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कब दूर होगी शिक्षकों की कमी: प्रेमपाल शर्मा

लेखक मंच - Fri, 27/10/2017 - 17:54

प्रेमपाल शर्मा

शिक्षा के नाम पर होने वाले विमर्श के तहत आए दिन लंबी-चौड़ी बातें होती रहती हैं, लेकिन शिक्षकों की कमी और उनकी भर्ती प्रक्रिया को लेकर मुश्किल से ही कोई बहस होती है। शिक्षा का प्रश्न इतना महत्वपूर्ण है कि सरकार कोई भी आए, देश और समाज के हित में उससे बच नहीं सकती। एक लंबे अर्से से ऐसी खबरें आ रही हैं कि हर स्तर पर शिक्षकों के पद खाली हैं। हाल की एक खबर के अनुसार देश में प्राथमिक विद्यालयों के स्तर पर शिक्षकों के लाखों पद रिक्त हैं। इन रिक्त पदों में आधे से अधिक बिहार और उत्तर प्रदेश में हैं। मानव संसाधन विकास मंत्रलय के आंकड़ों के अनुसार देश भर में प्राथमिक शिक्षा के स्तर पर शिक्षकों के तीन लाख पद रिक्त हैं। हालांकि सभी बच्चों को गुणवत्तापूर्ण प्राथमिक शिक्षा उपलब्ध कराने के मार्ग में शिक्षकों की कमी आड़े आने पर संसद की स्थायी समिति ने चिंता जताई, लेकिन यह ध्यान रहे कि ऐसी चिंता पहले भी जताई जाती रही है। प्राथमिक शिक्षा के विद्यालयों की तरह विश्वविद्यालयों में हजारों पद खाली पड़े हैं। विश्वविद्यालय के स्तर पर शिक्षकों की कमी पूरी करने के लिए संविदा या तदर्थ आधार पर शिक्षक नियुक्त अवश्य किए जा रहे हैं, लेकिन उन्हें बहुत कम वेतन दिया जा रहा है। क्या ऐसे गुरु देश को विश्व गुरु बना सकते हैं?

शिक्षकों की कमी कोई आज का संकट नहीं है। यह कमी रातोंरात पैदा नहीं हुई। पिछले तीन दशक या कहें उदारीकरण की शुरुआत सबसे पहले शिक्षा, बीमा, बैंक जैसे क्षेत्रों में हुई और तदर्थ नौकरियों के तहत शिक्षा मित्र, शिक्षा सहायक जैसे नामों का आरंभ भी विश्व बैंक और दूसरे पश्चिमी सलाहकारों की अगुआई में ही हुआ। कहने की जरूरत नहीं है कि इस बीच केंद्र और राज्यों में अलग-अलग विचारधाराओं वाले दलों की सरकारें रहीं, लेकिन हालात में कोई बुनियादी बदलाव नहीं हुआ। दबे स्वरों में इसका विरोध अवश्य किया जाता रहा है, लेकिन न तो तब और न ही अब जनता या बुद्धिजीवी इसके खिलाफ प्रदर्शन करने के लिए सड़कों पर उतरे। पता नहीं क्यों यह सवाल नहीं उठता कि आज आइआइटी, एम्स और आइआइएम जैसे चुनिंदा संस्थानों में भी शिक्षकों के पचास प्रतिशत से अधिक पद क्यों रिक्त पड़े हैं? विद्यार्थियों के जातिगत कोटे की एक भी सीट इधर-उधर हो जाए तो सड़कों पर हंगामा मचने लगता है, लेकिन इतने महत्वपूर्ण संस्थानों में पढ़ा कौन रहा है और उसकी योग्यता कितनी है, इस प्रश्न पर हमेशा चुप्पी छाई रहती है। विशेषकर बुद्धिजीवियो के बीच, क्योंकि उनके बच्चों को तो देश के ही अच्छे कॉलेजों में जगह मिल जाती है। इस बार की विश्व रैंकिंग में इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस, बेंगलुरु और आइआइटी आदि ही शामिल नजर आ रहे हैं। आखिर एक भी विश्वविद्यालय विश्व के चुनिंदा शिक्षा संस्थानों में अपनी जगह नहीं बना पा रहा है? जब पड़ोसी चीन अकादमिक स्तर पर लगातार बेहतर और दुनिया के अव्वल संस्थानों को चुनौती दे रहा हो तो हमें भी तुरंत ध्यान देने की जरूरत है। विशेषकर तब जब हमारे पास दुनिया की सबसे नौजवान आबादी है।

शिक्षा में गिरावट के जिस एक मुख्य कारण की सभी अनदेखी कर रहे हैं वह है शिक्षकों की कमी और उनकी कामचलाऊ भर्ती प्रक्रिया। अधिकतर शिक्षकों की नियुक्ति पूरी तरह साक्षात्कार के माध्यम से ही होती है। विश्वविद्यालयों में तो शिक्षकों की भर्ती से आसान कोई नौकरी ही नहीं है। बस साठगांठ या कोई जुगाड़ होना चाहिए। न यूजीसी कुछ कर सकता है और न सरकारें। यही कारण है कि इस पेशे में आजादी के बाद से ही सबसे ज्यादा भाई-भतीजावाद कायम है और इसी कारण परिवार विशेष के लोग ही तमाम पदों पर काबिज हो जाते हैं। भर्ती की यही स्थिति अन्य अनेक क्षेत्रों में है। देश भर में हजारों कोर्ट केस भर्ती के इन मसलों पर लंबित हैं।

उत्तर प्रदेश के विश्वविद्यालयों में लगभग पचास प्राचार्यो की नियुक्ति को हाल में सुप्रीम कोर्ट ने भ्रष्टाचार के ऐसे आरोपों के मद्देनजर रद किया है, लेकिन किसी भी सरकार की नींद अभी भी नहीं टूटी। पूर्व कैबिनेट सचिव टीएस सुब्रमण्यम की अगुआई में बनी समिति ने अपनी सिफारिशों में सबसे ऊपर शिक्षकों की भर्ती में सुधार, पारदर्शिता, ईमानदारी के लिए संघ लोक सेवा आयोग जैसे किसी बोर्ड को बनाने की बात कही थी, लेकिन सरकार, विपक्ष और विश्वविद्यालयों में सभी राजनीतिक पार्टियों के जेबी संगठन चुप रहे। हमें यह समझना होगा कि शिक्षा में गिरावट का सबसे मुख्य कारण उपयुक्त शिक्षकों का अभाव ही है। जब शिक्षक ही सुयोग्य नहीं होंगे तो भला शिक्षा का स्तर कैसे सुधरेगा? क्यों अयोग्य शिक्षकों को लाखों की मोटी तनख्वाह दी जानी चाहिए? क्यों दिल्ली विश्वविद्यालय सहित सभी विश्वविद्यालयों में कक्षाएं खाली हैं? यह किसी से छिपा नहीं कि एक ओर विश्वविद्यालयों में शिक्षकों के पद रिक्त हैं तो दूसरी ओर तमाम विद्यार्थी लाखों की फीस देकर कोचिंग सेंटरों में पढ़ रहे हैं। कोचिंग की एक-एक क्लास में तीन-तीन सौ तक की संख्या होती है। क्या शिक्षकों समेत सरकारी कर्मचारियों को बड़ी-बड़ी तनख्वाहें, सुविधाएं देने से संविधान में लिखा समाजवाद आ जाएगा? क्या शिक्षक भी लोक सेवक नहीं हैं? आखिर उन्हें भी तो सरकार के आला अफसरों की तर्ज पर लाखों रुपये का वेतन मिलता है? फिर उन्हें क्यों भर्ती की वस्तुनिष्ठ लिखित परीक्षा, गोपनीय रिपोर्ट, शोध की अनिवार्यता, समय पालन आदि से एतराज है।

भर्ती प्रक्रिया के गोरखधंधे पर एक न्यायाधीश की टिप्पणी थी कि लोक सेवक वेतन और सुविधाओं की होड़ में बड़े संगठित गिरोह में तब्दील हो चुके हैं। अध्ययन, अध्यापन, शोध में अपनी भाषाओं से परहेज और अंग्रेजी के आतंक को भी नजरअंदाज करने की ऐसी प्रवृत्ति हावी है कि समस्या पर चोट की नौबत ही नहीं आती। सभी जिम्मेदार लोग जानते-समझते हुए भी इसे विमर्श के केंद्र में लाने से बचते हैं। आप पश्चिमी देशों से शिक्षक-विद्यार्थी अनुपात से लेकर ग्रेडिंग, सतत मूल्यांकन परीक्षा, प्रयोगशाला, सेमेस्टर जैसी कितनी बातें अपनी शिक्षा प्रणाली में शामिल करते हैं, लेकिन शिक्षक की योग्यता और उनकी उचित भर्ती प्रक्रिया के प्रश्न को उसी अंदाज में नजरअंदाज करते आ रहे हैं मानो किसी कबीले के सरदार की तैनाती या पंसारी की दुकान पर सहायक की नियुक्ति की जा रही हो। दूसरी तमाम बातों के साथ-साथ इन सवालों का जवाब हासिल किए बिना शिक्षा व्यवस्था में सुधार असंभव है।

विकास की परिभाषा बदलने के लिये खड़ा हुआ है गुजरात का युवा

महंगी शिक्षा-बेरोजगारी के सवाल ने जातियों को एकजुट कर गुजरात चुनाव में बिछा दी है नई बिसात

गुजरात चुनाव में सड़कों पर अगर युवा नजर आने लगे हैं। तो उसके पीछे महज पाटीदार, दलित या ओबीसी आंदोलन नही है। और ना ही हार्दिक पटेल,अल्पेश या जिग्नेश के चेहरे भर है । दरअसल गुजरात का युवा जिस संकट से गुजर रहा है उसका सच महंगी शिक्षा और बेरोजगारी है। और छात्र-युवा के बीच के संकट को समझने के लिये पहले कालेजो की उस फेहरिस्त को समझें,जिसने गुजरात की समूची शिक्षा को ही निजी हाथों में सौंप दिया है। जिले दर जिले कालेज हो या यूनिवर्सिटी। टेक्निकल इस्टीट्यूट हो या फिर मेडिकल कालेज। कालेजों की समूची फेहरिस्त ही शिक्षा को इतना महंगा बना चुकी है कि गुजरात में हर परिवार के सामने दोहरा संकट है कि महंगी शिक्षा के साथ बच्चे पढ़ें। और पढ़ने के बाद नौकरी ही नहीं मिले। और गुजरात का सच ये है कि 91 डिप्लोमा कॉलेज प्राइवेट हैं। 21 में से 15 मेडिकल कालेज प्राइवेट है। दो दर्जन से ज्यादा यूनिवर्सिटी प्राइवेट है। और प्राइवेट कॉलेजो में शिक्षा महंगी कितनी ज्यादा है ये इससे भी समझा जा सकता है कि सरकारी कालेज में एक हजार रुपये सेमेस्टर तो निजी डिप्लोमा कालेज में 41 हजार रुपये प्रति सेमेस्टर फीस है। इसी तरह निजी मेडिकल कालेजों में पढ़ा कर अगर कोई गुजराती अपने बच्चे को डाक्टर बनाना चाहता है तो उसे करोड़पति तो होना ही होगा। क्योंकि अंतर खासा है । मसलन सरकारी मेडिकल  कालेज में 6 हजार रुपये सेमेस्टर फीस है । तो निजी मेडिकल कालेज में 3 से 6 लाख 38 हजार रुपये सेमेस्टर फीस है । और गुजरात के सरकारी मेडिकल कालेजो में 1080 छात्र तो निजी मेडिकल कालेज में 2300 छात्र पढाई कर रहे है । यानी  मुस्किल सिर्फ इतनी नहीं है कि पढाई मंहगी हो चली है । फिर भी मां बाप बच्चो को पढा रहे है । मुश्किल तो ये भी है मंहगी पढाई के बाद रोजगार ही नहीं है । हालात कितने बदतर है ये इससे भी समझा जा सकता है कि  प्राईवेट इंजीनियरिंग कालेजों में 25 से 30 हजार सीट खाली हैं । खाली इसलिये हैं क्योंकि डिग्री के बाद भी रोजगार नहीं है । सरकार का ही आंकडा कहता है कि 2014-15 में 20 लाख युवा रजिस्टर्ड बेरोजगार हैं ।

तो गुजरात की चुनावी राजनीति में ऊपर से हार्दिक पटेल , जिगनेश या अल्पेश के जरीये जातियों में बंटी राजनीति नजर आ सकती है लेकिन गुजरात के राजनीतिक इतिहास में ये भी पहली बार है कि जातियों में राजनीति बंट नहीं रही है बल्कि जातियों में बंटा समाज विकास के नाम पर  ही एकजुट हो रहा है । यानी विकास का जो सवाल गुजरात जाकर मोदी उठा रहे हैं । विकास के इसी सवाल को गुजराती भी उठा रहा है । यानी सवाल कांग्रेस की राजनीति का नहीं बल्कि गुजरात के विकास मॉडल का है, जहां हर परिवार के सामने संकट बीतते वक्त के साथ गहरा रहा है । तो विकास के नाम पर गुजरात के चुनाव में विकास का बुलबुला इसलीलिये फूट रहा है क्योंकि एक तरफ गुजरात के रजिस्ट्रड बेरोजगारो की तादाद  बीते 15 बरस में  20 लाख बढ़ गई । और दूसरी तरफ मनरेगा के तहत जाब कार्ड ना मिल पाने वालों की तादाद 31 लाख 65 हजार की है । और यही वह सवाल है जो विकास को लेकर मंच से जमीन तक पर गूंज रहा है । यानी राहुल गांधी कहते हैं कि विकास पगल हो गया है तो मोदी जवाब देते है कि मैं ही विकास हूं। यकीनन लड़ाई विकास को लेकर ही है । क्योंकि विकास के दायरे में अगर रोजगार नहीं है तो फिर छात्र-युवा और मनरेगा के बेरोजगारो के सामने संकट तो है । दरअसल 2016-17 का ही गुजरात का मनरेगा का आंकडा कहता है 3,47,000 लोगों ने मनरेगा जाब कार्ड के लिये अप्लाई किया और उसमें से सिर्फ 1,35, 000 लोगों को जाब कार्ड मिला । और जिन 39 फीसदी लोगों को मनरेगा के तहत काम भी मिला तो वह भी सिर्फ 19 दिनों का ही मिला ।

यानी काम 100 दिनों का देने की स्थिति में भी सरकार नहीं है । और मनरेगा के तहत ही बीते दस बरस में  38,45,000 में से 6,80,000 लोगों को ही काम मिला ।यानी रोजगार का संकट सिर्फ शहरों तक सीमित है ऐसा भी नहीं । मुश्किल ग्रामीण इलाको में कही ज्यादा है। और अगर विकास का कोई मंत्र रोजगार ही दिला पाने में सत्रम हो नहीं पाया है तो समझना गुजरात के उस समाज को भी होगा जहा कमोवेश हर तबका पढाई करता है । दलितों में भी 70 फिसदी साक्षरता है । पर शिक्षा कैसे महंगी होती चली गई और कैसे काम किसी के पास बच नहीं रहा है ये इससे भी समझा जा सकता है 60 फिसदी से ज्यादा बच्चे 12 वी से पहले ही पढाई छोड देते है । मसलन , 2006 में 15,83,000 बच्चो ने पहली में दाखिला लिया । 2017 में 11,80,000 छात्र दसवी की परिक्षा में बैठे । यानी करीब 4 लाख बच्चे दसवीं की पढाई तक पढ नहीं सके । और --मार्च 2017 में 12वी की परिक्षा  5,30,000 बच्चों ने दी । यानी हायर एजडूकेशन तक भी साढे छह लाख बच्चों ने पढाई छोड़ दी । तो गुजरात चुनाव का ये रास्ता ऐसे मोड़ पर जा खडा हुआ है जहां पहली बार जातियों में टकराव नहीं है । विकास की मोदी परिभाषा के सामानांतर हर गुजराती विकास की परिभाषा को अपनी मुश्किलो को खत्म करने से जोडना चाह रहा है । और ये हालात गुजरात में अगर राजनीतिक तौर पर कोई नया परिमाम देते है तो मान कर चलिये 2019 का रास्ता भी उस इकनामी से टकरायेगा जहां जाति - धर्म में बांटने वाली राजनीति नहीं चलेगी और जन समस्या एकजुट होकर नया रास्ता निकालेगी । 

प्रीतीश नंदी

रविवार - Thu, 26/10/2017 - 09:30
सरकार के हाथ में आपकी प्राइवेसी

1974 में गुजरात के छात्र थे, 2017 में गुजरात का युवा है

जुलाई 2015 में पाटीदारों की रैली को याद कीजिये। पहले सूरत फिर अहमदाबाद । लाखों लाख लोग। आरक्षण को लेकर सड़क पर उतरे लाखों पाटीदारों को देखकर किसी ने तब सोचा नहीं था कि 2017 के चुनाव की बिसात तले इन्हीं रौलियों से निकले युवा राजनीति का नया ककहरा गढेंगे। और जिस तरह सत्ता की बरसती लाठियों से भी युवा पाटीदार झुका नहीं और अब चुनाव में गांव गांव घूमकर रैली पर बरसाये गये डंडे और गोलियों को दिखा रहा है। तो कह सकते हैं आग उसके सीने में आज भी जल रही है और उसे बुझना देना वह चाहता नहीं है। दरअसल पाटीदारो के इस आंदोलन ने ही दलितों को आवाज दी और बेरोजगारी से लेकर शराब के अवैध धंधो को चलाने के खिलाफ उठती आवाज को जमीन मिली। तो कल्पेश या जिगनेश भी यूं ही नहीं निकले। कहीं ना कहीं हर तबके के युवा के बीच की उनकी अपनी जरुत जो पैसो पर आ टिकी। मुश्किल हालात में युवा के पास ना रोजगार है। ना ही सस्ती शिक्षा। ना ही व्यापार के हालात और ना ही कोई उन्हें सुनने को तैयार है तो राजनीतिक खांचे में बंटे ओबीसी , दलित, मुस्लिम हर तबके के युवाओ में हिम्मत आ गई है। तो आंदोलन की तर्ज पर चुनाव में कूदने की जो तैयारी गुजरात में युवा तबका कर रहा है। वह शायद इतिहास बना रहा है या इतिहास बदल रहा है। या पिर इतिहास दोहरा रहा । क्योंकि गुजात में छात्र आंदोलन को लेकर पन्नों को पलटिये तो आपके जहन में दिसंबर 1973 गूंजेगा। तब गुजरात के छात्रों ने ही जेपी की अगुवाई में आंदोलन की ऐसी शुरुआत की दिल्ली भी थर थर कांप उठी थी। तब करप्शन का जिक्र था। महंगाई की बात थी। भाई भतीजावाद की गूज थी। और तब अहमदाबाद के एलडी इंजीनियरिंग कालेज के छात्र सडक पर निकले थे। वह इसलिये निकले थे क्योंकि इंदिरा गांधी ने चुनाव के लिये गुजरात के सीएम चिमनभाई से 10 लाख रुपये मांगे थे। चिमनबाई ने मूंगफली तेल के व्यापारियों से 10 लाख रुपये वसूले थे। तेल व्यापारियो ने तेल की कीमत बढ़ा दी थी। छात्रों में गुस्सा तब पनपा जब अहमदाबाद के एलडी इंजिनियरिंग कालेज के छात्रोंवासों में कीमतें बढ़ा दी गई। तो क्या 1974 के बाद 2017 में छात्र सत्ता को ही चुनौती देने निकले है। और हालात कुछ ऐसे उलट चुके है कि तब कांग्रेस के चिमनबाई पटेल की सरकार के खिलाफ छात्रों में गुस्सा था। अब कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी के साथ हार्दिक, अल्पेश, जिग्नेश खड़े दिखायी दे रहे है। उस दौर में गुजरात के छात्र कालेजों से निकल कर नारे लगा रहे थे " हर बार विद्यार्थी जीता है, इस बार विद्यार्थी जीतेगा"। लेन मौजूदा वक्त में छात्रों के सामने शिक्षा के प्राइवेटाइजेशन की एसी हवा बहा दी जा चुकी है कि छात्र टूटे हुये है। तो क्या छात्रो के भीतर का असंतोष ही गुजरात में हर आंदोलन को हवा दे रहा है। और कांग्रेस को इसका लाभ मिल रहा है। इसीलिये राहुल गांधी 70 से 90 युवाओं को टिकट देने को तैयार है। हार्दिक, जिग्नेश और कल्पेश के साथी आंदोलनकारियों को 50 से ज्यादा टिकट देने को तैयार हैं। यानी चार दशक बाद गुजरात का युवा फिर संघर्ष की राह पर है। अंतर सिर्फ इतना है कि 1974 में निशाने पर कांग्रेस थी। 2017 में निशाने पर बीजेपी है। लेकिन छात्र तो सत्ता के खिलाफ हैं। पर गुजरात की इस राजनीति की धारा क्या वाकई 2019 की दिशा में बहेगी और क्या जेएनयू से लेकर हैदराबाद या पुणे से लेकर जाधवपुर यूनिवर्सिटी के भीतर उठते सवाल राजनीति गढने के लिये बाहर निकल पड़ेंगे। क्योंकि 1974 में भी चिमनभाई की सरकार हारी तो बिहार में नारे लगने लगे, गुजरात की जीत हमारी है, अब बिहार की बारी है। पर सियासत तो इस दौर में ऐसी पलट चुकी है कि बिहार जीत कर भी विपक्ष हार गया और बीजेपी हार कर भी सत्ता में आ गई । लेकिन गुजरात माडल के आईने में अगर देश की सियासत को ही समझे तो मोदी ऐसा चेहरा जिनके सामने बाजेपी का कद छोटा है । संघ लापता सा हो चला है । ऐसे में तीन चेहरे । हार्दिक पटेल । जिगनेश भिवानी । अल्पेश ठकौर । तीनो की बिसात । और 2017 को लेकर बिछाई है ऐसी चौसर जिसमें 2002 । 2007 । 2012 । के चुनाव में करीब 45 से 50 फिसदी तक वोट पाने वाली बीजेपी के पसीने निकल रहे है । यानी जिस मोदी के दौर में हार्दिक जवान हुये । जिगनेश और अल्पेश ने राजनीति का ककहरा पढा । वही तीनो 2017 में ऐसी राजनीति इबारत लिख रहे है । जहा पहली बार खरीद फरोख्त के आरोप बीजेपी पर लग रहे है । तो हवा इतनी बदल रही है कि राहुल गांधी भी अल्पेश ठकौर को काग्रेस में शामिल कर मंच पर बगल में बैठाने पर मजबूर है । गुपचुप तरीके से हार्दिक पटेल से मिलने को मजबूर है । चुनाव की तारिीखो के एलान के बाद जिग्नेश से भी हर समझौते के लिये तैयार है । यानी बीजेपी-काग्रेस दोनो इस तिकडी के सामने नतमस्तक है । ओबीसी-दलित-पाटिदार नये चुनावी समीकरण के साथ हर समीकरण बदलने को तैयार है । 18 से 35 बरस के डेढ करोड युवा अपनी शर्तो पर राजनीति को चलाना चाहते है ।तो क्या गुजरात बदल रहा है या नया इतिहास लिखने जा रहा है । क्योकि पटिदार समाज बीजेपी का पारपरिक वोट बैक रहा है । अल्पेश ठकोर के पिता खोडाजी ठाकोर काग्रेस में आने से पहले संघ से जुडे रहे है ।दलित समाज खुद को ठगा हुआ महसूस करता रहा । यानी चेहरे के आसरे अगर राजनीति होती है तो फिर समझना होगा 2002 से 2012 तक मोदी अपने बूते चुनाव जीतते रहे । दिल्ली से बीजेपी नेता के प्रचार की जरुरत कभी मोदी को गुजरात में नहीं पडी । तो मोदी के बाद बीजेपी का कोई ऐसा चेहरा भी नहीं बना जिसके आसरे बीजेपी चल सके । और अब मोदी दिल्ली में है और चेहरा खोजती गुजरात की राजनीति में कोई चेहरा काग्रेस के पास बी नहीं है । ऐसे में इन तीन चेहरे यानी हार्दिक पटेल । जिगनेश भिवानी। अल्पेश ठाकौर। ये सिर्फ चेहरे भर नहीं है बल्कि उनके साथ जुड़ा वही वोट बैंक है, जिस पर कभी बीजेपी काबिज रही। खासकर 54 फिसदी ओबीसी।18 फिसदी पाटीदार। पहली बार 7 फिसदी दलित भी उभर कर सामने है। तो क्या गुजरात चुनाव वोट बैंक के मिथ को भी तोड़ रहा है और युवाओं को आंदोलन की तर्ज पर राजनीति करने को भी ढकेल रहा है। यानी गुजरात के परिमाम सिर्फ 2019 को प्रबावित ही नहीं करेंगे बल्कि मान कर चलिये 2019 की चुनावी राजनीति सड़क से शुरु होगी। और जनता कोई ना कोई नेता खोज भी लेगी।

मिथक प्‍यार का

कारवाँ - Tue, 24/10/2017 - 15:01
बेचैन सी एक लड़की जब झांकती है मेरी आंखों में...
बेचैन सी एक लड़की जब झांकती है मेरी आंखों में
वहां पाती है जगत कुएं का
जिसकी तली में होता है जल
जिसमें चक्‍कर काटत हैं मछलियों रंग-बिरंगी

लड़की के हाथों में टुकड़े होते हैं पत्‍थर के
पट-पट-पट
उनसे अठगोटिया खेलती है लड़की
कि गिर पड़ता है एक पत्‍थर जगत से लुडककर पानी में
टप...अच्‍छी लगती है ध्‍वनि
टप-टप-टप वह गिराती जाती है पत्‍थर
उसका हाथ खाली हो जाता है
तो वह देखती है
लाल फ्राक पहने उसका चेहरा
त ल म ला रहा होता है तली में
कि
वह करती है कू...
प्रतिध्‍वनि लौटती है
कू -कू -कू
लड़की समझती है कि मैंने उसे पुकारा है
और हंस पड़ती है
झर-झर-झर
झर-झर-झर लौटती है प्रतिध्‍वनि
जैसे बारिश हो रही हो
शर्म से भीगती भाग जाती है लड़की
धम-घम-घम

इसी तरह सुबह होती है शाम होती है
आती है रात
आकाश उतराने लगता है मेरे भीतर
तारे चिन-चिन करते
कि कंपकंपी छूटने लगती है
और तरेगन डोलते रहते हैं सारी रात
सितारे मंढे चंदोवे सा

फिर आती है सुबह
टप-झर-धम-धम-टप-झर-झर-झर

कि जगत पर उतरने लगते हैं
निशान पावों के

इसी तरह बदलती हैं ऋतुएं
आती है बरसात
पानी उपर आ जाता है जगत के पास
थोडा झुककर ही उसे छू लिया करती है लड़की
थरथरा उठता है जल

फिर आता है जाड़ा
प्रतिबंधों की मार से कंपाता

और अंत में गर्मी
कि लड़की आती है जगत पर एक सुबह
तो जल उतर चुका होता है तली में

इस आखिरी बार
उसे छू लेना चाहती है लडकी
कि निचोडती है खुद को
और टपकते हैं आंसू
टप-टप
प्रतिध्‍वनि लौटती है टप-टप-टप
लड़की को लगता है कि मैं भी रो रहा हूं
और फफक कर भाग उठती है वह
भाग चलता है जल तली से।पर जुलाई 09, 2010
9 टिप्‍पणियां:
L.Goswamiने कहा…
मिथक को परिभाषित करती अच्छी कविता.
preetiने कहा…
behtareen ...
वन्दनाने कहा…
गज़ब्…………………बेहतरीन्…………………शानदार ………………लाजवाब्…………………अब तो शब्द भी कम पड रहे हैं।
वन्दनाने कहा…
फिर क्‍यों खींचते हैं पहाड़

बेहद गहन सोच का पर्याय है आपका लेखन्।
वन्दनाने कहा…
इच्छाओं की उम्र नहीं होती

क्या गज़ब का लेखन है……………नतमस्तक हूँ।
आज आपका ही लिखा पढ रही हूँ और अपने को धन्य कर रही हूँ।
shabdsrijanने कहा…
आपकी यह कविता अपनी सहजता में उदात्त की ओर ले जाने वाली खिडकियां खोलती है।
योगेंद्र कृष्णा
सूर्यकान्त गुप्ताने कहा…
इस आखिरी बार
उसे छू लेना चाहती है लडकी
कि निचोडती है खुद को
और टपकते हैं आंसू
टप-टप भावपूर्ण रचना।
वाणी गीतने कहा…
इस आखिरी बार
उसे छू लेना चाहती है लडकी
कि निचोडती है खुद को
और टपकते हैं आंसू
टप-टप
प्रतिध्‍वनि लौटती है टप-टप-टप
लड़की को लगता है कि मैं भी रो रहा हूं

अद्भुत ...!
arun c royने कहा…
मुकुल जी आपकी कवितायेँ पढना ए़क अनुभव है.. किसी और लोक में ले जाती है आपकी कविताएं, आपके गीत ... पहली कविता आपकी.. इच्छाओं की उम्र नहीं होती पढ़ी थी और आज भी जेहन में ताज़ी है कविता ... बेचैन सी एक लड़की जब झांकती है मेरी आंखों में... पढ़ कर तो अपने बचपने में चला गया जब ए़क लड़की यूं ही झाँका करती थी मेरे घर के आगे के कुए में ! समय बीतता गया वो लड़की बड़ी हुई लेकिन उस बूढ़े कुए की तरह उसके सपने सूख गए और वो लड़की पांच लड़कियों को जन्म देकर पिछले साल जुगार गयी... लगता है ... आज भी वो लड़की झांकती है मेरी आँखों में... उस बूढ़े कुए में... जो सूख गया है अब ! झकझोर दी है आपकी कविता !
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बुद्धिमत्ता आखि‍र है क्‍या : आइजैक एसिमोव

लेखक मंच - Tue, 24/10/2017 - 12:52

आइजैक एसिमोव ( 2 जनवरी 1920- 6 अप्रैल 1992)

जब मैं फौज में था, मैंने एक एप्टीट्यूड टेस्ट में हिस्सा लिया था। अमूमन सभी सैनिक इस टेस्ट को देते हैं। आम तौर पर मिलने वाले 100 अंकों की जगह मुझे 160 अंक मिले। उस छावनी के इतिहास में किसी ने भी अब तक यह कारनामा अंजाम नहीं दिया था। पूर दो घंटे तक मेरी इस उपलब्धि पर तमाशा होता रहा।

(इस बात का कोई ख़ास मतलब तो था नहीं। अगले दिन मैं फिर से उसी पुरानी और शानदार फौजी ड्यूटी पर तैनात कर दिया गया- यानी लंगर की चौकीदारी!)

जीवन भर मैं इसी तरह शानदार अंक लाता रहा हूं। और एक तरह से खुद को तसल्ली देता रहा हूं कि बड़ा बुद्धिमान हूं और उम्मीद करता हूं कि दूसरे लोग भी मेरे बारे में यही राय रखें।

वास्तव में ऐसे अंकों का लब्बो-लुआब यही है कि मैं इस तरह के अकादमिक प्रश्नों का जवाब देने में खासा अच्छा हूं, जो इस तरह की बुद्धिमत्ता परीक्षाएं लेने वाले लोगों द्वारा पसंद किए जाते हैं। यानी मेरी ही तरह के बौद्धिक रुझान के लोग।

उदाहरण के लिए, मैं एक मोटर मैकेनिक को जानता था जो इन बुद्धिमत्ता परीक्षाओं में किसी भी हाल मेरे हिसाब से 80 से ज्यादा स्कोर नहीं कर सकता था। मैं मानकर चलता था कि मैं मैकेनिक से ज्यादा बुद्धिमान हूं।

लेकिन जब भी मेरी कार में कोई गड़बड़ी होती तो मैं भागकर उसके पास पहुंच जाता। बेचैनी से उसे गाड़ी की जांच करते हुए देखता और उसके निर्देशों को ऐसे सुनता जैसे कोई देववाणी हो और वह हमेशा मेरी गाड़ी दुरुस्त कर देता।

सोचिए अगर मोटर मैकेनिक को बुद्धिमत्ता परीक्षा का प्रश्नपत्र तैयार करने को कहा जाता।

या किसी अकादमिक को छोड़कर कोई बढ़ई, या कोई किसान इस प्रश्नपत्र को तैयार करते। ऐसी किसी भी परीक्षा में मैं पक्के तौर पर खुद को बेवकूफ साबित करता और मैं बेवकूफ होता भी।

एक ऐसी दुनिया में, जहां मुझे अपनी अकादमिक ट्रेनिंग और मेरी जुबानी प्रतिभा का इस्तेमाल करने की छूट न हो, बल्कि उसकी जगह कुछ जटिल-श्रमसाध्य करना हो और वह भी अपने हाथों से, मैं फिसड्डी साबित होऊंगा।  

इस तरह मेरी बुद्धिमत्ता, निरपेक्ष नहीं, बल्कि उस समाज का एक फलन है जिसमें मैं रहता हूं। और यह उस सच्चाई का भी नतीजा है जिसे समाज के एक छोटे से हिस्से ने खुद को ऐसे मामलों का विशेषज्ञ बनाकर थोप दिया है।

आइए, एक बार फिर अपने मोटर मैकेनिक की चर्चा करें।

उसकी एक आदत थी- जब भी वह मुझसे मिलता तो मुझे चुटकुले सुनाता।

एक बार उसने गाड़ी के नीचे से अपना सर बाहर निकाल कर कहा: “डॉक्टर! एक बार एक गूंगा-बहरा आदमी कुछ कीलें खरीदने को हार्डवेयर की दुकान में गया। उसने काउंटर पर दो अंगुलियां खड़ी कीं और दूसरे हाथ से उन पर हथौड़ा चलाने का अभिनय किया।

“दुकानदार भीतर से हथौड़ा ले आया। उसने अपना सर हिलाया और उन दो अंगुलियों की ओर इशारा किया जिस पर वह हथौड़ा चलाने का उपक्रम कर रहा था। दुकानदार ने उसे कीलें लाकर दीं। उसने अपनी ज़रूरत की कीलें चुनीं और चला आया। इसी तरह डॉक्टर, अगला बंदा जो दुकान में आया, वह अंधा था। उसे कैंची की ज़रूरत थी। तुम्हारे हिसाब से उसने दुकानदार को कैसे समझाया होगा?”

उसकी बातों में खोए-खोए मैंने अपना दायां हाथ उठाया और अपनी पहली दो अंगुलियों से कैंची की मुद्रा बनाकर दिखाई।

इस पर मोटर मैकेनिक जोर-जोर से हंसते हुए बोला, “हे महामूर्ख, उसने अपनी आवाज़ इस्तेमाल की और बताया कि उसे कैंची चाहिए।”

फिर उसने बड़ी आत्मतुष्टि से कहा, “आज मैंने दिनभर अपने ग्राहकों से यही सवाल पूछा।”

“क्या तुमने काफी लोगों को इसी तरह बेवकूफ साबित किया?” मैंने पूछा।

“बहुत थोड़े”, वह बोला, “लेकिन तुम्हें तो मैंने बेवकूफ साबित कर ही दिया।”

“ऐसा क्यों हुआ?” मैंने पूछा.

“क्योंकि तुम बुड़बक पढ़े-लिखे हो डॉक्टर. मैं जानता हूं कि तुम ज्यादा स्मार्ट हो भी नहीं सकते।”

 मुझे कुछ बेचैनी महसूस हुई कि वह मेरे बारे में थोड़ा-बहुत जानता है। 

(रूस में जन्‍में प्रसि‍द्ध वि‍ज्ञान लेखक की आत्‍मकथा का एक अंश। इसका अनुवाद आशुतोष उपाध्‍याय ने कि‍या है।)

राजस्थान में प्रेस की आज़ादी को सीमित करने की तैयारी

जंतर-मंतर - Mon, 23/10/2017 - 12:13

शेष नारायण सिंह

राजस्थान की वसुंधरा राजे सरकार की तरफ से एक अध्यादेश जारी हुआ है , जो अगस्त १९८२ में बिहार के तत्कालीन कांग्रेसी मुख्यमंत्री  डॉ जगन्नाथ मिश्र के उस काले कानून की याद दिला देता  है जो उन्होंने प्रेस की आज़ादी को रौंद देने के लिए कानून की किताबों में दर्ज करवाने की साज़िश की थी . डॉ जगन्नाथ मिश्र ने उस बिल में ऐसा इंतज़ाम किया था कि पत्रकारों को ऐसी सज़ा दी जाए जो एक हत्यारे को भी नहीं दी जा सकती थी. अपराध संहिता और दंड प्रक्रिया में संशोधन कर दिया गया था . पत्रकार के खिलाफ अगर एफ आई आर दर्ज हो जाए तो उसके तथाकथित अपराध को गैरज़मानती बना दिया गया था . पुलिस के पास यह अधिकार आ गया था कि वह किसी भी पत्रकार को पकड़कर मैजिस्ट्रेट के सामने पेश करके उसको सख्त से सख्त सज़ा दिलवा सकती थी . उस बिल को काला बिल कहा गया , पूरे देश के पत्रकार सड़क पर आ गए और तत्कालीन प्रधानमंत्री और डॉ जगन्नाथ मिश्र की आका इंदिरा गांधी ने हस्तक्षेप किया और उस काले कानून को वापस लेना पड़ा . इंदिरा गांधी पांच साल पहले प्रेस की आज़ादी को  रौंदने का नतीजा भोग चुकी थीं. उनके बेटे और उनके  सलाहकारों ने सेंसरशिप लगा दी थी और १९७७ का चुनाव बुरी तरह से हार चुकी थीं. डॉ मिश्र ने अपने कुछ ख़ास चेला टाइप अफसरों की सलाह से यह कानून बनाया था लेकिन मीडिया और जनता की प्रतिरोध की आवाज़ इतनी तेज़ हो गयी कि इस काले कानून को वापस लेकर अपनी कुर्सी बचाना ही  उनको सही फैसला लगा . डॉ मिश्र ने भी हद कर दी थी. पत्रकार को अपराधी की श्रेणी में बैठाने  का पूरा बंदोबस्त कर दिया था. ताजीरात हिन्द की दफा २९२  और क्रिमिनल प्रोसीजर कोड के सेक्शन ४५५ को बदल दिया था  अपनी इस कारस्तानी को उन्होंने बिहार विधानसभा में पारित भी करवा लिया था .बिहार के इस काले कानून को दफ़न हुए ३५ साल हो गए हैं . इस बीच कई  राज्य सरकारों ने इसी तरह का दुस्साहस  किया लेकिन शुरुआती कोशिशें ही नाकाम कर दी गयीं . बिहार वाले काले बिल की तरह का ही एक अध्यादेश इस बार राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे लेकार आयी हैं . यह देखना दिलचस्प होगा कि उनके इस अध्यादेश के सार्वजनिक बहस के दायरे में आ जाने के बाद केंद्र सरकार और उनकी  पार्टी क्या रुख अपनाती है .जहां तक वसुंधरा राजे की बात है उन्होंने तो यह पेशबंदी मुकम्मल तरीके से कर ली है कि अगले साल होने वाले चुनावों के मद्दे-नज़र उनकी सरकार की पिछले पांच साल की  गलतियाँ उनकी पार्टी के नेताओं और आम जनता तक मीडिया के ज़रिये न पंहुचें ...
राजस्थान सरकार के आर्डिनेंस में जो प्रावधान हैं वे निश्चित रूप से लोकशाही पर सीधा हमला हैं .राजस्थान सरकार का यह अध्यादेश मूल रूप से भ्रष्ट जजों, मैजिस्ट्रेटों और सरकारी अफसरों को बचाने के लिए लाया  गया  है लेकिन इसी में यह व्यवस्था भी है कि मीडिया उन  आरोपों के बारे में कोई रिपार्ट नहीं करेगा जब तक कि सम्बंधित अधिकारी के खिलाफ मुक़दमा चलाने की अनुमति सरकार की तरफ से नहीं मिल जायेगी. क्रिमिनल लाज ( राजस्थान अमेंडमेंट ) अध्यादेश २०१७ नाम के इस आर्डिनेंस को पिछले महीने  जारी किया गया था और अब सरकार इसको कानून का रूप देने के लिए बिल के साथ तैयार है .
 इस बिल को देखते ही लगता है कि जिस तरह से राजे महराजे अपने लोगों को  किसी भी अपराध से मुक्त करने के लिए सदा तैयार रहते थे ,उसी तरह राजस्थान की राजशाही परम्परा की वारिस मुख्यमंत्री ने अपने भ्रष्ट अधिकारियों के कारनामों पर पर्दा  डालने के लिए जल्दी में  यह सारा कार्यक्रम रचा  है . इस अध्यादेश में यह प्रावधान है कि सरकार की मंजूरी के बिना जज,मैजिस्ट्रेट,और अन्य सरकारी कर्मचारियों के उन कामों की जांच नहीं की जा सकती जो उन्होंने अपनी ड्यूटी निभाते समय किया हो. सबको मालूम है कि सरकारी बाबू सारे भ्रष्टाचार ड्यूटी  के समय ही करते हैं. ऐसा लगता है कि उनके उन्हीं कारनामों की भ्रष्टाचार से सम्बंधित जांच में अडंगा डालने के लिए यह कानून लाया जा  रहा है .  इसके लपेटे में मीडिया को भी ले लिया गया है. कानून में व्यवस्था दी गयी है कि जब तक भ्रष्टाचार की जांच के लिए  सरकार की मंजूरी नहीं मिल जाती तब तक मीडिया भी आरोपों के बारे में रिपोर्ट नहीं कर सकता. इस मंजूरी में छः महीने लग सकते हैं .अभी तक ऐसा होता रहा है कि किसी सरकारी कर्मचारी के खिलाफ अगर कोई व्यक्ति शिकायत करता था और जांच एजेंसी जांच करने से इनकार कर देती थी  तो पीड़ित पक्ष मुक़दमा करके कोर्ट से जांच का आदेश करवा लेता था . जांच एजेंसी को एफ आई आर दर्ज करके जांच की प्रक्रिया शुरू करनी पड़ती थी . लेकिन अब राजस्थान में ऐसा नहीं हो सकेगा . प्रस्तावित कानून में इस पर भी रोक लगा दी गयी है . लिखा है ," कोई भी मैजिस्ट्रेट किसी ऐसे व्यक्ति के खिलाफ किसी जांच का आदेश नहीं देगा जो वर्तमान या भूतकाल में जज, मैजिस्ट्रेट या सरकारी कर्मचारी रह चुका हो ". हाँ अगर सरकार जांच एजेंसी की अनुमति मांगने वाली दरखास्त पर १८० दिन तक कोई कार्रवाई नहीं करती तो जांच एजेंसी को जांच करनी की स्वतंत्रता होगी . प्रस्तावित कानून में क्रिमिनल प्रोसीजर कोड में भी परिवर्तन किया  गया है . इसके कानून बन जाने के बाद , भ्रष्ट  सरकारी कर्मचारी का नाम ,पता , फोटो, और उसके परिवार के बारे में कोई भी जानकारी न तो छापी जा सकती है और न ही किसी अन्य रूप में प्रकाशित की जा सकती है . अगर किसी ने इस नियम का उन्ल्लंघन किया उसको दो साल की सज़ा हो सकती है . ..प्रस्तावित कानून में क्रिमिनल प्रोसीजर कोड के सेक्शन १५६ ( ३) और १९०(१) में भीबद्लाव  किया जाएगा जिसमें प्रावधान है कि कोई भी मैजिस्ट्रेट किसी भी अपराध का संज्ञान ले सकता है और जांच का आदेश दे सकता है .अब इसमें  संशोधन किया जा रहा है  अब इस सेक्शन के तहत कोई भी मैजिस्ट्रेट  किसी भी सरकारी कर्मचारी, जज या मैजिस्ट्रेट के खिलाफ  किसी जांच का आदेश नहीं दे सकता जब तक की सरकार से जांच की अनुमति न ले ली गयी हो.. अगर कथित अपराध उसकी ड्यूटी के दौरान किया  गया है . यह नियम भूतपूर्व कर्मचारियों पर भी लागू होगा. सभी सरकारी कर्मचारियों को निर्देश जारी कर दिया गया है कि वे किसी भी व्यक्ति या संगठन के खिलाफ प्रेस या सोशल मीडिया के ज़रिये कोई भी आरोप न लगाएं और  न ही कोई कमेन्ट करें .  सरकार के नियमों की किताब के हवाले से चेतावनी दी गयी है कि अगर किसी ने ऐसा नहीं किया तो उसके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जायेगी. वसुंधरा राजे की सरकार अपराध की जांच के नियमों  में इतना मूलभूत बदलाव करके राजस्थान में  भ्रष्टाचार को खुली छूट देने की  कोशिश  कर रही है . साथ ही प्रेस की आज़ादी पर भी ऐलानियाँ हमला कर रही है . राजस्थान की मुख्यमंत्री को पता होना चाहिए कि भारत में प्रेस की आज़ादी किसी नेता की तरफ से मिली हुयी खैरात नहीं है . यह भारत के संविधान में मौलिक अधिकारों के अनुच्छेद १९ (१)(ए) में गारंटी के रूप में मिला हुआ अधिकार है  और उसको बदलने की कोशिश जिसने भी किया उसने उसकी सज़ा भुगती है. इंदिरा  गांधी  को जो सज़ा मिली थी उसको पूरी दुनिया जानती है . प्रेस की आज़ादी कुचलने के कारण ही उनको १९७७ में चुनाव में हार का सामना करना पड़ा था. संविधान के मौलिक अधिकारों में अनुच्छेद १९(१) ( ए) के तहत अभिव्यक्ति की आज़ादी देश के हर नागरिक को उपलब्ध है . संविधान इसकी गारंटी देता है . मीडिया की आज़ादी संविधान के इसी अनुच्छेद से मिलती है . लेकिन यह आज़ादी निरंकुश नहीं है . अनुच्छेद १९ (२) के तहत कुछ पाबंदियां भी हैं. संविधान के अनुसार ' सबको अभिव्यक्ति की आज़ादी है .इस अधिकार में यह भी शामिल है कि सभी व्यक्ति बिना किसी बाहरी दखलन्दाजी के स्वतंत्र राय रख सकते हैं ,किसी भी माध्यम से सूचना ग्रहण कर सकते हैं , किसी को भी सूचना दे सकते हैं "सभी सरकारों ने प्रेस की इस स्वतंत्रता पर लगाम लगाने की बार बार कोशिश की है लेकिन संविधान को पालन करवाने का ज़िम्मा सुप्रीम कोर्ट के पास है . सुप्रीम कोर्ट संविधान के उन प्रावधानों की सही व्याख्या भी करता है जिन पर कोई विवाद हो . सुप्रीम कोर्ट के अधिकार क्षेत्र में यह भी है कि अगर कोई संविधान की मनमानी व्याख्या करने की कोशिश करे तो उसको नियंत्रित करे. कई बार सरकारें यह कहती भी पाई गयी हैं कि संविधान में प्रेस की स्वतंत्रता जैसी किसी भी बात की गारंटी नहीं दी गयी है. सरकारों के ऐसे आग्रह  सुप्रीम कोर्ट ने हमेशा ही दुरुस्त किया है . संविधान के लागू होने के कुछ दिन बाद ही यह नौबत आ गयी थी . उस समय सुप्रीम कोर्ट ने  रोमेश थापर बनाम मद्रास राज्य के मुक़दमे में आदेश दिया था कि " अभिव्यक्ति की आज़ादी सभी लोकतांत्रिक संगठनों की बुनियाद है " इन्डियन एक्सप्रेस बनाम यूनियन आफ इण्डिया के केस में कोर्ट ने कहा कि हालांकि  संविधान के अनुच्छेद १९ में  कहीं भी ' फ्रीडम आफ प्रेस ' शब्दों  का प्रयोग नहीं हुआ है लेकिन यह अनुच्छेद १९(१) ( ए) में समाहित है .इसी तरह से बेनेट कोलमैन एंड कंपनी बनाम यूनियन आफ इण्डिया के केस में सरकार के कहा था कि अखबार की पृष्ठ संख्या कम कर दी जाए . टाइम्स आफ इण्डिया ग्रुप की कंपनी बेनेट कोलमैन ने न्यूजप्रिंट कंट्रोल आर्डर को चुनौती देते हुए मुक़दमा कर दिया और कोर्ट ने आदेश दिया कि अख़बार की पेज संख्या कम करने संबंधी आदेश संविधान के अनुच्छेद १९(१)(ए ) का उन्ल्लंघन करता है .इस बात की पूरी संभावना है कि जनमत के दबाव के चलते वसुंधरा राजे सरकार को अपने विवादित कानून को ख़त्म करना पड़ेगा लेकिन अगर वे जिद पर अड़ी रहीं तो सुप्रीम कोर्ट से तो प्रेस की आज़ादी की हिफाज़त की उम्मीद हमेशा ही बनी हुयी है 

खराब समीक्षा खराब रचना से भी अधिक घातक है  : महेश पुनेठा

लेखक मंच - Sun, 22/10/2017 - 00:48

महेश पुनेठा

सोशल मीडि‍या का कैसे सार्थक प्रयोग कि‍या जा सकता है, इसकी बानगी कवि-शि‍क्षक महेश चंद्र पुनेठा का ‘बाखली’ के सपांदक गि‍रीश चंद्र पाण्‍डेय द्वारा लि‍या यह साक्षात्‍कार है। फेसबुक के माध्‍यम से हुई इस बातचीत में लेखन के लि‍ए समीक्षा अथवा आलोचना की भूमि‍का, दक्षि‍णपंथ व वामपंथ, साहित्य में ‘लोक’, छंदबद्ध और छंदमुक्त कवि‍ता, शि‍क्षण में दीवार पत्रि‍का की भूमि‍का आदि‍ वि‍भि‍न्‍न वि‍षयों पर लंबी बातचीत हुई है-

मुख्यतया किसी पुस्तक की समीक्षा के पैरामीटर्स क्या होते हैं ?

बहुत कठिन सवाल है।

आपके लिए कठिन नहीं है।

इस पर तो आमने-सामने बैठकर ही चर्चा हो सकती है। फिर भी संक्षेप में यही कहूँगा कि किसी किताब में क्या खास है और उसकी क्या सीमाएं हैं? इन दोनों पक्षों को लेकर समीक्षा में बात होनी चाहिए।

खास किसके लिए?

खास का मतलब नया या मौलिक, समाज को आगे ले जाने के लिए। मानवता के पक्ष में भी कहा जा सकता है।समीक्षा ऐसे प्रश्न भी खड़े करती है जो नई बहस को जन्म देते हैं। समीक्षा किसी भी पहलू को देखने का समीक्षक का अपना पक्ष भी होती है।

समीक्षक सीमाएं किस मायने में तय करता है?

सीमाओं का मतलब उसकी नजर में कथ्य-विचार -शिल्प और भाषाई की दृष्टि से उसमें क्या कमी रह गयी हैं? क्या वह रचना कहीं मानवीय मूल्यों के विरोध में तो नहीं खड़ी है?उसकी पक्षधरता किसी ताकतवर के साथ तो नहीं है? वह यथार्थ को भ्रमित तो नहीं करती हैं? आदि।

बहुत सारे समीक्षक लेखक का चेहरा देखकर समीक्षा करते हैं या फिर ये कहूँ समीक्षा करते ही नहीं। ऐसा क्यों होता है?क्या ये उस लेखक और पुस्तक के साथ अन्याय नहीं?

बिलकुल यह समीक्षा का बहुत बड़ा संकट है। आज समीक्षा किसी को स्थापित या किसी को खारिज करने के लिए ही अधिक हो रही है।निश्चित रूप यह लेखक और पुस्तक के साथ ही नहीं, साहित्य और समाज के प्रति भी अन्याय है।खराब समीक्षा खराब रचना से भी अधिक घातक है।

समीक्षा और छिद्रान्वेषण में अंतर को किस तरह समझा जा सकता है?

समीक्षा में समीक्षक पुस्तक की ताकत और कमजोरी दोनों बताता है और छिद्रान्वेषण में खोज-खोजकर कमियों को सामने रखता है। उसका उद्देश्य केवल रचना या रचनाकार की कमजोरियों को उजागर करना और उसे खारिज करना होता है।

क्या वाकई कोई समीक्षा या टिप्पणी पुस्तक को या लेखक को ऊंचा या नीचा स्तर दे सकती है। इसमें आपको कुछ घालमेल नहीं दि‍खता?

बिल्कुल देती ही है। लेखक को उठाती भी हैं और गिरा भी देती हैं। ऐसे बहुत सारे उदाहरण हैं, जहाँ समीक्षा ने लेखक को सामने लाने का काम किया। और बहुत सारे उदाहरण ऐसे भी हैं, जहां समीक्षा ने किसी रचनाकार के प्रति भ्रम फैलाकर पाठक के मन में उसकी गलत छवि प्रस्तुत करने का काम किया। क्योंकि सामान्य पाठक तो समीक्षक की कही बात को महत्वपूर्ण मानकर उसी अनुसार अपनी राय बनाता है।

क्या ये माना जाए कि‍ पुस्तक लिखने के बाद उसकी समीक्षा होना जरूरी है?

जरूरी जैसा तो कुछ नहीं है। लेकिन समीक्षा होने से नये पाठकों तक किताब की जानकारी पहुंचती है। वह अधिक पढ़ी जाती है। लोग पढ़ने के लिए प्रेरित होते हैं। खुद रचनाकार को भी अपने लेखन की सीमाओं का पता चल पाता है। उसका आत्मविश्वास बढ़ता है। वह और बेहतर लिखने के लिए प्रेरित होता है। विमर्श भी आगे बढ़ता है।

पुस्तक के शीर्षक और उसके अंतर्निहित तत्वों का तादात्म्य कैसे होना चाहिए। बहुत सारे शीर्षक रोचक होते हैं, पर तत्व उतना रोचक नहीं। इस पर आपका मन्तव्य?

केवल शीर्षक के रोचक होने से काम नहीं चलेगा। मुख्य बात तो किताब की विषयवस्तु ही है। उसे ताकतवर होना चाहिए। यदि उसमें दम नहीं है तो लिखना बेकार।

वर्तमान में हिंदी साहित्य में कुछ ऐसे नाम जो समीक्षाकर्म वाकई निष्पक्ष होकर कर रहे हैं?

नाम बहुत सारे हैं, किस-किस के नाम लिये जाएं ? विशेषकर कुछ युवा बहुत उम्मीद जगाते हैं।

जितने नाम भी अभी सूझ रहे हों, बताएं।

दरअसल, नाम लेने में नाम छूटने का खतरा अधिक होता है। प्रत्येक व्यक्ति की पढ़ने और देखने की अपनी सीमा होती है। हम केवल उन्हीं का नाम ले सकते हैं, जिन्हें हमने पढ़ा होता है लेकिन कोई जरूरी नहीं कि जो हमने पढ़ा हो वह सब महत्वपूर्ण ही हों और जिन्हें नहीं पढ़ पाए हैं, वे महत्वपूर्ण न हों। फिर एक व्यक्ति ने जितना पढ़ा होता है, उससे कई गुना उससे अपढ़ा छूट जाता है।

यानी आप उस खतरे से बचना चाहते हैं?

माना जा सकता है। अनावश्यक विवाद मुझे पसंद नहीं है।

आप भी समीक्षा कर्म और आलोचना से जुड़े रहे हैं।किन पुस्तकों की समीक्षा करते-करते आपने खुद के लेखन में परिवर्तन पाया है?

सीखना तो हर नई किताब पढ़ने के बाद होता ही है। हर नई किताब ने मेरे लेखन में कुछ न कुछ परिवर्तन किया,  भले ही वह एक कमजोर किताब ही क्यों न रही हो। उसने मुझे बताया कि अपने लेखन में किन बातों से बचना चाहिए। नागार्जुन, त्रिलोचन, केदारनाथ अग्रवाल, मुक्तिबोध, भगवत रावत, विजेंद्र, वीरेन डंगवाल, मंगलेश डबराल, हरीश चन्द्र पाण्डेय, जीवन सिंह, रमाकांत शर्मा आदि कवि-आलोचकों पर लिखते हुए मुझे बहुत कुछ सीखने को मिला। विशेषरूप से यह कि जनपक्षधरता, जीवन में ईमानदारी-सादगी, जन और प्रकृति से निकटता, जमीन व समाज से लगाव किसी रचनाकार के व्यक्तित्व और कृतित्व को कितना ऊंचा उठा देता है? इससे लेखन में कितनी गहराई और व्यापकता आ जाती है? मेरी हमेशा कोशिश रहती है कि किसी भी रचनाकार पर लिखने से पहले उनके लिखे को गहराई और विस्तार से जानूं-समझूं। इस प्रक्रिया में हमेशा कुछ न कुछ नया जानने-समझने को मिला।

आपने बड़ा सधा हुआ जबाब दिया है। इस सूची में कोई युवा तो नहीं दिख रहा।

युवाओं की एक लम्बी सूची है, जिन पर मैं निरंतर लिखता रहा हूँ। उतने नाम गिनाने यहाँ संभव नहीं हैं। उनमें से कुछ ऐसे भी हैं, जिन पर मित्रों के बार-बार आग्रह पर लिखा। इसको आप मेरी बेमानी भी कह सकते हैं। लेकिन यह मेरी कमजोरी रही है कि मैं मित्रों के आग्रह को नजरंदाज नहीं कर पाता हूँ। समीक्षा लिखने के चलते कुछ मित्रों के साथ संबंधों में खटास भी आई।

क्या उन युवाओं के साथ अन्याय नहीं होगा, नाम न लेकर?

अन्याय जैसा कुछ नहीं है क्‍योंकि‍ मेरे नाम लेने या न लेने से किसी के कद पर कोई प्रभाव नहीं पड़ना है।

एक थोड़ा-सा अटपटा सा प्रश्‍न जिसे पूछ ही लेता हूँ। कोई ऐसा उदाहरण किसी युवा के लेखन में आपकी समीक्षा के बाद बदलाव देखा गया हो?

मैं एक अदना सा पाठक और पाठक की प्रतिक्रिया से किसी के लेखन में भला क्या परिवर्तन आएगा मित्रवर।

आप ऐसा कैसे कह सकते हैं कि आपके लिखने या न लिखने से फर्क नहीं पड़ेगा क्योंकि कोई भी समीक्षा परिवर्तन लाती है। इसे आपने खुद माना है।

वह समीक्षा लिखने वाले के व्यापक अनुभव और गहरी दृष्टि पर निर्भर करता है। जहाँ तक मेरा सवाल है, न मेरे पास ऐसा कोई व्यापक अनुभव है और न ही कोई गहरी दृष्टि। मैं तो अभी खुद सीख रहा हूँ। साहित्य और समाज को समझने की कोशिश कर रहा हूँ।

जब हम साहित्य में समीक्षा की बात करते हैं तो वाम और दक्षिण दो पक्ष प्रमुख रूप से मिलते हैं। दोनों पक्षों की समीक्षा में मूलभूत अंतर क्या दिखता है?

वाम और दक्षिणपंथ की समीक्षा में वही अंतर है, जो इन दोनों विचारधाराओं के जीवन दृष्टि और साहित्य में है। दरअसल, हम किसी भी रचना का मूल्यांकन अपनी जीवन दृष्टि के आधार पर ही करते हैं। दुनिया को हम कैसे देखते हैं और उसे कैसा बनाना चाहते हैं? इसी आधार पर हम हर क्षेत्र का अन्वेषण-विश्लेषण करते हैं। कोई रचना या समीक्षा कर्म भी इसका अपवाद नहीं है। दक्षिणपंथ यथास्थितिवादी और परम्परावादी होता है। वह परम्परा में ऊपरी सुधार कर उसे मूलरूप में ही बनाए रखना और आगे ले जाना चाहता है। अतीत के प्रति अति मोहग्रस्त रहता है। अतीत में उसे अच्छाइयाँ ही अच्छाइयाँ नजर आती हैं। उसे पुरानी समाजिक और राजनीतिक व्यवस्था और नियम-कानूनों से भी कोई विशेष परेशानी नहीं होती है। पुराने जीवन मूल्यों को ही स्थापित और संरक्षित करना चाहता है। सामाजिक असमानता को भी जस्टीफाई करता है। इसके विपरीत वामपंथ सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन करने की बात करता है और परम्परा के उन्हीं मूल्यों को आगे ले जाने का समर्थन करता है, जो प्रगतिशील और वैज्ञानिक चेतना से लैस होते हैं। साथ ही एक समतावादी समाज के निर्माण में सहायक होते हैं। जीवन के प्रति यही दृष्टि उनके लेखन में भी अभिव्यक्त होता है। दोनों पक्ष समीक्षा के दौरान रचना में अपनी-अपनी विचारधारा के अनुकूल मूल्यों की पड़ताल और उसका खंडन-मंडन करते हैं।

वैसे क्या एक प्रश्न नहीं उठता कि समीक्षा पक्ष की प्रतिपक्ष को करनी चाहिए। वो ज्यादा लोकतान्त्रिक होती?

तब तो प्रत्येक रचना खारिज ही होगी। कोई भी रचना कसौटी में फिट नहीं बैठेगी, क्योंकि हर विचारधारा की अपनी-अपनी कसौटी होती है।

क्या यह भी सामन्तवाद की श्रेणी में नहीं आएगा कि आप अपने पक्ष को श्रेष्ठ मानते हैं। जरूरी नहीं कि‍ आपका पक्ष ही सही हो। दूसरा पक्ष भी हमेशा गलत तो हो नहीं सकता। इस पर क्या कहेंगे?

तब विचारधाराओं पर ही बात करनी पड़ेगी कि कौन सी विचारधारा अधिक जनपक्षीय, प्रगतिशील, मानवीय और वैज्ञानिक है?  इतिहास को खंगालना पड़ेगा। पुराने अनुभवों को देखना होगा। लेकिन यह बात तो स्वीकार करनी ही पड़ेगी कि हर विचारधारा की कसौटी तो अलग-अलग होती ही है। आप ही बताइये क्या किसी राजतन्त्र का मूल्यांकन, लोकतान्त्रिक कसौटी के आधार पर किया जा सकता है?

क्या यह माना जाए कि प्रतिपक्ष हमेशा गलत होता है

बिलकुल नहीं। पक्ष भी गलत हो सकता है। पर उसका निर्धारण किसी भी मूल्य, मान्यता तथा विचार को इतिहास के विकास क्रम में द्वंद्वात्मक दृष्टि से देखने पर ही हो सकता है। भले ही अंतिम सत्य जैसी कोई बात नहीं होती है, लेकिन हर देश-काल-परिस्थिति का अपना सत्य तो होता ही है। हमें उस सत्य तक पहुंचने की कोशिश करनी चाहिए।

साहित्य में ‘लोक’ एक ऐसा शब्द है, जिसे कवि, कथाकार, उपन्यासकार या कहूँ लेखक, समीक्षक, आलोचक सब अपने को लोक के नजदीक दिखाना चाहते हैं। इसके पीछे का कारण क्या हो सकता है? लोक के प्रति दया भाव या लोक के प्रति आस्था ?

लोक से नजदीकी दिखाने के सबके अलग-अलग कारण रहे हैं। कुछ के लिए यह लोकप्रियता हासिल करने का माध्यम है तो कुछ के लिए प्रतिबद्धता का। जो लोकप्रियता हासिल करना चाहते हैं और यह दिखाना चाहते हैं कि वे लोक के कितने नजदीक हैं,  वे लोक के मीठे-मीठे या उत्सवधर्मी रूप को अपनी रचनाओं में व्यक्त करते हैं और लोकधर्मी होने का भ्रम पैदा करते हैं। बिलकुल उसी तरह से जैसे आज बहुत सारे लोग महोत्सवों में लोकगीत-नृत्य की प्रस्तुति कर या फिल्मों में लोक धुनों और लोकसंस्कृति का इस्तेमाल कर खुद को लोक संस्कृति का सच्चा समर्थक और संरक्षक दिखाने की कोशिश करते हैं। जो लोक के प्रति प्रतिबद्ध होते हैंख्‍ वे लोक के संघर्षधर्मी, सामूहिक, सहकारी और प्रतिरोधीस्वरूप को अपनी रचनाओं में स्थान देते हैं। लोक को द्वंद्वात्मक रूप से देखते और दिखाते हैं। लोक की ताकत के साथ-साथ उसकी कमजोरियों को भी रेखांकित करते हैं। वे लोक को महिमामंडित नहीं, बल्कि जागरूक या चेतना संपन्न करते हैं। वे न दया दिखाते हैं और न ही आस्था। दरअसल, लोक को इन दोनों की ही आवश्यकता नहीं है। उसे तो अभिजात्य वर्ग द्वारा उसके खिलाफ की जा रही दुरभिसंधियों के प्रति सचेत कर उठ खड़े होने को ताकत देने वालों की जरूरत है। लोक की सामूहिक ताकत का अहसास कराने की आवश्यकता है।

एक मुकम्मल कविता जैसी कोई चीज भी होती है क्या?

दुनिया में मुकम्मल तो कुछ भी नहीं है। हो भी नहीं सकती है। ऐसा होगा तो फिर ठहराव आ जाएगा। जीवन का सौन्दर्य उसकी गतिशीलता में और परिवर्तनशीलता में ही है। हमेशा आगे बढ़ने में। क्या आप किसी नदी को देखकर कह सकते हैं कि‍ यह मुकम्मल नदी है या किसी पेड़ को देखकर कि यह मुकम्मल पेड़ है यानी कविता एक नदी की तरह है, प्रवाहमान होना ही उसका जीवंत होना है। कविता का काम हमें अधिक मानुष बनाना है, अर्थात अधिक संवेदनशील बनाना। हमारी संवेदनाओं का अधिकाधिक विस्तार करना। जीवन के सारतत्व तक पहुंचाना। सामान्यतः जिसे लोग नहीं देख पा रहे हैं, उसे दिखाना। यह तभी हो सकता है, जब वह नदी के सामान हमेशा प्रवाहमान हो ताकि उसमें नित नया जल प्रवाहित हो सके। वह छोटी-बड़ी धाराओं-सरिताओं को अपने में समाते हुए चले। वह गंदे नालों को भी अपने में मिलाकर उन्हें भी शुद्ध कर दे। अपने किनारे बसे जनों को अपना सर्वस्व देकर उनके जीवन में नया जीवन और नई स्फूर्ति का संचार कर दे। खुरदुरे पत्थरों को चिकना कर दे और कठोर चट्टानों पर सुन्दर आकृतियाँ गढ़ दे। यह सब करते हुए किसी तरह का कोई भेदभाव न करे। अंत में सबको एक समुद्र का नागरिक बना दे।

लोग मानते हैं कि छंद मुक्त कविता जब से प्रचलन में आयी तब से कविता ने अपनी जमीन खोई है। छंदबद्ध और छंदमुक्त कविता के बीच की खाई को किस रूप में देखते हैं, आप?

मुझे नहीं लगता है कि छंदबद्ध और छंदमुक्त कविता के बीच की खाई जैसी कोई बात है। यह खाई हमारे पाठ्यपुस्तकीय संस्कारों ने पैदा की है। पाठ्यपुस्तकों में हमेशा से छंदबद्ध कविता पढ़ने के कारण कविता को लेकर एक संस्कार बन गया है कि कविता का मतलब एक छंदबद्ध रचना। जबकि छंदबद्ध हो जाने मात्र से कोई रचना कविता नहीं हो जाती है। कविता अपने मितकथन, नवीनता, रूपकात्मकता, लय और सरसता से बनती है। अपनी लाक्षणिकता और व्यंजना से बनती है। उसमें विचारबोध, भावबोध और इन्द्रियबोध का सही तालमेल होना जरूरी है। यदि छंदबद्धता में ही कविता की लोकप्रियता होती तो आज भी वह कविता जो छंदों में लिखी जा रही है, उसी तरह लोकप्रिय होती। जैसे सूर-तुलसी-कबीर की कविता। हाँ, यह जरूर स्वीकार करना पड़ेगा कि कविता के नाम पर आज जो लयहीन लद्धड़ गद्य लिखा जा रहा है, जिसमें शब्दस्फीति बहुत अधिक है और बिम्बों, प्रतीकों और रूपकों की घोर उपेक्षा करते हुए शुष्क विचार व्यक्त किए जा रहे हैं, जिसमें इन्द्रियबोध और भावबोध सिरे से नदारत है। उसने कविता से पाठकों को दूर किया है। कविता के नाम पर जो अमूर्त और दुरूह गद्य लिखा जा रहा है, उससे बचने की आवश्यकता है।

कविता पढ़ी सबसे ज्यादा जाती है। पर कविता को वो सम्मान नहीं मिल पाता जो एक कहानी को मिलता है और चर्चा भी कम ही होती है। इसके क्या कारण हो सकते हैं?

मुझे नहीं लगता है कि कविता का सम्मान कम है या कम चर्चा होती है । अच्छी रचना किसी भी विधा में हो, उसको सम्मान भी मिलता है और चर्चा भी होती है। दरअसल, खराब या नकली कविता इतनी अधिक लिखी जा रही है कि उसके ढेर में अच्छी कविता कुछ दब सी गयी है। फिर हर पाठक की अपनी-अपनी रुचि होती है। मैं तो आज भी सबसे अधिक कविता ही पढ़ता हूँ। सबसे अधिक मन कविताओं में ही रमता है। किसी भी पत्रिका में सबसे पहले कविता ही पढ़ता हूँ। हाँ, यह जरूर है कि कविताओं को कुछ ठहरकर पढ़ने की जरूरत पड़ती है। बार-बार पढ़ने की जरूरत पड़ती है।

क्या आपको यह नहीं लगता कि कविता के प्रति नैराश्य भाव बढ़ा है। कवि भी तो कहानी की तरफ पलायन कर रहे हैं?

किसी कवि द्वारा कहानी लिखना न नैराश्य भाव है और न ही पलायन। हर विधा की अपनी सीमा होती है और हर जीवनानुभव की अपनी मांग। कभी-कभी रचनाकार को लगता है कि वह अपनी बात को किसी विधा विशेष में अच्छी तरह नहीं कह पाया है। कुछ ऐसा है, जो उस विधा विशेष की सीमाओं में बंध नहीं पा रहा है तो वह किसी अन्य विधा में अपनी बात कहने की कोशिश करता है। विषयवस्तु और जीवनानुभवों की प्रकृति के अनुसार विधाओं के बीच आवजाही चलती रहती है। यह सामान्य प्रवृत्ति है। हमेशा रही है। बहुत सारे समर्थ कवि हैं, जिन्होंने कविता के साथ-साथ कहानी या अन्य विधाओं में भी रचना की है। कभी-कभी यह भी होता है जो बात हम छोटी से कविता में कह जाते हैं, वह एक बड़े उपन्यास में भी नहीं कह पाते हैं। हर विधा की अपनी-अपनी ताकत और प्रभाव है। किसी को कमतर नहीं माना जा सकता है। जहाँ सुई की जरूरत है वहां सुई का ही इस्तेमाल करना होगा। जहाँ संबल की जरूरत है, वहां सुई का मोह छोड़ना ही पड़ेगा।  क्या इसे हम पलायन कह सकते हैं?

बिल्कुल नहीं।

पर ऐसा देखने में आता है कि पहले कविता लिखने वाला कवि कहानी की और रुख करता है। उसके पीछे शायद जीवनानुभवों का दबाव रहता हो।

कहीं इसके पीछे महत्वाकांक्षा तो नहीं?

महत्वाकांक्षा कैसी?

यश भी हो सकता है?

यश तो अच्छी कविता लिखने पर भी मिलता ही है। यश का संबंध विधा से नहीं, बल्कि लेखन के स्तर से होता है।

आप अपने को समीक्षा कर्म में कविता में सहज पाते हैं या कहानी या अन्य किसी विधा में?

मैं कविता में ही खुद को सहज पाता हूँ।

सबसे पहली कविता या संकलन जिस पर आपने कलम चलायी?

विजेंद्र जी के एक कविता संग्रह पर मैंने पहली समीक्षा लिखी जो वर्तमान साहित्य में प्रकाशित हुई।

उस पर विजेंद्र जी की क्या प्रतिक्रिया थी?

उन्हें अच्छा लगा। उन्होंने खुद अपना संग्रह भिजवाया था। कौन नहीं चाहता है कि उसके लिखे पर कोई बात करे।

अधिकतर देखा जाता है कि लोग समीक्षा करवाना तो चाहते हैं, परंतु सच्ची और खरी समीक्षा को पचा नहीं पाते।

आपने बिल्कुल सही कहा। सच कहो तो यह समीक्षा के सामने बहुत बड़ा संकट है। हर रचनाकार चाहता तो है कि उसकी रचना की समीक्षा हो, उस पर लिखा जाए। इस चाह में कोई बुराई भी नहीं है। आखिर कोई भी रचनाकार लिखता ही इसलिए है कि उसका लिखा हुआ पढ़ा जाए। उस पर बात हो ताकि उसकी बात अधिक से अधिक लोगों तक पहुँच सके। लिखे की सार्थकता भी यही है। लेकिन अधिकांश रचनाकारों की अपेक्षा रहती है कि उनके लिखे पर अच्छा-अच्छा ही कहा या लिखा जाए। उसकी खूब प्रशंसा हो। यदि आप दो-चार पंक्तियों में भी उनकी सीमा बता दो या उस ओर संकेत भी कर दो तो वे नाराज हो जाते हैं। इस सबके चलते मैं इधर अब समीक्षा करने से ही बचता हूँ। बहुत सारे मित्रों ने बोलचाल कम कर दी, जबकि पहले उनके साथ बहुत अच्छे सम्बन्ध थे। वैसे तो मैं किसी भी किताब के मजबूत पक्ष पर ही अधिक लिखता हूँ, क्योंकि मेरा मानना है कि कमजोर ढूंढ़ने चलो तो बड़े से बड़े रचनाकार के यहां बहुत सारा कमजोर मिल जाएगा। कोई भी रचनाकार ऐसा नहीं हो सकता है( जिसका लिखा हुआ सब कुछ श्रेष्ठ ही हो। इसलिए जब कभी बहुत जरूरी लगता है तो सीमाओं की ओर भी संकेत कर देता हूँ, लेकिन मेरा अनुभव है कि अधिकतर रचनाकार ऐसा पसंद नहीं करते हैं। एक और अनुभव रहा है मेरा- कुछ रचनाकार अपनी किताब भेजने के बाद तब तक समय-समय पर फोन करते रहते हैं, जब तक उनकी किताब की समीक्षा न लिख दी जाए और जब लिख दी जाती है तो यह सिलसिला बंद हो जाता है।

यह प्रवृति अधिकांश किस वयवर्ग के लेखकों में पायी जाती है?

ऐसे रचनाकारों में जो पत्र-पत्रिकाओं में छपने के बाद अपनी एक पहचान बना चुके होते हैं। जिनकी एक-दो किताबें भी आ चुकी होती हैं।

वही कहना चाह रहा था- समीक्षा से जुड़ा कोई अप्रिय वाकया।

इतना बड़ा तो कुछ नहीं है, जिसका उल्लेख किया जाए। छुटपुट प्रवृत्तियों के बारे में जिक्र कर ही चुका हूं।

आप समीक्षा के अलावा शिक्षा से भी जुड़े हुए है- एक संपादक के रूप में और एक शिक्षक के रूप में। क्या समीक्षा और संपादन दोनों एक-दूसरे के सहायक होते हैं या कठिनाई महसूस होती है?

जिस तरह से शिक्षा और साहित्य एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। उसी तरह लेखन और संपादन भी। इसलिए इनको करते हुए मुझे कभी कोई कठिनाई महसूस नहीं हुई, बल्कि यह कहना चाहिए कि मदद ही अधिक मिली। साहित्य ने शिक्षा की और शिक्षा ने साहित्य की समझदारी बढ़ाने का ही काम किया। मुझे लिखने का शौक नहीं होता तो शायद मैं बहुत सारी शिक्षा की वे किताबें नहीं पढ़ पाता, जो मैंने पढ़ीं। साहित्य में अभिरुचि ने शिक्षण में भी मेरी बहुत सहायता की। साहित्य ने मुझे बच्चों और समाज के प्रति अधिक संवेदनशील और रचनात्मक बनाया। मेरा तो मानना है कि हर शिक्षक को रचनाकार और साहित्य का गहरा पाठक होना चाहिए। साहित्य हमारी कल्पनाशीलता, दृष्टि और संवेदना का विस्तार करता है। एक शिक्षक के लिए ये तीनों जरूरी होते हैं। एक रचनाकार-शिक्षक बच्चों में अभिव्यक्ति कौशल और भाषाई दक्षताओं का अधिक अच्छी तरह विकास कर सकता है। उनके भीतर पढ़ने की आदत डाल सकता है। बालमन को अधिक अच्छी तरह से पकड़ सकता है। साहित्य और शिक्षा मुझे जुड़वा भाई-बहन की तरह लगते हैं। मैं तो यह मानता हूं कि विज्ञान-गणित के शिक्षकों को भी साहित्य का पाठक होना चाहिए। यदि ऐसा हो तो वे इन विषयों को और अधिक रोचक तरीके से पढ़ा सकते हैं।

एक सामान्य पाठक अगर कविता को पढ़ने और समझने का तरीका पूछ बैठे तो उसे किस तरह समझाया जा सकता है?

सूत्र जैसा तो कुछ नहीं है। दरअसल, यह संस्कार जैसा कुछ है, जिसे धीरे-धीरे ही प्राप्त किया जा सकता है। इसके लिए निरंतर, न केवल कविता बल्कि जीवन को भी पढ़ने की जरूरत होती है। उस जीवनानुभव से गुजरने की भी जरूरत पड़ती है, जिस पर कविता लिखी गयी गई अर्थात उन स्रोतों तक जाना पड़ता है, जहाँ से कविता का उद्गम हुआ है। कविता को चलते-फिरते नहीं समझा जा सकता है। उसके पास ठहरना पड़ता है। संवाद करना पड़ता है। उसे बार-बार पढ़ने की जरूरत पड़ती है। कविता शब्दों में नहीं होती है। शब्दों में खोजोगे तो भटक जाओगे। कुछ भी हाथ नहीं लगेगा। वह तो शब्दों के ओट में या दो शब्दों या फिर वाक्यों के अंतराल में भी हो सकती है। कभी-कभी तो कविता जहाँ शब्दों और पक्तियों में खत्म हो जाती है, वहां से शुरू होती है। इसलिए कविता को समझने के लिए धैर्य जरूरी है और साथ में अभ्यास भी। यही विशेषता है जो कविता को अन्य विधाओं से अलगाती है। अस्तु न कविता लिखना आसान है और न उसे समझना। कभी-कभी कविता जब शब्दों और पंक्तियों में खत्म हो जाती है, तब वहां से शुरू होती है। इसको सामान्य पाठक किस रूप में समझे। कविता को समझने को लेकर प्रतिष्ठित कवि वीरेन डंगवाल की कविता की ये पंक्तियाँ मुझे सटीक लगती हैं- जरा सम्हल कर/धीरज से पढ़/बार-बार पढ़/ठहर-ठहर कर/आँख मूंदकर आँख खोलकर/गल्प नहीं है/कविता है यह।

अलेक्सेई तोल्स्तोय ने कहीं कहा है कि कविता को पढ़ना और समझना मक्खन के चाकू से मक्खन को काटना है। इसे आप किस रूप में मानते है? कविता जहां खत्म होती है, वहां से शुरू होती है, से आपका क्या आशय है?

बहुत सारी कवितायें जहाँ खत्म होती हैं, वहाँ से शुरू होती हैं हमारे मन मस्तिष्क में। पाठक उन्हें रचता है। कविता उसके मन में बहुत सारे प्रश्न पैदा करती है, जिनका उत्तर खुद पाठक तलाशता है और खुद ही देता है। इस तरह अपने भीतर एक कविता बुनता जाता है और उस कविता की उलझनों को सुलझाता जाता है, बिलकुल इसी तरह जैसे अलेक्सेई तोल्स्तोय का यह कथन कि कविता को पढ़ना और समझना मक्खन के चाकू से मक्‍खन को काटना है। इस कथन का हर पाठक अलग-अलग अर्थ लेगा। हरेक अपनी-अपनी तरह से देखेगा। कोई जरूरी नहीं है कि वह आशय वही हो जो कवि व्यक्त करना चाहता हो। यही है शब्दों और पंक्तियों के बाद कविता शुरू होने से मेरा आशय।

कविता और एक्टिविज्म।

कविता और एक्टिविज्म, दोनों बहुत जरूरी हैं। एक्टिविज्म के बिना कविता का मेरे लिए कोई मतलब नहीं। मैं इस बात का कट्टर समर्थक हूँ कि कविता लिखे जाने से पहले उसे जिया जाना जरूरी है। एक्टिविज्म कविता को जीने का एक तरीका है। हमारे आसपास कविता लिखने वाले तो बहुत हैं, लेकिन जीने वाले बहुत कम इसलिए उसका प्रभाव बहुत दूर तक नहीं जाता है। फिर ऐसी कविता लिखने का क्या मतलब जो खुद को ही न बदले। कम ज्यादा जितना भी हो, हमें इस दिशा में प्रयासरत रहना चाहिए। एक्टिविज्म हमें नये-नये जीवनानुभव भी देता है, जो लिखने के लिए बहुत जरूरी है। मेरा मानना है कि कविता कविता के लिए नहीं, बल्कि जीवन के लिए होनी चाहिए। यश प्राप्ति इसका उद्देश्य नहीं होना चाहिए।

आपकी सबसे प्रिय कविता जिसे आप खुद का प्रतिबिम्ब कह सकते है। उसकी चार पंक्तिया अगर संभव हो?

बहुत सारी कविताएं प्रिय हैं। किसी एक का उल्लेख करें मैं दूसरों को कम नहीं करना चाहता हूँ। फिर प्रिय होना और खुद का प्रतिबिम्ब होना, दो अलग-अलग बातें हैं। एक साथ नहीं मिलाई जा सकती हैं। कोई जरूरी नहीं कि जो मुझे प्रिय हो, वह मेरे जीवन का प्रतिबिम्ब भी हो। बहुत सारी कवितायें हमें एक साथ अलग-अलग कारणों से प्रिय होती हैं बिल्कुल लोगों की तरह, क्या हम एक समय में एक से अधिक लोगों से प्रेम नहीं करते हैं? इसलिए यह बहुत कठिन प्रश्न है।

कविता अपने किस रूप में असरदार होती है?

कोई अपने कहन में असरदार होती है तो कोई कथन में। इसी तरह एक भावबोध में तो दूसरी विचारबोध और तीसरी इन्द्रियबोध में। फिर यह पाठक की रुचि और दृष्टि पर भी निर्भर करता है।

वही जानना चाह रहा हूँ कि‍ इन सब में किस रूप में सबसे ज्यादा असरदार होती है?

सबसे असरदार तो वही होगी जिसमें भावबोध, विचारबोध और इन्द्रियबोध तीनों का सही संतुलन हो।

आप ‘दीवार पत्रिका’ पर सालों से काम कर रहे हैं। इस प्रोजेक्ट से आपके जीवन में क्या परिवर्तन आए- एक साहित्यकार एक शिक्षक, और एक आम आदमी के रूप में।

परिवर्तन जैसा तो कुछ नहीं आया। हाँ, एक जिम्मेदारी का अहसास हुआ, लगा बच्चों के बीच उनकी रचनात्मकता के विकास के लिए बहुत अधिक काम करने की जरूरत है। यह पूरा क्षेत्र एक तरह से खाली पड़ा है। यह बहुत बुनियादी काम भी है। यदि हम एक विवेकशील, लोकतान्त्रिक और शांतिपूर्ण समाज बनाना चाहते हैं तो नीवं से ही शुरुआत करनी होगी। बच्चों को रचनात्मक लेखन-अध्ययन का चस्का लगा देना होगा। ‘दीवार पत्रिका’ इस दिशा में मुझे सबसे कारगर माध्यम नजर आती है। इसमें बहुत अधिक संभावनाएं दिखाई देती हैं। ‘दीवार पत्रिका’ अपने-आप में एक स्कूल है। एक ऐसा स्कूल, जिसमें बच्चों ‘हेड-हार्ट और हैण्ड’के संतुलित विकास का अवसर प्राप्त होता है। साथ ही इसे पुस्तकालय के साथ जोड़कर पढ़ने की संस्कृति के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन किया जा सकता है। बच्चों के साथ ‘दीवार पत्रिका’ पर काम करते हुए मेरी यह धारणा और पुख्ता हुई कि बच्चों के भीतर अपार क्षमता होती है, बस उन्हें अवसर देने और विश्वास करने मात्र की जरूरत होती है। वे ऐसा करके दिखा देंगे जैसा आप सोच भी नहीं सकते हैं। ‘दीवार पत्रिका एक अभियान’में काम करते हुए बच्चों को जानने-समझने का और अधिक मौका मिला। यह समझ में आया कि बच्चों के भीतर अपार है। बस, हमेशा उन्हें अपने अनुसार चलाने की कोशिश की जाती है। सब उन्हें अपना जैसा बना देना चाहते हैं। वे जैसा बनना चाहते हैं, वैसा कोई उनको बनने ही नहीं देता है। बच्चे बड़ों की महत्वाकांक्षाओं के शिकार है।

‘दीवार पत्रिका’ का विचार आया कहां से?

‘दीवार पत्रिका’ का विचार आने का किस्सा बहुत लम्बा है। इस बारे में मैंने अपनी किताब ‘दीवार पत्रिका और रचनात्मकता’में विस्तार से लिखा है। हाँ, यहाँ यह बता देना जरूरी समझता हूँ कि यह मेरा कोई मौलिक विचार नहीं है। ‘दीवार पत्रिका’ का इतिहास बहुत पुराना है। कहीं पढ़ रहा था कि द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान भी अपनी बात कहने के लिए कुछ लोगों ने इस तरह के माध्यम का इस्तेमाल किया। देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों में विद्यार्थियों के समूह ‘दीवार पत्रिका’ प्रकाशन करते रहे हैं। मैंने कुछ शिक्षक मित्रों के साथ मिलकर इसे एक अभियान का रूप देने तथा पाठ्यक्रम से जोड़कर शिक्षण का माध्यम बनाने का प्रयास अवश्य किया, जो आगे भी जारी रहेगा। सोशल मीडिया का इस्तेमाल करते हुए हमने इसका व्यापक प्रचार-प्रसार किया। साथी शिक्षकों को इसके लिए प्रोत्साहित किया। बच्चों के भीतर जिज्ञासा पैदा की। शिक्षकों और बच्चों के साथ दीवार पत्रिका निर्माण के लिए कार्यशालाओं का आयोजन किया। इसका परिणाम यह हुआ कि आज प्राथमिक स्कूलों तक में भी यह व्यापक पैमाने पर निकाली जाने लगी है। शिक्षण का एक सशक्त और सस्ता माध्यम बनकर सामने आया है। अच्छे परिणाम आ सामने आ रहे हैं। बच्चों को अपनी बात कहने का एक मंच मिला है। उनकी भाषायी दक्षता और अभिव्यक्ति की क्षमता का विकास हो रहा है। यह पाठ्यचर्या का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुकी है। आशा करते हैं कि‍ आने वाले समय में एक ऐसी पीढ़ी सामने दिखेगी, जिसकी रचनात्मकता को उभारने में ‘दीवार पत्रिका’ की अहम भूमिका रही होगी।

फिर मैं कविता की ओर लौटता हूँ। अधिकतर देखा जाता है कि‍ विद्रोह कविता का मूल कारण होता है। कविता का विद्रोही होना या कवि का विद्रोही होना इस पर आप क्या कहेंगे?

प्रतिरोध एक जरूरी जीवन मूल्य है। उसे जीवन में भी होना चाहिए और कविता में भी। यदि प्रतिरोध जीवन में नहीं होगा तो कविता में भी नहीं आ पाएगा। केवल दिखाने के लिए लाने की कोशिश की जाएगी तो वह भौंथरा प्रतीत होगा। पाठक जल्दी ही समझ जाएगा कि वह केवल कविता में कहने भर  के लिए प्रतिरोध है। ऐसी कविता पाठक के मन में प्रतिरोध के मूल्य को पैदा भी नहीं कर पाएगी। पाब्लो नेरुदा, ब्रेख्त, नाजिम हिकमत,  सारोवीवा से लेकर नागार्जुन, पाश,  गिर्दा, वीरेन डंगवाल, वरवर राव सरीखे तमाम कवियों की कविताओं में हम जो प्रतिरोध देखते हैं, वह उनके जीवन में भी दिखाई देता है। मेरा मानना है कि कवि के विद्रोही हुए बिना कविता विद्रोही हो ही नहीं सकती है। ऊपर जिन कवियों का मैंने जिक्र किया उनके जीवन में पहले विद्रोह था, तब उनकी कविताओं में उतरा। एक बात और सच्चा होगा जो कवि उसके जीवन में विद्रोह होगा ही होगा। बिना विद्रोह के एक बड़ी कविता जन्म ले ही नहीं सकती है। वह कवि खाक कविता लिखेगा, जो संतोषी होगा। कविता तो असंतोष की ही उपज होती है। जब कवि अपने चारों-ओर से असंतुष्ट होता है और उसे बदलना चाहता है, तब उस बदलाव की पहली अभिव्यक्ति कविता के रूप में ही होती है। आदि कवि बाल्मीकि की कविता भी विद्रोह स्वरूप ही निकली, चाहे वो करुणा के रूप में हो। एक कवि जिस तरह का समाज बनाना या देखना चाहता है, उसी तरह की अभिव्यक्ति अपनी कविता में करता है। वह शिकारी के प्रति कवि का विद्रोह ही तो था, जिसके चलते उसके मुंह से वह श्राप फूटा।

जी जी…वो श्राप किसी भी संवेदनशील के मुँह से निकलता। हाँ, वह अलग बात है कि‍ उसे छंद का रूप दे दिया गया।

वह छंद में नहीं भी होता, तब भी कविता होती। हाँ, छंद ने उसे अधिक प्रभावशाली बना दिया। इसलिए मुझे बार-बार लगता है कि कविता रूप में नहीं, बल्कि कथ्य में होती है। बहुत सारे लोग कविता नहीं लिखते हैं, लेकिन कवि होते हैं। उनकी अभिव्यक्ति किसी कविता से कम नहीं होती है। हमारे लोकगायक इसी तरह के तो थे। वे कवि कहलाने के लिए कविता नहीं करते थे। अपने आसपास के हर्ष-विषाद, दुःख-सुख, दर्द-आनंद को महसूस कर उनके भीतर से शब्द फूट पड़ते थे।

ऐसा क्या कारण है कि गेय पद ही सामान्य पाठक को अपनी ओर ज्यादा आकर्षित करते हैं?

स्वर जब संगीत के साथ मिल जाते हैं, अपना अधिक प्रभाव तो पैदा करते ही है। इसके पीछे एक कारण मुझे यह भी लगता है कि आदमी का स्वर से पहले सुर-संगीत से परिचय होता है। संगीत से आदमी का पहला लगाव होता है। वरिष्ठ कवि नरेश सक्सेना की कविता पंक्ति भी है- शिशु लोरी के शब्द नहीं/संगीत समझता है।

मैंने आज तक एक सरल और सहज महेश पुनेठा को देखा है, क्या कभी महेश पुनेठा को भी क्रोध आता है? अगर आता है तो घर, शिक्षण और साहित्य के माहौल में उसे किस तरह नियंत्रित करते हैं?

आपने आधे महेश पुनेठा को ही देखा है। बाहर कोई भी पूरा दि‍खता कहाँ है? घर में ही किसी को पूरा देखा जा सकता है। क्रोध प्राणी मात्र का मूल संवेग है, तब महेश पुनेठा भला उसका अपवाद कैसे हो सकता है? हाँ, उसे नियंत्रित करने की जरूरत पड़ती है। बादल बनेंगे तो बरसेंगे जरूर और बरस जाना ही ठीक भी होता है, फटना नहीं चाहिए। ‘बादल फटने’का क्या हश्र होता है? इसे हम पहाड़ियों से अधिक अच्छी तरह कौन समझ सकता है? क्रोध आता है तो व्यक्त कर देता हूँ। लेकिन हमेशा खुद को चैक भी करता रहता हूँ कि क्या मेरे व्यक्त करने का तरीका सही था और क्या उससे बचा नहीं जा सकता था? दूसरे को ही दोषी न मान खुद के दोष को स्वीकार करता हूँ इसलिए दूसरी बार क्रोध करने से बच जाता हूँ। मेरा मानना है कि दूसरे को भी क्रोध करने का अवसर दिया जाना चाहिए। यदि हम यह मान लें कि क्रोध करने का अधिकार छोटों और कमजोरों का भी उतना ही है, जितना बड़ों और ताकतवरों का, तो हम अपने क्रोध पर भी नियन्त्रण कर सकते हैं।

कविता और प्रेम इसको आज लिखे जा रही कविताओं में किस स्तर पर पाते हैं?

प्रेम जीवन का सनातन भाव है और कविता का सनातन विषय भी। जब तक जीवन रहेगा, प्रेम भी रहेगा और कविता में व्यक्त भी होगा और खूब हो रहा है।

क्या आपने कविता में प्रेम को जिया है?

क्या प्रेम को जिए बिना कविता रच पाना संभव है? मेरा छोटा अनुभव तो यही कहता है, असम्भव है। तब मैं बिना प्रेम का कविता कैसे लिख सकता हूँ, मित्रवर। वह तो केवल रोबोट के लिए ही संभव है।

आप पतली गली से निकलने की कोशिश कर रहे हैं। आपकी अपनी कोई प्रेम पगी पंक्तियां?

सारी ही कवितायेँ प्रेम में पगी हैं। कहा न, प्रेम के बिना तो कविता लिखना ही असंभव है। आप मानवीय मूल्यों से प्रेम करते हैं,  कमजोर,  दमित, शोषित, पीड़ित से प्रेम करते हैं,  इसीलिए कविता लिखते हैं और लिख पाते हैं। यदि आप इनके प्रेम में पगे न हों तो इनके पक्ष में एक पंक्ति भी नहीं लिख पायेंगे और जो लिखेंगे भी तो भले वह कुछ भी हो, लेकिन कविता नहीं होगी।

आजकल लिखी जा रही प्रेम कविताओं की गहराई और उनका फैंटेसी पर कुछ बोलना चाहेंगे?

गहराई किसी काल की मुहताज नहीं होती हैं। उथली प्रेम कवितायेँ हर काल में लिखी गयी हैं, आज भी लिखी जा रही हैं। उसमें से मोती चुनने का काम तो सहृदय का है। फैंटेसी का इस्तेमाल कविताओं में खूब होता रहा है, पर इसके साथ खतरा यह है कि यह अक्सर यथार्थ से पलायन का बहाना बन जाती हैं। फैंटेसी की सर्थाकता तो तभी है, जब वह यथार्थ से साक्षात्कार का माध्यम बने। जैसा कि हम मुक्तिबोध के यहाँ पाते हैं।

बात मुक्तिबोध की आ ही गयी। मुक्तिबोध की कविता सामान्य पाठक के लिए तो समझना बहुत मुश्किल होता ही है। मंझे हुए साहित्यकार भी उलझ जाते हैं, उनकी कविता के भंवर में। इसे मुक्तिबोध की कमजोरी कहेंगे या विद्वता?

बिलकुल आप ठीक कह रहे हैं, मुक्तिबोध की कविता में सामान्य पाठक ही नहीं, मंझे हुए साहित्यकार भी उलझ जाते हैं। डॉ. रामविलास शर्मा, केदारनाथ अग्रवाल, विजेंद्र जैसे प्रतिष्ठित साहित्यकार भी उनकी कविता में जटिलता और दुर्बोधता की शिकायत करते हैं। इसलिए उन्हें ‘कवियों का कवि’भी कहा जाता है। लगभग सभी साहित्यिक मानते हैं कि उनकी कविता को समझना बहुत आसान नहीं है। उनका भावबोध और रचना प्रक्रिया दोनों जटिल हैं। फंतासी का इस्तेमाल भी उनकी कविता को दुरूह बना देता है। संस्कृत, तत्सम और अप्रचलित शब्दों की प्रधानता भी उनकी भाषा को कठिन बना देती है। मैं इसे मुक्तिबोध की कविता की एक सीमा मानता हूँ। लेकिन जब हम उनकी आलोचनात्मक लेखों, डायरी के पन्नों और पत्रों को पढ़ते हैं, तो उनकी कवितायें खुलने लगती हैं। एक ताना हाथ आने की देर होती है, बस। दरअसल, मुक्तिबोध की कविता की जटिलता जानबूझकर पैदा की गई, जटिलता नहीं है। जैसा कि बहुत सारे कवि करते हुए पाए जाते हैं। अपनी बात को जलेबी की तरह घुमाकर एक प्रभाव पैदा रकने की कोशिश करते हैं, जबकि कथ्य के स्तर में उसमें कुछ खास होता नहीं है। केवल वाग्जाल फैलाते हैं। लेकिन मुक्तिबोध की जटिलता जीवनानुभवों और नवीनता से पैदा जटिलता है। जिनका मंथन करने पर मक्खन निकलता है। वह हमें मनुष्य के भीतर और बाहर दोनों ओर चल रहे संघर्षों की अनुभूति से परिचित कराते हैं। चेतन और अवचेतन की बात करते हैं। कभी-कभी इतनी गहराई में चले जाते हैं कि उनको पकड़ना कठिन हो जाता है, लेकिन जब धैर्य रखते हुए उनके साथ उतरते हैं, तो नायाब मोती भी हाथ लगते हैं। मुक्तिबोध के दुरूह लगने का एक कारण उनका मराठी भाषा से हिंदी में आना भी रहा। हिंदी उनकी मातृभाषा नहीं थी, बल्कि अर्जित भाषा थी। मुक्तिबोध ने जिंदगी के जिन सवालों को उठाया और जिस विचार व भावभूमि का निर्माण किया,  वैसा हिंदी के बहुत कम कवि कर पाए।

कहीं किसी का लिखा हुआ पढ़ रहा था,कविता को छंदों की ओर लौटना होगा, अगर उसे पाठक से जुड़ना है तो ।’ क्या आप इससे सहमत हैं?

सवाल छंद का नहीं है। यह कहना कि छंद में न होने के कारण आज कविता से पाठक दूर हो रहे हैं, यह स्थिति का सामान्यीकरण है। कारण बहुत सारे हैं। यदि छंद जुड़ाव का एकमात्र कारण होता, तो वे सारी कवितायें जो आज भी छंद में लिखी जा रही हैं, उनके बहुत सारे पाठक होने चाहिए थे या वे बहुत पढ़ी जानी चाहिए थीं,  क्या ऐसा है ? आज कविता छंदबद्ध हो या छंदमुक्त उसके पाठक कम ही हैं, बल्कि हमेशा ही गम्भीर साहित्य के पाठक कम ही रहे हैं। मेरे राय में कविता के छंदबद्ध होने से अधिक जरूरी है- कविता का जीवन से जुडा होना। जीवन के ज्वलंत सवालों को उठाना,  उनसे जूझना, पाठकों को नए जीवनानुभवों से परिचित कराना, जो कविता इस रूप में हमारी संवेदनाओं को झकझोरती है और उससे जुडती है,  उन कविताओं से पाठक अवश्य जुड़ता है। उन्हें पढ़ता है। बहुत सारी मुक्तछंद कवितायें इस बात का प्रमाण हैं। ऐसी बहुत सारी मुक्तछंद कवितायें हैं, जो बहुत सारे पाठकों द्वारा पसंद की जाती हैं। इस सबको थोड़ी देर के लिए अलग भी कर दें तो फिर भी पीछे नहीं लौटा जा सकता। कविता छंद से बहुत आगे आ चुकी है,  यह केवल हिंदी में ही नहीं, दुनियाभर के साहित्य में हो रहा है। मुक्तछंद में कविता लिखी जा रही हैं। इसका कारण छंद की अपनी कुछ सीमायें रही हैं। आज जीवन की जटिलता को छंदों में बांधकर पूरी तरह से कहना संभव नहीं लगता है। छंद बहुत बार भाव और विचार का गला घोंट देते हैं। हाँ, यह जरूरी है कि कवि को छंद की परम्परा का ज्ञान होना चाहिए। उससे ताकत ग्रहण करनी चाहिए। यदि छंद में आज का यथार्थ व्यक्त हो पाता है, तो व्यक्त भी किया जाना चाहिए। छंद से किसी को कोई परहेज नहीं है, लेकिन केवल छंदबद्ध रूप में ही कविता मान्य होगी, यह अब नहीं चलने वाला है। मुक्तछंद अब बहुत आगे निकल आया है।

आपने कविता और समीक्षा के साथ-साथ क्या कभी किसी कहानी पर भी काम किया?

एक दौर में लघुकथाएं लिखी थीं। उससे अधिक नहीं।

पहली लघुकथा कौन सी थी?

अपराधिनी।

लघुकथा कथा में परिवर्तित क्यों नहीं हो पायी?

कोई कोशिश नहीं की।

कहानी और कविता के सृजन में मूलभूत अंतर आप क्या पाते हैं?

कहानी विस्तार की अधिक आजादी देती है, जबकि कविता में कम शब्दों में अधिक कहने की जरूरत पड़ती है। कविता में बिम्बों, प्रतीकों, रूपकों आदि का प्रयोग एक तरह से विधागत आवश्यकता होती है। कविता किसी अन्न को पोटली में रखना है, तो कहानी उसे बिछा देना। कहानी सृजन अधिक समय की मांग भी करती है। फिर विषयवस्तु की अपनी मांग का भी सवाल होता है। मुक्तिबोध ने तो एक ही विषय पर कविता भी लिखी है और कहानी भी।

जी, वही अंतर जानना चाह रहा था ।

उन्हें लगा होगा कि‍ शायद कविता में वह अपनी बात पूरी तरह नहीं कह पाए इसलिए उन्होंने कहानी द्वारा कहने की कोशिश की होगी।

कहानी और नाटक की भारतीय परंपरा में सुखान्त को तरजीह देते आए हैं। लेखक पर वेस्टर्न लेखक इस का अनुपालन नहीं करते ऐसा क्यों?

यह जीवन दृष्टि का अंतर है। भारतीय जीवन दृष्टि संतोषम परम सुखम पर विश्वास करती है। जो है, अच्छा ही है। जो होगा, अच्छा ही होगा। जो तय है, वही होगा। उसे कोई बदल नहीं सकता है। हमारा अधिकांश साहित्य इसी दृष्टि को ही स्थापित करता है। इसको अंत भले का भला वाली दृष्टि भी कह सकते हैं। जबकि ऐसा हो, कोई जरूरी नहीं। अक्सर देखा गया है कि‍ भला तो ताकतवर का ही होता है। ताकत की भला-बुरा तय करती है। इतना ही नहीं, भारतीय दृष्टि यह भी है कि यदि कहीं कोई बुरा है तो उसमें कोई बदलाव भी करेगा तो वह कोई अवतारी पुरुष ही करेगा। जनशक्ति की उसमें कोई भूमिका नहीं। यह दृष्टि यथास्थितिवादी दृष्टि है।

क्या आपने कभी किसी कहानी को भी एक समीक्षक की दृष्टि से देखा?

बहुत अधिक तो नहीं। कुछ कहानी संग्रहों और उपन्यासों की भी समीक्षा लिखी है, मैंने।

कहानी की समीक्षा के वो तथ्य और कथ्य जिन्हें आप मानते हैं कि कहानी उनके बिना कहानी नहीं होती है?

कहानी में सबसे पहली बात है- उसमें कहानीपन का होना, वह निबंध की तरह न हो। शेष किसी भी रचना की समीक्षा करते हुए चाहे वह कविता हो या कहानी, सबसे पहले यही देखता हूँ कि उस रचना के माध्यम से रचनाकार ने जीवन की किस बुनियादी बात को उठाया है, जिसे अब तक किसी और ने न उठाया हो? क्या रचना में वही दिखाया गया है, जो सब देख रहे हैं या उसे दिखाया गया है,जिसे सामान्यतः लोग देख नहीं पाते हैं? उस रचनाकार की अपने जन, समाज और प्रकृति को देखने की दृष्टि क्या है? वह अपनी रचना में किसके पक्ष में खड़ा है? रचना में जिस समाधान की ओर संकेत किया गया है, वह कितना तर्कसंगत और मानवीय है? रचना पाठक की संवेदनाओं का विस्तार करने में कितनी सक्षम है?  क्या उसे पढ़ने के बाद पाठक वही रह जाता है, जो उसे पढ़ने से पहले था या कुछ परिवर्तन आता है? आदि-आदि।

हम कहानी की बात कर रहे थे, बहुत सारे लोग कहानी लिख रहे हैं। कहानी गढ़ने में काल्पनाशीलता की कितनी आवश्यक्ता होती है?

कल्पना तो सृजन का एक आवश्यक तत्व है। इसके बिना कोई भी रचना अनुभववाद की शिकार होकर रह जाती है। कल्पनाशीलता के बिना कोई भी रचना बड़ी नहीं हो सकती है। इसके अभाव में कोई भी रचनाकार केवल एक दर्पण बनकर रह जाता है। उसके सामने जो घट रहा है, उतना ही वह अपनी रचना में दिखायेगा, उससे अधिक कुछ नहीं। जबकि रचनाकार का काम वह दिखाना भी होता है, जो उसके सामने नहीं घट रहा है। दूसरे शब्दों में जिसे एक सामान्य आदमी नहीं देख पाता है। वह जिस नये समाज को अपनी रचना में दिखाता है, वह कल्पनाशीलता से ही संभव होता है। लेखन ही नहीं, बल्कि कोई भी सृजन हो वह कल्पनाशीलता के बिना संभव नहीं होता है। शिक्षण को भी में इसी रूप में देखता हूँ।

क्या आपने किसी पाश्चात्य कहानीकार को भी पढ़ा है?

थोडा़ बहुत मैक्सिम गोर्की और ताल्स्तॉय को।

पाश्चात्य लेखन और भारतीय लेखन शैली में क्या अंतर पाते हैं?

ज्यादा पढ़ा ही नहीं है, क्या अंतर बताऊंगा भला।

अपने लेखन के बारे में कुछ कहना चाहेंगे?

कुछ नही।

क्यों?

अपने लेखन पर भला खुद क्या कहा जा सकता है? जो लिख दिया, लिख दिया। अब वह मेरा कहाँ रहा।

आपके लेखन को मजबूती देने में आपकी धर्मपत्नी शीला जी के योगदान को आप किस रूप में रेखांेकित करना चाहेंगे?

मैं तो पूरा उनका ही योगदान मानता हूँ। वह यदि सहयोग नहीं करतीं तो शायद में न पढ़ पाता और न लिख। कभी भी उन्होंने मेरे पढ़ने-लिखने को लेकर नकारात्मक टिप्पणी नहीं की। उसे कभी भी फालतू या बैठे-ठाले का काम नहीं कहा। जैसा कि अक्सर मान लिया जाता है। मेरे लिखे की पहली पाठक वह ही रहीं हैं। मैं सुनाता हूँ और वह सुनती रहती हैं। बहुत बार तो पहला प्रूफ वह ही देखती हैं। व्याकरण और वर्तनी की गलतियों को पकड़ती हैं।घर की पूरी जिम्मेदारी को अपने ऊपर लेकर मुझे पढ़ने-लिखने के लिए छोड़ा है। मेरे बैंक-पोस्ट ऑफिस वाले काम भी वह निपटा देती हैं। पहले जब हाथ से लिखना होता था, तो मेरी कविताओं को फेयर करने का काम भी बहुत बार वहीं करती थीं। शुरू-शुरू में वापस आई रचनाओं के लिफाफों को छुपाने का काम भी। जब मैं नाश्‍ता-पानी कर लेता था, तब वह उन लिफाफों को मुझे दिखाती थीं। उन्हें इस बात का अहसास रहता था कि मुझे रचनाओं के लौटने पर कितना दुःख होता है। मेरा मानना है कि पत्नी के सहयोग के बिना कोई भी लेखक लम्बा लेखन नहीं कर सकता है।आपको तो पता है कि मैं जितने समय भी घर में रहता हूँ, लिखने या पढ़ने का काम ही करता रहता हूँ, लेकिन शीला ने कभी इस पर कोई नाराजगी व्यक्त नहीं की, बल्कि जब उनको घरेलू कामों से फुर्सत हो जाती है तो अपनी बुनाई लेकर या किताब लेकर मेरे बगल में आकर बैठ जाती हैं। बीच-बीच में घर-गृहस्थी और आसपडो़स की बातें मुझे बताती रहती हैं। कभी-कभी पढ़ने-लिखने में डूबे रहने के कारण सुन नहीं पाता हूँ, तो हल्की नाराजगी व्यक्त करते हुए कहती हैं कि आपके पास मेरी बात सुनने के लिए समय कहाँ ? लेकिन यह नाराजगी क्षणिक ही होती है। फिर थोड़ी देर में अदरक का पानी बनाकर ले आती है। वह खुद भी बहुत अच्छी पाठक हैं। घर में आनेवाली साहित्यिक पत्रिकाओं की कहानियां तो शायद ही कोई उनसे अपठित रही हो। घर में आने वाली कोई भी कहानी संग्रह या उपन्यास सबसे पहले वही पढ़ती हैं। अच्छा हुआ तो मुझे भी पढ़ने का सुझाव देती हैं।

मनाने का समय ही नहीं होता होगा, कभी यह वाक्‍य नहीं निकला- ये किताबें मेरी सौतन हैं?

यह वाक्‍य तो सुनने को नहीं मिला अब तक।

अच्छी बात है।

इतना ही नहीं, हमारे घर में पढ़ने-लिखने वाले लोगों का हमेशा आना-जाना लगा रहा है। घंटों तक बैठा रहना और बहस सामान्य बात रही है। हमारी बहस चलती रहती है और शीला बहुत प्रेम से चाय-पानी पिलाती रही हैं। खाना खिलाती रही हैं। खुद भी हमारे बातचीत में शामिल होती रही हैं। बाहर से आये साहित्यकारों का रुकना भी होता रहा है।उनकी सेवा-सुश्रुषा में भी कभी कोई कमी नहीं आने दी होगी। गंगोलीहाट में हमने अपने आवास में एक पुस्तकालय स्थापित किया था, उसकी साफ-सफाई और देख-रेख का काम भी शीला ही देखती थीं। यहाँ भी मेरे द्वारा अपने पुस्तकालय को सार्वजनिक करने पर भी उन्हें कोई आपत्ति नहीं हुई। पुस्तकालय से पाठकों को किताब देने के साथ-साथ चाय भी पिला देती हैं। ‘शैक्षिक दखल’ शुरू की उसके प्रकाशक की भूमिका में भी उन्होंने पूरी सक्रियता दिखाई। पंजीकरण का पूरा काम उन्होंने अपने हाथ में लिया। बैंक में खाता खोलना और लेन-देन करना सभी काम वही देखती थीं।

आपकी कविताओं को जब पढ़ता हूँ तो आंचलिक शब्दों का प्रयोग बहुत कम ही होता है, फिर भी आपकी कविताएं आंचलिकता को पूर्णतया उभार पाती हैं। यह कैसे संभव हो पाता है?

आंचलिक शब्दों के प्रयोग के बारे में मेरा स्पष्ट मानना रहा है कि इन शब्दों का इस्तेमाल जबरदस्ती नहीं होना चाहिए। ये शब्द सहज रूप से कथ्य की जरूरत के मुताबिक ही आने चाहिए। वहीं आने चाहिए, जहाँ भाव-विचार या प्रसंग की सटीक अभिव्यक्ति के लिए जरूरी हों। जब उनका कोई और विकल्प न हो। किसी दूसरे शब्द के माध्यम से वह गहराती, तीव्रता और व्यापकता नहीं आ पा रही हो। देश-काल-परिस्थिति और पात्र की प्रमाणिकता के लिए अति आवश्यक हो। किसी रचना को आंचलिक रंग देने मात्र के लिए मैंने कभी बोली के शब्दों का प्रयोग नहीं किया। आंचलिक शब्दों के अतिशय प्रयोग से रचना के बोझिल और दुरूह होने का उसी तरह खतरा पैदा हो जाता है, जैसे तत्सम और संस्कृतनिष्ठ शब्दों के प्रयोग से। केवल बोली के शब्दों से ही कोई रचना आंचलिक नहीं हो जाती है। जीवन की घटनाएँ, प्रकृति, समाज और उसमें आये चरित्र भी रचना को आंचलिक बनाते हैं।

यह कह सकते हैं लेखकों को आंचलिक शब्दों के प्रयोग सतर्कता बरतनी चाहिए।

बिलकुल। बोली के शब्दों के प्रयोग में यह ध्यान रखने की जरूरत होती है कि वे सहज रूप से आयें, कहीं भी जबरदस्ती ठूंसे नहीं लगने चाहिए। पाठक को उन्हें समझने के लिए किसी शब्दकोश की जरूरत नहीं पढ़नी चाहिए, सन्दर्भ से ही उनके आशय खुल जाने चाहिए। बेहद सतर्कता की जरूरत है।

साहित्य के केंद्रीकरण पर आप क्या कहना चाहेंगे?

केन्द्रीकरण से आपका क्या आशय है ? प्रश्न को थोडा और खोलें।

साहित्य का कुछ गिने-चुने लोगों के इर्द-गिर्द होना।

पाठकों के या साहित्यकारों के?

साहित्यकारों के।

मुझे लगता है कि‍ आज ऐसा नहीं है। छोटी-छोटी जगह से निकलने वाली ‘बाखली’जैसी सैकड़ों लघु पत्रिकाओं और सोशल मीडि‍या ने इसे तोडा़ है।

यानी ये आज केवल भ्रम रह गया है।

वस्तुस्थिति में काफी बदलाव आया है और आता जा रहा है। गढ़ और मठ टूट रहे हैं। अब दूर-दराज से लिखने वाले राष्ट्रीय स्तर पर अपनी उपस्थिति दर्ज कर रहे हैं। कुछ महानगरों या साहित्य के केन्दों की बपोती नहीं रहा। सोशल मीडिया साहित्य को आम पाठक तक ले जाने और साहित्यकारों के आपसे संवाद का एक प्रभावशाली और सशक्त माध्यम है। इसका भरपूर इस्तेमाल किया जाना चाहिए। सोशल मीडिया के प्रचलन बढ़ने से साहित्यकार और पाठक के बीच से संपादक और आलोचक की भूमिका कम हो गयी है। अब साहित्यकार इनका मुहताज नहीं रह गया है।

वेदप्रकाश जी के जाने पर लुग्दी साहित्य पर बहुत कुछ लिखा जा रहा है। आप लुग्दी साहित्य को किस स्तर पर देखते हैं?

लुगदी साहित्य को मैं साहित्य के क्षेत्र में प्राथमिक स्कूल के रूप में देखता हूँ। पढ़ने की लत लगाने में इसकी भूमिका हमेशा से असंदिग्ध रही है। उससे अधिक मैं इसके कोई सार्थकता नहीं देख पाता हूँ।

जो शास्त्रीय साहित्य अलमारियों और पुस्तकालयों में डम्प है, उसको किस श्रेणी में रखेंगे?

उच्च शिक्षा।

थोड़ा विस्तार से।

शास्त्रीय साहित्य हमें जीवन की गहराई और व्यापकता में ले जाता है। जीवन के विविध रूप-रंग-गंधों का दर्शन कराता है। अधिक मानवीय बनाता है। संवेदना का विस्तार करता है। मुक्तिबोध के शब्दों में कहूं तो अंतरात्मा के आयतन का विस्तार करता है। जीवन के ज्वलंत प्रश्नों से मुठभेड़ करता है। और एक बदलाव की दिशा बताता है। उसके लिए एक बेचैनी पैदा करता है। उसे पढ़ने के बाद पाठक वैसा नहीं रह जाता है, जैसा उससे पहले था। वह अपने को अधिक समृद्ध पाता है। केवल वस्तुस्थिति का चित्रण ही नहीं करता है, बल्कि उसके कारणों की पड़ताल भी करता है। कार्य और कारणों के संबंधों की तार्किक व्याख्या प्रस्तुत करता है। कुल मिलकर विवेकशीलता, संवेदनशीलता,  भाषाई संस्कार और वैज्ञानिक सोच पैदा करतस है।

सामन्तवाद और उदारवाद दोनों के साहित्य पर पर प्रभाव को आप किस रूप में देखते हैं?

समाज में मौजूद हर विचारधारा का प्रभाव साहित्य में दिखाई देना स्वाभाविक है। साहित्य के मूल में तो विचार ही होता है। हर विचारधारा साहित्य के माध्यम से ही प्रचार-प्रसार और मान्यता प्राप्त करती है। समाज में जितनी तरह की विचारधाराएँ होंगी, उतने तरह का साहित्य मिलेगा।

दोनों के कुप्रभावों को इंगित करने की भी तो आवश्यकता है?

वह तो हर नयी विचारधारा करती ही है।

मेरे कहने का आशय नयी पीढ़ी को उसके कुप्रभावों से आगाह किन शब्दों किया जाए,  हतोत्साहित भी न हों और कार्य में मौलिकता और प्रगतिशीलता भी आए?

उदारवाद एक तरह से सामन्तवाद के कुप्रभावों की उपज है। उसके लिए तो नई पीढ़ी को अपने समय और समाज को गहराई से समझना होगा। आर्थिक-सामजिक तथा राजनीतिक हर पहलू पर विचार करना होगा। मानव समाज के पूरे विकासक्रम को जानना होगा। उसका अन्वेषण-विश्‍लेषण करना होगा।यह एक लम्बी प्रक्रिया है। एक या दो दिन में किसी के दृष्टिकोण को नहीं बदला जा सकता है। या किसी विचारधारा की सीमाओं को नहीं बताया जा सकता है। एक बात और महत्वपूर्ण है कि यदि कोई बदलने के लिए तैयार न हो तो आप उसे नहीं बदल सकते हो।

मैं फिर समीक्षा में लौटता हूँ।आजकल समीक्षा और आलोचना में हो रहे घालमेल पर आपका मन्तव्य क्या है?

किस तरह की घालमेल ?

मेरा आशय गिराने-उठाने से है।

उठाने-गिराने का यह खेल हमेशा ही रहा है। इधर सोशल मीडिया के आने से कुछ बढ़ गया है। यह साहित्य और साहित्यकार दोनों के हित में नहीं है और अंतत समाज के हित में भी नहीं है।

आपको नहीं लगता कि हिंदी साहित्य में जो तथाकथित बड़े आलोचक, लेखक,  समीक्षक हैं,  वही उसे सम्मान की दृष्टि से नहीं देखते?

ऐसा कहना तो ठीक नहीं होगा।

क्या कारण है कि हिंदी साहित्य आज भी अंग्रेजी साहित्य से पीछे दिखता है?

किस रूप में पीछे मानते हैं, आप?

पाठक तक पहुँच और उसकी विषयवस्तु, उसकी लोकप्रियता, उसकी व्यवसायिकता।

यदि आप केवल भारत के सन्दर्भ में बात कर रहे हैं तो मुझे नहीं लगता है कि अंग्रेजी साहित्य पढ़ने वालों की संख्या हिंदी साहित्य पढ़ने वालों से अधिक है। अंग्रेजी अन्तरराष्‍ट्रीय भाषा है, उसकी लोकप्रियता और व्यवसायिकता का अधिक होना स्वाभाविक है। इसके पीछे बाजार की शक्तियों का भी हाथ है। विषयवस्तु में मुझे हिंदी का साहित्य कहीं से भी कम नहीं लगता।

आपकी मातृभाषा कुमाउंनी ही है। क्या आपने कुमाउंनी में भी कभी कुछ लिखने की कोशिश की?

नहीं।

नहीं लिखने के क्या कारण रहे?

लम्बी कहानी है, कुमांउनी में न लिख पाने की।

बचपन में पढने के लिए पिताजी के साथ लोहाघाट जाना हुआ। मैं अपनी सोर्याली में बोलता था, वहां भी उसी में बोलने लगा जिसमें काली कुमांउनी से कुछ अंतर है। इन दोनों बोलियों के शब्दों में अंतर है। वहां साथी बच्चों के द्वारा मेरी बोली के शब्दों की मजाक बनाया जाने लगी। मैंने हिंदी में बोलना शुरू किया फिर वहां से घर लौटने के बाद हिंदी में ही बोलने लगा। गांव में, लोगों के बीच हिंदी में बोलने के चलते तारीफ होने लगी। बस फिर वही सिलसिला चल पड़ा। कुमाउंनी का अभ्यास छूटता ही गया। जब बोलने का ही अभ्यास छूट गया तो लिखना तो दूर की बात रही। हिंदी में ही मौखिक-लिखित अभियव्यक्ति का अभ्यास अधिक रहा। उस समय अपनी बोली-बानी के प्रति कोई अतिरिक्त चेतना भी नहीं थी। शहर के नजदीकी गांव में रहने के चलते कुछ ऐसा माहौल भी था कि कुमाउंनी में बोलना पिछड़ेपन का प्रतीक समझा जाता था। हर माता-पिता अपने बच्चों को हिंदी में बोलने के लिए ही प्रोत्साहित करते थे, बल्कि कुमांउनी में बोलने पर टोकते थे। इस तरह छूटती ही चली गयी, अपनी दुधबोली। जब तक अपनी बोली-बानी के महत्व को समझने लगा, तब तक बहुत देर हो चुकी थी। हिंदी में लिखना और छपना अधिक हो गया। उसी में सहज भी लगने लगा। हिंदी में लिखकर अधिक पाठकों तक पहुंचना संभव था। कभी यह भी नहीं लगा कि जो बात हिंदी में कह रहा हूँ, उसे कुमाउंनी में बेहतर तरीके से कह सकता हूँ। जहाँ लोक की संवेदना को अधिक गहराई से व्यक्त करने हेतु इसकी जरूरत लगी, हिंदी में ही लोक बोली के शब्दों का इस्तेमाल कर लिया। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि लोक बोली को लेकर किसी तरह का कोई हीनताबोध हो मन में। कुमांउनी से मुझे उतना ही लगाव है, जितना हिंदी से। कभी फुर्सत मिलेगी तो जरूर कुमांउनी में भी लिखना चाहूँगा। कुछ कवितायें और समीक्षाएं लिखी भी हैं।

बुद्धिजीवियों, दलितों, पिछड़ों पर हो रहे हमलों के पीछे क्या कारण पाते हैं, आप?

यह अपनी सत्ताओं को संरक्षित रखने का कुप्रयास है। एक वर्ग विभाजित समाज में सत्ताएं किसी तरह के प्रतिरोध को बर्दास्त नहीं कर पाती है। उनको किसी तरह की चुनौती पसंद नहीं। वे हमेशा अपना एकाधिकार चाहती हैं। शासक वर्ग कभी नहीं चाहता है कि शासित वर्ग किसी रूप में भी सर उठाये। उसकी बराबरी में खड़ा हो। वह समाज में लगातार विभाजन को बनाये रखना चाहता है ताकि उसका वर्चस्व बना रहे और वह ऐशो आराम की जिंदगी जी सके। इसलिए दलितों और पिछड़ों पर हमलों का इतिहास बहुत पुराना है। उनको कमजोर बनाये रखने और भयग्रस्त करने के लिए शारीरिक और मानसिक हमले हमेशा से होते रहे हैं और जब तक वर्ग विभाजित समाज रहेगा, इनका खत्म होना संभव भी नहीं दिखाई देता है। सत्ता में जितनी अधिक सामन्ती और पूंजीवादी ताकतें हावी होंगी, उतना अधिक यह दमन तेज होगा। इन ताकतों द्वारा कमजोर वर्गों पर अपना प्रभुत्व बनाए रखने के लिए शारीरिक बल और मानसिक गुलाम बनाने के तरीकों का इस्तेमाल किया जाता है। हमेशा कोशिश रहती है कि शासित वर्ग की चेतना को कुंद कर दिया जाय। उसे धर्म, जाति, लिंग, रंग, क्षेत्र आदि की संकीर्णताओं में जकड़ दिया जाय। इसके लिए पूरा शिक्षाशास्त्र तैयार किया जाता है। लेकिन बुद्धिजीवी इस सबके खिलाफ चेतना के प्रसार का काम करते हैं, शासक वर्ग के कुचक्रों को उघाड़ते हैं, जनता को उनकी काली करतूतों से सचेत करते हैं। इस तरह प्रतिरोध को संगठित और धारदार करने का काम करते हैं। ऐसे में भला सत्ताएं उन्हें कैसे सहन कर सकती हैं? उनकी पहली कोशिश होती है कि वे बुद्धिजीवियों को लालच देकर अपने साथ मिला लें, न मानें तो उन्हें किसी भी तरह बदनाम किया जाय। उनकी छवि को संदिग्ध कर दिया जाय। इसके बावजूद न मानें तो उनको किसी तरह से कानूनी पचड़े में फांस लिया जाय या फिर उनका काम तमाम कर दिया जाय। दाभोलकर, पानसारे, कुलबुर्गी आदि इसके ताजे उदहारण हैं।

उभरते साहित्यकारों और कवियों के लिए उनके लेखन के विकास और भविष्य के लिए भी कुछ कहना तो बनता ही है?

अभी ऐसी न उम्र हुई और न अनुभव। मैं तो अभी खुद समाज और साहित्य को समझने की कोशिश में लगा हूँ। अपने भीतर के इंसान को बचाने की जद्दोजहद कर रहा हूँ। आज के दौर में कितना कठिन है- अपनी संवेदनशीलता को बचाए रखना। बस उसी दिशा में संघर्षरत हूँ। संवेदनशीलता को खत्म करने के लिए चारों ओर से सुनियोजित हमले हो रहे हैं। एक इंसान का इंसान बने रहना कठिन हो गया है। उसके ऊपर शारीरिक और मानसिक हमले किए जा रहे हैं। उससे कहा जा रहा है कि तुम कुछ भी बन जाओ, लेकिन तुम्हारा इंसान बने रहना हमें मंजूर नहीं है। सांप बन जाओ, केंचुए बन जाओ, सियार बन जाओ, गिद्द या चील बन जाओ, मकड़ी या जोंक बन जाओ, सब चलेगा लेकिन अपनी रीढ़ पर सीधा खड़ा इंसान उन्हें पसंद नहीं।

 

राजधर्म के रास्ते पर भटक तो नहीं गये मोदी-योगी ?

धर्म दीर्घकालीन राजनीति है और राजनीति अल्पकालीन धर्म । यूं तो ये कथन लोहिया का है । पर मौजूदा सियासत जिस राजधर्म पर चल पड़ी है, उसमें कह सकते है कि बीते 25 बरस की राजनीति में राम मंदिर का निर्माण ना होना धर्म की दीर्घकालीन राजनीति है । या फिर मंदिर मंदिर सीएम पीएम ही नहीं अब तो राहुल गांधी भी मस्तक पर लाल टिका लगाकर चुनाव प्रचार कर रहे हैं तो राजनीति अल्पकालीन धर्म है । या फिर पहली बार भारतीय राजनीति हिन्दुत्व के चोगे तले सत्ता पाने या बनाये रखने के ऐसे दौर में पहुंच चुकी है, जहां सिर्फ मंदिर है । यानी धर्म को बांटने की नहीं धर्म को सहेजकर साथ खड़ा होकर खुद को धार्मिक बताने की जरुरत ही हिन्दुत्व है । क्योंकि पहली बार राजधर्म गिरजाधर हो या गुरुद्वारा या फिर मस्जिद पर नहीं टिका है । यानी हिन्दु मुस्लिम के बीच लकीर खिंचने की जरुरत अब नहीं है । बल्कि हिन्दू संस्कृति से कौन कितने करीब से जुड़ा है राजनीति का अल्पकालीन धर्म इसे ही परिभाषित करने पर जा टिका है । इसलिये जिस गुजरात में अटल बिहारी वाजपेयी मोदी की सत्ता को राजधर्म का पाठ पढ़ा रहे थे । उसी गुजरात में राहुल गांधी को अब मंदिर मंदिर जाना पड़ रहा है । तो क्या हिन्दुत्व की गुजरात प्रयोगशाला राजनीतिक मिजाज इतना बदल चुका है कि मंदिर ही धर्म है । मंदिर ही सियासत ।

यानी नई राजनीतिक चुनावी लड़ाई हिन्दू वोट बैंक में साफ्ट-हार्ड हिन्दुत्व के आसरे सेंध लगाने की है । या फिर जाति-संप्रदाय की राजनीति पर लगाम लगती धर्म की राजनीति को नये सिरे से परिभाषित करने की कोशिश । क्योकि यूपी ने 1992 में राममंदिर के नाम पर जिस उबाल को देखा । और हिन्दु-मुस्लिम बंट गये । और 25 बरस बाद अयोध्या में ही जब बिना राम मंदिर निर्माण दीपावली मनी तो खटास कहीं थी । बल्कि समूचे पूर्वाचल में हर्षोउल्लास था । तो क्या हिन्दुत्व की राजनीतिक प्रयोगशाला में सियासत का ये नया घोल है जहा हिन्दु मुस्लिम के बीच लकीर खिंचने से आगे हिन्दुत्व की बडी लकीर खिंच कर सियासत को मंदिर की उस चौखट पर ले आया गया है जहा सुप्रीम कोर्ट का हिन्दुत्व को लेकर 1995 की थ्योरी फिट बैठती है पर 2017 की थ्योरी फिट नहीं बैठती। क्योंकि याद कीजिये सुप्रीम कोर्ट में जब हिन्दु धर्म और राजनीति में धर्म के प्रयोग को लेकर मामला पहुंचा तो दिसबर 1995 में जस्टिस वर्मा ने कहा , ' हिंदुत्व शब्द भारत यों की जीवन शैली की ओर इंगित करता है। इसे सिर्फ धर्म तक सीमित नहीं किया जा सकता। " और याद किजिये 22 बरस बाद जब एक बार पिर सुप्रीम कोर्ट में चुनाव प्रचार में धर्म के प्रयोग को लेकर मामला पहुंचा तो सात सदस्यीय संविधान पीठ ने 1995 की परिभाषा से इतर कहा , "धर्म इंसान और भगवान के बीच का निजी रिश्ता है और न सिर्फ सरकार को बल्कि सरकार बनाने की समूची प्रक्रिया को भी इससे अलग रखा जाना चाहिए। " तो सुप्रीम कोर्ट ने राजसत्ता के मद्देनजर धर्म की जो व्याख्या 1995 में की कमोवेश उससे इतर 22 बरस बाद 2017 में परिभाषित किया । पर 1995 के फैसले का असर अयोध्या में बीजेपी दिखा नहीं सकी । और जनवरी 2017 के पैसले के खिलाफ पहले यूपी में तो अब गुजरात के चुनावी प्रचार में हर नजारा उभर रहा है ।

और संयोग ऐसा है कि गुरात हो या अयोध्या । दोनो जगहो पर राजधर्म का मिजाज बीते डेढ से ढाई दशक के
दौर में बदल गया । ये सवाल वाकई बडा है कि 2002 के गुजरात दंगों के बाद सोनिया गांधी ने द्वारका या सोमनाथ में उसी तरह पूजा अर्चना क्यों नहीं की जैसी अब राहुल गांधी कर रहे है । 2002 के बाद पहली बार है कि काग्रेस नेता मंदिर मंदिर जा रहे हैं। और 1992 के बाद से अयोध्या में बीजेपी के किसी नेता ने दीपावली मनाने की क्यो नहीं सोची जैसे अब यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ ने दीपावली मनायी जबकि बीजेपी के कल्याण सिंह , रामप्रकाश गुप्ता और राजनाथ सिंह सीएम रहे । और कल्याण सिंह ने तो 1992 में बतौर सीएम धर्म की राजनीति की नींव रखी । तो तब कल्याण सिंह के मिजाज और अब योगी आदित्यनाथ के राजनीतिक मिजाज । अंतर खासा आ गया है । लेकिन मुश्किल ये नहीं कि राजनीति बदल रही है । मुश्किल ये है कि -कल्याण सिंह हार्ड हिन्दुत्व के प्रतीक रहे । योगी आदित्यनाथ हिन्दुत्व का टोकनइज्म यानी प्रतिकात्मक हिन्दुत्व कर रहे है । और समझना ये भी होगा कि पीएम बनने के साढे तीन बरस बाद भी पीएम मोदी अयोध्या नहीं गये । पर सीएम बनने के छह महीने पुरे होते होते योगी अयोध्या में दीपावली मना आये । यानी एक तरफ राहुल गांधी भी मंदिर मंदिर घूम कर साफ्ट हिन्दुत्व को दिखा रहे हैं। और दूसरी तरफ केदारनाथ जाकर पीएम मोदी तो अयोध्या में योगी हिन्दुत्व का टोकनइज्म कर रहे है । तो कौन सी राजनीति किसके लिये फायदेमंद या घाटे का सौदा समझना ये भी जरुरी है । क्योकि जनता सत्ता से परिणाम चाहती है। और गुजरात से लेकर 2019 तक के आम चुनाव के दौर में अगर कांग्रेस या कहे राहुल गांधी भी टोकनइज्म के हिन्दुत्व को पकड चुके है । तो मुश्किल बीजेपी के सामने कितनी गहरी होगी ये इससे भी समझा जा सकता है कि योगी का हिन्दुत्व और मोदी का विकास ही आपस में टकरायेगा । क्योंकि संयोग से दोनों का रास्ता टोकनइज्म का है । और गुजरात में बीजेपी के सामने उलझन यही है कि गुजरात माडल का टोकनइज्म टूट रहा है । औोर हिन्दुत्व के टोकनइज्म की सत्ता अभी बरकरार है ।
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लेखक विषय संवाद साभार अनुवादक

पहले वो आए साम्यवादियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं साम्यवादी नहीं था

 

फिर वो आए मजदूर संघियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं मजदूर संघी नहीं था

 

फिर वो यहूदियों के लिए आए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं यहूदी नहीं था

 

फिर वो आए मेरे लिए

और तब तक बोलने के लिए कोई बचा ही नहीं था

 

मार्टिन नीमोलर (1892-1984)