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मेरा जैसा मैं : गौरव सक्सेना

लेखक मंच - Thu, 11/05/2017 - 02:14

वैसे तो दुनि‍या का हर बच्चा बहुत खास है, लेकि‍न जि‍न बच्चों के  साथ मैं काम करता हूं, शायद वे इन सबमें भी सबसे कोमल-नि‍र्दोष-प्यारे हैं। हां, वि‍शेष अध्यापक होना सचमुच बहुत वि‍शेष है, कम से कम मेरे लि‍ए तो। ये बच्चे जि‍नके पास सीमि‍त शब्द हैं, कि‍तना कुछ बोलते हैं, जब वे मुस्कराते हैं, अचानक गले लग जाते हैं, रो देते हैं या जी खोल के हंसते हैं।

स्वलीनता (ऑटिज्म)  से ग्रसि‍त बच्चे ज्‍यादातर अपने परि‍वेश से सचेत संबंध स्‍थापि‍त नहीं कर पाते। अपनी बनाई दुनि‍या में वे जीते हैं और उस दुनि‍या में होने वाली गति‍वि‍धि‍यों में यदि‍ बदलाव हो या उनके क्रम को बदला जाए तो यह उनके लि‍ए एक भयावह समस्‍या हो जाती है।

मैं एक बात स्‍पष्‍ट कर दूं कि‍ स्‍वलीनता का संबंध बच्‍चे की बौद्धि‍क शक्‍ति‍ के साथ या उसके रचनात्‍मक कौशल से नहीं होता। ये बच्‍चे बडे़ ही हुनरमंद गायक, चि‍त्रकार, खि‍लाड़ी हो सकते है, यदि‍ इनकी संभावनाओं को सही तरह से आंका जाए।

बच्‍चों का व्‍यवहार कई अर्थों में अन्‍य बच्‍चों से अलग होता है। सबसे पहली समस्‍या होती है संवाद की- सब कुछ महसूस करने के बाद भी बच्‍चे खुद को ठीक से प्रस्‍तुत नहीं कर पाते। जो चीजें इनको अलग बनाती हैं वे हैं, समाज के नि‍यमों, परम्‍पराओं, संबंधों की जानकारी ने होना। इसके चलते कई बार ऐसा व्‍यवहार देखने को भी मि‍लता है, जो सामाजि‍क रूप से स्‍वीकार्य नहीं।

इन तमाम सारी सीमाओं के बावजूद ये बच्‍चे अपरि‍मि‍त कौशल के धनी होते हैं। आवश्‍यक नहीं है कि‍ प्रत्‍येक कौशल में ये अपनी उम्र के बच्‍चों जैसा प्रदर्शन करें, लेकि‍न जि‍स कौशल में रुझान होगा शायद उसमें बेहतर कोई दूसरा नहीं कर सकता।

जो एक बड़ी समस्‍या जिसका सामना ये बच्‍चे करते हैं, वह है- हमारे अंदर धैर्य और जानकारी का अभाव। यदि‍ बच्‍चों की आवश्‍यकताओं और वि‍शेषताओं को समझ, उसके आसपास की चीजों को परि‍वर्तित कर दि‍या जाए, तो ये बच्‍चे समाज के लि‍ए उतने की उपयोगी होंगे, जि‍तने अन्‍य बच्‍चे। इन बच्‍चों पर मैंने एक कवि‍ता लि‍खी है, जो आपके साथ साझा कर रहा हूं–

जैसा मैंने देखा तुमको कभी कभी
कुछ उल्झा-सुलझा
कभी कभी कुछ कहते सुनते
कभी कभी चुप रहते सहते
कभी कभी कुछ सपने बुनते

जैसा मैंने देखा तुमको
कभी कभी पानी सा बहते
कभी कभी कुछ जड़ भी होते
कभी कभी मुस्काते हँसते
कभी कभी दुनिया से डरते
जैसा मैंने देखा तुमको
कभी कभी तुम कह न पाये
कभी कभी तुम सुन न पाये
कभी कभी क्या, ज़्यादातर ही
हम सब धीरज धर न पाये

कभी कभी तुम खुद बोले हो
कभी कभी ख़ामोशी बोली

जैसा मैंने तुमको देखा
कभी कभी रिश्ते जीते हो
कभी कभी खुद में जीते हो
कभी कभी जो आ जाती है
चेहरे पर मुस्कान तुम्हारे
कभी कभी जब बाँहों में भर
दिल आंखें सब भर देते हो

जैसा मैंने तुमको देखा

कभी कभी तुम काग़ज़ के कुछ

पंख लगा के उड़ जाते हो

कभी कभी तुम रंग सा घुल कर

सबके मन में बस जाते हो
कभी कभी जब दिल की बातें
टुकड़ों टुकड़ों बतलाते हो
कभी कभी तुम मीठी सरगम बनकर
उर में छिप जाते हो
जैसा मैंने तुमको देखा

Naked Future 21C

NEET’s bizarre code sparks outrage in Kerala Promise of 21C: Everyone in a Global Prison. What happens to me (or someone else) today, is bound to happen to you sooner or later. *** Do you share some responsibility for this?

चुपचाप अट्टहास - 32 : सुनो मेरी फुफकार

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 हर मुँह से हिस्स हिस्स

कितने मुँह मेरे
दो कि चार कि अनगिनत
पथरीली राहें मुझे घेरतीं
मुझे उछालतीं गगनचुंबी लहरें समंदरों की
बँधा मैं अँधेरी रातों से
हर मुँह से हिस्स हिस्स
ज़हर फेंकता।


बरछे भाले तोप कमान
कोई मेरे लगातार बढ़ते
ज़हरीले मुखों को छेद नहीं सकता
मैं काल का काला बादल
सुनो मेरी फुफकार


अँधेरे में मेरी लपलपाती जीभ
तुम्हें दिखती होगी
जैसे मोहिनी नायिका जाती अभिसार को।


Many mouths I have
Is it two or four or countless
Rocky roads are all around me
High tidal waves from the seas throw me upwards
I am bound to darkness
Hissing venom spits
From each of my mouths.


No spears or cannon balls
Can pierce my ever spreading venomous mouths
I am the dark cloud of Kala, the terror eternal,
Hear me erupt.


You can see my tongue
Brandishing in darkness
Like a courtesan going to union with her lover.

चुपचाप अट्टहास - 31

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'हँसो, हँसो, जल्दी हँसो।'

क्या अन्न रह सकता है अनछुआ

फल अनपका

दौड़ रहा धमनियों में जो रक्त

उसकी भी चाहत

मज्जाएं जो खाई जातीं और जो मज्जाओं के पाचन पर बनतीं

कायनात भर में चाहत के समीकरण हैं

जिस्म के रहस्यों से परे उफ़्क के कोनों तक

दौड़ रही हैं चाहतें




मैंने समेट ली धरती के हर दरिया की चाहत

गंगा के बहाव में

गंगा की मैल कैसे साफ होगी


एक बार याद करें कवि को -

'हँसो, हँसो, जल्दी हँसो।'




Can a grain be left untouched?

And a fruit unripened?

Even the blood running in the veins

Desires

Marrow that is eaten and that is made with marrow digested

Desires prevail in equations of all the universe

From the mysteries of the body to the ends of the horizons

Desires racing




I gathered within me the desires of all rivers on the Earth

With Ganga flowing

How will Ganga ever be cleansed




Remember the poet for once

“Laugh, laugh and laugh right now!”
(The quote is from a poem by Raghuveer Sahay)

केंद्रीय गृहमंत्री और ओडिशा के मुख्‍यमंत्री को नियमगिरि के मसले पर खुला पत्र / समाजवादी जन परिषद

श्री नवीन पटनायक,

मुख्यमंत्री, ओडिशा,

भुवनेश्वर, ओडिशा

 

प्रिय मुख्यमंत्री श्री नवीन पटनायक जी,

बहरहाल, नियमगिरी में अनिल अग्रवाल की इंग्लैण्ड की कम्पनी वेदान्त द्वारा खनन कराने अथवा न कराने के सन्दर्भ में माननीय सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश से तथा न्यायपालिका की देखरेख में जनमत-संग्रह हुआ था जिसमें एक भी वोट वेदान्त द्वारा बॉक्साइट खनन के पक्ष में नहीं पड़ा था। आपकी सरकार से जुड़े माइनिंग कॉर्पोरेशन के अदालत में सर्वोच्च न्यायालय के फैसले को बदलवाने के प्रयास को न्यायपालिका ने अस्वीकार कर दिया है। आपके गृह विभाग को यह भलीभांति पता है कि प्रतिबन्धित भाकपा (माओवादी) ने जनमत संग्रह के बहिष्कार की अपील की थी। जनता ने जैसे वेदान्त द्वारा खनन को पूरी तरह से नकार दिया था, उसी प्रकार माओवादियों द्वारा जनमत-संग्रह बहिष्कार की अपील को भी पूरी तरह नकार दिया था।

इस परिस्थिति में ओडिशा पुलिस द्वारा नियमगिरी सुरक्षा समिति से जुडे कार्यकर्ताओं पर फर्जी मामले लादने और उन्हें ‘आत्मसमर्पणकारी माओवादी’ बताने की कार्रवाई नाटकीय, घृणित और जनमत की अनदेखी करते हुए वेदान्त कम्पनी के निहित स्वार्थ में है।

पुलिस द्वारा कुनी सिकाका की गिरफ्तारी, उसके ससुर तथा नियमगिरी सुरक्षा समिति के नेता श्री दधि पुसिका, दधि के पुत्र श्री जागिली तथा उसके कुछ पड़ोसियों को मीडिया के समक्ष ‘आत्मसमर्पणकारी माओवादी’ बताना ड्रामेबाजी है तथा इसे रोकने के लिए तत्काल आपके हस्तक्षेप की मैं मांग कर रहा हूं। कुनी, उसके ससुर और पड़ोसियों पर से तत्काल सभी मुकदमे हटा लीजिए जो आपकी पुलिस ने फर्जी तरीके से बेशर्मी से लगाए हैं।

इस पत्र के साथ मैं कुनी सिकाका के दो चित्र संलग्न कर रहा हूं। पहला चित्र सितम्बर 2014 में हमारे दल द्वारा आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी में का है जिसमें सर्वोदय नेता स्व. नारायण देसाई द्वारा कुनी को शॉल ओढ़ाकर सम्मानित किया जा रहा है। दूसरे चित्र में कुनी इस संगोष्ठी को माइक पर संबोधित कर रही है और हमारे दल समाजवादी जन परिषद का बिल्ला लगाये हुए है।

तीसरा चित्र गत वर्ष 5 जून पृथ्‍वी दिवस के अवसर पर नियमगिरी सुरक्षा समिति द्वारा आयोजित खुले अधिवेशन का है। इस कार्यक्रम के मंच पर सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ पर्यावरण-अधिवक्ता के सामने कुनी बैठी है, मंच पर सुश्री मेधा पाटकर व प्रफुल्ल सामंतराय भी बैठे हैं। मैं भी इस कार्यक्रम में नियमगिरी सुरक्षा समिति द्वारा आमंत्रित था तथा वह चित्र मैंने खींचा है। कार्यक्रम में पूरा पुलिस बन्दोबस्त था तथा आपके खुफिया विभाग के कर्मी भी मौजूद थे।

संसदीय लोकतंत्र, न्यायपालिका और संविधान सम्मत अहिंसक प्रतिकार करने वाली नियमगिरी सुरक्षा समिति को माओवादी करार देने की कुचेष्टा से आपकी सरकार को बचना चाहिए। राज्य की जनता,सर्वोच्च न्यायपालिका और पर्यावरण के हित का सम्मान कीजिए तथा एक अहिंसक आन्दोलन को माओवादी करार देने की आपकी पुलिस की कार्रवाई से बाज आइए।

चूंकि हमारी साथी कुनी सिकाका को गैर कानूनी तरीके से घर से ले जाने में अर्धसैनिक बल भी शामिल था इसलिए इस पत्र की प्रतिलिपि केन्द्रीय गृहमंत्री श्री राजनाथ सिंह को भी भेज रहा हूं। इस पत्र को सार्वजनिक भी कर रहा हूं।

 

विनीत,

अफलातून

महामंत्री, समाजवादी जन परिषद


Filed under: नियमगिरी, corporatisation, globalisation , privatisation, kishan patanayak, Maoist Ideology, mining, samajwadi janparishad, women Tagged: aflatoon, अफलातून, कुनी सिकाका, नवीन पटनायक, नियमगिरी, माओवाद, राजनाथ सिंह, समाजवादी जनपरिषद, kuni sikaka, Maoism, Navin Patanayak, niyamgiri, rajnath singh, samajwadi janparishad

आधारित डायलॉग

आधार बनवाया कि नहीं? लेकिन आधार तो वॉलंटरी … बनवाता है कि ठोक दूँ? मीलॉर्ड आधार वॉलंटरी … आधार तो वॉलंटरी ही है। मीलार्ड आतंकवादी, काला धन … आधार तो बनवाना पड़ेगा। आधार बनवाता है कि ठोक दूँ? … आधार बन… बनवा लिया! बनवा लिया! … … आधार ‘अ’ से लिंक करवाता है कि ठोक […]

'फते' और 'फलास'

शब्दों का सफर - Fri, 05/05/2017 - 18:23

उक्त दोनों ही शब्द किसी ज़माने की राजभाषाओं के शब्द है पर देसी रंग कुछ इस अंदाज़ में चढ़ा कि अब चाहें तो इन्हें मालवी का कह लें या अवधी का। ये भी नोट किया जाए कि अच्छी ख़ासी राजभाषाओं की कलई ज़माने की टकसाल में फीकी पड़ जाती है। किसी भी चीज़ पर जब तक 'देसी' का रंग न चढ़े तब तक वह लोकप्रिय भी नहीं हो सकती।

किसी ज़माने में अरबी-फ़ारसी राजभाषाएँ थीं। चूँकि तुर्क-मंगोल नस्लों के लोगों ने इस्लाम स्वीकार कर लिया था इसलिए उनकी अपनी भाषाओं पर अरबी-फ़ारसी रंग ज्यादा चढ़ा था। हिन्दुस्तान में जो ज़बान दाखिल हुई वह फौजी अमले द्वारा बोली जाने वाली भाषा थी। जो बहुत ज्यादा पढ़े-लिखे नहीं थे। हालाँकि शाही अमले में अरबी-फ़ारसी के आलिम भी होते थे पर उनकी तादाद बेहद कम।

तो बात थी 'फते' की जो अरबी के फ़तह का देसी रूप है। फ़तह के फते रूप पर मुस्लिम आलिमो हुक्काम सिर धुन लिया करते थे। पर ये देसी ज़बानों की फ़तह थी कि उन्होंने इसके फते, फत्ते जैसे रूप बना लिए। यही नहीं इससे संज्ञनाम भी बनाए जैसे फतेह सिंह, फतेसिंह, फतेपुर, फतेपुरा, फतेचंद आदि।
फलास का किस्सा तो और भी मज़ेदार। द्यूत क्रीड़ा यानी जुआ-सट्टा का चलन भारतीय समाज में प्राचीनकाल से रहा।

तुर्क-मंगोल लोगों के साथ गंजीफा भी आया जो ताश, पत्ती का खेल है। अंग्रेजो के पास भी ताश-पत्ते का खेल कार्ड बनकर पूरब से ही गया था। जब वे हिन्दुस्तान आए तो ताश का ज़ोर और बढ़ा। अबकि बार अंदाज़ विलायती था। सो विलायती ताश के खेल में तीन पत्ती वाला फ्लैश या फ्लश भी जुआरियों या द्यूतप्रेमियों में प्रसिद्ध हो गया।

अब कोई भी शहराती चलन जब तक देसी रंगत में न आए, आनंद नहीं आता। सो विलायती का बिलैती हुआ, जनरल का जरनैल और प्लाटून का पलटन हुआ वैसे ही फ्लैश का 'फलास' हो गया। ये सफर आपको कैसा लगा ? पसंद आया हो तो यहां क्लिक करें Pictures have been used for educational and non profit activies. If any copyright is violated, kindly inform and we will promptly remove the picture.

राजनैतिक-आर्थिक प्रस्ताव ,समाजवादी जन परिषद के जटेश्वर,जि अलीपुरद्वार ,पश्चिम बंग में हुए 11वें द्विवार्षिक सम्मेलन में पारित

2014 में पहली बार अपने बूते केन्द्र में सरकार बना लेने के बाद भारतीय जनता पार्टी ने एक तरफ उत्तर प्रदेश जैसे बडे राज्य में बड़ी चुनावी सफलता हासिल की है वहीं दूसरी ओर राजनीति को पूंजीपतियों के हाथों में बांध देने में सत्ता के शीर्ष में बैठे इस दल के लोगों ने अहम भूमिका अदा की है।विडंबना यह है कि शोषक वर्ग के स्वार्थ की पूर्ति के लिए नाना प्रकार की नीतियां बनाने और कदम उठाने के बावजूद केन्द्र में बैठा यह सत्ताधारी दल राष्ट्रवादी होने का दावा करता है। समाजवादी जन परिषद के लिए दो स्वार्थ सर्वोपरि है-शोषित वर्ग का स्वार्थ तथा देश का स्वार्थ। दल की स्पष्ट मान्यता है कि पूंजीपति वर्ग के स्वार्थ को तवज्जो देने  से देश के स्वार्थ का नुकसान ही होता है।

याराना पूंजीवाद और खेती

केन्द्र सरकार की विदेश नीति तक शासक वर्ग से जुड़े पूंजीपतियों के हक में है। प्रधान मंत्री मंगोलिया,बांग्लादेश जैसे हमसे कमजोर देशों में जाते हैं और उन्हें करोड़ों डॉलर का कर्ज देने की घोषणा करते हैं।यह ऋण उन्हीं देशों को दिया जाता है जहां प्रधान मंत्री के करीबी पूंजीपतियों द्वारा बड़ी परियोजना चलाने के लिए समझौता होता है।

देश के बड़े पूंजीपतियों का सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में 11 लाख करोड़ रुपये का बकाया है।इसे चुकता करवाने के लिए सरकार द्वारा कोई कदम नहीं उठाया जा रहा है। इस सन्दर्भ में रिजर्व बैंक के पिछले गवर्नर द्वारा कड़े कदम उठाने की मांग की गयी तो उन्हें सेवा विस्तार नहीं दिया गया।

खाद्यान्न एवं खाद्य तेल के मामले में स्वावलंबन हमारे देश की सबसे बड़ी उपलब्धियों में गिनी जानी चाहिए जिसका श्रेय इस देश के किसानों को जाता है।इस स्वावलंबन को पलटने की दिशा में भी सत्ता के करीबी पूंजीपतियों का प्रत्यक्ष हाथ दिखाई दे रहा है।भारत दुनिया का सबसे बड़ा पाम ऑयल आयात करने वाला देश हो गया है।गौतम अडाणी की खाद्य तेल की ‘फॉर्चून’ मार्के वाली कम्पनी द्वारा अन्य तेल कम्पनियों को पाम ऑयल मिला हुआ खाद्य तेल बेचने का तरीका बताना आयात बढ़ने का मुख्य कारण रहा है। देश के तमाम बड़े उद्योगपतियों की कम्पनियों द्वारा अफ्रीकी देशों में हजारों एकड़ के फार्मों में खेती कराई जा रही है तथा भारत सरकार इनके उत्पादों के आयात के लिए उन देशों से समझौते कर रही है। अरहर की दाल की कीमत जिन दिनों आसमान छू रही थी तब गौतम अडाणी के गुजरात स्थित निजी बन्दरगाह में अफ्रीका से आयातित सस्ती दाल(40 से 50 रुपए/किलो) इकट्ठा करके रखा गया था तथा कीमत 100 रुपये प्रति किलो होने के बाद उसे निकाला गया था। विदेशों से गेहूं आयात करने पर लगने वाले 25 प्रतिशत आयात शुल्क को पहले 10 फीसदी किया गया और फिर उसे पूरी तरह समाप्त कर दिया गया है। वित्त मंत्री द्वारा यह घोषित कर दिया गया है कि निजी कम्पनियां यदि ठेके पर खेती करना चाहेंगी तो उन्हें इजाजत दे दी जाएगी।

खेती में बढ़ रही लागत के कारण किसानों की आत्महत्या की दर 26 प्रतिशत बढ़ गयी है। उत्तर प्रदेश की नवनिर्वाचित सरकार ने लघु तथा सीमान्त किसानों के कर्जे माफ कर दिए हैं जो कुछ राहत देने वाला कदम है।इसके साथ ही स्टेट बैंक ऑफ इंडिया तथा रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के शीर्षस्थ अधिकारियों ने किसानों की कर्ज माफी के खिलाफ बयान देने शुरु कर दिए हैं। इन बयानों से स्पष्ट होता है कि सरकार देश भर के किसानों के कर्ज माफ करने की मांग पर सकारात्मक नजरिए से विचार नहीं करना चाहती है।

कृषि उपज के समर्थन मूल्य के सन्दर्भ मे स्वामीनाथन समिति की सिफारिश को लागू करने की मांग को सरकार नजरअन्दाज कर रही है।इस समिति द्वारा लागत खर्च में 50 फीसदी जोड़ कर समर्थन मूल्य निर्धारित करने की बात कही गयी थी। यह नहीं भूलना चाहिए 2014 के आम चुनाव के अभियान में नरेन्द्र मोदी ने भी इस समिति की सिफारिशों को लागू करने की बात चुनावी सभाओं में कही थी। सजप सहित देश के किसान आन्दोलन कृषि उपज के मूल्य निर्धारण की बाबत इस समिति की सिफारिश को लागू करने की मांग करते हैं।

बेरोजगारीः

समाजवादी जन परिषद के नेता और अर्थशास्त्री साथी सुनील ने ग्रामीण इलाके के रोजगार के सन्दर्भ कहा था,’आज भारत के गाँव उद्योगविहीन हो गए हैं और वहाँ खेती-पशुपालन के अलावा कोई धंधा नहीं रह गया है । गाँव और खेती एक दूसरे के पर्याय हो गये हैं । दूसरी ओर गांव और उद्योग परस्पर विरोधी हो गये हैं । जहाँ गाँव है , वहाँ उद्योग नहीं है और जहाँ उद्योग है , वहाँ गाँव नहीं है । यह स्थिति अच्छी नहीं है और यह भी औपनिवेशिक काल की एक विरासत है ।‘ खेती के बाद सबसे अधिक रोजगार देने वाले हथकरघा उद्योग, कुटीर उद्योग, लघु उद्योग और जंगल पर आश्रित रोजगार के अवसरों को समाप्त करने का खुला खेल शुरू हो चुका है। विकेंद्रीकरण से कम पूंजी लगा कर अधिक लोगों को रोजगार मिलेगा, इस सिद्धांत को अमली रूप देने वाले कानून को दस अप्रैल 2015 को पूरी तरह लाचार बना दिया गया। सिर्फ लघु उद्योगों द्वारा उत्पादन की नीति के तहत बीस वस्तुएं आरक्षित रह गई थीं। जो वस्तुएं लघु और कुटीर उद्योग में बनाई जा सकती हैं उन्हें बड़े उद्योगों द्वारा उत्पादित न करने देने की स्पष्ट नीति के तहत 1977 की जनता पार्टी की सरकार ने 807 वस्तुओं को लघु और कुटीर उद्योगों के लिए संरक्षित किया था। यह नीति विश्व व्यापार संगठन की कई शर्तों के आड़े आती थी इसलिए 1991 के बाद लगातार यह सूची संकुचित की जाती रही। विदेशी मुद्रा के फूलते गुब्बारे और भुगतान संतुलन के ‘सुधार’ के साथ यह शर्त जुड़ी थी कि उत्पादन में मात्रात्मक प्रतिबंध नहीं लगाए जा सकेंगे। विश्व व्यापार संगठन की इस शर्त के कारण 1 अप्रैल, 2000 को संरक्षित सूची से 643 वस्तुएं हटा दी गर्इं।

जिन बीस वस्तुओं को हटा कर संरक्षण के लिए बनाई गई सूची को पूरी तरह खत्म किया गया था उन पर गौर कीजिए- अचार, पावरोटी, सरसों का तेल, मूंगफली का तेल, लकड़ी का फर्नीचर, नोटबुक या अभ्यास पुस्तिका और रजिस्टर, मोमबत्ती, अगरबत्ती, आतिशबाजी, स्टेनलेस स्टील के बरतन, अल्युमिनियम के घरेलू बरतन, कांच की चूड़ियां, लोहे की अलमारी, लोहे की कुर्सियां, लोहे के टेबल, लोहे के सभी तरह के फर्नीचर, रोलिंग शटर, ताले, कपड़े धोने का साबुन और दियासलाई। बड़ी पूंजी, आक्रामक विज्ञापन, मानव-श्रम की जगह मशीन को तरजीह देने वाली तकनीक से लैस देशी-विदेशी खिलाड़ी अधिक रोजगार देने वाले इन छोटे उद्योगों को लील जाएंगे।

इस प्रकार के छोटे और कुटीर उद्योगों के उत्पादों की खपत को बढ़ावा देने के लिए केंद्रीय एवं राज्य-स्तरीय सरकारी क्रय संस्थाओं द्वारा लघु और कुटीर उद्योगों से ही सामान खरीदने की नीति को भी निष्प्रभावी बनाने की दिशा में काम हो रहा है। इससे ठीक विपरीत स्थिति पर गौर करें। बड़े उद्योगपतियों को बढ़ावा देने के लिए नियम-कानून बदल देने का भी इतिहास रहा है। सरकार द्वारा नियम कानून बदल कर अपने प्रिय औद्योगिक घराने को बहुत बड़े पैमाने पर लाभ पहुंचाने के प्रमुख उदाहरणों में अंबानियों के उदय को प्रायोजित करने के लिए तत्कालीन कांग्रेस सरकार द्वारा सिर्फ उन्हें ही सिंथेटिक धागे के उत्पादन के लिए कच्चे माल के आयात की इजाजत देने के साथ-साथ हथकरघा द्वारा तैयार की जाने वाली कपड़ों की किस्मों की आरक्षित सूची को निष्प्रभावी बना देना है। गौरतलब है कि कपड़ा और उद्योग नीति के इन नीतिगत फैसलों के द्वारा अंबानी को देश का सबसे बड़ा औद्योगिक घराना बनाने के पहले तक सूती कपड़े कृत्रिम धागों से बने कपड़ों से सस्ते थे। कृत्रिम धागों से पावरलूम पर बने कपड़ों की इजाजत के साथ-साथ लाखों हथकरघा बुनकरों की आजीविका छिन गई है। पहले पावरलूम पर सिर्फ ‘कोरे कपड़े’ और हथकरघे पर बिनाई की विविध डिजाइनों के कपड़ों को बनाने की इजाजत थी।

यह कानून 1985 में बन गया था। तब बाईस किस्म के कपड़े इस कानून के तहत हथकरघे के लिए संरक्षित किए गए गए थे। पावलूम लॉबी ने कानून को 1993 तक मुकदमेबाजी में फंसाए रखा और 1993 में जब यह प्रभावी हुआ तब संरक्षित किस्मों की संख्या ग्यारह रह गई। एक प्रामाणिक अध्ययन के अनुसार हथकरघे पर बने होने के दावे वाले सत्तर फीसद कपड़े दरअसल मिलों या पावरलूम पर बने होते हैं।

भारत में सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में तीस लाख लोगों को काम मिला है जबकि हथकरघा से दो करोड़ लोग जुड़े हैं। अठारहवीं सदी के फ्रांसीसी यात्री फ्रैन्कोए पिरार्ड डी लावाल ने अपने यात्रा विवरण में बताया है कि अफ्रीका के दक्षिणी छोर से चीन तक लोग भारतीय हथकरघे पर बने कपड़ों से अपना शरीर ढंकते थे। उनके अनुसार भारत के पूर्वी तट के सिर्फ एक बंदरगाह से सालाना पचास लाख गज कपड़े का निर्यात होता था।

पारंपरिक हुनर,कला और हस्तशिल्प से जुड़े इन तमाम रोजगारों को समाप्त करने की नीति को लागू करने के साथ-साथ जनता की आंख में धूल झोंकने के लिए केन्द्र सरकार प्रचारित कर रही है कि वह हुनर प्रशिक्षण के लिए योजना चला रही है।

सरकारी नौकरियों की स्थिति के बारे में सरकार ने संसद में लिखित सूचना दी है। केंद्रीय कार्मिक मंत्री जितेंद्र सिंह ने सदन में लिखित रूप से कहा है कि 2013 की तुलना में 2015 में केंद्र सरकार की सीधी भर्तियों में 89 फीसदी की कमी आई है। अनुसूचित जाति, जनजाति और अन्य पिछड़ी जातियों की भर्ती में 90 फीसदी की कमी आई है। 2013 में केंद्र सरकार में 1, 54,841 भर्तियां हुई थीं जो 2014 में कम होकर 1, 26, 261 हो गईं। मगर 2015 में भर्तियों की संख्या में अचानक बहुत कमी हो जाती है। सवा लाख से कम होकर करीब सोलह हज़ार हो गयी। बिना किसी नीतिगत फैसले के इतनी कमी नहीं आ सकती। 2015 में केंद्र सरकार में 15,877 लोग की सीधी नौकरियों पर रखे गए। 74 मंत्रालयों और विभागों ने सरकार को बताया है कि अनुसूचित जाति, जनजाति और अन्य पिछड़ी जातियों की 2013 में 92,928 भर्तियां हुई थीं। 2014 में 72,077 भर्तियां हुईं। मगर 2015 में घटकर 8,436 रह गईं। इस प्रकार नब्बे फीसदी गिरावट आई है।
2015-18 के बीच रेलवे में रोजगार नहीं बढ़ेगा। रेलवे के मैनपावर की संख्या 13, 31, 433  ही रहेगी। जबकि 1 जनवरी 2014 को यह संख्या पंद्रह लाख थी। करीब तीन लाख नौकरियां कम कर दी गई हैं। 2006 से 2014 के बीच 90,629 हज़ार भर्तियां हुईं। अमरीका में एक लाख की आबादी पर केंद्रीय कर्मचारियों की संख्या 668 है। भारत में एक लाख की आबादी पर केंद्रीय कर्मचारियों की संख्या 138 है और यह भी कम होती जा रही है।
आल इंडिया काउंसिल फार टेक्निकल एजुकेशन की ताज़ा रिपोर्ट के अनुसार साठ प्रतिशत इंजीनियर नौकरी पर रखे जाने के काबिल नहीं हैं। भारत में हर साल आठ लाख इंजीनियर पैदा होते हैं। इनकी फीस में तो कोई कमी नहीं हुई। ये काबिल नहीं हैं तो इंजीनियरिंग कालेजों का दोष हैं। उन्होंने इतना खराब इंजीनियर लाखों रुपये लेकर कैसे बनाया । उनके बारे में कोई टिप्पणी नहीं है। अब बाज़ार में नौकरियां नहीं हैं तो पहले से ही इंजीनियरों को नाकाबिल कहना शुरू कर दो ताकि दोष बाज़ार पर न आए। अगर साठ प्रतिशत इंजीनियर नालायक पैदा हो रहे हैं तो ये जहां से पैदा हो रहे हैं उन संस्थानों को बंद कर देना चाहिए।

काला धन और भ्रष्टाचार

देश के सबसे बड़े पूंजीपतियों को नाजायज लाभ पहुंचाने वाली केन्द्र सरकार काले धन को समाप्त करने का दावा करती है तो उससे बढ़ कर हास्यास्पद और क्या हो सकता है? सच्चाई तो यह है कि HSBC बैंक की स्विट्जरलैन्ड स्थित जेनेवा शाखा में कई भारतीयों के गुप्त खाते होने की खबर को आये काफी समय बीत चुका है।दुनिया भर के कई हथियार तस्कर ,नशीली दवाओं के अवैध धन्धे करने वाले तथा भ्रष्ट नेताओं के नाम उजागर हुए हैं।इस सूची में भारत के बडे उद्योगपति,सिनेमा स्टार आदि के नाम थे। इस सूची के सार्वजनिक होने के बाद सरकार को इन खाताधारकों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई करनी चाहिए थी,इसके बजाए सरकार ने इन खाताधारकों से नजदीकी संबंध होने के कारण ऐसी कोई कार्रवाई नहीं कि बल्कि उस राशि को कबूल लेने की छूट की घोषणा की है।

पनामा नामक देश में दुनिया भर के कई भ्रष्ट नेताओं,अवैध व्यापार करने वाले तथा तस्करों के बैंक खातों की सूची सार्वजनिक हुई है।इस खबर के उजागर होने के बाद रूस,पाकिस्तान जैसे कई देशों में भारी हलचल मच गई।भारत में देश के सबसे उद्योगपति तथा सीने-सितारों आदि के नाम उजागर होने के बावजूद सरकार ने उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई नहीं की है।

काले धन के समाप्ति के दावे के साथ सरकार ने सबसे बड़ा कदम ‘नोटबन्दी’ का उठाया। अर्थव्यवस्था में चलन से बाहर किए गए नोटों का मूल्य 86 फीसदी था। इस कदम से देश में आर्थिक आपातकाल की स्थिति पैदा हो गयी।नोटों को बदलने के लिए बैंकों की लाइन में खड़े 200 से अधिक लोगों की मृत्यु हो गई। इस सबके बावजूद जिन लोगों के पास इन बड़े नोटों में अघोषित पैसा था वे उसे बदलने या उसे खर्च करने में सफल हो गए।अघोषित धन के इन मालिकों ने अपने कर्मचारियों और मजदूरों को इन नोटों में कई महीनों का एडवान्स में वेतन और बोनस देकर,सोना तथा डॉलर में बदल कर तथा पेट्रोल पंपो के माध्यम से अघोषित पैसे से बिना नुकसान उठाए मुक्ति पा ली। विपक्षी दल इस मुद्दे की गहराई में नहीं गए तथा जनता के बीच इसके खिलाफ कारगर कदम उठाने से बचते रहे।इसके फलस्वरूप साधारण गरीब लोगों में यह भ्रम फैलाने सरकार सफल हो गयी कि इस कदम से आम जनता को खास कष्ट नहीं होगा और पैसे वालों लोगों का नुकसान होगा। वास्तविकता यह है कि सरकार ने आज तक कितने नोट वापस नहीं लौटे इसका अधिकृत आंकड़ा तक घोषित नहीं किया है। सजप यह मांग करती है कि सरकार इससे संबंधित तथ्य सार्वजनिक करे तथा छोटे मूल्य के नोट उपलब्ध कराए।

कांग्रेस सरकार के समय चले लोकपाल की मांग के आन्दोलन का विपक्षी दल के रूप में भाजपा को लाभ मिला था इसके बावजूद लोकपाल के लिए कोई कारगर कानून नहीं लाया गया है। भ्रष्टाचार का एक बड़ा हिस्सा पूंजीपतियों द्वारा बिना स्रोत बताये राजनैतिक दलों को चन्दे के रूप में दिया जाता है।इस वर्ष के वित्त विधेयक के साथ ऐसे चन्दे की कोई सीमा न रखने तथा स्रोत घोषित न करने को वैधानिकता प्रदान कर दी गई है। यह ध्यान देने लायक बात है कि वर्तमान में चुनाव में प्रत्याशियों के खर्च की सीमा निर्धारित है किन्तु दलों द्वारा किए गए चुनाव खर्च की कोई सीमा नहीं है इसलिए इसका हिसाब भी गंभीरता से नहीं दिया जाता है। चुनाव के दौरान विपक्षी दलों के एक-एक नेता को खरीदने में मौजूदा शासक दल करोड़ों रुपए खर्च करता है इसलिए अघोषित आय के स्रोतों को बाधित करने में उसकी कोई रुचि नहीं है बल्कि इन बाधाओं को दूर करने के उसके द्वारा कानून बना लिए गए हैं।

चुनाव-सुधार

चुनाव में अघोषित पैसे हासिल करने और उसके बल पर चुनाव लड़ने के सन्दर्भ में ऊपर के अनुच्छेद जिक्र किया गया है। निर्वाचन प्रक्रिया के सन्दर्भ में समाजवादी जनपरिषद आनुपातिक प्रतिनिधित्व को अपनाने की पक्षधर है। इस सन्दर्भ में दल का कहना हैः

भारत के राज्य / शासन के हरेक स्तर (यथा केन्द्र, प्रदेश, जिला परिषद, प्रखंड समिति और पंचायत) पर चुनाव की पद्धति FPTP (“सबसे अधिक मत पाने वाला ही विजेता”) है। इसके विरुद्ध 80 देशों में चालू और भविष्य की लोकप्रिय पद्धति “आनुपातिक प्रतिनिधित्व है।

FPTP पद्धति भारत के शासन और लोकतन्त्र में कई कमजोरियों और विकृतियों को चला बढ़ा रही है| वह नीतियों के बनने- बदलने में बहुत खतरनाक हालात पैदा कर रही है. इसकें कुछ तथ्य हैं-

  1. मोदी सरकार केवल 30% जनता की पसन्द से ही लोकसभा में बहुमत लेकर आई है. करीब 60% जनता, जो उसके विरुद्ध है; वह 5 साल के लिए संसद मे बहुत कम प्रतिनिधित्व वाली और अशक्त हो चुकी है. छोटी संख्या वाली विकसित हो रही विचारधाराओं और संगठनों का तो इस पद्धति के रहते संसद, विधानसभा वगैरह में पहुँच पाना और मात्र अपनी पहचान बना कर रख पाना असंभव है।
  2. देश की प्रत्येक राज्य सरकार में भी कोई एक पार्टी इसी तरह बहुमत से बहुत कम वोट लाकर भी शासक बन गई है। वे भी कई बार केन्द्र सरकार जैसे गलत और अलोकतान्त्रिक निर्णय और काम करती है। ये सारी अल्पमत वाली सरकारें दूरगामी आर्थिक और प्रशासनिक नीतियों और बड़े सामाजिक-धार्मिक प्रभाव वाले कार्यक्रम बनाती चलाती है। वे अतिवादी व्यवहार को बढ़ावा देती है जो बहुधा देश-समाज को गहरा नुकसान पहुँचाने वाली होती है।

इस मुद्दे की बाबत दल द्वारा सेमिनार आयोजित किए जाएंगे तथा सहित्य प्रकाशन किया जाएगा।

भारतीय समाज में जो लोग संकीर्ण भावनाओं को फैलाते हैं,जाति-प्रथा के विचार को फैलाते हैं,मठाधीशों के वर्चस्व को मजबूत करते हैं,साम्प्रदायिकता को फैलाकर निहित वर्ग की राजनीति को मजबूत बनाते हैं,उनकी राजनीति आज ताकतवर है। समाजवादी जन परिषद जिन गरीब और कमजोर तबकों की राजनीति करती है वह मजबूत न होने पर उन तबकों का न घर चलेगा न आजीविका।यह बात हमें जनता में ले जानी होगी। शोषित वर्ग का स्वार्थ और देश का स्वार्थ परस्पर जुड़े हुए हैं। धनी वर्ग की राजनीति का मुकाबला हम इसी राजनीति के बल पर करेंगे। हमें इस उद्देश्य को स्पष्ट तौर पर दिमाग में बैठा लेना होगा। पूंजीवादी,मनुवादी सोच की ताकतें जिस प्रकार ‘हिन्दू राष्ट्र’ का उद्देश्य अपने दिमाग बैठाये हुए हैं, उससे देश का विघटन अवश्यंभावी है। शोषित तबकों की राजनीति को मजबूत बना कर मौजूदा देश-विरोधी राजनीति को परास्त करने का यह सम्मेलन संकल्प लेता है।

प्रस्तावक- अफलातून. , समर्थक – कमलकृष्ण बनर्जी


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शशिकांत - Thu, 04/05/2017 - 00:02
डॉ. शशिकांत, सहायक प्रोफ़ेसर, हिंदी विभाग,  मोतीलाल नेहरु कॉलेज, दिल्ली वि.वि. दिल्ली 

सवाल जन-विश्वास का है ना कि केजरीवाल-कुमार विश्वास का

आप की राजनीति चुक गई लेकिन आंदोलन की जमीन जस की तस है

तो क्या केजरीवाल-विश्वास के बीच दरार की वजह सिर्फ अमानतुल्ला थे । और अब अमानतुल्ला को पार्टी से सस्पेंड कर दिया गया तो क्या केजरीवाल का विश्वास कुमार पर लौट आया । या फिर कुमार के भीतर केजरीवाल को लेकर विश्वास जाग गया । क्योंकि केजरीवाल से लंबी बैठक के बाद मनीष सिसोदिया के साथ खड़े होकर कुमार ने अपना विश्वास आप में लौटते हुये दिखाया जरुर । लेकिन आप के भीतर का संकट ना तो अमानतुल्ला है ना ही कुमार विश्वास का गु्स्सा। और ना ही केजरीवाल की लीडरशिप। और ना ही आरोप-प्रत्यारोप का सिलसिला । आप के संकट तीन हैं। पहला , आप नेताओ को लगता है वही आंदोलन है । दूसरा, आंदोलन की तर्ज पर गवर्नेंस चलाने की इच्छा है । तीसरा , चुनावी जीत के लिये पार्टी संगठन का ताना-बाना बुनना है। यानी करप्शन और आंदोलन की बात कहते कहते कुमार विश्वास राजस्थान के प्रभारी बनकर महत्व पा गये।
यानी पारंपरिक राजनीतिक दल के पारपंरिक प्रभावी नेता का तमगा आप और कुमार विश्वास के साथ भी जुड़ गया । तो क्या आने वाले वक्त में कुमार की अगुवाई में आप राजस्थान जीत लेगी । यकीनन इस सवाल को दिल्ली के बाद ना तो पंजाब में मथा गया। ना गोवा में मथा गया । ना ही राजस्थान समेत किसी भी दूसरे राज्य में मथा जा रहा है। चूंकि आप के नेताओं को लगता है कि वही आंदोलन है । तो चुनाव को भी आप आंदोलन की तरह ना मान कर पारंपरिक लीक को ही अपना रही है। तो बड़ा सवाल है, जनता डुप्लीकेट को क्यों जितायेगी। और दिल्ली चुनाव के वक्त को याद किजिये। 2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी का परचम देश भर में कांग्रेस की सत्ता के खिलाफ लहराया। लेकिन दिल्ली में आप इसलिये जीत गई क्योंकि चुनाव आप नहीं आम जनता लड़ रही थी। आम जनता के भीतर पारंपरिक बीजेपी-काग्रेस को लेकर सवाल थे । यानी आप में ठहराव आ गया । चुनावी जीत की रणनीति को ही जन-नीति मान लिया गया । सिस्टम से लड़ते हुये दिखना ही सिस्टम बदलने की कवायद मान लिया गया । तो याद कीजिये आंदोलन की इस तस्वीर को। आप के नेता जनता को रामलीला मैदान में बुला नहीं रहे थे। जनता खुद ब खुद रामलीला मैदान में आ रही थी । यानी आंदोलन से विकल्प पैदा हो सकता है ये जनता ने सोचा । और विकल्प चुनाव लड़कर, जीत कर किया जा सकता है ये उम्मीद आप पार्टी बनाकर केजरीवाल ने जगायी। लेकिन चुनावी जीत के बाद के तौर तरीके उसी गवर्नेंस में खो गये, जिस गवर्नैंस में पद पर बैठकर खुद को सेवक मानना था । वीआईपी लाल बत्ती कल्चर को छोडना था । जन सरकार में खुद को तब्दील करना था । तो बदला कौन । जनता तो जस की तस है । आंदोलन के लिये जमीन भी बदली नही है । सिर्फ आंदोलन की पीठ पर सवार होने की सोच ने सत्ता की लड़ाई में हर किसी को फंसा दिया है । इसलिये चुनाव आप हार रही है । हार की खिस आंदोलन को परफ्यूम मान रही है । और केजरीवाल हो या कुमार विश्वास बार बार सत्ता की जमी पर खडे होकर आंदोलन का रोना रो रहे है ।

तो फिर याद किजिये 2011 में हो क्या रहा था । कोयला घोटाला ,राडिया टेप , आदर्श घोटाला , 2 जी घोटाला ,कामनवेल्थ घोटाला ,कैश फार वोट, सत्यम घोटाला ,एंथेक्स देवास घोटाला । यानी कांग्रेस के दौर के घोटालो ने रामलीला मैदान को रेडिमेड आंदोलन की जमीन दे दी थी । यानी लोगों में गुस्सा था । जनता विकल्प चाहती थी । तब बीजेपी लड़खड़ा रही थी और चुनावी राजनीति से इतर रामलीला मैदान बिना किसी नेता के आंदोलन में इसलिये बदल रहा था क्योंकि करप्शन चरम पर था। और तब की मनमोहन सरकार ही कटघरे में थी और मांग उच्च पदों पर बैठे विशेषाधिकार प्राप्त लोगों के खिलाफ जनलोकपाल की नियुक्ति का सवाल था । तब रामलीला मैदान की भीड़ को नकारने वाली संसद भी झुकी। और लोकपाल प्रस्ताव पास किया गया। तो हालात ने रामलीला मैदान के मंच पर बैठे लोगो को लीडर बना दिया और यही लीडरई आप बनाकर चुनाव जीत गई । लेकिन मौजूदा सच यही है लोकपाल की नियुक्ति अभी तक हुई नहीं है। रोजगार का सवाल लगातार बड़ा हो रहा है । महंगाई जस की तस है/ । कालाधन का सवाल वैसा ही है । किसी का नाम सामने आया नही । कश्मीर के हालत बिगडे हुये है । किसानो की खुदकुशी कम हुई नहीं है । पाकिस्तान की नापाक हरकत लगातार जारी है । यानी मुद्दे अपने अपने दायरे में सुलझे नहीं है । लेकिन आप चुनाव जीतने के तरीकों को मथ रही है । और मुद्दों के आसरे चुनाव जीतने की सोच में बीजेपी से आगे आज कौन हो सकता है । जिसके अध्यक्ष अमित शाह बूथ लेवल पर संगठन बना रहे हैं । अभी से 2019 की तैयारी में लग चुके हैं । अगले 90 दिनो में 225 लोकसभा सीट को कवर करेंगे। तो चुनाव जीतने की ही होड़ में जब आप भी जा घुसी है तो वह टिकेगी कहां और जनता -डुप्लीकेट को जितायेगी क्यों। यानी आप के भीतर का झगडा सिर्फ चुनावी हार का झगड़ा भर नहीं है । बल्कि आंदोलन की राजनीतिक जमीन को गंवाना भी है । जिसके भरोसे आप को राजनीतिक साख मिली। वह खत्म हो चली है । लेकिन समझना ये भी होगा कि देश में आंदोलन की जमीन जस की तस है । नया सवाल ये हो सकता
है कि गैर चुनावी राजनीति से इतर किस मुद्दे पर नया आंदोलन कब कहां खड़ा होगा ।

हिन्दी संग्रामी श्यामरुद्र पाठक गिरफ्तार/नेरेन्द्र मोदी को लिखा उनका पत्र

सेवा में,

श्री नरेन्द्र मोदी जी,
प्रधान मंत्री, भारत सरकार ।

विषय : उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों में भारत की कम से कम एक-एक भाषा का प्रयोग अधिकृत करने की माँग को लेकर 3 मई, 2017 को पूर्वाह्न 11 बजे से आपके कार्यालय (प्रधान मंत्री कार्यालय) के समक्ष सत्याग्रह (धरना) प्रारम्भ करने की पूर्व सूचना ।

महाशय,

भारत के उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों में भारत की कम से कम एक-एक भाषा का प्रयोग अधिकृत करने हेतु केंद्र सरकार संविधान संशोधन विधेयक संसद में प्रस्तुत करे, इस आग्रह का पत्र आपके कार्यालय में 7 नवम्बर, 2014 और 1 दिसंबर, 2014 को हमने जमा किए ।

विश्व के इस सबसे बड़े प्रजातंत्र में आजादी के सत्तर वर्षों के पश्चात् भी सर्वोच्च न्यायालय और देश के 24 में से 20 उच्च न्यायालयों की किसी भी कार्यवाही में भारत की किसी भी भाषा का प्रयोग पूर्णतः प्रतिबंधित है और यह प्रतिबंध भारतीय संविधान की व्यवस्था के तहत है । संविधान के अनुच्छेद 348 के खंड (1) के उपखंड (क) के तहत उच्चतम न्यायालय और प्रत्येक उच्च न्यायालय में सभी कार्यवाहियाँ अंग्रेजी भाषा में होंगी ।

यद्यपि इसी अनुच्छेद के खंड (2) के तहत किसी राज्य का राज्यपाल उस राज्य के उच्च न्यायालय में हिंदी भाषा या उस राज्य की राजभाषा का प्रयोग राष्ट्रपति की पूर्व सहमति के पश्चात् प्राधिकृत कर सकेगा । इस खंड की व्यवस्था ऐसे उच्च न्यायालय द्वारा दिए गए किसी निर्णय, डिक्री या आदेश पर लागू नहीं होगी । अर्थात् इस खंड के तहत उच्च न्यायालयों में भारतीय भाषा के सीमित प्रयोग की ही व्यवस्था है; और इसके तहत उच्च न्यायालय में भी भारतीय भाषा का स्थान अंग्रेजी के समतुल्य नहीं हो पाता ।

ऐसी संवैधानिक व्यवस्था होते हुए भी किसी भारतीय भाषा के सीमित प्रयोग की स्वीकृति भी संविधान लागू होने के सड़सठ वर्ष पश्चात् भी केवल चार राज्यों के उच्च न्यायालयों में ही दी गई है । 14 फरवरी,1950 को राजस्थान के उच्च न्यायालय में हिंदी का प्रयोग प्राधिकृत किया गया । तत्पश्चात् 1970 में उत्तर प्रदेश,1971 में मध्य प्रदेश और 1972 में बिहार के उच्च न्यायालयों में हिंदी का प्रयोग प्राधिकृत किया गया । इन चार उच्च न्यायालयों को छोड़कर देश के शेष बीस उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय में सभी कार्यवाहियों में अंग्रेजी अनिवार्य है ।

सन् 2002 में छत्तीसगढ़ सरकार ने इस व्यवस्था के तहत उस राज्य के उच्च न्यायालय में हिंदी का प्रयोग प्राधिकृत करने की माँग केन्द्र सरकार से की । सन् 2010 एवं 2012 में तमिलनाडु एवम् गुजरात सरकारों ने अपने उच्च न्यायालयों में तमिल एवम् गुजराती का प्रयोग प्राधिकृत करने के लिए केंद्र सरकार से माँग की । परन्तु इन तीनों मामलों में केन्द्र सरकार ने राज्य सरकारों की माँग ठुकरा दी ।

5 अप्रिल, 2015 को उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीश, उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश एवम् राज्यों के मुख्यमंत्रियों के सम्मलेन में तमिलनाडु के तत्कालीन मुख्यमंत्री ओ पनीरसेल्वम ने तमिलनाडु सरकार की यह माँग दोहराई कि मद्रास हाई कोर्ट में तमिल भाषा के इस्तेमाल की इजाज़त दी जाए । उन्होंने केंद्र से अपील की कि वह इस मामले में अपने रुख पर पुनर्विचार करे और मद्रास हाई कोर्ट में तमिल भाषा के इस्तेमाल की इजाजत देकर तमिलनाडु राज्य की पुरानी आकांक्षा और माँग को पूरा करे । मुख्य मंत्री ने कहा कि यदि हमें न्याय का प्रशासन वाकई लोगों के करीब ले जाना है तो यह बहुत जरूरी है कि हाई कोर्ट में स्थानीय भाषा का इस्तेमाल किया जाए ।

ध्यातव्य है कि श्री ओ पनीरसेल्वम अन्ना द्रविड़ मुन्नेत्र कझगम पार्टी की ओर से मुख्यमंत्री पद पर थे और तमिलनाडु राज्य की मुख्य विपक्षी पार्टी द्रविड़ मुन्नेत्र कझगम पार्टी ने पिछले लोकसभा चुनाव में अपनी पार्टी के चुनाव घोषणा पत्र में लिखा था कि वह मद्रास हाई कोर्ट में तमिल के इस्तेमाल की समर्थक है ।

सन् 2012 में, जब आप गुजरात के मुख्यमंत्री थे, तब गुजरात सरकार ने केंद्र सरकार से यह आग्रह किया था कि गुजरात के उच्च न्यायालय में गुज़राती का प्रयोग अधिकृत हो । तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने तो इस पर ध्यान नहीं ही दिया, परन्तु आश्चर्य और दुःख इस बात का है कि जब आप स्वयम् देश के प्रधान-मंत्री बन गए तो भी आप ने इस पर कभी भी ध्यान नहीं दिया । आपके प्रधान मंत्री बनने के बाद इस मामले में पत्र लिखकर आपके कार्यालय में दो बार ( 7 नवम्बर, 2014 और 1 दिसंबर, 2014 को ) जमा किए गए पत्रों की प्राप्ति हमारे पास है ।

सर्वोच्च न्यायालय में अंग्रेजी के प्रयोग की अनिवार्यता हटाने और एक या एकाधिक भारतीय भाषा को प्राधिकृत करने का अधिकार राष्ट्रपति या किसी अन्य अधिकारी के पास नहीं है । अतः सर्वोच्च न्यायालय में एक या एकाधिक भारतीय भाषा का प्रयोग प्राधिकृत करने के लिए और प्रत्येक उच्च न्यायालय में कम-से-कम एक-एक भारतीय भाषा का दर्जा अंग्रेज़ी के समकक्ष दिलवाने हेतु संविधान संशोधन ही उचित रास्ता है । अतः संविधान के अनुच्छेद 348 के खंड (1) में संशोधन के द्वारा यह प्रावधान किया जाना चाहिए कि उच्चतम न्यायालय और प्रत्येक उच्च न्यायालय में सभी कार्यवाहियाँ अंग्रेजी अथवा कम-से-कम किसी एक भारतीय भाषा में होंगी ।

इसके तहत मद्रास उच्च न्यायालय में अंग्रेजी के अलावा कम-से-कम तमिल, कर्नाटक उच्च न्यायालय में अंग्रेजी के अलावा कम-से-कम कन्नड़, छत्तीसगढ़, हिमाचल प्रदेश, दिल्ली, उत्तराखंड और झारखंड के उच्च न्यायालयों में अंग्रेजी के अलावा कम-से-कम हिंदी और इसी तरह अन्य प्रांतों के उच्च न्यायालयों में अंग्रेजी के अलावा कम-से-कम उस प्रान्त की राजभाषा को प्राधिकृत किया जाना चाहिए और सर्वोच्च न्यायालय में अंग्रेजी के अलावा कम-से-कम हिंदी को प्राधिकृत किया जाना चाहिए ।

ध्यातव्य है कि भारतीय संसद में सांसदों को अंग्रेजी के अलावा संविधान की अष्टम अनुसूची में उल्लिखित सभी बाईस भारतीय भाषाओं में बोलने की अनुमति है । श्रोताओं को यह विकल्प है कि वे मूल भारतीय भाषा में व्याख्यान सुनें अथवा उसका हिंदी या अंग्रेजी अनुवाद सुनें, जो तत्क्षण-अनुवाद द्वारा उपलब्ध कराया जाता है । अनुवाद की इस व्यवस्था के तहत उत्तम अवस्था तो यह होगी कि सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों में एकाधिक भारतीय भाषाओं के प्रयोग का अधिकार जनता को उपलब्ध हो परन्तु इन न्यायालयों में एक भी भारतीय भाषा के प्रयोग की स्वीकार्यता न होना हमारे शासक वर्ग द्वारा जनता को खुल्लमखुल्ला शोषित करते रहने की नीति का प्रत्यक्ष उदाहरण है ।

किसी भी नागरिक का यह अधिकार है कि अपने मुकदमे के बारे में वह न्यायालय में स्वयम् बोल सके, चाहे वह वकील रखे या न रखे । परन्तु अनुच्छेद 348 की इस व्यवस्था के तहत देश के चार उच्च न्यायालयों को छोड़कर शेष बीस उच्च न्यायालयों एवम् सर्वोच्च न्यायालय में यह अधिकार देश के उन सतानवे प्रतिशत (97 प्रतिशत) जनता से प्रकारान्तर से छीन लिया गया है जो अंग्रेजी बोलने में सक्षम नहीं हैं । सतानवे प्रतिशत जनता में से कोई भी इन न्यायालयों में मुकदमा करना चाहे या उन पर किसी अन्य द्वारा मुकदमा दायर कर दिया जाए तो मजबूरन उन्हें अंग्रेजी जानने वाला वकील रखना ही पड़ेगा जबकि अपना मुकदमा बिना वकील के ही लड़ने का हर नागरिक का अधिकार है ।

अगर कोई वकील रखता है तो भी वादी या प्रतिवादी यह नहीं समझ पाता है कि उसका वकील मुकदमे के बारे में महत्‍वपूर्ण तथ्यों को सही ढंग से रख रहा है या नहीं ।

निचली अदालतों एवम् जिला अदालतों में भारतीय भाषा का प्रयोग अनुमत है । अतः उच्च न्यायालयों में जब कोई मुकदमा जिला अदालत के बाद अपील के रूप में आता है तो मुकदमे से संबद्ध निर्णय एवम् अन्य दस्तावेजों के अंग्रेजी अनुवाद में समय और धन का अपव्यय होता है; वैसे ही बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और राजस्थान उच्च न्यायालयों के बाद जब कोई मुकदमा सर्वोच्च न्यायालय में आता है तो भी अनुवाद में समय और धन का अपव्यय होता है ।

प्रत्येक उच्च न्यायालय एवम् सर्वोच्च न्यायालय में एक-एक भारतीय भाषा का प्रयोग भी अगर अनुमत हो जाए तो उच्च न्यायालय तक अनुवाद की समस्या पूरे देश में लगभग समाप्त हो जाएगी और सर्वोच्च न्यायालय में भी अहिंदीभाषी राज्यों के भारतीय भाषाओं के माध्यम से संबद्ध मुकदमों में से जो मुकदमे सर्वोच्च न्यायालय में आएँगे, केवल उन्हीं में अनुवाद की आवश्यकता होगी ।

प्रस्तावित कानूनी परिवर्तन इस बात की संभावना भी बढ़ाएगा कि जो वकील किसी मुकदमे में जिला न्यायालय में काम करता है, वही वकील उच्च न्यायालय और उच्चतम न्यायालय में भी काम कर सके । इससे वादी-प्रतिवादी के ऊपर मुकदमे से सम्बंधित खर्च घटेगा ।

यह कहना कि केवल हिंदी भाषी राज्यों (बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और राजस्थान) के उच्च न्यायालयों में भारतीय भाषा का प्रयोग अनुमत होगा, अहिंदीभाषी प्रांतों के साथ भेदभावपूर्ण व्यवहार है । परन्तु अगर यह तर्क भी है तो भी छत्तीसगढ़, हिमाचल प्रदेश, दिल्ली, उत्तराखंड एवं झारखंड के उच्च न्यायालयों में हिंदी का प्रयोग अनुमत क्यों नहीं है ?

ध्यातव्य है कि छत्तीसगढ़, उत्तराखंड एवम् झारखंड के निवासियों को इन राज्यों के बनने के पूर्व अपने-अपने उच्च न्यायालयों में हिंदी का प्रयोग करने की अनुमति थी ।

अगर चार उच्च न्यायालयों में भारतीय भाषा में न्याय पाने का हक है तो देश के शेष बीस उच्च न्यायालयों के अधिकार क्षेत्र में निवास करने वाली जनता को यह अधिकार क्यों नहीं ? क्या यह उनके साथ भेदभावपूर्ण व्यवहार नहीं है ? क्या यह अनुच्छेद 14 द्वारा प्रदत्त ‘विधि के समक्ष समता’ और अनुच्छेद 15 द्वारा प्रदत्त ‘जन्मस्थान के आधार पर भेदभाव का निषेध’ के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन नहीं है ? और इस आधार पर छत्तीसगढ़, तमिलनाडु और गुजरात सरकार के आग्रहों को ठुकराकर क्या केन्द्र सरकार ने देशद्रोह एवम् भारतीय संविधान की अवमानना का कार्य नहीं किया था ?

उच्च न्यायालयों एवम् सर्वोच्च न्यायलय में वकालत करने एवम् न्यायाधीश बनने के अवसरों में भी तीन प्रतिशत अंग्रेजीदां आभिजात्य वर्ग का पूर्ण आरक्षण है, जो कि ‘अवसर की समता’ दिलाने के संविधान की प्रस्तावना एवम् संविधान के अनुच्छेद 16 के तहत ‘लोक नियोजन के विषय में अवसर की समता’ के मौलिक अधिकार का उल्लंघन है ।

ऊपर वर्णित संविधान की अवमाननाओं के अलावा उच्च न्यायालयों एवम् सर्वोच्च न्यायालय में अंग्रेजी की अनिवार्यता अनेक संवैधानिक व्यवस्थाओं का उल्लंघन है, जिन में से कुछ का जिक्र नीचे किया जा रहा है :

(1) संविधान की प्रस्तावना के अनुसार भारत को ‘समाजवादी लोकतंत्रात्मक गणराज्य’ बनाना है और भारत के नागरिकों को ‘न्याय’ और ‘प्रतिष्ठा और अवसर की समता’ प्राप्त कराना है तथा ‘व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता और अखंडता सुनिश्चित करनेवाली बंधुता’ को बढ़ाना है ।

(2) अनुच्छेद 38 – राज्य लोक कल्याण की अभिवृद्धि के लिए काम करेगा ।
अनुच्छेद 39 – राज्य अपनी नीति का विशेष रूप से इस प्रकार संचालन करेगा कि सुनिश्चित रूप से सभी नागरिकों को समान रूप से जीविका के पर्याप्त साधन प्राप्त करने का अधिकार हो ।
अनुच्छेद ‘ 39 क’ – राज्य यह सुनिश्चित करेगा कि कानून का तंत्र इस प्रकार काम करे कि समान अवसर के आधार पर न्याय सुलभ हो और किसी भी असमर्थता के कारण कोई नागरिक न्याय प्राप्त करने के अवसर से वंचित न रह जाए ।

(3) अनुच्छेद ‘51 क’– भारत के प्रत्येक नागरिक का यह मूल कर्तव्य है कि वह स्वतंत्रता के लिए हमारे राष्ट्रीय आंदोलन को प्रेरित करने वाले उच्च आदर्शों को हृदय में संजोए रखे और उनका पालन करे और भारत के सभी लोगों में समरसता और समान भ्रातृत्व की भावना का निर्माण करे, जो धर्म, भाषा और प्रदेश या वर्ग पर आधारित सभी भेदभाव से परे हो ।

[ ध्यातव्य है कि ‘स्वराज’ हमारे स्वतंत्रता आंदोलन का पथ-प्रदर्शक सिद्धांत था और हिंदी व अन्य जन-भाषाओं का प्रयोग तथा जनता के लिए अंग्रेजी के अनिवार्य प्रयोग का विरोध गांधीजी की नीति थी और राष्ट्रभाषा का प्रचार-प्रसार उनके रचनात्मक कार्यक्रम का मुख्य बिंदु था । स्पष्ट ही अनुच्छेद 348 को वर्त्तमान स्वरूप में रखकर हमारे शासक वर्ग संविधान द्वारा निर्धारित मूल कर्तव्य का उल्लंघन कर रहे हैं । ]

(4) अनुच्छेद 343 – संघ की राजभाषा हिंदी होगी ।
अनुच्छेद 351 – संघ का यह कर्तव्‍य होगा कि वह हिंदी भाषा का प्रसार बढ़ाए, उसका विकास करे और उसकी समृद्धि सुनिश्चित करे ।

अनुच्छेद 348 में संशोधन करने की हमारी प्रार्थना एक ऐसा विषय है जिसमें संसाधनों की कमी का कोई बहाना नहीं बनाया जा सकता है । हम ऊपर यह बता चुके हैं कि प्रस्तावित संशोधन से अनुवाद में लगने वाले समय और धन की बचत होगी तथा वकीलों को रखने के लिए होने वाले खर्च में भी भारी कमी होगी । अनुच्छेद 348 का वर्त्तमान स्वरूप शासक वर्ग द्वारा आम जनता को शोषित करते रहने की दुष्ट भावना का खुला प्रमाण है । यह हमारी आजादी को निष्प्रभावी बना रहा है । यह एक शोषणकारी औपनिवेशिक व्यवस्था की जीवन्तता है । क्या स्वाधीनता का अर्थ केवल ‘यूनियन जैक’ के स्थान पर ‘तिरंगा झंडा’ फहरा लेना है ?

कहने के लिए भारत विश्व का सबसे बड़ा प्रजातंत्र है, परन्तु जहाँ जनता को अपनी भाषा में न्याय पाने का हक नहीं है, वहाँ प्रजातंत्र कैसा ? दुनिया के तमाम उन्नत देश इस बात के प्रमाण हैं कि कोई भी राष्ट्र अपनी जन-भाषा में काम करके ही उल्लेखनीय उन्नति कर सकता है । किसी भी विदेशी भाषा के माध्यम से आम जनता की प्रतिभा की भागीदारी देश की विकास-प्रक्रिया में नहीं हो सकती । प्रति व्यक्ति आय की दृष्टि से विश्व के वही देश अग्रणी हैं, जो अपनी जन-भाषा में काम करते हैं; और प्रति व्यक्ति आय की दृष्टि से विश्व के वे देश सबसे पीछे हैं, जो विदेशी भाषा में काम करते हैं । विदेशी भाषा में उन्हीं अविकसित देशों में काम होता है, जहाँ का बेईमान आभिजात्य वर्ग विदेशी भाषा को शोषण का हथियार बनाता है और इसके द्वारा विकास के अवसरों में अपना पूर्ण आरक्षण बनाए रखना चाहता है ।

इस विषय में केंद्र सरकार संविधान संशोधन विधेयक संसद में प्रस्तुत करने का निर्णय ले और इसकी सार्वजनिक घोषणा करे, यही हमारा आग्रह है ।

अगर इस तरह का निर्णय सरकार नहीं लेती है, तो 3 मई, 2017 को पूर्वाह्न 11 बजे से आपके कार्यालय के समक्ष हम सत्याग्रह (धरना) प्रारम्भ करेंगे ।
इस सत्याग्रह में किसी भी एक समय में अधिक से अधिक चार लोग भाग लेंगे । यह सत्याग्रह पूर्णतः शान्तिपूर्ण और अहिंसक ढंग से होगा । इसमें किसी प्रकार के लाउडस्पीकर का इस्तेमाल नहीं होगा ।

श्रीमान् से हमारा विनम्र आग्रह है कि जब तक हम किसी असभ्य भाषा का प्रयोग न करें तब तक हमारे साथ पुलिस या किसी अन्य सरकारी अधिकारी द्वारा असभ्य भाषा का इस्तेमाल न किया जाए और जब तक हम हिंसा या मारपीट पर न उतरें तब तक हमारे साथ पुलिस या किसी अन्य सरकारी अधिकारी द्वारा हिंसा या मारपीट का बर्ताव न किया जाए ।

अगर इस सम्बन्ध में हमें आपसे मिलने का मौक़ा दिया जाता है, तो हम आपके आभारी रहेंगे ।

आपका विश्वसनीय
24 अप्रिल, 2017 (मेरा हस्ताक्षर)
1. श्याम रुद्र पाठक
संयोजक, न्याय एवं विकास अभियान
एच डी – 189, सेक्टर 135, नॉएडा – 201304
shyamrudrapathak@gmail.com
फोन : 9818216384

  1. प्रेम चन्द अग्रवाल
    423/10, प्रीत नगर, अम्बाला शहर – 134003
    फोन : 9467909649
  2. ब्रह्मेश्वर नाथ मिश्र
    बी – 319, इंदिरा गार्डन, खोड़ा कॉलोनी, गाजियाबाद – 201309
    फोन : 9213161050
  3. बिनोद कुमार पाण्डेय
    ए – 435, जैतपुर एक्सटेंशन, पार्ट – 1, बदरपुर, नई दिल्ली- 110044
    फोन : 8287578876

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पाकिस्तान से ना युद्द, ना दोस्ती में फंसा भारत?

तो नॉर्दन कमान ने बकायदा प्रेस विज्ञप्ति जारी कर कहा कि पुंछ जिले में कृष्णा घाटी सेक्टर में लाइन आफ कन्ट्रोल के दो पोस्ट पर रॉकेट और मोर्टार से पाकिस्तान ने गोलाबारी की, जिसमें एक सेना का जवान और एक बीएसएफ का जवान शहीद हो गया। लेकिन पाकिस्तानी फौज ने भारतीय सैनिकों के शव को क्षत-विक्षत कर दिया। तो ये ना तो पहली घटना है। और हालात बताते हैं कि ये ना ही आखिरी घटना होगी। क्योंकि करगिल युद्द के बाद से पाकिस्तान ने आधे दर्जन से ज्यादा बार जवानों के सिर काटे हैं। मई 1999 में जवान सौरभ कालिया का सिर काटा। जून 2008 में 2/8 गोरखा रेजिमेंट के एक जवान का सिर काटा। जुलाई 2011 में कुमाऊं रेजिमेंट के जयपाल सिंह अधिकारी और लांस नायक देवेन्द्र सिंह के सर काटे। 8 जनवरी 2013 लांस नायक हेमराज का सिर काटा। अक्टूबर 2016 जवान मंजीत सिंह का सिर काटा। नवंबर 2016 तीन जवानों का शव क्षत-विक्षत किया। और 5 महीने बाद यानी 1 मई 2017 को पुंछ जिले के कृष्णा सेक्टर में दो जवानों के शव के साथ खिलवाड़ किया गया। और याद कीजिये 2013 में एलओसी पर लांस नायक हेमराज का सिर कटा हुआ पाया गया था तो उसके बाद संसद में तब की विपक्षी पार्टी जो अब सत्ता में है वह बिफर पड़ी थी। और सत्ता में आने पर एक सिर के बदले दस सिर काटने का एलान भी किया था। तब सभी ने तालियां बजायी थीं। लेकिन उसके बाद तो वही विपक्ष सत्ता में आया और पहली बार 29 सितबंर 2016 को सर्जिकल स्ट्राइक किया गया । और माना गया कि पाकिस्तान को सीख दे दी गई है। लेकिन हुआ क्या । ना सीजफायर थमा, ना आतंकी घुसपैठ थमी। ना सैनिकों की शहादत रुकी, ना पाकिस्तान ने कभी अपना दोष माना। और इस दौर में ये सवाल ही बना रहा कि पाकिस्तान को पडोसी मान कर युद्द ना किया जाये। या फिर युद्द से पहले बातचीत को तरजीह दी जाये । या फिर परमाणु हथियारों से लैस पाकिस्तान के साथ युद्द का मतलब विनाश तो नहीं होगा। तो आईये जरा परख ही लें कि ना युद्द ना दोस्ती के बीच अटके संबंध में भारत ने क्या और कितना गंवाया है। विभाजन के बाद युद्द और बिना युद्द के बीच फंसे भारत के जवानों की शहादत कभी रुकी नहीं। कुल 13,636 जवान सीमा पर या फिर कश्मीर में शहीद हो चुके हैं।

लेकिन ये भी देश की त्रासदी है कि इनमें से 7295 जवान तो युद्द में शद हुये जबकि 6341 जवान बिना युद्द ही शहीद हो गये। और इन हालातों को परखें तो पाकिस्तान से तीन युद्द। पहला 1965 में हुआ जिसमें 2815 जवान शहीद हुये। दूसरा युद्द 1971 में हुआ जिसमें 3900 जवान शहीद हुये और 1999 में हुये करगिल युद्द के वक्त 530 जवान शहीद हुये। और इन तीन युद्द से इतर भी कश्मीर और पाकिस्तान से लगी सीमा के हालातो में कुल शहीद हुये 6341 जवानों में से 6286 जवान आतंकी हमले में शहीद हुये । जबकि 55 जवान सीमा पर शहीद हुये । इनमें से 40 जवान एलओसी पर तो 15 जवान अंतरराष्ट्रीय सीमा पर शहीद हुय़े । यानी युद्द भी नहीं और दोस्ता भी नहीं । सिर्फ बातचीत का जिक्र और कश्मीर में आतंक को शह देते पाकिस्तान को लेकर दिल्ली से श्रीनगर तक सिर्फ खामोश निगाहो से हालातों को परखते हालात कैसे युद्द से भी बुरे हालात पैदा कर रहे हैं। ये इससे भी समझा जा सकता है कि पाकिस्तान का कश्मीर राग पाकिस्तान की हर सरकार को राजनीतिक ताकत देता है। पाकिस्तान का सीजपायर उल्लघन पाकिस्तानी सेना को पाकिस्तानी सरकार से बड़ा करता है। पाकिस्तान से आतंकी घुसपैठ आईएसाई को ताकत देती है। यानी एक तरफ विभाजन के बाद से ही पाकिसतान की चुनी हुई सत्ता हो या सेना या आईएसआई । जब तीनों की जरुरत कश्मीर में हिसा को अंजाम देना है तो फिर भारत के लिये सही रास्ता होगा कौन सा । क्योंकि विभाजन के बाद से पाकिस्तान से हुये हर युद्द में जितने जवान शहीद हुये जितने घायल हुये । जितने नागरिक मारे गये अगर उन तमाम तादाद को जोड भी दे । तो भी सच यही है कि कश्मीर में आंतक के साये 1988 से अप्रैल 2017 तक 44211 मौतें हो चुकी हैं। जिसमें 6286 जवान शहीद हुये । वही 14,751 नागरिक आतंकी हिंसा में मारे गये । जबकि सुरक्षाकर्मियों ने 23,174 आतंकवादियो को मार गिराया। यानी एक वक्त समूचे कश्मीर को जीतने का जिक्र होता था और अब कश्मीर में आतंकी हिसा पर पाकिस्तान को आतंकी देश कहने से आगे बात बढ नहीं रही है ।

तो सारे सवाल क्या पाकिस्तान को आतंकी देश कहने भर से थम जायेंगे। क्योंकि कश्मीर के हालात को समझे उससे पहले इस सच को भी जान लें कि 1947 में विभाजन के वक्त भी दोनो तरफ से कुल 7500 मौते हुई थीं। 18,000 घायल हुये थे । लेकिन अब उससे कई गुना जवान बिना युद्द शहीद हो चुके हैं। तो सवाल सिर्फ भारत के गुस्से भर का नहीं है । सवाल आगे की कार्वाई का भी है क्योंकि पाकिस्तान लगातार सीजफायर उल्लंघन कर रहा है । कश्मीर घाटी में लगातार हिंसक घटनाओं में ईजाफा हो रहा है। आलम ये है कि 2017 में पाकिस्तानी सेना 65 बार सीजफायर उल्लघन कर चुकी है। 2016 में 449 बार सीजफायर उल्लंघन की थी। 2015 में 405 बार सीजफायर उल्लंघन किया था। यानी सितंबर 2016 में हुये सर्जिकल स्ट्राइक का कोई असर पाकिस्तान पर दिखायी नहीं दे रहा है। और उस पर पाकिस्तान का सच यही है कि वह पाकिस्तान की रणनीति के केंद्र में कश्मीर है, और कश्मीर को सुलगाए रखना उसका मुख्य उद्देश्य। यही वजह है कि आतंकवादी और सेना अगर जमीन पर कश्मीर के हालात को बिगाड़ने का काम करते हैं तो कूटनीतिक और राजनीतिक तौर पर सरकार कश्मीर को गर्माए रखना चाहती है। आलम ये कि सिर्फ 2016 में यानी बीते साल कश्मीर मुद्दे पर चार बार पाकिस्तानी संसद में प्रस्ताव पास हुए। 8 जुलाई को पहला 22 जुलाई को दूसरा। 29 अगस्त को तीसरा और 7 अक्टूबर को चौथा प्रस्ताव पाकिस्तान की संसद में पास किया गया । तो क्या वाकई पाकिस्तान को लेकर भारत के पास कोई रणनीति नहीं है। और जो सवाल हर बार युद्द को लेकर हर जहन में दशहत भर देता है वह परमाणु युद्द की आहट का हो। तो इसका भी सच परख लें। यूं परमाणु बम भारत के पास भी हैं लेकिन भारत का दुनिया से वादा है कि किसी भी युद्ध में पहले परमाणु बम का इस्तेमाल वो नहीं करेगा अलबत्ता दुनिया को पाकिस्तान से इसलिए डर लगता है या कहें कि आशंका रहती है कि कहीं पाकिस्तान परमाणु बम का इस्तेमाल न कर दे। तो आइए पहले समझ लें कि परमाणु बम का इस्तेमाल हुआ तो क्या होगा। परमाणु विस्फोट विश्लेषण करने वाली साइट न्यूकमैप के मुताबिक अगर पाकिस्तान का 45 किलो टन का सबसे शक्तिशाली परमाणु बम भारत के तीन शहरों दिल्ली-मुंबई और कोलकाता पर गिरता है तो दिल्ली में करीब 3 लाख 67 हजार लोग मारे जाएंगे और 12 लाख 85 हजार से ज्यादा लोग रेडिएशन से प्रभावित होंगे । मुंबई में परमाणु बम गिरा तो 5 लाख 86 हजार लोग मारे जाएंगे और करीब 20 लाख 37 हजार लोग प्रभावित होंगे ।कोलकातामें बम गिरा तो करीब 8 लाख 66 हजार लोग मारे जाएंगे और करीब 19 लाख 25 हजार लोग प्रभावित होंगे। जाहिर है ये सिर्फ मौत का आंकड़ा है क्योंकि परमाणु बम का नुकसान तो बरसों बरस पर्यावरण से लेकर बीमारियों के हालात के रुप में शहर को देखना पड़ता है। जैसे हीरोशिमा और नागासाकी को देखना पड़ा है। लेकिन-दूसरा सच यह भी है कि परमाणु बम से शहर खत्म नहीं हो जाता। क्योंकि अगर पाकिस्तान के पास 100 से 120 परमाणु बम हैं तो भारत के पास भी 90-100 परमाणु बम हैं । लेकिन बारत की सैन्य शक्ति पाकिसातन से कई गुना ज्यादा है । आलम ये कि अमेरिका-चीन-रुस और सऊदी अरब के बाद भारत अपनी रक्षा ताकत बढ़ाने पर सबसे ज्यादा पैसा खर्च करने वाला देश है । स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रीसर्च इंस्टीट्यूट की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ भारी हथियार खरीद के मामले में भारत दुनिया का सबसे बड़ा आयातक देश है और इसने 2012 से 2016 के बीच पूरी दुनिया में हुए भारी हथियारों के आयात का अकेले 13 फ़ीसद आयात किया। दुनिया के 126 देशों मे सैन्य ताकत के मामले में भारत का नंबर चौथा और पाकिस्तान का 13वां है । ऐसे में सच ये भी है कि चाहे परमाणु युद्ध ही क्यों न हो। नुकसान भारत का होगा तो पाकिस्तान पूरा खत्म हो जाएगा। लेकिन सवाल यही है कि युद्ध नहीं होगा तो पाकिस्तान से कैसे निपटें-इसकी रणनीति भारत के पास नहीं है।

कैसे न हो यह सब

चुपचाप अट्टहास -30

कण-कण में चाहत
हर कण चाहत
दाने की चाहत कि उसे चबाया जाए
पानी की कि पीया जाए
चाहतें पूरी करने के लिए कौन क्या नहीं करता
बीज से दाना या समंदर से बारिश तक की यात्राएं चाहत हैं
मेरी चाहत कि हुकूमत करूँ
यात्रा मेरी छोटी कैसे हो सकती
बिकना-बिकाना, कत्ल और ख़ूँ के खेल
कैसे न हो यह सब

कण-कण में  चाहत
हर कण चाहत।

Desire defines every atom
Every atom is a desire
A grain desires to be devoured
Water to be drunk
We all go far to fulfill our desires
A seed becoming a grain and the ocean transforming to rains are desires
It is my desire that I must rule
Naturally it is a long journey
To buy and to sell, to kill and to play with blood
How could I not do it all

Desire defines every atom
Every atom is a desire.

बाबा साहब अम्बेडकर: साझी विरासत : प्रेमपाल शर्मा

लेखक मंच - Sat, 29/04/2017 - 21:05

डा. भीमराव अम्बेडकर

मुझे अफसोस है कि मैंने बाबा साहेब डा. भीमराव अम्बेडकर को बहुत देर से जाना। देर से तो मैंने महात्मा गांधी को भी पढ़ा, लेकिन बाबा साहेब को उसके भी बाद। क्यों ? कारण उस स्कूली व्यवस्था, शिक्षा में ज्यादा है। मेरी कॉलेज की नियमित पढ़ाई वर्ष 1975 में खुर्जा, उत्तर प्रदेश के एक कॉलेज में बी.एस.सी तक हुई। स्कूली पाठ्यक्रम में एक किताब थी- ‘हमारे पूर्वज’ । इसमें दधीचि‍ से लेकर विनोबा, सुभाष सभी थे। मुझे याद नहीं कि इसमें बाबा अम्बेडकर भी थे। न उन दिनों इनका जन्म दिवस होता था न निर्वाण या कोई और चर्चा। मात्र इतना बताया गया था कि हमारे संविधान बनाने में बाबा साहेब को बड़ा योगदान था। किस की सत्ता थी? कौन थे परिदृश्य पर? नेहरू जी, उनकी कांग्रेस और उनका मिला जुला वंश। किताबों में क्यों नहीं थे अम्बेडकर? मौलान आज़ाद लंबे समय तक शिक्षा मंत्री रहे। फिर उनके एक और शार्गिद नुरूल हसन। शुरू की नूराकुश्‍ती के बाद कम्यूनिस्ट विचारक राजनेता, बुद्धिजीवी भी सन साठ तक कांग्रेसी सांठ-गांठ में शामिल होना शुरू हो गए थे। नेहरू जी की मृत्यु के बाद वे इन्दिरा गांधी की किचन कैबिनेट का हिस्सा थे। पाठ्यक्रम नये बने, बदले गये लेकिन कांशीराम के उदय तक अम्बेडकर लगभग आजादी के सैकड़ों महापुरुषों की भीड़ में एक से ज्यादा नहीं थे। गांधी की तो छोड़ो नेहरू जी के साथ भी आकलन के योग्य नहीं माना जाता था। सार-संक्षेप यह कि जितना नुकसान अम्बेडकर को नेहरू और उनके दरबारियों ने पहुंचाया, उतना किसी दूसरी राजनीतिक सत्ता या व्यक्ति ने नहीं। मुसलमानों के मसीहा हैं तो नेहरू, दलित-गरीबों के तो नेहरू और पंडितों के तो वे हैं ही– पंडित वंश में जन्म लेने के कारण। राजनीति इसी का नाम है। इस विनिर्माण के लिए हर दावपेंच अपनाये गये और इसीलिए कांग्रेस सत्‍ता पहली बार वर्ष 2014 में कुछ हिली है।

उन दिनों के बुद्धिजीवियों की भूमिका भी यहां संदेह के घेरे में है कि क्यों उन्हें अम्बेडकर का संघर्ष, योग्यता, योगदान नहीं दिखाई दिया। क्यों वे नेहरू को खुश करने और बदले में कुछ विश्वविद्यालयों के पद, प्रतिष्ठा लेने के लिए अम्बेडकर को जाति विशेष का नेता ही मानते रहे। बिकी हुई जमात अपने नेता की मंशा सबसे पहले पहचान लेती है और उसी के अनुसार नाचती है। यही कारण है कि उन दिनों हमारी सभी पीढियों को बाबा साहेब अम्बेडकर जैसे महान व्यक्तित्व से सभी अध्ययन, पाठ्यक्रम, विमर्श में दूर रखा गया। सरदार पटेल जैसे और भी इतिहास निर्माताओं के साथ नेहरू वंश ने यही सलूक किया। लेकिन इतिहास की निर्ममता देखिए कि भारतीय समाज को आमूल-चूल बदलने वाले अम्बेडकर आज नेहरू से ज्यादा प्रासंगिक हैं- हर क्षेत्र में। सामाजिक, राजनीतिक आर्थिक सभी में।

एक कहावत है जितना बड़ा संघर्ष होगा, उतना ही बड़ा व्यक्तित्‍व। मनुष्य मनुष्य के बीच जैसा भेदभाव भारतीय समाज में है, वैसा अन्यत्र नहीं। दोहराने की जरूरत नहीं कि बचपन के क्रूर नृशंस आघातों ने ही अम्बेडकर को इतना मजबूत बनाया कि‍ वे भारतीय समाज को गठने वाले सबसे बड़े भारतीय महापुरुष हैं। नेहरू की जकड़न, कांग्रेसी आत्म प्रशंसा-प्रचार से जैसे-जैसे सन 1990 के आसपास देश को मुक्ति मिलती गयी, बाबा साहेब उभर कर आते रहे।

डॉ. भीमराव जैसी शख्सि‍यतें शताब्दियों बाद पैदा होती हैं। क्या उनके विचारों के बिना इक्कीसवी सदी या कहे आधुनिक भारत की कल्पना की जा सकती है? नि:संदेह हर महापुरुष अपने युग की उपज होता है, लेकिन बिरले ही ऐसे होते हैं जो आमूलचूल परिवर्तन के मसीहा बनते हैं। भारत जि‍तनी सामाजिक गैरबराबरी, भेदभाव, ऊंच-नीच शायद ही दुनिया में कहीं है। आश्चर्य की बात यह कि ऐसा हजारों साल तक चलता रहा। या कहें कि यह असमानता लगातार क्रूर और बढ़ती गयी। यहां उस मुस्लिम शासन को भी माफ नहीं किया जा सकता जो धर्म की तलवार तो भांजता रहा, समानता के लिए कोई कदम नहीं उठाया। लेकिन समय चक्र आगे बढ़ता रहा। यूरोप में पंद्रहवी सदी से शुरू हुए पुनर्जागरण ने दुनिया भर को गतिशील बनाया। तर्क, समानता, विज्ञान, स्त्री-पुरुष की बराबरी और धर्म की जकड़न से मुक्ति इस गतिशीलता के प्रस्थान बिंदू बने। औद्यौगिक क्रांति, उपनिवेशवाद के रथ पर सवार ये विचार फ्रांसीसी क्रांति, रूसी क्रांति से गुजरते हुए दुनियाभर में फैले। अम्बेडकर, गांधी, गोखले भी कैसे इनसे अछूते रह सकते थे, बल्कि कहें कि‍ इससे पहले राजा राममोहन राय, महात्मा फुले, सावित्रीबाई फुले भी आधुनि‍क समय की इसी समानता तर्क के दर्शन से अनुप्राणित हुए। बाबा साहेब अम्बेडकर नि:संदेह इनमें सबसे चमकते सितारे हैं।

सब से पहले अम्बेडकर सामाजिक बराबरी के लिए लड़े, फिर आर्थिक फिर मजदूरों के हितों के लिए। कौन सा क्षेत्र अछूता है? व्यक्तिगत स्वतंत्रता हो, स्त्री की बराबरी (हिन्दू कोड बिल), संवैधानिक सुधार से लेकर शिक्षा, पंचायती राज। सही मायनों में ऐसे स्टेसमैन जिनके विचार देश और देश के बाहर लगातार प्रासंगिक हैं। उनकी प्रतिभा का लोहा हर मंच ने माना और आज भी मान रहे हैं।

इस सबके बाद भी हमें भारतीय समाज को परिवर्तन की इस परिधि तक लाने वाली विरासत को एक निष्‍पक्ष दृष्टि, तर्क से समझने की जरूरत है, न कि भावना या राजनीतिक राग-द्वेष में कुतर्क वाली दृष्टि की। मौजूदा सभ्‍यताओं का बड़ा श्रेय इस तर्क पद्धति को है जो यूरोप के पुनर्जागरण से शुरू होती है। पूरा विज्ञान, सोचने का ढंग, धर्म को धकियाता हुआ आगे आता है और यूरोप के कायाकल्‍प के बाद पूरी दुनिया को बदलता है। फ्रांसीसी क्रांति हो या रूसी या अमेरिकी क्रांति और दास प्रथा का अंत- समानता की बुनियाद इन्‍हीं सड़कों से गुजरती है। इसलिए ब्रिटिश काल भारत के लिए एक वरदान भी है, जब हमारे इन सब दिग्‍गजों ने मनुष्‍य-मनुष्‍य की समानता, न्‍याय, भाईचारा, तर्क के अर्थ पहली बार जाने। क्‍या फुले महाराज की शुरू की शिक्षा उस ईसाई मिशनरी स्‍कूल में नहीं हुई होती तो समानता का दर्शन जान पाते ? अम्‍बेडकर का कायाकल्‍प भी एक तरफ भारतीय समाज में भेदभाव जातिगत घृणा के अनुभव और दूसरी और इंग्‍लैंड, जर्मनी, अमेरिकी समाज, विश्‍वविद्यालयों में बराबरी के अहसास से होता है। प्रतिभाशाली तो वे थे ही, कानून अर्थशास्‍त्र, लोकतंत्र, शिक्षा हर क्षेत्र में मौलिकता के स्‍तम्‍भ। सर सैयद अहमद खां भी इंग्लैंड से शि‍क्षा लेकर एक प्रगतिशील समाज की स्‍थापना के लिए मुसलमानों को ललकारते हैं और अलीगढ़ मुस्लिम विश्‍वविद्यालय की स्‍थापना के लिए आगे बढ़ते हैं। स्वयं महात्मा गांधी यदि सत्‍य अहिंसा के हथियारों से आगे बढ़े तो इसलिए कि उन्‍हें ब्रिटिश न्याय व्यवस्था, समाज पर यकीन था।

इसलिए इस पूरी विरासत को न भक्तिभाव से देखने की जरूरत है न नकारवादी भावना से। देश की आजादी भी जरूरी थी और समाज की जकड़न क्रूर जाति व्‍यवस्‍था से भी। गांधी पर वर्ण व्‍यवस्‍था के प्रति नरमी का आरोप सही है तो अम्‍बेडकर पर अंग्रेजों के प्रति नरमी का। दोनों के अपने कारण हैं और सबसे अच्‍छी बात है कि दोनों में एक निडरता, स्‍पष्‍टता और अपने लक्ष्‍य के प्रति पूरी निष्‍ठा है। क्‍या पूना पैक्‍ट सफल नहीं होता तो आजादी की लड़ाई की एकजुटता बनी रह सकती थी? हरगिज नहीं। और यदि अम्‍बेडकर ने सामाजिक बराबरी के लिए ऐसा हट, दृढ़ता न दिखाई होती तो क्‍या संविधान में बराबरी गरीबों के लिए विशेष सुविधाओं की बातें शामिल होंती? दोनों ही लोकतंत्र के खरे प्रहरी हैं। एक पूरे समाज की चिंता में देश भर को जगा रहा है तो दूसरा आजादी की खातिर। यह बात दीगर है कि आजादी के सामाजिक परिवर्तन जितना तेजी से होना चाहिए था, वैसा नहीं हुआ। लेकिन इसके लिए सामाजिक-राजनीतिक कारणों के साथ नेहरू वंश ज्‍यादा जिम्‍मेदार है। नेहरू की अटूट निरंकुश सत्‍ता 1946 से लेकर 1964 तक रही। क्‍या बीस वर्ष कम होते हैं, किसी बुनियादी परिवर्तन के लिए? और उसके बाद भी कुछ अंतराल को छोड़कर कांग्रेस का वंश ही सत्‍ता में रहा है। शायद गांधी न होते और उनका नेहरू को इशारा न होता तो न नेहरू की कांग्रेस अम्‍बेडकर को संविधान पीठ का अध्‍यक्ष बनाती और न वे कैबि‍नेट में आते। आये भी तो नेहरू की नीतियों से निराश होकर तुरंत इस्‍तीफा देकर बाहर हो गये। यहां तक कि हिन्‍दू धर्म को छोड़कर बौद्ध धर्म अपना लिया।

बाबा साहेब को सिर्फ दलित या जाति विशेष तक सीमित रखना उनके साथ ऐतिहासिक ज्‍यादती है। सवर्णों को समझने की जरूरत है कि इक्‍सवीं सदी का भारत धर्म ग्रंथों, उपनिषदों, पुराणों की व्‍याख्‍या से नहीं चलाया जा सकता। समानता नये समाज की बुनियाद है और इसे हासिल करना ही होगा। वहीं दलितों को भी इस विषमता से बचने की जरूरत है कि अम्‍बेडकरवाद होने की शर्त ब्राह्मण-विरोधी होना है। अम्‍बेडकर ब्राह्मणवाद की कट्टरता, ढोंग, नकली रीतिरिवाज के खिलाफ थे, व्‍यक्ति विरोधी नहीं। ऐसा न होता तो उनकी शादी एक ब्राह्मणी से नहीं हुई होती। हिन्‍दू धर्म की हजार बुराइयों के खिलाफ अम्‍बेडकर मृत्‍यु पर्यन्‍त लड़ते रहे, लेकिन मुस्लिम धर्म को वे इससे भी क्रूर मानते थे। उनका कहना था कि हिन्‍दू धर्म में अपनी बुराइयों के खिलाफ बोलने, उन्‍हें सुधारने की आजादी तो है, मुस्लिम धर्म की कट्टरता तो ऐसे प्रश्‍न उठाने की भी स्‍वतंत्रता नहीं देती। यही कारण है कि वर्षों सोचने-विचारने और कई बार कुछ मुस्लिम मित्रों के उकसावे के बावजूद न उन्होंने मुस्लिम धर्म अपनाया न ईसाई। वे बौद्ध धर्म की ओर गये। क्या यह अकारण है कि जितना बाबा साहेब अम्बेडकर का जादू है, उतना उनके अपनाये बौद्ध धर्म का नहीं। यह संतोष की भी बात है क्‍योंकि नयी सदी में और आने वाली सदियों में दुनिया भर से धर्म का मिटना ज्‍यादा स्‍थाई शांति का बंदोबस्त करेगा।

महात्मा गांधी पर एक किताब है- बहुरूप गांधी, अनु गांधी की लिखी हुई। मुझे लगता है कि बाबा साहेब अम्बेडकर के ज्ञान, अनुभव संघर्ष को देखते हुए यह शीर्षक उनके ऊपर और ज्‍यादा स्‍टीक बैठता है। शिक्षा, पंचायती राज, मजदूर बिल, अर्थशास्‍त्र, कानून से लेकर हिन्दू कोड बिल तक का ज्ञान। तीन तलाक मुद्दे पर जो बहस चल रही है, बाबा साहेब के विचार यहां सबसे महत्‍वपूर्ण हैं। 2 दिसंबर 1948 को संविधान सभा में बहस के विस्‍तार का जबाव देते हुए उन्‍होंने कहा था कि धर्म का दखल इतना क्यों होना चाहिए कि वह पूरे सामाजिक जीवन को ही समेट ले और विधानमंडल को उस क्षेत्र में घुसने ही न दे। कानून में बदलाव इसलिए चाहते हैं कि इतने अन्याय, असमानता, भेदभाव से भरी हमारी सामाजिक व्यवस्था हमारे मूलभूत मानवीय अधिकारों के रास्ते में न आये। हम ऐसी कल्पना भी कैसे कर सकते हैं कि कोई पर्सनल लॉ ऐसा भी हो सकता है जो राज्‍य के अधिकार क्षेत्र से एकदम बाहर हो। मौजूदा भारत के लिए सबसे ज्यादा प्रांसगिक महापुरुष।

हम सब का दायित्व है कि हम आत्म सजगता से अम्बेडकर जैसे व्‍यक्तित्व को देवता या मूर्तियों में कैद न होने दें। उन्होंने तो इन मूर्तियों को तोड़कर ही पूरे भारतीय समाज को रास्ता दिखाया था। वे हम सब की साझी विरासत हैं।

आखिर अंबेडकर को पीएम के तौर पर देखने की बात कभी किसी ने क्यों नहीं की ?

नेहरु की जगह सरदार पटेल पीएम होते तो देश के हालात कुछ और होते । ये सवाल नेहरु या कांग्रेस से नाराज हर नेता या राजनीतिक दल हमेशा उठाते रहे हैं। लेकिन इस सवाल को किसी ने कभी नहीं उठाया कि अगर नेहरु की जगह अंबेडकर पीएम होते तो हालात कुछ और होते । दरअसल अंबेडकर को राजनीतिक तौर पर किसीने कभी मान्यता दी ही नहीं। या तो संविधान निर्माता या फिर दलितों के मसीहा के तौर पर बाबा साहेब अंबेडकर को कमोवेश हर राजनीतिक सत्ता ने देश के सामने पेश किया । लेकिन इतिहास के पन्नों को अगर पलटे और आजादी से पहले या तुरंत बाद में या फिर देश के हालातों को लेकर अंबेडकर तब क्या सोच रहे थे और क्यों अंबेडकर को राजनीतिक तौर पर उभारने की कोई कोशिश हुई नहीं । और मौजूदा वक्त में भी बाबा साहेब अंबेडकर का नाम लेकर राजनीतिक सत्ता जिस तरह भावुक हो जाती है लेकिन ये कहने से बचती है कि अंबेडकर पीएम होते तो क्या होता ।

तो आईये जरा आंबेडकर के लेखन, अंबेडकर के कथन और अंबेडकर के अध्ययन को ही परख लें कि वह उस वक्त देश को लेकर वह क्या सोच रहे थे, जिस दौर देश गढ़ा जा रहा था । तो संविधान निर्माता की पहचान लिये बाबा साहेब अंबेडकर ने संविधान की स्वीकृति के बाद 25 नवंबर 1949 को कहा, " 26 जनवरी 1950 को हम अंतर्विरोधों के जीवन में प्रवेश करने जा रहे हैं । राजनीति में हम समानता प्राप्त कर लेंगे । परंतु सामाजिक-आर्थिक जीवन में असमानता बनी रहेगी। राजनीति में हम यह सिद्दांत स्वीकार करेंगे कि एक आदमी एक वोट होता है और एक वोट का एक ही मूल्य होता है । अपने सामाजिक और आर्थिक जीवन में अपनी सामाजिक और आर्थिक संरचना के कारण हम यह सिद्दांत नकारते रहेंगे कि एक आदमी का एक ही मूल्य होता है। कब तक हम अंतर्विरोधों का ये जीवन बिताते रहेंगे। कह तक हम अपने सामाजिक और आर्थिक जीवन में समानता को नकारते रहेंगे ? बहुत दिनो तक हम उसे नकारते रहे तो हम ऐसा राजनीतिक लोकतंत्र खतरे में डाल कर ही रहेंगे । जिसनी जल्दी हो सके हमें इस अंतर्विरोध को दूर करना चाहिये ।वरना जो लोग इस असमानता से उत्पीडि़त है वे इस सभा द्वारा इतने परिश्रम से बनाये हुये राजनीतिक लोकतंत्र के भवन को ध्वस्त कर देंगे। "   यानी संविधान के आसरे देश को छोड़ा नहीं जा सकता है बल्कि अंबेडकर असमानता के उस सच को उस दौर में ही समझ रहे थे जिस सच से अभी भी राजनीतिक सत्ता आंखे मूंदे रहती है या फिर सत्ता पाने के लिये असमानता का जिक्र करती है ।

यानी जो व्यवस्था समानता की होनी चाहिये, वह नहीं है तो इस बात की कुलबुलाहट अंबेडकर में उस दौर में इतनी ज्यादा थी कि 13 दिसंबर 1949 को जब नेहरु ने संविधान सभा में संविधान के उद्देश्यों पर प्रस्ताव पेश किया तो बिना देर किये अंबेडकर ने नेहरु के प्रस्ताव का भी विरोध किया । अंबेडकर की राइटिंग और स्पीचीज की पुस्तक माला के खंड 13 के पेज 8 में लिखा है कि आंबेडकर ने कितना तीखा प्रहार नेहरु पर भी किया। उन्होने कहा, " समाजवादी के रुप में इनकी जो ख्याती है उसे देखते हुये यह प्रसताव निराशाजनक है । मैं आशा करता था, कोई ऐसा प्रावधान होगा जिससे राज्यसत्ता आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक न्याय को यथार्थ रुप दे सके । उस नजरिए से मै आशा करता था कि ये प्रस्ताव बहुत ही स्पष्ट शब्दों में घोषित करे कि देश में सामाजिक आर्थिक न्याय हो । इसके लिये उघोग-धंधों और भूमि का राष्ट्रीयकरण होगा । जबतक समाजवादी अर्थतंत्र न हो तबतक मै नहीं समझता , कोई भावी सरकार जो सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय करना चाहती है वह ऐसा कर सकेगी । " तो अंबेडकर उन हालातों को उसी दौर में बता रहे थे जिस दौर में नेहरु सत्ता के लिये बेचैन थे और उसके बाद से बीते 70 बरस में यही सवाल हर नई राजनीतिक सत्ता पूर्व की सरकारों को लेकर यही सवाल खड़ा करते करते सत्ता पाती रही है फिर आर्थिक असमानता तले उन्हीं हालातों में को जाती है । यूं याद तो ठीक दो बरस संसद में संविधान दिवस मनाये जाने के दौर को भी याद किया किया सकता है, जब 26 नवंबर 2015 को संविदान दिवस मनाते मनाते कांग्रेस हो या बीजेपी यानी विपक्ष हो या सत्तादारी सभी ने एक सुर में माना कि अंबेडकर जिन सवालों को संविधान लागू होने से पहले उठा रहे थे , वही सवाल संविधान लागू होने के बाद देश के सामने मुंह बाये खड़े हैं।

ये अलग बात है कि कांग्रेस हो या बीजेपी दोनों ने खुद को आंबेडकर के सबसे नजदीक खड़े होने की कोशिश संसद में बहस के दौरान की । लेकिन दोनो राजनीतिक दलों में से किसी नेता ने यह कहने की हिम्मत नहीं की कि आजादी के बाद अगर अंबेडकर देश के पीएम होते तो देश के हालात कुछ और होते । क्योंकि अंबेडकर एक तरफ भारत की जातीय व्यवस्था में सबसे नीचे पायदान पर खडे होकर देश की व्यवस्था को ठीक करने की सोच रहे थे । और दूसरा उस दौर में अंबेडकर किसी भी राजनेता से सबसे ज्यादा सुपठित व्यक्तियो में से थे । जो अमेरिकी विश्वविघालय में राजनीति और सामाजिक अध्ययन करने के साथ साथ भारत की अर्थ नीति कैसे हो इसपर भी लिख रहे थे। यानी अंबेडकर का अध्ययन और भारत को लेकर उनकी स च कैसे दलित नेता के तौर पर स्थापना और संविधान निर्माता के तौर पर मान्यता तहत दब कर रह गई ये किसी ने सोचा ही नहीं । क्योंकि जिस दौर में महात्मा गांधी हिन्द स्वराज लिख रहे थे और हिन्द स्वराज के जरीये संसदीय प्रणली या आर्थिक हालातों का जिक्र भारत के संदर्भ में कर रहे थे । उस दौर में अंबेडकर भारत की पराधीन अर्थव्यवस्था को मुक्त कराने के लिये स्वाधीन इक्नामिक ढांचे पर भी कोलंबिया यूनिवर्सिटी में कह-बोल रहे थे । और भारत के सामाजिक जीवन में झांकने के लिये संस्कृत का धार्मिक पौराणिक और वेद संबंधी समूचा वाड्मंय अनुवाद में पढ़ रहे थे । और भोतिक स्थापनायें लोगों के सामने रख रहे थे । इसलिये जो दलित नेता आज सत्ता की गोद में बैठकर अंबेडकर को दलित नेता के तौर पर याद कर नतमस्तक होते है , वह इस सच से आंखे चुराते हैं कि आंबेडकर ब्रहमण व्यवस्था को सामाजिक व्यवस्था से आगे अक सिस्टम मानते थे । और 1930 में उनका बहुत साफ मानना था कि ब्राह्मण सिस्टम में अगर जाटव भी किसी ब्राह्मण की जगह ले लेगा तो वह भी उसी अनुरुप काम करने लगेगा, जिस अनुरुप कोई ब्राह्मण करता । अपनी किताब मार्क्स और बुद्द में आंबेडकर ने बारत की सामाजिक व्यवस्था की उन कुरितियों को उभारा भी और समाधान की उस लकीर को खींचने की कोशिश भी की जिस लकीर को गाहे बगाने नेहरु से लेकर मोदी तक कभी सोशल इंजिनियरिंग तो कभी अमीर-गरीब के खांचे में उठाते हैं। 1942 में आल इंडिया रेडियो पर एक कार्यक्रम में अंबेडकर कहते है , भारत में इस समय केवल मजदूर वर्ग की सही नेतृत्व दे सकता है । मजदूर वर्ग में अनेक जातियों के लोग है जो छूत-अछूत का भेद मिटाती है । संगठन के लिये जाति प्रथा को आधार नहीं बनाते । उसी दौर में अंबेडकर अपनी किताब , ' स्टेट्स एंड माइनरटिज " में राज्यो के विकास का खाक भी खिचते नजर आते है । जिस यूपी को लेकर ाज बहस हो रही है कि इतने बडे सूबे को चार राज्यों में बांटा जाना चाहिये । वही यूपी को स्पेटाइल स्टेट कहते हुये अंबेडकर यूपी को तीन हिस्से में करने की वकालत आजादी से पहले ही करते है ।

फिर अपनी किताब ' स्माल होल्डिग्स इन इंडिया " में किसानो के उन सवालों को 75 बरस पहले उठाते हैं, जिन सवालों का जबाब आज भी कोई सत्ता दे पाने में सक्षम हो नहीं पा रही है । अंबेडकर किसानों की कर्ज माफी से आगे किसानो की क्षमता बढाने के तरीके उस वक्त बताते है । जबकि आज जब यूपी में किसानो के कर्ज माफी के बाद भी किसान परेशान है । और कर्ज की वजह से सबसे ज्यादा किसानों की खुदकुशी वाले राज्य महाराष्ट्र में सत्ता किसानों की कर्ज माफी से इतर क्षमता बढाने का जिक्र तो करती है लेकिन ये होगा कैसे इसका रास्ता बता नहीं पाती । जबकि अंबेडकर 'स्माल होल्डिग्स " में तभी उपाय बताते हैं। और माना भी जाता है कि आंबेडकर ने नेहरु के मंत्रिमंडल में शामिल होने के िबदले योजना आयोग देने को कहा था। क्योंकि आंबेडकर लगातार भारत के सामाजिक - आर्थिक हालातों पर जिस तरह अध्ययन कर रहे थे , वैसे में उन्हें लगता रहा कि आजादी के बाद जिस इक्नामी को या जिस सिस्टम की जरुरत देश को है, वह उसे बाखूबी जानते समझते हैं। और नेहरु ने उन्हीं सामाजिक हालातों की वजह से ही नेहरु मंत्रिमंडल से त्यागपत्र भी दिया, जिन परिस्थितियों को वह तब ठीक करना चाहते थे। हिन्दू कोड बिल को लेकर जब संघ परिवार से लेकर , हिन्दुमहासभा और कई दूसरे संगठनों ने सड़क पर विरोध प्रदर्शन शुरु किया । तो संसद में लंबी चर्चा के बाद भी देश की पहली राष्ट्रीय सरकार को भी जब आंबेडकर हिन्दू कोड बिल पर सहमत नहीं कर पाये तो 27 सितंबर 1951 को अंबेडकर ने नेहरु को इस्तीफा देते हुये लिखा , " बहुत दिनों से इस्तीफा देने की सोच रहा था। एक चीज मुझे रोके हुये था, वह ये कि इस संसद के जीवनकाल में हिन्दूकोड बिल पास हो जाये । मैं बिल को तोड़कर विवाह और तलाक तक उसे सीमित करने पर सीमित हो गया थ। इस आशा से कि कम से कम इन्हीं को लेकर हमारा श्रम सार्थक हो जाये । पर बिल के इस भाग को भी मार दिया गया है । आपके मंत्रिमंडल में बने रहने का कोई कारण नहीं दिखता है । " दरअसल इतिहास के पन्नों को पलटिये तो गांधी, अंबेडकर और लोहिया कभी राजनीति करते हुये नजर नहीं आयेंगे बल्कि तीनों ही अपने अपने तरह से देश को गढना चाहते थे । और आजादी के बाद संसदीय राजनीति के दायरे में तीनों को अपना बनाने की होड़ तो शुरु हुई लेकिन उनके विचार को ही खारिज उनके जीवित रहते हुये उन्हीं लोगों ने किया जो उन्हे अपना बनाते या मानते नजर आये । इसलिये नेहरु या सरदार पटेल का जिक्र प्रशासनिक काबिलियत के तौर पर तो हो सकता है , लेकिन आजादी के ठीक बाद के हालात को अगर परखे तो उस वक्त देश को कैसे गढना हा यही सवाल सबसे बडा था । लेकिन पहले दिन से ही जो सवाल सांप्रदायिकता के दायरे से होते हुये कश्मीर और रोजगार से होते हुये जाति-व्यवस्था और उससे आगे समाज के हर तबके की भागेदारी को लेकर सत्ता ने उठाये या उनसे दो चार होते वक्त जिन रास्तो को चुना। ध्यान दें तो बीते 70 बरस में देश उन्ही मुद्दो में आज भी उलझा हुआ है । और राजनीतिक सत्ता ही कैसे जाति-व्यवस्था के दायरे से इतर सोच पाने में सक्षम नहीं है ।

तो इस सवाल को तो अंबेडकर ने नेहरु के पहले मंत्रिमडल की बैठक में ही उठा दिया था । इसलिये आंबेडकर पंचायत स्तर के चुनाव का भी विरोध कर रहे थे । क्योकि उनका साफ मानना था कि चुनाव जाति में सिमटेंगे । जाति राजनीति को चलायेगी । और असमानता भी एक वक्त देश की पहचान बना दी जायेगी । जिसके आधार पर बजट से लेकर योजना आयोग की नीतियां बनेंगी . और ध्यान दें तो हुआ यही । अंतर सिर्फ यही आया है कि आंबेडकर आजादी के वक्त जब देश को गढने के लिये तमाम सवालो को मथ रहे थे तब देश की आबादी 31 करोड थी । और आज दलितो की तादा ही करीब 21 करोड हो चली है । और शिक्षित चाहे 66 फिसदी हो लेकिन ग्रेजुएट महज 4 फिसदी है । इतना ही नहीं 70 फिसदी दलित के पास अपनी कोई जमीन नहीं है । और 85 फिसदी दलित की आय 5 हजार रुपये महीने से भी कम है । आबादी 16 फिसदी है लेकिन सरकारी नौकरियों में दलितों की तादाद महज 3.96 फिसदी है । और दलितो के सरकार के तमाम मंत्रालयों का कुल बजट यानी उनकी आबादी की तुलना में आधे से भी कम है । 2016-17 में शिड्यूल कास्ट सब-प्लान आफ आल मिनिस्ट्रिज का मजह 38,833 करोड दिया गया . जबकि आजादी के लिहाज से उन्हे मिलना चाहिये 77,236 करोड रुपये । पिछले बरस यानी 2015-16 में तो ये रकम और भी कम 30,850 करोड थी । यानी जिस नजरिये का सवाल आंबेडकर आजादी से पहले और आजादी के ठीक बाद उटाते रहे । उन सवालो के आईने में अगर बाबा साहेब आंबेडकर को देश सिर्फ संविधान निर्माता मानता है या दलितों की मसीहा के तौर पर देखता है तो समझना जरुरी है कि आखिर आजतक किसी भी राजनीतिक दल या किसी भी पीएम ने ये क्यों नहीं कहा कि अंबेडकर को तो प्रधानमंत्री होना चाहिये था। क्योंकि ये बेहद महीन लकीर है कि महात्मा गांधी जन सरोकार को संघर्ष के लिये तैयार करते रहे और अंबेडकर नीतियों के आसरे जनसरोकार के संघर्ष को पैदा करना चाहते रहे । यानी देश की पॉलिसी ही अगर नीचे से उपर देखना शुरु कर देती तो अंग्रेजों का बना ब या सिस्टम बहुत जल्द खत्म होता । यानी जिस नेहरु मॉडल को कांग्रेस ने महात्मा गांधी से जोडने की कोशिश की । और जिस नेहरु मॉडल को लोहिया ने खारिज कर समाजवाद के बीज बोने चाहे। इन दोनों को आत्मसात करने वाली राजनीतिक सत्ताओं ने आंबेडकर मॉडल पर चर्चा करना तो दूर आंबेडकर को दलितों की रहनुमाई तले संविधान निर्माता का तमगा देकर ही खत्म करने की कोशिश की । जो अब भी जारी है ।

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लेखक विषय संवाद साभार अनुवादक

पहले वो आए साम्यवादियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं साम्यवादी नहीं था

 

फिर वो आए मजदूर संघियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं मजदूर संघी नहीं था

 

फिर वो यहूदियों के लिए आए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं यहूदी नहीं था

 

फिर वो आए मेरे लिए

और तब तक बोलने के लिए कोई बचा ही नहीं था

 

मार्टिन नीमोलर (1892-1984)