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जो उठना है, वह किस गटर में गिरना है

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सतह से उठते सवाल : 'सतह से उठता आदमी' में से निकलते कुछ सवाल-('नया पथ' के ताज़ा अंक में प्रकाशित लेख)
कहा जा सकता है कि 'सतह से उठता आदमी' मूलत: एक अस्तित्ववादी रचना है। गौरतलब बात यह है कि जब यह कहानी लिखी गई तब विश्व साहित्य में अस्तित्ववादी चिंतन अपने शिखर पर था। पर अस्तित्ववाद आखिर है क्या? अस्तित्ववाद पर आलोचकों की कई तरह की राय रही है। अक्सर अस्तित्ववाद का उल्लेख आलोचना की गंभीरता मात्र जताने के लिए होता है; सचमुच आलोचक क्या कहना चाहता है या साफ नहीं होता। अस्तित्ववाद जीवन में किसी बृहत्तर मकसद को ढूँढने से हमें रोकता है। पर 'सतह से उठता आदमी' कहानी हमें अपने अस्तित्व का एक बड़ा मकसद ढूँढने को कहती है, बशर्ते हमारी संवेदनाएं बिल्कुल कुंद न हो गई हों, जिसका खतरा आज व्यापक है। हमारी कोशिश यहाँ गंभीर आलोचना की नहीं, महज एक खुले दिमाग से पुनर्पाठ की है।
'सतह से उठता आदमी' में तीन मुख्य चरित्र हैं - कन्हैया लेखक का प्रतिरूप है या कथावाचक की भूमिका में है, कृष्णस्वरूप उसका मित्र है, जो कभी ग़रीब होता था और अब अच्छी नौकरी मिल जाने से आर्थिक रूप से बेहतर स्थिति में है, और रामनारायण, जिसे कृष्णस्वरूप जीनियस मानता है, जो कभी धनी घर का बिगड़ा लड़का था और अब बौद्धिक उलझनों में खोया हुआ शख्स है। चरित्रों को भरपूर उभारा गया है, जैसा अमूमन उपन्यास लेखन में होता है, पर यह एक कहानी है, उपन्यास नहीं। पर चरित्रों के उभार पर ध्यान देना ज़रूरी है, नहीं तो सतह से उठने की सतही समझ भर रह जा सकती है।
कौन है जो सतह से उठता है? क्या वह कन्हैया है, या कृष्णस्वरूप या रामनारायण? किस सतह से कोई उठता है? कहाँ पर, कहाँ तक उठता है? कहानी के आखिर में कन्हैया अकेले में गटर में थूकता है। क्या यह सतह से उठने की स्थिति है? हम किसी एक समझ को प्रतिष्ठित न कर अलग-अलग संभावनाओं को सामने आने दें तो बेहतर होगा।
कन्हैया और कृष्णस्वरूप पुराने दोस्त हैं। दोनों के बचपन और किशोर उम्र मुफलिसी में ग़रीबी में बीते हैं। सालों बाद कन्हैया कृष्णस्वरूप से मिलता है तो उस पता चलता है कि कृष्णस्वरूप संपन्न हो चुका है, पर संस्कारों से वह अभी भी आम ग़रीबों जैसा ही है। कृष्णस्वरूप के घर पर ही रामनारायण कन्हैया से इस तरह मिलता है, जैसे कि उनमें पुरानी पहचान हो, पर सचमुच वे पहले कभी मिले नहीं हैं। रामनारायण धनी माँ-बाप का लड़का है, जिनमें आपसी मेल नहीं है। रामनारायण बहुत पढ़ा-लिखा है और अपने पिता की तरह ही आड़ंबरों से बचता है, पर वह कुछ हद तक विक्षिप्त भी है। कृष्णस्वरूप की माली हालत में बदलाव में रामनारायण की माँ का हाथ है और लगता है इस वजह से रामनारायण कृष्णस्वरूप के साथ अपमानजनक ढंग से बातचीत करता है।
राजकमल से प्रकाशित नेमिचंद्र जैन द्वारा संपादित रचनावली के तीसरे खंड में यह कहानी संकलित है। इस संस्करण में अक्सर कुछ लफ्ज़ों को भारी टाइप शैली (bold) में रखा गया है। मसलन इस कहानी में 'भई वाह! उन दिनों कृष्णस्वरूप रोज गीतापढ़ता था' वाक्य में 'गीता' पर जोर है। क्या यह मुक्तिबोध का खुद का किया हुआ है, या संपादकीय निर्णय है - यह सवाल शोध का विषय है। 'उन दिनों' यानी वे जो मुफलिसी के दिन थे। जाहिर है कि 'उन दिनों' कहते हुए इसके बाइनरी विलोम 'इन दिनों' की ओर भी संकेत रहता है - इन दिनों क्या वह गीता पढ़ता है? इस पर कहानी में कोई तथ्य उजागर नहीं होता, पर हो सकता है कि इन दिनों वह गीता नहीं पढ़ता। गीता का पढ़ा जाना या न पढ़ा जाना क्या बतलाता है? भारतीय मानस में खास कर जिन्हें अब हिन्दू कहा जाता है, गीता को सर्वश्रेष्ठ ग्रंथ मानना आम बात है, वैसे ही जैेसे और समुदायों में बाइबिल, कुरान, गुरु ग्रंथ साहब आदि को सर्वश्रेष्ठ ग्रंथ मान लिया जाता है। गीता में सांख्य और योग के महत्वपूर्ण तत्व हैं और इनका इस्तेमाल कृष्ण द्वारा अर्जुन को जंग लड़ने के लिए तैयार करने के लिए किया गया है। एक स्वच्छंदतावादी (ऐनार्किस्ट) नास्तिक गीता को कैसे देखेगा? इसके मद्देनज़र और यह ध्यान में रखते हुए कि अक्सर मुक्तिबोध को मार्क्सवाद के दायरे में रखकर देखा गया है, यह बात गौरतलब है कि गीता लफ्ज़ बोल्ड फोंट में है। इससे मुक्तिबोध का कैसा पाठ बनता है? अगर यह संपादकीय हस्तक्षेप है, तो क्या किसी विशेष पाठ को सामने लाने की, उभारने की कोशिश है?
कहानी पढ़ कर यह भी लगता है मुक्तिबोध हमें नैतिकता बोध की ओर ले जा रहे हैं, पर क्या सचमुच ऐसा है? क्या कृष्णस्वरूप में नैतिकता बोध खत्म हो गया है कि वह अपने आदर्शों को छोड़कर अचानक मिल रही सुविधाओं को एक के बाद एक ग्रहण करता गया है? वह कृष्णस्वरूप जो 'कहा करता था, “चाहिए, चाहिए, चाहिए" ने सभ्यता को विकृत कर डाला है, मनुष्य-संबंध विकृत कर दिए हैं। तृष्णा बुरी चीज़ है। हमारा जीवन कुरुक्षेत्र है। वह धर्मक्षेत्र है। हर एक को योद्धा होना चाहिए। आसक्ति बुरी चीज़ है', वही आज 'खुशहाल तो है ही, खुशहाली से कुछ ज्यादा है। उसकी चाल-ढाल बदल गई है। वह मोटा हो गया है। पेट निकल आया है। ढाई सौ रुपए का सूट पहनता है।' इस नैतिकता बोध में नया कुछ नहीं है। आज के घोर पूँजीवादी, नवउदारवादी युग में तो इसे ओल्ड-फैशन्ड ही कहा जाएगा। जो खुशहाल है या खुशहाली से कुछ ज्यादा है, उसे लेकर परेशानी क्यों। दुनिया जाए भाड़ में, समाज में दलित, पिछड़े, ग़रीब हों तो हों, पैसे कमाओ, जै सिरीराम बोलो, ऐश करो, दारु-शारु पिओ और खर्राटे मारते हुए सोओ। कृष्णस्वरूप ही तो आज का नॉर्मल है, समाज के लिए परेशानी का सबब तो रामनारायण है, भले ही जिसकी 'बात में मजा आता है,’ जिसका 'भाषा पर प्रचंड अधिकार है।‘ फिर भी अगर ऐसा है कि कहानी के केंद्र में नैतिकता का सवाल है तो यह महज अस्तित्ववादी रचना नहीं है।
कृष्णस्वरूप के किरदार का एक मजेदार पक्ष यह है कि 'उन दिनों' उसके सपने में शंकराचार्य, महात्मा गाँधी और जवाहरलाल भी आते थे। ऐसा वह कहता था। कहानी में हमें पता चलता है कि कृष्णस्वरूप सचमुच कन्हैया को प्रभावित करता था। लेकिन किस ढंग से?
इसके बाद का कथन है कि 'उसको' फ़िलॉसफ़ी की ज़रूरत थी, इसलिए कि 'उसका जीवन दुर्दशाग्रस्त था।' किसको? कृष्णस्वरूप को ही शायद, क्योंकि जीवन तो उसका दुर्दशाग्रस्त था। कन्हैया के बारे में भी हम बाद में जान पाते हैं कि उसका जीवन भी कृष्णस्वरूप जैसा ही रहा होगा। तो फ़िलॉसफ़ी की ज़रूरत कन्हैया को भी थी। कन्हैया कथावाचक की भूमिका में है, या कथावाचक हमें कहानी की दुनिया को कन्हैया की नज़रों से दिखलाना चाहता है। तो क्या मुक्तिबोध अपनी उलझनों को ही हमारे सामने रख रहे हैं? मुक्तिबोध उलझे हुए तो थे ही, यह एक बात उनके बारे में साफ कही जा सकती है कि अपने वक्त के और दीगर रचनाकारों की तुलना में मुक्तिबोध में बौद्धिक सवालों को लेकर जद्दोजहद कहीं ज्यादा सघन थी।
मुक्तिबोध जिस वक्त और जिन परिस्थितियों में रहकर साहित्य-लेखन कर रहे थे, उनको जीते हुए वे उन्नीसवीं सदी के अंत या बीसवीं सदी के शुरुआत तक की यूरोपी आधुनिकता के प्रभाव से अछूते नहीं रह सकते थे। उनके पास 'फ़िलॉसफ़ी ऑफ द ऐबसर्ड' की जगह नहीं थी। या जगह बहुत थी तो वह शंकराचार्य, महात्मा गाँधी और जवाहरलाल से अलग मार्क्स को जगह दे सकती होगी, पर आधुनिक भारत का जो अति-यथार्थ उनके सामने खुलता जा रहा था, उसके लिए सही फ़िलॉसफ़ी क्या हो सकती है, यह सवाल उन्हें तड़पाता होगा। मसलन कहानी में हम देखते हैं कि रामनारायण देखने में भयानक है। उसमें से 'अज्ञात, अप्राकृतिक विचित्रता' का भय जन्म लेता है। जाहिर है कि इस किरदार को भयानक शक्ल देते हुए कथाकार हमसे मुखातिब है। हम अपनी उस भयानक या विक्षिप्त शक्ल को देखने को मजबूर हो जाते हैं, जो न्याय पर अन्याय की जीत सह नहीं पाता, जो तड़पता रहता है।
‘कन्हैया ग़रीबी को, उसकी विद्रूपता को, और उसकी पशु-तुल्य नग्नता को जानता है। साथ ही उसके धर्म और दर्शन को भी जानता है। गाँधीवादी दर्शन ग़रीबों के लिए बड़े काम का है। वैराग्य भाव, अनासक्ति और कर्मयोग सचमुच एक लौह-कवच है, जिसको धारण करके मनुष्य आधा नंगापन और आधा भूखापन सह सकता है। ... उसके आधार पर आत्मगौरव, आत्मनियंत्रण और आत्मदृढ़ता का वरदान पा सकता है।' - यह कौन चीख रहा है? आगे और है - ‘ग़रीबी एक अनुभावत्मक जीवन है। कठोर से कठोर यथार्थ चारों तरफ़ से घेरे हुए है, एक विराट नकार, एक विराट शून्य-सा छाया हुआ है। लेकिन, इस शून्य के जबड़ों में मांसाशी दाँत और रक्तपायी जीभ हैं।' तो क्या गीता, गाँधीवादी दर्शन, शंकराचार्य और जवाहरलाल उन्हें उसी कठोर यथार्थ में दिखते हैं? अव्वल तो कहानी में कहानी होना पहली शर्त है, दर्शन हो तो बढ़िया, न हो तो भी ठीक। अगर बौद्धिकता में जाना ही है तो हजार साल पहले के पुनरुत्थानवादी वेदांती और अपने समय में पश्चिम के शांतिवादियों से प्रभावित घोषित राष्ट्रपिता और इतिहास में रुचि रखते एक राष्ट्रनेता का नाम एक साथ क्यों? क्या यह महज उलझन है, या बयान है? इस रचना के दो ही दशकों बाद कुछ मार्क्सवादी चिंतकों ने गीता में मुक्तिकामी सोच प्रतिष्ठित करने की कोशिश की थी। भारतीय वाम चिंतन में ऐसी उलझनों की भरमार है।
क्या मुक्तिबोध के लिए जीवन का कोई तार्किक आधार था? क्या जीवन का कोई मकसद है - क्या वह मकसद अपने वक्त के दक्षिण एशिया में महानायक रह चुके शंकर, गाँधी और नेहरू जैसे नामों में है, या वह उस 'अनुभवात्मक जीवन' में ही कहीं है, जो ग़रीबी है? एक साहित्य-रचना के रूप में 'सतह से उठता आदमी' में सबसे बड़ी खूबी यह है कि इन सवालों को मुक्तिबोध खुला छोड़ देते हैं, जो कि उनके समकालीन ही नहीं, बाद के रचनाकारों में भी विरल है। कन्हैया को जीवन की सचाइयों का पता है, पर उसके साथ हम कृष्णस्वरूप और जीनियस रामनारायण के खेल को निर्लिप्त भाव से देखते हैं। खेल कहें या कि पुराने ढंग से भव-लीला कहें। यह जो नए पुराने के बीच का आवागमन है, इसमें मुक्तिबोध अद्वितीय हैं। कहानी में दुर्योधन की प्रसिद्ध उक्ति 'जानामि धर्मं न च मे प्रवृत्ति/ जानाम्यधर्मं न च मे निवृत्तिः/ केनापि देवेन हृदिस्थितेन/यथा नियुक्तोऽस्मि तथा करोमि' का इस्तेमाल किया गया है। कृष्णस्वरूप का दुर्योधन धर्म-अधर्म के सामान्य द्वंद्वों में से आराम से गुजरता है। जो भी सही-ग़लत है, वह सब विधि का विधान है, इस को मानने वाला हीनता से ग्रस्त ग़रीब कृष्णस्वरूप बाद में स्वेच्छा से खुद को बदलता है। हो सकता है कि तब भी वह 'यथा नियुक्तोऽस्मि तथा करोमि' मानता हो, या कि उसके लिए इसे मानते रहना मजबूरी है, क्योंकि ऐसा न हो तो वह भयानक दिखता रामनारायण जो उसके अंदर भी कहीं बैठा है, उसे जीने न देगा।
नैतिकता बोध के सवाल रुकते नहीं हैं। जो शानदार खूबसूरत है, क्या वह सचमुच शानदार और खूबसूरत है? रामनारायण के पिता जात-पात नहीं मानते, हरि का नाम लेते हैं तो उनकी शानदार खूबसूरत पत्नी उन्हें ताना देकर कहती है कि 'जाओ, उस रंडी के पास जाकर बैठो।' एक उदार पुरुष अपनी खूबसूरत, पर रुढ़िवादी पत्नी के साथ कैसे निभाए, अहंकारी माँ रामनारायण को उशृंखल बनने से कैसे रोके, ये अस्तित्व के सामान्य संकट है। पर इन सबके साथ कृष्णस्वरूप में आ रहे बदलाव, उसके अंदर का लोलुप, महत्वाकांक्षी इंसान जो सतह से ऊपर उठने को बेताब है, उसके संकट विकट हैं। अपने विपन्न अतीत से निकलकर सुविधाओं से लदते रह कर भी वह लाचार है कि वह भयानक दिखता रामनारायण उसे हेय नज़रों से देखे, उसे दुत्कारे और वह कुछ न कर पाए, सिर्फ इसके कि वह कहता रहे कि 'सचमुच जीनियस' है। 'उन दिनों' का उसका गीता पाठ, उसके सपने में आते महानायक, सभी इन दिनों बेअसर हैं।
हम इन सवालों का जवाब नहीं ढूँढेंगे, क्योंकि जवाब तो हमें मालूम हैं। कृष्णस्वरूप के अंदर कोई रोता, चिंघाड़ता होगा, यह हम जानते हैं क्योंकि हम सब अपनी-अपनी सतह से उठने की प्रक्रियाओं में फँसे हुए हैं। ये प्रक्रियाएँ हमारे निजी दायरों में चल रही हैं और ये हमारे बड़े सामाजिक दायरों में भी चल रही हैं। इस लिए यह कहानी सिर्फ आत्म-अन्वेषण नहीं है। हम चीख चिल्ला कर झूठ को सच कहने वालों के साथ खड़े हो जाते हैं, हत्यारों को जन-गण-मन अधिनायक बना देते हैं। हमारे अंदर कोई हमें रोकने की, सचेत करने की कोशिश करता है, तो हम उसे जीनियस कह कर अपने से दूर कर लेते हैं, उसकी झिड़कों को झेल लेते हैं। हम जानते रहे, देखते रहे कि देश की आधी जनता को और विपन्नता की ओर धकेला जा रहा है, और हममें इतना भी विवेक नहीं बचा रहा कि हम भयानक दिखते जीनियसों को पहचान कर वापस अपने अंदर कभी देख सकें।
अच्छी अस्तित्ववादी रचना में उदासीनता लाजिम है, हालाँकि अक्सर ऐसी रचनाएँ पढ़ने के बाद मुख्य बोध अवसाद का होता है। पर मुक्तिबोध का उदासीन कथावाचन दरअसल उदासीन है नहीं, और समझौतों के किस स्तर तक हम गिर सकते हैं, जो उठना है, वह किस गटर में गिरना है, कन्हैया इसे थूकता हुआ हमें दिखलाता है। मुक्तिबोध हमें कहानी में सीधे नहीं कहते कि हम नैतिक सवालों पर गौर करें, पर पूरी कहानी इसी संकट पर केंद्रित है। कन्हैया की कहानी हमारी कहानी है। यह बस दुनिया को देखना भर नहीं है, उसे और उस-में जीना है। हम कितना उठ रहे हैं और कितना गटर में गिर रहे हैं, यह केंद्रीय सवाल बन कर सामने आता है। इसलिए अस्तित्ववादी होते हुए भी यह कहानी बहुत कुछ और है।

बोले तो आस्मां में सूराख बनते चले हैं

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हर सुबह

सुबह-सुबह शोर। आस्मां नींद में डूबा होता है, उसे झकझोर कर, धकेल कर,  खड़ा किया जाता है। आस्मां उठ कर धरती को ढक लेता है और हम दिनभर सच देखने से बच जाते हैं।

पहले यह जिम्मेदारी मुर्गों की होती थी कि आस्मां को जगाने की कवायद में 
लोगों को तैयार करें। आजकल मोर आगे आने लगे हैं। वक्त ने सचमुच जमाना 
बदल दिया कि हमें सच से बचाने नए जानवर सामने आ गए।

मसलन एक और खुदकुशी। जो मरता है वह खबर बन जाता है। मीडिया चाहे 
न चाहे, लोग हवाओं के लिए कान चौड़े कर लेते हैं। खबर किधर से किधर 
बहती है, लोग सूँघकर जान लेते हैं। कोई आस्मां को देख मुतमइन हो जाता है 
कि वह हमें सच से बचा लेगा। कोई सच सच सच सच रटने लगता है। थक 
जाता है कोई और कोई सो जाता है।

क्या है कि दुष्यंत ने उछाल दिया था तबियत से पत्थर।

बोले तो आस्मां में सूराख बनते चले हैं। (बनास जन  : जुलाई-सितंबर 2017)

आन फ्रांक, आखिरी बार मर जाओ

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आन फ्रांक, तुम्हारी डायरी कब रुकेगी!

मैं सत्य-कथाएँ नहीं पढ़ता
कभी तो लिखना बंद करो


चारों ओर हँसते खेलते लोग
छंद-लय में नाचते-गाते लोग
खलनायक बन जाते हैं
अब और नहीं सहा जाता
लिखना बंद करो
आखिरी बार मर जाओ
भूल जाएँ हम तुम्हें
याद रखें कि कोई था जिसे हम भूलना चाहते हैं


डरता हूँ कि तुम मेरी बेटी हो। 

                                        (बनास जन  : जुलाई-सितंबर 2017)

Anne Frank, when will you stop writing your journal!

I do not read true stories
Please stop writing

All around us, decent folks
Smiling and dancing in tune
Are turning into villains
I cannot take it any more

Stop writing 
Die forever now 
Let me forget you
Let me remember you as one we want to forget 

I fear that you are my daughter. 
 

स्वयंसेवक की चाय का तूफान तो मोदी-संघ दोनों को ले उड़ेगा...

राम मंदिर..राम मंदिर की रट लगाते लगाते उम्र पचास पार कर गयी,आंदोलन किया...सड़क पर संघर्ष  किया । देश भर के युवाओं को एकजुट किया । कार सेवा के लिये देश के कोने कोने से सिर्फ साधु संत ही नहीं निकले बल्कि युवा भी निकले...और आज जब चुनाव में विकास के बदले झटके में फिर राम मंदिर का जिक्र आ गया तो पहली बार लगा यही हिन्दुत्व भी ठगने की सियासत है । राम मंदिर सिर्फ सत्ता की दहलीज पर पड़ा एक पत्थर हो चला है । ऐसा क्या अचानक हुआ कि विकास का जो नारा गुजरात चुनाव में लगातार गूंज रहा था । झटके में वह 5 दिसबंर को गायब हो गया । और बहुत ही सलीके से राम मंदिर की इंट्री गुजरात चुनाव में हुई। आपको लगा होगा कि ये सुप्रीम कोर्ट में राम मंदिर के टाइटल केस को लेकर जो बहस हुई उसी के बाद गुजरात चुनाव में मंदिर-मस्जिद की इंट्री हुई ..पर मेरी मानिये सुप्रीम कोर्ट की तारीख भी 5 दिसबंर हो । 5 दिसबंर के अगले दिन 6 दिसबंर को देशभर में मंदिर की गूंज सुनाई दे.ये सब कुछ बहुत ही सिस्टेमिक तरीके से तय किया गया ।  तो क्या ये भी फिक्स था । हा हा ..आप चाय पीने आये हैं ....इसे पीजिये..खास गांव से मैंने मंगायी है । खूशबू से तो यही लग रहा है। .....वाकई शानदार है । हां इसमें दूध मिलाने की कोई जरुरत नहीं । जी..मैं बिना दूध वाली ही चाय यूं भी पीता हूं...पर ये तो बताईये कि क्या सुप्रीम कोर्ट में 5 को सुनवाई हो ये भी फिक्स था । देखिये ये तो लोअर कोर्ट में भी नहीं होता कि सबसे बड़ी सुनवाई की तैयारी ना हो और तैयारी के बाद सुनवाई 5 दिसंबर को होगी ये  कहने के बाद 5 दिसबंर को फिर अगली तैयारी की तारीख तय हो जाये ।...छोडिये इसे....पर आप कुछ क्यो नहीं बोलते । राम मंदिर का नाम आते ही आपका नाम तो हमारे जहन में आता ही है । ..ठीक कह रहे है आप ...मुझ पर भी  बहुत दबाव था मैं कुछ बोलू..मैं नहीं बोला । ना किसी को बोलने दिया । क्यों िआप खामोश क्यो रहे । जबकि आपकी पहचान तो राम मंदिर से जुड़ी हुई है । और आप बोलते तो सत्ता सरकार पर दवाब पडता। आपको लग सकता है कि दवाब पडता ।

सच तो यही है कि हम नहीं बोले तो राम मंदिर कहते हुये सत्ता की चौखट पर जा पहुंची नेताओ की चौखट पर फिर राम मंदिर आ जाता । यानी सिर्फ लाभ भुनाने की सियासत है ये । लाभ नहीं भावनात्मक तौर पर राजनीति साधने का मंत्र बना दिया गया राम मंदिर । और मैं तो इस हकीकत को समझ रहा हूं क्योंकि राम मंदिर के लिये ही समूचे देश के भ्रमण करने के दौरान देश के हालात को बेहद करीब से मैंने देखा है । देख रहा हूं ...तो क्या राम मंदिर की जरुरत अब देश के लोगो को नहीं है ? मैंने नहीं कहा ...मैं तो ये समझाना चाह  रहा हूं कि राम मंदिर सत्ता - सरकार -सियासत नहीं बनायेगी । राम मंदिर हमीं बनायेंगे । और हम भी तभी बना पायेंगे जब हिन्दुत्व के सवाल को  हम देश के मुद्दो से लोगो को जोड सके । यानी हिन्दुत्व ने क्या देश के मुद्दे को सामने आने नहीं दिया । हिन्दुत्व नहीं राम मंदिर को ही जिस तरह हिन्दुत्व का प्रतीक बना दिया गया । और इस दिशा में किसी ने सोचा ही नहीं कि इस प्रतीक को सियासत हड़प लेगी । तो हिन्दुत्व की परिकल्पना भी हवा हवाई हो जायेगी ।

हा हा हा..तो आप ये कह रहे है कि राम मंदिर शब्द को राजनीतिक सत्ता ने इस तरह परोसना शुरु किया कि हिन्दुत्व के असल मायने गायब हो जायें । मैं ये नहीं कह रहा है ..मेरा मानना है कि राम मंदिर के आसरे सत्ता ने अपनी कमजोरी ढंकना शुरु कर दिया । और हिन्दुत्व से जो जुडाव युवाओं का होना चाहिये .जो जुडाव किसानो का होना है वह तो हुआ ही नहीं ।  और ये गुजरात में नजर भी आ रहा है । कैसे....? देखिये गुजरात के युवा ने तो होश संभलाने के बाद से ही यहा उसीकी सत्ता देखी है जो राम मंदिर का जिक्र आते ही हिन्दु भावना को जाग्रत कर दें । पर इसी दौर में युवाओं की एस्पेरेशन उनकी सोच को किसी ने ना पूरा किया ...पूरा तो दूर ...समझा तक नहीं । तो क्या हार्दिक पटेल उसी एस्पेरेशन की उपज है । आप कह सकते हैं।  क्योंकि बेहतर जिन्दगी का मतलब ये तो कतई नहीं हो सकता है कि आपके पास खूब पैसा है तो आपका जीवन अच्छा होगा । पैसा नहीं है तो ना शिक्षा । ना स्वास्थ्य । ना रोजगार । फिर पॉलिटिक्स ही एकमात्र इंस्टीट्यूशन । आप और चाय लेंगे और साथ में कुछ मंगाऊ...ना ना साथ में कुछ और नहीं पर चाय जरुर मंगवाये ...इसकी खुशबू वाकई गर्म है । गर्म यानी ...ठंडे माहौल को भी गर्म कर देती है । खैर छोड़िये इसे आर ये बताईये कि आप ये तो ठीक कह रहे है कि राजनीतिक सत्ता ही सबकुछ हो चली है ....पर युवाओ का राजनीतिकरण भी इस दौर में तेजी से हुआ है । हो सकता है पर गुजरात का सच देखिये 20 लाख िसे ज्यादा बेरोजगार है । उनके भीतर के सवालों को कोई रिपरजेंट कर रहा है । कोई नहीं । इसी तरह किसानों की जो हालत है उनके हालात कैसे ठीक होंगे । इस
पर कहां किसी का ध्यान है । किसानो की जमीन सरकारी योजनाओं के तहत हथियाई भी गई । और फसल बर्बादी से लेकर कर्ज का जो बोझ किसानो पर है उसमें उसके पास युवाओ सरीखे एस्पेरेशन तो नहीं पर हर दिन जीने का संकट जरुर है। और किसान को आप  सिर्फ एक किसान भर ना मानिये । ये भी सोचिये कि उसके घर के बच्चे भी बडे हो रहे होंगे । वह भी स्कूल कालेज जाना चाहते होंगे । तो कौन सा हिन्दुत्व उनके लिये मायने रखेगा । हम तो उनके बीच जाते है और  उनकी मुश्किलो से जब खुद को जोडते है तो एक ही बात समझ में आती है कि युवाओं के एस्परेशन और किसानो की त्रासदी से खुद को कैसे जोडा जाये ।

तो क्या ये सरकार नहीं समझ पायी । सीधे कहे तो मोदी तो गुजरात में भी रहे और दिल्ली में भी पहुंच गये । तो जिन हालातो को आ परख रहे है ..समझ तो वह भी रहें होगें । फिर ये सवाल बीजेपी और संघ परिवार को क्या परेशान नहीं करते । अब बीजेपी या संघ परिवार के भीतर ये सवाल है या नहीं...ये तो सीधे वहीं बता पायेंगे ..लेकिन मेरी एक बात लिख लीजिये...संघ परिवार वक्त के साथ इरेलेवेंट हो जायेगेा । क्या कह रहे है आप । आप खुद संघ परिवार से ना सिर्फ जुडे है बल्कि आपकी तो पहचान भी संघ परिवार ही है । और देश का सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा कहिये या फिर संघ तो जिस राम मंदिर के आसरे  हिन्दुत्व को सुलगाता है आप उसके कर्णधार रहे है । आप जो कहे ..जो समझे...पर ये समझना होगा कि जबतक युवाओ और किसानो को वक्त की धारा के साथ नहीं जोडेगें तबतक कभी राम मंदिर तो कभी हिन्दुत्व तो कभी भारत पाकिसातन शब्द ही भारी पडेगें । और एक वक्त के बाद हम सभी इरेलेवेंट हो जायेंगे । तो ऐसे में तो आज की तारीख में नरेन्द्र मोदी शब्द ही सबसे रेलेंवेंट है । आप बीजेपी कहें या संघ परिवार या राम मंदिर ..मोदी शब्द के आगे कहां कोई टिकता है । ठीक कह रहे है आप मंहगाई, बेरोजगारी, किसान इसीलिये मायने नहीं रखते । क्योकि मोदी शब्द है । और ये भी समझ लिजिये कि इस बार गुजरात चुनाव को लेकर इतना हंगामा है फिर भी पहले चरण में दो फिसदी वोट पिछली बार की तुलना में कम पड़े । क्यों ? क्योंकि जो मोदी को वोट नहीं देना चाहते वह कांग्रेस को भी वोट देना नहीं चाहते थे । तो वोट डालने ही नहीं निकले । हिन्दुत्व फीका पड़ रहा है । तो ऐसे में आप जिस इक्नामी का सवाल उठा रहे हैं वही सवाल तो वामपंथी भी उठाते रहे है । पर उनके साथ को कोई खड़ा नहीं होता है । चुनाव दर चुनाव हार रहे हैं वामपंथी । देखिये कम्युनिस्टों का विचार सही है पर व्यवहार सही नहीं है । हिन्दुत्व को लेकर उनके भीतर अंतर्विरोध है । और भारतीय राजनीति का अनूठा सच तो यही है कि ज अंतर्विरोधो का लाभ उठा सके ..सत्ता उसी को मिल जायेगी । और मोदी फिलहाल सटीक है । और कम्युनिस्ट इसीलिये  सफल नहीं है । तो फिर आप अपने कन्ट्रडिक्शन को कैसे दूर करेंगे ? इसके लिये तरीके तो रिवोल्यूशन वाले ही अपनाने होंगे । यानी ? यानी जब राम मंदिर के लिये देश के लाखों-करोडों लोग सड़क पर उतर सकते है तो फिर जिन आर्थिक हालातो को लेकर देश में युवा मन सोच रहा है और किसान मुश्किल हालातो में जी रहे है उसे भी जोडना होगा । जेपी आंदोलन के वक्त तो हिन्दुत्व या राम मंदिर या धर्म का सवाल तो नहीं था । तब भी कितनी तादाद में लोग जुटे। और अन्ना आंदोलन के वक्त भी तो करप्शन का ही सवाल था । दिल्ली में लोग देशभर से पहुंच रहे थे कि नहीं । पाटिदारो का सवाल भी आरक्षण भर से नहीं है । आरक्षण पॉलिटिक्स का शार्ट-कट रास्ता है । युवा पाटिदार इसीलिये जुटे क्योकि वह मौजूदा हालात से नाराज है । नाराजगी समाधान नहीं होती । और समाधान सिर्फ नाराजगी से नहीं आती । हा हा ..जो समझे जो कहे ...मै कुछ कह नहीं रहा हूं पर ये तो समझ रहा हूं कि आपने जो संघर्ष राम मंदिर के लिये किया .उस संघर्ष को नये तरीके से रास्ता दिखाने की जरुरत क्या नहीं आन पडी है । और गुजरात चुनाव के परिणाम क्या कोई रास्ता दिखायेगें ?  मुझे तो भरोसा है गुजरात चुनाव के परिणाम से भी रास्ता निकलेगा । और  हिन्दुत्व की उस परिभाषा को भी आंदोलन से गढगें जिसपर बीजेपी-संघ परिवार तक चुप्पी मारे हुये है । रुकिये रुकिये ....आप कह रहे हैं बीजेपी गुजरात में हार रही है .... । अरे आप चाय पिजिये और 18 दिसंबर का इंतजार कीजिये । इंतजार तो हम कर ही रहे है । पर क्या वाकई बीजेपी हार रही है । हमें तो नहीं लगता ...दिल्ली की पत्रकारों की ये खासियत है । वह वे बात कहेंगे नहीं जो वह चाहते है । हा हा आप ही साफ कह दिजिये ....जो हालात है उसमें बीजेपी-संघ परिवार दोनों हार रही हैं । तो क्या हम माने गुजरात चुनाव परिणाम के बाद मुनादी होगी । हा हा हा....। तो पढ़ने वाले खुद समझ लें ये शख्स कौन है । क्योंकि इस शख्स के पास अभी उम्र भी है और हिन्दुत्व या राम मंदिर के मुद्दे पर मोदी और संघ परिवार से ज्यादा साख भी।




स्कूल, खिलौने और वह बच्चा : रजनी गोसाँई

लेखक मंच - Sat, 09/12/2017 - 20:13

बात उन दिनों की है, जब मैं एक प्रतिष्ठित प्ले स्कूल में नर्सरी की अध्यापिका थी। कक्षा में पांच वर्षीय एक नया बच्चा आया था। वह बहुत निम्नमध्यम वर्गीय परिवार से था। उसके पिता माली का काम करते थे। माँ घरों में काम करती थी।

स्कूल में उच्च मध्यमवर्गीय घरों के बच्चे पढ़ते थे तथा स्कूल की फीस भी बहुत ज्यादा थी। यह फीस उस नए बच्‍चे के परि‍वार के सामर्थ्य से बाहर थी। लिहाजा स्कूल संचालिका ने दाखिला देने से इन्‍कार कर दिया। लेकिन उनके बहुत आग्रह पर दयालुता दिखाते हुए स्कूल संचालिका ने बहुत मामूली फीस पर स्कूल में दाखिला दे दिया।

साथी अध्यापिकाओं ने उस बच्चे के स्कूल में दाखिले के प्रति अपना विरोध जताया। उन सबका मानना था कि इतने निम्न मध्यमवर्गीय परिवार से ताल्लुक रखने वाला बच्चा यदि स्कूल में प्रवेश पाता है, तो स्कूल की प्रतिष्ठा पर प्रभाव पड़ेगा। आखिर एक घंटे सभी अध्यापिकाओं के साथ विचार-विमर्श करने के बाद उस बच्चे को मेरी कक्षा में भेज दि‍या गया।

नयी चमचमाती यूनिफार्म, स्कूल बैग, किताब-कॉपी जब बच्चे को स्कूल से मिली, तो उसकी आँखें प्रसन्नता से चमक उठीं। आमतौर पर छोटे बच्चे शुरुआती दिनों में स्कूल आने पर रोते है, लेकिन वह बच्चा बहुत खुश था। नयी किताब, कॉपी, पेंसिल और इन सबसे बढ़कर स्कूल में खेलने के लिए रखे गए तरह-तरह के खिलौने- गुड्डे-गुड़िया, टेडीबेयर, ब्लॉक्स आदि को देखकर वह अपने को एक अलग दुनिया में पाता। उसके हावभाव उसकी इस प्रसन्नता को प्रकट करते। मेरी कक्षा में लकड़ी की गोल मेज थी। उसके चारों ओर लकड़ी की छोटी कुर्सियां लगाई गई थीं। सारे बच्चे इन्हीं कुर्सियों में बैठकर चित्रों में कलरिंग, विभिन्न फलों, सब्जियों के चित्रों की कटिंग, पेस्टिंग आदि कॉपियों में करते थे। वह बच्चा इन क्रियाकलापों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेता। मेरे हाथों में रंग-बिरंगे चित्रों की किताबें देखकर जोर से चिल्लाकर कहता, ‘‘मैम, अब हम कलरिंग करेंगे।’’

कुछ अध्यापिकाओं ने मुझे यह सुझाव भी दिया कि इस बच्चे को अन्य बच्चों से अलग बैठाया करो, क्योंकि इसकी भाषा, बोलचाल अन्य बच्चों की भाषा की तुलना में खड़ी बोली में है। उनका यह सुझाव मैंने सिरे से ख़ारिज कर दिया। वह बच्चा सभी बच्चों के साथ बैठता तथा सभी बच्चे मिलजुल कर खेलते।

उस बच्चे को स्कूल आते हुए कुछ ही दिन हुए थे। स्कूल की छुट्टी होने पर आया ने जब उसका बस्ता उठाया तो उसे वह बहुत भारी लगा। बस्ता खोलकर देखा तो उसके अंदर स्कूल के खिलौने रखे थे। उसने शोर मचा दि‍या कि‍ बच्चे ने खिलौने चोरी कर बस्ते में रख लिए हैं। स्कूल हेड ने बच्चे को डांटा। अन्य अध्यापिकाओं ने भी अपना मत रखा कि‍  निम्न वर्गीय बच्चों को स्कूल में रखोगे तो ऐसे ही होगा। दाखिला दिया ही क्यों? एक अध्यापिका बोल पड़ी, ‘‘देखा है- कभी कोई और बच्चा स्कूल की कोई चीज या खिलौना इस तरह बैग में छुपाकर घर ले गया हो? इसलिए पहले ही चेताया था कि‍ इस बच्चे को स्कूल में एडमिशन मत दो।”

बच्चे को स्कूल संचालिका के कमरे में ले जाया गया। स्कूल संचालिका ने बच्चे की माँ को फ़ोन कर स्कूल आने को कहा तथा बच्चे को अपने कमरे में बैठा दिया। मुझे यह सब अटपटा लग रहा था। मैंने स्कूल संचालिका से कहा कि‍ हमें बच्चे को स्कूल से नहीं निकालना चाहिए। एक बार उससे पूछना चाहिए। वह बच्चा मेरी ही कक्षा का था। इसलि‍ए मैं उसे अपने साथ कक्षा में ले आयी। बाकी बच्चे घर जा चुके थे। मैंने बच्चे को अपने पास बैठाया। वह सहमा हुआ था। मैंने बहुत प्यार से पूछा, ‘‘बेटा, आपने मैम से बि‍ना पूछे खिलौने क्यों लिए?” वह चुप रहा। दो-तीन बार पूछने पर उसने जवाब दिया, “मैम, मेरी छोटी बहन है। हमारे घर में एक भी खिलौना नहीं है। मैं उसे दिखाना चाहता था। मैं कल ये खिलौने वापस ले आता।’’ यह कहते हुए उसके आँखों में आंसू थे।

बीमार सरकारी इलाज और लूट पर टिका प्राइवेट इलाज ...शर्म क्यों नहीं आती ?

तो खबर अच्छी है। दिल्ली के शालीमार बाग के जिस मैक्स हॉस्पीटल ने जीवित नवजात शिशुओं को मरा बता दिया था, उसका लाइसेंस दिल्ली सरकार ने आज रद्द कर दिया। और दो दिन पहले हरियाणा सरकार ने गुरुग्राम के उस फोर्टिस हॉस्पीटल के खिलाफ एफआईआर दर्ज करा दी, जहां इलाज ना देकर लाखों की वसूली की  गई थी। और इंडियन मेडिकल एसोसियन ने बिना देर किये कह दिया कि ये तो गलत हो गया। क्योंकि गलती तो होती है और गलती होने पर लाइसेंस रद्द हो गया  तब तो देश के सभी सरकारी अस्पतालों को बंद करना पडेगा। यकीनन इंडियन मेडिकल एसोशियन ने सवाल तो जायज ही उठाया कि सरकारी अस्पतालों को सरकार  तब ठीक क्यों नहीं कर लेती। दो सवाल दो है। पहला, सरकार ने हेल्थ सर्विस से पल्ला क्यों झाड लिया है। दूसरा, भारत में हेल्थ सर्विस सबसे मुनाफे वाला धंधा कैसे बन गया। तो सरकार के नजरिये पर शर्म की जाये या फिर
जिन्दगी देने के नाम पर मुनाफा कमाने वाले निजी अस्पतालों पर शर्म की जाये। या मान लिया जाये कि जनता की चुनी हुई सरकारों ने ही जनता से पल्ला झाड़ कर पैसे वालों के हाथो में देश का भविष्य थमा दिया है। और उसमें हेल्थ  सर्विस अव्वल है। क्योकि देश में सरकारी हॉस्पीटल की तादाद 19817 है। वही प्राइवेट अस्पतालों की तादाद 80,671 है। यानी इलाज के लिये कैसे  समूचा देश ही प्राइवेट अस्पतालो पर टिका हुआ है। ये सिर्फ बड़े अस्पतालों की तादाद भर से ही नही समझा जा सकता बल्ति साढे छह लाख गांव वाले देश में  सरकारी प्राइमरी हेल्थ सेंटर और कम्युनिटी हेल्थ सेंटर की संख्या सिर्फ 29635 है। जबकि निजी हेल्थ सेंटरो की तादाद करीब दो लाख से ज्यादा है  । यानी जनता को इलाज चाहिये और सरकार इलाज देने की स्थिति में नहीं है। या कहें इलाज के लिये सरकार ने सबकुछ निजी हाथों में सौप दिया है।

क्योंकि सरकार देश के नागरिकों पर हेल्थ सेक्टर के लिये खर्च कितना करती है। ये भी देख कर शर्म ही आयेगी। क्योंकि सरकार प्रति महीने प्रति व्यक्ति पर 92 रुपये 33 पैसे खर्च करती है। और राज्यों में सबसे बेहतर स्थिति हिमाचल की है जहा प्रति नागरिक प्रति महीने 166 रुपये 66 पैसे प्रति व्यक्ति प्रति  महीने खर्च करता है। तो ये कल्पना के परे है कि देश में चुनी हुई सरकारें अपने नागरिकों के लिये कोई जिम्मेदारी लेने की स्थिति में भी है कि नहीं।  क्योंकि भारत सरकार के बजट से दुगने से ज्यादा तो प्राइवेट हेल्थ सेक्टर मुनाफा कमा लेता है। हालात है क्या ये इससे भी समझा जा सकता है कि 2009  में सरकारी का बजट था 16,543 करोड करोड और प्राइवेट हेल्थ केयर का बजट रहा 1,43,000 करोड रुपये। फिर 2015 में सरकारी बजट हुआ 33150 करोड तो प्रईवेट हेल्थ केयर का बजट हो गया 5,26,500 करोड़ । 2017 में सरकार का  बजट है 48,878 करोड तो प्राइवेट हेल्थ केयर बढ़कर हो गया 6,50,000 करोड़ रुपये। और जब सरकार को ही ये कहने में कोई शर्म नहीं आती कि देश में इलाज का ठेका तो पूरी तरह प्राइवेट अस्पतालों पर है और आंकड़े बताते हैं कि 70 फिसदी से ज्यादा हिन्दुस्तान इलाज के लिये प्राइवेट अस्पतालों पर टिका है। और ये सब किस तेजी से बडा है ये इससे भी समझा जा सकता है कि प्राइवेट  और सरकारी सेक्टर के तहत 17 बरस पहले यानी 2000 में हिस्सेदारी 50-50 फिसदी थी। और सन 2000 में हेल्थ पर सरकारी बजट 2474 करोड था। तो  प्राईवेट हेल्थ सेक्टर का बजट 50 हजार करोड का था। यानी आज जो देश के सरकारी हेल्थ सर्विस का बजट 48 हजार करोड का है 17 बरस पहले ही प्राइवेट क्षेत्र मुनाफे के लिये हैल्थ सर्विस में पैसा झोंक चुका था। तो ऐसे में  मौजूदा हालात को समझें। देश के 10 नामचीन हॉस्पीटल्स चेन का टर्नओवर करीब 50 हजार करोड़ के आसापस है। यानी देश के कुल स्वास्थ्य बजट से भी ज्यादा।  तो अगला सवाल यही है कि हेल्थ सर्विस को धंधा माना जाये या फेल हो चुकी सरकारो तले जनता की त्रासदी।

क्योंकि सरकार किस तरह के हेल्थ सर्विस को उपलब्ध कराती है। उसकी एक बानगी आईसीयू में पडे देश के किसी भी इलाके में किसी भी सरकारी अस्पतालो की देख लीजिये। कही अस्पताल में कुत्तों का झुंड तो कही स्टैचर तक नहीं। कही डॉक्टर के बदले प्यून ही टीका लगाते हुये। तो कही जमीन पर ही अस्पताल। कही पेड़ तले ही बच्चे को जनना। और सरकार की यही वह हेल्थ सेवा है जो हर उस शख्स को प्राइवेट अस्पतालों की तरफ ले जाती है,जिसकी जेब में जान बचाने के लिए थोड़ा भी पैसा है।और फिर शुरु होता है प्राइवेट अस्पतालों में मुनाफाखोरी का खेल क्योंकि फाइव स्टार सुविधाएं देते हुए अस्पताल सेवा भाव से कहीं आगे निकलकर लूट-खसोट  के खेल में शामिल हो चुके होते हैं,जहां डॉक्टरों को कारोबार का टारगेट दिया जाता है। छोटे अस्पतालों से मरीजों को खरीदा जाता है। यानी छोटे अस्पताल जो बडे अस्पातल के लिये रेफ्रर करते है वह भी मुनाफे का धंधा हो चुका है। फिर सस्ती दवाइयों को महंगे दाम में कई-कई बार बेचा जाता है। और जिन मरीजों का इंश्योरेंस है-उन्हें पूरा का पूरा सोखा जाता है। मुश्किल इतनी भर नहीं है कि जिीसकी जेब में पैसा है इलाज उसी के लिये है । मुश्किल तो ये भी है कि अब डाक्टरो को भी सरकारी सिस्टम पर भरोसा नहीं है। क्योंकि देश में 90 फिसदी डाक्टर प्राइवेट अस्पतालों में काम करते हैं।

इंडियन मेडिकल काउसिंल के मुताबिक देश में कुल 10,22,859 रजिस्टर्ड एलोपैथिक डाक्टर है । इनमें से सिर्फ 1,13,328 डाक्टर ही सरकारी अस्पतालों में हैं। तो फिर मरीजो को भी सरकारी अस्पतालो पर कितना भरोसा होगा। कौन भूल सकता है उड़ीसा के आदिवासी की उस तस्वीर को, जो कांधे पर पत्नी का शव लिये ही अस्पताल से निकल पड़ा। पर उस तस्वीर को याद कर विचलित होने से  पायदा नहीं क्योंकि सरकार के पास तो हेल्थ सर्विस के लिये अधन्नी भी नही। बीते 17 बरस में सरकारी हेल्थ बजट 2472 करोड से 48,878 करोड पहुंचा। इसी  दौर में प्राइवेट हेल्थ बजट 50 हजार करोड से साढ छह लाख करोड पहुंच गया ।यानी सरकारी सिस्टम बीमार कर दें और इलाज के लिये प्राईवेट अस्पताल  आपकी जेब के मुताबिक जिन्दा रखे। तो बिना शर्म के ये तो कहना ही पडेगा कि सरकार जिम्मेदारी मुक्त है और प्राईवेट हेल्थ सर्विस के लिये इलाज भी मुनाफा है और मौत भी मुनाफा है। क्योंकि दिल्ली के जिस मैक्स हास्पीटल का  लाइसेंस रद्द किया गया उस मैक्स ग्रुप का टर्न ओवर 17 हजार करोड पार कर चुका है। और सरकार के पास आम आदमी के सरकारी इलाज के लिये हर दिन का बजट सि 3 रुपये है।

धूल फांको, मगर : रोज मिलिगन

लेखक मंच - Wed, 06/12/2017 - 01:56

धूल ही फांकनी है तो ज़रूर फांको
मगर क्या इससे बेहतर नहीं कि
एक ख़ूबसूरत तस्वीर उकेरो या फिर कोई चिट्ठी लिखो,
लज़ीज़ खाना बनाओ या एक पौधा रोपो;
लालसाओं और ज़रूरतों के बीच फासले पर सोचो.

धूल ही फांकनी है तो ज़रूर फांको
मगर ज्यादा वक़्त नहीं है तुम्हारे पास
कितनी नदियां तैरनी हैं, और कितने पहाड़ चढ़ने हैं;
संगीत में डूबना है और किताबों में खो जाना है;
दोस्तियां निभानी हैं और जीना भी है भरपूर.

धूल ही फांकनी है तो ज़रूर फांको
लेकिन बाहर धरती इंतज़ार कर रही है
सूरज तुम्हारी आँखों में उतरना चाहता है
और हवा तुम्हारे बालों से खेलना चाहती है
बर्फ के फाहों की झुरझुरी और बारिश की फुहारें
तुम्हारे कानों में फुसफुसाना चाहते हैं,
यह दिन फिर लौटकर नहीं आएगा.

धूल ही फांकनी है तो ज़रूर फांको
मगर एक दिन बेमुरव्वत बुढ़ापा घेर लेगा
और जब तुम विदा होगे (वो तो ज़रूर होगे)
तुम खुद धूल के बड़े ढेर में बदल जाओगे. 

(अनुवाद: आशुतोष उपाध्याय)

दो बाल कवि‍ताएं : कंचन पाठक

लेखक मंच - Sun, 03/12/2017 - 13:20

कंचन पाठक

कानून, प्राणिविज्ञान और हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत से स्नातकोत्तर कंचन पाठक की रचनाएं सभी प्रमुख पत्र-पत्रि‍काओं में प्रकाशि‍त हो चुकी हैं।

प्‍यारा भोलाभाला बचपन

उम्र यही है जब हम सबको
देखरेख और प्यार चाहिए,
निश्छल निर्मल भोले मन को
सबका स्नेह दुलार चाहिए,
दुनिया की विकृति से अछूता
प्यारा भोला-भाला बचपन।
निपट अबोध पुष्प सा पावन
होता बड़ा निराला बचपन।।
बचपन तो कच्ची मिट्टी है
हर साँचे में ढल सकता है
तपकर जब कुंदन होगा तब
काँटों पर भी चल सकता है
शुभ मंगलमय संस्कार भी,
इन्हें चाहिए नेह प्यार भी
कल उन्नति पथ पर गतिमय हो
ऐसे दर्शन सद्विचार भी
मिल जाए यह सब तब बन जाए
अमृतमधु प्याला बचपन।
निपट अबोध पुष्प-सा पावन
होता बड़ा निराला बचपन।।

नन्हें नव-पादप को जैसे
उचित खाद-पानी मिल जाए,
बने सुपुष्ट तरु तब उस पर
कितने विहग ठिकाने पाए,
पर्ण सघन छाया में रुक कर
कितने पथिक सुकूँ हैं पाते,
फल फूलों से लदकर तरुवर
पर उपकार की कथा सुनाते,
कल का कीर्ति स्तंभ बनेगा
राष्ट्र भविष्य उजाला बचपन।
निपट अबोध पुष्प-सा पावन
होता बड़ा निराला बचपन।।

शुभ चैतन्‍य सि‍तारे बच्‍चे

बड़े खिलंदड़ बड़े साहसी होते हैं ये प्यारे बच्चे
छल बल से अनजान अपरिचित दुनियाभर के सारे बच्चे

नहीं कभी थकते ऊर्जा की बहती इनमें ऐसी धारा
घर संसार इन्हीं से रोशन, रोशन इनसे ही जग सारा
इनकी नन्हीं बदमाशी में होती कितनी मासूमी है
गीली मिट्टी का सा दिल है संस्कारों की नम भूमि है
हर बच्चे के अन्दर होती है कोई न कोई क्षमता
वैमनश्य से दूर रहें बस चाहें थोड़ी माँ की ममता
ख़ुशी-ख़ुशी हर बात मानते शुभ चैतन्य सितारे बच्चे
छल बल से अनजान अपरिचित दुनियाभर के सारे बच्चे।।

इनके मन में प्रश्न हजारों दिवा रैन चलते रहते हैं
एक साथ पलकों में सौ-सौ मधुर स्वप्न पलते रहते हैं
क्यों कोयल कु-कु करती है बुलबुल दिन भर किसे बुलाती
रात-रात भर चाँद की बूढी़ माई किसको लिखती पाती
अपनी उजली हँसी से भर देते मन में उजियारे बच्चे
छल बल से अनजान अपरिचित दुनियाभर के सारे बच्चे।।

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लेखक विषय संवाद साभार अनुवादक

पहले वो आए साम्यवादियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं साम्यवादी नहीं था

 

फिर वो आए मजदूर संघियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं मजदूर संघी नहीं था

 

फिर वो यहूदियों के लिए आए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं यहूदी नहीं था

 

फिर वो आए मेरे लिए

और तब तक बोलने के लिए कोई बचा ही नहीं था

 

मार्टिन नीमोलर (1892-1984)