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कर्जमाफी किसानों के लिये राहत है या राजनीति के लिये सुकून

तो देश की इकनॉमी का सच है क्या । क्योंकि एक तरफ 12 लाख 60 हजार करोड़ का कर्ज देशभर के किसानों पर है । जिसे माफ करने के लिये तमाम राज्य सरकारों के पास पैसा है नहीं । तो दूसरी तरफ 17 लाख 15 हजार करोड की टैक्स में माफी उद्योग सेक्टर को सिर्फ बीते तीन वित्तीय वर्ष में दे दी गई । यानी उघोगों को डायरेक्ट या इनटायरेक्ट टैक्स में अगर कोई माफी सिर्फ 2013 से 2016 के दौरान ना दी गई होती तो उसी पैसे से देशभर के किसानो के कर्ज की माफी हो सकती थी । तो क्या वाकई किसान और कारोबारियों के बीच मोटी लकीर खिंची हुई है । या फिर किसान सरकार की प्रथामिकता में कभी रहा ही नहीं । ये सवाल इसलिये क्योकि एक तरफ एनपीए या उगोगो को टैक्स में रियायत देने पर सरकार से लेकर बैंक तक खामोश रहते हैं। लेकिन दूसरी तरफ किसानों की कर्ज माफी का सवाल आते ही महाराष्ट्र से लेकर पंजाब तक के सीएम तक केन्द्रीय सरकार से मुलाकात कर पैसों की मांग करते हैं। और केन्द्र सरकार किसानों का मुद्दा राज्य का बताकर पल्ला झाड़ती है तो एसबीआई चैयरमैन किसानों की कर्ज माफी की मुश्किलें बताती है । तो किसान देश की प्राथमिकता में कहां खड़ा है । ये सवाल इसलिये जिस तरह खेती राज्य का मसला है, उसी तरह उद्योग भी राज्य का मसला होता है । और इन दो आधारों के बीच एक तरफ केन्द्रीय मंत्री संतोष गंगवार ने राज्यसभा में 16 जून 2016 को कहा , उघोगो को तीन बरस [ 2013-2016] में 17 लाख 15 हजार करोड रुपये की टैक्स माफी दी गई । तो दूसरी तरफ कृषि राज्य मंत्री पुरुषोत्तम रुपाला ने नंवबर 2016 में जानकारी दी किसानों पर 12 लाख 60 हजार रुपये का कर्ज है । जिसमें 9 लाख 57 हजार करोड रुपये कमर्शियल बैक से लिये गये है ।

और इसी दौर में ब्रिक्स बैंक के प्रजीडेंट के वी कामत ने कहा कि 7 लाख करोड का एनपीए कमर्शियल बैंक पर है ।  यानी एक तरफ उघोगो को राहत । दूसरी तरफ उघोगों और कारपोरेट को कर्ज देने में किसी बैक को कोई परेशानी नहीं है। लेकिन किसानों के कर्ज माफी को लेकर बैंक से लेकर हर सरकार को परेशानी। जबकि देश का सच ये भी है कि जितना लाभ उठाकर उघोग जितना रोजगार देश को दे नही पाते, उससे 10 गुना ज्यादा लोग खेती से देश में सीधे जुड़े हैं। आंकड़ों के लिहाज से समझें तो संगठित क्षेत्र में महज तीन करोड रोजगार हैं। चूंकि खेती से सीधे जुड़े लोगों की तादाद 26 करोड है। यानी देश की इक्नामी में जो राहत उघोगों को, कारपोरेट को या फिर सर्विस सेक्टर में भी सरकारी गैर सरकारी जितना भी रोजगार है, उनकी तादाद 3 करोड़ है । जबकि 2011 के सेंसस के मुताबिक 11 करोड 80 लाख अपनी जमीन पर खेती करते है । और 14 करोड 40 लाख लोग खेत मजदूर है । यानी सवा करोड की जनसंख्या वाले देश की हकीकत यही है कि हर एक रोजगार के पीछ अगर पांच लोगों का परिवार माने तो संगठित क्षेत्र से होने वाली कमाई पर 15 करोड़ लोगों का बसर होता है। वहीं खेती से होने वाली कमाई पर एक सौ दस करोड़ लोगों का बसर होता है । और इन हालातों में अगर देश की इक्नामी का नजरिया मार्केट इक्नामी पर टिका होगा या कहे पश्चिमी अर्थवयवस्था को भी भारत अपनाये हुये है तो फिर जिन आधारों पर टैक्स में राहत उद्योगों को दी जाती है । या बैंक उद्योग या कारपोरेट को कर्ज देने से नहीं कतराते तो उसके पीछे का संकट यही है कि अर्थशास्त्री ये मान कर चलते है कि खेती से कमाई देश को नहीं होगी । उद्योगों या कारपोरेट के लाभ से राजस्व में बढोतरी होगी ।

यानी किसानों की कर्ज माफी जीडीपी के उस हिस्से पर टिकी है जो सर्विस सेक्टर से कमाई होती है । और देश का सच भी यही है खेती पर चाहे देश के सौ करोड़ लोग टिके है लेकिन जीडीपी में खेती का योगदान महज 14 फिसदी है । तो इन हालातो में जब यूपी में किसानों की कर्ज माफी का एलान हो चुका है तो बीजेपी शासित तीन राज्यों में हो क्या रहा है जरा इसे भी देख लें। मसलन हरियाणा जहा किसान का डिफॉल्टर होना नया सच है
। आलम ये कि हरियाणा के 16.5 लाख किसानों में से 15.36 लाख किसान कर्जदार हैं । इन किसानों पर करीब 56,336 करोड़ रुपए का कर्ज है, जो 2014-15 में 40,438 करोड़ रुपए था । 8.75 लाख किसाने ऐसे हैं, जिन्होंने कमर्शियल बैंक, भूमि विकास बैंक, कॉपरेटिव बैंक और आणतियों से कर्ज लिया हुआ है । और कर्ज के कुचक्र में ऐसे फंस गए हैं कि अब कर्ज न निगलते बनता है न उगलते।

किसानों की परेशानी ये है कि वो फसल के लिए बैंक से कर्ज लेते हैं। ट्रैक्टर, ट्यूबवैल जैसी जरुरतों के लिए जमीन के आधार पर भूमि विकास बैंक या कॉपरेटिव सोसाइटी से लोन लेता है। मौसम खराब होने या फसल बर्बादी पर कर्ज का भुगतान नहीं कर पाता तो अगली फसल के लिए आढ़तियों के पास जाते हैं। और फिर फसल बर्बादी या कोई भी समस्या न होने पर डिफॉल्टर होने के अलावा कोई चारा नहीं रहता। लेकिन-अब यूपी में जिस तरह किसानों का कर्ज माफ हुआ है, हरियाणा के किसान भी यही मांगने लगे हैं। और दूसरा राज्य है राजस्धान । जहा किसानो को कर्ज देने की स्थिति में सरकार नहीं है । लेकिन राजस्धान का संकट ये है कि एक तरफ कर्ज मांगने वाले किसानो की तादाद साढे बारह हजार है तो दूसरी तरफ वर्ल्ड बैंक से किसानो के लिये जो 545 करोड रुपये मिले लेकिन उसे भी सरकार खर्च करना भूल गई और इसी एवज में जनता का गाढ़ी कमाई के 48 करोड़ रुपए अब ब्याज के रुप में वसुधंरा सरकार वर्ल्ड बैंक को भरेगी । दरअसल वर्ल्ड बैंक के प्रोजेक्ट की शुरुआत 2008 में हुई थी,जब वसुंधरा सरकार ने राजस्थान एग्रीकल्चर कांपटिटवेसन प्रोजेक्ट बनाया था और
फंडिंग के लिए वर्ल्ड बैंक को भेजा गया था । वर्ल्ड बैंक के इस प्रोजेक्ट के तहत कृषि, बागवानी, पशुपालन, सिंचाई और भूजल जैसे कई विभागों को मिलकर किसानों को कर्ज बांटने की योजना थी । वसुंधरा सरकार गई तो कांग्रेस की गहलोत सरकार आई और उसने 2012 में फंडिंग के लिए 832 करोड़ रुपए का प्रोजेक्ट वर्ल्ड बैंक को दिया । वर्ल्ड बैंक ने 545 करोड़ रुपए 1.25 फीसदी की ब्याज दर पर राजस्थान सरकार को दे दिए. लेकिन 2016 तक इसमें से महज 42 करोड़ ही सरकार किसानों को बांट पाई ।यानी एक तरफ किसानों को कर्ज नहीं मिल रहा। और दूसरी तरफ वर्ल्ड बैंक के प्रोजेक्ट के तहत जो 545 करोड़ रुपए में से जो 42 करोड बांटे भी गये वह किस रुप में ये भी देख लिजिये । 17 जिलों में यंत्र, बीज और खाद के लिए सिर्फ 14 लाख 39 हजार रुपए बांटे गए । फल, सब्जी, सोलर पंप के लिए 3 लाख 13 हजार रुपए। जल संग्रहण के लिए 7 लाख दो हजार रुपए बांटे गए । पशुपालन के लिए 2 लाख 19 हजार रुपए दिए ।नहरी सिंचाई निर्माण के लिए 2 लाख 36 हजार रुपए दिए गए । और भू-जल गतिविधियों के लिए 11 लाख 50 हजार रुपए बांटे गए । यानी सवाल सरकार का नहीं सरोकार का है । क्योकि अगर सरकार खजाने में पैसा होने के  बावजूद जनकल्याण का काम सरकार नहीं कर सकती तो फिर सरकार का मतलब क्या है। और तीसरा राज्य महाराष्ट्र जहां बीते दस बरस से किसानो का औसत खुदकुशी का आलम यही है कि हर तीन घंटे में एक किसान खुदकुशी करता है । खुदकुशी करने वाले हर तीन में से एक किसान पर 10 हजार से कम का कर्ज होता है । हालात है कितने बदतर ये 2015 के एनसीआरबी के आंकडों से समझा जा सकता है । 2015 में 4291 किसानों ने खुदकुशी की । जिसमें 1293 किसानो की खुदकुशी की वजह बैक से कर्ज लेना था । जबकि 795 किसानो ने खेती की वजह से खुदकुशी की । यानी खुदकुशी और कर्ज महाराष्ट्र के किसानों की बड़ी समस्या है, जिसका कोई हल कोई सरकार निकाल नहीं पाई।

और अब यूपी में किसानों की कर्ज वापसी के बीच महाराष्ट्र के देवेन्द्र फडणवीस सरकार पर ये दबाव पड़ना तय है कि वो भी महाराष्ट्र के किसानों के लिए कर्जवापसी की घोषणा करें। क्योंकि विपक्ष और सरकार की सहयोगी शिवसेना लगातार ये मांग कर रहे हैं और महाराष्ट्र में कई जगह धरना-प्रदर्शन हो रहे हैं। यानी यूपी की कर्जमाफी किसानो के लिये राहत है या राजनीतिक के लिये सुकून । इसका फैसला भी अब हर चुनाव में होगा। .

किस खिड़की पर हो तुम?

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फिज़ां


सोचता था कि इतनी है ज़मीं कहाँ तक जा पाऊँगा

अंजाने

धूप खिड़कियों से अंदर आती।



देखता था खिड़की से बाहर धूप फैली अनंत तक।

अंदर बातचीत।

कुछ पुरानी, कुछ आने वाले कल की।

साथ बुनते स्वप्न गीत

हम ज़मीं पर लेट जाते। धूप हमें छूती और बादलों से रूबरू होते ही



हम हाथों में हाथ रख खड़े हो जाते।

कहाँ आ पहुँचा

गड़गड़ाते काले बादल धूप निगलते

किसके नाच की थाप से काँपती धरती

मनपाखी डरता है



ढूँढता हूँ धूप

किस खिड़की पर हो तुम? (रेवांत 2017)




The Environs

I used to wonder how far I can go in this wide world

Unknown to me

The sun came in from the windows.



From my window I saw sun spread afar beyond the horizons.

Inside was our chit chat.

A bit about the past, and a bit future.

We composed dream songs together

And lay down on the floor. The sun caressed us and the moment it met the clouds


we were up holding our hands together.

Where am I now

Thundering dark clouds consume the sun

Who dances that the Earth shivers

My soul fears




I keep looking for the sun

On which window do I find you? p { margin-bottom: 0.25cm; line-height: 120%; }a:link { }

रघु ठाकुर

रविवार - Mon, 03/04/2017 - 21:30
गांधी तो सब के हैं

राम पुनियानी

रविवार - Mon, 03/04/2017 - 21:30
अतीत का सांप्रदायिकिकरण

स्किल इंडिया; एक विकास विरोधी अभियान

दखल की दुनिया - Mon, 03/04/2017 - 11:17

चन्द्रिका (मूलरूप से जागरण में प्रकाशित)
हर वक्त के अपने मूल्य होते हैं. वक्त बदलता है और मूल्य बदल जाते हैं. विकास हमारे वक्त का ऐसा मूल्य बन चुका है जिसे फिलहाल सामूहिक तौर पर लोगों में स्वीकृति मिली हुई है. जबकि विकास के कई आयाम हैं और इसके कई परिणाम. परिणाम वर्तमान के भी हैं और भविष्य के भी हैं. जिसे विकास कहकर आज बढ़ावा दिया जा रहा है जरूरी नहीं कि आने वाले भविष्य में उसको उसी तरह स्वीकार किया जाए. भाजपा द्वारा स्किल इंडिया की अवधारणा भी इसी विकास की बात से निकल कर आई है. लोगों में स्किल पैदा कर सरकार उन्हें बेहतर बनाने का दावा पेश कर रही है. उसे हमारे एजुकेशन का एक नया पैटर्न बताया जा रहा है. फिर वह क्या फर्क है जो स्किल और एजुकेशन को अलग कर रहा है. क्या एजुकेशन के बजाय सिर्फ स्किल पैदा करना एक विकसित समझ है.  दरअसल यह हमारी शिक्षा और ज्ञान के मायने को बदलने की एक कवायद है. उसके स्वरूप को बदला जा रहा है. इस तरह से बदला जा रहा है कि जिसके तात्कालिक असर भले न दिखें पर आने वाले वक्त में हम एक मूढ़ समाज बनाने की तैयारी कर रहे हैं. एक ऐसा समाज जो एक ही दिशा में सोचने वाला हो, एक ही जैसा सोचने वाला हो. एक यूनीलीनियर दुनिया बनाने की परियोजना का यह एक हिस्सा है. जो उस ज्ञान परंपरा को ख़त्म कर दे जिसके तहत बहुआयामी और आलोचनात्मक सोच विकसित होती है. जो लोकतंत्र के विचार को और मजबूत बनाती है. शिक्षा के बजट में लगातार कटौती की जा रही है. शोध करने और विमर्ष करने के दायरे भी कम किए जा रहे हैं. यूजीसी नोटीफिकेशन2016 के तहत सभी विश्वविद्यालयों में शोध को सीमित कर दिया गया है. जे.एन.यू. जैसे शोध आधारित देश के अग्रणी संस्थानों में 80% से ज्यादा सीटें इस वर्ष कम कर दी गई हैं. देश के अन्य केंद्रीय विश्वविद्यालयों के भी हालात कुछ ऐसे ही है. यह सरकार के विकास की नई दिशा है. जो ज्ञान के उस दायरे को कमजोर करना चाहती है जहां असहमति और मतभिन्नता का स्पेस निर्मित होता है. वह अपनी अलग-अलग योजनाओं के जरिए उस कल्याणकारी राज्य की परियोजना को ख़त्म कर रही है जिसके तहत शिक्षा, स्वास्थ्य को नागरिक अधिकार बनाया जाना था. वर्तमान सरकार और इसके पहले की सरकारें दोनों में ही इस योजना को लेकर कोई अंतर नहीं दिखता. वे निजीकरण को बढ़ावा और राज्य द्वारा लोगों को दी जाने वाली सुविधाओं में कटौती कर रही हैं. जब सरकार शिक्षा के बजट कम करेगी तो संस्थानों के लिए अपने संसाधन सीमित करने के अलावा कोई चारा नहीं बचता. शोधार्थियों को शोध के लिए दी जाने वाली सीमित राशि भी देना उनके लिए मुश्किल हो जाएगा. लिहाजा वे संस्थानों के लिए कुछ इस तरह के नियम बनाएंगे कि शोध और अध्ययन में कम लोग दाख़िला पा सकें. इसलिए शिक्षा में बजट की कटौती लोगों के ज्ञान की कटौती भी है. यहां मूल समस्या सरकार की मंसा में है. निजीकरण को बढ़ावा देने वाली उस प्रक्रिया में है. पब्लिक संसाधनों का सीमित होना या उच्च शिक्षा में सीटों का कम होना तो बस इसका उत्पाद भर है. जो निजीकरण के ख़िलाफ नहीं हैं, जिन्हें शिक्षा में बजट कटौती से परेशानी नहीं है. उन्हें केन्द्रीय विश्वविद्यालयों में और कम पैसों में अपने बच्चों के न पढ़ पाने का कोई मलाल नहीं होना चाहिए. जबकि पढ़ने वाली आबादी बढ़ रही है. शिक्षा के संस्थान भी बढ़े हैं पर संस्थानों की यह बढ़ोत्तरी निजी क्षेत्रों में हुई है. दुनिया के बड़े निवेशक व्यापारी एक नए निवेश के रूप में शिक्षा को देख रहे हैं और उसमे निवेश कर रहे हैं. जबकि उनके पास कोई कल्याणकारी योजना नहीं है कि वे समाज के लोगों को शिक्षित करना चाहते हैं. उनका यह भी उद्देश्य नहीं है कि वे दुनिया में ज्ञान की कोई परंपरा विकसित करना चाहते हैं. वे इसे एक लाभ के क्षेत्र के रूप में ही देख रहे हैं. उनके लाभ दोहरे हैं. आर्थिक लाभ के अलावा वे अपने मुताबिक मानव संसाधन को निर्मित कर रहे हैं. एक वर्ग के बच्चे, एक तरह के मूल्य, एक तरह का माहौल, एक खास तरह के कंक्रीट, जैसा कि निजी संस्थानों में दिखता है. शिक्षा के संस्स्थानों में किताबों के अलावा हमारे ज्ञान निर्माण में इस परिवेश की भी भूमिका होती है. यह एक मशीन सा है जो एक सांचे से एक ही तरह का पुर्जा पैदा करती है. वह वहीं फिट होगा जहां उसकी जगह है. वहां आलोचनात्मक समझदारी या संवेदनशीलता नहीं पनप सकती. वे बहुआयामी नहीं हो सकते. निजी क्षेत्र को इसकी जरूरत भी नहीं है कि सवाल और आलोचना पैदा हो. यह उसकी व्यवस्था के लिए ही परेशानी बनती है. तो राज्य लोगों के लिए शिक्षा की जो क्राइसिस पैदा कर रहा है वह निजी क्षेत्र के लिए लाभदायक बन रहा है.इसलिए सरकार के द्वारा शिक्षा के बजट में कटौती और निजी संस्थानों के बढ़ने का सीधा संबंध है. जब सरकार शिक्षा मुहैया नहीं कराएगी तो व्यवसायी उसे अपना नया क्षेत्र बनाएंगे. यह योजना हमारे समाज के ज्ञान को भी कमजोर करेगी. क्योंकि समाज विज्ञान के विषयों के अध्ययन अध्यापन में भी कमी आएगी. ये ऐसे विषय हैं जो रोजगार से ज्यादा अपने समाज को समझने और उसे नई दिशा में आगे बढ़ाने के चिंतन को विकसित करते हैं. इनका प्रत्यक्ष लाभ नहीं दिखता. व्यवसायिक शिक्षा में ऐसे विषय संस्थानों के दायरे से बाहर होंगे. केवल कम्पनियों और फैक्ट्रियों की जरूरत के मुताबिक स्किल्ड लोग तैयार किए जाएंगे.नए विकास में ज्ञान और शिक्षा देने के बजाय स्किल्ड बनाने की घोषणा सरकार ने कर ही दी है. यह वर्तमान सरकार के विकास की योजनाओं में से एक है. अंग्रेजी का यह स्किल्ड हिन्दी का कारीगर है. भाषा कई बार हमारे भीतर भ्रम पैदा करती है और चीजें उलट-पुलट जाती हैं. जाहिर सी बात है कि सरकारी उपक्रम कम होते गए हैं तो सरकार जो कारीगर तैयार कर रही है वह भी व्यवसायियों के लिए ही है. ऐसे में ज्ञान का मायने यही बन रहा है कि राज्य हमे व्यवसायियों के हाथो में सौंप रहा है. शिक्षित होने के लिए और शिक्षित होने के बाद भी. क्योंकि स्किल्ड बनाने के जरिए हमारे शिक्षा और ज्ञान की अवधारणा को ही बदला जा रहा है. शिक्षित होने और स्किल्ड होने के मायने एक जैसे नही हैं. कारीगर बनाना और ज्ञान अर्जित करना दोनों एक चीज नहीं है. ज्ञान का संबंध सीधे-सीधे नौकरियां पाने से ही नहीं था. बल्कि वह अपने समाज को समझना और सीखना था. आगे आने वाली पीढ़ी को अपने सीखे अनुभवों से और उन्नत करना था. इसे बदला जा रहा है. यह विकास के नाम पर दिया जाने वाला एक झांसा है. अपनी जरूरत के मुताबिक लोग स्किल्ड हो ही जाते हैं. किसी स्किल का होना कोई बुरी बात भी नहीं है. जरूरी सवाल यह है कि हमें क्यों स्किल्ड बनाया रहा है? हम किसके लिए स्किल्ड हो रहे हैं? क्या हमारे पढ़ने-लिखने और ज्ञान को इस स्किल्ड के जरिए अपदस्त तो नहीं किया जा रहा है. इसलिए एक तरफ विकास की बात करना और दूसरी तरफ स्किल इंडिया के जरिए लोगों से ज्ञान को छीनकर उनको कारीगर बनाना एक विकसित समझ नहीं है. यह एक तरह से ज्ञान और तार्किक सोच समझ को रोकना है. जहां हम अपने समाज में एक विषय पर विभिन्न मत रखते थे और वे मतभेद के अन्तर्विरोध ही थे जो हमारे समाज और ज्ञान को और आगे बढ़ाते थे. उसे ख़त्म करने की कवायद का ही नाम है स्किल इंडिया. जिसका असर हमारे समाज को लंबे समय में दिखेगा. फिलहाल तो जो चमक रहा है उसे हर कोई सोना ही कहने को आतुर दिख रहा है.

उमस बढ़ रही है

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डर


मैं सोच रहा था कि उमस बढ़ रही है

उसने कहा कि आपको डर नहीं लगता

मैंने कहा कि लगता है

उसने सोचा कि जवाब पूरा नहीं था

तो मैंने पूछा - तो।

बढ़ती उमस में सिर भारी हो रहा था

उसने विस्तार से बात की -

नहीं, जैसे खबर बढ़ी आती है कि

लोग मारे जाएँगे।

मैंने कहा - हाँ।

मैं उमस के मुखातिब था

यह तो मैं तब समझा जब उसने निकाला खंजर

कि वह मुझसे सवाल कर रहा था।(रेवांत 2017)




Fear




I thought that it was getting more humid

He said don’t you feel afraid

I said well I do

He thought that I had not quite replied

Then I asked – so

My head was getting stuffy with rising humidity

He explained -

You know, we hear

that people will be killed

I said – ya

I was dealing with the humidity

It hit me when he pulled out the knife

That he was interrogating me. 

सीमाहीन अन्याय: असीमानंद और साईबाबा पर अदालती फैसले

हाशिया - Sat, 01/04/2017 - 15:39

आनंद तेलतुंबड़े का नियमित स्तंभ.

महज 24 घंटे से भी कम के भीतर ऐसे दो फैसले आए, जिनकी वजह से देश भर में सिहरन की एक लहर दौड़ गई. पहला फैसला 7 मार्च को महाराष्ट्र की गढ़चिरोली सत्र अदालत से आया, जिसमें दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर जी.एन. साईबाबा और चार दूसरे लोगों को नक्सली गतिविधियों में मदद करने और उन्हें बढ़ावा देने के लिए गैर कानूनी गतिविधियां (निरोधक) अधिनियम (यूएपीए) और भारतीय दंड संहिता की विभिन्न धाराओं के तहत आजीवन कैद की सजा सुनाई गई. छठे आरोपित को 10 साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई गई.

दूसरा फैसला अगले दिन नेशनल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी (एनआईए) की जयपुर विशेष अदालत का था, जिसमें स्वघोषित साधु और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के पूर्व कार्यकर्ता स्वामी असीमानंद और दूसरे छह लोगों को बरी कर दिया गया. ये लोग 2007 के समझौता एक्सप्रेस विस्फोट (जिसमें अड़सठ लोग मारे गए थे और दर्जनों घायल हुए थे), हैदराबाद मक्का मस्जिद विस्फोट (सोलह मौतें, सौ जख्मी) और अजमेर दरगाह विस्फोट (तीन मौतें, 17 जख्मी) मामलों में अभियुक्त थे. फैसले ने सनसनीखेज अजमेर दरगाह धमाके के मामले में तीन दूसरे लोगों को कसूरवार ठहराया. जाहिर तौर पर, अगर कठोर यूएपीए द्वारा तैयार की गई अपराध की धारणा को छोड़ दें तो साईबाबा के मामले में अदालत द्वारा किसी अपराध का जरा भर भी हवाला नहीं दिया गया है. वहीं दूसरा फैसला जिस मामले के बारे में है, उनमें लोग सचमुच में मारे गए थे, जब अपराधियों ने 13वीं सदी की इस पवित्र दरगाह पर पांच हजार श्रद्धालुओं के एक मजमे के बीच बम धमाके किए. लेकिन इस मामले में मुख्य अभियुक्त को ही छोड़ दिया गया. अगर कोई और वक्त होता तब भी इन फैसलों को दुर्भाग्यपूर्ण संयोग मानते हुए उन पर अफसोस जाहिर किया जाता. लेकिन भाजपा के सत्ता में होने से ये सिर्फ एक मनहूस चलन को ही मजबूती देते हैं कि न्यायपालिका की संस्थागत साख की कीमत पर हिंदुत्व के अपराधियों का बचाव किया जा रहा है और इसके विरोधियों को कुचला जा रहा है और इसमें यह संस्था इसकी फरमाबरदार की भूमिका निभा रही है.

असीमानंद की मासूमियत

11 सितंबर के बाद संयुक्त राज्य अमेरिका जब पूरी दुनिया में मुसलमानों को आतंकवादियों के रूप में बदनाम कर रहा था, तो जायनिस्टों के बाद इसका सबसे बड़ा फायदा भारत में हिंदुत्ववादी ताकतों ने उठाया. संयुक्त राज्य के ‘आतंक के खिलाफ युद्ध’ ने मुसलमानों के खिलाफ हिंदुत्ववादी ताकतों की ऐतिहासिक रंजिश की पुष्टि करते हुए बढ़ावा दिया. हालांकि आजादी के बाद पहली आतंकी कार्रवाई खुद इन्हीं हिंदुत्ववादी ताकतों द्वारा की गई थी, जब उन्होंने मुसलमानों के प्रति नरमी दिखाने के लिए मो.क. गांधी की हत्या कर दी थी. लेकिन अजीब विरोधाभासी तरीके से आतंकवादी होने की छवि मुसलमानों के साथ जोड़ दी गई है. पहली बार, असीमानंद के कबूलनामों ने हिंदुत्ववादियों को आतंकवादी समूह के रूप में उजागर किया. हालांकि उसका यह कहना था कि उनका आतंक मुसलिम आतंक के जवाब में था, लेकिन जिन ज्यादातर हमलों को मुसलिम हमलों के रूप में देखा जाता है, मुमकिन है कि वे भी इन्हीं लोगों की करतूतें हों.

तत्कालीन गृह मंत्री पी. चिदंबरम ने अगस्त 2010 में पहली बार राज्य पुलिस प्रमुखों को ‘भगवा आतंकवाद’ के खतरों से आगाह कराया था. तब गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने राज्य में भगवा गौरव आंदोलन चला कर इसका जवाब दिया. यह सब असीमानंद के कबूलनामे की वजह से ही हुआ था, जो पुलिस द्वारा हिरासत में यातना देकर हासिल नहीं किया गया था. यह बॉटनी में पोस्ट ग्रेजुएट और मंजे हुए आरएसएस कर्मी असीमानंद उर्फ जतिन चटर्जी का एक बयान था, जो अनेक आतंकी साजिशों का मास्टरमाइंड था. यह क्रिमिनल प्रोसीजर कोड की धारा 164 के तहत 18 दिसंबर 2010 को तीस हजारी अदालत में मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट दीपक दबास के सामने दिया गया एक बयान है, जो इंडियन एविडेंस एक्ट 1872 के तहत एक सबूत के दायरे में आता है. उसने यह कबूल किया कि वह और दूसरे हिंदू कार्यकर्ता मुसलिम धार्मिक स्थलों पर बम धमाकों में शामिल थे, क्योंकि वे हरेक इसलामी आतंक का जवाब ‘बम के बदले बम’ की नीति से देना चाहते थे. इसके अलावा, कारवां  पत्रिका के साथ एक टेप किए इंटरव्यू में स्वामी ने यह उजागर किया था कि 2006 से 2008 के बीच के भयानक धमाकों की जिम्मेदारी मोहन भागवत द्वारा सौंपी गई थी, जो तब आरएसएस के महासचिव थे, लेकिन उन्होंने सावधान किया था कि “...तुम इसको संघ से नहीं जोड़ना.” बाद में असीमानंद इन दोनों ही साफ साफ और नहीं पलटे जा सकने वाले बयानों से मुकर गया.

असीमानंद का कबूलनामा, अनेक मामलों की तफ्तीश में हासिल होने वाले तथ्यों से मेल भी खाता था. समझौता एक्सप्रेस धमाके (2007) में अभियुक्त दयानंद पाण्डेय के लैपटॉप से जब्त ऑडियो टेपों ने यह पुष्टि की कि हिंदुत्व गिरोह देश भर में बम धमाकों की साजिश रच कर उन्हें अंजाम दे रहे थे, जिसमें मालेगांव (2006 और 2008), अजमेर शरीफ (2007) और मक्का मस्जिद (2007) धमाके शामिल हैं. पुलिस ने इनमें से हरेक मामले में दर्जनों मुसलमान युवकों को पकड़ा, हिरासत में रखा और यातनाएं दीं तथा हमेशा की तरह इन मामलों में इस्लामी मॉड्यूलों के शामिल होने की कहानी गढ़ी. लेकिन इन मामलों में हिंदुत्व गिरोह के हाथ को उजागर करने का श्रेय महाराष्ट्र एटीएस के तत्कालीन प्रमुख हेमंत करकरे को जाता है, जिनको 26 नवंबर के हमले में मार दिया गया. लेकिन गढ़ी हुई कहानियों का झूठ उजागर किए जाने के बाद भी, मुसलमान नौजवान 10 बरसों तक कैद में रहे और तब जाकर अदालत ने उन्हें बरी किया. इस भंडाफोड़ ने कम से कम दो जिंदगियां लीं: करकरे की मौत जो अभी भी एक रहस्य है और शाहिद आजमी की मौत, जिसको एक देशभक्त गुंडे का गुस्सा कह कर निबटा दिया गया. राजनीतिक इच्छाशक्ति के बिना यह मामला घिसटता रहा और 2014 में भाजपा के सत्ता में आने के बाद से, उनको अपने हाथ में लेने वाली एनआईए ने सभी सरगनाओं को छुड़ाने की साजिश रचनी शुरू कर दी है. मई 2016 में इसने साध्वी प्रज्ञा ठाकुर, शिवनारायण कलसांगरा, श्याम साहू, प्रवीण तक्कलकी, लोकेश शर्मा और धन सिंह तथा पांच दूसरे लोगों पर से 2008 के मालेगांव धमाके के मामले में आरोप वापस ले लिए, जबकि करकरे की तफ्तीश को ‘सवालों के घेरे में’ और ‘संदिग्ध’ बताते हुए बाकी सभी 10 अभियुक्तों पर से कठोर मकोका कानून के तहत आरोपों को हटा लिया गया है, जिसमें ले. कर्नल प्रसाद श्रीकांत पुरोहित शामिल है.

साईबाबा का अपराध

साईबाबा की 90 फीसदी विकलांगता और गिरती हुई सेहत के बावजूद, जिस जोरदार तरीके से राज्य ने उनकी जमानत का विरोध किया और अदालतों ने जिस तरह से उसे स्वीकार किया, उससे यह साफ था कि राज्य माओवादियों के ‘शहरी नेटवर्क’ के लिए इसे एक सबक बनाना चाहता था. इस मामले की डॉ. विनायक सेन के मामले के साथ अनोखी समानता है, जिनकी ऊंची प्रोफेशनल प्रतिष्ठा, सार्वजनिक सेवा के बेदाग रेकॉर्ड और उनके प्रति पूरी प्रगतिशील दुनिया की मुखर हमदर्दी के बावजूद उन्हें रायपुर सत्र अदालत द्वारा आजीवन कैद की सजा सुनाई गई और उन्हें लगातार जमानत देने से मना किया जाता रहा, ताकि यह उन सबके लिए एक मिसाल बन जाए जिनके दिल में माओवादियों को लेकर जरा भी नरमी है. राज्य के इस मंसूबे में विनायक सेन की बेगुनाही ही सबसे बड़ा कसूर बन गई. साईबाबा के मामले में, महाराष्ट्र सरकार ने छत्तीसगढ़ को भी पीछे छोड़ दिया है, जिसने अपने शिकार के रूप में राजधानी के एक प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय में काम करने वाले एक 90 फीसदी विकलांग प्रोफेसर को चुना. साईबाबा एक रेडिकल कार्यकर्ता रहे हैं और उन्होंने संघर्षरत जनता के लिए, जिसको सरकार पूरी तरह माओवादी कहती है, अपनी हमदर्दी को कभी छुपाया नहीं. लेकिन व्हीलचेयर पर चलने वाला एक शख्स, जो बिना किसी मदद के चल-फिर भी नहीं सकता, वह सोचने और लिखने से आगे जाकर क्या कुछ कर सकता है? लेकिन राज्य ठीक यही बात दिखाना चाहता है. अगर वह साईबाबा के साथ ऐसा कर सकता है, तो वह किसी के साथ भी ऐसा कर सकता है. इस मामले में उनके सह-आरोपितों हेम मिश्रा, जो जेएनयू के छात्र रहे हैं, और प्रशांत राही को भी, जो एक स्वतंत्र पत्रकार और कार्यकर्ता हैं, आतंकित करने के इस मंसूबे का हिस्सा बनाया गया. बाकी तीन आदिवासियों थे, ताकि इस असंभव गठजोड़ को बना कर पेश किया जा सके.

गढ़चिरोली सत्र अदालत ने उन सभी को यूएपीए की धाराओं 13, 18, 20, 38 और 39 के साथ साथ आईपीसी की धारा 120-बी के तहत कसूरवार ठहराया. उन्हें प्रतिबंधित पार्टी भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) और इसके “फ्रंट” रेवॉल्यूशनरी डेमोक्रेटिक फ्रंट (आरडीएफ) के साथ रिश्ते रखने के लिए सजा दी गई. विनायक सेन के मामले में ही जस्टिस मार्कण्डेय काटजू और ज्ञान सुधा मिश्रा की पीठ ने यह साफ-साफ कहा था कि महज एक प्रतिबंधित संगठन का सदस्य होना किसी को अपराधी नहीं बनाता, जब तक कि उसने हिंसा का सहारा न लिया हो या लोगों को हिंसा के लिए न भड़काया हो. मई 2015 में केरल उच्च न्यायालय ने माओवादी होने के संदेह में 2014 में पकड़े गए श्याम बालाकृष्णन को यह कहते हुए रिहा कर दिया कि “माओवादी होना कोई अपराध नहीं है.” उच्च न्यायालय ने यह गहरी बात कही कि “लोगों के लिए एक उम्मीदें रखना एक बुनियादी मानवाधिकार है” और “कानूनों से भटकाव को वर्दी की ओट में” छुपाने के लिए राज्य की आलोचना की, जहां कानून को “बचाने वाले ही इसका उल्लंघन करने वाले” बन जाते हैं. इसके बावजूद आरोपितों के माओवादी रिश्तों को मुद्दा बनाया गया. यहां 827 पन्नों के फैसले पर बिंदुवार विचार करना मुमकिन नहीं है, लेकिन जैसा कि वकीलों ने इसके बारे में ध्यान दिलाया है, इस फैसले में कानूनों की साफ साफ अनदेखी की गई है और तथ्यों की तरफ से जानबूझ कर आंखें मूंदी गई हैं. साफ जाहिर है कि यह फैसला पुलिस और राजनेताओं के दबावों के रंग में रंगा हुआ है, जैसा कि ज्यादातर निचली अदालतों के मामले में होता है.

राज्य की बदमाशी

ये दोनों मामले राज्य की बदमाशी को उजागर करते हैं. नवउदारवादी दौर में, राज्यों में फासीवादी होने के अंतर्निहित रुझान होते हैं, ताकि वे बाजार की हुकूमत को सुनिश्चित कर सकें. ये रुझान पूरी दुनिया में देखे जा रहे हैं, वहीं भारत में ब्राह्मणवाद की वर्चस्वशाली विचारधारा के साथ इसकी अच्छी ताल-मेल बैठ गई है. चाहे कोई भी दल सत्ता में रहे, भारत में राज्य हमेशा ही वही पूंजीवाद-परस्त, हिंदू-परस्त, ऊंची जातियों का हिमायती और मुट्ठी भर लोगों की हुकूमत बना रहता है. भाजपा इस पर जिस बेशर्मी से काबिज़ हो रही है, उससे बस यह राज्य और आक्रामक और मर्दानगी भरा बन रहा है, जिसकी झलक मोदी के रोबीले अंदाज में देखी जा सकती है. बहुत करीब दिख रहे हिंदू राष्ट्र के अपने लक्ष्यों को हासिल करने की खातिर, यह प्रतिरोध को नेस्तनाबूद करने के लिए किसी भी हद तक जा सकती है. इस दिशा में संस्थागत रुकावटों को इसने मोटे तौर पर अपने भगवाकरण अभियान के जरिए दूर कर दिया है, अब यह बची-खुची असहमतियों को भी कुचल रही है. हकीकत ये है कि 2014 के बाद से यह रुझान इतना साफ हो गया है कि ऐसे फैसलों का अंदाजा आप पहले से ही लगा सकते हैं. गुजरात में 2002 के कत्लेआम को अंजाम देने वाले सभी लोग कानून के फंदे से बाहर जा चुके हैं, बल्कि उनको अच्छा खास इनाम तक मिल चुका है. और तीस्ता सीतलवाड़ जैसे जिन लोगों ने प्रतिरोध खड़ा करने की कोशिश की है, उन्हें अलग-अलग तरह से परेशान और आतंकित किया जा रहा है.

अपने दावे के उलट हिंदुत्ववादी ताकतें हमेशा ही अपने काम को बेरहमी से अंजाम देती रही हैं; आखिर इस दुनिया में उनके बुनियादी प्रेरणास्रोत हिटलर और मुसोलिनी जैसे लोग रहे हैं और बुद्ध जैसे लोगों से वे नफरत करते आए है. हिंदुत्व के पूर्वज सावरकर ‘राजनीति का हिंदूकरण और हिंदुओं का सैन्यीकरण’ करना चाहते थे. 1999 में ग्राहम स्टेंस और उनके दो बेटों को जला कर हत्या, 2002 में दुलीना में पांच दलितों और 2015 में दादरी में मोहम्मद अखलाक की पीट पीट कर हत्या; उना के पास मोटा समाढियाला में चार दलित नौजवानों की निर्मम पिटाई या फिर नरेंद्र दाभोलकर, गोविंद पानसर और कलबुर्गी की हत्याएं इन ताकतों के क्रूर व्यक्तित्व की झलक देती हैं. आखिरकार जब वे अपनी सांस्कृतिक जड़ों का दम भरते हैं, तो हिंसा ही उनकी पहचान के रूप में सामने आती है, क्योंकि उनका धर्म ऐसा अकेला धर्म है, जिसके देवता हथियारों से लैस हैं. लेकिन यह ज़रूरी नहीं है कि राज्य भी अन्यायपूर्ण, हिंसक और अनैतिक बन जाए.

यह कल्पना करना एक गलतफहमी है कि इंसाफ के नाम पर साईबाबा और उनके सह-आरोपितों पर इस अन्यायपूर्ण और अनैतिक तरीके से निर्ममता से पेश आना उनके जैसे दूसरे लोगों के लिए एक सबक होगा. इसका कोई सबूत नहीं है कि ऐसे ‘सबक’ कभी अपने मकसद में कामयाब उतरे हों. इसके उलट, यह पुलिस मानसिकता माओवादियों के निर्माण को ही तेज करेगी. ये बदमाश राज्य की आतंकवादी कार्रवाइयों से लड़ने के जनता के इरादे को ही मजबूत करेगी.


समयांतर, अप्रैल 2017 में प्रकाशित.

उनको उगना है जैसे जंगली पौधे

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शब्द-खिलाड़ी



पागल हैं शब्दों को बाँधने वाले

शब्द तो पाखी हैं

फर फर उड़ते हैं

हम उन्हें हाथों से पकड़ते हैं

धमनियोंको पगडंडियाँ बना

साथ टहल आते हैं अँधेरी कोठियों तक




फिर कागज़ पर जड़ देते हैं

कि उनसे रोशनी मिले




पागल हैं बँधे शब्दों को

देख गीत गुनगुनाने वाले

शब्दों का क्या

उनको उगना है जैसे जंगली पौधे

हम देख

हँसते हैं खिसियाते हैं या

कभी दुबक जाते हैं गहरे कोनों में




शब्दों को देते हैं नाम

जैसे कि शब्द पहले शब्द नहीं थे

पागल हैं शब्दों से खेलने वाले।  (रेवांत 2017)


The Word-gamers


Crazy who peg the words
Words are  birds
They fly flapping their wings
We hold them with hands
Move together with them on lanes made of veins
to the dark rooms


And engrave them on paper
That they may show us light


Crazy those who sing
Watching words confined
Words do not care
They grow like wild plants
We watch
and smile or shy away or
Hide in dark corners


We name the words
Earlier words were not words
Crazy who play with words.  

वे सचमुच हक़ीक़ी इश्क में हैं

अक्सर मेरे साथ ऐसा होता है। कविताएँ छपती हैं। जीमेल से कट-पेस्ट करते 
हुए पी डी एफ फाइल से मिलान किए बिना कविताएँ एक दूसरे में गड्ड-मड्ड। 

इस पोस्ट से हाल में 'रेवांत' में प्रकाशित कुछ पुरानी कविताएँ क्रमवार लगा रहा 
हूँ -

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वे सुंदर लोग


आज जुलूस में, कल घर से, हर कहीं से

कौन पकड़ा जाता है, कौन छूट जाता है

क्या फ़र्क पड़ता है

मिट्टी से आया मिट्टी में जाएगा

यह सब किस्मत की बात है

इंसान गाय-बकरी खा सकता है तो

इंसान इंसान को क्यों नहीं मार सकता है?



वे सचमुच हक़ीक़ी इश्क में हैं

तय करते हैं कि आदमी मारा जाएगा

शालीनता से काम निपटाते हैं

कोई आदेश देता है, कोई इंतज़ाम करता है

और कोई जल्लाद कहलाता है



उन्हें कभी कोई शक नहीं होता

यह खुदा का करम यह जिम्मेदारी

उनकी फितरत है



हम ग़म ग़लत करते हैं

वे

पीते होंगे तो बच्चों के सामने नहीं

अक्सर शाकाहारी होते हैं

बीवी से बातें करते वक्त उसकी ओर ताकते नहीं हैं

वे सुंदर लोग हैं।



हमलोग उन्हें समझ नहीं आते

कभी कभी झल्लाते हैं

उनकी आँखों में अधिकतर दया का भाव होता है

अपनी ताकत का अहसास होता है उन्हें हर वक्त



हम अचरज में होते हैं कि

सचमुच खर्राटों वाली भरपूर नींद में वे सोते हैं।

वे सुंदर लोग।             (रेवांत - 2017)
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Pretty folks


Today it was from a march
Tomorrow it will be from home, from everywhere,
Someone is arrested, someone is releasedWho cares, ashes to ashesIt is all in your fateIf man can eat goats and cowsWhy can’t they eat humans?
Their love is of a higher orderThey decide that a man will be killedAnd they do it in a civilized waySomeone gives the orders, another finishes it offAnd someone else is the hangman
They have no self-doubtThis responsibility, this divine destinyis in their nature
We look for melting our sorrowsMay be they too drink but not in front of the childrenMore likely you find them vegetarianWhen speaking to their wives they do not look at themThey are pretty folks
They cannot understand usSometimes they get upsetMore frequently kindness pours out of their eyesThey are always aware of how powerful they are
We wonderthat they sleep in comfort snoring awayGosh, they are pretty folks.

कविता / प्रफुल्लित वातावरण में / राजेन्द्र राजन

यही वह जगह है - Thu, 30/03/2017 - 20:52

बहुत लंबे इंतजार के बाद नया युग आरंभ हुआ है

अब सुबह समय से होती है और प्रफुल्लित वातावरण में

वैसी ही हवा बहती है जैसी

अंधकार युग के विदा होने के बाद बहनी चाहिए

 

जिसके फलस्वरूप फूल खिलने लगे हैं

फसलें लहलहाने लगी हैं चिड़ियां गाने लगी हैं।

 

जिन्हें रास्ते से हटाना था हटा दिया गया है

जिन्हें रास्ते पर लाना था ला दिया गया है

सारे रास्तों की सारी बाधाएं दूर कर दी गई हैं

अब जाकर विकास ने पकड़ी है रफ्तार।

विकास इतना तेज चल रहा है कि लोग पीछे छूट जाते हैं

मगर उन्हें उनके हाल पर छोड़ नहीं दिया गया है

उन्हें विकास से जोड़ने के लिए कमेटियां

और योजनाएं बना दी गई हैं

और उन्हें बुलाकर या लाकर

जगह-जगह संबोधित भी किया जाता है।

 

विकास के रफ्तार पकड़ने के साथ ही

या उसके पहले से

आंकड़े एकदम दुरुस्त आने लगे हैं

अब आंकड़े जान लेने के बाद अलग से

सच्चाई जानने की जरूरत नहीं रहती।

 

जिसे वापस लाना था ला दिया गया है

जिसे भगाना था भगा दिया गया है

जिसे डराना था डरा दिया गया है

जिसे बचाना था बचा लिया गया है

कीमतों पर काबू पा लिया गया है

वे लोग काबू में हैं जिनकी कुछ कीमत है

जिसकी अभी -अभी कीमत लगी

उसकी खुशी देखते ही बनती है

बाकी यह सोचकर मुस्कराते हैं

कि मायूस दिखने से रही-सही कीमत भी जाती रहेगी।

 

इस तरह बने चतुर्दिक खुशनुमा माहौल में

नकारात्मक नजरिए के लिए गुंजाइश ही कहां बचती है

अब ना कहने के लिए बहुत हिम्मत जुटानी पड़ती है

सकारात्मक सोच का जोश इस कदर हावी है

कि घोषणा होती ही काम हुआ मान लिया जाता है

आश्वासन मात्र से होता है प्राप्ति का अहसास

वर्णन मात्र से छा जाता है संबंधित वस्तु के होने का विश्वास।

 

इस नवयुग की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि ऊंची-ऊंची कुर्सियों पर पहली बार ऐसे लोग बिठाये गए हैं

जिनका कद पद के अनुरूप है जिनको काबिलियत पर

शक नहीं किया जा सकता जो भरोसे के काबिल हैं

जो अलिखित निर्देशों को भी पढ़-समझ लेते हैं

और उन पर अमल करने को तत्पर रहते हैं

जिन्हें स्वयं सोचने की इच्छा या अवकाश नहीं

इसलिए जिनसे गलतियां नहीं होतीं और जो अपराध-बोध से दूर

सदा प्रसन्न रहते हैं बड़े फख्र से कहते हैं

हमारी अमूल्य सेवाओं के लिए

एक ही पुरस्कार पर्याप्त है

कि हमें निजाम में असीम निष्ठा रखने का

परम सौभाग्य प्राप्त है।

  • राजेन्द्र राजन
  • सभार-‘गांव के लोग’ से

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कविता /सबूत/राजेन्द्र राजन

यही वह जगह है - Thu, 30/03/2017 - 20:03

वे जो भी कहते हैं

चुपचाप मान लो

हुक्मरान सबूत नहीं देते।

सबूत नागरिकों को देने पड़ते हैं

उन्हें दिखाना पड़ता है हर मौके-बेमौके

प्रमाणपत्र

नागरिक होने का,मतदाता होने का,भारतीय

होने का

पते का,बैंक खाते का,कर अदायगी का

जन्म का,जाति का,शिक्षा का,गरीबी का

मकान का,दुकान का,खेत का,मजूरी का

चरित्र का,नौकरी का,सेवानिवृत्ति का

और कई बार खुद हाजिर होकर

बताना पड़ता कि आप खुद आप हैं

और जिंदा हैं।

सबूत देते रहना

नागरिक होने की नियति है

पर हुक्मरानों की बात कुछ और है

दाल में भले कुछ काला हो

उनका एलान या बयान भर काफी है

उस पर सवाल मत उठाओ

वरना संदिग्ध करार दिए जाओगे

तुम्हारे देशप्रेम पर शक किया जाएगा

फिर देशभक्ति का सबूत कहां से लाओगे?

  • राजेन्द्र राजन
  • (साभार- ‘गांव के लोग’)

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Not So Old European Ideas

Secularism is a European idea. And a recent one at that. Indeed it is. So is Nationalism. Atheism, however, is an ancient Indian idea. Multiple kinds of atheism, in fact.

महादेवी- स्‍त्री होने का अर्थ : कात्‍यायनी

एक ज़िद्दी धुन - Wed, 29/03/2017 - 13:26




स्‍त्री पक्ष पर महादेवी के चिन्‍तन का जो गहन, मौलिक और बहुआयामी चरित्र था, उस पर समाजशास्त्रियों ने तो एकदम ध्‍यान नहीं दिया, हिन्‍दी साहित्‍य के सुधी आलोचको ने भी काफी कम लिखा है। यह सचमुच एक दुखद विडम्‍बना है और विचार का प्रश्‍न भी। स्‍त्री प्रश्‍न पर महादेवी का चिन्‍तन अपने समाज के दिक्-काल परिप्रेक्ष्‍य में स्‍त्री होने के अर्थ का नितान्‍त मौलिक संधान है। उल्‍लेखनीय है कि स्‍त्री-अस्मिता पर सोचते हुए महादेवी का चिन्‍तन नारीवाद की अधुनातन अस्मितावादी विचार-सरणियों से सर्वथा अलग है। बीसवीं शताब्‍दी के पूर्वार्द्ध में ही नारीवाद की जो लहर यूरोप में पैदा हुई थी और जिसकी विभिन्‍न रूपों में गत शताब्‍दी के सातवें दशक तक सक्रियता बनी रही या जो पुन:संस्‍कारित होकर स्‍वयं को नये-नये रूपों में प्रस्‍तुत करती रही, उसकी अधिकांश उपधाराओं में स्‍त्री की स्‍वतंत्र अस्मिता के प्रश्‍न को ऐतिहासिक पृष्‍ठभूमि और सामाजिक-आर्थिक संरचना में निहित कारक-प्रेरक उपादानों से काटकर देखने की प्रवृत्ति निहित थी। गत शताब्‍दी के अन्तिम दशकों में सक्रिय उत्‍तरआधुनिकतावादी नारीवाद तो इस प्रवृत्ति से और भी बुरी तरह ग्रस्‍त था। 
इस मायने में महादेवी ने सर्वथा भिन्‍न रुख अपनाया। स्‍त्री की स्‍वतंत्रता के प्रश्‍न पर विचार करते हुए उन्‍होंने इस प्रश्‍न को स्त्रियों के अर्थ स्‍वातंत्र्य के प्रश्‍न से, उनकी सामाजिक-पारिवारिक पराधीनता के प्रश्‍न से, पुरुषवादी सामाजिक-सांस्‍कृतिक मूल्‍यों से और स्‍वयं स्‍त्री-समुदाय में व्‍याप्‍त बद्धमूल रूढ़ संस्‍कारों की दिमागी गुलामी से जोड़कर देखा। इस मायने में महादेवी का‍ चिन्‍तन मौलिकता और वैज्ञानिक तर्कणा की दृष्टि से उन्‍हें बीसवीं शताब्‍दी से पूरी दुनिया की अग्रणी स्‍त्री चिन्‍तकों के बीच स्‍थान पाने का हकदार बना देता है। स्‍त्री-प्रश्‍न पर महादेवी के जो ग्‍यारह निबन्‍ध 'श्रृंखला की कडि़यां' संकलन में संकलित हैं, वे बीसवीं शताब्‍दी के चौथे दशक में लिखे गये थे। इन निबंधों में महादेवी पुरुषसत्‍तात्‍मक समाज में स्त्रियों को सामाजिक-आर्थिक-सांस्‍कृतिक-पारिवारिक गुलामी और उनके कारणों का सन्‍तुलित विश्‍लेषण प्रस्‍तुत करती हैं, स्‍त्री की स्‍वतंत्र अस्मिता और पहचान के प्रश्‍न को उसकी सामाजिक चेतना के विस्‍तार की आवश्‍यकता को रेखांकित करती हैं, सामाजिक रूढि़यों से संघर्ष के जटिल पक्षों को उद्घाटित करती हैं, तथा स्त्रियों की आर्थिक स्‍वावलंबिता की अनिवार्यता पर बल देती है। इन निबंधों में महादेवी ने राष्‍ट्रीय जागरण-काल के नारी प्रबोधन की जनवादी मुक्ति-चेतना को स्‍वर दिया है। कभी-कभी यह सोचकर अफसोस होता है कि गद्य के दुर्लभ सौन्‍दर्य और जीवन-पर्यवेक्षण की सूक्ष्‍मग्राही दृष्टि के बावजूद, महादेवी ने कोई उपन्‍यास नहीं लिखा। यदि वे ऐसा करतीं तो निस्‍संदेह हिन्‍दी साहित्‍य में भी आज शायद आशापूर्णा देवी की सत्‍यवती और स्‍वर्णलता जैसी, या चेर्नीशेव्‍स्‍की की वेरा पाव्‍लोना जैसी प्रतिनिधि स्‍त्री-चरित्र मौजूद होती। कहा जा सकता है कि अपने देशकाल में उमा नेहरू और कमला देवी चौधरी से लेकर स्‍वयं महादेवी तक जो स्‍त्री चरित्र थे और राष्‍ट्रीय आन्‍दोलन में भागीदारी करने तथा सामाजिक रूढि़यों से टकराने वाली स्त्रियों का जो विशाल समुदाय मौजूद था, उनका प्रतिनिधित्‍व करने वाले प्रतिनिधि स्‍त्री-चरित्र अपने परिवेश और जद्दोजहद के साथ तत्‍कालीन स्‍त्री-लेखन के पटल पर सही ढंग से अपनी उपस्थिति नहीं दर्ज करा सके। लेकिन जहाँ तक वैचारिक लेखन का प्रश्‍न है, स्‍त्री-प्रश्‍न पर उस समय काफी कुछ लिखा गया। महादेवी का लेखन इसी समृद्ध परम्‍परा की अग्रतम कड़ी था। 
उन्‍नीसवीं शताब्‍दी के अन्तिम और बीसवीं शताब्‍दी के प्रारम्भिक वर्षों में हिन्‍दी की आदि स्‍त्री कथाकार बंग महिला ने साहस के साथ अपनी कहानियों और लेखों में पुरुष वर्चस्‍व के खिलाफ और स्‍त्री-उत्‍पीड़क रूढि़यों-मान्‍यताओं के खिलाफ आवाज़ उठाई। बंग महिला ने पुराणपंथी साहित्‍य-पण्डितों और सम्‍पादकों के कोप का ही नहीं, बल्कि कई बार तो महावीर प्रसाद द्विवेदी और रामचन्‍द्र शुक्‍ल की तीव्र असहमतियों और विरोध का सामना करते हुए भी स्त्रियों पर लादे जाने वाले नैतिक नियमों के बंधनों, विधवाओं की स्थिति, स्‍त्री-शिक्षा सम्‍बन्‍धी वर्जनाओं और पुरुष-प्रधान पारिवारिक-सामाजिक ढाँचे में स्‍त्री की पराधीनता पर प्रश्‍न उठाये। 
विशेषकर प्रथम विश्‍वयुद्ध के दौरान हिन्‍दी प्रदेश में स्‍त्री स्‍वातंत्र्य की नयी चेतना की जो लहर दिखायी देती है, वह बंग महिला की स्‍त्री-मुक्ति चेतना और सामाजिक सरोकारों का ही विस्‍तार थी। उन्‍नीसवीं शताब्‍दी के पुरुष समाज सुधारकों ने स्त्रियों की दुरवस्‍था पर करुणा और सहानुभूति के साथ विचार किया था और सुधार पर बल दिया था। इसके विपरीत, स्‍त्री-मुक्ति चेतना की जो नई लहर बीसवीं शताब्‍दी के दूसरे दशक में उठी, वह स्‍त्री समुदाय के भीतर से उठी मुक्ति की नयी आकांक्षा की परिणति थी। इस लहर ने स्त्रियों की पराधीनता और पुरुष-वर्चस्‍ववाद के हर रूप को ज्‍़यादा प्रखरता से उजागर किया और इसके विरुद्ध मुखर विद्रोह का स्‍वर ऊँचा उठाया। उस दौर की हिन्‍दी पत्र-पत्रिकाओं के सर्वेक्षण से यह बात स्‍पष्‍ट हो जाती है कि इस आन्‍दोलनात्‍मक सांस्‍कृतिक-सामाजिक लहर पर राष्‍ट्रीय आन्‍दोलन की विभिन्‍न धाराओं-उपधाराओं का स्‍पष्‍ट प्रभाव मौजूद था। 1909 में प्रयाग से रामेश्‍वरी नेहरू के सम्‍पादन में शुरू हुई पत्रिका 'स्त्री दर्पण' हिन्‍दी प्रदेश में स्‍त्री आन्‍दोलन की पहली और सबसे महत्‍वपूर्ण पत्रिका थी। इसमें तत्‍कालीन वामपंथी विचारक सत्‍यभक्‍त, राधामोहन गोकुल, रमाशंकर अवस्‍थी आदि के साथ हिन्‍दी की पहली नारीवादी विचारक उमा नेहरू और हृदयमोहनी, हुक्‍मा देवी, सत्‍यवती और सौभाग्‍यवती आदि लेखिकाएँ स्त्रियों की पराधीनता के विविध पक्षों पर नियमित रूप से लेख लिखती थीं तथा स्त्रियों के सामाजिक-राजनीतिक अधिकारों का मुद्दा प्रखरता के साथ उठाती थीं। गत शताब्‍दी के शुरुआती तीन दशकों के दौरान 'स्‍त्री दर्पण', 'गृहलक्ष्‍मी', महिला सर्वस्‍व', और 'चाँद' के अतिरिक्‍त 'सरस्‍वती', 'प्रभा', 'प्रताप', 'अभ्‍युदय', 'मर्यादा', 'सुधा', 'माधुरी' आदि सभी अग्रणी पत्रिकाओं में स्‍त्री प्रश्‍न पर विचारोत्‍तेजक लेख नियमित रूप से प्रकाशित होते थे और नारी जीवन विषयक सामाजिक प्रश्‍नों और सैद्धान्तिक मुद्दों पर गम्‍भीर एवं लम्‍बी बहसें चलती थीं जिनमें बहुतेरी लेखिकाएँ भागीदारी करती थीं। उस समय स्‍त्री प्रश्‍न पर चिंतन की एक धारा वह सुधारवादी-उदारवादी धारा थी जो आर्यसमाज के सामाजिक आन्‍दोलन और गाँधी के विचारों से प्रभावित थीं। एक दूसरी धारा उमा नेहरू जैसी रेडिकल नारीवादियों की थी जो मध्‍यवर्गीय रैडिकलिज़्म और यूरोपीय नारी आन्‍दोलन से, विशेषकर 1905 से चल रहे नारी मताधिकार आन्‍दोलन से प्रभावित थी। तीसरी धारा देशज चरित्र वाली क्रान्तिकारी जनवादी एवं प्रगतिशील धारा थी, जो स्‍वतंत्राता-समानता-भातृत्‍व के जनवादी सिद्धान्‍तों को स्त्रियों के ऊपर भी लागू करने पर बल देती थी तथा यह मानती थी कि पुरातनपंथी सामाजिक रूढि़यों से मुक्‍त होकर स्त्रियों को बराबरी एवं सम्‍मान का दर्जा दिये बिना राष्‍ट्रीय मुक्ति की परियोजना अपने समग्र एवं वास्‍तविक रूप में कभी भी साकार नहीं हो सकती। इस धारा के अग्रणी चिन्‍तक राधामोहन गोकुल थे, जो एक प्रचण्‍ड, निर्भीक, जुझारू, भौतिकवादी चिन्‍तक थे। तीसरे दशक से लेकर चौथे दशक के प्रारम्‍भ तक स्‍त्री प्रश्‍न पर लिखे गये गोकुलजी के लेख अपने निर्भीक एवं सूक्ष्‍म विश्‍लेषण की दृष्टि से आज भी अतुलनीय प्रतीत होते हैं। 
स्‍त्री-प्रश्‍न पर महादेवी के चिन्‍तन में हमें उपरोक्‍त तीनों धाराओं के सकारात्‍मक पक्षों का संश्‍लेषण नजर आता है। राजनीतिक विचारों की दृष्टि से महादेवी राष्‍ट्रीय आन्‍दोलन की मुख्‍य धारा के निकट थीं लेकिन सहानुभूति क्रान्तिकारियों के साथ भी थी। इस दृष्टि से उनके विचार गणेश शंकर विद्यार्थी के निकट प्रतीत होते हैं। राष्‍ट्रीय आन्‍दोलन और सामाजिक जीवन में भागीदारी विषयक विचारों में उनकी निकटता गाँधी के साथ दिखती है, लेकिन दूसरी ओर सामाजिक रूढि़यों के ध्‍वंस के मामले में उनके विचार एकदम अडिग एवं स्‍पष्‍ट थे। स्‍त्रियों की स्थिति के मामले में अतीत एवं धर्म के आदर्शीकरण की प्रवृत्ति उनमें लेशमात्र भी देखने को नहीं मिलती। वे नये के निर्माण के लिए पुरातन के ध्‍वंस का पक्ष लेती हैं और अतीतोन्‍मुखता की बजाय भविष्‍योन्‍मुख दृष्टि की बात करती हैं। उमा नेहरू का यूरोप-प्रेरित नारीवाद उच्‍चमध्‍यवर्गीय अभिजात स्त्रियों के बीच ही सहज स्‍वीकार्य हो सकता था। महादेवी जब स्‍त्री जीवन की समस्‍याओं की बात करती हैं तो उच्‍च मध्‍य वर्गीय शिक्षित स्त्रियों, परम्‍परापाश में जकड़ी आम मध्‍यवर्गीय घरेलू स्त्रियों और किसान-मज़दूर परिवारों की स्त्रियों - इन तीनों ही की अलग-अलग समस्‍याओं और साझा समस्‍याओं की चर्चा करती हैं। उनकी सैद्धान्तिक विवेचना व्‍यावहारिकता की जमीन से कभी पृथक नहीं होतीं। उनकी विषयवस्‍तु अमूर्त नारी प्रश्‍न नहीं है। उसे वे अपने समय व समाज के सन्‍दर्भ-चौखटे में अवस्थित करके देखती है। स्‍त्री-प्रश्‍न विषयक महादेवी का चिन्‍तन मुख्‍यत: अपने समाज की आन्‍तरिक गति से पैदा हुआ है। स्‍वतंत्रता और समानता के यूरोपीय प्रबोधनकालीन विचार यहाँ बाह्य प्रभाव के रूप में नहीं बल्कि पुन-संस्‍कारित देशज और लोकग्राह्य रूप में नजर आते हैं। इस मायने में महादेवी के विचारों की निकटता उमा नेहरू की अपेक्षा राधामोहन गोकुल की धारा के साथ अधिक प्रतीत होती है। बाह्य वैचारिक समानता की यदि बात करें तो स्‍त्री मुक्ति विषयक महादेवी केविचारों की निकटता यूरोपीय स्‍त्री-चिन्‍तकों की अपेक्षा उन्‍नीसवीं शताब्‍दी के जुझारू भौतिकवादी और क्रान्तिकारी जनवादी रूसी चिन्‍तक निकोलाई चेर्नीशेव्‍स्‍की के साथ बनती है जिन्‍होंने 'क्‍या करें' उपन्‍यास में अप्रतिम स्‍वतंत्र व्‍यक्ति एवं स्‍वप्‍नद्रष्‍टा संघर्षशील स्‍त्री चरित्र के रूप में अपनी नायिका वेरा पाव्‍लोना की सृष्टि की। 
महादेवी ने न केवल स्त्रियों की सामाजिक-पारिवारिक पराधीनता का प्रश्‍न उठाते हुए सामाजिक-राजनीतिक जीवन में उनकी भागीदारी तथा उनके आर्थिक स्‍वातंत्र्य पर बल दिया और इससे जुड़ी सभी बाधाओं-समस्‍याओं की चर्चा की। उन्‍होंने न केवल स्त्रियों की पराधीनता के चलते हुई सामाजिक-सांस्‍कृतिक विकृतियों की चर्चा की, बल्कि इसके साथ ही उन्‍होंने इस स्थिति से उत्‍पन्‍न स्त्रियों के आत्मिक-वैचारिक संकुचन और अस्मिता के लोप की ऐतिहासिक त्रासदी को भी रेखांकित किया। स्त्रियों की स्‍वतंत्र पहचान के अभाव या व्‍यक्तित्‍वहीनता की विडम्‍बना या अस्मिता के लोप पर विचार करते हुए अस्मितावादी राजनीति के विचारकों-पक्षधरों के समान, महादेवी अनैतिहासिक रुख नहीं अपनातीं। स्‍वतंत्र अस्मिता के अभाव के प्रश्‍न की पड़ताल वे सामाजिक-आर्थिक स्थितियों और सामाजिक-सांस्‍कृतिक रूढि़यों की ऐतिहासिक निरन्‍तरता से जोड़कर करती हैं। इसलिए महादेवी का स्‍त्री मुक्ति विषयक चिन्‍तन अपार आक्रोश वाला अकर्मक नारीवाद नहीं, बल्कि तर्कसंगत प्रतिरोध की गम्‍भीरता से युक्‍त सकर्मक चिन्‍तन है। निश्‍चय ही, वे बने-बनाये नुस्‍खे-फार्मूले नहीं सुझातीं या मुक्ति का कोई यूटोपिया नहीं प्रस्‍तुत करती हैं। इसके बजाय वे सामने उपस्थित समस्‍याओं का ऐसा सांगोपांग विश्‍लेषण प्रस्‍तुत करती हैं, जिनके बीच से स्‍त्री मुक्ति की एक परियोजना और उसका एक मार्ग आकार लेता प्रतीत होता है। 
स्‍त्री-पुरुष समानता का अर्थ महादेवी के लिए यह कदापि नहीं है कि स्त्रियाँ हर मायने में पुरुषों के जैसा होने का प्रयास करें। वे एकाधिक स्‍थानों पर स्त्रियों और पुरुषों की अलग-अलग विशेषताओं को रेखांकित करती हैं। उत्‍पीड़न को जन्‍म देने वाली सामाजिक असमानताओं और स्त्रियों को हेय बताकर उस उत्‍पीड़न का पक्ष-पोषण करने वाले सांस्‍कृतिक मूल्‍यों के निर्मूलन के बाद भी स्‍त्री-पुरुष की जैविक भिन्‍नता से उत्‍पन्‍न स्‍वभावगत भिन्‍नताएँ व विशिष्‍टताएँ तो मौजूद रहेंगी ही। बल्कि यूँ कहा जा सकता है कि इन भिन्‍नताओं की समाप्ति तो समाज से वैविध्‍य एवं प्रतिकूलता के सौन्‍दर्य की समाप्ति होगी। महादेवी का स्‍पष्‍ट विचार है कि समानता के लिए संघर्ष का यह अर्थ कदापि नहीं है कि स्त्रियाँ हर मायने में पुरुषों जैसा होने की कोशिश करें। वह अनुकरण उन्‍हें उनकी स्‍वतंत्र अस्मिता की स्‍थापना की दिशा में नहीं बल्कि एक अन्‍य रूप में लोप की दिशा में ही ले जायेगा। यहाँ स्‍त्री की अस्मिता के प्रश्‍न को महादेवी बुर्जुआ नारीवाद की मुख्‍य धाराओं से एकदम अलग रूप में देखती हैं और अपने अलग तरीके से स्‍त्री होने के अर्थ का संधान करती प्रतीत होती हैं। 
ऊपरी तौर पर देखने पर यह एक अजीब-सी बात लगती है कि स्‍त्री-प्रश्‍न विषयक निबन्‍धों में जहाँ महादेवी का एक प्रखर स्‍वतंत्रचेता रूप सामने आता है, वहीं छायावादी नारी-बोध वाली उनकी कविताएँ स्त्रियों के एकात्‍म प्रेम, उनकी पीड़ा, असहायता और अवसाद की अभिव्‍यक्ति में आगे नहीं जा पातीं। पहले मुझे भी वह अन्‍तरविरोध विचित्र और अव्‍याख्‍येय प्रतीत होता था। लेकिन गहराई से सोचने पर लगता है कि यह कोई विसंगति नहीं है। यह अन्‍तरविरोध एक एकल विचार-सरणि के दो प्रतिकूल पक्षों के अन्‍तरसंघर्ष के रूप में देख जाना चाहिए। इन्‍हीं प्रतिकूल पक्षों का टकराव महादेवी की विचार-प्रक्रिया की आन्‍तरिक गति है। अन्‍तरविरोध हर बड़े रचनाकार के कृतित्‍व में होता है और ये अन्‍तरविरोध वस्‍तुत- युगीन सामाजिक अन्‍तरविरोधों को परिवर्तित कर रहे हैं। तोल्‍स्‍तोय ओर दोस्‍तायेव्‍स्‍की हों, प्रेमचंद और निराला हों या महादेवी हों कोई भी इन अन्‍तरविरोधों से मुक्‍त नहीं रहा। महादेवी ने एक स्‍त्री के लिए समय और समाज द्वारा बाँधी गयी चौहद्दी में जीते और रहते हुए स्‍त्री होने के अर्थ का सन्‍धान किया और और मुक्ति के प्रश्‍न पर हर पहलू से विचार किया। उनके जीवन के समक्ष युगीन रंगमंच की अवश करने वाली सीमाएँ थीं और विचारों के लिए उड़ान भरने को भविष्‍य का क्षितिज। कहा जा सकता है कि इन्‍हीं में से पहला पक्ष महादेवी के काव्‍यबोध को जन्‍म देता है और दूसरा पक्ष उनके स्‍त्री प्रश्‍न विषयक निबन्‍धों की वैज्ञानिक, वस्‍तुपरक एवं निर्भीक तर्कसंगति में अभिव्‍यक्‍त होता है। एक अन्‍य धरातल पर सोचते हुए यह भी कहा जा सकता है कि स्‍त्री-जीवन की त्रासदी एवं विडम्‍बना की अनुभूति या अवबोध का पक्ष (परसेप्‍चुअल आस्‍पेक्‍ट) यदि महादेवी की कविताओं में सामने आता है तो उनका अवधारणात्‍मक पक्ष (कंसेप्‍चुअल आस्‍पेक्‍ट) उनके निबंधों में प्रकट होता है। 
अब महोदवी के इस अन्‍तरविरोध को समझने के लिए एक तीसरे सन्‍दर्भ चौखटे का सहारा लें। हमें कबीर और कई अन्‍य निर्गुण सन्‍तों में भी एक अन्‍तरविरोध देखने को मिलता है जो वास्‍तव में एक ही चिन्‍तन सरणि की आन्‍तरिक गति के दो पक्षों को प्रकट करता है। कहीं तो वे इहलोक की ठोस समस्‍याओं-रूढि़यों, पाखण्‍ड, अन्‍धविश्‍वास और अन्‍याय से टकराते हुए चुनौती की भाषा में बात करते हैं, फिर कहीं मानो स्‍वयं को निरूपाय-सा महसूस करते हुए, अवसाद या विरक्ति में डूबे हुए पारलौकिक दुनिया का संधान करते हुए रहस्‍यवाद में शरण ढूँढ़ते प्रतीत होते हैं। हर सामाजिक-वैचारिक संघर्ष में हार-जीत, आशा-निराशा के अवरोह आते हैं और सच्‍चे और बड़े रचनाकार वही हैं जिनका रचना-जगत इन दोनों पक्षों की इन्‍दराजी करे। महादेवी की कविताओं के मूल स्‍वर और उनके स्‍त्री-प्रश्‍न विषयक निबंधों के बीच के अन्‍तरविरोध को इसी रूप में देखा जा सकता है। 
और अन्‍त में इस अन्‍तरविरोध को देखने का चौथा कोण प्रस्‍तावित है। महादेवी की कविताओं का छायावादी नारीबोध, स्त्रियों के एकात्‍म प्रेम, पीड़ा, असहायता और अवसाद की केन्‍द्रीय अभिव्‍यक्ति के बावजूद ऐतिहासिक दृषि से स्‍त्री होने के अर्थ के सन्‍धान, स्‍त्री के स्‍वतंत्र वजूद की तलाश के उसी व्‍यापक उपक्रम का एक अंग है, जिसके अन्‍तर्गत महादेवी का वैचारिक गद्य लेखन आता है। इन कविताओं की स्‍त्री रीतिकालीन नायिका नहीं है, न ही इनका सौन्‍दर्यबोध और विधान ही रीतिकालीन है। ये अभिव्‍यक्तियाँ एक स्‍वतंत्र व्‍यक्तित्‍व वाली स्‍त्री की प्रेमानुभूतियों की, कामनाओं की, पीड़ाओं की अभिव्‍यक्तियाँ हैं। उन्‍नीसवीं शताब्‍दी के पूर्वार्द्ध में यूरोपीय स्‍वच्‍छन्‍दवादी काव्‍यधारा की प्रेमकविताएँ जिन ऐतिहासिक अर्थों में प्रगतिशील थीं, उन्‍हीं अर्थों में छायावादी दौर की प्रेम की कविताओं में भी प्रगतिशीलता का पहलू था। महादेवी के समय और समाज में वैयक्तिकता का बोध और प्रेम की अभिव्‍यक्ति भी एक सामाजिक विद्रोह था और एक स्‍त्री के लिए तो खासतौर पर। महादेवी की कविताओं का मूल स्‍वर आकुल प्रतीक्षा, सघन अवसाद, गहन पीड़ा और यदा-कदा असहायता की अभिव्‍यक्ति के बावजूद एक ऐसी स्‍त्री का स्‍वर है जिसका अपना वजूद है और जिसमें अपने प्रेम को, अपनी आशा-निराशा को प्रकट करने का साहस है। वह रीतिकालीन नायिका नहीं है। इन कविताओं का सौन्‍दर्य विधान भी रीतिकाल जैसा नहीं, बल्कि उसके ठीक विपरीत है। इस दृष्टि से आज महादेवी की कविताओं के भी पुनर्पाठ की आवश्‍यकता है। महादेवी ने स्‍त्री होने के अर्थ का जो सन्‍धान अपने युगीन सन्‍दर्भों में किया, उसी व्‍यापक उपक्रम के अलग-अलग पक्ष हमें उनके काव्‍य और गद्य में देखने को मिलते हैं।
('अदहन' के नवम्‍बर-दिसम्‍बर 2016 अंक में प्रकाशित)
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लेखक विषय संवाद साभार अनुवादक

पहले वो आए साम्यवादियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं साम्यवादी नहीं था

 

फिर वो आए मजदूर संघियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं मजदूर संघी नहीं था

 

फिर वो यहूदियों के लिए आए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं यहूदी नहीं था

 

फिर वो आए मेरे लिए

और तब तक बोलने के लिए कोई बचा ही नहीं था

 

मार्टिन नीमोलर (1892-1984)