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दीवाली , गरीबी , मेरा गाँव और बिरजू फुआ.

जंतर-मंतर - Thu, 19/10/2017 - 16:25



शेष नारायण सिंह

दीवाली के दिन जब मुझे अपने गाँव की याद आती है तो उसके साथ ही  बिरजू फुआ की याद आती है. दीवाली के दिन उनके घर खाना पंहुचाना मेरे बचपन का एक ज़रूरी काम हुआ करता था. बाद में मेरी छोटी बहन मुन्नी ने यह काम संभाल लिया. बिरजू फुआ के घर आस पड़ोस के कई घरों से खाना  जाता था. उनका पूरा नाम बृजराज कुंवर था, सन पैंतीस के आस पास उनकी शादी उनके पिता जी ने बहुत ही शान शौकत से सरुआर में कर दिया था. सरुआर उस इलाके को कहते थे जो अयोध्या से सरयू नदी को पार करने के बाद पड़ता है. यह गोंडा जिले का लकड़मंडी के बाद का इलाका है. उसको सम्पन्नता का क्षेत्र माना जाता था. बिरजू फुआ के पिता जी गाँव के संपन्न ठाकुर साहेब थे , वे उनकी इकलौती बेटी थीं, उन्होंने काफी मेहनत से  योग्य वर ढूंढ कर बेटी की शादी की थी. लेकिन ससुराल में उनकी बनी नहीं और वे नाराज़ होकर वापस अपने माता पिता के पास चली आयीं.  बाप ने बेटी को गले लगाया और वे यहीं रहने लगीं . लेकिन कुछ ही वर्षों के बाद उनके पिता जी की मृत्यु हो गयी . उसके बाद तो अकेली माँ को छोड़कर जाने के बारे में वे सोच भी नहीं सकती थीं. यहीं की हो कर रह गयीं. अगर पढी लिखी होतीं, अपने अधिकार के प्रति सजग होतीं तो बहुत फर्क  नहीं पड़ने वाला था लेकिन  अवध के ग्रामीण इलाकों में निरक्षर बेटी को उसके बाप के भाई भतीजे फालतू  की चीज़ समझते हैं. बेटी को ज़मीन में उसका हक देने को तैयार नहीं  होते .  उनके पिता जी की मृत्यु के बाद उनके खानदान वालों ने तिकड़म करके उनकी ज़मीन अपने नाम करवा लिया . थोड़ी बहुत ज़मीन उनकी विधवा यानी  बिरजू की माई  को मिली  .उसको भी  १९७४ में चकबंदी के दौरान हड़प लिया गया . अब संपत्ति के नाम पर उनके पास उनका पुराना घर बचा था जो गिरते पड़ते एक झोपडीनुमा हो गया था. मां बेटी अपनी झोपडी में रहती थीं.  जब तक ज़मीन थी तब तक किसी से हल बैल मांग कर कुछ पैदा हो जाता था लेकिन ज़मीन चली जाने के बाद उन्होंने  बकरियां पालीं, उनके यहाँ कई बकरियां होती थीं, उन दिनों बकरी पालने के लिए खेत होना ज़रूरी नहीं होता था. पेड़ की झलासी, जंगली पेड़ पौधों की पत्तियाँ आदि खाकर बकरियां पल जाती थीं. उन्हीं बकरियों का दूध  बेचकर उनका रोज़मर्रा का काम चलता था. बकरी के बच्चे बेचकर कपडे लत्ते ले लिए जाते थे.  जब उनकी माई मर गयीं तो बिरजू फुआ पर वज्र टूट पड़ा. उसके साथ साथ ही बकरियां भी सब खत्म हो गयीं. हालांकि उस समय उनकी उम्र साठ साल से कम नहीं रही होगी लेकिन अपनी माई पर भावनात्मक रूप से पूरी तरह निर्भर थीं. माँ के जाने के बाद  उनको दिलासा देने वाली बड़ी बूढ़ी  महिलाओं ने समझाया कि परेशान मत होइए , गॉंव है, सब अपने ही तो हैं ,ज़िन्दगी की नाव पार  हो जायेगी .
उसके बाद से गाँव के परिवारों के सहारे ही उनकी ज़िंदगी कटने वाली थी.  हमारे गाँवों में साल भर किसी न किसी के यहाँ कोई न कोई प्रयोजन पड़ता ही रहता है. अपने सगे भतीजों के  यहाँ तो वे कभी नहीं गयीं लेकिन पड़ोस के कुछ परिवारों  ने उनको संभाल लिया . अपने घर में तो अन्न का कोई साधन नहीं था लेकिन उन्होंने मजदूरी नहीं की. ठाकुर की बेटी थीं ,मजदूरी कैसे करतीं. सामंती संस्कार कूट कूट कर भरे हुए थे  .लेकिन पड़ोस के  ठाकुरों के जिन घरों में उनसे इज़्ज़त से बात की जाती थी, उनके यहाँ  चली जाती थीं. जो भी काम हो रहा हो ,उसमें हाथ लगा देती थीं. घर की मालकिन समेत सभी फुआ, फुआ करते रहते थे. जो भी खाना घर में बना होता था , वे भी उसी में शामिल हो जाती थीं.  फिर अगले दिन किसी और के यहाँ . शादी ब्याह में मंगल गीत गाये जाते थे . ढोलक बिरजू फुआ के हाथ से ही  बजता था.   बाद की पीढ़ियों के कुछ लड़के लडकियां उनको झिड़क भी देते थे तो कुछ बोलती नहीं थीं. लेकिन उनके चेहरे पर दर्द का जो मजमून दर्ज होता था, वह  मैंने कई बार देखा है . उस इबारत का अर्थ मुझे अन्दर तक झकझोर देता था. लेकिन ऐसे बदतमीज बहुत कम थे जो उनकी गरीबी के कारण  उनको अपमानित करते थे . हर त्यौहार में उनके चाहने वाले परिवारों से चुपके से खाना उनकी झोपडी तक पंहुचता था. बचपन के सामंती संस्कार ऐसे थे कि परजा पवन का कोई आदमी या औरत अगर उनके घर त्यौहार के बाद आ जाए तो उसको भी कुछ खाने को देती थीं क्योंकि उनके यहाँ कई परिवारों से कुछ न कुछ आया  रहता था . उनके सबसे करीबी पड़ोसी और मेरे मित्र तेज  बहादुर सिंह उनको हमेशा " साहेब" कहकर ही संबोधित करते थे. अपने अंतिम दिनों में वे चल फिर सकने लायक भी नहीं रह गयी थीं लेकिन अपनी मृत्यु के बाद लावारिस नहीं रहीं . पड़ोस के परिवारों के लोगों ने वहीं पर उनका अंतिम संस्कार किया जहां जवार के राजा रंक फ़कीर सब जाते थे. ग्रामीण जीवन में अपनेपन के जो बुनियादी संस्कार भरे पड़े हैं, शायद महात्मा गांधी ने उनके महत्व को समझा था और इसीलिये आग्रह किया था कि आज़ादी के बाद देश के विकास का जो भी माडल अपनाया जाए उसमें गाँव की केंद्रीय भूमिका  होनी चाहिए, गाँव को ही विकास की इकाई माना जाना  चाहिए . लेकिन  जवाहरलाल नेहरू ने ब्लाक को विकास की इकई बनाया और ग्रामीण विकास की नौकरशाही का एक बहुत बड़ा नया ढांचा तैयार कर दिया .  सोचता हूँ कि अगर विकास का गांधीवादी मन्त्र माना गया होता तो आज हमारे गाँवों की वह दुर्दशा न  होती जो आज हो रही है.

पागलों ने दुनिया बदल दी

आज मित्रों के लिए प्रस्तुत है मेरी नवीनतम  कहानी : पागलों ने दुनिया बदल दीमैं पूछती, ‘‘आप कैसे हैं?’’
और वे हँसने लगते, ‘‘हा-हा-हा!’’
मैं पूछती, ‘‘आपकी यह हालत कब से है?’’
और वे हँसने लगते, ‘‘हा-हा-हा!’’
मैं पूछती, ‘‘आप क्या थे? डॉक्टर, इंजीनियर, पत्रकार, प्रोफेसर…?’’
और वे हँसने लगते, ‘‘हा-हा-हा!’’
मैं पूछती, ‘‘आप लोग यह सामूहिक आत्महत्या क्यों कर रहे हैं?’’
और वे हँसने लगते, ‘‘हा-हा-हा!’’
मैं पूछती, ‘‘आप लोग तो असमर्थों में समर्थ थे, आपको जैविक कूड़ा बन जाने की क्या सूझी?’’
मेरे इस सवाल पर वे और भी जोर से हँसते, ‘‘हा-हा-हा!’’
मैं ‘सभूस’ की पत्रकार थी। ‘सभूस’ यानी समर्थों की भूमंडलीय समाचारसेवा। मुझे देश-देश जाकर पागलों की गतिविधियों के समाचार देने का काम सौंपा गया था। काम खतरनाक था, पर मैंने खुशी-खुशी करना मंजूर कर लिया था। मुझे शुरू से ही शक था कि पागलपन की वह बीमारी, जो इधर भूमंडलीय महामारी का रूप ले चुकी थी, बीमारी या महामारी नहीं, कोई और ही चीज है। मैं निजी तौर पर उसका पता लगाना चाहती थी। दूसरे, मुझे हल्की-सी एक उम्मीद थी कि मेरे देश की तबाही के साथ मेरे सब लोग शायद तबाह न हुए हों। शायद मेरे दादा-दादी, नाना-नानी, माता-पिता, मामा-मौसी और भाइयों-बहनों में से कोई बचकर भागने और किसी दूसरे देश में शरण पाने में सफल हो गया हो। निजी तौर पर तो मैं देश-देश घूमकर अपने लोगों का पता लगा नहीं सकती थी, सो मैंने सोचा कि पत्रकार के रूप में शायद मैं उन्हें पा सकूँ।
अपने-अपने कामों में लगे स्वस्थ लोगों के पागल होने का सिलसिला ठीक-ठीक कब और कहाँ शुरू हुआ, यह तो शायद कोई नहीं जानता, लेकिन वह समर्थ और असमर्थ दोनों तरह के देशों में और दुनिया भर में एक साथ शुरू हुआ था। सामान्य जीवन जीते, रोजमर्रा के काम करते, अच्छे-भले लोग अचानक हँसना शुरू कर देते और हँसते ही चले जाते। वे अपने घरों, दफ्तरों, खेतों, कारखानों वगैरह से निकलकर सड़कों पर आ जाते। उनमें पुरुष और स्त्रियाँ, बूढ़े और बूढ़ियाँ, प्रौढ़ और प्रौढ़ाएँ, युवक और युवतियाँ सभी होते।
ठीक तारीख बताना तो संभव नहीं, पर लोगों के पागल होने का सिलसिला जब शुरू हुआ, तब अखिल भूमंडल पर समर्थों के शासन का सत्रहवाँ साल चल रहा था। सोलह साल पहले समर्थ शासकों ने अपनी विश्व संसद बनायी थी और अपना नया संवत् शुरू किया था। उसके अनुसार वह समर्थ संवत् का सत्रहवाँ साल था। उसके पहले समर्थों और असमर्थों के बीच एक भूमंडलीय युद्ध हुआ था, जिसमें समर्थों की विजय और असमर्थों की पराजय हुई थी।
मैं एक असमर्थ देश की लड़की थी, जो युद्ध के समय एक समर्थ देश में पढ़ रही थी। मैं अपने देश लौटना चाहती थी, लेकिन मेरे माता-पिता ने सख्ती से मना कर दिया था। उनके विचार से मेरी सुरक्षा इसी में थी कि मैं जहाँ हूँ, वहीं बनी रहूँ। युद्ध में असमर्थ देश हार रहे थे और तबाह हो रहे थे।
उन्हें हारना ही था, क्योंकि उस युद्ध में दुनिया के सभी समर्थ देश एक होकर लड़े थे, जबकि असमर्थ देश आपस में लड़ते हुए लड़े थे। यों समर्थ देशों में भी कुछ देश कम और कुछ अधिक शक्तिशाली थे और उनके भीतर भी रंग, नस्ल, धर्म, संप्रदाय, क्षेत्र और भाषा वगैरह के तमाम झगड़े थे, लेकिन उस समय उनका लक्ष्य एक हो गया था–जैसे भी हो, असमर्थ देशों पर विजय पाना। दूसरी तरफ असमर्थ देश उस निर्णायक युद्ध में भी अपने भीतर के झगड़ों को छोड़कर–यानी धर्म-संप्रदाय, खान-पान, रहन-सहन, बोली-बानी, ऊँच-नीच, छूत-अछूत जैसे झगड़ों को छोड़कर–अपना एक लक्ष्य तय करके नहीं लड़ सके थे। उनका लक्ष्य समर्थों पर विजय प्राप्त करना नहीं, केवल स्वयं को बचाना था। उन्हें एक-दूसरे की चिंता नहीं थी, सबको अपनी-अपनी पड़ी थी। नतीजा वही हुआ, जो होना था। समर्थ जीते, असमर्थ हारे। जीतने के बाद समर्थों ने अपनी भूमंडलीय समर्थ संसद कायम की, अपना नया संवत् चलाया और अखिल भूमंडल पर शासन करने लगे।
समर्थों ने जो भूमंडलीय संविधान बनाया, उसकी सर्वप्रमुख धारा, जिससे समस्त उपधाराएँ निकलती थीं, यह थी कि समर्थों को ही जीवित रहने का अधिकार है। असमर्थ लोग और असमर्थ देश तभी जीवित रह सकते हैं, जब वे समर्थ बनने के लिए प्रयत्नशील होकर पूरी निष्ठा से समर्थों की सेवा करें। जो असमर्थ लोग या देश ऐसा नहीं करेंगे, उन्हें जीवित रहने का अधिकार नहीं होगा। इतना ही नहीं, वे समर्थों के प्रति कितने निष्ठावान हैं, यह भी समर्थ तय करेंगे और उन्हें पूरा अधिकार होगा कि निष्ठा में कमी पायी जाने पर वे असमर्थ लोगों को जैसे चाहें मारें-पीटें, जेलों में डाल दें या गोली-गोलों से उड़ा दें और असमर्थ देशों को जैसे चाहें लूटें और तबाह करें।अब, जीवित और सलामत रहना कौन नहीं चाहता? दुनिया भर के लोगों और देशों ने समर्थों की सेवा करते हुए स्वयं समर्थ बनने का प्रयास करना शुरू कर दिया। लेकिन समर्थों को यह अधिकार भी था कि वे किसे अपनी सेवा में रखें और किसे न रखें, और रखें, तो किस दर्जे का सेवक बनाकर रखें।
इस अधिकार के चलते असमर्थ लोगों में से योग्य सेवक छाँटे गये। भूख और कुपोषण से कमजोर तथा रोगों से जर्जर लोगों को सेवा के अयोग्य पाया गया। समर्थों की संसद में विचार किया गया और तय पाया गया कि अयोग्य लोग किसी काम के नहीं हैं, दुनिया में फैला हुआ कूड़ा हैं, उन्हें बुहारकर फेंक देना चाहिए। हाँ, इस प्रश्न पर कुछ बहस हुई कि उन्हें ‘ह्यूमन वेस्ट’ (मानव कूड़ा) कहा जाये अथवा ‘बायो वेस्ट’ (जैविक कूड़ा)। बहस के बाद तय हुआ कि उन्हें जैविक कूड़ा ही कहा जाना चाहिए, क्योंकि मानव कूड़े को तो श्मशान में ले जाकर जलाना या कब्रिस्तान में ले जाकर दफ्नाना होगा, और उसमें बेकार का खर्च होगा, जबकि जैविक कूड़ा खुद-ब-खुद सड़-गलकर मिट्टी में मिल जायेगा। उसे निपटाने का खर्च तो बचेगा ही, उससे कंपोस्ट खाद भी बनेगी, जो जमीन को अधिक उपजाऊ बनायेगी।
इस प्रकार चुने गये योग्य सेवकों से कहा गया कि योग्य सेवक बन जाना ही पर्याप्त नहीं है, उन्हें योग्यतम सेवक बनने का प्रयास करना चाहिए और इसके लिए आपस में होड़ लगाकर सर्वोच्च समर्थ-भक्ति का प्रमाण देना चाहिए। इसके लिए उन्हें हर समय अपना सर्वस्व समर्थों को समर्पित कर देने के लिए, यहाँ तक कि अपने प्राण तक दे देने के लिए, तैयार रहना चाहिए। जिस की समर्थ-भक्ति में तनिक भी कमी पायी गयी, उस पर कड़ी नजर रखी जायेगी। जिस किसी के मन में समर्थों के विरुद्ध कोई विचार पाया गया, हल्की-सी भावना भी पायी गयी, उसे कठोर दंड दिया जायेगा, जो आजीवन कारावास या तत्काल मृत्युदंड भी हो सकता है। ऐसे विचार या भावनाएँ रखने वालों की सूचना देने, उनको पकड़वाने या स्वयं ही घेरकर मार डालने वाले समर्थ-भक्तों को पुरस्कृत किया जायेगा।
असमर्थों को बताया गया कि उनमें से जो लोग सच्ची निष्ठा और भक्ति के साथ समर्थों की सेवा करेंगे, वे ही समर्थों के कृपापात्र बनकर समर्थों में शामिल हो सकेंगे। उन्हें समझाया गया कि जीवन एक दौड़ है, जिसमें उन्हें अपने तमाम प्रतिस्पर्धियों को पीछे छोड़कर आगे निकलना है। इसके लिए दूसरों को टँगड़ी मारकर गिराना भी पड़े, तो जायज है, क्योंकि पिछड़ जाने का अर्थ होगा अशक्त, अक्षम और अयोग्य सिद्ध होकर दौड़ से बाहर हो जाना और जैविक कूड़ा बनकर रह जाना।
समर्थों की यह व्यवस्था इतनी बढ़िया थी कि दूसरों के आगे निकल जाने के लोभ और दूसरों से पिछड़ जाने के भय से असमर्थ लोग जी-जान से समर्थों की सेवा दूसरों से बढ़-चढ़कर करने लगे। वे दिन-रात एक-दूसरे की, यहाँ तक कि अपने घर-परिवार के लोगों तक की जासूसी करने लगे और प्रमाण सहित उन्हें पकड़वाकर पुरस्कार प्राप्त करने लगे। इसके चलते तमाम लोग इतने भयभीत और संत्रस्त रहने लगे कि अपने-आप को भी भूल गये। वे भूल गये कि कल तक इन्हीं समर्थों से लड़ रहे थे। अब समर्थ उन पर चाहे जितना अन्याय और अत्याचार करें, वे उनके विरुद्ध विद्रोह करना तो दूर, विरोध का विचार भी मन में न लाते। वे उनके विरुद्ध धरना, प्रदर्शन, हड़ताल, भूख हड़ताल, आमरण अनशन आदि करना तो दूर, उनसे असहमति व्यक्त करना तक भूल गये थे।
असमर्थों के मन में अपना आतंक जमाये रखने के लिए समर्थों ने प्रत्येक देश में विभिन्न धर्मों के आतंकी संगठन बनवाये, उन्हें खूब हथियार दिये, उनका खूब प्रचार किया और उन्हें खूब बढ़ावा दिया। दूसरी तरफ, यह सोचकर कि ये सशस्त्र आतंकी संगठन किसी दिन समर्थों के ही विरुद्ध न हो जायें, उन्होंने हर देश में पुलिस और फौज के अलावा तरह-तरह के आतंक-विरोधी सशस्त्र बल संगठित किये और उन्हें भी खूब हथियार दिये, उनका भी खूब प्रचार किया और उन्हें भी खूब बढ़ावा दिया। इससे एक तरफ तो पूरी दुनिया में धार्मिक संगठनों की अपनी-अपनी निजी सेनाएँ बनीं और दूसरी तरफ हथियारों की माँग बेतहाशा बढ़ी, जिसकी पूर्ति के लिए हथियारों का उत्पादन और व्यापार अत्यंत तेजी से बढ़ा। इससे असमर्थों में असुरक्षा की भावना बढ़ी। कोई नहीं जानता था कि कौन कब कहाँ और कैसे मार डाला जायेगा। असमर्थ लोग साँस भी लेते, तो डर-डरकर।
इसके साथ ही समर्थों ने सत्य, न्याय, नैतिकता, शांति, अहिंसा, प्रेम, सहयोग, सद्भाव आदि शब्दों के अर्थ अपने हित में बदल दिये और घोषणा कर दी कि जो लोग पुराने मानव-मूल्यों के अर्थ में इन शब्दों का प्रयोग करेंगे, वे मूल्य-अपराधी माने जायेंगे। मूल्य-अपराधियों के लिए उन्होंने विशेष पुलिस थानों और जेलों की व्यवस्था की। उन्हें नवीनतम हथियारों से लैस किया और मूल्य-अपराधियों को क्रूरतम यातनाएँ तथा भीषण दंड देने की व्यवस्थाएँ कीं। फिर भी पता नहीं क्यों और कैसे, मूल्य-अपराध और मूल्य-अपराधी बढ़ते जा रहे थे। शुरू-शुरू में व्यक्ति ही, जैसे स्त्रियाँ और पुरुष ही, मूल्य-अपराधी होते थे। बाद में उनके संगठन भी मूल्य-अपराधी होने लगे। फिर पूरे के पूरे इलाके और यहाँ तक कि पूरे के पूरे देश भी मूल्य-अपराधी होने लगे। मसलन, प्रेम करने वाली लड़कियाँ और लड़के मूल्य-अपराधी। अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करने वाले संगठन मूल्य-अपराधी। स्वायत्तता की माँग करने वाले इलाके मूल्य-अपराधी। स्वतंत्रता की माँग करने वाले देश मूल्य-अपराधी। आतंक और युद्ध के विरुद्ध शांति की माँग करने वाले सभी लोग और देश मूल्य-अपराधी।
समर्थों की सेवा से मुक्त होकर आत्मनिर्भर होकर जीना चाहने वाले लोग और देश तो सबसे बड़े मूल्य-अपराधी माने जाने लगे। उन्हें दंड देने के लिए स्थानीय स्तर पर पुलिस और कई दूसरे सशस्त्र बलों की व्यवस्था थी, जबकि भूमंडलीय स्तर पर समर्थों की भूमंडलीय सेनाएँ हमेशा तैयार रहतीं और इशारा पाते ही जल, थल और वायु मार्गों से जाकर उन पर टूट पड़तीं। गोली-गोलों से लेकर अत्यंत विनाशकारी बमों तक का इस्तेमाल करके वे अपराधी देशों को धूल में मिला देतीं। जो देश धूल में मिलाये जाते, उन देशों के खेत-खलिहान, बाग-बगीचे, कल-कारखाने, स्कूल-कॉलेज, पुस्तकालय और संग्रहालय आदि सब धूल में मिला दिये जाते। उनके साथ-साथ करोड़ों लोग और उनके अरबों-खरबों सपने भी धूल में मिला दिये जाते।
मेरा असमर्थ देश भी इसी तरह धूल में मिलाया गया था। मेरे देश के करोड़ों लोग मारे गये थे। करोड़ों लोग लापता हो गये थे। उनमें मेरे माता-पिता, भाई-बहन, सगे-संबंधी, मित्र-परिचित तथा बचपन में मेरे साथ पढ़ने और खेलने वाले मेरे सहपाठी भी थे। मैं बच गयी थी, क्योंकि मैं एक समर्थ देश में रहकर पढ़ रही थी।
बाद में मुझे पता चला कि धूल में मिलाये जा चुके मेरे देश के कुछ लोग बच गये थे, मगर बड़ी मुश्किल से बचे थे। उनका बाकी सब तो नष्ट हो चुका था, बस उनकी और उनके कुछ लोगों की जान बाकी थी, जिसे बचाने के लिए वे भागे थे। गोलियों और गोलों से, छोटे और बड़े बमों से, बचते-बचाते जब वे भाग रहे होते, तभी किसी के पिता की, किसी की माँ की, किसी के भाई की, किसी की बेटी या बेटे की जान चली जाती। अपने मृतकों को वहीं पड़ा छोड़ भागते-भागते–समुद्री, पहाड़ी और रेगिस्तानी रास्तों से भागते-भागते–वे कहीं समुद्रों में जल-समाधि ले लेते, कहीं बर्फ की कब्रें बनाकर उनमें दफ्न हो जाते, तो कहीं अपने ऊपर रेत के पिरामिड बनाकर उनके नीचे अदृश्य हो जाते। और इतनी मुसीबतें उठाने के बाद जब वे हजारों-लाखों की संख्या में समर्थ देशों में शरण लेने पहुँचते, तो उन देशों की सीमाओं पर खड़ी फौजें उन्हें रोक देतीं। वे कँटीले तारों की बाड़ तोड़कर जबर्दस्ती घुसने की कोशिश करते, तो फौजें उनका सामूहिक संहार कर डालतीं।
सौभाग्य से जिन्हें समर्थ देशों में शरण मिल जाती, उन्हें कई कठिन अग्नि-परीक्षाओं से गुजरना पड़ता। पहले उन्हें ठोक-बजाकर देखा जाता कि उनमें कौन सशक्त है, कौन अशक्त। अशक्तों को शरण न दी जाती और जैविक कूड़ा मानकर खुद-ब-खुद मरने के लिए छोड़ दिया जाता। सशक्तों में देखा जाता कि कोई मूल्य-अपराधी तो नहीं है। जिसमें सत्य, न्याय, नैतिकता आदि के मूल अर्थों वाले कीटाणु पाये जाते, उसे तुरंत मृत्युदंड देकर खत्म कर दिया जाता। इसके बाद जो बच जाते, उन्हें भी संदिग्ध माना जाता और उन पर कड़ी नजर रखी जाती। उन्हें ढेर सारी शर्तों के साथ और अत्यंत सख्त निगरानी में समर्थों की सेवा में लगाया जाता।
मैं धूल में मिलाये जा चुके अपने देश लौटकर क्या करती? मैंने मान लिया, या कल्पना कर ली, कि मैं वहाँ से अपनी जान बचाकर भागी हूँ और जहाँ पढ़ रही हूँ, वहाँ मैंने शरण ले रखी है। मैंने पढ़ाई पूरी करके नौकरी कर ली और पत्रकार बनकर देश-देश घूमने लगी।
समर्थ संवत् सोलह तक ऐसा लगता था, जैसे पूरी दुनिया पर समर्थों का शासन सदा के लिए कायम हो गया है और दुनिया की कोई ताकत उसे हिला नहीं सकती। लेकिन अगले साल ही उसकी नींव हिल गयी। समर्थ संवत् सत्रह में दुनिया के हर देश में एक अजीब-सा परिवर्तन होने लगा।
असमर्थों में दो तरह के लोग थे–सामान्य असमर्थ और विशिष्ट असमर्थ। सामान्य असमर्थ पुराने जमाने के अकुशल श्रमिकों जैसे थे, जबकि विशिष्ट असमर्थ कुशल श्रमिकों तथा अपने-अपने कार्यक्षेत्र के विशेषज्ञों जैसे। उन्हें असमर्थों में समर्थ कहा जाता था और यह माना जाता था कि देर-सबेर वे भी समर्थ बन जायेंगे और अखिल भूमंडल पर शासन करने वाली विश्व संसद के सदस्य बन जायेंगे। मगर उन्होंने पाया कि वे एक तरफ तो समर्थ बन जाने के लोभ में समर्थों की सेवा में दिन-रात एक किये रहते हैं और दूसरी तरफ उन्हें असमर्थ हो जाने का या कूड़ा ही बनकर रह जाने का डर सताता रहता है। इस विकट स्थिति से उत्पन्न उनका तनाव इतना बढ़ जाता कि वे एक दिन पागल हो जाते और हँसने लगते–हा-हा-हा!
वे प्रायः सामूहिक रूप से हँसते थे। मसलन, उनमें से कोई कहता, ‘‘सत्य।’’ और बाकी सब हँसने लगते, ‘‘हा-हा-हा!’’ कोई कहता, ‘‘न्याय।’’ और बाकी सब हँसने लगते, ‘‘हा-हा-हा!’’ कोई कहता, ‘‘नैतिकता।’’ और बाकी सब हँसने लगते, ‘‘हा-हा-हा!’’ कोई कहता, ‘‘आजादी।’’ और बाकी सब हँसने लगते, ‘‘हा-हा-हा!’’ कोई कहता, ‘‘बराबरी।’’ और बाकी सब हँसने लगते, ‘‘हा-हा-हा!’’ वे कहते कुछ नहीं थे, बस हँसते और हँसते ही चले जाते, ‘‘हा-हा-हा!’’ स्पष्ट था कि वे मूल्य-अपराधी हैं, लेकिन उन्हें मृत्युदंड नहीं दिया जा सकता था, क्योंकि वे समर्थों के काम के लोग थे। डॉक्टर, इंजीनियर, वैज्ञानिक, अर्थशास्त्री, समाजशास्त्री, शिक्षक, प्रशिक्षक, उद्योगों-व्यापारों के व्यवस्थापक आदि। उनके बिना समर्थों का काम नहीं चल सकता था, इसलिए उन्हें मारा नहीं जाना था, उनके पागलपन का इलाज ही किया जाना था।
समर्थों ने पागलों के इलाज के लिए पागलखाने बना रखे थे। कोई पागल नजर आता, तो सरकारी कर्मचारी आते और उसे पकड़कर पागलखाने में ले जाते। शुरू-शुरू में समर्थों ने उस पागलपन को मामूली बीमारी समझा था, लेकिन वह पागलपन धीरे-धीरे छूत के रोग की तरह बढ़ने लगा और फिर महामारी की तरह तेजी से फैलने लगा। कोई सोच भी नहीं सकता था कि अचानक दुनिया में एक साथ इतने पागल पैदा हो जायेंगे। ऐसा लगता था, मानो जिसे वे बहुत देर से समझ नहीं पा रहे थे, वह जोक, मजाक या चुटकुला अचानक उनकी समझ में आ गया हो और उसे इतनी देर से समझ पाने पर वे उस पर कम और अपने-आप पर ज्यादा हँस रहे हों। पहले वे धीरे से हँसते–हा-हा-हा! फिर जोर से–हा-हा-हा! फिर और जोर से–हा-हा-हा!
जरा सोचिए, दुनिया के हर हिस्से में हजारों-लाखों-करोड़ों लोग अचानक जोर-जोर से, पूरा गला फाड़कर हँसने लगे होंगे, तो दुनिया का क्या हाल हुआ होगा!
हुआ यह कि समर्थों की नींद उड़ गयी। वे अपनी सरकारों के भरोसे चैन से सोते थे। जागकर उन्होंने सरकारों से पूछा, ‘‘यह क्या हो रहा है?’’ लेकिन सरकारों की अपनी ही नींद उड़ी हुई थी। वे पुलिस-थानों, अदालतों, जेलों, पागलखानों आदि की व्यवस्थाओं के भरोसे चैन से सोती थीं। अब वे जागकर उन व्यवस्थाओं से पूछ रही थीं, ‘‘यह क्या हो रहा है?’’ व्यवस्थाएँ भी, जो प्रायः सोती रहती थीं, अब जाग उठी थीं और सारी दुनिया की एक-एक हलचल से निरंतर अवगत कराते रहने वाले भूमंडलीय खुफिया तंत्र से पूछ रही थीं, ‘‘यह क्या हो रहा है?’’ और खुफिया तंत्र के लोग नवीनतम तकनीकों से प्राप्त फुटेज खँगालते हुए तीव्रतम गति वाले कंप्यूटर खटखटाकर एक-दूसरे से पूछ रहे थे, ‘‘यह क्या हो रहा है?’’
समर्थों की समझ में कुछ नहीं आ रहा था और पागलों की संख्या और उनकी हँसी का शोर पल-प्रतिपल बढ़ता जा रहा था। असमर्थ लोग भी चैन से नहीं सो पा रहे थे। वे लगातार बनी रहने वाली बेचैनी में दुःस्वप्न देखते हुए सोते थे। अब उनकी दुःस्वप्नों वाली नींद भी हराम हो गयी और वे अपने घरों से निकलकर सड़कों पर आ गये। देखते-देखते उनमें से भी कई पागल होने लगे और उनमें भी पागलों की संख्या बढ़ने लगी।
समर्थों ने अपनी विश्व संसद की आपातकालीन बैठक बुलायी और उसमें तय किया कि दिन-दूने और रात-चैगुने बढ़ते पागलों का इलाज संभव नहीं है, अतः उन्हें नियंत्रित करने के लिए त्वरित कार्रवाई की जाये।
पहली कार्रवाई हर देश में पुलिस की तरफ से हुई। उसने बड़े पैमाने पर धावा बोलकर पागलों को गिरफ्तार किया, लेकिन पहली बार यह देखा कि पागल न तो डरे, न गिरफ्तार होने से बचने के लिए भागे। वे हँसते-हँसते, ठहाके लगाते हुए, ठाठ से गिरफ्तार हुए। यह देखकर पुलिस घबरा गयी। उसे पता था कि पागलखानों में पहले ही जरूरत से ज्यादा पागल भरे हुए हैं। नये पागलखाने तत्काल बनवाना संभव नहीं है और तब तक इतने सारे पागलों को कहीं और रखना भी संभव नहीं है। उसने सोचा, गिरफ्तार पागल उसकी गिरफ्त से छूटकर भागने की कोशिश करेंगे, तो वह उन्हें भाग जाने देगी। किसी-किसी देश में तो पुलिस पागलों से प्रार्थना भी करती पायी गयी कि वे भाग जायें। लेकिन पुलिस की इस प्रार्थना पर पागल इतने जोर से हँसे कि वह डर गयी। उसने अपने-अपने देशों की सरकारों से पूछा, ‘‘पागल काबू में नहीं आ रहे हैं। क्या किया जाये?’’ सरकारों ने समर्थों की विश्व संसद से पूछा, ‘‘पागल काबू में नहीं आ रहे हैं। क्या किया जाये?’’
समर्थों की विश्व संसद ने समस्त सरकारों को और सरकारों ने अपने-अपने देश की पुलिस को आदेश दिया, ‘‘पागलों को दूर जंगल में ले जाकर छोड़ आओ।’’ पुलिस ने आदेश का पालन किया। लेकिन पागलों को जंगलों में छोड़कर हर जगह की पुलिस अपनी गाड़ियों में वापस आयी, तो उसने देखा कि पहले से भी ज्यादा पागल हाथ उठाकर हँसते हुए उसका स्वागत कर रहे हैं। पुलिस हैरान रह गयी। इतनी दूर जंगल में छोड़े हुए पागल पैदल उससे पहले वापस कैसे पहुँचे? सरकारों को बताया गया, तो उन्होंने कोई और उपाय न देख आदेश दिया, ‘‘पागलों को फिर से गाड़ियों में भरकर फिर से दूर जंगल में छोड़कर आओ।’’ पुलिस ने पुनः आदेश का पालन किया। लेकिन घोर आश्चर्य! जंगलों में पहले छोड़े गये पागल वहाँ पहले से ही हाथ उठाकर अट्टहास करते हुए नये पागलों के स्वागत में खड़े थे!
यह चमत्कार कैसे हुआ? न पुलिस की समझ में आया, न सरकारों की समझ में।
दरअसल किसी की भी समझ में कुछ नहीं आ रहा था। दुनिया के हर शहर, हर गाँव में जोर-जोर से हँसने वाले नये-नये पागल पैदा हो रहे थे और न जाने कब से वीरान-सुनसान पड़े जंगल उनसे आबाद हो रहे थे। वे वहाँ अपनी बस्तियाँ बसा रहे थे और खेती, बागवानी, पशु पालन जैसे काम करते हुए अपनी नयी जिंदगी शुरू कर रहे थे। दुनिया की सरकारों को लगा कि यह तो भारी गड़बड़ है। इस तरह गाँव-गाँव और शहर-शहर असमर्थ लोग पागल होते रहे और जंगलों में जाकर अपनी अलग दुनिया बसाकर अपने ढंग से जीने लगे, तो समर्थों की व्यवस्था का क्या होगा? उनके खेतों और कारखानों में काम कौन करेगा? उनके उद्योग और व्यापार कौन चलायेगा? उनके लिए भोजन-वस्त्र कौन जुटायेगा? उनकी सुरक्षा के लिए पुलिस और फौज में भर्ती होने कौन आयेगा? उनके दफ्तर, स्कूल, काॅलेज, अस्पताल वगैरह कौन चलायेगा?
पागलों की बढ़ती संख्या से सबसे पहले पुलिस प्रभावित हुई। समर्थों के शासन में पुलिस वालों को वेतन बहुत कम दिया जाता था, लेकिन असमर्थों को डरा-धमकाकर लूटने की पूरी छूट दी जाती थी। इसलिए पुलिस की नौकरी में ‘ऊपर की कमाई’ असली कमाई मानी जाती थी। मगर ऊपर की कमाई का कम-ज्यादा होना इस बात पर निर्भर करता था कि असमर्थ पुलिस से कम डरते हैं या ज्यादा। ज्यादा कमाई के लिए पुलिस असमर्थों को ज्यादा से ज्यादा डराकर रखती थी। वह पागलों को भी डराना चाहती थी, मगर पागल थे कि पुलिस से डरते ही नहीं थे। वह उन्हें आधी रात उनके घरों से उठाकर ले जाये, थानों में ले जाकर उनकी पिटाई करे, हवालात में उन्हें थर्ड डिग्री की यातनाएँ दे, या उनका एनकाउंटर ही क्यों न कर दे, पागल उससे डरते ही नहीं थे। पुलिस द्वारा दी जाने वाली हर धमकी, हर गाली, हर लाठी, हर गोली का जवाब वे गलाफाड़ हँसी से देते।
पागलों के इस रवैये से पुलिस की ऊपर की कमाई बहुत घट गयी। उसी अनुपात में पागलों को पकड़-धकड़कर जंगलों में छोड़ आने के काम में उसकी रुचि भी घट गयी। होते-होते यह होने लगा कि सरकारें जब पुलिस को पागलों से निपटने के आदेश देतीं, तो पुलिस उनसे निपटने की झूठी रिपोर्टें सरकारों को देकर अपना कर्तव्य पूरा हुआ मान लेती। नतीजा यह हुआ कि पुलिस नाकारा हो गयी और सभी देशों की सभी सरकारों के प्रशासन ठप्प हो गये। पुलिस थाने बेकार हुए, तो अदालतें और जेलें भी बेकार हो गयीं। यह पूरा तंत्र इतना बड़ा था कि उसके बेकार हो जाने से कई काम एक साथ हुए। एक तरफ सरकारें, जो इसी तंत्र के बल पर टिकी थीं और इसी से लोगों को आतंकित रखकर उन पर शासन करती थीं, अचानक बेहद कमजोर हो गयीं। दूसरी तरफ हर देश में पुलिस के अफसर और सिपाही, अदालतों के जज और वकील, जेलों के जेलर और जल्लाद एक साथ बेकार हो गये। करोड़ों-करोड़ लोग बेरोजगार हो गये।
अब इतने सारे बेरोजगार लोग करें तो क्या करें? जायें तो कहाँ जायें? कोई और उपाय न देख वे पागलों के पास गये और उनसे पूछा, ‘‘हम कहाँ जायें और क्या करें?’’
पागलों ने हँसकर उनसे कहा, ‘‘सत्ता के आसमान में बहुत उड़ लिये, अब श्रम की जमीन से जुड़ो। मेहनत करो और खुद कमाओ-खाओ।’’
‘‘कैसे?’’
‘‘जहाँ भी खाली जमीन मिले, वहाँ खेती और बागवानी करके अन्न और फल पैदा करो। गाय, भैंस, भेड़, बकरी, मुर्गी, मछली आदि पालकर दूध, मांस आदि पैदा करो। बेचने के लिए नहीं, खुद खाने और दूसरों को खिलाने के लिए। खुद जीने के लिए और दूसरों को जिलाने के लिए।’’
मरता क्या न करता! थानों, अदालतों और जेलों से मुक्त हुए लोगों ने जगह-जगह छोटी-छोटी देहाती बस्तियाँ बसायीं और आत्मनिर्भर होकर जीना शुरू कर दिया। प्रशासन और न्याय व्यवस्था द्वारा बड़े पैमाने पर किये जाने वाले काम उनकी पंचायतें छोटे पैमाने पर करने लगीं। अपराध एकदम कम या खत्म ही हो गये थे। अदालतों और जेलों की जरूरत ही नहीं रही थी, छोटे-मोटे झगड़े पंचायतों में ही निपटा लिये जाते।
तब सरकारों ने पागलों से निपटने का काम फौजों को सौंपा। समर्थ-असमर्थ हर देश के पास अपनी फौज थी। फौजें अपने-अपने देश की सीमाओं की सुरक्षा करती थीं, दूसरे देशों के हमलों को रोकती थीं और कभी-कभी खुद भी दूसरे देशों पर हमले करती थीं। ज्यों ही पता चलता, किसी असमर्थ देश में अशांति है, समर्थ देशों की फौजें शांति स्थापित करने पहुँच जातीं और वहाँ मरघट की-सी शांति स्थापित कर देतीं। ज्यों ही पता चलता, किसी असमर्थ देश में जनतंत्र खतरे में है, वे जनतंत्र की रक्षा करने पहुँच जातीं और वहाँ निहायत सख्त और मजबूत तानाशाही वाला जनतंत्र स्थापित कर देतीं। ज्यों ही पता चलता, कोई असमर्थ देश समर्थों की सेवा से मुक्त होकर स्वतंत्र और स्वायत्त होना चाहता है, समर्थों की फौजें उसे समर्थ-भक्ति का पाठ पढ़ाने पहुँच जातीं और वहाँ की सरकार को डरा-धमकाकर, या खुले बाजार में खरीदकर, उसकी जगह समर्थों के लिए काम करने वाली कोई कमजोर-सी कठपुतली सरकार बनाकर बिठा देतीं।
लेकिन पागलों से निपटने का मामला बड़ा टेढ़ा था। वे न तो आजादी या अपने लिए अलग राज्य जैसी कोई माँग करते, न ऐसी किसी माँग के लिए अहिंसक आंदोलन या हिंसक विद्रोह करते। वे बस इतना करते कि समर्थों की सेवा करना छोड़ हँसने लगते। वे सिर्फ हँसते थे और समर्थों का बताया हुआ कोई काम नहीं करते थे। उन्होंने खेतों और कारखानों, दुकानों और दफ्तरों, स्कूलों और अस्पतालों आदि में काम करने जाना बंद कर दिया था। उनसे काम करने को कहा जाता, तो वे हँसने लगते। भूखों मर जाने का डर दिखाया जाता, तो हँसने लगते। जेलों और पागलखानों में भेजे जाने का डर दिखाया जाता, तो हँसने लगते। उन्हें दूर जंगलों में छुड़वा दिया जाता, तो भी वे हँसते और हँसते ही रहते।
आखिरकार समर्थों की विश्व संसद में एक प्रस्ताव पास हुआ कि पागलों को मौत से डराया जाये, क्योंकि मौत से बड़ा डर कोई नहीं होता। प्रस्ताव के अनुसार समर्थ और असमर्थ, सब देशों की सरकारों ने अपनी फौजों को आदेश दिया कि वे जाकर अपने-अपने देश के पागलों को मौत से डरायें। गाँव-गाँव, शहर-शहर, मुहल्ले-मुहल्ले और गली-गली में जायें, इक्के-दुक्के पागलों को गोली से उड़ा दें और उनकी लाशें पेड़ों या खंभों पर लटका दें, ताकि दूसरे पागल डरें और पागलपन छोड़कर काम पर लौटें। अगर कहीं एक से अधिक पागल मिलें, तो उनमें से कुछ को गोली चलाकर खत्म कर दें। अगर पागलों की भीड़ें मिलें, तो जरूरत के मुताबिक उन पर छोटे बम डालकर उनमें से कुछ को मार डालें। पागलों को हर हाल में डराकर उनका हँसना बंद कराना है और उन्हें काबू में लाकर काम पर लगाना है।
आदेश पाकर सभी देशों की फौजें अपने-अपने देश के पागलों को पागलपन छोड़कर काम पर लौटने के लिए तैयार करने निकल पड़ीं। मगर पागल इतने ज्यादा पागल हो चुके थे कि उन्हें मरने से डर ही नहीं लगता था। गोली लगने पर वे चीखते नहीं थे, गला फाड़कर हँसते थे–हा-हा-हा! गोले बरसाये जाने पर वे भागते नहीं थे, तोपों के सामने निहत्थे खड़े रहकर हँसते थे–हा-हा-हा! ऊपर से बम बरसाये जाने पर जब उनकी लाशों के चिथड़े उड़ने लगते, तब भी उनके सामूहिक ठहाके सुनायी पड़ते–हा-हा-हा! उन ठहाकों का ऐसा गगनभेदी शोर उठता कि फौजियों के दिल दहल जाते। जंगलों में छोड़े गये पागलों पर जब गोली-गोले बरसाये जाते, तब तो पागलों की हँसी में जंगल के पशु-पक्षियों, पेड़-पौधों और नदी-नालों की आवाजें भी शामिल होकर उसे ऐसे विकट हास्य की भयंकर गड़गड़ाहट में बदल देतीं कि हथियारों के बल पर स्वयं को परम शक्तिशाली समझने वाले फौजी डरकर भाग खड़े होते।
एक बार मैं पागलों की रिपोर्टिंग के लिए एक जंगल में गयी, तो मैंने देखा कि जंगल में छोड़ दिये गये हजारों पागल जिंदा रहने की जुगत में लगे हैं। कोई जमीन खोद रहा है, कोई पेड़ पर चढ़कर फल तोड़ रहा है, कोई आग जला रहा है, तो कोई उस पर कुछ भून रहा है। फौजियों को आते देख वे इकट्ठे होकर सामने आये और हँसकर बोले, ‘‘मारोगे? मारो!’’ और हँसने लगे, ‘‘हा-हा-हा!’’
फौजी हैरान होकर देखते रह गये कि सामने मौत देखकर भी ये लोग हँस रहे हैं। उन्होंने ऐसे लोग पहले कभी नहीं देखे थे, जो मारे जाने से डरते न हों, बल्कि हँसते हों। फौजियों को लगा, यह तो लड़ाई नहीं, निर्दोष निहत्थे लोगों की हत्या है। सामूहिक हत्या। जनसंहार।
फौजी भी आखिर थे तो मनुष्य ही। उन्होंने हथियार फेंक दिये और घुटनों के बल बैठकर, हाथों में चेहरे छिपाकर, फूट-फूटकर रोने लगे। उन्हें रोते देख पागल आगे बढ़े, उनके पास पहुँचे, उनके गले मिले और वे भी रोने लगे।
फौजियों ने रोते-रोते कहा, ‘‘हम कितने पागल थे, जो तुम को पागल समझते थे! असली पागल तो हम हैं, जो मरने और मारने की वह नौकरी करते हैं, जिसने हमें इंसान से हैवान और शैतान बना दिया है!’’
‘‘तो समझ लो कि आज से तुम्हारी मरने और मारने वाली नौकरी खत्म, जीने और जिलाने वाली जिंदगी शुरू! तुम्हें इंसान से हैवान और शैतान बनाने वाले हैं ये हथियार। इनको दुनिया से विदा करो।’’
‘‘मगर कैसे?’’
‘‘यह तुम खुद सोचो। लेकिन यह समझ लो कि जब तक हथियारों का बनना और बिकना बंद नहीं होगा, लोग डरते रहेंगे और पागल भी होते रहेंगे।’’
फौजियों ने पागलों को गौर से देखा, फिर आपस में एक-दूसरे को देखा, मुस्कराये और पागलों से बोले, ‘‘हम समझ गये।’’
‘‘तो आज की रात तुम हमारे मेहमान रहो। मिलकर जंगल में मंगल करते हैं।’’
और उस रात जंगल में जो जश्न पागलों और फौजियों ने मिलकर मनाया, उसमें उन्होंने मुझे भी शामिल किया। ऐसा जश्न मैंने पहले कभी नहीं देखा था।
अगले दिन मैंने इस घटना की विस्तृत रिपोर्टिंग की और वह सभूस (समर्थों की भूमंडलीय समाचारसेवा) के जरिये एक बड़ी खबर बनकर सारी दुनिया में प्रकाशित और प्रसारित हुई। इस खबर से समर्थों की हालत खराब हो गयी। उन्होंने झटपट समर्थों की विश्व संसद की एक आपातकालीन बैठक बुलायी और उसमें आनन-फानन यह फैसला किया कि पागलों को खत्म करने के लिए भेजी गयी फौजें वापस बुला ली जायें और पागलों के प्रतिनिधियों को बातचीत के लिए बुलाया जाये।
फैसले के मुताबिक तुरंत सारी दुनिया के पागलों को अपने प्रतिनिधि चुनकर भेजने के संदेश और फौजियों को अपने ठिकानों पर वापस लौटने के आदेश भेजे गये। लेकिन पागलों तक यह संदेश और फौजियों तक यह आदेश पहुँचा, तो पागल और फौजी दोनों एक साथ हँसे। दोनों की सम्मिलित हँसी दुनिया भर में ऐसी गूँजी कि जैसे दुनिया भर के पूरे आसमान में छाये घने बादल गड़गड़ा उठे हों। उस गड़गड़ाहट में बिजली-से चमकते और तड़तड़ाते कुछ समवेत शब्द भी थे :
‘‘मरेंगे और मारेंगे नहीं, जियेंगे और जिलायेंगे।’’ ‘‘डरेंगे और डरायेंगे नहीं, हँसेंगे और हँसायेंगे।’’
अब, यह उस सम्मिलित हँसी का असर रहा हो या उन समवेत शब्दों का, दुनिया भर में तमाम असमर्थ हँसने लगे। जो असमर्थ पागल और फौजी नहीं थे, वे भी हँसने लगे। और उसी विश्वव्यापी समवेत हँसी के बीच वह घटना घटी, जो दुनिया में न तो पहले कभी घटी थी और न आगे कभी घटेगी।
फौजियों ने अपने भूमंडलीय संचार-तंत्र के जरिये न जाने कैसे सारी दुनिया की सारी फौजों के बीच एक सहमति बनायी और एक दिन प्रत्येक देश की फौज ने अपने देश के हथियार-कारखानों और आयुध-भंडारों पर कब्जा कर लिया। उन्होंने अपने पास के तथा आयुध-भंडारों में भरे सब छोटे-बड़े अस्त्रों-शस्त्रों और परम विनाशकारी बमों के साथ-साथ उन्हें बनाने वाली मशीनों को भी ले जाकर गहरे महासागरों में डुबो दिया। हथियार बनाने के कारखानों की जगहों पर उन्होंने सस्ते खाद्य पदार्थों, पोषक आहारों, औषधियों और चिकित्सा संबंधी उपकरण आदि बनाने के कारखाने खुलवा दिये।
दुनिया भर के हथियारों के कारखाने बंद हो गये, तो हथियारों का भूमंडलीय बाजार और व्यापार भी खत्म हो गया। पुलिस, दूसरे सशस्त्र बलों और आतंकी संगठनों के पास जो हथियार थे, वे भी कुछ दिन बाद गोला-बारूद न मिलने से बेकार हो गये। इस प्रकार दुनिया भर के लोग हथियारों द्वारा पैदा किये जाने वाले भय और आतंक से मुक्त हो गये। इसके साथ ही भय और आतंक के सहारे अनंत काल तक अखिल भूमंडल पर शासन करने के लिए समर्थों द्वारा बनायी गयी संस्थाएँ और व्यवस्थाएँ भी बेकार हो गयीं। समर्थों की वह विश्व-संसद, जिसने हजारों साल आगे की सोचकर अपना नया संवत् चलाया था, वह भी नहीं रही।
मेरा और दूसरे बहुत-से लोगों का खयाल था कि अब पागल लोग समर्थों की बनायी विश्व संसद पर कब्जा करेंगे और उसमें बैठकर समर्थों की भाँति ही अखिल भूमंडल पर शासन करेंगे। लेकिन उन्होंने ऐसा कुछ नहीं किया। किया सिर्फ यह कि विश्व संसद की इमारत को ऐतिहासिक वस्तुओं का संग्रहालय बनाकर उसे हमेशा के लिए ‘इतिहास की वस्तु’ बना दिया।
हथियारों के कारखाने नष्ट हो जाने के बाद फौजों का भी कोई काम नहीं रहा। सो फौजियों ने यह किया कि जिन सीमाओं की सुरक्षा वे किया करते थे, उन्होंने हँसते-हँसते मिटा दीं और यह काम सीमाओं के इस पार और उस पार के फौजियों ने, जो पहले एक-दूसरे के दुश्मन हुआ करते थे, दोस्त बनकर साथ-साथ किया। सीमाएँ मिटा देने के बाद फौजियों ने अपनी वर्दियाँ उतारकर सादा कपड़े पहने, वर्दियों के ढेर लगाये, उनकी होलियाँ जलायीं और एक-दूसरे के गले मिले। देशों और दिलों को बाँटने वाली सीमाओं से दुनिया को मुक्त करने की खुशी में वे पागलों की तरह हँसे। उन्होंने जमकर जाम छलकाये, मुक्ति के गीत गाये, जी भरकर नाचे और एक-दूसरे से विदा लेकर पागलों के पास यह पूछने गये कि अब वे क्या करें। पागलों ने उनसे कहा, ‘‘तुमने मरने और मारने का काम छोड़कर जीने और जिलाने का काम करने की कसम खायी थी। अब उस काम को कर दिखाने का समय आ गया है। लोगों के बीच जाओ और भूख, कुपोषण, बीमारी और बेरोजगारी के कारण मर रहे उन मनुष्यों को जिलाओ, जो समर्थों की विश्व व्यवस्था द्वारा मानव कूड़ा और जैविक कूड़ा बना दिये गये हैं। इसके लिए उत्पादन और वितरण की एक नयी व्यवस्था बनाओ, जिसका मूल मंत्र हो–अपना उत्पादन और अपना उपभोग। बड़े-बड़े शहरों में केंद्रित बड़े-बड़े उद्योगों की बड़ी-बड़ी मशीनों वाली उत्पादन प्रणाली को बदलकर छोटी-छोटी ग्रामीण बस्तियों में विकेंद्रित छोटे-छोटे उद्योगों और हाथ से या हवा, पानी, धूप, भाप और पशुओं की शक्ति से चलने वाली छोटी-छोटी मशीनों वाली उत्पादन प्रणाली शुरू करो।’’
भूतपूर्व फौजियों में एक नयी जिंदगी शुरू करने और एक नयी व्यवस्था बनाने का उत्साह पैदा हुआ, तो वे मुक्त मन, स्वस्थ तन और सुंदर भावनाओं और योजनाओं के साथ दुनिया भर में फैल गये। उन्होंने सबसे पहले उन ऊँची इमारतों, बड़े कारखानों, बड़े बाजारों, मॉलों, मनोरंजन केंद्रों आदि को बंद किया, जिनमें नाहक ही ऊर्जा की भारी फिजूलखर्ची होती थी। उनमें लगने वाली ऊर्जा को उन्होंने ग्रामीण बस्तियों की ओर मोड़ा, जहाँ खेती-बाड़ी और उससे जुड़े छोटे-छोटे उद्योगों के लिए तथा घरों, स्कूलों, अस्पतालों आदि के लिए उसकी जरूरत थी। इससे ग्रामीण क्षेत्रों में बेरोजगारी छूमंतर हो गयी और वहाँ रोजगार इतने बढ़ गये कि शहरों के बेरोजगार वहाँ जाकर अपना उत्पादन और अपना उपभोग करने लगे। मनुष्यों को कूड़ा बनाने वाली व्यवस्था को अतीत की वस्तु बनाकर वे मनुष्यता का भविष्य बनाने लगे।
पहले के लोग गाँवों से शहरों की ओर भागते थे, अब उलटा होने लगा। शहर खाली होने लगे। ऊँची-ऊँची इमारतें बेकार हो गयीं। बड़े-बड़े कारखाने या तो बंद हो गये, या बेहद जरूरी चीजों का उत्पादन करने लगे। बाजारों में विज्ञापन के बल पर गैर-जरूरी चीजों का बिकना बंद हो गया। दुनिया की पूरी व्यवस्था ही बदलती नजर आने लगी।
अब कुछ और तरह के पागलों ने एक चमत्कार किया। एक दिन दुनिया भर के अर्थशास्त्री, वित्त विशेषज्ञ, मुद्रा विशेषज्ञ, बैंकिंग विशेषज्ञ, सट्टा बाजार विशेषज्ञ और दुनिया भर की वित्त व्यवस्था से जुड़े कंप्यूटरों के विशेषज्ञ मिले, जो अपने-अपने काम करते हुए ही किसी दिन हँस पड़े थे और पागल हो गये थे। उन्होंने एक-दूसरे से कहा, ‘‘मनुष्यों को पागल बनाने वाली दो चीजें हैं–भय और लालच। फौजी पागलों ने दुनिया को भय से मुक्त कर दिया है, अब लालच से मुक्त करने की बारी हमारी है। भय से मुक्ति के लिए उन्होंने हथियारों को दफ्नाया और सीमाओं को मिटाया, लालच से मुक्ति के लिए हम दुनिया से धन का सफाया करेंगे।’’
‘‘कैसे?’’
इस प्रश्न पर उनके बीच लंबी बहस हुई और एक योजना बनी, जिसके अनुसार एक दिन बैंकों और दूसरे वित्तीय संस्थानों की भूमंडलीय संचार-व्यवस्था एकदम ठप्प हो गयी। दुनिया भर के बैंकों और दूसरे वित्तीय संस्थानों के कंप्यूटर खराब हो गये। उनमें पल-पल में अरबों-खरबों का जो धन दुनिया में इधर से उधर होता रहता था, उसका आना-जाना बंद हो गया। दुनिया भर के बैंक अकाउंट बंद हो गये। बैंकों में जितने भी खाते थे, उन सब में जमा राशियाँ शून्य हो गयीं।
इससे दुनिया में ऐसी खलबली मची, जैसी हथियारों के दफ्नाये जाने और सीमाओं के मिटाये जाने के समय भी नहीं मची थी। कल तक जो धनी और महाधनी थे, रातोंरात धनहीन हो गये। जिन लोगों के घरों, दुकानों और दफ्तरों में लाखों-करोड़ों की नकदी रखी हुई थी, वह सब बेकार हो गयी। सट्टा बाजार सहित सारा बाजार और व्यापार ठप्प हो गया। सिक्के धातुओं के और नोट कागजों के बेकार टुकड़े होकर रह गये।
पहले लोग हँसते-हँसते पागल हुए थे, इस बार बहुत-से लोग रोते-रोते पागल हुए।
अगला कदम कुछ और पागलों ने उठाया। दुनिया के हर देश में लोगों की आबादी, जनसंख्या के घनत्व और नगर-नियोजन आदि का हिसाब रखने से संबंधित विभागों में काम करने वाले जो विशेषज्ञ हँसते-हँसते पागल हुए थे, उन्होंने मिलकर हिसाब लगाया कि दुनिया में कहाँ आबादी बहुत कम है और कहाँ बहुत ज्यादा। हालाँकि दुनिया से धन का सफाया हो जाने के बाद धनी-निर्धन जैसे भेद खत्म हो गये थे, फिर भी कहीं अधिकांश लोग अब भी बेघर थे और कहीं बहुत थोड़े लोग अब भी बहुत बड़ी-बड़ी जगहों में रहते थे। कहीं लोगों के पास खाने-पहनने की चीजों के भंडार भरे हुए थे और कहीं बहुत-से लोग भूखे-नंगे घूम रहे थे। पागलों ने घनी आबादी वाले इलाकों के बेघर, बेरोजगार और भूखे-नंगे लोगों से कहा, ‘‘यह पृथ्वी उन थोड़े-से लोगों की बपौती नहीं है, जो इस पर इतनी बड़ी-बड़ी जगहें घेरकर बैठे हुए हैं। यह पृथ्वी सबकी है और इस पर सबको आराम से रहने-बसने का हक है। जाओ, जहाँ बहुत ज्यादा जगह में थोड़े-से लोग रहते हों, वहाँ जाकर रहो और जो लोग जरूरत से ज्यादा खाते-पहनते हों, उनके साथ मिल-बाँटकर खाओ-पहनो।’’
भय और आतंक तो अब दुनिया में रह ही नहीं गया था, सीमाएँ मिट जाने से अब लोग वीजा और पासपोर्ट के बिना दुनिया में कहीं भी आ-जा सकते थे। समर्थों की विश्व व्यवस्था में लोग दूसरे देशों में नौकरी करने या शरण लेने के लिए दीन-हीन होकर जाया करते थे। अब वे अधिकारपूर्वक रहने-बसने के लिए जाने लगे। इससे बहुत बड़ी-बड़ी जगहों में रहने वाले और जरूरत से ज्यादा खाने-पहनने वाले थोड़े-से लोगों को थोड़ी तकलीफ हुई, लेकिन बहुत छोटी-छोटी जगहों में बहुत बड़ी संख्या में रहने वाले और खाने-पहनने को बहुत कम पाने वाले बहुत-से लोगों को बहुत राहत मिली।
इसके बाद वे साहित्यकार, कलाकार, शिक्षक और अन्य संवेदनशील लोग सक्रिय हुए, जो अपने-अपने समाजों में ऊँच-नीच के भेद और उनके आधार पर किये जाने वाले अन्याय-अत्याचार देखकर पागल हुए थे। हालाँकि अब काफी आजादी और बराबरी हो गयी थी, जिससे अमीर-गरीब, मर्द-औरत, गोरा-काला, सवर्ण-शूद्र, बहुसंख्यक-अल्पसंख्यक जैसे भेदों के आधार पर किये जाने वाले अन्याय-अत्याचार काफी कम हो गये थे, फिर भी पुरानी आदतों और मान्यताओं के चलते इस प्रकार के कुछ अन्याय-अत्याचार अब भी होते थे। यह देखकर उन पागलों ने औरतों से कहा कि वे मर्दों को घेरें, कालों से कहा कि वे गोरों को घेरें, शूद्रों से कहा कि वे सवर्णों को घेरें और अल्पसंख्यकों से कहा कि वे उन बहुसंख्यकों को घेरें, जो लैंगिक, नस्ली, धार्मिक, सांप्रदायिक और खान-पान, वेश-भूषा, रहन-सहन आदि के भेदों के आधार पर उनके प्रति अन्याय और अत्याचार करते हैं। पागलों ने उनसे कहा कि उन लोगों को घेरकर मारना-पीटना नहीं है, बस उन्हें घेरकर उन पर हँसना है और तब तक हँसते रहना है, जब तक वे शर्मिंदा होकर मनुष्यों को मनुष्य न समझने की अपनी भूल स्वीकार करके उसे सुधार न लें।
इस तरह दुनिया भर में सामाजिक अन्याय के विरुद्ध हँसी के हथियार से लड़ाई लड़ी गयी और जीती गयी।हाँ, मैं अपने बारे में बताना तो भूल ही गयी। मैं अब भी पत्रकार थी, मगर अब मैं ‘सभूस’ (समर्थों की भूमंडलीय समाचारसेवा) की नहीं, बल्कि उसे बदलकर बनायी गयी ‘अभूस’ (अखिल भूमंडलीय समाचारसेवा) की पत्रकार थी। अब मेरा काम दुनिया में हो रहे नये बदलावों की रिपोर्टिंग करना था। दुनिया में इतने बड़े-बड़े बदलाव इतनी तेजी के साथ हो रहे थे कि मैं उनकी रिपोर्टिंग के लिए दिन-रात यहाँ से वहाँ भागती रहती थी। इधर मेरी रुचि प्रकृति और पर्यावरण से संबंधित बदलावों में अनायास बढ़ गयी थी।
अपने काम के साथ-साथ मैं अपने माता-पिता, भाई-बहन और दूसरे सगे-संबंधियों की तलाश भी करती रहती थी। मगर उनमें से कोई भी मुझे कहीं भी नहीं मिला। हाँ, एक बार जब मैं दुनिया भर में घूम-घूमकर पागलों द्वारा शुरू की गयी नये ढंग की सामूहिक खेती-बाड़ी, बागवानी और खाने योग्य पशुओं, पक्षियों, मछलियों आदि के उत्पादन के साथ-साथ पर्यावरण की रक्षा से संबंधित कार्यक्रमों की रिपोर्टिंग कर रही थी, तब मुझे एक पर्यावरण सम्मेलन में एक पागल दिखा, जो मुझे अपने बड़े भाई जैसा लगा। लेकिन मुझे अपने परिवार से बिछुड़े इतना लंबा अरसा हो चुका था और वह जिस देश में मुझे दिखा था, वह मेरे देश से इतनी दूरी पर था कि वहाँ मुझे अपने भाई का होना संभव नहीं लगा। फिर भी मैंने उससे मिलकर उसके अतीत के बारे में जानना चाहा। लेकिन वह हँस दिया। मैं समझ गयी, यदि वह मेरा भाई होता, तो अवश्य ही मुझे पहचान लेता।
लेकिन उस पागल से मिलने के बाद मैंने सोचा, कम से कम एक बार मुझे उस देश में अवश्य जाना चाहिए, जो कभी मेरा देश था और जिसे कभी समर्थों ने धूल में मिला दिया था। दुनिया में इतने बड़े-बड़े परिवर्तन हो गये हैं, क्या पता वहाँ जाकर मुझे अपने परिवार के लोगों के बारे में कुछ पता चले या शायद वहाँ कोई मुझे मिल ही जाये।
और एक दिन मैं वहाँ पहुँच गयी, जहाँ मेरा शहर हुआ करता था। उस जगह का नाम तो वही था, लेकिन मेरा जाना-पहचाना वह शहर वहाँ नहीं था, जो नदी के दोनों किनारों पर घनी बस्तियों, बहुमंजिली ऊँची-ऊँची इमारतों और बड़े-बड़े उद्योगों वाला एक बड़ा शहर था। नदी अब भी वहाँ थी, लेकिन उसके दोनों तरफ घनी बस्तियों की जगह हरी-भरी खेतियाँ थीं। बहुमंजिली इमारतों की जगह इकमंजिले मकान थे। दिन में धूप और रात में चाँदनी के लिए खुले-खुले मकान। बड़ी-बड़ी मशीनों वाले बड़े कारखानों की जगह छोटे-छोटे कारखाने थे, जिनमें हाथ से या छोटी मशीनों से रोजमर्रा के काम की चीजें बनायी जा रही थीं। जहाँ फौजी छावनी हुआ करती थी, वहाँ स्कूल, काॅलेज और अस्पताल बन गये थे। परेड मैदानों को खेल के मैदानों में बदल दिया गया था। हथियार बनाने का कारखाना दवाइयाँ बनाने का कारखाना बन गया था। आयुध-भंडार खाद्य सुरक्षा के लिए बनाया गया अन्न भंडार बन गया था। रेलवे स्टेशन था, लेकिन पहले जितना बड़ा, बंद और भीड़भाड़ वाला नहीं, बल्कि छोटा-सा खुला हुआ और शांत। पेट्रोल और डीजल से चलने वाले वाहन जब सारी दुनिया में ही चलने बंद हो गये थे, तो पहले की तरह उनसे घिरी सड़कें अब मुझे वहाँ कहाँ दिखतीं? उनकी जगह मुझे वे वाहन दिखे, जो मैंने बचपन में शहरों से दूर गाँव-देहात में चलते देखे थे–बैलगाड़ी, भैंसागाड़ी, घोड़ागाड़ी, ऊँटगाड़ी। लोग ज्यादातर पैदल चल रहे थे या साइकिलों पर।
मैं संवाददाता वाली जिज्ञासा के साथ लोगों से पूछताछ करती, अपने बदले हुए शहर के बारे में नयी जानकारियाँ जुटाती घूम रही थी और साथ-साथ उस जगह का पता भी लगा रही थी, जहाँ कभी मेरा घर था। बड़ी देर बाद मुझे एक बूढ़ा आदमी मिला, जिसे मैं पहचान गयी। उसने भी मेरे माता-पिता के नाम से मुझे पहचान लिया। मैंने उससे अपने घर के बारे में पूछा, तो वह मुझे एक टीले पर ले गया और वहाँ से नदी किनारे के हरे-भरे खेतों के बीच बने खूबसूरत मकानों वाली छोटी-सी बस्ती की तरफ इशारा करते हुए बोला, ‘‘वहाँ है तुम्हारा घर।’’
मेरे पूछने पर उसने बताया कि युद्ध के दिनों में जब शहर पर भारी बम बरसाये जा रहे थे, दूसरे लोगों की तरह मेरे परिवार के लोग भी जान बचाने के लिए भागे थे। वे कहाँ-कहाँ गये, कहाँ-कहाँ रहे, उसे मालूम नहीं था। कब और कैसे लौटे, यह भी वह नहीं बता सका। मगर उससे मुझे यह मालूम हो गया कि लौटने वालों में मेरी माँ थीं, मेरे पिता नहीं थे। मेरी छोटी बहन नहीं थी, पर मेरे बड़े भाई थे। माँ और बड़े भाई ने दूसरे लोगों के साथ मिलकर नदी के किनारे खाली पड़ी जमीन को सामुदायिक खेती के लायक बनाया, खेतों के बीच सामूहिक श्रम से मकान बनाये, जो सुंदर थे और एक जैसे नहीं थे।   उनमें से ही एक मकान में मेरी माँ मेरे भाई, मेरी भाभी और मेरी एक भतीजी के साथ सुख से रहती हैं।
विदा लेते समय मैंने शुक्रिया कहा, तो उस भले बूढ़े ने मेरा सिर थपथपाकर आशीर्वाद दिया, ‘‘खुश रहो। जाओ, मिलो अपने लोगों से।’’
मुद्दतों बाद मुझसे मिलकर माँ और भाई तो खुश हुए ही, पहली बार मिली भाभी और भतीजी भी बहुत खुश हुईं। भतीजी को देखकर मुझे लगा कि जैसे मैं उसमें अपनी किशोरावस्था देख रही हूँ।
मैं शाम को घर पहुँची थी। शाम से देर रात तक खाना-पीना चलता रहा और दुनिया भर की बातें होती रहीं। बातों ही बातों में मुझे पता चला कि माँ, भाई और भाभी तीनों मिलकर सामुदायिक खेती और बागवानी करते हैं और मेरी भतीजी स्कूल में पढ़ती है। मगर इसके अलावा चारों सार्वजनिक जीवन में भी खूब सक्रिय रहते हैं। माँ की रुचि शुरू से ही संगीत में थी, सो वे एक संगीतशाला में बच्चों को संगीत सिखाती हैं। भाई को बचपन से ही चित्रकला में रुचि थी और अब वे एक अच्छे चित्रकार बन गये हैं। भाभी की रुचि इतिहास लेखन में है और वे एक पुस्तक लिख रही हैं–‘पागलों ने दुनिया बदल दी’। भतीजी की रुचि तैराकी में है और उसने तैराकी की कई प्रतियोगिताओं में पदक प्राप्त किये हैं।
अगले दिन सुबह सबने मुझे पूरा घर दिखाया, अपने पड़ोसियों से मिलवाया और अपने सामुदायिक खेतों और बागों में घुमाया। वहाँ से नदी पास ही थी। भाई ने मुझसे कहा, ‘‘आओ, नदी पर चलते हैं।’’
‘‘नहीं, नदी पर नहीं।’’ सहसा मेरे मुँह से निकल गया।
‘‘क्यों? नदी पर क्यों नहीं?’’ भाई को आश्चर्य हुआ, लेकिन अगले ही क्षण उन्होंने मेरी तरफ देखा और हँस पड़े, ‘‘डरती हो कि फिसलकर उसमें गिर न पड़ो?’’
मैं शरमा गयी। मुझे बचपन की वह घटना याद थी, जब मैं माता-पिता और भाई-बहन के साथ एक बार नदी पर घूमने आयी थी और किनारे पर से फिसलकर नदी में गिर गयी थी। नदी शहर की गंदगी और कारखानों से निकलने वाले काले गंधाते पानी के मिलने से बदबूदार गंदे नाले जैसी हो गयी थी और गहरी होने के बावजूद बड़ी मंथर गति से बहती थी। मैं उसमें गिरकर डूबने लगी, तो पिता उसमें कूद पड़े और उन्होंने मेरे बाल पकड़कर मुझे पानी में से निकाला। पिता और मैं नदी में से निकलकर आये, तो काले बदबूदार पानी में भीगे हुए थे और उसमें बहते सड़े-गले खर-पतवार के तिनके हमारे बालों में, मुँह और हाथ-पैरों पर चिपके हुए थे। हमें इस हालत में देखकर मेरे भाई-बहन ही नहीं, माँ भी खूब हँसी थीं।
मुझे शरमाते देख भाई ने कहा, ‘‘डरो नहीं, दूसरी तमाम चीजों की तरह हमारी नदी भी बहुत बदल गयी है।’’
और मैंने पास जाकर नदी को देखा, तो देखती ही रह गयी। काले बदबूदार पानी वाली और मंथर गति से बहने वाले गंदे नाले-सी नदी अब एकदम स्वच्छ जल और तेज बहाव वाली सुंदर नदी बन गयी थी।
उसमें कुछ ऐसा आकर्षण और आमंत्रण था कि मैंने कहा, ‘‘मैं नहाऊँगी।’’ और जो कपड़े मैं पहने हुए थी, उन्हीं को पहने-पहने मैंने छलाँग लगा दी। मुझे मालूम नहीं था कि पानी का बहाव इतना तेज होगा। तैरना जानते हुए भी मैं नदी की तेज धार में बह चली और डूबने लगी। यह देखकर मेरी भतीजी नदी में कूदी, तेजी से तैरती हुई मेरे पास आयी और मुझे बाहर निकाल लायी।
‘‘याद है, माँ, जब यह बचपन में फिसलकर नदी में गिर गयी थी और पिता इसे निकालकर लाये थे?’’ भाई ने मुस्कराते हुए कहा।
‘‘हाँ, याद है। तब यह कैसी भूतनी बनकर निकली थी!’’ माँ हँस पड़ीं।
उनको हँसते देख मेरी भी हँसी छूट गयी और मैं खूब हँसी। बहुत दिनों बाद इतना हँसी।
हँसते-हँसते मैंने नदी की ओर देखा। स्वच्छ जल की वेगवती धारा के उस पार खड़े घने दरख्तों के ऊपर उठते सुबह के सूरज को देखा। पीछे मुड़कर हरे-भरे खेतों के एक तरफ फलदार पेड़ों के बागों को और दूसरी तरफ बने सुंदर इकमंजिले मकानों को देखा। फिर मैंने अपने परिवार को देखा और सभी कुछ मुझे इतना सुंदर लगा, इतना सुंदर लगा कि बता नहीं सकती!

ना मोदी राहुल के विकल्प है ना राहुल मोदी के...दोनों को लड़ना खुद से है

दो चेहरे। एक नरेन्द्र मोदी तो दूसरे राहुल गांधी। एक का कद बीजेपी से बड़ा। तो दूसरे का मतलब ही कांग्रेस। एक को अपनी छवि को तोड़ना है। तो दूसरे को अपनी बनती हुई छवि को बदलना है। 2019 के आम चुनाव से पहले गुजरात से लेकर हिमाचल। और कर्नाटक से लेकर राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ तक के चुनावी रास्ते में टकरायेंगे मोदी और राहुल ही। पर दोनों के संकट अपने अपने दायरे में अलग अलग होते हुये भी एक सरीखे हैं। और 2019 से पहले नई छवि दोनों को गढ़नी है। क्योंकि मोदी के सामने अब मनमोहन सरकार  नहीं अपने किये वादों की चुनौती है। जिसे उन्होंने 2014 मे गढ़ा। मोदी को हिन्दुत्व का चोगा पहनकर विकास का मंत्र फूंकते हुये संघ से लेकर वोट बैंक तक के लिए उम्मीद को बरकरार रखना है। मोदी को गरीबों की आस को भी बरकरार रखना है और युवा भारते के सपनो को भी जगाये रखना है। यानी जिस  उल्लास-उत्साह के साथ 2014 में कांग्रेस को निशाने पर लेकर मोदी मनमोहन सरकार या गांधी परिवार की हवा निकाल रहे थे, उसने मोदी की छवि को ही इतना फूला दिया कि 2019 में खुद को कैसे मोदी पेश करेंगे ये चुनौती मोदी के सामने है। और गुजरात में इस चुनौती के सामने घुटने टेकते मोदी जीएसटी को लेकर नजर आये। जब वह ये कहने से नहीं चूके कि जीएसटी सिर्फ उनका  किया-धरा नहीं है। इसमें पंजाब-कर्नाटक की कांग्रेस सरकार का भी योगदान है। तो एक देश एक कानून की हवा क्या जीएसटी के साथ वैट व दूसरे टैक्स के लिये जाने की वजह से निकल रही है। हो जो भी मोदी को खुद से ही इसलिये  टकराना है क्योंकि सामने कोई ऐसा नेता नहीं जो मोदी का विकल्प हो। सामने राहुल गांधी हैं, जिन्हें खुद अपनी छवि गढ़नी है। राहुल कांग्रेस के अध्यक्ष बन सकते है पर पार्टी कैसे बदलेंगे। राहुल की सामूहिकता का बोध मुस्लिम-दलित-आदिवासी के बिखरे वोट को कैसे एकजुट करेंगे। राहुल की  राजनीतिक समझ क्या बार बार विरासत से नहीं टकरायेगी।

क्योंकि चाहे अनचाहे नेहरु-गांधी परिवार की राजनीतिक समझ के दायरे में राहुल गांधी की आधुनिक कांग्रेस टकरायेगी ही। यानी राहुल की चुनौती मोदी से टकराने की नहीं बल्कि खुद की छवि गढने की है। यानी मोदी और राहुल चाहकर भी ना तो  एक दूसरे का विकल्प हो सकते हैं और ना ही खुद को एक दूसरे के खिलाफ खड़ा कर चुनाव जीत सकते है। दोनों को ही खुद को गढना है। क्योंकि पहली बार जनता 2014 में पार्टी से बडे मोदी के कद को देखने की आदी हो चली है तो वह  जीतायेगी भी किसी चेहरे को और हरायेगी भी किसी चेहरे को ही। चाहे वह चेहरा मोदी हो या राहुल गांधी। राहुल गांधी पहली बार कांग्रेस को लेकर तब  मथ रहे है जब वह अपने इतिहास में सबसे कमजोर है। और मोदी ऐसे वक्त जीत के घोड़े पर सवार हैं, जब आरएसएस भी अपने विस्तार को मोदी की सत्ता तले देख  रही है। दोनों ही हालात जन-मन को भी कैसे प्रभावित कर रहे होंगे ये इससे
भी समझा जा सकता है कि 1991 के आर्थिक सुधार के घोडे पर सवार भारत 2017 में आते आते उन सवालों से जूझने लगा है, जो सवाल इससे पहले या तो इक्नामी के दायरे में आते रहे या फिर करप्शन या वोट बैंक को प्रबावित करते रहे। यानी नेता कौन होगा और भारत का अक्स कैसे शून्यता तले दुनिया के मानचित्र  पर उभर रहा है इस सवाल से हर भारतीय चाहे अनचाहे जूझने लगा है। यानी तकनीकी विस्तार ने सत्ता को हर नागरिक तक पहुंचा भी दिया और हर नागरिक सीधे सत्ता पर टिका टिप्पणी करने से चूक भी नहीं रहा है। तो हिन्दुस्तान  का सच अब छुपता भी नहीं। हालात सार्वजनिक होने लगे हैं कि एक तरफ देश में 36 करोड] लोग गरीबी की रेखा से नीचे है। तो दूसरी तरफ देश के 12 करोड़ कंज्यूमर हैं, जिन पर बाजार की रौनक टिकी है। लेकिन भारत का सच इसी पर टिक जाये तो भी ठिक सच तो ये है कि एक तरफ संयुक्त राष्ट्र के खाद्य व कृर्षि
संगठन की 2015 की रिपोर्ट कहती है कि भारत में 19 करोड से ज्यादा लोग भूखे सोते हैं। तो 2017 की विश्व भुखमरी सूचकांक में भारत सौवे नंबर पर नजर आता है। यानी मोदी या राहुल खुद को मथे कैसे। कैसे वह सरोकार की राजनीति करते हुये नजर आये । ये चुनौती भी दोनो के सामने है क्योंकि सत्ता  की निगाहबानी में दूसरी तरफ एक ऐसा भारत है जो हर तकलीफ से इतना दूर है कि हर दिन साढे सोलह टन अनाज बर्बाद कर दिया जाता है। 2015 से 2017 के  दौर में 11,889 टन अनाज बर्बाद हो गया।

इन हालातों के बीच झारखंड के सिमडेगा से जब ये खबर आती है कि एक बच्ची की मौत इसलिये हो गई क्योंकि राशन दुकान से अनाज नहीं मिला। अनाज इसलिये नहीं मिला क्योकि आधार कार्ड नहीं था तो राशन कार्ड भी नहीं था। तो क्या मौत दो जून की रोटी की तडप  तले जा छुपी है। और अगर भूख से हुई मौत को छुपाने में सियासत लग रही है,देश के इस सच को भी समझना जरुरी है कि एक तरफ भूख खत्म करने के लिये। गरीबी हटाओ के नारे तले. इंदिरा गांधी से लेकर मौजूदा मोदी सरकार भी गरीबो की मसीहा अलग अलग योजनाओ तले खुद को मान रही है। यानी राहुल सिर्फ मोदी पर चोट कर बच नहीं सकते और मोदी 70 बरस के गड्डो का जिक्र कर पीएम  बने भी नहीं रह सकते है । और यही से स्टेटसमैन की खोज भी शुरु होती है और सर्वसम्मति वाले नेता की चाहत भी लोगो में बढती है । क्योकि मोदी हो या राहुल दोनो ही इस सच को जानते समझते है कि गरीब सबसे बडा वोट बैक भी है  और गरीबी सबसे बडी त्रासदी भी । पर सरकारो की नीतियो ने कैसे देश को खोखला किया इससे दोनो ही क्या ज्यादा दिनो तक आंखे मूंद सकते है । क्योकि कहे कोई कुछ भी सच तो यही है कि 254 करोड रुपये का अनाज हर दिन बर्बाद हो  जाता है । 58 हजार करोड का बना हुआ भोजन हर बरस बर्बाद हो जाता है । और इस अंधेरे से दूर दिल्ली के रायसीमा हिल्स पर मौजूद साउथ-नार्थ ब्लाक की  इस जगमगाहट को देखकर कौन कह सकता है कि गरीबो के लिये यहा वाकई कोई नीतियां बनती होगी । क्योकि इनइमारतो से तो सबसे करीब संसद भवन ही है । जहा का सच ये है कि -बीते 10 बरस में 7 राष्ट्रीय दलों की कुल संपत्ति 431 करोड़ रुपए से बढकर 2719 करोड़ रुपए हो गई । जिसमें बीजेपी की संपत्ति 122 करोड़ रुपए से बढ़कर 893 करोड़ तो कांग्रेस की संपत्ति 167 करोड़ से 758 करोड़ पार कर गई । तो सत्ता की दिवाली तो हर दिन मनती ही होगी । पर नीतिया हर दौर में ऐसी रही है कि बीते 10 बरस में 2,06,390  मीट्रिक टन अनाज गोदामों में रखे रखे सड़ गया। इन्हीं10 बरस में 6400 लाख टन खाना बर्बाद हो गया लेकिन भूख से तरसते लोगों तक नहीं पहुंच सका । और इन्ही दस बरसो में जनता के नुमाइन्दो की संपत्ति सबसे तेजी से सबसे  ज्यादा बढी । तो मोदी हो या राहुल । मथना खुद को दोनों को ही है। क्योंकि दिल्ली की चकाचौंध देश का सच है नहीं और देश का सच दिल्ली से दूर होता चला जा रहा है।

किसान को बेचारा मानकर शासक वर्ग विकास में बाधा डालते हैं .

जंतर-मंतर - Mon, 16/10/2017 - 05:58


शेष नारायण सिंह
करीब चालीस साल बाद कुवार के महीने में  गाँव गया. मेरे गाँव में पांडे बाबा वाला महीना बहुत ही खूबसूरत होता है. न गर्मी न ठंडी,   तरह तरह की फसलों की खुशबू हवा में तैरती रहती है. अन्य इलाकों  में जिस त्यौहार को  विजयादशमी या दशहरा कहा जाता है उसको मेरे क्षेत्र में पांडे बाबा ही कहा जाता था. पांडे बाबा हमारे यहाँ के लोकदेवता हैं . उनको धान चढ़ाया जाता था. उनका  इतिहास  मुझे नहीं पता है लेकिन माना जाता था कि पांडे बाबा की पूजा करने से बैलों का स्वास्थ्य बिलकुल सही रहता है . गोमती नदी के किनारे दक्षिण में धोपाप है और  नदी के उस पार पांडे बाबा का स्थान है . जहां उनका ठिकाना है उस गाँव का नाम बढ़ौना डीह है लेकिन अब उसको  पांडे बाबा के नाम से ही जाना जाता है . आज के चालीस साल पहले हर  घर से कोई पुरुष सदस्य पांडे बाबा के मेले में दशमी के दिन ज़रूर जाता था.. हर गाँव से हर घर से लोग जाते थे. बैलों की खैरियत तो सबको चाहिए होती थी. मैं पहली बार आज से पचास साल पहले आपने गाँव के कुछ वरिष्ठ लोगों के  साथ गया था,मेरे बाबू नहीं जा सके थे . उन  दिनों दशमी तक धान की फसल तैयार  हो चुकी होती थी ,अब नहीं होती . इस बार मैंने देखा कि धान के पौधों में अभी फूल ही लग रहे थे ,यानी अभी महीने भर की कसर है.अब कोई पांडे बाबा नहीं जाता. क्योंकि अब किसी को बैलों के अच्छे स्वास्थ्य की ज़रूरत ही नहीं है. अब खेती में बैलों की कोई भूमिका नहीं है . पहले बैलों से हल चलते थे , सिंचाई के लिए भी कुएं से पानी निकालने में बैलों की अहम भूमिका होती थी, बैलगाड़ी या लढा से सामान  ढोया जाता था.  यानी ग्रामीण अर्थव्यवस्था में बैलों की बहुत बड़ी भूमिका होती थी. अब नहीं होती. अब ट्रैक्टर से खेत जोते जाते हैं , ट्यूबवेल से सिंचाई होती है , ट्राली से माल ढोया जाता है .अब ग्रामीण  व्यवस्था में बैलों की कोई भूमिका नहीं होती. इसलिए अगर घर में पल रही गाय बछड़े को जन्म दे देती है तो लोग दुखी हो जाते हैं . अभी तक तो बछड़े को औने पौने दाम पर बेच दिया जाता था लेकिन अब ऐसा नहीं होता. गाय या बछड़े को एक जगह से दूसरी जगह ले जाना अब असंभव है. स्वयम्भू गौरक्षक ऐसा होने नहीं देते . नतीजा यह हो रहा है कि एक ऐसे जानवर को बाँध कर खिलाना पड़ रहा है  जो गाय और भैंस का चारा खाता है और किसान की आर्थिक स्थिति को कमज़ोर करता  है. पिछले करीब चार  महीने से एक नयी परम्परा शुरू हो गयी है . अब लोग  अपने गाँव से थोड़ी दूर ले जाकर बछड़ों को रात बिरात छोड़ आते हैं. वे खुले घूमते हैं और जहां भी हरी फसल दिखती हसी,चरते खाते हैं .  कुछ साल पहले हमारे गाँवों में पता नहीं कहाँ से नील गाय बहुत बड़ी संख्या में आ गए थे. अब संकट का रूप धारण कर चुके हैं . बताते हैं कि नील गायों को डराने के  लिए १०-१५ साल पहले सरकारी तौर पर जंगली सूअर छोड़ दिए गए थे . सूअरों ने नील गाय को तो भगाया नहीं ,खुद  ही जम  गए . अब तक हरियाली वाली फसलें नील गाय खाते थे . आलू, शकरकंद , प्याज ,लहसुन, गाजर ,मूली, आदि ज़मीन के नीचे होने वाली फसलों को सुअर नुक्सान पंहुचा रहे थे और अब इसी जमात में वे बछड़े भी शामिल हो गए हैं.जिनको किसानों ने ही  छुट्टा छोड़  दिया है . खेती की हालत बहुत ही ख़राब है .कई लोगों को प्रधानमंत्री पद के दावेदार नरेंद्र मोदी का वह भाषण बहुत अच्छी तरह से याद है जिसमें उन्होंने २०१४ के लोकसभा चुनाव के पहले कहा था कि किसान की आमदनी दुगुनी कर दी जायेगी . नीतियाँ ऐसी बनाई जायेंगी जिस से किसान को सम्पन्नता की राह पर डाल दिया जाएगा . उनकी बातों पर भरोसा करके किसानों ने उनको वोट दिया ,लोकसभा में तो जिताया ही,  विधान सभा में भी उनकी पार्टी को  वोट दिया और सरकार बनवा दी . लेकिन उत्तर प्रदेश में  उनकी सरकार बनते ही पशुओं की बिक्री एकदम बंद हो गयी . हर गाँव  में दो चार ऐसे नौजवान प्रकट हो गए , जिनके जीवन का उद्देश्य ही गौवंश की रक्षा है. लोग परेशान हैं कि जाएँ तो जाएँ कहाँ .जानवरों को बेचकर किसान को अतिरिक्त आमदनी हो जाती थी. आमदनी दुगुना करने के वायदे वाली सरकार के संरक्षण में काम कर रहे गौरक्षकों ने आमदनी का एक जरिया भी खत्म कर दिया और सरकार कोई भी कार्रवाई नहीं कर रही है .
आज ग्रामीण इलाकों में  जो लोग परिवार के मुखिया  हैं , उनकी उम्र साठ साल के पार है. उन लोगों ने अपने बचपन में १९६४ की वह  भुखमरी भी देखी है जो लगातार सूखे की  वजह से आई थी. किसान लगभग पूरी तरह से बरसात के पानी पर ही निर्भर था.  उन यादों से भी लोग कांप जाते हैं . नरेंद्र मोदी के वायदों के बाद लोगों को उम्मीद थी कि गरीब का बेटा जब प्रधानमंत्री बनेगा तो शायद कुछ ऐसा कर दे जो तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने कियाथा. हरित क्रान्ति की शुरुआत कर दी थी. हालांकि उसका श्रेय इंदिरा गांधी ने बटोरा.दिल्ली आकर जब खेती किसानी के इंचार्ज कुछ महाप्रभुओं से बात की तो उन्होंने लाखों करोड़ों मीट्रिक टन और लाखों हेक्टेयर में  अच्छी फसलों के आंकड़े देकर मुझे संतुष्ट करने की कोशिश की . इन आंकड़ाबाज अफसरों नेताओं को यह बताने की जरूरत है कि आम आदमी की मुसीबतों को आंकड़ों में घेर कर उनके जले पर नमक छिड़कने की संस्कृति से बाज आएं। अकाल या सूखे की हालत में ही खेती का ख्याल न करें, इसे एक सतत प्रक्रिया के रूप में अपनाएं। इस देश का दुर्भाग्य है कि जब फसल खराब होने की वजह से शहरी मध्यवर्ग प्रभावित होने लगता है, तभी इस देश का नेता और पत्रकार जगता है। गांव का किसान, जिसकी हर जरूरत खेती से पूरी होती है, वह इन लोगों की प्राथमिकता की सूची में कहीं नहीं आता।
कोई इनसे पूछे कि फसल चौपट हो जाने की वजह से उस गरीब किसान का क्या होगा जिसका सब कुछ तबाह हो चुका है। वह सरकारी मदद भी लेने में संकोच करेगा क्योंकि गांव का गरीब और किसान मांग कर नहीं खाता। यह कहने में कोई संकोच नहीं कि गांव का गरीब, सरकारी लापरवाही के चलते मानसून खराब होने पर भूखों मरता है। आजादी के बाद जो जर्जर कृषिव्यवस्था नए शासकों को मिली थी, वह लगभग आदिम काल की थी। 
जवाहरलाल नेहरू ने कृषि को प्राथमिकता नहीं दी . उनको उम्मीद थी कि औद्योगिक विकास के साथ-साथ खेती का विकास भी चलता रहेगा। लेकिन 1962 में जब चीन का हमला हुआ तो उनको एक जबरदस्त झटका लगा। उस साल उत्तर भारत में मौसम अजीब हो गया था। रबी और खरीफ दोनों ही फसलें तबाह हो गईं थी। जवाहर लाल नेहरू को एहसास हो गया था कि कहीं बड़ी गलती हुई है। ताबड़तोड़ मुसीबतों से घिरे मुल्क पर 1965 में पाकिस्तानी जनरल, अयूब ने भी हमला कर दिया। युद्ध का समय और खाने की कमी। बहरहाल प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने जय जवान, जय किसान का नारा दिया और अनाज की बचत के लिए देश की जनता से आवाहन किया कि सभी लोग एक दिन का उपवास रखें। यानी मुसीबत से लडऩे के लिए हौसलों की ज़रूरत पर बल दिया। लेकिन भूख की लड़ाई हौसलों से नहीं लड़ी जाती। जो लोग 60 के दशक में समझने लायक थे उनसे कोई भी बता सकता है कि विदेशों से सहायता में मिले बादामी रंग के बाजरे को निगल पाना कितना मुश्किल होता है। लेकिन भूख सब कुछ करवाती है। अमरीका से पी एल 480 योजना के तहत मंगाये गए गेहूं की रोटियां किस रबड़ की तरह होती थीं .
केंद्र सरकार में ऊंचे पदों पर बैठे लोगों को क्या मालूम है कि गांव का गरीब किसान जब अपनी बुनियादी ज़रूरतों के लिए क़र्ज़ लेता है  तो कितनी बार मरता है, अपमान के कितने कड़वे घूंट पीता है। इन्हें कुछ नहीं मालूम और न ही आज के तोता रटंत पत्रकारों को जरूरी लगता है कि गांव के किसानों की इस सच्चाई का आईना इन कोल्हू के बैल नेताओं और नौकरशाहों को दिखाएं। गांव के गरीब की इस निराशा और हताशा का ही जवाब था १९६६ में शुरू हुआ खेती को  आधुनिक बनाने का वह ऐतिहासिक कार्य. २०१४ के चुनाव के पहले जब नरेंद्र मोदी ने किसान की आमदनी डबल करने की बात की तो लोगों को लगा कि शायद वैसा ही कुछ हो जाए . लेकिन आज की ज़मीनी सच्चाई यह है कि किसान के लिए सरकारी नीतियों में ऐसा कुछ नज़र नहीं आ रहा है.
किसानों की समस्या को समझने वालों ने इस देश में कभी भी सत्ता नहीं संभाली . जब से ईस्ट इण्डिया कंपनी ने भारत पर क़ब्ज़ा किया तब से ही खेती की अनदेखी होती रही है . सत्ताधीशों की सुविधा के अनुसार खेती करने के अवसर हमेशा से ही उपलब्ध कराये जाते रहे हैं . ऐसा नहीं है कि अपने देश में अधिक नक़दी देने वाली फसलों की कमी रही हो. लेकिन उनको भी शासक अपने हित साधन के लिए इस्तेमाल करते रहे हैं नील, अफीम,रबड़,चाय,पिपरमिंट,गन्ना ,काफी, मसाले आदि ऐसी फसलें हैं जो किसान को सम्पन्न बना सकती थीं लेकिन सरकारों ने ऐसा होने नहीं दिया . नील और अफीम को तो शुद्ध रूप से सरकारी नियंत्रण में ही रखा गया और वहां जमकर शोषण हुआ.महात्मा गांधी का चंपारण आन्दोलन ही नील के किसानों की समस्याओं को दृष्टि में रखकर किया गया . इस तरह के बहुत सारे उदहारण देश भर में हुए हैं जहाँ किसानों की समस्याओं की बुनियाद पर आन्दोलन शुरू हुए लेकिन अंत उनका भी सत्ताधीशों की शक्ति को पुख्ता करने में ही हुआ .आधुनिक युग में भी भारतीय किसान को अन्नदाता ही माना जा रहा है .किसी भी नेता का भाषण सुन लीजिये उसमें किसान को भगवान् बताने की कोशिश की जायेगी . लेकिन उसकी सम्पन्नता के बारे में कोई भी योजना कहीं नहीं नज़र आयेगी. किसान की दुर्दशा का बुनियादी कारण इसी सोच में है. उसकी पैदावार की कीमत सरकार तय करती है . और जब सरकार की तरफ से  न्यूनतम खरीद मूल्य तय करने की घोषणा की जाती है तो लगता है कि मंत्री जी बहुत बड़ी कृपा कर रहे हैं और किसान को कुछ खैरात में दे रहे हैं . इसके अलावा भी सरकारी नीतियों में भारी कमियाँ हैं . खाद के नाम पर  जो सब्सिडी आती थी वह  सीधे खाद का उत्पादन करने वाली कंपनी के खाते  में जमा हो जाता था और उस से उम्मीद की  जाती थी कि वह किसान को उसका लाभ देगा .लेकिन ऐसा होता नहीं था. वर्तमान सरकार में एक मंत्री जी हैं जो कभी  रासायनिक खाद विभाग के  मंत्री हुआ करते थे . उनके ऊपर आरोप लगा था कि  रासायनिक खाद पर सरकार ने जो भी सब्सिडी बढ़ाई थी उसका पचास प्रतिशत मंत्री ने  नक़द वापस ले  लिया था. जांच की मांग भी हुयी लेकिन मामला रफा दफा हो गया . ऐसे  बहुत सारे मामले हैं जहां सत्ताधीशों ने किसान के नाम पर हेराफेरी की है और किसान को घडियाली आंसू की बोतलें भेजते रहे हैं .समस्या का हल किसान को अन्नदाता और देश की खाद्य आवश्यकताओं के पूर्तिकर्ता के खांचे से बाहर निकालकर नीतियाँ बनाने की सोच में है .उस पर दया करने की कोई ज़रूरत नहीं है . दुनिया के कई देशों में अन्न की कमी है . वहां विश्व खाद्य संगठन आदि की मदद से अन्न भेजा जाता है. इस काम में अमरीका और  विकसित देशों का पूरी तरह  से कब्ज़ा है . हमें मालूम  है कि दुनिया की सबसे बड़ी खाद्य कंपनी कारगिल भारत में दूर दराज़ के गावों में जाकर सस्ते दाम पर गेहूं आदि खरीद रही है उस गेहूं को वह उन देशों में भेजती है जहाँ खाने की कमी होती है . कारगिल अमरीकी कंपनी है. सरकार को चाहिए कि किसानों की पैदावार को सीधे विश्व  भर में फैले उपभोक्ता तक पंहुचाने का उपाय करे. ऐसी नीतियाँ बनाई जाएँ जिससे किसान को बेचारा माने जाने वालों को समझ में आये कि किसान बेचारा नहीं होता, अगर जागरूकता हो तो वह अमरीकी किसानों की तरह बहुत सम्पन्नता का जीवन बिता सकता है लेकिन उसके लिए उसकी आत्मसम्मान की भावना को  सही मुकाम पर पंहुचाना होगा, उसको केवल मतदाता ही नहीं देश के विकास का हरावल दस्ता मानना होगा . 

संजीव ठाकुर की कवि‍ताएं        

लेखक मंच - Sun, 15/10/2017 - 14:01

संजीव ठाकुर

पीढ़ियाँ

हम पीते थे चाय एक साथ
फुटपाथ पर बैठते थे
अपने गम बिछाकर
बतियाते थे दुनिया की, जहान की
गलियाते थे
साहित्यिक चूतियापे को
मठों को, मठाधीशों को
पत्रिकाओं के संपादकों को
प्रकाशकों के कारनामों को
आलोचकों की क्षुद्रताओं को
पिछले दरवाजे से पुरस्कार झटकता कोई शख़्स
हमें नागवार गुजरता था
पुस्तक विमोचन समारोहों को हम
कहा करते थे
भांड -मिरसियों का काम !

समय बदलता गया धीरे–धीरे
हममें से कुछ लोग
आलोचक बन गए
झटक लिया किसी ने कोई पुरस्कार
सुशोभित कर रहा कोई
किसी पत्रिका के संपादक का पद
अकादमी की गतिविधियाँ
किसी की जेब में हैं !
डोलते हैं दस–बीस प्रकाशक
कंधे पर रखे झोले की तरह
विमोचन समारोहों में
झलक जाता है
किसी का विहंसता चेहरा ।

गलिया रहे हैं चार लोग
सफदर हाशमी मार्ग के फुटपाथ पर
चाय पीते हुए–
संपादकों को,
प्रकाशकों को,
आलोचकों को,
मठाधीशों को…!

लगाम दो

अब भी लगाम दो
चाह को
इतना भी चाहता है कोई
मृग मारीचिका को ?

हल

हल हो सकता है सवाल
सुख के एक टुकड़े का
तुम
मेरे बारे में सोचना
शुरू तो करो !

वस्तुस्थिति

कुछ भी तो नहीं है
अपने लिए
आँसू के सिवा

किसे बताऊँ ? किसे बताऊँ
उसने
मेरे हृदय पर मूत दिया है ?
कचरे की टोकरी
रख दी है
नाक पर !मेरी कमजोरी तुम जानते हो
कृपा कर किसी को नहीं बताना –
मैं अव्वल दर्जे का पाजी हूँ
मेरे पास वह सब नहीं
जो जरूरी है जीने के लिए
आज की परिभाषा में !

सोमरस क्‍या है ?

कारवाँ - Fri, 13/10/2017 - 16:33
ऋग्‍वेद के अनुसार - मन्‍द्रस्‍यरूपंविविदुर्मनीषिण: - विद्वान लोग मदकर सोमरस का स्‍वरूप जानते हैं। स: पवस्‍वमदिन्‍तम। सोम को अत्‍यंत प्रमत्‍त करने वाला बताया गया है। सोम को स्‍वर्ग से बाज ले आया था। एक जगह इसके पृथ्‍वी से पैदा होने का भी जिक्र है। सोम धुनष से छूटे बाण की तरह और अश्‍व की तरह और बाज पक्षी की तरह स्‍वर करता है। सेाम को अधिकतर हरित रंग का बताया गया है ओर पत्‍थरों से कुचलकर इसका रस निकलता है। सोम को कवि, क्रान्‍तकर्मा कहा गया है। सोम गोचर्म के उपर पत्‍थरों के साथ क्रीड़ा करते हैं। उनसे धन-धान्‍य, संतति और शुत्रु के विनाश की कामना की जाती है। सोम के शोधक गोचर्म और मेषचर्म हैं। सोम बाहुओं द्वारा सांशोधित, वसतीवरी-जल से  सिंचित काष्‍ठपात्र में निहित अपने स्‍थान को गमन करते हैं। स:पवश्‍च मदाय कंनृचक्षा:देववीतये। इन्‍द्रो इति इन्‍द्राय पीतये।।1।।सोम तुम नेताओं के दर्शक हो। तुम देवों के आगमन या यज्ञ के लिए इन्‍द्र के पान, मद और सुख के लिए क्षरित होओ।उतत्‍वामरूणंवयं गोणिअहमोमदायकम। ।3।।सोम मद के लिए रक्‍त-वर्ण तुम्‍हें हम दुग्‍ध अादि से संस्‍कृत करते हैं। गोणि:श्रीणीतमत्‍सरम।मदकर सोम को दूध आदि से संस्‍कृत करते हैं।परीतो वायवे सुतं गिर: इन्‍द्राय मत्‍सरम। अव्‍योवारेषु सिंचत।।10।।31।। ऋग्‍वेदस्‍तोताओ तुमलोग वायु और इन्‍द्र के लिए अभिषुत और मदकर सोम को अभिषव देश से लेकर सिंचित करो।सोम के लिए मद चुलाने वाले और मदकर का प्रयोग पचासों बार हुआ है। इंद्र के मद के लिए हम सोम को बनाते हैं ऐसा लिखा गया है। सोम के क्षरित होने का जिक्र भी बार बार है। ऋत्विक लोग सोम को मेष के रोएं से यानि उन से छानते हैं। सोम की माताएं नदियां हैं। सोम ने वृत्र का वध करते समय इंद्र की रक्षा की थी।   सोम तुम अतीव मादक हो, चमसों में बैठते हो, तुम बहुसंख्‍यक और शोभन वीर्य धन क्षरित करो। सोम दूध व दधि संस्‍कृत होकर क्षरित होकर दशापवित्र की ओर द्रोण कलश में जाते हैं। रक्‍त-वर्ण, हरितवर्ण, पिंगलवर्ण सोम। काम वर्षक सोम जलधारा से बनाए जाते हैं। सोम राक्षसों को नष्‍ट करते हैं मतलब राक्षस सोमपान नहीं करते थे। सोम उसी तरह तरंग पैदा करते हैं जैसे रथी अश्‍व को चलाता है। शोधित गतिपरायण सोम सरलता से आकाश की ओर जाते हैं, वे जलपात्र की ओर जाते हैं। सोम को मनुष्‍य बनाते हैं और देवता पीते हैं। सोम तुम उस इन्‍द्र के लिए बहो जिसने 99 शत्रु पुरियाें को नष्‍ट किया है। एक जगह लिखा है - कार्यकुशल स्त्रियां सुंदर वीर्यवाले अपने पति सोम के क्षरणशील होने की इच्छा करती हैं। यस्‍य:तेमद्यंरसमतीव्रमदुहन्ति। तुम्‍हारे मदकर और क्षिप्र मददाता रस को हम पत्‍थरों से दुहते हैं। जैसे घोड़े को जल में मार्जित किया जाता है उसी तरह सोम को दूध-दहि आदि से मार्जित किया जाता है। सोम हर तरह के भय को नष्‍ट करते हैं। सोम जौ के सत्‍तू में मिलाया जाता है ऐसा भी जिक्र है। इंद्र के लिए सोम काले चमड़े वाले राक्षसाें को दूर हटाते हैं। सोम शिशु के समान नीचे मुंह करके रोते भी हैं। एक जगह सोम को इंद्र भी कहा गया है। सोमपान कर ही इंद्र युद्ध को जाते हैं। अंतरिक्ष की अप्‍सराएं यज्ञ में बैठकर पात्राों में सोम को क्षरित करती हैं। सोम को पृथवी का पुत्र भी कहा गया है। जैसे स्‍त्री पुरूष को सुख देती है उसी तरह सोम यजमान को सुख देते हैं। जो तुम्‍हारा पान करता है उसके सारे अंगों में प्रभु होकर तुम विस्‍तृत हो जाते हो। परिपक्‍व शरीर वाले ही तुम्‍हें ग्रहण व धारण कर सकते हैं। तुम्‍हारे रस को पीकर पापी लोग प्रमत्‍त वा आनन्दित न हों ऐसी भी प्रार्थना की गयी है। मधुरभाषी वेन लोग यज्ञ में सोमाभिषव करत हैं। सोम युद्ध में जाते हें और महान अन्‍न को जीतते हैं। ---------------------------------------------------------------ऋग्‍वेद संहिता - सायण भाष्‍य संवलित, चौखंबा प्रकाशन - सप्‍तम अष्‍टक - प्रथम अध्‍याय से सोम वर्णन आरंभ होता है। मंडल 9 अध्‍याय 2 सूक्‍त 45 से लेकर अध्‍याय 7 सूक्‍त 113 तक करीब साढे तीन सौ पृष्‍ठों मे लगातार सोम का वर्णन है।

साइि‍कल के पंप से उड़ा राकेट : समीर मिश्रा

लेखक मंच - Fri, 13/10/2017 - 00:55

अगर आप कभी ओडिशा के गंजाम ज़िले से गुजरें तो वहां ग्राम विकास विद्या विहार स्कूल में ज़रूर जाइएगा। पूरबी घाटों के बीच में स्थित इस स्कूल में विज्ञान  सिखाने की अद्भुत तकनीक इस्तेमाल की जाती है।

यहाँ पर सातवीं क्लास के बच्चे अपना खुद का पानी का राकेट बनाते हैं और उसे उड़ाते हैं। एक पुरानी  पानी  की बोतल और साइकिल  के  पंप का इस्तेमाल करके बनाये हुए राकेट को उड़ाते हुए इन बच्चों को देखना एक अलग ही अनुभव था| यहाँ के दो बच्चों ने अपने स्कूल के कंप्यूटर लैब में एक नवोन्मेष प्रयोगशाला नामक केंद्र की स्थापना की है, जहाँ बच्चे रोज़मर्रा की चीज़ों का इस्तेमाल करके विज्ञान के नए-नए मॉडल बनाते हैं। जैसे एक विद्यार्थी ने कॉफ़ी कप, पुराने पेन और जूते के डब्बे का इस्तेमाल करके एक कप एनीमोमीटर बनाया जिससे वायु का वेग नाप सकते हैं। यह सभी प्रारूप इन बच्चों के पाठ्यक्रम का हिस्सा हैं। इसकी शुरुआत करने वाले यहाँ पर काम कर रहे नौजवान समीर कुमार मिश्रा एसबीआई फेलो हैं। वह कहते हैं कि‍ अगर इस तरह की प्रयोगशालाएं हर स्कूल में हों तो वह दिन दूर नहीं, जब आप अखबारों में भारतीय आविष्कारों के बारे में पढ़ेंगे।

समीर ने यहाँ पर एक और प्रयोग किया। उन्होंने यहाँ के स्कूली प्रोजेक्ट वर्क में परिकल्प की नीव रखी। परिकल्प एक नए प्रकार का प्रोजेक्ट करने का तरीका है, जिसके अंदर आप बच्चों से फाइलें न बनवाकर असल ज़िन्दगी की दिक्कतों का समाधान खोजने के लिए प्रेरित करते हैं और उसे प्रोजेक्ट के तौर पर प्रस्तुत करते हैं। उदाहरण के तौर पर बच्चों के कई ग्रुप बनाए जाते हैं। फिर अलग-अलग ग्रुप को वि‍भि‍न्‍न कार्य दिए जातें हैं। एक ग्रुप को स्कूल में होने वाली बीमारियों की लिस्ट बनानी थी और उसका इलाज कैसे होगा, इस पर एक पोस्टर बनाना था। दूसरे ग्रुप को इसी पर काम करते हुए उन दवाओं के लिए एक प्राथमिक उपचार पेटी बनानी थी, जिसमें उन बीमारि‍यों की दवायें रखी जाएंगी। एक ग्रुप को मंगल यान का प्रतिरूप बनाना था। इस तरह बच्चे सीखतें भी हैं और स्कूल का भी स्तर बढ़ता है।

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यह स्कूल ऐसी जगह है जहाँ बिजली और नेटवर्क की काफी दिक्कत है। हमें पता चला कि‍ इसी स्कूल के एक बच्चा है सुभकांत जानी जिसने ने जवाहर नवोदय विद्यालय की परीक्षा उत्तीर्ण की है। गौरतलब है कि‍ उसके गाँव में बिजली है ही नहीं। वहां सूर्यास्त के बाद लालटेन और कैंडल पर ही ज़िन्दगी निर्भर है। अगर ऐसी जगह से एक बच्चा नवोदय जैसा परीक्षा में सफल होने का माद्दा रखता है और दीपक और सीताराम जैसे बच्चे अपने सीमित संसांधनों से कभी न डरते हुए विज्ञान के नए-नए प्रारूप बना सकते हैं तो हम अगर ठान लें तो जल्दी ही भारत को शिक्षा के पायदान में पानी के राकेट की तरह ही सबसे ऊपर ले जा सकते हैं|

वाटर राकेट बनाने  की विधि आवश्यक सामग्री

1: पानी की पुरानी बोतल (1 लीटर )
2: कॉर्क
3: साइकिल पंप
4: फुटबॉल आदि में हवा भरने वाली पिन

विधि

1: पुरानी  बोतल का ढक्कन खोलें और उसमें आधे लीटर से थोड़ा कम पानी भरें |
4: बोतल का मुँह कॉर्क से इस प्रकार बंद करें जिससे बोतल पर दबाव देने पर ही वह निकले।
3: कॉर्क के बाहरी सिरे से हवा वाली पिन इस प्रकार अंदर डालें जिससे वह आधी अंदर और आधी बहार रहे | कोशिश करें कि‍ पिन कॉर्क के मध्य से होती हुई अंदर जाए।
4: बाहर वाले पिन के सिरे से साइकिल पंप की  नली  जोड़ दें।
5: पानी की बोतल को ज़मीन पर उल्टा रख दें जिससे कॉर्क वाला सिरा नीचे रहे। कॉर्क पानी को बाहर निकलने से रोके रखेगा।
6: बोतल को सहारा देने के लिए ईंट का उपयोग करें। ईंटों को बोतल के साइड में लगा दें, लेकि‍न ध्यान रहे वे बोतल को सिर्फ सहारा दें और पकड़े नहीं।
7: साइकिल पंप से बोतल के अंदर हवा पंप करना शुरू करें |
8: कुछ देर पंप करने के बाद आपको आपका हाथों से बना राकेट हवा से बातें करता नज़र आएगा |

 वैज्ञानिक सिद्धांत

यह उड़ान न्यूटन के तीसरे गति नियम पर आधारित है जो कहता है कि‍-
‘प्रत्येक क्रिया की उसके बराबर तथा उसके विरुद्ध दिशा में प्रतिक्रिया होती है।‘जितनी जोर से हम जमीन पर अपना पैर पटकते हैं, उतनी ही अधिक हमें चोट लगती है अर्थात् जितनी जोर से हम जमीन को नीचे की ओर दबाते हैं उतनी ही जोर से पृथ्वी हमें ऊपर की और धकेलती है. जितनी जोर से हम गेंद को पटकते हैं उतना ही ऊपर वह उछलती है।
इसी प्रकार बोतल से हवा के दबाव से बहार आता पानी ज़मीन से टकराता है। प्रतिक्रिया में वह बोतल को ऊपर की और धक्का देता है । इस प्रकार बोतल से जब तक पानी निकलता है बोतल ऊपर की ओर उड़ती चली जाती है।

प्रक्षेपण के दौरान ध्यान रखने लायक बातें-

1: इसे खुली जगह में ही किया जाए।
2: प्रक्षेपण के दौरान उसकी सीध में ना देखें और थोड़ा दूर खड़े रहें।
3: बोतल में आप पानी में रंग भी मिला सकते हैं। इससे नज़ारा बहुत अद्भुत लगेगा।
4:कॉर्क की जगह आप रबर का भी इस्तेमाल कर सकते है।  बैडमिंटन के शटलकाक के पीछे लगे हुए हिस्से का भी उपयोग कर सकते हैं।
5: आप इसे राकेट की तरह रूप देकर सुप्रवाही बना सकते हैं। लेकिन राकेट का वज़न कम रखें
6: 1 लीटर की बोतल से सफल प्रक्षेपण के बाद आप 2 लीटर की बोतल से भी यह प्रयोग कर सकते हैं।

 

प्रो. विवेक कुमार ने सफ़ेद झूठ बोला है, वे संघ के कार्यक्रम में युवाओं में देशप्रेम जगाने गए थे!

दखल की दुनिया - Thu, 12/10/2017 - 23:49
दिलीप ख़ान
पहले एक तस्वीर आई। इसके बाद प्रो. विवेक कुमार ने फेसबुक पर लिखा, “मेरी फोटो शेअर करने वाले ने यह क्यों नही बताया की प्र. विवेक कुमार किस विषय पर भाषण दे रहे थे और इस कार्यक्रम का शीर्षक क्या था. ना ही सामने बैठे श्रोताओं को दिखाया ? ना ही यह बताया इसी संगठन के एक विंग ने ग्वालियर में मेरे उपर हमला करवाया था. केवल फोटो शेयर करके लोगो को गुमराह न करे…आज मुझे अहसास हो रहा है की मै बहुत बड़ी परसोनालिटी बन गया हूँ…क्योंकि बहुत बड़े बड़े लोग इस फोटो को शेयर कर रहे है. मुझे आशा है की मेरा समाज मेरी आंदोलन के प्रति प्रतिबद्धता एवं सत्य-निष्ठा को अवश्य समझेगा..प्रो. विवेक कुमार.”


फिर दूसरी फोटो आई, जिसमें श्रोता दिख रहे थे। फिर तीसरी आई जिसमें विवेक कुमार चंद लोगों के साथ मंच पर बैठे गप लड़ाते दिख रहे हैं।


विवेक कुमार ने पहले पहली तस्वीर को झूठा कहा, फिर सारी तस्वीरों को। इस प्रकरण पर मैंने फ़ेसबुक पर जब लिखा तो कई लोगों ने कहा कि विवेक कुमार फोटो को नकली बता रहे हैं और दावा कर रहे हैं कि वे उस कार्यक्रम में गए ही नहीं। बीते कुछ साल से दक्षिणवर्ती दुनिया द्वारा स्थापित फोटोशॉप के भयंकर दौर में पहली नज़र में मुझे कुछ भी मुमकिन नज़र आता है। मैंने पोस्ट डिलीट कर दी। लेकिन इसी दौर ने हमें यह भी सिखाया है कि हम अपने सीमित ज्ञान के बूते असली फोटो और फोटोशॉप्ड फोटो में अंतर पहचान जाएं! मुझे एक भी तस्वीर फोटोशॉप्ड नहीं लगी। अलबत्ता, विवेक कुमार के दावे को गंभीरता से लेते हुए यह ज़रूर लगा कि प्रामाणिक जानकारी के साथ इस पर लिखा जाना चाहिए क्योंकि जिस व्यक्ति पर सवाल उठाया जा रहा है वह ऐसे किसी कार्यक्रम के होने की दावेदारी को ही नकार रहा था/है।


तस्वीर में मौजूद जिस एक व्यक्ति को मैं निजी-सार्वजनिक तौर पर जानता हूं वह व्यक्ति अगर समूचे कार्यक्रम और वहां अपनी भागीदारी को झुठला रहा हो तो कोई वजह नहीं बनती थी कि विवेक कुमार की बातों को न माना जाए। लेकिन बातों को मानने के दौरान आंखों में पानी का छींटा मारकर थोड़ा चौकन्ना हुआ तो विवेक कुमार की तरफ़ से परस्पर विरोधी दावों का मैंने पता लगाना शुरू किया। शुरुआत में कार्यक्रम के बारे में जो जानकारियां हाथ लगीं वो हैं-
स्थान- संजय वन, भारतीय जनसंचार संस्थान के बगल में 
तारीख़-  8 अक्टूबर 2017
टाइम-  सुबह के 8-9 बजे
आयोजक- RSS का आरके पुरम खंड
ये सब आसानी से पता चल गया लेकिन विवेक कुमार और उनके तरफ़दार ‘कार्यक्रम का विषय’ पूछते रहे। संघ के कई लोगों से मैंने पता किया। कार्यक्रम में मौजूद कुछ लोगों से भी मैंने जानना चाहा कि विवेक कुमार ने क्या बोला? आम तौर पर चकल्लस में रहने वाले 12वीं से ऊपर के संघपरस्त छात्रों का ध्यान बहुत ज़्यादा भाषणों पर नहीं टिकता और तब तो और भी नहीं जब भाषण पार्क में हो। सो, एक ने बताया कि विवेक सर ने अपने जीवन संघर्षों और उपलब्धियों पर भाषण दिया।
यह संतुष्ट करने वाला जवाब नहीं था। 12वीं से ऊपर के छात्रों के लिए आयोजित इस विशेष कार्यक्रम में विवेक कुमार के सिर्फ़ जीवन संघर्षों और उपलब्धियों को सुनने के लिए संघ क्यों उन्हें न्यौता देगा? फिर संघ के कुछ और लोगों से बात हुई और अंत में संघ के राजीव तुली से। राजीव तुली से पता चला कि राष्ट्रनिर्माण में युवा की भादीदारी और उनके भीतर देशप्रेम जगाने जैसे किसी मुद्दे पर विवेक कुमार ने भाषण दिया, जिसमें प्रसंगवश उन्होंने अपने जीवन के भी कुछ किस्से भी सुनाए।


मंच पर हरे रंग के कुर्ते में जो सज्जन बैठे हैं उनका नाम जतिन है, जिन्हें संघ के लोग पारंपरिक तरीके से जतिन जी कहते हैं। वे दिल्ली RSS के सह प्रांत प्रचारक हैं। जिस फोटो में विवेक कुमार कुछ लोगों के साथ बैठकर गप मार रहे हैं उनमें बैठा एक व्यक्ति जेएनयू में ही कंप्यूटर साइंस जैसा कुछ पढ़ाते हैं।
संघ के लोगों से जब मैंने इस बाबत जानकारी चाही तो उनमें से एक ने इस बात पर हैरानी जताई कि विवेक कुमार इस बात से कैसे मुकर सकते हैं कि वे कार्यक्रम में शरीक हुए। राजीव तुली ने कहा विवेक जी को ऐसा नहीं करना चाहिए। वे गए थे और उन्हें सार्वजनिक तौर पर ऐसा स्वीकार करना चाहिए। हालांकि राजीव तुली ने इस मामले को तूल देने की कोशिश करने वाले हम जैसे लोगों की सहिष्णुता पर भी सवाल उठाए कि विवेक कुमार अगर संघ के कार्यक्रम में चले गए तो बाक़ी लोग इसमें क्यों इतना उतावलापन भरी रुचि दिखा रहे हैं।
संघ का मानना है कि वह हर विचारधारा के लोगों को बुलाने के लिए मंच मुहैया कराने की कोशिश में जुटा है। ज़ाहिर है कि संघ का मंच इस मायने में विलग विचारधारा के लोगों के लिए बेहद सुरक्षित और मुफ़ीद है क्योंकि दूसरे मंच से अगर यही लोग बोलने जाते हैं तो संघ के लोग उन पर हमला तक कर बैठते हैं। विवेक कुमार जब ग्वालियर गए थे तो ABVP के लोगों ने उन पर हमला किया था। TISS प्रशासन ने आख़िरी मौक़े पर कार्यक्रम रद्द कर दिया था या फिर विवेक कुमार को आने से मना कर दिया था।
RSS रह-रह कर इन दिनों आंबेडकर को को-ऑप्ट करने की कोशिश में जुटा है। बहुत मुश्किल काम ले लिया है RSS ने। उससे न तो आंबेडकर पकड़ा जा रहा है और न छोड़ा। इसलिए हो सकता है वो आंबेडकर पर बिल्कुल अपनी लाइन से उलट वालों को भी बुलाकर लोगों को लामबंद कर रहे हों। मज़दूरों-किसानों-दलितों का विंग तो पहले से ही मौजूद है। इनमें वो कई बार जेनुइन मुद्दे उठाकर फिर उसकी भोंडी व्याख्या कर नकली और अश्लील चेतना का विकास करते हैं, जो लोगों के वर्गीय-जातीय हितों के उलट होता है।
संघ और विवेक कुमार दोनों का पक्ष सुनने के बाद मुझे अब सच में यक़ीन हो गया है कि दुनिया बेहद लोकतांत्रिक हो गई है और भारतीय समाज लोकतंत्र की पराकाष्ठा को छू चुका है। जाहिर तौर पर संघ की पताका लोकतंत्र के टीले पर उदार विचारधारा के सबसे बड़े नुमाइंदे के तौर पर अपना नाम दर्ज़ करा रही है। विवेक कुमार भी बेहद लोकतांत्रिक हो चुके हैं कि उन्हें बाएं-दाएं-ऊपर-नीचे हर मंच पर ‘अपनी बात’ रखने में कोई परेशानी नहीं होती। कथ्य और विषयवस्तु ही अहम है, मंच गौण। कथ्य नाम के आदर्शवादी शब्द ने मंच नाम के भौतिकवादी शब्द पर जीत हासिल कर ली है। विवेक कुमार इतने लोकतांत्रिक हो गए हैं कि हमलावर (पूरे दलित समुदाय पर हमलावर) के मंच पर जाने में भी उन्हें कोई परेशानी नहीं हुई। हो सकता है कि वे सच में इतने ही लोकतांत्रिक हों, लेकिन उनके इस ‘जाने’ को RSS ख़ुद के लोकतांत्रिक होने की दावेदारी और चिह्न को मज़बूती से पेश करने की कोशिश कर रहा है। किसका फ़ायदा हुआ?
दिलचस्प यह है कि विवेक कुमार की फोटो इंटरनेट पर सबसे पहले संघ के लोगों ने शेयर की क्योंकि कार्यक्रम में शरीक श्रोतागण उसी खित्ते के थे। या तो हम इस शेयर करने को सामान्य तौर पर फेसबुकिया परिघटना के दायरे में अनिवार्यत: ‘एटैंडिंग ए प्रोग्राम विद मुन्ना एंड 48 अदर्स’ नामक ललक का नतीजा मान लें, या फिर इसे ‘लीक’ मान लें। लीक करने से संघ का कोई नुकसान नहीं है। नुकसान विवेक कुमार और संघविरोधी खित्ते में हैं, जिसमें लोग विवेक कुमार से सवाल पूछेंगे, उनकी राजनीति पर सवाल पूछेंगे, इसी बहाने दलित आंदोलन और आंबेडकरवाद पर सवाल उठेगा, लेफ़्ट के लोग चपेट में आएंगे कि संघ के मंच पर किसी के पहुंच भर जाने से वामपंथियों के पेट में मरोड़ क्यों उठता है? संघ का तो सब कुछ बम-बम है। आप देखिए न कि विवेक कुमार ने अपने फेसबुक पोस्ट में भी फोटो शेयर करने वाले ग़ैर-संघी लोगों को ही निशाना बनाया है।
अगर विवेक कुमार गए, तो उन्हें मान लेना चाहिए था। झूठ बोलना अच्छी बात नहीं है। ख़ासकर तब, जब आप शिक्षक हों। झूठ क्यों बोले? इसका मतलब आप मानते हैं कि वहां जाना ‘ठीक’ नहीं था। यानी आप ख़ुद संघ के मंच पर जाने को ‘ग़लत’ मानते हैं और जब ख़ुद वहां चले गए और लगा कि एक वैचारिक ज़मीन पर रहने वाले लोग आपसे पूछेंगे तो आपने झूठ बोलना शुरू कर दिया। कम्यूनिकेशन और साइकोलॉजी में इसे ‘कॉग्निटिव डिजोनेंस’ कहते हैं, जिसमें लोग वो करते हैं जिसे वो करना ठीक नहीं समझते। और जब वो कर लेते हैं तो उसे ढंकने के लिए ऐसा तर्क गढ़ने की कोशिश करते हैं जिससे उनका कृत्य छुप जाए। लेकिन इस मामले में विवेक कुमार ने ढंकने के लिए तर्क के बजाय झूठ का सहारा लिया। इससे फौरी तौर पर उनका वहां जाना कई लोगों को काल्पनिक लगा, लेकिन जब सच्चाई सामने आ ही गई है तो उनके चरित्र में झूठ नाम की अतिरिक्‍त चीज़ भी जुड़ गई। उन्हें ऐसा नहीं करना चाहिए था। हमें दुख हुआ है और दुखी होने के चलते ही यह सब लिखा। उम्मीदों का क्या है, पता नहीं किस गली में टूट जाए। जो लोग उम्मीद बचा लेते हैं, उन्हें बचा लेनी चाहिए। 
बाक़ी संघ का क्या है। कई आंदोलनों और आंदोलनकारियों को अपने कार्यक्रम में बुला-बुलाकर सम्मानित कर-कर के पूरी लीगेसी को शून्य कर देने की उसकी पुरानी ट्रेनिंग है। लोग बताते हैं कि उत्तराखंड राज्य आंदोलन में उत्‍तराखण्‍ड क्रांति दल के ज़्यादातर लोगों को संघ गांव-कस्बों में किसी भी कार्यक्रम में बुलाकर फूल-माला पहना देता था। उन्हें अच्छा लगता था कि कोई तो पूछ रहा है। फिर, धीरे-धीरे और अच्छा लगने लगा। जब उससे भी और अच्छा लगा तो फूल-माला की उन्हें आदत पड़ गई और फिर संघ ने बाहें फैलाकर कहा कि आओ, समाहित हो जाओ। फिर आधे समाहित हो गए और जो बचे, उनमें से ज़्यादातर कब दाएं मुड़ेंगे और कब बाएं और कब बीच में खड़े रहेंगे, कोई नहीं जानता।

साहित्य अपने समय की स्थितियों का प्रतिबिंब: मैनेजर पांडेय

लेखक मंच - Thu, 12/10/2017 - 14:28

चूरू में आयोजि‍त कार्यक्रम में वि‍चार व्‍यक्‍त करते मैनेजर पांडेय।

चूरू : प्रयास संस्थान की ओर से शनिवार 30 सितंबर को शहर के सूचना केंद्र में हुए पुरस्कार समारोह में जोधपुर की लेखिका पद्मजा शर्मा को उनकी पुस्तक ‘हंसो ना तारा’ के लिए इक्यावन हजार रुपये का घासीराम वर्मा साहित्य पुरस्कार एवं गांव सेवा, सवाई माधोपुर के लेखक गंगा सहाय मीणा को उनकी पुस्तक ‘आदिवासी साहित्य की भूमिका’ के लिए ग्यारह हजार रुपये का रूकमणी वर्मा युवा साहित्यकार पुरस्कार प्रदान किया गया। इस दौरान ‘भय नाहीं खेद नाहीं’ पुस्तक के लिए नई दिल्ली की दीप्ता भोग व पूर्वा भारद्वाज को संयुक्त रूप से पचास हजार रुपये का विशेष घासीराम वर्मा सम्मान प्रदान किया गया।

देश के प्रख्यात गणितज्ञ डॉ घासीराम वर्मा की अध्यक्षता में हुए समारोह को संबोधित करते हुए नामचीन आलोचक मैनेजर पांडेय ने कहा कि कवि किसी अर्थशास्त्री और इतिहासकार पर निर्भर नहीं रहता, वह अपने समय को जैसा देखता है, वैसा ही लिखता है। इसलिए साहित्य अपने समय की स्थितियों का प्रतिबिंब होता है। पांडेय ने कहा कि मातृभाषा ने ही तुलसी, सूर, मीरा और विद्यापति को महाकवि बनाया। इसलिए मातृभाषाओं के लिए संकट के इस समय में हमें मातृभाषाओं में सृजन करना चाहिए। बेहतर बात है कि राजस्थान में असंख्य लेखक हैं जो हिंदी के साथ-साथ मातृभाषा राजस्थानी में लिख रहे हैं। उन्होंने विजयदान देथा का स्मरण करते हुए कहा कि भाषा को जानना अपने अस्तित्व को जानना है। उन्होंने कहा कि आज के समय में जबकि दूसरे लोग अपनी सुख-सुविधाओं के लिए लड़ रहे हैं, आदिवासी अपने अस्तित्व के लिए, अपने जल, जंगल और जमीन को बचाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। उन्होंने ‘ग्रीन हंट’ का उदाहरण देते हुए कहा कि ब्रिटिश भारत में आदिवासियों के साथ जैसा व्यवहार होता था, वैसा ही आजाद भारत में उनके साथ बर्ताव किया जा रहा है। पंडिता रमाबाई को याद करने एक पुराने संघर्ष को याद करना है और यह स्त्री को यह याद दिलाना है कि वह किसी भी संघर्ष में अकेली नहीं है। उन्होंने कहा कि साहस के साथ अपनी बात कहने से आलोचना में जान आती है। उन्होंने कहा कि मनुष्य एक भाषिक प्राणी है और भाषा से ही परिवार व समाज की रचना होती है।

मुख्य वक्ता नारीवादी चिंतक शीबा असलम फहमी ने कहा कि कानून ने स्त्री को बराबरी का अधिकार दिया है, लेकिन समाज अपने अंदर से इसे स्वीकार नहीं कर पा रहा है। हम कितनी भी तरक्की कर जाएं, लेकिन यदि उपेक्षितों और वंचितों को बराबरी का अधिकार नहीं दे पाएं और यह तरक्की चंद लोगों तक ही सीमित रहती है तो इसका कोई अर्थ नहीं है। उन्होंने कहा कि हमारे भीतर बलात्कार के अपराधी के प्रति जो घृणा का भाव रहता है, वहीं घरेलू हिंसा जैसे अपराधों के लिए भी होना चाहिए। शरीर के साथ होने वाले अपराध को तो हम देखते हैं लेकिन मन के साथ होने वाले अपराध को हम नजरअंदाज कर देते हैं। औरत को औरत बनाए रखने के लिए जो किया जाता है, वह अपने आप में भयावह है। हमें अपने घर में एक मजबूत बेटी तैयार करनी चाहिए और उसे संपत्ति का अधिकार आगे बढ़कर देना चाहिए।

पुरस्कार से अभिभूत साहित्यकार पद्मजा शर्मा, दीप्ता भोग, पूर्वा भारद्वाज और गंगा सहाय मीणा ने अपनी सृजन प्रक्रिया, संघर्ष और अनुभवों को साझा किया। भंवर सिंह सामौर ने अतिथियों का स्वागत किया। प्रयास संस्थान के अध्यक्ष दुलाराम सहारण ने आभार उद्बोधन में आयोजकीय पृष्ठभूमि पर प्रकाश डाला। संचालन कमल शर्मा ने किया।

इस दौरान मालचंद तिवाड़ी, नरेंद्र सैनी, रियाजत खान, रामेश्वर प्रजापति रामसरा, मीनाक्षी मीणा, दलीप सरावग, रघुनाथ खेमका आदि‍ साहि‍त्‍य प्रेमी मौजूद थे।

प्रकृति, धरती का आभार प्रकट करते उत्‍सव : रजनी गुसाईं

लेखक मंच - Mon, 09/10/2017 - 02:17

रजनी गुसाईं

भारतवर्ष को एक देश नहीं, बल्‍कि‍ महादेश कहकर सम्बोधित किया जाए तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। रहन-सहन, खान-पान, बोली-भाषा, जाति-धर्म की जितनी विविधताएं भारत में देखने को मिलती हैं, उतनी विश्‍व में किसी भी देश में ढूँढ़ने से भी नहीं मिलेंगी। भारत की संस्कृति में विभिन्न धर्मों, जातियों, संस्कृतियों का समावेश है। यही कारण है कि भारत में पूरे वर्ष पर्व, त्योहारों का मेला लगा रहता हैं। भारत की गौरवशाली समृद्ध सामाजिक-सांस्कृतिक विरासत में प्रकृति, कृषि, ऋतुओं, नदियों से जुड़े व्रत, त्योहार मनाने की प्रथा प्राचीनकाल से ही चली आ रही हैं! भारत में लोक उत्सव और प्रकृति का चोली-दामन का साथ हैं। कई प्रमुख त्योहार प्रकृति, ऋतुओं तथा कृषि से सीधे जुड़े हुए हैं। खेती किसानी से जुड़े भारत में जो प्रमुख त्योहार हैं, वे लोहिड़ी, मकर सक्रांति, पोंगल, बैसाखी, बिहु हैं, जोकि भारत के विभिन्न प्रांतो में अपने-अपने रीतिरिवाजों के साथ हर्षोल्लास के साथ मनाए जाते हैं। फसल बुवाई, कटाई के समय इन लोकोत्सव को मनाने का ध्येय एक ही हैं- प्रकृति, धरती का आभार प्रकट करना जिसकी गोद से अन्न उपजता है। जिससे धरती के सभी प्राणियों का पेट भरता है। इन अवसरों पर नदियों में स्नान करने तथा सूर्य को अर्ध्य देने की परम्परा भी है। नदी जिसके जल से खेतों का सींचा जाता है। सूर्य जिसके कारण पृथ्वी का ऋतु चक्र बदलता है। धूप, गर्मी, वर्षा सूर्य से ही प्राप्त होती है, जिसके कारण खेतों में फसलें लहलहाती हैं। भारतीय समाज में कृषि से जुड़े इन उत्सवों का विशेष महत्व हैं।

बात लोक से जुड़े उत्सवों, प्रकृति, जल की हो और भारत के आदिवासी समाज के उत्सवों का उल्लेख नहीं हो इसकी कल्पना भी असम्भव है। क्योंकि आज भी भारत में आदिवासी समाज का अस्तित्व विद्यमान है, जो प्रकृति के निकट रहकर अपनी लोक संस्कृति को सहेजे हुए है। यह समाज जंगल  को ही अपना घर मानता है। और जंगल ही इन का ईश्वर होता है। झारखण्ड के आदिवासी लोक उत्सव में प्रकृति से जुड़ा एक ऐसा ही त्योहार प्रमुखता से मनाया जाता हैं- ‘सरहुल’। सरहुल वसंत ऋतु के दौरान मनाया जाता है। जब पेड़-पौधों में नए अंकुर फूटने लगते हैं। साल के पेड़ की शाखों पर नए फूल खिलने लगते हैं। यह गाँव के देवता की पूजा है, जिन्हे इन जनजातियों का रक्षक माना जाता है। देवता की पूजा साल के फूलों से ही की जाती है। पूजा संपन्न होने के बाद ग्रामीणों में प्रसाद वितरित किया जाता हैं जिसे ‘हड़िया’ कहा जाता है, जोकि चावल का बना होता है। पूरा गाँव गायन और नृत्य के साथ सरहुल का त्योहार मनाता है। झारखण्ड के अन्य त्योहार जैसे करम, जावा, तुशु हैं। प्रकृति प्रेमी तथा जल जंगल जमीन को ही अपनी अमूल्य सम्पत्ति मानने वाली आदिवासी जनजाति के ये त्योहार कृषि, उर्वरता से ही जुड़े हैं।

आश्विन और कार्तिक माह को पर्वों का माह भी कहते हैं, क्योंकि इस दौरान कई बड़े पर्व आते हैं जो समूचे भारतवर्ष में प्रमुखता से मनाए जाते हैं। उमस भरी गर्मी, वर्षा ऋतु विदा लेती है। शरद ऋतु का आगमन होता है। जिसका आरम्भ शारदीय नवरात्र के साथ होता है! नौ दिनों तक चलने वाले इस पर्व में उत्तर भारत में जहां जगह जगह हिन्दू पौराणिक कथा पर आधारित रामलीला का मंचन होता ह, जिसमे भगवान श्री राम के जीवन से जुडी़ घटनाओं का मंचन किया जाता है। वहीं बंगाल तथा असम में इसे दुर्गा पूजा के नाम से जाना जाता है। जगह-जगह माँ दुर्गा का भव्य पंडाल बनाकर शक्ति की प्रतीक, महिसासुर नामक असुर का वध करने वाली देवी दुर्गा की आराधना की जाती है। लोग नए वस्त्र धारण कर पंडाल में देवी दुर्गा की आराधना के लिए पहुंचते हैं। पंडाल में मेले जैसा दृश्य होता है। सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन भी होता है।

रामलीला का समापन रावण का पुतला जलाकर विजयदशमी के दिन जिसे दशहरा भी कहते हैं, होता है। पौराणिक कथा के अनुसार भगवान राम ने इसी दिन लंका नरेश रावण नाम के असुर का वध किया था। शक्ति की प्रतीक माँ दुर्गा ने महिषासुर नामक राक्षस का वध किया था। इसलिए इसे विजयादशमी कहते हैं। भारतीय लोक समाज में ये त्योहार बुराई पर अच्छाई, अधर्म पर धर्म की विजय का प्रतीक माने जाते हैं।

भारत का सबसे बड़ा पर्व दीपावली भी कार्तिक माह में मनाया जाता है। इस त्योहार को घर की साफ़-सफाई, रंग-रोगन से भी जोड़ा जाता है। क्योंकि देवी लक्ष्मी की पूजा दीपावली पर की जाती है। देवी लक्ष्मी को धन की देवी माना जाता है। ऐसी मान्यता है कि दीपावली की रात देवी लक्ष्मी पृथ्वी पर भ्रमण करती है। वह साफ़ सुथरे घर में ही अपना आशीर्वाद बरसाती हैं तथा गंदगी से दूर रहती हैं! यही कारण हैं कि दीपावली पर लोग घर की साफ-सफाई प्रमुखता से करते हैं। वैसा इसका वैज्ञानिक या तकनीकी कारण यह भी है कि‍ दीपावली वर्षा ऋतु के बाद आती है, जब शरद ऋतु का आगमन होता है। वर्षा के कारण घर में आई सीलन, काई, सीलन की महक दूर भगाने कि लिए भी यह समय घर की अंदरुनी सफाई के लिए उपयुक्‍त होता है। दीपावली मनाने के पीछे एक पौराणिक कथा भी प्रचलित है। हजारों वर्ष पहले अयोध्या के राजा राम चौदह वर्ष का वनवास काट कर अपनी नगरी अयोध्या लौटे थे। अपने राजा राम के आने की ख़ुशी में अयोध्यावासियों ने पूरी नगरी को दीप प्रज्‍जलि‍त कर सजाया था कार्तिक अमावस्या की। अँधेरी रात में अयोध्या नगरी दीपों के प्रकाश से झिलमिला उठी थी। आज भी लोग दीपावली के दिन अपने घरों को फूलों की साज सज्जा के साथ साथ बिजली के रंगीन बल्बों, दीयों से सजाते हैं। इसलिए दीपावली को प्रकाश का उत्सव भी कहते हैं।

सूर्य की उपासना से ही जुड़ा बिहार का मुख्य पर्व छठ पूजा कार्तिक माह में ही मनाया जाता है। चार दिन तक चलने वाला यह उत्सव कठोर व्रत नियम के साथ आरम्भ होता है, जोकि व्रत के चौथे दिन नदी के घाट पर उगते सूर्य को अर्ध्य देकर समाप्त होता है। इन चार दिनों तक घरों में विभिन्न प्रकार के व्यंजन बनाए जाते हैं। घर की महिलायें सूर्य उपासना, छठ मैया से जुड़े लोकगीत गाती हैं। इस पर्व को मनाने का भी मूल ध्येय सूर्य भगवान का आभार प्रकट करना है, जिसके कारण हमें अन्न जल प्राप्त होता है।

भारत में उत्सव मनाने की इस बहुरंगी छटा में सभी संस्कृतियों का सम्मिश्रण है। ये उत्सव जीवन में आनंद और उल्लास लाते हैं। साथ ही देश को एक धागे में भी पिरोते हैं और भारत भूमि के सदियों पुराने संदेश ‘वसुदेव कुटुम्बकमद्ध’ यानी सारा विश्‍व एक परिवार है, की धारणा को और मजबूत करते है।

गोरखपुर में बच्चों की मौत ने पूरे सिस्टम की संवेदनहीनता को बेपर्दा कर दिया है : मनोज कुमार सिंह

लेखक मंच - Sun, 08/10/2017 - 13:24

‘दिमागी बुखार: बच्चों की मौत और विफल स्वास्थ्य तंत्र’ पर व्‍याख्‍यान देते मनोज कुमार सिंह।

नई दि‍ल्‍ली : ‘‘गोरखपुर में आक्सीजन संकट के दौरान चार दिन में 53 बच्चों की मौत ने पूरे सिस्टम की संवेदनहीनता को बेपर्दा कर दिया। मौतों का सिलसिला उसके बाद भी जारी है। पूरे देश जनस्वास्थ्य और स्वास्थ्य सेवाओं की क्या स्थिति है, उसे इसके आईने में देखा जा सका है। कुल मिलाकर बहुत भयावह परिदृश्य है। सिर्फ बीआरडी मेडिकल कालेज में वर्ष 1978 से इस वर्ष तक 9907 बच्चों की मौत हो चुकी है। इस आंकड़े में जिला अस्पतालों, सीएचसी-पीएचसी और प्राइवेट अस्पतालों में हुई मौतें शामिल नहीं हैं। इंसेफेलाइटिस से मौतों के आंकड़े आईसवर्ग की तरह हैं। अब तो इस बीमारी का प्रसार देश के 21 राज्यों के 171 जिलों में हो चुका है। खासकर देश के 60 जिले और उत्तर प्रदेश के 20 जिले इससे बुरी तरह प्रभावित हैं।’’ 7 अक्टूबर 2017 को राजेंद्र भवन, दिल्ली में छठा कुबेर दत्त स्मृति व्याख्यान देते हुए चर्चित पत्रकार और जन संस्कृति मंच के महासचिव मनोज कुमार सिंह ने यह कहा। कवि-चित्रकार और टीवी के मशहूर प्रोड्यूसर कुबेर दत्त की स्मृति में हर साल एक व्याख्यान आयोजित होता है। इस बार व्याख्यान का विषय ‘दिमागी बुखार: बच्चों की मौत और विफल स्वास्थ्य तंत्र’ था।

मनोज कुमार सिंह ने कहा कि 40 वर्ष पुरानी बीमारी को अब भी अफसर, नेता और मीडिया रहस्यमय या ‘नवकी’ बीमारी बताने की कोशिश कर रहे हैं। यह दरअसल एक बड़़ा झूठ है। जिन  डॉक्टरों ने इसके निदान की कोशिश की, उन्हें अफसरों द्वारा अपमानित होना पड़ा। बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. केपी कुशवाहा ने बहुत पहले ही जब इस बीमारी को अज्ञात बताए जाने पर आपत्ति जाहिर की थी, तो उनकी नहीं सुनी गई। उनका स्पष्ट तौर पर मानना था कि यह बीमारी जापानी इंसेफेलाइटिस है।

मनोज ने बताया कि इंसेफेलाइटिस को समझने के लिए हमें जापानी इंसेफेलाइटिस और एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिन्ड्रोम को समझना पड़ेगा। चीन, इंडोनेशिया में भी टीकाकरण, सुअर बाड़ों के बेहतर प्रबन्धन से जापानी इंसेफेलाइटिस पर काबू कर लिया गया, लेकिन भारत में हर वर्ष सैकड़ों बच्चों की मौत के बाद भी सरकार ने न तो टीकाकरण का निर्णय लिया और न ही इसके रोकथाम के लिए जरूरी उपाय किए। जब उत्तर प्रदेश में वर्ष 2005 में जेई और एईएस से 1500 से अधिक मौतें हुई तो पहली बार इस बीमारी को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर हाय तौबा मची। उन्होंने कहा कि दिमागी बुखार किसी भी आयु के व्यक्ति को हो सकता है लेकिन 15 वर्ष से कम उम्र के बच्चों में यह ज्यादा है। इस रोग में मृत्यु दर तथा शारीरिक व मानसिक अपंगता बहुत अधिक है।

इंसेफेलाइटिस के रोकथाम के दावे और हकीकत का जिक्र करते हुए मनोज कुमार सिंह ने कहा कि स्वास्थ्य विभाग के जिम्मे इंसेफेलाइटिस के इलाज की व्यवस्था ठीक करने, टीकाकरण और इस बीमारी पर शोध का काम था तो पेयजल एवं स्वच्छता मंत्रालय को गांवों में शुद्ध पेयजल उपलब्ध कराने के लिए इंडिया मार्का हैण्डपम्पों, नलकूपों की स्थापना तथा व्यक्तिगत शौचालयों का बड़ी संख्या में निर्माण कराना था। इसी तरह सामाजिक न्याय मंत्रालय को इस बीमारी से भीषण तौर पर विकलांग हुए बच्चों के पुनर्वास, शिक्षा व इलाज की व्यवस्था का काम था। इस योजना के पांच वर्ष गुजर गए लेकिन अभी तक इंसेफेलाइटिस से होने वाली मौतों व अपंगता को कम करने में सफलता मिलती नहीं दिख रही है। टीकाकरण में लापरवाही है, शुद्ध पेयजल उपलब्ध नहीं है, पानी का पूरा एक कारोबार विकसित हो गया है, शौचालय निर्माण के दावे निरर्थक हैं।

मनोज कुमार सिंह ने स्थापना के 45 वर्ष और गुजर जाने के बाद भी बीआरडी मेडिकल कालेज में एमबीबीएस की सीट 100 से ज्यादा न बढ़ पाने पर सवाल उठाया, जबकि इंसेफेलाइटिस के सर्वाधिक मरीज आते हैं। यहां हर वर्ष जेई एईएस के 2500 से 3000 मरीज आते हैं, लेकिन इस मेडिकल कालेज को दवाइयों, डाक्टरों, पैरा मेडिकल स्टाफ, वेंटीलेटर, आक्सीजन के लिए भी जूझना पड़ता है। इंसेफेलाइटिस की दवाओं, चिकित्सकों व पैरामेडिकल स्टाफ, उपकरणों की खरीद व मरम्मत आदि के लिए अभी तक अलग से बजट का प्रबंध नहीं किया गया है। इंसेफेलाइटिस मरीजों के इलाज में लगे चिकित्सकों, नर्स, वार्ड ब्वाय व अन्य कर्मचारियों का वेतन, मरीजों की दवाइयां तथा उनके इलाज में उपयोगी उपकरणों की मरम्मत के लिए लगभग एक वर्ष में सिर्फ 40 करोड़ की बजट की जरूरत है, पर केंद्र और राज्य की सरकार इसे देने में कंजूसी कर रही है। ये हालात बताते हैं कि मंत्रियों-अफसरों के दावों और उन्हें अमली जामा पहनाने में कितना फर्क हैं। उन्होंने तंज करते हुए कहा कि जापान ने 1958 में ही इस बीमारी पर काबू पा लिया था। जापान से बुलेट ट्रेन लाने से ज्यादा जरूरी यह था कि उसकी तरह हम इस बीमारी को रोक लगा पाते।

मनोज कुमार सिंह ने कहा कि जेई/एइएस से मरने वाले बच्चे और लोग चूंकि गरीब परिवार के हैं इसलिए इस मामले में चारों तरफ चुप्पी दिखाई देती है। डेंगू या स्वाइन फलू से दिल्ली और पूना में कुछ लोगों की मौत पर जिस तरह हंगामा मचता है, उस तरह की हलचल इंसेफेलाइटिस से हजारों बच्चों की मौत पर कभी नहीं हुई। गरीबी के कारण ये इंसेफेलाइटिस के आसान शिकार होने के साथ-साथ हमारी राजनीति के लिए भी उपेक्षा के शिकार है।

उन्होंने यह भी बताया कि चीन निर्मित वस्तुओं के बहिष्कार करने वाली राजनीति के बजाय सच यह है कि एक दशक से चीन में बना टीका ही देश के लाखों बच्चों को जापानी इंसेफेलाइटिस जैसी घातक बीमारी से बचा रहा है। सस्ता टीका मिलने के बावजूद हमारे देश की सरकार ने टीके लगाने का निर्णय लेने में काफी देर नहीं की होती तो सैकड़ों बच्चों की जान बचायी जा सकती थी। वर्ष 2013 में भारत में जेई का देशी वैक्सीन बना और इसे अक्टूबर 2013 में लांच करने की घोषणा की गई, लेकिन अभी देश की जरूरतों के मुताबिक यह वैक्सीन उत्पादित नहीं हो पा रही है।

मनोज कुमार सिंह ने कहा कि देश की सरकार सकल घेरलू उत्पाद का सिर्फ 1.01 फीसदी स्वास्थ्य पर खर्च कर रही है। बहुत से छोटे देश भी स्वास्थ्य पर भारत से ज्यादा खर्च कर रहे हैं। उत्तर प्रदेश में स्वास्थ्य सेवा की हालत तो और खराब है। ग्रामीण स्वास्थ्य सांख्यिकी 2016 के अनुसार यूपी के सीएचसी में 3092 विशेषज्ञ डॉक्टरों सर्जन, गायनकोलाजिस्ट, फिजिशियन बालरोग विशेषज्ञ की जरूरत है, लेकिन सिर्फ 484 तैनात हैं यानी 2608 की जरूरत है। देश में भी यही हाल है। कुल विशेषज्ञ चिकित्सकों के 17 हजार से अधिक पोस्ट खाली हैं। यूपी के 773 सीएचसी में सिर्फ 112 सर्जन, 154 बाल रोग विशेषज्ञ, 115 स्त्री एवं प्रसूति रोग विशेषज्ञ, 143 रेडियोग्राफर हैं। इस स्वास्थ्य ढांचे पर इंसेफेलाइटिस जैसी जटिल बीमारी तो क्या साधारण बीमारियों का भी मुकाबला नहीं किया जा सकता है। यही कारण है कि उत्‍तर प्रदेश में बच्चों की मौत सबसे अधिक है। उन्होंने कहा कि स्वास्थ्य को सिर्फ चिकित्सा से जोड़ कर नहीं देखना चाहिए, बल्कि इसका सीधा सम्बन्ध गरीबी और सामाजिक-आर्थिक कारण भी हैं। यदि गरीबी कम नहीं होगी और सभी लोगों को बेहतर रोजगार, स्वच्छ पेयजल, शौचालय उपलब्ध नहीं होगा तो देश को स्वस्थ रखना संभव नहीं हो पाएगा।

व्याख्यान के बाद गीतेश, सौरभ, आशीष मिश्र, नूतन, अखिल रंजन, इरफान और विवेक भारद्वाज के सवालों का जवाब देते हुए मनोज कुमार सिंह ने कहा कि रिसर्च के मामले में सरकारी या प्राइवेट स्तर पर सन्नाटे की स्थिति है, इसलिए कि इस बीमारी पर रिसर्च को लेकर किसी की ओर से कोई फंडिंग नहीं है। फंडिंग थी तो एचआइवी, एडस की बड़ी चर्चा होती थी, पर फंडिंग बंद होते ही लगता है कि वे बीमारी ही गायब हो गर्ईं।

मनोज कुमार सिंह ने दो टूक कहा कि इस बीमारी के निदान में सरकार की कोई रुचि नहीं है, इसलिए कि तब उसे स्वच्छ पानी, ठीक शौचालय और संविधान प्रदत्त अन्य अधिकारों को सुनिश्चित करना पड़ेगा। विडंबना यह है कि राजनीतिक पार्टियों के लोग जब विपक्ष में होते हैं, तो इसे मुद्दा बनाते हैं, पर सरकार में जाते ही इस पर पर्दा डालने लगते हैं। उन्होंने कहा कि बोलना और करना दो भिन्न बातें हैं। जब भाजपा विपक्ष में थी, तो योगी ने इस बीमारी को लेकर मौन जुलूस निकाला था, लेकिन नेशनल हाईवे पर नौ गायें कट जाने के बाद जिस तरह तीन दिन तक उन्होंने बंदी करवाई थी, वैसा बंद उन्होंने इंसेफेलाइटिस के लिए कभी नहीं करवाया। मनोज ने बताया कि अपनी जिम्मेवारी से बचने के लिए ही सरकार ने विगत 11 अगस्त को मरीजों की मदद करने वाले डॉ कफील को खलनायक बनाया। उन्होंने कहा कि बीमारी का दायरा बढ़ रहा है। शुद्ध पेयजल की समस्या बहुत गंभीर है, कम गहराई वाले हैंडपंपों के जरिए इंसेफेलाइटिस के बीमारी के संक्रमण होता है, वहीं ज्यादा गहराई वाले हैंडपंपों में आर्सेनिक और उससे होने वाले कैंसर का खतरा है। बच्चे वोटबैंक नहीं हैं, इसलिए राजनीतिक पार्टियों के लिए यह गंभीर मुद्दा नहीं है। उनके ज्यादातर अभिभावक गरीब और मजदूर हैं, भले ही रोजी-रोटी के लिए वे महानगरों में चले जाएं, पर इस इलाके से उनके पूरे परिवार का विस्थापित होकर कहीं दूसरी जगह चले जाना संभव नहीं है।

मनोज का मानना था कि सरकार पर आंदोलनात्मक दबाव बनाना जरूरी है। तत्काल तो बचाव पर ध्यान देना जरूरी है, प्रति मरीज लगभग 3000 रुपये की जरूरत है, प्राइवेट प्रैक्टिस वाले सुविधा देने को तैयार नहीं है। यह काम तो सरकार को ही करना होगा, पर मुख्यमंत्री की रुचि तो केरल में जाकर वहां के स्वास्थ्य सेवा पर टीका-टिप्पणी करने में ज्यादा है, जहां बच्चों की इस तरह की मौतें बहुत ही कम होती हैं।

मनोज ने बताया कि साहित्य में भी मदन मोहन के उपन्यास ‘जहां एक जंगल था’ और एक-दो कविताओं के अतिरिक्त इंसेफेलाइटिस की बीमारी का कोई प्रगटीकरण नहीं है।

संचालन करते हुए सुधीर सुमन ने इंसेफेलाइटिस से हुई बच्चों की मौतों में सरकार और स्वास्थ्य तंत्र की विफलताओं को ढंकने की कोशिश के विरुद्ध एक जनपक्षीय पत्रकार के बतौर मनोज कुमार सिंह के संघर्ष का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि मनोज लगातार इस बीमारी को लेकर लिखते रहे हैं, पर इस बार जिस लापरवाही और संवेदहीनता की वजह से बड़े पैमाने पर बच्चों की मौतें हुईं, जो कि एक किस्म की हत्या ही थी, उसके पीछे की वजहों और उसके लिए जिम्मेवार लोगों और उनके तंत्र का गोरखपुर न्यूज ऑनलाइन वेब पोर्टल के जरिए मनोज ने बखूबी पर्दाफाश किया। सच पर पर्दा डालने की सत्ता की कोशिशों के बरअक्स निर्भीकता के साथ उन्होंने जो संघर्ष किया, वह वैकल्पिक मीडिया में लगे लोगों के लिए अनुकरणीय है।

सवाल-जवाब के सत्र से पूर्व, चर्चित चित्रकार अशोक भौमिक ने व्याख्यानकर्ता मनोज कुमार सिंह को स्मृति-चिह्न के बतौर कुबेर दत्त द्वारा बनाई गई पेंटिंग दी। गोरखपुर में स्वास्थ्य तंत्र और सरकार की नाकामियों और संवेदनहीनता की वजह से मारे गए बच्चों की याद में जन संस्कृति मंच के कला समूह द्वारा पेंटिंग प्रदर्शनी लगाए जाने तथा उससे होने वाली आय के जरिए इंसेफेलाइटिस के निदान के लिए चलने वाले प्रयासों में मदद देने की घोषणा भी की गई।

व्याख्यान से पूर्व जसम, दिल्ली के संयोजक रामनरेश राम ने लोगों का स्वागत किया। उसके बाद प्रसिद्ध चित्रकार हरिपाल त्यागी ने कुबेर दत्त की कविताओं के नए संग्रह ‘बचा हुआ नमक लेकर’ का लोकार्पण किया। कवि-वैज्ञानिक लाल्टू द्वारा लिखी गई इस संग्रह की भूमिका का पाठ श्याम सुशील ने किया। सुधीर सुमन ने कहा कि इस संग्रह कविताओं में कुबेर दत्त की कविता के सारे रंग और अंदाज मौजूद हैं। उन्होंने कवि के इस संग्रह और अन्य संग्रहों में मौजूद बच्चों से संबंधित कविताओं का पाठ किया। कुबेर दत्त की कविताओं के हवाले से यह बात सामने आई कि नवउदारवादी अर्थव्यवस्था के असर में विकसित राजनीतिक-धार्मिक सत्ता की उन्मत्त तानाशाही बच्चों के लिए यानी मनुष्य के भविष्य के लिए भी खतरनाक है। नब्बे के दशक के शुरुआत में लिखी गई अपनी एक कविता में उन्होंने जिन सांप्रदायिक फासीवादी ताकतों की शिनाख्त की थी, वे आज हूबहू उसी रूप में हमारे सामने हैं। गोरखपुर में भी वहीं उन्मादी, नृशंस और जनता के प्रति संवेदनहीन प्रवृत्ति वाला चेहरा नजर आया।

अध्यक्षता करते हुए बनारस से आए साहित्यकार वाचस्पति ने कहा कि सरकार की जो आपराधिक लापरवाही और नेतृत्व का जो पाखंड है, उसे मनोज कुमार ने अपने व्याख्यान के जरिए स्पष्ट रूप से दिखा दिया। इस बीमारी से बचाव के लिए निरंतर संघर्ष की आवश्यकता है। उन्होंने कुबेर दत्त से जुड़े संस्मरण भी सुनाए।

आयोजन के आरंभ में मशहूर फिल्म निर्देशक कुंदन शाह और उचित इलाज के अभाव में मारे गए बच्चों को एक मिनट का मौन रखकर श्रद्धांजलि दी गई।

इस मौके पर वरिष्ठ कवि राम कुमार कृषक, रमेश आजाद, वरिष्ठ पत्रकार आनंद स्वरूप वर्मा, जसम के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजेन्द्र कुमार, रामजी राय, दूरदर्शन आर्काइव्स की पूर्व निदेशक कमलिनी दत्त, कहानीकार महेश दर्पण, दिनेश श्रीनेत, कौशल किशोर, पत्रकार पंकज श्रीवास्तव, अभिषेक श्रीवास्तव, कवि मदन कश्यप, दिगंबर, रंगकर्मी जहूर आलम, कवि शोभा सिंह, कहानीकार योगेंद्र आहूजा, आलोचक प्रणय कृष्ण, आशुतोष कुमार, राधिका मेनन, पत्रकार भाषा सिंह, अशोक चौधरी, डॉ. एसपी सिन्हा, प्रभात कुमार, राजेंद्र प्रथोली, गिरिजा पाठक, अमरनाथ तिवारी, अनुपम सिंह, मनीषा, रविप्रकाश, बृजेश यादव, इरेंद्र, मृत्युंजय, तूलिका, अवधेश, मुकुल सरल, रविदत्त शर्मा, सोमदत्त शर्मा, संजय भारद्वाज, गीतेश, सुनीता, रूचि दीक्षित, अंशुमान, कपिल शर्मा, रामनिवास सिंह, सुनील चौधरी, सुजीत कुमार, कनुप्रिया, असद शेख, नौशाद राणा, शालिनी श्रीनेत, रोहित कौशिक, माला जी, दिवस, अतुल कुमार, उद्देश्य आदि मौजूद थे।

प्रस्‍तुति‍ : सुधीर सुमन

‘दि‍मागी बुखार- बच्‍चों की मौत और वि‍फल स्‍वास्‍थ्‍य तंत्र’ पर व्‍याख्‍यान 7 को  

लेखक मंच - Fri, 06/10/2017 - 12:22

नई दि‍ल्‍ली : इंसेफेलाइटिस यानी दिमागी बुखार से चार दिनों के भीतर पचास से अधिक बच्चों की मौत ने इस बार पूरे देश को झकझोर कर रख दिया। जनता के भीतर सबसे ज्यादा गुस्सा उत्तर प्रदेश के मंत्रियों के बयानों से भड़का। यह बीमारी क्या है? इसके कितने प्रकार हैं? देश के कौन से इलाके इससे प्रभावित हैं? विगत 40 वर्षों में इसका समाधान न हो पाने की वजहें क्या हैं? किस तरह महज एक अस्पताल में ही 40 वर्षों में इस बीमारी से 9733 मौतें हुईं? क्यों पूरा तंत्र और सरकार बच्चों की मौतों को सामान्य मौतें बताने के लिए पूरा जोर लगाए रहा? ऐसे तमाम सवालों से संबंधित है इस बार का कुबेर दत्त स्मृति व्याख्यान।

यह बीमारी तो महज एक बानगी है इस देश में जनस्वास्थ्य के प्रति आपराधिक लापरवाही की। ऐसी कई बीमारियों की चपेट में है इस देश की जनता।

इंसेफलाइटिस की बीमारी से हुई बच्चों की मौतों और विफल स्वास्थ्य तंत्र पर छठा कुबेर दत्त स्मृति व्याख्यान देंगे मनोज कुमार सिंह, जो चर्चित युवा पत्रकार रहे हैं, जमीनी रिपोर्टों के लिए मशहूर हैं। गोरखपुर से प्रतिरोध का सिनेमा अभियान शुरू करने वाले मनोज कुमार सिंह वहां की बौद्धिक-सांस्कृतिक जगत की एक महत्वपूर्ण शख्सियत हैं। जन संस्कृति मंच के हालिया राष्ट्रीय सम्मेलन में उन्हें महासचिव की जिम्मेवारी दी गई है। फिलहाल वे गोरखपुर न्यूज लाइन नामक चर्चित वेबपोर्टल चला रहे हैं।

मनोज कुमार सिंह का मानना है कि इंसेफेलाइटिस से मौतों के जो आकंडे सामने आ रहे हैं, वे तो आईसवर्ग की तरह हैं। इन आंकड़ों में जिला अस्पतालों, सीएचसी-पीएचसी और प्राइवेट अस्पतालों में हुई मौतें शामिल नहीं हैं। अब तो यह बीमारी सिर्फ पूर्वांचल तक ही सीमित नहीं रह गई है। इसका प्रसार देश के 21 राज्यों के 171 जिलों में हो चुका है। इस बीमारी के दो प्रकार हैं- जापानी इंसेफलाइटिस और एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिन्ड्रोम। नेशनल वेक्टर बार्न डिजीज कंट्रोल प्रोग्राम के मुताबिक वर्ष 2010 से 2016 तक एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिन्ड्रोम से पूरे देश में 61957 लोग बीमार पड़े, जिसमें 8598 लोगों की मौत हो गई। इसी अवधि में जापानी इंसेफेलाइटिस से 8669 लोग बीमार हुए, जिनमें से 1482 की मौत हो गई। इस वर्ष अगस्त माह तक पूरे देश में एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिन्ड्रोम के 5413 केस और 369 मौतों के आंकड़े आए। जापानी इंसेफेलाइटिस से इसी अवधि में 838 केस और 86 मौत के मामले सामने आए। अभी भी मौतों की सूचनाएं आ ही रही हैं।

इंसेफेलाइटिस के मुद्दे पर मनोज पिछले कई वर्षों से लगातार लिखते रहे हैं।

गोरखपुर के बीआरडी मेडिकल कॉलेज में बच्चों की मौत के सवाल पर जनता के दुख-दर्द और उसके गुस्से के साथ वे अपने वेबपोर्टल के जरिए खड़े रहे, जबकि सरकार और स्वास्थ्य तंत्र के नकारेपन और आपराधिक संवेदनहीनता को ढंकने की हरसंभव कोशिश की जाती रही। आइए जनता के सच के साथ, उसकी व्यथा के साथ निर्भीकता से खड़े पत्रकार के अनुभव को हम सुनें। मौत बांटने वाले संवेदनहीन तंत्र के विरुद्ध जीवन के लिए विभिन्न स्तरों पर जारी संघर्षों में से एक संघर्ष के साझीदार बनें।

कार्यक्रम की रूपरेखा-

तारीख- 7 अक्टूबर 2017, समय- 5 बजे शाम

स्थान- राजेंद्र भवन, दीनदयाल उपाध्याय मार्ग, आईटीओ मेट्रो स्टेशन के पास, दिल्ली

एडहॉक सिस्टम पर चल रही है देश की हायर एजुकेशन

दिल्ली यूनिवर्सिटी के 45 कालेजों में 1734 पद खाली पड़े हैं। इसके लिये बकायदा 10 जून से लेकर 15 जुलाई 2017 के बीच विज्ञप्ति निकालकर बताया भी किया कि रिक्त पद भरे जायेंगे। कमोवेश हर विषय या कहें फैकल्टी के साथ रिक्त पदों का जिक्र किया गया  । यानी देश की टॉप  यूनिवर्सिटी में शुमार दिल्ली यूनिवर्सिटी का जब ये आलम है तो देश की बाकी सेन्ट्रल यूनिवर्सिटी में क्या हो सकता है ये सोचकर आपकी रुह कांप जायेगी। क्योंकि हायर एजुकेशन को लेकर  बकायदा हर राज्य में सेन्ट्रल यूनिवर्सिटी बनायी गई । और अव्वल नंबर पर जेएनयू का जिक्र बार बार बार होता है। और देश के आईआईटी, आईबीएम और एनआईटी को बेहतरीन .यूनिवर्सिटी माना जाता है । पर हालात कितने बदतर हैं जरा ये भी देख लिजिये । पहले देश के टॉप दस सेन्ट्रल यूनिवर्सिटी, जहा 70 फीसदी से ज्यादा पद रिक्त हैं। तो सिलसिलेवार समझें। सेन्ट्रल यूनिवर्सिटी ऑफ हरियाणा में 87.1 फिसदी पद रिक्त पड़े हैं तो सेन्ट्रल यूनिवर्सिटी आफ तमिलनाडु में 87.1 फिसदी। और इसी तरह सेन्ट्रल यूनिवर्सिटी आफ ओडिशा में 85 फिसदी । सेन्ट्रल यूनिवर्सिटी आफ बिहार में 84.4 फिसदी । सेन्ट्रल यूनिवर्सिटी आफ पंजाब में 80.7 फिसदी । सेन्ट्रल यूनिवर्सिटी आफ केरल में 78.6 फिसदी । सेन्ट्रल यूनिवर्सिटी आफ कश्मीर में 75.6 फिसदी । इंदिरा गांधी नेशनल  ट्राइबल यूनिवर्सिटी [ मध्यप्रेदश } में 75.4 फिसदी ।सेन्ट्रल यूनिवर्सिटी आफ हिमाचल में 73.4 फिसदी । सेन्ट्रल यूनिवर्सिटी आफ सिक्किम में 72.1 पिसदी पद रिक्त है । यूं यूनिवर्सिटी की फेहरिस्त में जेएनयू और बीएचयू में छात्रो का हंगामा तो हर किसी को याद है । सियासत भी खूब हुई ।

मसलन आप भूले नहीं होंगे जेएनयू में आजादी के नारे । पर इन नारों से इतर किसी ने नहीं पूछा कि जेएनयू में कितने पद रिक्त पडे हैं।  सरकार की रिपोर्ट कहती है 323 पद खाली पड़े हैं । भरे क्यों नहीं गये । तो कोई बोलने को तैयार नहीं । और जो बीएचयू फिल्हाल बिना वीसी के है और छात्राओं पर पुलिस ने डंडे क्यो बरसाये, ये सवाल अब भी बार बार गूंज रहा है और छात्राओं के सवाल अब भी कानो में गूंज रहे होंगे कि बीएचयू कैसे बिगड़ गया । उसे बचाना होगा तो  मदनमोहन मालवीय जी के बीएचयू का हाल ये है कि बीएचयू में 896 रिक्त पद है । यानी  सेन्ट्रल यूनिवर्सिटी के कुल 15862 पदों में से 5958 पद रिक्त पडे हैं । इसीलिये दुनियाभर में टाप यूनिवर्सिटी में अक्सर चर्चा होती है कि नौ छात्रो पर एक शिक्षक होना चाहिये । पर भारत में 23 छात्रों पर एक शिक्षक है । और देश में जिस आईआईटी, आईबीएम और  एनआईटी को बेहतरीन यूनिवर्सिटी का दर्जा दिया जाता है । वहां का हाल ये है कि  6000 से ज्याद पद रिक्त पडे है । और इसके अलावे सिर्फ देशभर के इंजीनियरिंग कालेजों को परख लें तो सरकारी आंकडे ही कहते हैं कि इंजीनिंयरिंग कालेजो के 4 लाख 2 हजार पदो में से एक लाख 22 हजार पद रिक्त पडे है । यानी मुश्किल इतनी भर नहीं है कि सरकार रिक्त पदो पर भर्ती क्यो नहीं करती मुस्किल तो ये भी है कि जिस यूजीसी के मातहत सेन्ट्रल यूनिवर्सिटी आती है । उस यूजीसी के पास कोई परमानेंट चेयरमैन तक नहीं है । एडहाक चैयरमैन है ।  वाइस चैयरमैन का पद भी खाली पडा है । फाइनेनसियल एडवाइजर ही सचिव का काम देख रहा है ।

तो हायर एजूकेशन के लिये यूजीसी से लेकर सेन्ट्रल यूनिवर्सिटी  जब एडहॉक चैयरमैन से लेकर एडहॉक प्रोफेसर पर  निर्भर होगी तो होगा क्या । हो ये रहा है कि बडी तादाद में हायर एजुकेशन के लिये देश के बच्चे दूसरे देशों में जा रहे हैं। और कल्पना कीजिये हायर एजुकेशन को लेकर देश का बजट 33323 करोड रुपये है । जबकि हर बरस दूसरे देसो में पढने जा रहे बच्चो के मां-बाप एक लाख 20 हजार करोड से ज्यादा की रकम खर्च कर रहे है । एसोचैम की रिपोर्ट कहती है 2012 में ही 6 लाख बच्चे हर बरस देओश छोड कर बाहर पढाई के लिये चले जाते थे । तो बीते पांच बरस में इसमें कितना इजाफा हो गया होगा और उनके लिये देश में हायर एजूकेशन की कोई व्यवस्था क्यों नहीं है । ये अपने आप में सवाल है ।

मीडिया कब तक बेचेगा समोसा और चाय

कारवाँ - Thu, 05/10/2017 - 15:03
बीबीसी सहित तमाम मीडिया ने पिछले दिनों एक खबर चलाई थी 'आइआइटी में समोसे बेचने वाले का बेटा'। यह क्‍या तरीका है खबरें बनाने का। कल को अमित शाह जैसे राजनीतिज्ञ इसे 'बनिये का बेटा बना आइआइटीयन'  कह सकते हैं। जब वे गांधी को बनिया कह सकते हैं तो फिर उनसे और क्‍या उम्‍मीद की जा सकती है।
यह मीडिया क्‍यों राजनीतिज्ञों की भ्रष्‍ट भाषा को अपना आधार बना रहा। यह प्रवृत्ति इधर बढती जा रही, किसी भी सफल युवा को उसके आर्थिक हालातों के लिए सार्वजनिक तौर पर शर्मिंदा करना, जैसे जरूरी हो। समोसा बेचे या चाय कोई काम मीडिया की नजर में छोटा क्‍यों हो। केवल पैसे वालों के ही बेटे क्‍यों बढें आगे।
यह जाति, पेशे, धर्म,गरीबी आदि के आधार पर बांटने की राजनीतिज्ञों की बीमारी को मीडिया क्‍यों हवा दे रहा। एक ओर गुड़,तेल,चूरन बेचने वाले रामदेव को मीडिया योगिराज बताता है जब कि रामदेव खुद अपना टर्नओवर(मुनाफा) बताते हुए खुद को मुनाफाखोर घोषित करते हैं।
यह लोकतंत्र है तो यह तो सहज होना चाहिए कि गरीब आदमी जिसकी संख्‍यां ज्‍यादा है उसको हर जगह ज्‍यादा जगह मिलनी चाहिए। खबर तो यह होनी चाहिए कि इस बार भी मुटठी भर अमीरजादों ने कब्‍जा कर लिया तमाम पदों पर।
संसद में साढे चार सौ के आसपास करोडपति हैं। तो यह सवाल बार-बार क्‍यों नहीं उठााया जाता कि भारत में अगर गरीब आ‍बादी है तो उसके प्रतिनिधि क्‍यों तमाम अमीर लोग होते जा रहे। अखि‍र इस करोडपति तंत्र को लोकतंत्र लिखने की क्‍या मजबूरी है मीडिया की।

60 बरस पहले कांग्रेस थी..60 बरस बाद बीजेपी है

केरल में बीजेपी की जनरक्षा यात्रा का  नजारा राजनीति जमीन बनाने के लिये है । या फिर राज्य में राजनीतिक हिंसा को रोकने के लिये । ये सवाल अनसुलझा सा है । क्योंकि वामपंथी कैडर और संघ के स्वयंसेवकों का टकराव कितनी हत्या एक दूसरे की कर चुका है, इसे ना तो वामपंथियों के सत्ता पाने के बाद की हिंसा से समझा जा सकता है ना ही सत्ता ना मिल पाने की जद्दोजहद में संघ परिवार के सामाजिक विस्तार से जाना जा सकता है । मसलन एक तरफ बीजेपी और संघ के स्वयंसेवकों के नाम हैं तो दूसरी तरफ सीपीएम के कैडर के लोगो के नाम। सबसे खूनी जिले कुन्नुर में एक तरफ सीपीएम कैडर के तीस लोग हैं, दूसरी तरफ संघ के स्वयंसेवकों के 31 नाम है । सभी मारे जा चुके हैं। राजनीतिक हिंसा तले मारे गये। ये सब बीते 16 बरस की राजनीतिक हिंसा का
सच है। और कुन्नूर की इस हिंसा के परे समूचे केरल का सच यही है । 2001 से 2016 तक कुल 172 राजनीतिक हत्यायें हो चुकी है । जिसमें बीजेपी-संघ के स्वयसेवको की संख्या 65 है तो सीपीएम के कैडर के  85 लोग मारे गये हैं। इसके अलावे कांग्रेस के 11 और आईयूएमएल के भी 11 कार्यकत्ता मारे गये है ।  तो राजनीतिक हिंसा किस राज्य में कितनी है इसके आंकडों के लिये सरकारी एंजेसी एनसीआरबी के आंकडो को भी देखा जा सकता है। जहां देश में पहले नंबर पर यूपी है तो केरल टाप 10 में भी नहीं आता।

लेकिन लड़ाई राजनीतिक है तो राजनीति के अक्स में ही केरल का सच समझना भी जरुरी है । क्योंकि आाजादी के बाद पहली बार लोकतंत्र की घज्जियां उड़ाते हये किसी राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाया तो वह केरल ही था और तब दिल्ली में नेहरु थे। और केरल में नंबूदरीपाद यानी  60 बरस के पहले कांग्रेस ने राजनीति दांव केरल को लेकर चला था । 60 बरस बाद केरल में वामपंथी विजयन की सत्ता है तो दिल्ली में मोदी है । तो दिल्ली की सत्ता तो काग्रेस से खिसक कर बीजेपी के पास आ गई । पर 60 बरस के दौर में बीजेपी केरल की जमीन पर राजनीतिक पैर जमा नहीं पायी । बावजूद इसके की संघ परिवार की सबसे ज्यादा शाखा आजकी तारिख में केरल में ही है । 5000 से ज्यादा शाखा। तो  बीजेपी अब वाम सत्ता को लेकर आंतक-जेहाद और हिंसक सोच से जोड़ रही है । तो अब चाहे खूनी राजनीति को लेकर सियासत हो । लेकिन 60 बरस पहले चर्च के अधिन चलने वाले स्कूल कालेजो  पर नकेल कसने का सवाल था । तब नंबूदरीपाद चाहते थे निजी स्कूलो में वेतन बेहतर हो । काम काज का वातावरण अच्छा हो ।

और इसी पर 1957 में शिक्षा विधेयक लाया गया । कैथोलिक चर्च ने विरोध कर दिया । क्योकि उसके स्कूल-कालेजो की तादाद खासी ज्यादा थी । नायर समुदाय के चैरिटेबल स्कूल-कालेज थे । तो उसने भी विरोध कर दिया । तो उस वक्त काग्रेस नायर समुदाय के लीडर मनन्त पद्ननाभा पिल्लई के पीछे खडी हो गई । और आंदोलन को उसने राजनीतिक हवा दी । हडताल, प्रदर्शन, दंगे से होते हुये  आंदोलन इतना हिसंक हो गया कि  पुलिस ने 248 जगहो पहर लाठीचार्ज किया और तीन जगहो पर गोली चला दी ।डेढ लाख प्रदर्शन कारियो को जेल में ढूसा गया । और जुलाई 1959 में जब एक गर्भवती मधुआरिन पुलिस की गोली से मारी गई तो  उसने आंदोलन की आग में धी का काम किया । और नंबूदरीपाद के मुरीद नेहरु भी तब काग्रेसी सियासत के दवाब में आ गये । वित्त मंत्री मोरारजी देसाई के विरोध और राष्ट्रपति राजेन्द्र प्रसाद के अनिच्छा भरी सहमति के वाबजूद आजाद भारत में पहली बार  चुनी हुई सरकार को बर्खास्त कर राष्ट्रपति शासन लगाने का एलान 31 जुलाई 1959 को कर दिया गया । उसके बाद काग्रेस अपने बूते तो नहीं लेकिन यूडीएफ गठबंधन के आसरे सत्ता में जरुर आई । पर सीपीएम को पूरी तरह डिगा नहीं पायी । पर संघ अपने विस्तार को अब राजनीतिक जुबान देना चाहता है तो पहली बार जनरक्षा यात्रा के दौरान मोदी सरकार के हर  मंत्री को केरल की सडक पर कदमताल करना है । जिससे मैसेज यही जाये कि सवाल सिर्फ केरल का नहीं बल्कि देश का है । तो केरल की वामपंथी सरकार अपना
किला कैसे बचायेगी या फिर किला नहीं ढहा तो जो प्रयोग नेहरु ने राष्ट्रपति शासन लगाकर किया था क्या उसी रास्ते मोदी चल निकलेगें । ये सवाल तो है ।

गुरुत्वीय तरंगें किस तरह बदलने वाली हैं हमारे ज्ञान की दुनिया

पहलू - Wed, 04/10/2017 - 19:22
सौ साल तक तो यह अटकल ही चलती रही कि इस तरह की कोई चीज संभव है या नहीं। यह आश्चर्य की बात है कि इसी दुविधा के माहौल में कुछ लोग इन तरंगों को दर्ज करने के उपकरण बनाने में भी जुटे रहे। उनके दुस्साहस का अंदाजा लगाकर आप सिर्फ उनके सामने सिर ही झुका सकते हैं। नोबेल कमिटी ने इतना ही किया है। न इससे कम, न ज्यादा। जरा सोचकर देखिए, गुरुत्वीय तरंगों को अगर तरंग माना जाए तो ये किस चीज में चलने वाली तरंगें हैं? इनके रास्ते में करोड़ों प्रकाश वर्ष की दूरी ऐसी गुजर जाती है, जहां एक छोटा से छोटा कण तक नहीं होता, दूसरी तरफ ये ब्लैक होल जैसे इलाकों से भी गुजरती हैं, जिनसे पार पाना रोशनी तक के लिए नामुमकिन होता है।

2015 में आइंस्टाइन ने जनरल थिअरी ऑफ रिलेटिविटी के तहत अपनी तरफ से अकाट्य ढंग से स्पेस-टाइम (देश-काल) संजाल की संकल्पना दी थी। एक ऐसी चीज, जो खुद में कुछ भी नहीं है, लेकिन जो हर जगह, हर चीज में, हर समय में समान रूप से फैली हुई है। भारतीय दर्शन में पंचम तत्व आकाश की व्याख्या कुछ-कुछ इसी रूप में की जाती है, लेकिन समय वहां नदारद है। आइंस्टाइन के यहां आकाश और समय आपस में जुड़े हुए हैं, एक ही अमूर्त व्यक्तित्व के अलग-अलग चेहरों की तरह। और सबसे बड़ी बात यह कि भारतीय दर्शन का आकाश एक सर्वव्यापी स्थिर तत्व है, जबकि आइंस्टाइन का देशकाल फैलता-सिकुड़ता है। यहां तक कि इसमें छेद भी हो सकता है। 
उस समय ही आइंस्टाइन का कहना था कि किसी बहुत भारी पिंड को, सूरज से कई गुना भारी पिंड को अगर बहुत ज्यादा त्वरण मिल जाए, यानी उसकी रफ्तार अचानक बहुत ज्यादा बढ़ जाए तो वह देशकाल में ऐसी विकृति ला सकता है, जो अबाध रूप से आगे बढ़ती हुई एक तरह की तरंग जैसी शक्ल ले सकती है। यह बात आम समझ से परे है। अव्वल तो उस समय तक ऐसे किसी पिंड और उसे मिल सकने वाले इतने बड़े त्वरण की कल्पना करना भी लगभग असंभव था। फिर, मान लीजिए, ऐसी अनहोनी हो ही जाए, तो स्पेस में आने वाले किसी फैलाव या सिकुड़ाव क नापा कैसे जाएगा? जिस भी पैमाने से इसे नापना होगा, क्या वह खुद भी उतना ही फैल या सिकुड़ नहीं जाएगा?
यह उधेड़बुन आखिरकार 2015 में खत्म हुई और पिछले साल, यानी 2016 में पहली बार गुरुत्वीय तरंग की शिनाख्त का प्रकाशन हुआ। पता चला कि 30 सूर्यों के आसपास- एक थोड़ा कम, एक थोड़ा ज्यादा- वजन वाले दो ब्लैक होल एक अरब तीस करोड़ प्रकाश वर्ष दूर एक-दूसरे के करीब आते हुए रोशनी की आधी रफ्तार (एक सेकंड में लगभग डेढ़ लाख किलोमीटर) से घूमने लगे और फिर आपस में मिलकर एक हो गए। इस क्रम में ऊर्जा कितनी निकली- सेकंड के भी एक बहुत छोटे हिस्से में इतनी, जितनी तीन सूर्यों को पूरा का पूरा ऊर्जा में बदल देने पर निकल सकती है। इतनी भीषण घटना से देशकाल में पैदा हुई जो थरथरी एक अरब तीस करोड़ वर्षो में चल कर धरती तक पहुंच पाई, उसका आकार इतना छोटा था कि हमारा दिमाग उसकी कल्पना भी नहीं कर सकता। यूं समझें कि सूरज से धरती तक का आकाश इसके असर में जरा देर के लिए एक परमाणु बराबर सिकुड़ गया।  
बहरहाल, शुरू में कुछ लोगों ने यह भी कहा कि संभव है, यह थरथरी किसी और हलचल से पैदा हुई हो। लेकिन पिछले डेढ़-दो वर्षों में यह सिलसिला बढ़ते-बढ़ते कुछ दिन पहले चौथी तरंग के प्रेक्षण तक पहुंचा और यह तय हो गया कि आने वाले दिनों में विज्ञान की कुछ सबसे बड़ी सनसनियां गुरुत्वीय तरंगों के जरिये रचे जाने वाले खगोलशास्त्र के ही हिस्से आने वाली हैं। लेकिन इससे खगोल विज्ञान की सेहत फर्क क्या पड़ेगा? सबसे पहला तो यह कि आर्यभट से लेकर आज तक का खगोलशास्त्र पूरी तरह रोशनी पर निर्भर है, जो खुद में बहुत भरोसेमंद जरिया नहीं है। स्पेक्ट्रोमेट्री और एक्स-रे, गामा-रे टेलिस्कोपों के साथ भी यह सीमा जुड़ी है कि कुछ मामलों में उनके नतीजे बहुत धुंधले हो जाते हैं। जैसे, ब्लैक होल को ही लें तो उससे कोई रोशनी बाहर ही नहीं आती, लिहाजा अटकलबाजी के सिवाय वहां ज्यादा कुछ करने को होता ही नहीं।
इसके विपरीत गुरुत्व तरंगें किसी भी जिंदा या मुर्दा तारे की परवाह नहीं करतें। वे खाली जगहों से भी उतनी ही आसानी से गुजरती हैं, जितनी आसानी से महाशून्य (द ग्रेट वॉयड) से। इन्हें धोखा देना या अपने दायरे में जकड़कर बाहर निकल जाने देना सृष्टि के सबसे बड़े ब्लैक होल के भी वश की बात नहीं है। कुछ वैज्ञानिक तो इतने आशावान हो चले हैं कि उन्हें लगता है, भविष्य की गुरुत्वीय तरंग वेधशालाएं सृष्ठि के आरंभ बिंदु ‘बिग बैंग’ का भी कुछ हाल-पता ले सकती हैं, जहां तक पहुंचने की उम्मीद भी किसी टेलिस्कोप से नहीं की जाती। असल में, ब्रह्मांड की बिल्कुल शुरुआती रचनाएं भी बिग बैंग से कम से कम चार लाख साल बाद की हैं। तो नोबेल प्राइज की खबरों में ही न डूबे रहिए। मजे लीजिए, नजर के सामने खुल रहे इस नए शास्त्र के, जिसे कल तक कल्पना से भी परे माना जाता था।

साहित्य की कलम से विज्ञान लिखता हूं: देवेंद्र मेवाड़ी

लेखक मंच - Wed, 04/10/2017 - 12:16

देवेंद्र मेवाड़ी

7 मार्च 1944 को नैनीताल जिले के एक दूरस्थ पर्वतीय गांव-कालाआगर में जन्‍में वरिष्ठ विज्ञान लेखक श्री देवेंद्र मेवाड़ी के पर्यावरण, कृषि, जीव-जंतु, खगोल विज्ञान और विज्ञान कथा पसंदीदा विषय हैं, जिन पर वे पिछले पांच दशकों से निरंतर लेखनी चला रहे हैं। देश की प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में उनके वैज्ञानिक विषयों पर 1500 से अधिक लेख प्रकाशित हो चुके हैं। वे अब तक 25 मौलिक पुस्तकें लिख चुके हैं जिनमें प्रमुख है- ‘विज्ञाननामा’, ‘मेरी यादों का पहाड़’ (आत्मकथात्मक संस्मरण), ‘मेरी विज्ञान डायरी’ (भाग-1), ‘मेरी विज्ञान डायरी’ (भाग-2), ‘मेरी प्रिय विज्ञान कथाएं’, ‘भविष्य’ तथा ‘कोख’ (विज्ञान कथा संग्रह), ‘नाटक-नाटक में विज्ञान’, ‘विज्ञान की दुनिया’, ‘विज्ञान और हम’, ‘सौरमंडल की सैर’, ‘विज्ञान बारहमासा’, ‘विज्ञान प्रसंग’, ‘सूरज के आंगन में’, ‘फसलें कहें कहानी’, ‘विज्ञान जिनका ऋणी है’ (भाग-1 तथा भाग-2), ‘अनोखा सौरमंडल’, ‘पशुओं की प्यारी दुनिया’, ‘हॉर्मोन और हम’। प्रस्तुत है मेवाड़ी जी के साथ हुई मनीष मोहन गोरे की बातचीत के अंश-    

उत्तराखंड के दूर-दराज के गांव में जन्मे एक बालक से प्रख्यात विज्ञान लेखक देवेंद्र मेवाड़ी बनने का सफर किस तरह तय किया?

आज पीछे पलट कर देखता हूं मनीष जी, तो मुझे अपनी इस पचास वर्ष लंबी यात्रा की राह साफ दिखाई देती है जो मुझे फिर से पहाड़ के मेरे गांव और मेरे बचपन के दिनों में पहुंचा देती है। उत्तराखंड के नैनीताल जिले में पहाड़ के जिस गांव कालाआगर में मेरा जन्म हुआ, वह तब खेतों की हरियाली और घने जगलों से घिरा हुआ था। उन घने जंगलों में असंख्य वन्य जीव होते थे। गांव में चिड़ियां चहचहाती रहती थीं। कितनी तरह की रंग-बिरंगी तितलियां और कीट-पतंगे होते थे। हमारे गांव के सिरमौर जंगल में वसंत आते ही बुरांश के सुंदर लाल फूल खिल जाते थे तो खेतों के आसपास पीले रंग की प्यूली के फूल मन को लुभाने लगते थे। हम नीचे घाटियों से उठता हुआ कोहरा देख सकते थे जो पेड़-पौधों और खेतों से होकर हमसे मिलने के लिए भागता हुआ ऊपर चला आता था। वहां प्रकृति थी और हमारी तमाम जिज्ञासाओं के जवाब प्रकृति ही देती थी। हम बीजों को उगते, फूलों को खिलते, बादलों को उमड़-घुमड़ कर बरसते हुए देख सकते थे। रात में लाखों-लाख तारों भरा आसमान हमारा मन मोह लेता था। आज याद आता है कि कितना कुछ जानना चाहता था मैं तब अपने आसपास की दुनिया के बारे में। मेरे भीतर बैठा वही बालक आज अपने विज्ञान लेखन के जरिए प्रकृति की किताब के बारे में आमजन को बताने की विनम्र कोशिश कर रहा है।

वनस्पति विज्ञान में एम.एस-सी., हिंदी साहित्य में एम.ए. और जनसंचार में उपाधि हासिल करने के बाद आप विज्ञान लेखन की ओर कैसे उन्मुख हुए?

आपको मैं यहां बताना चाहता हूं कि इस तरह प्रकृति की किताब पढ़ते-पढ़ते मैं अपने गांव के सामने के दूसरे पहाड़ पर गोविंद बल्लभ पंत इंटर कालेज मैं पहुंच गया और वहां भी प्रकृति के बीच रह कर विज्ञान के विषयों के साथ इंटर की परीक्षा पास की। पेड़-पौधों और वन्य जीवों से बहुत प्यार था, इसलिए नैनीताल में उच्च शिक्षा के दौरान वनस्पति विज्ञान, प्राणि विज्ञान और रसायन विज्ञान जैसे विषय चुने। फिर वनस्पति विज्ञान में एम.एस-सी की। उन्हीं दिनों की बात है-  मैं कहानियां लिखने लगा था। मेरी कहानियां कहानी, माध्यम, उत्कर्ष आदि पत्रिकाओं में छपने लगी थीं। विज्ञान मुझे बहुत रोचक लगता था और मेरा मन करता था कि मैं विज्ञान की वे तमाम बातें अपने साथियों और अन्य लोगों को बताऊं। इसलिए मैंने विज्ञान पर लिखना शुरू किया। मेरा पहला लेख सन् 1965 में ‘कुमाऊं और शंकुधारी’ इलाहाबाद की ‘विज्ञान’ पत्रिका में और दो लेख- ‘जानि शरद ऋतु खंजन आए’ तथा ‘शीत निष्क्रियता’ ‘विज्ञान जगत’ मासिक पत्रिका में प्रकाशित हुए। ‘विज्ञान जगत’ के संपादक प्रो. आर.डी. विद्यार्थी ने मेरे पत्र के उत्तर में लिखा था, “लिखते रहना, कौन जाने किसी दिन तुम स्वयं एक विज्ञान लेखक बनो।” उनके इस वाक्य ने मुझमें विज्ञान लेखन की लौ जगा दी और मैं विज्ञान लेखक बन गया।

50 वर्ष लंबी अबाध विज्ञान लेखन यात्रा के दौरान आपके जीवन में अनेक पड़ाव आये होंगे और आपने संघर्ष किया होगा। कभी ऐसा महसूस नहीं हुआ कि जीवन के तमाम झंझावातों और नौकरी-चाकरी के बीच विज्ञान लेखन नहीं हो पा रहा है और इसे छोड़ ही देते हैं।

मैंने तय कर लिया था कि मुझे जीवन में विज्ञान लेखक बनना है, परिवार के भरण-पोषण के लिए मुझे भले ही किसी भी तरह की नौकरी करनी पड़े। विज्ञान लेखक बनने के मेरे संकल्प ने मुझे निरंतर विज्ञान लेखन के लिए प्रेरित किया। मुझे पहली नौकरी भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (पूसा इंस्टीट्यूट, नई दिल्ली) में मिली। वहां मैंने तीन वर्ष तक मक्का की फसल पर शोध कार्य किया। उस बीच मैंने मक्का पर कई लेख लिखे। उसके बाद पंतनगर कृषि विश्वविद्यालय के आमंत्रण पर मैं पूसा इंस्टीट्यूट छोड़ कर पंतनगर चला गया। वहां मैंने तेरह वर्षों तक कृषि की मासिक पत्रिका ‘किसान भारती’ का संपादन किया। इसके अलावा पाठ्य-पुस्तकों के अनुवाद और पत्रकारिता शिक्षण से भी जुड़ा रहा। वहां से मैं देश के सबसे बड़े राष्ट्रीयकृत बैंक पंजाब नैशनल बैंक में जनसंपर्क तथा प्रचार की जिम्मेदारी संभालने के लिए चला गया। वहां 22 वर्ष रहा, चीफ (जनसंपर्क) के रूप में अवकाश प्राप्त करने के बाद एक वर्ष तक विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी विभाग (भारत सरकार) की संस्था विज्ञान प्रसार में फैलो रहा। यह सब इसलिए बता रहा हूं कि नौकरी चाहे कोई भी रही हो, मैं निरंतर विज्ञान लेखन करता रहा क्योंकि यही मेरे जीवन का लक्ष्य था। इन तमाम वर्षों में देश की अग्रणी पत्र-पत्रिकाओं के लिए लगातार लिखता रहा। प्रिंट के अलावा, रेडियो, टेलीविजन तथा फिल्म जैसे माध्यमों के लिए भी लिखा। मैंने हर नौकरी पूरी ईमानदारी और मेहनत से की तथा नौकरी के काम को निर्धारित समय से भी अधिक समय दिया। लेकिन नौकरी के बाद का समय तथा छुट्टियों के दिन मेरे अपने होते थे जिनका मैंने पूरा उपयोग विज्ञान लेखन के लिए किया। एक बात और, विज्ञान लेखन मुझे सदा नौकरी के तनावों से मुक्त होने का सुअवसर देता रहा। बल्कि यों कहूं कि दवा का काम करके मुझे तनाव से मुक्त करता रहा।

आपके लिए लोकप्रिय विज्ञान लेखन के क्या मायने हैं? विज्ञान लेखन करते हुए आपके मन में क्या लक्ष्य रहते हैं?

मेरे लिए लोकप्रिय विज्ञान लेखन का अर्थ यह है कि तकनीकी भाषा में लिखा गया विज्ञान का ज्ञान ‘खग ही जाने खग की भाषा’ न बना रहे। वह वैज्ञानिकों और विज्ञान के शिक्षकों तथा विद्यार्थियों तक ही सीमित न रहे, बल्कि आम जन तक पहुंच सके। यह तभी हो सकता है जब विज्ञान के ज्ञान को सरल-सहज भाषा, रोचक शैली और विविध विधाओं में लिखा जाए। अपनी  लेखन यात्रा में मेरा यही लक्ष्य रहा है।

आपके विज्ञान लेखन की एक अलग पहचान है। इस मुकाम को कैसे हासिल किया आपने?

आपकी यह बात सुन कर मुझे बहुत खुशी हो रही है। असल में मैं यह सोचता रहता था कि मेरे लेखन की एक अलग पहचान बने। मेरी रचना का अगर कोई भी अंश किसी पाठक को मिल जाए तो वह पहचान ले कि यह तो लगता है देवेंद्र मेवाड़ी ने लिखा होगा। इसका सबूत मुझे कई वर्ष पहले मिला था जब पूर्वी उत्तर प्रदेश के एक दूरस्थ इलाके से किसी सीता बहिन का पत्र मिला। उनके दो बच्चे एक पत्रिका के पन्ने से खेल रहे थे जिसे उनके हाथ से लेकर सीता ने पढ़ा। उसमें लेखक का नाम नहीं था। उसने पत्र में लिखा कि वह पन्ना पढ़ कर मैं समझ गई थी कि वह सब आपने ही लिखा होगा। वह मेरी रचनाएं पढ़ती रही थी इसलिए उसने मेरे लिखने का अंदाज बखूबी समझ लिया था। असल में अपने लेखन को एक अलग पहचान देने के लिए मैंने उसे विविध विधाओं में लिखा और उसमें साहित्य की सरसता भी भरी। इसीलिए मैं कहता हूं कि मैं साहित्य की कलम से विज्ञान लिखता हूं। अपने इस प्रयास में मैं हरसंभव कोशिश करता हूं कि विज्ञान की जो बात मैं पाठकों को बताने जा रहा हूं, वह ऐसी भाषा और शैली में हो कि वे उसे अच्छी तरह समझ लें और उसका आनंद उठाएं।

 साहित्य की कलम से विज्ञान लेखन सचमुच प्रेरक पंक्ति है युवा विज्ञान लेखकों के लिए। आपने 13 वर्ष तक कृषि पत्रिका किसान भारतीका सम्पादन कार्य भी किया है। इस अनुभव ने आपमें किस प्रकार का संस्कार भरा?

वे तेरह वर्ष मेरे लिए लेखन और संपादन की परीक्षा के वर्ष थे। पत्रिका किसानों की थी, इसलिए मुझे विज्ञान की जानकारी ऐसी भाषा-शैली में उन तक पहुंचानी थी जिसे वे आसानी से समझ सकें। उस दौरान मुझे तरह-तरह की शैलियों में लिखने का मौका मिला। और, यह तो सच है कि किसान विज्ञान की जानकारी का लाभ तभी उठाते जब उन्हें वह जानकारी सरल-सहज भाषा में मिलती। मैंने वही किया।

आपको ऐसा नहीं लगता कि इतर क्षेत्र में रहने से मन में जो तड़प उठती है, वही व्यक्ति से उसके पसंदीदा क्षेत्र में उल्लेखनीय काम करवाती है।

लगता है, बशर्ते यह हर क्षण याद रहे कि जीवन में मुझे क्या करना है, क्या बनना है। जो चाहा, वह सदा मिलता नहीं। इसलिए जो मिलता है, उसमें समर्पित रूप से काम करते हुए शेष समय में वह किया जा सकता है जो जीवन का लक्ष्य है। इतर क्षेत्र में काम करने पर मन में वह तड़प बार-बार उठती है। वह काम पिछड़ने पर हूक भी उठती है।

आपके लेखन के आरम्भिक दौर में बड़ी पत्रिकाएं थीं, मनीषी संपादक थे, आपने उन पत्रिकाओं में खूब लिखा भी। लेकिन, बाद में वे पत्रिकाएं कम हो गईं, अखबारों में विज्ञान कम हो गया। तब कैसे आपने अपना विज्ञान लेखन जारी रखा?

आप ठीक कह रहे हैं। मेरे लेखन के प्रारंभिक दौर में धर्मयुग, साप्ताहिक हिंदुस्तान, नवनीत, कादंबिनी और दिनमान जैसी बड़ी प्रसार संख्या वाली मासिक पत्रिकाएं तो थीं ही, सभी अखबार भी रविवासरीय पत्रिका प्रकाशित किया करते थे जिनमें कथा-कहानी, कविता के साथ-साथ विज्ञान भी छपता था। डा. धर्मवीर भारती, मनोहर श्याम जोशी, नारायण दत्त, अज्ञेय और रघुवीर सहाय जैसे मनीषी संपादक भी थे। मेरा सौभाग्य है कि उन मनीषी संपादकों ने मेरे विज्ञान लेखन को न केवल प्रोत्साहित किया, बल्कि उसे संवारा भी। वैसी पत्रिकाओं की कमी हुई तो मैं समाचारपत्रों के रविवारीय संस्करणों और संपादकीय पृष्ठ पर विज्ञान लिखता रहा। मैंने रेडियो के लिए भी विज्ञान खूब लिखा। बाद में टेलीविजन आ जाने पर उसके लिए भी कार्यक्रमों के आलेख लिखे और प्रस्तुत किए।

आपने रेडियो-टेलीविजन का जिक्र किया। इन इलैक्ट्रानिक माध्यमों के लिए आपने लेखन की शुरूआत कैसे की?

वैज्ञानिक विषयों पर रेडियो वार्ताओं से। आकाशवाणी के दिल्ली और लखनऊ केन्द्रों से विज्ञान के विविध विषयों पर मेरी बड़ी संख्या में वार्ताएं प्रसारित हुईं। मुझे याद है, उस दिन जब पूर्व प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी हमारे देश के प्रथम अंतरिक्षयात्री राकेश शर्मा से सीधे अंतरिक्ष में बात करने वाली थीं तो उस वक्त मैं लखनऊ केन्द्र से ‘अंतरिक्ष में भारत का योगदान’ विषय पर अपनी वार्ता दे रहा था। वार्ता के अंत में मेरे पास एक पर्ची भेज कर श्रोताओं के लिए यह घोषणा करने के लिए कहा गया कि ‘अभी कुछ ही क्षणों के बाद प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी हमारे देश के प्रथम अंतरिक्ष यात्री राकेश शर्मा से बातचीत करेंगी। कृपया प्रतीक्षा करें।’ मैंने यह घोषणा की। और, तभी लिंक जुड़ गया और प्रधानमंत्री की राकेश शर्मा से बातचीत शुरू हो गई। वे मेरे लिए रेडियो प्रसारण के यादगार क्षण थे। दिल्ली केन्द्र से मैंने लाइव प्रसारण में वर्ष 1995 के सूर्यग्रहण के विशेषज्ञ की हैसियत से आंखों देखा हाल और ग्रहण से जुड़े वैज्ञानिक तथ्य बताए। ब्रिज-इन और फोन-इन कार्यक्रमों में भाग लिया। विज्ञान पत्रिका कार्यक्रम की प्रस्तुति की और ‘मानव का विकास’ सहित अनेक विज्ञान धारावाहिकों के लिए वर्षों तक पटकथाएं लिखीं। इसी तरह दूरदर्शन, लखनऊ के ‘चैपाल’ कार्यक्रम में नियमित ‘नई बातरू नया चलन’ की धारावाहिक प्रस्तुति दी। दिल्ली आकर ‘विज्ञान दर्पण’ के पचासों एपिसोड लिखे। प्रख्यात फिल्मकार अरुण कौल की संगत में ‘धूमकेतु’ वृत्तचित्र बनाया।

संचार के मुद्रण स्वरूपों की जगह डिजिटल मीडिया ने समाज के लगभग हर वर्ग को अपनी ओर आकर्षित किया और अपना उपयोगकर्ता बनाया है। यह एक बड़ी घटना है। इसके चलते बच्चों और युवाओं में किताबी पठनीयता घटी है और फेसबुक, वाट्सएप जैसे डिजिटल मंचों पर उपस्थिति बढ़ी है। इन मंचों का सहारा लेकर इन्हें लोकप्रिय विज्ञान या ललित विज्ञान साहित्य से कैसे जोड़ा जा सकता है?

यह बात सही है कि विगत कुछ वर्षों में डिजिटल माध्यम की लोकप्रियता बढ़ी है। लेकिन, मैं यह भी मानता हूं कि किताब का अपना अस्तित्व है और वह सदा बना रहेगा। जिन्हें किताब पढ़नी है, वे किताबें पढ़ रहे हैं। हां, हमें समय की जरूरत के अनुसार डिजिटल मीडिया का भी विज्ञान लेखन के लिए भरपूर उपयोग करना चाहिए। मैंने भी कुछ वर्ष पहले से फेसबुक और अपने ब्लाग पर विज्ञान की बातें लिखना शुरू किया। आभासी दुनिया के साथियों ने मेरे इस लेखन में रुचि ली और उनकी संख्या बढ़ती गई। यहां मैं आपको यह भी बता दूं कि अनेक साहित्यकार और साहित्य प्रेमी भी मेरे विज्ञान लेखन के नियमित पाठक हैं। इस तरह मैं विज्ञान और साहित्य के बीच एक सेतु बनने की भी हर संभव कोशिश कर रहा हूं। डिजिटल माध्यम के लाखों-लाख पाठक हैं। हमें इस माध्यम का भरपूर उपयोग करके उन पाठकों तक विज्ञान का ज्ञान पहुंचाने का निरंतर प्रयास करना चाहिए।

सोशल मीडिया के विभिन्न मंचों पर विज्ञान लेखन का कितना प्रभाव है?

सोशल मीडिया विज्ञान की जागरूकता बढ़ाने के लिए एक सशक्त माध्यम के रूप में काम आ सकता है। इस दिशा में कुछ विज्ञान लेखक समर्पित रूप से काम भी कर रहे हैं और उनके ब्लाग सामयिक वैज्ञानिक जानकारी पाठकों को दे रहे हैं। ‘विज्ञान विश्व’ और ‘साइंटिफिक वर्ल्ड’ काफी अच्छे ब्लाग हैं। लेकिन, विज्ञान लेखकों को इस विधा का अधिक से अधिक उपयोग करना चाहिए।

विज्ञान डायरी, संस्मरण जैसी अनोखी साहित्यिक विधाओं को आपने विज्ञान लेखन से जोड़कर काम किया है। इस दिशा में काम करने की प्रेरणा आपको कहां से मिली?

यह जानकर खुशी हुई कि आपका ध्यान इस ओर गया है। केवल लेखों के रूप में विज्ञान प्रस्तुत करने की एकरसता को तोड़ने के लिए मैंने डायरी के रूप में विज्ञान लिखना शुरू किया। इस विधा में मेरी दो पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। डायरी के रूप में विज्ञान लिखने पर उसमें एक व्यक्तिगत लगाव और अधिक विश्वसनीयता आ जाती है। पाठक उसे लेखक के निजी बयान के रूप में लेता है। इसी तरह मैंने संस्मरण की विधा में निकट से देखे विज्ञान लेखकों के बारे में लिखा है जिनमें उनका पूरा व्यक्तित्व और कृतित्व उजागर होता है। इसके अलावा मैंने नाट्य विधा में भी काफी विज्ञान लिखा है और शीघ्र ही मेरे रेडियो नाटकों की पुस्तक ‘नाटक-नाटक में विज्ञान’ प्रकाशित होने जा रही है। विगत दो वर्षों से मैं स्कूल-कालेजों और विश्वविद्यालयों में जाकर विज्ञान की किस्सागोई यानी स्टोरी टेंलिंग भी कर रहा हूं। अब तक पांच हजार से अधिक बच्चों को मैं सौरमंडल की सैर कराने के साथ-साथ विज्ञान की कहानियां भी सुना चुका हूं। जहां तक प्रेरणा का सवाल है, वह तो अंतःप्रेरणा ही है। जब मन कुछ नया करने के लिए बेचैन होता है तो नई विधा के रूप में रास्ता सामने दिखाई देने लगता है।

अनुवाद एक महत्वपूर्ण काम है। इसमें दो भाषाओं का ज्ञान आवश्यक है, लेकिन जब वैज्ञानिक साहित्य के अनुवाद की बात आती है तो इसमें विज्ञान की जानकारी का तीसरा आयाम जुड़ जाता है। मेरी चिंता है कि विज्ञान साहित्य के अनुवादकों को कैसे तैयार किया जाना चाहिए?

बहुत महत्वपूर्ण मुद्दा उठाया आपने। अनुवाद एक बेहद गंभीर कार्य है। वैज्ञानिक साहित्य का अनुवाद करते समय अनुवादक की जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है। भारत में हिंदी सहित विभिन्न भारतीय भाषाओं में वैज्ञानिक साहित्य के अनुवाद की स्थिति संतोषजनक नहीं कही जा सकती। इस ओर ध्यान दिए जाने की जरूरत है। यहां पर विज्ञान संचार की सरकारी और गैर सरकारी एजेंसियों की जिम्मेदारी बढ़ जाती है।

जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण जैसी मौजूदा सार्वभौमिक समस्याओं के लिहाज से विज्ञान लेखकों और विज्ञान संपादकों के दायित्व को आप किस तरह देखते हैं?

जलवायु परिवर्तन और प्रदूषण जैसे खतरों से जन सामान्य को आगाह करने में विज्ञान लेखक महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकते हैं। विज्ञान संपादक ऐसे जानकारीपूर्ण विज्ञान लेखों को लिखवाने और उन्हें प्रकाशित करने में अहम योगदान दे सकते हैं।

वैज्ञानिक साहित्य सृजन में मानवीय पहलुओं और मूल्यों का संपोषण कितना अहम है? पर्यावरण संरक्षण और वैज्ञानिक शोध की दिशा में इनकी भूमिका को आप किस प्रकार महसूस करते हैं?

विज्ञान और प्रौद्योगिकी को मनुष्य के जीवन तथा समाज से अलग करके नहीं देखा जा सकता है। ये हमारे जीवन और समाज से अभिन्न रूप से जुड़े हुए विषय हैं। वहीं दूसरी ओर यह भी उतना ही सच है कि वैज्ञानिक अनुसंधान के दौरान यह सुनिश्चित किया जाए कि इससे पर्यावरण और जीव-जंतुओं के अस्तित्व पर संकट न आने पाए।

विज्ञान लेखन की कौन-कौन सी सशक्त विधाओं में काम करने की संभावना है?

लेख और फीचर लेखन के अलावा ललित विज्ञान भी लिखा जाना चाहिए ताकि लोग उस सरस विज्ञान को पढ़ने के लिए लालायित हों। इससे पाठकों की संख्या तो बढ़ेगी ही, वैज्ञानिक जागरूकता का भी प्रसार होगा। इधर मैं यात्रावृत्तांतों के रूप में विज्ञान लिख रहा हूं जिसे आभासी दुनिया के साथी काफी पसंद कर रहे हैं। इस तरह यात्रा के बहाने यात्रा के दौरान देखी गई तमाम चीजों से जुड़े विज्ञान की जानकारी भी पाठकों को मिल जाती है। विज्ञान नाटकों के क्षेत्र में भी लिखने की बहुत गुंजाइश है। हिंदी में मंचन के लिए स्तरीय विज्ञान नाटकों की बहुत कमी है, इस दिशा में भी काम किया जाना चाहिए। विज्ञान कथाओं का बहुत अभाव है, इसलिए इस विधा में भी लिखने की बहुत संभावना है। लेकिन, विज्ञान कथा लिखते समय यह जरूर ध्यान रखना चाहिए कि वह विज्ञान कथा ही है और कहानी की परिभाषा के भीतर आती है।

अपनी भावी योजनाओं के बारे में बताएं।

मैं फिलहाल विज्ञान की विविध विधाओं में निरंतर विज्ञान लेखन कर रहा हूं और यह क्रम भविष्य में भी जारी रहेगा। ‘मेरी विज्ञान डायरी भाग-3‘ को पुस्तक रूप में तैयार कर रहा हूं और अपने यात्रावृत्तातों पर आधारित किताब की पांडुलिपि को भी संजो रहा हूं। विज्ञान कथाएं और उपन्यास लिखने का भी मन है। सोचता हूं, विज्ञान पर कुछ ऐसा लिखूं जिसे लोग कथा-कहानी की जैसी रोचकता के साथ पढ़ सकें। कुछ योजनाएं और भी हैं, जो पूरी हो जाने के बाद विश्वास है पाठकों को अपनी ओर आकर्षित करेंगी।

युवा विज्ञान लेखकों के लिए आपके क्या सन्देश हैं?

विज्ञान लेखन की अपार संभावनाएं हैं और सच पूछिए तो भविष्य विज्ञान लेखन का है, क्योंकि दुनिया में विज्ञान का प्रभाव लगातार बढ़ता जा रहा है। नई पीढ़ी को स्वयं जागरूक होने के लिए और समाज में वैज्ञानिक जागरूकता फैलाने के लिए, विज्ञान लेखन के क्षेत्र में आगे आना चाहिए। इस तरह वे समाज में वैज्ञानिक चेतना जगाने का उत्तरदायित्व पूरा कर सकेंगे। आज जनसंचार माध्यमों में और विशेष रूप से अनेक निजी चैनलों में जिस तरह भूत-प्रेत, आत्माओं, इच्छाधारी नाग-नागिनों और आत्माओं का महिमामंडन किया जा रहा है, उससे आगे बढ़ते समाज को बहुत नुकसान हो रहा है। विकसित देशों में जहां युवा पीढ़ी समंदरों के गर्भ में झांकने, पृथ्वी के अनजाने रहस्यों को बूझने और अंतरिक्ष में सौरमंडल तथा उसके पार ब्रह्मांड की अबूझ पहेलियों को सुलझाने के सपने देख रही है, वहां हमारी युवा पीढ़ी को चैनलों पर यह सब दिखाया जा रहा है। इसका प्रतिगामी प्रभाव पड़ेगा। यह दुखद स्थिति है। इसलिए नई पीढ़ी को मशाले-राह बन कर सामने आना चाहिए। कल की दुनिया वह होगी जिसे आज की नई पीढ़ी बनाएगी।

न्याय और सुरक्षा मांगती बेटियों को लाठी से क्यों मारा ?

जंतर-मंतर - Wed, 04/10/2017 - 08:54

( 28 सितम्बर को लिखा गया लेख. अब वाइस चांसलर ,जी सी त्रिपाठी, "निजी कारण" से छुट्टी पर जाने को  मजबूर हो चुके हैं उर्फ़ औकात में आ गए हैं ) शेष नारायण सिंह   
काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से जो सन्देश आया है वह बहुत ही डरावना है . वहां की घटनाओं  से पुरुष आधिपत्य की  मानसिकता के जो संकेत आये हैं उनकी परतों की व्याख्या करने से जो तस्वीर उभरती है वह बहुत ही खतरनाक है . काशी का सन्देश यह है कि अगर आपने देश के सबसे बड़े विश्वविद्यालय में  अपनी  बेटी को पढने के लिए भेजा है तो आपको हमेशा चिंतित रहना चाहिए . यह भी संदेश आया है कि अपनी कमियाँ छुपाने के लिए बीएचयू का कुलपति किसी अन्य बहुत ही आदरणीय विश्वविद्यालय को अपमानित करने की कोशिश  कर सकता है . जब कुल्पति , जी सी त्रिपाठी ने  कहा कि जेएनयू कल्चर की एक मजिस्ट्रेट ने उनको बदनाम करने की कोशिश की तो वे अपनी हीनभावना पर परदा डालने की कोशिश कर रहे थे. उनको मालूम है कि जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में पढने लडकियों के माता पिता बेटी को वहां दाखिल  करवा कर जब लौटते हैं तो वह जानते हैं कि वे अपनी बेटी को देश की एक बेहतरीन शिक्षा  संस्था में  दाखिल करवा कर आये हैं . जेएनयू  का कैम्पस माँ की गोद की तरह सुरक्षित माना जाता है .  इसलिए बीएचयू के कुलपति जी ने यह  देश को यह सन्देश भी साफ़ साफ़ दे दिया कि वे अपने दिमाग की  गंदगी को ढकने के लिये किसी के पर दरवाज़े कीचड फेंकने में संकोच नहीं करेंगे .
आखिर काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की घटना क्या थी . हुआ यह था कि  छात्रावासों में रहने वाली लडकियां विश्वविद्यालय के कुलपति से मांग कर रही थीं, कि कैम्पस के पुरुष छात्रों और बाहरी तत्वों से लगातार होने वाली छेडछाड की घटनाओं से उनको बचाएं.  मौजूदा संकट की शुरुआत एक घटना से हुयी . किसी मोटरसाइकिल सवार लफंगे ने एक लडकी के साथ अभद्र आचरण किया . वह  लडकी अपनी शिकायत लेकर विश्वविद्यालय के चीफ प्राक्टर के पास गयी  . चीफ प्राक्टर और छात्रा के बीच बातचीत का जो विवरण सामने आया है वह हैरतंगेज़ है, सभ्य समाज को परेशान कर देने वाला है . छात्रा ने मीडिया को बताया है कि उस  दुष्टात्मा ने शिकायत सुनने के बाद उस लडकी  से कहा कि अब आप अपने हास्टल जायेंगी कि  रेप होने तक यहीं इंतजार करेंगीं. शूकर पुरुष मानसिकता के हिसाब से भी, यह कार्य निन्दनीय है . इसके बाद वह लडकी वापस आयी ,अपनी सहेलियों से ज़िक्र किया और कोई रास्ता न  देख कर अपने को अनाकर्षक बनाने के काम में जुट गयी . लडकी ने अपना सर मुंडवा लिया . मीडिया को उसने बताया कि उसने ऐसा  इसलिए किया जिससे कि वह बदसूरत लग सके जिससे लफंगों का ध्यान उसकी तरफ न  पड़े. बाद में लड़कियों ने चीफ प्राक्टर के नाम एक अर्जी लिखी और उनके पास कई लडकियां गईं . इस बार भी अपनी दम्भी मानसिकता  का परिचय देते हुए उन अधिकारी ने लड़कियों को अपमानित किया और भगा दिया . यहाँ यह समझ लेना ज़रूरी है कि  प्राक्टर कोई सुरक्षा बलों से अवकाशप्राप्त अधिकारी नहीं होता ,वह वास्तव में एक सीनियर शिक्षक होता है जो सुरक्षातंत्र के लोगों से संपर्क में रहता है और अपने बच्चों के कल्याण के लिए लगातार प्रयास करता रहता  है. यह लडकी जिसको उसने रेप की  धमकी दी थी वह भी उसकी बच्ची ही मानी जाती है. लड़कियों ने जो चिट्ठी लिखी वह बहुत ही साधारण मांग वाली थी. लड़कियों की चिट्ठी में केवल यह गुहार लगाई गयी  थी कि उनको  कैम्पस में आने वाले पुरुषों की छेड़छाड़ से  बचाएं . कोई भी सभ्य पुरुष इसके लिए उन लड़कियों को आश्वस्त कर देता लेकिन काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के चीफ प्राक्टर साहब ने उनकी चिट्ठी को नज़रंदाज़ कर दिया .  लडकियां काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के कुलपति महोदय से मिलने  गयीं लेकिन उन्होने मिलने से इनकार कर दिया. लडकियां धरने पर बैठ गईं फिर भी वीसी साहब मिलने से इनकार करते रहे. उसके बाद जो हुआ उसको पूरी दुनिया जानती है. इस सारे प्रकरण में मुख्य धारा के मीडिया के एक वर्ग की प्रवृत्ति बहुत ही अजीब रही . काशी हिन्दू विश्वविद्यालय वाराणसी में है . वहां  कई राष्ट्रीय अखबारों के संस्करण निकलते हैं अधिकतर ने सही रिपोर्टिंग नहीं की. वैकल्पिक  मीडिया के ज़रिये ख़बरें बाहर आईं और तब  बीएचयू के अधिकारियों को लगा कि मीडिया को मैनेज करने के बावजूद भी अत्याचार की  खबर को दबाया नहीं जा सका .एक सच्चाई और भी है. . काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में लडकियों को वह सम्मान कभी नहीं मिला को देश के अन्य विश्वविद्यालयों में लड़कियों को मिलता  है लेकिन एक बात देखी गयी थी कि अपनी  उग्र  पुरुषसत्तावादी मानसिकता के बावजूद  बीएचयू में पुरुष छात्र लड़कियों की रक्षा में खड़े होते रहे हैं . पुराने छात्र नेता ,चंचल ने यूनियन के अध्यक्ष पद का चुनाव लड़कियों की मर्यादा और खुदमुख्तारी को मुद्दा बनाकर लड़ा था और जीते थे. इस बार ऐसा नहीं  हुआ . बहुत बाद में आम छात्र नेताओं ने मामले  में दखल देना शुरू किया .जब पता लग गया कि केंद्र सरकार की सत्ताधारी पार्टी के सहयोगी कुलपति को कटघरे में खड़ा किया जा सकता है तब कुलपति की पार्टी से सम्बद्ध छात्र उसके बचाव में आ गए और अन्य छात्र उसके विरोध में मोर्चा सम्भालने में जुट गए. उसके बाद जो हुआ उसको अब सारी दुनिया जानती है. हालांकि मुख्यधारा के अखबार  बहुत बाद तक अपनी मुसीबतों के लिए लड़ रही छात्राओं को उपद्रवी ही बताते रहे लेकिन उनकी बात को कोई भी मान नहीं  रहा था. बीएचयू के महिला महाविद्यालय में पुलिस के हमले के बाद उत्तर प्रदेश सरकार भी हरकत में आयी और वाराणसी के कमिश्नर को जांच करने को कहा . कमिश्नर नितिन गोकर्ण ने जांच के बाद चीफ सेक्रेटरी को रिपोर्ट दे दी है  जिसमें उन्होंने बवाल के लिए बीएचयू प्रशासन को दोषी ठहराया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि बीएचयू प्रशासन ने छेड़छाड़ के मुद्दे पर गंभीरता नहीं दिखाई, न ही समय पर उचित कार्रवाई की। प्राथमिक जांच रिपोर्ट में गंभीर आरोप बीएचयू प्रशासन पर लगे . रिपोर्ट में कहा गया है कि पीड़ित छात्राओं की शिकायत  कुलपति त्रिपाठी ने नहीं सुनी. प्राक्टर पहले ही छात्राओं को  टरका चुका था. उसके बाद छेड़खानी से तंग आ चुकी छत्राओं ने धरने का रास्ता अपनाने का फैसला किया . इस जांच के  सामने आने के बाद बीएचयू प्रशासन सक्रिय हुआ. लेकिन उसके पहले तक जो हो चुका था , वह किसी भी विश्वविद्यालय के लिए कलंक की बात है . पुलिस की पाशविकता की जो  तस्वीर सामने आयी है वह बहुत ही हृदय विदारक है . अपनी  पुरुषसत्तावादी मानसिकता के लिए कुख्यात उत्तर प्रदेश पुलिस ने बीएचयू  कैम्पस  में बहुत ही गैरजिम्मेदार काम किया. एक तो महिला महाविद्यालय में देर रात को हमला करने जा रही फ़ोर्स में महिला सिपाहियों को शामिल नहीं किया . पुरुष सिपाहियों की फ़ोर्स ने लगभग आधी रात को  लड़कियों के छात्रालय पर हमला किया और महिला प्रोफेसरों को भी नहीं छोड़ा . बीएचयू की एक सहायक प्रोफ़ेसर ने बताया कि ," जब पुलिस लाठियां चला  रही थी तो एक छात्रा ज़मीन पर गिर गयी. मैं उस लडकी को बचाने गयी तो मैं भी पुलिस के हमले का शिकार हो गयी . मैंने उनसे  विनती की कि मैं विश्वविद्यालय की  टीचर हूँ लेकिन वे लोग  लाठियां चलाते ही रहे . उस समय रात के साढे ग्यारह बजे थे " पूरे मामले में  बीएचयू के कुलपति का रुख सबसे गैज़िम्मेदार था . घटना के बाद वे दिल्ली आये और एक  टेलिविज़न ने उनका इंटरव्यू किया . उस मीडिया संपर्क के बाद उनका जो स्वरुप देखा उससे साफ़ समझ में आ गया कि कैम्पस में उन्होंने जो कुछ किया वह तो बहुत कम था . वे अगर अपनी पर उतर आते तो वे और भी  बहुत कुछ कर सकते थे . टेलिविज़न चैनल में कुलपति गिरीश चन्द्र त्रिपाठी  को देखकर लगा ही नहीं कि यह व्यक्ति उसी विश्वविद्यलय का कुलपति है जहाँ कभी कुलपति के रूप में बहुत बड़े विद्वान विराजते थे .पंडित मदन मोहन मालवीय स्वयं काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के कुलपति  रहे. उनके पहले सर सुन्दर लाल और सर पी एस शिवस्वामी अय्यर जैसे महान लोग भी बीएचयू के कुलपति रह चुके थे . मालवीय जी के अट्ठारह साल के कार्यकाल के बाद डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन भी कुलपति रहे .अमरनाथ झा, आचार्य नरेंद्र देव और त्रिगुण सेन जैसी महान लोग काशी हिन्दू  विश्वविद्यालय के कुलपति पद पर रह चुके हैं . जब टेलिविज़न पर मौजूदा कुलपति प्रोफ़ेसर गिरीश चन्द्र त्रिपाठी का दर्शन हुआ तो समझ में आया कि इतनी ऊंची परम्परा वाले विश्वविद्यालय का क्या हाल हो चुका है . कुलपति ने अपनी ही लड़कियों को पिटवाने के लिए कैम्पस में पुलिस बुला लिया जबकि  भारत छोडो आन्दोलन के दौरान इसी विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ एस राधाकृष्णन ने बीएचयू के  कैम्पस में अंग्रेजों की पुलिस को दाखिल होने की अनुमति नहीं दी थी. बीएचयू की परम्पराओं का पतन १९६७ में शुरू हुआ जब इंदिरा गांधी की सरकार थी . केंद्रीय विश्वविद्यालय था . इंदिरा गांधी में सस्थाओं के प्रति सम्मान की वह  भावना नहीं थी जो पंडित जवाहरलाल नेहरू में थी. नतीजा यह हुआ कि केन्द्रीय विश्वविद्यालयों में कुलपति भी सिफारशी होने लगे . उसी क्रम में उन्होंने ए सी जोशी को कुलपति बनाया और फिर जो ढलान शुरू हुआ वह आजतक जारी है . ए सी जोशी के कार्यकाल में ही बीएचयू का  कुलपति अफसर माना जाने लगा ,वरना उसके पहले वह परिवार का सही अर्थों में मुखिया होता था. जोशी जी के  कार्यकाल  में ही बीएचयू कैम्पस में पुलिस ने छात्रावासों के अन्दर घुसकर लड़कों की खूब पिटाई की थी. उसी के बाद  छात्र आन्दोलन से निपटने के लिए विश्वविद्यालय को अनिश्चित काल के लिए बंद करने की परम्परा शुरू हुई. और वहां से चलकर आज की हालात तक बात पंहुची है .    बताते हैं कि इसी नवम्बर में  मौजूदा कुलपति जी सी त्रिपाठी का कार्यकाल पूरा हो रहा है . वे एक टर्म और चाहते हैं . दिल्ली दरबार में फेरी भी लगा रहे हैं . आर एस एस का समर्थन उनको पहले से ही है .लेकिन लगता  है कि इस काण्ड के बाद उनकी पकड़ आर एस एस पर कमज़ोर  पड़ेगी. एक जानकार ने बताया कि जब वे अपनी मंशा लेकर शिक्षा मंत्री प्रकाश जावडेकर के सामने पेश हुए थे तो उन्होंने साफ बता दिया था कि आप अपना कार्यकाल सम्मान पूर्वक बिताकर चले जाइए अब वहां किसी विद्वान व्यक्ति को कुलपति बनाया जाएगा . हालांकि अब यह लगने लगा है कि कुलपति जी सी  त्रिपाठी को अपना कार्यकाल पूरा करना भी भारी पड़ेगा
काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की घटना के बाद  हवा में बहुत सारे सवाल उठ खड़े हुए हैं . एक सवाल यह है कि अगर उच्च शिक्षा के केन्द्रों में महिलाओं की इज्ज़त की सुरक्षा की गारंटी नहीं दी जा सकती तो हम बेटी बचाओ , बेटी पढाओ का नारा क्यों लगाते हैं . . बीएचयू के आन्दोलन में लड़कियों का नारा था, " न्याय, सुरक्षा आज़ादी, मांगे आधी आबादी ." इसमें ऐसी कौन सी बात थी जिससे देश की शान्ति को ख़तरा था. या जैसा कि बाद में टेलिविज़न पर कुलपति त्रिपाठी ने कहा  कि प्रधानमंत्री की सभा में अडंगा लगाने के लिए यह आन्दोलन किया गया था. सच्ची बात यह है कि अगर गिरीश चन्द्र त्रिपाठी ने सही समय पर इस समस्या का हल निकाल दिया होता तो उनके फैसले से प्रधानमंत्री की वाहवाही ही होती . उन्होंने यह भी  कहा कि कैम्पस में पेट्रोल बम चल रहे थे .  उनकी इस बात को न तो उत्तर प्रदेश  सरकार ने गंभीरता से लिया और न ही केंद्र  सरकार ने .काशी हिन्दू विश्वविद्यालय का सबक यह है कि केंद्र सरकार को चाहिए कि चेलों को पदासीन करने के काम से बाज आये और विश्वविद्यालयों को विद्वत्ता और  शोध का केंद्र बनाने का प्रयास करे
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लेखक विषय संवाद साभार अनुवादक

पहले वो आए साम्यवादियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं साम्यवादी नहीं था

 

फिर वो आए मजदूर संघियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं मजदूर संघी नहीं था

 

फिर वो यहूदियों के लिए आए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं यहूदी नहीं था

 

फिर वो आए मेरे लिए

और तब तक बोलने के लिए कोई बचा ही नहीं था

 

मार्टिन नीमोलर (1892-1984)