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जन-जिम्मेदारी से पल्ला झाड़कर जन-भागीदारी की मांग करती राजनीति सत्ता

खुली अर्थव्यवस्था की जो लकीर पीवी नरसिंह राव ने जो लकीर 1991 में खींची,  उसी लकीर पर वाजपेयी चले, मनमोहन सिंह चले और अब मोदी भी चल रहे हैं । और खुली इक्नामी की इस लकीर का मतलब यही था कि रोजगार हो या शिक्षा । इलाज हो या घर । या फिर सुरक्षा । जब सब कुछ प्राइवेट सेक्टर के हाथों में इस तरह सौंपा गया कि सरकार या तो हर जिम्मेदारी से मुक्त हो गई। या फिर सरकार खुद ही कमीशन लेकर काम देने की स्थिति में आ गई । क्योंकि प्राईवेट सेक्टर को काम करना है और मुनाफा कमाना है । या कहें मुनाफा कमाना है तो कोई भी काम करना है । इन दोनो हालातों के बीच ही जनता के चुने हुए नुमाइन्दों की राजनीतिक सत्ता कैसे चलती है, अब इस सवाल को समझने की भी जरुरत है। क्योंकि सिलसिलेवार तरीके से जब हालात को परखें तो फिर जनभागेदारी कैसे सरकार के साथ होगी । जिसकी मांग स्वच्छता को लेकर 2 अक्टूबर को प्रधानमंत्री ने की ये भी सवाल होगा । मसलन सरकारी नौकरी की तुलना में कई गुना ज्यादा प्राइवेट सेक्टर में नौकरी है। मसलन 1 करोड़ 72 लाख 71 हजार नौकरी सरकारी क्षेत्र में है । तो प्राइवेट सेक्टर में 1,14,22,000 है तो असंगठित क्षेत्र में 43 करोड 70  लाख नौकरियां हैं। तो फिर जनता रोजगार के लिये सरकार की तरफ क्यों देखेगी । और पांच साल के लिये चुनी हुई किसी भी सत्ता के पांच बरस के दौर में 8 हजार से ज्यादा सरकारी नौकरियों का आवेदन नहीं निकलता। तो सरकारी नौकरी है नहीं।

और सरकारी नीतियों से अगर प्राईवेट सेक्टर की नौकरी कम होगी तो फिर नौकरी का संकट तो गहरायेगा ही जैसे अभी गहरा रहा है । इसी तरह शिक्षा, हेल्थ , घर और सुरक्षा को लेकर भी जनता सरकार की तरफ क्यों देखे । जब शिक्षा को लेकर सरकार का बजट 46,356  करोड हो और निजी क्षेत्र का बजट 7,80,000 करोड का है । जब हेल्थ सर्विस का सरकारी बजट 48,878 करोड का है और प्राईवेट क्षेत्र के हेल्थ सर्विस का बजट साढे छह लाख करोड़ का हो चुका हो । जो 2020 तक 18 लाख करोड का हो जायेगा । तो फिर सरकारी स्वास्थ्य सिस्टम का मतलब बची क्या । इसी तरह घरों को लेकर भी हालात को समझे तो पिछले ढाई बरस में एक लाख तीन हजार सरकारी घर बने तो 4 लाख 71 हजार प्राइवेट घर बनकर  खाली पडे है । प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत 2022 तक 4 करोड 30 लाख घर बनाने का लक्ष्य है । चुनाव 2019 में होने है । पहले ढाई बरस में लक्ष्य का सिर्फ 7 पिसदी घर बना है तो सरकार की तरफ किस नजर से जनता देखेगी । और इस कडी में जब पुलिस का जिक्र होगा तो समझना ये भी होगा निजी सुरक्षाकर्मियों की तादाद पुलिसकर्मियों से ज्यादा हो गई है । हालत ये है कि देश में पुलिस की संख्या 14 लाख है । जबकि निजी सुरक्षाकर्मियों की संख्या 70 लाख है। पूरे देश की पुलिस को लेकर बजट करीब 54 हजार करोड़ का है । पर दूसरी तरफ निजी सुरक्षाकर्मियों को लेकर प्राइवेट सेक्टर का बजट 60 हजार करोड़ पार कर चुका है । जो अगले दो बरस में 80 हजार करोड़ हो जायेगा। लेकिन पुलिस सुधार और सुधार के लिये बजट की रफ्तार बताती है कि अगले दो बरस में पुलिस बजट में 5 हजार करोड़ से ज्यादा की बढोतरी हो नहीं सकती है ।  तो फिर चुनी हुई सरकारो का मतलब सिवाय प्राइवेट सेक्टर अनुशासन में काम करें उसके अलावे ।

प्राइवेट सेक्टर में किसे कितना लाभ मिले ये नये सिस्टम बिल्ट-आपरेट-ट्रासफंर  सिस्टम यानी बीओटी से भी समझा जा सकता है । जिसमें सरकार निजी सेक्टर को लाइसेंस देती है । जिस क्षेत्र का काम  दिया जाता है उससे मुनाफा कमाकर वापस उसे सरकार को सौपा जाता है । मसलन सडक और  पुल कोई प्राईवेट सेक्टर बनाता है  उससे मुनाफा कमाता है । पिर सरकार को दे देता है । तो क्या सरकारे इसीलिये पेल हो रही है या फिर जनता का भरोसा धीरे धीरे सरकार से ही उठने लगा है । ये सवाल हर उस परिस्थिति से जोडा जा सकता है जिन परिस्थितियो में जनभागीदारी का सवाल सरकार उठाती  है । याद किजिये 2006 में मनमोहन सरकार ने पीपीपी मॉडल शुरु किया । जनता ने जमीन दी । सरकार ने मुआवजा दिया । पर देश में रोजगार या कमाई के लिये कोई इन्फ्रास्ट्रक्चर है ही नहीं तो मुआवजा लेकर भी जमता फक्कड हो गई। और  अब जब मोदी स्वच्छता के लिये जनभागीदारी का जिक्र कर गये तो उसके पीछे के इस सच को भी हर किसी ने देखा कि 60 हजार करोड स्वच्छता के प्रचार प्रसार में कैसे खर्च हो गये । धन जनता का । या कहे देश का । स्वच्छता देश की । पर प्रचार प्रसार राजनीतिक लाभ के लिये और काम की सफलता का सरकारी आंकडा ही तीस फिसदी का ।तो जो गलती पीपीपी मॉडल को लेकर मनमोहन कर रहे थे । क्या वही गलती जनभागीदारी के नाम पर मोदी कर रहे हैं । क्योकि राजनीतिक लाभ के लिये राजनीतिक सत्ता का कामकाज पांच बरस चलता है यह आखिरी सच हो चला है। इसलिये सरकारी योजनाये वक्त से पहले दम तोड रही है । आलम ये कि बीते साल 6000 नए स्टार्टअप शुरु हुए थे, जिनकी संख्या इस साल सितंबर के महीने तक घटकर 800 पर आ गई है। और आईबीएम इंस्टीट्यूट फॉर बिजनेस वैल्यू एंड ऑक्सफोर्ड इक्नोमिक्स की रिपोर्ट कहती है कि देश के 90 फीसदी स्टार्टअप शुरु होने के पांच साल में बंद हो जाएंगे क्योंकि उनमें कोई नवीनता और खास बिजनेस मॉडल ही नहीं है । और तो और पांच बरस की सफलता दिखाने का ही तरीका नोटबंदी-जीएसटी तो नहीं । क्योकि कपड़ा मंत्रालय के आंकड़े कह रहे हैं कि तीन साल में 67 टैक्सटाइल यूनिट बंद हो गई, जिनसे 17600 लोगों की नौकरी चली गई । ज्यादातर नौकरी तीसरे साल गई । तो ये आकंड़ा संगठित क्षेत्र का है, और असंगठित क्षेत्र की लघु कपड़ा इकाइयां  कितनी बंद हो गई-इसका किसी को अता पता नहीं है अलबत्ता सीएमआईई का सर्वे कहता है कि नोटबंदी के बाद असंगठित क्षेत्र में 15 लाख लोगों की नौकरी गई । और हालात धीरे धीरे कैसे बिगड़ रहे हैं-इसका अंदाज इस बात से भी लगाया जा सकता है कि कपड़ा, धातु, चमड़े, रत्न एवं आभूषण, आईटी एवं बीपीओ, ट्रांसपोर्ट, ऑटोमोबाइल्स और हतकरघा जैसे संगठित क्षेत्रों में रोज़गार निर्माण में तेज गिरावट आई है । उधर, कॉरपोरेट सेक्टर का हाल भी बिगड़ा हुआ है। एलएंडटी जैसी कंपनी ने 2017 की पहली दो तिमाही में 14000 लोगों की छंटनी की । एचडीएफसी बैंक ने 3230 लोगों को निकाल दिया । इस वित्तीय साल की पहली तिमाही में ही पांच में तीन बड़ी आईटी कंपनियों ने करीब 5000  लोगों को निकाल दिया । तो सरकार अगर जिम्मेदारी से पल्ला झाड कर प्राईवेट सेक्टर पर टिक जाये । और वोट की नीतियो से अगर निजी क्षेत्र में भी नौकरी खत्म होने लगे तो फिर 'एमबिट कैपिटल’ की नयी रिसर्च रिपोर्ट को समझना चाहिये जो कहती है कि , " देश में बढ़ती बेरोजगारी से न केवल असमानता बढ़ेगी बल्कि अपराधों में तेजी और सामाजिक तनाव मे भी बढ़ोतरी हो सकती है"

हिन्‍दी की कछुआ दौड़

कारवाँ - Tue, 03/10/2017 - 16:22
हिन्दी के वरिष्ठ कवियों में शुमार रघुवीर सहाय ने हिन्दी को कभी दुहाजू की बीबी का संबोधन देकर उसकी हीन अवस्था की ओर इशारा किया था। इस बीच ऐसी कोई क्रांतिकारी बात हिन्दी को लेकर हुयी हो ऐसा भी नहीं है। हां, यह सच्चाई जरूर है कि पिछले पचास-साठ वर्षों में हिन्दी भीतर ही भीतर बढ़ती पसरती जा रही है और आज की तारीख में वह बाजार के तौर तरीके को प्रभावित करने की स्थिति में आ चुकी है। इस आमदरफ्त में उसके स्वरूप में भी कुछ सतही परिवर्तन होते दिख रहे हैं। पिछले पचास सालों में अगर हिन्दी ने अपनी जड़ें लगातार फैलायी हैं और अपना बाजार खड़ा कर लिया है तो यह सहज ही है। ध्यान देने योग्य है कि लगातार विपरीत परिस्थितियों में ही हिन्दी का विकास हुआ है। मुगलकाल में हिन्दी का विकास तेजी से हुआ था। तब भक्ति आंदोलन ने हिन्दी को जन जन से जोड़ा था। अंग्रेजी राज में भी स्वतंत्रता आंदोलन की मुख्य भाषा होने के चलते हिन्दी का विकास हुआ। अगर इन पचास-साठ सालों में हिन्दी ने धीरे धीरे ही सही अपनी पकड़ मजबूत की है तो इसका कारण इसका राजकाज की भाषा नहीं बन पाना ही है। अपनी इस सुस्त रफ्तार से ही एक दिन हिन्दी कछुआ दौड़ में अंग्रेजी को परास्त कर दे तो अजूबा नहीं।
पिछले सालों में हिन्दी का जिन दो क्षेत्रों में अप्रत्याशित विकास हुआ है वह है मीडिया और राजनीति। पिछले पचास सालों में हिन्दी के अखबारों की पाठक संख्या करोड़ तक पहुंच चुकी है और लाख तक नहीं पहुंच पाने पर अब हिन्दी के अखबार लोकप्रिय नहीं माने जाते। यह सब हिन्दी के बढ़ते बाजार का ही परिणाम है।
आज आम भारतीय जब अपनी खबर अपनी भाषा में पढ़ना चाहता है तो हिन्दी का मीडिया में पकड़ बढ़ते जाना स्वाभाविक है। सारे टेलिविजन चैनल हिन्दी की कमाई खााते हैं पर यह दुर्भाग्य ही है कि चैनलों की वेबसाइट का कंटेंट हिन्दी में नहीं है। जबकि हिन्दी अखबारों के न्यूज पोर्टल अब ह्टिस देने और खुद को अपडेट करने में अंग्रेजी से आगे निकल रहे हैं। भारत में तेजी से हुए कंम्प्यूटराइजेशन के चलते हिन्दी का बाजार इंटरनेट पर लगातार गर्म हो रहा है। यह हिन्दी की बाजार में मजबूत होती स्थिति ही है कि बीबीसी जैसा चैनल जिसके पास हिन्दी के पर्याप्त कंटेंट नहीं होते और जिनका काम हिन्दी की कमाई से नहीं चलता, वह भी हिन्दी वेबसाइट चला रहा है। पहले हिन्दी में मेल करना आसान नहीं था पर अब हिंदी के मंगल फान्ट और बहुत सारे फान्ट कान्वर्टरों के चलते हिंदी में लिखना आसान हो गया है और इससे तेजी से हिन्दी का क्षेत्र बढ़ रहा है, यह पूरी दुनिया के हिन्दी भाषियों को जोड़ रहा है और  यह भविष्य में हिन्दी के विकास को नयी जमीन मुहैय्या कराता जाएगा। इसके साथ रोमन में  नेट पर हिन्दी ही नहीं भोजपुरी कविताओं की मांग भी बढ़ती जा रही है। जगह बना लेने के बाद उसके स्तर पर भी बात शुरू होगी। 
मीडिया के बाद राजनीति हिन्दी की ऐसी दूसरी रणभूमि है जहां वह लगातार मैदान मार रही है। वहां तो हिन्दी की सहायक लोकभाषाओं तक ने अपना रंग दिखा दिया है। लालू प्रसाद की भाषा इसका अच्छा् उदाहरण है। संसद से सड़क तक वे अपनी भोजपुरी मिश्रित हिन्दी का लोहा मनवा चुके हैं। प्रधानमंत्री होने की तो अहर्ता ही हिन्दी बोलना है। इस क्षेत्र में अंग्रेजी को लगातार मुंह की खानी पड़ी है। मनमोहन सिंह ने खुद को हिंदी से दूर रखा तो वे भारतीय जनता से भी दूर हुए।
बाजार जिस आम जन की गांठ ढीली करना चाहता है उसका चालीस फीसदी हिन्दी भाषी है और अंग्रेजी भाषी मात्र तीन फीसदी हैं। यह हिन्दी जन जैसे जैसे शिक्षित होता जाएगा बाजार को अपना सामान लेकर उस तक जाना होगा। यह हिन्दी के बाजार का दबाव ही है कि आज बहुत से अंग्रेजी अखबार हिन्दी की हेडिंग लगा रहे हैं। यह हिन्दी का बाजार ही है कि चाय, पानी, चाट, पूरी, दोसा, दादा, पंचायत जैसे शब्दों को अंग्रेजी की आक्सफोर्ड डिक्शनरी में शामिल करना पड़ा है। कुल मिलाकर हिन्दी का बजार बढ़ा है और लोकतंत्र के विकास के साथ आमजन की भाषा के बाजार का बढ़ना सहज भी है। हां बाकी हिन्दी की जो दुर्दशा हो रही है उस पर ध्यान देने की जरूरत है और यह काम हम आपको ही करना होगा।अंग्रेजों की अंग्रेजी से तो हम पार पा चुके थे पर अब नया हमला अमेरिकी बाजार की अंग्रेजी का है और  हिंदी, हिंदू, हिंन्‍दुस्‍तान वाली इस सरकार को भी मोदी फेस्‍ट, मिशन 2019, मेक इन इंडिया, रोड शो आदि से कुछ फुर्सत मिले तो हिंदी को कुछ राहत मिले।

वायरल हो जाइए बनाम जूता मारो भेजे पर

कारवाँ - Tue, 03/10/2017 - 16:16


कुछ हो नहीं रहा आपसे या जम नहीं रहा या आप बोर हो रहे तो आप वायरल हो जाइए। इसके लिए कुछ खास नहीं करना। आप ऐसे व्‍यक्ति की पहचान कीजिए जो जवाब मेंजूते ना मार सके। (इस लोकतंत्र को ऐसे लोगों से भरा जा रहा है।) फिर उसे गिन कर कुछ जूते मारिए। फिर जूतों की या उसके जूता खाए चेहरे की तस्‍वीर नेट पर डालिए। और बोलिए कि यह शख्‍स सपने मेंमेरे महान बाप को गालियां दे रहा था। हो सके तो अपने महान बाप की तस्‍वीर शेयर कीजिए। महान बाप की तस्‍वीर ऐसी बनाइए कि लगे कि जो गालियां दी गयी हैं उसने उनको आहत किया है और अगर आपने कुछ नहीं किया तो वे आत्‍महत्‍या कर लेंगे। अगर महान बाप स्‍वर्ग में हों तो भी कोई बात नहीं, आत्‍मा तो स्‍वर्ग में भी रहती है और वहां भी आहत हो ही सकती है। अपने महान बाप और पिटे हुए व्‍यक्ति की तस्‍वीरें आजू-बाजू डालिए और उसके साथ फूल और चप्‍पल पास ही रख दीजिए। और चूंकि यह लोकतंत्र है तो लोगों को छूट दीजिए कि वे अपनी खुशी या सुविधा या भावनाओं के हिसाब से उसके पिता को फूल चढाएं और पिटे हुए को जूते मारें या संभव हो तो दोनों करें। इसके एवज में कुछ हल्‍का फुल्‍का चार्ज भी कर सकते हैं आप। फूल चढाने के साथ जूते मारना फ्री भी कर सकते हैं। लोगों को छूट दीजिए कि वे इसे अपने बाप भाई मां बहनों के साथ शेयर करें या टैग करें। कमजोर दिल वालों को आप कुछ किफायत दे सकते हैं या उनके जूते आप फूलों से बना सकते हैं या कम से कम फूलों जैसे वे दिखें ऐसा तो कर ही सकते हैं।यूं आप अपने बाप, भाई या लंगोटिया यार को भी जूतेमार सकते हैं बस उसे पता होना चाहिए कि यह सब आप अपने या उसके वायरल होने के लिए कर रहे। कहीं बिना पहले बताए आपने ऐसा कर दिया तो आपकी वही दशा होगी जो पिलपिल बेशर्मा की हुई है। यूं चिंता की कोई बात नहीं। बाद में आप चांदी के जूतों से पीटकर उसे शांत कर सकते हैं और वापिस अपने चंडूखाने में शामिल कर सकते हैं। हां, चांदी के जूते मारते समय आप एक गाना (जूतामारो भेजे पर तेरा भेजा शोर करता है) गाएं तो सड़े पर सुहागा हो जाए। देखिए भिगाकर इतने जूते मारे मैंने, आपको बुरा तो नहीं लगा ना। हां, आपको कुछ लगेगा ही नहीं बस दिमाग में रहना चाहिए कि वायरल होना है।

हमारा अपना महिषासुर

दखल की दुनिया - Sun, 01/10/2017 - 11:17

गौरी लंकेश
एक दैत्य अथवा महान उदार द्रविड़ शासक, जिसने अपने लोगों की लुटेरे-हत्यारे आर्यो से रक्षा की।
महिषासुर ऐसे व्यक्तित्व का नाम है, जो सहज ही अपनी ओर लोगों को खींच लेता है। उन्हीं के नाम पर मैसूर नाम पड़ा है। यद्यपि कि हिंदू मिथक उन्हें दैत्य के रूप में चित्रित करते हैं, चामुंड़ी द्वारा उनकी हत्या को जायज ठहराते हैं, लेकिन लोकगाथाएं इसके बिल्कुल भिन्न कहानी कहती हैं। यहां तक कि बी. आर. आंबेडकर और जोती राव फूले जैसे क्रांतिकारी चिन्तक भी महिषासुर को एक महान उदार द्रविडियन शासक के रूप में देखते हैं, जिसने लुटेरे-हत्यारे आर्यों (सुरों) से अपने लोगों की रक्षा की।
इतिहासकार विजय महेश कहते हैं कि ‘माही’ शब्द का अर्थ एक ऐसा व्यक्ति होता है, जो दुनिया में ‘शांति कायम करे। अधिकांश देशज राजाओं की तरह महिषासुर न केवल विद्वान और शक्तिशाली राजा थे, बल्कि उनके पास 177 बुद्धिमान सलाहकार थे। उनका राज्य प्राकृतिक संसाधनों से भरभूर था। उनके राज्य में होम या यज्ञ जैसे विध्वंसक धार्मिक अनुष्ठानों के लिए कोई जगह नहीं थी। कोई भी अपने भोजन, आनंद या धार्मिक अनुष्ठान के लिए मनमाने तरीके से अंधाधुंध जानवरों को मार नहीं सकता था। सबसे बड़ी बात यह थी कि उनके राज्य में किसी को भी निकम्मे तरीके से जीवन काटने की इजाजत नहीं थी। उनके राज्य में मनमाने तरीके से कोई पेड़ नहीं काट सकता था। पेडों को काटने से रोकने के लिए उन्होंने बहुत सारे लोगों को नियुक्त कर रखा था।
विजय दावा करते हैं कि महिषासुर के लोग धातु की ढलाई की तकनीक के विशेषज्ञ थे। इसी तरह की राय एक अन्य इतिहासकार एम.एल. शेंदज प्रकट करती हैं, उनका कहना है कि “इतिहासकार विंसेन्ट ए स्मिथ अपने इतिहास ग्रंथ में कहते हैं कि भारत में ताम्र-युग और प्राग ऐतिहासिक कांस्य युग में औजारों का प्रयोग होता था। महिषासुर के समय में पूरे देश से लोग, उनके राज्य में हथियार खरीदने आते थे। ये हथियार बहुत उच्च गुणवत्ता की धातुओं से बने होते थे। लोककथाओं के अनुसार महिषासुर विभिन्न वनस्पतियों और पेड़ों के औषधि गुणों को जानते थे और वे व्यक्तिगत तौर पर इसका इस्तेमाल अपने लोगों की स्वास्थ्य के लिए करते थे।
क्यों और कैसे इतने अच्छे और शानदार राजा को खलनायक बना दिया गया? इस संदर्भ में सबल्टर्न संस्कृति के लेखक और शोधकर्ता योगेश मास्टर कहते हैं कि “इस बात को समझने के लिए सुरों और असुरों की संस्कृतियों के बीच के संघर्ष को समझना पडेगा”। वे कहते हैं कि “ जैसा कि हर कोई जानता है कि असुरों के महिषा राज्य में बहुत भारी संख्या में भैंसे थीं। आर्यों की चामुंडी का संबंध उस संस्कृति से था, जिसका मूल धन गाएं थीं। जब इन दो संस्कृतियों में संघर्ष हुआ, तो महिषासुर की पराजय हुई और उनके लोगों को इस क्षेत्र से भगा दिया गया”।
कर्नाटक में न केवल महिषासुर का शासन था, बल्कि इस राज्य में अन्य अनेक असुर शासक भी थे। इसकी व्याख्या करते हुए विजय कहते हैं कि “1926 में मैसूर विश्वविद्यालय ने इंडियन इकोनामिक कांफ्रेंस के लिए एक पुस्तिका प्रकाशित की थी, जिसमें कहा गया था कि कर्नाटक राज्य में असुर मुखिया लोगों के बहुत सारे गढ़ थे। उदाहरण के लिए गुहासुर अपनी राजधानी हरिहर पर राज्य करते थे। हिडिम्बासुर चित्रदुर्ग और उसके आसपास के क्षेत्रों पर शासन करते थे। बकासुर रामानगर के राजा थे। यह तो सबको पता है कि महिषासुर मैसूर के राजा थे। यह सारे तथ्य यह बताते हैं कि आर्यों के आगमन से पहले इस परे क्षेत्र पर देशज असुरों का राज था। आर्यों ने उनके राज्य पर कब्जा कर लिया”।
मैसूर में महिषासुर दिवस पर सेमिनार, जिसमें लेखकों ने उन्हें बौद्ध राजा बताया ओर उनके अपमान का विरोध किया
आंबेडकर ने भी ब्राह्मणवादी मिथकों के इस चित्रण का पुरजोर खण्डन किया है कि असुर दैत्य थे। आंबेडकर ने अपने एक निबंध में इस बात पर जोर देते हैं कि “महाभारत और रामायण में असुरों को इस प्रकार चित्रित करना पूरी तरह गलत है कि वे मानव-समाज के सदस्य नहीं थे। असुर मानव समाज के ही सदस्य थे”। आंबेडकर ब्राह्मणों का इस बात के लिए उपहास उड़ाते हैं कि उन्होंने अपने देवताओं को दयनीय कायरों के एक समूह के रूप में प्रस्तुत किया है। वे कहते हैं कि हिंदुओं के सारे मिथक यही बताते हैं कि असुरों की हत्या विष्णु या शिव द्वारा नहीं की गई है, बल्कि देवियों ने किया है। यदि दुर्गा (या कर्नाटक के संदर्भ में चामुंडी) ने महिषासुर की हत्या की, तो काली ने नरकासुर को मारा। जबकि शुंब और निशुंब असुर भाईयों की हत्या दुर्गा के हाथों हुई। वाणासुर को कन्याकुमारी ने मारा। एक अन्य असुर रक्तबीज की हत्या देवी शक्ति ने की। आंबेडकर तिरस्कार के साथ कहते हैं कि “ऐसा लगता है कि भगवान लोग असुरों के हाथों से अपनी रक्षा खुद नहीं कर सकते थे, तो उन्होंने अपनी पत्नियों को, अपने आप को बचाने के लिए भेज दिया”।
आखिर क्या कारण था कि सुरों (देवताओं) ने हमेशा अपनी महिलाओं को असुरों राजाओं की हत्या करने के लिए भेजा। इसके कारणों की व्याख्या करते हुए विजय बताते हैं कि “देवता यह अच्छी तरह जानते थे कि असुर राजा कभी भी महिलाओं के खिलाफ अपने हथियार नहीं उठायेंगे। इनमें से अधिकांश महिलाओं ने असुर राजाओं की हत्या कपटपूर्ण तरीके से की है। अपने शर्म को छिपाने के लिए भगवानों की इन हत्यारी बीवियों के दस हाथों, अदभुत हथियारों इत्यादि की कहानी गढ़ी गई। नाटक-नौटंकी के लिए अच्छी, लेकिन अंसभव सी लगने वाली इन कहानियों, से हट कर हम इस सच्चाई को देख सकते हैं कि कैसे ब्राह्मणवादी वर्ग ने देशज लोगों के इतिहास को तोड़ा मरोड़ा। इतिहास को इस प्रकार तोड़ने मरोड़ने का उनका उद्देश्य अपने स्वार्थों की पूर्ति करना था।
महिष-दशहरा पर अयोजित मोटरसाइकिल रैली केवल बंगाल या झारखण्ड में ही नहीं, बल्कि मैसूर के आस-पास भी कुछ ऐसे समुदाय रहते हैं, जो चामुंडी को उनके महान उदार राजा की हत्या के लिए दोषी ठहराते हैं। उनमें से कुछ दशहरे के दौरान महिषासुर की आत्मा के लिए प्रार्थना करते हैं। जैसा कि चामुंडेश्वरी मंदिर के मुख्य पुजारी श्रीनिवास ने मुझसे कहा कि “तमिलनाडु से कुछ लोग साल में दो बार आते हैं और महिषासुर की मूर्ति की अाराधना करते हैं”।
पिछले दो वर्षों से असुर पूरे देश में आक्रोश का मुद्दा बन रहे हैं। यदि पश्चिम बंगाल के आदिवासी लोग असुर संस्कृति पर विचार-विमर्श के लिए विशाल बैठकें कर रहे हैं, तो देश के विभिन्न विश्विद्यालयों के कैम्पसों में असुर विषय-वस्तु के इर्द-गिर्द उत्सव आयोजित किए जा रहे हैं। बीते साल उस्मानिया विश्विद्यालय और काकाटिया विश्वविद्यालय के छात्रों ने ‘नरकासुर दिवस’ मनाया था। चूंकि जेएनयू के छात्रों के महिषासुर उत्सव को मानव संसाधन मंत्री (तत्कालीन) ने इतनी देशव्यापी लोकप्रियता प्रदान कर दी थी कि, मैं उसके विस्तार में नहीं जा रही हूं।
महिषासुर और अन्य असुरों के प्रति लोगों के बढ़ते आकर्षण की क्या व्याख्या की जाए? क्या केवल इतना कह करके पिंड छुडा लिया जाए कि, मिथक इतिहास नहीं होता, लोकगाथाएं भी हमारे अतीत का दस्तावेज नहीं हो सकती हैं। विजय इसकी सटीक व्याख्या करते हुए कहते हैं कि “मनुवादियों ने बहुजनों के समृद्ध सांस्कृतिक इतिहास को अपने हिसाब से तोड़ा मरोड़ा। हमें इस इतिहास पर पड़े धूल-धक्कड़ को झाडंना पडेगा, पौराणिक झूठों का पर्दाफाश करना पड़ेगा और अपने लोगों तथा अपने बच्चों को सच्चाई बतानी पडेगी। यही एकमात्र रास्ता है, जिस पर चल कर हम अपने सच्चे इतिहास के दावेदार बन सकते हैं। महिषासुर और अन्य असुरों के प्रति लोगों का बढता आकर्षण बताता है कि वास्तव में यही काम हो रहा है।


(गौरी लंकेश ने यह रिपोर्ट मूल रूप से अंग्रेजी में लिखी थी, जो वेब पोर्टल बैंगलोर मिरर में 29 फरवरी, 2016 को प्रकाशित हुई थी) साभार- हिमांशु कुमार की फेसबुक पोस्ट से.

बूथ पर तैनात सरकारी कर्मचारी भी चुनाव जितवा सकते हैं

जंतर-मंतर - Sat, 30/09/2017 - 13:31


शेष नारायण सिंह

नई दिल्ली, २९ सितम्बर .भारत में चुनाव परिणामों को प्रभावित करने वाले कारणों में एक नया आयाम जुड़ गया है . एक शोधपत्र में यह नतीजा निकला है कि बूथों पर चुनाव संपन्न करने वाले पोलिंग अधिकारी और पीठासीन अधिकारी भी चुनाव नतीजों को प्रभावित करते हैं. ज़मीनी आंकड़ों को इकठ्ठा करके  गंभीर मंथन के बाद यह बात सामने आयी है कि  मतदान करवाने  वाले अधिकारी कई बार चुनावे नतीजों को इस हद तक प्रभावित करते हैं कि नतीजे पलट भी सकते हैं . कुछ मामलों में तो बूथ अधिकारी की पक्षधरता मत प्रतिशत में सात प्रतिशत तक का बदलाव का कारण बनी है .
ब्राउन विश्वविद्यालय के डॉ युसफ नेगर्स ने अपनी नई खोज में यह  सिद्ध करने का प्रयास किया है कि हरेक बूथ पर काम करने वाले सरकारी अधिकारी भी चुनाव को प्रभावित करते सकते हैं. “ Enfranchising your own ? Experimental Evidence on Bureaucrat Diversity and Election Bias in India “  नाम का उनका शोधपत्र उपलब्ध है . युसूफ नेगर्स आजकल ब्राउन विश्वविद्यालय में हैं . उन्होंने हार्वर्ड विश्वविद्यालय  से पाब्लिक पालिसी में पी एच डी किया है.लन्दन स्कूल आफ इकनामिक्स के छात्र रहे डॉ नेगर्स को राजनीतिक अर्थशास्त्र के क्षेत्र में अधिकारी विद्वान् माना जाता है . उनके यह नतीजे आने वाले समय में भारत में चुनाव करवाने वाली संस्थाओं का ध्यान निश्चित रूप से आकर्षित करने वाले हैं .शोध का नतीजा  है कि अपनी बिरादरी या  धर्म के   लोगों के पक्ष में बूथ स्तर के अधिकारी मतदान के पैटर्न को प्रभावित कर सकते हैं.इससे चुनाव की  निष्पक्षता प्रभावित  होती है. इस बात को इस पर्चे में सिद्ध कर दिया गया है.  अगर पोलिंग पार्टी में एक जाति विशेष के ही अधिकारी हैं तो उस जाति के उम्मीदवार या पार्टी को ज्यादा वोट मिलने की संभावना बढ़ जाती है .अगर चुनाव धार्मिक ध्रुवीकरण के माहौल में संपन्न हो  रहा है तो जो पार्टी अधिसंख्य आबादी वालों की प्रतिनिधि के रूप में प्रचारित हुयी रहती  है , उसका फायदा होता है . ऐसे माहौल में आम तौर पर अल्पसंख्यक मतदाताओं की पहचान  आदि में काफी सख्ती बरती जाती है . कई बार उनको लौटा भी दिया जाता है लेकिन अगर पोलिंग पार्टी में कोई भी अधिकारी या कर्मचारी अल्पसंख्यक समुदाय का होता है तो यह धांधली  नहीं हो पाती . कुल मिलाकर इस तरह के आचरण से चुनावी नतीजे प्रभावित होते हैं . भारत में चुनाव प्रक्रिया, उसके नतीजों आदि के राजनीति शास्त्र पर दुनिया भर में बहुत शोध हुए  हैं लेकिन इस विषय पर यह पहला काम है . पर्चे में इस बात को भी  रेखांकित किया गया है कि भारत में चुनाव अधिकारियों की निष्पक्षता पर अब ऐलानियाँ सवाल उठाये जा रहे हैं . पूरी दुनिया के देशों के चुनावी आचरण पर सर्वे करने वाली  संस्था, वर्ल्ड वैल्यूज़ सर्वे के ताज़ा आंकड़ों के अनुसार सर्वे किये गए कुल देशों के तीन चौथाई देशों में  करीब २५ प्रतिशत लोग मानते हैं कि  चुनाव अधिकारी आम  तौर पर बेईमानी करते हैं . और यह भी कि आधी दुनिया में बूथ पर होने वाली हिंसा राजनीतिक चिंता का विषय है. विकासशील देशों में यह वारदातें ज्यादा होती हैं . लेकिन यह बीमारी अमरीका  जैसे विकसित देशों में भी है . २०१४ के एक सर्वे के अनुसार अमरीका में भी भरोसेमंद , प्रशिक्षित और  निष्पक्ष चुनाव कार्मचारियों की भारी कमी है .शोधपत्र में भारतीय चुनाव प्रक्रिया को तकनीकी रूप से उच्च  श्रेणी की बताया गया है .लेकिन फिर भी अधिकारियों के पूर्वाग्रह जनता के मत को प्रभावित कर सकते हैं और करते हैं  .इस गड़बड़ी को दूर करने का तरीका यह हो सकता है कि हर बूथ पर जाने वाली पोलिंग पार्टी में एक ही जाति या  धर्म के लोगों को न रख कर बूथों पर ऐसे कर्मचारी तैनात किये जाएँ जिनकी जाति और धर्म में वैभिन्य हो.

भूखे बेघर दुधमुंहे बच्चे आतंकवादी नहीं होते , सरकार

जंतर-मंतर - Sat, 30/09/2017 - 07:42

शेष नारायण सिंह
म्यांमार में अपना घरबार छोड़कर भाग रहे रोहिंग्या मुसलमानों की दर्दभरी कहानी पूरी  दुनिया में चर्चा  का विषय है .  अरकान में बसे इन लोगों की नागरिकता छीन ली गयी है . यह देशविहीन लोग हैं . अमनेस्टी इंटरनैशनल की रिपोर्ट है कि भागते हुए   रोहिंग्या मुसलमानों के  घरों में  अभी भी ( २४ सितम्बर,१७  )आग लगी  हुई है . जो बुझ गयी है उनमें से धुंआ निकल रहा है . आसमान से ली गई तस्वीरों में यह तबाही का मंज़र साफ़   देखा जा सकता  है . अमनेस्टी इंटरनैशनल की निदेशक तिराना हसन का कहना है कि जो सबूत मिले हैं वे म्यांमार  की शासक आंग सां सू ची की झूठ को बेनकाब कर  देते हैं . ऐसा लगता है कि म्यांमार के अधिकारी  यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि जो लोग भाग कर देश छोड़कर जाने को मजबूर किये जा रहे  हैं अगर वे कभी अंतर्राष्ट्रीय दबाव  के चलते वापस भी आयें तो उनको अपने घर की जगह पर  कुछ न मिले .. उनको उनके घरों की राख हे  नज़र आये .म्यांमार में तबाह हो रहे लोग पड़ोस के देशों में शरण लेने को मजबूर हैं . दिनरात चल कर बंगलादेश , भारत , मलयेशिया आदि देशों में पंहुच रहे लोगों को पता ही नहीं है कि कहाँ जा रहे हैं . उनके साथ बीमार लोग हैं , भूख से तड़प रहे बच्चे हैं , चल फिर सकने  से  मजबूर बूढ़े हैं , गर्भवती महिलायें हैं और दुधमुंहे   नवजात शिशु हैं . बड़ी संख्या में  भारत में भी म्यांमार के रोहिंग्या शरणार्थी पंहुच रहे  हैं. मौत से भाग कर नदी, नाले, पहाड़ , जंगल के  रास्ते अनिश्चय की दिशा में  भाग रहे लोगों को कहीं जाने का ठिकाना  नहीं है .बड़ी संख्या में लोग भारत भी आ रहे  हैं.  हमारी सरकार ने साफ़ कर दिया है कि इन लोगों को अपने देश में ठिकाना  नहीं दिया जाएगा.  भारत के गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने आधिकारिक बयान दे दिया है और कहा  है कि म्यांमार के अराकान  प्रांत से आ रहे लोग शरणार्थी  नहीं  हैं , वे गैरकानूनी तरीके से आ रहे लोग हैं .  उनको देश की सीमा के  अन्दर नहीं आने दिया जाएगा . म्यांमार से लगे राज्यों की सीमा चौकसी बढ़ा दी गयी  है .भारत सरकार के रुख से एकदम साफ़  है कि रोहिंग्या शरणार्थी भारत में नहीं आ सकते  और जो पहले से आ चुके हैं ,उनको देश से निकाल दिया जाएगा . जो  हालात अराकान में है उसमें वे अपने घर तो नहीं जा सकते , समझ में नहीं आता कि उनको भेजा कहाँ जाएगा .अपनी जान की हिफाज़त की मांग करते हुए कुछ  रोहिंग्या शरणार्थियों ने सुप्रीम कोर्ट में गुहार लगाई  है.  अपने हलफनामे में  दो रोहिंग्या लोगों ने कहा है कि अगर  उनके बीच से कोई बदमाशी कर रहा हो तो उसको तो देश से निकाल  दिया जाए या सज़ा दी जाए लेकिन  जो लोग मौत से भाग कर यहाँ शरण लेकर अपनी जान बचा रहे हैं उनको वापस न भेजा  जाए क्योंकि  वहां तो निश्चित मौत उन लोगों का इंतज़ार कर रही है.  जिन दो लोगों ने सुप्रीम कोर्ट में अर्जी दी है वे करीब पांच-छः साल से भारत में शरण लिए हुए  हैं.  उन्होंने  बाहलफ बयान दिया है कि उन दोनों के खिलाफ कोई भी मामला कहीं भी दर्ज नहीं है , यहाँ तक  उनकी जानकारी में किसी भी  रोहिंग्या के खिलाफ कोई मामला नहीं है. उनकी वजह से  राष्ट्रीय सुरक्षा को कोई ख़तरा नहीं है . फरियादियों ने कहा है कि पता लगा है कि सरकार ऐसे चालीस हज़ार रोहिंग्या शरणार्थियों का पता लगाएगी और उनको  देश से निकाल देगी . उन्होंने प्रार्थना की है कि हालांकि भारत ने शरणार्थियों के अंतर राष्ट्रीय कन्वेंशन पर दस्तखत नहीं किया है लेकिन मुसीबतज़दा लोगों की  हमेशा  ही मदद करता रहा है . प्रार्थना की गयी है कि वे भारत में रहने या स्वतंत्र रूप से कहीं  भी आने जाने के अधिकार की मांग नहीं कर रहे हैं .  उनको अपनी हिफाज़त में केवल  तब तक रहने दिया जाय जब तक कि उनके देश में  उनकी जान  पर मौत का साया मंडरा रहा है . उन्होंने कहा कि भारत में  उनको किसी तरह का  अधिकार नहीं चाहिए .  रोहिंग्या फरियादियों ने अपील की है कि जिस तरह  से भारत में तिब्बत और श्रीलंका से आये शरणार्थियों की जान की हिफाज़त की व्यवस्था है , वही उनको भी उपलब्ध करा दी जाए.  दया की अपील को संविधान की सीमा में रखने की बात भी की गयी है .    याचिका में कहा गया है कि रोहिंग्या अपना वतन  छोड़कर भाग रहे हैं क्योंकि म्यांमार में उनको सिलसिलेवार तरीके से परेशान किया जा रहा है . उनकी मुसीबत का कारण उनका धर्म और उनकी  जातीय पहचान है . इसलिए अंतर्राष्ट्रीय कानून के तहत वे शरणार्थी हैं और  वे अपने देश वापस नहीं जा सकते क्योंकि वहां उनको फिर वही यातना सहनी पडेगी.  सुप्रीम कोर्ट ने मामले को सुनवाई के लिए स्वीकार कर लिया है और अब अगली सुनवाई ३ अक्टूबर   को होगी. केंद्र सरकार के सख्त   रुख के कारण रोहिंग्या लोगों का अब भारत में रह पाना मुश्किल है, सुप्रीम कोर्ट से उनको कुछ उम्मीद है. लेकिन देश में उनको लेकर  बड़े पैमाने पर सियासत शुरू हो गयी है . किसी कोने में  पड़े हुए कुछ मौलाना मैदान में आ गए हैं जो अपनी राजनीतिक रोटियाँ सेंकने में लग गए हैं . एक मौलाना ने कोलकता की एक मीटिंग में कह  दिया  कर्बला में हम बहत्तर थे लेकिन हमने लाखों का जनाज़ा निकाल दिया . अब कोई इस मौलाना से कहे कि भाई जिस अराकान में इन मुसलमानों   के ऊपर हर तरह की मुसीबत टूट पडी है आप  वहां क्यों नहीं जाते , वहां जाइए और वहां का जो भी यजीद हो उसको खत्म कर के इन गरीब लोगों की जान  बचाइये ., तो बगलें झाँकने लगेंगे . लेकिन यहाँ भारत में जहां हर  तरह से  तबाह रोहिंग्या ने शरण ले  रखी है उनके खिलाफ माहौल बनाकर आपको क्या  मिलेगा . लेकिन वे अपनी हरकत से  बाज़ नहीं  आयेंगें . इन्हीं गैरजिम्मेदार मौलाना साहिबान के मेहरबानी से  देश में चारों तरह सक्रिय हिंदुत्व  के अलमबरदारों को हर मुसलमान के खिलाफ लाठी भांजने का  बहाना मिल जाता  है.   रोहिंग्या के भारत में  रहने के मुद्दे पर टेलिविज़न पर हो रही एक बहस में मैने मन बनाया था कि रोहिंग्या मुसलमानों की मुसीबतों को सही संदर्भ में देश के सामने रखने की कोशिश की जायेगी लेकिन गैरजिम्मेदार के किस्म के लोगों के बयानात शुरू हो गए और सारी बहस रास्ते से भटक गयी . भारत की मौजूदा  सत्ताधारी  पार्टी की तो हमेशा   ही  कोशिश रहती है कि जहाँ भी संभव हो और जहां तक बस चले माले को हिन्दू-मुस्लिम कर देना उनके वोटों के लिहाज़ से सही रहेगा ,इसलिए उनके प्रवक्ता इस तरह की बात हर हाल में करना चाहते  हैं. जाने अनजाने पढ़े लिखे  मुसलमान भी उसी पिच पर बात करने लगते हैं . समझ में नहीं आता  कि एक मुसीबतज़दा समुदाय के प्रति समाज का एक बड़ा हिस्सा इतना निर्दयी क्यों  हो रहा है . रोहिंग्या दुनिया के सबसे ज्यादा खस्ताहाल  लोग हैं .म्यांमार में रोहिंग्या मुसलमान   सदियों से बर्मा के अरकान प्रदेश में रह रहे हैं लेकिन १९८२ में बर्मा की फौजी हुकूमत ने उनकी नागरिकता छीन ली और ऐलान कर दिया कि वे  बर्मा के नागरिक नहीं हैं .  बर्मा में करीब १३५ जातीय समूहों को सरकारी मान्यता मिली हुयी  है लेकिन रोहिंग्या को उस  श्रेणी में नहीं रखा गया है . इसके पहले जब बर्मा में  लोकतंत्र शासन था तो उनकी इतनी दुर्दशा नहीं थी . बर्मा में करीब सवा सौ साल  ( १८२४ - १९४८ ) अंग्रेज़ी राज रहा था , उस दौर में  वहां बड़ी संख्या में भारत से मजदूर गए थे .  अंग्रेजों ने बर्मा को भारत के  एक राज्य के रूप में रखा था इसलिए इन लोगों को उस समय विदेशी नहीं माना गया  था, उनका आना  जाना  अपने  ही देश में  आने जाने जैसा था .  लेकिन इन लोगों के वहां जाकर काम करने और बसने को वहां के स्थानीय लोगों ने स्वीकार नहीं किया था .आज म्यांमार के शासक उसी  मुकामी सोच के तहत  इन लोगों को अपने देश का नागरिक नहीं मानते .म्यांमार की हुकूमत  इन लोगों  को अभी भी  रोहिंग्या नहीं मानती , वे इनको बंगाली घुसपैठिया  ही बताते हैं .१९४८ में म्यांमार ( बर्मा ) की आज़ादी के बाद रोहिंग्या को कुछ दिन सम्मान मिला .  इस समुदाय के कुछ लोग संसद  के सदस्य  भी हुए , सरकार में भी शामिल हुए लेकिन १९६२ में  फौजी हुकूमत की स्थापना के बाद सब कुछ बदल गया .  कई पीढ़ियों से यहाँ रह रहे लोगों को भी विदेशी घोषित कर दिया गया . नतीजा यह हुआ कि उनको नौकरी आदि मिलना बंद हो गया . रोहिंग्या म्यांमार के चुनावों में वोट नहीं दे सकते .मौजूदा मुसीबत की शुरुआत अक्टूबर २०१६ में शुरू  हुयी जब रोहिंग्या मुसलमानों की  नुमाइंदगी  का दावा करने वाले  और अपने को अरकान रोहिंग्या साल्वेशन आर्मी का सदस्य बताने वाले कुछ लोगों ने अगस्त के महीने में म्यांमार की बार्डर पुलिस के ९ कर्माचारियों को मार डाला . उसके बाद म्यांमार की सेना की टुकड़ियां अरकान के गाँवों में घुसने लगीं और लोगों को प्रताड़ित करने लगीं . सैनिकों ने लोगों को क़त्ल किया, रेप किया और घर जलाए . हालांकि यह सब काम म्यांमार की सेना २०१३ से ही शुरू कर चुकी थी लेकिन अक्टूबर २०१६ में उनको  बड़ा बहाना मिल गया . यह भी सच है कि रोहिंग्या समुदाय में कुछ लोगों ने हथियार उठा लिया है लेकिन सेना उनको तो पकड़ नहीं पाई  , अलबत्ता गांवों में रह रहे निहत्थे मुसलमान मर्दों को  मार डालने का सिलसिला लगातार चलता  रहा.रोहिंग्या की मुसीबत में जो इंसान  सबसे घटिया नज़र आ रहा है उसका नाम  है म्यांमार की स्टेट चांसलर आंग  सां सू ची. वे  रोहिंग्या की समस्याओं पर कोई बात करने को तैयार नहीं हैं . वे इन लोगों को आतंकवादी कहती  हैं .यह  बेशर्मी की हद है  कि दुनिया भर में  पनाह मांग रहे गरीब, भूखे ,  बूढ़े बच्चे , औरतें उनकी नज़र में आतंकवादी हैं . उनको याद रखना चाहिए कि एक समय था जब जब आंग सां सू ची भी अपने वतन के  बाहर ठोकर खा रही थीं और भारत समेत पूरी दुनिया उनकी और उनके लोगों की भलाई की बात करती थी . तब म्यांमार की फौजी हुकूमत उनको आतंकवादियों का नेता कहती थी .  अगर उस वक़्त  दुनिया ने  उनको भी वैसे ही ठुकराया होता जैसे वे अनाथ रोहिंग्या  म्यांमार के निवासियों को ठुकरा रही हैं तो वे आज कहाँ होतीं.  इस सारी  मुसीबत में बंगलादेश की  प्रधानमंत्री शेख  हसीना एक  महान नेता के रूप में पहचानी जा रही हैं और शरणार्थियों को  संभाल रही हैं. भारत के प्रधानमंत्री के पास भी  मौक़ा है कि वे दुनिया के बड़े  नेता के रूप में अपने को स्थापित कर लें लेकिन अभी तक भारत सरकार का रुख मानवता के बहुत बड़े पक्षधर के रूप में नहीं आया है .आगे शायद हालात कुछ  बदलें.

डॉ एस के सरीन मेरे लिए किसी फ़रिश्ते से कम नहीं .

जंतर-मंतर - Wed, 27/09/2017 - 22:45


शेष नारायण सिंह


२७ सितम्बर २०१६  के दिन मेरे  डाक्टर  ने एक बहुत बड़ा फैसला लिया था . मेरे लिए डॉ सरीन फ़रिश्ता  हैं . २८ दिन से मेरा बुखार उतरा नहीं था. मैं ११ सितम्बर को वसंत कुञ्ज,नई दिल्ली के आई एल बी एस ( ILBS) अस्पताल में दाखिल हुआ था . जब मैं उस अस्पताल  में गया था तो मेरी हालत बहुत ही खराब  थी . बाकी तो सब ठीक हो गया लेकिन बुखार नहीं उतर रहा  था. कैंसर , टीबी, आदि भयानक बीमारियों के टेस्ट हो गए थे , सब कुछ  रूल आउट हो गया था लेकिन बुखार? डॉ एस के सरीन  इलाज में नई नई खोज के लिए दुनिया  भर में विख्यात हैं  .गैस्ट्रो इंटाइटिस का सबसे सही इलाज उनके नाम पर रजिस्टर्ड है.  दुनिया के कई  अस्पतालों में ' सरीन प्रोटोकल ' से ही इस बीमारी का इलाज किया जाता  है .   मेरे सैकड़ों टेस्ट हो चुके थे लेकिन बुखार का कारण पता नहीं लग रहा था. डॉ सरीन ने इम्पिरिकल आधार पर नई दवा तजवीजी और इलाज शुरू कर दिया  . तीन दिन के अन्दर बुखार खत्म . इसलिए २७  सितम्बर २०१६ को मैं अपने पुनर्जीवन की शुरुआत मानता हूँ . पांच अक्टूबर २०१६ के दिन जब मुझे अस्पताल से  छुट्टी मिली तो मेरे  डाक्टर ने कहा था कि " अब आप जाइए फिजियोथिरैपी होगी और आप चलना फिरना शुरू कर देंगें . बस एक बात का ध्यान रखना --- "अगर बुखार हो या उल्टी आये तो बिना किसी से  पूछे सीधे अस्पताल आ जाइएगा, मुझे या किसी और से संपर्क करने की कोशिश भी मत करना . सिस्टम अपना काम करेगा . मुझे  तुरंत पता लग जाएगा ."  ऐसी नौबत नहीं आयी , फ़रिश्ते का हाथ जो मेरे ऊपर था . आज एक साल बाद जब मेरे दोस्त कहते हैं कि अब आप पहले से भी ज्यादा स्वस्थ लग रहे हैं तो डॉ एस के सरीन एक सम्मान में सर झुक जाता  है.  डॉ सरीन मेडिकल एथिक्स बड़े साधक हैं .अपने देश में अगर इसी तरह के मेडिकल एथिक्स के बहुत सारे साधक हर अस्पताल में हों तो अपने देश की  स्वास्थ्य व्यवस्था में क्रान्ति आ सकती  है. सितम्बर २०१६ के बाद की अपनी ज़िंदगी को मैं डॉ सरीन की तपस्या का प्रसाद मानता हूँ और इसको सबके कल्याण के लिए समर्पित कर चुका हूँ . 

राहुल का सॉफ्ट हिन्दुत्व तो मोहन भागवत का मुस्लिम प्रेम

शहर इलाहाबाद के रहने वाले कश्मीरी पंडित राहुल गांधी । इन्हीं शब्दों के साथ द्वारका के मंदिर में पंडितों ने राहुल गांधी से पूजा करायी और करीब आधे घंटे तक राहुल गांधी द्वारकाधीश के मंदिर में पूजा कर निकले । और मंदिर में पूजा अर्चना के बाद राजनीतिक सफलता के लिये चुनावी प्रचार में राहुल गांधी निकल पड़े। तो दूसरी तरफ रविवार को नागपुर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के दशहरा कार्यक्रम में पहली बार किसी मुस्लिम को  मुख्य अतिथि बनाया गया । दरअसल रविवार को बाल स्वयंसेवकों की मौजूदगी में आरएसएस के बैनर तले हुये कार्यक्रम में वोहरा  समाज से जुडे होम्योपैथ डाक्टर के रुप में पहचान पाये मुन्नवर युसुफ को मुख्य अतिथि बनाया गया । तो सियासत कैसे कैसे रंग धर्म के आसरे ही सही लेकिन दिखला रही है उसी की ये दो तस्वीर अपने आप में काफी है कि बदलाव आ रहा है । एक तरफ कांग्रेस मुस्लिम तुष्टिकरण के आरोप से पीछा छुड़ाना चाहती है । तो राहुल गांधी द्वारका मंदिर के रंग में है और  संघ परिवार  हिन्दू राष्ट्र की सोच तले मुस्लिम विरोधी होने के दाग को धोना चाहती है। तो पहली बार मुन्नवर युसुफ को मुख्यअतिथि बना रही है । तो सवाल दो है । पहला , सॉफ्ट हिन्दुत्व के आसरे कांग्रेस अपने पुराने दौर में लौटना चाह रही है ।  यानी अब कांग्रेस समझ रही है कि जब इंदिरा की सत्ता थी । तब कांग्रेस ने सॉफ्ट हिन्दुत्व अपना कर जनसंघ और संघ परिवार को कभी राजनीति तौर पर मजबूत होने नहीं दिया ।

और आज जब राहुल गांधी द्वारका मंदिर पहुंचे तो पंडितों ने उन्हें दादी इंदिरा गांधी और पिता राजीव गांधी के साइन किये हुये उन पत्रों को दिखाया जब वह भी मंदिर पहुंचे थे । इंदिरा गांधी 18 मई 1980 को द्वारका  मंदिर पहुंची थी । तो राजीव गांधी 10 फरवरी 1990 तो द्वारका मंदिर पहुंचे थे । तो कह सकते हैं राहुल गांधी ने लंबा लंबा वक्त लगा दिया सॉफ्ट हिन्दुत्व के रास्ते पर चलने में । या फिर 2004 में राजनीति में कदम रखने के बाद राहुल ने सिर्फ सत्ता ही देखी तो विपक्ष में रहते हुये पहली बार राहुल गांधी धर्म की सियासत को भी समझ रहे है । तो राहुल गांधी अतित की काग्रेस को फिर से बनाने के लिये साफ्ट हिन्दुत्व की छूट चुकी लकीर को खिंचने निकल पडे है । लेकिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ तो अतीत की लकीर मिटाकर पहली बार मुस्लिमों के प्रति साफ्ट रुख अपनाते हुये दिल से लगाने को खुलेतौर पर दिखायी देने के लिये मचल रहा है । तो क्या कांग्रेस के साफ्ट
हिन्दुत्व से कही बड़ा सवाल आरएसएस का है । और पहली बार संघ अगर दशहरे के कार्यक्रम में किसी मुस्लिम को मुख्यअतिथि बना रही है तो ये सवाल जायज है कि संघ अपने हिन्दू राष्ट्र में मुसलिमों के लिये भी जगह है ये बताना चाहता है ।

या फिर बीजेपी की राजनीतिक सफलता के लिये संघ ने अपना एजेंडा परिवर्तित किया है। ये दोनों सवाल महत्वपूर्ण इसलिये है क्योकि संघ परिवार इससे बाखूबी वाकिफ है कि संघ के हिन्दुत्व ने कभी मुस्लिमों को
सीधे खारिज नहीं किया । पर सावरकर के हिन्दुत्व ने कभी मुस्लिमो को मान्यता भी नहीं दी । और  संघ ने हिन्दुओ के विभाजन को रोकने के लिये सावरकर के हिन्दुत्व का विरोध नहीं किया । यानी चाहे अनचाहे पहली बार संघ को लगने लगा है कि जब उसके प्रचारको के हाथ में ही सत्ता है तो फिर अब सावरकर के हिन्दुत्व को दरकिनार कर संघ के व्यापक हिन्दुत्व की सोच को रखा जाये। या फिर काग्रेस साफ्ट हिन्दुत्व पर लौटे उससे पहले बीजेपी चाहती है कि  संघ कट्टर हिन्दुत्व वाली सोच को खारिज कर मुस्लिमों के साथ खडे होते हुये दिखायी देंम । जिससे मोदी के विकास का राग असर डाल सके । क्योकि अतीत के पन्नों को पलटे तो कांग्रेस और हिन्दू सभा 1937 तक एक साथ हुआ करते थे । मदनमोहन मालवीय कांग्रेस के साथ साथ हिन्दू सभा के भी
अध्यक्ष रहे । लेकिन 1937 में करणावती में हुये हिन्दुसभा की बैठक में जब सावरकर अध्यक्ष चुन लिये गये तो हिन्दू सभा , हिन्दू महासभा हो गई । और उसी वक्त काग्रेस और हिन्दु महासाभा में दूरी आ गई पर राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ और हिन्दू महसभा यानी हेडगेवार और सावरकर नजदीक आ गये . तो क्या 80 बरस पुराने हिन्दुत्व फिर से मुख्यधारा की राजनीति को परिभाषित कर रही है । क्योकि 80 बरस पहले संघ ये जानते समझते हुये सावरकर यानी हिन्दु महासभा के पीछे खडी हो गई कि  सावरकर के हिन्दुत्व में मुस्लिम-इसाई के लिये कोई जगह नहीं थी । सावरकर ने बकायदा अलग हिन्दु राष्ट्र और अलग मुस्लिम राष्टे्र का भाषण भी दिया और 1923 में हिन्दुत्व की किताब में भी मुस्लिमो को जगह नहीं दी ।

पर संघ इसलिये सावरकर के हिन्दुत्व की आलोचना ना कर सका क्योंकि सावरकर का जहा भाषण होता वहा अगले दिन से संघ की शाखा शुरु हो जाती । क्योंकि हिन्दु महासाभा के पीछे सेघ सकी तरह कोई संगठन या कैडर नहीं था । तो संघ सावरकर के हिन्दुत्व की सोच के साये में अपना विस्तार करता रहा और जब जनसंघ बनाने का वक्त आया तो हिन्दु महासभा से निकले श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने ही जनसंघ की स्थापना की । तो इतिहास अपने को दोहरा रहा है या नये तरीके से परिभाषित कर रहा है । या फिर मौजूदा हालात ने समाज के भीतर ही इतनी मोटी लकीर खींच दी है कि अब सियासत- सत्ता में  लकीर मिटाने के दौर शुरु हो रहे हैं।

बीएचयू को जेएनयू बनने दीजिए, बीएचयू को जनेऊ मत बनाइए वीसी साहेब!

दखल की दुनिया - Mon, 25/09/2017 - 16:43
चन्द्रिका(मूलरूप से द वायरहिंदी में प्रकाशित)मैं बीएचयू और जेएनयू दोनों विश्वविद्यालयों का छात्र रहा. इसलिए कह रहाहूं कि बीएचयू को जेएनयू बनने दीजिए वीसी साहेब. बीएचयू को जनेऊसे मत बांधिए. जनेऊ को उसब्राम्हणवादी वर्चस्व के प्रतीक के रूप में लीजिएगा. 
जिसमे एक ठसकहोती है. जिस ठसक की वजहसे आप कुर्सी छोड़कर गेट तक नहीं आए. अपनी सुरक्षा की गुहारलगा रही लड़कियों से यह कहने नहीं आए कि उनका उत्पीड़न गलत है. उनकी सुरक्षा की मांगसही है. ग़लत पर हमकार्यवाही करेंगे. सही के साथखड़े रहेंगे. 
यह कहनेके बजाय उन्हें धमकाया. उनके घर सेभी उन्हें असुरक्षित करने की कोशिश की. उन परलाठियां चलवाई. उन्हें हास्टल से बाहरजाने पर विवश कर दिया. वे सुरक्षामांग रही थी, उन्हें और असुरक्षितकिया. उन्हें घायल किया. 
आपका बयान आया है किबीएचयू को बदनाम किया जा रहा है. बीएचयू एक पुरानी संस्था है. 100 साल से भी ज़्यादा पुरानी. अपने वक्त का वहशायद भारत का सबसे बड़ा आवासीय परिसर भी रहा है. वहां लोगों ने पढ़ाईकी अपने क्षेत्रों में नाम कमाए. उन कामऔर नाम के जरिए बीएचयू ने भी नाम कमाए. 
आपका यह कहनाकि बीएचयू को बदनाम किया जा रहा है. गलत हैं. बीएचयू का नाम और ज़्यादा रोशन हो उसके लिए यह काम किया जा रहा है. लड़कियों को भीआज़ादी मिले उसके लिए वे अपना हक़ मांग रही हैं. वे सुरक्षितरहें उनकी इतनी ही मांग है. 
किसी भी तारीख़के चौबीस घंटे उनके लिए आधे न किए जाएं. आधी आबादी का दिनभी पूरे चौबीस घंटे का हो. यह आज़ादीऔर यह वक्त उनकी प्रतिभा को और निखारेगा. वे निखरेंगीतो बीएचयू भी निखरेगा. बीएचयू का नामहोगा. बदनाम नहीं होगा बीएचयू. 
बुरी घटनाएं और छिनीहुई आज़ादी बदनामी होती है. आज़ादी के ख़्वाबको बदनामी कहना किन्हीं और समाजों का चलन है. जिसे मैने जनेऊ कहा है यहवहां का प्रचलन है. वहां खड़े होकर आप मतबोलिए. देर से ज़ुबान खोला है तो लोकतंत्र और सामंतशाही को एक ही गिलास में मत घोलिए. 
यह कहनाआसान है कि बाहर के लोग उकसा रहे हैं. जेएनयू और इलाहाबादके लोग बहका रहे हैं. आज़ादी बहकाने और उकसानेसे नहीं मिलती. आप 1857 के अंग्रेजों जैसा कुछ बता रहे हैं. आज़ादी का अहसासदिलाना बहकाना नहीं है. झूठ मत बोलिए. फिलवक्त यह काम मुल्क के शीर्ष पदों पर बैठे लोगों के लिए छोड़िए. जो झूठबोल रहे हैं और बोलवा रहे हैं. जो ज़हरघोल रहे हैं और घोलवा रहे हैं.बीएचयू को जेएनयू बनने दीजिए. बीएचयू की दीवारेंभी विचारों और नारों से रंगने दीजिए. कविताएं लगने दीजिए. पर्चेपोस्टर बंटने दीजिए. धारा 144 हटालीजिए. उन्हें राजनीति भी करने दीजिए. राजनीति करेंगे तो देशकी नीति और नियति दोनों बदलेगी. अगर यह शिक्षाके संस्थानों में नहीं होगा. अगर यह विश्वविद्यालयों मेंनही होगा तो फिर कहां होगा. 
बहस, विचार और विमर्श अगर विश्वविद्यालयों में नहीं पैदा होंगे तो फिर कहां होंगे. उन्हें स्क्रू और नटबोल्टमत बनाइए. कमोबेस जेएनयू में यह बचाहुआ है. अलग-अलग विचारों का होना और पर्चे, पोस्टरों का कोनाअभी बचा हुआ है. कमोबेस जेएनयू में जनेऊ का धागाभी कमजोर है. थोड़ा ही सहीबहस विमर्श भी अभी वहां बचा हुआ है. जो सत्ताओंको चुनौती देता है. 
जो उनताकतों को चुनौती देता है जो मानवीय अधिकारों को ताक पर रख रही हैं. वह सरकारोंको चुनौती देता है जो लोगों के अधिकारों को खा रही हैं. मुझे यकीन है आपऔर आपके पक्षकार किसी के अधिकार को खाए जाने के पक्ष में नहीं खड़े होंगे. वे इसकेख़िलाफ खड़े होंगे. इसलिए जेएनयू के साथखड़े होंगे. उस जगहके साथ खड़े होंगे जहां शंख और डफली एक साथ बजते हैं और लोग अपनी समझ बनाकर किसी एक को चुनते हैं. बेशक राष्ट्रवाद को कमजोर मत होने दीजिए. पर अंग्रेजोंके जमाने के राष्ट्रवाद को मत ढोइए. वंदेमातरम और झंडेके राष्ट्रवाद से राष्ट्र को ऊपर उठाइए. मुल्क के लोगकिसी भी झंडे और गीत से बड़े हैं. उन्हीं की बाजूओंपर सारे झंडे खड़े हैं. उनके बाजुओं को ताकतदीजिए. राष्ट्रवाद और राष्ट्रवादियों को नई आदत दीजिए. लोकतंत्र की नईतस्वीर खीचिए पुरानी को सहेज कर रख दीजिए. कल कीकिताबों के लिए, कल केबच्चों के लिए. ताकि जब वेआएं तो समझ पाएं अपने पुराने देश को, बदले हुए परिवेश को. जेएनयू ने जितनी पढ़ाई की है. जेएनयू ने उतनीलड़ाई की है. एक शिक्षाका संस्थान अगर शोध और विमर्श करता है. समाज के किसानों, मजदूरों और आदिवासियों को जाकर पढ़ता है. उसे समझता है और डिग्रियां लेता है. उसका फर्ज बनता है किवह उन स्थितियों को बदले. वह उसेबदले जिसे बदले जाने की जरूरत है. 
जो उसनेपढ़ा और समझा है उसके सहारे उनके अधिकारों के लिए सवाल करे. इन्हीं सवालों और समझदारियोंने हमे वहां से निकाला है जहां एक राजा हुआ करता था. जहां राजा ईश्वर का दूतहुआ करता था. सवाल करके और वहांसे निकल करके ही हम लोकतंत्र में आए हैं. सबकी बराबरी का वहदस्तावेज बनाए हैं. उसे और बेहतरकरना और पुराना जो बचा हुआ अवशेष है उससे बाहर करना हम ही करेंगे. हमने ही औरतोंके साथ उनके घरों से बाहर आने की लड़ाई लड़ी है. बाहर आने पर हमही उनके साथ उनकी सुरक्षा के लिए भी लड़ेंगे. ताकि रात का चांदवे भी चौराहों से देखें. ताकि वे भीकिसी गुमटी से चाय पिएं उधार लेके. 
अभी उन्हें अपने लिए यह जगहबनानी है. क्योंकि किताब, औरकम्प्यूटरों से मिला ज्ञान बहुत कम होता है. अगर ज्ञान यहीं से मिलतातो पढ़ाई के सारे संस्थान बंद हो जाते. जेएनयू भी बंदहो जाता. बीएचयू भी बंदहो जाता. ज्ञान किताबों के अक्षरोंसे नहीं पूरा होता. सौ सालबाद ही सही महामना के महान संस्थान को यह अवसर उन्हें देना चाहिए कि रात को सड़क के अहसास को वे जान सकें. किसी पुलिया पर बैठके कविता लिखने का ठान सकें.  वे असुरक्षित हैं. वे किसबात से असुरक्षित हैं. वे असुरक्षितहैं कि उन्हें छेड़ा जा रहा है. उनका उत्पीड़न किया जा रहाहै. समाज और संस्थान दोनों जगह यही स्थिति है. इन स्थितियोंको बदलने के लिए इस संस्कृति को बदलने के लिए बहुत बदलाव की जरूरत है. वह धीरे-धीरे आएगा. जैसे धीरे-धीरेजनतंत्र आया. जैसे धीरे-धीरेउनकी आबादी आई स्कूलों तक. स्कूलों से विश्वविद्यालयों तक. 
जब वे एक साथ पढ़ेंगे एक साथ रहेंगे. एक दूसरेको तभी समझ पाएंगे. एक दूसरेको तभी समझा पाएंगे. बीएचयू ने इसेरोक रखा है. उनकी पढ़ाई, उनकीकक्षाएं तक अलग कर रखी हैं. उन्हें एक क्लासमें बैठकर पढ़ने के साथ-साथ अवसर मिलने देना. इसअसुरक्षा को कम करेगा. वे विचारऔर कमजोर होंगे जो यह कह रहे हैं कि 6 बजे बाहर जाने की क्याजरूरत थी. लड़कियों के बाहरजाने की जरूरतों पर सवाल कम हो जाएंगे. सच केलोकतंत्र के लिए लड़कियों को लड़ने दीजिए. राष्ट्रवाद और राष्ट्रहितके लिए उन्हें लड़ने दीजिए. जो आज़ादीऔर हक़ के लिए उकसा रहे हैं उन्हें बधाई दीजिए. बदनाम होने की जड़ोंको कमजोर करिए. लड़कियां जहां कमजोर पड़ें राष्ट्रहित के लिएआप खुद लड़िए.

भाषण, सेक्स और चैनल

हालात  तो खुला खेल फर्रुखाबादी से आगे के हैं...

दिन शुक्रवार। वक्त दोपहर के चार साढ़े चार का वक्त । प्रधानमंत्री बनारस में मंच पर विराजमान। स्वागत हो रहा है । शाल-दुशाला ऊढ़ाई  जा रही है । भाषणों का दौर शुरु हो चला है। पर हिन्दी के राष्ट्रीय न्यूज चैनल पर हनीप्रीत के अभी तक गायब पूर्व पति विश्वास गुप्ता का कही से पदार्पण हुआ और वह जो भी बोल रहा था, सबकुछ चल रहा था । हनीप्रीत के कपड़ों के भीतर घुसकर। गुरमीत के बेड पर हनीप्रीत । कमरा नहीं हमाम । बाप - बेटी के नाम पर संबंधों के पीछे का काला पन्ना । भक्तों पर कहर और महिला भक्तों की अस्मत से खुला खिलवाड़। सबकुछ लाइव । और एक दो नहीं बल्कि देश के टाप पांच न्यूज चैनलो में बिना ब्रेक । पूरी कमेन्ट्री  किसी बीमार व्यक्ति या ईमानदार व्यक्ति के  बीमार माहौल से निकल कर बीमार समाज का खुला चित्रण । वो तो भला हो कि एएनआई नामक समाचार एजेंसी का, जिसे लगा कि अगर हनीप्रीत की अनंत  कथा  चलती रही तो कोई पीएम को दिखायेगा नहीं । और साढे तीन बजे से शुरु हुई विश्वास गुप्ता की कथा को चार बजकर पैंतीस मिनट पर एएनआई ने काटा तो हर किसी ने देखा अब प्रधानमंत्री मोदी को दिखला दिया जाये। यानी तीन सवालों ने जन्म लिया । पहला , एएनआई की जगह अगर न्यूज चैनलों ने पहले से लाइव की व्यवस्था हनीप्रीत के पूर्व पति की प्रेस कांन्फ्रेस की कर ली होती और पूर्व पति अपनी कथा रात तक कहते रहते तो पीएम मोदी का बनारस दौरा बनारस के भक्त चश्मदीदो के सामने ही शुरु होकर खत्म हो जाता ।

यानी फाइव  कैमरा सेट जो हर एंगल से पीएम मोदी को सडक से मंदिर तक और म्यूजियम से मंच तक लगा था वह सिवाय डीडी के कही दिखायी नहीं देता । दूसरा सवाल एएनआई ने पहले कभी किसी ऐसी लाइव प्रेस कान्फ्रेस को बीच में काटने की नहीं सोची जिसे हर न्यूज चैनल ना सिर्फ चटखारे ले कर दिखा रहा था बल्कि हर चैनल के भीतर पहले से तय सारे कार्यक्रम गिरा अनंतकालीन कथा को ही चलाने  का अनकहा निर्णय भी लिया जा चुका था। और तीसरा सवाल क्या एएनआई ने पीएमओ या पीएम की प्रचार टीम के कहने पर हनीप्रीत के पूर्व पति की उस प्रेस कांन्फ्रेस का लाइव कट कर दिया, जिसमें सेक्स था। थ्रिल था। सस्पेंस था । नाजायज संबंधों से लेकर बीमार होते समाज का वह सबकुछ था, जिसे कोई भी कहता नहीं लेकिन समाज के भीतर के हालात इसी तरह के हो चले हैं। यानी हर दायरे के भीतर का कटघरा इसी तरह सड-गल रहा है । और बेफ्रिक्र समाज किसी अनहोनी से बेहतरी के इंतजार में जिये चला जा रहा है। क्योंकि पीएम बनारस में क्या कहते क्या इसमें किसी की दिलचस्पी नहीं है । या फिर हनीप्रीत के  शरीऱ और गुरमित के रेप की अनकही कथा में समाज की रुचि है । तो संपादकों की पूरी फौज ही हनीप्रीत को दर्शको के सामने परोसने के लिये तैयार है। तो पीएम से किसी को उम्मीद नहीं है या फिर प्रतिस्पर्धा के दौर में जो बिकता  है वही चलता है कि तर्ज पर अब संपादक भी आ चुके है, जिनके कंधों पर टीआरपी ढोने का भार है। हो सकता है। फिर अगला सवाल ये भी है कि अगर ऐसा है तो इस बीमारी को ठीक कौन करेगा। या सभी अपने अपने दायरे में अगर हनीप्रीत हो चुके हैं तो फिर देश संभालने के लिये किसी नेहरु, गांधी , आंबडेकर, लोहिया , सरदार , शयामा प्रसाद मुखर्जी या दीन दयाल उपाध्याय  का जिक्र कर कौन रहा है। या कौन से समाज या कौन सी सत्ता को समाज को संभालने की फिक्र  है। कहीं ऐसा तो नहीं महापुरुषो का जिक्र सियासत सत्ता इसलिये कर रही है कि बीमार समाज की उम्मीदें बनी रहें। या फिर महापुरुषों के आसरे कोई इनकी भी सुन ले। मगर सुधार हो कैसे कोई समझ रहा है या ठीक करना चाह भी रही है । शायद  कोई नहीं ।

तो ऐसे में बहुतेरे सवाल जो चैनलो के स्क्रिन पर रेंगते है या सत्ता के मन की बात में उभरते है उनका मतलब होता क्या है  ?  फिर क्यो फिक्र होती है कि गुरुग्राम में रेयान इंटरनेशनल स्कूल में सात बरस के मासूम की हत्या पर भी स्कूल नहीं रोया । सिर्फ मां-बाप रोये । और जो खौफ में आया वह अपने बच्चो को लेकर संवेदनशील हुआ । फिर क्यों फिक्र हो रही है कि कंगना रनावत के प्यार के एहसासों के साथ रोशन खानदान ने खिलवाड़ किया । क्यों फिक्र होती है कि गाय के नाम पर किसी अखलाख की हत्या हो जाती है। क्यो फिक्र होती है कि लंकेश से लेकर भौमिक की पत्रकारिता सच और विचारधारा की लड़ाई लड़ते हुये मार दिये जाते है । क्यों फिक्र होती है लिचिंग जारी है पर कोई हत्यारा नहीं है । फिक्र क्यों होती है कि पेट्रोल - डिजल की कमाई में सरकार ही लूटती सी दिखायी देती है । फिक्र क्यो होती है बैको में जमा जनता के पैसे पर कारपोरेट रईसी करते है और सरकार अरबो रुपया इनकी रईसी के लिये माफ कर देती है । नियम से  फिक्र होनी नहीं चाहिये जब न्यूज चैनलों पर चलती खबर को लेकर उसके संपादको की मंडली ही खुद को जज माने बैठी हो । और अपने ही चैनल की पट्टी में चलाये  कि किसी को किसी कार्यक्रम से नाराजगी हो या वह गलत लगता हो तो शिकायत करें । तो अपराध करने वाले से शिकायत करेगा कौन और करेगा तो होगा क्या।

और यही हाल हर सत्ता का है । जो ताकतवर है उसका अपराध बताने भी उसी के पास जाना होगा । तो संविधान की शपथ लेकर ईमानदारी या करप्शन ना करने की बात कहने वाले ही अगर बेईमान और अपराधी हो जाये तो फिर शिकायत होगी किससे । सांसद-मंत्री-विधायक -पंचायत सभी जगह तो बेईमानों और अपराधियों की भरमार है । बकायदा कानून के राज में कानूनी तौर पर दागदार है औसत तीस फिसदी जनता के नुमाइंदे। तो फिर सत्ता की अनकही कहानियों को सामने लाने का हक किसे है । और सत्ता की बोली ही अगर जनता ना सुनना चाहे तो सत्ता फिर भी इठलाये कि उसे जनता ने चुना है । और पांच बरस तक वह मनमानी कर सकती है तो फिर अपने अपने दायरे में हर सत्ता मनमानी कर ही रही है । यानी न्याय या कानून का राज तो रहा नहीं । संविधान भी कहा मायने रखेगा । एएनआई की लाउव फुटेज  की तर्ज पर कभी न्यायपालिका किसी को देशद्रोही करार देगी और कभी राष्ट्रीयता का मतलब समझा देगी। और किसी चैनल की तर्ज पर सत्ता - सियासत भी इसे लोकतंत्र का राग बताकर वाह वाह करेगी  । झूठ-फरेब । किस्सागोई । नादानी और अज्ञानता । सबकुछ अपने अपने दायरे में अगर हर सत्ता को टीआरपी दे रही है तो फिर रोकेगा कौन और रुकेगा कौन । और सारे ताकतवर लोगो के नैक्सस का ही तो राज होगा। पीएम उन्हीं संपादको को स्वच्छभारत में शामिल होने को कहेंगे, जिनके लिये हनीप्रीत जरुरी है । संपादक उन्हीं मीडिया  कर्मियो को महत्व देंगे जो हनीप्रीत की गलियों में घूम घूम कर हर दिन नई नई कहानियां गढ़ सकें । और कारपोरेट उन्हीं संपादको और सत्ता को महत्ता देंगे जो बनारस में पीएम के भाषण और हनीप्रीत की अशलीलता तले टीआरपी के खेल को समझता हो। जिससे मुनाफा बनाया जा सके।

यानी देश के सारे नियम ही जब कमाई से जा जुड़े हों। कारपोरेट के सामने हर तिमाही तो सत्ता के सामने हर पांच साल का लक्ष्य हो । तो हर दौर में हर किसी को अपना लाभ ही नजर आयेगा । और अगर सारे हालात मुनाफे से जा जुड़े हैं तो राम-रहीम के डेरे से बेहतर कौन सा फार्मूला किसी भी सत्ता के लिये हो सकता है। और रायसिना हिल्स से लेकर फिल्म सिटी अपने अपने दायरे में किसी डेरे से कम क्यों आंकी जाये ।  और आने वाले वक्त में कोई ये कहने से क्यो कतरायेगा कि जेल से चुनाव तो जार्ज फर्नाडिस ने भी लड़ा तो गुरमित या हरप्रीत क्यो नहीं लड सकते है । या फिर इमरजेन्सी के दौर में जेपी की खबर दिखाने पर रोक थी । लेकिन अभी तो खुलापन है अभिव्यक्ति की आजादी है तो फिर रेपिस्ट गुरमित हो या फरार  हनीप्रीत । या किसी भी अश्लीलता या अपराधी की  खबरे दिखाने पर कोई रोक तो है नहीं । तो खुलेपन के दौर में जिसे जो दिखाना है दिखाये । जिसे जो कहना है कहे । जिसे जितना कहना है कह लें । यानी हर कोई जिम्मेदारी से मुक्त होकर उस मुक्त इकनामी की पीठ पर सवार है जिसमें हर हाल में मुनाफा होना चाहिये । तब तो गुजराती बनियो की  सियासत कह सकती है गुजराती बनिया तो महात्मा गांधी भी थे , ये उनकी समझ थी कि उनके लिये देश की जनता का जमावडा अग्रेजो से लोहा लेने का हथियार था । मौजूदा सच तो पार्टी का कार्यक्त्ता  बनाकर वोट जुगाडना  ही है । तो फिर देश का कोई भी मुद्दा हो उसकी अहमियत किसी ऐसी कहानी के आगे कहां टिकेगी जिसमें किस्सागोई राग दरबारी से आगे का हो । प्रेमचंद के कफन पर मस्तराम की किताब हावी हो । और लोकतंत्र के राग का आदर्श  फिल्मी न्यूटन की ईमानदारी के आगे घुटने टेकते हुये नजर आये। और ऐलान हो जाये कि 2019 में पीएम उम्मीदवार न्यूटन होगा  अगर वह आस्कार जीत जाये तो । या फिर हनीप्रीत होगी जिसे भारत की पुलिस के सुरक्षाकर्मी खोज नहीं पाये । यानी लोकप्रीय होना ही अगर देश संभालने का पैमाना हो तो लोकप्रियता का पैमाना तो कुछ भी हो सकता है ।  जिसकी लोकप्रियता होगी । जिसे सबसे ज्यादा दर्शक देखाना चाहता होंगे वही देश चलायेंगे। क्या हालात वाकई ऐसे हैं ? सोचियेगा जरुर।

प्रधानमंत्री जी तब गंगा मां ने बुलाया था, अब बेटियां बुला रही हैं

दखल की दुनिया - Sat, 23/09/2017 - 14:56
चन्द्रिका
(मूलरूप से द वायरहिंदी में प्रकाशित)

तब वे प्रधानमंत्री नहीं थे. तबहर-हरमोदी थे. घर-घर मोदी बन रहे थे. जबउन्हें गंगा मां ने बुलाया था. वैसेनदी किसी को नहीं बुलाती. कभी-कभी बाढ़ को बुलाती है नदी. ऐसाकहते हैं कवि.
बाढ़ अपने आसपास को उपजाऊ करती है. परवह बहुत कुछ तबाही भी भरती है. जहांतक पहुंच होती है बाढ़ की तबाही वहां तक पहुंचती है.जैसा उन्हें नदी ने बुलाया, गंगाने बुलाया, वेदेश में बाढ़ की तरह आए. पूरेदेश में तबाही की तरह छाए. अब जब फिर से पहुंचे हैं उसी शहर. प्रधानमंत्रीबनकर. उन्हेंकिस बात का है डर. मांनहीं इस बार बेटियां बुला रही हैं. गुजरनाथा उन्हें उसी रास्ते से. जहांसे उन्हें गुजरना था. जहांहजारों उन्ही बेटियों का प्रदर्शन और धरना था. जिन्हें पढ़ाने और बचाने के नारे उन्होंने गढ़े हैं. वेनारे जिससे उनके विज्ञापन भरे हैं. उन्हींबेटियों के रास्ते से गुजरना था. यूंरास्ता तो नहीं बदलना था. परउनका रास्ता बदल दिया गया. ताकि यह कायम रहे कि सब कुछ ठीक चल रहा है और देश बदल रहा है. यहबात उन तक पहुंचे. रास्ताबदल रहा है यह बात उन तक न पहुंचे. क्यों बदल रहा है रास्ता इसकी वजह भी न पहुंचे. बनारस हिंदू युनिवर्सिटी में वर्षों से चले आ रहेलड़कियों के उत्पीड़न पर यह छात्राओं द्वारा शायद पहला इतना बड़ा प्रतिरोध है. जबवे इतनी भारी तादात में बाहर निकल कर आई हैं. जहांउन्हें हर रोज 7 बजेहॉस्टल के भीतर बंद कर दिया जाता था. वे हास्टल और हास्टल के बाहर की चहरदीवारी को लांघ कर सड़क पर आ गईहैं. वेकुलपति को हटाने के नारे लगा रही हैं. वेअपने विश्वविद्यालय में अपनी असुरक्षा को जता रही हैं. एक छात्रा के साथ हुई छेड़खानी से उठा यह मामला सरकार के जुमले पर एक बैनर लगा रहा है. बेटीबचाओ, बेटीपढ़ाओ के आदेश को उन्होंने सवाल में बदल दिया है. बचेगीबेटी, तभीतो पढ़ेगी बेटी. उसकेआगे बैनर में जगह नहीं है नहीं तो वे यह भी लिख देती. बचेगीतो पढ़ेगी बेटी, नहींतो लड़ेगी बेटी! महानता और महामना दोनों को वर्षों से ढोने वाले विश्वविद्यालय पर ये लड़कियां थोड़ा स्याही लगा रही हैं. उसबड़े से बुर्ज नुमा गेट पर उन्होंने जो बैनर टांग दिया है, उसनेउसकी महानता और भव्यता को ढंक दिया है. आंड़े-तिरछे अक्षरों से लिखा हुआ यह पहला बैनर होगा जिसने उस सिंहद्वार पर लटक कर पूरे द्वार को ही लटका दिया है. ऐसा नहीं कि इस विश्वविद्यालय के इतिहास में विद्यार्थियों के आंदोलन नहीं रहे. बिद्यार्थियोंके आंदोलन रहे, छात्रोंके आंदोलन रहे. छात्राओंके आंदोलन नही रहे शायद. मैं वहां का छात्र रहा. जबतक रहा यह सुनता रहा कि पूरे कैम्पस में धारा 144 लागूहै. एकपढ़ाई की जगह जैसे एक दंगा और लड़ाई की जगह हो. जहां 144 लगा दिया गया हो हर वक्त के लिए. जहां अपने हॉस्टल के कमरे में कविताओं के पोस्टर पर प्रतिबंध हो. जहांकिसी भी तरह की विचार गोष्ठी करने पर आप डरते हों. वहींप्रशासन की मदद से कुछ लोग आर.एस.एस. कीशाखा करते हों. ऐसे विश्वविद्यालय में आवाज़ उठाना उनका निशाना बनना है. उनकानिशाना बनना जो इस विश्वविद्यालय को हिन्दुओं का विश्वविद्यालय मानते हैं. उनकीसंख्या यहां बहुतायत है. वे परंपरा की दुहाई देते हैं और सामंती घरों की तरह लड़कियों को शाम 7 बजेतक हॉस्टल की छतों के नीचे ढंक देते हैं. वेहास्टल से बाहर नहीं जा सकती. सिर्फदिन में उन्हें पढ़ने जाने की छूट है. दिन में भी उनके चलने के रास्ते तय हैं. वेउधर से नहीं जाती जिधर से छात्रों के हास्टल हैं. उनपर तंज कसे जाते रहे हैं. उनकेसाथ बदसुलूकी होती रही है. इसलिएउन्होंने रास्ते बदल लिए हैं. उन्होंने अपने रास्ते बना लिए हैं. चुपहोकर चलने के रास्ते. येब्वायज हास्टलों के किनारे से होकर नहीं गुजरते. यहहिन्दू विश्वविद्यालय होने की पहचान है. यहइसकी नीव है जिसने इस परंपरा को विकसित किया है. शिक्षा में यह एक अछूत बर्ताव है जो हिन्दू विश्वविद्यालय में इस तरह था. जहांग्रेजुएट स्तर पर भी लड़कों और लड़कियों की अलग-अलगकक्षाएं बनाई गई हैं. लड़कियोंके लिए अलग हास्टल हैं पर लड़कियों के कालेज भी अलग हैं. उनके बीच कोई इंट्रैक्शन नहीं है. नही उनके बीच कोई संवाद है. इसीबीच की खाली जगह ने वह संस्कृति पैदा की है जो अश्लील व छेड़खानीके संवाद से भरती है. विश्वविद्यालय के लिए ये दोनों अलग-अलगजीव हैं जिन्हें अलग-अलगरखना है. सीखऔर समझ की उम्र में जब किसी को एक पूरी आबादी के सारे अनुभवों से दूर कर दिया जाता है तो पुरुष वर्चस्व अपने तरह से काम करता है. वह एक महिला के डर, उसकेपढ़ने के हक़ के बजाए उस वस्तु के रूप में ही देखता है जो वह देर रात देखी जाने वाली फिल्म से अनुभव करता है. वहउसके लिए एक साथी नही बन पाती. प्रशासनउसे उसका साथी नहीं बनने देता. इसपूरे स्वरूप को समझने की जरूरत है.       जो लड़कियां आंदोलन कर रही हैं. उनकीजो मांगे हैं वे बहुत कच्ची हैं. परउनके सड़क पर आने का इरादा जरूर पक्का है. वेसीसीटीवी कैमरे मांग रही हैं. वेएक तकनीकी देखरेख की मांग कर रही हैं. वे और ज्यादा सुरक्षा गार्ड बढ़ाए जाने की मांग कर रही हैं. जबकिकोई कैमरा कोई गार्ड महिलाओं के उत्पीड़न को नहीं रोक सकता. उन्हेंहर वक्त घूरे जाने वाली आंखें, उन्हेंहर वक्त बोले जाने वाले शब्द जिसे कोई कैमरा नहीं कैद कर सकता. जिसे कोई गार्ड नहीं सुन सकता. वहीसुन सकती हैं. वेसुनती भी हैं. यहउस संस्कृति की आवाज है जो उन्हें देवी बताता है. जोबेटी बचाता है. जोबेटी पढ़ाता है. जोभेद को बरकरार रखता है. महिला होने और पुरुष होने के हक़ को अलग-अलगतरह से देखता है. उन्हेंएक-दूसरेसे दूर रखता है. एकदूसरे से अनभिज्ञ बनाता है. सवालउठाने पर वह लांछन लगाता है. सवालउठाने पर वह उनके साथ खड़ा हो जाता है जिनके वर्चस्व बने हुए हैं.
इसलिए जो लड़कियां आज निकल आई हैं. जोआज रात सड़क पर सोई हैं. जिनमेंसड़क पर सोने और हांथ में मुट्ठी होने का पहला एहसास आया है. वेबहुत कुछ भले न करदें पर कुछ न कुछतो कर ही गुजरेंगी. अपनेवक्त को ऐसे नहीं गुजर जाने देंगी. 

चरित्रहीन परिवेश की कहानियां: स्वयं प्रकाश

लेखक मंच - Sat, 23/09/2017 - 12:07

नई दिल्ली: हमारे चरित्रहीन समय में बड़े चरित्रों का बनना बंद हो गया है इसलिए परिवेश ने अब चरित्रों का स्थान ले लिया है। ‘छबीला रंगबाज का शहर’ में ऐसे ही चरित्रहीन परिवेश की कहानियां हैं, जहाँ कथाकार वास्तविक पात्रों की काल्पनिक कहानियां दिखा रहा है। सुप्रसिद्ध कथाकार स्वयं प्रकाश ने साहित्य अकादेमी सभागार में 16 सि‍तंबर को युवा कथाकार प्रवीण कुमार के पहले कहानी संग्रह ‘छबीला रंगबाज का शहर’ का लोकार्पण करते हुए कहा कि आजकल कहानीकारों की उम्र कम होने लगी है। ऐसे में नए कहानीकार के लिए सबसे जरूरी शुभकामना यही होगी कि हम उनसे लम्बी सक्रियता की अपेक्षा करें।

युवा आलोचक संजीव कुमार ने ‘छबीला रंगबाज का शहर’ को यथार्थ के गढ़े जाने का पूरा कारोबार बताने वाला संग्रह बताया। उन्होंने कहा कि खबरों के निर्माण की कार्यशाला का हिस्सा हो जाने की इन कहानियों को पढ़ना विचलित करने वाला अनुभव है, जहाँ नए ढंग से कहन की वापसी हो रही है। संजीव कुमार ने कहा कि संयोग से वे इन कहानियों की रचना प्रक्रिया के भी साक्षी रहे हैं। ‘छबीला रंगबाज का शहर’ का एक वाक्य ‘हर जगह यही हो रहा है’ वस्तुत: आरा शहर ही नहीं, हमारे समूचे परिदृश्य की बात कहता है।

विख्यात पत्रकार और ‘जनसत्ता’ के पूर्व सम्पादक ओम थानवी ने प्रवीण कुमार की कहानियों की रचना शैली में नाटकीय तत्वों की प्रशंसा करते हुए कहा कि ये ऐसी कहानियां हैं, जहाँ चीज़ें मजे-मजे में बताई जा रही हैं, लेकिन कहने का ढंग अलहदा है। कहानी का यह नया ढांचा है, जहाँ यथार्थ वास्तव में ‘उघाड़ा’ हो रहा है।

प्रसिद्ध आलोचक और दिल्ली विश्वविद्यालय के पूर्व सम कुलपति प्रोफेसर सुधीश पचौरी ने कहा कि प्रवीण कुमार की कहानियाँ विकास की आड़ में हो रही लूटखोरी को दिखाती हैं और विराट लुम्पेनाइजेशन का नया पाठ प्रस्तुत करती हैं। उन्‍होंने लुम्पेनाइजेशन को कहानी का विषय बनाकर बिल्कुल नए ढंग से लिखने के लिए प्रवीण कुमार को बधाई देते हुए कहा कि जिस प्रसन्न गद्य में वे लिखते हैं, वह सचमुच ‘रीडरली टेक्स्ट’ कहा जाएगा। उन्होंने कहा कि ‘छबीला रंगबाज का शहर’ में कथाकार विडम्बनामूलकता को नष्ट करते चले हैं और यही बात उन्हें सिविल सोसायटी का पक्षधर बनाती है।

इससे पहले संयोजन कर रही डॉ उमा राग ने अतिथियों का परिचय दिया और कथाकार प्रवीण कुमार ने ‘छबीला रंगबाज का शहर’ संग्रह के कुछ अंशों का पाठ कि‍या। संग्रह के प्रकाशक राजपाल एण्ड सन्ज़ की तरफ से मीरा जौहरी ने आभार प्रदर्शन करते हुए कहा कि नयी रचनाशीलता के लिए हिंदी का सबसे पुराना  प्रतिष्ठित प्रकाशन सदैव स्वागत करता है।

आयोजन में विचारक प्रो अपूर्वानंद, कवि अनामिका, कथाकार प्रियदर्शन, पाखी सम्पादक प्रेम भारद्वाज, बनास जन के सम्पादक पल्लव, हिन्दू कालेज के आचार्य डॉ रामेश्वर राय, डॉ रचना सिंह, डॉ मुन्ना कुमार पांडेय, डॉ अमितेश कुमार, डॉ नीरज कुमार सहित बड़ी संख्या में विद्यार्थी और युवा पाठक उपस्थित थे।

प्रस्‍तुति‍: प्रणव जौहरी

हिंदी के विकास के लिए उसको बच्चों की भाषा बनाना बहुत ही ज़रूरी है

जंतर-मंतर - Sat, 23/09/2017 - 10:09
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शेष नारायण सिंह
इस साल का हिंदी दिवस और सरकारी दफ्तरों का हिन्दी पखवाड़ा बीत गया .  नई दिल्ली के सरकारी दफ्तरों में खूब आना जाना हुआ. हर जगह हिंदी पखवाडा का बैनर लगा था. लेकिन वहां काम करने वालों से बात करने पर वही हिंदी सुनने को मिली जिसको दिल्ली के एक प्रतिष्ठित हिंदी अखबार ने असली हिंदी बताने का बीड़ा उठा रखा है . हिंदी पखवाड़े के दौरान नज़र आई एक भाषाई बानगी ," यू नो, आई वेरी मच लाइक हिंदी लैंग्वेज। मैं हिंदी बोलने वालों को एप्रिसिएट करता हूँ।"  इस हिंदी को हिंदी भाषा के विकास का संकेत मानने  वाले वास्तव में भाषा की हत्या कर रहे हैं . सच्ची बात यह है कि इस  तरह की भाषा का  इस्तेमाल करके वे लोग अपनी धरोहर और भावी  पीढ़ियों के विकास पर ज़बरदस्त हमला कर रहे हैं . ऐसे लोगों की चलते ही बहुत बड़े पैमाने पर भाषा का भ्रम फैला हुआ  है.  आम धारणा फैला  दी गयी है कि भाषा सम्प्रेषण और संवाद का ही माध्यम है . इसका अर्थ यह हुआ कि यदि भाषा दो व्यक्तियों या समूहों के बीच संवाद स्थापित कर सकती है और जो कहा जा  रहा है उसको समूह समझ रहा है जिसको संबोधित किया जा रहा है तो भाषा का काम हो गया . लोग कहते  हैं कि भाषा का यही काम है  लेकिन यह बात सच्चाई से बिलकुल परे है . यदि भाषा केवल बोलने और समझने की  सीमा तक सीमित कर दी गयी तो पढने और लिखने का काम कौन करेगा . भाषा को यदि  लिखने के काम से मुक्त कर दिया गया तो   ज्ञान को आगे कैसे बढ़ाया जाएगा . भाषा को जीवित रखने के लिए पढ़ना भी बहुत ज़रूरी है क्योंकि श्रुति और स्मृति का युग अब नहीं है . भाषा  सम्प्रेषण का माध्यम है लेकिन वह धरोहर और मेधा की वाहक भी  है .  इसलिए भाषा को बोलने ,समझने, लिखने और पढने की मर्यादा में ही रखना ठीक रहेगा . यह  भाषा की प्रगति और   सम्मान के लिए सबसे आवश्यक शर्त है . भाषा के लिए समझना और बोलना सबसे छोटी भूमिका है .  जब तक उसको पढ़ा  और लिखा नहीं जाएगा तब तक वह  भाषा  कहलाने की अधिकारी ही नहीं होगी. वह केवल बोली होकर रह जायेगी .  यह बातें सभी भाषाओं के लिए सही है  लेकिन हिंदी भाषा  के लिए ज्यादा सही  है. आज जिस तरह का विमर्श हिन्दी के बारे में देखा जा रहा है वह हिंदी के संकट की शुरुआत का संकेत माना जा सकता है. हिंदी  में अंग्रेज़ी शब्दों को डालकर उसको  भाषा के विकास की बात करना  अपनी हीनता को स्वीकार करना  है . हिंदी को एक वैज्ञानिक सोच की भाषा और सांस्कृतिक थाती  की वाहक बनाने के लिए अथक प्रयास कर रहे  भाषाविद, राहुल देव   का कहना  है  कि, "हिंदी  समाज वास्तव में एक आत्मलज्जित समाज है . उसको अपने आपको हिंदी वाला कहने में शर्म आती है  . वास्तव में अपने को दीन मानकर ,अपने दैन्य को छुपाने के लिए वह अपनी हिंदी में अंग्रेज़ी  शब्दों को ठूंसता है " इसी तर्क के आधार पर हिंदी की वर्तमान स्थिति को समझने का प्रयास किया  जाएगा.
 हिंदी के बारे में एक और भाषाभ्रम भी बहुत बड़े स्तर पर प्रचलित है .  कहा जाता है कि भारत में टेलिविज़न और सिनेमा  पूरे देश में हिंदी का विकास कर रहा है . इतना ही नहीं इन  माध्यमों के  कारण विदेशों में भी  हिंदी का विस्तार हो रहा है. लेकिन इस तर्क में दो  समस्याएं हैं. एक तो यह कि सिनेमा टेलिविज़न की हिंदी भी वही वाली है जिसका उदाहरण ऊपर दिया गया है  और दूसरी  समस्या  यह है कि बोलने या समझने से किसी भाषा का  विकास नहीं हो सकता . उसको  लिखना और बोलना बहुत ज़रूरी है , उसके बिना फौरी तौर पर संवाद तो  हो जाता है लेकिन उसका कोई  स्वरुप तय नहीं होता.  टेलिविज़न और सिनेमा में पटकथा या संवाद लिखने वाले बहुत से ऐसे  लोग हैं  जो हिंदी की सही समझ रखते हैं लेकिन शायद उनकी कोई मजबूरी होती है  जो उल्टी सीधी भाषा लिख देते हैं . हो   सकता है कि उनके अभिनेता या निर्माता उनसे वही मांग करते हैं .  इन लेखकों को प्रयास करना चाहिए कि निर्माता निदेशकों को यह समझाएं कि यदि सही भाषा लिखी गयी तो भी बात और अच्छी हो जायेगी . यहाँ डॉ चन्द्र प्रकाश द्विवेदी  की फिल्मों का उदाहरण  दिया जा सकता  है जो भाषा के बारे में बहुत ही सजग रहते हैं. अमिताभ बच्चन की भाषा भी एक अच्छा उदाहरण है .  सिनेमा के संवादों में उनकी हिंदी को सुनकर भाषा की क्षमता का अनुमान लगता  है .सही हिंदी बोलना असंभव नहीं है ,बहुत आसान  है. अधिकतर सिनेमा कलाकार निजी बातचीत में अंग्रेज़ी बोलते पाए जाते हैं जबकि उनके रोजी रोटी का साधन  हिंदी सिनेमा ही है. पिछले दिनों एक टेलिविज़न कार्यक्रम में फिल्म अभिनेत्री कंगना रनौट की भाषा सुनने का अवसर मिला , जिस तरह से उन्होंने हिंदी शब्दों और मुहावरों का प्रयोग किया ,उसको टेलिविज़न और  सिनेमा वालों को  उदाहरण के रूप में प्रयोग करना चाहिए .  एक अन्य अभिनेत्री स्वरा भास्कर भी बहुत अच्छी भाषा बोलते देखी और सुनी गयी हैं . . डॉ  राही मासूम  रज़ा ने टेलिविज़न और सिनेमा के माध्यम से सही हिंदी को पूरी दुनिया में  पंहुचाने  का जो काम किया है ,उस पर किसी भी भारतीय को गर्व हो सकता  है. कुछ दशक पहले  टेलिविज़न पर दिखाए गए उनके धारावाहिक , ' महाभारत ' के संवाद  हमारी भाषाई धरोहार का हिस्सा बन चुके हैं.  टेलिविज़न बहुत बड़ा माध्यम है , बहुत बड़ा उद्योग है . उसका समाज की भाषा चेतना पर बड़ा असर पड़ता है . लेकिन सही भाषा बोलने वालों की गिनती उँगलियों पर की जा सकती है .दुर्भाग्य की बात यह है कि  आज इस माध्यम के कारण  ही बच्चों के  भाषा संस्कार बिगड़ रहे  हैं. छतीसगढ़ हिंदी साहित्य सम्मलेन के  अध्यक्ष ललित सुरजन का कहना है  कि " टेलिविज़न वालों से उम्मीद की जाती है कि वह भाषा को परिमार्जित करे और  भाषा का संस्कार देंगे लेकिन वे तो भाषा  को बिगाड़ रहे  हैं . हिंदी के अधिकतर टेलिविज़न चैनल  हिंदी और अन्य भाषाओं में विग्रह पैदा कर  रहे  हैं. हिंदी के अखबार भी हिंदी को बर्बाद कर रहे हैं  . यह  आवश्यक है कि औपचारिक मंचों से सही हिंदी बोली जाए अन्यथा हिंदी को बोली के स्तर तक सीमित कर दिया जाएगा ".आज टेलिविज़न की कृपा से छोटे बच्चों की भाषा का  प्रदूषण हो रहा है .बच्चे  सोचते  हैं कि जो भाषा टीवी पर सुनायी पड़  रही है ,वही हिंदी है .माता पिता भी अंग्रेज़ी ही बोलने के लिए प्रोत्साहित करते हैं क्योंकि स्कूलों का दबाव रहता है . देखा गया है कि बच्चों की पहली भाषा तो अंग्रेज़ी हो ही चुकी है .बहुत भारी फीस लेने वाले स्कूलों में  अंग्रेज़ी बोलना अनिवार्य है . अपनी भाषा में बोलने वाले बच्चों को दण्डित किया जाता है. एक महंगे स्कूल  के हिंदी समर्थक मालिकों की बातचीत के एक अंश पर ध्यान देना ज़रूरी  है ." हम अपनी ही कंट्री में हिंदी को सपोर्ट नहीं करेंगे, तो और कौन करेगा ? मैंने अपने स्कूल में हिंदी बोलने वालों पर सिर्फ हंड्रेड रुपीज़ फाइन का प्रोविजन रखा है, अदरवाइज दूसरे स्कूल टू हंड्रेड रुपीज़ फाइन करते हैं। "   यह दिल्ली के किसी स्कूल की बातचीत   है . देश के  अन्य क्षेत्रों में भी यही दुर्दशा होगी.  बच्चों की मुख्य भाषा अंग्रेज़ी हो जाने के संकट बहुत ही भयावह  हैं. साहित्य ,संगीत आदि की बात तो बाद में आयेगी ,अभी तो बड़ा संकट दादा-दादी, नाना-नानी से संवादहीनता की स्थिति   है. आपस में बच्चे अंग्रेज़ी में बात  करते हैं ,  स्कूल की भाषा अंग्रेज़ी हो ही चुकी है , उनके  माता पिता  भी आपस में और बच्चों से अंग्रेज़ी में बात करते हैं नतीजा यह होता है कि बच्चों को अपने  दादा-दादी से बात  करने के लिए हिंदी के शब्द तलाशने पड़ते हैं .  जिसके कारण संवाद में निश्चित रूप से कमी आती है  .यह स्पष्ट तरीके से नहीं दिखता लेकिन  बूढ़े लोगों को तकलीफ बहुत होती है. यह मेरा भोगा हुआ यथार्थ है . मेरे पौत्र  ने अपने स्कूल और अपने पड़ोस में रहने वाले अपने मित्रों से बहुत गर्व से  बताया था कि " माई  बाबा नोज़ इंगलिश ". यानी बच्चा अपने बाबा को अंग्रेज़ी का ज्ञाता बताकर वह अपने को या तो औरों से श्रेष्ठ बता रहा था या यह कि अपने दोस्तों को बता रहा था कि मेरे बाबा भी आप लोगों के बाबा की तरह ही जानकार  व्यक्ति हैं .शायद  उसके दोस्तों के बाबा दादी अंग्रेज़ी जानते होंगें .एक समाज के रूप में हमें  इस स्थिति को संभालना पडेगा . बंगला, तमिल, कन्नड़ , तेलुगु . मराठी आदि भाषाओं के इलाके में रहने वालों को  अपनी भाषा की श्रेष्ठता पर गर्व होता है. वे अपनी भाषा में कहीं भी बात करने में लज्जित  नहीं  महसूस करते लेकिन हिंदी में यह संकट  है .  इससे हमें  अपने  भाषाई संस्कारों को मुक्त करना  पडेगा.  अपनी भाषा को बोलकर श्रेष्ठता का अनुभव करना भाषा के  विकास  की बहुत ही ज़रूरी शर्त  है.  इसके लिए  पूरे प्रयास से हिंदी को रोज़मर्रा की भाषा , बच्चों की भाषा  और बाज़ार की भाषा बनाना बहुत ही ज़रूरी है . आज देश में  बड़े व्यापार की भाषा अंग्रेज़ी है , वहां उसका प्रयोग किया जाना चाहिए . हालांकि वहां भी अपनी मातृभाषा का प्रयोग किया जा सकता  था . चीन और जापान ने अपनी भाषाओं को ही बड़े  व्यापार का माध्यम बनाया और आज हमसे बेहतर आर्थिक विकास के उदाहरण बन चुके हैं . अंग्रेज़ी सीखना ज़रूरी है  तो वह  सीखी जानी चाहिए , उसका साहित्य पढ़ा जाना  चाहिए, अगर ज़रूरी है तो उसके माध्यम से वैज्ञानिक और जानकारी जुटाई जानी चाहिए लेकिन भाषा की श्रेष्ठता के लिए सतत प्रयत्नशील रहना चाहिए . भारतेंदु हरिश्चंद्र की बात   सनातन सत्य है कि ' निज भाषा उन्नति अहै सब उन्नति को मूल '. भाषा की चेतना से ही पारिवारिक जीवन को और सुखमय बनाया जा सकता  है . हमारी परम्परा की वाहक भाषा ही होती है . संस्कृति, साहित्य , संगीत सब कुछ भाषा के ज़रिये ही अभिव्यक्ति  पाता है ,इसलिए हिंदी भाषा को उसका गौरवशाली स्थान दिलाने के लिए हर स्तर से हर संभव प्रयास किया जाना चाहिए .

Beautiful moments- पति पत्नी के जोक्स का उल्टा पुल्टा रूप -39

Two versions of one joke- husband angel and wife angel. See the difference. Tell me, did you laugh equally?

Situation -1
I was mugged by a thief last night on my way home. Pointing a knife at me ... He asked me "your money or your life!"

I told him I was married... so I have no money and no life...

We hugged and cried together.

It was a beautiful moment...

अगर अपशब्दों के स्कूल में वे पास हो जाएंगे तो हमारा समाज फेल हो जाएगा

दखल की दुनिया - Fri, 22/09/2017 - 11:43
चन्द्रिकामूलरूप से द वायर में प्रकाशितसोसल मीडिया: आपराध को बढ़ावा देने वाले भी अपराधी हैं प्रधानमंत्री को अपशब्द कहना बुरा है. किसीको भी अपशब्द कहना बुरा है. तुलनाएंवैसे भी उतनी सटीक नहीं होती. चाहेगधे की इंसान से की जाए या इंसान की गधे से. गांलियांतो और भी ठीक नहीं होती. चाहेछोटी हों या बड़ी. समाजकी बुरी चीजें इनसे ठीक नहीं होती. बुराइंसान भी इससे ठीक नहीं होता. कोईमंत्री और प्रधान भी इससे ठीक नहीं होता. ऐसाकरने से उसकी विचारधाराएं भी ठीक नहीं होती. उन्हेंठीक करने की उलझन में हम ही बेठीक होने लगते हैं. वहीरास्ता अपना लेते हैं जिससे हमारा कोई वास्ता नहीं होना चाहिए था. ये प्रवृत्तियां लगातार बढ़ रही हैं और बढ़ाई जा रही हैं. क्योंकिशासन में आने से पहले जिस समझ को बीजेपी ने बनाया था. जिससमझ को बीजेपी ने बढ़ाया. समाजबहुत कम लौटा रहा है अभी उन्हें और बाकियों को भी. अभी बहुत कुछ बकाया है. अभीकितना कम तो लोगों ने चुकाया है. उन्मादजो भरा जा रहा है. हत्याओंतक के बाद जैसा-जैसाकहा जा रहा है. वहहमारी संवेदना और नैतिकता दोनों को कमजोर कर रहा है. वहहमारे समाज को आदमख़ोर कर रहा है.   भाजपा ने शासन में आने से पहले जो शुरू किया था कांग्रेस उसे अब आगे बढ़ा रही है. जैसेशासन में आने का रास्ता बना रही है. अबउनकी नकल कर रही है कांग्रेस. अकलकम लगा रही है. किधीरे-धीरेबीजेपी होने जा रही है, कांग्रेस. जब बीजेपी हो जाएगी कांग्रेस. बीजेपीकुछ और हो जाएगी. थोड़ा उससे बढ़कर जो वह थी अब तक. फिरलोगों को दो बीजेपी में से किसी एक को चुनना पड़ेगा. यहीविकल्प बचेगा. दोबुराईयों में से किसी एक को चुनना होगा. ज़्यादा नफ़रत और बड़ी गाली नहीं सुन सकते तो छोटी सुनना होगा. यहसब हमे अभ्यस्त बना देगा. हमइसके आदी हो जाएंगे. कुछभी सुनकर चौंकने की आदत आधी हो जाएगी. उन्माद की राजनीति समाज की आदत बदल देगी. हमेपता भी न चलेगाकि हम बदल गए. हमविकास कर गए या फिसल गए. बुलेटट्रेन से पहले बुलेट थ्योरी वे ला चुके हैं. बगैरकिसी घोषणा के वे दुष्प्रचार को प्रचार में बदल दे रहे हैं. बेबातको समाचार में बदल दे रहे हैं. इसबहाने वे अपने वादों से कहीं और निकल ले रहे हैं. सवाअरब से अधिक की आबादी वाला जो मुल्क है हमारा. जिसकासमाज एक बरस में दो-दोबार हप्ते भर गधे पर बहस कर रहा है. उसकाकितना कुछ तो मर रहा है. महंगाईसे वह खुद भी मर रहा है. परवह गधे पर बहस कर रहा है. उसनेगाय पर बहस की. उसनेमुर्गों पर बहस की. उसनेट्रोल और गुर्गों पर बहस की. उसकीबहस में वह गायब है जिन कारणों से वह खुद गायब हो रहा है. येबहसें कहां से आ रहीहैं? क्योंआ रहीहैं? कौनइन्हें बना रहा है? कौनकिसे सुना रहा है. इसेसमझने की जरूरत है.   सत्ता में आने से पहले यह बीजेपी का सफल आयोजन था. दुस्प्रचारका प्रचार करना. मनमोहनसिंह और सोनिया गांधी की तरह-तरहकी तस्वीरें बनाना. नैतिकताकी किसी भी लकीर को मिटाना. कांग्रेसीनेताओं को किसी और फ्रेम में लगाना. लोगोंका इन तस्वीरों पर हंसना-हंसाना. लोगों का इन तस्वीरों पर चिढ़ना-चिढ़ाना. जैसे को तैसा करना. ऐसेको वैसा करना. वेसफल हुए थे. दूसरेहार गए थे. जोसफल हुए हार वे भी गए हैं. किदुस्प्रचारों और अनैतिकताओं की जो गंदगी उन्होंने फैलाई है. वहउन्हीं की ज़िंदगी के आसपास बिखरी पड़ी है. उसकीठोकरें उन्हें भी लगनी हैं और लग रही हैं. जबकिउनकी सफलता के कारण सिर्फ दुष्प्रचार नहीं थे. पुरानीसरकार के अपने किए धरे भी थे. परदुष्प्रचार के प्रचार में वे सफल माने गए. सफल हो जाने के इस फार्मूले का कांग्रेस अब नकल कर रही है. इसनकल में और बेहतर प्रदर्शन के लिए और ज़्यादा गिरना होगा उसे. नैतिकतामें गिरने के लिए अगर बीजेपी ने थोड़ी भी जमीन नहीं छोड़ी है तो कांग्रेस को गड्ढे बनाकर गिरना होगा. ख़ामियोंको ठीक ढंग से न लापाने की नाकामी में चीजों को और विद्रूप करके दिखाना होगा. परेशानियोंऔर बदहालियों को किसी नफ़रत से ढंक देना होगा. बीजेपीकी नकल में बीजेपी हो जाना होगा या बीजेपी से कुछ और ज़्यादा. ऐसेमें अगर वे हार भी गए तो भी वे सफल होंगे जो नफरत के लिए मेहनत कर रहे थे. जोअभी भी नफरत के लिए मेहनत कर रहे हैं. जोविद्रूप ढंग से सारी नैतिकताओं को ताख़ पर धर रहे हैं.  नफ़रत का जो रजिस्टर है. वहांबहुत कम जगह बची है. उन्होंनेबहुत कम जगह बचने दी है. वहीउनके आंकड़ों का स्रोत है. वहीउनका वोट है. इसीमें वे लगातार आंकड़े भर रहे हैं. लोगगाय के नाम पर मर रहे हैं. लोगतेल के दाम पर चूं भी नहीं कर रहे हैं. एकअच्छे समाज के लिए जिस रजिस्टर को खाली होना चाहिए था. वहांमुसलमानों का ख़ून बिखरा पड़ा है. वहांउन सबका ख़ून बिखरा पड़ा है जो नफ़रत नहीं चाहते. जोअसहमति जताने का हक़ चाहते हैं. जोबोलने की आज़ादी चाहते हैं. जोसबके लिए मुल्क को उतना ही मानते हैं. जितनासरकारें जुल्म को मानती हैं.सबकी गरिमा मिट रही है. कुछ चिंतित हैं, कुछ मिटाने की चिंता में हैं. प्रधानमंत्री की गरिमा, मंत्रीकी गरिमा और संत्री की गरिमा के ख़याल उसी समाज से आएंगे. जिसे आप बनाएंगे. आने वाले प्रधानमंत्री की भी गरिमा बचेगी जब पुराने प्रधानमंत्री की गरिमा बचाएंगे. पदों की गरिमा चुनिंदा नहीं हो सकती. भक्ति चुनिंदा हो सकती है. सरकारें बदलने के साथ भक्त बदल जाएंगे और अपने-अपने प्रधानमंत्री की गरिमा बचाने के लिए चिल्लाएंगे. अपने नेताओं की गरिमा बचाने के लिए वे और नीचे गिर जाएंगे.   समाज की नैतिकताएं कमजोर हुई हैं. उन्हेंकमजोर किया गया है. क्योंकिइन्हीं कमजोरियों ने जाने कितनों को मजबूत किया हुआ है. वेमजबूत होने के लिए इन्हीं कमजोरियों को अपना रहे हैं. जबहम इसे और कमजोर करेंगे वे और गिरेंगे. वहींसमाज भी गिरेगा अपनी आदतों और समझदारियों के साथ. समाजके गिरने की जमीन को हमे बचाना चाहिए. अंधेरेमें घेरे जाने की मुहिम से हमे बचना चाहिए. बचनाउन्हें भी चाहिए जो फिलवक्त इसे बेंचने में लगे हैं.संघ के स्कूलों में एक नैतिक शिक्षा की किताब होती थी. शायदअब भी होती है. बीजेपीको उसे और छपवानी चाहिए और अपने भक्तों के बीच बंटवानी चाहिए. कांग्रेसको भी अपनी एक नैतिक शिक्षा की किताब बनानी चाहिए. अगरअपशब्दों और विद्रूपताओं और अनैतिकता के स्कूल में ये पास हो गए तो हमारा समाज फेल हो जाएगा. जय-हिन्द जो बोलते हैं उनके लिए भी यह मुल्क जेल हो जाएगा. 

बिगड़ी इकनॉमी, ढहता मनरेगा और बेरोजगारी में फंसा देश 2019 का चुनाव देख रहा है

सबसे बडी चुनौती इकनॉमी की है । और बिगडी इकनॉमी को कैसे नये आयाम दिये जाये जिससे राजनीतिक लाभ भी मिले अब नजर इसी बात को लेकर है । तो एक तरफ नीति आयोग देश के 100 पिछडे जिलों को चिन्हित करने में लग गया है तो दूसरी तरफ वित्त मंत्रालय इकनॉमी को पटरी पर लाने के लिये ब्लू प्रिंट तैयार कर रहा है । नीति आयोग के सामने चुनौती है कि 100 पिछड़े जिलों को चिन्हित कर खेती, पीने का पानी , हेल्थ सर्विस और शिक्षा को ठीक-ठाक कर राष्ट्रीय औसम के करीब लेकर आये तो वित्त मंत्रालय के ब्लू प्रिंट में विकास दर कैसे बढे और रोजगार कैसे पैदा हो। नजर इसी पर जा टिकी है। और इन सबके लिये मशक्कत उघोग क्षेत्र, निर्माण क्षेत्र , रियल स्टेट और खनन के क्षेत्र में होनी चाहिये इसे सभी मान रहे हैं। यानी चकाचौंध की लेकर जो भी लकीर साउथ-नार्थ ब्लाक से लेकर हर मंत्रालय में खिंची जा रही हो, उसके अक्स में अब सरकार को लगने लगा है कि प्रथामिकता इकनॉमी की रखनी होगी इसीलिये अर्थव्यवस्था में नई जान फूंकने के लिए एक ब्लूप्रिंट तैयार किया जा रहा है । जिससे जीडीपी में तेजी आये , रोजगार बढ़े। और बंटाधार हो चुके रियल इस्टेट और खनन क्षेत्र को पटरी पर लाया सके । लेकिन सवाल इतना भर नहीं । इक्नामिस्ट मनमोहन सिंह सत्ता में रहते हुये इकनॉमी को लेकर फेल मान लिये गये । और जनता की नब्ज को समझने वाले मोदी सत्ता संभालने के बाद इकनॉमी संबालने से जूझ रहे हैं। और देश का सच  ये है कि नेहरु ने 1960 में सौ पिछडे जिले चिन्हित किया । मोदी 2017 में 100 पिछडे जिलों के चिन्हित कर रहे हैं । 1960 से 1983 तक नौ कमेटियों ने सौ पिछड़े जिलों पर रिपोर्ट सौपी । कितना खर्च हुआ । या रिपोर्ट कितनी अमल में लायी गई ये तो दूर की गोटी है ।

सोचिये कि जो सवाल आजादी के बाद थे, वही सवाल 70 बरस बाद है । क्योकि जिन सौ जिलों को चिन्हित कर काम शुरु करने की तैयारी हो रही है उसमें कहा तो यही जा रहा है कि हर क्षेत्र में राष्ट्रीय औसत के समकक्ष 100 पिछडे जिलो को लाया जाये । लेकिन जरुरत  कितनी न्यूनतम है किसान की आय बढ जाये । पीने का साफ पानी मिलने लगे ।शिक्षा घर घर पहुंच जाये । हेल्थ सर्विस हर किसी को मुहैया हो जाये ।और इसके लिये तमाम मंत्रालयों या केन्द्र राज्य के घोषित बजट के अलावे प्रचार के लिये 1000 करोड़ देने की बात है । यानी हर जिले के हिस्से में 10 करोड । तो हो सकता है पीएम का अगला एलान देश में सौ पिछडे जिलों का शुरु हो जाये । यानी संघर्ष न्यूनतम का है । और सवाल चकाचौंध की उस इकनॉमी तले टटोला जा रहा है जहां देस का एक छोटा सा हिस्सा हर सुविधाओ से लैस हो । बाकि हिस्सों पर आंख कैसे मूंदी जा रही है ये मनरेगा के बिगडते हालात से भी समझा जा सकता है । क्योंकि मानिये या ना मानिये । लेकिन मनरेगा अब दफ्न होकर स्मारक बनने की दिशा में जाने लगा है । क्योकि 16 राज्यो की रिपोर्ट बताती है मनरेगा बजट बढते बढते चाहे 48 हजार करोड पार कर गया लेकिन रोजगार पाने वालो की तादाद में 7 लाख परिवारो की कमी आ गई । क्योंकि केंद्रीय ग्रामीण  विकास मंत्रालय की ही रिपोर्ट कहती है  कि 2013-14 में  पूरे 100 दिनों का रोजगार पाने वाले परिवारों की संख्या 46,59,347 थी,। जो साल 2016-17 में घटकर 39,91,169 रह गई । तो मुश्किल ये नहीं कि सात लाख परिवार जिन्हे काम नहीं मिला वह क्या कर रहे होंगे । मुश्किल दोहरी है , एक तरफ नोटबंदी के बाद मनरेगा मजदूरों में 30 फिसदी की बढोतरी हो गई । करीब 12 लाख परिवारों की तादाद बढ गई । दूसरी तरफ जिन 39 लाख परिवारों को काम मिला उनकी दिहाड़ी नही बढ़ी। आलम ये है कि इस वित्तीय वर्ष यानी अप्रैल 2017 के बाद से यूपी, बिहार,असम और उत्तराखंड में मनरेगा कामगारों की मजदूरी में सिर्फ एक रुपये की वृद्धि हुई । ओडिशा में यह मजदूरी दो रुपये और पश्चिम बंगाल में चार रुपये बढ़ाई गई ।

और दूसरी तरफ -बीते साल नवंबर से इस साल मार्च तक बिहार, छत्तीसगढ़, राजस्थान, झारखंड, पश्चिम बंगाल और ओडिशा में तो काम मांगने वालों की संख्या में 30 फीसदी तक बढ़ोतरी दर्ज हुई । तो मनरेगा का बजट  48000 करोड़ कर सरकार ने अपनी पीढ जरुर ठोकी । लेकिन हालात तो सुप्रीम कोर्ट के निर्देश को लागू ना करा पाने तक के है । एक तरफ 2014 में सुप्रीम कोर्ट ने कहा , मनरेगा की मजदूरी को राज्यों के न्यूनतम वेतन के बराबर लाया जाए ।  लेकिन इस महीने की शुरुआत में केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्रालय द्वारा गठित एक समिति ने मनरेगा के तहत दी जानी वाली मजदूरी को न्यूनतम वेतन के साथ जोड़ने को गैर-जरूरी करार दे दिया जबकि खुद समिति मानती है कि 17 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में मनरेगा की मजदूरी खेत मजदूरों को दी जाने वाली रकम से भी कम है। तो फिर पटरी से उतरते देश को राजनीति संभालेगी कैसे । और इसी लिये जिक्र युवाओ का हो रहा है । बेरोजगारी का हो रहा है । और ध्यान दीजिये राहुल के निशाने पर रोजगार का संकट है। पीएम मोदी के निशाने पर युवा भारत है। और दोनों की ही राजनीति का सच यही है कि देश में मौजूदा वक्त में सबसे ज्यादा युवा है । सबसे ज्यादा युवा बेरोजगार है। और अगर युवा ने तय कर लिया कि सियासत
की डोर किसके हाथ में होगी तो 2019 की राजनीति अभी से पंतग की हवा में उड़ने लगेगी । क्योकि 2014 के चुनाव में जितने वोट बीजेपी और काग्रेस दोनो को मिले थे अगर दोनों को जोड़ भी दिया जाये उससे ज्यादा युवाओ की तादाद मौजूद वक्त में है । मसलन 2011 के सेंसस के मुताबिक 18 से 35 बरस के युवाओ की तादाद 37,87,90,541 थी । जबकि बीजेपी और काग्रेस को कुल मिलाकर भी 28 करोड़ वोट नहीं मिले । मसलन 2014 के चुनाव में बीजेपी को 17,14,36,400 वोट मिले । तो कांग्रेस को 10,17,32,985 वोट मिले और देश का
सच ये है कि 2019 में पहली बार बोटर के तौर पर 18 बरस के युवाओ की तादाद 13,30,00,000 होगी यानी जो सवाल राहुल गांधी विदेश में बैठ कर उठा रहे हैं उसके पीछे का मर्म यही है कि 2014 के चुनाव में युवाओं की एक बडी तादाद कांग्रेस से खिसक गई थी । क्योकि दो करोड रोजगार देने का वादा हवा हवाई हो
गया था और याद किजिये तब बीजेपी ने अपने चुनावी घोषणा पत्र में रोजगार कामुद्दा ये कहकर उठाया था कि "कांग्रेस नेतृत्व वाली यूपीए सरकार बीते दस साल के दौरान कोई रोजगार पैदा नहीं कर सकी, जिससे देश का विकास बुरी तरह प्रभावित हुआ"। तो मोदी ने सत्ता में आने के लिये नंवबर  2013 को आगरा की  चुनावी रैली में पांच बरस में एक करोड रोजगार देने का वादा किया था । पर रोजगार का संकट किस तरह गहरा रहा है और हालात मनमोहन के दौर से भी बुरे हो जायेंगे ये जानते समझते हुये अब ये सवाल राहुल गांधी ,  मोदी  सरकार
को घेरने के लिये उठा रहे हैं । यानी मुश्किल ये नहीं कि बेरोजगारी बढ़ रही है संकट ये है कि रोजगार देने के नाम पर अगर युवाओं को 4 बरस पहले बीजेपी बहका रही थी और अब नजदीक आते 2019 को लेकर कांग्रेस वही सवाल उठा रही तो अगला सवाल यही है कि बिगडी इकनॉमी , मनरेगा का ढहना और  रोजगार संकट
सबसे बडा मुद्दा तो 2019 तक हो जायेगा लेकिन क्या वाकई कोई विजन किसी के पास है की हालात सुधर जाये  ।

दिल और सोच को छूने वाली हैं गौहर रज़ा की कवितायें : अनामिका

लेखक मंच - Wed, 20/09/2017 - 13:36

‘खामोशी’ का लोकार्पण करतीं शर्मिला टैगोर और अन्‍य अति‍थि‍गण।

नई दिल्ली : कवि और सुपरिचित फिल्मकार गौहर रज़ा की सद्य प्रकाशित नज़्म पुस्तक ‘खामोशी’ का लोकार्पण 9 सि‍तंबर को इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में हुआ। इसका लोकार्पण जानी-मानी अभिनेत्री शर्मिला टैगोर ने किया। इस अवसर पर हिंदी के प्रसिद्ध कवि अशोक वाजपेयी ने कहा कि कविता एक तरह की ज़िद है उम्मीद के लिए और हमें कृतज्ञ होना चाहिए की ऐसी कविता हमारे बीच और साथ में है। उन्होंने कहा कि कविता और राजनीति की कुंडली नहीं मिलती, लेकिन गौहर रज़ा अपनी कविता में जीवन के छोटे-बड़े सभी पहलुओं को जगह देते हैं। कवयि‍त्री  अनामिका ने कहा की गौहर रज़ा की कवितायेँ दिल और सोच को छूने वाली है। सिर्फ देश में ही नहीं, बल्कि विदेश में होने वाली घटनाओं पर भी उनकी कड़ी नज़र है।

शर्मीला टैगोर ने पुस्तक का विमोचन करते वक़्त कहा की गौहर बेबाकी के साथ और बिना डरे नज़्में लिखते हैं और अपना सख़्त से सख़्त वि‍रोध भी हमेशा खूबसूरत ज़बान में लिखते हैं। उन्होंने कहा की गौहर की नज़्में हमारे उस ख़्वाब का हिस्सा हैं, जो हमने आज़ादी के वक़्त देखा था। एक ऐसा समाज बनाने का ख़्वाब जहाँ ख्यालों की विविधता हो, जहाँ बोलने की आज़ादी हो, जहां अपनी तरह से जीने का अधिकार हो। ऐसे वक़्त में जब उम्मीद का दामन तंग लगने लगे, तब गौहर की नज्में हम सब की आवाज़ बन कर हमेशा सामने आयी हैं। शायर गौहर रज़ा ने समारोह में अपनी पुस्तक से कुछ चुनिंदा ग़ज़लें और नज़्में सुनाईं।

आयोजन में आलोचक अपूर्वानंद, कथाकार प्रियदर्शन, पत्रकार कुलदीप कुमार, कथाकार प्रेमपाल शर्मा, क़व्वाल ध्रुव संगारी, सामाजिक कार्यकर्ता शबनम हाशमी, हिन्दू कॉलेज की डॉ रचना सिंह सहित बड़ी संख्या में साहित्य प्रेमी, अध्यापक और लेखक उपस्थित थे।

चैनल खोये हैं हनीप्रीत में, देश परेशान है मन के मीत से

एक तरफ हनीप्रीत का जादू तो दूसरी तरफ मोदी सरकार की चकाचौंध । एक तरफ बिना जानकारी किस्सागोई । दूसरी तरफ सारे तथ्यो की मौजूदगी में खामोशी । एक तरफ हनीप्रीत को कटघरे तक घेरने के लिये लोकल पुलिस से लेकर गृहमंत्रालय तक सक्रिय । दूसरी तरफ इक्नामी को पटरी पर लाने के लिये पीएमओ सक्रिय । एक तरफ हनीप्रीत से निकले सवालो से जनता के कोई सरोकार नहीं । दूसरी तरफ सरकार के हर सवाल से  जनता के सरोकार । तो क्या पुलिस- प्रशासन, नौकरशाह-मंत्री और मीडिया की जरुरत बदल चुकी है या फिर वह भी डि-रेल है । क्योंकि देश की बेरोजगारी के सवाल पर हनीप्रीत का चरित्रहनन देखा-दिखाया जा रहा है । पेट्रोल की बढ़ती कीमतों पर हनीप्रीत के नेपाल में होने या ना होना भारी है । गिरती जीडीपी पर हनीप्रीत के रेपिस्ट गुरमीत के संबध मायने रखने लगे हैं। 10 लाख करोड पार कर चुके एनपीए की लूट पर डेरा की अरबो की संपत्ति की चकाचौंध भारी हो चली है । नेपाल में हनीप्रीत का होना नेपाल तक चीन का राजमार्ग बनाना मायने नहीं रख रहा है ।

जाहिर है ऐसे बहुतेरे सवाल किसी को भी परेशान कर सकते हैं कि आखिर जनता की जरुरतो से इतर हनीप्रीत सरीखी घटना पर गृमंत्रालय तक सक्रिय हो जाता है और चौबिस घंटे सातों दिन खबरों की दिशा में हनीप्रीत की चकाचौंध . हनीप्रीत की अश्लीलता । हनीप्रीत के चरित्र हनन में ही दुनिया के पायदान पर पिछडता देश क्यों रुचि ले रहा है । या उसकी रुची भी अलग अलग माध्यमो से तय की जा रही है । अगर बीते हफ्ते भर से हनीप्रीत से जुड़ी खबरों का विश्लेषण करें तो शब्दो के आसरे सिर्फ उसका रेप भर नहीं किया गया । बाकि सारे संबंधो से लेकर हनीप्रीत के शरीर के भीतर घुसकर न्यूजचैनलों के डेस्क पर बैठे कामगारों ने अपना हुनर बखूबी दिखाया । यूं एक सच ये भी है कि इस दौर में जो न्यूज चैनल हनीप्रीत की खबरो के माध्यय से जितना अश्लील हुआ उसकी टीआरपी उतनी ज्यादा हुई ।

तो क्या समाज बीमार हो चुका है या समाज को जानबूझकर बीमार किया जा रहा है । यूं ये सवाल कभी भी उठाया जा सकता था । लेकिन मौजूदा वक्त में ये सवाल इसलिये क्योंकि 'वैशाखनंदन '  की खुशी भी किसी से देखी नहीं जा रही है। यानी चैनलों के भीतर के हालात वैशाखनंदन से भी बूरे हो चले है क्योकि उन परिस्थितियों को हाशिये पर धकेल दिया जा रहा है जो 2014 का सच था । और वही सच कही 2019 में मुंह बाये खडा ना हो जाये , तो सच से आंखमिचौली करते हुये मीडियाकर्मी होने का सुरुर हर कोई पालना चाह रहा है । याद किजिये 2014 की इक्नामी का दौर जिसमें बहार लाने का दावा मोदी ने चुनाव से पहले कई-कई बार किया। लेकिन तीन साल बाद महंगाई से लेकर जीडीपी और रोजगार से लेकर एनपीए तक के मुद्दे अगर अर्थव्यवस्था को संकट में खड़ा कर रहे हैं तो चिंता पीएम को होना लाजिमी है। और अब जबकि 2019 के चुनाव में डेढ बरस का वक्त ही बचा है-सुस्त अर्थव्यवस्था मोदी की विकास की तमाम योजनाओं को पटरी से उतार सकती है। क्योकि 2014 में
इक्नामिस्ट मनमोहन सिंह भी फेल नजर आ रहे थे । और अब ये सवाल मायने नही रखते कि , नोटबंदी हुई मगर 99 फीसदी नोट वापस बैंक आ गए । एनपीए 10 लाख करोड से ज्यादा हो गया । खुदरा-थोक मंहगाई दर बढ रही है ।  उत्पादन-निर्माण क्षेत्र की विकास दर तेजी से नीचे जा रही है । आर्थिक विकास दर घट रही है । क्रेडिट ग्रोथ साठ बरस के न्यूनतम स्तर पर है । यानी सवाल तो इक्नामी के उस वटवृक्ष का है-जिसकी हर डाली पर झूलता हर मुद्दा एक चुनौती की तरह सामने है। क्योंकि असमानता का आलम ये है कि दुनिया के सबसे ज्यादा भूखे लोग भारत में ही । यूएन की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में 19 करोड़ से ज्यादा लोग भुखे सोने को मजबूर हैं। सरकार की रिपोर्ट कहती है करोडपतियो की तादाद तेजी से बढ़ रही। दो फ्रांसीसी अर्थशास्त्रियों थोमा पिकेती और लुका सॉसेल का नया रिसर्च पेपर तो कहता है कि भारत में साल 1922 के बाद से असमानता की खाई सबसे ज्यादा गहरी हुई है ।

तो क्या हनीप्रीत सरीखे सवालों के जरिये मीडिया चाहे -अनचाहे या कहे अज्ञानवश उन हालातो को समाज में बना रहा है जहा देश का सच  राम रहिम से लेकर हनीप्रीत सरीखी खबरो में खप जाये । और सक्रिन पर अज्ञानता ही सबसे ज्यादा बौधिक क्षमता में तब्दिल अगर दिखायी देने लगें । तो ये महज खबरो को परोसने वाला थियेटर नहीं है बल्कि एक ऐसे वातावरण को बनाना है जिसमें चुनौतियां छुप जाये । क्योंकि अगर अर्थव्यवस्था पटरी से उतरी तो देश को जवाब देना मुश्किल होगा और उस वक्त सबकी नजरें सिर्फ एक बात टिक जाएंगी
कि क्या मोदी ब्रांड बड़ा है या आर्थिक मुद्दे। यानी चाहे अनचाहे मीडिया की भूमिका भी 2019 के लिये ऐसा वातावरण बना रही है जहां हनीप्रीत भी 2019 में चुनाव लड़ लें तो जीत जाये ।





मम्मी पापा क्या करते हैं? पति पत्नी के जोक्स का उल्टा पुल्टा रूप-38

स्कूल में दाखिले के समय

अध्यापिका ने पप्पू से पूछा-
" बेटा तुम्हारे पिता क्या करते हैं ?"

पप्पू- जो मम्मी बोलती हैं ।

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लेखक विषय संवाद साभार अनुवादक

पहले वो आए साम्यवादियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं साम्यवादी नहीं था

 

फिर वो आए मजदूर संघियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं मजदूर संघी नहीं था

 

फिर वो यहूदियों के लिए आए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं यहूदी नहीं था

 

फिर वो आए मेरे लिए

और तब तक बोलने के लिए कोई बचा ही नहीं था

 

मार्टिन नीमोलर (1892-1984)