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चांदनी चन्दन सदृश’: / हम क्यों लिखें?

लेखक मंच - Tue, 18/07/2017 - 23:06

अजित कुमार

‘चांदनी चन्दन सदृश’: / हम क्यों लिखें? / मुख हमें कमलों सरीखे/क्यों दिखें? / हम लिखेंगे:/ चांदनी उस रुपये-सी है/ कि जिसमें/चमक है, पर खनक ग़ायब है।’

नयी कविता के ग़ैर-रूमानी मिज़ाज की ऐसी प्रतिनिधि पंक्तियां लिखनेवाले कवि-गद्यकार श्री अजित कुमार हमारे बीच नहीं रहे। आज (18 जुलाई 2017) सुबह 6 बजे लम्बी बीमारी से संघर्ष करते हुए 84 साल की उम्र में दिल्ली के एक अस्पताल में उनका निधन हो गया।

हिन्दी के साहित्यिक परिदृश्य को अपनी गरिमामय उपस्थिति से जीवंत रखनेवाले अजित जी ने लगभग छह दशकों की अपनी साहित्यिक सक्रियता से हिन्दी की दुनिया को यथेष्ट समृद्ध किया। देवीशंकर अवस्थी के साथ ‘कविताएँ 1954’ का सम्पादन करने के बाद 1958 में उनका पहला कविता संग्रह ‘अकेले कंठ की पुकार’ प्रकाशित हुआ था। तब से ‘अंकित होने दो’, ‘ये फूल नहीं’, ‘घरौंदा’, ‘हिरनी के लिए’, ‘घोंघे’ और ‘ऊसर’ – ये कविता-संग्रह प्रकाशित हुए। उपन्यास ‘दूरियां’, कहानी-संग्रह ‘छाता और चारपाई’ तथा ‘राहुल के जूते’, संस्मरण और यात्रा-वृत्त की पुस्तकें ‘दूर वन में’, ‘सफरी झोले में’, ‘निकट मन में’, ‘यहाँ से कहीं भी’, ‘अँधेरे में जुगनू’, ‘सफरी झोले में कुछ और’ और ‘जिनके संग जिया’, तथा आलोचना पुस्तकें ‘इधर की हिन्दी कविता’, ‘कविता का जीवित संसार’ और ‘कविवर बच्चन के साथ’ प्रकाशित हुईं। इनके अलावा नौ खण्डों में ‘बच्चन रचनावली’, ‘सुमित्रा कुमारी सिन्हा रचनावली’, ‘बच्चन निकट से’, ‘बच्चन के चुने हुए पत्र’, ‘हिन्दी की प्रतिनिधि श्रेष्ठ कविताएं’ समेत बीसियों पुस्तकें उनके सम्पादन में निकलीं। अभी-अभी उनकी किताब ‘गुरुवर बच्चन से दूर’ छप कर आयी है।

अपनी लम्बी बीमारी और शारीरिक अशक्तता के बावजूद अजित जी लेखन में लगातार सक्रिय रहे। कुछ समय से दिल्ली की साहित्यिक संगोष्ठियों में उनका आना-जाना थोड़ा कम अवश्य हो गया था, पर विभिन्न संचार-माध्यमों के ज़रिये साहित्यिक समुदाय के साथ उनका जीवंत संपर्क बना हुआ था।

श्री अजित कुमार का निधन हिन्दी की दुनिया के लिए एक बड़ी क्षति है. जनवादी लेखक संघ उनके योगदान को स्मरण करते हुए उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करता है।

मुरली मनोहर प्रसाद सिंह (महासचिव)
संजीव कुमार (उप-महासचिव)

अनुप्रि‍या की बाल कवि‍ताएं

लेखक मंच - Sun, 16/07/2017 - 14:18

चि‍त्र: अनुप्रि‍या

कि‍ताब

काले अक्षर की माला में
गूंथा हुआ जवाब हूँ
मैं तो प्यारी मुनिया की
एकदम नयी किताब हूँ

मेरे भीतर कई कहानी
कितने सारे रंग
उड़ता बादल,चहकी चिड़िया
सब हैं मेरे संग

उड़नखटोला अभी उड़ा है
लेकर सपने साथ
आसमान की सैर करेंगे
दे दो अपना हाथ

प्यासा कौवा ढूँढ़ रहा है
पानी की एक मटकी
शेर आ रहा पास है अब तो
साँस हमारी अटकी

मुन्ना खाए आम रसीला
मुनिया देखे फूल
खेल-खेल में पढ़ते बच्चे
बातें सारी भूल।

चिड़िया रानी

चिड़िया रानी पल भर ठहरो
मुझको तुम एक बात बताओ
कैसे गाती इतना मीठा
आज पहेली यह सुलझाओ

कैसे नन्हे पंखों के बल
आसमान छू पाती हो
तुम्हें पकड़ने हम जो आएं
झट से तुम उड़ जाती हो

कैसे छोटी चोंच तुम्हारी
चुग जाती है दानों को
आज बताना होगा तुमको
हम नन्हे अनजानों को

एक दिन फुरसत में हमको भी
आसमान की सैर कराओ
चूं-चूं-चीं-चीं की भाषा में
नयी कहानी हमें सुनाओ।

सुबह सवेरा

हाथ थाम कर सूरज का
घर से चला सवेरा
चिड़ियों के पंखों ने डाला
आसमान में डेरा

धीमे-धीमे आँख मींचते
उठा है सारा बाग़
लहरों ने रच डाला  है
आज नया फिर राग

ढूंढ़ रहा है बादल कब से
खोयी हुई जुराब
भूल गया है मेज पे रख के
फिर वो नयी किताब

खिल आये हैं चेहरे फिर
फिर से सजे हैं खेल
जिससे कल झगड़ा कर आये
आज किया फिर मेल

सोबन ब्वौडा! असली आज़ादी तो तूने दिलाई : कमल जोशी

लेखक मंच - Tue, 11/07/2017 - 16:12

कमल जोशी

कमल जोशी जी से 20 जून को कोटद्वार में उनके घर पर मुलाकात हुई थी। मेरे आग्रह पर उन्‍होंने ‘लेखक मंच’ के लि‍ए छह रचनाएं दे दी थीं। अन्‍य रचनाएं देने का वादा कि‍या था। उनमें में से एक ‘रंगीली की खि‍चड़ी’ 26 जून को प्रकाशि‍त कर दी थी। अब पढ़ि‍ए उनकी एक और रचना-

हिमालय खूबसूरत दिख रहा था।

उखड़ती साँसों के बावजूद मैंने ट्राय-पोड लगाया, कैमरा सेट किया और फोटो खींचने लगा। हिमालय मनमोहक अदाएं दिखा रहा था। एक सुन्दर फोटो भी ट्रैकिंग की सारी थकान मिटा देती है। इन्हीं दृश्यों के लिए भी तो मैं यात्राएं करता हूँ।

मैं खतलिंग ग्लेशियर के इलाके में था। कल सुबह ही अपनी बाइक पर आया था। अपनी आदत और जिद के अनुरूप रेहा पिछली सीट पर कब्जा जमाये थी। चंबा से बूढ़ा केदार का रास्ता इतना खूबसूरत था कि जो रास्ता चार घंटे में कट जाना चाहिए था, उस पर ही हमने सारा दिन लगा दिया था। ज्यादा समय तो टिहरी डैम के नीचे दबे हुए टिहरी के यादों के बारे में बात करने में ही कट गया। कितनी बार टिहरी आया था और जिन सड़कों पर चला था, फटफटिया दौड़ाई थी, आज वो सब पानी के नीचे दबी थीं, जाने कैसी होंगी वे सड़कें अब? पानी के साथ आई गाद में दब गयी होंगी! …पर यादें हैं, जो हमेशा तैरती ही रहती हैं!

घनसाली के बाद घुमावदार रास्ता। दोनों तरफ कभी चीड़ की तो कभी मिलीजुली प्रजाति के पेड़। हवा में ठंडी खुनक और साथ में करेले के साथ नीम वाली तर्ज पर कवि हृदया रेहा। हर पचास कदम पर बाइक रोकने को कहती। रास्ते को महसूस करती, पेड़ों से बतियाती रेहा। किसी शहर में पले-बढ़े को इस रूप में देखना मुझ जैसे पहाड़ी को भला ही लगता है, और असमंजस भी होता है कि‍ हम पहाड़ी ही क्यों पहाड़ का इतना असम्मान करते है। शायद पहाड़ में रहने के दुःख और कठिनाइयां हमें इसकी सुन्दरता को अनदेखा करने को मजबूर कर देती हैं।

रेहा के साथ एक पंगा और है। वह जहां कहीं भी सड़क के किनारे के ढाबे में किसी औरत को काम करता देखती है, तो बिना रुके नहीं रहती। चाय पीनी तो लाजिमी है ही (मैं अपने प्रिय फैन-बिस्कुट का भक्षण भी करता हूँ), उस महिला से बात कर उसकी जिन्दगी और परिस्थितियों में झांकने की भी कोशिश करती है। कई बार मुझे दुभाषिये का काम भी करना होता है। ऐसे ही चमियाला से पहले एक ढाबे पर एक महिला चाय बना रही थी। रेहा ने मेरा कन्धा दबाया। मैने इशारा समझा और ढाबे पर बाइक रोक दी। चाय की जरूरत तो मुझे भी थी। उतरते ही चाय का ‘आर्डर’दे दिया गया। मेरी कमजोरी को देखते हुए रेहा ने महिला से पूछा, ‘‘क्‍या फैन भी हैं?’’ महिला ने ‘हाँ’ कहा तो रेहा ने फैन लेकर मुझे पकड़ाए और ताकीद दी, ‘‘तुम अपना मुंह फैन खाने में व्यस्त रखना, मैं जरा बात भी करती हूँ।’’ मैं निरीह बकरे की तरह फैन चबाने में व्यस्त हो गया। रेहा महिला के साथ बातें करने लगी। पता चला कि ढाबा मालकिन महिला का नाम सावित्री है और यह ढाबा उसके पति ने खोला था। पर ढाबा खोलते ही पति के यार दोस्तों ने यहां कब्जा जमा लिया।

‘‘ग्राहक कम आते थे और साथ के लुंड ज्यादा…मवासी तो घाम लगनी ही थी।’’ दुखी सावित्री ने बताया, ‘‘दारूड़ी भी गया था।’’

सावित्री ने पति को समझाया, दोनों बच्चों की जिम्मेदारी के बारे में बताया, ‘‘पर दारूड़ी किसी की सुनता है क्या?’’ ये सवाल उसने रेहा से ही कर डाला।

‘‘क्‍यों, अब कहाँ है पति।’’ रेहा ने जिज्ञासावश पूछा।

‘‘अरे कहाँ,  हमें नरक में छोड़ कर खुद भाग्याँन हो गया।’’ बिना भाव बदले सावित्री बोली, ‘‘ कर्जा ऊपर से छोड़ गया। मैं तो घर पर ही रहती थी।’’ उसने जोड़ा। फिर बताया कि जब कर्जा के तकाजे वाले आये और उन्हें लगता कि‍ अब कर्जा वापस नहीं मिलेगा, तो वे उसके पति को ही गाली देने लगते। पति तो पति ही था, सावित्री की नजर में। उसके लिए गाली कैसे सहती। इसलिए उसने तय किया कि‍ वह खुद ढाबा चला कर कर्जा उतार देगी। और उसने ऐसा किया भी। उसकी कर्मठता से विभोर रेहा ने उसे गले लगा लिया। मैं सिर्फ ‘शाबास भुली’का ही गंग्याट कर पाया।

रात को हम बूढ़ाकेदार ही रुके। यहाँ मेरे परिचित बिहारी भाई का आश्रम भी है, पर रात को उनको परेशान करना उचित नहीं समझा, तो एक छोटे से होटल में रहे।

सुबह चिड़ियों की चहचाहट से नीद खुली। बाइक को बुढा़केदार में ही छोड़ दिया गया। हम अगुंडा होते हुए  महासर ताल के रास्ते लगे। हमारा कोई निश्चित जगह जाने का कार्यक्रम नहीं था। उत्तराखंड, अरे नहीं तब उत्तराँचल, बने एक साल हुआ था यानी ये वृतांत 2001 का है।

मैं उत्तराखंड के बारे में लोगों की राय जानने को उत्सुक था इसलिए घूम रहा था। जब मैं नयी टिहरी में था तो रेहा का पता चला कि‍ मैं नयी टिहरी में हूँ, तो वह बिना बताये चंबा आ गई- इस फरियाद कम धमकी ज्यादा के साथ कि वह घूमना चाहती है। फिर क्या था, हम सतत आवाराओं की तरह निकल पड़े थे।

हम महासर के ऊपर एक धार में पहुंचे थे कि‍ मुझे हिमालय दिखाई दिया। मैंने ट्राइ-पौड तान दिया- फोटो के लिए। पिट्ठू लिए हुए रेहा भी पीछे से आकर पसर गई। फोटो खींचने की जल्दी इसलिए थी कि कहीं कोहरा खूबसूरत हिमालय को ढक न दे।

मैंने फोटो लीं, लाजिमी था कि रेहा के कुछ पोज उस ब्रेक ग्राउंड में भी लूं क्योंकि‍ खाने का सामान उसी के पिट्ठू में था। अगर यह न करता तो ये भी हो सकता था कि रेहा खुंदक में मुझे खाने के लिए कुछ ना दे या कम दे।

पेट में कुछ जाने के बाद आसपास देखा। लगभग आधे किलोमीटर की दूरी पर एक व्यक्ति बैठा था। आसपास गायें थीं। वह यहाँ इस छोटे से मैदान में पशु चराने ही आया था। वह भी हमें देख रहा था। हमारा रात को यहीं रहने का इरादा था क्योंकि‍ पास ही छोटा पानी का नाला भी था और कुछ दूरी पर छाने भी। रात काटने के लिए सुरक्षित जगह थी। उस व्यक्ति के अलावा और कोई आसपास नहीं था। मैं उससे ही जगह की जानकारी लेने गया। नजदीक पहुँच कर जैसे ही मैं उसको अभिवादन करता, उसने कहा, ‘‘गुड मोर्निंग।’’  मैं अचकचा गया। इस तरह के अंग्रेजी अभिवादन की आशा मुझे नहीं थी। वह एक बुजुर्ग थे और छोटी सी छड़ी लेकर एक पत्थर पर बैठे थे। वह लगभग बहत्तर-पिछत्‍तर साल के थे। मैंने भी ‘गुड मार्निंग’ कह कर उनको जवाब दिया और बिस्कुट का पैकेट खोल कर उनकी और बढा़या। पहले तो उन्होंने मना किया, पर रेहा न जाने कब पीछ-पीछे आ गई थी।  उसने कहा कि‍ ले लीजिये ना ताऊ जी। तो उन्होंने एक बिस्कुट ले लिया। उन्होंने हमें बैठने को कहा तो हम पास के ही पत्थर में बैठ गये। मैंने देखा कि‍ वहां पर एक पुरानी ब्रिटिश टाइम की गरम डांगरी रखी है। संयोग से उस पर जो मोनोग्राम था, उस पर रॉयल आर्मी जैसा कुछ लिखा था, जो बहुत ध्यान से पढ़ने पर ही पता चल रहा था। मैंने पूछा कि‍ यह डांगरी आपके पास कहाँ से आई तो वह मुस्कराए और बोले कि‍ यह मेरी ही है। मैंने उनसे पूछा कि‍ वह ब्रिटिश फौज में थे, क्या। उन्होंने हामी भरी और कहा, ‘‘मैंने  वर्ल्ड वार भी लड़ा है। यह तब की ही है।’’

मैंने उनसे उनके फौजी जीवन के बारे में पूछा तो उन्होंने कहा कि‍ वह आजाद हिन्द फौज में भी थे। अब दिलचस्पी बढ़नी स्वाभाविक थी। वह तो जिंदा इतिहास थे। रेहा ने स्वाभावानुसार डायरी निकाली और वृद्ध जी से नाम पूछा। उन्होंने अपना नाम सोबन सिंह बताया। उनसे बातें शुरू हुईं। कहानी दिलचस्प थी। उन्हीं के शब्दों में…

‘‘मैं जब चौदह साल का था, तो देश (मैदान) के बारे में बहुत सुना था। पौड़ी जिले के एक फौजी थे। वह जब छुट्टियों में आये तो अपनी बहन के घर हमारे गाँव आये। उनकी चमक-दमक देखकर हम बहुत प्रभावित हुए। तय कर लिया कि‍ फौज में भर्ती होंगे। पर टिहरी में तो भरती होती नहीं थी। हमें पता चला कि‍ लैंसडाउन में फौज की भरती हो रही है। मैं और मेरे दो दोस्त घर से बिना बताये लैंसडाउन के लिए भाग गए। रात को जिस गाँव में जाते और कहते कि‍ फौज में भर्ती होने जा रहे हैं तो लोग खाना खिला देते। सोने-ओढ़ने को दे देते। तब जमाना दूसरा था, पराया बच्चा भी अपना होता था। तीन दिन में लैंसडाउन पहुंचे। डर तो रहे थे।’’ सोबन सिंह जी ने बताया। लैंसडाउन पहुँचने पर वे लोग सीधे फौज के एक संतरी के पास पहुंचे और उसे सीधे सल्यूट किया। जब उसने पूछा तो उन्होंने बताया कि‍ हम फौज में भर्ती होने टिहरी से आए हैं। उसने कहा कि‍ परसों सुबह बटालियन ग्राउंड में आना। मैं सबसे छोटा था तो उसने मुझ से मेरी उम्र पूछी। मैंने बताया कि‍ चौदह साल है। वह संतरी बोला, ‘‘तुम्हारी उम्र छोटी है। तुम भर्ती नहीं हो सकते।’’ मैं बहुत दुखी हो गया। मेरी आँखों में आंसू आ गए कि अब घर किस मुंह से जाऊँगा। डर भी रहा था। मेरी हालत देखकर संतरी को दया आ गई।

शायद संतरी को पहले किसी ने इतनी इज्जत से सेल्यूट किसी ने नही किया था इसलिए वह प्रभावित हो गया था। वह बोला, ‘‘ तू पहाड़ी हिसाब से थोड़ा लंबा है। जब तेरी उम्र पूंछे तो अपनी उम्र सोलह साल बताना।’’

गुरुमंत्र पाकर सोबन सिंह खुश हो गए। उनको बीच का एक दिन काटना मुश्किल हो गया। पैसे नही थे, खाना कहाँ से खाएं और फौज की भर्ती की परीक्षा देनी थी। वह उदास बैठे थे। तभी एक काला कोट पहने व्यक्ति उधर से गुजरा। ‘‘हमें पता नहीं था कि‍ काला कोट वकील पहनते हैं और हम कचहरी के रास्ते पर हैं। उसने हमें देखा। शायद हमारे चेहरे पर भूख साफ दिखाई दे रही थी। उसने पूछा कि‍ कौन हो, क्यों बैठे हो। पहले तो हम घबराए कि‍ यह क्यों पूछ रहा है, पर बाद में उन्हें बताया कि‍ फौज में भरती होने आए है।’’

‘‘ भाग कर आए हो।’’ जब उन्होंने पूछा तो हमें काटो तो खून नहीं। हमारे साथ का एक रोने लगा। वह डर से रो रहा था या भूख से पता नहीं। यह मैंने सोबन सिंह जी से नही पूछा।

उन्होंने उसे रोते हुए देखकर पूछा कि‍ पैसे-वैसे हैं तुम्हारे पास! तो इन लोगों ने मना कर दिया।

‘‘जब उन्होंने पूछा कि‍ रात को खाना खाया कि‍ नहीं, तो हम चुप रहे।’’

काले कोट वाले व्यक्ति ने उनसे पूछा, ‘‘क्या भूखे पेट फौज में भर्ती होओगे?’’ फिर उन्होंने जेब से एक रुपिया निकाला और उन्हें दिया और ‘सि‍र्फ खाना खाना’ कहकर चला गए। काले कोट वाला वह वकील इन लोगों को देवदूत सा लगा!

‘‘हम तो उनका नाम भी नहीं पूछ पाए।’’ उस वक्त एक रुपया बहुत होता था। आज के 100 रुपयों से ज्यादा। हमने दो दिन उसी में काटे और तीसरे दिन भर्ती के लिये पहुंचे। उन दिनों आज की तरह कठिन नहीं था, भर्ती होना। अंग्रेजों को तो लड़ने के लिए भेड़-बकरी चाहिए थी। हमारी उम्र, लंबाई-चौड़ाई लि‍खी। मैदान में दौडा़या और वजन उठवाया। फिर एक डॉक्टर ने आला लगाकर कुछ देखा। बस उस समय ही डर लगा। और हम भर्ती हो गए।’’सोबन सिंह जी ने बताया।

‘‘लैंसडाउन में हमारी ट्रेनिंग हुई, नौ महीने के लिए और फिर हमें बरेली भेजा गया। दो महीने बाद ही हमें मलाया (मलेशिया) जापानियों से लड़ने भेज दिया। बम-गोले गिरते थे। पैंट में ही हग-मूत देते थे। बच्चे ही तो थे हम। बाद में हमें जापानियों ने पकड़ लिया। कैदी हो गया। ये सन (उन्नीस सौ) चवालीस  की बात होगी। कैद में हम दिन भर ड्रिल करते थे। जापानी हमसे ज्यादती भी करते थे।

‘‘एक दिन एक हिन्दुस्तानी हवालदार हमारे पास आया कि‍ क्या हम कैद से छूटना चाहते हैं? हमने कहा कि‍ क्या उसके पास भागने का कोई प्लान है। उसने कहा कि‍ भागना नहीं है। अपने देश के लिए लड़ना है। हमने कहा कि‍ वह तो हम कर ही रहे थे। तब उसने कहा कि‍ तुम देश के लिए नहीं, अंग्रेजों के लिए लड़ रहे थे। हमारी समझ में कुछ नहीं आया।’’ सोबन सिंह जी ने बताया।

‘‘एक दिन हमारी बड़ी परेड यानी सब कैदी हिन्दुस्तानी सिपाहियों को एक साथ मैदान में लाया गया। पता चला कि‍ कोई सुभाष बोस भाषण देंगे। हमने सोचा कि‍ जापानी अफसरों के होते हुए कोई हिन्दुस्तानी भाषण देगा- इसका मतलब है कि‍ वह कोई बड़ा आदमी होगा। भाषण में सुभाष बोस ने कहा कि‍ भारतवासी गुलाम हैं।  हमें गुलामी की जंजीर तोड़नी होगी। मेरी समझ में नहीं आया कि‍ गुलाम क्या होता है?. उन्होंने कहा कि‍ हमें देश को आजाद कराने के लिए अंग्रेजों से लड़ना होगा। आजाद हिन्द फौज में भर्ती होना होगा।’’

‘‘बाद में पंजाबी हवालदार ने हमें गुलामी का मतलब समझाया। हमारी आंखें खुली कि‍ हम अब तक विदेशियों के लिए अपनी जान देने पर उतारू थे। हम आजाद हिन्द फौज में आ गए। रंगून, बर्मा में हमने अंग्रेजी फौज के खिलाफ लड़ा। हार गए और हमारे ऑफिसर ढिल्लों को अंग्रेजों ने जेल में डाल दिया था। जंगलों में भटकते रहे। इस डर से कि‍ पकडे़ जायेंगे, तो सजा होगी। हम गांवों में आ गये और सारे कागज फाड़ डाले कि‍ कहीं पकडे़ न जाएँ। देश जब आजाद हुआ, तो हमने समझा कि‍ हमें फौज वापस ले लेगी, पर पता चला की फौजी नियमों से हम बागी थे। कोई पेंशन नहीं। ‘‘हमने और हमारे साथियों ने कई बार सरकार को लिखा कि‍ हम अंग्रेजों के हिसाब से तो बागी थे, पर अपने हिन्दुस्तान के लिए ही तो लडे़ ही थे। हमारी सुध लो। पर कहीं से कोई जवाब नहीं।’’  इसके बाद सोबन सिंह चुप हो गए।

मैंने सोबन सिंह को ध्यान से देखा। यह भी एक स्वतन्त्रता सेनानी था। देश के लिए लड़ा। गोलियों का सामना किया था। यह यहाँ अपनी भेड-बकरियों के साथ जिंदगी बिताने के लिए अभिशप्त है। कुछ स्वतन्त्रता सेनानियों को ताम्र पत्र मिले, पेंशन मिली, उनके बच्चों को और बच्चों के बच्चों को भी रियायत मिली, नौकरी मिली! इस सेनानी का, जीवन के आखिरी मुकाम पर खडे़ सोबन सिंह का सहारा सिर्फ एक बांस की डंडी है….! यह भी तो स्वतन्त्रता सेनानी ही है। मैंने ध्यान दिया कि‍ बातों-बातों में रेहा ने कब सोबन सिंह का हाथ पकड़ लिया है और उसे सहला कर सांत्वना दे रही है। मुझे पता ही नहीं चला। सोबन सिंह उसे प्यार से देख रहे थे।

सोबन सिंह ने मेरी और देखा और कहा, ‘‘उत्‍तरांचल बन गया है। क्या हमारी भी कुछ पूछ होगी!’’ तब मैं कोई जवाब नहीं दे पाया था! सोबन सिंह जी से मिलने के सोलह साल बाद आज यह कह सकने कि‍ स्थिति में हूँ कि उत्तराखंड तो सिर्फ नेताओं और ठेकेदारों के लिए बना है ताऊ जी, आपको पूछने की फुर्सत किसी को नहीं.!

मुझे भी चुप देख कर सोबन सिंह जी ने हिमालय के तरफ देख कर कहा, ‘‘कोहरा साफ हो गया है।हिमालय की फोटो खींचो।’’

मैंने हिमालय की तरफ देखा- मुझे वो बिलकुल भी अच्छा नहीं लग रहा था। सोबन ब्वौडा की बात सुनने के बाद मैं खुद को कोहरे से निकाल नहीं पा रहा था।

माटीमिली

यह कहानी मैंने 1977 में लिखी थी और मेरे कहानी-संग्रह 'बदलाव से पहले' (1981) में संकलित है. इसका पंजाबी अनुवाद प्रसिद्ध पंजाबी कथाकार अमरजीत चन्दन ने 'खेह पैणी' नाम से किया था. वह अनुवाद पंजाबी में प्रकाशित मेरी कहानियों के संग्रह 'त्रासदी...माइ फुट!' में प्रकाशित है. इधर साहित्यिक पत्रिका 'परिकथा' के जुलाई-अगस्त, 2017 के अंक में इसे पुनः प्रकाशित किया गया है. 
कहानी

माटीमिली

‘‘इस तरह मुँह काला करायेेगी, रधिया, तो गाँव में तेरा टिकना मुश्किल हो जायेगा।’’
जाड़े की आधी रात है। चाँदनी में कोहरा घुला हुआ है। खेतों से गाँव की ओर जाने वाला दगड़ा धुँधलाये उजास में सुनसान और डरावना  लग रहा है। लेकिन यहाँ एक धर्मप्राण व्यक्ति एक गिरी हुई औरत को उपदेश दे रहा है। धर्मप्राण व्यक्ति हैं पंडित शिवदत्त और गिरी हुई औरत है रधिया कुम्हारिन।
‘‘अगर भली औरत की तरह नहीं रह सकती, तो कहीं और जा मर।’’ पंडित शिवदत्त कह रहे हैं और रधिया सुन रही है। 
जूते-मोजे और कोट-कंबल डाटे, सिर पर ऊनी टोपी और उसके ऊपर से कसकर मफलर बाँधे पंडित शिवदत्त रधिया पर गर्म हो रहे हैं और रधिया पैरों में सिर्फ दो रुपये वाली प्लास्टिक की चप्पलें पहने, धोती-कुर्ती पर बस एक सूती खेस लपेटे खड़ी काँप रही है।
खेत में सोबरन से मिलकर वह जल्दी-जल्दी अपने घर की ओर लपकी जा रही थी कि पीपल के नीचे से आते पंडित शिवदत्त अचानक हाथ में लोटा लिये प्रकट हो गये। इतनी रात और इतनी ठंड में तो कुत्ते-सियार भी कहीं दुबके रहते हैं, लेकिन पंडित शिवदत्त आ रहे थे। पहचानकर बोले, ‘‘रधिया, तू? इतनी रात को कहाँ से आ रही है?’’ और सहमी हुई रधिया चुप खड़ी रह गयी, तो सब कुछ जानते-बूझते भी कहने लगे, ‘‘तो सोबरन से तेरी यारी चल रही है, क्यों?’’ और फिर शायद भूल ही गये कि लोटा लेकर घर से किसलिए निकले हैं। 
न ठंड की परवाह है, न रात के सन्नाटे की। रधिया के चारित्रिक पतन की समस्या उनके लिए सर्वप्रमुख हो उठी है और वे उसे उपदेश दिये जा रहे हैं। उनके विचार से रधिया अपने दुराचार से गाँव की नाक कटवा रही है, गाँव में घोर कलियुग ले आयी है, बालकों को रात में अकेले छोड़कर यहाँ खेतों में रासलीला रचाने आती है, लोक-परलोक की कुछ भी चिंता नहीं...
रधिया यह सब न समझती हो, सो बात नहीं; लेकिन रधिया के अपने तर्क हैं। उसके हिसाब से जवान औरत को मर्द चाहिए और बिन बाप के बालकों को बाप। उसका आदमी जिंदा होता, तो वह भी किसी सती-सावित्री से कम नहीं थी। हालाँकि वह जानती है कि सोबरन वह मर्द-बाप नहीं है, लेकिन अकेली औरत को, जिसे सब चींथ खा जाना चाहते हों, सुरक्षा का कोई साधन तो चाहिए।
लेकिन गाँव रधिया के तर्क नहीं मानता। उसके लिए तो रधिया बस एक गिरी हुई औरत है। शुरू में जब रधिया अपनी बदनामी से डरती थी, कोई कुछ कहता तो सफाइयाँ देने लगती थी और झूठी कसमें खा जाती थी। फिर भी कहा-सुनी बंद न होती, तो लड़ने लगती। झूठी तोहमतें लगाकर सामने वाले की आबरू मिट्टी में मिला देती। कहती, ‘‘कौन दूध का धोया है, मैं भी तो जानूँ। मुझे तो सब समझाते हैं, कोई उन लोगों को क्यों नहीं समझाता, जो हमेशा मेरी मिट्टी खराब करने की ताक में रहते हैं?’’ रधिया की इतनी बात सच होती और इस सच के आधार पर वह किसी के भी बारे में बड़े से बड़ा झूठ बोल जाती। इसलिए लोग उससे डरने लगे थे। आज भी डरते हैं। मगर नफरत भी करते हैं, इसलिए चुप भी नहीं रह सकते। 
रधिया ने जब देखा कि गाँव वालों के मुँह किसी तरह बंद नहीं किये जा सकते, तो अपना ही मुँह बंद कर लिया। अब कोई कुछ कहता है, तो कहता रहे। वह किसी को जवाब नहीं देती। सारे लांछन, सारे उपदेश चुपचाप सुन लेती है। इस समय भी सुन रही है। सुन रही है, वरना ठेंगा दिखाकर चली गयी होती, तो पंडित शिवदत्त क्या कर लेते उसका?
पंडित शिवदत्त रधिया की चुप्पी से चिढ़ रहे हैं। कह रहे हैं, ‘‘कितनी ढीठ हो गयी है तू! कोई कुछ भी कहता रहे, तुझे किसी की परवाह नहीं।’’ उनकी चिढ़ स्वाभाविक है। जवाब न मिले, तो लांछन धरने वाले का मजा नहीं आता। गुस्सा और चढ़ता है, ‘‘नहीं मानती तो जा, मर, हमें क्या है! जैसा करेगी वैसा भुगतेगी। देखती जा, तेरी देह में नरक फूटेगा। बुढ़ापे में भीख माँगती डोलेगी।’’ लेकिन जानते हैं कि उपेक्षा से भी तो काम नहीं चलेगा, इसलिए फिर कहते हैं, ‘‘तू चाहती है कि हम इस अनर्थ को चुपचाप देखते रहें? सो नहीं होगा। इसका मतलब तो यह है कि तू जो पाप करती है, गाँव की रजामंदी से करती है। पर गाँव यह सब बर्दाश्त नहीं करेगा। पंच-प्रधान लोग तेरा बहिष्कार करने की सोच रहे हैं। खैर चाहती है, तो अब भी सँभल जा।’’
रधिया सुन रही है और चुप है। उसे गाँव से निकाल देने की कोशिश आज से नहीं, तभी से चल रही है, जब से वह विधवा हुई है।
सरूपा कुम्हार मरा था, तो लोगों ने अंदाजा लगाया था कि अकेली रधिया यहाँ नहीं रहेगी। गाँव में कोई दूसरा घर कुम्हारों का नहीं है। सरूपा भी सात-आठ साल पहले ही इस गाँव में आकर बसा था। पहले वह अपने गाँव से गधे पर बरतन लादकर यहाँ बेचने आता था, लेकिन शादी के बाद ही भाइयों में बँटवारा हो गया, तो सरूपा यहाँ के मुखिया ठाकुर नूरसिंह के सामने आकर रोया था, ‘‘ताल के किनारे एक झुपड़िया डाल लेने दो मुखिया, जिंदगी-भर तुम्हारे बासन बनाऊँगा।’’ मुखिया ने इजाजत दे दी थी और सरूपा अपनी नयी ब्याहुली रधिया के साथ गाँव में आ बसा था। कच्ची ईंटें पाथकर दोनें ने खुद ही ताल के किनारे अपना घर बना लिया था और गाँव ने उन्हें ऐसे अपना लिया था, जैसे वे सदा से यहीं रहते आये हों। लेकिन एक बेटी और एक बेटा पैदा करके सरूपा जब पिछले साल हैजे से मर गया, तो लोगों ने सोचा था, अकेली रधिया अब क्या रहेगी यहाँ? सरूपा के भाई उसे लेने आये थे। एक रँडुआ देवर तो रधिया से नाता करके यहीं रह जाने की बात भी करता था, लेकिन रधिया ने लड़कर सबको भगा दिया था। कहा था, ‘‘जब चार दिन की ब्याहुली को घर से निकाला था, तब कहाँ गयी थी तुम्हारी दया-माया? चले जाओ, मैं अकेली ही अपनी जिंदगी काट लूँगी।’’
कुम्हारों में सदा के लिए विधवा बनकर रहना जरूरी नहीं। रधिया चाहती, तो कहीं भी नाता कर लेती, लेकिन अपने हाथों बनाये घर और रोटी-कपड़ा दे सकने वाले जमे-जमाये चाक से उसे इतना मोह हो गया था कि न तो उसे छोड़कर कहीं जाना चाहती थी, न उसे यह पसंद था कि सरूपा का घर किसी और का घर कहलाये। डरती भी थी कि दूसरे आदमी ने अगर सौत लाकर छाती पर बिठा दी, तो वह अपने बालकों को लेकर कहाँ जायेगी?
गाँव वालों को रधिया का रह जाना अच्छा लगा था, लेकिन मुखिया को अखर गया था। रधिया के चले जाने की संभावना सामने आते ही उसके घर पर उनकी नजर गयी थी। भले ही वह उनकी अपनी सीर-पट््टी पर नहीं, गाँव की पंचायती जमीन पर बना था, लेकिन उनकी इजाजत से बना था, इसलिए खाली हो जाने पर वे उस पर कब्जा कर सकते थे। उन्होंने सोच लिया था कि पंच लोग न माने, तो वे उसे चैपाल बना देंगे, पर उसका इस्तेमाल तो कर ही सकंेगे। लेकिन रधिया जब कहीं नहीं गयी, तो उन्हें लगने लगा, जैसे वह उनके अपने घर पर कब्जा किये बैठी है। अहसान जताकर रधिया से कुछ और वसूल करना चाहा, तो वह भी नहीं कर सके। उलटे एक नुकसान और हो गया। सरूपा से उन्होंने चाहे जितने बरतन बनवाये, कभी दाम नहीं दिया था, लेकिन रधिया ने फोकट में बरतन देने से इनकार कर दिया। तब से मुखिया बहुत चिढ़े हुए हैं रधिया से। पंच-प्रधान लोगों को उकसाते रहते हैं कि रधिया को गाँव से निकाला जाये, लेकिन गाँव वाले रधिया का ही पक्ष लेते हैं--पड़ी रहने दो, मुखिया! विधवा है बेचारी, अपना कमाती-खाती है।
रधिया को नहीं मालूम, लेकिन गाँव के लड़कों को मुखिया ने ही रधिया के पीछे लगाया था। रधिया ने लड़कों को हाथ नहीं धरने दिया, तो उन्होंने ही गाँव के गुंडा पहलवान सोेबरन को उकसाया था, ‘‘कुम्हरिया बहुत इतराकर चलती है, सोबरन। लगता है, कोई उसके कस-बल ढीले करने वाला नहीं मिला।’’
नजर तो सोबरन की भी थी रधिया पर, लेकिन डरता था। मुखिया की शह पाकर उसकी झिझक जाती रही थी। उसी शाम उसके घर पानी का गगरा फूट गया था और नया गगरा लेने वह रधिया के घर जा पहुँचा था। लेकिन उसे आश्चर्य हुआ था कि रधिया ने उसकी छेड़खानी का विरोध नहीं किया। गालियाँ नहीं दीं। शोर नहीं मचाया। रोने लगी। रो-रोकर उसने सोबरन को बताया कि गाँव के बड़े लोगों के लड़के उसे तंग करते हैं और वह कई दिनों से खुद ही सोबरन से उनकी शिकायत करने की सोच रही थी। सोबरन ने आश्वासन दिया था, ‘‘फिकर मत करो, राधे, अब किसी की हिम्मत नहीं कि तुम्हारी तरफ आँख उठाकर भी देखे। सब सालों को देख लूँगा मैं।’’
रधिया जानती थी कि सोबरन बदमाश है। हनुमान के अखाड़े में पहलवानी करता है, लेकिन दारू पीता है, जुआ खेलता है, ठाकुर नूरसिंह की पाल्टी में होने के कारण उनके विरोधियों से लड़ाई-झगड़ा और मार-पीट करता रहता है, कोई और नहीं मिलता तो अपनी औरत को ही कसाइयों की तरह पीटता है। फिर भी उसने सोबरन का हाथ पकड़ा था और उसके बाद गाँव के लफंगे लड़कोें से सचमुच सुरक्षित हो गयी थी। 
मुखिया ने यह नहीं सोचा था कि सोबरन से रधिया की ऐसी यारी हो जायेगी। उन्हेें लगा, सोबरन को जिस काम पर उन्होंने लगाया था, सोबरन ने किया नहीं। वे सोबरन से नाराज रहने लगे थे और रधिया के कस-बल ढीले करने के लिए उन्होंने अपने लड़के मलखान सिंह को प्रेरित किया था। नतीजा यह हुआ कि सोबरन और मलनखान सिंह में लड़ाई हो गयी और सोबरन ने मलखान सिंह का सिर फोड़ दिया। खुंस में मुखिया ने सोबरन को झूठमूठ एक डकैती के केस में फँसा दिया। थानेदार को रुपया खिलाकर सोबरन छूट तो आया, लेकिन इसके लिए उसे मुखिया से ही कर्ज लेना पड़ा और अपने खेेत रेहन रख देने पड़े। तब से वह मुखिया की पाल्टी से अलग हो गया है और बदला लेने की सोच रहा है, लेकिन मौका नहीं पा रहा है। मुखिया रधिया और सोबरन दोनों से खफा हैं, लेकिन सोबरन से डरते हैं, इसलिए अब उन्होंने धरम-करम की बातें शुरू कर दी हैं। परसों उन्होंने पंडित शिवदत्त से कहा था, ‘‘रधिया ससुरी बड़ा अनर्थ कर रही है, पंडित! हम तो समझा-बुझाकर हार गये। अब तो तुम ही उसे समझाओ। नहीं माने तो गाँव से साली का बहिष्कार कर दो।’’
पंडित शिवदत्त को नहीं मालूम था कि रधिया को समझाने का मौका उन्हें इतनी जल्दी मिल जायेगा। रधिया से वे डरते भी थे। एक बार कुछ कहा था, तो रधिया ने सबके सामने उसका पानी उतार दिया था। इसलिए उन्होंने मजाक में लोगों से कहा था, ‘‘हम समझाने गये, तो तुम ही लोग कहोगे कि पंडित भी रधिया से जा फँसे।’’ मुखिया की चैपाल पर बैठे लोग उनकी बात सुनकर हँसे थे। कहा था, ‘‘अरे पंडितजी, तुम अब साठ से ऊपर के हुए, अब तुम क्या फँसोेगे किसी से!’’
मन में यह सरस वार्तालाप चल रहा है और मुँह से धाराप्रवाह उपदेश निकल रहा है। एक पंथ दो काज वाली कहावत को मन ही मन गुनते हुए पंडित शिवदत्त एक साथ दो बातें सोच रहे हैं। रधिया को समझा-बुझाकर सुमार्ग पर लाना है और मौका लगे, तो यह परीक्षा भी कर देखनी है कि इस उम्र में किसी से फँस सकते हैं या नहीं।
लेकिन रधिया ठंड में सुन्न हुई जा रही है। पैरों में चढ़ता शीत उसकी टाँगों को काठ न बना दे, इसलिए कभी एक पाँव पर जोर देकर खड़ी होती है, कभी दूसरे पाँव पर। कह कुछ नहीं रही, लेकिन समझ सब रही है। मुखिया की चैपाल पर हुई बातचीत वह सुन चुकी है। सोबरन से भी अभी यही बात करके आ रही है। सोबरन ने उसे आश्वासन दिया है, लेकिन उसने कहा है कि वह नूरसिंह को तो देख लेगा पर पंडित शिवदत्त से कुछ नहीं कह पायेगा। पंडित शिवदत्त उसके गुरु हैं। उन्हीं के हनुमान मंदिर वाले अखाड़े में वह पहलवान बना है। रधिया शिवदत्त को मँगता बामन ही कहती-मानती है, लेकिन सोबरन से बात करने के बाद उनसे डर रही है। जानती है, यह मँगता बामन गाँव के मुखिया और पंच-प्रधान लोगों से मिलकर उसे गाँव से निकलवा सकता है। अपने बालकोें की चिंता है उसे। गाँव से निकाल दी गयी, तो कहाँ जायेगी उनको लेकर? पीहर में भी तो कोई नहीं बचा, नहीं तो...
‘‘तू कुछ बोलेगी भी? हम इतनी देर से तुझसेे सिर मार रहे हैं और तू एकदम चुप्प खड़ी है।’’ पंडित शिवदत्त जोर से डाँटते हैं, तो रधिया को लगता है, अब तो कुछ बोलना ही पड़ेगा। कहती है, ‘‘तुम ठीक कह रहे हो, पंडितजी। कान पकड़ती हूँ, अब उसकी तरफ आँख उठाकर भी नहीं देखूँगी।’’
‘‘पर तेरा क्या विश्वास? कल को फिर तू...?’’
‘‘नहीं पंडितजी, अपने बालकों की सौंह।’’ जानती है कि झूठी कसम खा रही है, लेकिन इसके अलावा जान छुड़ाने का और उपाय भी क्या है? कसम खाते-खाते रुआँसी हो आयी है। इस समय तो वह इस मँगते बामन के पाँव भी पकड़ सकती है। लेकिन पंडित शिवदत्त इतने से ही संतुष्ट हो गयेे हैं। कहते हैं, ‘‘तो जा, अब घर जा। जिन बालकों की सौगंध खायी है, उन्हें जाकर सँभाल।’’
रधिया तेज-तेज कदमों से गाँव की ओर चल दी है और पंडित शिवदत्त ‘हरिओम-हरिओम’ कहते हुए खेत की तरफ बढ़ गये हैं। एक पतिता को पाप से बचा लेने और स्वयं पाप में पड़ते-पड़ते बच जाने के संतोष और आनंद के साथ वे खेत की मेंढ़ पर लोटा रखकर हगने बैठ गये हैं, लेकिन रधिया का गोरा रंग और सुंदर चेहरा उनकी आँखों में बसा हुआ है। थोड़ी देर पहले रधिया और सोबरन ने खेत में बने मचान पर जो लीला की होगी, उसकी कल्पना से वे उत्तेजित हो जाना चाह रहे हैं, लेकिन जाड़े की रात में खुले मैदान की यह ठंड...हरिओम-हरिओम...  
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गाँव सोया पड़ा है। बुझे हुए अलावों की राख से थोड़ी गरमाई पाते हुए कुत्तों ने रधिया की आहट पर जागकर गुर-गुर ही है, लेकिन भौंके नहीं हैं। ताल के किनारे गाँव से अलग-थलग बना रधिया का घर एकदम भूतवासा लग रहा है। एक मड़हे और एक छप्पर वाले इस घर के गज-भर ऊँची सपील से घिरे आँगन में ही चाक चलता है और उसी के एक कोने में आँवाँ सुलगता है। विधवा हो जाने के बाद से रधिया ही मिट्टी खोदने-गोेेड़ने से लेकर बरतन पकाने तक का सारा काम करती है। हुनर हाथ में ऐसा है कि उसे अपने बरतनों पर गेरू पोतने की जरूरत कभी नहीं पड़ी। आँच ही ऐसी देती है कि काली मिट््टी में भी दमकता हुआ लाल रंग खिल उठता है। इस समय सारा आँगन आज ही चाक से उतारे गये कच्चे सकोरों की पाँतों से भरा हुआ है। कल जब ये सूख जायेंगे, तब रधिया इन्हें पकायेगी। अभी तो ये ऐसे लग रहे हैं, जैसे इनमें चाँदनी भरने के लिए इन्हें आँगन में सजा दिया गया हो। 
सकोरों को देखकर रधिया मुस्कराती है। पंडित जी की सारी धमकियाँ और सारे उपदेश बिसर जाते हैं। शाम की वह घड़ी याद आ जाती है, जब वह यहाँ बैठी चाक चला रही थी। थकान से उसकी कमर टूट रही थी, जब सोबरन ताल में बैलों को पानी पिलाकर खँखारता हुआ घर के सामने से गुजरा था। रधिया समझ गयी थी और काम खत्म करने के बाद वह बेहद ठंड के बावजूद गरम पानी और खुशबूदार साबुन से नहायी थी। बच्चों को खिला-पिलाकर उन्हें सुलाते हुए खुद भी थोड़ी देर ऊँघ ली थी कि रात भी हो जाये और कुछ थकान भी उतर जाये। फिर अपने-आप ही जागी थी और घर का दरवाजा भेड़कर दबे पाँव निकल गयी थी। खेत में सोबरन उसकी प्रतीक्षा में जागता मिला था। रधिया ने मचान केे नीचे पहुँचकर सियार की बोली उतारी थी और सोबरन हुर्र करता हुआ फौरन उठ बैठा था। वह मचान पर चढ़ गयी थी और जब सोबरन ने उसे अपनी रजाई में लेकर सीने से चिपटाया था, ठंड के मारे उसके दाँत बज रहे थे और उत्तेजना में उसकी रग-रग काँप रही थी। 
वह सुख मिट्टी हो चुका है। ठंड से काँपती हुई रधिया चुपके से घर में घुसती है। देखती है, दोनों बच्चे चैन से सो रहे हैं। वह अपनी खाट पर रजाई में दुबक जाती है। रजाई ठंडी है और रधिया के पैर तो बरफ हो रहे हैं। जब तक बाहर थी, इतनी ठंड नहीं लग रही थी, लेकिन रजाई ओढ़ लेने के बाद अब उसके दाँत किटकिटा रहे हैं। थोड़ी देर वह पंडित शिवदत्त की बातों पर विचार करती है, लेकिन उसे पता नहीं चलता कि कब रजाई भरक गयी, कब उसकी कँपकँपी बंद हुई और कब उसे नींद आ गयी। 
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पंडित शिवदत्त रधिया को समझाकर ही संतुष्ट नहीं हुए। न जाने उन्हें क्या सूझा कि जंगल-झाड़े से निबटकर खाली लोटा लटकाये खेत की मेढ़-मेढ़ चलते वे सोबरन के मचान तक जा पहुुँचे। सोबरन खर्राटे भर रहा था, पंडित शिवदत्त की ललकारती-सी आवाज सुनकर जागा। लाठी सँभालकर ऊपर से झाँकता हुआ बोला, ‘‘कौन है?’’ और पंडित शिवदत्त को पहचानकर बोला, ‘‘क्या बात है, गुरूजी?’’ कहता हुआ अपनी रजाई लपेटे नीचे उतर आया। मन में खुटका तो हो रहा था कि पंडित ने शायद रधिया को यहाँ से जाते देख लिया है, लेकिन यह नहीं जानता था कि वे इस बात को इतना तूल देंगे।
‘‘तुमको शरम नहीं आती, सोबरन?’’ पंडित शिवदत्त कोई भूमिका बाँधे बिना लताड़ने लगे, ‘‘घर में सुंदर-सुशील बहू है, ठाकुर नेगसिंह जैसे मातबर आदमी के तुम लड़के हो, हमारे अखाड़े में बीस बरस ब्रह्मचारी रहकर तुमने पहलवानी और हनुमान-पूजा की है, और एक नीच कुम्हारिन पर अपना ईमान बिगाड़ लिया है तुमने, ऐं?’’
सोबरन कुछ बोला नहीं, पर उसे हँसी आ गयी। आधी रात को, इतनी ठंड में, और इस तरह सुनसान खेत में आकर, सोबरन को सोते से जगाकर पंडितजी यह सब कहेंगे, यह बात उसे बहुत ही मजेदार लगी।
लेकिन पंडित शिवदत्त पगला रहे थे। पहले वे रधिया की नीचता बताते रहे, फिर न जाने क्या हुआ कि बोेले, ‘‘रधिया के पास ऐसा क्या है, जो तुम्हारी बहू के पास नहीं है?’’ इसके बाद वे रधिका के अंग-प्रत्यंग की तुलना सोबरन की बहू से करने लगे। अपने जाने वे सोबरन को सुमार्ग पर लाने के लिए ही ऐसा कर रहे थे, लेकिन सोबरन को उनके मुँह से रधिया की छातियों के साथ अपनी बहू की छातियों का बखान अच्छा नहीं लगा। उसे गुस्सा आ गया। उसने अपनी रजाई उतार फेंकी और पंडित शिवदत्त को उठाकर खेत में पटक दिया। गेहूँ और सरसों के हाथ-हाथ भर ऊँचे पौधों पर जमी ओस में पंडित शिवदत्त नहा-से गये और भयार्त स्वर में चिल्लाने लगे। सोबरन ने उनका मुँह बंद कर दिया और बुढ़ऊ कहीं मर न जाये, इस डर से उन्हें पीटने के बजाय झकझोरकर बोला, ‘‘कहे देता हूँ पंडित, आगे कुछ बोले तो जबान खेंच लूँगा। सोबरन को समझ क्या रखा है तुमने? अब खैर चाहते हो, तो चुपचाप चले जाओ यहाँ से।’’
पंडित शिवदत्त लटपटाते हुए उठकर चले गये। बासठ की उम्र हुई, आज तक इतना अपमान उनका कभी नहीं हुआ। भृगु, विश्वामित्र और दुर्वासा जैसे तमाम क्रोधी ऋषि-मुनियों को याद करते हुए वे खेत से निकलकर दगड़े में आये और घूमकर खड़े हो गये। मचान के नीचे सोबरन अभी भी खड़ा था। ठाकुर के लौंडे ने ब्राह्मण पर हाथ उठाया। पंडित शिवदत्त को अपने अंदर परशुराम की आत्मा उतरती महसूस हुई और उन्होंने खाली लोटे को फरसे की तरह उठाकर चिल्लाते हुए प्रतिज्ञा की, ‘‘तेरा वंश न मेट दिया तो नाम शिवदत्त नहीं।’’
खेत में छायी खामोशी पर तैरते उनके शब्द दूर खड़े सोबरन तक पहुँचे और वह दगड़े की तरफ बढ़ा। लेकिन उसकी आकृृति हिलती दिखाई दी, तो पंडित शिवदत्त फिर से पकड़ लिये जाने के डर से गिरते-पड़ते गाँव की तरफ दौड़ पड़े। 
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पंडित शिवदत्त चले गये, पर सोबरन को नींद नहीं आ रही है। वह मचान पर बनी झोंपड़ी में घुसकर रजाई ओढ़कर बैठ गया है और बीड़ी फूँक रहा है। सुन रहा है कि नीचे खेत में कोई जानवर घुस आया है और चर रहा है, लेकिन वह उसे भगाने के लिए उठ नहीं पा रहा है। लड़ाई-झगड़ा उसके लिए नयी चीज नहीं है, लेकिन पंडित शिवदत्त पर हाथ उठाना उसे अखर रहा है। अपने गुस्से को सही ठहराने के लिए वह पंडित शिवदत्त की बातें याद कर रहा है, लेकिन उनकी बातें उसे गलत भी लग रही हैं और सही भी। रधिया और अंगूरी की जिस तुलना पर वह बिगड़ उठा था, खुद तब से कई बार कर चुका है। रधिया कभी उन्नीस लगती है, कभी इक्कीस। अंगूरी उसकी बहू है, रधिया से ज्यादा जवान है, उसके लड़के की माँ है। फिर रधिया? लेकिन रधिया में जो बात है, अंगूरी में नहीं। रधिया प्यार करती है, अंगूरी अधिकार जमाती है। अंगूरी सोबरन के दारू पीने पर चिढ़ती है और लड़ती है, रधिया दारू को बुरा नहीं समझती, बल्कि पीने के लिए दो-चार रुपये भी दे देती है। आज भी तीन रुपये दे गयी है। लेकिन...
सोबरन को लगता है, बात सिर्फ देह और दारू की नहीं, बात कुछ और है। लेकिन क्या?
उसे रधिया की बातें याद आ रही हैं। मुखिया उसे गाँव से निकाल देने की फिराक में हैं, यह सोबरन भी जानता है। लेकिन वह इसमें क्या कर सकता है? रधिया का कोई कानूनी हक तो यहाँ है नहीं। और होता भी तो क्या? कानून तो पैसे का है सब। मेरे ही मामले में क्या हुआ? झूठा मुकद्दमा था, फिर भी जेल हो गयी होती, अगर पैसा न होता...और पैसा तो साले मुखिया जैसे लोगों के पास ही है। उनकी पहुँच भी ऊपर तक है। थाना-कचहरी से लेकर असेंबली तक। सोबरन उनसे अपनी ही लड़ाई नहीं लड़ पा रहा है, रधिया के लिए कैसे लड़े?
मगर उसकी यह कमजोरी रधिया जाने, यह सोबरन को मंजूर नहीं। वह कौन होती है उस पर ताना कसने वाली कि वह कुछ नहीं कर सकता? अरे, जब मैं कह रहा हूँ कि मैं सब देख लूँगा तो विश्वास कर। नहीं करती तो मर। उस मास्टर साले को बीच में क्यों लाती है?
दरअसल गुस्सा सोबरन को मास्टर पर ही था, मारे गये पंडित शिवदत्त। रधिया ने सोबरन को कच्चा पड़ता देख कहा था, ‘‘देख लो, सोबरन, कहीं मास्टर की ही बात सच्ची न निकले कि तुम कुछ नहीं कर पाओगे।’’
सोबरन ने रधिया को डाँट दिया था, ‘‘उस पाजी की बात मत करो, राधे! मैं उसका नाम भी तुम्हारे मुँह से नहीं सुनना चाहता।’’ रधिया हँस दी थी, ‘‘मैं उसका नाम क्यों लूँ, बात आयी तो मैंने कह दी। तुम्हें नहीं पसंद है, तो छोड़ो। पर यह सोच लो कि अब तुम्हें कुछ करना जरूर पड़ेगा। मुखिया मुझे गाँव से निकालने पर तुले हैं।’’
रधिया हँस दी थी और सोबरन ने कह दिया था, ‘‘तुम फिकर मत करो, मैं सब देख लूँगा।’’ लेकिन कहते समय उसे लगा था कि वह झूठ बोल रहा है और रधिया उस झूठ को समझ रही है। रधिया के जाने के बाद भी सोबरन इस अहसास से तिलमिला रहा था। उसे लगा, मास्टर से रधिया की बातचीत आजकल कुछ ज्यादा ही होने लगी है। मास्टर जरूर उसे मेरे खिलाफ भड़काता होगा। 
‘‘मुखिया के खिलाफ तुम कुछ नहीं करोगे। तुम्हें अपने मौज-मजे से फुर्सत मिले तब न!’’ गाँव के स्कूल में पढ़ाने आने वाले मास्टर की यह बात सोबरन को अक्सर याद आती है। हालाँकि मास्टर ने उसका कभी कुछ बुरा नहीं किया, फिर भी उसे मास्टर पर गुस्सा आता है। उसकी समझ में नहीं आता कि जब दुनिया में सभी बदमाश हैं, तो मास्टर ही एक शरीफ कैसे हो सकता है? फिर गाँव के लोग आनगाँव के इस आदमी की इतनी इज्जत क्योें करते हैं? यहाँ तक कि मुखिया भी उससे दबते हैं, जबकि वह खुलेआम मुखिया की मुखालफत करता है। बातें उसकी सोबरन को भी सही लगती हैं, लेकिन उसमें कुछ ऐसा है कि सोबरन को उससे डर लगता है। और डेढ़ पसली के उस आदमी से सोेबरन डरना नहीं चाहता। हालाँकि मास्टर से डरने की कोई बात नहीं है, मास्टर जब भी मिलता है, हँसकर बात करता है, लेकिन उसकी बातों में कुछ ऐसा होता है कि सोबरन उसके सामने खुद को बहुत छोटा और कमजोर समझने लगता है। यह चीज उसे तिलमिला देती है। तिलमिलाकर वह गुस्से से भर उठता है। गुस्से में किसी से लड़ाई-झगड़ा कर लेता है। कोई और नहीं मिलता, तो अंगूरी को ही पीट देता है। अपने लड़के को ही मार बैठता है। फिर भी तिलमिलाहट जाती नहीं। दारू पीता है, रधिया को भोगता है, फिर भी नहीं। भीतर एक आग-सी लगी रहती है। सोचता है, जब तक नूरसिंह से बदला नहीं ले लेगा, यह आग बुझेगी नहीं। लेकिन मुखिया नूरसिंह रात-बिरात कभी निकलते नहीं, निकलें भी तो तमंचा हर वक्त उनकी जेब में रहता है।
इसी उधेड़-बुन में पड़ा सोबरन जागता रहा और बीड़ियाँ फूँकता रहा। उसके लिए यह एक अजीब और परेशानी वाली बात थी। वह कभी उधेड़-बुन में नहीं पड़ता। या तो सीधा सोचता है, या सोचता ही नहीं। सही-गलत जो होता है, कर डालता है। भुगतना पड़ता है, तो भुगत लेता है। चिंता और पहलवानी का कोई साथ नहीं। 
हारकर सोबरन ने सीधी बात सोच ली है: सुबह होते ही वह पंडित शिवदत्त के पास जायेगा। उनके चरण छूकर क्षमा माँगेगा। रधिया का जो होना हो सो हो, उसकी परवाह नहीं करेगा। सोबरन ने उसकी सुरक्षा का ठेका थोड़े ही ले रखा है! मास्टर के गुण गाती है, तो जा, मास्टर से मदद माँग। मास्टर की भगतिन...साले को मारा नहीं तो नाम सोबरन नहीं!
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सुबह रोज की-सी सुबह थी। रात को जो घटना खेत में घट गयी थी, उसका रंचमात्र भी प्रभाव रधिया के मन पर नहीं था। आँख खुलने पर राधे-राधे कहकर बातें करने वाले सोबरन की आवाज उसके कानों में जरूर गूँजी थी, उठकर अँगड़ाई लेते समय एक सुखद सिहरन भी उसने महसूस की थी, दगड़े में खड़े पंडित शिवदत्त का उपदेश भी उसे याद आया था, लेकिन इस सबको उसने मन पर टिकने नहीं दिया था।
रोज की तरह उठी और बाजरा पीसने बैठ गयी। पीसती रही और जो मन में आया, गाती रही। बच्चों के जागने का समय हुआ, तो छप्पर के नीेचे बने चैके में आकर चूल्हा चेताया और पानी का बटुला गरम होने को रख दिया। ठंडे पैरों को आँच के सामने रखकर तपाने लगी। अरहर की सूखी डंडियाँ भरभराकर जल रही थीं और लपट लेती आँच को देखना उसे अच्छा लग रहा था। कल खरीदी हुई गुड़ की भेली उसके ध्यान में थी और वह सोच रही थी कि बालक उठ जायें, तो उनके लिए बाजरे का मीठा दलिया पका देगी।
तभी पाँच बरस की उसकी बिटिया उसके पास आ बैठी। रधिया ने ओढ़ा हुआ खेस खोलकर बेटी को ढँक लिया और अपने साथ सटा लिया। फिर बोली, ‘‘अपने मास्साब की बात भूल गयी, बिट्टो?’’
सुनकर बिट्टो को सहसा ध्यान आया और उसने मुस्कराते हुए छोटे-छोटे हाथ जोड़कर माँ से कहा, ‘‘अम्मा, नमस्ते।’’
रधिया खिल उठी। बिट्टो पर असीसें बरसा दीं। आशीर्वादों में बिट्टो खूब बड़ी हो गयी, पढ़-लिखकर मास्टरनी बन गयी, अच्छे-से दूल्हे के साथ उसकी शादी भी हो गयी। बिट्टो ने माँ की गोद में लेटकर आँखों में बची रह गयी नींद में फिर सपने खोजना शुरू कर दिया, लेकिन माँ चुप होकर चूल्हे में लकड़ियाँ सरकाती हुई, आँच की लपटों को एकटक देखने लगी। 
माँ का सपना बहुत बड़ा है, इसलिए खुली आँखों से देखना पड़ता है उसे। वह जानती है कि एक मेहनत-मजूरी करने वाली, नीच जात, अकेली विधवा को अपने बच्चों को पढ़ा-लिखाकर किसी लायक बनाने का सपना नहीं देखना चाहिए, लेकिन वह देखती है। वह जानती है कि उसका सपना कहीं भी टूट सकता है या तोड़ दिया जा सकता है; लेकिन कच्चे बरतन टूट जायेंगे इस डर से क्या कोई बरतन बनाना छोड़ देता है? उसके बच्चे तो चाक पर चढ़ी गीली मिट्टी हैं। वह उन्हें अच्छे से अच्छा बनाकर चाक सेे उतारेगी, बढ़िया से बढ़िया आँच देकर उन्हें पकायेगी, सुंदर से सुंदर बेल-बूटों से उन्हें सजायेगी।
स्कूल में बिट्टो को दाखिल कराने गयी थी, तो उसने मास्टर से कहा था, ‘‘खूब अच्छी तरह पढ़ाना, मास्टर, मैं अपनी बिट्टो को मास्टरानी बनाऊँगी।’’
मास्टर एक विधवा कुम्हारिन की इस महत्त्वाकांक्षा पर मुस्कराया था। मूँछों में हँसते हुए उसने कहा था, ‘‘सो तो ठीक है, रधिया, लेकिन यह ठहरी लड़की जात। मास्टरनी बन भी गयी, तो क्या इसकी कमाई तुम्हारे हाथ आयेगी?’’
रधिया बात समझकर भी तिलमिलायी नहीं थी। हँसकर कहा था, ‘‘इतने गगरे-सुराहियाँ बनाती हूँ, मास्टर, सबका ठंडा पानी मैं ही पीती हूँ क्या? और तुम भी तो यही काम करते हो। तुम्हारे पढ़ाये हुए बालकों में से कोई मास्टर बनेगा, कोई पटवारी, कोई थानेदार। क्या उनकी कमाई तुम्हें खाने को मिल जायेगी?’’
मास्टर अचकचाकर रधिया का मुँह देखने लगा था। रधिया जैसी औरत के मुँह से ऐसी ज्ञान की बात सुनने की उम्मीद उसे नहीं थी। उस समय कुछ नहीं कहा था उसने, पर एक दिन बिट्टो ने स्कूल से लौटकर माँ को बताया था कि मास्साब ने क्या कहा है--अपनी माँ से खूब प्यार किया करो। रोज सुबह उठकर नमस्ते किया करो। तुम्हारी माँ बहुत समझदार औरत है।
रधिया चूल्हेे की आँच को देखती है और मुस्कराती है। अपने बारे में सोचती है--कितनी गिरी हुई और बदनाम औरत है वह, लेकिन कोई तो है, जो उसे ठीक समझता है। मास्टर के लिए उसके मन में आदर ही आदर है। उसे वह बिट्टो के संदर्भ से ही नहीं, अपने संदर्भ से भी जानती है।
गाँव में सोबरन के साथ रधिया को सबसे पहले मास्टर ने ही देखा था। उस दिन मास्टर को गाँव में कुछ देर हो गयी थी। शाम के झुटपुटे में रेतीले दगड़े में अपनी साइकिल रौंदता वह अपने गाँव जा रहा था कि अमराई के साथ वाले अरहर के खेत में से सोबरन और रधिया अचानक एक साथ निकल पड़े थे। गाँव में अरहर के खेत बदनाम होते हैं। रधिया के साथ सोबरन को अरहर के खेत से निकलते देख अनुमान के लिए कुछ बचा ही नहीं था। मास्टर मुस्कराता हुआ आगे बढ़ गया था, लेकिन सोबरन ने उसे पुकार लिया था, ‘‘सुनो मास्टर!’’ और मास्टर के रुक जाने पर सोबरन ने पास आकर उसकी साइकिल का हैंडिल पकड़ लिया था। कहा था, ‘‘तुमने देख तो लिया और देखकर मुस्करा भी लिये, पर आगे बात फैली, तो इस गाँव में मास्टरी नहीं कर पाओगे। मेरा नाम सोबरन है।’’
धमकी तगड़ी थी, क्योंकि सोबरन तगड़ा था, लेकिन मास्टर हँस दिया था। बोला, ‘‘हाँ, भाई, तुम सोबरन ही हो। मैं तुम्हें जानता हूँ। नामी पहलवान हो। लेकिन गाँव में शायद एक सोबरन और भी तो है, जो किसी डकैती-वकैती में पकड़ा गया था? सुना है, वह थानेदार के जूते चाटकर जेल जाने से बच आया था।’’ सोबरन को झटका लगा था, लेकिन मास्टर उसे बोलने का मौका दिये बिना कहता गया था, ‘‘मुझे तो तुम यहाँ मास्टरी करने नहीं दोगे, पर नूरसिंह ने तुमको डाके में फँसाकर जबर्दस्ती तुम्हारे खेत रेहन रख लिये, तब तुम्हारी मर्दानगी कहाँ गयी थी?’’
‘‘उस बात से तुमको कोई मतलब नहीं, मास्टर!’’ सोबरन को गुस्सा चढ़ आया था और साइकिल के हैंडिल को झकझोरते हुए उसने कहा था, ‘‘तुमने मेरे खिलाफ कुछ किया, तो काटकर नहर में फेंक दूँगा।’’
‘‘तुम्हारा क्या खयाल है, मैं तुम्हारे खिलाफ क्या करूँगा?’’ मास्टर ने गंभीर होकर पूछा था। 
‘‘बदनामी करोगे, और क्या करोगे तुम! पर मैं भी देख लूँगा।’’
‘‘निश्चिंत रहो, तुम्हारी बदनामी करते फिरने की मुझे फुरसत नहीं है। लेकिन तुम्हें देखना ही हो, तो अपने को देखो। क्या हो तुम? अच्छे-भले किसान के लड़के थे, दारूबाजी और गुंडागर्दी में पड़ गये और जिनके लिए लड़े-मरे, उन्हीें के बनाये झूठे मुकद्दमे में फँसकर अपनी जमीन से हाथ धो बैठे। अपने ही खेतों में तुम ठाकुर नूरसिंह के नौकर बनकर रह गये हो, इस चीज को भी देखते हो तुम?’’
‘‘सब देख रहा हूँ, मास्टर! मौका देख रहा हूँ। नूरा को एक दिन ठिकाने लगाकर ही रहूँगा। देख लेना।’’
‘‘देख लिया! मुखिया के खिलाफ तुम कुछ नहीं करोगे। तुम्हें अपने मौज-मजे से फुरसत मिले तब न!’’ कहते हुए मास्टर ने सोबरन का हाथ पकड़कर अपनी साइकिल के हैंडिल से हटा दिया था।
रधिया देखती रह गयी थी। सोबरन कुछ नहीं बोल पाया था। सोबरन को किसी के सामने इतना फीका पड़ते रधिया ने कभी नहीं देखा था। उसे आश्चर्य हुआ था, इस पतले सींक-से आदमी में कौन-सी ताकत है, जो सोबरन जैसे खूनी आदमी का हाथ झटककर चला गया? रधिया की समझ में एक ही बात आयी थी कि मास्टर के पास विद्या है और विद्या की ताकत सोबरन की खूनी ताकत से बड़ी है। उसने सोचा था, अगर वह पढ़ी-लिखी होती और कहीं मास्टरानी होती, तो क्या उसे किसी से डरना पड़ता?
उस दिन से रधिया मास्टर की इज्जत करने लगी थी और उसे अपनी बिट्टो को मास्टरनी बनाने की धुन सवार हो गयी थी। और जिस दिन से रधिया ने बिट्टो के मुँह से मास्टर द्वारा की गयी अपनी प्रशंसा सुनी है, वह उसका और भी आदर करने लगी है। मास्टर सुबह-शाम गाँव में आते-जाते रधिया के घर के सामने से ही गुजरता है। स्कूल रधिया के घर से जरा दूर है, इसलिए जाते समय बिट्टो को साइकिल पर बिठा ले जाता है, लौटते समय छोड़ जाता है। रधिया से दो-चार बातें भी कर लेता है।
एक दिन उसने पूछा था, ‘‘सोबरन तुम्हें कैसा आदमी लगता है, रधिया?’’
‘‘मेरे लिए तो अच्छा ही है, मास्टर!’’
‘‘उसे दारू-पानी के लिए पैसा तुम देती हो?’’
‘‘कभी-कभार हाथ में कुछ रह जाता है तो...’’ रधिया सकुचा गयी थी। उस दिन मास्टर से न जाने क्यों उसे कुछ डर-सा लगा था। लेकिन मास्टर ने फिर और कुछ नहीं पूछा था, मुस्कराकर रह गया था। रधिया का मन हुआ था, कह दे--सोबरन का हाथ मैंने अपनी हिफाजत के लिए पकड़ा है, मास्टर! गाँव के लोगों को तो तुम जानते हो, उनका बस चले तो मुझे चींथकर खा जायें। सोबरन बदमाश आदमी है, उससे सब डरते हैं, इसीलिए उसकी होकर रहती हूँ। इसीलिए चार पैसे भी उस पर खरच देती हूँ। लेकिन मास्टर से यह सब कह नहीं पायी थी। कहना जरूरी भी नहीं लगा था। सोचा था, मास्टर इतना विद्वान आदमी है, क्या इतनी बात नहीं समझता होगा?
‘‘सोबरन की बहू को यह सब मालूम है?’’ मास्टर ने पूछा था।
‘‘मालूम है। एक दिन आकर मुझसे लड़ी भी थी, पर सोबरन ने उसे पीट दिया था। फिर नहीं आयी। हाँ, राह-बाट कभी मिल जाती है, तो गालियाँ देती है। मैं जवाब नहीं देती।’’
‘‘ऐसा कब तक चलेगा, रधिया?’’
‘‘जब तक जिंदा हूँ, जब तक ये हाथ-गोड़ चलते हैं, तब तक ऐसा ही चलेगा, मास्टर! मेरे लिए दुनिया में और कहीं ठौर नहीं है। बस, ये बालक पल जायें, कुछ पढ़-लिख जायें।’’ रधिया ने कहा था और फिर एकाएक पूछ लिया था, ‘'बिट्टो कुछ पढ़ती-पढ़ाती है कि नहीं?’’
‘‘पढ़ती तो है, पढ़ाने भी लगेेगी कभी।’’
‘‘मास्टरानी बन जायेगी?’’ 
‘‘तुम बनाना चाहती हो, तो क्यों नहीं बनेगी? तुम मास्टरनी की अम्मा जरूर बनोगी।’’
तब से मास्टर रधिया को ‘मास्टरनी की अम्मा’ कहने लगा है। रधिया को उसका यह मजाक अच्छा लगता है। एक दिन उसने भी मजाक में कहा था, ‘‘तुम इतने बड़े, ऊँची जात के और बाल-बच्चों वाले न होते और मेरी बिट्टो बड़ी होती, तो तुमसे उसका ब्याह कर देती। फिर बिट्टो को मास्टरानी बनाये बिना ही मास्टरानी की अम्मा बन जाती।’’ मास्टर ने रधिया को झिड़क दिया था। कहा था, ‘‘क्या बात करती हो! बिट्टो मेरी छोटी लड़की के बराबर है।’’
एक दिन इसी तरह हँसते और बातें करते उन्हें किसी ने देख लिया था और सोबरन से जाकर कह दिया था। सोबरन ने रधिया पर गुस्सा किया था। कहा था, ‘‘अब मास्टर से आँख लड़ाने लगी हो?’’ रधिया नाराज हो गयी थी। धारदार जबान से कह दिया था, ‘‘होश की बात करो, सोबरन! अव्वल तो ऐसी कोई बात है नहीं, और हो भी तो मैं तुम्हारी ब्याहता नहीं हूँ। तुमसे कुछ लेती नहीं हूँ, तुम्हें कुछ दे ही देती हूँ।’’
कहने को कह गयी थी, लेकिन कहने के बाद डर गयी थी। सोेबरन कहीं कुछ कर न डाले। इतनी बात कौन मर्द बर्दाश्त करेगा? लेकिन सोबरन बेशरम-सा हँस दिया था और रधिया की खुशामद करने लगा था। उस रात रधिया को सोेबरन--वही गुंडा पहलवान, जिससे सारा गाँव डरता था--एकदम नामर्द-सा लगा था और रधिया को अपनी चिंता हो आयी थी। मुखिया अगर मुझे गाँव से निकाल देने पर तुल जायें, तो क्या वह मुझे बचा लेगा? और कोई सहारा न देख उसने अपने डर को मन में ही दबा लिया था। लेकिन उस रात सोबरन के साथ का सुख रधिया को सुख-सा नहीं लगा था। 
कल रात भी कुछ-कुछ ऐसा ही...
अंदर से छोटे बच्चे के जागकर रोने की आवाज सुनकर सोच में डूबी रधिया का ध्यान भंग हुआ। गोद में ऊँघती बिट््टो को जगाकर उसने कहा, ‘‘उठ बिट्टो, लाला जाग गया है। तू यह गरम पानी ले ले। हाथ-मुँह धोकर स्कूल जाने को तैयार हो।’’
**
मास्टर ओस-भीगे दगड़े में साइकिल चलाता हुआ खेतों के बीच से निकलकर गाँव की तरफ आ रहा है। तेजी से चलती हुई उसकी साँस धुएँ की शक्ल में बाहर निकल रही है। नौ बजने वाले हैं और धूप निकल आयी है, लेकिन रात कोहरा इतना घना पड़ा है कि अभी तक नहीं छँटा है। मास्टर ताल की ओर देखता है। कोहरे को भेदकर जल तक पहुँचती किरणों का दृृश्य उसे अच्छा लगता है। जल पर भाप-सी उठ रही है, जैसे ताल में नहाने के लिए गरम किया हुआ पानी भरा हो।
मास्टर मुग्ध होकर ताल की तरफ देख रहा था, इसलिए देख नहीं पाया कि सोबरन कब सामने आ गया और कब उसने पास आकर उसकी साइकिल को पकड़ लिया। मास्टर ने चैंककर देखा और दारू की तीखी गंध उसके नथुनों में घुस पड़ी। 
कोई और होता तो डर जाता, लेकिन मास्टर को सोबरन से डर नहीं लगता। सोबरन सामने आता है, तो मास्टर को हँसी आने लगती है। सोचता है, यह बैल कभी नहीं समझ पायेगा कि इसकी जिंदगी किस तरह बर्बाद हो रही है। पंडित शिवदत्त के धर्म और ठाकुर नूरसिंह की राजनीति के मिक्सचर ने इसे एक तरफ निहायत बौड़म, निकम्मा और डरपोक बना दिया है, तो दूसरी तरफ एकदम लंपट, हिंसक और दुस्साहसी। ऐसे लोगों से किस तरह पेश आया जाता है, मास्टर को मालूम है। सोबरन की चर्चा चलने पर वह कहा करता है, ‘‘ऐसे लोगों से डरे तो मरे।’’
  ‘‘आज सुबह-सुबह कहाँ से पी आये, ठाकुर सोबरन सिंह?’’ मास्टर ने साइकिल से उतरकर मुस्कराते हुए कहा, ‘‘लगता है, रधिया आजकल पैसे कुछ ज्यादा देने लग गयी है!’’
क्षण-भर पहले तक सोबरन का खयाल था कि वह मास्टर को मारेगा। इतना मारेगा कि मास्टर इस गाँव में आना भूल जायेगा। वह काफी देर से पुलिया पर बैठा मास्टर की ही प्रतीक्षा कर रहा था, जिसकी बातों ने उसे सारी रात सोने नहीं दिया था। रात को ही उसने एक सीधी बात सोच ली थी: रधिया के खयाल के साथ मास्टर का खयाल आता है, और यह ठीक नहीं है, इसलिए वह मास्टर को मारेगा। इसके बाद कुछ भी सोचना जरूरी नहीं था। रात को रधिया तीन रुपये दे गयी थी। खेत से उठकर सोबरन सुबह सीधा छिद्दा के घर चला गया था, जिसके यहाँ कच्ची दारू खिंचती और बिकती है। तीन रुपये में जितनी आ सकती थी, खडे़-खड़े पीकर सोबरन चला आया था और मास्टर को मारने के लिए पुलिया पर बैठकर उसकी प्रतीक्षा करने लगा था। लेकिन मास्टर की बात सुनकर वह भौंचक-सा बस उसे देखता रह गया। न हाथ उठा, न मुँह से कोई गाली निकली। उसे लगा, यह सुबह-सुबह ठंड में खाली पेट नशा कर लेने के कारण है।
‘‘पुलिया पर बैठो और धूप खाओ।’’ मास्टर ने कहा और साइकिल खड़ी कर दी। सोबरन के हाथ से हैंडिल छुड़ाया और उसे पकड़कर पुलिया पर ले आया। बिठाकर चलने लगा था कि सोबरन औंधे मुँह उसके पैरों पर गिर पड़ा। मास्टर ने समझा, नशे के कारण गिर गया है। उठाने की कोई जरूरत न समझकर उसने अपने पैर खींचे, लेकिन देखा कि सोबरन उसके पैर पकड़े हुए है और कह रहा है, ‘‘मुझे माफ कर दो, गुरूजी! अब कभी तुम पर हाथ नहीं उठाऊँगा।’’
मास्टर मुस्कराया। बोला, ‘‘चलो, कर दिया माफ। अब उठो।’’
‘‘नहीं-नहीं, पहले वचन दो, वचन।’’
‘‘क्या वचन लेना चाहते हो मुझसे?’’
‘‘नहीं, पहले वचन दो, वचन।’’
‘‘अच्छा, वचन दिया। अब बोलो, क्या चाहते हो?’’
कुछ देर मास्टर उत्तर की प्रतीक्षा में खड़ा रहा। कोई जवाब नहीं आया, तो उसने झुककर सोबरन को उठाया। सोबरन की आँखें बंद थीं और मुँह में दगड़े की धूल भरी हुई थी। वह या तो सो गया था, या बेहोश हो गया था। उसे वहीं छोड़कर मास्टर गाँव की तरफ चल दिया।
**
रधिया का घर रास्ते में ही पड़ता है और स्कूल जाने के लिए तैयार बिट्टो अक्सर मास्टर को घर के बाहर खड़ी मिलती है। बिट्टो को अपने साथ स्कूल ले जाना मास्टर का नियम-सा बन गया है। लेकिन यह क्या? आज बिट्टो नहीं, रधिया के घर के सामने गाँव के कई लोग खड़े दिखायी दे रहे हैं। पंडित शिवदत्त, चैधरी रामसेेवक, मुखिया नूरसिंह, और भी कई लोग। घूँघट वाली एक औरत हाथ नचा-नचाकर ऊँची आवाज में रधिया को गालियाँ दे रही है, ‘‘तेरे बालकों को साँप डस जाये, नासपीटी नागिन! रंडी, छिनाल, मेरा ही आदमी रह गया था तेरी आग बुझाने को?’’
मास्टर ने साइकिल से उतरकर देखा, रधिया छोटे बच्चे को गोद में चिपकाये और एक बाँह से बिट््टो को अपने-से सटाये अंदर दरवाजे के पास खड़ी भय से काँप रही है। पंडित शिवदत्त ने बिना पूछे ही मास्टर को बता दिया कि गालियाँ देने वाली औरत सोबरन की बहू है, कि रात को उन्होंने अपनी आँखों से रधिया को सोबरन के खेत में देखा था, कि सोबरन सुबह खेत से घर नहीं लौटा और खेत पर भी नहीं है। मास्टर को स्थिति से अवगत कराने के बाद पंडित शिवदत्त रधिया की ओर मुड़ गये, ‘‘अब बोलती क्यों नहीं? कहाँ भेज दिया है सोबरन को?’’
मास्टर कुछ कहता कि गाँव के दो-तीन लोग उसे खींचकर एक तरफ ले गये। संतू धीमर जल्दी-जल्दी कहने लगा, ‘‘मास्साब, मुखिया लोग रधिया को गाँव से निकालने की मिसकौट करके आये हैं। हमारे खयाल से इन्होंने सोबरन को कहीं छिपा दिया है और उसकी बहू को भड़काककर यहाँ ले आये हैं। अब बताओ, क्या किया जाये?’’
‘‘तुम मेरे साथ आओ।’’ मास्टर ने संतू से कहा। दूसरों से वहीं रुकने को कहकर उसने साइकिल वहीं खड़ी कर दी और संतू केे साथ पुलिया की ओर चल दिया। 
मुखिया नूरसिंह उस समय रधिया से कह रहे थे, ‘‘तुझे क्या हम जानते नहीं हैं! तू कुछ भी कर सकती है। तू तो ऐसी है कि जिंदा आदमी को खा जाये। अब सीधे-सीधे बता दे कि सोबरन कहाँ है, नहीं तो पुलिस बुलाकर जूते पड़वाऊँगा साली पर।’’
रधिया चुप है। उसकी चुप्पी से अंगूरी का हौसला और बढ़ गया है। गालियाँ बकती हुई वह रधिया के घेर में घुस आयी है। आँगन में सूखने के लिए रखे सकोरों को उसने लात मारकर इधर-उधर छितरा दिया है। पाँव पटक-पटककर उन्हें तोड़ रही है। रधिया क्रोध से थरथर काँपती हुई भी अपनी मेहनत की यह बरबादी देख रही है, मगर चुप है। अपनी जगह से हिल भी नहीं पा रही है। बच्चों को उसने और ज्यादा अपने साथ सटा लिया है। शायद वह खतरे को भाँप गयी है कि अंगूरी अब उसके बच्चों पर झपटने वाली है। लेकिन उसकी समझ में यह बात नहीं आ रही है कि जब रात को वह सोबरन को अच्छा-भला छोड़ आयी थी, तो सुबह होते ही वह कहाँ चला गया? क्यों चला गया? और चला गया, तो क्या इसका दुख रधिया को नहीं होगा? जिसकी छाया में वह अपने को सुरक्षित समझती है, उसे वह कहाँ भेज देगी? क्यों भेज देगी? फिर ये लोग उसके पीछे क्यों पड़े हैं?
रधिया के कच्चे सकोरों को चूर-चूर करने के बाद अंगूरी रधिया पर झपटी और गोद के बच्चे को छीनने लगी। अब उसे घूँघट का खयाल नहीं रह गया था और क्रोध में बिफरती हुई वह रधिया को एकदम डायन लग रही थी। लगता था, बच्चा उसके हाथ आ गया, तो वह उसे धरती पर पटककर मार डालेगी या दूूर ताल में फेंक देगी। छीना-झपटी में छोटा बच्चा चीखा, तो घबराकर बिट्टो भी चीखने लगी। बच्चे को छीनने के लिए जब अंगूरी रधिया को नोचने-काटने लगी, तो रधिया उसे धक्का देकर चीख उठी, ‘‘छोड़ मुझे, चुड़ैल! मुझे क्यों खाने आ रही है? तेरा आदमी मेरी गाँठ में तो बँधा नहीं है। घर में बैठा हो, तो तू खुद जाकर देख ले।’’
एक तरह से खुद ही अंगूरी को अपने घर के भीतर ठेलकर रधिया बाहर घेर में निकल आयी। जबान खुल ही गयी, तो अब क्या है! वह एक-एक को देख लेगी। गाँव के पंच-प्रधान लोगों से उसे नफरत हो रही थी, जो सोबरन की बहू को समझाने के बजाय खड़े-खड़े तमाशा देख रहे थे। सबसे ज्यादा नफरत हो रही थी उसे पंडित शिवदत्त से। रात को कैसे उपदेश दे रहे थे, और अब झूठा इल्जाम लगा रहे हैं कि मैंने सोबरन को कहीं भगा दिया है। मैं कहाँ भगा दूँगी उसे?
बाहर आकर उसने पंडित शिवदत्त को लताड़ा, ‘‘क्यों रे मँगते, तूने ही लगायी है न यह आग? तू कहता है, तूने मुझे रात में सोबरन के साथ खेत में देखा था। अब खोल दूँ तेरी पोल-पट्टी?’’ पंडित शिवदत्त को उम्मीद नहीं थी कि रधिया इतने दिन बाद फिर अपने पुराने चंडी रूप में लौट आयेगी। वे कुछ कहते, तब तक तो रधिया ने अन्य लोगों को सुनाते हुए कह दिया, ‘‘इससे पूछो, आधी रात को यह मँगता आनगाँव के एक आदमी लेकर मेरे घर पर क्या अपनी बिटिया की दलाली करने आया था? मैंने इसे फटकार दिया, तो यह बगुला भगत बदला निकालने आया है? झूठे, मक्कार, तुझे कोेढ़ फूटे, मेरे बासनों का नास करा दिया। एक-एक फूटे सकोरे की पाई-पाई टेंट से न निकलवा ली, तो नाम रधिया नहीं। गाँव वालों को तमाशा दिखाने लाया है तू? पर गाँव वालों की आँखें फूट गयी हैं क्या? सोबरन से दुश्मनी रही होगी, तो तेरी रही होगी। उसको कुछ किया होगा, तो तूने किया होगा।’’
पंडित शिवदत्त नहीं जानते थे कि रधिया इतना साफ झूठ इतनी सफाई से बोल जायेगी। वे कब किसके लिए दलाली करने आये थे इसके द्वार पर? उन्होंने लोगों से कहा कि रधिया झूठ बोल रही है, लेकिन रधिया ने बात इस ढंग से कही थी कि लोगों को पंडित शिवदत्त की बात पर विश्वास नहीं हुआ। सबूत यह था कि रात को पंडित शिवदत्त के यहाँ सचमुच कोई बाहर का आदमी आया था, जो सुबह होते ही चला गया था। पंडित शिवदत्त सफाई देने लगे कि वह तो उनकी जिजमानी का नाई था, जो एक बारात का न्यौता देने आया था। लेकिन वह तो उनके साथ कहीं नहीं निकला। और उसे लेकर रधिया के घर आने का तो सवाल ही नहीं उठता। वे इतने धरम-करम वाले आदमी क्या रंडी की दलाली करने आयेंगे? कहते-कहते उनकी आँखों में आँसू आ गये। रात को सोबरन ने उन्हेें खेत में उठाकर पटक दिया था और अब रधिया ने यह झूठा इल्जाम उन पर लगा दिया है। हे भगवान, सचमुच कलियुग आ गया है। सत्य का कोई मूल्य नहीं रहा।
रधिया ने देखा कि पंडित शिवदत्त फँस गये हैं, तो उसकी आवाज और ऊँची हो गयी, ‘‘एक-एक पाई धरा लूँगी, एक-एक पाई। मुझ पर कोई बस नहीं चला, तो इस घोड़ी को भड़काकर ले आया। नासपीटे, मेरे सारे बासन खुँदवा दिये। सारे दिन हाड़-गोड़ तोड़कर बनाये थे। माँग-माँगकर फोकट का माल खाने वाले मँगते, तुझे क्या मालूम कि इनको बनाने में कितनी मेहनत लगती है। और मुझे धमकाने के लिए इन मुखिया-चैधरी लोगों को अपने साथ लाया है तू? तू समझता है, मैं इनकी दाब-डाँट में आ जाऊँगी? अरे, मैं किसी का दिया नहीं खाती। ढैया-पँसेरी नाज देते हैं, तो ढाई मन की मेहनत के बासन बनवा लेते हैं। ऊपर से बेगार। कभी रधिया इनका आँगन लीपे, कभी रधिया इनके घरों में मिट्टी पहुँचाये। इतनी मेहनत तो चमार-टोले के लिए करूँगी, तो भी अपना और अपने बालकों का पेट भर लूँगी। तू यह मत समझ कि मुझे तू गाँव से निकलवा देगा। यहाँ सब कितने बड़े धर्मात्मा हैं, सो मैं खूब जानती हूँ। कहे तो एक-एक के गुन बखान दूँ?’’
‘‘चलो भाई, चलो। अब रधिया किसी को नहीं बोलने देगी।’’ चौधरी रामसेवक ने मुखिया नूरसिंह से कहा। 
मुखिया नूरसिंह पंडित शिवदत्त का हाथ पकड़कर बोले, ‘‘छोड़ो पंडित, तुमको वहम हो गया होगा। रधिया की जगह किसी और को देख लिया होगा तुमने।’’
पंडित शिवदत्त की स्थिति बड़ी विचित्र हो गयी थी। अब वहाँ से चल देेने में ही उन्हें कुशल दिखायी दी। लेकिन सोबरन की बहू उन्हें खिसकते देख आगे बढ़ आयी। सोबरन को रधिया के घर में न पाकर वह कब की बाहर निकल आयी थी और चुपचाप खड़ी हुई नासमझ-सी यह सब देख-सुन रही थी। अब वह पंडित शिवदत्त की ओर लपकी, ‘‘जाते कहाँ हो, पंडित, पहले यह बताओ कि मेरा आदमी कहाँ है?’’
‘‘यह रहा तुम्हारा आदमी।’’ मास्टर की आवाज ने सबको चौंका दिया।
सबने देखा, नशे में धुत्त सोबरन को एक-एक बाँह से कंधे पर उठाये मास्टर और संतू धीमर उसे घसीटते-से ला रहे हैं। 
‘‘पुलिया के पास पीये पड़ा था।’’ संतू ने कहा और सोबरन को वहीं जमीन पर डाल दिया। 
अंगूरी सोबरन को देखकर सिहर गयी। उसने घूँघट खींच लिया और जहाँ की तहाँ खड़ी रह गयी। क्या कहे-करे, उसे कुछ नहीं सूझा। 
‘‘ले जाओ, भाई, कोई इसे इसके घर पहुँचा दो।’’ मुखिया ने कहा। लेकिन कोई आगे नहीं आया। संतू हाथ झाड़ चुका था और मास्टर अपनी साइकिल थाम चुका था। बाकी लोग मुखिया से नजर बचाकर मास्टर की तरफ देख रहे थे। स्थिति समझ कर मुखिया ने कहा, ‘‘मास्टर, तुम कहो, कोई दो आदमी इसे यहाँ से उठाकर इसके घर ले जायें।’’
मास्टर का इशारा पाकर जवाहर नाई और सीतो मुसहर ने सोबरन को उसी तरह कंघों पर डाला और घसीट ले चले। सोबरन की बहू भी चुपचाप उनके पीछे चली गयी। 
‘‘कोई बात न बात की जड़।’’ किसी ने कहा और अपनी साइकिल से टिके खड़े मास्टर को छोड़कर बाकी सब लोग भौंचक, डरे-सहमे और बेवकूफ-से बने वहाँ से चल पड़े।
मास्टर चकित-सा खड़ा था और रधिया के चेहरे पर बदलते भावों को पढ़ रहा था। फिर आँगन में फूटे पड़े कच्चे सकोरों की ओर देखते हुए उसने कहा, ‘‘आज तो तुम्हारा बहुत नुकसान हो गया, मास्टरनी की अम्मा!’’
‘‘नहीं मास्टर, यह कोई खास नुकसान नहीं है।’’ रधिया ने कहा और बिट्टो को मास्टर के पास छोड़कर गोद के बच्चे को चूमती हुई भीतर चली गयी। जब वह मुड़ी थी, मास्टर ने उसकी डबडबायी आँख में चमकता एक आँसू देख लिया था। 
मास्टर कुछ पल ठिठका-सा खड़ा रहा, फिर बिट्टो के साथ स्कूल की तरफ चल दिया। 
रधिया भीतर जाकर बच्चे को सीने से लगाये फूटकर रो पड़ी। वह रो रही थी और अपने को ही कोस रही थी, ‘‘माटीमिली, तूने हाथ भी पकड़ा तो किसका!’’
--रमेश उपाध्याय

अमरीका अगर चूका तो जर्मनी विश्व नेता बन सकता है

जंतर-मंतर - Sat, 08/07/2017 - 12:43

शेष नारायण सिंह 
इजरायल की ऐतिहासिक यात्रा के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी २० के शिखर सम्मलेन में भाग लेने  हैम्बर्ग  पंहुंच गए हैं. दुनिया के औद्यिगिक देशों और आर्थिक  क्षेत्र की उभरती हुयी शक्तियों का यह क्लब मूल रूप से आर्थिक प्रशासन के एजेंडा के साथ स्थापित किया है . लेकिन अन्य मुद्दे  भी इस का विषयवस्तु समय की तात्कालिक आवश्यकता के हिसाब से  बन जाते हैं .इसके सदस्यों में अमरीका तो है ही उसके अलावा  भारत ,चीन, रूस , अर्जेंटीना , आस्ट्रेलिया, ब्राजील, ब्रिटेन, कनाडा , फ्रांस , जर्मनी , इंडोनेशिया ,इटली, जापान ,मेक्सिको,साउदी अरब, दक्षिण अफ्रीका, दक्षिण कोरिया और तुर्की हैं . यूरोपियन यूनियन को भी एक राष्ट्र सदस्य का दर्ज़ा दिया  गया है . जी २० में दुनिया  की आबादी का करीब दो तिहाई हिस्सा शामिल है और विश्व की अर्थव्यवस्था का ८० प्रतिशत इसके सदस्य देशों  में केन्द्रित है . १९९९ में शुरू हुए इस संगठन की ताक़त बहुत अधिक मानी जाती है . २००८ में पहली बार सदस्य देशों के नेताओं का शिखर सम्मलेन अमरीका की राजधानी वाशिंटन डी सी में हुआ था तब से अलग अलग देशों में यह सम्मलेन होता  रहा  है . जर्मनी में हो रहा मौजूदा सम्मलेन बहुत ही महत्वपूर्ण इस लिहाज़ से भी है कि मई में इटली में हुए जी ७ सम्मलेन के दौरान अमरीकी  राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पेरिस समझौते से अपने आपको अलग कर लिया था. उस सम्मलेन में उन्होंने भारत और चीन की आलोचना करके एक नया विवाद खड़ा कर दिया  था  जबकि जर्मनी की चांसलर एंजेला मर्केल ने उनसे सार्वजनिक रूप से असहमति जताई थी..जी २० सम्मेलन में भी जर्मन चांसलर एंजेला मर्केल और अमरीकी राष्ट्रपति  डोनाल्ड ट्रंप के बीच बड़े मतभेद की पूरी सम्भावना है क्योंकि जर्मनी ने साफ संकेत दे दिया है कि  वह जलवायु परिवर्तन,मुक्त व्यापार और  शरणार्थियों की समस्या को मुद्दा  बाने के लिए प्रतिबद्ध है जबकि अमरीका के नए नेतृत्व ने कह दिया है कि  वह अमरीकी तात्कालिक हित से पर ही ध्यान देने वाला है . वैश्विक मद्दे फिलहाल अमरीकी राष्ट्रपति की  प्राथमिकता सूची से बाहर  हैं. इस बात की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता कि इस सम्मेलन में अमरीका अलग थलग पड़  सकता है जबकि बाकी देशों में एकता के मज़बूत होने की सम्भावना है . अमरीका का राष्ट्रपति बनने के बाद डोनाल्ड ट्रंप पहली बार रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से आमने सामने मिल रहे हैं . यह देखना दिलचस्प होगा कि बराक ओबामा जैसे सुलझे हुए राष्ट्रपति के बाद नए अमरिकी राष्ट्रपति का रूसी नेता के साथ आचरण किस तरह से दुनिया के सामने आता  है. अभी पिछले हफ्ते संयुक्त राष्ट्र के नए महासचिव अंतोनियो गुतरेस ने अमरीकी प्रशासन के नेताओं को चेतावनी दे दी थी कि अगर अमरीका अंतर्राष्ट्रीय बिरादरी की समस्याओं में उपयुक्त रूचि नहीं दिखाता तो इस बात की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता कि वह विश्व के नेता के रूप  अपना मुकाम गंवा देगा . कूटनीतिक   हलकों में माना जा रहा है कि इस सम्मलेन के बाद एंजेला मर्केल का विश्व नेता के रूप में क़द बढ़ने वाला है क्योंकि शिखर सम्मलेन के  कुछ दिन पहले ही वे दो उभरती हुयी मज़बूत ताक़तों के नेताओं ,  भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के प्रधानमंत्री ली केकियांग से वे जर्मनी में मिल चुकी हैं और जी ७ के वक़्त अमरीकी राष्ट्रपति ने भारत और चीन का नाम लेकर इन देशों को  जो तकलीफ दी थी उसपर मरहम लगाने  की अपनी मंशा का इज़हार भी कर दिया है . हालांकि यह सच है कि कार्बन के उत्सर्जन के मामले में चीन का नंबर एक है और भारत भी तीसरे नंबर पर  है लेकिन इनमे से किसी को भी डोनाल्ड ट्रंप हडका कर लाइन पर लाने की हैसियत नहीं रखते . ऐसी हालत में ट्रंप की अलोकप्रियता के मद्दे नज़र एंजेला मर्केल की पोजीशन बहुत ही मज़बूत है और पेरिस समझौते के  हैम्बर्ग में स्थाई भाव बन जाने से अमरीकी नेतृत्व शुरू से ही  रक्षात्मक खेल खेलने के लिए अभिशप्त है .
ऐसा लगता है कि ट्रंप के राष्ट्रपति काल के दौरान अमरीका लिबरल स्पेस को रोज़ ही गँवा रहा है और यूरोप के नेता यूरोपीय गौरव को स्थापित करने के लिए तैयार लग रहे हैं . पेरिस समझौते से अमरीका के अलग होने  की जी ७  शिखर बैठक में उठाई गई बात को यूरोप में बहुत ही नाराजगी से लिया गया है .  आज के माहौल में यूरोप में लिबरल स्पेस में एंजेला मेकेल सबसे बड़ी  नेता हैं . जी २० के इस शिखर सम्मेलन में जर्मनी का उद्देश्य   है  कि वैश्वीकरण की अर्थव्यवस्था को सबके हित में इस्तेमाल किया जाय. इस सम्मलेन में विकास को प्रभावी और सम्भव बनाने के तरीकों पर  गंभीर चर्चा होगी. अफ्रीका की गरीबी को खत्म करने के लिए किये जाने वाले कार्यों से जो अवसर उपलब्ध  हैं,  उन  पर यूरोपीय देशों की नजर  है . महिलाओं के आर्थिक सशक्तीकरण और दुनिया भर में बढ़ रही बेकार नौजवानों की फौज के लिए रोज़गार के अवसर पैदा करना बड़ी प्राथमिकता है . बुनियादी ढाँचे के सुधार में पूंजी निवेश का बहुत ही संजीदगी से  यूरोप के देश उठा रहे हैं शिक्षा और कौशल विकास में बड़े लक्ष्य निर्धारित करना और उनको हासिल   करने की दिशा में  भी अहम चर्चा होगी .हालांकि जर्मनी के नेता  इस बात से बार बार इनकार कर रहे हैं कि जर्मन नेता  अमरीकी  आधिपत्य  को चुनौती देना चाहती हैं लेकिन कूटनीति की दुनिया में इन बयानों का  शाब्दिक अर्थ न लेने की परम्परा है  और आने वाले समय में ही तय होगा कि ट्रंप के आने के बाद अमरीका की हैसियत में जो कमी आना शुरू हुयी थी वह और कहाँ तक गिरती है. जी२० का सम्मलेन अंतर्राष्ट्रीय संबंधों के गतिशास्त्र में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाने जा रहा है . हैम्बर्ग के लिए जिस  तरह का एजेंडा तय करने में जर्मनी ने सफलता पाई है वह उनको पूंजीवादी दुनिया का नेतृत्व   करने के बड़े अवसर दे रहा है . अगर अमरीका विश्व नेता के अपने मुकाम से खिसकता है तो निश्चित रूप से जर्मनी ही स्वाभाविक नेता बनेगा . यह संकेत साफ दिख रहा है .जलवायु परिवर्तन के अलावा मुक्त व्यापार भी इस सम्मेलन का बड़ा मुद्दा है .एंजेला मर्केल ने दावा किया है कि हैम्बर्ग में कोशिश की जायेगी कि मुक्त व्यापार के क्षेत्र में विस्तार से चर्चा हो और अधिकतम देशों के अधिकतम  हित में कोई फैसला लिया जाए. उन्होंने साफ़ कहा कि नए अमरीकी प्रसाशन के रवैय्ये के चलते यह बहुत कठिन काम होगा लेकिन जर्मनी  की तरफ से कोशिश पूरी की जाएगी . ऐसा लगता है कि अमरीका से रिश्तों  के बारे में पूंजीवादी देशों में बड़े पैमाने पर विचार विमर्श चल रहा है . पिछले अस्सी वर्षों से अमरीका और पूंजीवादी यूरोप के हित आपस में जुड़े हुए थे लेकिन अब उनकी फिर से व्याख्या की जा रही है . यूरोप के बाहर भी अमरीकी राष्ट्रपति की क्षणे रुष्टा, क्षणे तुष्टा की प्रवृत्ति अमरीका को  अलग थलग करने में भूमिका अदा कर रही  है . अमरीका का हर दृष्टि से सबसे करीबी देश  कनाडा भी अब नए अमरीकी नेतृत्व से खिंचता दिख रहा है . अभी पिछले हफ्ते वहां की संसद में विदेशमंत्री  क्रिस्टिया फ्रीलैंड ने बयान दिया कि अमरीका जिस तरह से खुद ही अपने विश्व नेता के कद को कम करने पर आमादा  है उस से तो साफ़ लगता है कि हमको ( कनाडा ) भी अपना स्पष्ट और संप्रभुता का रास्ता खुद ही तय करना होगा. भारत का जी२० देशों में  बहुत महत्व  है . इसकी विकासमान अर्थव्यवस्था को दुनिया विकसित देशों की राजधानियों में पूंजीनिवेश के अच्छे मुकाम के रूप में देखा जाता है .पिछले साल सितम्बर  के शिखर सम्मलेन में भारत ने चीन को लगभग हर मुद्दे पर  समर्थन दिया था और यह उम्मीद  जताई थी कि चीन  भी उसी तरह से भारत को महत्व देगा लेकिन पिछले दस महीने की घटनाओं को देखा जाए तो  स्पष्ट हो जाएगा कि भारत ने भविष्य का जो  भी आकलन किया  था , वह  गड़बड़ा गया है . चीन का रुख भारत के प्रति दोस्ताना नहीं है. जबकि भारत के प्रधानमंत्री ने पूरी कोशिश की . चीन के सबसे बड़े नेता को भारत बुलाया, बहुत ही गर्मजोशी से उनका अतिथि सत्कार किया , हर तरह के व्यापारिक संबंधों को विकसित करने की कोशिश की लेकिन चीन की तरफ से वह गर्मजोशी देखने को नहीं मिली . बल्कि उलटा ही काम हो रहा है . पाकिस्तान स्थित आतंकवादी मसूद अजहर को जब संयुक्त राष्ट्र में अंतर राष्ट्रीय आतंकी घोषित करने का अवसर आया तो चीन ने वीटो कर दिया . भारत के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण कैलाश मानसरोवर यात्रा को बहुत ही असभ्य तरीके  से बंद करवाया, सिक्किम और भूटान के मुद्दों को लगभग रोज़ ही उठा रहा है. हिन्द महासागर में अपने विमान वाहक जहाज़ों को स्थापित करके  चीन ने स्पष्ट कर दिया है कि भारत चाहे जितना अपनापन दिखाए उसकी  कूटनीति उसके राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रख कर ही  की जायेगी ,उसमें  व्यक्तिगत संबंधों की कोई भूमिका नहीं होती . इस हालत में भारत को हैम्बर्ग में अपने एजेंडे को नए   सिरे से तैयार करना पड़ा है ..जी २० के इस सम्मलेन में भारत की नई प्राथमिकता बिल्कुल स्पष्ट है . भारत चाहता है कि  बुनियादी ढांचे में बड़े पैमाने पर पूंजी निवेश हो , सबके विकास के अवसर उपलब्ध कराये जाएँ, ऊर्जा कके विकास में बड़ा कार्यक्रम चले , आतंकवाद और काले धन पर लगाम लगाई जा सके. भारतीय टैक्स व्यवस्था में भारी सुधार की घोषणा करने के बाद भारत में विदेशी  निवेश के अवसर बढे हैं. उद्योग लगाने में अब यहाँ ज्यादा सहूलियत रहेगी , ऐसा भारत का दावा है लेकिन देश में जिस तरह से कानून को बार बार हाथ में  लेने और राज्य सरकारों की अपराधियों को न पकड़ पाने की घटनाएं दुनिया भर में चर्चा का विषय बन गयीं हैं  , वह  चिंता का विषय है . गौरक्षा के नाम पर देश में फ़ैल रहे आतंक से  बाकी दुनिया में देश की छवि कोई बहुत  अच्छी नहीं बन रही  है . ज़ाहिर है  प्रधानमंत्री सारी दिक्क़तों को दरकिनार कर देश की एक बेहतरीन छवि पेश करने की कोशिश  करेंगें 
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लेखक विषय संवाद साभार अनुवादक

पहले वो आए साम्यवादियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं साम्यवादी नहीं था

 

फिर वो आए मजदूर संघियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं मजदूर संघी नहीं था

 

फिर वो यहूदियों के लिए आए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं यहूदी नहीं था

 

फिर वो आए मेरे लिए

और तब तक बोलने के लिए कोई बचा ही नहीं था

 

मार्टिन नीमोलर (1892-1984)