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जो विशाल है वही विकास है

दखल की दुनिया - Sat, 12/08/2017 - 02:40
(मूलरूप से दैनिक जागरण में प्रकाशित)चन्द्रिकावहां दुनियाका दूसरा सबसेऊंचा बांध बनायाजा रहा है. दुनिया के सबसेऊंचे पहाड़ केबीच. नेपालऔर भारत कीअंतर्राष्ट्रीय सीमा परबनने वाला यहपहला बांध है. इसे पंचेश्वर बांध के नाम से जाना जाएगा. इसे एशिया कासबसे बड़ा बांधबताया जा रहाहै. पश्चिमी नेपालऔर उत्तराखंड केपिथौरागढ़ जिले मेंइसके जल भरावका विस्तार होगा. नेपाल और भारतकी सीमा कोविभाजित करती महाकाली नदीको जल स्रोतके तौर परलिया जाएगा. इसकेजल संग्रहण कीक्षमता टिहरी बांधसे भी तीनगुना ज़्यादा होगी. 315 मीटर ऊंचाई वालेइस बांध मेंतकरीबन 122 गांव डूब क्षेत्र सेप्रभावित होंगे. जिसमेतकरीबन 30 हजारपरिवार बसे हुएहैं. यहनेपाल और भारतका एक संयुक्त कार्यक्रम है. तकरीबन 50 हजारकरोड़ रूपए कीलागत से बननेवाले इस बांधसे 5000 मेगावॉट बिजलीके उत्पादन कीउम्मीद की जारही है. यह सबकुछ विशालहै. प्रचलनमें यही विकासहै. सबसेबड़े और सबसेपहले का तमगागौरवान्वित सा करताहै. हमारीमानसिकता बना दीगई है किविशाल ही विकासहै. इसगौरवान्वित होने मेंहम बड़े खतरेकी आशंकाओं कोभुला देते हैं. फिलहाल इस विशालयोजना को मंजूरीमिल गई है. इस महीने मेंडूबने वाले गांवोंके जन सुनवाईकी प्रक्रिया शुरूहोनी है. ऐसे बड़े विकासके लिए बड़ेविस्थापन और बड़ेबलिदान की जरूरतें होतीहैं. 

इन बड़ीपरियोजनाओं के खतरेभी बड़े हैं. हिमालय के बीचबसा यह इलाकाजहां परियोजना प्रस्तावित है. चौथे जोन वालेभूकम्प का क्षेत्र है. जबकि उत्तराखंड काअधिकांश इलाका संभावित आपदाओंसे ग्रसित है. यहां के लगभगपहाड़ अलग-अलगभूकंप जोन मेंबटें हैं. ऐसेमें इतनी ऊंचाईपर इतने बड़ेबांध को बनानाऔर भी ख़तरनाकहै. हिमालयअभी अपने बननेकी प्रक्रिया सेगुजर रहा हैऔर जब भीइसका लैंड सेटलमेंट होगाएक बड़ा भूकम्पआना तय है. लिहाजा हमे ऐसेकिसी भी तरहका इतना बड़ानिर्माण नहीं करनाचाहिए जो न सिर्फ आसपास कोप्रभावित करे बल्किअन्य राज्यों मेंभी तबाही काकारण बने. पिछलेदिनों उत्तराखंड मेंहुई केदारनाथ आपदासे भी यहसीख लेनी चाहिए. जिसमे कई हजारलोगों की जानेगई. भलेही इसे एकप्राकृतिक आपदा कहदिया गया. भले ही प्राकृतिक आपदा कह के लोगों को गुमराह किया गया. परन्तु ये मानव जनित आपदाएं ही रही हैं. उत्तराखंड कीगहरी नदियों मेंजलभराव की स्थितिकभी न बनतीअगर कम्पनियों केद्वारा जगह-जगहनदियों को रोकान जाता. इसरुकावट से पेड़और पत्थर केमलबे जलभराव काकारण बनते हैं और भारी बारिश से नदियां उफान पर आ जाती हैं. निश्चय ही जबपंचेश्वर झील जोकि सैकड़ों किमीमें पानी काभराव करेगी उसकाअसर आसपास केपहाड़ों पर पड़ेगा. जिसका आंकलन पहलेसे लगाया जानामुश्किल है. इसलिए बड़ी परियोजना केसाथ इसे एकबड़ी आपदा कीपूर्व पीठिका केरूप में भीदेखा जाना चाहिए. साथ ही यहपश्चिमी नेपाल औरपिथौरागढ़ की साझासंस्कृति का इलाकाहै. जहांलोग आपस मेंरिश्ते-नातेरखते हैं. इतनीबड़ी झील दोदेशों के बीचके इस रिश्तेको भी खत्मकर देगी. लोगोंको इस झीलके लिए अपनेगांव छोड़ने होंगेऔर विस्थापित होकरदूर बसना होगा. जब भी विस्थापन सेप्रभावित लोगों औरगांवों का आंकलनकिया जाता हैउसे बहुत हीसीमित दायरे मेंदेखा जाता है. जो विस्थापित किएजाते हैं उन्हेंही प्रभावित भीमाना जाता है. जबकि आसपास केजो लोग विस्थापित नहींहोते प्रभावित वेभी होते हैं. उनके रिश्ते प्रभावित होतेहैं. उनकीसदियों से चलीआ रही रोजमर्रा कीज़िंदगी से वेलोग और उनकेपड़ोसी गांव अचानकग़ायब हो जातेहैं. इसतरह के सांस्कृतिक, आर्थिक और सामाजिक प्रभावका कोई भीआंकड़ा किसी दस्तावेज मेंशामिल नहीं कियाजाता. 
दैनिक जागरण 
इसबांध का प्रस्ताव 1981 में ही होगया था. बाद में इससेडूबने वाले गांवोंको चिन्हित करलिया गया औरअब उनके विस्थापन कीप्रक्रिया शुरू होनेवाली है. 11 अगस्त को गांवों कीपहली जन सुनवाईहोनी है. जन सुनवाई कोजिला मुख्यालय परआयोजित किया गयाहै. डूबवाले गांवों सेजिला मुख्यालय पचाससे सौ किमीकी दूरी परहैं और मौसमबारिश का है. पहाड़ के इनदूर गांवों मेंआवागमन की सुविधाएं बहुतकम हैं. साथही गांव केलोगों को ठीक-ठीक इसके बारेमें कुछ भीपता भी नहींहै. सरकारें अपनीमंसा से अपनेअनुसार काम करतीहैं. सबकुछतय हो जानेके बाद वेलोगों की रायलेना चाहती हैं. ऐसे में लोगोंको पता हीनहीं चल पाताकि उन्हें करनाक्या है औरजन सुनवाईयां पूरीकर दी जातीहैं. अबउनके पास सिर्फआदेश होते हैंकि उन्हें अपनेगांव कब तकछोड़ देने हैं औरउन्हें कहां बसनाहै. इसकाज़िक्र नहीं होताकि उन्हें किनसेबिछड़ना है औरउनका क्या-क्याउजड़ना है.
पिथौरागढ़ एक पिछड़ाइलाका है. जहां लोगों कोविस्थापन के नियमकानून नहीं पता. पिछड़े इलाके होनेके फायदे सरकारों कोइसी आधार परमिलते हैं किये इलाके प्राकृतिक संपदाओं सेभरपूर होते हैं. पिछड़े इलाकों कापिछड़ापन सरकारी होताहै. वर्षोंसे लोगों कोराज्य मूलभूत सुविधाओं सेइतना वंचित करदेता है किवे पीड़ित महसूसकरने लगते हैं. उनके पास अपारसंपदाएं होती हैंपर वे सबसेगरीब होते हैं. ऐसे में वेकुछ भी करनेको तैयार होतेहैं. विकासके नाम परबांध का आनाकई बार उनकेलिए खुशी कीख़बर जैसा होताहै. उन्हेंविस्थापन के दंसका आंकलन नहींहोता. वेसरकारी वंचना सेइतने पीड़ित होतेहैं कि कहींभी चले जानाचाहते हैं. ऐसीस्थिति में सरकारों केलिए जन सुनवाईऔर विस्थापन एकआसान प्रक्रिया बनजाती है. सरकारें उन्हें नौकरीका लालच देतीहैं और जोजमीनों के स्वामीहोते हैं उनकेपूरे परिवार में सेकोई एक परियोजना मेंनौकर बन जाताहै. जाहिरहै कि उनपिछड़े इलाकों मेंशिक्षा का वहस्तर नहीं होताकि उन्हें कोईबेहतर ओहदा मिलसके. वेफोर्थ ग्रेड केकर्मचारी बन जातेहैं. जहांभी इस तरहकी परियोजनाएं बनीहैं विस्थापितों कायही हश्र रहाहै. यदिपंचेश्वर बांध बनायाजाएगा तो वहां के लोगोंका भी यहीहोना है. जबकि जो उन्हेंखोना है उसगणित का जोड़-घटाव किसी किताबमें कभी नहींहोना है.

विकास यही है, कुछ को उजाड़ देना और कुछ को उजाला देना

दखल की दुनिया - Fri, 11/08/2017 - 01:30
(महाकाली नदी पर बनने वाले एशिया के सबसे बड़े पंचेश्वर बांध पर एक रिपोर्ट)
(द वायर हिन्दी में प्रकाशित
)चन्द्रिका
नदियों के बहनेके किस्से कईसदियों के हैं. जब से नदियांहैं तब से. जब नदी नहींहोगी तब भीनदी को बहनेसे ही नदी को यादकिया जाएगा. उनकाबहना ही उनकानदी होना है. उन्हें बांध देनेके किस्से बसकुछ ही बरसपुराने हैं. नेहरूने इसी बंधीहुई नदी कोआधुनिक मंदिर कहाथा. क्योंकि प्रधानमंत्री नेकहा था इसलिएअब बांध हमारेमंदिर हैं. अबजबकि प्रधानमंत्री के कहेहुए को न मानना देशद्रोह होनेलगा है. पहले प्रधानमंत्री के कहेहुए को न मानना और भीपुराना देशद्रोह होनाचाहिए. हमजो आधुनिक सुविधाओं केसाथ जीते हैंउनके उजाले यहीं, इन्हीं आधुनिक मंदिरों सेआते हैं. हमारेसुख सुविधाओं केसाथ जीने केलिए कई गांवोंको जाना पड़ताहै. अपनीवर्षों की जमीनको छोड़कर उन्हेंकहीं और बसनापड़ता है. अपने घरों सेउन्हें उजड़ना पड़ताहै. फिलवक्त हमजिस बल्ब कीरोशनी में पढ़रहे होते हैं. किसी रास्ते परआगे बढ़ रहेहोते हैं. एकनदी वहीं रुकरही होती है. कई गांव उसमेडूब रहे होतेहैं. यहीं, कई लोग अपनेगांव और घरडूबने की फिक्रमें डूब रहेहोते हैं. उन्हेंविस्थापित कर दियाजाता है. उन्हें कहीं औरस्थापित कर दियाजाता है. उन्हें नई स्मृतियां बनानीहोती हैं. विस्थापित हुएघर के नएपते के साथउन्हें पता चलताहै कि घरऔर जमीन केसाथ उनका औरभी बहुत कुछडूब गया. कोईसरकार उसका कोईमुआवजा नहीं देती. पड़ोसी गांव जोनहीं डूबे उनकेसाथ रोजमर्रा केरिश्ते डूब गए. सरकार के पासरिश्ते डूबने काकोई मुआवजा नहींहोता. सरकारके पास बहुतकुछ डूबने काकोई मुआवजा नहींहोता. सरकारें किन्हीं औरचीजों में डूबीहोती हैं. जबसरकारें बदलती हैंतो पिछली सरकारकिन-किनचीजों में डूबीथी उसका कुछ-कुछ पता चलपाता है यानहीं भी पताचल पता.  बांध आधुनिकमंदिर हैं. विशालबांध और बड़ेमंदिर हैं. उत्तराखंड देवोंकी भूमि है. आधुनिक मंदिरों कीभूमि भी वहीबन रही है. प्राचीनता से आधुनिकता काऔर आधुनिकता सेआपदा का यहफैलाव है. अब तक कासबसे बड़ा आधुनिकमंदिर टिहरी बांधथा. अबउससे भी बड़ापंचेश्वर बनाया जानेवाला है. यह एशिया कासबसे बड़ा औरदुनिया का दूसरासबसे ऊचाई वालाबांध होगा. यहसच में विशालहै. आधुनिकता मेंयही विकास है. कुछ को उजाड़देना और कुछको उजाला देना. यह बांध दोमुल्क की सरहदोंपर बनेगा. भारतनेपाल के बीचजो महाकाली नदीसरहद बनाती है. वहां बांध बनेगा. वहीं झील बनेगी. वहां से बिजलीपैदा होगी. इसकीक्षमता तकरीबन 5 हजारमेगावाट की होगी. परियोजना से जोबिजली पैदा होगीवह दोनों मुल्कों मेंबंटेगी. तकरीबनपचास हजार करोड़की लागत सेबनने वाले इसपंचेश्वर बांध कीऊंचाई 315 मीटरहोगी. इतनीमीटर की ऊचाईमें जल भरावसे 122 गांवडूब जाएंगे. 30 हजारसे ज़्यादा लोगसरकारी आदेशों कापालन करते हुएकहीं और चलेजाएंगे. जहांसरकार उन्हें बसानाचाहेगी. उन्हेंसरकारों की चाहतसे ही उजड़ना है औरसरकारों के कहेपर ही बस जाना है. बांधोंके बनने औरलोगों के उजड़नेमें महाकाली कायह एक औरइलाका शामिल होजाएगा. जबभी बांध बनताहै. लोगोंके गांव डूबतेहैं और उन्हेंउनके गांवों सेहटाया जाता हैतो लोग ख़िलाफतकरते हैं. परउन्हें हटा दियाजाता है. कई बार उन्हेंकहीं और बसादिया जाता है. कई बार उनमेसे कुछ कोनौकरियां भी देदी जाती हैं. विस्थापन के बादउन्हें पता चलताहै कि जिसेवे अपनी जमीनसमझते थे. जो उनका अपनागांव था. जो उनके अपनेनदी नौले थे. वे सब उनकेनहीं थे. दुनिया की समूचीआबादी के पासजो उनका हैवह उनका नहींहोता. सरकारें सबसेज़्यादा ताकतवर हैं. सरकारें जिनके लिएकाम करती हैंवे और भीज़्यादा ताकतवर हैं. वे बहुत कमहैं पर बहुतअमीर हैं. उन्हेंहर रोज बहुतसारी बिजली चाहिए. वे सरकार सेबिजली मांगते हैं. सरकार नदियों कोरोकती है. गांवों को उजाड़तीहै और बांधबना कर उन्हें बिजलीदेती है. वे बिजली सेकम्पनियां चलाते हैं. कम्पनियों में सामानबनाते हैं. सामानों सेमुनाफा कमाते हैंऔर एक औरकम्पनी लगाते हैं. फिर उन्हें औरबिजली चाहिए होतीहै. उनकीचाहते अभी बहुतबची हुई हैं. अभी बहुत बांधबनने बचे हुएहैं. अभीबहुत गांव उजड़नेभी बचे हुएहैं. जबकिछः करोड़ सेज़्यादा आबादी अभीतक बांधों केबनने से विस्थापित होचुकी है. बिजली जरूरी है. बिजली की जरूरतबहुत कम है. जितनी बिजली देशमें बनती हैघरों में उसका 25% से भी कमप्रयोग होता है. बहुत बड़ा हिस्सादेश की कम्पनियों कोजाता है. ऐसे में महाकाली परबनने वाला पंचेश्वर बांधविस्थापितों की संख्यामें कुछ औरसंख्या जोड़ देगा. पश्चिमी नेपाल औरभारत के पिथौरागढ़ इलाकेसे 30 हजारसे ज़्यादा परिवारों कोअपने गांवों सेजाना पड़ेगा.    महाकालीके दोनों किनारों परबसे लोगों कोये सब आंकड़ेनहीं पता. उन्हेंनही पता किबिजली किसके लिएबनाई जा रहीहै. उन्हेंनहीं पता किउन्हें कहां बसायाजाएगा. यहबात उन तकपहुंच गई हैकि यहां गांवमें झील बननाहै और उन्हेंहटाया जाएगा. इसीमहीने 9 अगस्त से जनसुनवाई शुरू होनीहै. जनसुनवाई के बारेमें भी उन्हेंख़बर नहीं हैजिनके घर डूबनेहैं. अपनीबात कहने केलिए गांव केलोगों को जिला/ब्लाक मुख्यालय तकआना होगा. तकरीबन50-100 किमी. की पहाड़ी रास्तेकी दूरी औरबारिश के मौसममें उन्हें आनाहै. गांवके लोग अपनीबात कह सकतेहैं पर सरकारअपनी बात कहचुकी है. विस्थापित होने वालोंके लिए मुआवजाही एक मात्रसहारा है. पिथौरागढ़ उत्तराखण्ड काएक पिछड़ा इलाकाहै. कहायह भी जासकता है किसरकार ने बीतेकई सालों मेंसुविधाएं न देकरइसे पिछाड़ दियाहै. वेसभी इलाके पिछड़ेहुए होते हैंजो दूर जंगलोंमें होते हैं, जो दूर पहाड़ोंपर होते हैं. उनके पास अकूतप्राकृतिक संपदाएं होतीहैं. उनकेजंगल फलों औरखेतों से हरे-भरे होते हैं. अक्सर प्राकृतिक संपदाओं सेअगड़े हुए इलाकेही पिछड़े हुएइलाके कहे जातेहैं. हमारीसरकारों के पासविविधता भरे देशके लिए विविधता भरामॉडल नहीं है. उसके पास एकही मॉडल हैकि चौड़ी सड़कऔर विशाल घरोंसे शहर खड़ाकर देना. गांवोंको शहर कीतरफ ढकेल देना. बीते सत्तर वर्षोंमें सभी सरकारों कीउपलब्धि यही रहीहै कि वेलोगों से गांवोंको खाली करवारही हैं. लोगोंको भगा रहीहैं. लोगभाग रहे हैंऔर किसी शहरमें रुक जारहे हैं याकहीं नहीं रुकरहे हैं. खननकम्पनियों, बांधों, कोल माइंस केजरिए लोगों काअलग से विस्थापन होरहा है. सत्तर सालों कायह देश एकभगदढ़ भरा देशहै. लोगोंकी ज़िंदगी, जमीनऔर ज़ेहन सेस्थिरता को मिटायाजा रहा है. उत्तराखंड में टिहरीका विस्थापन एकनमूना है. पंचेश्वर एक नमूनाबनेगा. कमआबादी वाले पहाड़ोंमें बहुत कमआबादी वाले दलितोंकी यहां बहुतज़्यादा आबादी है. उनके पास जमीनेकम होती हैं. विस्थापन इन्हीं जमीनोंके आधार परकिया जाना है. मुआवजे इन्हीं जमीनोंके आधार परमिलने हैं. जिसकेपास जितनी जमीनेहोंगी उसे उतनाज़्यादा मुआवजा मिलेगा. इन दलित समुदायके लोगों कोमुआवजे के नामपर बहुत कममिलेगा. जोभूमिहीन हैं उनकेलिए परियोजना मेंकोई मुआवजा नहींहै. जिनकेपास घर हैउन्हें घर बनानेके लिए बसढेड़ लाख कामुआवजा तय हुआहै. ढेड़लाख में कोईघर कैस बनसकता है. जिनके पास कुछभी नहीं हैवे भी महाकाली केसहारे अपना जीवनजी लेते थे. नदी से हररोज मछली पकड़के बेंचने केबदले का कोईमुआवजा नहीं होता. जंगल से पत्तलबनाने. लकड़ीसे बर्तन बनानेके हक छीनलिए जाएंगे. उसकाकोई मुआवजा नहींमिलना है. अल्बत्ता उनके परिवारमें से किसीएक को नौकरीमिलेगी. कमपढ़े लिखे कोकम पढ़ी-लिखीवाली नौकरी.
नीले पानी वाली महाकाली नदीउनके लिए रोजगारगारंटी से पहलेवाली रोजगार गारंटीहै. बहुतवर्षों से औरकई पीढ़ियों सेवह उनका रोजगारहै. महाकाली केकिनारे बसने वालेवनराजियों के लिएभी नदी औरजंगल ही रोजगारहै. वेइसी के पत्थरसे कुछ बनालेते थे. वे इसी कीपानी से मछलियां निकाललेते थे. यहीं जंगलों सेलकड़ी निकाल वेबर्तन बनाते हैं. वे रह लेतेहैं बगैर नौकरीके. उन्हेंरहना पड़ेगा नौकरीकरते हुए. वहांके लोगों कोकिसी को भीपूरे परिवार कोनौकरी नहीं मिलनीहै. कोईएक नौकरी करेगा, पूरे परिवार कोउस पर आश्रितरहना पड़ेगा. यहांके लोग भारतसे ज़्यादा नेपालके साथ पुस्तैनी संबंधों सेजुड़े हैं. पश्चिमी नेपालके साथ उनकेरिश्ते इस तरहके हैं किबाकी का पूराभारत उन्हें नेपालीही समझता है. वे नेपाल कोनेपाल नहीं कहते. नेपाल उनके लिएकभी दूसरा मुल्कनहीं रहा. वहकाली पार काइलाका है बस. उनके त्योहार भीसाथ-साथहोते. उनकेदेवता भी आसपासहोते. अपनेदेवताओं को पूजनेवे कालीपार चलेजाते. यहकिसी गैर मुल्कजाने की तरहनही होता. महाकाली उनकेगीतों में है. महाकाली नेपाली गीतोंमें है. वे कहते हैंकि नेपाली हीउनके अपने हैं. राष्ट्र से ज़्यादामजबूत रोजमर्रा कीवह ज़िंदगी होतीहै जिनके साझासहारे से कोईसमाज जीता है. नेपाल के लोगजब मजदूर बनकरकालीपार से आतेहैं तो वेअपने पैसे उनकेघरों में सहेजदेते. लौटतेवक्त वे पैसेवापस ले जाते. उनके बीच कायह भरोसा है. बांध से बनीसौकड़ों किलोमीटर चौड़ीझील उनके इसरिश्ते में दूरीपैदा करेगी. गांवके लोगों नेजनसुनवाइ के बहिस्कार कीबात की है. वे अपना गांवनहीं छोड़ना चाहते. उनका कहना हैकि महाकाली नदीनहीं उनकी मांहै. जबकिसरकार ने एकही नदी औरएक ही जानवरको मां कीमान्यता दी है. मनुष्य का दर्जादिया है. शायद गाय औरगंगा के अलावाकिसी और नदीको मां कहनाउनका देशद्रोह न हो जाए.  

लूट का स्कूल : संजीव ठाकुर

लेखक मंच - Fri, 11/08/2017 - 00:22

संजीव ठाकुर

मैं देश के उन लाखों पिताओं में से एक हूँ, जिनके बच्चे लगभग चार साल के हो गए हैं और जिन्हें किसी न किसी पब्लिक स्कूल की शरण में जाने में विलंब की कोई गुंजाइश नहीं है। किसी-किसी पब्लिक स्कूल में अपने बच्चे के लिए प्रकांरातर से अपने लिए एक जगह आरक्षित करवाने की यह कवायद दरअसल तभी शुरू हो जाती है, जब बच्चा ‘थ्री प्लस’ का हो जाता है। और उससे भी पहले स्कूल में भरती होने के लिए तैयार करने के क्रम में हर गली-मुहल्ले में खुल गए ‘प्ले स्कूल’ की शरण में जाना भी लगभग अनिवार्य हो गया यानी बच्चा ‘टू प्लस’ का हुआ नहीं कि उसे ‘शिक्षा’ ग्रहण करने के लिए भेजना अनिवार्य-सा हो गया है। लाख समितियाँ बनें, लाख सिफारिशें की जाएँ, बच्चों का बचपन छीनने की यह प्रक्रिया थमने वाली नहीं लगती, बहरहाल!

पिछले सितंबर से ही प्ले स्कूल वाले लिस्ट भेजने लगे, अमुक स्कूल में अमुक तिथि तक आवेदन करना है, तमुक स्कूल में तमुक तिथि तक! माँ-बाप इंटरव्यू में जाकर कुछ ऐसी-वैसी हरकत न कर जाएँ, इसके लिए बाकायदा काउंसलर को बुलवाकर प्ले स्कूल वालों ने हमारा ‘ओरिएन्टेशन’ (पुनश्चर्या) भी करवाया, छद्म-साक्षात्कार भी। फिर भी हममें से अधिकतर माता-पिता फेल हो गए और मनचाही जगह बच्चे का एडमीशन न करवा पाने की वजह से कुंठित भी। जिन्होंने ‘ब्रांडेड’ स्कूल पाया, उन्होंने चालें टेढ़ी कर सड़कों पर इतराना भी शुरू कर दिया। बाकी भी जहाँ-तहाँ एडमीशन करवाकर निश्‍चिंत हो गए। यह निश्‍चिंतता मन चाहा स्कूल न पा सकने के बावजूद भारी भरकम कीमत देकर प्राप्त करनी पड़ी। बहुत ‘बड़े’ स्कूलों की अनाप-शनाप कीमत से पाँच-सात हजार कम कीमत देकर ही इन्हें पाया जा सका। किसी ने बिल्डिंग फंड के नाम पर दान लिया, किसी ने विकास फंड के नाम पर तो किसी ने किसी शैक्षणिक ट्रस्ट के नाम पर। अपनी ही सेवा करने वाले इन ट्रस्टों के नाम पर ‘सधन्यवाद’ कई हजार लिए गए। धर्म के नाम पर चार आना, आठ आना मात्र निकालने वाले लोगों को भी यहाँ पाँच हजार, आठ हजार निकालने पड़े। बदले में उन्हें धन्यवाद तो मिला ही। वैसे यह धन्यवाद भी वे नहीं देते तो कोई उनका क्या बिगाड़ लेता?

आखिर अप्रैल के प्रथम सप्ताह से बच्चों के सत्र आरंभ हो गए। सत्र आरंभ होने से पहले सभी माता-पिता को बच्चों के वस्त्र लेने बुलाया गया। कोई हजार रुपये के कपड़े, जूते, नैपकिन वगैरह दिए गए। नैपकिन इसलिए कि बच्चे उन्हें स्कूल के डेस्क पर बिछाकर खाना खाएँ और डेस्क गंदे न हों। उन गंदे डेस्कों को साफ करवाने का खर्च स्कूल वालों का बच जाए। सभी बच्चों को ‘स्विमिंग कॉस्ट्यूम’ भी दिए गए। इससे क्या कि अधिकांश स्कूलों में स्विमिंग पूल ही नहीं हैं और वे एक टबनुमा चीज में पानी भरकर बच्चों को उछलने-कूदने की सुविधा देते हैं।

इसके बाद स्टेशनरी की बारी आई। स्टेशनरी के नाम भी हजार रुपये लिए गए और बदले में सात कॉपियाँ, सात जिल्दें, कुछ स्टिकर, दो पुस्तकें और एक लिस्ट दी गई। ये कॉपियाँ वगैरह देने की कृपा इसलिए की गई ताकि माता-पिता उन पर अपने बच्चों के नाम लिख सकें, उन पर जिल्द चढ़ा सकें। और वह लिस्ट इसलिए ताकि माता-पिता देख सकें कि आपके बच्चे किन-किन चीजों का उपयोग स्कूल में करेंगे! वे सभी स्टेशनरी के सामान उनकी क्लास टीचर को सीधे दे दिए जाएँगे। आप उनके दर्शन भी नहीं कर सकते। हाँ, उनके दाम देखकर कुढ़-भुन सकते हैं। तो कुढ़िए-पैंसिल दो पैकेट- बावन रुपये। शार्पनर- तीन रुपये। पेपर सोप- तीस रुपये, कलर पेंसिल-चौबीस रुपये। इरेजर-तीन रुपये इत्यादि, इत्यादि। यह कहने की आवश्यकता नहीं है कि बाजार भाव से तीन गुना में ये सामान आपको स्कूल-काउंटर से खरीदने हैं। और यह पूछने का तो आपको अधिकार ही नहीं है कि पूरे सत्र में, जिसमें कोई चार महीने तो छुट्टियों के ही होंगे, बच्चे इतनी पेंसिलों का क्या करेंगे? इतने पेपर सोप का क्या करेंगे? और उनसे जो एप्रैन के पैसे लिए गए हैं, उनका क्या होगा? पच्चीस रुपये ब्लो पेन क्या सत्र समाप्ति के बाद बच्चों को लौटा दिया जाएगा? नहीं भैये, नहीं! अगले सत्र में आप इससे कुछ ज्यादा रकम ही भरेंगे, क्योंकि आपके बच्चे एक क्लास और ऊपर चढ़ जाएँगे।

स्कूलों में अभी छुटिृयाँ चल रही हैं। स्कूल वाले समर कैंप के नाम पर अलग से बच्चों के माता-पिता को दूह रहे हैं। आखिर छुट‍्टि‍यों का बस का किराया भी तो ले ही लिया है। स्कूल-फीस तो चलो जायज है, ये बस का किराया? करीब दो महीने बसों को देख भी नहीं पाने वाले बच्चों को बस का किराया क्यों देना पड़ा? राम जाने! हमारी सरकार तो ये सब बातें जान ही सकती है। सरकार ने कौड़ियों के मोल जमीनें दे ही दी हैं स्कूल वालों को। इससे ज्यादा वह क्या कर सकती है? स्कूल चलाने वाले कोई बड़े उद्योगपति हैं, कोई राजनेता, कोई माफिया उन पर अंकुश रखना क्या किसी सरकार के वश का है? खैर!

स्कूल का सत्र शुरू होने पर भी लूट का खेल जारी रहा। माता-पिता को मीटिंग के बहाने बुलाया गया और दो सौ बीस रुपये जमा कराने को कहा गया। इसके बदले एक वर्कशीट बच्चों को रोज दी जाएगी, जिसमें वो आकृतियों को जोड़ेंगे, उसमें लिखी उल्टी-सीधी कविताओं को रटेंगे, होम वर्क करेंगे और उन्हें बीस रुपये के एक फाइल कवर में रखेंगे। यानी हजार रुपये के स्टेशनरी आइटम में यह ‘वर्कशीट’ शामिल नहीं थी। सभी पिता की तरह मैंने भी रुपये निष्कासित किए, मन लेकिन खीझता रहा और एक सप्ताह बाद बेटी के बस्ते में जब पैंसठ रुपये और जमा करने का फरमान लिखा आया तो मैं उबल पड़ा- ‘‘इतने-इतने पैसे लिए हैं, एक डायरी तक नहीं दे सकते? आई कार्ड बनाने की जिम्मेदारी क्या उनकी नहीं है?’’ आखिर पत्नी ने शांत कराया और मैं जाकर पैंसठ रुपये और दे आया। मैं जानता हूँ, लूट का यह खेल खत्म नहीं हुआ है। स्कूल के खुलते ही फिर किसी मद में माँग की जाएगी, फिर किसी मद में। लूट का यह खेल तो दरअसल तभी खत्म होगा, जब बेटी बारहवीं पास कर जाएगी। और बारहवीं के बाद शायद लूट के ज्यादा बड़े खेल की तैयारी करनी होगी।

संगीत और सांप्रदायिक पूर्वाग्रह : कुलदीप कुमार

जनपक्ष - Wed, 09/08/2017 - 21:28



पश्चिम के साथ साक्षात्कार की प्रक्रिया में उन्नीसवीं सदी में हिंदुओं और मुसलमानों ने अपनी-अपनी अस्मिता को अपने “गौरवपूर्ण अतीत” के आलोक में समझने और परिभाषित करने का प्रयास किया और इस प्रक्रिया में स्वयं को न केवल सांस्कृतिक बल्कि एक राजनीतिक समुदाय के रूप में भी पुनर्गठित किया। सांप्रदायिकता इसी प्रक्रिया के दौरान उत्पन्न विचारधारा है जिसकी बुनियाद अपने समुदाय के हितों को दूसरे समुदाय के हितों के खिलाफ समझने पर रखी गई है। ज़ाहिर है कि इस क्रम में अपने समुदाय का गौरवगान करने और दूसरे समुदाय से नफरत करने की प्रवृत्ति का पैदा होना बहुत स्वाभाविक है। 
भारतीय उपमहाद्वीप का संगीत उसमें रहने वाले सभी निवासियों के योगदान से बना संगीत है जिस पर किसी एक समुदाय का एकाधिकार नहीं है। ऐतिहासिक कारणों से किसी एक समुदाय का अल्प या दीर्घ अवधि के लिए वर्चस्व तो स्थापित हो सकता है लेकिन एकाधिकार कभी भी स्थापित नहीं हो सकता; और, यह वर्चस्व भी स्थायी नहीं होता क्योंकि दूसरा समुदाय स्थापित सत्ता-समीकरण को बदलने के लिए हमेशा सक्रिय रहता है। यदि इस सक्रियता के पीछे केवल बेहतर कलासृजन की प्रेरणा हो तो किसी को कोई आपत्ति नहीं हो सकती। लेकिन यदि इसके पीछे शुद्ध सांप्रदायिक आग्रह हो समस्या पैदा होती है। 
संगीतकार संगीत को ईश्वर की आराधना बताते हैं। अक्सर उन्हें यह कहते हुए भी पाया जाता है कि संगीत उनके लिए ईश्वर तक पहुँचने का साधन है। नाद को ब्रह्म भी माना जाता है और कहा जाता है कि संगीत देश, काल, जाति, धर्म और संप्रदाय---सभी सीमाओं का अतिक्रमण करता है क्योंकि वह सार्वदेशिक एवं सार्वकालिक है। संगीतकार का धर्म केवल संगीत है क्योंकि स्वरों का कोई धर्म नहीं होता। लेकिन यह आदर्श स्थिति का वर्णन है, वास्तविक स्थिति का नहीं। उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध से लेकर अब तक सम्पूर्ण भारतीय उपमहाद्वीप में जिस तरह सांप्रदायिकता की विषबेल फली-फूली है, उसके कारण देश का विभाजन करने वाली इस विचारधारा के जहरीले असर से संगीत भी अछूता नहीं रह सका है। 
पुरानी पत्रिकाएँ उलटने-पलटने के क्रम में ‘अकार’ का एक अंक (अगस्त 2013-नवंबर 2013) हाथ में आया जिसमें सैयद जुल्फिकार अली बुखारी की आत्मकथा ‘सरगुजश्त’ का एक अंश छपा है। सैयद जुल्फिकार अली बुखारी सैयद अहमद शाह बुखारी (उर्दू के मशहूर व्यंग्यकार पितरस बुखारी) के छोटे भाई थे और आजादी के पहले इन दोनों भाइयों का ऑल इंडिया रेडियो पर ऐसा वर्चस्व था कि उसे मज़ाक में लोग बीबीसी (बुखारी ब्रदर्स कॉर्पोरेशन) कहने लगे थे। विभाजन के बाद जुल्फिकार बुखारी रेडियो पाकिस्तान में काफी समय तक काम करने के बाद उसके महानिदेशक भी बने। यह आत्मकथा उन्होंने पाकिस्तान में ही लिखी लेकिन इस अंश का संबंध 1930 के बाद के विभाजनपूर्व भारत से है। 
बुखारी लिखते हैं: “अब इनको कौन बताए कि मद्रास को छोड़कर बाकी तमाम हिंदुस्तान में अगर मौसिकी का इल्म है तो सिर्फ मुसलमानों को, मौसिकी हिंदुओं के नजदीक भी नहीं गई। मैं ये बात किसी तअस्सुब (पूर्वाग्रह) की बिना पर नहीं कहता, इल्म के मामले में तअस्सुब कैसा? हकीकत ये है कि हमारे हिंदुस्तान में आने से कब्ल (पहले) यहाँ सिर्फ चार सुर रायज (प्रचलित) थे। मुसलमानों ने सात सुर यहाँ आकर रायज किए। ये तमाम मौसिकी मुसलमानों की आवरदा (लाई हुई) है। मद्रास में इस मौसिकी को अरब लाये और शुमाली (उत्तरी) हिंदुस्तान में ईरान के रास्ते से आने वाले मुसलमान।” विष्णु दिगंबर पलुस्कर--- जिनके ओंकारनाथ ठाकुर, विनायकराव पटवर्धन, नारायणराव व्यास, डी. वी. पलुस्कर और बी. आर. देवधर जैसे यशस्वी शिष्य हुए--- के बारे में बुखारी साहब के उद्गार कुछ यूं निकले हैं: “भाईजान मरहूम और मैं दोनों विष्णु दिगंबर के लाहौर वाले स्कूल में दाखिल हुए ताकि देखें तो सही कि ये लोग क्या करते हैं। मगर चंद ही दिनों में लाहौल पढ़कर बाहर आ गए। अब कौन बैठकर भजन गाता और वो भी बेसुरे उस्ताद की आवाज के साथ आवाज मिलाकर।” 
पाकिस्तानी फिल्मों के मशहूर संगीत निर्देशक खुर्शीद अनवर ने वॉइस ऑफ अमेरिका की उर्दू सर्विस के प्रमुख ब्रायन सिल्वर को दिये एक इंटरव्यू में भी यही बात कही थी कि हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत मुसलमानों का है। कान्हड़ा का जिक्र आने पर उन्होंने कहा कि सभी तरह के कान्हड़े, चाहे वह दरबारी कान्हड़ा हो या कौंसी कान्हड़ा या हुसैनी कान्हड़ा या नायकी कान्हड़ा—ये सभी मुसलमानों के ही बनाए हुए हैं। यूं सभी यह जानते हैं कि दरबारी कान्हड़ा, मियां की तोड़ी, मियां की सारंग, मियां मल्हार जैसे मशहूर राग तानसेन के बनाए हुए हैं जिनके बारे में अभी तक तय नहीं हो पाया है कि वे अपना धर्म छोड़कर मुसलमान बने थे या नहीं। आचार्य बृहस्पति जैसे प्रकांड विद्वान और संगीतशास्त्री का मत है कि तानसेन ने कभी इस्लाम स्वीकार नहीं किया क्योंकि समकालीन ऐतिहासिक दस्तावेजों में इस बात का कोई जिक्र नहीं है और इसका पहले-पहल उल्लेख अठारहवीं सदी में मिलता है।
संगीत जगत हिन्दू सांप्रदायिक भावनाओं और उद्देश्यों से अछूता रहा हो, ऐसा भी नहीं है। विष्णु दिगंबर पलुस्कर और विष्णु नारायण भातखंडे ने संगीत-शिक्षण की जो संस्थाएं खोलीं, उनके द्वारा काफी हद तक इनकी पूर्ति हुई। पलुस्कर के यशस्वी शिष्यों ने उनकी परंपरा को देश भर में फैलाया और आज वह लगभग वर्चस्व वाली स्थिति में है। लेकिन यह भी एक विचारणीय विषय है कि उनकी शिष्य-परंपरा में एक भी ऐया मुस्लिम संगीतकार क्यों नहीं है जो संगीत सम्मेलनों के मंचों पर नज़र आता हो। जबकि सच्चाई यह है कि अगर ग्वालियर घराने के संस्थापक हद्दू खां-हस्सू खां अपनी गायकी हिन्दू शिष्यों को न सिखाते तो विष्णु दिगंबर पलुस्कर का उदय ही न होता। शिक्षित हिन्दू मध्यवर्ग में संगीत के प्रचार के उद्देश्य से पलुस्कर ने तुलसीदास, सूरदास, मीरा और नानक जैसे संत कवियों की पंक्तियां लेकर उन्हें रागों में बांधा, भजन के अतिरिक्त संगीत के अन्य प्रकारों को त्याज्य माना और इस तरह इस धारणा को बल प्रदान किया कि भारतीय संगीत मुख्यतः धर्म से जुड़ा है और मुस्लिम शासकों के दौर में संगीतकारों और संगीत, दोनों के (चारित्रिक) स्तर में गिरावट आई। 
सांप्रदायिक दृष्टि से संगीत को देखने के परिणामस्वरूप पाकिस्तान और भारत, दोनों में एक अजीब किस्म की कोशिश की गई और रागों के नाम बदले गए। सौभाग्य से यह कोशिश कामयाब नहीं हो सकी। पाकिस्तान में रामकली, दुर्गा, भैरव, शंकरा, श्याम कल्याण जैसे उन रागों के नाम बदलने की कोशिश हुई जिनमें  हिन्दू देवी-देवताओं के नाम आते थे और बन्दिशों में भी ऐसे ही परिवर्तन किए गए लेकिन यह कोशिश विफल रही। भारत में ओंकारनाथ ठाकुर ने राग जौनपुरी को जीवनपुरी कहना शुरू किया जबकि यह सर्वमान्य तथ्य है कि इस राग की रचना जौनपुर के सुल्तान हुसैन शाह शर्क़ी ने की थी। पुराने लोग अभी भी याद करते हैं कि ओंकारनाथ ठाकुर संगीत सम्मेलन के मंच को गंगाजल से शुद्ध करके और उस पर अपनी मृगछाला बिछाकर बैठने के बाद ही अपना गायन शुरू करते थे। इसी तरह यमन को केवल कल्याण कहने की परंपरा भी डाली जा रही है। लेकिन सौभाग्य से यह प्रयास भी परवान नहीं चढ़ पा रहा है। 
विष्णु नारायण भातखंडे ने संगीत के हिंदूकरण की कोशिश नहीं की, लेकिन उनका संस्कृत में लिखे गए प्राचीन संगीत ग्रन्थों पर ज़रूरत से ज़्यादा ज़ोर था। जानकी बाखले ने अपनी पुस्तक “टु मेन एंड म्यूज़िक” में विस्तार से वर्णन किया है कि किस तरह वे मुस्लिम उस्तादों से संस्कृत ग्रन्थों के बारे में सवाल करते थे और यह सिद्ध करते थे कि उनकी गायकी का कोई प्रामाणिक सैद्धान्तिक आधार नहीं है। लेकिन इन्हीं उस्तादों की सहायता लेना उनकी मजबूरी थी और उनसे ही राग-चर्चा करके और बन्दिशें एकत्रित करके भातखंडे ने अपनी पुस्तकें लिखीं। यही नहीं, जब उन्होंने लखनऊ में संगीत शिक्षण के लिए मैरिस कॉलेज की स्थापना की तब खानदानी संगीतजीवी मुस्लिम संगीतकारों को अध्यापन के लिए नियुक्त करना पड़ा। मैक्स कैट्ज़ ने ‘सांस्थानिक सांप्रदायिकता’ पर लखनऊ में किए गए अपने शोध के आधार पर दर्शाया है कि किस तरह इस विद्यालय में, जिसे अब भातखंडे संगीत संस्थान के नाम से जाना जाता है और 2000 से जिसे विश्वविद्यालय का दर्जा भी प्राप्त है, मुस्लिम उस्तादों और छात्रों की संख्या में लगातार कमी आती गई। यह प्रक्रिया इस विद्यालय में ही नहीं, समूचे संगीत जगत में चली है जिसके कारण मुस्लिम उस्तादों से संगीत सीखने वाले शिक्षित हिन्दू मध्यवर्ग के संगीतकारों की व्यापक उपस्थिति के कारण खानदानी मुस्लिम संगीतकार लगातार हाशिये की तरफ ठेले जाते रहे। इन संगीत विद्यालयों के कारण संगीत का प्रचार-प्रसार तो हुआ लेकिन ये एक भी बड़ा कलाकार देने में असमर्थ रहे। 
यह मान्यता भी फैलाई गई कि मुसलमानों के आगमन के कारण उत्तर भारत का संगीत दूषित हो गया लेकिन दक्षिण भारत का संगीत इससे बचा रहा। 1974 में प्रकाशित पुस्तक “मुसलमान और भारतीय संगीत” में आचार्य बृहस्पति ने इस धारणा का खंडन करते हुए सिद्ध किया कि किस तरह मुसलमानों के साथ आए ईरानी संगीत के साथ संपर्क में आने से भारतीय संगीत की श्रीवृद्धि हुई और उसमें परिवर्तन आए। मूर्छना-पद्धति के स्थान पर मेल-पद्धति आ गई और “संस्कृत के अनेक ग्रंथ मेल पद्धति के आधार पर लिखे गए”। भातखंडे ने भी मेल-पद्धति के आधार पर ही रागों का वर्गीकरण और रूप-निर्धारण किया। उन्होंने तो अपने विचारों को मनवाने के लिए ‘चतुर पंडित’ के छद्मनाम ने संस्कृत में ग्रन्थों की रचना भी कर डाली ताकि उन पर प्राचीनता की प्रामाणिकता का ठप्पा लग जाए। 
अब तो कैथरीन बटलर स्कोफील्ड जैसे शोधकर्ताओं ने निर्णायक रूप से सिद्ध कर दिया है कि मुग़ल बादशाह औरंगज़ेब ने संगीत को देशनिकाला नहीं दिया था, केवल पकी उम्र होने पर दरबार में उसके इस्तेमाल पर पाबंदी लगा दी थी। लेकिन आचार्य बृहस्पति ने तो 1974 में प्रकाशित इस पुस्तक में ही स्पष्ट शब्दों में लिख दिया था कि “1667-1668 में औरंगजेब ने आदेश दिया कि गायक लोग दरबार में आयें, पर गाना न गायें। इस आदेश के कारण विशुद्ध राजनीतिक थे। इटालियन इतिहासकर मनुक्कि के अनुसार इस प्रतिबंध के बाद भी औरंगजेब बेगमों और शाहज़ादियों के मनोरंजन के लिए गायिकाओं और नर्तकियों की नियुक्ति करता था और अंतःपुर में गाना-बजाना होता था”। लेकिन सांप्रदायिक पूर्वाग्रहों के कारण औरंगजेब की संगीत-विरोधी कट्टर मुस्लिम शासक वाली छवि आज भी बनी हुई है जबकि आचार्य बृहस्पति उसके इस प्रकार के निर्णयों के पीछे विशुद्ध राजनीतिक कारण मानते हैं।  
इस सबके बावजूद अच्छी बात यह है कि इन सांप्रदायिक रुझानों के बावजूद अभी तक हिंदुस्तानी संगीत जगत में सांप्रदायिक सद्भाव बना हुआ है।  हालांकि इसके साथ ही यह भी सही है कि खानदानी घरानेदार मुस्लिम गायकों और वादकों की संख्या में लगातार कमी आती जा रही है। खयाल के कुछ घरानों में तो मुस्लिम गायक लगभग विलुप्त-से होते जा रहे हैं। संगीत सम्मेलनों के मंच पर अब ग्वालियर, आगरा और जयपुर जैसे घरानों समादृत मुस्लिम कलाकार ढूँढने पर ही मिलेंगे। संगीत को समाज और राज्य की ओर से मिलने वाले आर्थिक-राजनीतिक समर्थन और संरक्षण की संरचनागत समस्याओं की भी इस प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका है। इस महत्वपूर्ण विषय पर आगे कभी चर्चा करेंगे। 

कमल जोशी- एक यायावर का अचानक चले जाना : ज़हूर आलम  

लेखक मंच - Wed, 09/08/2017 - 01:29

कमल जोशी

हमेशा चलते रहना ही उसने अपने जीवन का उद्देश्य बना लिया था। उसने कभी विराम नहीं लिया और 3 जुलाई को बिना किसी को बताए वह सबसे लम्बी अनजान और एक अनंत यात्रा पर निकल गया। बचपन में ही लग गई एक्यूट  अस्थमा की भयंकर बीमारी से लड़ते हुए उसने पहाड़ का चप्पा-चप्पा छान मारा था, चाहे वो रूपकुण्ड और नन्दा राजजात की कठिन यात्रा हो या लद्दाख और छोटा कैलाश की अनंत ऊँचाइयों को पार करना। कम आक्सीजन के कारण जहां बड़े‎-बड़े‎ चौड़े सीने वाले महारथियों की भी साँस फूल जाती थी, वहां दृढ निश्चयी जिद्दी दमे का मरीज कमल उन ऊँचाइयों और दुर्गम पहाड़ों को हँसते–हँसते पार कर लेता था,  क्योंकि प्रकृति और पर्वत की ऊँचाइयों से उसे अगाध प्रेम था और इनके साथ हो रहे दुर्व्यवहार के प्रति गहरी चिन्ता थी।

उत्तराखण्ड के पहाड़-गाँव-लोगों की स्थिति को जानने समझने के लिए 1974 , 1984 , 1994 , 2004  व 2014 में डा० शेखर पाठक के नेतृत्व में पहाड़ संस्था की ओर से आयोजित ‘अस्कोट-आराकोट अभियान’ की लम्बी यात्राओं का वह अगुवा साथी रहा। उत्तराखण्ड के सभी राजनीतिक, समाजिक और सांस्कृतिक आन्दोलनों/अभियानों में उसने बढ़-चढ़‎ कर अपनी महत्वपूर्ण‎ हिस्सेदारी निभाई।
कमल जोशी अपनी धुन का पक्का और बहुत जिद्दी इंसान था। बचपन में ही उसे एक्यूट अस्थमा का जानलेवा रोग लग गया था।  दुनिया भर के इलाजों के बावजूद डाक्टरों ने जवाब दे दिया था कि वह बहुत दिन नहीं बचेगा, पर उसने जिद पकड़‎ ली कि वह जियेगा ! …और बिमारी से लड़ते हुए उसने 63 साल की एक भरपूर जिंदगी बिना किसी रोक-टोक के आजादी के साथ बिल्कुल अपनी तरह से जी ! वह कहीं रुका नहीं। बस चलता रहा। वह कहता भी था, “चलना ही मेरी खुराक है और जिन्दगी भी। जिस दिन रुक गया, समझ लो…।’’

वह सबसे बेलौस तरीके से और खुलकर मिलता था। आप-जनाब वाली ‍औपचारि‍कता उसे बिल्कुल पसन्द नहीं थी। इसीलिए नये-अंजान लोगों से भी वह पलभर में ही घुल-मिल जाता था और उनका दोस्त बन जाता था। इसीलिए उस पारदर्शी दोस्त के मित्रों/जानकारों की इतनी लम्बी फेहरिस्त है कि गिनना मुश्किल होगा। बेबाकी का यह आलम था कि वह किसी के दबाव में कभी नही आता था- चाहे वह कोई भी तुर्रमखाँ हो। उसे खुले दिमाग‎ के लोग ही पसंद थे। बकौल हरजीत-
जो तबीयत हरी नही करते
उनसे हम दोस्ती नही करते

केमिस्ट्री में एमएससी करने के बाद रिसर्च करने के लिए वह कुमाऊँ‎ विश्वविद्यालय नैनीताल आया था। तीन साल गहन शोध करने के बाद जब थीसिस लिखी‎ जा रही थी, अन्तिम चेप्टर मे किसी बात पर गाईड से उसके विचार नही मिले और उसने एक झटके में रिसर्च को तिलांजलि दे दी और फोटोग्राफी, पत्रकारिता, कविता, चित्रकला, सामाजिक व सांस्कृतिक कार्यों और यायावरी में अपना जीवन झोंक दिया। फिर कभी पीछे मुड़कर  नहीं देखा।
बेबाक पत्रकारिता, लेखन और फोटोग्राफी में उसकी नजर का और सोच का कोई जवाब नहीं था। कमल एक बहुत ही उच्चकोटि का लाजवाब फोटोग्राफर था। यह उसकी नजर का कमाल था कि उसके अधिकांश फ्रेम और कम्पोजीशन पेंटिंग जैसे लगते थे।  दिल्ली में एक बार वह मुझे मशहूर फोटोग्राफर रघु राय के स्टूडियो में ले गया था। कमल और रघुराय के बड़े‎ बेतकल्लुफ ताल्लुकात थे। कमल और उसकी फोटोग्राफी के प्रति रघु राय का सम्मान देख मैं दंग था।

अस्सी के दशक में नैनीताल आने के बाद युगमंच, पहाड़, नैनीताल समाचार और उत्तरा पत्रिका से उसने अपना गहरा नाता जोड़ लिया था। जसम और युगमंच परिवार का वह स्थायी‎ सदस्य बन गया था। नाटकों, नुक्कड नाटक समारोह, कवि सम्मेलन‎, होली महोत्सव, फिल्म फेस्टिवल आदि में नैनीताल से बाहर चले जाने के बावजूद वह हमेशा अपनी उपस्थिति और भागीदारी निभाता रहा। डा. शेखर पाठक के सम्पादन में ‘ पहाड़’ और डा. उमा भट्ट के सम्पादन में निकलने वाली महत्वपूर्ण पत्रिका ‘ उत्तरा’ में उसका सहयोग अतुलनीय था।

देहरादून से संजय कोठियाल के सम्पादन में निकलने वाली मासिक पत्रिका ‘युगवाणी’ में उसकी भूमि‍का बहुत महत्वपूर्ण थी। मुख्य पन्ने पर उसके द्वारा खींची एक बोलती हुई तस्वीर और उसी पर कमल का आलेख युगवाणी को नई ऊँचाइयां प्रदान कर रहे थे। अब उसके जाने के बाद युगवाणी का मुख्य पन्ना सूना हो जाएगा- जिसका पाठक महीने भर इंतजार करते थे, जिसमें पहाड़ की किसी जुझारू महिला, ढाबे वाले या किसी मासूम पहाड़ी‎ बालक-बालिका की तस्वीर और उसी से जुड़ी पहाड़ के पहाड़ से जीवन, कठोर परिश्रम और जीवन्तता बाल सुलभता पर एक विचारोत्तेजक स्टोरी होती थी। वह अपनी यात्राओं के पड़ा‎वों से उन सच्ची स्टोरियों को उठाकर कागज पर बेहतरीन लेखन शैली में उतार देता था।
वह अपने समाज के लिए प्रेम से सराबोर बहुआयामी प्रतिभा थी। जिन्दगी का अनूठा चितेरा और बेहतरीन इंसान था। उसकी बेबाक हँसीं हमेशा कानों में गूंजती रहेगी।

पिछले साल वह मेरे व मुन्नी के साथ हमारा गाइड बन कर उत्तरकाशी से हरसिल और गंगोत्री तक गया था। इस साल यमनोत्री की यात्रा का प्रोग्राम था, पर कमल वादा तोड़‎कर किसी और यात्रा पर चला गया !

आभा की कविताएं

कारवाँ - Sat, 05/08/2017 - 13:59
लड़कियां
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घर-घर
खेलती हैं लडकियाँ
पतियों की सलामती के लिए
रखती हैं व्रत

दीवारों पर
रचती हैं साझी
और एक दिन
साझी की तरह लडकियाँ भी
सिरा दी जाती हैं
नदियों में

आख़िर
लडकियाँ
कब सोचना शुरू करेंगी
अपने बारे में ...।

एक शब्‍द

---
शादी का
लाल जोडा पहनाया था
माँ ने

उसकी रंगत ठीक ही थी
पर उसमें टँके सितारे
उसकी रंगत
ढँक रहे थे

मुझे दिखी नहीं वहाँ
मेरी खुशियाँ
मुझ पर पहाड़-सा टूट पडा
एक शब्‍द-
शादी

बागों में सारे फूल खिल उठे
पर मेरी चुनरी की लाली
फीकी पडती गई
बक्‍से में बंद
बंद।

उस फूल का नाम
---
मेरी तकदीर पर
वाहवाही
लूटते हैं लोग

पर अपने घ्रर में ही
घूमती परछाई
बनती जा रही मैं

मैं ढूंढ रही पुरानी ख़ुशी
पर मिलती हैं
तोडती लहरें
ख़ुद से सुगंध भी आती है एक

पर
उस फूल का नाम
भ्रम ही रहा
मेरे लिए।

उन आंसुओं का अर्थ
---
बचपन में पराई
कहा
फिर सुहागन
अब विधवा

ओह!
किसी ने भी पुकारा नहीं
नाम लेकर

मेरे जन्‍म पर खूब रोई माँ
मैं नवजात
नहीं समझ पाई उन आँसुओं का अर्थ

क्‍या वाकई माँ
पुत्र की चाहत में रोई थी।

उद्धत भाव से
---
मोहित करती है
वह तस्‍वीर
जो बसी है रग-रग में

डरती हूँ
कि छू कर उसे
मैली ना कर दूँ

हरे पत्‍तों से घिरे गुलाब की तरह
ख़ूबसूरत हो तुम
पर इसकी उम्‍मीद नहीं
कि तुम्‍हें देख सकूँ

इसलिए
उद्धत भाव से
अपनी बुद्धि मंद करना चाहती हूँ।

वक्‍तव्‍य न दो
---
घृणा से
टूटे हुए लोगो!

दर्पण
और अनास्‍था से
असंतुष्‍ट महिलाओं को

वक्‍तव्‍य न दो।

जाने कौन हो तुम
---

जाने कौन हो
तुम

यह
तुम्‍हारी झलक है
या कोई झील है

जिसमें
डूबी जा रही मैं।

मेरे आंसू
---
कभी कभी
ऐसा क्यों लगता है
कि सबकुछ निरर्थक है

कि तमाम घरों में
दुखों के अटूट रिश्ते
पनपते हैं
जहाँ मकडी भी
अपना जाला नहीं बना पाती

ये सम्बन्ध हैं
या धोखे की टाट
अपने इर्द-गिर्द घेरा बनाए

चेहरों से डर जाती हूँ
और मन होता है
कि किसी समन्दर में छलांग लगा दूँ।

मेरी आंखों का नूर
---
लोग कहते हैं
कि बेटे को
ज़िन्दगी दे दी मैंने

पर उसके कई संगी नहीं रहे
जिनकी बड़ी-बड़ी आँखें
आज भी घूरती कहती हैं-
आंटी, मैं भी कहानी लिखूंगी
अपनी

उसकी आवाज़ आज भी
गूँजती है कानों में

बच्‍ची!
कैसी आवाज़ लगाई तूने
जो आज भी गूँज रही है फिजाँ में

ओह!
व्‍हील-चेयर पर
दर्द से तड़पती आँखें वे

वह दर्द
आज मेरी आँखों का नूर बन
चमक रहा है।

प्रोफेसर यशपाल- विज्ञान और समाज के सेतु: प्रेमपाल शर्मा

लेखक मंच - Sat, 05/08/2017 - 13:52

 

प्रोफेसर यशपाल

प्रोफेसर यशपाल (26.11.1926-25.07.2017) को सच्‍चे मायने में जन वैज्ञानिक कहा जा सकता है यानी आम आदमी की भाषा में विज्ञान को समझने, समझाने के लिए जीवन पर्यन्‍त प्रयत्‍नशील। उनका मानना था कि जिस बात को आप आम आदमी को नहीं समझा सकते, वह विज्ञान अधूरा है। इतना ही नहीं, उन्‍हें आम आदमी की समझ–बूझ पर भी बहुत भरोसा था। इसीलिए शिक्षा में वे उस ज्ञान के प्रबल पक्षधर थे, जो सदियों से समाज ने अपने अनुभव से अर्जित किया है, लेकिन उसकी कूपमंडूकता के उतने ही विरोधी। उनके एक-एक शब्‍द में अंधविश्‍वासों, तंत्र-मंत्र के खिलाफ जंग झलकती है। दूरदर्शन पर वर्षों तक चलने वाला प्रोग्राम ‘टर्निंग प्‍वांइट’ इसलिए इतना लोकप्रिय और ज्ञानवर्धक बना। देश के कोने-कोने से आए किसी भी प्रश्‍न को वे बच्‍चों की सी  सहजता से उठाते थे और मानते थे कि स्कूल यदि बच्चों के इस सहज ज्ञान को विज्ञान की नयी रोशनी में संवर्धित कर पाये तो शिक्षा का कायाकल्‍प हो सकता है।

हर मंच पर स्कूल, विश्‍वविद्यालय, मंत्रालय तक उन्होंने  बार-बार दोहराया कि बच्चे केवल ज्ञान के ग्राहक ही नहीं हैं। वे उसे समृद्ध भी करते हैं। बराबर के भागीदार। किसान, आदिवासी समाज के शब्द, बोली और परंपरागत जानकारी भी उतनी ही महत्वपूर्ण है, जितना शहरी किताबी ज्ञान। पाठ्यक्रम में दोनों का सामंजस्य, संतुलन चाहिए। स्कूल की दीवारों के भीतर और और उसके बाहर के परिवेश में जितना कम फासला होगा, शिक्षा उतनी ही बेहतर, सहज, रुचिकर होगी। माध्यम भाषा की कसौटी पर यशपाल की अवधारणा को परखा जाए तो हमारे शहरी स्कूल उस विदेशी भाषाओं में पढ़ाते हैं, जो अपने आसपास के परिवेश से बहुत दूर है।

एक साथ उन्‍हें कास्मिक वैज्ञानिक, शिक्षाविद, विज्ञान संपादक, प्रशासक की श्रेणी में रखा जा सकता है। अपने अग्रज समकालीन भौतिक वैज्ञानिक, शिक्षाविद डॉ. दौलत सिंह कोठारी की तरह। अपनी भाषाओं के प्रति दोनों का प्‍यार बेमिसाल रहा। मुझे याद आ रही है, दिल्‍ली की एक गोष्‍ठी। जवाहर लाल नेहरू विश्‍वविद्यालय में शायद नेहरूजी के ही किसी वैज्ञानिक अवदान के प्रसंग में थी। प्रोफेसर यशपाल मुख्‍य वक्‍ता थे। बोलने के लिए खड़े हुए। मंच की तरफ देखते हुए पूछने लगे कि‍ क्‍या हिन्‍दी में बोल सकता हूं? जाहिर है, दिल्‍ली के ऐसे मंच बहुत स्‍पष्‍टता और उत्‍साह से हिन्‍दी के लिए हामी नहीं भरते। कुछ मिनट तो वे अंग्रेजी में बोले फिर तुरंत हिन्‍दी की सहजता में उतर आए। प्रसंग भी इतने आत्‍मीय थे कि उन्‍हें केवल अपनी भाषा में ही कहा जा सकता था। यादगार भाषण था, वैज्ञानिक सोच को बढ़ाने के लिए। और यह भी कि जो व्‍यक्ति समाज को समझता है, उसके बीच से एक लंबे संघर्ष से गुजरा है, उसे जनभाषा की ताकत और उसकी संवाद शक्ति का एहसास है। यही कारण है कि प्रोफेसर यशपाल के किसी भी भाषण के बाद प्रश्‍नों की बौछार लग जाती थी। कभी-कभी घंटों तक। क्‍योंकि न वे विज्ञान का आतंक चाहते थे, न अंग्रेजी का। ऐसे ही सामान्‍य प्रश्‍नों को संकलित कर एनसीईआरटी ने एक किताब प्रकाशित की है, हिन्‍दी और अंग्रेजी दोनों में- खोजी प्रश्‍न Discovered Questions। एक नेशनल बुक ट्रस्‍ट ने भी Random Curiosities। स्कूल, कॉलेज के विद्यार्थियों के लिए बहुत जरूरी।

यशपाल का जन्म मौजूदा पाकिस्तान के झुंग में हुआ था। विभाजन की त्रासदी के दौर से गुजरते हुए परिवार ने हरि‍याणा के कैथल में डेरा डाला। पंजाब यूनिवर्सिटी से भौतिकी में स्नातकोत्तर के बाद आगे की पढा़ई के लिए  एमआईटी अमेरिका गए। यहाँ दाखिले का प्रसंग भी शिक्षा –विमर्श के लिए बहुत प्रासंगिक है। प्रवेश परीक्षा में वे असफल रहे, तो उन्हें फिर से परीक्षा देने को कहा गया और इस बार उन्होंने बहुत अच्छा किया। सबक यह कि व्यक्ति की क्षमताओं को मापने के लिए परीक्षा पद्धति‍यों  को लचीला बनाने की जरूरत है– दुनियाभर के वि‍श्‍ववि‍द्यायलों की तर्ज़ पर।

विज्ञान के साथ-साथ शिक्षा में उनका मौलिक योगदान रहा है। 1992 में ‘बस्‍ते का बोझ’ शीर्षक से उनकी रिपोर्ट पर्याप्‍त चर्चा में रही है। वे कोचिंग और ट्यूशन के घोर विरोधी थे। कोचिंग के बूते आईआईटी में चुने जाने के भी वे पक्ष में नहीं थे। उनका मानना था कि यह बनावटी सफलता है। जो सफल हो जाते हैं, उन्‍हें दूसरे विषयों का शायद ही कोई ज्ञान होता है और जो असफल रहते हैं, वे पूरी उम्र एक निराशा के भाव में रहते हैं। पाठ्यक्रम, शिक्षक विद्यार्थी अनुपात, नर्सरी के दाखिले में टेस्ट, माँ- बाप के इंटरव्यू को बंद करना जैसी बातों को उन्‍होंने राष्‍ट्रीय स्‍तर पर उठाया और समझाने की कोशिश की। उनकी अध्‍क्षता में बना राष्‍ट्रीय पाठ्यचर्चा कार्यक्रम-2005 एक ऐतिहासिक दस्‍तावेज है। हालांकि इसके पक्ष–विपक्ष में कम विवाद नहीं हुआ। पारंपरिक विज्ञान के धुर विरोधी इतिहासकारों ने यह कहकर चुनौती दी कि इसकी प्रमाणिकता पर संदेह है, लेकिन यशपाल अपनी मान्यता पर अडिग रहे। उनका कहना सही था कि उसे सिरे से नकारने की बजाय नयी वैज्ञानिक कसौटियो पर कसा जाए क्योंकि हर ज्ञान, समझ समाज सापेक्ष होता है। ग्रेड प्रणाली, परीक्षा को तनाव मुक्‍त करने की उनकी सिफारिशों का दूरगामी महत्व है। समान स्कूल व्यवस्था की बात कोठारी आयोग ने 1966 में की थी, यशपाल भी उसके पूरे समर्थन में थे। एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा था कि सरकारी स्कूल इतने अच्छे और ज्यादा हो जाएँ कि बच्चे निजी स्कूल की तरफ झांके भी नहीं। घर की सारी आमदनी इन प्राइवेट स्कूल में बर्बाद हो रही है।  2008 में उच्‍च शिक्षा के कायान्‍तरण के लिए भी उन्‍होंने एक रिपोर्ट बनायी। दुर्भाग्‍य से इन दोनों ही रपटों को न सही रूप में समझा गया, न लागू किया गया।

जीवनभर अटूट जिजीविषा और उत्‍साह से काम करने वाले यशपाल जी को अंतिम दिनों में इसका अहसास था। वर्ष 2009 में आकाशावाणी के एक कार्यक्रम में मैंने जब समान शिक्षा, अपनी भाषा में पढ़ाई का माध्‍यम, बढ़ती कोचिंग के प्रश्‍नों पर सरकार की असफलता के बारे में पूछा तो उनके स्‍वर में उतनी ही निराशा थी। यों उन्‍हें पद्मभूषण, पद्मविभूषण जैसे सर्वोच्‍च पुरस्‍कारों से नवाजा गया, उनकी शिक्षा संबंधी सिफारिशों की चर्चा भी देशभर में होती है, लेकिन इसे देश का दुर्भाग्‍य न कहें तो क्‍या कहें कि‍ जहां ऐसे वैज्ञानिक के होते हुए भी वैज्ञानिक सोच के पैमाने पर इतना बड़ा देश दुनिया के सबसे फिसड्डी देशों में है। प्रोफेसर यशपाल को सच्‍ची श्रद्धांजलि उनके विचारों, शिक्षा को फिर से जीवित करने, जन-जन तक फैलाने में है।

ऐसे भी बढ़ता है बस्‍ते का बोझ

निजी स्‍कूलों के बोझ को सरकारी स्‍कूल के बच्‍चों की तुलना में अक्‍सर दोगुने से भी ज्‍यादा वज़न का बस्‍ता लादना पड़ता है। इसमें जरूरी किताबों की बजाय गैरजरूरी किताबों की संख्‍या ही अधिक होती है। मिसाल के लिए, आठवीं कक्षा तक चले वाली सुलेख की किताबें। इन गैरजरूरी किताबों की कीमतें भी जरूरी किताबों की तुलना में बहुत ज्‍़यादा होती हैं। लेकिन हर विद्यार्थी को ये सभी किताबें खरीदनी पढ़ती हैं।

होता यह है कि प्राइवेट स्‍कूलों में चलने वाली अधि‍कांश किताबें निजी प्रकाशक छापते हैं। मान लो किसी किताब की लागत 3 रुपये है तो प्रकाशक उसे पुस्‍तक विक्रेता को 6 रूपये में देगा।     पुस्‍तक विक्रेता, निजी स्‍कूलों के पाठ्यक्रम में उस किताब को शामिल करवा लेगा और इसके बदले स्‍कूल के विद्यार्थियों की कुल संख्‍या के हिसाब से स्‍कूल एक प्रति पर 3 रुपये कमीशन लेगा। यानी यह किताब पुस्‍तक विक्रेता को कुल 9 रूपये में पड़ी। लेकिन विद्यार्थी को यही किताब 15 से 20 रूपये तक में मिलेगी। अब पाठ्यक्रम में जितनी ज्‍़यादा किताबें होंगी प्रकाशक, पुस्‍तक विक्रेता और स्‍कूल चलाने वालों को उतना ही ज्‍़यादा मुनाफा होगा। ज़ाहिर है, इन तीनों में से कोई भी बच्‍चे के बस्‍ते के वज़न की परवाह करेगा तो उसका अपना धंधा चौपट हो जाएगा।

(यशपाल रिपोर्ट- बस्‍ते का वोझ(1992) से/साभार: चकमक, सितम्‍बर, 1994)

लम्बी लकीर खींच गया रवांई साहित्य महोत्सव : प्रवीन कुमार भट्ट

लेखक मंच - Fri, 04/08/2017 - 02:02


रवांई साहित्य महोत्सव में वि‍चार व्‍यक्‍त करते वक्‍ता।

देहरादून : यमुना और टोंस नदियों से लगा प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर रवांई क्षेत्र अपने प्राचीन इतिहास व विशिष्ट संस्कृति के लिए जाना जाता है। क्षेत्र की भवन निर्माण कला व काष्ठशिल्प भी बेजोड़ है। इतिहासकारों का मत है कि हिमांचल व उत्तराखंड की सीमा में बसे रवांई क्षेत्र में पाए गए अनेक प्राचीन मंदिर व अन्य निर्माण 1000 वर्ष से भी अधिक पुराने हैं। इससे ही इस क्षेत्र की प्राचीन संस्कृति का सहज अंदाजा हो जाता है। कृषि और बागवानी के क्षेत्र में भी रवांई का कोई सानी नहीं है। रवांई का लाल चावल अपनी खूबियों के लिए दूर-दूर तक पहचाना जाता है। यमुना-टोंस के अलावा कमल और ऐसी ही अनेक छोटी नदियां रवांई क्षेत्र को सरसब्ज रखने में अपना योगदान देती हैं।

उत्तराखंड के देहरादून और टिहरी जनपद की सीमाओं से लगे उत्तरकाशी जनपद का रवांई क्षेत्र कृषि, बागवानी, पशुपालन व स्वरोजगार के लिए जाना जाता है लेकिन इस क्षेत्र में साहित्यिक गतिविधियां नगण्य रही हैं। रवांई क्षेत्र की साहित्यिक शून्यता को भरने की पहल सामाजिक संस्था अर्श व देहरादून की प्रकाशन संस्था समय साक्ष्य द्वारा प्रारंभ की गई। दोनों संस्थाओं ने मिलकर 29-30 जुलाई 2017 को रवांई क्षेत्र के केन्द्रीय नगर पुरोला में रवांई साहित्य महोत्सव का आयोजन किया। टीएचडीसी सेवा, टोंस वन प्रभाग पुरोला व होटल क्लासिक हिल व्यू के सहयोग व रवांई साहित्य महोत्सव आयोजन समिति के संयोजन में आयोजित दो दिवसीय आयोजन में कुल दस सत्र आयोजित किए गए।

रवांई घाटी में पहली बार आयोजित साहित्य महोत्सव महानगरों में आयोजित हो रहे साहित्य महोत्सवों से उन्नीस नहीं रहा। इस आयोजन के सत्र इस प्रकार रखे गए कि साहित्य महोत्सव में साहित्यकार, राजनीतिज्ञ, सामाजिक कार्यकर्ता, पर्यावरणविद्, व्यवसायी, इतिहासकार व किसान सभी एक साथ मंच पर नजर आए। साहित्य महोत्सव में न सिर्फ हिन्दी साहित्य में पहाड़ जैसे आंचलिकता व स्थानीयता से जुड़े सत्र आयोजित किए गए जिसमें हिन्दी साहित्य के साथ पहाड़ के रिश्ते और उसकी मौजूदगी पर बात हुई, बल्कि यमुना टोंस घाटी के इतिहास, समाज और संस्कृति जैसे सत्र भी हुए। जहां श्रोताओं को यमुना-टोंस घाटी के इतिहास और प्राचीन संस्कृति के विषय में इतिहासकारों से तथ्यपरक जानकारी हासिल हुई। दो दिवसीय रवांई साहित्य महोत्सव 2017 में राज्यसभा सांसद प्रदीप टम्टा, लोकसंस्कृति के पुरोधा प्रो. डी.आर. पुरोहित, जमना लाल बजाज व इन्दिरा गांधी पुरस्कार प्राप्त गांधीवादी विचारक व सामाजिक कार्यकर्ता राधा बहन, उत्तराखंड के पूर्व कैबिनेट मंत्री मोहन सिंह रावत ‘गांववासी’,  राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त किसान युद्धवीर सिंह रावत, बाल मनोविज्ञान विशेषज्ञ खजान सिंह, भारत में सबसे अधिक छह बार माउन्ट एवरेस्ट फतह कर चुके पर्वतारोही लवराज सिंह धर्मशत्तू,  पुस्तकों की दुनिया के जानकार रमाकांत बेंजवाल, बाल प्रहरी के सम्पादक व बाल साहित्यकार उदय किरौला, डॉ राधेश्याम बिजल्वाण, डॉ विजय बहुगुणा जैसे विषय विशेषज्ञ मौजूद रहे।

पुरोला के प्रथम नागरिक नगर पंचायत अध्यक्ष प्यारे लाल हिमानी ने सभी साहित्यकारों व उपस्थित नागरिकों का स्वागत किया। आयोजन के पहले दिन ‘यमुना टोंस घाटी- इतिहास, समाज और संस्कृति, ‘हिमालय और हम’, हिन्दी साहित्य में पहाड़, ‘कवि और कविताएं’ (स्थानीय कवियों का कविता पाठ) जैसे रोचक सत्र आयोजित किए गए। पहले दिन सायं साहित्यकारों को पुरोला से मठगांव व धुनधार होते हुए साहित्यकार महावीर रवांल्टा के गांव महरगांव का भ्रमण कराया गया। महरगांव में महाबीर रवांल्टा की अगुवाई में ग्रामीणों ने साहित्यकारों का जोरदार स्वागत किया। इस अवसर पर ग्रामीणों द्वारा तांदी गीत व नृत्य आयोजन के साथ ही साहित्यकारों को पहाड़ी व्यंजन अरसे, पकौड़ी व लाडू खाने को दिए।

आयोजन के दूसरे दिन का पहला सत्र ‘यमुना टोंस घाटीः स्थानीय आर्थिकी और उसकी चुनौतियाँ’ विषय पर आयोजित किया गया। इसके अतिरिक्त आयोजन का दूसरा सत्र ‘मैं और पहाड़’ विषय पर पर हुआ। इस एकल सत्र को प्रसिद्ध पर्वतारोही लवराज सिंह धर्मशत्तू ने संबोधित किया। दूसरे दिन का तीसरा सत्र ‘पुस्तकें कुछ कहना चाहती हैं’ विषय पर आयोजित किया गया। इस सत्र को राजभवन देहरादून के पुस्तकलाध्यक्ष रमाकांत बेंजवाल ने संबोधित किया। बाल साहित्य और बच्चे सत्र को बालसाहित्य के पारखी उदय किरोला ने संबोधित किया। आयोजन के दूसरे दिन दो पुस्तकों का लोर्कापण भी किया गया। पहली पुस्तक महाबीर रवांल्टा की रवांल्टी कविताओं की पुस्तक ‘गैणी जण आमार सुईन’ तथा दूसरी पुस्तक डॉ. सत्यानन्द बडोनी की ‘बस! इथगि चैन्दू’ रही। आयोजन के दौरान सांस्कृतिक कार्यक्रमों की भी धूम रही। इन कार्यक्रमों में कलाकारों द्वारा रवांई घाटी की लोकसंस्कृति को प्रदर्शित किया गया। जीआईसी पुरोला, शिवालिक पब्लिक स्कूल के छात्रों द्वारा रवांई क्षेत्र के लोकगीतों में नृत्य प्रस्तुत किए गए। आयोजन के दूसरे दिन की शाम रवांई के प्रसिद्ध लोकगायक अनिल बेसारी के नाम रही। बेसारी और उनकी टीम ने स्थानीय लोकगीतों का ऐसा शमा बाँधा कि आयोजन स्थल के आसपास लोग छतों पर चढ़कर कार्यक्रम का आनंद उठाते रहे। इस अवसर पर देहरादून से साहित्यकार शूरवीर सिंह रावत, पत्रकार राजेन्द्र जोशी, मनोज इष्टवाल, दिनेश कंडवाल, सुरेन्द्र पुण्डीर व सुन्दर बिष्ट भी पहुंचे।

रवांई साहित्य महोत्सव में सांस्‍कृति‍क कार्यक्रम पेश करते कलाकार।

‘इतिहास समाज और संस्कृति’सत्र में बोलते हुए राज्यसभा सांसद प्रदीप टम्टा ने कहा कि रवांई का इतिहास समूचे पर्वतीय भूभाग से अलग है। अलग-अलग अवसरों पर हुई पुरातात्विक खुदाई से भी यह संकेत मिल चुके हैं। प्रो. डी.आर. पुरोहित ने बताया कि रवांई क्षेत्र के लोकगीत व लोकनृत्य अपनी अलग ही छाप छोड़ते हैं और यहां संस्कृति अभी अपने मूलरूप में बची हुई है। रवांई क्षेत्र के इतिहास से जुड़े डॉ. राधेश्याम बिजल्वाण ने रवांई की प्राचीन धाड़ा प्रथा के बारे में बताया, जबकि डॉ. प्रहलाद रावत ने रवांई के ऐतिहासिक स्थलों व मंदिरों के बारे में बताया। इसी प्रकार डॉ. बिजय बहुगुणा ने रवांई की बोली की प्राचीनता पर अपनी बात कही। इस सत्र का संचालन इतिहास के प्रवक्ता सुभाष उनियाल ने किया।

‘हिमालय और हम’सत्र में राधा बहन, मोहन सिंह रावत गांववासी व अशोक वर्मा बतौर वक्ता शामिल रहे। राधा बहन ने इशारा किया कि‍ कि‍स प्रकार भारी व अनियोजित निर्माणों के कारण हिमालयी क्षेत्र के पर्यावरण व पारिस्थितिकी को नुकसान पहुंच रहा है। उन्होंने कहा कि विकास और पर्यावरण में संतुलन भविष्य को सुरक्षित रखने की पहली शर्त है। पूर्व मंत्री मोहन सिंह रावत गांववासी ने रवांई क्षेत्र की गई अपनी यात्राओं के साथ ही हिमालय के महत्व और उपयोगिता पर प्रकाश डाला। उत्तराखंड ओबीसी आयोग के पूर्व अध्यक्ष अशोक वर्मा ने कहा कि पर्यावरण और पारिस्थितिकी के साथ संतुलन बनाते हुए विकास भी जरूरी है। उन्होंने हिमालय में संघर्षपूर्ण जीवन जी रहे लोगों के लिए बेहतर नीतियां बनाने की वकालत की। इस सत्र का संयोजन युवा साहित्यकार सुभाष तराण द्वारा किया गया।

‘कवि और कविता’ सत्र में स्थानीय कवियों महावीर रवांल्टा, अर्जुन सिंह नेगी, नीरज उत्तराखंडी, खिलानन्द बिजल्वाण, चन्द्रमोहन नौडियाल, प्रवीन तिवारी, सुभाष तराण, बलदेव सिंह भंडारी, बसंती असवाल व चन्द्रभूषण बिजल्वाण आदि ने कविता पाठ किया।

आयोजन के दूसरे दिन का पहला सत्र ‘यमुना-टोंस घाटीः स्थानीय आर्थिकी और उसकी चुनौतियां’ विषय पर आयोजित किया गया। इस सत्र को कृषि पंडित की उपाधि से नवाजे गए क्षेत्र के प्रगतिशील किसान युद्धवीर सिंह, युवा होटल व्यवसायी हरिमोहन सिंह नेगी, पर्यटन व्यवसायी चैन सिंह रावत, दिनेश भट्ट,  डॉ. आशा राम बिजल्वाण व युवा नेता अमेन्द्र बिष्ट ने संबोधित किया। युद्धवीर सिंह रावत ने बताया कि किस प्रकार यमुना टोंस घाटी में खेती करने के तौर-तरीकों में बदलाव आया और किसान व्यवसायिक खेती की ओर उन्मुख हुए। उन्होंने खेती किसानी के प्रति नई पीढ़ी की उदासीनता और सरकार के रवैये को भी सामने रखा। हरिमोहन सिंह नेगी ने कहा कि यमुना-टोंस घाटी में देश ही नहीं वरन् दुनिया के कुछ खूबसूरत स्थान हैं। यहां वर्ष भर बहने वाली सुंदर नदियां हैं। यहां चांइसील और हर की दून जैसे बुग्याल हैं। फिर भी यहां पर्यटन का वैसा विकास नहीं हो पाया है। इसके लिए उन्होंने मिलकर प्रयास करने पर बल दिया। डॉ. आशा राम बिज्लवाण ने बताया कि यमुना टोंस घाटी की आर्थिकी को मजबूत करने के लिए व्यावसायिक रणनीतियों पर भी फोकस करना होगा, केवल उत्पादन से काम नहीं चलेगा। साहसिक पर्यटन से जुड़े चैन सिंह रावत ने बताया कि यमुना टोंस घाटी से 30 से अधिक ट्रेकिंग रूट हैं।

‘मैं और पहाड़’ सत्र में एकल संबोधन करते हुए पर्वतारोही लवराज सिंह धर्मशत्तू ने युवाओं का आह्वान किया कि वे अधिक से अधिक संख्या में पर्वतारोहण से जुड़ें। उन्होंने बताया कि पर्वतारोहण न सिर्फ आपको हौसला देता है, बल्कि रोजगार भी देता है।

‘पुस्तकें कुछ कहना चाहती हैं’सत्र में रमाकांत बेंजवाल ने उपस्थित श्रोताओं को बताया कि भले ही ऐसा प्रतीत हो रहा है कि पढ़ने की आदत कम हो रही है, लेकिन हकीकत यह है कि प्रकाशित हो रही पुस्तकों की संख्या लगातार बढ़ रही है। इसी प्रकार ‘बाल साहित्य और बच्चे’ सत्र में उदय किरौला ने बाल साहित्य के महत्व पर प्रकाश डालते हुए बच्चों में पढ़ने की आदत विकसित करने पर जोर दिया। इस सत्र का संयोजन प्रेम पंचोली द्वारा किया गया। आयोजन से जुड़ी रानू बिष्ट, राजेन्द्र लाल आर्या, सुभाष उनियाल आदि ने भी विभिन्न सत्रों में प्रतिभाग किया। इस अवसर पर पुस्तक प्रदर्शनी व स्थानीय उत्पादों का स्टॉल भी लगाया गया।

कुल मिलाकर दो दिनों का यह आयोजन यमुना-टोंस घाटी में साहित्य को लेकर एक अच्छी शुरुआत कर गया है जिसकी गूंज अगले आयोजन तक सुनाई देती रहेगी।

प्रेमचंद के बहाने समय-समाज को समझने की कोशि‍श  

लेखक मंच - Tue, 01/08/2017 - 21:36

रा.इ.का. टोटनौला में दीवार पत्रिका ‘नवांकुर’ के प्रेमचंद अंक का विमोचन किया गया।

पि‍थौरागढ़ : प्रेमचंद जयंती तथा उसकी पूर्व संध्या पार उनको याद करते हुए जगह-जगह विविध कार्यक्रम आयोजित किए गए। इसका उद्देश्य प्रेमचंद के बहाने अपने समय और समाज को जानना-समझना और पढ़ने की संस्कृति को आगे बढ़ाना रहा। इस बार पिथौरागढ़ में आरम्भ स्टडी सर्किल, रचनात्मक शिक्षक मंडल और लोकतान्त्रिक साहित्य-संस्कृति मंच द्वारा प्रेमचंद जयंती को एक अलग अंदाज में मनाया गया। प्रेमचंद जयंती की पूर्व संध्या पर एक ‘कथा चौपाल’ का आयोजन किया गया। इसके न किसी को औपचारिक आमंत्रण पत्र दिए गए, न किसी को अध्यक्षता के लिए कहा गया और न ही कोई मुख्य वक्ता तय किया गया। कथा पाठ हुआ। उसके बाद उपस्थित लोगों ने बिना किसी औपचारिकता के कहानी को लेकर अपनी-अपनी बात रखी। गिर्दा के जनगीतों से कार्यक्रम की शुरुआत और समापन हुए। लोग उसके बात भी चर्चा-परिचर्चा करते हुए देखे गए।

कार्यक्रम का एक विहंगम शब्द-चित्र ‘बाखली’ के संपादक गिरीश चन्द्र पाण्डेय ने अपने फेसबुक वाल पर कुछ यूँ खींचा है- बरसात का दिन, राम लीला फिल्ड,और मुंशी प्रेमचंद जयंती का पूर्व दिन शाम के साढ़े चार बजे के आसपास बरसात का रुक जाना और आरम्भ स्टडी सर्कल के कुछ युवा साथी अपने पोस्टरों और किताबों से भरे झोलों के साथ बाहर निकलते हैं। साथ में विनोद उप्रेती, राजीव जोशी, कमलेश उप्रेती, चिंतामणि जोशी, किशोर पाटनी, दिनेश भट्ट आदि का ओपन थियेटर की ओर आना पिथौरागढ़ के माहौल में आ रहे परिवर्तन की ओर इंगित कर रहा था। बस कुछ ही पलों में पोस्टर लहराने लगे और एक मेज पर सज गई थीं कुछ स्थूल और कुछ कृसकाय किताबें। अब तक कुछ भी तो नहीं था, दो-चार लोगों के सि‍वाय।लग रहा था कि‍ बस इतने ही लोग क्या बोलेंगे। क्या सुनेंगे। क्या विचार-विमर्श होगा। कुछ ही देर में महेश पुनेठा आदि का आना और सीढ़ियों पर बैठ जाना । एक-एक कर संख्या का बढ़ते जाना। और बिना औपचारिकता के आरम्भ के साथियों के संचालन में गिर्दा के जनगीत के साथ प्रेमचंद की दो बैलों की कथा का अभिनयात्मक वाचन । थोड़ी ही देर में शिक्षकों और छात्रों के समूह से सामने की सीढ़ियां भर गईं। थोड़ी दूर पर बैठे कुछ बच्चे पहले कुछ मजाकिया मूड में थे, कहानी के उतार-चढ़ाव के साथ खुद को जोड़ने से रोक नहीं पाए। चुपचाप आए और पीछे बैठ गए और कहानी में लीन हो गए। तहसील परिसर की दीवार पर कुछ लोग जो ऐसे ही खड़े थे, दीवार के सहारे खड़े होकर हीरा और मोती की बातें ऐसे सुन रहे थे मानो अपने गांव की सैर में चले गए हों। बीच-बीच में बज रहीं मोबाइल की घण्टियों से ऐसा लग रहा था मानो थियेटर में पार्श्व संगीत चल रहा हो। करीब पौन घण्टे चली कहानी अब पूर्णता की ओर थी । आखिर कहानी पूरी हुई । युवा संचालक का बातचीत को आगे बढ़ाना । खुले मंच को अपने विचारों को साझा करने को कहना । किसी कहानी को कौन किस तरह किन कोणों से पढ़ता और समझता है, कितना अपने से और समाज से जोड़ पाता है, तत्कालीन समाज और समय और आज के परिपेक्ष्‍य में कहानी उपादेयता, पात्रों का गठन और उनकी उपयोगिता पर खुल कर चर्चा परिचर्चा हुई । खास बात यह थी की बोलने वालों में सबसे मुखर युवा और बच्चे थे । सभी ने यह माना कि यह खुली चर्चा शहर में पढ़ने और पढ़ाने की संस्कृति को विकसित करने के लिए एक सार्थक पहल है। यह लगातार होनी चाहिए। रचनात्मक शिक्षक मंडल का योगदान भी सराहनीय रहा। युवाओं को अगर सही मर्गदर्शन मिले तो शहर की फिजा बदल सकती है। युवाओं का यह जोश भविष्य के प्रति आश्वस्त करता है। अंत में फिर जनगीत के साथ एक खूबसूरत खुले मंच का विसर्जन। और उसके बाद किशोर पाटनी, राजीव जोशी, चिंतामणि जोशी की औपचारिक बातें। कुल मिलाकर एक खूबसूरत शाम ।अब बारिश शुरू हो चुकी थी ।

कार्यक्रम में पोस्‍टर रहे आकर्षण का केंद्र।

इस कार्यक्रम के बारे में डीडीहाट से शामिल होने आए शिक्षक साथी कमलेश उप्रेती ने अपनी फेसबुक पोस्ट में लिखा है कि कुछ बेहतर करने के लिए बहुत बड़े तामझाम की जरूरत बिल्कुल नहीं होती। लगन हो और नीयत साफ तो खुले आसमान के नीचे भी शानदार आयोजन हो सकता है। इसका उदाहरण है पिथौरागढ़ में कालेज में पढ़ने वाले युवाओं का एक रचनात्मक समूह ‘आरंभ स्टडी सर्कल’। कल महान भारतीय साहित्यकार मुंशी प्रेमचंद के जन्मदिन पर कथा चौपाल का अनौपचारिक आयोजन इन जोशीले युवाओं द्वारा किया गया। साथ में एक बुक स्टॉल भी, जहां पर प्रेमचंद साहित्य के साथ वैज्ञानिक विषयों पर किताबें खरीदने के लिए उपलब्ध, कितना सुखद है यह सब हमारे पिथौरागढ़ में हो रहा है।
कहानी ‘दो बैलों की कथा’ का वाचन नाटकीय संवाद शैली में किया गया तो आभास हुआ कि इस तरह सामूहिक वाचन से कथ्य के कितने सारे आयाम खुलते हैं!  दोस्तो, इस दौर में जब युवा राह चलते भी अपने स्मार्टफोन में घुसा रहता है, आपके किताब उठाकर सरेआम पचास लोगों को पढ़कर सुनाने के जज्बे को सलाम बनता है।

प्रेमचन्द जयंती की पूर्व संध्या पर रचनात्मक शिक्षक मण्डल रामनगर द्वारा एमपी इंटर कालेज में कार्यक्रम आयोजित किया गया । इस कार्यक्रम के बारे में कार्यक्रम के संयोजक नवेंदु मठपाल अपनी फेसबुक पोस्ट पर बताते हैं कि 38 विद्यालयों के 700 से अधिक बच्चे, मौका था प्रेमचन्द जयंती की पूर्व संध्या पर रचनात्मक शिक्षक मण्डल द्वारा एमपी इंटर कालेज में आयोजित कार्यक्रम का। ये बच्चे विगत एक महीने में 10 हजार बच्चों से विभिन्न तरीकों से कि‍ए गए सम्पर्क के परिणामस्वरूप आए। बोर्ड सचिव श्री वीपी सिमल्टी जी ने बतौर मुख्य अतिथि अपने स्कूली दिनों को प्रेमचन्द की कहानियों के बहाने याद किया, तो बतौर विशिष्ट अतिथि मौजूद कुमाउंनी साहित्यकार मथुरादत्त मठपाल जी ने भी वक्तव्य रखा। ललिता बिनवाल स्मारक समिति के अध्यक्ष बिनवाल जी, वरिष्ठ चित्रकार सुरेश लाल जी, रंगकर्मी रामपाल जी, कवि असगर जी, संजय रिखडी जी के नेतृत्व में भोर संस्था की नौजवान टीम के साथियों, अनेक प्रधानाचार्यों एसपी मिश्रा जी, राय जी, दिग्विजय सिंह जी, पुष्पा बुधानि जी, नलनी श्रीवास्तव जी, नीना सन्धु जी, जीतपाल जी के नेतृत्व में रोवर्स, रेंजर्स की टीम समेत 50 से अधिक शिक्षक-शिक्षिकाओं का रहा सक्रिय सहयोग। देघाट के शिक्षक साथी पाठक जी का विशेष धन्यवाद। बच्चों की एक टीम लेकर पहुंच गए।

अनौपचारि‍क कार्यक्रम में लोगों ने दि‍खाई खासी रुचि‍।

कार्यक्रम की शुरुआत भोर की टीम ने 1857 विद्रोह के प्रयाण गीत ‘हि‍म हैं इसके मालिक हिंदुस्तान हमारा’ एवं रामप्रसाद बिस्मिल के गीत ‘सरफरोशी की तमन्‍ना’ से हुई। प्रत्येक प्रतिभागी बच्चे को दिया गया- प्रेमचन्द साहित्य। आयोजक मण्डल द्वारा निकाली गई पुस्तिका ‘हमारी विरासत’ का भी विमोचन हुआ। कौन कहता है कि‍ बच्चे पढ़ना नही चाहते, शिक्षकों को तो सिर्फ वेतन और छुट्टी ही चाहिए। रचनात्मक मण्डल की टीम ने फिर गइस धारणा को गलत साबित किया।

गतवर्ष की भांति ही डॉ. डी.डी. पंत स्मारक बाल विज्ञान खोजशाला बेरीनाग में प्रेमचंद जयंती की पूर्व संध्या पर भव्य आयोजन किया गया। साथी कमलेश जोशी अपनी फेसबुक वॉल में बताते हैं कि  इस कार्यक्रम में विभिन्न स्कूलों के बच्चों ने प्रेमचंद की कहानियों पर पोस्टर बनाए, कहानियों का वाचन किया और नाटक किए। फ़िल्म ‘ईदगाह’ का प्रदर्शन भी किया गया। उल्लेखनीय है कि पिछले वर्ष प्रेमचंद जयंती के अवसर पर यहाँ एक बालिका द्वारा प्रेमचंद की कहानी ‘दो बैलों की कथा’ का कुमाउंनी भाषा में किया अनुवाद काफी चर्चित रहा था।

प्रेमचंद जयंती की पूर्व संध्या पर अज़ीम प्रेमजी फाउन्डेशन, टीएलसी गरुड़ में भी कार्यक्रम आयोजि‍त हुए। इसके बारे में युवा लेखक बिपिन जोशी अपनी  फेसबुक वॉल पर कुछ इस तरह बताते हैं-  मुंशी प्रेमचंद जयंती की पूर्व संध्या पर अज़ीम प्रेमजी फाउन्डेशन, टीएलसी गरुड़ में कहानी वाचन एवम काव्य गोष्‍ठी का आयोजन किया गया। प्रेमचंद जी की मशहूर कहानी ‘बड़े भाई साहब’ का वाचन किया गया । कहानी पर सारगर्भित चर्चा की गई । उक्त कार्यक्रम में शिक्षक साथियों सहित उत्तराखण्ड के लोक साहित्यकार गोपाल दत्त भट्ट, मोहन चन्द्र जोशी, चन्द्र शेखर बडशीला, ओम प्रकाश फुलारा, वरिष्ठ पत्रकार आनंद बिष्ट तथा जिला शिक्षा अधिकारी आकाश सारस्वत भी मौजूद रहे।

कार्यक्रम का संचालन करते हुए शिक्षक नीरज पन्त ने मुंशी जी के साहित्य पर उनके जीवन पर प्रकाश डाला। मुंशी जी के बहाने दलित साहित्य और नारी साहित्य पर भी बातचीत की गई । कहानी ‘बड़े भाई साहब’ का वाचन शिक्षक उमेश जोशी ने कि‍या।
कथा चर्चा के बाद कुमाउंनी लोक साहित्य के प्रख्यात हस्ताक्षर मोहन जोशी, वरिष्ठ साहित्यकार गोपाल दत्‍त भट्ट, ओमप्रकाश फुलारा ने अपनी रचनाओं का पाठ कि‍या।
साहित्य गोष्‍ठी को एक महत्वपूर्ण रचनात्मक कार्यक्रम बताते हुए डीईओ आकाश सारस्‍वत ने प्रेमचंद की कालजयी रचनाओं की प्रसंगिकता पर विचार रखे।

कुमाउं  मंडल  के विभिन्न स्कूलों में भी प्रेमचंद जयंती अपने-अपने तरीके से मनाई गई।  रा.इ.का. देवलथल में अनेक कार्यक्रम आयोजित किए गए। दीवार पत्रिका ‘मनोभाव’ के प्रेमचंद विशेषांक का प्रधानाचार्य अनुज कुमार श्रीवास्तव ने लोकार्पण किया। उन्होंने कहा कि‍ प्रेमचंद का साहित्य हमें साम्प्रदायिकता, जातिवाद, क्षेत्रवाद जैसी संकीर्णताओं से ऊपर उठने की प्रेरणा देता है। उन्होंने बच्चों द्वारा सम्पादित दीवार पत्रिका के इस विशेष अंक की प्रशंसा करते हुए कहा कि इस तरह के प्रयास अधिकाधिक होने चाहिए क्योंकि इससे बच्चों की रचनाशीलता और कल्पनाशीलता को नए आयाम मिलते हैं। इससे पूर्व कार्यक्रम का संचालन करते हुए दीवार पत्रिका के संपादक राहुल चन्द्र बड़ ने प्रेमचंद के व्यक्तित्व और कृतित्व पर प्रकाश डाला। शिक्षक रमेश चन्द्र भट्ट ने एक दि‍न पूर्व ‘प्रतिभा दिवस’ पर जूनियर कक्षाओं द्वारा तैयार की गई  दीवार पत्रिकाओं का बच्चों द्वारा समूहवार प्रस्तुतीकरण भी  किया गया।

इससे पूर्व प्रेमचंद जयंती पर कक्षावार निबंधों का पाठ किया गया। कक्षा-12 में उनके निबंध ‘प्राचीन और नवीन’ तथा कक्षा-10 में ‘आजादी की लडाई’ का वाचन किया गया। इन पर बच्चों ने लिखित रूप से अपनी प्रतिक्रिया दी। कक्षा-9 के बच्चों के साथ प्रेमचंद की प्रमुख कहानियों की चर्चा करते हुए उन्हें पढ़ने के लिए प्रेरित किया गया। बच्चों को बताया गया कि कहानियां हमें केवल आनंद ही नहीं प्रदान करती हैं, बल्कि वे जिस कालखंड में रची गयी होती हैं, उस समय और समाज के बारे में बहुत कुछ बताती हैं।जैसे- प्रेमचंद के साहित्य को पढ़ते हुए वे आजादी की लडाई के बारे में तथा उस समय के समाज के बारे में बहुत कुछ जान और समझ सकते हैं। इससे हमारी भाषा भी मजबूत होती है। इसलिए पाठ्यपुस्तकों के साथ-साथ साहित्य की पुस्तकें भी पढ़ी जानी चाहिए। न केवल खुद, बल्कि दूसरों को भी पढ़ने के लिए प्रेरित करना चाहिए। इसके लिए पुस्तकालय खोलने के अभियान से जुड़ने की बच्चों से अपील की गई।  बच्चों ने लिखित रूप से संकल्प व्यक्त किया कि वे अपने-अपने गांव में छोटे-छोटे पुस्तकालय स्थापित करने की कोशिश करेंगे। साथ ही वे प्रेमचंद की अगली जयंती तक उनकी अधिक से अधिक रचनाएँ पढ़ेंगे।

रा.इ.का. टोटनौला में शिक्षक-साहित्यकार चिंतामणि जोशी के मार्गदर्शन में दीवार पत्रिका ‘नवांकुर’ के प्रेमचंद अंक का विमोचन किया गया। उन्‍होंने अपनी फेसबुक वाल लि‍खा है कि‍ आज मास का अंत था और चौथे वादन के बाद दीवार पत्रिका समूह द्वारा ‘नवांकुर’ के प्रेमचंद विशेषांक के लोकार्पण व प्रेमचंद जयंती मानाने की योजना भी थी। सुबह विद्यालय पहुंचे तो रात भर के बाद भी बरसात जारी थी। बच्चे पिछले लगभग 15 दिनों से अपने ढंग से प्रेमचंद को जानने-समझने में लगे थे। इस माह दीवार पत्रिका के भी दो अंक तैयार कर चुके थे। विद्यालय में बृहद कक्ष है नहीं। तीसरे वादन तक भी मौसम नहीं खुला तो कक्षा 11अ के बच्चों ने अपनी कक्षा का फर्नीचर बगल के कक्ष में शिफ्ट कर कक्षा में दरिया बिछा दीं और शिक्षकों के लिए कुर्सियां डालकर प्रधानाचार्य जी को सूचित कर दिया कि कार्यक्रम होगा और कक्षा कक्ष में ही होगा। वाह! जहाँ चाह वहां राह।

दीवार पत्रिका संपादक मंडल ने मध्यांतर के बाद विद्यार्थियों को बिना बैग के छोटे से कक्ष में बिठा दिया। मुख्य संपादक कविता कापड़ी ने आवश्यक निर्देशों के बाद प्रेमचंद जयंती पर कार्यक्रम की रूपरेखा प्रस्तुत की कि नवांकुर का लोकार्पण, आलेख-कविताओं-कहानियों का वाचन, समीक्षा, प्रेमचंद के बहाने पढ़ने-लिखने की संस्कृति पर संवाद होगा और गणित अध्यापिका नीता अन्ना को बच्चों की ओर से विदाई भी दी जाएगी। कविता 100 बच्चों के भीतर स्व-अनुशासन रोपित कर चुकी थी।

प्रधानाचार्य कैलाश बसेड़ा जी के साथ श्रीमती अन्ना, पूनम, स्वाति व दीवार पत्रिका टीम ने नवांकुर का लोकार्पण किया। प्रधानाचार्य ने दीवार पत्रिका के महत्व को सीखने-सिखाने की प्रक्रिया में महत्वपूर्ण मानते हुए बच्चों की खूब प्रशंसा की। छात्रा बबीता पाण्डेय ने स्वरचित कुमाउंनी कविता में प्रेमचंद की जीवनी और रचना संसार को व्यक्त किया। कमलेश पाण्डेय ने स्वरचित ‘प्रेमचंद जिन्होंने साहित्य में यथार्थ को निरूपित किया’ तथा आकांक्षा ने ‘प्रेमचंद की रचनाओं में स्त्री पक्ष’ आलेख का वाचन किया। तनुजा कापड़ी ने स्वरचित कहानी ‘शेरा की वापसी’ का पाठ कर सभी की संवेदना को झकझोरा। हिंदी शिक्षक राजेन्द्र बिष्ट, प्रकाश राम व विज्ञानं शिक्षक संतोष पन्त ने बच्चों को प्रेमचंद के विस्तृत रचना संसार की सैर कराई। मैंने प्रेमचंद के सम्बन्ध में बच्चों के प्रश्नों एवं जिज्ञासाओं के समाधान का प्रयास किया। उन्हें प्रेरित किया कि अच्छा साहित्य पढ़ने की आदत विकसित कर कैसे वे बेहतर इन्सान बन सकते हैं।

बागेश्वर जनपद के गरुड़ विकासखंड में स्थित राजकीय जूनियर हाईस्कूल रौल्याना में नवाचारी शिक्षक साथी नीरज पन्त के निर्देशन में  प्रेमचंद की जयंती मनाई गई। इस अवसर पर बच्चों ने मुंशी प्रेमचंद की कहानी ‘ईदगाह’ और ‘पूस की रात’ का वाचन किया एवं कहानी के तत्वों पर चर्चा की।  ग्राम प्रधान मदन गिरी की अध्यक्षता में विविध कार्यक्रम हुए।

क्रि‍एटि‍व उत्‍तराखंड द्वारा रुद्रपुर में संचालित सृजन पुस्‍तकालय में भी प्रेमचंद जयंती पर कार्यक्रम आयोजि‍त कि‍या गया। इस अवसर पर प्रेमचंद की जीवन पर प्रकाश डाला गया और ईदगाह और दो बैलों की कहानी का वाचन कि‍या गया। इसके साथ कवि‍ता पाठ भी हुआ।

राजकीय इंटर कॉलेज खरसाड़ा पालगेट टि‍हरी गढ़वाल में आयोजि‍त कार्यक्रम में दो बैलों की कहानी और कई अन्‍य कहानि‍यों का वाचन और चर्चा हुई। साथ ही प्रेमचंद की भाषा, जीवन दर्शन और सामाजि‍क सरोकारों पर चर्चा हुई। कार्यक्रम का संचालन मोहन चौहान ने कि‍या।

राजकीय प्राथमि‍क वि‍द्यालय नवीन चौरसौ बागेश्‍वर में प्रेमचंद जयंती पर बच्चों ने दीवार पत्रिका ‘मन की बात’ तैयार की। मुख्य का आकर्षण प्रेमचंद की कहानियों का वाचन, जीवन परिचय, स्वरचित कहानी पाठ और चित्रांकन रहा। कार्यक्रम प्रधानाध्‍यापि‍का रीता जोशी की देखरेख में संपन्‍न हुआ।

प्रेमचंद जयंती पर आयोजि‍त कार्यक्रम में बड़ी संख्‍या में बच्‍चों की भागेदारी बहुत कुछ कहती है।

प्रस्‍तुति‍ : महेश चन्द्र पुनेठा

हिन्दी नवजागरण में प्रेमचंद : मनमोहन

एक ज़िद्दी धुन - Mon, 31/07/2017 - 11:42

भारतीय नवजागरण और राष्ट्रीय स्वाधीनता संघर्ष की श्रेष्ठतम उपलब्धियों में एक प्रेमचंद भी हैं। आज़ादी के बाद बहुत से अवांगर्द कहते थे कि प्रेमचंद पुराने पड़ गए हैं। बल्कि प्रेमचंद के निधन के बाद ही बहुतों को ऐसा लगने लगा था। लेकिन इसे अलग से साबित करने की कोई ज़रूरत नहीं है कि प्रगतिशील आन्दोलन ने प्रेमचंद के छोड़े हुए सिलसिले को बड़ी शिद्दत से संभाला और आगे बढ़ाया। आज़ादी के बाद के रचनात्मक संघर्ष की कहानी भी यही बताती है कि प्रेमचंद कभी इतने पुराने नहीं हुए कि उन्हें बार-बार याद करने की ज़रूरत ही ख़त्म हो जाए। प्रेमचंद का अधूरा काम पूरा होना तो मुश्किल है लेकिन यह आगे ज़रूर बढ़ा है चाहे इसका अधूरापन और भी फैला हुआ दिखाई देता हो। पिछले बीस-पच्चीस बरस में हमारे जीवन में जो कुछ घटा है उसे देखें तो प्रेमचंद और भी करीब लगते हैं और उनके होने की केन्द्रीयता और प्रासंगिकता और भी ज़्यादा समझ में आती है। कहना फ़िज़ूल है कि किसी लेखक की प्रासंगिकता का अर्थ यह नहीं कि नए संदर्भ में उस लेखक को हूबहू दुहराया जा सकता है। इन दिनों खाये-पिये दस-बीस फीसदी लोगों की दुनिया में प्रेमचंद चाहे क़तई अजनबी और फालतू नज़र आएं लेकिन उन करोड़ों-करोड़ हिन्दुस्तानियों के लिए प्रेमचंद का अर्थ अभी कम नहीं हुआ है जो साम्राज्यवादी विश्वीकरण के बर्बर हमलों की सबसे बुरी मार झेल रहे हैं।
जिस ऐतिहासिक कार्यसूची के इर्द गिर्द 19वीं 20वीं सदी के भारतीय नवजागरण का नक्शा उभर कर सामने आया था, शायद उसमें मध्यकालीन सरंचनाओं से बंधे एक परम्परागत समाज की अपनी जातीयता और आधुनिकता की खोज के लक्ष्य सबसे केन्द्रीय अनुरोध थे। इस संदर्भ में पहली बात जो गौरतलब है वह यह कि 19वीं सदी में भारतीय नवजागरण का अंकुरण उपनिवेशीकरण की मुहिम के साथ-साथ और एक औपनिवेशिक परिस्थिति में हुआ। आधुनिकता की सीमित प्रक्रिया के खुलने (आधुनिक शिक्षा, संचार, आधुनिक भाषा, नए मध्यवर्ग के उदय) के साथ जिस समय एक आन्तरिक आलोचना की भूमिका बनी और समाज-सुधार का एजेंडा सामने आने लगा, उसी समय पुराने सामाजिक ढांचों और वर्चस्व की प्रणालियों ने समाज सुधार के कार्यक्रम पर पुनरुत्थानवादी मुहिम के जरिए भारी दबाव बनाया जिससे उसके उदारवादी सारतत्व को कमज़ोर और अनुकूलित किया जा सके।
पुराने और नए उदीयमान सामाजिक अभिजन इस नवजागरण के नायक थे। पुनरुत्थानवाद की मिलावट के साथ समाज-सुधार के सीमित कार्यक्रम भी इन्हें एक नई जगह और आवश्यक गतिशील उर्जा देते थे। इससे इनकी छोटी-छोटी सामुदायिक पहचानें, बड़ी जातीय पहचान की शक्ल में ढ़ल कर सामने आती थीं और इनके वर्चस्व के लिए नई क्षेत्र-रचना होती थी।
उन्नीसवीं शती के उत्तरार्द्ध में एक राजनीतिक आन्दोलन के रूप में राष्ट्रीय आन्दोलन की रेखाएं उभरने के साथ-साथ धीरे-धीरे समाज सुधार का कार्यक्रम पीछे जाने लगा। इसके अलावा सुधार के प्रश्न पर सामाजिक प्रतिक्रियावाद का संगठित और उग्र विरोध सामने आने लगा था। `समाज संशोधन` के आग्रह को `भारतीय संस्कृति` में `विजातीय हस्तक्षेप` और पश्चिम के अंधानुकरण के तौर पर चित्रित और प्रचारित किया गया। महाराष्ट्र के नवजागरण में, जहां रानाडे की `सोशल कॉन्फ्रेंस` या `प्रार्थना समाज` जैसी उदारवादी मध्यवर्गीय संस्थाओं के अलावा ज्योतिबा फुले और उनके सत्यशोधक समाज के रूप में समाज सुधार आन्दोलन की ज़्यादा मूलगामी धारा उभर आई थी, वहां यह पुनरुत्थानवादी प्रतिक्रिया सबसे कड़ी थी। विवाह की उम्र 10 से 12 साल करने वाले `Age of Consent Bill` के आने पर महाराष्ट्र में `ऊंची जातियों` की ओर से तीखी प्रतिक्रिया की गई। यही नहीं लमाज सुधार की संस्था सोशल कॉन्फ्रेंस और नवोदित भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के रिश्ते को हिंसक अभियानों के ज़रिए तोड़ा गया। संस्कृति की राजनीति का सहारा लेकर अनुदार विचार और नवोदित राष्ट्रवाद में गूढ़ गठजोड़ कायम हुआ। कुछ ही समय में यह उग्र अनुदारवादी मुहिम साम्प्रदायिक विद्वेष और हिंसा का औजार बन गई। उन्नीसवीं सदी के आख़िरी दशकों में बंगाल, महाराष्ट्र और उत्तर भारत के नवजागरण का साम्प्रदायीकरण और विखंडन तेज हो गया। यह साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण उपनिवेशवादियों के लिए बेहद अनुकूल था जिनके एजेण्डे में 1857 के बाद विभाजनकारी कार्यनीति ने और भी ज़्यादा केन्द्रीयता हासिल कर ली थी।
बंगाल और महाराष्ट्र के मुकाबले हिन्दी प्रदेश के नवजागरण में उदारवादी सारतत्व पहले से ही कम था। इसकी एक वजह तो यही थी कि हिन्दी प्रदेश के नवजागरण ने जब तक होश संभाला तब तक भारतीय नवजागरण में उदारवाद की कार्यसूची, पुनरुत्थानवादस और सम्प्रदायवाद के भारी दबाव में आ चुकी थी। उत्तर भारत में नवजागरण शुरू से साम्प्रदायिक विभाजन और विद्वेष का शिकार था। पुरोहितवाद से कड़ी टक्कर लेने के बावजूद कुल मिलाकर आर्य समाज ने ज़्यादा उग्र और अपवर्जनकारी तरीके से अखिल हिन्दूवाद के एकीकृत कट्टरतावादी नमूने को प्रस्तावित किया। सामाजिक गतिशीलता की आकांक्षी कुछ उदीयमान द्विज जातियों और मध्य जातियों को अपना आधार बनाने के कारण पुरोहितवाद से लड़ना सुगम हुआ। लेकिन आर्यसमाज के नवब्राह्मणवाद में सामाजिक गतिशीलता के आश्वासन के साथ पुनरुत्थानवाद का पुट, संकीर्णता (`पश्चिम` विरोध या `विधर्मियों का आतंक`) और उग्र अनुदारता ब्रह्मसमाज के मुकाबले कहीं ज़्यादा थी।
19वीं सदी के हिन्दी नवजागरण का सबसे ज्यादा लोकप्रिय और सर्वप्रिय अभियान उर्दू के मुकाबले नागरी लिपि में लिखी `नई चाल` की हिंदी (जिसे भारतेंदु मंडल के लेखकों ने `आर्य हिन्दी` कहा है) की प्रतिष्ठा से सम्बन्धित था। किसी हद तक शिक्षा प्रसार के कार्यक्रम के अलावा शायद हिन्दी नवजागरण का यह अकेला कार्यक्रम था जिसमें `आन्दोलन` की ऊर्जा थी। भाषा और लिपि का मुद्दा धर्म से जुड़ गया था और साम्प्रदायिक विभाजन का सक्षम औजार बन गया था। तीखी विद्वेषपूर्ण स्पर्धा इसकी संचालिका शक्ति बन गई। 19वीं शती के उत्तरार्द्ध में हिन्दी नवजागरण की कुल मिला कर जो रूपरेखा बनी उसमें आर्य समाज और भारतेंदु मंडल के आलावा जात पांत के सुदृढ़ीकरण के साथ-साथ उभरीं `गौ रक्षिणी` सभाओं और `लिपि संवर्द्धिनी` सभाओं की बड़ी भूमिका थी। इन तमाम उपक्रमों को देसी रियासतों और रजवाड़ों का भरपूर सहयोग और सरंक्षण हासिल था। आर्य समाज ने `गौ रक्षा `और भाषा-लिपि के इन अभियानों में शरीक हो कर ही सनातन पंथ के प्रभाव क्षेत्र तक अपने नेतृत्व का विस्तार किया। बाद में `शुद्धि आन्दोलन` के जरिये इसी सिलसिले को नई आक्रामकता मिली।
इसे ऐतिहासिक विचित्रता ही कहा जा सकता है कि उत्तर भारत के `जातीय जागरण` को जातीय विखंडन की नींव पर खड़ा होना पड़ा। विखंडन और `जागरण` सहवर्ती प्रक्रियाएं बन गईं। आधुनिक भाषा जातीय गठन का एक अनिवार्य औजार मानी जाती है। यह कोरा औजार भी नहीं है बल्कि यह जाति, धर्म की संकीर्ण पहचानों से बाहर एक वृहत्तर जातीय समुदाय के बनने की रासायनिक प्रक्रिया का अंग है। लेकिन खुद इस प्रक्रिया में ढ़ल कर निकली उत्तर भारत की ख़ूबसूरत आधुनिक बोली साम्प्रदायिक होड़ की शिकार हुई और दो टुकड़े हो गई। इतना स्पष्ट बंटवारा हुआ कि उर्दू-फ़ारसी के अच्छे जानकर होने के बावजूद फोर्ट विलियम कॉलेज के लल्लू जी लाल से लेकर बीसवीं सदी के लाला भगवानदीन तक के हिन्दी गद्य पर इसका छींटा तक दिखाई नहीं देता। 19वीं सदी के उर्दू विरोध की परम्परा बीसवीं सदी में हिन्दुस्तानी की ख़िलाफत तक पहुंची।
इसी नवजागरण के हिस्से मुंशी प्रेमचंद भी थे। लेकिन इसे समझने में शायद कठिनाई न होनी चाहिए कि इसमें उनकी जगह ज़्यादा मुश्किल और अलग थी। उर्दू और हिन्दी दोनों के अलग-अलग लिखे गए इतिहासों में उनकी एक ही जगह है। इस बात का महत्व और अर्थ कभी कम न होगा कि प्रेमचंद ने अपने विचार और रचनात्मक व्यवहार के जरिए उत्तर भारतीय नवजागरण के साम्प्रदायिक विभाजन के धूर्त तर्क को सिरे से रद्द कर दिया और उसके झूठ के साथ कभी समझौता नहीं किया। इस `नीच ट्रेजैडी` के साथ प्रेमचंद कभी संतुष्ट सम्बन्ध नहीं बना सके, जबकि हिंदी नवजागरण के ज़्यादातर पुरोधाओं के बारे में ऐसा नहीं कहा जा सकता। प्रेमचंद के बाद प्रगतिशील आन्दोलन ने ज़रूर इस खाई को अस्वीकार कर के हिन्दी-उर्दू को फिर से करीब लाने में मदद की। वरना हिंदी बौद्धिकता की `मुख्यधारा` की आत्मचेतना में पिछले दो सौ साल के इस अन्तर्विभाजन की पीड़ा शायद ही कभी झलकती हो। सच तो ये है कि खंडित हिंदी जाति की `गौरव यात्रा` का प्रसन्न चित्त वृत्तांत लिखने वाले ज़्यादातर इस अन्तर्विभाजन को ही हिन्दी नवजागरण का सबसे बड़ा कारनामा समझते हैं।
भाषा के मसले पर फिरक़ापरस्ती से लगातार लड़ने और हथियार न डालने का एक खास सामाजिक अर्थ था। अगर जातीय गठन के प्रश्न को प्रेमचन्द ज्यादा बुनियादी ढंग से पेश कर पाते हैं और अपनी रचनाओं में हिन्दुस्तानियत की ज्यादा मजबूत और ज़रख़ेज़ बुनियाद पर खड़े दिखाई देते हैं तो इसकी वजह यही है कि उन्होंने यथार्थ को विभाजन की बाधा के अंदर से नहीं देखा। `हिन्दू`, `मुसलमान` की अपवर्जी और बंद श्रेणियों या मिथक कल्पनाओं की मदद लिए बिना उन्होंने अपने समय के ठोस यथार्थ को, उसके ठोसपन में समझने और अपना रुख तय करने की कोशिश की। धर्म-संस्कृति की राजनीति के पाखंड को वे अच्छी तरह जानते थे, और उसकी छद्म गरिमा का कोई दबाव उन पर नहीं था। साम्प्रदायिकता किस तरह `संस्कृति` और `राष्ट्रवाद` की खाल ओढ़ कर सामने आती है और किस तरह साम्राज्यवाद विरोधी राष्ट्रीय आन्दोलन को विफल करना चाहती है, यह वे खूब समझते थे।
साम्प्रदायिक राष्ट्रवाद के लिए इस अचूक और निर्भ्रांत नज़र के चलते ही प्रेमचन्द के परिप्रेक्ष्य में उदारवादी अन्तर्वस्तु इतनी सघन है। क्योंकि नवजागरण काल में साम्प्रदायिक राष्ट्रवाद की राजनीति के उभार का एक अहम लक्ष्य ठीक इसी अन्तर्वस्तु को कमज़ोर करने का रहा है। इस तथ्य का भी इस चीज़ से ज़रूर एक रिश्ता है कि हिन्दी नवजागरण में प्रेमचनंद यथार्थवाद के सबसे बड़े आविष्कारक और प्रतिष्ठापक हैं। हिन्दुस्तान के देहात के अनेक ग़रीब चेहरे अपनी अनगिनत कहानियों के साथ पहली बार हिन्दी में प्रेमचन्द के ज़रिए ही दाख़िल हुए।
19वीं-20वीं सदी के हिन्दी नवजागरण में (निराला जैसे कुछ अपवादों को छोड़ कर) दलित प्रश्नों की शायद ही कोई जगह बन पाई। यह प्रेमचन्द की उदार जनतंत्रात्मकता का ही एक पहलू था कि वे जाति व्यवस्था की अतार्किता और बर्बरता को और इस में निहित झूठ, मक्कारी, फरेब और हरामखोरी को इतने निर्णायक और विस्तृत ढंग से सामने लाये। इसकी अमनुष्यता के खिलाफ लड़ना उन्हें हमेशा जरूरी लगा। उन्होंने साम्प्रदायिकता और जातिवाद के रिश्ते को ठीक-ठीक समझ लिया था। वे जानते थे कि धार्मिक पहचान को आक्रामकता देकर दलितों और स्त्रियों की अभिव्यक्तियों और प्रश्नों को आसानी से कुचला जा सकता है।
हालांकि, भारतेन्दुयुग में ही कई लेखकों ने जातपात की व्यवस्था में आ गई संकीर्णता और परजीविता की आलोचना की थी। लेकिन उनका परिप्रेक्ष्य `जाति सुधार` का था। `जाति सुधार` का परिप्रेक्ष्य अन्तत: जाति के सुदृढ़ीकरण का ही परिप्रेक्ष्य था। इसमें जातिव्यवस्था के उत्पीड़क और विभेदकारी वर्चस्ववादी चरित्र को नहीं समझा गया।
प्रेमचन्द ने संस्कृति के प्रश्नों को अर्थनीति के प्रश्नों से कभी अलग नहीं किया। न ही उन्होंने आर्थिक या वर्गीय प्रश्नों को सामाजिक-वैचारिक प्रश्नों से अलग किया। यानी प्रेमचन्द न संस्कृतिवाद का सहारा लेते हैं और न अमूर्त अर्थवाद का।
हिन्दी नवजागरण में और उससे भी कहीं ज्यादा उसकी विरुद कथा में लोकवाद की मिथकीय उपस्थिति की एक बड़ी भूमिका रही है। प्रेमचन्द साधारण जनता और खास तौर पर किसानों के लेखक कहे जाते हैं। गांधी का उन पर गहरा असर था। आधुनिक पूंजीवाद को वे गहरे संशय से देखते थे। लेकिन वे किसानों के लोकवाद से संचालित नहीं थे बल्कि शहरी-देहाती गरीबों के जनवादी हितों की नज़र से ही यथार्थ को देखते थे। उन्होंने किसान का या गांव का कोई रहस्यमय मिथक नहीं बनाया जिसकी आड़ लेकर निरंकुश सामाजिक संरचनाओं की पर्दापोशी की जाती है। देहात के ऐसे लोकवादी मिथक को तोड़ कर उन्होंने इसके पीछे चल रहे शोषण और दमन के वर्चस्ववादी सामाजिक-आर्थिक-विचारधारात्मक तंत्र की निष्ठुरता और निरंकुशता को बेपर्दा किया।

हिन्दी नवजागरण का समतलीकरण करते हुए अक्सर यह भुला दिया जाता है कि रामचंद्र शुक्ल के `लोकमंगल` और प्रेमचंद की नज़र में बुनियादी अंतर है। प्रेमचंद का लोक शुक्ल जी के लोक की तरह `उदार निरंकुशतंत्र` का कोई आदर्श नमूना या कोई ख़याल या रूपक भर नहीं है जिसमें वर्चस्व की प्रणाली को चुनौती देना धर्मद्रोह समझा जाय। वह तो ठोस सामाजिक शक्तियों के हितों के पारस्परिक संघर्ष से आंदोलित (और उसी से परिभाषित) एक उपद्रवग्रस्त रणक्षेत्र है जिसमें आर्थिक सामाजिक न्याय के ज्वलंत प्रश्नों की केन्द्रीयता हमेशा बनी रहती है। प्रेमचन्द की सतत चिन्ता वंचित तबकों के हक़ में सामाजिक रूपांतरण की है, जब कि शुक्ल जी का `लोकधर्म` एक ऐसी `ऑथोरिटी` की खोज है, जो `लोकरक्षा` कर सके यानी बाहर और अन्दर से बार-बार चुनौती पाने वाली सामाजिक अनुशासन की `आदर्श` व्यवस्था को मजबूती से लागू कर सके और `छोटे-बड़े` की मर्यादाओं (`शिष्टाचार` और `शील`) की प्रतिष्ठा कर सके। जबकि प्रेमचन्द अपनी दुनिया में बराबरी के मूल्य को केन्द्रीयता देना चाहते हैं।
उसी बनारस से प्रेमचन्द का भी ताल्लुक था जिससे कभी भारतेन्दु का या प्रेमचन्द के समकालीन रामचन्द्र शुक्ल और जयशंकर प्रसाद का। लेकिन यह देखना मुश्किल नहीं है कि प्रेमचन्द के बनारस और जयशंकर प्रसाद की `काशी` में कुछ न कुछ अन्तर ज़रूर है। प्रेमचन्द का बनारस `संस्कृति का कलश` नहीं है। प्राच्यवादियों की मिथक कल्पना के जादू के बाहर यह गरीब हिन्दू-मुसलमान छोटे काश्तकारों, कारीगरों, जुलाहों और दूसरे किरदारों से भरा पड़ा है।
नवजागरण की प्रक्रिया सारत: आधुनिकीकरण की प्रक्रिया थी। और यह उर्दू-हिन्दी के समग्र आधुनिक लेखन में किसी न किसी रूप में घटित हुई। इसे प्रेमचंद में ही नहीं दूसरे नवजागरणकालीन लेखकों में भी किसी न किसी तरह लक्षित किया जा सकता है। लेकिन प्रेमचंद हिन्दी नवजागरण की आत्मबाधा के फन्दे में नहीं फंसे। वे शायद ऐसा इसलिए कर सके क्योंकि वे अलग जगह खड़े थे। वे अन्दर से विभक्त कर दी गई वृहत्तर हिन्दी जाति के प्रतिनिधि रचनाकार थे और इसी जगह से जातीय गठन के प्रश्न को संबोधित कर रहे थे, ज्यादा बुनियादी ढंग से। उन्होंने वास्तविकता को हिन्दी जाति के वर्चस्वशील सामाजिक अभिजनों की गतिशीलता के लक्ष्यों की नज़र से नहीं, इस जाति के बाहर पड़े वंचित तबकों और गरीबों के हितों की नज़र से देखा और इस जगह को कभी छोड़ा नहीं।
हिन्दी नवजागरण (या हिन्दी-उर्दू नवजागरण में) प्रेमचंद का विकासक्रम संभवत: सबसे अधिक सुसंगत और सतत है। उसमें लगातार एक निख़ार है। 1907 के प्रेमचंद, 1917-18 या 1922-24 के प्रेमचंद और 1934-36 के प्रेमचंद एक नहीं हैं। भावुक देश प्रेम, आर्य समाज की सुधार भावना, गांधीवादी करुणा की तमाम गलियों से गुजरते हुए भी वे लगातार एक समतामूलक न्यायसंगत समाज की रचना के स्वप्न में संचालित थे। और अंत में एक कठिन जगह पहुंच चुके थे जहां बिना किसी झूठी मदद, आसानी या सदाशयता के यथार्थ का बीहड़ और उलझा हुआ भू-दृश्य पूरा दिखाई देता है। अगर ऐसा न होता तो `कफ़न` या `पूस की रात` जैसी कहानियां न लिखी जातीं।
ऐसा नहीं है कि प्रेमचंद आखिरी मंज़िल पर पहुंच चुके थे। बल्कि 1936 में जिस नए मोड़ पर वे खड़े थे वह एक नई शुरुआत जैसा लगता है। लैंगिक प्रश्नों पर उनके परिप्रेक्ष्य में पितृसत्तात्मक चेतना के दबाव किसी न किसी तरह आखिर तक दिखाई देते हैं। `गोदान` में भी स्त्रियों के बराबर के राजनीतिक अधिकारों के प्रश्न पर वे असमंजस में हैं और स्त्रियों की नागरिक छवि की गुत्थी को पूरी तरह सुलझा नहीं सके हैं।
हिन्दी नवजागरण में प्रेमचंद कुछ-कुछ उसी तरह मौजूद हैं जिस तरह मध्यकालीन भक्ति आंन्दोलन में कबीर मौजूद हैं। हिन्दी नवजागरण के सनातनवादी आख्यान में उन्हें जिस तरह एक `देवमंडल` का हिस्सा बना कर शामिल कर लिया गया है, इससे यक़ीनन उनकी अपनी ख़ास जगह खो गई है।*** मनमोहन


(यह लेख 1995 में लिखा गया था और 2006 में `सहमत-मुक्तनाद` में प्रकाशित हुआ था।)

क्या प्रभाष जोशी होने के लिये रामनाथ गोयनका चाहिए?

मालवा के पठार की काली मिट्टी और लुटियन्स की  दिल्ली के राजपथ की  लाल बजरी के बीच प्रभाष जोशी की पत्रकारिता । ये प्रभाष जोशी का सफर नहीं है । ये पत्रकारिता की वह सुरंग है, जिसमें से निकलकर मौजूदा वक्त की पत्रकारिता को समझने के लिये कई आंखों, कई कान मिल सकते है तो कई सच, कई अनकही सियासत समझ में आ सकती है । और पत्रकारिता की इस सुरंग को वही ताड़ सकता है जो मौजूदा वक्त में पत्रकारिता कर रहा हो । जिसने प्रभाष जोशी को पत्रकारिता करते हुये देखा होऔर जिसके हाथ में रामबहादुर राय और सुरेश सर्मा के संपादन में लेखक रामाशंकर कुशवाहा की किताब "लोक का प्रभाष " हो । यूं " लोक का प्रभाष "  जीवनी है । प्रभाष जोशी की जीवनी । लेकिन ये पुस्तक जीवनी कम पत्रकारीय समझ पैदा करते हुये अभी के हालात को समझने की चाहे अनचाहे एक ऐसी जमीन दे देती है, जिस पर अभी प्रतिबंध है । प्रतिबंध का मतलब इमरजेन्सी नहीं है । लेकिन प्रतिबंध का मतलब प्रभाष जोशी की पत्रकारिता को सत्ता के लिये खतरनाक मानना तो है ही । और उस हालात में ना तो रामनाथ गोयनका है ना इंडियन एक्सप्रेस। और ना ही प्रभाष जोशी हैं। तो फिर बात कहीं से भी शुरु कि जा सकती है । बस शर्त इतनी है कि अतीत के पन्नों को पढ़ते वक्त मौजूदा सियासी धड़कन के साथ ना जोडें । नहीं तो प्रतिबंध लग जायेगा । तो टुकड़ों में समझें। रामनाथ गोयनका ने जब पास बैठे धीरुभाई अंबानी से ये सुना कि उनके एक हाथ में सोने की तो दूसरे हाथ में चांदी की चप्पल होती है । और किस चप्पल से किस अधिकारी को मारा जाये ये अधिकारी को ही तय करना है  तो गोयनका समझ गये कि हर कोई बिकाऊ है, इसे मानकर धीरुभाई चल रहे हैं । और उस मीटिंग के बाद एक्सप्रेस में अरुण शौऱी की रिपोर्ट और जनसत्ता में प्रभाष जोशी का संपादकपन । नजर आयेगा कैसी पत्रकारिता की जरुरत तब हुई । अखबार सत्ता के खिलाफ तो खड़े होते रहे हैं । लेकिन अखबार विपक्ष की भूमिका में आ जाये ऐसा होता नहीं । लेकिन ऐसा हुआ । यूं "लोक का प्रभाष " में कई संदर्भों के आसरे भी हालात नत्थी किये गये है।


मसलन वीपी सिंह से रामबहादुर राय के इंटरव्यू से बनी किताब "मंजिल से ज्यादा सफर" के अंश का जिक्र। किताब का सवाल - जवाब का जिक्र । सवाल-कहा जाता है हर सरकार से रिलायंस ने मनमाफिक काम करवा लिये। वाजपेयी सरकार तक से । जवाब-ऐसा होता रहा होगा । क्योंकि धीरुभाई ने चाणक्य सूत्र को आत्मसात कर लिया । राज करने की कोशिश कभी मत करो, राजा को खरीद लो।

तो क्या राजनीतिक शून्यता में पत्रकारिता राजनीति करती है । या फिर पत्रकारिता राजनीतिक शून्यता को भर देती है । ये दोनो सवाल हर दौर में उठ सकते है । और ऐसा नहीं है कि प्रभाष जोशी ने इसे ना समझा हो । पत्रकारिता कभी एक पत्रकार के आसरे नहीं मथी जा सकती । हां, चक्रव्यूह  को हर कोई तोड़ नहीं पाता। और तोड कर हर कोई निकल भी नहीं पाता । तभी तो प्रभाष जोशी को लिखा रामनाथ गोयनका के उस पत्र से शुरुआत की जाये जो युद्द के लिये ललकारता है। जनसत्ता शुरु करने से पहले रामनाथ अगर गीता के अध्याय दो का 38 वां श्लोक का जिक्र अपने दो पेजी पत्र में करते हैं, जो उन्होंने प्रभाष जोशी को लिखा, " जय पराजय, लाभ-हानी तथा सुख-दुख को समान मानकर युद्द के लिये तत्पर हो जाओ - इस सोच के साथ कि युद्द करने पर पाप के भागी नहीं बनोगे। " और कल्पना कीजिये प्रभाष जोशी ने भी दो पेज के जवाबी पत्र में रामनाथ गोयनका को गीता के श्लोक से पत्र खत्म किया , " समदु:खे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ । ततो युद्दाय युज्यस्व नैंव पापमवायस्यसि ।।" और इसके बाद जनसत्ता की उड़ान जिसके सवा लाख प्रतियां छपने और खरीदे जाने पर लिखना पड़ा- बांच कर पढे । ना ना बांट कर पढ़ें का जिक्र था। लेकिन बांटना तो बांचने के ही समान होता है। यानी लिखा गया दीवारों के कान होते है लेकिन अखबारो को पंख । तो प्रभाष जोशी की पत्रकारीय उड़ान हवा में नहीं थी। कल्पना कीजिये राकेश कोहरवाल को इसलिये निकाला गया क्योंकि वह सीएम देवीलाल के साथ बिना दफ्तर की इजाजत लिये यात्रा पर निकल गये । और देवीलाल की खबरें भेजते रहें। तो देवीलाल ने भी रामनाथ गोयनका को चेताया कि खबर क्यों नहीं छपती । और जब यह सवाल रामनाथ गोयनका ने प्रभाष जोशी से पूछा तो संपादक प्रभाष जोशी का जवाब था । देवीलाल खुद को मालिक संपादक मान रहे हैं। बस रिपोर्टर राकेश कोहरवाल की नौकरी चली गई। लेकिन रामभक्त पत्रकार हेमंत शर्मा की नौकरी नहीं गई। सिर्फ उन्हें रामभक्त का नाम मिला। और हेमंत शर्मा " लोक का प्रभाष " में उस दौर को याद कर कहने से नहीं चूकते कि प्रभाष जी ने रिपोर्टिंग की पूरी स्वतंत्रता दी । रिपोर्टर की रिपोर्ट के साथ खडे होने वाले संपादकों की कतार खासी लंबी हो सकती है । या आप सोचे अब तो कोई बचा नहीं तो रिपोर्टर भी कितने बचे हैं ये भी सोचना चाहिये । लेकिन प्रभाष जोशी असहमति के साथ रिपोर्टर के साथ खड़े होते। तो उस वक्त रामभक्त होना और जब खुद संपादक की भूमिका में हो तब प्रभाष जोशी की जगह रामभक्त संपादक हो जाना। ये कोई संदर्भ नहीं है । लेकिन ध्यान देने वाली बात जरुर है कि चाहे प्रभाष जोशी हो या सुरेन्द्र प्रताप सिंह । कतार वाकई लंबी है इनके साथ काम करते हुये आज भी इनके गुणगान करने वाले संपादको की । लेकिन उनमें कोई भी अंश क्यो अपने गुरु या कहे संपादक का आ नहीं पाया । यो सोचने की बात तो है । मेरे ख्याल से विश्लेषण संपादक रहे प्रभाष जोशी का होना चाहिये । विश्लेषण हर उस संपादक का होना चाहिये जो जनोन्मुखी पत्रकारिता करता रहा। आखिर क्यों उनकी हथेली तले से निकले पत्रकार रेंगते देखायी देते है। क्यों उनमें संघर्ष का माद्दा नहीं होता। क्यों वे आज भी प्रभाष जोशी या एसपी सिंह या राजेन्द्र माथुर को याद कर अपने कद में अपने संपादकों के नाम नत्थी करनाचाहते है। खुद की पहचान से वह खुद ही क्यों बचना चाहते है। रामबहादुरराय में वह क्षमता रही कि उन्होंने किसी को दबाया नहीं। हर लेखन को जगह दी। आज भी देते है।  चाहे उनके खिलाफ भी कलम क्यों न चली। लेकिन राम बहादुर राय का कैनवास उनसे उन संपादकों से कहीं ज्यादा मांगता है जो रेग रहे है। ये इसलिये क्योंकि ये वाकई अपने आप में अविश्वसनिय सा लगता है कि जब प्रभाष जी ने एक्सप्रेस में बदली सत्ता के कामकाज से नाखुश हो कर जनसत्ता से छोड़ने का मन बनाया तो रामबहादुर राय ने ना सिर्फ मुंबई में विवेक गोयनका से बात की बल्कि 17 नवंबर 1975 को पहली बार अखबार के मालिक विवेक गोयनका को पत्र लिखकर कहा गया कि प्रभाष जोशी को रोके। बकायदा बनवारी से लेकर जवाहर लाल कौल । मंगलेश डबराल से लेकर रामबहादुर राय । कुमार आंनद से लेकर प्रताप सिंह। अंबरिश से लेकर राजेश जोशी । ज्योतिर्मय से लेकर राजेन्द्र धोड़पकर तक ने तमाम तर्क रखते हुये साफ लिखा । "हमें लगता है कि आपको प्रभाषजी को रोकने की हर संभव कोशिश करनी चाहिये ।" जिन दो दर्जन पत्रकारों ने तब प्रभाष जोशी के लिये आवाज उठायी । वह सभी आज के तारिख में जिन्दा है । सभी की धारायें बंटी हुई है। आप कह सकते है कि प्रभाष जोशी की खासियत यही थी कि वह हर धारा को अपने साथ लेकर चलते। और यही मिजाज आज संपादकों की कतार से गायब है। क्योंकि संपादकों ने खुद को संपादक भी एक खास धारा के साथ जोड़कर बनाया है।
दरअसल, प्रभाष जोशी के जिन्दगी के सफर में आष्ठा यानी जन्मस्थान । सुनवानी महाकाल यानी जिन्दगी के प्रयोग । इंदौर यानी लेखन की पहचान । चडीगढ़ यानी संपादकत्व का निखार । दिल्ली यानी अखबार के जरीये संवाद । और इस दौर में गरीबी । मुफ्लिसी । सत्ता की दरिद्रगी । जनता का संघर्ष । सबकुछ प्रभाष जोशी ने जिया । और इसीलिये सत्ता से हमेशा सम्मानजनक दूरी बनाये रखते हुये उसी जमीन पर पत्रकारिता करते रहे जिसे कोई भी सत्ता में आने के बाद भूल जाता है । सत्ता का मतलब सिर्फ सियासी पद नहीं होता चुनाव में जीत नहीं होती । संपादक की भी अपनी सत्ता होती है । और रिपोर्टर की भी ।

लेकिन जैसे ही सत्ता का स्वाद कोई भी चखने लगता है वैसे ही पत्रकारिता कैसे पीछे छूटती है इसका एहसास हो सकता है प्रभाष जोशी ने हर किसी को कराया हो । लेकिन खुद सत्ता के आसरे देश के राजनीतिक समाधान की दिशा में कई मौको पर प्रभाष जोशी इतने आगे बढे कि वह भी इस हकीकत को भूले कि राजनीति हर मौके पर मात देगी । अयोध्या आंदोलन उसमें सबसे अग्रणी कह सकते है । क्योंकि 6 दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद ध्वंस हुआ तो प्रभाष जोशी ये लिखने से नहीं चूके , '  राम की जय बोलने वाले धोखेबाज विध्वंसको ने कल मर्यादा पुरुषोत्तम राम के रधुकुल की रिती पर कालिख पोत दी...... "। सवाल इस लेखन का नहीं सवाल है कि उस वक्त संघ के खिलाफ डंडा लेकर कूद पडे प्रभाष जोशी के डंडे को भी रामभक्तों ने अपनी पत्रकारिता से लेकर अपनी राजनीति का हथियार बनाया । कहीं ढाल तो कही तलवार ।  और प्रभाष जी की जीवनी पढ़ते वक्त कई पन्नो में आप ये सोच कर अटक जायेंगे कि क्या वाकई जो लिखा गया वही प्रभाष जोशी है।

लेकिन सोचिये मत । वक्त बदल रहा है । उस वक्त तो पत्रकार-साहित्यकारों की कतार थी । यार दोस्तो में भवानी प्रसाद मिश्र से लेकर कुमार गंधर्व तक का साथ था । लेखन की विधा को जीने वालो में रेणु से लेकर रधुवीर सहाय थे। वक्त को उर्जावान हर किसी ने बनाया हुआ था । कही विनोबा भावे अपनी सरलता से आंदोलन को भूदान की शक्ल दे देते । तो कही जेपी राजनीतिक डुगडुगी बजाकर सोने वालो को सचेत कर देते । अब तो वह बिहार भी सूना है । चार लाइन न्यूज चैनलों की पीटीसी तो छोड़ दें कोई अखबारी रपट भी दिखायी ना दी जिसने बिहार की खदबदाती जमीन को पकड़ा और बताय़ा कि आखिर क्यो कैसे पटना में भी लुटिसन्स का गलियारा बन गया । इस सन्नाटे को भेदने के लिये अब किसी नेता का इंतजार अगर पत्रकारिता कर रही है तो फिर ये विरासत को ढोते पत्रकारो का मर्सिया है । क्योकि बदलते हालात में  प्रभाष जोशी की तरह सोचना भी ठीक नहीं कि गैलिलियो को फिर पढे और सोचे " वह सबसे दूर जायेगा जिसे मालूम नहीं कि कहा जा रहा है " । हा नौकरी की जगह पत्रकारिता कर लें चाहे घर के टूटे सोफे पर किसी गोयनका को बैठाने की हैसियत ना बन पाये । लेकिन पत्रकार होगा तो गोयनका भी पैदा हो जायेगा, ये मान कर चलें।

कौन मेरे अंदर लगातार अट्टहास करता है

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चुपचाप अट्टहास -37

लोग मुझे देखते हैं
और पास से गुजर जाते हैं
छूना तक नहीं चाहते
मुझे देर तक देखना नहीं चाहते

आँखें दूर कर लेते हैं



मुझे देखते ही उनके अंदर
आग-सी धधकने लगती है
वे खुद से ही घबराने लगते हैं
उन्हें मेरी कोई जरूरत नहीं है


मुझे मेरी अपनी जरूरत है क्या
यह जो आग उनमें धधकती दिखती है
मेरे अंदर तो नहीं धधक रही


लोग ऐसे ही आएँगे गुजरते जाएंगे
जाने कितने आस्मां खुलते हैं
मैं उनमें से किसी एक को भी छू नहीं सकता


कौन मेरे अंदर लगातार अट्टहास करता रहता है
कौन मेरे अंदर जाने कितने प्रलयंकर अंधड़ बन आता है
कौन मेरे अंदर धूमकेतु-सा हो उड़ता है
कौन मेरे अंदर अनबुझ ज्वालामुखी बन फैलता है।

People look at me
And they walk by
They do not want to look at me for a long while
They take their eyes away


They look at me
And they feel a fire within
They get scared of themselves
They do not need me


Do I need myself
This fire that appears within them
Could it be burning within me


People will come and go
And there are skies that open out
I cannot touch even one of then


Who within me laughs aloud all the time
Who within me comes as a tornado again and again
Who within me flies like a comet
Who within me explodes like a volcano.

हेपेटाइटिस एक जानलेवा बीमारी है लेकिन बचाव संभव है

जंतर-मंतर - Sat, 29/07/2017 - 22:44


शेष नारायण सिंह 
28 जुलाई विश्व हेपेटाइटिस दिवस है . लीवर की यह बीमारी पूरी दुनिया में बहुत ही खतरनाक रूप ले चुकी है . दुनिया में ऐसे ११ देश हैं जहां हेपेटाइटिस के मरीज़ सबसे ज़्यादा हैं . हेपेटाइटिस के मरीजों का ५० प्रतिशत ब्राजील,चीन, मिस्र, भारत , इंडोनेशिया , मंगोलिया,म्यांमार, नाइजीरिया, पाकिस्तान, उगांडा और वियतनाम में रहते हैं . ज़ाहिर है इन मुल्कों पर इस बीमारी से दुनिया  को मुक्त करने की बड़ी जिम्मेवारी है. २०१५ के आंकडे मौजूद हैं. करीब ३३ करोड़ लोग हेपेटाइटिस की बीमारी से पीड़ित थे. हेपेटाइटिस बी सबसे ज़्यादा खतरनाक है और इससे पीड़ित लोगों की संख्या भी २५ करोड़ के पार थी. ज़ाहिर है अब यह संख्या  और अधिक हो गयी होगी. २०१५ में हेपेटाइटिस से मरने वालों की संख्या १४ लाख  से  अधिक थी .चुपचाप आने वाली यह बीमारी टी बी और एड्स से ज्यादा लोगों की जान ले रही है . ज़ाहिर है कि इस बीमारी से युद्ध स्तर पर मुकाबला  करने की ज़रूरत  है और इस अभियान में जानकारी ही  सबसे बड़ा हथियार है . विज्ञान  को अभी तक पांच तरह के पीलिया हेपेटाइटिस के बारे में जानकारी है .  अभी  के बारे जानकारी हेपेटाइटिस ए, बी ,सी ,डी और ई . सभी खतरनाक हैं लेकिन बी से  खतरा बहुत ही ज्यादा   बताया जाता है .  विश्व स्वास्थ्य संगठन , हेपेटाइटिस को २०३० तक ख़त्म करने की योजना पर  काम भी कर रहा  है . भारत भी उन देशों में शुमार है जो इस  भयानक बीमारी के अधिक मरीजों वाली लिस्ट में  हैं इसलिए भारत की स्वास्थय प्रबंध व्यवस्था की ज़िम्मेदारी बहुत बढ़ जाती है .
इस वर्ग की बीमारियों में हेपेटाइटिस  बी का प्रकोप सबसे ज्यादा है और इसको ख़त्म करना सबसे अहम चुनौती है .इस बारे में जो सबसे अधिक चिंता की बात है वह यह है एक्यूट हेपेटाइटिस बी का कोई इलाज़ नहीं है .सावधानी ही सबसे बड़ा इलाज़ है .  विश्व बैंक का सुझाव है कि संक्रमण हो जाने के बाद आराम, खाने की ठीक व्यवस्था और  शरीर में ज़रूरी तरल पदार्थों का स्तर बनाये रखना ही बीमारी से बचने  का सही तरीका है .क्रानिक हेपेटाइटिस बी   का इलाज़ दवाइयों से संभव  है . ध्यान देने की बात यह है कि हेपेटाइटिस बी की बीमारी पूरी तरह से ख़त्म नहीं की जा सकती इसे केवल   दबाया जा सकता है .इसलिए जिसको एक बार संक्रामण हो गया उसको जीवन भर दवा लेनी चहिये . हेपेटाइटिस बी  से बचने का सबसे  सही तरीका टीकाकरण है .  विश्व स्वास्थ्य  संगठन का सुझाव है कि सभी बच्चों को जन्म के साथ ही हेपेटाइटिस बी का टीका दे दिया जाना  चाहिए .अगर सही तरीके से टीकाकरण  कर दिया जाय तो बच्चों में  ९५ प्रतिशत बीमारी की   संभावना ख़त्म हो जाती है  . बड़ों को भी  टीकाकरण से फायदा होता है .पूरी दुनिया में हेपेटाइटिस को खत्म करने का अभियान चल रहा है .मई २०१६ में वर्ल्ड हेल्थ असेम्बली ने ग्लोबल हेल्थ सेक्टर स्ट्रेटेजी आन वाइरल हेपेटाइटिस २०१६-२०२०  का प्रस्ताव  पास किया  था. संयुक्त  राष्ट्र ने २५ सितम्बर को अपने प्रस्ताव संख्या  A/RES/70/1  में  इस प्रस्ताव को सस्टेनेबल डेवलपमेंट गोल्स को शामिल किया था . वर्ल्ड हेल्थ असेम्बली का यह प्रस्ताव उन उद्देश्यों को शामिल करता है .इस प्रस्ताव का संकल्प यह  है कि हेपेटाइटिस को ख़त्म करना है . अब चूंकि भारत इन ग्यारह देशो में हैं जहां हेपेटाइटिस के आधे मरीज़ रहते हैं इसलिए भारत की ज़िम्मेदारी सबसे  ज़्यादा  है . जिन देशों का नाम है उनमें भारत और चीन अपेक्षाकृत संपन्न  देश माने जाते हैं इसलिए यह ज़िम्मेदारी और बढ़ जाती   है . सरकार को चाहिए कि जो भी संसाधन उपलब्ध हैं उनका सही तरीके से इस्तेमाल करने की संस्कृति विकसित करें. बीमारी को बढ़ने से रोकें.रोक के बारे में इतनी  जानकारी फैलाएं कि लोग खुद ही  जांच आदि  के कार्य को प्राथमिकता दें और हेपेटाइटिस  को समाप्त करने को एक मिशन के रूप में अपनाएँ .अपने देश में इस दिशा में  अहम कार्य हो रहा है . देश के लगभग सभी बड़े  मेडिकल शिक्षा  के संस्थानों, मेडिकल  कालेजों और बड़े अस्पतालों में लीवर की बीमारियों के इलाज और नियंत्रण के साथ साथ रिसर्च  का काम भी हो रहा   है . सरकार का रुख  इस सम्बन्ध में बहुत ही प्रो एक्टिव है . नई दिल्ली में लीवर और पित्त रोग के  बारे में रिसर्च के लिए एक संस्था की स्थापना ही कर दी गयी है. २००३ में शुरू हुयी इंस्टीटयूट आफ लीवर एंड  बिलियरी साइंसेस नाम की यह संस्था विश्व स्तर की है.  जब संस्था शुरू की गयी तो इसका मिशन लीवर की एक विश्व संस्था बनाना था  और वह लगभग पूरा कर लिया गया है .
इस संस्थान की प्रगती के पीछे इसके संस्थापक निदेशक डॉ शिव कुमार सरीन की शख्सियत को माना जाता  है . शान्ति स्वरुप भटनागर और पद्मम भूषण से   सम्मानित डॉ सरीन को विश्व में लीवर की बीमारियों के इलाज़ का सरताज माना जाता है . बताते हैं कि दिल्ली के जी बी पन्त अस्पताल में कार्यरत डॉ शिव  कुमार सरीन ने  जब उच्च शोध के लिए विदेश जाने का मन बनाया  तो तत्कालीन मुख्यमंत्री ने उनसे पूछा  कि क्यों  विदेश जाना चाहते हैं , उनका जवाब था कि  लीवर से   सम्बंधित बीमारियाँ देश में बहुत बढ़ रही हैं  और उनको कंट्रोल करने के लिए बहुत ज़रूरी है कि आधुनिक संस्थान में  रिसर्च किया जाए. तत्कालीन मुख्यमंत्री ने प्रस्ताव दिया  कि विश्वस्तर का शोध संस्थान  दिल्ली में ही स्थापित कर लिया जाए. वे तुरंत तैयार हो गए और आज उसी   फैसले के कारण  दिल्ली में लीवर की बीमारियों के लिए  दुनिया भर में  सम्मानित एक संस्थान मौजूद है  . इस संस्थान को  विश्वस्तर का बनाने में इसके संस्थापक  डॉ एस के सरीन का बहुत योगदान है . वे स्वयं भी बहुत ही उच्चकोटि के वैज्ञानिक हैं .  लीवर से सम्बंधित बीमारियों के इलाज के लिए १७ ऐसे प्रोटोकल  हैं जो दुनिया भर में उनके नाम से जाने जाते हैं . सरीन्स क्लासिफिकेशन आफ गैस्ट्रिक वैराइसेस को सारे विश्व के मेडिकल कालेजों और अस्पतालों में इस्तेमाल किया जाता  है . उनके प्रयास से ही सरकारी स्तर पर दिल्ली में जो इलाज उपलब्ध है वह निजी क्षेत्र के  बड़े  से बड़े अस्पतालों में नहीं है . अच्छी बात यह है कि सरकारी संस्था होने के कारण  आई एल बी एस अस्पताल में गैर ज़रूरी खर्च बिलकुल नहीं होता .
इस साल भी   वर्ल्ड हेपेटाइटिस दिवस  के लिए पूरी  दुनिया के साथ साथ भारत में भी  पूरी तैयारी  है . खबर आई है कि पटना समेत देश के  सभी बड़े शहरों में सम्मलेन आदि आयोजित करके जानकारी बढ़ाई जा रही  है
विश्व स्वास्थ्य  संगठन की तरफ से हर साल २८ जुलाई को वर्ल्ड हेपेटाइटिस दिवस  मनाये जाने का एक मकसद है . इस जानलेवा बीमारी के बारे में पूरी दुनिया में जानकारी बढाने और उन सभी लोगों को एक मंच देने के उद्देश्य से यह आयोजनं  किया जाता है जो किसी न किसी तरह से इससे प्रभावित होते हैं . हर साल करेब १३ लाख लोग इस बीमारी से मरते हैं . इस लिहास से यह टीबी ,मलेरिया और एड्स से कम खतरनाक नहीं  है. हेपेटाइटिस के ९० प्रतिशत लोगों को पता भी नहीं होता कि उनके शरीर में यह जानलेवा विषाणु पल रहा  है . नतीजा  यह होता है कि वे किसी को बीमारी दे सकते हैं या लीवर की भयानक बीमारियों से खुद ही ग्रस्त हो सकते हैं , अगर लोगों को जानकारी हो तो इन बीमारियों से समय रहते मुक्ति पाई जा सकती है .

भ्रष्टाचार किसी भी नेता का अधिकार नहीं है

जंतर-मंतर - Sat, 29/07/2017 - 22:41

शेष नारायण सिंह
बंगलूरू की एक जेल में भ्रष्टाचार के आरोप  में सज़ा काट रही अन्नाद्रमुक  नेता वीके शशिकला को जेल में बहुत ही संपन्न जीवन जीने का अवसर मिल रहा है . जेल विभाग की एक बड़ी अफसर ने आरोप लगाया है कि जेल में शशिकला को  जेल मैनुअल के खिलाफ जाकर सुविधाएं दी जा रही हैं . अफसर का  आरोप है कि सुविधा पाने के लिए जेल विभाग के महानिदेशक को शशिकला ने एक करोड़ रूपया दिया है और बाकी कर्मचारियों ने भी एक करोड़ रूपये में बाँट लिया है . आरोप बहुत ही गंभीर  है लेकिन महानिदेशक महोदय  का कहना  है कि कि वो जांच के लिए तैयार हैं. हालांकि उन्होंने भ्रष्टाचार के आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया है. उनको मालूम है कि जब जांच होगी तो कोई भी आरोप सिद्ध नहीं होगा क्योंकि जिस तरह से भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप में जेल में बंद अन्नाद्रमुक नेता  शशिकला भ्रष्टाचार के रास्ते ही सज़ा को आरामदेह बनाने में सफल रही हैं , उसी तरह से जेल महकमे के महानिदेशक साहेब भी अपने खिलाफ जांच करने वाले अधिकारियों को संतुष्ट करने में सफल हो  जायेगें . 
देश की जेलों सज़ा काट रहे लोगों को आरामदेह ज़िंदगी बिताने के लिए जेल के अन्दर बहुत  खर्च करना  पड़ता है और वह सारा खर्च रिश्वत के रास्ते ही अफसरों  की जेब तक पंहुचता  है . वी के शशिकला के बहाने भ्रष्टाचार के मुद्दे पर पूरे देश में चर्चा फिर शुरू हो गयी है लेकिन यह चर्चा ही रहेगी  क्योंकि भ्रष्टाचार के नियंताओं के हाथ बहुत बड़े हैं . बिहार के सबसे बड़े राजनीतिक परिवार के खिलाफ आजकल भ्रष्टाचार के कारनामे मीडिया के फोकस में हैं . उनके बेटे बेटियों की  अरबों की संपत्ति , राजनीतिक चर्चा की मुख्य धारा में आ गयी है .  सवाल उठ रहे हैं कि  इनके पास यह संपत्ति आयी किस तरीके से लेकिन लालू प्रसाद यादव विपक्ष की राजनीतिक एकता के नाम  पर मुद्दे को भटकाने की कोशिश  में लगे हुए हैं.  उत्तर प्रदेश में भी आजकल भ्रष्टाचार के खिलाफ  मुहिम चल रही है लेकिन भ्रष्टाचार के मामलों में कहीं कोई ढील नहीं है . आजकल नोयडा में एक कालोनी में आस पास की झुग्गियों में रहने वाले लोगों की तरफ से पत्थरबाजी की घटना ख़बरों में  है . नोयडा जैसे महंगी ज़मीन  वाले इलाकों में भूमाफिया वाले  , इलाके के प्रशासन और पुलिस वालों की मदद से सरकारी ज़मीन पर क़ब्ज़ा  करते हैं . सरकारी ज़मीन पर बहुत ही गरीब लोगों को गैरकानूनी तरीके  से बसाते हैं. ज़ाहिर है इन लोगों के वोट बहुत ज्यादा होते हैं और राजनीतिक नेता वोट की लालच में अपने मुकामी लोगों के ज़रिये इन झुग्गियों को संरक्षण देते हैं . सरकारी जुगाड़ से इन झुग्गियों को  मंजूरी दिला दी जाती है जिसमें नेता, अफसर और अपराधी शामिल होते हैं . इसके बाद जो भूमाफिया इस ज़मीन का करता धरता होता है वह इस मान्यता प्राप्त ज़मीन को बहुत ही महंगे  दामों में बेचता है और वहां रहने वाले झुग्गी वालों को कुछ दे लेकर किसी और सरकारी ज़मीन पर बसा देता  है . नोयडा की मौजूदा घटना इसी बड़े   साजिशतंत्र का हिस्सा है . दिलचस्प बात यह है कि उत्तर प्रदेश सरकार का सरकारी ज़मीन से गैरकानूनी क़ब्ज़ा हटाने  का  बड़ा अभियान चल रहा  है और उस सबके बीच में इतना बड़ा घोटाला सामने आ  गया है . बताते है कि जब कानून व्यवस्था की हालत  को सामान्य बनाने  की कोशिश कर रहे नोयडा और जिले के आला अधिकारियों का ध्यान सरकारी ज़मीन पर अनधिकृत कब्जे की ओर दिलाया गया तो बड़े हाकिम लोग नाराज़ हो गए और कहा कि एक अलग मुद्दा उठाने की ज़रुरत नहीं  है . जब उनको ध्यान दिलाया गया कि मुख्य मंत्री जी के आदेश से राज्य में सरकारी ज़मीन को मुक्त कराने  का अभियान चल रहा है तो अफसरों ने कहा कानून-व्यवस्था प्राथमिकता है और अन्य किसी भी विषय पर बात नहीं की जायेगी .नोयडा की घटना तो केवल एक घटना है . पूरे देश में इसी पैटर्न पर भ्रष्टाचार चल रहा  है , कई राज्यों में मुख्यमंत्री निजी तौर पर बहुत ईमानदार  हैं लेकिन भ्रष्टाचार का तंत्र चलाने वाले अधिकारियों का अपना एक सिस्टम है और उसको कोई भी नेता आम तौर पर तोड़ नहीं सकता . उत्तर प्रदेश के  मुख्यमंत्री के बारे में भी यही कहा जाता है . व्यक्तिगत रूप से उनकी इमानदारी  को सभी स्वीकार करते हैं और उनका उदाहरण दिया जाता है . लेकिन राज्य के भ्रष्टाचार को रोकने में वे नाकामयाब रहे हैं. सरकार के हर विभाग में भ्रष्टाचार   कम करने के दावे के साथ सरकार बनी थी लेकिन आजकल भ्रष्टाचार बढ़ा है .यही हाल केंद्र में भी है .प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने २००१ में गुजरात के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी . उनके खिलाफ किसी तरह के आर्थिक भ्रष्टाचार की शिकायत उनके विरोधी भी नहीं करते लेकिन क्या गुजरात में या अब  केंद्र में आर्थिक भ्रष्टाचार ख़त्म हो गया है .  भ्रष्टाचार है और वह प्रधानमंत्री को मालूम है इसीलिये उन्होंने भ्रष्टाचार की जांच करने वाले सरकारी विभागों को हिदायत दी है कि ऊंचे पदों पर बैठे भ्रष्ट अधिकारियों और जिम्मेदार लोगों के भ्रष्टाचार के मामलों की जांच करें और समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार को खत्म करने में मदद करें। प्रधानमंत्री ने सरकारी अधिकारियों को बता दिया  कि छोटे पदों पर बैठे लोगों के भ्रष्टाचार के कारनामों को पकड़कर कोई वाहवाही नहीं लूटी जा सकती, हालांकि उस भ्रष्टाचार को रोकना भी ज़रूरी है लेकिन उससे समाज और राष्ट्र का कोई भला नहीं होगा। प्रधानमंत्री ने जो बात कही है वह बावन तोले पाव रत्ती सही है और ऐसा ही होना चाहिए।लेकिन भ्रष्टाचार के इस राज में यह कर पाना संभव नहीं है। अगर यह मान भी लिया जाय कि इस देश में भ्रष्टाचार की जांच करने वाले सभी अधिकारी ईमानदार हैं तो क्या बेईमान अफसरों की जांच करने के मामले में उन्हें पूरी छूट दी जायेगी लेकिन सरकारी अफसर ,नेता, अपराधी और भूमाफिया के बीच जो सांठ गाँठ है क्या उसको तोडा जा सकता है .

अक्सर देखा  गया है कि राजनीति में आने के पहले जो लोग मांग जांच कर अपना खर्च चलाते थे, एक बार विधायक या सांसद बन जाने के बाद जब वे अपनी नंबर एक की  संपत्ति का ब्यौरा देते हैं तो वह करोड़ों में होती है। उनके द्वारा घोषित संपत्ति , उनकी सारी अधिकारिक कमाई के कुल जोड़ से बहुत ज्यादा होती है . इसके लिए जरूरी है बड़े पदों के स्तर पर ईमानदारी की बात की जाय . आज अपने  देश में भ्रष्टाचार और घूस की कमाई को आमदनी मानने की परंपरा शुरू हो चुकी है, वहां भ्रष्टाचार के खिलाफ क्या कोई अभियान चलाया जा सकेगा? और यह बंगलूरू में भी सच है और नोयडा में भी. 
इसको  दुरुस्त करना पड़ेगा और इसके  लिए आन्दोलन की ज़रुरत है . इस बात में कोई शक नहीं है कि किसी भी पूंजीवादी अर्थव्यवस्था पर आधारित लोकतांत्रिक देश में अगर भ्रष्टाचार पर पूरी तरह से नकेल न लगाई जाये तो देश तबाह हो जाते हैं। पूंजीवादी व्यवस्था में आर्थिक खुशहाली की पहली शर्त है कि देश में एक मजबूत उपभोक्ता आंदोलन हो और भ्रष्टाचार पर पूरी तरह से नियंत्रण हो। मीडिया की विश्वसनीयता पर कोई सवालिया निशान न लगा हो। अमरीकी और विकसित यूरोपीय देशों के समाज इसके प्रमुख उदाहरण हैं। यह मान लेना कि अमरीकी पूंजीपति वर्ग बहुत ईमानदार होते हैं,बिलकुल गलत होगा।लेकिन भ्रष्टाचार के खिलाफ वहां मौजूद तंत्र ऐसा है कि बड़े-बड़े सूरमा कानून के इकबाल के सामने बौने हो जाते हैं। और इसलिए पूंजीवादी निजाम चलता है।इसलिए राष्ट्रहित ,जनहित और  और  अर्थव्यवस्था के हित में यह ज़रूरी है कि भ्रष्टाचार को समूल नष्ट किया जाए .लेकिन यह इतना आसान नहीं है .सही बात यह है कि जब तक केवल बातों बातों में भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई लड़ी जायेगी तब तक कुछ नहीं होगा . इस आन्दोलन को अगर तेज़ करना है कि तो घूस के पैसे को तिरस्कार की नज़र से देखना पड़ेगा . क्योंकि सारी मुसीबत की जड़ यही है कि चोर, बे-ईमान और घूसखोर अफसर और नेता रिश्वत के बल पर समाज में सम्मान पाते रहते हैं . 
अपने देश में पिछले कुछ  दशकों में घूसखोरी को सम्मान का दर्जा मिल गया है . वरना यहाँ पर दस हज़ार रूपये का घूस लेने के अपराध में जवाहर लाल नेहरू ने , अपने एक मंत्री को बर्खास्त कर दिया था . लेकिन इस तरह के उदाहरण बहुत कम हैं . इसी देश में जैन हवाला काण्ड हुआ था जिसमें मुख्य  धरा की सभी पार्टियों के नेता शामिल थे .आर्थिक उदारीकरण के बाद सरकारी कंपनियों में विनिवेश के नाम पर जो घूसखोरी इस देश में हुई है उसे पूरा देश जानता है . इस तरह के हज़ारों मामले हैं जिन पर लगाम लगाए बिना भ्रष्टाचार को खत्म कर सकना असंभव है . लेकिन भ्रष्टाचार के खिलाफ र्राष्ट्रीय स्तर पर  जनांदोलन की ज़रुरत है और मीडिया समेत सभी ऐसे लोगों को सामने आना चाहिए जो पब्लिक ओपीनियन को दिशा देते हैं ताकि अपने देश और अपने लोक तंत्र को बचाया जा सके. हालांकि बहुत देर हो चुकी  है और शशिकला और  लालू यादव जैसे लोग राजनीति के नाम पर कुछ भी करके सफल हो रहे हैं . इसको रोका जाना चाहिए .

मेरी पहली मुहब्बत : मेरी नीम का पेड़

जंतर-मंतर - Sat, 29/07/2017 - 22:39


शेष नारायण सिंह
नीम की चर्चा होते ही पता नहीं क्या होता  है कि  मैं अपने  गांव पंहुंच जाता हूँ.  बचपन  की पहली यादें ही नीम से जुडी हुयी हैं . मेरे  गाँव में नीम  एक देवी  के रूप में स्थापित हैं, गाँव के पूरब में अमिलिया तर वाले बाबू साहेब की ज़मीन में जो नीम  का पेड़ है ,वही काली माई का स्थान है . गाँव के बाकी नीम के पेड़ बस पेड़ हैं .   लेकिन उन पेड़ों में भी मेरे बचपन की बहुत सारी मीठी यादें हैं . मेरे दरवाज़े पर जो नीम का  पेड़ था , वह गाँव  की बहुत सारी गतिविधियों का केंद्र था . सन २००० के सावन में जब  बहुत तेज़ बारिश हो रही थी, तो चिर्री पड़ी ,  लोग बताते हैं कि पूरे गाँव में अजोर हो गया था  , बहुत तेज़ आवाज़ आई थी और सुबह  जब लोगों ने देखा तो मेरे दरवाज़े की नीम का एक  ठासा टूट कर नीचे गिर गया था. मेरे बाबू वहीं पास में बने मड़हे में रात में सो  रहे थे. उस आवाज़ को सबसे क़रीब से  उन्होंने ही सुना था. कान फाड़ देने वाली आवाज़ थी वह . चिर्री वाले हादसे के बाद नीम का  पेड़ सूखने लगा था. अजीब इत्तिफाक है कि उसके बाद ही मेरे बाबू  की जिजीविषा  भी कम होने लगी थी. फरवरी आते आते नीम के पेड सूख  गया . और उसी  २००१ की फरवरी में बाबू भी चले गए थे . जहां वह नीम का पेड़ था , उसी जगह के आस पास मेरे भाई ने नीम के तीन पेड़ लगा दिए है , यह नीम भी तेज़ी से बड़े हो  रहे हैं . इस नीम के पेड़ की मेरे गाँव के सामाजिक जीवन में बहुत महत्व है .इसी पेड़ के नीचे मैंने और मेरे अज़ीज़ दोस्त बाबू बद्दू सिंह ने शरारतें  सीखीं और उनका अभ्यास भी किया . जाड़ों में धूप सबसे पहले इसी पेड़ के नीचे बैठ कर सेंकी जाती थी. पड़ोस के कई बुज़ुर्ग वहां मिल जाते थे . टिबिल साहेब और पौदरिहा बाबा तो  धूप निकलते  ही आ जाते थे. बाकी लोग भी आते जाते रहते थे. मेरे बाबू के काका थे यह दोनों लोग . बहुत आदरणीय इंसान थे. हुक्का भर भर के नीम के पेड़ के नीचे पंहुचाया जाता रहता था. घर के तपता में आग जलती रहती थी.    इन दोनों ही बुजुर्गों का असली नाम कुछ और था लेकिन  सभी इनको इसी नाम से जानते थे. टिबिल साहेब कभी उत्तर प्रदेश पुलिस में कांस्टेबिल रहे थे , १९४४ में रिटायर हो गए थे , और मेरे पहले की पीढी भी उनको इसी नाम से जानती थी.  पौदरिहा का नाम इस लिए पड़ा था कि वे  गाँव से किसी की बरात में गए थे तो इनारे की पौदर के पास ही खटिया  डाल कर वहीं सो गए थे . किसी घराती ने उनको पौदरिहा कह दिया और जब बरात लौटी तो भाइयों ने उनका यही नाम कर दिया . इन्हीं  मानिंद  बुजुर्गों की छाया में हमने शिष्टाचार  की बुनियादी  बातें सीखीं थीं.मेरी नीम की मज़बूत डाल पर ही सावन में झूला पड़ता था. रात में गाँव की लडकियां और बहुएं उस  पर झूलती थीं और कजरी गाती थीं.  मानसून के  समय चारों तरफ झींगुर की आवाज़ के बीच में ऊपर नीचे जाते झूले पर बैठी  हुयी कजरी गाती मेरे गाँव की लडकियां  हम लोगों को किसी भी महान संगीतकार से कम नहीं लगती थीं.  जब १९६२ में मेरे गाँव  में स्कूल खुला तो सरकारी बिल्डिंग बनने के पहले इसी नीम के पेड़ के नीचे ही  शुरुआती कक्षाएं चली थीं.   धोपाप जाने वाले नहवनिया लोग जेठ की दशमी को थक कर इसी नीम  के नीचे आराम करते  थे. उन दिनों सड़क कच्ची थी और ज़्यादातर लोग धोपाप पैदल ही जाते थे .
 मेरे गाँव में सबके घर के आस पास नीम के पेड़ हैं और किसी भी बीमारी में उसकी  पत्तियां , बीज, तेल , खली आदि का इस्तेमाल बड़े पैमाने पर  होता था लेकिन आब नहीं होता. निमकौड़ी बीनने और बटोर कर रखने का रिवाज ही खत्म हो गया है . लेकिन नीम के पेड़ के प्रति श्रद्धा कम नहीं  हो रही है . एक दिलचस्प वाकया है  . मेरे बचपन में   मुझसे छः साल बड़ी मेरी   बहिन  ने घर के ठीक  सामने  नीम का एक पौधा  लगा दिया   था. उसका विचार था कि जब भाइयों की दुलहिन आयेगी  तब तक नीम  का पौधा पेड़ बन जाएगा  और उसी  पर उसकी  भौजाइयां झूला डालकर झूलेंगी.  अब वह पेड़ बड़ा हो गया  है , बहुत ही घना और शानदार .  बहिन के भाइयों की दुलहिनें  जब आई थीं तो पेड़ बहुत छोटा था . झूला नहीं पड़ सका . अब उनकी भौजाइयों के  बेटों की दुलहिनें आ गयी हैं लेकिन अब गाँव  में लड़कियों का झूला झूलने की परम्परा  ही ख़त्म हो गयी है .इस साल  मेरे छोटे भाई ने ऐलान कर दिया कि बहिन   वाले  नीम के पेड़ से घर को ख़तरा है ,लिहाज़ा उसको कटवा दिया जाएगा . हम लोगों ने कुछ बताया  नहीं लेकिन बहुत तकलीफ हुयी  . हम  चार भाई  बहनों के   बच्चों को हमारी तकलीफ  का अंदाज़ लग गया और उन लोगों ने ऐसी  रणनीति बनाई   कि नीम का  पेड़ बच गया .जब नीम के उस पेड़ पर हमले का खतरा मंडरा रहा   था तब मुझे अंदाज़ लगा कि मैं नीम से कितना मुहब्बत करता हूँ . 
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लेखक विषय संवाद साभार अनुवादक

पहले वो आए साम्यवादियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं साम्यवादी नहीं था

 

फिर वो आए मजदूर संघियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं मजदूर संघी नहीं था

 

फिर वो यहूदियों के लिए आए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं यहूदी नहीं था

 

फिर वो आए मेरे लिए

और तब तक बोलने के लिए कोई बचा ही नहीं था

 

मार्टिन नीमोलर (1892-1984)