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मेरी पहली मुहब्बत : मेरी नीम का पेड़

जंतर-मंतर - Thu, 06/07/2017 - 13:45


शेष नारायण सिंह
नीम की चर्चा होते ही पता नहीं क्या होता  है कि  मैं अपने  गांव पंहुंच जाता हूँ.  बचपन  की पहली यादें ही नीम से जुडी हुयी हैं . मेरे  गाँव में नीम  एक देवी  के रूप में स्थापित हैं, गाँव के पूरब में अमिलिया तर वाले बाबू साहेब की ज़मीन में जो नीम  का पेड़ है ,वही काली माई का स्थान है . गाँव के बाकी नीम के पेड़ बस पेड़ हैं .   लेकिन उन पेड़ों में भी मेरे बचपन की बहुत सारी मीठी यादें हैं . मेरे दरवाज़े पर जो नीम का  पेड़ था , वह गाँव  की बहुत सारी गतिविधियों का केंद्र था . सन २००० के सावन में जब  बहुत तेज़ बारिश हो रही थी, तो चिर्री पड़ी ,  लोग बताते हैं कि पूरे गाँव में अजोर हो गया था  , बहुत तेज़ आवाज़ आई थी और सुबह  जब लोगों ने देखा तो मेरे दरवाज़े की नीम का एक  ठासा टूट कर नीचे गिर गया था. मेरे बाबू वहीं पास में बने मड़हे में रात में सो  रहे थे. उस आवाज़ को सबसे क़रीब से  उन्होंने ही सुना था. कान फाड़ देने वाली आवाज़ थी वह . चिर्री वाले हादसे के बाद नीम का  पेड़ सूखने लगा था. अजीब इत्तिफाक है कि उसके बाद ही मेरे बाबू  की जिजीविषा  भी कम होने लगी थी. फरवरी आते आते नीम के पेड सूख  गया . और उसी  २००१ की फरवरी में बाबू भी चले गए थे . जहां वह नीम का पेड़ था , उसी जगह के आस पास मेरे भाई ने नीम के तीन पेड़ लगा दिए है , यह नीम भी तेज़ी से बड़े हो  रहे हैं . इस नीम के पेड़ की मेरे गाँव के सामाजिक जीवन में बहुत महत्व है .इसी पेड़ के नीचे मैंने और मेरे अज़ीज़ दोस्त बाबू बद्दू सिंह ने शरारतें  सीखीं और उनका अभ्यास भी किया . जाड़ों में धूप सबसे पहले इसी पेड़ के नीचे बैठ कर सेंकी जाती थी. पड़ोस के कई बुज़ुर्ग वहां मिल जाते थे . टिबिल साहेब और पौदरिहा बाबा तो  धूप निकलते  ही आ जाते थे. बाकी लोग भी आते जाते रहते थे. मेरे बाबू के काका थे यह दोनों लोग . बहुत आदरणीय इंसान थे. हुक्का भर भर के नीम के पेड़ के नीचे पंहुचाया जाता रहता था. घर के तपता में आग जलती रहती थी.    इन दोनों ही बुजुर्गों का असली नाम कुछ और था लेकिन  सभी इनको इसी नाम से जानते थे. टिबिल साहेब कभी उत्तर प्रदेश पुलिस में कांस्टेबिल रहे थे , १९४४ में रिटायर हो गए थे , और मेरे पहले की पीढी भी उनको इसी नाम से जानती थी.  पौदरिहा का नाम इस लिए पड़ा था कि वे  गाँव से किसी की बरात में गए थे तो इनारे की पौदर के पास ही खटिया  डाल कर वहीं सो गए थे . किसी घराती ने उनको पौदरिहा कह दिया और जब बरात लौटी तो भाइयों ने उनका यही नाम कर दिया . इन्हीं  मानिंद  बुजुर्गों की छाया में हमने शिष्टाचार  की बुनियादी  बातें सीखीं थीं.मेरी नीम की मज़बूत डाल पर ही सावन में झूला पड़ता था. रात में गाँव की लडकियां और बहुएं उस  पर झूलती थीं और कजरी गाती थीं.  मानसून के  समय चारों तरफ झींगुर की आवाज़ के बीच में ऊपर नीचे जाते झूले पर बैठी  हुयी कजरी गाती मेरे गाँव की लडकियां  हम लोगों को किसी भी महान संगीतकार से कम नहीं लगती थीं.  जब १९६२ में मेरे गाँव  में स्कूल खुला तो सरकारी बिल्डिंग बनने के पहले इसी नीम के पेड़ के नीचे ही  शुरुआती कक्षाएं चली थीं.   धोपाप जाने वाले नहवनिया लोग जेठ की दशमी को थक कर इसी नीम  के नीचे आराम करते  थे. उन दिनों सड़क कच्ची थी और ज़्यादातर लोग धोपाप पैदल ही जाते थे .
 मेरे गाँव में सबके घर के आस पास नीम के पेड़ हैं और किसी भी बीमारी में उसकी  पत्तियां , बीज, तेल , खली आदि का इस्तेमाल बड़े पैमाने पर  होता था लेकिन आब नहीं होता. निमकौड़ी बीनने और बटोर कर रखने का रिवाज ही खत्म हो गया है . लेकिन नीम के पेड़ के प्रति श्रद्धा कम नहीं  हो रही है . एक दिलचस्प वाकया है  . मेरे बचपन में   मुझसे छः साल बड़ी मेरी   बहिन  ने घर के ठीक  सामने  नीम का एक पौधा  लगा दिया   था. उसका विचार था कि जब भाइयों की दुलहिन आयेगी  तब तक नीम  का पौधा पेड़ बन जाएगा  और उसी  पर उसकी  भौजाइयां झूला डालकर झूलेंगी.  अब वह पेड़ बड़ा हो गया  है , बहुत ही घना और शानदार .  बहिन के भाइयों की दुलहिनें  जब आई थीं तो पेड़ बहुत छोटा था . झूला नहीं पड़ सका . अब उनकी भौजाइयों के  बेटों की दुलहिनें आ गयी हैं लेकिन अब गाँव  में लड़कियों का झूला झूलने की परम्परा  ही ख़त्म हो गयी है .इस साल  मेरे छोटे भाई ने ऐलान कर दिया कि बहिन   वाले  नीम के पेड़ से घर को ख़तरा है ,लिहाज़ा उसको कटवा दिया जाएगा . हम लोगों ने कुछ बताया  नहीं लेकिन बहुत तकलीफ हुयी  . हम  चार भाई  बहनों के   बच्चों को हमारी तकलीफ  का अंदाज़ लग गया और उन लोगों ने ऐसी  रणनीति बनाई   कि नीम का  पेड़ बच गया .जब नीम के उस पेड़ पर हमले का खतरा मंडरा रहा   था तब मुझे अंदाज़ लगा कि मैं नीम से कितना मुहब्बत करता हूँ . 

दास्तान-ए-पाकिस्तान : अमरीका से गिरा ,चीन पर अंटका

जंतर-मंतर - Thu, 06/07/2017 - 11:23


शेष नारायण सिंह  प्रधानमंत्री नरेंद्र  मोदी की ताज़ा अमरीका यात्रा को भारत में आम तौर पर एक ऐसी यात्रा के रूप में देखा जा रहा है  जिसके बाद अमरीकी अर्थव्यवस्था को तो तो फायदा हुआ  है लेकिन भारत को उम्मीद से बहुत कम मिला है .  लेकिन सरहद के पर पाकिस्तान में उनकी यात्रा से पाकिस्तानी नीति निर्धारकों में घबडाहट है .व्हाइट हाउस में मोदी-ट्रंप मुलाक़ात के दौरान जिस तरह से  प्रधानमंत्री ने अमरीकी राष्ट्रपति को गले लगाया उसके बाद पाकिस्तानी विदेश नीति के हलकों में खासी चिंता देखी जा रही है . हिजबुल मुजाहिदीन के मुखिया सैयद सलाहुद्दीन को  अंतर राष्ट्रीय आतंकी घोषित किये जाने से भी पाकिस्तान को परेशानी हो रही है क्योंकि वहां सलाहुद्दीन को सरकारी तबकों में इज्ज़त की निगाह से देखा जाता है . पूर्व राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ तो उसको पीर साहेब कहते थे .भारत और अमरीका की बढ़ती दोस्ती का एक नतीजा यह भी है कि अब  पाकिस्तान लगभग पूरी तरह से चीन की  भारत नीति का एक पुर्जा होता जा रहा है . जिस तरह से  पहले ज़माने में वह दक्षिण एशिया में अमरीकी  विदेश नीति के लक्ष्यों को पूरा करने  का मुख्य एजेंट हुआ करता था  ,उतनी ही वफादारी से अब पाकिस्तान चीन की हित साधना का यंत्र बन गया है . साथ ही  पाकिस्तान में इस बात पर भी चिंता जताई जा रही है कि अमरीका अब भारत की तरफ  ज़्यादा खिंच रहा है . जिसका भावार्थ यह  है कि अब वह पाकिस्तान  से पहले से अधिक दूरी बना लेगा. जो पाकिस्तान अपने अस्तित्व में आने के साथ से ही  अमरीका का बहुत ही प्रिय देश रहा हो और  भारत  के खिलाफ अमरीका से  मदद भी लेता रहा हो उसको भारत का दोस्त बनते देख पाकिस्तान सरकार में चिंता बढ़ रही है  और वह मीडिया के ज़रिये साफ़ नज़र आ  रही है और पाकिस्तान की राजनीति पैर नज़र रखने वाले किसी भी व्यक्ति को बिलकुल साफ़ तौर पर दिख रही  है ..प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अमरीका यात्रा और उसके बाद जारी हुए संयुक्त बयान के बाद स्पष्ट हो गया है कि   राष्ट्रपति ट्रंप भारत-पाक संबंधों के मामले में भारतीय  पक्ष को महत्व दे रहे हैं . पिछले सत्तर वर्षों में पाकिस्तानी हुक्मरान ने ऐसा माहौल बना रखा है कि जैसे कश्मीर पर पाकिस्तान का अधिकार स्थापित करना ही पाकिस्तानी राजनीति का प्रमुख आधार हो . उनके इस अभियान में अमरीका की  मदद भी मिलती रही है . लेकिन पिछले कुछ वर्षों से अमरीका की भारत से  दोस्ती बढना शुरू हो गयी है  और जब  मोदी-ट्रंप बातचीत के बाद तस्वीर  सामने आयी तो ऐसा लगने लगा कि अब अमरीका   क्षेत्रीय आतंकवाद के मुद्दे पर भारत की बात को ज़्यादा सही मान रहा है .पाकिस्तान की सरकार की वह उम्मीद भी अब ख़त्म हो गयी है जिसके तहत वह अपने लोगों को यह बताता रहता था  कि कश्मीर के मामले में  अमरीका बिचौलिए की भूमिका निभाएगा . यहाँ  तक कि जब अमरीका ने पाकिस्तानी  कश्मीर नीति के ख़ास हिस्सा बन चुके ,सैयद सलाहुद्दीन को अंतर राष्ट्रीय आतंकी घोषित किया तो कुछ पाकिस्तानी पत्रकारों ने कहना शुरू कर दिया कि इसी बहाने अमरीका  भारत और कश्मीर के बीच सुलह कराने के लिए बिचौलिया बनना चाहता है. लेकिन  वक़्त बीत रहा है और  तस्वीर और ज्यादा साफ़ होती जा रही  है . पाकिस्तानी अखबारों में अब अमरीका की बात बहुत ही साफ़ शब्दों  में छपने लगी है . अमरीकी विदेश विभाग के प्रवक्ता  का वह बयान भी प्रमुखता से छपा है जिसमें कहा गया  है कि  "  कश्मीर पर किसी भी बातचीत की रफ़्तार , स्कोप और उसका चरित्र दोनों  ही पक्षों को तय करना है लेकिन हम ( अमरीका ) हर उस सकारात्मक क़दम का समर्थन करते हैं जो दोनों पक्ष अच्छे रिश्ते बनाने की दिशा में बढाते हैं " . यह बयान पाकिस्तानी पत्रकारों के सवाल के उस सवाल के जवाब में मिला है जो उन्होंने अमरीकी प्रवक्ता से पूछा था . ज़ाहिर है कि अमरीका या  किसी भी देश  को कश्मीर मामले में दखल देने  के लिए तैयार करने की पाकिस्तानी कोशिश को ज़बरदस्त झटका  एक बार फिर लग गया   है और दुनिया भर में भारत  के  दृष्टिकोण को ही मान्यता मिल रही है क्योंकि भारत मानता  है कि कश्मीर समस्या  के हल के लिए किसी की भी मध्यस्थता को स्वीकार नहीं किया जा सकता है . हालांकि शिमला समझौते में पाकिस्तान ने भी माना था कि आपसी बातचीत से ही द्विपक्षीय  समस्याओं का हल निकला जाएगा लेकिन उसके बाद से उसकी सभी   सरकारों ने शिमला समझौते का उल्लंघन किया  है .अमरीका के भारत की तरफ झुक जाने का नतीजा  है कि पाकिस्तानी सरकार अब चीन पर पूरी तरह से निर्भर होती जा रही है . विदेश नीति का  बहुत पुराना मंडल सिद्धांत है  कि दुश्मन का दुश्मन , दोस्त होता है.  पाकिस्तान की मौजूदा विदेश नीति भारत और चीन के बीच कथित दुश्मनी की बुनियाद पर ही टिकी है . शायद इसीलिये चीन के विदेश मंत्री के स्वागत के मौके पर पाकिस्तान के विदेशी मामलों के मुख्य सलाहकार सरताज अज़ीज़ ने कहा कि " पाकिस्तान का चीन  से जो सम्बन्ध  है वह हमारी विदेशनीति का मुख्य स्तम्भ है ." उनके इस बयान के बाद अमरीकी मीडिया ने इस बात को मुकम्मल तरीके से घोषित कर दिया है  कि एशिया में पाकिस्तान की नीतियों में बहुत बड़ा बदलाव  आ चुका है .अब पाकिस्तान के नेता  चीन की हर बात मानने के लिए अभिशप्त नज़र आते हैं लेकिन उनको  भारत के खिलाफ अपने अभियान में चीन से बहुत उम्मीद नहीं करना चाहिए .इसलिए पाकिस्तानी हुक्मरान ,खासकर फौज को वह बेवकूफी नहीं करनी चाहिए जो१९६५ में जनरल अयूब ने की थी . १९६५ के भारत-पाकिस्तान युद्ध के पहले उनको लगता था कि जब वे भारत पर हमला कर देगें तो चीन भी भारत पर हमला कर देगा क्योंकि तीन साल पहले ही भारत और चीन केबीच सीमा पर संघर्ष हो चुका था. जनरल को उम्मीद थी कि उसके बाद  भारत कश्मीर उन्हें दे देगा. ऐसा कुछ भी नहीं हुआ और पाकिस्तानी फौज़ लगभग तबाह हो गयी. भारत के खिलाफ किसी भी देश से मदद मिलने की उम्मीद करना पाकिस्तानी फौज की बहुत बड़ी भूल होगी. लेकिन सच्चाई यह है कि पाकिस्तानी फौज़ के सन इकहत्तर की लड़ाई के हारे हुए अफसर बदले की आग में जल रहे हैं , वहां की तथाकथित सिविलियन सरकार पूरी तरह से फौज के सामने नतमस्तक है . कश्मीर में आई एस आई ने हालात को बहुत खराब कर दिया है .  हालांकि यह भी सच है कि चीन अपने व्यापारिक हितों के लिए  पाकिस्तान का इस्स्तेमाल कर रहा  है . हिन्द महासागर में अपनी सीधी पंहुंच बनाना चीन का  हमेशा से सपना रहा है और अब पाकिस्तान ने  पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर के रास्ते ,अपने कब्जे वाले बलोचिस्तान तक सड़क बनाने और समुद्र पर बंदरगाह बनाने की अनुमति दे कर उसका वह सपना पूरा कर   दिया  है . जानकार बताते हैं कि अब पाकिस्तान के लिए चीन से पिंड छुड़ाना बहुत मुश्किल होगा क्योंकि पश्चिम एशिया और हिन्द महासागर क्षेत्र में में चीनी मंसूबों को पूरा करने के लिए इस बंदरगाह का बहुत ही अधिक महत्व है .चीन की तरफ इस्लामाबाद की बढ़ती मुहब्बत से किसी को कोई ताज्जुब नहीं हो रहा  है. पाकिस्तान सरकार में कई महीनों से इस बात की चिंता बढ़ रही थी कि अमरीका कहीं उसको आतंक का प्रायोजक देश न घोषित कर दे क्योंकि अफगानिस्तान  की तरफ से इस तरह की मांग लगातार उठ रही है . इस डर का कारण यह है कि अफगानिस्तान में मौजूद अमरीकी सेना के बड़े अफसर ,  पाकिस्तान में रूचि लेने वाले अमरीकी नेता और अफगान सरकार इस बात को जोर देकर कहते रहे हैं कि पाकिस्तान सरकार की  ओर से  अफगानिस्तान विरोधी आतंकवादियों को बढ़ावा दिया जा रहा  है  और उनको पाकिस्तान के अन्दर मौजूद आतंकी कैम्पों में ट्रेनिंग भी दी जा रही है.इस बात में दो राय नहीं है कि पाकिस्तान  सरकार  अब चीन की विदेश नीति  में एक महत्वपूर्ण भूमिका रखती है . प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति ट्रंप की मुलाक़ात से जो दोस्ती के संकेत निकल रहे थे उससे  पाकिस्तानी   हुकूमत में  जो  चिंता थी उसको कम करके पेश करने की लगातार कोशिश चल रही  है . चीन के विदेशमंत्री की  पाकिस्तान यात्रा और उनकी सेवा में पूरी सरकार का लग जाना  भारत-अमरीका  दोस्ती  के असर से मुक्त होने की कोशिश भी है .  पाकिस्तानी विदेश विभाग ने साफ़ कहा है कि अगर अमरीका भारत से दोस्ती बढाता  है तो दक्षिण एशिया में शान्ति की कोशिशों को नुक्सान होगा .. पाकिस्तान इस बात से बहुत  नाराज़  है कि नरेंद्र मोदी और दोंल्ड ट्रंप ने  क्षेत्रीय आतंकवाद पर काबू करने की बात पर जोर दिया . दक्षिण एशिया में  क्षेत्रीय आतंकवाद को पाकिस्तानी  संरक्षण में  पल रहे आतंकवाद को ही कहा जाता है . पाकिस्तान में यह भी माना जा रहा है कि सलाहुद्दीन को आतंकी घोषित करना  भी भारत को खुश करने के लिए किया जा रहा है . पाकिस्तान के आतंरिक   मालों के मंत्री  चौधरी निसार अली खान ने कहा है कि संयुक्त राज्य ने " भारत की ज़बान बोलना शुरू कर दिया है ." पाकिस्तान ने अपनी नाराजगी को अमरीकी अधिकारियों के सामने जता भी दिया है . उसको शिकायत है कि १९६० से अब तक अमरीका ने भारत पर हुए हर आक्रमण में पाकिस्तानी सेना की मदद की है लेकिन इस  बार उसने भारत को ड्रोन और अन्य हाथियार दे दिया है जो हर हाल में पाकिस्तान के  खिलाफ ही इस्तेमाल होगा.पाकिस्तानी अखबारों में इस बात पर भी चिंता  जताई जा रही है कि पाकिस्तान आर्थिक  मामलों में चीन पर बहुत ही अधिक निर्भर होता जा रहा है और उससे बहुत जयादा उम्मीदें पाल रखी  हैं . जबकि चीन पाकिस्तान में केवल लाभकारी  पूंजी निवेश कर रहा है और विश्व में अपने को ताक़तवर दिखाने के लिए पाकिस्तान की भौगोलिक स्थिति   का फायदा ले रहा है . अफगानिस्तान में पाकिस्तान की हनक को  बढ़ाने की पाकिस्तानी फौज की कोशिश को चीन कोई तवज्जो नहीं दे रहा है  . कुल मिलाकर  कभी अमरीका का कारिन्दा रहा पाकिस्तान अब चीन की तरफ बहुत तेज़ी से बढ़ रहा है लेकिन उसको वहां भी कोई महत्व नहीं  मिल रहा है जबकि  अमरीका अब भारत का करीबी होता जा रहा है .Click here to Reply or Forward

नब्बे के दशक में कश्मीरी पंडितों का पलायन : कुछ तथ्य

जनपक्ष - Wed, 05/07/2017 - 14:47

·         अशोक कुमार पाण्डेय
1-     1990 के दशक में कश्मीर घाटी में आतंकवाद के चरम के समय बड़ी संख्या में कश्मीरी पंडितों ने घाटी से पलायन किया. पहला तथ्य संख्या को लेकर. कश्मीरी पंडित समूह और कुछ हिन्दू दक्षिणपंथी यह संख्या चार लाख से सात लाख तक बताते हैं. लेकिन यह संख्या वास्तविक संख्या से बहुत अधिक है. असल में कश्मीरी पंडितों की आख़िरी गिनती 1941 में हुई थी और उसी से 1990 का अनुमान लगाया जाता है. इसमें 1990 से पहले रोज़गार तथा अन्य कारणों से कश्मीर छोड़कर चले गए कश्मीरी पंडितों की संख्या घटाई नहीं जाती. अहमदाबाद में बसे कश्मीरी पंडित पी एल डी परिमू ने अपनी किताब “कश्मीर एंड शेर-ए-कश्मीर : अ रिवोल्यूशन डीरेल्ड” में 1947-50 के बीच कश्मीर छोड़ कर गए पंडितों की संख्या कुल पंडित आबादी का 20% बताया है. (पेज़-244) चित्रलेखा ज़ुत्शी ने अपनी किताब “लेंग्वेजेज़ ऑफ़ बिलॉन्गिंग : इस्लाम, रीजनल आइडेंटीटी, एंड मेकिंग ऑफ़ कश्मीर” में इस विस्थापन की वज़ह नेशनल कॉन्फ्रेंस द्वारा लागू किये गए भूमि सुधार को बताया है (पेज़-318) जिसमें जम्मू और कश्मीर में ज़मीन का मालिकाना उन ग़रीब मुसलमानों, दलितों तथा अन्य खेतिहरों को दिया गया था जो वास्तविक खेती करते थे, इसी दौरान बड़ी संख्या में मुस्लिम और राजपूत ज़मींदार भी कश्मीर से बाहर चले गए थे. ज्ञातव्य है कि डोगरा शासन के दौरान डोगरा राजपूतों, कश्मीरी पंडितों और कुलीन मुसलमानों के छोटे से तबके ने कश्मीर की लगभग 90 फ़ीसद ज़मीनों पर कब्ज़ा कर लिया था. (विस्तार के लिए देखें “हिन्दू रूलर्स एंड मुस्लिम सब्जेक्ट्स”, मृदु राय) इसके बाद भी कश्मीरी पंडितों का नौकरियों आदि के लिए कश्मीर से विस्थापन जारी रहा (इसका एक उदाहरण अनुपम खेर हैं जिनके पिता 60 के दशक में नौकरी के सिलसिले में शिमला आ गए थे) सुमांत्रा बोस ने अपनी किताब “कश्मीर : रूट्स ऑफ़कंफ्लिक्ट, पाथ टू पीस” में यह संख्या एक लाख बताई है,( पेज़ 120)  राजनीति विज्ञानी अलेक्जेंडर इवांस विस्थापित पंडितों की संख्या डेढ़ लाख से एक लाख साठ हज़ार बताते हैं, परिमू यह संख्या ढाई लाख बताते हैं. सी आई ए ने एक रिपोर्ट में यह संख्या तीन लाख बताई है. एक महत्त्वपूर्ण तथ्य अनंतनाग के तत्कालीन कमिश्नर आई ए एस अधिकारी वजाहत हबीबुल्लाह कश्मीरी पंडित संघर्ष समिति श्रीनगर की 7 अप्रैल, 2010 प्रेस रिलीज़ के हवाले से बताते हैं कि लगभग 3000 कश्मीरी पंडित परिवार स्थितियों के सामान्य होने के बाद 1998 के आसपास कश्मीर से पलायित हुए थे. (देखें, पेज़ 79,माई कश्मीर : द डाइंग ऑफ़ द लाईट, वजाहत हबीबुल्ला). बता दूँ कि कश्मीरी पंडित संघर्ष समिति इन भयानक स्थितियों के बाद भी कश्मीर से पलायित होने से इंकार करने वाले पंडितों का संगठन है. अब भी कोई साढ़े तीन हज़ार कश्मीरी पंडित घाटी में रहते हैं, बीस हज़ार से अधिक सिख भी हैं और नब्बे के दशक के बाद उन पर अत्याचार की कोई बड़ी घटना नहीं हुई, हाँ हर आम कश्मीरी की तरह उनकी अपनी आर्थिक समस्याएं हैं जिस पर अक्सर कोई ध्यान नहीं देता. हाल में ही तीस्ता सीतलवाड़ ने उनकी मदद के लिए अपील जारी की थी. साथ ही एक बड़ी समस्या लड़कों की शादी को लेकर है क्योंकि पलायन कर गए कश्मीरी पंडित अपनी बेटियों को कश्मीर नहीं भेजना चाहते.
गुजरात हो कि कश्मीर, भय से एक आदमी का भी अपनी ज़मीन छोड़ना भयानक है, लेकिन संख्या को बढ़ा कर बताना बताने वालों की मंशा तो साफ़ करता ही है.  
2-     उल्लिखित पुस्तक में ही परिमू ने बताया है कि उसी समय लगभग पचास हज़ार मुसलमानों ने घाटी छोड़ी. कश्मीरी पंडितों को तो कैम्पों में जगह मिली, सरकारी मदद और मुआवज़ा भी. लेकिन मुसलमानों को ऐसा कुछ नहीं मिला (देखें, वही) सीमा क़ाज़ी अपनी किताब “बिटवीन डेमोक्रेसी एंड नेशन” में ह्यूमन राईट वाच की एक रपट के हवाले से बताती हैं कि 1989 के बाद से पाकिस्तान में 38000 शरणार्थी कश्मीर से पहुँचे थे. केप्ले महमूद ने अपनी मुजफ्फराबाद यात्रा में पाया कि सैकड़ों मुसलमानों को मार कर झेलम में बहा दिया गया था. इन तथ्यों को साथ लेकर वह भी उस दौर में सेना और सुरक्षा बलों के अत्याचार से 48000 मुसलमानों के विस्थापन की बात कहती हैं. इन रिफ्यूजियों ने सुरक्षा बलों द्वारा, पिटाई, बलात्कार और लूट तक के आरोप लगाए हैं. अफ़सोस कि 1947 के जम्मू नरसंहार (विस्तार के लिए इंटरनेट पर वेद भसीन के उपलब्ध साक्षात्कार या फिर सईद नक़वी की किताब “बीइंग द अदर” के पेज़ 173-193) की तरह इस विस्थापन पर कोई बात नहीं होती.
3-     1989-90 के दौर में कश्मीरी पंडितों की हत्याओं के लेकर भी सरकारी आँकड़े सवा सौ और कश्मीरी पंडितों के दावे सवा छः सौ के बीच भी काफ़ी मतभेद हैं. लेकिन क्या उस दौर में मारे गए लोगों को सिर्फ़ धर्म के आधार पर देखा जाना उचित है.
परिमू के अनुसार हत्यारों का उद्देश्य था कश्मीर की अर्थव्यवस्था, न्याय व्यवस्था और प्रशासन को पंगु बना देने के साथ अपने हर वैचारिक विरोधी को मार देना था. इस दौर में मरने वालों में नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेता मोहम्मद युसुफ़ हलवाई,  मीरवायज़  मौलवी फ़ारूक़, नब्बे वर्षीय पूर्व स्वतन्त्रता संग्राम सेनानी मौलाना मौदूदी, गूजर समुदाय के सबसे प्रतिष्ठित नेता क़ाज़ी निसार अहमद, विधायक मीर मुस्तफ़ा,  श्रीनगर दूरदर्शन के डायरेक्टर लासा कौल, एच एम टी के जनरल मैनेज़र एच एल खेरा, कश्मीर विश्वविद्यालय के उपकुलपति प्रोफ़ेसर मुशीर उल हक़ और उनके सचिव अब्दुल गनी, कश्मीर विधान सभा के सदस्य नाज़िर अहमद वानी आदि शामिल थे (वही, पेज़ 240-41) ज़ाहिर है आतंकवादियों के शिकार सिर्फ़ कश्मीरी पंडित नहीं, मुस्लिम भी थे. हाँ, पंडितों के पास पलायित होने के लिए जगह थी, मुसलमानों के लिए वह भी नहीं. वे कश्मीर में ही रहे और आतंकवादियों तथा सुरक्षा बलों, दोनों के अत्याचारों के शिकार होते रहे.
जगमोहन के कश्मीर में शासन के समय वहाँ के लोगों के प्रति रवैये को जानने के लिए एक उदाहरण काफी होगा. 21 मई 1990 को जब मौलवी फ़ारूक़ की हत्या के बाद जब लोग सड़कों पर आ गए तो वह एक आतंकवादी संगठन के ख़िलाफ़ थे लेकिन जब उस जुलूस पर सेना ने गोलियाँ चलाईं और भारतीय प्रेस के अनुसार 47 (और बीबीसी के अनुसार 100 लोग) गोलीबारी में मारे गए तो यह गुस्सा भारत सरकार के ख़िलाफ़ हो गया. (देखें, कश्मीर : इंसरजेंसी एंड आफ़्टर, बलराज पुरी, पेज़-68) गौकादल में घटी यह घटना नब्बे के दशक में आतंकवाद के मूल में मानी जाती है. इन दो-तीन सालों में मारे गए कश्मीरी मुसलमानों की संख्या 50000 से एक लाख तक है. श्रीनगर सहित अनेक जगहों पर सामूहिक क़ब्रें मिली हैं. आज भी वहाँ हज़ारो माएं और व्याह्ताएं “आधी” हैं – उनके बेटों/पतियों के बारे में वे नहीं जानती कि वे ज़िंदा हैं भी या नहीं, बस वे लापता हैं.  (आप तमाम तथ्यों के अलावा शहनाज़ बशीर का उपन्यास “द हाफ़ मदर” पढ़ सकते हैं.)
4-     कश्मीर से पंडितों के पलायनों में जगमोहन की भूमिका को लेकर कई बातें होती हैं. पुरी के अनुसार जगमोहन को तब भाजपा और तत्कालीन गृह मंत्री मुफ़्ती मोहम्मद सईद के कहने पर कश्मीर का गवर्नर बनाया गया था. उन्होंने फ़ारूक़ अब्दुल्ला की सरकार को बर्ख़ास्त कर सारे अधिकार अपने हाथ में ले लिए थे. अल जज़ीरा को दिए एक साक्षात्कार में मृदु राय ने इस संभावना से इंकार किया है कि योजनाबद्ध तरीक़े से इतनी बड़ी संख्या में पलायन संभव है. लेकिन वह कहती हैं कि जगमोहन ने पंडितों को कश्मीर छोड़ने के लिए प्रेरित किया.  वजाहत हबीबुल्लाह पूर्वोद्धरित किताब में बताते हैं कि उन्होंने जगमोहन से दूरदर्शन पर कश्मीरी पंडितों से एक अपील करने को कहा था कि वे यहाँ सुरक्षित महसूस करें और सरकार उनकी पूरी सुरक्षा उपलब्ध कराएगी. लेकिन जगमोहन ने मना कर दिया, इसकी जगह अपने प्रसारण में उन्होंने कहा कि “पंडितों की सुरक्षा के लिए रिफ्यूजी कैम्प बनाये जा रहे हैं, जो पंडित डरा हुआ महसूस करें वे इन कैम्पस में जा सकते हैं, जो कर्मचारी घाटी छोड़ कर जायेंगे उन्हें तनख्वाहें मिलती रहेंगी.” ज़ाहिर है इन घोषणाओं ने पंडितों को पलायन के लिए प्रेरित किया. (पेज़ 86 ;मृदु राय ने भी इस तथ्य का ज़िक्र किया है). कश्मीर के वरिष्ठ राजनीतिज्ञ और पत्रकार बलराज पुरी ने अपनी किताब “कश्मीर : इंसरजेंसी एंड आफ़्टर” में जगमोहन की दमनात्मक कार्यवाहियों और रवैयों को ही कश्मीरी पंडितों के विस्थापन का मुख्य ज़िम्मेदार बताया है.(पेज़ 68-73). ऐसे ही निष्कर्ष वर्तमान विदेश राज्य मंत्री और वरिष्ठ पत्रकार एम जे अकबर ने अपनी किताब “बिहाइंड द वेल” में भी दिए हैं. (पेज़ 218-20) कमिटी फॉर इनिशिएटिव ऑन कश्मीर की जुलाई 1990 की रिपोर्ट “कश्मीर इम्प्रिजंड” में नातीपुरा, श्रीनगर में रह रहे एक कश्मीरी पंडित ने कहा कि “इस इलाक़े के कुछ लोगों ने दबाव में कश्मीर छोड़ा. एक कश्मीरी पंडित नेता एच एन जट्टू लोगों से कह रहे थे कि अप्रैल तक सभी पंडितों को घाटी छोड़ देना है. मैंने कश्मीर नहीं छोड़ा, डरे तो यहाँ सभी हैं लेकिन हमारी महिलाओं के साथ कोई ऐसी घटना नहीं हुई.” 18 सितम्बर, 1990 को स्थानीय उर्दू अखबार अफ़साना में छपे एक पत्र में के एल कौल ने लिखा – “पंडितों से कहा गया था कि सरकार कश्मीर में एक लाख मुसलमानों को मारना चाहती है जिससे आतंकवाद का ख़ात्मा हो सके. पंडितों को कहा गया कि उन्हें मुफ़्त राशन,घर, नौकरियाँ आदि सुविधायें दी जायेंगी. उन्हें यह कहा गया कि नरसंहार ख़त्म हो जाने के बाद उन्हें वापस लाया जाएगा.”  हालाँकि ये वादे पूरे नहीं किये गए पर कश्मीरी विस्थापित पंडितों को मिलने वाला प्रति माह मुआवज़ा भारत में अब तक किसी विस्थापन के लिए दिए गए मुआवज़े से अधिक है. समय समय पर इसे बढ़ाया भी गया, आख़िरी बार उमर अब्दुल्ला के शासन काल में. आप गृह मंत्रालय की वेबसाईट पर इसे देख सकते हैं. बलराज पुरी ने अपनी किताब में दोनों समुदायों की एक संयुक्त समिति का ज़िक्र किया है जो पंडितों का पलायन रोकने के लिए बनाई गई थी. इसके सदस्य थे – पूर्व हाईकोर्ट जज मुफ़्ती बहाउद्दीन फ़ारूकी (अध्यक्ष), एच एन जट्टू (उपाध्यक्ष) और वरिष्ठ वक़ील ग़ुलाम नबी हग्रू (महासचिव). ज्ञातव्य है कि 1986 में ऐसे ही एक प्रयास से पंडितों को घाटी छोडने से रोका गया था. पुरी बताते हैं कि हालाँकि इस समिति की कोशिशों से कई मुस्लिम संगठनों, आतंकी संगठनों और मुस्लिम नेताओं से घाटी न छोड़ने की अपील की, लेकिन जट्टू ख़ुद घाटी छोड़कर जम्मू चले गए. बाद में उन्होंने बताया कि समिति के निर्माण और इस अपील के बाद जगमोहन ने उनके पास एक डीएसपी को जम्मू का एयर टिकट लेकर भेजा जो अपनी जीप से उन्हें एयरपोर्ट छोड़ कर आया, उसने जम्मू में एक रिहाइश की व्यवस्था की सूचना दी और तुरंत कश्मीर छोड़ देने को कहा! ज़ाहिर है जगमोहन ऐसी कोशिशों को बढ़ावा देने की जगह दबा रहे थे. (पेज़ 70-71)
कश्मीरी पंडितों का पलायन भारतीय लोकतंत्र के मुंह पर काला धब्बा है, लेकिन यह सवाल अपनी जगह है कि क़ाबिल अफ़सर माने जाने वाले जगमोहन कश्मीर के राज्यपाल के रूप मे लगभग 400000 सैनिकों की घाटी मे उपस्थिती के बावज़ूद इसे रोक क्यों न सके? अपनी किताब “कश्मीर : अ ट्रेजेडी ऑफ़ एरर्स” में तवलीन सिंह पूछती हैं – कई मुसलमान यह आरोप लगाते हैं कि जगमोहन ने कश्मीरी पंडितों को घाटी छोड़ने के लिए प्रेरित किया. यह सच हो या नहीं लेकिन यह तो सच ही है कि जगमोहन के कश्मीर में आने के कुछ दिनों के भीतर वे समूह में घाटी छोड़ गए और इस बात के पर्याप्त सबूत हैं कि जाने के लिए संसाधन भी उपलब्ध कराये गए.”

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मित्रों से अनुरोध है कि कश्मीर में रह रहे कश्मीरी पंडितों के संगठन कश्मीरी पंडित संघर्ष समिति और उसके कर्ता धर्ता संजय टिक्कू के बयान और साक्षात्कार पढ़ लें। मिल जाएंगे इंटरनेट पर बिखरे। 

असल मे जैसा कि एक कश्मीरी पंडित उपन्यासकार निताशा कौल कहती हैं - कश्मीरी पंडित हिंदुत्व की ताक़तों के राजनीतिक खेल के मुहरे बन गए हैं। विस्तार के लिए वायर में छपा उनका 7 जुलाई 2016 का लेख पढ़ लें। जब निताशा ने अल जज़ीरा के एक प्रोग्राम में राम माधव का प्रतिकार किया तो कश्मीरी पंडितों के संघ समर्थक समूह के युवाओं ने उनको भयानक ट्रॉल किया। दिक़्क़त यह है कि भारतीय मीडिया संघ से जुड़े पनुन कश्मीर (पूर्व में सनातन युवक सभा) को ही कश्मीरी पंडितों का इकलौता प्रतिनिधि मानता है। वह दिल्ली में रह रहे बद्री रैना जैसे कश्मीरी पंडितों के पास भी नहीं जाना चाहता। -----

ये बस कुछ तथ्य हैं, लेकिन इनके आधार पर आप चीज़ों का दूसरा चेहरा दिखा सकते हैं. एक सवाल और है – क्या कश्मीरी पंडित कभी घाटी में लौट सकेंगे?
अभी मै दो सवाल छोड़कर जा रहा हूँ –
क्या कश्मीरी पंडित घाटी लौटना चाहते हैं?क्या दिल्ली और श्रीनगर चाहते हैं कि कश्मीरी पंडित घाटी में लौटें?

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लेखक इन दिनों “कश्मीरनामा : भविष्य की क़ैद में इतिहास” नामक किताब लिख रहे हैं)


सबरंग हिन्दी से साभार 

स्वतंत्रता, संवाद और विश्वास : महेश पुनेठा

लेखक मंच - Wed, 05/07/2017 - 12:03

पिछले दिनों फेसबुक पर मैंने एक प्रश्न पोस्ट किया कि आप अपना कोई भी कार्य किन परिस्थितियों में सबसे बेहतरीन रूप में कर पाते हैं? इसके उत्तर में लगभग दो दर्जन लोगों ने अपनी राय व्यक्त की, जिन्हें मोटे रूप में हम दो वर्गों में बांट सकते हैं। पहला वर्ग- जिनका कहना था कि वे दबाव, विपरीत परिस्थितियों, चुनौतीपूर्ण और विरोध के माहौल में अपना कार्य सबसे बेहतरीन रूप में कर पाते हैं। दूसरा वर्ग- जिनका कहना था कि वे जब मनचाहा काम हो और मनचाहे ढंग से करने की आजादी हो, अनुकूल परिस्थितियां हों, समय-समय पर प्रोत्साहन और मार्गदर्शन मिल रहा हो, किसी तरह का कोई दबाव न हो और भयमुक्त वातावरण हो, ऐसे में बेहतरीन रूप में कार्य कर पाते हैं। दूसरे वर्ग के लोगों की संख्या अधिक थी। पहले वर्ग की बातें मुझे आदर्शवादी अधिक लगीं। कहने-सुनने में तो ये बातें अच्छी लगती हैं, लेकिन वास्तविकता से काफी दूर हैं। ऐसे व्यक्ति अपवाद ही होंगे, जो भय-दबाव-अविश्‍वास और विपरीत परिस्थितियों में अपना बेहतरीन या सर्वश्रेष्‍ठ दे पाएं। कम से कम रचनात्मक कार्य तो बिल्कुल ही नहीं। यदि ऐसा होता तो दुनिया के सारे बेहतरीन काम गुलामों के खाते में होते। वास्तविकता यह है कि हम किसी भी कार्य को उन्हीं परिस्थितियों में बेहतरीन रूप में कर सकते हैं, जब हमें उस काम को करने के लिए पूरी स्वतंत्रता प्रदान की जाय, किसी तरह का कोई शारीरिक और मानसिक दबाव न डाला जाय, जहां भी उस कार्य को संपादित करने के लिए हमें कुछ जानने-समझने की जरूरत महसूस हो, उसके लिए हमें आवश्‍यक संवाद करने के पूर्ण अवसर दिए जायें। हम पर इस बात का विश्‍वास किया जाय कि हम उस कार्य को करने की क्षमता रखते हैं अर्थात हम उस कार्य को कर सकते हैं। बात-बात पर यदि हमारी ईमानदारी और निष्‍ठा पर शक किया जाता है, तो उसका प्रभाव हमारी कार्यक्षमता पर पड़ता है।

जैसा कि हमारा सरोकार शि‍क्षा से है और जब हम सीखने-सिखाने के संदर्भ में उक्त प्रश्‍न को देखते हैं, तो यहां भी दूसरे वर्ग के लोगों के उत्तर ही सटीक प्रतीत होते हैं। स्वतंत्रता, विश्‍वास और संवाद, सीखने-सिखाने की प्रक्रिया के मूल तत्व हैं। इन तीनों तत्वों के सही तालमेल के बिना सीखना-सिखाना संभव नहीं लगता है। यह बात शि‍क्षक और शि‍क्षार्थी दोनों पर बराबर रूप से लागू होती है। शि‍क्षक सिखाने की प्रक्रिया में स्वतंत्रता, संवाद और विश्‍वास चाहता है तो बच्चे सीखने की प्रक्रिया में। एक शि‍क्षक अपने शि‍क्षण और स्कूल प्रबंधन के दौरान तमाम तरह के प्रयोग तभी कर सकता है, जब उसे ऐसा करने की आजादी दी जाय, उस पर विश्‍वास व्यक्त किया जाय। साथ ही शि‍क्षक को खुद पर भी विश्‍वास हो तथा एक ओर उच्च अधिकारियों तो दूसरी ओर बच्चों के साथ निरंतर संवाद स्थापित करने के उसे अवसर प्रदान किए जायें। आज सरकारी शि‍क्षा का सबसे बड़ा संकट यही विश्‍वास का संकट है, जिसे एक सोची-समझी चाल के तहत पैदा किया गया है। इसी के बलबूते शि‍क्षा का बाजार फल-फूल रहा है।

शि‍क्षण एक कला है। कोई भी कला तब तक पूर्णरूप में विकसित नहीं हो सकती है, जब तक उसके लिए दबावमुक्त वातावरण न हो। इधर ‘जबावदेही’के नाम पर शि‍क्षक पर जिस तरह के नियंत्रण लगाए जा रहे हैं, वे उस पर दबाव ही अधिक बनाते हैं। बच्चों के परीक्षा-परिणामों को तो पहले से ही उसकी वेतन-वृद्धि और पदोन्नति से जोड़ा जा चुका था, अब उसकी कक्षा-शि‍क्षण प्रक्रिया पर नजर रखने के लिए सी.सी.टी.वी. कैमरे लगाने तक की बात की जा रही है। संयुक्त राज्य अमेरिका जैसे देशों ने इन उपायों पर अमल करके भी देख लिया है। इसके नाकारात्मक परिणाम ही देखने में आए। फिर भी इसका अनुकरण किया जा रहा है। दरअसल, इस तरह के उपाय शि‍क्षक की रचनात्मकता को प्रभावित करते हैं। उसे दायरे से बाहर जाकर कुछ नया करने से रोकते हैं। उसे स्वाभाविक नहीं रहने देते हैं। यह समझा जा सकता है कि अपनी वेतन वृद्धि-पदोन्नति और नौकरी बचाने के भय से ग्रस्त अध्यापक कभी भी बच्चों को भयमुक्त वातावरण नहीं दे सकता है। यह एक मनोवैज्ञानिक सत्य है कि भय हमेशा कमजोर की ओर संक्रमित होता है।

दुनियाभर के शि‍क्षाविद् इस बात पर बल देते हैं कि बच्चों को भयमुक्त वातावरण दिया जाय। इसके पीछे यह तर्क है कि सीखने के लिए जिस अवलोकन, चिंतन और विश्‍लेषण की आवश्‍यकता होती है, वह दबावमुक्त वातावरण में ही हो संभव है। यदि बच्चों का मन-मस्तिष्‍क किसी भी प्रकार के दबाव में होता है तो वह एक तरह से व्यस्त होता है।ऐसे में बच्चे अवलोकन और विश्‍लेषण नहीं कर सकते हैं। अवलोकन और विश्‍लेषण के लिए मन का अवकाश में होना जरूरी है। साथ ही बच्चों की क्षमताओं पर विश्‍वास किया जाय, यह कतई न कहा जाय- ‘वे बच्चे हैं यह उनके वश की बात नहीं है।’ उनसे खुला संवाद किया जाय।लेकिन खाली स्वतंत्रता और विश्‍वास तब तक कारगर साबित नहीं होंगे, जब तक उनसे सार्थक संवाद न हो और उन्हें प्रश्न करने को प्रोत्साहित न किया जाय। साथ ही जहां उन्हें प्रोत्साहन की जरूरत है, वहां प्रोत्साहन और जहां मार्गदर्शन की जरूरत है, वहां मार्गदर्शन दिया जाय। दूसरे शब्दों में जब बच्चे जिस तरह की मदद चाहें,  उन्हें उस तरह की मदद देने के लिए तैयार रहा जाए। बच्चों की जिज्ञासा को जागृत किया जाय। अब यहां पर सवाल उठता है कि तमाम तरह के दबावों से दबा शि‍क्षक क्या ऐसा कर सकता है?

कतिपय शि‍क्षक-अभिभावक बच्चों को स्वतंत्रता प्रदान करने की बात पर चुटकी लेते हुए कहते हैं कि अब बच्चों को रोकना-टोकना नहीं है, वे जो चाहे उन्हें करने देना है, उनसे अब कुछ कहना नहीं है क्योंकि अब तो भयमुक्त वातावरण बनाना है। दरअसल, यह बात का सरलीकरण करना है। स्वतंत्रता का मतलब यह कतई नहीं है कि बच्चों को उनके हाल पर छोड़ दिया जाय, वे जैसा चाहें, वैसा करते रहें। बच्चों के लिए स्वत्रंतता के साथ-साथ खुला संवाद भी बहुत जरूरी है। ध्यातव्य है, ‘संवादहीन स्वतंत्रता’को अराजकता में बदलने में देर नहीं लगती है। बच्चों को स्वतंत्रता देने के साथ ही उनसे और अधिक संवाद करना जरूरी हो जाता है। ऐसे में शि‍क्षक-अभिभावक की जिम्मेदारी बढ़ जाती है। उसे पहले से अधिक रचनात्मक और कल्पनाशील होना पड़ता है। उसे संवाद के माध्यम से एक बड़ी दुनिया से बच्चों का परिचय कराना होता है। उनके हर प्रश्‍न का उत्तर देने की कोशि‍श करनी होती है। बच्चों के भीतर यह आत्मविश्‍वास पैदा करना पड़ता है कि वे चाहें तो बहुत कुछ कर सकते हैं। उनके भीतर अपार क्षमता है और वे अपनी क्षमताओं को पहचानें और खुद पर विश्‍वास करें। इस जिम्मेदारी को शि‍क्षक-अभिभावक तभी अच्छी तरह से निभा सकते हैं, जब बच्चों से अधिक से अधिक दोस्ताना संवाद स्थापित करें।

इस अंक को हमने कुछ ऐसे विद्यालयों पर केंद्रित किया है, जिनका कार्य अन्य विद्यालयों से हटकर है। जहां सीखने-सिखाने के नए तरीके अपनाए गए या अपनाए जा रहे हैं। आप पाएंगे कि इन सभी विद्यालयों के बीच सबसे बड़ी समानता यही है कि सभी के मूल में स्वतंत्रता, संवाद और विश्‍वास निहित है, जिनके अभाव में इस तरह के विद्यालयों की कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। इन्हें इस सिद्धांत के प्रमाण के रूप में देखा जा सकता है। इन विद्यालयों में बच्चों को दबाव मुक्त रखने और स्वतंत्रता देने के उद्देश्‍य से कक्षा-परीक्षा और स्कूल आने-जाने के समय तक में भी छूट दिखाई देती है।

इस अंक में हमारी कोशि‍श थी कि हम अधिक से अधिक ऐसे स्कूलों के बारे में जानकारी दें, जिनकी कार्यप्रणाली और शि‍क्षण प्रक्रिया परम्परागत पद्धति से हटकर है, जिन्हें ‘नवाचारी स्कूल’कहा जा सकता है। लेकिन हमें सरकार द्वारा तय मानकों के हिसाब से बहुत अच्छा कार्य कर रहे ‘अच्छे स्कूल’ तो बहुत सारे  मिले पर ‘नवाचारी स्कूल’ गिने-चुने ही। इस पर चिंतन करने की जरूरत है कि आखिर शि‍क्षा जैसे रचनात्मक क्षेत्र में भी नवाचार का इतना अभाव क्यों? क्यों नहीं हम लीक से हटकर सोच पा रहे हैं? इसके लिए कौन जिम्मेदार है? ‘क्या सख्ती से पेश आओ’नीति पर चलकर यह संभव है?

(शैक्षि‍क दखल, अंक-10, जुलाई 2017 से साभार)

Azamgarh : History, Culture and People

इयत्ता - Wed, 05/07/2017 - 02:05
आजमगढ़ : इतिहास और संस्कृति                          - हरिशंकर राढ़ी आजमगढ़ रेलवे स्टेशन    फोटो : हरिशंकर राढ़ी रामायणकालीन महामुनि अत्रि और सतीत्व की प्रतीक उनकी पत्नी अनुसूया के तीनों पुत्रों महर्षि दुर्वासा, दत्तात्रेय और महर्षि चन्द्र की कर्मभूमि का गौरव प्राप्त करने वाला क्षेत्र आजमगढ़ आज अपनी सांस्कृतिक विरासत और आधुनिकता के बीच संघर्ष करता दिख रहा है। आदिकवि महर्षि वाल्मीकि के तप से पावन तमसा के प्रवाह से पवित्र आजमगढ़ न जाने कितने पौराणिक, मिथकीय, प्रागैतिहासिक और ऐतिहासिक तथ्यों और सौन्दर्य को छिपाए अपने अतीत का अवलोकन करता प्रतीत हो रहा है। आजमगढ़ को अपनी आज की स्थिति पर गहरा क्षोभ और दुख जरूर हो रहा होगा कि जिस गरिमा और सौष्ठव से उसकी पहचान थी, वह अतीत में कहीं खो गयी है और चंद धार्मिक उन्मादी और बर्बर उसकी पहचान बनते जा रहे हैं। आजमगढ़ ने तो कभी सोचा भी न होगा कि उसे महर्षि दुर्वासा, दत्तात्रेय, वाल्मीकि, महापंडित राहुल    सांकृत्यायन, अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’, शिक्षाविद अल्लामा शिबली नोमानी, कैफी आजमी और श्यामनारायण पांडेय के बजाय बटला हाउस, आतंकवाद, जातिवादी राजनीति और अपराध से जाना जाएगा।
इतिहास- पौराणिक आख्यानों और रामायण काल की भौगोलिक स्थिति का आकलन करें तो यह कोशल राज्य का एक हिस्सा था। ऋषि विश्वामित्र राम-लक्ष्मण को सरयू (घाघरा) के किनाने-किनारे लेकर बलिया होते हुए जनकपुर सीता स्वयंवर में ले गए थे। जनश्रुति के अनुसार वे एक रात्रि सरयूतट पर दोहरीघाट में विश्राम किए थे, इसीलिए इसका नाम दोहरीघाट पड़ा। महराजगंज स्थित भैरव बाबा का स्थान एक विचित्र बिंदु पर पड़ता है और यह तत्कालीन संस्कृति के एक केंद्र  के रूप में था। विचित्रता यह है कि भैरव जी से पश्चिम में अयोध्या, उत्तर में गोरखनाथ की भूमि गोरखपुर और दक्षिण में बाबा विश्वनाथ की नगरी और भारत की सांस्कृतिक राजधानी वाराणसी बराबर दूरी पर हैं। यहां से ये तीनों स्थान लगभग चालीस कोस (120 किमी) की दूरी पर हैं। यह अपनी संस्कृति, शौर्य और आस्था के लिए प्रसिद्ध था और जनश्रुति के अनुसार यहां पर राजा दक्ष ने यज्ञ किया था।
आजमगढ़ की सरकारी वेबसाइट और कुछ अन्य स्रोतों की मानें तो रामकाल में आजमगढ़ में राजभर या भर समुदाय का वर्चस्व था और उसी की सत्ता थी। चूंकि इस क्षेत्र में बाहरी शक्तियों के आक्रमण का भय कम था, इसलिए यहां किलों तथा अन्य राजकीय महलों का कोई अवशेष नहीं मिलता। यदि आजमगढ़ में किलों की बात की जाए तो एक किला घोसी में है जो राजा घोष ने बनवाया था। किंतु, इस पर भी मतभेद है। कुछ लोगों का कहना है कि इसे असुरों ने बनवाया था।

महराजगंज, आजमगढ़ में  (भैरोजी मंदिर )  
फोटो : हरिशंकर राढ़ीआजमगढ़ का प्राचीन इतिहास अन्य भारतीय स्थानों की भांति अप्रमाणित ही है क्योंकि भारत में कभी इतिहास लिखने की परंपरा ही नहीं रही। देश का इतिहास और इतिहास लेखन पहले अंगेरेजों ने सत्यानाश को समर्पित किया और बाद में प्रायोजित तौर पर लिखने वाले ‘महान वामपंथी इतिहासकारों’ ने। भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण ने भी कुछ पाने के लिए कोई खास जहमत नहीं उठाई और यदि कहीं उठाई और प्रमाण भी दिया तो सरकारों और ‘बुद्धिजीवियों’ ने मानने से साफ इन्कार कर दिया। विश्वास न हो तो अयोध्या प्रकारण देख सकते हैं। आजमगढ़ में ऐसे अनेक स्थल हैं जिनकी खुदाई की गई होती तो अनेक रहस्यों से पर्दा उठता। भैरोजी में जहां मिडिल स्कूल  यदि वहां के ऊँचे टीले की खुदाई होती तो कुछ रहस्योद्घाटन हो सकता था। किसी समय यहां कूपर साहब का बंगला था और उससे पहले यहां शुजाउद्दौला के समय हिंदुओं और मुसलमानों में संघर्ष हुआ था।
1192 के तराइन के युद्ध में पृथ्वीराज चैहान मुहम्मद गोरी के हाथों पराजित हुआ तथा उसे बंदी बनाकर गजनी ले जाया गया और वहीं उसे मार डाला गया। 1193 में जयचंद भी मारा गया और वाराणसी सहित आजमगढ़ (तब आजमगढ़ वाराणसी का ही एक भाग था और आजमगढ़ नामकरण नहीं हुआ था) गोरी के नुमाइंदों के हाथ में आ गया।
आजमगढ की स्थापना और नामकरणयह एक निर्विवाद तथ्य माना जाता है कि आजमगढ़ की स्थापना आजमशाह ने की थी और उसी के नाम पर इस शहर का नाम आजमगढ़ रखा गया। जनश्रुतियों, विकीपीडिया और आजमगढ़ गजेटियर (Azamgarh Gazetteer, Vol XXXIII, of the District Gazetteer of the United Province of Agra and Oudh, Edited and Compiled by DRAKE –BROCKMAN – ICS. Published in 1911) के अनुसार आजमगढ़ की स्थापना ऐलवल और फुलवरिया गांवों के ध्वंशावशेषों पर की थी। किसी समय मेहनगर के गौतम राजपूत शासक विक्रमाजीत बहुत प्रभावशाली थे किंतु कालांतर में टैक्स इत्यादि की अदायगी न कर पाने के कारण उन्हें शुजाउद्दौला के दरबार में पेश होना पड़ा। उसके सामने दो स्थितियां थी - या तो अपने राज्य से हाथ धोएं या फिर इस्लाम स्वीकार करें। हालांकि इन शर्तों का कोई ठोस प्रमाण नहीं मिलता, किंतु उस समय की मुगल प्रवृत्ति को देखते हुए इस पर सहज विश्वास हो उठता है। विक्रमाजीत ने अपनी सत्ता बचाने के लिए इस्लाम धर्म स्वीकार कर लिया। उसने एक मुस्लिम युवती से शादी की जिससे दो पुत्र - आजमशाह और अजमत शाह पैदा हुए। आजमशाह ने आजमगढ़ की स्थापना की और अजमत शाह ने अजमतगढ़ बसाया जो जीयनपुर बाजार के पास सगड़ी तहसील में पड़ता है। आजमगढ़ की सरकारी वेबसाइट और आजमगढ़ गजेटियर के अनुसार आजमगढ़ की स्थापना सन् 1665 ई0 में हुई, हालांकि कुछ स्थानीय जानकारों का मानना है कि यह वाकया सन् 1770 के आस-पास का होगा क्योंकि शुजाउद्दौला का शासनकाल तभी माना जाता है। विकीपीडिया के मुताबिक विक्रमाजीत मुगलों के दिल्ली दरबार अपनी राज्य सीमा बढ़ाने की इच्छा लेकर गए थे। उन्हें वहां आजमगढ़ के इर्द-गिर्द 22 परगना दे दिए गए किंतु इसके बदले उन्हें इस्लाम कुबूल करना पड़ा।

आजमशाह की कन्नौज में 1675 ई0 में मृत्यु हो गई। अजमत शाह ने अजमतगढ़ में शासन करना शुरू तो किया किंतु वह कभी मजबूत शासक नहीं बन पाया। छबीले राम ने 1688 में अजमतगढ़ पर धावा बोल दिया और अजमत शाह जान बचाने के लिए गोरखपुर की ओर भागा। दोहरीघाट के निकट जब वह घाघरा पार कर रहा था तभी चिल्लूपार (बड़हलगंज) की ओर से उसे रोक लिया गया। अजमत शाह घाघरा मेें डूब गया या मार दिया गया। उसका पुत्र इकराम शासन व्यवस्था देखता था। उसके छोटे भाई  का नाम मोहब्बत था। अंततः इस परिवार से केवल मोहब्बत का पुत्र इरादत ही बचा जो सिमटी हुई जमींदारी संभालने लगा।

अंगरेजों के शासनकाल में 18 सितंबर, 1832 को आजमगढ़ आधिकारिक रूप से जिला बना और अलग से कलेक्टरेट बनाई गई। मि0 थामसन जनपद के पहले कलेक्टर बने जो आगे चलकर कंपनी के ले0 गवर्नर बने।


स्वाधीनता का प्रथम संग्राम और आजमगढ़अंगरेजों ने आजमगढ़ के भौगोलिक, ऐतिहासिक महत्त्व और यहां के लोगों का जुझारूपन देखते हुए सदैव बड़ी गंभीरता से लिया। सन् 1857 के आंदोलन में आजमगढ़ में अंगरेजों की 17वीं बटालियन डेरा जमाए थी। आंदोलनकारियों से भयंकर युद्ध हुआ और एक बार अंगरेजों के पांव उखड़ने लग गए थे। फिर लखनऊ से 19वीं और 34वीं बटालियन की मदद मिली और वे आंदोलन को कुचलने में कामयाब रहे।

प्रथम स्वाधीनता संग्राम में लखनऊ एक महत्त्वपूर्ण केंद्र रहा था। बेगम हजरत महल के संघर्ष के किस्से मशहूर हैं। एक बार लखनऊ जीत के बाद भी अंगेरजों के हाथ से निकल गया था और स्वाधीनता सेनानियों की विजय हो गई थी। किंतु उसके बाद अंगरेजों ने दूसरी टुकड़ियां और कप्तान भेजकर लखनऊ को जीत लिया। इस जीत का जश्न इंग्लैंण्ड में जोर-शोर मनाया गया और मरने वाले अंगरेज सिपाहियों को शहीद की संज्ञा दी गई। अंगरेज कवि अल्फ्रेड लार्ड टेन्नेशन की कविताओं के प्रशंसक भारत में भी बहुत से हैं। वह रानी विक्टोरिया का जमाना था और इंग्लैण्ड में उपनिवेश विस्तार की देशभक्ति चरम पर थी। विक्टोरिया काल में अंगरेजी साहित्य पूरी तरह राजभक्त हो चुका था और साहित्य में प्रेम, शृंगार और कोमल भावनाओं को निंदनीय दृष्टि से देखा गया। विक्टोरिया कालीन अंगरेजी साहित्य की प्रमुख विशेषता यह थी कि इंग्लैण्ड की शासक महिला होने के बावजूद महिलाओें को पथभ्रष्टिका के रूप में देखा गया और उन्हें विकास और विस्तार के मार्ग में बाधा माना गया। उनके यौन आकर्षण और प्रेम की निंदा की गई और शारीरिक संबंधों के लिए दंडित किया गया। राबर्ट ब्राउनिंग की कविता ‘माई लास्ट डचेस’ और ‘परफीरिया’ज लवर’ उनकी महिला विरोधी प्रतिनिधि कविताएं हैं। इस क्रम में लाॅर्ड टेन्नेशन का उल्लेख करना परमावश्यक है जिन्हें एक कवि के तौर पर बहुत सम्मान मिलता है। बहुत कम लोग जानते हैं कि टेन्नेशन ने ‘डिफेंस आॅफ लकनाॅऊ’ नाम की एक लंबी कविता लिखी है जिसमें 1857 के युद्ध में लखनऊ युद्ध गंवाने वाले अंगरेज सैनिकों को शहीद के तौर पर श्रद्धांजलि दी गई है और पुनः जीतने वालों की स्तुति की गई । इतना ही नहीं, भारतीय विद्रोहियों को अपशब्द भी कहा गया है। पढ़कर ऐसा लगता है कि लखनऊ टेन्नेशन की पुश्तैनी जायदाद रही हो और भारतीयों ने उस पर जबरन कब्जा कर लिया हो।

अठारहवीं सदी के प्रारंभ में आजमगढ़ जौनपुर और गाजीपुर की सरकारों के अधीन रहा। उस समय आजमगढ़ का राजा मोहब्बत शाह था। सन् 1857 की क्रांति में आजमगढ़ ने बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया और वीर कुंवर सिंह के नेतृत्व में भयंकर संघर्ष हुआ। 3 अक्टूबर, 1929 को महात्मा गंाधी ने आजमगढ़ का दौरा किया और श्रीकृष्ण पाठशाला में एक सभा का आयोजन हुआ जिसमें लगभग 75000 लोगों ने हिस्सा लिया तथा 5000 रुपये गांधी जी को भेंट किया गया।

भारत छोड़ो आंदोलन में भी आजमगढ़ ने अपने हिस्से की क्रांति में कोई कसर नहीं छोड़ी। सरायमीर के निकट रेलवे लाइन उखाड़ दी गई, तरवां थाना फूंक दिया गया और महराजगंज थाने को भी लगभग कब्जे में ले लिया गया। अंततः आजादी का जश्न मनाने में भी आजमगढ़ पीछे नहीं रहा।
तमसा: आजमगढ़ को पवित्र तमसा तट पर स्थित सबसे बड़ा शहर होने का सौभाग्य प्राप्त है। तमसा आज भी बह रही है और आजमगढ़ का लगभग तीन ओर से परिवेष्टित किए हुए है, ठीक वैसे ही जैसे काशी को गंगा ने कर रखा है। लेकिन, भौतिकता और लालच के दौर में होने वाले विकास और असंवेदनशीलता से वह भी धीरे-धीरे अन्य नदियों की भांति काली और मैली हो रही है। तमसा छोटी भले हो, उसका सांस्कृतिक, पौराणिक और ऐतिहासिक महत्त्व कम नहीं है। इसी के पावन तट पर आदि कवि महर्षि वाल्मीकि का आश्रम था, जहां आदिकाव्य रामायण का सृजन हुआ। इसी आश्रम में सीता का वनवास कटा और लव-कुश का जन्म हुआ। यहीं महर्षि वाल्मीकि को प्रथम छंद ज्ञान हुआ और उनका विश्वविख्यात श्लोक ‘मा निषाद प्रतिष्ठाम...’ प्रकट हुआ। इसी के तट पर भगवान दत्तात्रेय का आश्रम भी है जहां तमसा अपनी छोटी बहन कुंवर नदी से संगम करती है तो दुर्वासा का आश्रम तमसा और मझुई के संगम पर है।

तमसा आज जैसी भी स्थिति में हो, रामायण काल में यह एक पवित्र और महत्त्वपूर्ण नदी थी। गोस्वामी तुलसीदास ने अयोध्या कांड में इसका कई बार उल्लेख किया है। राम वनगमन और भरत के मनाने जाने के क्रम में तुलसीदास जी ने इसके महत्त्व को रेखांकित किया है। राम को वन में छोड़कर वापस आए सुमंत्र महाराज दशरथ को राम के वनगमन का वृत्तांत सुनाते हुए कहते हैं -
प्रथम बासु तमसा भयउ, दूसर सुरसरि तीर।
न्हाइ रहे जलपान करि सिय समेत रघुबीर ।। रामचरित मानस, अयो0 150।।

जब भरत राम को मनाने चित्रकूट के लिए गए तो उनका प्रथम रात्रि विश्राम तमसा तट पर ही हुआ था। रामचरित मानस का प्रसंग देखिए-
तमसा प्रथम दिवस करि बासू। दूसर गोमति तीर निवासू ।। अयोध्या0 187-8 ।।

भरत ने वापसी में चित्रकूट से अयोध्या की यात्रा कुल चार दिनों में की थी। उनकी दुखकातर मानसिकता को समझा जा सकता है। वापसी में पहला दिन तो बिना आहार के ही बीत गया था, ऐसी स्थिति में न गंगा ही अच्छी लगी होगी और न तमसा ही।
महर्षि वाल्मीकि के जीवन में तो तमसा बहुत गहराई तक समाई हुई थी। उन्होंने तमसा को और तमसा ने उन्हें गरिमा प्रदान की। ‘रामायण’ बालकांड के द्वितीय सर्ग में ही महर्षि वाल्मीकि तमसा को लेकर लिखते हैं-
स तु तीरं समासाद्य तमसाया मुनिस्तदा।
शिष्यमाह स्थितं पाश्र्वे दृष्ट्वा तीर्थकर्दमम् ।।4।।
अकर्दममिदं तीर्थं भरद्वाज निशामय।
रमणीयं प्रसन्नाम्बु सन्मनुष्यो यथा ।।5।।
न्यस्यतां कलशस्तात दीयतां वल्कलं मम।
इदमेवावगाहिष्ये तमसातीर्थमुत्तमम् ।।6।।

अर्थात् तमसा के तट पर पहुंचकर वहां के घाट को कीचड़ से रहित देखकर मुनि ने अपने पास खड़े हुए शिष्य से कहा - भरद्वाज देखो, यहां का घाट बहुत सुंदर है। इसमंे कीचड़ का नाम नहीं है। यहां का जल वैसा ही स्वच्छ है, जैसा सत्पुरुष का मन होता है। तात, यहीं कलश रख दो और मुझे मेरा वल्कल वस्त्र दो। मैं तमसा के इसी उत्तम तीर्थ में स्नान करूंगा।’
वनगमन के समय राम ने सीता और लक्ष्मण सहित तमसा तट पर रात्रि विश्राम किया था, जिसका उल्लेख रामचरित मानस में सुमंत्र के मुख से मिलता है। इसका वर्णन महर्षि वाल्मीकि ने भी किया है-
ततस्तु तमसातीरं रम्याश्रित्य राघवः ।
सीतामुद्वीक्ष्य सौमित्रिमिदं वचनमब्रवीत ।। रामायण, अयो0 सर्ग 46, श्लोक -1

उसी तमसा को हमारी विकसित सभ्यता और सुख-सुविधा मुंह चिढ़ा रही है। शायद ही उसे विश्वास होता हो कि कभी उसके तट पर भगवान श्रीराम को आश्रय मिला होगा और उन्होंने उसके सौन्दर्य और पवित्रता की भूरि-भूरि प्रशंसा की होगी। ऐसा भी एक दिन रहा होगा कि उसने न जाने कितने ऋषियों को अपने तट पर बसाया होगा और उनकी प्रशंसा पाई होगी। अब तो हमें भौतिक और अंधाधंुध विकास चाहिए।

तमसा, जिसे स्थानीय तौर पर प्रायः टौंस या टौंसिया के नाम से पुकारा जाता है, आजमगढ़ को पश्चिम, दक्षिण और पूरब से घेरे हुए है। पहले इस पर एक मात्र पुल था जो आजमगढ़ को जौनपुर-वाराणसी रोड से जोड़ता था। अंगरेजों का बनवाया हुआ। बाद में कलेक्टरी मैदान के पास एक और पुल बना जो अब अपर्याप्त सिद्ध होता है। आजकल अंगरेजों के बनाए पुल को तोड़कर नया पुल बनाया जा रहा है। सिधारी के पास का पुल पूरबी हिस्सों को जोड़ता है।
आजमगढ़ रेलवे स्टेशन    फोटो : हरिशंकर राढ़ीरेल यातायात:  रेल यातायात की दृष्टि से आजमगढ़ अब देश के प्रमुख हिस्सों से ठीक से जुड़ गया है। एक समय था कि यह जनपद रेलवे से लगभग वंचित था। सन 1997 में ब्राड गेज के चालू होने से पूर्व यहां के लोगों के लिए वाराणसी या शाहगंज ही आश्रय हुआ करता था। ऐसा नहीं था कि आजमगढ़ में रेल लाइन नहीं थी, थी किंतु मीटर गेज और प्रमुख मार्ग पर न होने से वह नहीं के बराबर ही थी। आज का आजमगढ़ रेलवे स्टेशन तब स्थानीय आजमगढ़ियों की बोली में पल्हनी स्टेशन के नाम से जाना जाता था और 75-80 की उम्र वाले आज भी उसे पल्हनी ही कहते हैं क्योंकि मुख्य शहर से लगभग तीन किमी की दूरी पर पल्हनी नामक गांव में यह बना था। आजमगढ़ गजेटियर के अनुसार आजमगढ़ 8 जून 1898 को तुर्तीपार मऊ रेलखंड से कनेक्ट हुआ था जो उस समय बंगाल और उत्तर पश्चिम रेल प्रखंड में पड़ता था। इसी तिथि पर मऊ- आजमगढ़ खंड को भी चालू किया गया जिस पर खुरहट, मोहम्दाबाद गोहना और जहानागंज रोड स्टेशन थे। 15 मार्च 1899 को इंदारा स्टेशन से बलिया लाइन को खोला गया और तुर्तीपार लाइन को बनारस तक विस्तारित किया गया। 14 फरवरी 1903 को मऊ-आजमगढ़ लाइन को शाहगंज से जोड़ दिया गया, अर्थात आजमगढ़ मुख्य रेलपथ से जुड़ गया और जौनपुर-वाराणसी पहुंचना आसान हो गया। 1904 में घोसी होते हुए दोहरीघाट के लिए रेलवे लाइन खोल दी गई और बाद में शाहगंज से गोशाईंगंज होते हुए फैजाबाद के लिए ट्रैक बिछाने का सर्वेक्षण किया गया।
आजमगढ़ रेलवे स्टेशन का एक दृश्य  
 फोटो : हरिशंकर राढ़ीकालांतर में वाराणसी - शाहगंज - फैजाबाद लाइन ब्राडगेज बन गई और आजमगढ़ -शाहगंज लाइन मीटर गेज ही। परिणाम यह हुआ कि यह रेल सेक्शन लगभग अनुपयोगी और अन्य क्षेत्रों से कटा ही रह गया। सन 2000 के आसपास आजमगढ़- दिल्ली (1997 के आसपास ब्राडगेज बन जाने पर ) कैफियात एक्सप्रेस चलने के पूर्व मैं भी दिल्ली की ट्रेन पकड़ने या तो गोरखपुर या फैजाबाद जाया करता था।

रेलवे के सुविधा अच्छी न होने से आजमगढ़ का रोडवेज बसस्टेशन काफी विकसित हुआ और यह आज भी उत्तर प्रदेश के बड़े बस स्टेशनों में एक है। यहां से प्रदेश के लगभग हर जिले के लिए बसें हैं और गाजीपुर तथा बलिया डिपो की बसें भी इसकी संख्या और सुविधा में वृद्धि करती हैं।
आजमगढ़ रेलवे स्टेशन पर  लेखक  हरिशंकर राढ़ी






विकास के इस युग में भी आजमगढ़ एक अदद हवाई अड्डे के लिए तरस रहा है। लखनऊ से पूरब जाने पर अगला हवाई अड्डा गया और पटना ही है जो बिहार में लगभग 500 किमी की दूरी पर है। मजे की बात है कि आजमगढ़ फैजाबाद रोड पर कप्तानगंज के पास मंदुरी में हवाई अड्डा बनकर तैयार है और इसका ट्रायल भी हो चुका है। न जाने कौन सी समस्या है कि इसे चालू नहीं किया जा सका।  इसके चालू होते ही आजमगढ़ ही नहीं, बलिया, दक्षिणी गोरखपुर, अंबेडकरनगर देश की हरेक हिस्से से जुड़ जाएंगे। जब सन 2014 के चुनाव में यहां से सांसद के तौर पर श्री मुलायम सिंह यादव चुने गए थे और उन्हीं के पुत्र श्री अखिलेश यादव की प्रदेश में सरकार थी, तब लोगों की आशाएं आसमान चूमने लगी थीं। किंतु ढाक के वही तीन पात। मंदुरी हवाई अड्डा उस दिन की बाट देख रहा है जब उसके रनवे पर कोई ऐसा विमान उतरे जिसमें आजमगढ़ की मिट्टी का कोई नाॅन वीआईपी हो।

आजमगढ़ विकास की राह पर है। यहां के लोग सीधे-सरल जरूर हैं किंतु वे विरोध और परिवर्तन की राजनीति में गहरा विश्वास करते हैं। इधर जब से जाति और धर्म की राजनीति का बोलबाला हुआ है, आजमगढ़ उसमें बहुत आगे है। कभी वामपंथियों का गढ़ था, अब जातिवादियों का है। यहां से अनेक कद्दावर नेता निकले किंतु आजमगढ़वासियों को तकलीफ है कि उनमें से किसी ने जिले के विकास के लिए कुछ नहीं किया। पहले स्व0 चंद्रजीत यादव इंदिरा गंाधी की कैबिनेट में मंत्री रहे। उन्होंने कुछ निजी परिचय के लोगों की सुधि ली। जनता सरकार के समय स्व0 रामनरेश यादव उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री हुए। उन्होंने कुछ करने की सोची कि 19 माह में उनकी सरकार का पतन हो गया। बाद में बहुत दिनों तक वे राज्यपाल रहे किंतु आजमगढ़ की याद उन्हें नहीं आई। यह भी दुखद रहा कि आजमगढ़ की जनता ने प्रायः सत्ताविरोध में मतदान किया और उसका दंश झेलने को मिला। हाँ, घोसी के सांसद और इंदिरा गांधी के करीबी स्व0 कल्पनाथ राय ने अपने क्षेत्र में बहुत विकास किया और मऊ को अलग जिला बनवाने में उनका प्रयास स्मरणीय है।
आजमगढ़ की बोली भोजपुरी है। एक अलग सी भोजपुरी जो बनारस और आजमगढ़ के लिए ही बनी है। इसमें न तो बिहार, बलिया और गोरखपुर का दीर्घ विस्तार है और न उच्चारण में ‘ओ’ या बंगाली पुट। यह अवधी और भोजपुरी का एक सीधा मिश्रण है, सपाट है। न तो मिठास की अधिकता और न अवधी की रूक्षता। आजमगढ़ की भोजपुरी यानी बनारसी भाषा। भोजपुरी भाषी क्षेत्रों में आजमगढ़ और बनारस ही ऐसे हैं जहां ‘है’ के लिए ‘हौ’ का प्रयोग होता है और ‘का हो गुरू, का हालि हौ?’ का एकात्म प्रयोग। अभी भी आजमगढ़ में दिखावा और प्रपंच का प्रकोप नहीं है। लोग राजनीति कैसी भी करें, जीवन बड़ी सादगी से जीते हैं।

dhanyavad

ये रही मैं, तुम्हारे सामने, तुमसे मुकाबला करने के लिए : अरुंधति रॉय

एक ज़िद्दी धुन - Mon, 03/07/2017 - 15:00

Photo by TARUN BHARTIYAतीन विभिन्न अंग्रेजी साक्षात्कारों से ली गईं चुनिंदा टिप्पणियां
रूपांतर : शिवप्रसाद जोशी

•मैं अपने काम के भीतर रहती हूं. हालांकि मैं ये कहूंगी कि कभी मैं उन लेखकों के बारे में सोचती थी जो अज्ञात रहना चाहते है- लेकिन मैं ऐसी नहीं रही हूं. क्योंकि इस देश में ये महत्त्वपूर्ण है, खासकर औरत के लिए, ये कहना जरूरी हैः “सुनो, ये रही मैं, मैं तुम्हारे सामने हूं तुमसे मुकाबला करने के लिए, और मैं यही सोचती हूं और मैं छिपूंगी नहीं.” अगर मुझसे किसी को साहस मिला है....प्रयोग का...कतार को छोड़कर निकल आने का....तो ये प्यारी बात है. मैं सोचती हूं कि हमारे लिए ये कहना बहुत महत्त्वपूर्ण हैः “हम कर सकते हैं! हम करेंगे! हमसे न उलझना! समझे.”

•बात ये है कि जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल को उस कुख्यात खनन कंपनी से आर्थिक सहायता मिलती है जो आदिवासियों की आवाज़ों को ख़ामोश कर रही है, उन्हें उनके घरों से बेदख़ल कर रही है, और अब तो इसे ज़ी टीवी भी फंड कर रहा है, जो आधा समय तो मेरा शिकार करने के लिए पीछे पड़ा रहता है. तो सिद्धांत के तौर पर मैं ऐसे उत्सवों में नहीं जा सकती हूं. कैसे जा सकती हूं. मैं उनके खिलाफ लिख रही हूं. कहने का मतलब, बात ये नहीं है कि मैं कोई पवित्र या शुद्ध व्यक्ति हूं, जैसे हम सब में विरोधाभास होते हैं, हमारे कई मुआमले होते हैं, मेरे साथ भी यही है, मैं गांधी जी की तरह नहीं हूं, लेकिन सिद्धांत में, इसपर टिके रहती हूं. दुनिया के सबसे गरीब लोगों की आवाजों को बंद कर दबा कर आप आख़िर कैसे आप फ्री स्पीच का चमकदार मंच बन जाते हैं जहां लेखकों की चहलपहल और उड़ानें हैं. मुझे इससे समस्या है.

•जब मैं किताब लिख रही थी, तो सामयिक मामलात ज्यादा नहीं देख पाई. मैं फेसबुक आदि पर भी नहीं हूं. यूं मुझे इससे कोई समस्या भी नहीं है, लेकिन मुझे एडवर्ड स्नोडेन ने एक बात बताई थी. कि जब फेसबुक शुरु हुआ था तो सीआईए ने उसका जश्न मनाया था क्योंकि उन्हें बिना कुछ किए एक साथ सारी सूचनाएं मिल गई थीं. इससे अलग, बात ये भी है कि जब आप लिख रहे होते हैं, तो पढ़ने के बारे में थोड़ा विचित्र से हो जाते हैं- कभी कभी मैं पूरी किताब नहीं पढ़ रही होती हूं, सिर्फ़ कुछ डुबकियां लगा लेती हूं, अपने विवेक को परखने के लिए.

•मैं मानती हूं कि नायपॉल एक मुकम्मल सिद्ध लेखक हैं, हालांकि अपने वैश्विक नजरिए को लेकर हम दो छोरो पर हैं. लेकिन वास्तव में, मुझ पर उस रूप में किसी लेखक का उतना प्रभाव नहीं है. मुझे कहना पड़ेगा कि मुझे ये बात अविश्वसनीय लगती है कि भारत में लेखकों, और कमोबेश समस्त भारतीय लेखकों, या कमसेकम जानेमाने लेखकों.....चलिए लेखक न भी कहें, लेकिन उनमें उन चीज़ों को छिपा लेने का एक स्तर है जो यहां समाज के मर्म में अवस्थित हैं, जैसे जाति. आप देखिए कि यहां कुछ भारी गड़बड़ है. ये इस तरह से है कि रंगभेदी दक्षिण अफ्रीका में लोग, रंगभेद का ज़िक्र किए बिना लिखते रहें.

•जो कुछ मैं जानती हूं, वो यहां है, जिस किसी को मैं जानती हूं, और वास्तव में बाहर मैं कभी रही नहीं हूं, विदेश में, तो किसी अजनबी देश में अकेले रह लेने का ख़्याल आतंकित भी करता है. लेकिन इस समय मैं मानती हूं कि भारत एक अत्यधिक ख़तरनाक जगह पर ठिठका हुआ है, मैं नहीं जानती कि किस के साथ क्या हो सकता है- मेरे साथ या किसी के साथ भी. ये कुछ उपद्रवी हैं जो ये तय करते हैं कि किसे मारा जाना है, किसे गोली मारी जानी है, किसे पीट पीटकर मार डालना है. मैं सोचती हूं कि शायद पहली बार ऐसा हो रहा है कि भारत में लोग, लेखक और अन्य लोग, उस तरह का संत्रास महसूस कर रहे है जैसे लोगो ने चिली और लातिन अमेरिका में झेला था. एक तरह का आतंक निर्मित हो रहा है जिसका हमें ठीक से अंदाज़ा भी नहीं है. ऐसे मौके आते हैं जब आप बहुत चिंतित हो जाते हैं, फिर गुस्सा, और फिर आप एक निडर ज़िद्दी बन जाते हैं. मैं मानती हूं कि ये कहानी अभी खुल ही रही है.

•ये किताब के बारे में नहीं है या वे क्या पढ़ते हैं क्या नहीं. ये उन कुछ निरंकुश नियमों के बारे में है जो उन्हें बना लिए हैं कि क्या कहना है, क्या नहीं कहना है, कौन क्या कह सकता है, कौन किसे मार सकता है. ये सब. मैं यहां रहती हूं, यहां लिखती हूं और ये किताब भी यहां के बारे में है. लेकिन स्थिति यहां बेकाबू है, नीचे ही. ये महज़ मार दिए जाने की बात नहीं है. ये कुछ ऐसा हैः अगर आप मुसलमान हैं तो जोखिम उठाए बगैर आप ट्रेन या बस में बैठ भी कैसे सकते हैं. तो मेरे साथ क्या होता है, मुझे नहीं पता है. मैंने एक किताब लिख दी है जिसे लिखने में मुझे दस साल लगे हैं, और दुनिया के 30 देशों में दुनिया के सबसे बड़े प्रकाशक इसे छाप रहे है. मैं कुछ मूर्खों को इस बात की इजाज़त नहीं दे सकती कि वे आएं और इसमें खलल डालें और तमाम हेडलाइनें उड़ा ले जाएं. मैं ऐसा क्यों करूं. बात उनके छोटे दिमागों के बारे में नहीं है, ये बात साहित्य की है. इसकी हिफ़ाज़त की जानी चहिए और इस पर्यावरण में तो समझबूझ कर की जानी चाहिए.

•इस उपन्यास को लिखने में दस साल लगे हैं. लेकिन मैं समझती हूं कि द गॉड ऑफ़ स्मॉल थिंग्स और आज के बीच पिछले बीस साल में, मैंने यात्राएं की हैं, और इतनी सारी चीज़ों में मुब्तिला रही हूं, उनके बारे में लिखती रही हूं. जब मैं राजनैतिक निबंध लिख रही थी तो उनमें एक तरह की बड़ी अरजेंसी थी, हर बार आप एक स्पेस को या एक मुद्दे को खोल देना चाहते थे. लेकिन फिक्शन अपना समय लेता है और ये परतदार होता है. कश्मीर जैसी जगह में जो उन्माद प्रकट हो रहा हैः आप वहां की फ़िज़ां में निहित आतंक का वर्णन किस तरह करेंगे. बात सिर्फ किसी मानवाधिकार रिपोर्ट की नहीं है कि कि कितने लोग कहां कहां मरे. जो वहां हो रहा है उसके साइकोसिस का वर्णन कैसे करेंगे आप. फ़िक्शन के सिवाय.....मैंने फिक्शन इसलिए नहीं चुना क्योंकि मैं कश्मीर के बारे में कुछ कहना चाहती थी, लेकिन फिक्शन आपको चुनता है. मैं नहीं समझती कि ये बात इतनी सरल होती होगी कि मेरे पास देने के लिए कुछ सूचना है और इसलिए मैं एक किताब लिखना चाहती थी. ये ये तो देखने का एक तरीका है. सोचने का एक तरीका. ये एक प्रार्थना है, ये एक गीत है.
(दहिंदू डॉट कॉम में जास ओयाह से बातचीत)

`गल्प कभी घोषणापत्र नहीं हो सकता...`
•जो यात्राएं मैंने की हैं, जिन लोगों से मिली हूं, जो जीवन मैंने जिया है, और जो राजनैतिक निबंध मैने पिछले बीस साल में लिखे हैं वे सब द मिनिस्ट्री ऑफ़ अटमोस्ट हैपीनेस के स्वप्न निर्माण की प्रक्रिया का हिस्सा हैं. लेकिन निबंध और नॉवल दो बिल्कुल अलग विधाएं हैं. फ़िक्शन लिखते हुए मैं रिलेक्स रहती हूं, लगभग स्वप्न में. मैं किसी तरह की जल्दी में नहीं हूं. मैं उन सब लोगों और प्राणियों (दुष्ट भी) के साथ रहना चाहती थी जो दस साल पहले मेरे पास आने लगे थे....देखने के लिए हम आपस में एक दूसरे को पसंद करते हैं या नहीं. फ़िक्शन कभी घोषणापत्र नहीं हो सकता, ढकाछिपा राजनैतिक निबंध, जिसमें कृत्रिम किरदार आपकी तरफ से बोलें, ये एक ऐसा यूनिवर्स बनाने की बात है जहां लोग घूमते भटकते रह सकें, मैं ऐसी कहानी लिखना चाहती थी कि जिसमें मैं किसी के पास से यूं ही न गुज़र जाऊं किसी छोटे से छोटे किरदार के साने से भी, बल्कि रुकं, एक बीड़ी जलाऊं और वक्त पूछूं. ऐसी कहानी जिसमें बैकग्राऊंड अचानक फ़ोरग्राउंड बन जाता है. शहर एक व्यक्ति बन जाता है...मेरे लिए फ़िक्शन लिखना, प्रार्थना के सबसे करीब है.
(स्क्रॉल डॉट इन)
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`समयांतर` से साभार
(अरुंधति की तस्वीर The MINISTERY of UTMOST HAPPINESS के बारे में तरुण भारतीय की परिचयात्मक फिल्म से)

सलाहुद्दीन के बहाने अमरीका कश्मीर में बिचौलिया बनने की फ़िराक में तो नहीं है .

जंतर-मंतर - Mon, 03/07/2017 - 08:31


शेष नारायण सिंह

पाकिस्तान में आतंकवाद  पूरी दुनिया में चर्चा का विषय बना हुआ   है . यूरोप में   हुए आतंकी हमलों में ज्यादातर के सूत्र पाकिस्तान से जुड़े हुए होते हैं . इस  हफ्ते पाकिस्तान और आतंक के हवाले से दो बड़ी घटनाएं हुईं . एक  तो अमरीका ने पाकिस्तान से चलने वाले आतंकवादी संगठन , हिजबुल मुजाहिदीन के मुखिया सैयद  सलाहुद्दीन को अंतरराष्ट्रीय आतंकी घोषित कर दिया.  अपने मुल्क में इसके बाद बड़ी खुशियाँ मनाई जा रही हैं . लेकिन इसमें बहुत खुश होने की बात नहीं है क्योंकि यह भी संभव है कि अमरीका इसी बहाने कश्मीर के मामले में बिचौलिया बनने के अपने सपने को  साकार करने की कोशिश करना चाह  रहा हो . इस अनुमान का आधार यह है कि सैयद सलाहुद्दीन पाकिस्तान में अमरीकी प्रशासन का बहुत ही लाड़ला रह  चुका है .  अमरीकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन के दबाव में तत्कालीन पाकिस्तानी राष्ट्रपति जनरल परवेज़ मुशर्रफ ने एक बार सलाहुद्दीन को भारत  के खिलाफ आतंकी  हमले बंद करने के लिए तैयार भी कर लिया था . वैसे भी  सलाहुद्दीन को अंतरराष्ट्रीय आतंकी घोषित करके अमरीका ने केवल भारत को लालीपाप ही थमाया है . इस  घोषणा का मतलब यह है कि अब सलाहुद्दीन अमरीका की यात्रा नहीं कर सकता और अमरीका में कोई बैंक अकाउंट या कोई अन्य संपत्ति नहीं रख सकता . अगर ऐसी कोई संपत्ति वहां होगी तो वह ज़ब्त कर ली जायेगी  .  पाकिस्तान और कश्मीर में रूचि रकने वाले सभी लोगों  को मालूम है कि सलाहुद्दीन का आतंक का धंधा अमरीकी की मदद के बिना भी चलता रहेगा .   
दूसरी घटना यह है कि चीन पाकिस्तान के साथ एक बार फिर खड़ा हो  गया है .. एक सरकारी बयान में चीन की तरफ से कहा गया है कि ' चीन का विचार है कि आतंकवाद  के  खिलाफ सहयोग को बढाया जाना चाहिए . अंतरराष्ट्रीय बिरादरी को इस  सम्बन्ध में पाकिस्तान की कोशिशों को मान्यता देना चाहिए और उसको समर्थन करना चाहिए. चीन मानता है कि अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद के खिलाफ चल रहे युद्ध में पकिस्तान अगले दस्ते में खडा है और इस दिशा में प्रयास कर रहा है '. चीन के बयान का लुब्बो लुबाब यह है कि पाकिस्तान आतंकवाद का समर्थक नहीं बल्कि वह आतंकवाद से पीड़ित है.
 चीन का यह बयान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के साझा बयान के बाद या यों कहें कि उसको बेअसर करने के लिए आया है . साझा बयान में कहा गया था कि ' आतंकवाद को ख़त्म करना हमारी ( भारत और अमरीका की  ) सबसे  बड़ी प्राथमिकता है . हमने आतंकवाद , अतिवाद और बुनियादी धार्मिक  ध्रुवीकरण के बारे में बात की . हमारे सहयोग का  प्रमुख उद्देश्य आतंकवाद से युद्ध ,  आतंकियों के सुरक्षित ठिकानों  और आतंकी अभयारण्यों को ख़त्म करना  भी है .' यह  संयुक्त बयान आतंकवाद और पाकिस्तान को जोड़ता हुआ दिखता है . ज़ाहिर है अब अमरीका भी  पाकिस्तान में पल रहे आतंकवाद का शिकार है , वरना एक दौर वह भी था जब पाकिस्तान में आतंकवाद  को पालना अमरीकी विदेश नीति का हिस्सा हुआ  करता था और पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति  जिया उल हक १९८० के दशक में आतंकवाद को हवा देने के अमरीकी प्रोजक्ट के  मुख्य एजेंट हुआ करते थे . आतंकवाद को पाकिस्तान में सरकारी नीति के रूप में इस्तेमाल करने के सिलसिला १९८० के दशक में फौजी तानाशाह और चीफ  मार्शल लॉ प्रशासक ज़नरल जिया उल हक ने शुरू  किया था. उसने आतंकियों की एक बड़ी फौज बनाई थी जो अमरीकी  पैसे से तैयार की गयी थी .  अमरीका को अफगानिस्तान में मौजूद रूसी सैनकों  से लड़ाई के लिए बन्दे चाहिए थे . पाकिस्तान  ने अपनी सेना की शाखा आई  एस आई के ज़रिये बड़ी संख्या में पाकिस्तानी बेरोजगार नौजवानों को  ट्रेनिंग दे कर अफगानिस्तान में  भेज दिया था . जब अफगानिस्तान में  अमरीका की रूचि नहीं रही तो  पाकिस्तान  की आई एस आई ने इनको ही भारत  में आतंक फैलाने के लिए लगा दिया .  सोवियत रूस के विघटन के बाद आतंकवादियों की यह फौज कश्मीर में लग गयी . सलाहुद्दीन उसी दौर की पैदाइश  है .कश्मीर में युसूफ शाह नाम से  चुनाव लड़कर हारने के  बाद वह पाकिस्तान चला गया था और वहां उसको अफगान आतंकी गुलबुद्दीन हिकमतयार ने ट्रेनिंग दी थी. हिकमतयार अल  कायदा वाले ओसामा बिन लादेन का ख़ास आदमी हुआ करता था. शुरू में इसका संगठन जमाते इस्लामी का सहयोगी हुआ करता था लेकिन बाद में सलाहुद्दीन ने अपना  स्वतंत्र संगठन बना लिया.  
 चीन के  ताज़ा बयान को अगर इस पृष्ठभूमि में देखा जाए तो बात समझ में आती है क्योंकि आज पाकिस्तान  में भी खूब आतंकी हमले  हो  रहे हैं . लेकिन यह भी सच है  कि जब अमरीका की मदद से पाकिस्तानी तानाशाह, जिया उल हक आतंकवाद को अपनी सरकार की नीति के रूप में विकसित कर रहे थे , तभी दुनिया भर के समझदार लोगों ने उन्हें चेतावनी दी थी. लेकिन उन्होंने किसी की नहीं सुनी . जनरल जिया ने धार्मिक उन्मादियों और फौज के जिद्दी जनरलों की सलाह से देश के बेकार फिर रहे नौजवानों की एक जमात बनायी थी जिसकी मदद से उन्होंने अफगानिस्तान और भारत में आतंकवाद की खेती की थी .उसी खेती का ज़हर आज पाकिस्तान के अस्तित्व पर सवालिया निशान बन कर खडा हो गया है.. अमरीका की सुरक्षा पर भी उसी आतंकवाद का साया मंडरा रहा है जिसके तामझाम को अमरीका ने ही पाकिस्तानी हुक्मरानों की मदद से स्थापित किया गया था . दुनिया जानती है कि अमरीका का सबसे बड़ा दुश्मन, अल कायदा , अमरीकी पैसे से ही बनाया गया था और उसके संस्थापक ओसामा बिन लादेन अमरीका के ख़ास चेला हुआ करते थे .आज बात बदल गयी है . आज अमरीका में पाकिस्तान को आतंक के मुख्य क्षेत्र के रूप में पहचाना जाता है . जो अमरीका कभी  पाकिस्तानी आतंकवाद का फाइनेंसर हुआ करता था  वही आज उसके एक सरगना को अंतरराष्ट्रीय आतंकवादी घोषित कर चुका है .और भारत सरकार के प्रधानमंत्री को यह बताने की  कोशिश कर रहा है कि वह कश्मीर के मामले में भारत का सहयोगी बनने को तैयार है .
अब कश्मीर का मसला बहुत जटिल हो गया  है . पाकिस्तान कभी नहीं चाहेगा  कि वहां की समस्या हल हो.  कश्मीर के मसले को जिंदा रखना पाकिस्तानी शासकों की मजबूरी है क्योंकि १९४८ में जब जिनाह की सरपरस्ती में कश्मीर पर कबायली हमला हुआ था उसके बाद से ही भारत के प्रति नफरत के पाकिस्तानी अभियान में कश्मीर विवाद का  भारी योगदान रहा है अगर पाकिस्तान के हुक्मरान उसको ही ख़त्म कर देंगें तो उनके लिए बहुत मुश्किल हो जायेगी.
पाकिस्तान की एक देश में स्थापना ही एक तिकड़म का परिणाम है. वहां की एक बड़ी आबादी के रिश्तेदार और आधा परिवार भारत में है .उनकी सांस्कृतिक जड़ें भारत में हैं लेकिन धर्म  के आधार पर बने पाकिस्तान में रहने को अभिशप्त हैं .  शुरू से ही पाकिस्तानी शासकों ने धर्म के सहारे अवाम को इकठ्ठा रखने की कोशिश की . अब उनको पता चल गया है कि ऐसा सोचना उनकी बहुत बड़ी गलती थी. जब भी धर्म को राज काज में दखल देने की आज़ादी दी जायेगी राष्ट्र का वही हाल होगा जो आज पाकिस्तान का हो रहा है .इसलिए धर्म और गाय के नाम पर  चल रहे खूनी खेल की अनदेखी  करने वाले भारतीय नेताओं को  भी सावधान होने की ज़रूरत  है क्योंकि जब अर्धशिक्षित और लोकतंत्र से अनभिज्ञ धार्मिक नेता  राजसत्ता को अपने इशारे पर नचाने लगते हैं  तो वही होता है जो पाकिस्तान का हाल हो रहा है.   धर्म को राजकाज का मुख्य आधार बनाकर चलने वालों में १९८९ के बाद के इरान  को भी  देखा जा सकता है . ईरान जो कभी आधुनिकता की दौड़ में बहुत आगे हुआ करता था , धार्मिक कठमुल्लों की  ताक़त बढ़ने के बाद आज दुनिया में अलग थलग पड़ गया है .
 आजकल पाकिस्तान की  दोस्ती चीन से बहुत ज़्यादा है लेकिन अभी कुछ वर्ष पहले तक पाकिस्तान में रहने वाला आम आदमी अमरीकी और साउदी  अरब की  खैरात पर जिंदा था.  उन दिनों पाकिस्तान पर अमरीका की ख़ास मेहरबानी हुआ करती थी. आज अमरीकी दोस्ती का  हाथ भारत की तरफ बढ़ चुका है  और चीन के बढ़ते क़दम को रोकने के  लिए अमरीका भारत से अच्छे   सम्बन्ध बनाने की फ़िराक में है .आज पाकिस्तान पूरी तरह  से अस्थिरता के कगार पर खड़ा है . कभी भारत और  बाद  में अफगानिस्तान के खिलाफ आतंकवादियों की   जमातें तैयार करने वाला पाकिस्तान   आज अपनी एकता को बनाये रखने के लिए संघर्ष कर रहा है . अमरीका से दोस्ती और धार्मिक उन्माद को राजनीति की मुख्य धारा में लाकर पाकिस्तान का यह हाल हुआ है . भारत को भी  समकालीन इतिहास के इस पक्ष पर नज़र रखनी चाहिए कि कहीं अपने महान देश की हालत अपने शासकों की अदूरदर्शिता के कारण पाकिस्तान जैसी न  हो जाए. पाकिस्तान को अमरीका ने   इस इलाके में अपने प्रभाव को बनाए रखने के लिये इस्तेमाल किया  था , कहीं भारत उसी जाल में न फंस जाए. पाकिस्तान जिस तरह से अपने ही बनाए दलदल में फंस चुका है.और उस दलदल से निकलना पाकिस्तान के अब बहुत मुश्किल है .  उसकी मजबूरी का फायदा अब  चीन उठा रहा है . पाकिस्तान में चीन भारी विनिवेश कर रहा है . ज़ाहिर है वह पाकिस्तान को उसी तरह की कूटनीतिक मदद कर रहा  है जैसी कभी अमरीका किया करता था. १९७१ की बांग्लादेश  की लड़ाई  में पाकिस्तान ने भारत की सेना को धमकाने के लिए बंगाल की खाड़ी में अपने सातवें बेड़े  के युद्धक विमान वाहक जहाज़ ,इंटरप्राइज़ को भेज  दिया  था. भारत के इतिहास के सबसे मुश्किल दौर ,१९७१ में वह  पाकिस्तान को भारत के खिलाफ इस्तेमाल होने के  लिए हथियार दे रहा था . एक बड़ा सवाल है कि क्या भारत को अमरीका उसी तरह का सहायक बनना चाहिए जैसा कभी पाकिस्तान हुआ करता था. भारत के राजनयिकों को इस बात को गंभीरता से समझना पडेगा कि कहीं अमरीका  सलाहुद्दीन को   अंतर राष्ट्रीय आतंकी घोषित करके कश्मीर में हस्तक्षेप  करने की भूमिका तो नहीं बना रहा है . सलाहुद्दीन  के बहाने अमरीका कश्मीर में बिचौलिया बनने की फ़िराक में तो नहीं है .
शेष नारायण सिंह

पाकिस्तान में आतंकवाद  पूरी दुनिया में चर्चा का विषय बना हुआ   है . यूरोप में   हुए आतंकी हमलों में ज्यादातर के सूत्र पाकिस्तान से जुड़े हुए होते हैं . इस  हफ्ते पाकिस्तान और आतंक के हवाले से दो बड़ी घटनाएं हुईं . एक  तो अमरीका ने पाकिस्तान से चलने वाले आतंकवादी संगठन , हिजबुल मुजाहिदीन के मुखिया सैयद  सलाहुद्दीन को अंतरराष्ट्रीय आतंकी घोषित कर दिया.  अपने मुल्क में इसके बाद बड़ी खुशियाँ मनाई जा रही हैं . लेकिन इसमें बहुत खुश होने की बात नहीं है क्योंकि यह भी संभव है कि अमरीका इसी बहाने कश्मीर के मामले में बिचौलिया बनने के अपने सपने को  साकार करने की कोशिश करना चाह  रहा हो . इस अनुमान का आधार यह है कि सैयद सलाहुद्दीन पाकिस्तान में अमरीकी प्रशासन का बहुत ही लाड़ला रह  चुका है .  अमरीकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन के दबाव में तत्कालीन पाकिस्तानी राष्ट्रपति जनरल परवेज़ मुशर्रफ ने एक बार सलाहुद्दीन को भारत  के खिलाफ आतंकी  हमले बंद करने के लिए तैयार भी कर लिया था . वैसे भी  सलाहुद्दीन को अंतरराष्ट्रीय आतंकी घोषित करके अमरीका ने केवल भारत को लालीपाप ही थमाया है . इस  घोषणा का मतलब यह है कि अब सलाहुद्दीन अमरीका की यात्रा नहीं कर सकता और अमरीका में कोई बैंक अकाउंट या कोई अन्य संपत्ति नहीं रख सकता . अगर ऐसी कोई संपत्ति वहां होगी तो वह ज़ब्त कर ली जायेगी  .  पाकिस्तान और कश्मीर में रूचि रकने वाले सभी लोगों  को मालूम है कि सलाहुद्दीन का आतंक का धंधा अमरीकी की मदद के बिना भी चलता रहेगा .   
दूसरी घटना यह है कि चीन पाकिस्तान के साथ एक बार फिर खड़ा हो  गया है .. एक सरकारी बयान में चीन की तरफ से कहा गया है कि ' चीन का विचार है कि आतंकवाद  के  खिलाफ सहयोग को बढाया जाना चाहिए . अंतरराष्ट्रीय बिरादरी को इस  सम्बन्ध में पाकिस्तान की कोशिशों को मान्यता देना चाहिए और उसको समर्थन करना चाहिए. चीन मानता है कि अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद के खिलाफ चल रहे युद्ध में पकिस्तान अगले दस्ते में खडा है और इस दिशा में प्रयास कर रहा है '. चीन के बयान का लुब्बो लुबाब यह है कि पाकिस्तान आतंकवाद का समर्थक नहीं बल्कि वह आतंकवाद से पीड़ित है.
 चीन का यह बयान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के साझा बयान के बाद या यों कहें कि उसको बेअसर करने के लिए आया है . साझा बयान में कहा गया था कि ' आतंकवाद को ख़त्म करना हमारी ( भारत और अमरीका की  ) सबसे  बड़ी प्राथमिकता है . हमने आतंकवाद , अतिवाद और बुनियादी धार्मिक  ध्रुवीकरण के बारे में बात की . हमारे सहयोग का  प्रमुख उद्देश्य आतंकवाद से युद्ध ,  आतंकियों के सुरक्षित ठिकानों  और आतंकी अभयारण्यों को ख़त्म करना  भी है .' यह  संयुक्त बयान आतंकवाद और पाकिस्तान को जोड़ता हुआ दिखता है . ज़ाहिर है अब अमरीका भी  पाकिस्तान में पल रहे आतंकवाद का शिकार है , वरना एक दौर वह भी था जब पाकिस्तान में आतंकवाद  को पालना अमरीकी विदेश नीति का हिस्सा हुआ  करता था और पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति  जिया उल हक १९८० के दशक में आतंकवाद को हवा देने के अमरीकी प्रोजक्ट के  मुख्य एजेंट हुआ करते थे . आतंकवाद को पाकिस्तान में सरकारी नीति के रूप में इस्तेमाल करने के सिलसिला १९८० के दशक में फौजी तानाशाह और चीफ  मार्शल लॉ प्रशासक ज़नरल जिया उल हक ने शुरू  किया था. उसने आतंकियों की एक बड़ी फौज बनाई थी जो अमरीकी  पैसे से तैयार की गयी थी .  अमरीका को अफगानिस्तान में मौजूद रूसी सैनकों  से लड़ाई के लिए बन्दे चाहिए थे . पाकिस्तान  ने अपनी सेना की शाखा आई  एस आई के ज़रिये बड़ी संख्या में पाकिस्तानी बेरोजगार नौजवानों को  ट्रेनिंग दे कर अफगानिस्तान में  भेज दिया था . जब अफगानिस्तान में  अमरीका की रूचि नहीं रही तो  पाकिस्तान  की आई एस आई ने इनको ही भारत  में आतंक फैलाने के लिए लगा दिया .  सोवियत रूस के विघटन के बाद आतंकवादियों की यह फौज कश्मीर में लग गयी . सलाहुद्दीन उसी दौर की पैदाइश  है .कश्मीर में युसूफ शाह नाम से  चुनाव लड़कर हारने के  बाद वह पाकिस्तान चला गया था और वहां उसको अफगान आतंकी गुलबुद्दीन हिकमतयार ने ट्रेनिंग दी थी. हिकमतयार अल  कायदा वाले ओसामा बिन लादेन का ख़ास आदमी हुआ करता था. शुरू में इसका संगठन जमाते इस्लामी का सहयोगी हुआ करता था लेकिन बाद में सलाहुद्दीन ने अपना  स्वतंत्र संगठन बना लिया.  
 चीन के  ताज़ा बयान को अगर इस पृष्ठभूमि में देखा जाए तो बात समझ में आती है क्योंकि आज पाकिस्तान  में भी खूब आतंकी हमले  हो  रहे हैं . लेकिन यह भी सच है  कि जब अमरीका की मदद से पाकिस्तानी तानाशाह, जिया उल हक आतंकवाद को अपनी सरकार की नीति के रूप में विकसित कर रहे थे , तभी दुनिया भर के समझदार लोगों ने उन्हें चेतावनी दी थी. लेकिन उन्होंने किसी की नहीं सुनी . जनरल जिया ने धार्मिक उन्मादियों और फौज के जिद्दी जनरलों की सलाह से देश के बेकार फिर रहे नौजवानों की एक जमात बनायी थी जिसकी मदद से उन्होंने अफगानिस्तान और भारत में आतंकवाद की खेती की थी .उसी खेती का ज़हर आज पाकिस्तान के अस्तित्व पर सवालिया निशान बन कर खडा हो गया है.. अमरीका की सुरक्षा पर भी उसी आतंकवाद का साया मंडरा रहा है जिसके तामझाम को अमरीका ने ही पाकिस्तानी हुक्मरानों की मदद से स्थापित किया गया था . दुनिया जानती है कि अमरीका का सबसे बड़ा दुश्मन, अल कायदा , अमरीकी पैसे से ही बनाया गया था और उसके संस्थापक ओसामा बिन लादेन अमरीका के ख़ास चेला हुआ करते थे .आज बात बदल गयी है . आज अमरीका में पाकिस्तान को आतंक के मुख्य क्षेत्र के रूप में पहचाना जाता है . जो अमरीका कभी  पाकिस्तानी आतंकवाद का फाइनेंसर हुआ करता था  वही आज उसके एक सरगना को अंतरराष्ट्रीय आतंकवादी घोषित कर चुका है .और भारत सरकार के प्रधानमंत्री को यह बताने की  कोशिश कर रहा है कि वह कश्मीर के मामले में भारत का सहयोगी बनने को तैयार है .
अब कश्मीर का मसला बहुत जटिल हो गया  है . पाकिस्तान कभी नहीं चाहेगा  कि वहां की समस्या हल हो.  कश्मीर के मसले को जिंदा रखना पाकिस्तानी शासकों की मजबूरी है क्योंकि १९४८ में जब जिनाह की सरपरस्ती में कश्मीर पर कबायली हमला हुआ था उसके बाद से ही भारत के प्रति नफरत के पाकिस्तानी अभियान में कश्मीर विवाद का  भारी योगदान रहा है अगर पाकिस्तान के हुक्मरान उसको ही ख़त्म कर देंगें तो उनके लिए बहुत मुश्किल हो जायेगी.
पाकिस्तान की एक देश में स्थापना ही एक तिकड़म का परिणाम है. वहां की एक बड़ी आबादी के रिश्तेदार और आधा परिवार भारत में है .उनकी सांस्कृतिक जड़ें भारत में हैं लेकिन धर्म  के आधार पर बने पाकिस्तान में रहने को अभिशप्त हैं .  शुरू से ही पाकिस्तानी शासकों ने धर्म के सहारे अवाम को इकठ्ठा रखने की कोशिश की . अब उनको पता चल गया है कि ऐसा सोचना उनकी बहुत बड़ी गलती थी. जब भी धर्म को राज काज में दखल देने की आज़ादी दी जायेगी राष्ट्र का वही हाल होगा जो आज पाकिस्तान का हो रहा है .इसलिए धर्म और गाय के नाम पर  चल रहे खूनी खेल की अनदेखी  करने वाले भारतीय नेताओं को  भी सावधान होने की ज़रूरत  है क्योंकि जब अर्धशिक्षित और लोकतंत्र से अनभिज्ञ धार्मिक नेता  राजसत्ता को अपने इशारे पर नचाने लगते हैं  तो वही होता है जो पाकिस्तान का हाल हो रहा है.   धर्म को राजकाज का मुख्य आधार बनाकर चलने वालों में १९८९ के बाद के इरान  को भी  देखा जा सकता है . ईरान जो कभी आधुनिकता की दौड़ में बहुत आगे हुआ करता था , धार्मिक कठमुल्लों की  ताक़त बढ़ने के बाद आज दुनिया में अलग थलग पड़ गया है .
 आजकल पाकिस्तान की  दोस्ती चीन से बहुत ज़्यादा है लेकिन अभी कुछ वर्ष पहले तक पाकिस्तान में रहने वाला आम आदमी अमरीकी और साउदी  अरब की  खैरात पर जिंदा था.  उन दिनों पाकिस्तान पर अमरीका की ख़ास मेहरबानी हुआ करती थी. आज अमरीकी दोस्ती का  हाथ भारत की तरफ बढ़ चुका है  और चीन के बढ़ते क़दम को रोकने के  लिए अमरीका भारत से अच्छे   सम्बन्ध बनाने की फ़िराक में है .आज पाकिस्तान पूरी तरह  से अस्थिरता के कगार पर खड़ा है . कभी भारत और  बाद  में अफगानिस्तान के खिलाफ आतंकवादियों की   जमातें तैयार करने वाला पाकिस्तान   आज अपनी एकता को बनाये रखने के लिए संघर्ष कर रहा है . अमरीका से दोस्ती और धार्मिक उन्माद को राजनीति की मुख्य धारा में लाकर पाकिस्तान का यह हाल हुआ है . भारत को भी  समकालीन इतिहास के इस पक्ष पर नज़र रखनी चाहिए कि कहीं अपने महान देश की हालत अपने शासकों की अदूरदर्शिता के कारण पाकिस्तान जैसी न  हो जाए. पाकिस्तान को अमरीका ने   इस इलाके में अपने प्रभाव को बनाए रखने के लिये इस्तेमाल किया  था , कहीं भारत उसी जाल में न फंस जाए. पाकिस्तान जिस तरह से अपने ही बनाए दलदल में फंस चुका है.और उस दलदल से निकलना पाकिस्तान के अब बहुत मुश्किल है .  उसकी मजबूरी का फायदा अब  चीन उठा रहा है . पाकिस्तान में चीन भारी विनिवेश कर रहा है . ज़ाहिर है वह पाकिस्तान को उसी तरह की कूटनीतिक मदद कर रहा  है जैसी कभी अमरीका किया करता था. १९७१ की बांग्लादेश  की लड़ाई  में पाकिस्तान ने भारत की सेना को धमकाने के लिए बंगाल की खाड़ी में अपने सातवें बेड़े  के युद्धक विमान वाहक जहाज़ ,इंटरप्राइज़ को भेज  दिया  था. भारत के इतिहास के सबसे मुश्किल दौर ,१९७१ में वह  पाकिस्तान को भारत के खिलाफ इस्तेमाल होने के  लिए हथियार दे रहा था . एक बड़ा सवाल है कि क्या भारत को अमरीका उसी तरह का सहायक बनना चाहिए जैसा कभी पाकिस्तान हुआ करता था. भारत के राजनयिकों को इस बात को गंभीरता से समझना पडेगा कि कहीं अमरीका  सलाहुद्दीन को   अंतर राष्ट्रीय आतंकी घोषित करके कश्मीर में हस्तक्षेप  करने की भूमिका तो नहीं बना रहा है . 

चुपचाप अट्टहास - 36: देश मेरे दिमाग में कुलबुलाता है

अब क्या सीखूँ
दिमाग भर चुका है
एक आदर्श की अनंत प्रतियों से
कि मैंने इस धरती को अँधेरे धुँए में बदल देना है

दिमाग में लाशें भरी हैं
मन में जो संगीत गूँजता है
वह भूखे सताए लोगों की चीखें हैं
नंगे-अधनंगे गश्त करते हैं मेरे दिमाग की धमनियों में
चीखते हुए राष्ट्रगीत।

उनके जिस्मों पर से कीड़े-मकौड़े, साँप-बिच्छू गुजरते हैं
मेरा दिमाग कीटों की बिष्ठाओं से भर गया है
गर्भपात से गिरे भ्रूण ज़हन में किलबिलाते हैं
पूरा देश मेरे दिमाग में कुलबुलाता है

सीने के आरपार जाती किरणें
मेरी अपनी छवि दिखलाती हैं अंतर्मन में
हड्डियों पर हमलावर लिंग लटकाए दिखता हूँ
चेहरा सूखे बालों से भरा होता है
अब क्या सीखूँ
इंसानियत के कत्ल की इंतहा दिखती मुझे
अपनी तस्वीर में।

What can I possibly learn now
My mind is filled
With innumerable replicas of an ideal
That I must transform this planet into a dark smoke pit.

My mind is filled with the dead
I hear music
Of the starving downtrodden
They march naked in the veins in my brains
Howling the National anthem.

Insects, snakes and scorpions, crawl on their bodies
My brain is filled with the excreta of these insects
Aborted fetuses swing around in my brain
The entire Nation wriggles in my brains

Rays piercing through and through the chest
Display  my own image in my inner mind
I appear with a violent phallus hanging on my bones
My face is filled with uncouth hair
What can I possibly learn now
I see the limits of trampled humanity
in my own image.

गैर राजनीतिक उपन्यास एक मिथक है : अरुंधति रॉय

एक ज़िद्दी धुन - Sun, 02/07/2017 - 13:43
तीन विभिन्न अंग्रेजी साक्षात्कारों से ली गईं चुनिंदा टिप्पणियां - 1रूपांतर : शिवप्रसाद जोशी
-गैर राजनीतिक उपन्यास नहीं लिखा जा सकता है. ये एक मिथक है. मैं मानती हूं कि हर छोटी परी कथा भी किसी न किसी रूप में राजनीतिक होती है. जब आप किसी चीज़ से परहेज़ करते हैं, तो वो भी उतना ही राजनीतिक है जितना कि उस चीज़ को संबोधित करना.* -मेरे लिए, कहानी कहने का तरीका भी कहानी जितना ही महत्त्वपूर्ण है. जब आप कश्मीर जैसी जगहों के बारे में लिखते हैं, या मध्य भारत के जंगलों में जो हो रहा है उसके बारे में लिखते हैं, जिस किसी चीज़ के बारे में.....मैं कहती रही हूं कि फ़िक्शन एक सत्य है. क्योंकि इन जगहों में जो घटित हो रहा है, उस आतंक को सिर्फ़ रिपोर्ताज और प्रमाण आधारित रिपोर्टिंग या फुटनोट्स से समझाना, कभीकभार मुमकिन नहीं होता है. ख़ुद फ़िज़ां और वो लोगों को क्या करने करे लिए विवश करती है और आपको उस ख़ौफ़ के साथ कैसे बसर करनी होती है, सालोंसाल उसके साथ कैसा एडजस्ट करना होता है, तो ये दास्तान वास्तव में सिर्फ़ फ़िक्शन ही सुना सकता है.*-अपने राजनीतिक लेखन में अक्सर ही मैं वास्तव में अपने लेखन से ज़्यादा आक्रोश महसूस करती हूं. जब मैं फ़िक्शन लिखती हूं तो मैं अपनी देह में बिल्कुल अलग व्यक्ति की तरह होती हूं. फ़िक्शन लिखते हुए मुझमें एक बड़ी शांति रहती है. हो सकता है ये अवचेतन में हो, लेकिन ऊपरी तौर पर मैं किसी ऑडियंस या पाठक या किसी और चीज़ के बारे में नहीं जानती हूं. मैं उसके स्वागत को लेकर बहुत ज़्यादा नहीं सोच रही होती हूं.*

-हाल में, विदेशी संवाददाताओ के एक दल के साथ, मैं दिल्ली में थी. भारत में जो कुछ हो रहा है और उसे कम्यूनिकेट करने की असमर्थता से वे लगभग सदमे में थे. क्योंकि वो चीज़ बॉलीवुड और मुक्त बाज़ार और बढ़ती इकोनमी के शोर में दबी हुई है....(उधर)..सैकड़ों हजारों राजनैतिक कार्यकर्ता भारत को उस बिंदु पर ले आ रहे हैं जहां उसे लगभह हिंदू राष्ट्र घोषित कर दिया गया है. मैं लोगों से कहती थी कि अगर भारतीय बाजार पूरी तरह खुला न होता, और भारत एक बड़ी वित्तीय ठिकाना न होता, तो हम आज जनसंहार और रासायनिक हथियारों और सड़कों में पीट पीटकर मार डालने की वारदातों, दलितों पर चाबुक बरसाने की वारदात के बारे में लिख रहे होते. अभी तो ऐसी भीड़ और ऐसे विजिलांटी हैं जो मुसलमानों की दाढ़ी खींच रहे हैं, उन्हें हिंदू नारे कहने पर मजबूर कर रहे हैं, लोगों को पीट पीटकर खत्म कर रहे हैं.*

-मुक्त बाज़ार इस सब के लिए जिम्मेदार नहीं है लेकिन मुक्त बाजार इस सब को शक्ति मुहैया कराता है. जो अवसर वो हासिल कराता है, अंतरराष्ट्रीय वित्त, ये उस तथ्य को धीरे धीरे ढक देते हैं कि क्रूरता और धर्मांधता का एक स्तर है.. अगर किसी दूसरे देश में, हजारों लोगों के कत्ल की कोई अगुवाई कर रहा होता, मुसलमानों को शरणार्थी शिविरों में धकेला जा रहा होता, तो बाहरी दुनिया में इसे अलग ढंग से लिया जाता. लेकिन अब भारत मार्केट फ्रेंडली, बॉलीवुडीय, धुंधला सा नाज़ुक गुदगुदा खिलौना है.*
-अमेरिका में बेलगाम पूंजीवाद के लिए कच्चा माल दूसरे देशों पर युद्ध थोपकर निकाला जा सकता है. भारत जैसे देशों में हम खुद का उपनिवेशीकरण कर ऐसा कर रहे हैं. मैं सिर्फ रूपक में नहीं कह रही हूं. मैं कहती हूं कि मध्य भारत के जंगल, अर्धसैनिक बलों से भरे हुए हैं जो स्थानीय लोगों को अपनी जमीन से बेदख़ल करने की कोशिश कर रहे हैं. सरकार के बहुत नजदीक एक व्यक्ति ने कहा कि “अफ्रीकी लोग सड़कों पर पीटे जा रहे हैं, मार डाले जा रहे हैं, भारत को नस्ली बताया जा रहा है,” तो उसने कहा, “हम नस्ली कैसे हो सकते हैं. हम इन काले दक्षिण भारतीयों के साथ भी तो रहते हैं.” हजारों किसान और आदिवासी जन, देशद्रोह के आरोप में जेल में बंद है क्योंकि वे अपनी जमीन को बचाए रखने की लड़ाई लड़ रहे हैं और वे जमीनें खनन कंपनियों को सौंपी जा रही हैं. जो वहां हो रहा है और बाहर भारत की जो छवि है, उन दोनों में एक गहरा विच्छेद है.* (स्लेट डॉट कॉम में इसाक शोटनर से बातचीत के अंश)`समयांतर` से साभार

गाय

शैशव - Fri, 30/06/2017 - 22:31

इस कविता से हर उर्दू सिखने वाले ने ऊर्दू  का पाठ पढना शुरू किया है। इसे इस्माइल मेरठी ने 1858 मे  लिखा था …अगर मेरे किसी भाई के पास इससे अच्छी कविता हो तो जरूर बताये। गाय से बेइंतहा प्यार हुए बगैर ऐसी कविता असंभव है। पढ़िए-

****

रब का शुक्र अदा कर भाई 

ज़िस ने हमारी गाय बनाई 

उस मालिक को क्योंना पुकारे 

जिसने पिलाए दूध की  धारे 

ख़ाक को उसने सब्ज़ बनाया 

सब्ज़ को फिर इस गाय ने  खाया 

कल जो घास चरी थी वन में 

दूध बनी वो गाय के थन में 

सुभान अल्लाह  दूध है कैसा 

ताजा, गरम, सफेद और मीठा 

दूध में भीगी रोटी मेरी 

उसके करम ने बख्शी सेहरी 

दूध, दही और मट्ठा मसका

दे ना खुदा तो किसके बस का

गाय को दी क्या अच्छी सूरत

खूबी की हैं गोया मूरत 

दाना, दुनका, भूसी, चोकर 

खा लेती है सब खुश होकर 

खाकर तिनके और ठठेरे 

दूध है देती शाम सबेरे 

क्या गरीब और कैसी प्यारी 

सुबह हुई जंगल को सिधारी 

सब्ज़ से ये मैदान हरा है 

झील में पानी साफ भरा है 

पानी मौजें मार रहा है 

चरवाहा पुचकार रहा है 

पानी पीकर .चारा चरकर 

शाम को आई अपने घर पर 

दोरी में जो दिन है काटा

बच्चे को किस प्यार से चाटा

गाय हमारे हक में नेमत 

दूध है देती खा के बनस्पत 

बछड़े इसके बैल बनाएं

जो खेती के काम में आएं

रब की हम्द-ओ-सना कर भाई 

जिसने  ऐसी गाय बनाई ।

**

यह नज्म आज भी उर्दू की हर पहली किताब का सबक है । गाय की तारीफ़ में ऐसी दूसरी कविता शायद ही मिले।


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बीसवीं शताब्दी के तानसेन- उस्ताद बड़े गुलाम अली खान :  संजीव ठाकुर

लेखक मंच - Fri, 30/06/2017 - 01:54

उस्ताद बड़े गुलाम अली खान

आज से करीब ढाई-तीन सौ साल पहले फजल दाद खान नाम के एक पठान शख्स लाहौर के पास स्थित कसूर नाम के स्थान में ‘सुर की देवी’ की तलाश में निकले। उन्होंने सुन रखा था कि ‘सुर की देवी’ को पहाड़ों, जंगलों और नदियों में पाया जा सकता है तो वे सालों साल ‘सुर की देवी’ की तलाश में भटकते रहे। एक दिन वे एक पत्थर से सिर टेककर बैठे हुए थे कि सामने के जंगल से आवाज़ आई—”फजल दाद! मैं यहाँ हूँ।’’

फजल दाद उस आवाज़ की दिशा में गए तो देखा कि संपूर्ण जंगल स्वर्णिम प्रकाश से जगमगा रहा था। अंदर जाने पर उन्हें एक लंबी स्त्री दिखाई पड़ीं जो ऊपर आकाश की ओर उड़ रही थीं। उन्होंने फजल दाद को संगीत का वरदान दिया और वापस लौटकर अपने लोगों को संगीत सिखाने को कहा। ‘सुर की देवी’ ने यह भी कहा कि ‘संगीत तुम्हारे परिवार में पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलेगा।’ फजल दाद कसूर लौट आए। वरदान पाकर लौटने के कारण लोग उन्हें पीर फजल दाद खान कहने लगे। वे अपने लोगों को संगीत सिखाने लगे।

फजल दाद के वरदान पाने की यह कहानी सच हो या न हो, यह तो सच है कि संगीत इस परिवार में पीढ़ी-दर-पीढ़ी चला—खल्क अली खान, इरशाद अली खान, इदा खान, अली बख्श खान से होते हुए बड़े गुलाम अली खान तक पहुँच गया। पीर फजल दाद खान से चला आया संगीत का यह घराना ‘कसूर का घराना’ कहलाया! इस घराने में यों तो बड़े गुलाम अली खान के पिता अली बख्श खान और चाचा काले खान की गिनती देश के चोटी के गायकों में की जाती थी, लेकिन बड़े गुलाम अली खान ने जो ख्याति अर्जित की वह इस घराने के किसी भी गायक के लिए संभव नहीं हो सकी थी। बड़े गुलाम अली खान की प्रतिभा को पहचानकर उनके पिता अली बख्श खान ने कहा था—‘‘हमारी सात पीढिय़ों में भी तुम्हारे जैसा कोई न हो सका, न ही आगे किसी के होने की संभावना है।’’ अली बख्श खान की बात सही साबित हुई!

कसूर घराने के होने के बावजूद अपनी गायकी को और अधिक समृद्ध करने के लिए बड़े गुलाम अली खान के पिता अली बख्श और चाचा काले खान ने पटियाला घराने के उस्ताद फतेह अली खान साहब से तालीम ली थी। इस तरह उनकी गायकी में कसूर और पटियाला दोनों घराने का रंग आ गया था। उनका घराना भी आगे ‘कसूर-पटियाला का घराना’ कहा जाने लगा। बड़े गुलाम अली खान, जिन्होंने अपने पिता और चाचा दोनों से तालीम ली थी, दोनों की गायकी की विशेषताओं से लैस हो गए थे। पिता से सरगम और चाचा से तानों की अदायगी के गुर उन्होंने सीखे थे।

बड़े गुलाम अली खान का जन्म कसूर में 2 अप्रैल, 1902 को हुआ था—पिता अली बख्श और माता माई बुड्ढी की पहली संतान के रूप में। घर में संगीत का वातावरण होने के कारण गुलाम अली ने तीन-चार साल की उम्र में ही स्वरों को थोड़ा-बहुत समझ लिया था। मातृभाषा की तरह उन्होंने सरगम सीखा था। छुटपन में ही गुलाम अली ने गड़ेरियों, किसानों, फकीरों और जोगियों से सुनकर ढेर सारे गीत सीख लिये थे। कसूर के लोग उनको रोककर ये गीत सुना करते थे। कभी वे बाजार मिठाई या दही लेने जाते तो हलवाई उन्हें गाना सुनाने को कहता। गाना सुनकर हलवाई उन्हें दही-मिठाई दे देता और पैसे भी नहीं लेता। माँ इस बात पर गुस्सा करतीं।

संगीत के प्रति गुलाम अली के लगाव को देखकर उनके पिता ने छ: साल की उम्र में उन्हें अपने छोटे भाई के हवाले कर दिया था। काले खान ही उन्हें संगीत सिखाते थे। पुत्र नहीं होने की वजह से काले खान उन्हें पुत्र की तरह ही मानते थे। गुस्सा आने पर पिटाई भी करते थे। गुलाम अली अपने चाचा की सेवा में लगे रहते थे और संगीत सीखते रहते थे। तीन ही साल में उन्होंने इतना सीख लिया कि अपने चाचा के साथ संगत करने लगे। नौ साल की उम्र में उन्होंने दिल्ली-दरबार में काले खान का संगत किया था। जार्ज पंचम के दिल्ली आगमन के अवसर पर दिल्ली-दरबार में होने वाले संगीत के कार्यक्रम में उस्ताद काले खान को भी बुलाया गया था। काले खान के संगत कलाकार के रूप में गुलाम अली दिल्ली गए थे। राजा-महाराजा और नवाबों के सामने गाने की चुनौती का सामना करने का उनका यह पहला अनुभव था।

उस्ताद काले खान की तरह ही गुलाम अली की आवाज़ में ताकत थी। उसको उन्होंने रियाज के द्वारा और अधिक ताकतवर बना दिया था। पहले लाहौर के निकट सुनसान इमारत चार बुर्जी में पूरे गले से किया गया रियाज और बाद में रावी के किनारे रात भर किया गया रियाज उनके गले को तैयार करने में काफी मददगार रहा था। 1918 में चाचा काले खान की असामयिक मृत्यु के बाद तो गुलाम अली रियाज पर और अधिक ध्यान देने लगे थे। असल में उस्ताद काले खान की मृत्यु के बाद कसूर और लाहौर के लोग कहने लगे थे—”संगीत तो काले खान के साथ ही कसूर से चला गया। इस परिवार में अब वैसा कौन हो सकता है?’’….यह बात गुलाम अली को चुभ गई और उन्होंने अपने चाचा की तरह का गायक बनने की ठान ली। अब वे दिन-रात रियाज करने लगे। रियाज के साथ-साथ वे सारंगी बजाना भी सीखते थे। सारंगी के इस अभ्यास ने भी उनके गले को तैयार करने में काफी मदद पहुँचाई थी।

काले खान की मृत्यु के बाद गुलाम अली की माँ ने गुलाम अली को पिता के पास जम्मू जाने को कहा। गुलाम अली के पिता जम्मू में रहा करते थे। जम्मू में उन्होंने दूसरी शादी भी कर ली थी। जम्मू में गुलाम अली को देखकर पिता बहुत खुश हुए, लेकिन बेटे को सौतेली माँ के साथ रखने में उन्हें परेशानी थी। इस वजह से उन्होंने अपनी एक शिष्या के घर गुलाम अली को रखवा दिया। कुछ दिनों बाद पिता ने बेटे को एक पल्टा सिखा दिया और लाहौर लौटकर पूरे साल उसका रियाज करने को कहा। गुलाम अली ने उन्हें गाकर सुनाया तो वे भावुक हो गए और आशीर्वाद देते हुए कहा कि तुम्हारे जैसा गायक हमारे खानदान में पैदा नहीं हुआ था!

गुलाम अली अठारह-उन्नीस साल के थे, जब वे अपने पिता के साथ लखनऊ की एक महफिल में गाने गए थे। अवध के ताल्लुकेदारों की महफिल में उन्होंने पिता के साथ गाया था। एक दिन लखनऊ के एक हम्माम में नहाते हुए उनकी मुलाकात लखनऊ के प्रसिद्ध गायक उस्ताद नज़ीर खान से हुई। नज़ीर खान उन्हें लखनऊ की जानी-मानी तवायफ नब्बन बाई के यहाँ ले गए। उस्ताद नज़ीर खान ने गुलाम अली से कहा—”मैं जानता हूँ कि तुम्हारे चाचा और पिता ने तुम्हें अच्छी तालीम दी है और तुम एक अच्छे गायक हो, लेकिन तुम अपने स्केल से ऊपर के स्केल में गा सकते हो?’’ गुलाम अली ने विनम्रता से जवाब दिया—”खुदा की मेहरबानी और आपके आशीर्वाद से, आप जिस स्केल में कहें, मैं गा सकता हूँ।’’….नज़ीर खान खुद हारमोनियम लेकर बैठे, तबला और तानपूरा मिलाया गया। और जब गुलाम अली ने मंद्र स्वर में गायन किया तो उनकी आवाज़ हारमोनियम के मंद्र स्वर से भी नीची थी। इसी तरह उन्होंने तार सप्तक में तान लेकर उस्ताद को अचंभित कर दिया। उस्ताद नज़ीर खान ने गुलाम अली के सम्मान में अपने कान छू लिये। नब्बन बाई उनके गाने से इतनी प्रभावित हुईं कि उन्हें कुछ दिन अपने घर रहने का आग्रह करने लगीं। शाम में जब नब्बन बाई को सुनने लखनऊ के बड़े लोग आए, नब्बन बाई ने गुलाम अली को गाने को कह दिया। लखनऊ के संगीत प्रेमी लोगों पर गुलाम अली के गायन का बहुत अच्छा प्रभाव पड़ा। जब गुलाम अली लौटकर पिता के पास आए तो पिता ने गुस्सा दिखाते हुए कहा—”बहुत हो गया। कल सुबह नाई आकर तुम्हारी घुँघराली लटें काट जाएगा। सारे फसाद की जड़ यही है। औरतें तुमसे इसी वजह से आकर्षित होती हैं।’’

अगले दिन गुलाम अली के बाल मूँड़ दिए गए और अविलम्ब पिता उन्हें लेकर लाहौर वापस आ गए!

लाहौर लौटकर गुलाम अली फिर से रावी तट पर रात भर रियाज करने लगे। चाँदनी रात हो या अँधेरी रात, वे रियाज करना नहीं छोड़ते। धीरे-धीरे लोगों को पता चल गया कि गुलाम अली रात में रियाज करते हैं। उनका गायन सुनने लोग रात में रावी तट पर पहुँच जाते। इससे गुलाम अली को श्रोताओं के समक्ष गाने का अनुभव भी मिल जाता। 1921 में पिता के फालिज के शिकार हो जाने पर रावी तट पर उनके रियाज का क्रम टूट गया। अब घर की पूरी जिम्मेदारी उनके कंधों पर थी। उन्होंने अपने परिवार के साथ-साथ अपनी सौतेली माँ और सौतेले भाई-बहनों की जिम्मेदारी भी उठा ली। इसके लिए वे जगह-जगह कार्यक्रम देने लगे। शीघ्र ही श्रेष्ठ युवा गायकों में उनकी गिनती होने लगी। उन्हीं दिनों उनका नामकरण बड़े गुलाम अली के रूप में हुआ। दरअसल गुलाम अली नाम के एक और गायक थे। लोग उन्हें छोटे गुलाम अली कहते थे। बड़े गुलाम अली को लोग बड़े गुलाम अली कहने लगे।

1927 ई. में बड़े गुलाम अली की शादी अल्लाह जिवाई से हो गई। अपनी पत्नी के साथ गुलाम अली ने लाहौर के कूचा कश्मीरियां में अपनी गृहस्थी बसाई। दो साल बाद अल्लाह जिवाई ने एक पुत्र को जन्म दिया, जिसका नाम करामत अली रखा गया। इसके डेढ़ साल बाद दूसरा बेटा आया, जिसका नाम मुनव्वर रखा गया। लेकिन बड़े गुलाम अली का यह सुखद वैवाहिक जीवन अधिक दिनों तक नहीं चल पाया। पाँच साल होते-होते इस पर ग्रहण लग गया। 1932 में अचानक बीमार होकर अल्लाह जिवाई अल्लाह को प्यारी हो गईं। दो छोटे-छोटे बच्चों को उनके परिवार वालों ने सँभाला और बड़े गुलाम अली को संगीत ने। उन्हीं दिनों अपने सुरमंडल के तार छेड़कर उन्होंने गाया—”याद पिया की आए, यह दु:ख सहा न जाए, हाय राम!”….अचानक आ गई इन पंक्तियों में से बड़े गुलाम अली खान का दु:ख फूट रहा था। हृदय से निकली इन पंक्तियों और स्वरों से उस दिन एक ऐसी ठुमरी सृजित हुई थी जो बड़े गुलाम अली की सबसे लोकप्रिय ठुमरियों में तो शुमार की ही जाती है, विरह की अभिव्यक्ति के खयाल से आज भी इसका कोई सानी नहीं है। इसी तरह बड़े गुलाम अली की एक और बहुचर्चित ठुमरी उन्हीं दिनों पहली बार गाई गई थी—”का करूँ सजनी, आए न बालम।….रोवत-रोवत कल ना पड़त हैं, याद आवत जब उन की बतियाँ!”

बड़े गुलाम अली अपने तैयार गले और सुमधुर आवाज़ के साथ पूरे देश में कार्यक्रम देते घूम रहे थे। उनके घूमते रहने और लौटकर लाहौर आने में एक कनस्तर घी की महत्त्वपूर्ण भूमिका थी। घर से निकलते हुए वे अपने और अपने साजिंदों के उपयोग के लिए एक कनस्तर घी रखवा लेते थे। घी का वह कनस्तर जहाँ खाली हो जाता, वहीं से वे घर को लौट जाते। लौटकर घर आते तो बच्चों के लिए तरह-तरह के उपहार लाते। पास-पड़ोस के लोग उम्मीदें लेकर उनके पास आने लगते। किसी की बेटी का ब्याह बड़े गुलाम अली के आने तक रुका होता तो किसी की बीमारी का इलाज। खान साहब किसी को निराश नहीं करते। उनका विश्वास था कि जब उनकी जेब खाली हो जाएगी, अल्ला मियाँ फिर से उसे भर देंगे।

लाहौर के हीरामंडी में उन दिनों गुलजार बाई नाम की एक तवायफ रहा करती थीं। वह युवा थीं, अच्छा गाती थीं। उनका नाम था। जब उन्होंने बड़े गुलाम अली के बारे में सुना तो उनसे मिलने की इच्छा जताई। बड़े गुलाम अली उनसे मिलने गए। अब वह गुलजार बाई की शाम की महफिल में रोज जाने लगे। गुलजार बाई के गाने में संगत देने के लिए सारंगी भी बजाने लगे। संगीत से जुड़ा उनका नाता धीरे-धीरे प्यार के नाते में बँध गया। लेकिन एक दिन क्या हुआ कि महफिल में गुलजार बाई ने एक नए श्रोता की ओर कुछ ज्यादा ध्यान दे दिया। गुलाम अली को गुस्सा आ गया। वे महफिल छोड़कर घर चले आए और बैग में अपना सामान भरकर स्टेशन को चल पड़े। टिकट खिड़की पर जाकर उन्होंने एक टिकट माँगा। खिड़की पर बैठे क्लर्क ने पूछा—”कहाँ का टिकट चाहिए?” तो बड़े गुलाम अली बोले—”पहली गाड़ी जहाँ जाती हो, वहीं का टिकट दे दीजिए!” क्लर्क ने बताया—”अगली गाड़ी बम्बई जा रही है।“’’ बड़े गुलाम अली ने बम्बई का टिकट लिया और गाड़ी के आने पर उस पर बैठ गए। यह 1940 का कोई दिन था।

बम्बई पहुँचकर बड़े गुलाम अली ने भेंडी बाजार का पता पूछा। अपने चाचा काले खान से उन्होंने भेंडी बाजार में रहने वाली गायिका गंगा बाई का नाम सुन रखा था। बस वे पूछते-पाछते गंगा बाई के घर पहुँच गए। गंगा बाई ने उन्हें अपने घर पर ठहराया। थोड़े दिनों बाद अपने दु:ख से निकलकर बड़े गुलाम अली ने रियाज करना शुरू कर दिया। गंगा बाई उनके गायन से बहुत प्रभावित हुईं। गंगा बाई के घर आने-जाने वाले लोग भी उनके गायन से प्रभावित होते। धीरे-धीरे बम्बई के संगीत प्रेमियों के बीच गुलाम अली की चर्चा होने लगी। एक दिन बम्बई की प्रसिद्ध गायिका जद्दन बाई (अभिनेत्री नरगिस की माँ) के घर संगीत का कार्यक्रम रखा गया। वहाँ फिल्म से जुड़ी कई हस्तियाँ भी मौजूद थीं। बड़े गुलाम अली के गायन ने सबका मन मोह लिया। उन्हें नजराना दिया गया और अलग-अलग जगहों पर गाने का आमंत्रण भी।

कई महीने बाद एक दिन पता लगाकर बड़े गुलाम अली की प्रेमिका गुलजार बाई बम्बई पहुँच गईं। वह गुलाम अली को लाहौर लौट चलने को मनाने लगीं। वह गुलाम अली का साथ पाने के लिए अपना धन, अपनी संपत्ति, यहाँ तक कि गायन छोड़ देने को तैयार थीं। लेकिन बड़े गुलाम अली का दिल नहीं पिघला तो नहीं ही पिघला। गुलजार बाई को अकेले लाहौर लौटना पड़ा।

गंगा बाई के घर में रहते हुए ही बड़े गुलाम अली को निजामुद्दीन खान जैसे तबला वादक मिले और मिले ‘हरि ओम तत् सत’ भजन के बोल। ‘हरि ओम तत् सत’ के बोल लेकर एक गायक बड़े गुलाम अली के पास आए थे। आकर उन्होंने यह भजन बड़े गुलाम अली को सुनाया था। बड़े गुलाम अली इससे इतने प्रभावित हुए कि ‘पहाड़ी’ में इसकी धुन बना दी। यह बड़े गुलाम अली का बहुचर्चित भजन है। महात्मा गाँधी ने एक बार इसे बड़े गुलाम अली के मुँह से सुना था और प्रशंसा में उनको पोस्टकार्ड लिखा था।

बम्बई में रहते हुए बड़े गुलाम अली को साल-डेढ़ साल हो गए थे। एक दिन उनके बेटे मुनव्वर का पत्र आया जिसमें उन्होंने पिता को याद करते हुए लिखा था—”अगर मैं चिडिय़ा होता तो उड़कर आपके पास चला आता और आपके साथ ही रहता।’’ बेटे की इस बात का ऐसा प्रभाव पड़ा कि बड़े गुलाम अली तुरंत लाहौर लौट गए। लाहौर में उनके बेटों की अच्छी देखभाल हो रही थी, यह देखकर उन्हें अच्छा लगा। अब उन्होंने छोटे बेटे मुनव्वर को संगीत सिखाना भी शुरू कर दिया।

1943 का वर्ष अवसान पर था। घर के अंदर बैठे बड़े गुलाम अली कुछ नया सृजन करने की तैयारी में थे कि डाकिए की आवाज़ ने बाधित कर दिया। उठकर गए तो डाकिया उन्हें एक पत्र दे गया। पत्र बम्बई से आया था। वह ‘विक्रमादित्य संगीत उत्सव’ का निमंत्रण-पत्र था। इस संगीत उत्सव में, जहाँ हिन्दुस्तान के कई दिग्गज शास्त्रीय गायक हिस्सा लेने वाले थे, बड़े गुलाम अली को बुलाया जाना बड़े सम्मान की बात थी। कार्यक्रम अगले वर्ष यानी 1944 में होना था। बड़े गुलाम अली दुबारा बम्बई गए। कार्यक्रम में उन्होंने ‘मारवा’ और ‘पूरिया’ जैसे दो बहुत मिलते-जुलते रागों पर अपना अधिकार दिखलाकर अपनी धाक जमा दी। कार्यक्रम में उस्ताद फैयाज खाँ, अल्लादिया खान, केसर बाई जैसे प्रतिष्ठित गायक-गायिकाओं का भी गायन हुआ था। उनके बीच बड़े गुलाम अली खान ने अपना सिक्का मनवा लिया था।

कार्यक्रम के बाद सुप्रसिद्ध संगीतज्ञ प्रो. बी.आर. देवधर बड़े गुलाम अली के पास गए और उनके शक्तिशाली गायन का राज़ पूछा। बड़े गुलाम अली खान ने कहा—”पंडित जी! मैं यहाँ आपको वह नहीं बता सकता हूँ। आप मुझे अपने स्कूल में बुलाइए, वहाँ बताऊँगा।’’

प्रो. देवधर ने ससम्मान उन्हें अपने स्कूल में बुलाया। अगले दिन प्रो. देवधर के विद्यार्थियों और संगीतकारों के बीच बड़े गुलाम अली ने अपने गाने की ताकत का प्रदर्शन किया। उनके गले से ऐसी आवाज़ निकल रही थी जैसे दस तानपूरों को मिलाकर आवाज़ निकल सकती है। इसके बाद उन्होंने रियाज करने के तरीके के बारे में बतलाया था। फिर कणयुक्त स्वरों के प्रयोग का तरीका भी बतलाया था।

बम्बई में ही उस्ताद बड़े गुलाम अली खान को दक्षिण भारतीय संगीतज्ञ जी.एन. बाला सुब्रमण्यम ने मद्रास आने का निमंत्रण दिया। बड़े गुलाम अली ने मद्रास जाकर अपना गायन प्रस्तुत किया। वहाँ भी उन्होंने श्रोताओं का मन मोह लिया। श्रोताओं में एम.एस. सुब्बुलक्ष्मी जैसी गायिका भी मौजूद थीं। कार्यक्रम के बाद शाल ओढ़ा कर सम्मानित करते हुए जी.एन. बाला सुब्रमण्यम ने बड़े गुलाम अली को ‘संगीत सम्राट’ की उपाधि से विभूषित किया था। इस कार्यक्रम के बाद दक्षिण के कुछ और स्थानों पर भी उन्हें गाने को बुलाया गया। अपने कार्यक्रमों को प्रस्तुत कर वे लाहौर लौट गए।

1947 में बड़े गुलाम अली अफगानिस्तान के राजा ज़हीर शाह के निमंत्रण पर अफगानिस्तान गए। ज़हीर शाह बड़े गुलाम अली के इतने बड़े प्रशंसक थे कि उन्होंने उस्ताद को काबुल में बस जाने और दरबारी गायक का पद सँभालने का आग्रह कर डाला। लेकिन उस्ताद ने उनके आग्रह को नहीं माना और वे लाहौर को चल पड़े। लाहौर लौटने में उन्हें बड़ी कठिनाई हुई। उस्ताद अफगानिस्तान में ही थे कि इधर हिन्दुस्तान में साम्प्रदायिकता की आग भड़क उठी थी। हिन्दू-मुस्लिम एक-दूसरे को लूट-मार रहे थे। किसी तरह बड़े गुलाम अली अपने घर पहुँचे थे। उसी वर्ष देश का विभाजन हुआ था और बड़े गुलाम अली ने फिर से अपनी गृहस्थी बसाने की बात सोची। उनके तबलावादक मित्र ने अल्ला राखी नाम की एक विधवा स्त्री का पता बताया और पैंतालीस वर्ष के विधुर गुलाम अली ने तीस वर्ष की उस विधवा स्त्री से विवाह कर लिया। बड़े गुलाम अली अपनी दूसरी पत्नी से भी उतना ही प्रेम करने लगे। यही नहीं, उन्होंने अपनी पत्नी को बुरके से बाहर निकाला और आधुनिक स्त्री के रूप में रहने की आजादी दी। किसी कार्यक्रम में जाते हुए वे पत्नी को भी साथ रखते। धीरे-धीरे पत्नी नई तहजीब सीखती गईं। उनका घर अब संगीतकारों और संगीत प्रेमियों के लिए हमेशा खुला रहने लगा। अल्ला राखी दिल से सबका स्वागत करतीं। हाँ, उन्हें पति का बेफिक्र होकर खर्च करना अच्छा नहीं लगता था। वे भविष्य के लिए भी कुछ-कुछ बचाना चाहती थीं, लेकिन बड़े गुलाम अली उनकी यह बात नहीं सुनते। कोई जरूरतमंद चाहे वह सगा-संबंधी हो, पास-पड़ोसी हो या संगीतकार, उनके घर से खाली हाथ नहीं जा सकता था।

विभाजन के बाद बड़े गुलाम अली लाहौर में ही रह रहे थे। वहीं 1951 में उन्हें बम्बई से मोरारजी देसाई का निमंत्रण आया। मोरारजी देसाई उन दिनों महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री थे। बड़े गुलाम अली उनका निमंत्रण पाकर बम्बई गए। वहाँ उनका जैसा स्वागत किया गया, उसे देखकर उस्ताद भाव-विभोर हो गए। और जब मोरारजी देसाई ने उनसे कहा—”खान साहब! हिन्दुस्तान में आपके इतने प्रशंसक हैं, आप यहीं वापस क्यों नहीं आ जाते?” तो खान साहब ने कहा—”अगर मैं हिन्दुस्तान की नागरिकता पा लेता हूँ तो यह बहुत अच्छा होगा। मैं लाहौर में रहता था, विभाजन होने पर खुद-ब-खुद पाकिस्तानी हो गया।”

मोरारजी देसाई ने बड़े गुलाम अली को भारतीय नागरिकता दिलाने की कोशिश शुरू कर दी। दो-तीन साल की कागजी कार्यवाही के बाद 1954 में पं. जवाहर लाल नेहरू ने उन्हें भारतीय नागरिकता दे दी। पाकिस्तानी अधिकारी बड़े गुलाम अली को भारत आने से रोक रहे थे। उस्ताद को धन-सम्पत्ति, मकान का प्रलोभन दे रहे थे, लेकिन उस्ताद ने कहा, ‘‘उन्हें सब कुछ तो दिया जा सकता है, मगर हिन्दुस्तान में रहने वाले उनके हजारों प्रशंसकों को पाकिस्तान कैसे लाया जा सकता है?” उस्ताद अपना परिवार लेकर बम्बई आ गए। बम्बई में उन दिनों ओंकार नाथ ठाकुर, केसर बाई, अल्लादिया खान, हीरा बाई बरोडकर, काले नजीर खान, अमान अली खान, विष्णु दिगंबर पलुस्कर जैसे गायक-गायिका रहते थे। बड़े गुलाम अली इन संगीतकारों की दुनिया के अभिन्न अंग बन गए। धीरे-धीरे फिल्मी दुनिया के लोगों से भी उनका परिचय हुआ। लेकिन फिल्मों में गाने से वे परहेज ही करते रहे। लेकिन के. आसिफ ने उन्हें घेर ही लिया। के. आसिफ जब ‘मुग़ले आज़म’ बना रहे थे, तब उन्होंने तानसेन के रूप में बड़े गुलाम अली का गायन रखने की बात सोची। वे उस्ताद के पास गए और उनसे निवेदन किया—”मैं अपनी तरफ से पूरी कोशिश कर रहा हूँ कि यह फिल्म अच्छी बने। लेकिन यह फिल्म तभी यादगार बन सकती है जब तानसेन के रूप में आप गाएँ।’’

फिल्मी दुनिया की जानकारी रखने वाले पत्रकार हरीश तिवारी ने इस प्रसंग का वर्णन करते हुए लिखा है कि के. आसिफ को टालने की गर्ज से बड़े गुलाम अली खान साहब ने उन दिनों के हिसाब से काफी बड़ी रकम (पाँच हजार रुपये) माँगी। के. आसिफ बोले—”मैं आपको पन्द्रह हजार दूँगा।’’ अब उस्ताद अपनी बात से कैसे मुकर सकते थे? उनको ‘मुग़ले आज़म’ में गाना ही पड़ा। उन्होंने राग रागेश्री में ‘शुभ दिन आए’ बंदिश गाई। युद्ध में विजय पाकर लौट रहे सलीम के स्वागत में यह गीत बज रहा था। इसी फिल्म में सलीम और अनारकली के बाग में मिलन की पृष्ठभूमि में रियाज करते तानसेन सुने जा सकते हैं। बड़े गुलाम अली की आवाज़ में तानसेन एक ठुमरी गा रहे थे—’प्रेम जोगन बन आई।’

उस्ताद बड़े गुलाम अली का पारिवारिक और पेशेवर जीवन बड़ा अच्छा बीत रहा था कि नियति ने अपने क्रूर बाण उन पर चला दिए। महाराष्ट्र के अकोला में वे कार्यक्रम दे रहे थे। यह 1961 की बात है। मंच पर ही उनकी तबीयत खराब होने लगी। उन्होंने अपने संगतकारों से कहा—”मैं अपने हाथ नहीं हिला पा रहा हूँï!” उसी हालत में उन्होंने कार्यक्रम पूरा किया और शीघ्र ही बम्बई चले गए। वहाँ ‘बॉम्बे हास्पीटल’ में उन्हें भरती कराया गया। उन पर फालिज का असर हो गया था। उनका पूरा बायाँ अंग फालिज का शिकार हो गया था। वे हिल-डुल नहीं पा रहे थे। मुँह से बोली भी नहीं निकल पा रही थी। यह उनके लिए एक गहरा आघात था। रोज गाने वाले गुलाम अली के लिए बिना गाए रहना बहुत मुश्किल था। उन्होंने एक दिन डॉक्टर से कहा भी—”अगर मैं गा नहीं सकता तो मैं जीना भी नहीं चाहता।’’

अस्पताल से जब वे घर आए तब उन्होंने फिर से रियाज करना शुरू कर दिया। धीरे-धीरे उन्होंने अपनी खोई हुई आवाज़ पा ली। एक बार फिर वे कार्यक्रम देने की स्थिति में आ गए। भले ही उनका पुत्र मुनव्वर और संगतकार उन्हें पकड़कर मंच तक ले जाते हों लेकिन मंच पर जाते ही वे वही गुलाम अली हो जाते थे।

1963 में उस्ताद बड़े गुलाम अली खान कलकत्ता की यात्रा पर गए। कलकत्ता उन्हें इतना पसंद आया कि उन्होंने वहीं बस जाने का फैसला कर लिया। वे बम्बई से कलकत्ता आ गए। पार्क सर्कस के बेग बगान में एक फ्लैट किराए पर ले लिया। कलकत्ता के संगीत-प्रेमी लोगों और उस्ताद विलायत खान, अली अकबर खान, करामत खान, शौकत अली खान और रहिमुद्दीन डागर जैसे संगीतकारों ने उनका तहे दिल से स्वागत किया। अब कलकत्ता के लोगों के सामने उनकी सांगीतिक प्रतिभा का प्रदर्शन अक्सर होने लगा। उनकी ख्यति कुछ इस कदर फैली कि रामकृष्ण मिशन आश्रम की ओर से उन्हें गाने का न्योता भिजवाया गया। बड़े गुलाम अली ने खुशी-खुशी यह न्योता स्वीकारा और कार्यक्रम के दिन अपने दल-बल के साथ वहाँ पहुँच गए। उन्होंने वहाँ राग पीलू में ‘राधे कृष्ण बोल, तेरा क्या लगेगा मोल’ भजन गाकर सुनाया। कार्यक्रम के बाद आश्रम के प्रमुख स्वामी ने बड़े गुलाम अली के पैर छुए और उन्हें सोने की चेन उपहार में दी।

बड़े गुलाम अली खान साहब की खासियत यह थी कि वे जिस भाव से स्वामी जी के आश्रम में या पीर की मजार पर या किसी आत्मीय के घर में गा सकते थे, उसी भाव से किसी जेल में भी। यही वजह थी कि जब उन्हें कलकत्ता के अलीपुर जेल में गाने का न्योता मिला तो उन्होंने बिना किसी हील-हुज्जत के उसे स्वीकार कर लिया। और हिंसक कैदियों के सामने ‘मालकौंस’ गाकर उन्होंने उन्हें नफरत से दूर प्यार की दुनिया में पहुँचा दिया। उनके गायन का ऐसा प्रभाव कैदियों पर पड़ा कि वे उन्हें उठने नहीं दे रहे थे। तब खान साहब ने ‘पहाड़ी’ में एक ठुमरी सुनाई—’अब तो आवो साजना, पूरी हो मन की आशा!’ इसके बाद उन्होंने कैदियों से कहा—‘‘अब मैं थक गया हूँ। अल्लाह ने चाहा तो फिर हाजिर हूँगा।’’ इसके बाद उनका कार्यक्रम खत्म हुआ।

ढेर सारे संगीत प्रेमी नवाबों, राजाओं, जमींदारों की तरह हैदराबाद के नवाब जहीर यार जंग भी बड़े गुलाम अली खान के प्रशंसक थे। उनके आग्रह पर उस्ताद 1965 में कार्यक्रम देने हैदराबाद गए। वहाँ से लौटकर आने के बाद विशाखापत्तनम में उनका स्मरणीय कार्यक्रम हुआ। 1967 के दिसम्बर में वे अपने परिवार और संगतकारों के साथ फिर हैदराबाद गए। हैदराबाद की यह यात्रा इहलोक की उनकी अंतिम यात्रा थी। जनवरी 1968 में उन्हें दमा का तेज दौरा पड़ा। डॉक्टर के इलाज से दमा तो ठीक हुआ, लेकिन साँस की तकलीफ बनी रही। उस्ताद के बेटे मुनव्वर को अनहोनी की आशंका होने लगी तो उन्होंने पाकिस्तान से अपने सगे-संबंधियों को बुलवा लिया। 22 अप्रैल, 1968 को उस्ताद ने मुनव्वर से कहा—”अब केवल चौबीस घंटे बचे हैं, जब मैं तुम्हें तकलीफ दूँगा।’’ मुनव्वर ने कहा—”अब्बा! ऐसे मत बोलिए, अब तो आप ठीक हो रहे हैं!’’

23 अप्रैल, 1968 की सुबह मुर्गे ने बाँग दी तो उस्ताद ने मुनव्वर से कहा—”तुमने सुना? मुर्गा राग तोड़ी में बाँग दे रहा था!” फिर उन्होंने मुनव्वर की माँ को याद किया। इसके बाद उनकी साँस की डोर टूट गई। चार मीनार इलाके के ‘दायरा मीर मोमिन’ कब्रगाह में उन्हें दफना दिया गया।

बड़े गुलाम अली खान कई मामलों में बड़े थे। गायकी में तो बड़े थे ही, व्यक्ति के रूप में भी बहुत बड़े थे। अपने आस-पास के लोगों की मदद करते चलना उन्हें खूब आता था। जाति-धर्म से वे बहुत ऊपर उठे हुए थे। उन्हें कई बार पूछा जाता, टोका जाता कि ‘आप मुसलमान होकर भी हिन्दुओं के देवी-देवता के भजन क्यों गाते हैं?’ तो वे साफ-साफ कहते—’ईश्वर एक है।’’ उनके बहुचर्चित भजन ‘हरि ओम् तत् सत’ गाने के बारे में संगीत के किसी विद्वान ने उनसे पूछा—”खान साहब, आप इतने भावपूर्ण ढंग से हिन्दू भजन कैसे गा लेते हैं?” खान साहब ने आश्चर्य से पूछने वाले की ओर देखा और कहा—”ईश्वर, सत्य और हक़ एक ही हैं। मैं जिस समय ‘हरि ओम् तत् सत’ गाता हूँ, उस समय मेरे मन में अल्ला रहते हैं। भाषाएँ अलग-अलग हैं लेकिन अल्ला, खुदा, हरि सभी एक ही उस परम सत्ता के नाम हैं। अंग्रेज उनके लिए ‘गॉड’ शब्द का प्रयोग करते हैं, हिन्दू ‘परमात्मा’। सीधी सी बात है, पता नहीं लोग इसे क्यों नहीं समझते हैं?”

इसी तरह की एक घटना पाकिस्तान में घटी थी। खान साहब रेडियो-पाकिस्तान पर गाने को गए थे। देश विभाजन के बाद पाकिस्तान के आला अधिकारी संगीत और कला को भी विभाजित करने की कोशिश में लगे थे। वैसे ही एक अधिकारी ने उन रागों, ठुमरियों और दादरा को रेडियो पर प्रतिबंधित करना शुरू कर दिया था, जिनमें हिन्दू देवी-देवताओं के नाम थे। बड़े गुलाम अली खान साहब उस दिन जब ‘मियां की तोड़ी’ में ‘अब मोरी राम, राम री दइया’ गाकर निकले, उस अधिकारी ने कहा—”खान साहब! ये राम-राम क्या है? अब रहीम-करीम के बारे में सोचिए!”

अधिकारी की बात से बड़े गुलाम अली दु:खी हो गए। उन्होंने कहा—”आप परंपरा से चली आ रही रचना में हेर-फेर नहीं कर सकते। वे उसी तरह गाई जाएँगी, जैसी वे रची गई हैं। खैर, उसे भूल जाइए। अब मैं आपके रेडियो स्टेशन के लिए नही गाऊँगा। रेडियो-पाकिस्तान के पैनल से मेरा नाम निकाल दीजिए।’’

बड़े गुलाम अली जैसे सच्चे संगीत साधक के लिए ईश्वर और संगीत में कोई भेद नहीं था। वे कहा करते थे—”संगीत ही मेरा खुदा और संगीत ही मेरी नमाज है।“ जो आदमी संगीत को ही खुदा मानता हो उसके लिए राम-रहीम और कृष्ण-करीम में अंतर हो भी कैसे सकता था?

बड़े गुलाम अली स्वाभिमानी व्यक्ति थे। इसी वजह से उन्होंने किसी राजा के दरबार में नौकरी करने की बात नहीं सोची। जिन राजाओं और नवाबों से वे मिलते थे, बराबरी के स्तर पर मिलते थे। वे खुद को किसी जागीरदार से कम नहीं समझते थे। संगीत के इस जागीरदार का कहना था—”नवाबों की जागीरें हो सकती हैं, मेरी जागीर मेरा संगीत है। वे अपने साम्राज्य के मालिक हो सकते हैं, मैं अपनी सल्तनत का सुल्तान हूँ।’’

शास्त्रीय संगीत में लोग अक्सर किसी न किसी चमत्कार की चर्चा किया करते हैं। मियां तानसेन के ‘मल्हार’ गाने पर वर्षा होने और ‘दीपक’ गाने पर शरीर के जल उठने की बात लोग करते आ रहे हैं। ‘अपने युग के तानसेन’ बड़े गुलाम अली खान के बारे में भी इस तरह की कई बातें कही जाती हैं। एक बार लाहौर के निकट के किसी गाँव के चौधरी उन्हें मनाकर कार्यक्रम देने ले गए। जुलाई का महीना था। उन्होंने गाने के लिए ‘मियां मल्हार’ राग का चयन किया। उनके अंतरा गाते-गाते आकाश में काले-काले बादल घुमड़ आए और ठंडी-ठंडी फुहारें पडऩे लगीं। विलंबित के बाद वे द्रुत की बंदिश गाने लगे—”बिजली चमके, बरसे मेहर, आई लो बदरवा!” उस समय दो मोर पास के जंगल से आ गए और चबूतरे पर चढ़कर पंख फैलाकर नाचने लगे। बड़े गुलाम अली ने अपना गायन ज़ारी रखा और उनका तबलची मोर के नृत्य से मिलता-जुलता ताल बजाने लगा।

इसी तरह काबुल में कार्यक्रम देते हुए एक चमत्कार देखा गया था। जब खान साहब ज़हीर शाह के महल में गा रहे थे, एक सफेद कबूतर उड़कर आ गया और वह ध्यान लगाकर खान साहब का गाना सुनने लगा। फिर वह पंख फैलाकर धीरे-धीरे नाचने लगा।

बड़े गुलाम अली खान साहब को प्रकृति से बहुत प्रेम था। प्रकृति की चीजों को वे बड़े ध्यान से देखते थे और उनको अपने गायन में उतारते थे। जैसे कि किसी पार्क में या झील के किनारे या नदी के किनारे बैठकर सूर्यास्त देखकर या पक्षियों को उड़ते, चहकते, नाचते या कूदते देखकर उन्हें तानों की बुनावट सूझती थी। संगीत के कुछ गंभीर विद्वानों ने भी उनके इस गुण को लक्षित किया है। श्री एस.के. सक्सेना ने ऐसी दो घटनाओं का वर्णन किया है, जब प्रकृति में देखी-सुनी चीजों को खान साहब ने अपने तान में लाकर दिखलाया था। एक बार दिल्ली घराने के प्रसिद्ध गायक उस्ताद चाँद खान के घर बड़े गुलाम अली का कार्यक्रम चल रहा था। अचानक एक बिल्ली लोगों के बीच आ गई और थोड़ी देर में खुद वहाँ से चली गई। खान साहब ने भी बिल्ली का जाना देखा और अगले ही गायन में उन्होंने बिल्ली के जाने को तान के जरिए दिखला दिया।

दूसरी घटना भी दिल्ली की ही है। सुबह के एक कार्यक्रम में वे ‘भैरवी’ गा रहे थे। अचानक पास से गाड़ी का इंजन गुजरा, जिसकी तेज आवाज़ ने श्रोताओं को परेशान कर दिया। लेकिन तुरंत ही बड़े गुलाम अली साहब ने ठीक उसी आवाज़ को दिखलाते हुए जो तान लिया, उससे श्रोता दंग रह गए।

बड़े गुलाम अली खान साहब की शिष्या मालती गिलानी ने भी अपनी किताब में खान साहब की इस विशेषता को रेखांकित किया है। मालती गिलानी ने लिखा है कि खान साहब प्रकृति के मिजाज और अपने आस-पास की आवाज़ों से बहुत प्रभावित होते थे। बिजली का चमकना, बादलों का गरजना, वर्षा का होना आदि उनके अंदर जज्ब होता रहता था और गाते हुए तानों में वे बिजली की चमक ले आते थे तो गमक में बादलों की गडग़ड़ाहट!

बड़े गुलाम अली खान के बारे में एक सवाल बार-बार किया जाता है कि वे ठुमरी गायक के रूप में अच्छे थे या खयाल-गायक के रूप में? और जवाब यह है कि वे दोनों में अच्छे थे। यह अलग बात है कि बड़े गुलाम अली एक ही राग को घंटों गाते जाने में पुनरावृत्ति का खतरा देखते थे और छोटी-छोटी रचनाओं के द्वारा अपने गायन की चमक दिखला जाते थे ।  लेकिन इसका यह अर्थ नहीं कि वे खयाल के मामले में कमजोर थे। वे वास्तव में ‘चौमुखया गवैया’ थे। खयाल और ठुमरी तो वे गाते ही थे, दादरा और टप्पा भी गाते थे। ग़ज़ल और भजन गाते थे। तराना गाते थे, सबद गाते थे। सूफियाना कलाम गाते थे, पंजाबी लोकगीत गाते थे। गायन की किसी एक विधा के निकष पर उनको परखना किसी अन्याय से कम नहीं होगा।

बड़े गुलाम अली खान साहब के प्रिय राग थे—मालकौंस, विहाग, देश, भूपाली, जौनपुरी, भैरवी, दरबारी कान्हड़ा, यमन, बागेश्वरी आदि। उनकी गाई खूबसूरत ठुमरियों में से ‘बाजूबंद खुल-खुल जाए, (भैरवी) ‘का करूँ सजनी आए न बालम’ (जंगला भैरवी,) ‘प्रेम की मारे कटार’ (सोहनी,) ‘कंकर मार जगा गयो रे’ (पीलू,) ‘कटे न बिरहा की रात’ (पीलू,) ‘ना जा पी परदेस सजनवा’ (शिवरंजनी), तोरे नैनां जादू भरे’ (तिलंग), ‘रस के भरे तोरे नैन’ (भैरवी), ‘अब तो आवो साजना’ (पहाड़ी), ‘याद पिया की आए’ (मिश्र कौशिक ध्वनि) आदि ठुमरियाँ कालातीत की श्रेणी में रखी जा सकती हैं। ‘हरि ओम तत् सत’ (पहाड़ी) जैसे भजन भी इसी श्रेणी में रखे जा सकते हैं।

‘सुगम संगीत के बादशाह’ कहे जाने वाले बड़े गुलाम अली, ‘मैलोडी के बादशाह’ भी कहे जाते हैं। ‘सबरंग’ नाम से सैकड़ों बंदिशें भी उन्होंने लिखी हैं। आज प्राय: सभी शास्त्रीय गायकों के हाथ में रहने वाले साज ‘सुरमंडल’ के हिन्दुस्तानी संगीत में प्रथम प्रयोग का श्रेय भी उन्हें दिया जाता है।

भारत सरकार द्वारा ‘पद्मभूषण’ (1962) और विश्व भारती विश्वविद्यालय द्वारा डी.लिट. (1964) अलंकरण से सम्मानित बड़े गुलाम अली खान के संगीत की विशेषता बतलाते हुए उनकी शिष्या मालती गिलानी ने कहा है कि ‘उनका संगीत इंद्रधनुष के समान था, जिसमें रोमांस, भाव और आध्यात्मिकता की छायाएँ लिपटी हुई थीं। संगीत की विदुषी सुशीला मिश्र ने तो बड़े गुलाम अली के बारे में यहाँ तक लिखा है कि ‘कौन जानता है, आगे आने वाली पीढ़ी उन्हें उसी तरह याद करे जिस तरह हम तानसेन को याद करते हैं!’

और संगीत विशेषज्ञ एस.के. सक्सेना सभी महत्त्वपूर्ण गायकों को ध्यान में रखकर कहते हैं, ”फैयाज खान के बाद हिन्दुस्तानी संगीत में कोई ऐसा गायक नहीं हुआ जिसे बड़े गुलाम अली से श्रेष्ठ कहा जा सके।’’ शायद एस.के. सक्सेना गलत नहीं कहते।

मोदी,संसद और गांधी....आधी रात का सच

" कई सालों पहले, हमने नियति के साथ एक वादा(Tryst with Destiny) किया था, और अब समय आ गया है कि हम अपना वादा निभायें, पूरी तरह न सही पर बहुत हद तक तो निभायें. आधी रात के स्ट्रोक के समय, जब दुनिया सो रही होगी, भारत जीवन और स्वतंत्रता के लिए जाग जाएगा."

ये उस आधी रात का सच है जब आधी दुनिया सो रही थी और भारत आजादी के लिये जाग रहा था। 14-15 अगस्त 1947 की आधी रात संविधानसभा को सत्ता हस्तांतरित होनी थी। एतिहासिक और यादगार अवसर। रात 11 बजे वंदे मातरम से सभा की शुरुआत हुई। और ठीक बारह बजे नेहरु ने प्रसिद्द भाषण दिया । लेकिन संयोग देखिये आजादी की मशाल जिस शख्स ने उठायी और गुलामी के अंधेरे को जिस शख्स ने दूर किया, वह शख्स 15 अगस्त 1947 को संसद में नही बल्कि दिल्ली से डेढ हजार किलोमीटर दूर कलकत्ता के बेलियाघाट के घर में अंधेरे में बैठे रहे। ये शख्स और कोई और नहीं महात्मा गांधी थे। जो दिल्ली में आजादी के जश्न से दूर बेलियाघाट में अपने घर से राजगोपालाचारी को ये कहकर लौटा दिये कि घर में रोशनी ना करना। आजदी का मतलब सिर्फ सत्ता हस्तांतरण नहीं होता। लेकिन आजादी कैसे सिर्फ एक तारीख तले कैद हो गई। ये 1972 में आजादी के सिल्वर जुबली और 1997 में आजादी के गोल्डन जुबली को आधीरात के वक्त इसी संसद में मनाकर बताया गया। और आज कांग्रेस ने संसद को आधीरात को जगमग करने का खुला विरोध करते हुये बायकाट कर दिया, जिसे मौजूदा सत्ता ने जीएसटी तले देश को आर्थिक आजादी से जोड़ते हुये आधीरात को संसद को जगमग करने की सोची। तो सवाल सत्ता-विपक्ष के टकराव का नहीं है।

सवाल तो उस संसद की मर्यादा का है, जहा 70 बरस पहले नेहरु ने राष्ट्रसेवा का प्रण  लिया था। और 70 बरस बाद आजादी से आर्थिक आजादी के नारे तले भारत को संसद की जगमग तले चकाचौंध मानने के सपने संजोये जा रहे हैं। जबकि इन 70 बरस में किसान-मजदूरों की मौत ने खेती को श्मशान में बदल दिया है। औद्योगिक  मजदूरों की लड़ाई न्यूनतम को लेकर आज भी है। गरीबी की रेखा के नीचे 1947 के भारत से दोगुनी तादाद पहुंच चुकी है। पीने के साफ पानी से लेकर भूख की लडाई अब भी लड़ी जा रही है। तो 30 जून की आधीरात को पीएम क्या कहेंगे उसका तो इंतजार कीजिये लेकिन याद कर लिजिये 15 अगस्त 1947 की आधी रात  पहले पीएम नेहरु ने कहा, "भारत की सेवा मतलब लाखों पीड़ित लोगों की सेवा करना है. इसका मतलब गरीबी, अज्ञानता, बीमारी और अवसर की असमानता को समाप्त करना है. हमारी पीढ़ी के सबसे महानततम व्यक्ति [ महात्मा गांधी ] की महत्वाकांक्षा हर आंख से एक-एक आंसू पौंछने की है. हो सकता है ये कार्य हमारे लिए संभव न हो लेकिन जब तक पीड़ितों के आँसू ख़त्म नहीं हो जाते, तब तक हमारा काम खत्म नहीं होगा."

महात्मा गांधी ने तो गौ रक्षा का सवाल हो या किसानों का, हर सवाल को उठाया। संघर्ष किया तो क्या वाकई आधी रात को संसद को जगमग कर हालात सुधारने का ऐलान किया जा सकता है। क्योंकि याद कीजिये जिस गौ रक्षा के सवाल को लेकर देश के मौजूदा पीएम मोदी ने महात्मा गांधी को याद कर लिया। तो गांधी जी का क्या कहना था। छह अक्टूबर, 1921, को महात्मा गांधी ने  यंग इंडिया में लिखा , "हिंदू धर्म के नाम पर ऐसे बहुत से काम किए जाते हैं, जो मुझे मंजूर नहीं है....और गौरक्षा का तरीका है उसकी रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति देना. गाय की रक्षा के लिए मनुष्य की हत्या करना  हिंदू धर्म और अहिंसा धर्म से विमुख होना है। हिंदुओं के लिए तपस्या द्वारा, आत्मशुद्धि द्वारा और आत्माहुति द्वारा गौरक्षा का विधान है. लेकिन आजकल की गौरक्षा का स्वरूप बिगड़ गया है।" तो करीब 96 बरस पहले  महात्मा गांधी ने गो रक्षा को लेकर जो बात कही थी-आज 96 बरस बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को उन्हीं बातों के साए में गौ रक्षा पर अपनी बात कहनी पड़ी। तो क्या आजादी से 26 बरस पहले और आजादी के 70 बरस बाद भी सत्ता को गो रक्षा के नाम पर मानव हत्या के हालात से रुबरु होना ही पडाता है । तो भारत बदला कितना। संविधान अपना है। कानून अपना है। कानून की रक्षा के लिये संस्थाएं काम कर रही हैं। बावजूद इसके सिस्टम फेल कहां हैं,जो देशभर में कल लोग सडक पर उतर आये । सोशल मीडिया से शुरु हुए नॉट इन माई  नेम कैंपेन के तहत लोगो ने बोलना शुरु इसलिये कर दिया क्योकि सत्ता खामोश रही । और सिस्टम कही फेल दिखायी देने लगा । फेल इसलिये क्योकि गौरक्षा के  नाम पर पहलू खान से लेकर जुनैद तक। और 11 शहरों में 32 लोगो की हत्या गौ रक्षा के नाम पर की जा चुकी है। यानी शहर दर शहर भीड ने गो रक्षा ने नाम  पर जिस तरह न्याय की हत्या सडक पर खुलेआम की। और न्याय की रक्षा के लिये तैनात संस्थान ही फेल नजर आये उसमें महात्मा गांधी को याद कर पीएम का भावुक होना कैसे न्याय दिलायेगा ये सवाल भी उठा । तो राजनीति की अक्स तले गो रक्षा का सवाल भी अगर उठेगा तो फिर गोरक्षा के नाम पर मानवाता की
हत्या का सवाल उठाने वाले महात्मा गांधी की उस आवाज को सुन लें जो उन्होने 19 जनवरी, 1921 को गुजरात के खेड़ा जिले में स्वामीनारायण संप्रदाय के तीर्थस्थान पर एक विशाल सभा को संबोधित करते हुए कही , " आप अंग्रेज अथवा मुसलमान की हत्या करके गाय की सेवा नहीं कर सकते, बल्कि अपनी ही प्यारी जान देकर उसे बचा पाएंगे. ...मैं ईश्वर नहीं हूं कि गाय  बचाने के लिए मुझे दूसरों का खून करने का अधिकार हो. ...कितने हिंदुओं ने बिना शर्त मुसलमानों के लिए अपने जीवन को उत्सर्ग कर दिया है. वणिकवृत्ति से गाय की रक्षा नहीं हो सकती’"

फिर महात्मा गांधी ही क्यो विनोबा भावे  को भी याद कर लिजिये । क्योकि पीएम ने उन्हे भी तो याद किया । विनोवा भावे ने गौरक्षा के लिए अपनी जिंदगी दांव पर लगा दी-देश में गौरक्षा के  लिए एक कानून बनाने की मांग को लेकर आंदोलन खड़ा किया, वो विनोबा भावे भी यह कहने से नहीं चूके , "हमें बचपन में सिखाया गया कि एक अस्पृश्य को छूने से जो अपवित्रता आ जाती है, वह गाय को छू लेने से दूर हो जाती है. जो जड़ बुद्धि एक मनुष्य को अपवित्र मानने की बात कहती है, वही एक पशु को मनुष्य से भी पवित्र मानने की बात कहती है. इस युग में यह मानने योग्य नहीं कि गाय में सभी देवताओं का निवास है और दूसरे प्राणियों में अभाव है. इस प्रकार की अतिशयतापूर्ण पूजा को मूढ़ता ही कहना होगा." तो अतीत की इन आवाजों का मतलब है क्या। क्योंकि महात्मा गांधी ने तो नील किसानो की मुक्ति के लिये चंपारण सत्याग्रह भी किया । और किसानों के हक को लेकर कहा भी , " मैं आपसे यकीनन कहता हूं कि खेतों में  हमारे किसान आज भी निर्भय होकर सोते हैं, जबकि अंग्रेज और आप वहां सोने के लिए आनाकानी करेंगे...... किसान तलवार चलाना नहीं जानते, लेकिन किसी की तलवार से वे डरते नहीं हैं.......किसानों का, फिर वे भूमिहीन मजदूर हों या मेहनत करने वाले जमीन मालिक हों, उनका स्थान पहला है। उनके परिश्रम से ही पृथ्‍वी फलप्रसू और समृद्ध हुई हैं और इसलिए सच कहा जाए तो जमीन उनकी ही है या होनी चाहिए, जमीन से दूर रहने वाले जमींदारों की नहीं।" तो गांधी ने किसानों से ऊपर किसी को माना ही नहीं। लेकिन गांधी का नाम लेकर राजनीति करने वालों के इस देश में किसानों का हाल कभी सुधरा नहीं-ये सच है। आलम ये कि मंदसौर में किसान आंदोलन के दौरान गोली चलने से 5 लोगों की मौत पर तो हर विपक्षी दल ने आंसू बहाए और विरोध जताया-लेकिन उसी मध्य प्रदेश में 6 जून के बाद से अब तक 42 किसान खुदकुशी कर चुके हैं,लेकिन चिंता में डूबी आवाज़े गायब हैं। हद तो ये कि 9 किसानों ने उसी सीहोर में खुदकुशी की-जो शिवराज सिंह चौहान का गृहनगर है। और मध्य प्रदेश में ऐसा कोई दिन नहीं जा रहा-जब किसान खुदकुशी नहीं कर रहा। और उससे सटे धान का कटोरा कहे जाने वाले छत्तिसगढ में बीते 15 दिनो में 10 किसानों ने खुदकुशी कर ली । मसलन , कुलेश्वर देवांगन, दुर्ग, 11 जून , भूषण गायकवाड़, ग्राम गोपालपुर डोंगरगढ़ 16 जून , रामझुल ध्रुव, लोहारा कवर्धा 17 जून , मंदिर सिंह ध्रुव भोखा बागबाहरा 22 जून , हीराधर निषाद जामगांव बागबाहरा 24 जून , ज्ञानी राम ग्राम अण्डी कांकेर 24 जून , सीताराम कौशिक मोहतरा
कवर्धा 24 जून , कुंवर सिंह निषाद बरसांटोला डोंगरगढ़ 25 जून , डेराह चंद ग्राम घुमका राजनांदगांव 25 जून , चन्द्रहास साहू ग्राम कुरुद जिला धमतरी 26 जून । तो किसानों के अच्छे दिन के बजाय हर सूबे में बुरे दिन क्यों आ गए और तमाम दावों के बावजूद देश के किसानों के अच्छे दिन नहीं आ पा रहे-ये सच है। तो सवाल यही है कि किसानों की दशा सुधरेगी कैसे। क्योंकि मौजूदा सत्ता कर्ज माफी से आगे देख नहीं पा रही है । जबकि महात्मा गांधी ने अपने हर आंदोलन के केन्द्र में किसानो को रखा। क्योंकि उनका मानना था कि भारत अपने सात लाख गांवों में बसता है, न कि चंद शहरों में।

चुपचाप अट्टहास - 35: हर सुंदर के असुंदर को अपनाया

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मूँछ होती थी
काली कच्ची उम्र की
सिर पर उन दिनों के बालों के साथ जमती भली थी
आईना देखता उससे बातें करता था
कहता था कि वह कभी न गिरेगी
वह गिरी भी कटी भी
जब यह वारदात हुई
मैं दिनों तक दाँतों से नाखून काट चबाता रहा
लू में बदन तपाया
बारिश के दिन सड़कों में भीगा
हर सुंदर के असुंदर को अपनाया
इस तरह बना जघन्य
मूँछ फिर कभी खड़ी नहीं हुई
हर सुबह एक नए उस्तरे से उसे मुँड़वाता हूँ
फिर बाँट देता उस्तरा
गोरक्षकों को।


I had a moustache
dark one like a young adult
It used to match well with the hair on my head
I talked with it when looking at the mirror
I told it that it will never droop
And then it drooped and and I lost my dignity


For days I bit my nails
After it happened
I tanned my skin in blazing sun
Got drenched in pouring rain
I went for the ugly in all that is beautiful
This is how I turned ugly
The moustache never twisted upwards
Every morning I use a new razor to shave it off
And then I hand over the razor
to the cow-vigilantes.
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लेखक विषय संवाद साभार अनुवादक

पहले वो आए साम्यवादियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं साम्यवादी नहीं था

 

फिर वो आए मजदूर संघियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं मजदूर संघी नहीं था

 

फिर वो यहूदियों के लिए आए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं यहूदी नहीं था

 

फिर वो आए मेरे लिए

और तब तक बोलने के लिए कोई बचा ही नहीं था

 

मार्टिन नीमोलर (1892-1984)