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मोदी, अमेरिका और खेती के सवाल

रविवार - Fri, 19/05/2017 - 21:30
यह नागार्जुन का अपमान

मोदी सरकार पर नज़र रखने में कांग्रेस अब तक असफल रही है

जंतर-मंतर - Fri, 19/05/2017 - 09:43


शेष नारायण सिंह
इसी मई में नरेंद्र  मोदी सरकार के तीन साल पूरे हो गए. सरकार और उसके समर्थकों का दावा है कि बी जे पी सरकार ने पिछले तीन वर्षों में हर क्षेत्र में सफलता की बुलंदियां हासिल की हैं ,विदेश नीति से लेकर महंगाई ,बेरोजगारी ,कानून व्यवस्था सभी क्षेत्रों में सफलता के रिकार्ड बनाए गए हैं ,ऐसा बीजेपी वालों का दावा है . यह अलग बात है कि इन सभी क्षेत्रों में  सरकार की सफलता संदिग्ध हैं . महंगाई कहीं कम  नहीं हुयी है , चुनाव अभियान के दौरान बीजेपी ने जिन करोड़ों नौकरियों का वादा किया था  ,वह कहीं भी नज़र नहीं आ रही हैं . ख़ासतौर से ग्रामीण इलाकों में चारों तरफ बेरोजगार नौजवानों के हुजूम देखे जा सकते हैं . किसानों की हालत जो पिछले ४० वर्षों से खराब होना शुरू हुई थी वह बद से बदतर होती जा रही है.  उत्तर प्रदेश और बिहार के अवधी ,भोजपुरी इलाकों से नौजवान बड़ी संख्या में देश के औद्योगिक नगरों की तरफ पलायन करते थे और छोटी मोटी नौकरियाँ हासिल करते थे, वह पूरी तरह ठप्प है . लेकिन बीजेपी के  प्रवक्ता आपको ऐसे ऐसे आंकड़े दिखा देगें कि लगेगा कि आपकी ज़मीन से इकट्ठा की गयी जानकारी गलत है , वास्तव में देश तरक्की कर  रहा है , चारों तरफ खुशहाली है , नौजवान बहुत खुश हैं और अच्छे दिन आ चुके हैं . मोदी सरकार के तीन साल पूरे होने की खुशी में टेलिविज़न चैनलों पर बहसों का मौसम शुरू हो  गया है . बीजेपी के कुशाग्रबुद्धि प्रवक्ता वहां मौजूद रहते हैं और पूरी दुनिया को बताते रहते हैं कि पिछले तीन वर्षों में  सब कुछ बदल गया है  . ऐसे ही एक डिबेट में शामिल होने का मौक़ा मिला . बीजेपी  के प्रवक्ता ने अच्छी तरह अपनी बात रखी जो उनको रखना चाहिए . यह उनका फ़र्ज़ है .
इसी डिबेट में कांग्रेस प्रवक्ता भी थे. तेज़ तर्रार नौजवान नेता. राहुल गांधी की राजनीति के अलमबरदार . लेकिन उनके पास बीजेपी के प्रवक्ता का विरोध करने के लिए कोई तैयारी नहीं थी. लगातार नरेंद्र मोदी पर हमले करते रहे . अपने हस्तक्षेप के दौरान कई बार उन्होंने नरेंद्र मोदी या प्रधान मंत्री शब्द का बार बार उलेख किया और बहस में बीजेपी  सरकार की खामियों को गिनाने के लिए केवल नरेंद्र मोदी  का सहारा लेने की कोशिश करते रहे.जब  डिबेट में मौजूद पत्रकारों ने उनको याद दिलाया कि अगर आपकी बात को सच मान भी लिया जाए  कि पिछले तीन वर्षों में सरकार ने जनहित का कोई काम नहीं किया है  और हर मोर्चे पर फेल रही है तो आप लोगों  ने सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी का कर्त्तव्य क्यों नहीं  निभाया, कांग्रेस ने सरकार की असफलताओं को उजागर करने के लिए कोई जन आन्दोलन क्यों नहीं शुरू किया . क्यों आप लोग टेलिविज़न  कैमरों और  अपनी पार्टी के दफ्तरों के  अलावा कहीं नज़र नहीं आये. तो उनके पास बगलें झांकने के अलावा कोई जवाब नहीं था. बड़ी खींचतान  के पाद उन्होंने रहस्योद्घाटन किया कि पिछले दिनों जन्तर मन्तर पर तमिलनाडु  से  आये   किसानों का जो विरोध देखा गया था , वह कांग्रेस द्वारा आयोजित था. ज़ाहिर है और किसी आन्दोलन का ज़िक्र नहीं किया जा सकता  था क्योंकि कहीं कुछ था ही नहीं . ऐसी हालत में एक ऐसे  आन्दोलन को अपना बनाकर पेश  करने की कोशिश  की गयी  जिसमें कांग्रेस की भूमिका केवल  यह थी  कि उनके आला नेता , राहुल गांधी किसानों के उन आन्दोलन से सहानुभूति जताने जंतर मंतर गए थे , कुछ देर बैठे थे और उस मुद्दे  पर उनकी पार्टी  ने बयान आदि देने की रस्म अदायगी की थी.
सवाल यह उठता है कि क्या मुख्य विपक्षी दल का कर्त्तव्य यहीं ख़त्म हो जाता है . क्या लोकतंत्र में यह ज़रूरी  नहीं कि  सरकार अपनी राजनीतिक समझ  के हिसाब से जनहित और राष्ट्रहित  के कार्यक्रम लागू करती रहे और अगर उसकी सफलता संदिग्ध हो तो जनता के बीच जाकर या किसी भी तरीके से विपक्षी पार्टियां  सरकार की कमियों को बहस के दायरे में लायें . या विपक्ष की  यही भूमिका  है कि वह इस बात का इंतज़ार करे कि २०१९ तक जनता बीजेपी से निराश हो जायेगी और फिर से  कांग्रेस सहित विपक्षी दलों को सत्ता थमा देगी.  फिलहाल यही माहौल है . कहीं कुछ भी विरोध देखा नहीं जा रहा  है.
कांग्रेस का ड्राइंग रूम की पार्टी बन जाना इस देश की भावी राजनीति के लिए अच्छा संकेत नहीं है .  कांग्रेस के राहुल गांधी टीम के मौजूदा नेता  यह दावा करते हैं कि उनकी पार्टी   महात्मा गांधी, सरदार पटेल ,जवाहर लाल नेहरू की पार्टी है . बात बिलकुल सही है क्यों जवाहर लाल नेहरू के वंशज उनकी पार्टी के सर्वोच्च नेता हैं . लेकिन क्या इन लुटियन की दिल्ली में रमण करने वाले नए कांग्रेसी नेताओं को मालूम नहीं है कि कांग्रेस के नेताओं ने आन्दोलन को देश की राजनीति का स्थाई भाव बना दिया था. १९२० से लेकर १९४६ तक कांग्रेस ब्रिटिश साम्राज्य की कमियों को हर मोर्चे पर बेपरदा किया था जहां भी संभव था. १९४७ के पहले कांग्रेस के तीन बड़े  आन्दोलन राजनीतिक आचरण के विश्व इतिहास में  जिस सम्मान से उद्धृत किये जाते हैं उसपर कोई भी देश या समाज गर्व कर सकता है . १९२० का महात्मा गांधी का आन्दोलन इतना ज़बरदस्त  था कि  भारत की जनता की एकजुटता को खंडित करने के लिए उस वक़्त के हुक्मरानों को सारे घोड़े खोलने पड़े थे. १९२० के आन्दोलन के बाद ही ऐसा माहौल बना था कि अंग्रेजों ने  अपने वफादार  भारतीयों को आगे करके  कई ऐसे संगठन बनवाये जिनके कारण भारतीय अवाम की एकता को तोड़ने में उनको सफलता मिली. कांग्रेस के १९३० के आन्दोलन का ही नतीजा था कि महात्मा गांधी ने अंग्रेजों को मजबूर कर दिया कि वह  भारतीयों के साथ मिलकर देश पर शासन करें . १९३५ का गवर्नमेंट आफ इण्डिया एक्ट  कांग्रेस की अगुवाई में  चले आन्दोलन का ही नतीजा था .यह भी सच है कि अँगरेज़ शासकों ने भारत की राजनीतिक एकता को खत्म करने के बहुत सारे प्रयास किये लेकिन कहीं कोई सफलता नहीं मिली. शायद  राजनीतिक आन्दोलन के इसी जज्बे का नतीजा था कि१९४२ में जब महात्मा गांधी के साथ खड़े देश ने नारा दिया कि अंग्रेजो ' भारत छोडो ' तो ब्रिटिश हुकूमत ने इन शोषित पीड़ित लोगों की  आवाज़ को हुक्म माना और उनको साफ़ लग गया कि भारत की एकजुट राजनीतिक ताक़त के सामने टिक पाना नामुमकिन था. राजनीति की इस परम्परा का वारिस होने का दावा करने वाली कांग्रेस के मौजूदा नेताओं का वातानुकूलित माहौल से बाहर न निकलने का आग्रह समझ परे है .मौजूदा  कांग्रेस नेताओं से गांधी-नेहरू परम्परा की उम्मीद भी नहीं है लेकिन राहुल गांधी की दादी और चाचा की राजनीति की उम्मीद तो  की ही जा सकती है . जब १९७७ में भारी जनाक्रोश के बाद इंदिरा गांधी की सरकार बेदखल कर दी गयी थी तो सत्ता को अपनी  हैसियत से  जोड़ चुके संजय गांधी के सामने मुश्किलें बहुत थीं . इमरजेंसी के उनके कारनामों की जांच के लिए शाह आयोग बना दिया गया था, जनता का भारी विरोध था, गली गली में कांग्रेस और इंदिरा -संजय  की टोली की निंदा हो रही थी.   इमरजेंसी में कांग्रेस के बड़े नेता रहे लोग जनता पार्टी की शरण में जा चुके थे . कांग्रेस के लिए चारों तरह अन्धेरा  ही अँधेरा था लेकिन कांग्रेस ने सड़क पर आने का फैसला किया . एक दिन दिल्ली की सडकों पर चलने वालों देखा कि काले पेंट से दिल्ली की दीवारें पेंट कर दी गयी थीं और लिखा था कि ' शाह आयोग नाटक है '. शाह आयोग को इमरजेंसी की ज्यादातियों की जांच  करने के लिए मोरारजी देसाई सरकार ने स्थापित किया था. उसी के विरोध से  तिरस्कृत कांग्रेस ने विरोध की बुनियाद डाल दी. यह सच है कि उन दिनों  सभ्य समाज में कांग्रेस के प्रति बहुत ही तिरस्कार का भाव था लेकिन संजय गांधी और इंदिरा गांधी ने हिम्मत नहीं हारी . बहुत सारे ऐसे नौजवानों  को संजय गांधी ने इकठ्ठा किया जिनको भला आदमी नहीं माना जा सकता था लेकिन उनके सहारे ही आन्दोलन खड़ा कर दिया और जनता पार्टी की सरकार के विरोधाभासों को बहस के दायरे में ला दिया . इंदिरा गांधी और संजय गांधी जेल भी गए और जब जेल से बाहर आये तो उनके साथ और बड़ी संख्या में लोग जुड़ते गए. नतीजा यह हुआ कि १९८० में कांग्रेस की धमाकेदार वापसी हुई . आज के कांग्रेस के अला नेता किसी आन्दोलन के बाद जेल जाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे हैं . हाँ याह संभव है कि उनको नैशनल हेराल्ड के केस में आपराधिक मामले में जेल जाना पड़ जाए.कांग्रेस ने १९९९ से २००४  तक  सोनिया गांधी के नेतृव में भी अटल बिहारी वाजपेयी सरकार को लगातार घेरने की राजनीति की और सारे तामझाम , सारे मीडिया मैनेजमेंट, सारे शाइनिंग इण्डिया के बावजूद जनता ने कांग्रेस को फिर से सत्ता सौंप दी. सत्ता खंडित थी लेकिन बदलाव हुआ और बदलाव राजनीतिक आन्दोलन के रास्ते हुआ. यह ज़रूरी नहीं कि आन्दोलन के बाद सत्ता मिल ही जाए. सोशलिस्ट पार्टी के बड़े नेताओं , आचार्य नरेंद्र देव और डॉ राम मनोहर लोहिया ने विपक्ष में रहते हुए जीवन भर उस वक़्त की कांग्रेस सरकारों की खामियों को  सड़क पर उतर कर जनता  के सामने उजागर करते रहे  . उन महान नेताओं को सत्ता कभी नहीं मिली लेकिन लोकतंत्र में जनता को यह अहसास हमेशा बना रहा कि उस दौर की सत्ताधारी पार्टी जो भी जनविरोधी काम कर रही है उसकी जानकारी नेताओं को है और वे उसके लिए संघर्ष कर रहे हैं . आज की सत्ताधारी पार्टी बीजेपी भी जब विपक्ष में होती थी तो आम जनता को प्रभावित करने आले मुद्दों पर आन्दोलन का  रास्ता अपनाती  रही  है . दिल्ली में रहने वालों को मालूम है कि जब तक मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री रहे हर हफ्ते बीजेपी की अलग अलग इकाइयों  का जंतर मंतर पर कोई न कोई आन्दोलन चलता ही रहता था.
आज के विपक्षी नेताओं की   स्थिति बिलकुल अलग है . वे टेलिविज़न की बाईट देते हैं , प्रेस  कान्फरेंस करते हैं , लाखों  की कारों  में बैठकर संसद आते हैं , गपशप  करते हैं , कभी कभार कुछ बोल देते हैं और उम्मीद करते हैं कि देश भर में  रहने वाली जनता उनके वचनों को तलाश करके निकाले और उनके अनुसार पूरी तरह से नाकाम हो चुकी मोदी सरकार के खिलाफ २०१९ में मतदान करे  और हरे भरे दिल्ली शहर से बाहर गए बिना इन  विपक्षी नेताओं को सत्ता सौंप दे .लेकिन राजनीति में ऐसा  नहीं होता . यहाँ न कोई बिल्ली होती है और न कोई छींका टूटता है इसलिए सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी को अपना कर्त्तव्य सही  तरह से निभाने के लिए जनता के बीच जाना  होगा . उनको यह  हमेशा ध्यान रखना होगा कि लोकतंत्र में सरकारी पक्ष की भूमिका पर निगरानी  रखने और जनता को चौकन्ना रखने के लिए विपक्ष होता  है . आज की स्थिति यह है कि  विपक्ष अपना काम सही  तरीके से  नहीं कर रहा है .
साभार : देशबन्धु ( 19-05-2017}

इंसाफ पर ना-पाक मुहर क्यों ?

क्या भारत को वाकई कुलभूषण जाधव मामले में काउंसलर एक्सेस मिल जायेगा। ये सबसे बड़ा सवाल है क्योंकि पाकिस्तान के भीतर का सच यही है कि कुलभूषण जाघव को राजनयिक मदद अगर पाकिस्तान देने देगा तो पाकिस्तान के भीतर की पोल पट्टी दुनिया के सामने आ जायेगी । और पाकिस्तान के भीतर का सच आतंक, सेना और आईएसआई से कैसे जुड़ा हुआ है इसके लिये चंद घटानाओं को याद कर लीजिये। अमेरिकी ट्विन टावर यानी 2001 में 9/11 का हमला। और पाकिस्तान ने किसी अमेरिकी एजेंसी को अपने देश में घुसने नहीं दिया । जबकि आखिर में लादेन पाकिस्तान के एबटाबाद में मिला । इसी तरह अमेरिकी पत्रकार डेनियल पर्ल की हत्या आतंकवादियों ने 2002 में की । लेकिन डेनियल के अपहरण के बाद से लगातार पाकिस्तान ने कभी अमेरिकी एजेंसी को पाकिस्तान आने नहीं दिया। फिर याद कीजिये मुबंई हमला । 26/11 के हमले के बाद तो बारत ने पांच डोजियर पाकिस्तान को सौंपे। सबूतों की पूरी सूची ही पाकिस्तान को थमा दी लेकिन लश्कर-ए-तोएबा को पाकिस्तान ने आंतकी संगठन नहीं माना । हाफिज सईद को आतंकवादी नहीं माना । भारत की किसी एजेंसी को जांच के लिये पाकिस्तान की जमीन पर घुसने नहीं दिया । फिर सरबजीत को लेकर एकतरफा जांच की । पाकिस्तान के ही मानवाधिकार संगठन ने सरबजीत को लेकर पाकिस्तानी सेना की संदेहास्पद भूमिका पर अंगुली उठायी तो भी किसी भारतीय एजेंसी को पाकिस्तान में पूछताछ की इजाजत नहीं दी गई । और जेल में ही सरबजीत पर कैदियों का हमला कर हत्या कर दी।

और दो बरस पहले पठानकोट हमले में तो पाकिस्तान की जांच टीम बाकायदा ये कहकर भारत आई कि वह भी भारतीय टीम को पाकिस्तान आने की इजाजत देगी । लेकिन दो बरस बीत गये और आजतक पाकिस्तान ने पठानकोट हमले की जांच के लिये भारतीय टीम को इजाजत नही दी । यानी अगला सवाल कोई भी पूछ सकता है कि क्या वाकई पाकिस्तान जाधव के लिये भारतीय अधिकारियों को मिलने की इजाजत देगा । यकीनन ये अंसभव सा है । क्योंकि पाकिस्तान के भीतर का सच यही है कि सत्ता तीन केन्द्रों में बंटी हुई है । जिसमें सेना और आईएसआई के सामने सबसे कमजोर चुनी हुई सरकार है. और तीनों को अपने अपने मकसद के लिये आतंकवादी या कट्टरपंछी संगठनो की जरुरत है। और सत्ता के इसी चेक एंड बैलेस में फंसे पाकिस्तान के भीतर कोई भी विदेशी अधिकारी अगर जांच के लिये जायेगा या पिर जाधव से मिलने ही कोई राजनयिक चला गया। तो पाकिस्तान का कौन सा सच दुनिया के सामने आ जायेगा।

लेकिन इंटरनेशनल कोर्ट आफ जस्टिस के फैसले को अगर पाकिस्तान नहीं मान रहा है तो मान लीजिये इसके पीछे बडी वजह पाकिस्तान के पीछे चीन खड़ा है,जो भारत के लिये अगर ये सबसे मुश्किल सबब है , तो पाकिस्तान के लिये सबसे बडी ताकत है । क्योंकि इंटरनेशनल कोर्ट आफ जस्टिस के फैसले को जिस तरह पाकिस्तान ने बिना देर किये खारिज किया उसने नया सवाल तो ये खडा कर ही दिया है कि क्या आईएसजे के फैसले को ना मान कर पाकिस्तान यून में जाना चाहता है । यून में चीन के वीटो का साथ पाकिस्तान को मिल जायेगा ।जैसे जैश के मुखिया मसूद अजहर पर वीटो पर चीन ने बचाया । जाहिर है चीन के लिये पाकिस्तान मौजूदा वक्त में स्ट्रेटजिक पार्टनर के तौर पर सबसे जरुरी है और भारत चीन के लिये चुनौती है । और ध्यान दें तो कश्मीर में आंतकवाद से लेकर इकनामिक कॉरीडोर तक में जो भूमिका चीन पाकिस्तान के साथ खडा होकर निभा रहा है उसमें जाधव मामले में भ चीन पाकिस्तान के साथ खडा होगा इंकार इससे भी नहीं किया जा सकता । लेकिन जाधव मामले में पाकिस्तान का साथ देना चीन को भी कटघरे में खड़ा सकता है । क्योंकि मौजूदा वक्त में इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ जस्टिस के 15 जजो की कतार में चीन के भी जज जियू हनक्वीन भी है । और आज फैसला सुनाते हुये दो बार रोनी अब्राहम ने सर्वसम्मति से दिये जा रहे फैसले का जिक्र किया । तो एक तरफ चीन के जज अगर फैसले के साथ है तो फिर मामला चाहे यूएन में चला जाये वहा चीन कैसे पाकिस्तान के लिये वीटो कर सकता है । लेकिन ये तभी संभव है जब चीन भी जाधव मामले पर आईएसजे के फैसेल को सिर्फ कानूनी फैसला माने । लेकिन सच उल्टा है . कोर्ट का फैसला भारत पाकिस्तान के संबंधो के मद्देनजर सिर्फ कानून तक सीमित नहीं है और चीन का पाकिस्तान के साथ खडे होना या भारत के खिलाफ जाना कानूनी समझ भर नहीं है । बल्कि राजनीयिक और राजनीति से आगे न्यू वर्ल्ड आर्डर को ही चीन जिस तरह अपने हक में खडा करना चाह रहा है उसमें भारत के लिये सवाल पाकिस्तान नहीं बल्कि चीन है । जिससे टकराये बगैर पाकिस्तान के ताले की चाबी भी नहीं खुलेगी ये भी सच है ।

क्योंकि इससे पहले कभी इंटरनेशनल कोर्ट आफ जस्टिस के पैसले को लेकर पाकिस्तान का रुख इस तरह नहीं रहा । क्योकि ये चौथी बार है, जब भारत और पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय कोर्ट में आमने-सामने हैं। और 1945 में बने इंटरनेशनल कोर्ट आफ जस्टिस के इतिहास में ये पहला मौका है जब किसी देश के खिलाफ इतना कडा पैसला दिया गया हो । और याद किजिये तो 18 बरस पहले पाकिस्तान ने इसी इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ जस्टिस का दरवाजा ये कहकर खटखटा था कि भारत ने जानबूझ कर पाकिस्तान के टोही विमान को मार गिराया । जबकि सच यही था कि सोलह सैनिकों को ले जा रहा पाकिस्तान का विमान जासूसी के इरादे से भारत के कच्छ में घुस आया था । और तब कोर्ट की 15 जजो की पीठ ने 21 जून 2000 को पाकिस्तानं के आरोपों को बहुमत से खारिज कर दिया था । और आज पाकिस्तान की दलील जाधव को जासूस बताने की खारिज हुई ।तो पाकिस्तान को दोनो बार मात मिली है। और पन्नों को पलटें तो 1971 के युद्द के बाद पूर्वी पाकिस्तान को भारत ने जब बांग्लादेश नाम का देश ही खडा कर दिया । और 90 हजार पाकिस्तानी सैनिको को बंदी बनाया । युद्द के बाद 1973 में पाकिस्तान भारत के खिलाफ आसीजे पहुंचा। पाकिस्तान ने आरोप लगाया कि भारत 195 प्रिजनर्स ऑफ वॉर्स को बांग्लादेश शिफ्ट कर रहा है, जबकि उन्हें भारत में गिरफ्तार किया गया है। ये गैरकानूनी है। भारत ने इस मामले लड़ाई लड़ी लेकिन जब तक कुछ फैसला हो पाता दोनों देशों ने 1973 में न्यू दिल्ली एग्रीमेंट साइन कर लिया। और उससे पहले 1971 में भारत ने अंतरराष्ट्रीय नागरिक उड्डयन संगठन के अधिकार क्षेत्र के खिलाफ एक मामला दायर किया था। पाकिस्तान ने इस संगठन में भारत की शिकायत की थी। इसमें संगठन ने पाकिस्तान का साथ दिया था इसीलिए इस संगठन के खिलाफ भारत ने अंतरराष्ट्रीय न्यायालय का रुख किया। लेकिन-आसीजे से भारत को निराशा हाथ लगी क्योंकि 18 अगस्त 1972 को फैसला पाकिस्तान के पक्ष में गया था। उस वक्त पाकिस्तान के राष्ट्रपति जुल्फिकार अली भुट्टो ने इंटरनेशनल कोर्ट आफ जस्टिस की खूब वाहवाही की थी । और आज पाकिस्तान उसी इंटरनेशनल कोर्ट आफ जस्टिस के फैसले को गलत बता रहा है । तो सवाल अब कुलभूषण जाधव पर अंतरराष्ट्रीय कोर्ट के फैसले का नहीं बल्कि इंसाफ पर पाकिस्तान के नापाक मुहर का है ।


वैकल्पिक मीडिया की भ्रामक अवधारणा

दखल की दुनिया - Thu, 18/05/2017 - 16:52
-    दिलीप ख़ान
सोशल मीडिया का प्रचलन बढ़ने के बाद इसे वैकल्पिक मीडिया करार देने की बहस भी तेज़ी से बढ़ी है। जब भी वैकल्पिक मीडिया की बात होती है तो समान्य तौर पर लोग इसे सोशल मीडिया से जोड़ देते हैं। कुछ वर्ष पहले तक वैकल्पिक मीडिया का पर्याय लघु पत्रिकाओं या फिर छोटे-मझोले अख़बारों को माना जाता था। वक़्त बदला, तकनीक बदली तो फेसबुक, ब्लॉग्स और वेबसाइट्स ने इस अवधारणा को बदल डाला, लेकिन इससे बुनियादी नहीं बदल जाते। वो सवाल आज भी यही है कि असल में वैकल्पिक मीडिया कहा किसे जाए?
 18 मई 2017 के दैनिक जागरण के राष्ट्रीय संस्करण में प्रकाशितवैकल्पिक शब्द आते ही ये साफ़ हो जाता है कि किसी संरचना/विचार या फिर किसी ईकाई के बरअक्स कोई ऐसा ढांचा, जो उससे अलग और कई अर्थों में उलट तौर पर हमारे बीच पेश आएं। जब वैक्लपिक मीडिया नाम का शब्द सामने आता है तो इसे कथित मुख्यधारा मीडिया के समानांतर पेश किया जाता है। लेकिन क्या कोई मीडिया अपने-आप में वैकल्पिक या समानांतर होता है? मीडिया अपने-आप में कोई ऐसी चीज़ नहीं है जो हमारी ‘वैकल्पिकता’ की मंशा के मुताबिक़ व्यवहार करे। 
मीडिया किसी विचार/ख़बर या मुद्दे को पेश करने का ज़रिया भर है। यह एक माध्यम है। विचार और ख़बर किसी भी मीडिया के ज़रिए हम तक पहुंच सकते हैं। मिसाल के लिए जिसे लोग मुख्यधारा का मीडिया कहते हैं उसमें प्रिंट भी शामिल है और टीवी भी। यानी प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक के दो अलग-अलग खांचों में बंटे होने के बावजूद वो “मुख्यधारा” बना रहता है। लेकिन, उसी के बरअक्स लघु पत्रिकाओं और छोटे अख़बारों को जब वैकल्पिक मीडिया के तौर पर हम चिह्नित करते हैं तो हम किस बिंदु पर उसे अलग कह रहे होते हैं? क्या माध्यम के बिंदु पर? माध्यम के लिहाज से देखें तो लघु पत्रिका और छोटे अख़बार प्रिंट की श्रेणी में गिने जाएंगे। ज़ाहिर है फर्क मीडियम का नहीं है, फर्क है विषयवस्तु का।
विषय-वस्तु से ही लोग तय करते हैं कि समानांतर या फिर वैकल्पिक किसे कहा जाए। यानी नैरेटिव ही वैकल्पिक होने का मूल है, मीडिया नहीं। इसलिए वैकल्पिक मीडिया की अवधारणा बुनियादी तौर पर भ्रामक है। बढ़ते ऑनलाइन यूजर्स के बाद ऐसा ज़रूर हुआ है कि कई ख़बरों और मुद्दों को सोशल मीडिया में उछलने के बाद ही बड़े मीडिया घरानों में जगह मिल पाई। इसे सोशल मीडिया की सफ़लता के तौर पर भी पेश किया गया। लेकिन, ‘बड़े मीडिया घरानों’ में जगह दिलाने को उपलब्धि के तौर पर क्यों पेश किया जाए? 

क्या सोशल मीडिया सच में वैकल्पिक मीडिया है?ऐसी कई घटनाओँ की दर्जन भर से ज़्यादा लोकप्रिय मिसालें पिछले दो-तीन वर्षों के दरम्यान ही गिनाईं जा सकती हैं। यही नहीं, सोशल मीडिया मोबलाइज़ेशन इतना कारगर रहा कि कई मुल्कों में सियासत की तस्वीर तक बदल गई। कई जगहों पर सोशल मीडिया के ज़रिए ही लोग साझे मुद्दे और साझे संघर्ष में एकजुट हुए। इसे सोशल मीडिया की बड़ी ताक़त के तौर पर पेश किया जाता रहा है। लेकिन ये विमर्श का दूसरा मुद्दा है। सोशल मीडिया मोबलाइजेशन का बड़ा टूल बनकर उभरा है, इसमें कोई शक नहीं। लेकिन क्या जिन मुद्दों को एक पक्ष अपनी ताक़त के तौर पर पेश करता है वो संपूर्णता में ताक़तवर है? क्या सोशल मीडिया की ये ताक़त सच में उन्हीं विचारों को हासिल है, जिन्हें ‘मुख्यधारा के मीडिया’ में जगह नहीं मिल पाती?

अगर बड़े मीडिया घरानों में ‘जगह दिलाने में क़ामयाब होने’ को हम ताक़त मान लें, तो इसकी एकमात्र वजह उस ख़ास मुद्दे को ज़्यादा लोगों तक पहुंचाए जाने के भाव से जुड़ा है। अब अगर किसी स्थापित मीडिया से ज़्यादा पहुंच किसी निजी वेबसाइट या फिर निजी सोशल मीडिया एकाउंट की हो तो क्या उसे ‘मुख्यधारा’ कहा जाएगा? ये कुछ ऐसे बुनियादी सवाल हैं, जिनपर वैक्लपिक बनाम ‘मुख्यधारा’ की बहस के दरम्यांन फिर से सोचा-देखा जाना चाहिए।
मीडियम से ज़्यादा महत्वपूर्ण है मीडियम पर पकड़ और स्वामित्व। यही नैरेटिव को भी तय करता है और कंटेंट को भी। फ़ेसबुक अगर किसी सामाजिक बदलाव का मंच साबित हो रहा है तो इसी फेसबुक पर भड़काऊ, झूठे और आधारहीन ख़बरें भी चलाई जा रही हैं। बंगलुरू में पूर्वोत्तर राज्यों के लोगों के ख़िलाफ़ जिस तरह ऑनलाइन अभियान चला, वो ज़मीन पर उतरकर और भी ज़्यादा हिंसक हो गया था। फेसबुक और व्हाट्सऐप जैसे मंचों ने तथ्य को कई चेहरों में बांट दिया है। जिसके हाथ में जो ‘तथ्य’ है, वो उसी को ‘असली’ तथ्य मान रहा है। अफ़वाह/झूठ की भी फ़सल यहां लहलहा रही है। पूरा मामला इस पर निर्भर करता है कि फ़ेसबुक या किसी भी सोशल मीडिया का इस्तेमाल किस लिहाज से कौन कर रहा है। अगर वो वर्चस्वशाली विचारधारा के समानांतर कोई नैरेटिव खड़ा कर रहा है तो वो वैकल्पिक पत्रकारिता का मंच हो सकता है, लेकिन वो महज मंच ही है, वैकल्पिक मीडिया नहीं।
फ़ेसबुक एक कंपनी है, जिसपर सारा नियंत्रण मार्क ज़करबर्ग है। यूजर के पास सिर्फ़ अपना कंटेंट तय करने का अधिकार है। मीडियम के गणित और सॉफ्टवेयर को अपने मुताबिक़ ढालने का नहीं। पिछले कुछ वर्षों में इसमें भी कई बदलाव देखने को मिले हैं। फ़ेसबुक के एल्गोरिद्म को इस तरह बदल दिया गया है कि एक यूजर जिन यूजर्स के साथ जितना परस्पर संवाद करेगा, उनकी न्यूज़ फीड में उतनी ही ज़्यादा उन व्यक्तियों का लिखा हुआ कंटेंट दिखेगा। अगर परस्पर संवाद कम हुआ, तो दिखना भी कम। ऐसे में ‘वैकल्पिक मीडिया’ के तौर पर इसे अगर पेश किया जाए और फॉलो करने वाले यूजर्स की संख्या को एक मानक मान लें, तो भी इस एल्गोरिद्म के चलते एक ख़ास विचारधारा वालों के बीच ही वो बातें अटककर रह जाती हैं, या फिर उस विचारधारा से इतर उन लोगों के बीच, जो सच में उस कंटेंट में रुचि रखते हों।
वैक्लपिक नैरेटिव के बिना वैक्लपिक मीडिया कुछ नहीं हैफ़ेसबुक अपने-आप में कंपनी के बतौर किसी भी कंटेंट का उत्पादन नहीं करता। ये यूजर्स जेनेरेटेड कंटेंट का एक मंच है। लेकिन, वो मुनाफ़ा कमाने में दुनिया के बड़े अख़बारों को बहुत पीछे छोड़ चुका है। 2016 के आख़िरी चौथाई में फ़ेसबुक ने 3600 करोड़ रुपए का मुनाफ़ा कमाया, तो वहीं न्यूयॉर्क टाइम्स ने इसी दौरान पिछली चौथाई के मुक़ाबले तीन करोड़ का नुकसान सहा। अब अगर न्यूयॉर्क टाइम्स को ‘मुख्यधारा का मीडिया’ मान लें और फ़ेसबुक को ‘वैकल्पिक मीडिया’ तो किसी भी पैमाने पर ये मुफ़ीद नहीं बैठता। 
जिस तरह कोई आम यूजर अपनी बात दूसरे तक पहुंचाने के लिए फ़ेसबुक का इस्तेमाल करते हैं, उसी तरह न्यूयॉर्क टाइम्स भी फ़ेसबुक के ज़रिए अपनी बात और ज़्यादा लोगों तक पहुंचाने की कोशिश में जुटा है। यानी ये सबके लिए खुला मंच है। वैकल्पिक मीडिया के बदले इसलिए वैकल्पिक पत्रकारिता की अवधारणा पर ज़ोर दिया जाना चाहिए क्योंकि ‘मीडिया और तकनीक’ पर नियंत्रण किसी भी आम व्यक्ति से ज़्यादा आसानी से कोई स्थापित ‘मुख्यधारा मीडिया घराना’ कर सकता है। वैकल्पिक मीडिया की अवधारणा तकनीकी तौर पर भ्रामक है, वैकल्पिक अगर कुछ है तो सिर्फ़ नैरेटिव, राजनीति और विचारधारा।

विवेक भटनागर की चार ग़ज़लें

लेखक मंच - Tue, 16/05/2017 - 02:03

विवेक भटनागर

एक

उसके दिल में इस क़दर तनहाइयां रक्खी मिलीं
उसकी आंखों में वही परछाइयां रक्खी मिलीं

कुछ जगह रक्खी मिली दीवार अपने दरमियां
कुछ जगह पर गहरी-चौड़ी खाइयां रक्खी मिलीं

टूटता दम दफ़्तरों में मां की ममता का मिला
परवरिश करने को घर में बाइयां रक्खी मिलीं

कुछ किताबों में दबी थीं बेतरह दिलचस्पियां
टेक्स्ट बुक में तो फ़क़त जम्हाइयां रक्खी मिलीं

नाज़ था हमको जवानी पर मगर कुछ दिन हुए
रुख़ पे अपने झुर्रियां और झाइयां रक्खी मिलीं

ज़र्दियां मजदूर-मेहनतकश के थीं चेहरों पे जो
मेरी ग़ज़लों में वही रानाइयां रक्खी मिलीं

दो

शबे ग़म इस क़दर ठहरी हुई है
क़रीब आकर सहर ठहरी हुई है

जहां से हम चले मंज़िल की जानिब
वहीं पर रहगुज़र ठहरी हुई है

छलक कर आंख से पाकीज़गी की
चमक रुख़सार पर ठहरी हुई है

बताती है सही दो बार टाइम
घड़ी चारों पहर ठहरी हुई है

टहल कर रेत में लौटा समंदर
किनारे पर लहर ठहरी हुई है

करे किससे शिकायत पत्थरों की
ये डाली बेसमर ठहरी हुई है

किसी दिन भी बदल सकता है मंज़र
बहुत दिन से नज़र ठहरी हुई है

तीन

हां, तो मैं कह रहा था कि आते रहा करो
रिश्ता वही है, जिसको निभाते रहा करो

अपनी मुहब्बतों को लुटाते रहा करो
बदले में दुगना प्यार कमाते रहा करो

उठता है कोई, उसको गिराने को हैं बहुत
गिरते हुओं को यार उठाते रहा करो

या तो बढ़ाओ ज्ञान सुनो सबकी गुफ़्तगू
या कितना ज्ञान है ये बताते रहा करो

होकर बड़े वो नींद की गोली न खाएंगे
बच्चों को लोरी गा के सुलाते रहा करो

नन्हे दियो! तुम्हीं से उजालों की रौनकें
जल-जल के तीरगी को बुझाते रहा करो

तुमको तो मोक्ष चाहिए, दुनिया की क्या पड़ी
गंगा में सारे पाप बहाते रहा करो

हैं ये क़लम उठाने की शर्तें विवेक जी
जागे रहो, सभी को जगाते रहा करो

चार

कुछ लोग दिखावे की फ़क़त शान रखे हैं
तलवार रखें या न रखें, म्यान रखे हैं

गीता ये रखे हैं, तो वो कुरआन रखे हैं
हम घर में मगर मीर का दीवान रखे हैं

बाज़ार है ये, नींद के मारे हैं खरीदार
व्यापारी यहां ख़्वाब की दूकान रखे हैं

जब ज़िंदगी नुकसानो नफ़े पे नहीं चलती
सुख-दुख के लिए लोग क्यों मीज़ान रखे हैं

ग़ुरबत को धरम मान के कुछ लोग तो अक्सर
नवरात्र के व्रत, रोज़ए रमज़ान रखे हैं

जो हक़ हैं ग़रीबों के उन्हें भीख समझकर
देते हैं अगर, उनपे वो एहसान रखे हैं

पत्थर वो चलाते हुए टुक सोच तो लेता
पुरखों ने इन्हीं संग में भगवान रखे हैं

शि‍क्षा और मनोविज्ञान की भी गहरी समझ रखते थे मुक्तिबोध : महेश चंद्र पुनेठा

लेखक मंच - Sun, 14/05/2017 - 01:05

मुक्तिबोध

ज्ञान को लेकर बहुत भ्रम हैं। सामान्यतः सूचना, जानकारी या तथ्यों को ही ज्ञान मान लिया जाता है। इनको याद कर लेना ज्ञानी हो जाना माना जाता है। इस अवधारणा के अनुसार एक ज्ञान प्रदानकर्ता है तो दूसरा प्राप्‍तकर्ता, जिसे पाओले फ्रेरे ‘बैंकिंग प्रणाली’कहते हैं। इसमें शि‍क्षक जमाकर्ता और विद्यार्थी का मस्तिष्‍क बैंक की भूमिका में होता है। शि‍क्षक बच्चे के मस्तिष्‍क रूपी बैंक में सूचना-जानकारी या तथ्य रूपी धन को लगातार जमा करता जाता है। वह इस बात की परवाह नहीं करता है कि उसे लेने के लिए बच्चा तैयार है या नहीं। शि‍क्षक द्वारा कही बात ही अंतिम मानी जाती है। दरअसल, यह ज्ञान की बहुत पुरानी अवधारणा है। यह तब की है, जब शि‍क्षा की मौखिक परंपरा हुआ करती थी। सूचना, जानकारी या तथ्यों को रखने का रटने के अलावा और कोई विकल्प नहीं होता था। एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक इनके हस्तांतरण का यही एकमात्र उपाय हुआ करता था। जो जितनी अधिक सूचना, जानकारी या तथ्यों को याद रख पाता था, वह उतना ही अधिक ज्ञानी माना जाता था। ज्ञान का यह सीमित और आधा अधूरा अर्थ है। वस्तुतः जो लिया या दिया जाता है, वह ज्ञान न होकर केवल सूचना या जानकारी है।

ज्ञान कभी दिया नहीं जा सकता है। ज्ञान का तो निर्माण या सृजन होता है। इसलिए आप दूसरों को सूचना या जानकारी तो दे सकते हैं, ज्ञान नहीं। ज्ञान के साथ बोध का गहरा संबंध है। ज्ञान निर्माण की एक पूरी प्रक्रिया है, जो अवलोकन, प्रयोग-परीक्षण, विश्‍लेषण से होती हुई निष्‍कर्ष तक पहुंचती है। ज्ञान द्वंद्व और संश्‍लेषण से उत्पन्न होता है। अनुभवों और तर्कों की उसमें विशेष भूमिका रहती है। यह माना जाता है कि मनुष्‍य की सारी अवधारणाएं उसके अपने अनुभवों के आधार पर बनती हैं। शि‍क्षा में ज्ञान की यह अवधारणा ‘रचनात्मकतावाद’के नाम से जानी जाती है, जो अपेक्षाकृत नई मानी जाती है। भारतीय शि‍क्षा में इस अवधारणा की गूंज बीसवीं सदी के अंतिम दशक से सुनाई देना प्रारम्भ होती है। लेकिन मुक्तिबोध ज्ञान को लेकर इस तरह की बातें पांचवें दशक में लिखे अपने निबंधों में कहने लगे थे। ज्ञान, बोध, सृजनशीलता, सीखने जैसी अवधारणाओं को लेकर उनके निबंधों में बहुत सारी बातें मिलती हैं। मुक्तिबोध ज्ञान और जानकारी के बीच के इस अंतर को स्पष्‍ट करते हैं। भले ही उनकी यह बात सीखने की प्रक्रिया के संदर्भ में नहीं, बल्कि रचना-प्रक्रिया के संदर्भ में आती है। लेकिन सीखने की प्रक्रिया के संदर्भ में भी वह सटीक बैठती है। मुक्तिबोध ज्ञान के विकास के बारे में कहते हैं- ‘‘बुद्धि स्वयं अनुभूत विशि‍ष्‍टों का सामान्यीकरण करती हुई हमें जो ज्ञान प्रस्तुत करती है, उस ज्ञान में निबद्ध ‘स्व’से ऊपर उठने, अपने से तटस्थ रहने, जो है उसे अनुमान के आधार पर और भी विस्तृत करने की होती है।…ज्ञान व्यवस्था…जीवनानुभवों और तर्कसंगत निष्‍कर्षों और परिणामों के आधार पर होती है।…तर्कसंगत (और अनुभव सिद्ध) निष्‍कर्षों तथा परिणामों के आधार पर, हम अपनी ज्ञान-व्यवस्था तथा उस ज्ञान-व्यवस्था के आधार पर अपनी भाव-व्यवस्था विकसित करते।…बोध और ज्ञान द्वारा ही ये अनुभव परिमार्जित होते हैं यानी पूर्व-प्राप्त ज्ञान द्वारा मूल्यांकित और विश्‍लेषि‍त होकर, प्रांजल होकर, अंतःकरण में व्याख्यात होकर, व्यवस्था-बद्ध होते जाते हैं।’’  वह पुराने ज्ञान में नवीन ज्ञान को जोड़कर सिंद्धांत व्यवस्था का विकास करने की बात करते हैं। यहीं पर द्वंद्व और संश्‍लेषण की प्रक्रिया चलती है। उनके लिए ज्ञान का अर्थ केवल वैज्ञानिक उपलब्धियों का बोध नहीं, वरन् उत्थानशील और ह्रासशील शक्तियों का बोध भी है।…ज्ञान भी एक तरह का अनुभव है, या तो वह हमारा अनुभव है या दूसरों का। इसलिए वे ज्ञान को काल सापेक्ष और स्थिति सापेक्ष मानते हैं। उसे जीवन में उतारने की बात कहते हैं- ‘‘ज्ञान-रूपी दांत जिंदगी-रूपी नाशपाती में गड़ना चाहिए, जिससे कि संपूर्ण आत्मा जीवन का रसास्वादन कर सके।’’

आज सबसे बड़ी दिक्कत शि‍क्षा की यही है कि वह न संवेदना को ज्ञान में बदल पा रही है और न ज्ञान से संवेदना पैदा कर पा रही है। फलस्वरूप आज की शि‍क्षा एक सफल व्यक्ति तो तैयार कर ले रही है, लेकिन सार्थक व्यक्ति नहीं अर्थात ऐसा व्यक्ति जो अपने समाज के प्रति जिम्मेदार और हाशि‍ए पर पड़े लोगों के प्रति संवेदनशील हो, जिसके लिए शि‍क्षित होना धनोपार्जन करने में सक्षम होना न होकर समाज की बेहतरी के लिए सोचना हो। ऐसे में यह महत्वपूर्ण बात है कि मुक्तिबोध ज्ञान को संवेदना के साथ जोड़कर देखते हैं। ‘चांद का मुंह टेड़ा है’कविता की ये पंक्तियां इस संदर्भ में उल्लेखनीय हैं- ‘ज्वलंत अनुभव ऐसे/ऐसे कि विद्युत धाराएं झकझोर/ज्ञान को वेदन-रूप में लहराएं/ज्ञान की पीड़ा/रुधिर प्रवाहों की गतियों में परिणित होकर/अंतःकरण को व्याकुल कर दे।’इसलिए वह यह आवश्‍यकता महसूस करते हैं कि संवेदनात्मक उद्देश्‍य, अपनी पूर्ति की दिशा में सक्रिय रहते हुए, मनुष्‍य के बाल्यकाल से ही उस जीवन-ज्ञान का विकास करे, जो संवेदनात्मक उद्देश्‍यों की पूर्ति करे। संवेदनात्मक उद्देश्‍यों से उनका आशय स्व से ऊपर उठना, खुद की घेरेबंदी तोड़कर कल्पना-सज्जित सहानुभूति के द्वारा अन्य के मर्म में प्रवेश करना है। दूसरे के मर्म में प्रवेश कर पाना तभी संभव है, जब शि‍क्षा दिमाग के साथ-साथ दिल से भी जुड़ी हो, वह बच्चे की संवेदना का विस्तार करे। इसी कारण ज्ञानात्मक-संवेदना और संवेदनात्मक-ज्ञान की अवधारणा उनकी रचना-प्रक्रिया और आलोचना की आधार रही।

मुक्तिबोध अनुभव को, सीखने और रचना के लिए बहुत जरूरी मानते हैं। कोई भी रचना ‘अनुभव-रक्त ताल’में डूबकर ही ज्ञान में बदलती है। देखिए ‘भूरी-भूरी खाक धूल’कविता की ये पंक्तियां- नीला पौधा/यह आत्मज/रक्त-सिंचिता हृदय धरित्री का/आत्मा के कोमल आलबाल में/यह जवान हो रहा/कि अनुभव-रक्त ताल में डूबे उसके पदतल/जड़ें ज्ञान-संविधा की पीतीं।’वह अनुभव को पकाने की बात करते हैं । देखा जाए तो शि‍क्षा एक तरह से अनुभवों को पकाने का ही काम तो करती है। मुक्तिबोध लिखते हैं ,‘‘वास्तविक जीवन जीते समय, संवेदनात्मक अनुभव करना और साथ ही ठीक उसी अनुभव के कल्पना चित्र प्रेक्षित करना- ये दोनों कार्य एक साथ नहीं हो सकते। उसके लिए मुझे घर जाकर अपने में विलीन होना पड़ेगा।’’ वह सिद्धांत की नजर से दुनिया को देखने की अपेक्षा अनुभव की कसौटी पर सिद्धांत को कसने तथा विचारों को आचारों में परिणित करने के हिमायती रहे। यही है ज्ञान निर्माण या सृजन की प्रक्रिया। ‘ज्ञान अनुभव से ही शुरू होता है। ज्ञान के सिद्धांत का भौतिक रूप यही है।  जब व्यक्ति अनुभवों से सीखना छोड़ देता है, उसमें जड़वाद आ जाता है। कितनी महत्वपूर्ण बात कही है उन्होंने, आज तमाम शि‍क्षाविद् इसी बात को तो कह रहे हैं, ‘‘यह सही है कि प्रयोगों में गलती हो सकती है। भूलें हो सकती हैं। किंतु उसके बिना चारा नहीं है। यह भी सही है कि कुछ लोग अपने प्रयोगों से इतने मोहबद्ध होते हैं कि उसमें हुई भूलों से इंकार करके उन्हीं भूलों को जारी रखना चाहते हैं। वे अपनी भूलों से सीखना नहीं चाहते हैं। अतः वह जड़वादी हो जाते हैं।’’ पर इसका अर्थ यह नहीं समझा जाना चाहिए कि मुक्तिबोध प्रयोग और अनुसंधान के नाम पर अब तक मानव जाति को प्राप्त ज्ञान का अर्थात सिद्धांतों से इंकार करते हों। उनका स्पष्‍ट मानना था, ‘‘इसका अर्थ यह कि बदली हुई परिस्थिति में परिवर्तित यथार्थ के नए रूपों का, उनके पूरे अंतःसंबंधों के साथ अनुशीलन किया जाए, उनको हृदयगंम किया जाए।’’  आज इसे ही सीखने का सही तरीका माना जा रहा है। वास्तविक अर्थों में सीखना इसी तरह होता है। यही सीखना स्थाई होता है। सीखने का मतलब कुछ जानकारियों को रट लेना नहीं है। सीखना तो व्यवहार में परिवर्तन का नाम है। ऐसा परिवर्तन जो चेतना को अधिकाधिक यथार्थ संगत बना दे,  जिसके के लिए मुक्तिबोध अतिशय संवेदनशील, जिज्ञासु तथा आत्म-निरपेक्ष मन की आवश्‍यकता पर बल देते हैं। वह अनुभवों से सीखने की ही नहीं, बल्कि अनुभव-सत्य को जन तक पहुंचाने की बात भी कहते हैं- ‘तब हम भी अपने अनुभव/सारांशों को उन तक पहुंचाते हैं जिसमें/जिस पहुंचाने के द्वारा हम, सब साथी मिल/दंडक वन में से लंका का पथ खोज निकाल सकें।’(‘भूरी-भूरी खाक धूल’)। देखा जाय तो यही शि‍क्षा का असली उद्देश्‍य भी है। यदि शि‍क्षित होने पर हम जनहित में कुछ कर नहीं पाए तो उसकी क्या सार्थकता है?

आज शि‍क्षण में पीयर लर्निंग पर बहुत बल दिया जा रहा है। एन.सी.एफ.2005 में कहा गया है कि सहभागितापूर्ण सीखना और अध्यापन, पढ़ाई, भावनाएं एवं अनुभव को कक्षा में एक निश्‍चि‍त और महत्वपूर्ण जगह मिलनी चाहिए। सहभागिता एक सशक्त रणनीति है। यह माना गया है कि समूह में या अपने साथियों से सीखना अधिक अच्छी तरह से होता है। उक्त दस्तावेज इसके पीछे यह तर्क देता है कि जब बच्चे और शि‍क्षक अपने व्यक्तिगत या सामूहिक अनुभव बांटते हैं, उन पर चर्चा करते हैं और उनमें परखे जाने का भय नहीं होता है, तो इससे उन्हें उन लोगों के बारे में भी जानने का अवसर मिलता जो उनके सामजिक यथार्थ का हिस्सा नहीं होते। इससे वे विभिन्नताओं से डरने के बजाय उन्हें समझ पाते हैं। कुछ इसी तरह की बात मुक्तिबोध अपने एक निबंध ‘समीक्षा की समस्याएं’ में लिखते हैं- ‘‘जहां तक वास्तविक ज्ञान का प्रश्‍न है- वह ज्ञान स्पर्धात्मक प्रयासों से नहीं, सहकार्यात्मक प्रयासों से प्राप्त और विकसित हो सकता है।’’  यह अच्छी बात है कि मुक्तिबोध प्रतियोगिता या प्रतिस्पर्धा को नकारते हैं। हो भी क्यों न! यह एक पूंजीवादी मूल्य है और मुक्तिबोध समाजवादी समाज के समर्थक रहे। प्रतिस्पर्धा से कभी भी एक समतामूलक या सहकारी समाज नहीं बन सकता है। सबको साथ लेकर आगे बढ़ने की प्रवृत्ति ही एक सुंदर समाज का निर्माण कर सकती है।

सीखने के लिए स्वतंत्रता और भयमुक्त वातावरण का होना बहुत जरूरी है। दबाव या भय में कुछ भी सीखना संभव नहीं है। स्वतंत्रता बच्चे को चिंतन और उसे सृजन के लिए प्रेरित करती है। बच्चे में सृजनशीलता के विकास के लिए स्वतंत्रता का होना पहली शर्त है। कुछ इसी तरह की बात मुक्तिबोध भी कहते हैं- ‘‘व्यक्ति-स्वातंत्र्य कला के लिए, दर्शन के लिए, विज्ञान के लिए अत्यधिक आवश्‍यक और मूलभूत है। कोई भी सृजनशील प्रक्रिया उसके बिना गतिमान नहीं हो सकती।’’ मुक्तिबोध व्यक्तिगत स्वतंत्रता के प्रबल समर्थक हैं। उनका मानना है कि भले ही यह एक आदर्श है फिर भी मानव की गरिमा और मानवोचित जीवन प्रदान करने के लिए बहुत जरूरी है। यह जनता के जीवन और उसकी मानवोचित आकाक्षांओं से सीधे-सीधे जुड़ा़ है। कोई भी सृजनशील प्रक्रिया उसके बिना आगे नहीं बढ़ सकती है। यह सच भी है। हम अपने चारों ओर अतीत से लेकर वर्तमान तक दृष्‍टि‍पात करें तो पाते हैं कि दुनिया में जितने भी बड़े सृजन हुए हैं, वे सभी किसी न किसी स्वातंत्र-व्यक्तित्व की देन हैं। इन व्यक्तित्वों को यदि सृजन की आजादी नहीं मिली होती तो इतनी बड़ी उपलब्धि उनके खातों में नहीं होती। हर सृजन के मूल में स्वतंत्रता ही है। मुक्तिबोध इस बात को बहुत गहराई से समझते हैं।

इस प्रकार ज्ञान की बदली अवधारणा और बाल मनोविज्ञान की दृष्‍टि‍ से विश्‍लेषण करें तो हम पाते हैं कि मुक्तिबोध का चिंतन बहुत तर्कसंगत और प्रगतिशील है। इसमें शि‍क्षा और मनोविज्ञान को लेकर उनकी गहरी समझ परिलक्षित होती है। एक लोकतांत्रिक और वैज्ञानिक सोच से लैस समाज बनाने की दिशा में उनका यह चिंतन बहुत उपयोगी सिद्ध हो सकता है। आज जब ज्ञान को एक खास तरह के खांचे में फिट करने और तैयार माल की तरह हस्तांतरित करने की कोशि‍श हो रही है, तो मुक्तिबोध के ये विचार अधिक प्रासंगिक हो उठते हैं।

घर का मालिक यानी पति

शब्दों का सफर - Sat, 13/05/2017 - 20:09
दु नियाभर की भाषाओं में शब्द निर्माण व अर्थस्थापना की प्रक्रिया एक सी है। विवाहिता स्त्री के जोड़ीदार के लिए अनेक भाषाओं के शब्दों में अधीश, पालक, गृहपति जैसे एक से रूढ़ भाव हैं। हिन्दी में ‘पति’ सर्वाधिक बरता जाने वाला शब्द है। उसे गृहस्थ भी कहते हैं। अंग्रेजी में वह हसबैंड है। फ़ारसी में खाविन्द है। संस्कृत में शालीन। भारत-ईरानी परिवार की भाषाओं में राजा, नरेश, नरश्रेष्ठ, वीर, नायक जैसे शब्दों में “पालक-पोषक” जैसे भावों का भी विस्तार हुआ। यह शब्द पहले आश्रित, विजित या प्रजा के साथ सम्बद्ध हुआ फिर किसी न किसी तौर पर स्त्री के जीवनसाथी की अभिव्यक्ति इन सभी रूपों में होने लगी। हसबैंड जो घर में वास करे- ‘पति’ में स्वामी, नाथ, प्रभु, क्षेत्रिक, राज्यपाल, शासक, प्रधान, पालक के साथ-साथ भर्ता अथवा भरतार का भाव है जिसका अर्थ हसबैंड। दम्पति का अर्थ भी गृहपति ही है। यह दिलचस्प है कि पालक, भरतार यानी भरण-पोषण करने वाला जैसी अभिव्यक्ति के अलावा ‘पति’ जैसी व्यवस्था में रहने अथवा निवासी होने का भाव भी आश्चर्यजनक रूप में समान है। अंग्रेजी के हसबैंड शब्द को लीजिए जिसमें शौहर, पति, खाविंद, नाथ या स्वामी का भाव है। इसका पूर्वपद है hus जिसका अभिप्राय घर यानी house है। पाश्चात्य भाषाविज्ञानियों के मुताबिक पुरानी इंग्लिश में इसका रूप हसबौंडी था। विलियम वाघ स्मिथ इसे Bonda बताते हैं जिसका अर्थ है स्वामी, मालिक। इस तरह हसबैंड का मूलार्थ हुआ वह जो घर में रहता है। भाव स्थिर हुआ गृहस्थ, गृहस्वामी, गृहपति अर्थात पति। खाविंद अर्थात स्वामी- फ़ारसी में पति को ख़ाविंद कहते हैं जो मूल फ़ारसी के خاوند खावंद का अपभ्रंश है। इसका अर्थ है शौहर, पति-परमेश्वर, भरतार, सरताज और गृहपति आदि। भाषाविज्ञानियों के अनुसार (प्लैट्स, नूराई, मद्दाह, अवस्थी आदि) खावंद दरअसल خداوند खुदावन्द का छोटा रूप (संक्षेपीकरण) है। यह दो शब्दों, खुदा خدا और وند वन्द से मिल कर बना है। ग़ौर करें खुदा का अर्थ है प्रभु, स्वामी, ईश्वर, परम आदि। संस्कृत के वन्त / वान जैसे सम्बन्ध-सूचक जेन्दावेस्ता/फ़ारसी में वन्द/मन्द/बान में बदल जाते हैं। इस तरह खुदावन्द का अर्थ हुआ खुदा सरीखा, परमेश्वर सरीखा। ज़ाहिर है हिन्दी में पति, स्वामी या भरतार कहने के पीछे भी यही भाव है। गृहस्थ यानी जो घर में रहे- हिन्दी का गृहस्थ शब्द भी इसी कड़ी में खड़ा नज़र आता है। उसे कहते हैं जो घर में रहता हो। जो घर में स्थिर/स्थित हो। गृहस्थ में विवाहित, बाल-बच्चेदार, गृहपति जैसे भाव हैं। घर और मकान दरअसल एक से शब्द लगते हैं मगर इनमें फ़र्क है। घर एक व्यवस्था है जबकि मकान एक सुविधा है। सो घर जैसी व्यवस्था में रिश्तों के अधीन होना ज़रूरी होता है। इसीलिए आमतौर पर घर होना, किसी रिश्ते में बंधने जैसा है। शादी-शुदा व्यक्ति को इसीलिए घरबारी कहा जाता है किसी स्त्री को गिरस्तिन तभी कहा जाता है जबकि वह विवाहिता हो। शालीन वही जो गृहस्थ हो- हिन्दी में सीधे सरल स्वभाव वाले व्यक्ति को शालीन कहा जाता है। दरअसल यह शालीन का अर्थविस्तार है। किसी ज़माने में शालीन का अर्थ था गृहस्थ। डॉ रामविलास शर्मा के मुताबिक शालीन वह व्यक्ति है जिसके रहने का ठिकाना है। मोटे तौर पर यह अर्थ कुछ दुरूह लग सकता है, मगर गृहस्थी, निवास, आश्रय से उत्पन्न व्यवस्था और उससे निर्मित सभ्यता ही घर में रहनेवाले व्यक्ति को शालीन का दर्जा देती है। शाल् यानी रहने का स्थान, शाला, धर्मशाला, पाठशाला आदि इससे ही बने हैं। शाल शब्द के मूल में बाड़ा अथवा घिरे हुए स्थान का अर्थ निहित है। कन्या के लिए हिन्दी का लोकप्रिय नाम शालिनी संस्कृत का है जिसका अर्थ गृहस्वामिनी अथवा गृहिणी होता है। व्यापक अर्थ में गृहस्थ ही शालीन है। स्पष्ट है कि आश्रय में ही शालीनता का भाव निहित है। घरबारी जिसका घरु-दुआर हो- गृहस्थ के लिए घरबारी शब्द बना है घर+द्वार से। घरद्वार एक सामासिक पद है जिसमें द्वार भी घर जैसा ही अर्थ दे रहा है। द्वार से ‘द’ का लोप होकर ‘व’ बचता है जो अगली कड़ी में ‘ब’ में तब्दील होता है। इस तरह घरद्वार से घरबार प्राप्त होता है जिससे बनता है घरबारी। गिरस्तिन भी दम्पति के अर्थ में असली घरमालकिन है। घर शब्द की व्युत्पत्ति संस्कृत के गृह से मानी जाती है। संस्कृत का गृह और प्राकृत घर एक दूसरे के रूपान्तर हैं। यहाँ ‘र’ वर्ण ‘ग’ से अपना दामन छुड़ा कर आज़ाद होता है और ‘ह’ खुद को ‘ग’ से जोड़ कर ‘घ’ में तब्दील होता है इस तरह ‘गृह’ से ‘घर’ बनता है। दम्पती यानी घर के स्वामी- हिन्दी में संस्कृत मूल के दम्पति का दम्पती रूप प्रचलित है जिसका अर्थ है पति-पत्नी। संस्कृत में दम्पति का जम्पती रूप भी है। संस्कृत कोशों में दम का अर्थ घर, मकान,आश्रय बताया गया है वहीं बांधने का, रोकने का, थामने का, अधीन करने का भाव भी है। यही नहीं, इसमें सज़ा देने, दण्डित करने का भाव भी है। अनिच्छुक व्यक्ति या जोड़े को चहारदीवारी में रखना दरअसल सज़ा ही तो है। जिसका कोई ठौर-ठिकाना न हो वह आवारा, छुट्टा सांड जैसे विशेषणों से नवाज़ा जाता है जबकि हमेशा घर में रहनेवाले व्यक्ति को घरू या घरघूता, घरघुस्सू आदि विशेषण दिये जाते हैं। गृहपति भी है दम्पती- दम्पति का एक अन्य अर्थ है गृहपति। पुराणों में अग्नि, इन्द्र और अश्विन को यह उपमा मिली हुई है। दम्पति का एक अन्य अर्थ है जोड़ा, पति-पत्नी, एक मकान के दो स्वामी अर्थात स्त्री और पुरुष। दम् की साम्यता और तुलना द्वन्द्व से भी की गई है जिसमें द्वित्व का भाव है अर्थात जोड़ी, जोड़ा, युगल, स्त्री-पुरुष आदि। जो भी हो, दम्पति में एक छत के नीचे साथ-साथ रहने वाले जोड़े का भाव है। आजकल सिर्फ़ पति-पत्नी के अर्थ में दम्पति शब्द का प्रयोग होने लगा है जबकि इसमें घरबारी युगल का भाव है। दम में है आश्रय- यह जो दम् शब्द है, यह भारोपीय मूल का है और इसमें आश्रय का भाव है। आश्रय के अर्थ में भारतीय मनीषा में धाम शब्द का बड़ा महत्व है। धाम का मोटा अर्थ यूं तो निवास, ठिकाना, स्थान आदि होता है मगर व्यापक अर्थ में इसमें विशिष्ट वास, आश्रम, स्वर्ग सहित परमगति अर्थात मोक्ष का अर्थ भी शामिल है। धाम इंडो-यूरोपीय भाषा परिवार का शब्द है। संस्कृत धातु ‘धा’ इसके मूल में है जिसमें धारण करना, रखना, रहना, आश्रय जैसे भाव शामिल हैं। प्राचीन भारोपीय भाषा परिवार की dem/domu जैसी क्रियाओं से इसकी रिश्तेदारी है जिनका अभिप्राय आश्रय बनाने (गृहनिर्माण) से है। दम यानी डोम यानी गुम्बद- यूरोपीय भाषाओं में dome/domu मूल से कई शब्द बने हैं। गुम्बद के लिए अंग्रेजी का डोम शब्द हिन्दी के लिए जाना पहचाना है। सभ्यता के विकासक्रम में डोम मूलतः आश्रय था। सर्वप्रथम जो छप्पर मनुष्य ने बनाया वही डोम था। बाद में स्थापत्य कला का विकास होते होते डोम किसी भी भवन के मुख्य गुम्बद की अर्थवत्ता पा गया मगर इसमें मुख्य कक्ष का आशय जुड़ा है जहां सब एकत्र होते हैं। लैटिन में डोमस का अर्थ घर होता है जिससे घरेलु के अर्थ वाला डोमेस्टिक जैसा शब्द भी बनता है।

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अच्छी कविता समय की जटिलता को समेटती है : वि‍ष्णु नागर

लेखक मंच - Sat, 13/05/2017 - 15:30

काव्य-संग्रह ‘वह लड़की जो मोटरसाइकिल चलाती है‘ का लोकार्पण करते पल्ल्व, प्रेमचंद गांधी, वि‍ष्णु नागर और अनन्त भटनागर।

अजमेर : ‘‘हमारी दुनिया में इतने रंग और जटिलताएं हैं कि उन्हें समेटना हो तो कविता करने से सरल कोई तरीका नहीं हो सकता। यह आवश्यक नहीं कि जो आसानी से समझ आ जाए, वह अच्छी और जो समझना जटिल हो, वह खराब कविता है या इसके विपरीत भी। जो कविता समय की जटिलता को समेटती है, वो अच्‍छी कविता है। सामाजिक परिवर्तनों को रेखांकित करना ही कविकर्म है।’’ ये विचार सुविख्यात कवि व व्यंग्यकार विष्णु नागर ने कवि व शिक्षाविद् डॉ. अनन्त भटनागर के नये काव्य-संग्रह ‘वह लड़की जो मोटरसाइकिल चलाती है’ के लोकार्पण समारोह में बतौर मुख्य अतिथि व्यक्त किये। रविवार 7 मई, 2017 को सूचना केन्द्र में आयोजित कार्यक्रम में उन्होंने कहा कि संग्रह की कविताएं सामाजिक चेतना से संबद्ध हैं और समझने में भी सरल हैं। सरल अभिव्यक्ति कौशल अत्यन्त कठिन कार्य है।

समारोह में विशिष्ट अतिथि युवा आलोचक डॉ. पल्लव ने कविता के सामाजिक सरोकारों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि अनन्त भटनागर की काव्यचेतना पर जन आन्दोलनों का प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है। अध्यक्षीय उद्बोधन देते हुए प्रतिष्ठित कवि-स्तंभकार प्रेमचन्द गांधी ने कहा कि इस संग्रह की कविताएं नये तेवर और प्रभावी शब्दावली को लिये हुए हैं।

चित्तौड़गढ़ से आये डॉ. राजेश चौधरी और वरिष्ठ काव्य आलोचक डॉ. बीना शर्मा ने पुस्तक पर विस्तृत आलेख पढ़ते हुए कहा कि वर्तमान की स्थितियों पर केन्द्रित होना इस संग्रह की विशेषता है। मोबाइल फोन, बाजार, नया साल और सेज में नयी सभ्यता के उपादानों को समझने की कोशिश की गई है। संग्रह का दूसरे खण्ड उम्र का चालीसवाँ में नितांत निजी अनुभूतियों के साथ रिश्तों में आते बदलाव को अभिव्यक्त करती कविताएं हैं। शीर्षक कविता कथ्य में अनूठी और सच्चे स्त्री विमर्श की कविता है। डॉ. रजनीश चारण, कालिंदनंदिनी शर्मा और दिव्या सिंहल ने अतिथियों का परिचय दिया। नगर निगम उपायुक्त ज्योति ककवानी, शचि सिंह और वर्षा शर्मा ने संग्रह की चुनिंदा कविताओं का पाठ किया।

स्वागत उद्बोधन में नाटककार उमेश कुमार चैरसिया ने कृति को मानवीय संवेदनाओं की अभिव्यक्ति बताया। समारोह का संचालन गीतकार कवयित्री पूनम पाण्डे ने किया। डॉ. बृजेश माथुर ने आभार अभिव्यक्त किया। इस अवसर पर नगर के अनेक गणमान्य व्यक्ति उपस्थित थे।

प्रस्तुति‍ : उमेश कुमार चैरसिया

घाटी के सफर पर 24 घंटे

कल तक बंदूक का मतलब आतंक था, आज वादी की हवाओं में बारुद है......


जहाज ने जमीन को छुआ और तो खिड़की से बाहर का मौसम कुछ धुंधला धुंधला सा दिखायी दिया। तब तक एयर-होस्टेज की आवाज गूंज पड़ी...बाहर का तापमान 27 डिग्री है । उमस भी है। सुबह के 11 बजे थे और जहाज का दरवाजा खुलते ही गर्म हवा का हल्का सा झोंका चेहरे से टकराया। सीट आगे की थी तो सबसे पहले श्रीनगर की हवा का झोंका चेहरे से टकराया। घाटी आना तो कई बार हुआ और हर बार आसमान से कश्मीर घाटी के शुरु होते ही कोई ना कोई आवाज कानों से टकराती जरुर रही कि कश्मीर जन्नत क्यों है। लेकिन पहली बार जन्नत शुरु हुई और जहाज जमीन पर आ गया और कोई आवाज नहीं आई। गर्मी का मौसम है जहाज खाली। किराया भी महज साढे तीन हजार। यानी सामान्य स्थिति होती तो मई में किराया सात से दस हजार के बीच होता। लेकिन वादी की हवा जिस तरह बदली। या कहें लगातार टीवी स्क्रीन पर वादी के बिगड़ते हालात को देखने के बाद कौन जन्नत की हसीन वादियों में घूमने निकलेगा । ये सवाल जहन में हमेशा रहा लेकिन जहाज जमीन पर उतरा तो हमेशा की तरह ना तो कोई चहल-पहल हवाई अड्डे पर नजर आई ना ही बहुतेरे लोगों की आवाजाही। हां, सुरक्षाकर्मियों की सामान्य से ज्यादा मौजूदगी ने ये एहसास जरुर करा दिया कि फौजों की आवाजाही कश्मीर हवाई अड्डे पर बढ़ी हुई है। और बाहर निकलते वक्त ना जाने क्यों पहली बार इच्छा हुई कि हर एयरपोर्ट का नाम किसी शक्स के साथ जुड़ा होता है तो श्रीनगर अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट किसके नाम पर है। और पहली बार नजर गई एक किनारे में लिखा है शेख-उल-आलम एयरपोर्ट। कौन है शेख-उल-आलम...ये सोच
बाहर निकला तो इकबाल हाथ में मेरे नाम का प्लेकार्ड लिये मिल गया। इकबाल । श्रीनगर के डाउन टाउन में रहने वाला। टैक्सी चलाता है । और आज से नहीं 1999 से इकबाल में पहली बार एयरपोर्ट पर ही मिला था । तब मैं भी पहली बार श्रीनगर पहुंचा था। लेकिन तब साथ में कैमरा टीम थी। क्योंकि अमरनाथ यात्रा के दौरान आतंकी हिंसा की रिपोर्ट करने पहुंचा। और उसके बाद दर्जनों बार इकबाल ही हवाईअड्डे पर दिल्ली से एक फोन करने पर पहुंच जाता । और हर बार मेरे सवालों का जबाब देते देते वह शहर पहुंचा देता। ये शेख-उल-आलम कौन थे । जिनके नाम पर श्रीनगर हवाई अड्डा है।

आप पहले व्यक्ति है जो पूछ रहे हैं। जनाब वो संत थे । उन्हें नुन्द श्रृषि । यहां से 60 किलोमीटर दूर कुलगाम के क्योमोह गांव में जन्म हुआ था । बहुत नामी संत थे । कुलगाम चलेंगे क्या । श्रीनगर से अनंतनाग। वहां से 10 किलोमीटर ही दूर है । न न । मैं झटके में बोला । कल सुबह लौटना भी है। कुछ घंटों के लिये इस बार आये है। हां ..रोज टीवी पर रिपोर्ट दिखाते दिखाते सोचा शनिवार का दिन है छुट्टी है। रविवार को लौट जाऊंगा । जरा हालात देख आऊं । लोग हालात देख कर नहीं आते और आप हालात देखने आये हो। अब ये किसी से संभल नहीं रहा है। या कहे कोई संभाल नहीं रहा। आप जो भी कहो। लेकिन हर कोई तो सड़क पर ह। ना कोई काम है । ना कमाई। स्कूल कालेज चलते नहीं। बच्चे क्या करें। और मां बाप परेशान हैं। ये देखिये गिलानी का घर। चारों
तरफ पुलिस वाले क्यों है। सिर्फ सिक्यूरिटी फोर्स ही तो है हर जगह। और इकबाल के कहते ही मेरी नजर बाहर सड़क पर गई तो बख्तरबंद गाडियों में सिक्यूरिटी फोर्स की आवाजाही ने खींच लिया। ये सिर्फ हैदरपुरा [ गिलानी का घर ] में है या पूरे शहर में । शहर में आप खुद ही देख लेना । कहां जायेंगे पहले। सीधे लाल चौक ले चलो। जरा हालात देखूंगा । चहल-पहल देखूंगा । फिर यासिन मलिक से मिलूंगा । अब चलती नहीं है सेपरिस्टों की। क्यों दिल्ली से तो लगता है कि अलगाववादी ही कश्मीर को चला रहे हैं। इकबाल हंसते हुये बोला । जब महबूबा दिल्ली की गुलाम हो गई तो आजाद तो सिर्फ सेपरिस्ट ही बचे। फिर चलती क्यों नहीं। क्योंकि अब लोगों में खौफ नहीं रहा । नई पीढी बदल चुकी है । नये हालात बदल चुके हैं । लेकिन सरकारों के लिये कश्मीर अब भी नब्बे के युग में है। आप खुद ही यासिन से पूछ लेना, नब्बे में वह जवान था। बंदूक लिये घाटी का हीरो था । अब सेपरिस्टों के कहने पर कोई सड़क पर नहीं आता । सेपरिस्ट ही हालात देखकर सड़क पर निकले लोगों के साथ खड़े हो जाते हैं। पूछियेगा यासिन से ही कैसे वादी में हवा बदली है और बच्चे-बच्चियां क्यों सडक पर है । रास्ते में मेरी नजरें लगातार शनिवार के दिन बाजार की चहल-पहल को भी खोजती रही । सन्नाटा ज्यादा नजर आया । सड़क पर बच्चे खेलते नजर आये। डल लेक के पास पटरियों पर पहली बार कोई जोड़ा नजर नहीं आया। और लाल चौक। दुकानें खुली थीं। कंटीले तारों का झुंड कई जगहों पर पड़ा था। सुरक्षाकर्मियों की तादाद हमेशा की तरह थी। लाल चौक से फर्लांग भर की दूरी पर यासिन मलिक का घर। पतली सी गली । गली में घुसते ही चौथा मकान। लेकिन गली में घुसते ही सुरक्षाकर्मियों की पहली आवाज किससे मिलना है । कहां से आये है । खैर पतली गली । और घर का लकड़ी का दरवाजा खुलते ही। बेहद संकरी घुमावदार सीढ़ियां । दूसरे माले पर जमीन पर बिछी कश्मीरी कारपेट पर बैठ यासिन मलिक। कैसे आये । बस आपसे मिलने और कश्मीर को समझने देखने आ गये । अच्छा है जो शनिवार को आये । जुम्मे को आते तो मिल ही नहीं पाते। क्यों ? शुक्रवार को सिक्यूरिटी हमें किसी से मिलने नहीं देती और हमारे घर कोई मिलने आ नहीं पाता । यानी । नजरबंदी होती है । तो सेपरिस्टो ने अपनी पहचान भी तो जुम्मे के दिन पत्थरबाजी या पाकिस्तान का झंडा फरहाने वाली बनायी है । आप भूल कर रहे हैं । ये 90 से 96 वाला दौर नहीं है । जब सेपरिस्टो के इशारे पर बंदूक उठायी जाती। या सिक्यूरिटी के खिलाफ नारे लगते । क्यों 90 से 96 और अब के दौर में अंतर क्या आ गया है। हालात तो उससे भी बुरे लग रहे हैं। स्कूल जलाये जा रह हैं। लड़कियां पत्थर फेंकने सड़क पर निकल पड़ी हैं। आतंकी खुलेआम गांव में रिहाइश कर रहे है । किसी आतंकी के जनाजे में शामिल होने  लिये पूरा गांव उमड़ रहा है । तो आप सब जानते ही हो तो मैं क्या कहूं । लेकिन ये सब क्यों हो रहा है ये भी पता लगा लीजिये । ये समझने तो आये हैं। और इसीलिये आपसे मिलने भी पहुंचे हैं। देखिये अब सूचना आप रोक नहीं सकते। टेक्नालाजी हर किसी के पास है । या कहे टेक्नालाजी ने हर किसी को आपस मे मिला दिया है । 90-96 के दौर में कश्मीरियों के टार्चर की कोई कहानी सामने नहीं आ पाई । जबकि उस दौर में क्या कुछ हुआ उसकी निशानी तो आज भी मौजूद है । लेकिन देश – दुनिया को कहां पता चला । और अब जीप के आगे कश्मीरी को बांध कर सेना ने पत्थर से बचने के लिये ढाल बनाया तो इस एक तस्वीर ने हंगामा खड़ा कर दिया । पहले कश्मीर से बाहर पढ़ाई कर रहा कोई छात्र परेशान होकर वापस लौटता तो कोई नहीं जानता था। अब पढे-लिखे कश्मीरी छात्रों के साथ देश के दूसरे
हिस्से में जो भी होता है, वह सब के सामने आ जाता है । कश्मीर के बाहर की दुनिया कश्मीरियों ने देख ली है। इंडिया के भीतर के डेवलेपमेंट को देख लिया है । वहां के कालेज, स्कूल, हेल्ख सेंटर , टेक्नालाजी सभी को देखने
के बाद कश्मीरियों में ये सवाल तो है कि आखिर ये सब कश्मीर में क्यों नहीं । घाटी में हर चौराहे पर सिक्यूरिटी क्यों है ये सवाल नई पीढ़ी जानना चाहती है । उसे अपनी जिन्दगी मे सिक्यूरिटी दखल लगती है। आजादी के मायने बदल गये है बाजपेयी जी । अ

अब  आजादी के नारो में पाकिस्तान का जिक्र कर आप नई पीढी को गुमराह नहीं कर सकते हैं। तो क्या सेपरिस्टो की कोई भूमिका नहीं है । आतंकवाद यूं ही घाटी में चल रहा है। गांव के गांव कैसे हथियारों से
लैस हैं। लगातार बैंक लूटे जा रहे हैं। पुलिस वालों को मारा जा रहा है । क्या ये सब सामान्य है । मैं ये कहां कह रहा हू सब सामान्य है । मैं तो ये कह रहा हूं कि कश्मीर में जब पीढी बदल गई, नजरिया बदल गया । जबकि दिल्ली अभी भी 90-96 के वाकये को याद कर उसी तरह की कार्रवाई को अंजाम देने की पॉलिसी क्यों अपनाये हुये है । क्या किसी ने जाना समझा कि वादी में रोजगार कैसे चल रहा है । घर घर में कमाई कैसे हो रही है । बच्चे पढाई नही कर पा रहे है । तो उनके सामने भविष्य क्या होगा । तो स्कूल जला कौन रहा है । स्कूल जब नहीं जले तब पांच महीने तक स्कूल बंद क्यों रहे...ये सवाल तो आपने कभी नहीं पूछा । तो क्या सेपरिस्ट स्कूल जला रहे हैं । मैंने ये तो नहीं कहा। मेरे कहने का मतलब है जनता की हर मुश्किल के साथ अगर दिल्ली खड़ी नहीं होगी तो उसका लाभ कोई कैसे उठायेगा, ये भी जले हुये स्कूलों को देखकर समझना चाहिये। हुर्रियत ने तो स्कूलों की जांच कराने को कहा । मैंने खुद कहा कौन स्कूल जला रहा है सरकार को बताना चाहिये। आप नेताओं से मिलें तब आपको सियासत समझ में समझ में आयेगी । फिर आप खुद ही लोगों से मिलकर पूछें कि आखिर ऐसा क्या हआ की जो मोदी जी चुनाव से पहले कश्मीरियत का जिक्र कर रहे थे वह वही मोदी जी चुनाव परिणाम आने के बाद कश्मीरियो से दूरी क्यों बना बैठे । और चुनी हुई महबूबा सरकार का मतलब है कितना । यासिन से कई
मुद्दो पर खुलकर बात हुई । बात तो इससे पहले भी कई बार हुई थी । लेकिन पहली बार यासिन मलिक ने देश की राजनीति के केन्द्र में खडे पीएम मोदी को लेकर कश्मीर के हालात से जोडने की वकालत की । सीरिया और आईएसआईएस के संघर्ष तले कश्मीर के हालात को उभारने की कोशिश की । करीब दो घंटे से ज्यादा वक्त गुजारने के बाद मोहसूना [ यासिन का घर } से निकला तो श्रीनगर में कई लोगो से मुलाकात हुई । लेकिन जब बात एक पूर्व फौजी से हुई और उसने जो नये सवाल खडे किये । उससे कई सवालों के जबाव पर ताले भी जड दिये। मसलन पूर्व फौजी ने साफ कहा , जिनके पास पैसा है । जिनका धंधा बडा है । कमाई ज्यादा है । उनपर क्या असर पडा । क्या किसी ने जाना । और जब वादी के हालात बिगड चुके है जब उसका असर जम्मू पर कैसे पड रहा होगा क्या किसी ने जाना । क्या असर हो रहा है । आप इंतजार किजिये साल भर बाद आप देखेगें कि
जम्मू की डेमोग्राफी बदल गई है । वादी में जो छह महीने काम-कमाई होती थी जब वह भी ठप पडी चुकी है तो फिर धाटी के लोग जायेगें कहा । कमाई-धंधे का केन्द्र जम्मू बन रहा है । सारे मजदूर । सारे बिजनेस जम्मू शिफ्ट हो रहे है ।जिन हिन्दु परिवारो को लगता रहा कि घाटी में मिस्लिम बहुतायत है और जम्मू में हिन्दू परिवार तो हालात धीरे धीरे इतने बदल रहे है कि आने वाले वक्त में मुस्लिमो की तादाद जम्मू में भी ज्यादा हो जायेगी । और जम्मू से ज्यादा बिसनेस जब कश्मीर में है तो फिर जम्मू के बिजनेस मैन भी कश्मीरियो पर ही टिके है । लेकिन चुनी हुई सरकार के होने के बावजूद सेना ही केन्द्र में क्यो है । और सारे सवाल सेना को लेकर ही क्यू है । कोई महबूबा मुफ्ती को लेकर सवाल खडा क्यो नहीं करता । ये बात आप नेशनल कान्प्रेस वालो से पूछिये या फिर किसी भी नेता से पूछिये आपको समझ में आ जायेगा । लेकिन आपको क्या मानना है कि महबूबा बेहद कमजोर सीएम साबित हुई है । महबूबा कमजोर नहीं मजबूत हो रही है । उसका कैडर । उसकी राजनीति का विस्तार हो
रहा है । वह कैसे । हालात को बारिकी से समझे । घाटी में जिसके पास सत्ता है उसी की चलेगी । सिक्यूरटी उसे छुयेगी नहीं । और सिक्रयूरटी चुनी हुई सरकार के लोगोग को छेडेगी भी नहीं । महबूबा कर क्या रही है । उसने
आंतकवादियो को ढील दे रखी है । सेपरिस्टो [ अलगाववादियों ] को ढील दे रखी है । पत्थरबाजो के हक में वह लगातार बोल रही है । तो फिर गैर राजनीतिक प्लेयरो की राजनीतिक तौर पर  नुमाइन्दगी कर कौन रहा है । पीडीपी कर रही है । पीडीपी के नेताओ को खुली छूट है । उन्हे कोई पकडेगा नहीं । क्योकि
दिल्ली के साथ मिलकर सत्ता की कमान उसी के हाथ में है । और दिल्ली की जरुरत या कहे जिद इस सुविधा को लेकर है कि सत्ता में रहने पर वह अपनी राजनीति या एंजेडे का विस्तार कर सकती है । लेकिन बीजेपी इस सच को ही समझ नहीं पा रही है कि पीडीपी की राजनीति जम्मू में भी दखल देने की स्थिति में आ रही है । क्योकि जम्मू सत्ता चलाने का नया हब है । और कमान श्रीनगर में है । फिर जब ये खबर ती है कि कभी सोपोर में या कभी शोपिया में सेना ने पत्थरबाजो या तकवादियो को पनाह दिये गांववालो के खिलाफ आपरेशन शुरु कर
दिया है तो उसका मतलब क्या होता है । ठीक कहा आपने दो दिन पहले ही 4 मई को शोपिया में सेना के आपरेशन की खबर तमाम राष्ट्रीय न्यूज चैनलो पर चल रही थी । जबकि शोपियां का सच यही है कि वहा गांव-दर-गांव आंतकवादियो की पैठ के साथ साथ पीडीपी की भी पैठ है । अब सत्ताधारी दल के नेताओ को सिक्यूरिटी देनी है और नेता उन्ही इलाको में कश्मीरियों को साथ खडाकर रहे है जिन इलाको में आंतक की गूंज है । तो सिक्यूरटी वाले करे क्या । इस हालात में होना क्या चाहिये । आप खुद सोचिये । सेना में कमान हमेशा एक के पास होती है तभी कोई आपरेशन सफल होता है लेकिन घाटी में तो कई हाथो में कमान है । और सिक्यूरटी फोर्स सिवाय सुरक्षा देने के अलावे और कर क्या सकती है । हम बात करते करते डाउन-टाउन के इलाके में पहुंच चुके थे । यहां इकबाल का घर था तो उसने कारपेट का बिजनेस करने वाले शौहेब से मुलाकात
करायी । और उससे मिलते ही मेरा पहला सवाल यही निकला कि बैंक लूटे जा रहे है । तो क्या लूट का पैसा आंतकवादियो के पास जा रहा है । शौहेब ने कोई जबाव नहीं दिया । मैने इकबाल  तरफ देखा । तो आपस में कस्मीरी में दोनों ने जो भी बातचीत की उसके बाद शौहेब हमारे साथ खुल गया । लेकिन जवाबा इतना ही
दिया कि मौका मिले तो जे एंड के बैंक के बारे में पता कर लीजिये । ये किसको लोन देते है । कौन  जिन्होने लोन नहीं लौटाया । और जिन्होंने लोन लिया वह है भी की नहीं । तो क्या एनपीए का आप जिक्र कर रहे है । आप कह
सकते है एनपीए । लेकिन जब आपने बैंक के लूटने का जिक्र किया तो मै सिर्फ यहीं समझाना चाह रहा हूं कि बैक बिना लूटे भी लूटे गये है । लूटे जा रहे है । लूटने का दिखावा अब इसलिये हो रहा है जिससे बैक को कोई जवाब ना देना पडे । डाउन डाउन में ही हमारी मुलाकात दसवी में पढाई करने वाले छात्र मोहसिन वानी से हुई । निहायत शरीफ  । जानकारी का मास्टर । परीक्षा देकर कुछ करने का जनुन पाले मोहसिन से जब हमने उसके स्कूल के बार में पूछा तो खुद सेना के स्कूल में अपनी पढाई से पहले उसने जो कहा , वह शायद भविष्य
के कश्मीर को पहला दागदार चेहरा हमें दिखा गया । क्योंकि जिक्र तो सिर्फ उसकी पढाई का था । और उसने झटके में घाटी में स्कूल-कालेजो का पूरा कच्चा-चिट्टा ये कहते हुये हमारे सामने रख दिया कि अगर अब मुझसे स्कूल और हमारी पढाई के बारे में पूछ रहे है तो पहले ये भी समझ लें सिर्फ 20 दिनों में कोई स्कूल साल भर की पढाई कैसे करा सकता है । लेकिन घाटी में ये हो रहा है । क्योंकि कश्मीर घाटी में बीते 10 महीनो में कुल जमा 46 दिन स्कूल कालेज खुले । आर्मी पब्लिक स्कूल से लेकर केन्द्रीय विद्यालय तक और हर कान्वेंट से लेकर हर लोकल स्कूल तक । आलम ये है कि वादी के शहरों में बिखरे 11192 स्कूल और घाटी के ग्रामीण इलाको में सिमटे 3 280 से ज्यादा छोटे बडे स्कूल सभी बंद हैं । और इन स्कूल में जाने वाले करीब दो लाख से ज्यादा छोटे बडे बच्चे घरो में कैद हैं । ऐसे में छोटे छोटे बच्चे कश्मीर की गलियों में घर के मुहाने पर खड़े होकर टकटकी लगाये सिर्फ सड़क के सन्नाटे को देखते रहते हैं। और जो बच्चे कुछ बड़े हो गये हैं, समझ रहे हैं कि पढ़ना जरुरी है । लेकिन उनके भीतर का खौफ उन्हे कैसे बंद घरों के अंधेरे में किताबो से रोशनी दिला पाये ये किसी सपने की तरह है। क्योंकि घाटी में बीते 10 महीनो में 169 कश्मीरी युवा मारे गये हैं। और इनमें से 76 बच्चे हाई स्कूल में पढ़ रहे थे । तो क्या बच्चो का ख्याल किसी को नहीं । नही हर कोई हिंसा के बीच आतंक और राजनीतिक समाधान का जिक्र तो कर रहा है लेकिन घरो में कैद बच्चो की जिन्दगी कैसे उनके भीतर के सपनों को
खत्म कर रही है और खौफ भर रही है , इसे कोई नहीं समझ रहा है । लेकिन अब तो सरकार कह रही है स्कूल कालेज खुल गये । और बच्चे भटक कर हाथो में पत्थर उठा लिये है तो वह क्या करें । ठीक कह रहे है आप । आप दिल्ली से आये है ना । तो ये भी समझ लिजिये स्कूल कालेज खुल गये हैं लेकिन कोई बच्चा इसलिये स्कूल नहीं आ पाता क्योंकि उसे लगता है कि स्कूल से वह जिन्दा लौटेगा या शहीद कहलायेगा। बच्चे के भीतर गुस्सा देख मै खुद सहम गया । मै खुद भी सोचने लगा जिन बच्चो के कंघे पर कल कश्मीर का भविष्य होगा उन्हे कौनसा भविष्य मौजूदा वक्त में समाज और देश दे रहा है इसपर हर कोई मौन है । और असर इसी का है कि घाटी में 8171 प्राइमरी स्कूल, 4665 अपर प्राईमरी स्कूल ,960 हाई स्कूल ,300 हायर सेकेंडरी स्कूल, और सेना के दो स्कूल में वाकई पढाई हो ही नही रही है ।  श्रीनगर से दिल्ली तक कोई सियासतदान बच्चों के बार में जब सोच नहीं रहा है । हमारी बातचीत सुन खालिद भी आ गया था । जो बेफ्रिकी से हमे सुन रहा था । लेकिन जब मैने टोका खालिद आप कालेज में पढते है । तो उसी बेफ्रिकी के अंदाज में बोला...पढता था । क्यों अब । वापस आ गया । कहां से । कोटा से । राजस्थान में है । वापस क्यो आ गये । खबर तो बनी थी कश्मीर के लडको को राजस्थान में कैसे कालेज छोडने को कहां गया । मुझे भी याद आया कि सिर्फ राजस्तान ही नहीं बल्कि यूपी में कश्मीरी छात्रो को वापस कश्मीर लौटने के लिये कैसे वही के छात्र और कुछ संगठनो ने दवाब बनाया । बाद में गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने इसका विरोध किया । लेकिन ये मुझे खालिद से मिलकर ही पता चला कि दिल्ली की
आवाज भी कश्मीरी छात्रों के लिये बे-असर रही । फिर भी मैने खालिद को टटोला अब आगे की पढाई । तो उसी गुस्से भरे अंदाज में खालिद बोल पडा सीरिया में बीते 725 दिनों से बच्चों को नहीं पता कि वह किस दुनिया में जी रहे हैं। स्कूल बंद हैं। पढ़ाई होती नहीं । तो ये बच्चे पढ़ना लिखना भी भूल चुके हैं। और समूची दुनिया में इस सच को लेकर सीरिया में बम बरसाये जा रहे हैं कि आईएसआईएस को खत्म करना है तो एक मात्र रास्ता हथियारों का है । युद्द का है। लेकिन वक्त के साथ साथ बड़े होते बच्चों को दुनिया कौन सा भविष्य दे रही है इसपर समूची दुनिया ही मौन है । इसके बाद बातचीत को कईयो से हुई । 90-96 के आंतकवाद के जख्मो को भी टटोला और अगले दिन यानी रविवार को सुबह सुबह जब एयरपोर्ट के निकल रहा था तो चाहे अनचाहे इकबाल बोला , सर
आपको सीएम के घर की तरफ से ले चलता हूं । वक्त है नहीं । फिर मिलना भी नहीं है । अरे नहीं सर ..मिलने नहीं कह रहा हू । आपने फिल्म हैदर देखी थी । हां क्यों । उसमें सेना के जिन कैंपों का जिक्र है । जहां आतंकवादियो को रखा जाता था । कन्सनट्रेशन कैंप । हा, वही कैंप, जिसमें कश्मीरियों को बंद रखा
जाता था । उसे श्रीनगर में पापा कैंप के नाम से जानते हैं। और श्रीनगर में ऐसे तीन कैंप थे । लेकिन मैं आपको पापा-2 कैंप दिखाने ले जा रहा हूं । कन्सनट्रैशन कैंप अब तो खाली होगा । नहीं.. वही तो दिखाने ले जा रहा हूं
। और जैसे ही सीएम हाउस शुरु हुआ ...इकबाल तुरंत बोल प़डा , देख लीजिए,,यही है पापा-2 । तो 1990-96 के दौर के कन्सनट्रैशन कैप को ही सीएम हाउस मे तब्दील कर दिया गया । मैंने चलती गाड़ी से ही नजरों को घुमा कर देखा और सोचने लगा कि वाकई घाटी में जब आंतकवाद 90-96 के दौर में चरम पर था और अब जब आतंकवाद घाटी की हवाओ में समा चुका है तो बदला क्या है आंतकवाद...कश्मीर या कश्मीर को लेकर सियासत का आंतकी चेहरा ।

क्योंकि मेरे जहन में सीएम हाउस को देखकर पापा-टू कैप में रखे गये उस दौर के आंतकवादी मोहम्मद युसुफ पैरी  याद आ गया । जिसने आंतक को 90 के दशक में अपनाया । पाकिस्तान भी गया । पाकिस्तान में हथियार चलाने की ट्रेनिंग भी ली । उसकी पहचान कूकापैरी के तौर पर बनी । वह उस दोर में जेहादियो का आदर्श था । लेकिन पाकिसातन के हालात को देखकर लौटा तो भारतीय सेना के सामने सरेंडर कर दिया । फिर मुख्यधारा में शामिल होने के लिये इखवान नाम का संगठन शुरु किया । जो आतंकवाद के खिलाफ था । और कूकापैरी जो कि मुसलमान था । कश्मीरी था । आतंकवादी बन कर आजादी के लिये निकला था । वही कूकापैरी जब आंतकवाद के खिलाफ खडा हुआ तो कश्मीर में हालात सामान्य होने लगे । उसी के आसरे 1996 में भारत कश्मीर में चुनाव करा सका । वह खुद भी चुनाव लड़ा । जम्मू कश्मीर आवामी लीग नाम की पार्टी बनायी ।  विधायक बना । और आंतकवाद के जिस दौर में फारुख अबंदुल्ला लंदन में गोल्फ खेल रहे थे । वह चुनाव लडने 1996 में वापस इंडिया लौटे । और चुनाव के बाद फारुख अब्दुल्ला को दिल्ली ने सत्ता थमा दी । और कूकापैरी को जब बांदीपूरा के हसैन सोनावारी में जेहादियो ने गोली मारी तो उसके अंतिम संस्कार में सत्ताधारी तो दूर । डीएम तक नहीं गया । कश्मीर के आतंक के दौर की ऐसी बहुतेरी यादें लगातार जहन में आती रही और सोचने लगा कि वाकई घाटी में जब आंतकवाद 90-96 के दौर में चरम पर था और अब जब आतंकवाद घाटी की हवाओं में समा चुका है तो बदला क्या है आतंकवाद...कश्मीर या कश्मीर को लेकर सियासत का आतंकी चेहरा । ये सोचते सोचते कब दिल्ली दिल्ली आ गया और कानों में एयर होस्टेज की आवाज सुनाई पड़ी कि बाहर का तापमान 36 डिग्री है । सोचने लगा सुबह 11 बजे दिल्ली इतनी गर्म । और जन्नत की गर्माहट के बीच सुकून है कहां ।






मुर्दों को इंसाफ़ कहाँ मिलता है

क़ातिल ने कहा
वह इंसाफ़ करेगा
तुम्हें न्याय देगा
क़ातिल जानता है
शव न सुनता है 
न बोलता हैमुर्दों को इंसाफ़ कहाँ मिलता है !क़ातिल मुस्कुराता है
वह देखता नहीं अपना चेहरा किसी आईने में |
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लेखक विषय संवाद साभार अनुवादक

पहले वो आए साम्यवादियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं साम्यवादी नहीं था

 

फिर वो आए मजदूर संघियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं मजदूर संघी नहीं था

 

फिर वो यहूदियों के लिए आए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं यहूदी नहीं था

 

फिर वो आए मेरे लिए

और तब तक बोलने के लिए कोई बचा ही नहीं था

 

मार्टिन नीमोलर (1892-1984)