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फांसी को हत्या माना जाना चाहिए

दखल की दुनिया - Thu, 20/04/2017 - 23:17
चन्द्रिका(मूल रूप से जागरण में प्रकाशित)जासूस समाज में कभी अच्छे मूल्य का शब्द नहीं बन पाया. कभी भी नहीं बन पाया. वह संदिग्ध रहा. घर से लेकर राष्ट्र तक. पर उसका होना बचा रहा. उसकी जरूरत बची रही. इसलिए यह राज्य के लिए एक गुप्तचर और वैध सी चीज बना रहा. आज भी बना हुआ है. जो जितने बड़े राष्ट्र हैं उनके पास उतने ज्यादा जासूस हैं. कहा यह भी जा सकता है कि उनकी जासूसी ने उन्हें बड़े राष्ट्र होने में मदद की है. किसी मुल्क की आंतरिक सूचनाएं जुटाना और उससे वाकिफ होना उस मुल्क को कमजोर बनाता है. इस दौर और पहले के दौर की बड़ी लड़ाईयां जासूसों की मजबूती और उनकी जासूसी कामयाबी से जीती गई हैं. इसलिए इस बात में कोई शक़ नहीं किया जाना चाहिए कि दो पड़ोसी मुल्क जिनकी सरकारों ने लगभग दुश्मनाना रिश्ता रखा हुआ है उनके जासूस एक दूसरे मुल्क में नहीं हैं या नहीं रहेंगे. वे रहेंगे, जब तक राज्य रहेगा. जब तक राज्य और राज्य के बीच लड़ाईयां रहेंगी. जब तक भेदों और भीतर की सूचनाओं को जानने की जरूरत रहेगी. वे जब गैर मुल्कों में पकड़े जाएंगे उनको सजाएं दी जाएंगी. इसकी परवाह किए बगैर दूसरे जासूस फिर तैयार किए जाएंगे. कुलभूषण जाधव के बाद कोई और जासूस होगा. क्योंकि कुलभूषण जाधव के पहले दसियों भारतीय जासूसों को पाकिस्तान में पकड़ा गया है. उन्हें सज़ा हुई है. कुछ को मौत की भी सज़ा सुनाई गई है. सज़ा सुनाने के बावजूद किसी को फांसी नहीं हुई है. उनमे से ज़्यादातर जेल में आजीवन कारावास काटते हुए मर गए हैं.फांसी की सजा उसे नहीं होनी चाहिए. यह बात सिर्फ कुलभूषण के लिए नहीं कही जानी चाहिए. बल्कि मौत की सज़ा लोकतंत्र में किसी को नहीं होनी चाहिए. यह बात यहां से शुरू की जानी चाहिए. किसी का जीवन लेने के बाद उसे वापस लाने का सामर्थ्य अगर मनुष्य और राज्य के पास नहीं है तो उसे जीवन लेने का अधिकार नहीं होना चाहिए. यह कानून इंसान में सुधार होने की गुंजाइश को ख़त्म करता है. एक कल्याणकारी और लोकतांत्रिक राज्य को हमेशा अपने इंसान में सुधार की उम्मीद रखनी ही पड़ती है. ऐसी बहुत सी दलीलें और भी हैं. दुनिया के ज्यादातर राष्ट्रों ने सज़ा-ए-मौत को प्रतिबंधित कर दिया है. इसलिए कुलभूषण की सज़ा-ए-मौत के खिलाफ हमे होना चाहिए. लेकिन उससे पहले हमे किसी भी अपराधी की मौत के ख़िलाफ होना चाहिए. पर मुल्कों के अपने कायदे हैं. भारत और पाकिस्तान दोनों सज़ा-ए-मौत के कानून को मानते हैं. इस आधार पर दोनों यह भी मानते हैं कि अपराधियों को सुधारा नहीं जा सकता उन्हें खत्म करना ही एक मात्र उपाय है. एक मात्र उपाय तानाशाही के अलावा और कहीं नहीं हो सकता. जबकि हमारी सरकार यह कह रही है कि अगर जाधव को सज़ा दी गई तो वह उसे हत्या मानेगी. हमे इसे किस रूप में देखना चाहिए. जो सरकार अपने राज्य के कानून में हत्या करने का प्रावधान रखती है उसे किसी भी मुल्क में अपराधी को हत्या की सज़ा देने से रोकने का हक़ तबतक नहीं बनता जबतक वह अपने कानून से हत्या और मौत को ख़ारिज न कर दे. जबकि इसको लेकर दोनों मुल्कों की सरकारों के एक मत हैं. अपराध के बदले हत्या पर वे दोनों सहमत हैं. हत्या के बदले हत्या एक लोकतांत्रिक कानून नही हो सकता. यह एक मध्य-युगीन मूल्य है. जिसे लोकतंत्र के ढांचे में नहीं होना चाहिए. कुलभूषण के जासूस होने और संगीन अपराधों में शामिल होने का पाकिस्तान दवा कर रहा है. वह दावा कर रहा है कि कुलभूषण के पास उसके दो पासपोर्ट थे. एक उसके अपने नाम से और एक किसी मुस्लिम नाम से. वह दावा कर रहा है कि उसके पास कई हमले कराने में कुलभूषण का हाथ होने के सुबूत हैं. उसका दावा है कि जिस कोर्ट में सज़ा हुई है वहां तीस दिन के भीतर फैसले का प्रावधान है पर उसने एक बरस से ज़्यादा वक्त लेकर इसकी जांच की है. वह ढेर सारे सबूत देने के लिए तैयार है. सारी जांच पड़ताल के बावजूद, अपराध होने के बावजूद सज़ा-ए-मौत को खारिज किया जाना चाहिए. अगर कुलभूषण को सज़ा दी जाती है तो इसे हत्या माना जाना चाहिए. पर भारत सरकार के दोहरे चरित्र की वजह से नहीं. राष्ट्रप्रेम की वजह से नहीं. इसे हत्या मानने के कारण और हैं. इस हत्या के ज़िम्मेदार वे सब होंगे जो नागरिक अधिकारों के ख़िलाफ हैं. जो मानवाधिकारों के ख़िलाफ हैं. जो हर घटना के बाद सड़कों पर उन्मादी भीड़ की तरह निकल आते हैं और फांसी पर लटका देने की मांग करते हैं. वही अपने दोहरे चरित्र को दिखाते हुए इसे रोकने की बात कर रहे हैं. उन्हें अपने विचारों का आकलन करना चाहिए. पाकिस्तान का जासूस यदि भारत के लिए आतंकवादी है तो भारत का जासूस पकिस्तान के लिए आतंकवादी ही होगा. अतंकवाद और देशभक्ति किसी भी राष्ट्र के लिए एक सापेक्ष चीज है. एक उन्मादी भीड़ है पाकिस्तान में भी. एक उन्मादी भीड़ है हिन्दुस्तान में भी. लंबे वक्त में राज्य और सरकारों के द्वारा पैदा की गई दुश्मनी ने ही इस भीड़ को भी पैदा किया है. यह हिन्दुस्तान की वही भीड़ जो पाकिस्तान का जासूस कहकर 2015 में कानपुर में एक आदमी की हत्या कर देती है. वही भीड़ जो वकीलों के भेष में यह फैसला करती है कि आतंकवाद के आरोपी का कोई केस नहीं लड़ेगा. वही भीड़ जो कोर्ट परिसर में जे.एन.यू. के कन्हैया कुमार पर हमला करती है. वही भीड़ जो आलोचकों को पाकिस्तान भेजने के लिए उतावली रहती है. वैसी ही भीड़ पाकिस्तान के वकीलों में भी है. जिसने कुलभूषण के केस को न लड़ने का एलान किया है. यहां की भी बार काउंसिल ने ऐसे कई फैसले लिए हैं. हमारे लिए यह चिंता का विषय होना चाहिए कि जो हम खुद नही कर पाते उसकी अपेक्षा दूसरों से कैसे करें. नफरत के जो बीज राज्य बोता है. उसकी फसल हमारे यहां ही क्यों तैयार होगी. वह दोनों मुल्कों में बराबर तैयार की जाती रही है. जब तक इस नफरत को बोने के कारण को हम नहीं समझेंगे. हम विचार के आधार पर अपने फैसले नहीं लेंगे. हमारे फैसले उन्माद और अवसरपरस्त होंगे. हम कुलभूषण को बचा भी लें तो इंसान के बतौर जो एक आरोपी या फिर अपराधी का हक़ है उसे खो देंगे.    

शिक्षा: कितना सर्जन, कितना विसर्जन : अनुपम मिश्र

लेखक मंच - Thu, 20/04/2017 - 02:07

अनुपम मि‍श्र

सेंट्रल इंस्‍टीट्यूट ऑफ एजूकेशन के 67वें स्थापन दि‍वस के अवसर पर 19 दि‍संबर 2014 को दि‍या गया अनुपम मि‍श्र का भाषण-

कोई एक सौ पचासी बरस पहले की बात है। सन् 1829 की। कोलकाता के शोभाबाजार नाम की एक जगह में एक पाठशाला की, स्कूल की स्थापना हुई थी। यह स्कूल बहुत विशिष्ट था। इसकी विशिष्टता आज एक विशेष व्यक्ति से ही सुनें हम। विनोबा इस स्कूल में 21 जून सन् 1963 में गए थे। उन्होंने यहां शिक्षा को लेकर एक सुन्दर बात-चीत की थी। उसके कुछ हिस्से हम आज यहाँ दुहरा लें और फिर आगे की बात-चीत इसी किस्से से बढ़ सकेगी।

विनोबा कहते हैं कि इस स्कूल से कई महान विद्यार्थी निकले हैं। इनमें पहला स्थान शायद रवीन्द्रनाथ का है। उनकी स्मृति में इस स्कूल में एक शिलापट्ट भी लगाया गया है। स्कूल इस पट्ट में बहुत गौरव से बताता है कि यहाँ रवीन्द्रनाथ पढ़ते थे। यह बात अलग है कि उस समय रवीन्द्रनाथ को भी मालूम नहीं था कि वे ही ‘रवीन्द्रनाथ’ हैं। और न स्कूल वालों को, उनके संचालकों को मालूम था कि वे आगे चल कर ‘रवीन्द्रनाथ’ होंगे।

यह स्कूल गुरुदेव का आदरपूर्वक स्मरण करता है। लेकिन गुरुदेव भी उस स्कूल का वैसे ही आदर के साथ स्मरण करते हों- इसका कोई ठीक प्रमाण मिलता नहीं। हाँ, एक जगह उन्होंने यह जरूर लिखा है कि, मैं पाठशाला के कारावास से मुक्त हुआ, स्कूल छोड़कर चला गया। यानी इस स्कूल में उनका मन लगा नहीं। चित्त नहीं लगा। पर स्कूल वालों ने तो अपना चित्त उन पर लगा ही दिया था।

विनोबा फिर इस प्रसंग को स्कूल से बिलकुल अलग एक और संस्था से जोड़ते हैं। स्कूल संस्था है गुणों के सर्जन की तो यह दूसरी संस्था है दुर्गुणों के विसर्जन की। जीवन में कुछ भयानक गलतियाँ, भूले हो जाएँ तो ऐसा माना जाता है कि उन भूलों को, गलतियों को मिटाने का काम इस संस्था में होता है। यह संस्था है कारावास, जेल। इसमें सामान्य अपराधियों के अलावा सरकारें, सत्ताएँ, तानाशाह आदि कई बार ऐसे लोगों को भी जेल के भीतर रखते हैं, जो उस दौर की सत्ता के हिसाब से कुछ गलत काम करते माने जाते हैं। पर बाद में तो समाज उन्हें अपने मन में एक बड़ा दर्जा दे देता है।

विनोबा कहते हैं कि जिस किसी कारावास में बड़े-बड़े लोग बन्दी बनाकर रखे जाते हैं, बाद में उन लोगों के नाम भी वहाँ एक पत्थर पर, एक बोर्ड पर लिख दिए जाते हैं। वे यहाँ थे- इस पर कारावास को बड़ा गौरव का अनुभव होता है और वह उसे अब सार्वजनिक भी कर देना चाहता है।

नैनी जेल में नेहरूजी, यरवदा जेल में गाँधीजी और मंडाले में लोकमान्य तिलक और साउथ अफ्रीका की ऐसी ही किसी जेल में नेल्सन मंडेला का नाम पत्थर पर उत्कीर्ण मिल जाएगा।

स्कूल और कारागार तो एक-दूसरे से नितान्त भिन्न, एकदम अलग-अलग संस्थाएँ होनी चाहिए- एकदम अलग-अलग स्वभाव की व्यवस्थाएँ होनी चाहिए। इन्हें चलाने वाली बातें अलग भी होनी चाहिए। कारागार की समस्याएँ भी पूरी दुनिया में लगभग एक-सी हैं और स्कूल की समस्याएँ भी लगभग एक-सी। कारागार में सुधार होना चाहिए- इसे कहते सब हैं, मानते सब हैं, पर कभी एकाध किरण चमक जाए, दो-चार योगासन सिखा दिए जाएँ, हॉलीवुड और उसी की तर्ज पर बॉलीवुड भी एकाध फिल्म बना दे- इससे ज्यादा कुछ हो नहीं पाता। कारागार सुधर नहीं पाते और कभी तो लगता है कि हमारे स्कूल तक वैसे बनने लगते हैं। किसी भी महीने के अखबार पलट लें, स्कूलों में क्या-क्या नहीं हो रहा।

रवीन्द्रनाथ ने विनोबा के शब्दों में कहें तो सदोष और तंग तालीम के कारण अपने स्कूल को कारावास कहा था। लेकिन विनोबा पूछते हैं कि इन स्कूलों में यदि आज भी ऐसी ही तालीम दी जाती है तो सोचने की बात है आखिर इनका सुधार कब होगा। स्कूल ऐसा होना चाहिए जहाँ बच्चे मुक्त मन से सीखें।

तो इसी कठिन काम में, स्कूलों को कारागार न बनने देने में आप सब लोग जुटे हैं। न जाने कब से लगे हैं। यह संस्था, सीआईई शिक्षण के विराट संसार में अभिनव प्रयोगों को प्रोत्साहन देने के लिए ही बनी थी। इसके उद्घाटन के अवसर पर मौलाना आजाद का दिया गया भाषण अभी भी हमारी धरोहर की तरह है। पढ़ना, पढ़ाना और पढ़ाने वालों को पढ़ाना- ऐसी तीन स्तर की स्कूल व्यवस्था में क्या अच्छा है, क्या बुरा है, क्या कमी है, क्या अच्छाई है- यह तो आप सब मुझसे बेहतर ही जानते हैं। मैं उस काम के लिए यों भी अयोग्य ही साबित होऊंगा। खुद पढ़ने में, पढ़ाने में मेरी कोई खास गति नहीं थी। पुराने किस्से-कहानियों में नचिकेता का किस्सा मुझे बचपन में बहुत भा गया था। नचिकेता की मृत्यु विषयक जिज्ञासा, यम से उस बालक का संवाद आदि बातों से मेरा कोई लेना-देना नहीं था। उस कहानी में एक जगह नचिकेता, जिसे स्वागत भाषण कहते हैं- वैसे कुछ बुदबुदाता है। उसी बुदबुदाहट में यह पता चलता है कि नचिकेता कोई बहुत होशियार छात्र नहीं रहा है। न वह अगली पंक्ति का छात्र था और न कोई पिछली पंक्ति का। जरा औसत किस्म का छात्र था वह। मैं भी ऐसा ही औसत दर्जे का छात्र रहा, पढ़ाई के अपने पूरे दौर में।

इस औसत दर्जे पर मैंने और आगे सोचा। कोई अध्ययन जैसा, निष्कर्ष जैसा काम तो नहीं किया पर इसे दूसरी पीढ़ी को भी सौंपने का काम सहज ही कर लिया था मैंने।

प्राथमिक शिक्षा के दौर में अपने जीवन की जब पहली परीक्षा देकर मेरा बेटा कुछ चिन्तित-सा घर लौटा तो मैंने पूछ ही लिया था कि क्या बात है ऐसी। उत्तर था पर्चा अच्छा नहीं हुआ। वह और आगे कुछ बताता, उससे पहले ही मैंने पूछा कि तुम्हारी कक्षा में और कितने साथी हैं। उत्तर था- चालीस।

तब तो किसी-न-किसी को चालीसवाँ नम्बर भी आना पड़ेगा। वह तुम भी हो सकते हो। मुझे इससे कोई परेशानी नहीं होगी और तुम्हें भी नहीं होनी चाहिए।

यह जो नम्बर गेम चल पड़ा है, इसका कोई अन्त नहीं है। कृष्ण कुमारजी ने बहुत पहले एक सुन्दर लेख लिखा था, शायद आज से कोई छह बरस पहले- जीरो सम गेम। इस खेल में किसी को कोई लाभ नहीं हो रहा, लेकिन हमारी एक-दो पीढ़ियों को तो इसमें झोंक ही दिया गया है।

घर का कचरा तो कभी-कभी दरी के नीचे भी डाल कर छिपा दिया जाता है पर समाज में यदि यह भावना बढ़ती गई कि 90 प्रतिशत से नीचे का कोई अर्थ नहीं तो हर वर्ष हमारी शिक्षण संस्थाओं से निकले इतने सारे, असफल बता दिए गए छात्र कहाँ जाएँगे। कितनी बड़ी दरी चाहिए नब्बे प्रतिशत से कम वाले इस नए कचरे को छिपाने के लिये? मीटरों नहीं किलोमीटरों लंबी-चौड़ी दरी। लगभग पूरा देश ढँक जाए इतनी बड़ी दरी बनानी पड़ेगी। फिर दरी के नीचे छिपे नब्बे के नीचे वाले भला कब तक शान्त बैठेंगे- दरी में वे जगह-जगह छेद करेंगे, उसे फाड़ कर ऊपर झांकेंगे।

मैंने तय किया था कि आज आप सबके बीच में दो ऐसे स्कूलों का किस्सा रखूँगा जो इस 90-99 के फेर से बचे रहे। इनमें से एक तो ऐसा बचा कि उसने 90-99 के फेर को अपने आस-पास के लोगों तक को ठीक से समझाया और एक ऐसा काम कर दिखाया जो हम खुद भी नहीं कर पाते- उसने समाज में अच्छी शिक्षा के दरवाजे खोले, मगर अपने दरवाजे बन्द कर दिए।

99 का फेर हमारे बच्चों में अपूर्णता की ग्लानि भरता है। वह उन्हें जताता रहता है कि इससे कम नम्बर आने पर तुम न अपने काम के हो, न अपने घर के काम के और न समाज के काम के। फिर वे खुद ऐसा मानने लगते हैं, उनके माता-पिता भी उन्हें इसी तरह देखने लगते हैं। फिर ये तीनों विभाजन एक ही रूप में समा जाते हैं। वह रूप है रोज-रोज बढ़ता बाजार। तुम बाजार के काम के नहीं। तुम पूरे नहीं हो, पूर्ण नहीं। अपूर्ण हो। निहायत बेवकूफ हो। खुद पर भी बोझा हो, हम पर भी बोझा। हर साल ऐसे उदाहरणों की कमी नहीं जो बताते हैं कि 99 न आ पाने का, अपूर्णता का बोझा कितना भारी हो जाता है कि उस बोझ को उठाकर जीवन जीने के बदले इन कोमल बच्चों को, किशोर छात्रों को अपनी जान दे देना, आत्महत्या करना ज्यादा ठीक लगता है।

उन स्कूलों पर आने से पहले एक बार फिर विनोबा का सहारा ले लें। वे रवीन्द्रनाथ के स्कूल वाले प्रसंग में ही एक बहुत ऊँची बात कहते हैं। वे बच्चों को भी उतना ही पूर्ण मानते हैं, जितने पूर्ण उनके माता-पिता हैं। वे ईशउपनिषद के पूर्णमदः पूर्णमिदम का उल्लेख करते हैं। यह भी पूर्ण, वह भी पूर्ण। माँ-बाप भी पूर्ण, बच्चे भी पूर्ण और उनके शिक्षक भी पूर्ण। यदि माँ-बाप की अपूर्णता देखकर बच्चे को शिक्षा दोगे तो पहले तो छात्र अपूर्ण दिखेगा और फिर माँ-बाप शिक्षक में भी अपूर्णता देखने लगेंगे।

यह जरा कठिन-सी बात लगती है- पूर्णता और अपूर्णता की। लेकिन बच्चे को पूर्ण समझ कर तालीम देने लगें तो कल शिक्षण का ढँग ही बदल जाएगा। विनोबा कहते हैं कि‍ इसके लिए बच्चे के आस-पास की सारी सृष्टि आनन्दमय होनी चाहिए। स्कूल भी आनन्दमय होना चाहिए। तब स्कूल में छुट्टी का सवाल ही नहीं उठता, क्योंकि वह कोई सजा तो नहीं है। वह तो आनन्द का विषय है।

ऐसी बातें ‘दूर की कौड़ी’ लगेंगी। पर समय-समय पर अनेक शिक्षाविदों ने, शिक्षा शास्त्रियों ने, क्रान्तिकारियों तक ने, उन सबने जिनने समाज की शिक्षा पर कुछ सोचा-समझा था- उनने आकाश कुसुम जैसी कल्पनाएँ की तो हैं। उनके नाम देशी भी हैं, विदेशी भी। पढ़ाने का पूरा शास्त्र जानने वाले आप सब उन नामों से मुझसे कहीं ज्यादा परिचित हैं। और इसमें भी शक नहीं कि निराशा के एक लम्बे दौर में साँस लेते हममें से ज्यादातर को लगेगा कि ऐसा होता नहीं है।

लेकिन दून या ऋषि जैसे परिचित नामों से अलग हट कर पहले हम एक गुमनाम स्कूल की यात्रा करेंगे आज।

स्कूल का नाम नहीं पर वहाँ पहुंचने के लिए कुछ तो छोर पकड़ना पड़ेगा न। इसलिए गाँव के नाम से शुरू करते हैं यह यात्रा। गाँव है- लापोड़िया। जयपुर जिले में अजमेर के रास्ते मुख्य सड़क छोड़कर कोई 20-22 किलोमीटर बाएँ हाथ पर।

यहाँ नवयुवकों की एक छोटी-सी टोली कुछ सामाजिक कामों में, खेलकूद में, भजन गाने में लगी थी। गाँव में एक सरकारी स्कूल था। पर सब बच्चे उसमें जाते नहीं थे। शायद तब सरकार को भी ‘सर्व शिक्षा अभियान’ सूझा नहीं था। गाँव में पुरखों के बने तीन बड़े तालाब थे, पर वे न जाने कब से टूटे पड़े थे। बरसात होती थी पर इन तालाबों में पानी नहीं टिकता था। अगल-बगल से बह जाता था। इन्हें सुधारे कौन। पंचायत तो ग्राम विकास की योजनाएँ बनाती थी! और उन योजनाओं में यह सब तो आता नहीं था।

गाँव में पशु- बकरी, गाय, बैल काफी थे। और चराने के लिए ग्वाले थे। ग्वाले ज्यादातर बच्चे ही थे, किशोर, जिन्हें आप सब शायद ‘दूसरा दशक’ के नाम से भी जानते हैं। गोचर था जरूर पर हर गाँव की तरह इस पर कई तरह के कब्जे थे। घास-चारा था नहीं वहाँ। इसलिए ये ग्वाले पशुओं को दूर-दूर चराने ले जाते थे।

नवयुवकों की छोटी-सी टोली इन्हीं बच्चों में घूमती थी। किसी पेड़ के नीचे बैठ उन्हें भजन सिखाती, गीत गवाती। इस टोली के नायक लक्ष्मण सिंह जी से आप पूछेंगे तो वे बड़े ही सहज ढंग से बताते हैं कि कोई बड़ा ऊँचा विचार नहीं था हमारे पास। न हम नई तालीम जानते थे, न पुरानी तालीम और न किसी तरह की सरकारी तालीम। शिक्षा का कहने लायक कोई विचार हमें पता नहीं था।

यह किस्सा है सन् 1977 का। दिन भर ऐसे ही गाते-बजाते पशु चराते। एक साथी थे गोपाल टेलर। इतनी अंग्रेजी आ गई थी कि दर्जी के बदले टेलर शब्द ज्यादा वजन रखता है बस। तो गोपाल टेलर को लगा कि दिन में तो ये सब काम होते ही हैं, रात को एक लालटेन जला कर कुछ लिखना-पढ़ना भी तो सीखना चाहिए।

सरकारी स्कूल था पर उसमें तो भरती होना पड़ता था, रोज दिन को जाना पड़ता था। रात को कोई क्यों पढ़ाएगा? सरकारी शाला के समानान्तर कोई रात्रि शाला खोलने जैसी भी कोई कल्पना नहीं थी। सरकार के टक्कर पर कोई प्राइवेट स्कूल भी खोलने की न तो इच्छा थी, न हैसियत। लक्ष्मण सिंह जी बताते हैं कि अच्छे विचारों को उतारने में समय लगता है, मेहनत लगती है, साधन लगते हैं- यह सब भी हमें कुछ पता नहीं था। नहीं तो हम तो इस सबसे घबरा जाते और फिर कुछ हो नहीं पाता। हमारे पास तो बस दो चीजें थीं- धीरज और आनन्द।

गाँव को पता भी नहीं चला और गाँव में सरकारी स्कूल के रहते हुए एक ‘और’ स्कूल खुल गया। हमें भी नहीं पता चला कि यह कब खुल गया। स्कूल खुल ही गया तो हमें पता चले उसके गुण। कौन से गुण और क्या ये सचमुच गुण ही थे। यह सूची बहुत लम्बी है। आप जैसे शिक्षाविद इन पर काम करेंगे तो हमें इन गुणों को और भी समझने का मौका मिलेगा।

किससे करवाते उद्घाटन, क्यों करवाते उद्घाटन जब पता ही नहीं कि यह स्कूल कब खुल गया? स्कूल का नाम भी नहीं रखा था, नाम तो तब रखते जब होश रहता कि कोई स्कूल खुलने जा रहा है। जब बिना नाम का स्कूल खुल ही गया तो फिर तो यही सोचने लगे कि स्कूल का नाम क्यों रखना। क्या यह भी कोई जरूरी चीज है?

नेताओं के नाम पर बने स्कूलों की कमी नहीं, क्रान्तिकारियों, शहीदों, सन्तों, मुनियों, ऋतुओं, ऋषियों और तो और जात-बिरादरी के ऊँचे और छुटभैये नेताओं के नाम पर भी सब तरफ स्कूल हैं ही। पर सचमुच अगर पूरे देश में हर गाँव में स्कूल खोलने हों तो कोई पाँच-सात लाख नामों की जरूरत पड़ेगी। नया क्या हो पाएगा तो कुछ मत करो। गुमनाम स्कूल चल पड़ा। बच्चों से कहाँ जा रहे हो जैसे प्रश्न पूछने वाले लोग थे नहीं। न पोशाक थी न वर्दी थी, बस्ता बोझ वाला भी नहीं था, बिना बोझ वाला बस्ता भी नहीं था। स्कूल जैसा कुछ था नहीं तो नाम किसका रखते!

भवन नहीं था, न अच्छा, न गिरता-पड़ता। चलता-फिरता स्कूल था। आज यहाँ, कल वहाँ। गर्मी के मौसम में बड़े बरगद के नीचे, ठण्ड के दिनों में खुले में धूप के साथ। प्रश्न पूछने वालों की क्या कमी। कोई पूछ ही बैठे कि और बरसात के दिनों में कहाँ लगाओगे स्कूल? तो उत्तर मिलता कि सब बच्चे तो किसान-परिवार से हैं। बरसात में वे सब अपने खेतों में काम करते हैं। यानी तब छुट्टी रखी जाएगी क्या? उत्तर मिलता कि नहीं। उन दिनों हमारे बच्चे गुणा-भाग सीखते हैं। गुणा-भाग कैसा? भगवान का गुणा-भाग। एक मुट्ठी गेहूँ बोने से जो पौधे उगेंगे, उनकी बाली गिन कर तो देखो। प्रकृति का विराट गुणा-भाग समझने का इतना सुन्दर मौका कब मिलेगा। सारे सरल और कठिन गुणा-भाग, दो दूनी चार जैसे सारे पहाड़ों का पहाड़, गणित का पहाड़ भी खेती के गुणा-भाग से छोटा ही, बौना ही होगा। यह नया बीज-गणित, बीजों का गणित जीवन के शिक्षण का भाग है।

कक्षाओं का शुरू में विभाजन नहीं था पर धीरे-धीरे पहली टोली के बच्चे आगे बढ़े तो, वे अपने आप दूसरी कक्षा में आ गए। वे अपने पीछे जो खाली जगह कर आए थे, उसमें अब उत्साह से एक नई जमात आ गई। पर पहली कक्षा में पढ़ा क्या? कौन-सा पाठ्यक्रम? कोई बना बनाया ढाँचा नहीं रखा गया था। जो अक्षर ज्ञान सरकारी स्कूल में पढ़ाया जाता था, या कहें नहीं पढ़ाया जाता था, उसे यहाँ बिना डाँटे-फटकारे पढ़ा दिया था। और साथ में अनगिनत नई बातें, जानकारियाँ पाठ्यक्रम के अलावा भी। कुछ पचास पेड़-पौधों के नाम तो उन्हें आते ही थे, लेकिन अब उन नामों को लिखना भी आ गया था।

पहली से दूसरी कक्षा के बीच यों कोई दीवार तो नहीं थी, भवन ही नहीं था फिर भी बच्चों को लगा कि स्कूलों में परीक्षा होती है तो हमारी परीक्षा कब होगी? नवयुवकों की टोली खुद कोई बड़ी पढ़ी-लिखी तो थी नहीं। आपस में बैठ दो-चार तरह के प्रश्न- भाषा, अक्षर ज्ञान, गिनती आदि के बना लिए। एकाध वर्ष इस तरह से पर्चे बने, पर्चे जाँचे भी गए और पास-फेल बताने के बदले बच्चों को बुलाकर उनकी गलतियाँ वगैरह जो थीं, वो सब समझा दीं और उन्हें अगली कक्षा में भेज दिया।

फिर इस टोली को लगा कि जीवन में प्रश्न पूछना भी तो आना चाहिए बच्चों को। क्यों न हम उन्हें अभी से प्रश्न पूछना सिखाने लगें। इससे हम भी कुछ नया सीखेंगे और वे भी। तय हुआ कि हरेक छात्र एक प्रश्न पत्र खुद बनाएगा। बीस छात्रों की कक्षा में एक ही विषय पर बीस प्रश्न पत्र तैयार हो गए। यह भी निर्णय किया गया कि उन्हें आपस में पत्तों की तरह फीट कर एक दूसरे में बाँट दिया जाए। देखा गया कि सभी प्रश्न पत्र ठीक-ठाक बने थे, न बड़े सरल न बहुत कठिन। उत्तरों की जाँच टोली के सदस्यों ने ही की।

एकाध वर्ष इसी तरह चला। फिर यह बात भी ध्यान में आई कि प्रश्न जब बच्चे बना ही रहे हैं तो उत्तर पुस्तिका की जाँच हम क्यों करें! यह काम भी बच्चों पर डाल कर देखना चाहिए। आखिर जीवन में अपना खुद का मूल्यांकन सन्तुलित ढँग से करना भी आना चाहिए। न अपने को कोई तीसमारखाँ समझे और न दूसरों से गया गुजरा। सहज आत्मविश्वास से बच्चों का मन खुलना और खिलना चाहिए। प्रश्न भी तुम्हीं पूछो, उत्तरों की जाँच-पड़ताल भी तुम्हीं करो, अब। टोली की जरूरत पड़े तो मदद ली जा सकती है। निष्पक्षता दूसरों के प्रति और अपने प्रति भी सीखनी चाहिए। अपना हाथ जगन्नाथ जैसे मुहावरे पढ़ तो लो पर उन्हें अपने से दूर ही रखो।

इस गुमनाम स्कूल का कोई संचालक मण्डल नहीं था। अध्यक्ष, सदस्य, मन्त्री, प्रधानाचार्य, कोषाध्यक्ष जैसा कोई पद नहीं था। महीने में कुल जितना खर्च होता, उतना चन्दा माता-पिता से मिल जाए तो फीस क्यों लेना। कई बार कोई कहता कि फसल कटने पर हम कुछ दे पाएँगे, अभी तो है नहीं। स्कूल में कोई रजिस्टर नहीं था, इसलिए फीस, हाजरी, किसने दिया पैसा, किसने नहीं- ऐसा कुछ भी रिकॉर्ड नहीं रखा गया।

बच्चे पढ़ रहे थे, खेल रहे थे, आनन्द कर रहे थे। गाँव में इन नवयुवकों की टोली की एक संस्था भी थी- ग्राम विकास नवयुवक मण्डल। उसमें कई तरह के मेहमान आते थे। कभी आस-पास से तो कभी दूर-दूर से भी। टोली उन मेहमानों से भी कहती कि थोड़ा समय निकालें और हमारे बच्चों से भी बातें करें।

क्या बातें? कुछ भी बताएँ जो आपको ठीक लगे। एक वर्ष में 25-30 विजिटिंग फैकल्टी। तरह-तरह की जानकारियाँ। स्कूल चल पड़ा मजे-मजे में।

इधर, इन बच्चों के चेहरों पर सचमुच ज्ञान की एक चमक-सी दिखने लगी थी। जो परिवार अपने बच्चों को सरकारी स्कूल भेज रहे थे, वे भी अब कभी-कभी इस विचित्र स्कूल में आने लगे थे। उन्हें भी यहाँ का वातावरण खुला-खुला-सा दिखा। डाँट-फटकार, मारा-पीटी कुछ नहीं। बच्चे महकते-से, चहकते-से दिखते थे। कुछ परिवारों ने अपने बच्चों को सरकारी स्कूल से निकाल कर इस स्कूल में डाल दिया।

नवयुवकों की टोली को लगा कि एक ही गाँव में कम-से-कम शिक्षा को लेकर होड़ नहीं मचनी चाहिए। लक्ष्मण सिंह जी एक दिन सरकारी स्कूल चले गए। प्रधान मास्टरजी से मिले। बड़ी विनम्रता से उन्हें भी अपने स्कूल आने का निमन्त्रण दिया। कहा ये भी आपके ही बच्चे हैं, आपका ही स्कूल है। यहाँ थोड़ी भीड़ ज्यादा हो गई थी तो वहाँ कुछ कर लिया है।

धीरे-धीरे वहाँ के एकाध मास्टर इधर भी आने लगे। वे यहाँ के बच्चों में ज्यादा रमने लगे। एक बड़ा अन्तर तो समझदारी का था। उधम यहाँ बिलकुल नहीं था। बचपन था, बचपना नहीं था। उमर में सयाने हुए बिना बच्चे व्यवहार में कितने सयाने हो सकते हैं- इसका कुछ चित्र उभरने लगा था।

इस बीच गाँव के तीनों टूटे तालाब भी नव-युवकों की टोली और उनकी संस्था को बाहर से मिली कुछ मदद से बन गए थे। यहाँ पानी कम ही बरसता है। कोई 24 इंच। पर अब जितना भी बरसता उसे रोकने का पूरा प्रबन्ध हो गया था। तब आई बारी गाँव के गोचर को ठीक करने की, कब्जे हटाने की। फिर इस आन्दोलन में इस स्कूल के सभी बच्चों ने भाग लिया। कभी-कभी तो ठण्ड की रातें गोचर में रजाई ओढ़ कर पहरा देते हुए भी कटीं- अपने माता-पिता के साथ।

गाँव में सभी जातियों के परिवार हैं। चोरी-छिपे कई परिवार आस-पास के हिरण, खरगोश का शिकार करते थे। गोचर उजड़ जाने से इनकी संख्या भी कम हो गई थी। पर गोचर सुधरने लगा तो वन के ये छोटे पशु भी आने लगे।

तब गाँव लापोड़िया ने सबकी बैठक कर शिकार न खेलने का संकल्प लिया। इसका स्कूल से यों कोई खास सम्बन्ध नहीं दिखेगा पर शहर के अपने बच्चे स्कूलों की तरफ से कभी-कभी चिड़ियाघर जाते हैं न। लापोड़िया गाँव ने अपने पूरे क्षेत्र को खुला चिड़ियाघर घोषित किया। सब की निगरानी से। इसमें स्कूल ने भी साथ दिया। जगह-जगह वन्य प्राणियों के संरक्षण, संवर्धन के बोर्ड बना कर लगा दिए गए और उस इबारत को लोगों के मन में भी उतारने की कोशिश की गई।

इस खुले चिड़ियाघर में शहरों के चिड़ियाघरों की तरह भले ही शेर, हाथी या जिराफ न हों लेकिन जो भी जानवर और पक्षी थे वे इस स्कूल की तरह ही खुले में घूमते थे और उनके बीच घूमते थे ये बच्चे।

स्कूल की कक्षाएँ आगे बढ़ती गईं। पहली दूसरी हो गई, दूसरी तीसरी। इस तरह जब पहली बार सातवीं कक्षा आठवीं बनी तो आठवीं की बोर्ड की ऊँची दीवार बच्चों के सामने खड़ी थी। सन् 1985 की बात होगी। अब तक तो वे खुद अपनी परीक्षा लेते थे, खुद ही प्रश्न बनाते थे, खुद ही अपने उत्तरों को सावधानी से जाँचते थे। अब उन्हें दूसरों के बनाए प्रश्न-पत्र मिलने वाले थे। उनके उत्तर भी कोई और जाँचने वाले थे। लेकिन बच्चों को, इस टोली को और उनके माता-पिता को भी इसकी कोई खास चिन्ता नहीं थी। बोर्ड की परीक्षा के अदृश्य डर से यह स्कूल मुक्त था।

पूरी तैयारी थी पहली बार आठवीं की इस अपरिचित बाधा से मिलने की। सब बच्चों के फॉर्म राज्य शिक्षा बोर्ड में प्राइवेट छात्र की तरह जमा कराए गए। वहीं के सरकारी स्कूल में उन्हें परीक्षा में बैठने की अनुमति मिली। अपने स्कूल में परीक्षा भी अपनी ही थी। तुरन्त परिणाम आ जाता था। यहाँ शिक्षा मण्डल का विशाल संगठन था। पूरे राज्य में फैला हुआ। इसलिए परिणाम आने में लम्बा इन्तजार करना पड़ा। पर जो बच्चे परीक्षा दे चुके थे, उन्होंने इस बीच में स्कूल आना बन्द नहीं किया। वे हमेशा की तरह आते रहे। नई-नई चीजें करते रहे, अपने से छोटे बच्चों को पढ़ाते भी रहे।

परिणाम आया। इस गुमनाम स्कूल की पूरी कक्षा इस दीवार को मजे में फांद गई थी। परिणाम शत-प्रतिशत था।

बच्चों की संख्या भी बढ़ चली थी, इसलिए शिक्षकों की जरूरत भी पड़ी। पर यह संख्या दो या तीन से ज्यादा कभी नहीं हो पाई। बाकी पढ़ाई बच्चे मिलकर करते। बड़ी कक्षा के बच्चे छोटी कक्षा को पढ़ाते। अंग्रेजी, विज्ञान और गणित में थोड़ा अभ्यास रखने वाले रामनारायण बुनकर किसी और शहर से विवाह कर गाँव में आई राजेश कंवर ने मदद दी। पर ये भी बच्चों को पढ़ाने की कोई डिग्री नहीं रखते थे। पढ़ाते-पढ़ाते सीखते गए, सिखाते गए।

बच्चे सन् 1985 के बाद हर साल आठवीं की एक दीवार कूदते-फाँदते रहे। हाँ, स्कूल की इमारत तो कभी-भी नहीं बनी, पर कुछ वर्ष बाद पाठ्यक्रम की किताबें बढ़ने लगीं। तो कुछ नई खरीद करनी पड़ी। इन किताबों-कॉपियों को रोज-रोज घर से भारी बस्ते में लाना और फिर स्कूल से वापस घर ले जाने के नियम भी बड़े लचीले रखे गए। चाहो तो ले आओ, चाहो तो ले जाओ। एक घर में किसी कोने में बनी आलमारियों में सबके बस्ते रखने का इन्तजाम भी हो गया था। जिसे होमवर्क कहा जाता है वह यहाँ नहीं था। यों भी घर में कोई कम काम होते हैं क्या? घर के ऐसे कामों में माता-पिता का हाथ बटाना भी तो एक शिक्षण ही है।

स्कूल में जब ठीक मानी गई संख्या में शिक्षक ही नहीं थे तो चपरासी जैसा पद भी कहाँ होता। देश भर के, शायद दुनिया भर के स्कूलों में बजने वाली घण्टी यहाँ नहीं बजती थी। इसलिए दिन का समय अलग-अलग विषयों के घण्टों में बाँटा नहीं जाता था।

आज भाषा पढ़ रहे हैं तो दो-चार दिन भाषा, व्याकरण, उच्चारण, विभक्तियाँ- सब कुछ अच्छे-से पढ़ समझ लो। फिर बारी गणित की आ गई तो दो-चार दिन गुणा-भाग का मजा लो। कभी-कभी तो एक ही विषय पूरे हफ्ते चल जाता। पचास मिनट की तलवार किसी के सिर पर नहीं लटकती थी। न शिक्षक पर न छात्र पर।

फि‍र स्कूल में किसी घर से एक अखबार भी आने लगा। बड़े बच्चों को किताबों के अलावा अखबार पढ़ने की भी इच्छा हो तो वह पूरी की जानी चाहिए। सभी घरों में यों भी अखबार नहीं आता था। फिर बच्चों ने अखबार की खबरों पर टिप्पणी भी देना, अपनी पसन्द, नापसन्द भी बताना शुरू किया। फिर वे थोड़ा आगे बढ़े। खुद हाथ का लिखा दो-चार पन्ने का एक अखबार भी निकालने लगे। स्कूल का नाम नहीं था, अखबार भी बिना नाम का। हफ्ते में एक बार। हाथ से गाँव की, स्कूल की, खेती-बाड़ी की, आस-पास की खबरें, टिप्पणियाँ लिखी जातीं। गाँव से 20 किलोमीटर दूर जयपुर-अजमेर सड़क पर दूदू कस्बे में फोटो कॉपी मशीन थी। शहर आते-जाते किसी के हाथ से हस्त लिखित सामग्री भेज दी जाती। कोई सौ प्रतियाँ वापस आ जातीं। इसे बच्चों के अलावा गाँव के बड़े लोग भी खरीदते और चाय तक की दुकानों पर इसे पढ़ा जाने लगा था। आठ आना या एक रुपया दाम भी रखा गया ताकि फोटो कॉपी का खर्च निकल आए। कोशिश की जाती कि अधिक-से-अधिक बच्चे इसमें अपनी राय रखें, कुछ-न-कुछ सब लिखें। ऐसा स्कूल चला सकने वाली टोली, उसका गाँव अभी एक और विचित्र प्रयोग करने जा रहा था।

गाँव ने शिकार बन्द कर दिया था। वन्य प्राणियों का संरक्षण गाँव खुद कर रहा था। खुले चिड़ियाघर का जिक्र पहले आ ही चुका है।

गाँव के तीनों तालाब ठीक होकर अब लबालब भरने लगे थे। एक तालाब पर चुग्गा भी रखा जाने लगा था। हर घर अपनी फसल से कुछ अनाज निकाल कर इस चुग्गा-घर में बनी एक कोठरी में जमा करने लगा था। यहाँ से इसका एक अंश रोज निकाल कर एक विशेष बने चबूतरे पर डाल दिया जाता था। इस चबूतरे पर बिल्ली-कुत्ते झपट नहीं सकते थे। आस-पास की कई तरह की चिड़ियों के झुण्ड यहाँ बेफिक्र आते और दाना चुगते थे। सुबह से शाम तक चहचहाहट बनी रहती थी।

चूहे कहाँ नहीं हैं। लापोड़िया में खूब थे। किसानों के घरों में कहीं-न-कहीं तो अनाज की बोरियाँ होंगी ही। एक दिन लक्ष्मण सिंह जी को लगा कि हम सब घरों में चूहों को पकड़ने के लिए पिंजरे रखते हैं। पकड़ते तो खुद हैं पर फिर बच्चों को पिंजरा पकड़ा कर कहते हैं, बाहर छोड़ कर आओ या मार दो। पेड़ बचा रहे हैं, वन्य प्राणी बचा रहे हैं, लेकिन घर के प्राणी को मार रहे हैं।

इस चूहे ने हमारा भला ऐसा क्या बिगाड़ा है? बम्बई के सिद्धि विनायक मन्दिर में पूजा करने बड़े-बड़े प्रसिद्ध लोगों के जाने की खबरें छपती हैं, कैलेण्डरों में तरह-तरह के गणेशजी मिलते हैं और उन्हीं के पास बैठा रहता है यह चूहा। पर हम उसे न जाने कब से मारे चले आ रहे हैं। न सन्त उसे बचाते हैं, न मुनि लोग, न सरकारें। अरे वो तो चूहा मारने के लिए इनाम भी देती हैं। अनाज का दुश्मन नम्बर एक मानती है सरकार चूहों को।

गाँव के कुछ लोग मिलकर बैठे। बातचीत चली कि इस पर क्या किया जा सकता है। सबने माना कि अनाज भी बचे और चूहा भी। प्रयोग के तौर पर गाँव की आबादी से दो-चार कदम की दूरी पर एक चूहा घर बनाने का निर्णय हुआ। न जीव दया का नारा। न अहिंसा को परमधर्म बताने का कोई ऊँचा झण्डा। बस प्रकृति को समझकर अपना कर्तव्य निभाने की एक कोशिश भर करने की बात थी।

कोई दस बीघा जमीन इस काम के लिए निकाली गई इस चूहा घर के लिए। एक तरह की झाड़ी से बाड़ लगाई ताकि एकदम बिल्ली कुत्ते न घुस पाएँ। सबको बता दिया गया कि घरों में चूहों को पकड़ें तो मारे नहीं, इस चूहा घर में लाकर उन्हें छोड़ दें।

घर के कोनों में दुबके चूहे जब यहाँ दस बीघा में छूटने लगे तो उन्हें कैसा लगा- ये तो टीवी वाले उनसे कभी पूछ ही लेंगे। पर जो यहाँ आया उसने अपने शानदार बिल बनाने शुरू कर दिए। कुछ ही समय में चूहा घर आबाद हो गया, बस्ती बस गई। गाँव में चील, उल्लू भी हैं, साँप भी, बिल्ली भी हैं, चूहे भी। प्रकृति में सब कुछ सबके सहारे मिल-जुलकर चलता है।

गाँव में चूहा घर बना गया। वहाँ के पेड़ों पर जो चिड़ियाँ बैठतीं उनकी बीट से तरह-तरह की घास के बीज नीचे गिरते। चूहा घर में बिल बन गए, आस-पास घास उग आई। उन्हें जितना भोजन चाहिए उतना मिल गया, जितनी सुरक्षा मिलनी चाहिए, घास के कारण उतनी सुरक्षा मिल गई और जितने चूहे इन चील, उल्लुओं को चाहिए, उतने उन्हें मिल ही जाते होंगे।

चूहा घर बने अब दस वर्ष पूरे हो रहे हैं। गाँव में चूहों की आबादी नहीं बढ़ी है। प्रकृति सन्तुलन खुद रखती है। खुद चूहे आजादी का महत्व जानते हैं। शायद वे खुद अपनी आबादी पर नियन्त्रण रखे हैं।

तो क्या घरों में चूहे एकदम खत्म हो गए हैं अब वे घरों में नहीं आते? लक्ष्मण सिंह जी बड़े ही सहज ढँग से उत्तर देते हैं कि देखिए, आप भी कभी-कभी घर का खाना खाते-खाते अघा जाते हैं तो किसी दिन होटल में, ढाबे में चले ही जाते हैं। इसी तरह एकाध बार ये चूहे भी अपना घर छोड़ कर हमारे घरों में आकर हलवा-पूरी या कुछ तो भी खा जाते हैं पर अब प्रायः वे घरों के भीतर वैसे नहीं रहते जैसे पहले रहते थे। अब उनके अपने घर हैं, आरामदेह बिल हैं- यह जीवन उनके लिए ज्यादा स्वाभाविक है, सहज है। शायद ज्यादा आनन्द का है। घर के कारागार से उनकी मुक्ति हुई है।

कारागार से फिर स्कूल को याद कर लें। लापोड़िया ने स्कूल को आनन्दधाम बनाया। फिर देखा कि गाँव का सरकारी स्कूल भी थोड़ा-थोड़ा सुधर चला है। नवयुवकों की इस टोली ने फिर सन् 2006 में तय किया कि हमें किसी की होड़ में तो स्कूल चलाना नहीं था। तो क्यों न इसे अब बन्द कर दें।

सृजन किया था जैसे चुप-चाप, उसी तरह एक दिन उस स्कूल का विसर्जन कर दिया। न नाम था, न भवन, न बैंक में कोई खाता था, न कोई संचालक मण्डल, न ऐसे शिक्षक थे, जिन्हें स्कूल बन्द करने के बाद किसी तरह की बेरोजगारी का सामना करना पड़ता। या कि वे धरना देते दरवाजे पर। सबने मिलकर शुरू किया था। सबने मिल कर उसे सिरा दिया, उसका विसर्जन कर दिया।

विसर्जित होकर यह विचार पूरे गाँव में फैल गया है। लोग अच्छी बातें सीखने की कोशिश करते हैं, बुरी बातों को विसर्जित करने का प्रयास करते हैं। सब अच्छा सीख गए, सब बुरा मिटा दिया- ऐसा तो नहीं कह सकते पर इसी लम्बे दौर में इस क्षेत्र में 9 वर्ष का भयानक अकाल पड़ा था। आधे से कम बरसात गिरी थी, पर गाँव में एक बूँद पानी की कमी नहीं थी। गाँव के तीनों तालाब ऊपर से सूख गए थे पर इनने गाँव के भूजल को इतना सम्पन्न बना दिया था कि कोई सौ कुँओं में से एक भी कुँआ सूखा नहीं था, नौ साल के अकाल में। पूरे दौर में ठीक-ठीक फसल होती रही हर खेत में। गाँव के बच्चों को दूध तक मिलता रहा, वहाँ के गोचर के कारण। जयपुर की सरस डेयरी को भी इस अकालग्रस्त गाँव से सबसे पौष्टिक दूध मिला। सरकार ने उसका प्रमाणपत्र भी दिया था तब।

फिर कोई चार साल पहले इस इलाके में इतना अधिक पानी गिरा कि जयपुर शहर में भी बाढ़ आ गई, आस-पास के कई गाँव डूबे थे तब। पर लापोड़िया बाढ़ में डूबा नहीं। उसके तालाबों ने फिर सारा अतिरिक्त पानी आने वाले दौर के लिए समेट लिया था।

लापोड़िया गाँव ने न तो सरकारी स्कूल की निन्दा की, न कोई निजी प्राइवेट स्कूल उसकी टक्कर पर खोला, न किसी कारपोरेट को, कम्पनी को उसकी सामाजिक जिम्मेदारी जता कर शिक्षा में सुधार की योजना बनाई। उसने ममत्व, यह तो मेरा है, मान कर एक गुमनाम स्कूल खोला, शिक्षण को कक्षा की दीवारों से उठा कर पूरे गाँव में फैलने का विनम्र प्रयास किया और फिर उसे चुपचाप समेट भी लिया। एक भी पुस्तिका या कोई लेख इस प्रयोग को अमर बनाने के लिए उसने छापा नहीं।

शुरू में हमने दो स्कूलों की चर्चा करने की बात रखी थी। दूसरा स्कूल लापोड़िया गांव से थोड़ा अलग स्वभाव का है। यह पंजाब के गुरुदासपुर जिले के तुगलवाला गाँव में चल रहा है। पर यह लापोड़िया की तरह गुमनाम नहीं है। शिक्षा के कड़वे दौर में इस मीठे स्कूल का नाम है- बाबा आया सिंह रियाड़की स्कूल। सन् 1925 में यहाँ के एक परोपकारी बाबा आया सिंह ने इसकी स्थापना पुत्री पाठशाला के रूप में की थी। गुरुमुख परोपकार उमाहा उनका घोष वाक्य था- यानी गुरु का सच्चा सेवक परोपकार भी बहुत चाव से, आनन्द से करे।

यह विद्यालय यों कोई 15 एकड़ में फैला हुआ है पर बहुत चाव से, आनन्द से काम करने के कारण आस-पास के अनेक गाँवों के मनों में, उनके हृदय में इस स्कूल ने जो जगह बनाई है, उसका तो कोई हिसाब नहीं लगाया जा सकता। यहाँ प्राथमिक शाला- यानी पहली कक्षा से एम.ए. तक की शिक्षा दी जाती है। छात्राओं की संख्या है लगभग 3000। इसमें से कोई 1000 छात्राएँ अपने पास के घरों से आती हैं। दूर के गाँवों की कोई 2000 छात्राएँ यहाँ छात्रावास में रहती हैं। पढ़ाई का खर्च महीने के हिसाब से नहीं, वर्ष के हिसाब से है। रोज आने-जाने वालों की फीस लगभग एक हजार रुपए सालाना है। जो यहीं रहती हैं, उन्हें पढ़ाई, आवास और भोजन का खर्च लगभग 6,600 रुपया देना होता है। पूरे वर्ष का। जिन परिवारों को यह मामूली-सी फीस भी ज्यादा लगे- उनसे एक रुपया भी नहीं लिया जाता। भरती होने के लिए आने वाली किसी भी छात्रा को यहाँ वापस नहीं किया जाता। सचमुच, विद्यामन्दिर के दरवाजे हरेक के लिए खुले हैं।

3000 छात्राओं वाले इस शिक्षण संस्थान में बहुत गिनती करें तो शायद दस-पांच शिक्षक मिल जाएँगे। पढ़ाई का, पढ़ाने का सारा काम छात्राएँ ही करती हैं। बड़ी कक्षाओं की छात्राएँ अपने से छोटी कक्षाओं को पूरे उत्साह से पढ़ाती हैं। सैल्फ टीचिंग डे हमारे स्कूलों में होता है पर यहाँ तो सेल्फ टीचिंग इयर है पूरा।

सिर्फ पढ़ाना ही नहीं, इतने बड़े शिक्षण संस्थान का पूरा प्रबन्ध छात्राओं के हाथ में ही है। यह काम दरवाजे पर होने वाली चौकीदारी से लेकर प्रधानाध्यापक के कमरे तक जाता है। साफ-सफाई, बिजली-पानी, इतनी बड़ी संख्या में छात्राओं का नाश्ता, दो समय का भोजन, तीन-चार मंजिल की इमारतों की टूट-फूट, नया निर्माण- सारे काम छात्राओं की टोलियाँ मिल बाँट कर करती हैं। संस्थान के रोजमर्रा के सब काम निपटाने के बाद इन्हीं छात्राओं की टोलियाँ जरूरत पड़ने पर आस-पास के गाँवों में सामाजिक विषयों पर, कुरीतियों पर, भ्रूण हत्या, नशाखोरी जैसे विषयों पर जन-जागरण के लिए पद यात्राओं पर भी निकल पड़ती हैं।

यह एक ऐसा संस्थान माना जाता है जहाँ पंजाब के प्रायः सभी मुख्यमंत्री, राज्यपाल वर्ष में एकाध बार माथा टेकने आ ही जाते हैं। पर इस संस्थान ने आज तक पंजाब सरकार से मान्यता नहीं माँगी है। सरकार ने मान्यता देने का प्रस्ताव अपनी तरफ से रखा तो भी स्कूल ने विनम्रता से मना किया है।

इसके संचालक श्री सरदार स्वरन सिंह विर्क का कहना है कि बच्चों की फीस से, खेती-बाड़ी, फल-सब्जी के बगीचों से इतना कुछ मिल जाता है कि विद्यालय को सरकार से मदद लेने की जरूरत नहीं पड़ती। फिर शासन की मान्यता का मतलब है शासन के तरह-तरह के नियमों का पालन। ज्यादातर नियम व्यवहार में उतारना कठिन होता है तो लोग उन्हें चुपचाप तोड़ देते हैं। फिर झूठ बोलना पड़ता है। ना, यह सब यहाँ होता नहीं। इस स्कूल को इस इलाके में सच की पाठशाला के नाम से भी जाना जाता है। यहाँ छात्राएँ बोर्ड और विश्वविद्यालय की परीक्षाएँप्राइवेट छात्र की तरह देती हैं।

पूरे देश में परीक्षाओं में नकल करने के तरह-तरह के नए तरीके, नई तकनीकें खोजी जा रही हैं। पंजाब के परीक्षा में नकल एक बड़ी समस्या है। नकल रोकने के फ्लाइंग दस्ते तक हैं। लेकिन गाँव तुगलवाला की यह संस्था नकल के बदले छात्राओं की अकल और उनके संस्कारों पर जोर देती है। यह बताते हुए थोड़ा अटपटा भी लगता है कि यहाँ नकल पकड़ने वाले को एक बड़ा इनाम दिए जाने का बोर्ड तक लगा है !

शुरू में कहीं विनोबा की एक बात कही थी- छात्र भी पूर्ण, उसके माता-पिता भी पूर्ण और शिक्षक भी पूर्ण। यहाँ शिक्षण का काम तीन चरणों में होता है। पहले में एक शिक्षिका पचास छात्राओं को पढ़ाती है। फिर दस-दस के समूहों को पढ़ाया जाता है। इन समूहों में कोई छात्रा किसी कारण से कुछ कमजोर दिखे तो उसे अपूर्ण, मूर्ख नहीं माना जाता- तब उसे एक अलग शिक्षिका समय देती है और उसे कुछ ही दिनों में सबसे साथ मिला दिया जाता है।

शिक्षा के स्वावलम्बन की ऐसी मिसाल कम ही जगह होंगी- केवल गेहूँ, धान ही पैदा नहीं होता। इतनी बड़ी रसोई शाला का पूरा आटा यहीं पिसता है, धान की भूसी यहीं निकाली जाती है। गन्ना पैदा होता है तो गुड़ भी यहीं पकता है, सौर ऊर्जा है, गोबर गैस है। काम दे चुकी छोटी-सी-छोटी चीज़ भी कचरे में नहीं फेंकी जाती- सब कुछ एक जगह इकट्ठा करने वाली टोली है और फिर इस कबाड़ से क्या-क्या जुगाड़ बन सकता है- उसे भी देखा जाता है। बची चीजें बाकायदा कबाड़ी को बेची जाती हैं और उसकी भी पूरी आमदनी का हिसाब रखा जाता है।

सर्व धर्म समभाव पर विशेष जोर देने की बात ही नहीं है। वह तो है ही यहाँ के वातावरण में। दिन की शुरुआत सुबह गुरुवाणी के पाठ से होती है। परिसर की सफाई रोज नहीं होती। सप्ताह में एक बार। क्योंकि 3000 की छात्र संख्या होने पर भी कोई कहीं कचरा नहीं फेंकता। स्वच्छता अभियान यहाँ बिना किसी नारे के बरसों से चल रहा है।

आप सभी शिक्षा के संसार में बाकी संसार की तरह आ रही गिरावट की चिन्ता कर रहे हैं, उसे अपने-अपने ढँग से सम्भाल भी रहे हैं। आज सब चीजें, सुरीले से सुरीले विचार अन्त में जाकर बाजार का बाजा बजाने लग जा रहे हैं। शिक्षा की दुनिया में शिक्षण अपने आप में एक बड़ा बाजार बन गया है। पर जैसे बाजार में मुद्रास्फीति आई है ऐसे ही शिक्षा के बाजार में भी यह मुद्रास्फीति आ गई है। पहले सन्तरामजी बी.ए. से काम चला लेते थे। आज तो पीएचडी का दाम भी घट गया है।
हम में से कई लोगों को इसी परिस्थिति में आगे काम करना है। जो पढ़ाई आज आप कर रहे हैं, वह आगे-पीछे आपको एक ठीक नौकरी देगी- पर शायद इसी बाजार में। प्रायः साधारण परिवारों से आए हम सबके लिए यह एक जरूरी काम बन जाता है। इसलिए आप सबको एक छोटी-सी सलाह- नौकरी करें जीविका के लिए। लेकिन चाकरी करें बच्चों की। हम अपनी नौकरी में जितना अंश चाकरी का मिलाते जाएँगे, उतना अधिक आनन्द आने लगेगा।

विनोबा से हमने आज की बात प्रारम्भ की थी। उन्हीं की बात से हम विराम देंगे। यह प्रसंग बहुत सुन्दर है। इसे बार-बार दुहराने में भी पुनर्रुक्ति दोष नहीं दिखता। उनके शब्द ठीक याद नहीं। भाव कुछ ऐसे हैं:

पानी जब बहता है तो वह अपने सामने कोई बड़ा लक्ष्य, बड़ा नारा नहीं रखता कि मुझे तो बस महासागर से ही मिलना है। वह बहता चलता है। सामने छोटा-सा गड्ढा आ जाए तो पहले उसे भरता है। बच गया तो उसे भर कर आगे बढ़ चलता है। छोटे-छोटे ऐसे अनेक गड्ढों को भरते-भरते वह महासागर तक पहुँच जाए तो ठीक। नहीं तो कुछ छोटे गड्ढों को भर कर ही सन्तोष पा लेता है।

ऐसी विनम्रता हम में आ जाए तो शायद हमें महासागर तक पहुँचने की शिक्षा भी मिल जाएगी।

हौसले की उड़ान : शशि‍ काण्डपाल

लेखक मंच - Mon, 17/04/2017 - 11:01

खुद को पैदायशी शिक्षिका मानने वाली शशि‍ काण्डपाल दि‍व्यांग

शशि‍ काण्डपाल

बच्चों के लि‍ए वि‍शेष रूप से संवेदनशील हैं। वर्तमान में वह दिव्यांग बच्चों के लिए संस्था ‘शाश्वत जिज्ञासा’ से जुड़ी हैं। लखनऊ के नामी स्कूल में पढ़ाने के दौरान उनके संपर्क में आए दि‍व्यांग बच्चे का संस्मरण-

कुछ समय पहले मॉल में बहुत जरूरी सामान ढूंढ़ने की दौड़ में अचानक लगा मानो कोई अजीब सी आवाज़ में मेम, मेम पुकार रहा है। आम इंसान शायद उस मेम शब्द को न समझ पाए, लेकिन मैं जान जाती हूं कि‍ कोई वि‍शेष बच्चा मुझे पुकार रहा है। नज़र घुमाई तो व्हील चेयर से आधा लटका बच्चा मुझे यूं लपकने को तैयार था, मानो जरा सी ताक़त आ जाये तो वो मुझे पकड़ ले।

मैं याद करने की कोशिश में उस तक पहुंची तो हैरान रह गई। वह रुद्रांश था।

मेरा वह वि‍शेष बच्चा, जिसके लिए मुझे कई चट्टानों से टकराना पड़ा था और सबसे बड़ी चट्टान खुद उसका अपना परिवार था, समाज था और स्कूल था। अब वह शरीर से कमजोर नहीं था। अच्छा खासा अठारह साल का नौजवान। आवाज़ भले ही भारी हो गई थी, हँसी वही दूधिया थी।
रुद्रांश एक संभ्रांत परिवार के अत्यंत कामयाब पिता की नाकामयाबी का प्रतीक बन चुका था। वह मुझे तब मि‍ला, जब उसके छोटे भाई के स्टडी टूर के सि‍लसि‍ले में उसके घर गई।

मैं ड्राइंग रूम में बैठी चिंघाड़ने सी आवाज़ें सुन रही थी, जिसे घरवाले कभी बिस्कुट, कभी मिठाई या कभी फालतू के ठहाकों से बहका रहे थे। मुझे वह आवाज़ बार-बार परेशान कर रही थी और लगता था मानो किसी को यातना दी जा रही हो। ऐसे में मेरा बेचैन होना स्वाभाविक था। मैं पूछ बैठी कि‍ आखिर यह क्या हो रहा है? यह आवाज़ किसकी है और क्यों है? क्योंकि आपके जिस बच्चे की रिपोर्ट मुझे स्कूल में जमा करनी है, उसे तब तक पूरा कैसे कर सकूंगी जब तक उसका वातावरण नहीं जानूंगी या आप लोग मुझे सब कुछ सच-सच नहीं बताएँगे। वे सभी अचानक चुप हो गए और एक-दूसरे का मुंह देखने लगे। मैं मन ही मन डरने लगी कि‍ पता नहीं अब किस सच्चाई से मेरा सामना होगा।

वे लोग मुझे बड़ा सा बरामदा पार कराकर एक कमरे में ले गए। इसकी बड़ी-बड़ी खिडकियों में जालियाँ लगी थीं और जानवर बंद करने के बाड़े सा अहसास दिला रही थीं। उसी के भीतर एक नन्ही सी जान अपनी व्हीलचेयर पर चमड़े की बेल्ट से बंधा  चीख रहा था। शायद वह दिनभर चिल्लाता होगा इसलि‍ए उसका गला बैठ गया था और आवाज घो-घो में बदल गयी थी | वह एडमिशन चाहने वाले अक्षत का बड़ा भाई था, लेकिन दिखता उससे भी छोटा था। उम्र दस साल, लेकिन कद, काठी पांच साल सी। बोलने, चलने, हाथ-पैरों की हरकतों से लाचार, दिमाग से कमजोर लेकिन सुन सकता है। मुझे देखते ही शांत हो गया। मैं स्पेशल एजुकेटर नहीं हूं। लेकिन मानव हूं और उसका इतना परेशान होना मुझे बर्दाश्त नहीं था। उसके पिता और दादा की परिवार के हर सदस्य और नौकरों को सख्त हिदायत थी कि उसे कमरे तक सीमित रखा जाये ताकि उनका सो कॉल्ड सम्मान बचा रहे। लेकिन वह जैसे-जैसे बड़ा हो रहा था, उसकी रुचियाँ बदल रही थीं और उसे संभालना मुश्किल होता जा रहा था।

माँ का दिल भर-भर आता कि‍ उसके बच्चे का क्या होगा? कैसे जियेगा? मेरे पूछने पर कि‍ उसे आज तक स्कूल क्यों नहीं भेजा गया या कोशिश क्यों नहीं की गई, का जवाब मिला कि हालत तो आप देख ही रही हैं। दो-चार स्कूलों में बात की थी तो उन्होंने ये बवाल लेने से साफ़ मना कर दिया और बड़ा होने पर किसी स्पेशल स्कूल भेजने का मशविरा दे दिया।

मैंने रिसर्च में पढ़ा था कि‍ यदि ऐसे बच्चों को सामान्य बच्चों के साथ रखा जाये तो इनमें ना सिर्फ सुधार आता है, बल्कि कई चीजें सीख भी जाते हैं। सामान्य बच्चे भी इनके साथ रह कर अपनी जिम्मेदारी समझ पाते हैं और आपसी समझ का वातावरण पैदा होता है। आखिर, समाज के इतने बड़े हिस्से को समाज से काटने का अपराध हम कैसे कर सकते हैं?

उसकी माँ ने मेरी भावुकता का फायदा उठाते हुए कहा कि‍ क्या मैं इसे अपनी क्लास में दाखिला दिलवा सकती हूं? मैंने उन्हें स्कूल आने का न्योता और सहायता का आश्वासन दिया। हालाँकि, मैं खुद नहीं जानती थी कि स्‍कूल प्रशासन मेरी इस सिफारिश को कैसे लेगा?

दूसरे दिन मेरी रिपोर्ट और रुद्रांश का केस प्रिंसिपल ने मीटिंग बुलाकर सबके सामने रखा। मेरी सोच से परे वहां हर इंसान के मुह पर सिर्फ ना थी। हर टीचर इस पचड़े से दूर रहने की राय दे रहा था। यह स्कूल का माहौल बिगाड़ने की कोशिश थी। जो बच्चे यहाँ ऊँची फीस देकर पढ़ रहे हैं, उनकी पढा़ई में खलल डालने का हक़ मुझे किसने दिया, यह पूछा जा रहा था। जब वह चिलाएगा, तब आप क्या कर पाएंगी? कितनी कक्षाएं डिस्टर्ब होंगी, आपने सोचा है? क्या हमारे यहां बच्चों की कमी है, जो हम ऐसे बच्चों को दाखिला देने लगें? आखिर आपके सि‍र पर यह समाज सेवा का भूत क्यों सवार है? मेरी कम जानकारी और भावुकता पर ताने थे और व्‍यावाहरि‍क बनने की सलाह थी।

उसके बाद मेरी साम दाम दंड भेद की लड़ाई खुद और स्कूल से हुई। मैंने ना सिर्फ क़ानून के कुछ अंश और विकलांगों से सम्बंधित कुछ तथ्य उनके सामने रखे, बल्कि खुद के इस्तीफे की पेशकश भी कर डाली। उसमें लिखा कि‍ मैं असंवेदनशील लोगों के साथ काम नहीं कर सकती। उसके बाद रुद्रांश मिड सेसन में मेरा शिष्य बना, छोटी सी कुर्सी में चमड़े की बेल्ट से बंधा।

एडमिशन के बाद मुझे दूसरी जंग लड़नी थी। रुद्रांश दिनभर चिल्लाता, तो क्लास के बाकी बच्चे डिस्टर्ब होते और तमाम शिकायतें करते। उनके घरों से भी फोन आते- क्या आपने किसी पागल को एडमिशन दिया है? और यह सब सुनकर मैं आहात होती। प्रिंसिपल धमकाने का कोई मौका नहीं छोड़ती, लेकिन मुझे लगता हमारे इसी असंवेदनशील रवैये ने इन वि‍शेष बच्चों को समाज की मुख्यधारा में जोड़ने का काम नहीं किया। न उनकी जरूरतों का ध्यान रखा और न सहारा देने की कोशिश की।

स्कूल ऑफिस में रुद्रांश के साथ रोज मेरी भी पेशी होती, लेकिन मेरे प्रयोग जारी थे। कुछ टीचर अब मेरी मंशा और कोशिश से सहमत थे और यदा कदा उसकी व्हीलचेयर को क्लास तक पंहुचा देते। उससे हंस कर बात कर लेते, हालाँकि वह सिर्फ टुकुर-टुकुर ताकता। लेकिन आश्चर्य था कि उसे स्कूल का वातावरण पसंद आ गया था और लोगों को देखना उसे अच्छा लगता था। वह प्रार्थना के दौरान चिल्लाता, सो उसे स्कूल लगने के आधा घंटे बाद लाने की हिदायत दी गई। इसे मैंने मान लिया क्योंकि क्लास के और बच्चे भी बहुत छोटे थे और उनका ख्याल रखना जरूरी था। रुद्रांश गाड़ी से किलकता हुआ आता तो आया भी उसे भुनभुनाते हुए लेने जाती।

एक दिन जब रुद्रांश बहुत अशांत था, मैंने वह बेल्ट खोल दी जो उसे कुर्सी से बांधे रखती थी। वह आजादी की ख़ुशी में गिर पड़ा, लेकिन शांत भी हुआ। उसे मैंने चीजें छूने को दी- पुराने अखबार, ब्लॉक्स, फ़ुटबाल, रबर के जानवर और फल। वह बहुत खुश होता। अक्सर अपने दोनों हाथों से मेरा चेहरा छूता मानो कुछ तसल्ली चाहता हो। वह मेरा सब्जेक्ट बन चुका था और मैं अनगढ़ हाथों से उसको संवारने में लगी थी।

उसे खाना-पीना, बाथरूम जाना, कुछ नहीं आता था। लेकिन बच्चों को देखकर अब उसके कांपते हाथ हरकत करते- खाने को मुंह चलता और शैतानियाँ भी सीख गया था, क्योंकि खाली जो रहता था।

पिता यूं फोन करता मानो अपनी कीमती थाती मुझे सौंप चुका हो और मैं उसको नुकसान न पंहुचा दूं। बच्चे क्लास में जोर-जोर से पढ़ते और वह सुन सकता था। रुद्रांश घरघराती आवाज़ में दिनभर घर में रट्टा लगता और माँ को निहाल करता।

धीरे-धीरे क्लास के बच्चे रुद्रांश का साथ देने लगे। वे उसको एक सामान्य बच्चे की तरह समझाते और वह कुछ न समझ के भी हँसता और खुश रहता। उसकी देखभाल होती। ढेर सारे दोस्त जो थे, उसके पास अब।

आज रुद्रांश ने अपने साथियों का हाथ पकड़ खड़े होने की कोशिश की, आज वह गिर पडा़ और उसके अति कोमल घुटने छिल गए, यह सब चलता। लेकिन मैंने अब डरना बंद कर दिया था क्योंकि हम दोनों एक-दूसरे का साथ जो देने लगे थे।

पोयम्स के दौरान रुद्रांश हंसता, तरह-तरह से मुंह बनाता, हाथों को नचाता और पैर भी चलाता। टुकड़े करके देने पर रोटी खाने लगा। कलाई से चम्मच बाँध देती और वह चावल, मैगी खा लेता। आश्चर्यजनक परिवर्तन थे।

कानून भी कहता है कि‍ यदि कोई वि‍शेष बच्चा, नार्मल बच्चों के साथ पढ़ना चाहे तो स्कूल को उसे जगह देनी पड़ेगी और यही कानून मेरा सहारा था। हालाँकि, मैं जानती थी कि इन बच्चों के लिए वही स्कूल ज्यादा उपयुक्त हैं, जहां उनके लिए बाथरूम, टूल्स, पठन सामग्री, सहायता और टेकनीक्स उपलब्ध हैं, लेकिन मैं तो बस उसे पहले उस अँधेरे कमरे से बाहर लाना चाहती थी और खुद की क्षमता भी देखना चाहती थी।

एक और जंग…एक साल के बाद रुद्रांश को उसके जैसे अच्छे वि‍शेष स्कूल में दाखिला दिलाने के लिए उसके दादा और पिता को राजी करना और दबाव डालना। उन्हें कतई  गवारा न था कि विशेष स्कूल की बस रोज उनके दरवाजे पर आये और एक दिव्यांग यहाँ रहता है, यह सब जाने।…हाय रे झूठी शान!

लेकिन अब हम तीन थे- मैं, रुद्रांश और उसकी माँ। परिवर्तनों से उसकी माँ का आत्मविश्वास भी बढ़ चुका था। काफी हुज्जत के बाद स्पेशल स्कूल चुना तो गया, लेकिन दिल्ली शहर में।

रुद्रांश चला गया।

तीस बच्चों के बावजूद क्लास में सन्नाटा था। अब मुझे हर समय मुस्कुरा कर देखने वाला कोई नहीं था। इस बीच सभी को रुद्रांश से लगाव हो गया था। प्रिंसिपल अक्सर उस भोले बच्चे की मुस्कान याद करतीं। इंटरवल में टीचर्स उसे देखने आती थीं। वह हेल्लो कहना और हाथ मिलाना भी सीख गया  था। अक्सर टीचर्स के दुपट्टे  या साडी़ का छोर पकड़ कर हँसता और सबको अपने मोह में बाँध लेता। अब सब उसे मिस करते थे।

रुद्रांश तो चला गया, लेकिन उसके जाने के बाद कई वि‍शेष बच्चों को लेकर उनके माँ-बाप आगे आये। उनकी आशा और हिम्मत के लिए रुद्रांश एक रास्ता खोल कर चला गया था।

जब लोग अपने बच्चों के 90 प्रति‍शत मार्क्स पर हताश होते हैं, तो मुझे रुद्रांश जैसे बच्चे बहुत याद आते हैं, जिनके माँ-बाप उनके मुंह से सिर्फ एक संबोधन सुनने को तरसते हैं। वो अपना नाम बता दें तो क्या कहने! वो खुद कुछ आराम से खा ले तो माँ निहाल।
सच्चाई तो यह है कि‍ ज्यादातर लोग इन बच्चों को अपनी अज्ञानता से घरों में बंद करके उन्हें और भी अक्षम बना देते हैं और दोष बच्चों पर मढ़ देते हैं या ऊपर वाले पर।

जानकर बहुत अच्छा लगा कि‍ रुद्रांश जिसे मैंने पेन्सिल पकड़वाने में अपना पूरा जोर लगा दिया था, उसने कला में रुचि दिखाई और स्पेशल स्कूल ने उसे खूब प्रेरित किया। उनकी और अपनी माँ की सहायता और जिद की वजह से रुद्रांश  अपने पिता की परवाह किये बिना दिल्ली के एक नामी फ़ास्ट फ़ूड सेण्टर में लोगों की आवभगत का काम करता है। स्कूल इन बच्चों को ना सिर्फ शिक्षित करता है, बल्कि अपने पेरों पर खड़े होने में भी सहायता करता है। रुद्रांश  आज भी बोल नहीं पाता, लेकिन प्रभावशाली मुस्कान से सबको अपना बना लेता है। वहां आये बच्चो के स्केच बना कर उन्हें खुश और फिर से आने को प्रेरित करता है। हॉस्टल में रहता है। घर नहीं आना चाहता। शायद वो काली यादें उसे डराती हैं।

इस बातचीत के दौरान वह लगातार मेरा हाथ अपनी हथेलियों में पकडे रहा मानो अब कभी नहीं छोड़ेगा। लेकिन माँ के समझाते ही अपना मोबाइल निकाल कर हिलते हाथो से मेरा फोटो लिया। मेरे पूछने पर कि‍ इसे मैं कैसे याद रही तो पता चला उन्होंने क्लास ग्रुप की इनलार्ज फोटो बनवा कर उसे दी है, जिसे वह अपने साथ रखता है।

मुझे लगा कि‍ मेरे संघर्ष का फल अगर ये वाला रुद्रांश है, तो मैं जीवन भर संघर्ष करने को तैयार हूं।

रुद्रांश…मेरी आँखें खोलने और मुझे गौरान्वित करने का शुक्रिया बच्चे!!
शुभकामनायें!!

शशि‍ काण्डपाल

शशि‍ काण्डपाल

भरतपुर लुट गयो रात मोरी अम्‍मा!

आज पढ़िए "कथादेश" के अप्रैल,2017 के अंक में छपी एक कहानी। अपनी राय और टिप्पणियां पोस्ट करना न भूलें।

माई के पास भर मुट्ठी पैसा लेकर आया तो झुनिया ने उसकी बंधी हुई दोनों मुट्ठी को भरपूर हथेली से चटाक से मारकर ऐसे झटकारा कि उसकी दोनों मुट्ठियों में फंसे पैसे छिटक कर पूरे घर में बिखर गए। झुनिया ने फिर झटकारकर उसकी एक कलाई पकड़कर उसे अपनी ओर खींचा और तड़-तड़ कई लप्‍पड़ जमा दिए –‘रे कोढि़या! कौन बोला तुमको पइसा लूटने को? हमरे कटिहारी मे भी अईसे ही लूटेगा?”
‘नहीं! तखनी तो हम तुमको कन्‍हा दिए रहेंगे न!’ लेरहा की मासूम बात से झुनिया को हंसी छूट गई। उसने लेरहा को धर के गोद में दबोच लिया और उसे पकड़-पकड़ कर झुलाने और गाने लगी -
राम-लछुमन सुगा उडि़ गेल अंगनमा से
जिनगी के सांस आएल मोरा भरतवा से!
लेरहा माई के पंजरा में मुंह छुपा के सांस लेता रहा। उसे माई का ई लाड़ बहुत अच्‍छा लगता है। माई के पेट की हल्‍की गर्मी से उसको नींद आने लगती है। नींद के झोंके में वह सपने में विचरने लगता है। उस सपने में वह अपने चारों ओर पैसे ही पैसे देखता है। मेघ से पानी के बदले पैसे की बरसात- सफ़ेद ओले की तरह सफ़ेद- सफ़ेद सिक्के! अब तो चवन्नी-अठन्नी का चलन ही खतम हो गया है। एक रुपए-दो रुपए के सिक्के!
झुनिया ने गुस्‍से भरा हाथ लेरहा की जिन हथेलियों पर मारी थी, उन्हें अब प्‍यार से सहला रही थी। हथेली सहलाते- सहलाते उसकी नजर अगल-बगल छिटके पैसों पर पड़ी। लेरहा माई के पेट में मुंह घुसाए सो गया था। उसकी छूटती सांस की गर्मी झुनिया को भी लग रही थी। लेकिन उस गर्मी से ज़्यादा उसको इधर-उधर बिखरे पैसे नज़र आ रहे थे। उसने धीरे से सोए हुए लेरहा को जमीन पर लिटाया और पैसे समेटने लगी – साढ़े बारह रुपए। “मुंह-मरौना के! ई अठन्नी काहे लागी सब लुटाता है! है कोनो मोल आजकल इसका जो बाज़ार में कोनो लेगा?”
झूलन साहू की एक सौ दो बरस की माई मरी है। अंग्रेजी बैंड के साथ उसका जनाजा उठा है। भर गांव और शहर मय्यत में शामिल हुआ है। बनिया है झूलन साहू। खूब पैसेवाला। खूब लुटा रहा है पैसा। लेरहा और उसके जैसे बच्‍चे खूब लूट रहे हैं – पैसा! खाली पैसा!! बताशा, मखाना, फूल और मूढ़ी चुनने-बीछने वाली चीजतो है नहीं। कई बार एक ही पैसे पर दो-दो, तीन-तीन लूटनेवाले हा‍थ पड़ते। सब आपस में छीना-झपटी करते। मार-पीट हो जाती- गाली-गलौज तो साधारण बात थी। मुंह-कान फूट जाते। पैसा जिसे मिलता, वह विजयी भाव से सभी को देखता। जिसे नहीं मिलता, वह खिसियाहट मिटाने के लिए आगे बढ़ जाता।
लेरहा कभी छीना-झपटी में नहीं पड़ता। वह मराछ है और देह से तनिक कमजोर। उसके ऊपर के दो-दो भाई चले गए। झुनिया ने बड़े शौक से उनके नाम रखे थे- रामचन्‍नर और लछुमन। साल बीतते-बीतते दोनों भाई एक-एक करके बंसवाड़ी में दफन हो गए। लेरहा के जन्‍म पर सभी ने कहा- ‘गे! इसको बेच दे किसी के हाथ। और बढि़या नाम मत रख।‘
झुनिया का मन था, इसका नाम भरत रखे। जिनगी और मरण अपने हाथ में है का? भगवान के यहां से इतनी ही जिनगी लिखाकर लाए थे दोनों पूत!
बगलवाली गोबरा माय के हाथ एक पसेरी चावल में बेच दिया अपने भरत को। बहुत लार चूआता था छुटपन में। सभी ने कहा –‘गे, बहुत लेरचुअना है ई तो। रख दे नाम लेरहा!’
झुनिया ऊपर से लेरहा और मन में पुकारती – भरत! झुनिया को रामायण बहुत पसंद है। राम समेत चारो भाई। सिया-सु‍कुमारी। सीधी-सच्‍ची कोसिल्‍ला माई आ हड़ाशंखिनी कैकेयी। सबसे तो नट्टिन निकली मंथरा। भरत जैसा भाई कहां आजकल मिलेगा जो राजपाट छोड़ के भाई का खड़ाऊं पूजे! उसने जमीन पर सोए लेरहा का मुंह प्‍यार से चूम लिया –‘हमर भरत!’
भरत दो महीना पहले ही गीत सुनके आया है – ‘भरतपुर लुट गयो रात मोरी अम्‍मा!’ जब-तब गुनगुनाता है। झुनिया के पूछने पर बताता है –‘दशहरा के नाटक में बाई जी आई थी नाचने। ओही गा रही थी। मेरा नाम आया तो हम रट लिए ई लाइन। लोग सब ई लाइन पर खूब पिहकारी मारे। सबको हमरा नाम एतना पसीन है माई!’
झुनिया ने बरज दिया- ‘बाई जी लोग का गाया गीत नहीं गाते। खराब होता है।‘ गीत की लाइन पर तनिक मुसकाई थी। कैसे बताए इस नन्‍ही जान को इस लाइन का मतलब! बड़ा होकर खुदे बूझ जाएगा।‘
लेरहा की ज़बान पर जैसे ई गीत चढ़ गया। उसकी बचकानी आवाज में वह गीत अच्छा भी लगता। एक हल्‍की मुस्‍कान झुनिया के मुंह पर आ जाती। धीरे-धीरे उसकी जबान पर भी चढ़ गया- ‘भरतपुर लुट गयो रात मोरी अम्‍मा!’ ललाइन के घर काम करते हुए वह भी यही लाइन गुनगुना रही थी। खूब किताब सब पढ़ानेवाली ललाइन बोली थी कि यह तो गुलाबबाई का गाया गीत है। भरी महफिल में वह गाती थी। ललाइन एक किताब उठा लाई थी- ‘देखो, गुलाबबाई की जीवनी। ये उसकी तस्वीर! ...ये देखो, राष्ट्रपति से पुरस्कार लेती गुलाबबाई! झुनिया को सब अच्छा लगा, लेकिन यह सोचकर उसके कान लाल हो गए- ‘अगे मैया! कैसे गाती होगी सारे मरदों के बीच में? सरम नहीं लगता था!’
शर्म झुनिया को भी नहीं आती है। लेरहा के लूटे पैसों से अनाज खरीदते। कहने को हर बार लेरहा के लूटे पैसे पर बिगड़ती है। लेरहा को झड़पती- मारती है। मगर फिर उसी पैसे से ज़रूरत का सामान भी लाती है। जैसे अभी इन्हीं पैसों को लेकर वह बाजार जाएगी। लेरहा फर्माईश कर चुका है, दो दिन पहले- ‘माई! बगिया खाएंगे। झुनिया ने उसे छेड़ा था- ‘पूरा बगइचा खा जाएगा? रामजी की बगिया? सीता जी की बगिया!’
लेरहा बोला –‘ऊँ...! पिट्ठा!’ झुनिया फिर मुस्‍काई। लेरहा तुनुककर बाहर भागा और गोबरा और अन्य बच्चों के साथ खेलने में मगन हो गया। गोबरा और बाकी साथियों की आज रात की प्लानिंग थी। लेरहा सुनने लगा। सुन-सुन कर सनसनाता रहा। सोचता रहा, इस प्लान में शामिल हो कि नहीं! शामिल होने पर माई को बताना पड़ेगा।
अगहन चढ़ गया था। धनकटनी हो रही थी। झुनिया धान काट रही थी। मजूरी में धान मिल रहा था। एक पसेरी धान सुखाकर चावल कुटा लाई थी। खुद्दी (टूट चावल) से आटा पिसवा लिया था। जितना धान-चावल इकट्ठा कर ले, उतना बढ़िया। छह महीना तो चल जाए कम से कम। लेकिन खाली भात ही तो नहीं चाहिए न! बाद में तो उसी चावल को अधिया पर बिछाकर दाल-तेल सब खरीदना पड़ता है। तब भात की अवधि छह महीने से घटकर तीन-चार महीने में सिमट जाती है।
लेरहा के लूटे पैसे बीच-बीच में राहत का काम कर जाते। तेल-मसाला, तरकारी और कभी-कभी मछली। लेरहा को सरसो के मसाले में पकाई गई रोहू मछली और उसना चावल का भात बहुत पसंद है। उस दिन उसका जैसे पेट ही नही भरता। उस दिन झुनिया ज़्यादा चावल पकाती। कभी कभी लेरहा ढेबरा में से एकाध मछली पकड़ लाता। वह उसको आग में पकाकर उसका चोखा बना देती।
बाजार से वह चना दाल ले आई और भिगो दिया। सोए लेरहा को उठा कर मांड़ भात खिलाते हुए सूचना दी –‘सांझ में खाना बगिया।‘ लेरहा मुस्‍काया और मुंह धोए बगैर बाहर भाग गया।
शाम चार बजे ही झुनिया ने चने की दाल के साथ लहसुन-मिर्च सिल पर पीस लिया। फिर उसमें नमक और हल्‍दी मिलाया। कड़ाही चढ़ाकर तीन कटोरी पानी उबलने के लिए डाला। पानी उबला तो उसी कटोरी से तीन कटोरी चावल का आटा उबलते पानी में डाल उसे चांड़ने यानी पकाने लगी। पल भर में आटा सारा पानी सोख गया। आटा फैलकर भर कड़ाही हो गया। झुनिया ने उसे कठौती में खाली किया और ठंडे पानी का छींटा दे-देकर गूंथने लगी। हाथ तो जलते हैं, लेकिन यह ज़रूरी है। ठंढा करके गूंथने से आटे में गांठ पड़ जाती है।
इस बीच उसने तसले में पानी उबलने के लिए चढ़ा दिया। आटा गूंधने के बाद उसने उसकी छोटी-छोटी लोई काटी। लोई की छोटी-छोटी पूरी हाथ से ही थपक ली। पूरी पर पिसी हुई दाल फैलाई और बीच से मोड़ कर मुंह बंद कर दिया- सफेद-सफेद आधे चांद सा पिरकिया! तसले में उबलते पानी में बगिया बना-बनाकर डालती गई। भाप से पका बगिया ज़्यादा अच्‍छा होता है, मगर आज उसने उसे पानी में उबाल दिया। लहसुन-मिर्च की चटनी पीसी और लाल मिर्च का अचार! उसके अपने ही मुंह में पानी आ गया। लेकिन कैसे पहले खुद ही खा ले। जिसके लिए बनाया है, पहले वो तो मुंह जुठिया ले। लेकिन उसके भी पहले, चार बगिया गोबरा माय को दे आई। आखिर उसी ने उसके लेरहा को खरीदा है न! एक टुकड़ा चखने को हुई, मगर छोड़ दिया –‘पहले मेरा भरत खा ले।‘
झुनिया का भरत शाम में अपने हम उमर छोकरों के साथ खेल रहा था। गोबरा बोला –‘आज तो बड़का भारी बरियाती है। पता है, फिलिम का हीरो है।‘
‘तुमको कइसे पता कि ऊ फिलिम का हीरो है।‘
‘सुंदर लोग हीरो ही होते हैं। हीरो का बरियाती है। सुने हैं, खूब बढि़या-बढि़या खाना बना है।’
‘बढि़या खाना है तो क्या तुमको बुलाकर प्‍लेट पकड़ाएगा?’
‘अरे, बरियतिया सब जितना छोड़ेगा, दंतकट्टा नहीं, सा‍बुत, उतने में अपना लोग चार दिन खाएंगे।’
‘छि:! जुट्ठा! ...हम अपना घरे खाएंगे। माई बगिया बनाई है।’
‘रे! माई तो फिरो बना देगी। हीरो का बियाह फिर थोड़े यहां होगा! सुने हैं कि औरत और लड़की सब भी आई है। बरियाती में ऊ लोग भी नाचेगी। आज तो बरियाती भी खूब सान से निकलेगा। खूब पइसा लुटाएगा। चल!’
गोबरा और उसकी हमउम्र के बच्चे अपनी प्लानिंग के मुताबिक जनवासा पहुंच गए थे।  घराती इन्‍हें डांट-भगा रहे थे। पर, ये सब दूल्‍हे को देखने के लिए हुलुक रहे थे- किसके जैसा होगा? सलमान खान? शाहरुख खान? शाहिद कपूर?
दूल्‍हा तो नहीं, दूल्‍हे की शेरवानी की एक झलक दिखी। वे लोग और ज्यादा हुलकने लगे- कपड़ा एतना बढ़िया है, तो दुलहा तो सहिए में हीरो होगा!
लेरहा कई बार पूछ चुका था झुनिया से- ‘माई गे! हम भी बरियाती में बत्‍तीवाला हंडा उठाएं? गोबरा, मुंगरा सब उठाता है। बीस-बीस रुपइया मिलता है।’
‘न...ई...!’ झुनिया चिल्‍ला पड़ी। उसको बत्‍ती से बहुत डर लगता है- बरियाती में आगे-आगे जानेवाला बत्‍तीवाला हंडा जेनेरेटर से चलता है- यह मालूम होने के बाद भी। लेरहा के बाप ने ही बताया था। वह बरियाती में हंडा उठाता था। बिजली-बत्ती का कारोबार भी थोड़ा-बहुत जानता था। ऐसे ही किसी के बियाह में लेरहा का बाप फ्यूज ठीक कर रहा था कि कुछ और। मेघ-बुन्नी का दिन था। लेरहा के बाप की देह से बिजली का कोई एक तार सट गया और खून सोखकर ही उसकी देह को छोड़ा। लोग लाख लकड़ी से मारते रहे, बाकिर...! तब से झुनिया को बत्‍ती से बहुत डर लगता है।
लेरहा मन मसोस के रह जाता। एकाध बार सोचा, उठा लेते हैं। माई बरियात देखने थोड़े ना आएगी। लेकिन डर लगा- ‘छौंड़ा सब ही चुगली लगा आएगा। शादी में उसकी आमदनी का एक ही जरिया है- बारातियों द्वारा लुटाए गए पैसे लूटना।
हीरो की बारात निकली- धूमधाम से। उनलोगों की चक-मक देखकर लेरहा और उसके झुंड के सभी बच्चों को लगा कि सही में, पैसेवालों की धज ही अलग होती है। नए-नए फैशन के कपड़े, गहने हेयर स्‍टाइल। बारात के संग आई औरतें- लड़कियां बैंड की धुन पर जी खोल नाच रही थी। वे सभी हीरोइने लग रही थी। दूल्हे के साथी भी हीरो से कम नहीं लग रहे थे।
बैंड बजना शुरू हुआ। बारात निकल पड़ी। लेरहा और उसके साथी बारात से एक दूरी बनाकर चल रहे थे। उनकी आँखें नोट की गड्डीवाले हाथों को खोज रही थी। मय्यत में न रेजगारी! बियाह में तो नोट! इनलोगों को अंदाजा हो गया था, दूल्‍हे को औंछकर नोट उड़ाएगा तो नोट कहां तक जाकर उड़ेगा, रूकेगा।
एक सजे-धजे, मस्‍त, सुन्‍दर, भरी सी डील-डौलवाले एक सज्‍जन ने अपने सूट से करारे नोटों की गड्डी निकाली! गुलाबी रंग! लंबे नोट! अरे बाप रे! ई तो बीस टकिया है रे! एको गो मिल गया तो बूझो... मारे खुशी के लेरहा और उसके साथी आगे की सोच ही नहीं सके। सभी की सांसें अटक गई- बीस रुपए के गुलाबी नोट! किसी ने उन सज्जन को पुकारा- ‘मामा जी!’ लेरहा और साथी रिश्‍ता समझ गए। मामा हैं न, इसलिए जी खोल कर पैसा लुटाएगा।
मामाजी ने गड्डी में से लगभग एक चौथाई नोट निकाला, दूल्‍हे पर औंछा और एक साथ हवा में उछाल दिया। नए, करारे नोट अपनी चिकनाई में ताश के नए पत्‍तों की तरह एक-एक कर अलग-अलग होकर उड़े और फिर जमीन पर गिरने लगे। बैंड बज रहा था। बैंड मास्‍टर भौंड़ी आवाज में गा रहा था –
‘तूने मारी एंट्री यार, दिल में बजी घंटी यार,
टुन, टुन.... टूनानन, टुन-टुन!
अनेकानेक घंटियां लेरहा और उसके साथियों के दिलों में भी बजी। नोट नीचे गिरे, इसके पहले ही सब उसे लपकने को उछले।
बारात देखने के लिए पूरा कस्‍बा उमड़ा पड़ा था। शोहदे बारात की लड़कियों को छूना चाह रहे थे। इसलिए बरात के साथ घराती और कुछ बाराती उनके लिए सुरक्षा घेरा बनाकर चल रहे थे। हर दालान से बूढ़े और बाकी मर्द सड़क पर आ गए थे। बहुएं दालान या दरवाजे के पीछे से झांक रही थीं। बेटियां सामने थी। बूढि़या बैठी थीं। बैंड का संगीत, गीत, रोशनी और बारात के चारो ओर लगी स्थानीयों की भीड़ अजीब अफरातफरी पैदा कर रही थी।
नोट इसी के बीच उड़े। लेरहा ने दोनों हाथों में नोटों को पकड़ा। चार-पांच नोट उसके हाथ में आ गए। आज तो! उसका दिल बल्लियों उछलने लगा। माई भी खुश हो जाएगी। इस बार उसकी शर्ट-पैंट पक्की। माई से बोलकर अबकी वह जींस लेगा और एक कैप भी। वह नोटों को संभाल ही रहा था कि एक मुट्ठी नोट फिर से हवा में लहराया। लेरहा ने बमुश्किल हाथ के नोट को पैंट की जेब में डाला और जोर से हवा में उछलते नोट को पकड़ने के लिए पूरे दम से उछला- पैसा आ रहा है ना। एक जोड़ी जुत्ता भी।
उछाले गए नोट हवा में इधर-उधर बिखर गए। लेरहा अपनी ही उछाल को संभाल न सका और बगल के बिजली के खंभे से जा टकराया। खंभे ने उसे गेंद की तरह बाउंस किया और वह वापस धरती पर आ गिरा। जमीन पर वह जहां गिरा, वहां चट्टाननुमा एक पत्‍थर पड़ा था । उसका माथा उस पत्थर पर पड़ा। ज़ोरदार चीख और धमाके की आवाज साथ-साथ आई। हाथ में आए नोट इधर-उधर बिखर गए।
लेरहा की चींख बैंड की धुन से भारी निकली और खून के छींटे सुरक्षा घेरा तोड़ कर लड़कियों तक जा पहुंचे। लड़कियों की भयंकर चीख भी इसमें शामिल हो गई। लड़कियों को संभालते और बाकी बच्चों को थपियाते, गरियाते घराती सभी बारातियों और दूल्हे को लिए-दिए आगे निकल गए। बारात के एकदम आगे बैड बज रहा था। बैंड मास्टर गा रहा था-
‘बलम पिचकारी, जो तूने मुझे मारी
तो सीधी-साधी छोरी शराबी हो गई।‘
मामा जी ने गड्डी से बचे हुए नोट निकाल लिए थे और हवा में लहराने के लिए हाथ भांज रहे थे। बाकी बच्चे उसे लूटने के लिए मामा जी के हाथ का निशाना साध रहे थे।
लेरहा खून के तालाब में डूबा हुआ था। गोबरा भागकर झुनिया को खबरकर फिर से बाराती के पीछे भाग गया- आज तो बिसटकिया है! छोड़ा नहीं जा सकता।
आज झुनिया को लेरहा की पिलानिंग की कोई खबर नहीं थी। वह खुश थी कि आज उसने बिना परेशानी के जल्दी ही लेरहा की बगिया खाने की साध पूरी कर दी थी, वरना उसकी एक छोटी सी फरमाईश पूरी करने में भी उसे दिनों लग जाते। ललाइन से बार-बार पैसे मांगते उसे शरम आती। बीच बीच मे मांगने से पगार के एकमुश्त पैसे भी निकल जाते। लेरहा को न आते देख वह गुस्से से लाल हो रही थी। उसे खुद भी बगिया बहुत पसंद था। कई बार उसका हाथ उसकी ओर बढ़ा था- एक खा ही ले। लेकिन, वह चाहती थी कि पहले लेरहा खाए। उसे देर होते देख बगिए को बार-बार देखती झुनिया ने तय किया कि आज वह उसको खाना भी नहीं देगी और सटकी से मारेगी भी। मन ही मन वह उसको गरियाए भी जा रही थी कि गोबरा की खबर से चिहुँक पड़ी और भागी बरियाती की ओर।  
गांव-कस्‍बे की बारात देर से लगती है, देर से शादी होती है। रोशनी के हंडे बारात के आगे चलते चले जाते हैं। अंधि‍यारा बारात के पीछे रह जाता है। फिर भी इतनी रोशनी तो थी ही कि नोट की शकल दिख जाए।
लेरहा की पैंट से लूटे हुए नोट झांक रहे थे। किसी ने लेरहा की पैंट से नोट निकाला और नोट को देखते ही पिच्च से थूका और गंदी गालियों से बारात को भिगोने लगा- ‘साला, मादर...! कौन बोला था नोट लुटाने को रे हरामी का जना! देखो हो भाई लोग ई बड़का-बड़का लोग के बरियाती का करिस्‍तानी। बहुत देखा रहे थे कि बीसटकिया लुटा रहे हैं।’
 लूटे गए सभी नए नोट पर महात्‍मा गांधी की तस्‍वीर की जगह ‘बाल-वीर’ सीरियलवाले हनुमान की तस्‍वीर चिपकी हुई थी। सभी का गुस्‍सा बारात के छोड़े गए रॉकेट से भी ऊपर पहुंचा- ‘नकली नोट लुटा रहे थे, साले, हरामखोर!
 झुनिया ने नोटों को नहीं देखा। वह खून में डूबे लेरहा का मुंह भर देख रही थी। उसकी आँखों के सामने दिन में लूटे गए झुम्मन साहू की माई की मय्यत से लूटे गए पैसे याद आए और उन पैसों से बनी बगिया। बगिया ठंढी हो गई थी। लेरहा को मारने के लिए राखी हुई सटकी किसी कोने में बिसूर रही थी। झुनिया ने दिन की तरह ही लेरहा का माथा अपनी गोद में भरा और बैंड-पटाखे से भी ऊंची आवाज में डकरी- ‘भरतपुर लुट गयो रात मोरी अम्‍मा!’
रात धीरे-धीरे भीग रही थी। गुलाबबाई सभी की जबान पर बस गई थी। नोट के ‘बाल-वीर’ हनुमान कह रहे थे- ‘भूत-पिसाच निकट नहीं आवै, महावीर जब नाम सुनावै।‘ महावीर अदृश्य भूत-पिशाच को निकट नहीं आने दे सकते हैं, मगर हनुमान जी भी नहीं समझ पा रहे थे कि धरती पर के इन जीवित पिशाचों से कैसे और किसको बचाएं!’ #####






 

IVR Systems – 1

When you use an IVR system, most of them ask you to enter some kind of access code, such as the credit card number and other details. Combined with the fact that you are calling from your registered phone (which should be enough to identify you), by the time you reach the customer representative, they […]

बौद्ध-धर्म और कम्युनिज्म / बाबासाहब भीमराव अम्बेडकर

[नवम्बर 1956 में,विश्व-बौद्ध-सम्मेलन काठमंडू (नेपाल) में दिया गया बाबासाहेब का व्याख्यान]

मित्रों!आज जिस युग में हम विचर रहे हैं,उसमें संसार के बुद्धिवादी विचारकों को मानव जीवन को सुखी एवं समृद्ध बनाने के लिए केवल दो ही मार्ग ही दिखाई पड़ते हैंः पहला मार्ग साम्यवाद का है और दूसरा बौद्ध-धर्म का।शिक्षित युवकों पर साम्यवाद (Communism) का प्रभाव अधिक दिखाई देता है,इसका प्रमुख कारण यह है कि साम्यवाद का प्रचार सुसंगठित रूप से हो रहा है,और इसके प्रचारक बुद्धिवादी दलीलें पेश करते हैं।बौद्ध-धर्म भी बुद्धिवादी है,समता-प्रधान है।और परिणाम की ओर ध्यान दिया जाए,तो साम्यवाद से अधिक कल्याणकारी है। इसी तत्त्व पर अपने विचार आपके आगे रखना चाहता हूं।क्योंकि मैं समझता हूं,यह बात शिक्षित युवकों के आगे रखना अति आवश्यक है।

मेरे विचार में साम्यवाद की इस चुनौती को स्वीकार करते हुए बौद्ध-भिक्षुओं को चाहिए कि वे युगानुरूप अपनी विचार-पद्धति एवं प्रचार-कार्य में परिवर्तन करें और भगवान बुद्ध के विचार विशुद्ध रूप में शिक्षित युवकों के सामने रखें।बौद्ध धर्म के उत्थान और उन्नति के लिए इसीकी अत्यन्त आवश्यकता है।यदि इस काम को बौद्ध भिक्षु उचित प्रकार से न कर सकेंगे,तो बौद्ध धर्म की बहुत हानि होगी।इसमें तनिक भी संदेह नहीं है।सारे संसार में व्याप्त कम्युनिज्म को भगवान बुद्ध की विचार प्रणाली में केवल यही उत्तर है कि मानव-जीवन को सुखी बनाने का साम्यवाद एक समीपी किन्तु टेढ़ा मार्ग है। बौद्ध-धर्म यद्यपि अपेक्षाकृत एक लम्बा रास्ता है किन्तु इस समीपी और टेढ़े रास्ते पर चलने की अपेक्षा यह एक सुन्दर,हितकर,समुचित और सम्यक राज-मार्ग है।

मार्क्सवादी साम्यवाद के मार्ग में संकट है,विपत्तियां हैं,इसीलिए उस मार्ग से हमें जहां पहुंचना है,वहां पहुंच पायेंगे या नहीं,इसमें संदेह है।

मार्क्सवादी साम्यवादी की मुख्य बात यह है कि संसार में आर्थिक शोषण से उत्पन्न विषमता के कारण ही बहुसंख्यक लोग दीन और दास बनकर कष्ट उठा रहे हैं।इस आर्थिक विषमता के शोषण और लूट को रोकने का एक ही रास्ता है,जिसके द्वारा व्यक्तिगत सीमित अधिकार को नष्ट किया जाए और उसकी जगह संपत्ति का राष्ट्रीयकरण या सामाजीकरण करके राष्ट्रीय अधिकार को अधिष्ठित किया जाय,जिससे श्रमिकों के राज्य की स्थापना हो,शोषण बंद हो और श्रमजीवी-वर्ग सुखी हो।

बौद्ध-धर्म का मुख्य तत्त्व भी मार्क्सवाद के अनुसार ही है। इसके अनुसार संसार में दुख है और उस दुख को दूर करना आवश्यक है।भगवान बुद्ध ने भी जिस दुख का निरूपण किया है,वह सांसारिक दुख ही है।बुद्ध-वचनों में इसके अनेक प्रमाण पाए जाते हैं। बौद्ध-धर्म अन्य धर्मों की भांति आत्मा और परमात्मा के संबंध पर आधारित नहीं है,बौद्ध-धर्म जीवन की अनुभूति पर अधिष्ठित है।दुख का पारलौकि अर्थ लगाकर पुनर्जन्म से उसका संबंध जोड़ना बुद्ध-मत के विरुद्ध है।संसार में दरिद्रता में जन्म लेकर प्लनेवाले दुखों का नाश होना अनिवार्य आवश्यक है।यह मान लेने के बाद देखना होगा कि इस दुख को हटाने के भगवान ने कौन-कौन से मार्ग बताये हैं। भगवान बुद्ध ने आदर्श बौद्ध समाज के तत्त्व संघ के अन्तर्निहित किए हैं।संघ में व्यक्तिगत संपत्ति के अधिकार के लिए कोई स्थान नहीं है।भिक्षु को केवल आठ चीजें अपने पास रखने का आदेश है।इन आठों में सबसे पहला वस्त्र है।इसमें भी परिग्रह की भावना का निर्माण न होने पाये,इस बात का ध्यान रखना आवश्यक है।

संपत्ति पर व्यक्ति -विशेष का अधिकार सारे अनर्थों का कारण है यह बात भगवान बुद्ध ने कार्ल मार्क्स से चौबीस सौ वर्ष पहले जान ली थी।बुद्ध और मार्क्स में जो अन्तर है,वह केवल उस दुख के दूरीकरण के लिए बताए हुए उपायों में है।मार्क्स के मतानुसार संपत्ति पर से व्यक्ति का अधिकार हटाने का एक-मात्र साधन बलप्रयोग है,इसके विपरीत भगवान बुद्ध के विचारानुसार करुणा,मैत्री,समता,प्रेम,तृष्णा का त्याग,विराग आदि प्रमुख साधन हैं।बलपूर्वक सत्ता ग्रहण करके साम्यवादी अधिनानायकी स्थापित करके व्यक्तिगत अधिकार नष्ट करने में मार्क्सवादी प्रणाली थोड़े दिनों तक अच्छी मालूम होती है,इसके बाद कटु हो जाती है।क्योंकि बलपूर्वक अधिष्ठित अधिनायकी तथा उसके द्वारा आरंभ होने वाले हत्याकांड की परिसमाप्ति कब होगी,इसकी निश्चयता नहीं है।और यदि अधिनायकी कहीं असफल हो गयी ,तो फिर अपरिमित रक्तपात के सिवा और कोई मार्ग नहीं रह जाता। हिंसा के द्वारा स्थापित समता समाज में दृढता नहीं हो पाती,क्योंकि बल का स्थान धीरे-धीरे किस अन्य तत्त्व द्वारा ग्रहण किया जायेगा,इसका कोई उत्तर मार्क्स की मत-प्रणाली में नहीं है। हिंसा-प्रधान साम्यवादी शासन-प्रणाली में -शासन-चक्र अपने आप ही धीरे-धीरे नष्टप्राय होता जायेगा।यह बात भ्रममूलक नहीं है।

इसके विपरीत बुद्ध-प्रदर्शित अहिंसा,करुणा,मैत्री,समता द्वारा दुखों और क्लेशों की निवृत्ति का मार्ग श्रेयस्कर है,क्योंकि वह चित्त की विशुद्धि और हृदय-परिवर्तन के पुनीत तत्त्व पर आधारित है।मनुष्य के जीवन को सुखी बनाने के लिए नैतिक रूप से उसके मन को सुसंस्कृत करना अनिवार्य आवश्यक है,इस बात पर भगवान बुद्ध ने जितना अधिक ध्यान दिया उतना शायद संसार के किसी भी धर्म-प्रवर्तक या विचार-प्रणाली ने नहीं दिया।मनुष्य में विवेक हमेशा जागृत और सक्रिय बनाये रखने के लिए सदाचरण या शील को श्रद्धा का अधिष्ठान प्रदान करना भगवान बुद्ध का हेतु या लक्ष्य है। शील या सदाचरण को श्रद्धा का रूप प्राप्त होने के बाद दुख कम करने के लिए अर्थात शोषण और आर्थिक लूट रोकने के लिए बलप्रयोग की आवश्यकता नहीं रहती। ”State shall wither away.”(राज्य स्वयं सूख जाएगा) लेनिन का यह मधुर स्वप्न यदि साकार होगा,तो वह बलप्रयोग द्वारा स्थापित की हुई अधिनायकी द्वारा नहीं,वरन बुद्ध-प्रदर्शित शील-सदाचार और विशुद्धि-तत्त्व से ही होगा।

अदिनायकी का भगवान बुद्ध ने विरोध किया है।अजातशत्रु के एक मंत्री ने एक बार उनसे प्रश्न किया-“भगवन! बज्जियों पर हम किस प्रकार विजय प्राप्त कर सकेंगे?”भगवान बुद्ध ने उत्तर में कहा-“बज्जी लोग जब तक गणतंत्र-शासन का संचालन बहुमत से करते रहेंगे,तब तक वे अजेय हैं।जिस दिन बज्जी गणतंत्र शासन-प्रणाली को त्याग देंगे, उसी दिन वे पराजित हो जायेंगे।”भगवान बुद्ध का यह नीतिप्रधान लोकतंत्र का मार्ग मार्क्सवादी अधिनायक-तंत्र की पएक्षा अधिक हितकर एवं चिरस्थायी है।मुझे आशा है साम्यवाद का यह कल्याणकारी प्राचीन मार्ग यदि आज भी हम युवक समाज के सामने समुचित रूप से रख सकें,तो यह उन्हें आकर्षित किये बिना न रहेगा।

भगवान ने पने भिक्षुओं को “बहुजन-हित और बहुजन-सुख” के लिए आदेश किया था कि “संसार की हर दिशा में जाकर मेरे इस आदि में कल्याण करनेवाले,मध्य में कल्याण करनेवाले और अंत में कल्याण करनेवाले धर्म का प्रचार करो और विशुद्ध ब्रह्मचर्य का प्रकाश करो।”किंतु आज हम देखते हैं,भिक्षुगण मनमुख हो अपने-अपने विहार में रहकर आत्मोन्नति का मार्ग ढूंढ़ रहे हैं।यह कदापित उचित और हितकर नहीं है। बौद्ध धर्म एकांत में आचरण किया जानेवाला कोई रहस्यमय आचार नहीं है,यह एक प्रबल सामाजिक संघ-शक्ति है।आज भी विनाश की भयानक चोटी पर खड़े संसार का मार्ग दिखाने का सामर्थ्य इस शक्ति में है। भगवान बुद्ध के आदेश को स्मरण रखते हुए उनके पवित्र कल्याणकारी धर्म का चारों ओर प्रचार करने की चेष्टा भिक्षुओं को करना चाहिए।

नोट(अनुवादक का)-कम्युनिस्ट और कम्युनिज्म के संबंध में बाबासाहेब ने अपने लाहौर वाले भाषण “जातिभेद का विनाश” में तथा नागपुर के भाषण” हम बौद्ध क्यों बनें?” में भी अच्छा प्रकाश डाला है।ये दोनों व्याख्यान अलग-अलग छपे हैं।


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चुपचाप अट्टहास : 29 - बहुत देर हो चुकी होगी

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मैं गाँधी का मुखौटा बनाता हूँ
कोई डरता है कि मुझे क्या हो गया है
कोई सोचता कि मैं भटक गया
या कि सुधर गया हूँ


मैं नहीं खोया
ज़मीन में गड़े मटकों सा हूँ
गल पिघल जाती है मिट्टी
मैं रहता हूँ वहीं जहाँ टिका था
मैं मैं हूँ नहीं
कैसे खोऊँ अपने आप को
इसे इश्क में वफादारी कह दो
हारूँ या जीतूँ
मुखौटा गाँधी का हो कि बुद्ध का
पैने रहेंगे मेरे दाँत
जानोगे जब गहरी नींद में होगे तुम
महसूस करोगे अपनी गर्दन पर
बहता हुआ ख़ून जो मेरी जीभ सोखेगी
जब गड़ जाएँगे दाँत
थोड़ी देर तुम्हें भी होगा उन्माद
फायदा कुछ तुम्हें भी तो है
कि अँधेरे के इस दौर में
जगमगाती है रोशनी तुम्हारे घर
तुम्हें भी यात्राओं का मिलता है सुख
जब कल्पना में ही सही उड़ लेते हो तुम मेरे साथ
जब तक तुम जानोगे
रोशनी है अँधेरे से भरी
बहुत देर हो चुकी होगी
गाँधी के पदचिह्न मिटाता अपने कदमों आता तुम्हें सहलाऊँगा
उसी गर्दन पर उंगलियाँ फेरते हुए
जहाँ से तुम्हारा ख़ून पिया था।


I make masks that look like Gandhi
Some wonder what has happened to me
Some fear that I may have gone bonkers
Some think that I have reformed myself


I am not lost
I am like clay pots buried in earth
The clay dissolves eventually
I remain where I was
How can I lose myself
when I am not myself
You may call it loyalty in love
I may lose or I may win
The mask I wear my be Gandhi or Buddha
My teeth remain sharp as ever
You will know it only when in deep slumber
you feel on your neck
Blood flowing that my tongue will suck
When the teeth will dig inside you
You will enjoy it for a while
You too gain from it a bit after all
Your house shines in this age of darkness
You too enjoy travels
When even if in thoughts you fly with me
By the time you know
That the shine is filled with darkness
It will be too late
I will erase the footprints of Gandhi
And come on my own feet to comfort you


With my fingers rubbing the same neck
Where I sucked your blood from. 

चुपचाप अट्टहास: 28 - अंदर झाँक लो जब तक सब स्थिर

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 अंदर झाँक लो जब तक सब स्थिर इस गर्म रात को सिरहाने से आवाज़ें आ रही हैं
 सिरहाने पर कान रखकर बाएँ बगल पर टिककर सोता हूँ
 पलकें मूँदते ही निकल आते हैं जुलूस
 हुजूम चल रहा है और शोर बढ़ता आ रहा है    वे सामने दिखती हर चीज़ को चूरमचूर करते आ रहे हैं
 सेनापति ने योजनाएँ बनाई हैं कि कैसे इनको तबाह किया जाए
 व्यूह वापस बुलाए हैं हमने इतिहास के पन्नों से
पुराणों में से निकाल जीवंत किए हैं अश्वमेध-आख्यान सरकारें क्या पूरी कायनात को तबाह करने की योजना बन रही है    फिलहाल कायनात अपनी धुरी पर है
 शहरों में गगनचुंबी इमारतें स्थिर खड़ी हैं
 अँधेरे में जगमगाहट दिखती है खिड़कियों से आती रोशनी से
 अंदर झाँक लो जब तक सब स्थिर है
 देख लो एक किशोरी कैसे शांत सोती है
 उम्र ही ऐसी है कि कितनी साफ दिखती है दुनिया
 फिलहाल लुत्फ उठाओ मशीन की ठंड में काँपते हुए
आखिरी लड़ाई होनी है कल।



This night, hot, I hear voices from my pillow

I put my ears on the pillow and lie down on my left side

I close my eyes, I see the marches

The crowd marching and the noise approaching




They are crushing everything in sight

My commander has planned to eliminate them

We have looked at strategies learning from history

Ancient imperial victories have come alive

We plan to demolish not just Governments, but the creation.



For now the creation moves on its axis

The skyscrapers in the cities are standing robust

In the dark light shines in through the windows

Look inside when all is well

Look how a young girl sleeps in calm

Such is her age that the world appears pretty

For now enjoy the cooling machine when you can



 Tomorrow will be the last battle.  

लोकतंत्र की नाकामी से उपजता उन्माद

दखल की दुनिया - Sat, 08/04/2017 - 11:38
धर्म प्रकाश

अब तक भेदभाव खत्म हो जाने थे. धर्म और रेस के आधार पर हत्याएं बंद हो जानी थी. तीन सौ बरस से भी पहले दुनिया में आए लोकतंत्र की प्रेक्टिस को इतना तो करना ही था. पर हत्याएं बढ़ गई हैं और नफरत कई गुना ज्यादा उभर कर सामने आ रही है. यह सिर्फ हमारे अपने देश की हालात नहीं हैं, यह पूरी दुनिया में हो रहा है. अमेरिका में भी जहां लोकतांत्रिक प्रक्रिया में सबसे पहली भागीदारी हुई थी वहां भी लोग इसी तरह की नफरत दिखा रहे हैं. इतने लम्बे वक्त के बाद इस तरह की घटनाओं का होना कहीं न कहीं उस नाकामयाबी को दिखा रहा है जो लोकतंत्र से मिलनी थी. जिन मूल्यों के साथ लोकतंत्र आया था वह घटता जा रहा है. सबके लिए सब बराबर नहीं हो पा रहा. हमें तलाशी लेनी चाहिए. अपने देश के राजनीतिक विकास की, दुनिया के राजनीतिक विकास की. शायद पूरे लोकतंत्र के प्रणाली की ही तलाशी लेनी चाहिए. हमे यह समझने की कोशिश करनी चाहिए कि क्यों समता, समानता और बंधुत्व दुनिया में कमजोर पड़ रहा है.  
अलग-अलग देशों में इसके अलग-अलग रूप देखने को मिल रहे हैं. पर समग्रता में देखें तो लोगों में असहिष्णुता सब जगह बढ़ी है. हाल ही में ट्रंप सरकार आने के बाद अमेरिका में नस्लीय हमले बढ़े हैं. गैर-अमेरिकियों में एक असुरक्षाबोध पैदा हुआ है. जो एक मॉडर्न राष्ट्र के रूप में देखा जाता है और जहां लोग बेहतर जीवन और नौकरियों के लिए जाते रहे हैं रेस आधारित हिंसा और घटनाओं ने वहां लोगों में भय पैदा कर दिया है. ट्रंप जब चुनाव लड़ रहे थे तो उनके चुनावी अभियान में भी यह विभेद उनके भाषणों के तहत देखने में आ रहा था. अमेरिकी और गैर-अमेरिकी को मुद्दा बनाया जा रहा था. शायद वहां के लोगों ने इसे स्वीकार किया और उन्हें अपना मत दिया. जीतने के बाद जिसका प्रतिफल हम देख रहे हैं. लोगों के द्वारा इस तरह की नफरत को स्वीकार किया जाना ही इस बात को दिखाता है कि संरचना के तौर पर एक लोकतांत्रिक व्यवस्था का होना और लोगों में लोकतंत्र के मूल्य का स्थापित हो पाना दोनों अलग-अलग चीजें हो गई हैं. लोगों में वे लोकतांत्रिक मूल्य नहीं निर्मित हो पा रहे हैं जो रेस, जाति, धर्म को बराबरी से देख सकें. सबके साथ समानता का बर्ताव कर सकें.  
अमेरिका में जब दिन्दुस्तानियों पर हमला होता है तो हिन्दुस्तानियों के लिए यह शोक और दुख की बात होती है. उन्हें लगता है कि यह ग़लत हुआ. पर जब हिन्दुस्तान में नाइजिरिया और साउथ अफ्रीकन देशों के लोगों पर हमले होते हैं तो वे इन घटनाओं को ठीक वैसे नहीं देख पाते जैसे कि अमेरिका में गैर-अमेरिकी पर हुए हमले को देखते हैं. महाराष्ट्र में मनसे और शिवसेना बिहारियों के नाम पर उत्तर भारतीयों पर हमले करती रही है. मद्रासी कह के दक्षिण भारतीयों को निशाना बनाया जाता रहा है. नेपाली के नाम पर नॉर्थ-ईस्ट के लोगों को प्रताड़ित किया जाता रहा है. मुसलमानों को तो पूरी दुनिया में अलग-अलग तरह से हमले किए जा रहे हैं. उनके कई मुल्कों को तबाह कर दिया गया. इन सारे हमलों को हम अलग-अलग देशों और अलग-अलग संदर्भों के साथ देख सकते हैं. जबकि हम इसके मूल में जाएंगे तो एक ही कारण समझ में आएगा. बदले हुए अर्थतंत्र ने जो असुरक्षा पैदा की है उस असुरक्षा ने लोगों को उन्मादी बना दिया है. उसी असुरक्षा ने मुल्क की सरकारों को भी उन्मादी बना दिया है. बड़े मुल्क छोटे मुल्कों पर हमले कर रहे हैं और स्थानीय और ताकतवर लोग गैर-स्थानीय और कम ताकतवर पर हमले कर रहे हैं. यह बड़े पैमाने से लेकर छोटे पैमाने पर हितों की लड़ाई है.  
इन हमलों की वजह कई बार बहुत साफ तौर पर दिखती है. कई बार ये हमले बहुत अपरोक्ष होते हैं. कारण कोई और गिनाया जाता है लेकिन उसके पीछे की वजह कोई और ही होती है. इसे हमे समझने की कोशिश करनी चाहिए. पूरे दुनिया के स्तर पर अर्थव्यावस्था इस तरह से गड़बड़ हुई है कि राज्य अपने लोगों को रोजगार देने की स्थिति में नहीं है. दो करोड़ प्रति वर्ष नौकरियों का दावा करने के बाद भी हमारी केन्द्र सरकार कुछ हजार नौकरियां देने में भी असफल रही है. तकनीकी विकास ने कई प्राइवेट संस्थानों व अन्य संस्थाओं में भी नौकरियां कम कर दी हैं. ऐसे में लोग बेरोजगार और बेहाल स्थिति में हैं. कम से कम लोगों द्वारा ज्यादा से ज्यादा काम कराना ही इस मुनाफे की व्यवस्था के लिए लाभकारी है. यह वित्तिय व्यवस्था जितना ज्यादा और बढ़ेगी बड़ी पूजी और कम लोगों के हाथों में सिमटती जाएगी. रोजगार और कम होते जाएंगे. पूजी का डिस्ट्रीब्यूशन भी और कम होता जाएगा.
इस बेहाली के लिए राजनैतिक पार्टियां अलग-अलग तरह के वायदे लेकर आती हैं पर उनके लिए बेरोजगारी को दूर करना मुश्किल हो रहा है. ऐसे में वे बेरोजगारी की वजहों को बदल देती हैं और लोगों को दिग्भ्रमित करने का प्रयास करती हैं. वे यह बताने के बजाय कि राज्य अपनी नीतियों के कारण रोजगार देने में असफल हो रहा है यह बताती हैं कि स्थानीय की नौकरियां गैर-स्थानीय के हाथों में जा रही हैं. इस तरह से स्थानीय और गैर-स्थानीय के बीच एक नफरत को पैदा किया जाता है. सरकार खुद हमले न करके लोगों के भीतर इस तरह का भाव पैदा करती है कि वे ख़तरनाक हो जाते हैं. उन्हें उनका हित जाता हुआ दिखता है. वे सरकार की नीतियों पर सोचने के बजाय दूसरों के लिए नफरत की रणनीतियां तैयार करने लगते हैं. वे उन्मादी हो जाते हैं.भारत के संदर्भ में यदि हम देखें तो जो उन्माद दिख रहा है वह सिर्फ भाजपा के सत्ता में आने का उन्माद नहीं है. कांग्रेस के वक्त भी वे उन्मादी थे. बस यह उन्माद थोड़ा और बढ़ गया है. अमेरिका से लेकर नोएडा तक और दादरी से लेकर बाबरी तक जो लकीर खींची जा रही है. वह हमारे इतिहास के पन्नों से कई लाइने काट रही है. वह लोकतंत्र और संविधान की लाइन को भी काट रही है जिसके तहत हमे धर्मनिर्पेक्षता और बंधुत्व का एक मूल्य मिला हुआ है. अमरीका में भारतीय महफूज नहीं हैं. यह हमे अपने मुल्क में रहते हुए दिखता है. जबकि अमेरिका से कई देश महफूज नहीं हैं. क्योंकि बड़ी अर्थव्यवस्था को बनाना और उसे टिकाए रखने के लिए जरूरी हो गया है कि किसी न किसी तरीके से गैर मुल्कों पर कब्जेदारी बनी रहे. वहां के संसाधनों को अपने लिए उपयोग किया जा सके.
लोकतंत्र और उसके बाद ग्लोबलाइजेशन का यह परिणाम तो नहीं सोचा गया था कि अमेरिका में गैर अमरीकी मारा जाएगा. अस्ट्रेलिया में भारतीय मारा जाएगा. और भारत में नाइजीरियन और साउथ अफ्रीकन मारा जाएगा. यह सब कबीलाई समाजों के इतिहास सा हो रहा है. जो अपने कबीले में दूसरे कबीले को नहीं घुसने देते थे. पर फिर से हमारे समाजों में हत्या और नफरत के जो आधार बन रहे हैं वे ऐसा समाज बना रहे हैं जहां ग्लोबलाइजेशन भी है और कबीले का पुरानापन भी है.

हिन्दू राष्ट्र की दुहाई कौन दे रहा है ?

दुनिया के सबसे पुराने लोकतांत्रिक देश अमेरिका में 16 फीसदी लोग किसी धर्म को नहीं मानते । लेकिन दुनिया के सबसे बडे लोकतांत्रिक देश भारत में सत्ता ही खुद को हिन्दू राष्ट्र बनाने मानने की कुलबुलाहट पाल रही है । ब्रिटेन में करीब 26 फीसदी लोग किसी धर्म को नहीं मानते । लेकिन भारत में सत्ताधारी पार्टी खुले तौर पर ये कहने से नहीं हिचक रही है कि भारत को हिन्दू राष्ट्र हो जाना चाहिये। यूरोप-अमेरिका के तमाम देशों में हर धर्म के लोगो की रिहाइश है। नागरिक हैं। लेकिन कहीं धर्म के नाम पर देश की पहचान हो ये अवाज उठी नहीं । दुनिया के एक मात्र हिन्दू राष्ट्र नेपाल की पहचान भी दशक भर पहले सेक्यूलर राष्ट्र हो गई। यानी जैसे ही राजशाही खत्म हुये। चुनाव हुये । संविधान बना । उसके बाद नेपाल के 80 फीसदी से ज्यादा नेपाल में रहने वाले हिन्दुओ ने ये अवाज दुबारा नहीं उठायी कि वह नेपाल को हिन्दु राष्ट्र बनाना चाहते हैं। और भारत में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ हो या हिन्दू महासभा, उसने भी नेपाल के हिन्दू राष्ट्र के तमगे को खूब जीया । इस हद तक की हिन्दुत्व का सवाल आने पर बार बार नेपाल का जिक्र हुआ । लेकिन नेपाल में भी जब राजशाही खत्म हुई और हिन्दू राष्ट्र का तमगा वहां की चुनी हुई सरकार ने खत्म किया तो फिर हिन्दुत्व के झंडाबरदरार संगठनों ने कोई आवाज उठाने की हिम्मत नहीं की । लेकिन भारत में सवाल तो इस लिहाज से उलझ पड़ा है । एक तरफ योदी आदित्यनाथ को हिन्दुत्व का झंडाबरदार दिखाया जा रहा है दूसरी तरफ मोदी इस पर खामोशी बरत रहे हैं। एक तरफ योगी के जरीये हिन्दू महासभा के उग्र हिन्दुत्व की थ्योरी की परीक्षा हो रही है। दूसरी तरफ आरएसएस गोलवरकर से लेकर शेषाद्री तक के दौर में भारत और भारतीय के सवाल से आगे बढ़ना नहीं चाह रहे हैं । एक तरफ योगी के सीएम बनने से पहले मोदी के लिये योगी भी फ्रिंज एलीमेंट ही थे । और मोदी ने पीएम उम्मीदवार बनने से लेकर अभी तक के दौर में बीजेपी के बाहर अपना समर्थन का दायरा इतना बड़ा किया कि वह पार्टी से बड़े दिखायी देने लगे ।

लेकिन मोदी के समर्थन के दायरे में ज्यादातर वही फ्रिंज एलीमेंट आये जो बीजेपी के सत्ता प्रेम में बीजेपी के कांग्रेसीकरण का होना देख मान रहे थे । और मोदी ने दरअसल दिल्ली कूच की तैयारी में बीजेपी के उस प्रोफेशनल पॉलिटिक्स को ही दरकिनार किया, जिसके आसरे सिर्फ चुनाव की जीत हार राजनीतिक मुद्दों पर टिकती । तो इन हालातो में सवाल तीन है । पहला क्या गोरक्षा के नाम पर अलवर में जो हुआ उस तरह की घटना के पीछे कहीं फ्रिंज एलीमेंट को कानूनी जामा तो नहीं पहनाया जा रहा है। दूसरा अगर कानून व्यवस्था के दायरे में फ्रिंज एलीमेंट पर नकेल कसी जायेगी, जैसी हिन्दू वाहिनी के रोमियो स्कावयड पर नकेल कसी जा सकती है तब योगी के महंत का औरा सीएम के संवैधानिक पद से कैसे टकरायेगा और उसके बाद हालात बनेंगे कैसे। और तीसरा योगी के हिन्दुत्व राग से उत्साही समाज से मोदी पल्ला कैसे झाडेंगे ।

ये ऐसे सवाल है जो मोदी और योगी को एक दौर के वाजपेयी और आडवाणी की जोडी के तौर पर बताये जा सकते हैं । लेकिन समझना ये भी होगा वाजपेयी-आडवाणी की जोड़ी चुनावी हिसाब-किताब को सीटो के लिहाज से नहीं बल्कि परसैप्शन के लिहाज से देश को प्रभावित करती थी । यानी वाजपेयी नरम हैं आडवाणी कट्टर है, ये परसेप्शन था । लेकिन मोदी नरम है और योगी कट्टर हैं ये परसैप्शन के आधार पर चल नहीं सकता क्योंकि योगी के हाथ में देश के सबसे बडे सूबे की कमान है। और वहां उन्हें गवर्नैंस से साबित करना है कि उनका रास्ता जाता किधर है। लेकिन समझना ये भी होगा कि एक वक्त जनसंघ के अधिवेशन में ही जब हिन्दू राष्ट्र की प्रस्तावना रखी गयी तो तब के सरसंघचालक गुरु गोलवरकर ने ये कहकर खारिज किया कि जनसंघ को संविधान के आधार पर काम करना चाहिये। और सच यही है कि उसके बाद ही दीन दयाल उपाध्याय ने एकात्म-मानवतावाद की थ्योरी को आत्मसात किया। और जनसंघ ने भी एकात्म-मानवतावाद को ही अपनाया। और तो और दत्तोपंत ठेंगडी ने भी इसी बात की वकालत की थी कि संघ को भी हिन्दुत्व से इतर उस रास्ते को पकड़ना होगा जिसपर हिन्दुत्व धर्म नहीं बल्कि जीवन पद्दति के तौर पर उभरे। यूं आरएसएस के पन्नों को पलटने पर ये भी साफ होता है कि पचास के दशक में हिन्दु राजाओं को भी सेकुलर के तौर पर ही गुरुगोलवरकर ने मान्यता दी । मसलन सम्राट अशोक को हिन्दू राजा नहीं बल्कि सेकुलर राजा के तौर पर ही माना जाता है। तो नया सवाल ये भी निकल सकता है कि फिर एक वक्त के फ्रिंज एलीमेंट माने जाने वाले योगी आदित्यनाथ को संवैधानिक पद, वह भी सीएम की कुर्सी पर क्यों बैठाया गया । क्या ये पहल गौरवशाली हिन्दू राष्ट्र की परिकल्पना तले पनपी । हो जो भी लेकिन 21 वीं सदी में जब भारत की पहचान एक बडे बाजार से लेकर उपभोक्ता समाज के तौर पर कहीं ज्यादा है । दुनिया के तमाम देशों में भारत के प्रफोशनल्स की चर्चा है । और उसके साथ ही शिक्षा से लेकर हेल्थ सर्विस और पीने के पानी से लेकर भूखे भारत का सच संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट तक में दिखायी दे रहा है और ऐसे मोड़ पर भारत में सत्ता के लिये चुनावी जीत उस सोशल इंजीनियरिग पर जा अटकी है, जो जाति-प्रथा को बनाये रखने पर जोर देती है। और वोटो का ध्रुवीकरण धर्म की उस सियासत पर जा टिका है, जहां 20 करोड़ मुसलमानों की कोई जरुरत सत्ता में रहने के लिये सत्ताधारी पार्टी को है ही नहीं । तो फिर आगे का रास्ता जाता किधर है । क्योंकि हिन्दुस्तान का वैभवशाली अतीत भी भारत को हिन्दू राष्ट्र के तौर पर कभी ना तो पहचान दे पाया और ना ही उसका प्रयास किया गया । और मुगलिया सल्तनत से लेकर अंग्रेंजों के दौर में भी हिन्दुओ की तादाद 80 फीसदी रही । लेकिन हिन्दू राष्ट्र की परिकल्पना को बदलने के बदले हर सत्ता ने यहां की जीवन पद्दति को अपनाया और संसाधनों की लूट के जरीये अय्याशी की । और राजनीति की इसी अय्याशी को लेकर आजादी के बाद महात्मा गांधी ने आजादी के बाद कांग्रेस की सत्ता को लेकर सवाल भी उठाये । लेकिन आजादी के बाद के 70 बरस के दौर में देश के हर राजनीतिक दल ने सत्ता भोगी। और गरीब हिन्दुस्तान पर लोकतंत्र की दुहाई देकर राज करने वाले नेताओ के सरोकार कभी आम जनता से जुडे नहीं। तो आखिरी सवाल यही है कि क्या हिन्दू राष्ट्र की दुहाई भारत की अंधेरे गलियों में अतीत की रोशनी भर देती है । या फिर सत्ता के सारे मोहरे चुक चुके हैं तो नारा हिन्दू राष्ट्र का है।

कोई उन्हें छू सके

उड़ते हुए

उड़ते
हुए नीचे लहरों से कहो कि

तुम्हें
आगे जाना ही है

तुम
बढ़ोगे तो तुम्हारे पीछे आने
वाले बढ़ेंगे

इसलिए
आगे बढ़ते हुए अपनी उँगलियाँ
पीछे रखो

कि
कोई उन्हें छू सके ।    (रेवांत - 2017)

Flying
When you fly
Tell the waves below

That you have to
Move forward
You
Move and then move those
Who follow you

And so
Moving ahead
Keep your fingers behind

That others
May feel them.

गांव बचेगा तो गाय बचेगी

दखल की दुनिया - Wed, 05/04/2017 - 22:55

 चन्द्रिका (मूलरूप से द वायर में प्रकाशित)
वे गाय को बचा रहे हैं और गांव को खत्म कर रहे हैं. गांव बचेगा तो गाय खुद ही बच जाएगी. वैसे यह कहना भी ख़तरनाक हो गया है. फिलहाल कुछ भी कहना ख़तरनाक हो गया है. सुनने के लिए दो लोगों के नाम बचे हैं और इसी के उन्माद में जाने कितने लोग फंसे हैं. फंसे हैं कि उन्हें लगता है कि यही है जो उन्हें उबार देगा. उन्हें उनके दुख और डर से निकाल लेगा. वे भीतर से डरे हुए लोग हैं जो उन्मादी हो गए हैं. हत्या और उन्माद के लिए उन्हें वहीं से ताकत मिल रही है. जबकि एक को दूसरे से शोहरत मिल रही है.

जहां कोई नाम बहुत बड़ा बना दिया जाता है. उसकी मान्यता बढ़ा दी जाती है और एक समूह भक्त बन जाता है. धर्म, राजनीति, ब्यूरोक्रेसी कहीं भी इसे देखा जा सकता है. वे एक अदृश्य ताकत के बल पर फलते-फूलते हैं और तलवार की तरह समाज के चेहरे पर झूलते हैं. वे, जो गाय की रट लगाए हुए हैं. वे जो कोई भी मांस न खाने की हठ लगाए हुए हैं. वे गाय प्रेमी नहीं हैं. अगर होते तो गाय और गांव के संबध को समझते. कि वह गांव खत्म हो रहा है जहां गाय रह पाती थी. गांव वह बच रहा है जहां गाय की जगह दो गऊ जैसे बूढ़े ही बच पा रहे हैं. इसी विकास की प्रक्रिया ने गाय पालने वाले लोगों को गांव से बाहर कर दिया है. खेतीबाड़ी तबाह कर उन्हें शहर में भर दिया है. शहरों और शहरों के बीच अथाह भरे हुए इलाकों के बीच जो रिक्त स्थान है, वही गांव है. इन रिक्त स्थानों को गाय से नही भरा जा सकता. गाय से कोई भी रिक्त स्थान नहीं भरा जा सकता. फिलहाल जहां-जहां गाय लिखा जा रहा है, जहां-जहां गाय बोला जा रहा है. नफरत का कोई और ही चीज घोला जा रहा है. दो समुदायों के बीच जो बना हुआ, बचा हुआ रिश्ता था उसका धागा खोला जा रहा है.

गाय के बहाने वे उससे अपनी नफरत जता रहे हैं. सुअर (बाराह) जो उनके मिथक में ईश्वर था उसके खाए जाने, मारे जाने पर सवाल तक नहीं उठा रहे हैं. सवाल नहीं उठना चाहिए. न गाय पर न सुअर पर. खानपान के अलग-अलग भौगोलिक, सांस्कृतिक कारण हैं. वैसे उन्हें किसी की संस्कृति का सम्मान नहीं है. उन्हें किसी से प्यार नहीं है. न मुल्क से, न गाय से, न गांव से, न गोरू से. क्योंकि गांव और गाय वाले मुल्क का बचना एक अलग तरह से बसना है. पूरी तरह से एक अलग अर्थव्यवस्था को रचना है. जिसे उजाड़ा गया और उजाड़ा जा रहा है. गाय से प्यार बगैर चरागाहों के नहीं हो सकता. गाय से प्यार बिना बैलों और हरवाहों के नहीं हो सकता. शहर चरागाह नहीं बना सकते. वहां हम हल बैल नहीं चला सकते. वहां तो हम खुद ही हर रोज कातिक के बैल बने हुए हैं. शहर जितने बड़े हैं हम उतना ज्यादा मिट्टी में सने हैं. इन घनी बस्तियों की बहुतायत आबादी जमीन से ऊपर सीढ़ियों वाले छतों की है. जानवरों ने अभी अपने को इस मुताबिक नहीं बनाया. सीढ़ियों पर चढ़ने और छतों पर रहने के लायक खुद को नहीं ढाला. हम हैं कि यह सब नहीं सोचते. अपनी ज़िंदगी और अपनी आंख से न देखकर गाय और गोबर में अड़े हुए हैं.

वन बीएचके में कोई कैसे गाय बसाएगा. बस वह अपनी दौड़ती-फिरती ज़िंदगी में जब भी गाय का नाम सुनेगा भावुक हो जाएगा. उसके लिए वन बीएचके की भी जरूरत नहीं. ट्रेन की सीट पर भी बैठकर गाय को लेकर भावुक हुआ जा सकता है. गाय को पालने और बचाने की बात वहीं पर ठहरी हुई है और हररोज ट्रेन हमे शहर की तरफ लिए जा रही है. शहर की भीड़ हररोज और बढ़ रही है. आसपास के गांव को अपने भीतर कर रही है. इंसान का ही रहना यहां मुहाल है. यह तो गाय को बचाने और बसाने का सवाल है.
सारे रोजगार, सारे संस्थान शहर में हैं. सारी मुफलिसी, सारी तंगी घर में है. एक को तो छोड़ देना पड़ेगा. या इस विकास के रास्ते को ही मोड़ देना पड़ेगा. शहर टूटेंगे गांव तभी बस पाएगा. गाय तभी बस पाएगी. जब गाय सिर्फ धरम के लिए नहीं होगी. जब गोमूत्र सिर्फ पीने के लिए नहीं होगा. जब गोबर सिर्फ हवन के लिए नहीं होगा. वह खेतों में खाद के लिए होगा, उपजाऊं अनाज के लिए होगा. हमारे जीवन की पूरी प्रक्रिया का हिस्सा होगा. होंगे सारे जानवर. गाय जैसा होगा उनका भी होना.
पर ऐसा नहीं होगा इस सरकार से. इससे पहले की भी सरकार से नहीं होगा और उससे पहले की भी सरकार से नहीं होगा. क्योंकि इस मुल्क के विकास के लिए उनके पास वही खाका है. जिससे बना न्यूयार्क है, जिससे बना ढाका है. मुल्क हमारे अलग हैं पर उनका विकास, हमारा विकास एक है. गाय के मामले में वे हमसे ज्यादा नेक हैं. हम बड़ी आबादी वाले देश को बगैर गांव के नहीं जीना था. हमारे कपड़े अलग थे हमे अपने तरीके से सीना था. हम न्यूयार्क नहीं हो सकते, हम जापान नहीं हो सकते. कई मुल्कों की लाशों पर चमकता हुआ शहर दुनिया में बहुत कम बन सकता है. अमेरिका बनना कई मुल्कों के इतिहास, भूगोल को निगल जाना है. अमरीका बनना कई मुल्कों का पड़ोसी मुल्कों से युद्ध कराते रहना है. अमेरिका होना दुनिया में सबसे ज्यादा हथियार तैयार करना है. हथियार तैयार करना भविष्य में तबाही और भय की उम्मीद को ज़िंदा रखना है. दुनिया में हम सबको असुरक्षित रखने का ही नाम है सबसे विकसित देश का नाम. हम उसी का पीछा करते हुए कुछ दशक पीछे हैं. शायद हम हमेशा पीछा करने वाले देश ही रहेंगे. हम आगे तभी जा सकते हैं जब वह पीछे जाए. इस एक लाइन वाली दुनिया की व्यवस्था में ऐसे ही सबको खड़े होना है. आगे जाने के लिए कोई और रास्ता नहीं है सिवाय इसके कि अपने से आगे वाले को पीछे छोड़ा जाए, इसके लिए उसकी बांह मरोड़ा जाए.
हमे भारत बनाना था. जहां सबको बसना था. जहां इतिहास में सबके हिस्से थे. जहां जातीयों के जुल्म के भी किस्से थे. हमे उसे खतम करना था. हमने वह नहीं किया. हमने वह नहीं सोचा. दुनिया के उन मुल्कों के उधारी विकास को हमने अपनी मिल्कियत बना ली. अब जो है वह भयावह है. उनके विकास का ही मॉडल शहर है कि हमे भी उसे ज़हर की तरह पीना पड़ रहा है. मौत के पहले हर रोज की मौत को जीना पड़ रहा है. युवा उम्र के लोग अफवाह की तरह फैल गए हैं, इन शहरों में. निराधार, हर रोज बदल दिए जाने वाली ख़बर की तरह. पहले उन्हें नौकरी न पाने के ख़तरे हैं, नौकरी पाने के बाद इसके छिन जाने के ख़तरे हैं. इन खतरों से जो बचा हुआ मोहलत का वक्त होता है उसमे वे खुद भी खतरनाक हो जाते हैं. कहीं उन पर ख़तरा है तो कहीं वे उससे उबरने के लिए खुद खतरा बन रहे हैं. उन्माद यहीं से पैदा होता है. व्यवस्था उन्हें खतरे में डालती है और उससे उबरने के लिए उन्हें खतरनाक बनाती है. तब गाय ही सबसे बड़ा सवाल बना दिया जाता है. गांव वहां से फिर भी हट जाता है.
जिन्हें इतनी असुरक्षाओं के बीच ज़िंदा रहना और बचे रहना है उन्हें नैतिकता नहीं सिखाई जा सकती. नैतिकता उस ढांचे से पनपती है जहां आप जीवन जी रहे होते हैं. अर्थतंत्र पर टिकी इस दुनिया में आर्थिक तंगी के बीच आप किसी को ईमानदार नहीं बना सकते. ईमानदार बनाने की धारणा बना सकते हैं. इस आधार पर एक राजनैतिक पार्टी बना सकते हैं. सदी के सबसे बड़े झूठ को सच बना सकते हैं. और भी बहुत कुछ बना सकते हैं पर ईमानदार इंसान नहीं बना सकते. क्योंकि इंसान अपने समाज की जरूरतों और ढांचों से अपने मूल्य बनाता है. न कि उसके मूल्य के आधार पर ढांचा बन पाता है. बहते हुए नाले का पानी अगर साफ हो तो सारी चीजें अपने मूल रंग में दिख सकती हैं. एक-एक चीज को निकालकर उसे धुलकर उसका रंग दिखाना सिर्फ बहकावा है. ऐसे बहकावे में ही उन्माद भी है, हिंसा भी है और वह सबकुछ है जो पूर्णता में किसी चीज को देखने से रोक देगा. गाय दिखेगी, गांव नहीं दिखेगा. विकास सुनाई पड़ेगा और हर कोई परेशान रहेगा.       

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लेखक विषय संवाद साभार अनुवादक

पहले वो आए साम्यवादियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं साम्यवादी नहीं था

 

फिर वो आए मजदूर संघियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं मजदूर संघी नहीं था

 

फिर वो यहूदियों के लिए आए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं यहूदी नहीं था

 

फिर वो आए मेरे लिए

और तब तक बोलने के लिए कोई बचा ही नहीं था

 

मार्टिन नीमोलर (1892-1984)