Increase |  Decrease |  Normal

Current Size: 100%

Share this
Syndicate content

Feed aggregator

गुजरात में कांग्रेस बीजेपी को टक्कर दे रही है लेकिन सर्वे के कहते हैं जीत बीजेपी की ही होगी

जंतर-मंतर - Wed, 15/11/2017 - 06:44


शेष नारायण सिंह 
अहमदाबाद १२ नवम्बर . हिमाचल प्रदेश में मतदान पूरा हो जाने के बाद अब सारा राजनीतिक ध्यान गुजरात चुनाव पर है .  बीजेपी ने  सारी ताकत इस चुनाव को जीतने के लिए झोंक दी है . कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने भी कोई  कसर नहीं छोड़ रखी है . उनको  इस चुनाव से बहुत उम्मीदें हैं , बीजेपी से माहौल में  जो नाराजगी है उसके हिसाब से राहुल गांधी की उम्मीद जायज़ लगती है  लेकिन गुजरात की सडकों में मिलने वाला हर शख्स कहता मिल जाता है कि इस  साल चुनाव में  भाजप की हालत बहुत खराब है लेकिन जीत अंत में सत्ताधारी पार्टी की ही  होगी क्योंकि बीजेपी  अध्यक्ष अमित शाह और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी गुजरात विधानसभा के चुनाव में हार किसी कीमत पर स्वीकार नहीं करेंगे इसलिए वे हर हाल में जीतेंगें . उसके लिए कुछ भी करना पड़े. बीजेपी के कार्यकर्ता कहते हैं कि अभी भले कांग्रेस का प्रचार भारी नज़र आता हो लेकिन जब प्रधानमंत्री मनीला की विदेश यात्रा से वापस आयेगें और अपने  चुनावी प्रचार शुरू करेंगे तो कांग्रेस वाले कहीं नहीं  दिखेंगे.  उनका दावा है कि पिछले २५ वर्षों में नरेंद्र मोदी ने गुजरात में गंभीर राजनीतिक  कार्य किया है और हर गली मोहल्ले और गाँव को अच्छी तरह जानते हैं .   गुजरात चुनाव का मौजूदा प्रचार देखकर १९८० के दशक में अमेठी में होने वाले   प्रचार की याद  ताज़ा हो गयी. उन दिनों कांग्रेस नेताओं संजय गांधी और  उनकी मृत्यु के बाद राजीव  गांधी को खुश करने के लिए किसी भी चुनाव के दौरान ,कांग्रेस का  हर बड़ा नेता अमेठी  क्षेत्र के गाँवों में घूमता मिल जाता था. आजकल गुजरात में केंद्रीय मंत्रिमंडल के अधिकतर सदस्य कहीं  न कहीं मिल जा रहे हैं .रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमन,  अहमदाबाद की मणिनगर में मतदाताओं के बीच पैदल घूमती नज़र आयीं . मणिनगर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का चुनाव क्षेत्र कहा जाता है . अहमदाबाद नगर का पूर्वी  इलाका मणिनगर विनसभा क्षेत्र है  . अहमदाबाद तमिल संगम के खजांची , आर राजा  का दावा है कि इस क्षेत्र में करीब पचास हज़ार तमिल परिवार  रहते हैं .  मुख्य रूप से उनकी आबादी खोखरा  और अमराई वाडी में है . शायद इसीलिये यहाँ पर तमिलनाडु की मूल निवासी रक्षामंत्री निर्मला सीतारमन को घर घर जाकर प्रचार करने को कहा गया है. १९९० से इस सीट पर भाजप का क़ब्ज़ा है .२००१ में राज्य का मुख्यमंत्री नियुक्त होने के बाद इसी सीट से नरेंद्र मोदी ने विधान सभा की सदस्यता ली थी . उस वक़्त  कमलेश पटेल विधायक थे . उन्होंने नरेंद र्मोदी के लिए सीट खाली की थी. नरेंद्र मोदी २००२, २००७ और २०१२ में यहाँ से चुने गए थे .मणिनगर विधान सभा बीजेपी के लिए सबसे सुरक्षित सीट मानी जाती है लेकिन  यहाँ भी उसके विरोध के सुर साफ़ नज़र आये .  हालांकि हर जगह बीजेपी के कार्यकर्ता रक्षामंत्री का खूब जोर शोर से स्वागत करते नज़र आये लेकिन एक  व्यक्ति उनको काला कपडा दिखाने में सफल रहा.. बाद में महेश पटेल नाम के उस व्यक्ति ने  बताया कि ,”मैं पाटीदार  हूँ ,और पिछले बीस साल से भाजप का  सदस्य हूँ . लेकिन अब मैं निराश हूँ . पार्टी के नेता लोग सरकारी पैसे को लूट रहे हैं और अपनी जेबें भर रहे हैं .सडकों के निर्माण में बहुत ही  घटिया माल लगाया गया है . मैं कई बार इन लोगों से शिकायत कर चुका हूँ लेकिन कोई सुनता ही नहीं “. पाटीदार ( पटेल )  बिरादरी में बीजेपी से नाराज़गी है .  सरदार पटेल और महात्मा गांधी के  समय से ही पटेल लोग कांग्रेस को वोट देते  रहे थे लेकिन लाल कृष्ण आडवानी की सोमनाथ से अयोध्या रथयात्रा के बाद से पटेल लगभग पूरी तरह से बीजेपी  को वोट देते  रहे हैं . पहली बार हार्दिक पटेल के  आन्दोलन के बाद आजकल वे बीजेपी से दूर जाते नज़र आ रहे हैं . हालांकि जानकार इस बात को भी पक्का बता रहे हैं कि अमित शाह और नरेंद्र मोदी की यात्राओं के बाद बड़ी संख्या में पटेल वोट हार्दिक को छोड़ देंगें  इस बात में दो राय नहीं है कि पटेल समुदाय इस बार पूरी तरह से बीजेपी के साथ नहीं होगा . ओबीसी नेता अल्पेश ठाकोर तो  कांग्रेस में औपचारिक रूप से शामिल ही  गए हैं , दलितों के नेता जिग्नेश भी  कांग्रेस की तरफ झुक चुके हैं . बीजेपी को अगर कोई नुक्सान होगा तो उसमें   इन  तीनों नौजवान नेताओं के अलावा  बहुत ही ख़ास योगदान राज्य भर में फैले हुए  छोटे व्यापारियों का होगा . वे अभी चुप  हैं लेकिन थोड़ी देर बात करने पर साफ़ समझ में आ जाता है कि वे बीजेपी के जी एस टी वाले  काम से बहुत परेशान हैं .इन्हीं कारणों  से शायद  प्रचार में अभी कांग्रेस का माहौल दिख रहा है .प्रचार में कांग्रेस की हवा को चुनाव सर्वे सही नहीं मानते . लोकनीति सी एस डी एस के   सर्वे के अनुसार  बीजेपी को इस बार भी गुजरात में सत्ता मिलेगी . सर्वे के अनुसार जीत तो होगी लेकिन २०१२ से कम सीटें आने की उम्मीद है .बीजेपी के मतदान प्रतिशत में भी मामूली कमी आ सकती है.२०१२ में ४७.९ प्रतिशत मिला था जो इस साल ४७ प्रतिशत  रहने की संभावना है .कांग्रेस को पिछली बार ३८ प्रतिशत वोट मिले थे जो इस बार ४१ प्रतिशत तक बढ़ जाने  का आकलन सर्वे में किया  गया है . . सौराष्ट्र क्षेत्र में कांग्रेस को फिलहाल बढ़त है . सर्वे के अनुसार बीजेपी और कांग्रेस  दोनों को ही सौराष्ट्र में ४२-४२ प्रतिशत वोट मिल सकते हैं . अगर इसी में किसी  को थोडा तल विचल हुआ तो नतीजे भारी बदलाव का कारण बन सकते हैं . दक्षिण और मध्य गुजरात में बीजेपी की  मजबूती बनी हुयी  है. क्योंकि वहां उसको ५१ प्रतिशत वोट मिल  सकते हैं जिसके कारण बड़ी संख्या में सीटें मिल सकती हैं .मतदान के लिए गुजरात में अभी करीब महीना भर बाकी है . नतीजा जो भी ,चुनाव बहुत ही दिलचस्प हो गया है .

बच्चों के लिये कौन सा भारत गढ़ रहे हैं हम ?

दूसरी में पढ़ने वाले प्रघुम्न की हत्या 11वीं के छात्र ने कर दी। और हत्या भी स्कूल में ही हुई। प्रद्युम्न पढ़ने में तेज था। हत्या का आरोपी 11वीं का छात्र पढ़ने में कमजोर था। परीक्षा से डरता था। यानी हत्या की वजह भी वजह भी स्कूल में परीक्षा का दवाब ही बन गया। तो कौन सी शिक्षा स्कूल दे रहे हैं। और कौन सा वातावरण हम बच्चों को दे पा रहे हैं। ये दोनों सवाल डराने वाले हैं। पर सरकारी गीत है स्कूल चले हम..इस गीत के आसरे 99 फीसदी बच्चों का इनरॉलमेंट स्कूल में हो तो गया। क्योंकि सर्वशिक्षा अभियान देश में चला। 27 हजार करोड़ का बजट बनाया गया। पर सरकारी सच यही है कि दसवीं तक पढ़ते पढ़ते देश के 47.4 फीसदी बच्चे पढ़ाई छोड़ देते हैं।  इनमें 19.8 फीसदी पांचवीं तक में तो 36.8 फीसदी आठवीं तक पढाई पूरी नहीं कर पाते और बच्चों के लिये पढाई के इस वातावरण का अनूठा सच यही है कि एक तरफ बिना इन्फ्रास्ट्रक्चर सरकारी स्कूलो में 11 करोड़ बच्चे जाते हैं। तो मोटी फीस देकर 7 करोड बच्चे निजी स्कूल जाते हैं।

सरकार का शिक्षा बजट 46,356 करोड़ है। निजी स्कूलो का बजट 8 लाख करोड़ का है। यानी जिस समाज को शिक्षा के आसरे अपने पैरो पर खड़े होना है उसके भीतर का सच यही है कि बच्चे देश का भविष्य नहीं होते बल्कि बच्चे वर्तमान में कमाई का जरिया  होते हैं। और मुनाफे के लिये भागते दौटते देश में बच्चे कैसे या तो पीछे छूट जाते हैं या फिर बच्चो को पढाने के लिये मां बाप बच्चों से देश ही छुड़वा देते हैं। जरा ये भी समझ लें। क्योंकि अनूठा सच है ये कि देश के 5 लाख 53 हजार बच्चे इस बरस देश छोड कर विदेशों में पढने चले गये। और उनके मां बाप इन बच्चो की पढाई के लिये 1 लाख 20 हजार करोड सिर्फ फीस देते हैं। जबकि देश में उच्च शिक्षा के नाम पर मौजूदा वक्त में 3 करोड 42 लाख 11 हजार बच्चे पढ़ाई कर रहे हैं। और उनके लिये सरकार का कुल बजट है 33 हजार 329 करोड है। यानी सरकार उच्च सिक्षा के लिये एक बच्चे पर 974 रुपये सालाना खर्च करती है। पर विदेश जाकर पढने वाले एक बच्चे पर औसतन 2,16,958 रुपये सालाना खर्च मां बाप का जेब से होता है। तो देश का भविष्य  कैसे गढ़ा जा रहा है। या फिर किस तरीके से देश के भविष्य की पौध को हम कैसे तैयार कर रहे हैं, उसके भीतर झांककर क्या कोई देखना चाहता है या फिर  सत्ता को भी विदेश लुभाने लगा है। क्योंकि फिलिपिन्स में प्रधानमंत्री मोदी वहां रह रहे नागरिकों से रुबरु हुये तो देश के मुनाफे का ही जिक्र किया। मसलन "  यूपीए में जिक्र होता था कितना गया। अब जिक्र होता है  कितना आया।"

यानी चाहे अनचाहे समूचा समाज ही मुनाफा पाने और कमाने की होड़ में है तो फिर जो बच्चे देश छोडकर विदेश जा रहे है वह भारत लौटेंगे क्यों। और एनआरआई होकर भारत की तरफ देखने का मतलब होगा क्या । क्योंकि आज की तारीख में 1,78,35,419 भारतीय दुनिया के अलग अलग हिस्सो में हैं। 1,30,08,407 एनआरआई हैं। यानी कुल 3 करोड से ज्यादा भारतीय देश छोड चुके हैं। तो फिर कौन सा देश हम तैयार कर रहे हैं। और बीते 5 बरस का अनूठा सच  ये भी है कि 90 फीसदी अप्रवासी भारतीय वापस लौटते नहीं हैं। तो क्या पढ़े लिखों के लिये या पैसे वालो के लिये देशप्रेम का पाठ देश छोडकर विदेश चले  जाना है । तो क्या देश वाकई बच्चों के लायक बच नहीं रहा । ये सवाल जहन में आना तो चाहिये । क्योंकि शिक्षा भी तो तभी होगी जब जिन्दा रहेगें । कह  सकते है सवा सौ करोड़ के देश में अगर लाखों बच्चों की मौत हो भी जाती है तो क्या हुआ। लाखों बच्चे फिर पैदा हो जायेंगे। यकीन जानिये यही हो रहा है । क्योंकि हर बरस देश में जन्मते ही 7लाख 30 हजार बच्चों की मौत हो जाती है । 10 लाख 50 हजार बच्चे एक बरस भी जी नहीं पाते और सिर्फ प्रदूषण से हर बरस औसतन 2 लाख 91 हजार 288 बच्चों की मौत हो जाती है । तो दोष कहा कहा किस किस को दिया जाये। मसलन दिल्ली में प्रदूषण कम नही हुआ बल्कि दिल्ली वाले अभ्यस्त हो गये। सरकार हांफने लगी। अदालतें बेजुबा हो गई एनजीटी की कोई सुनता नहीं। प्रदूषण और दो जून की रोटी आपस में ऐसी टकरायी कि  जहरीली धुंध का असर कम नहीं हुआ अलबत्ता पढ़ाई का बोझ जान की कीमत पर भारी पड गया । और अब बच्चे स्कूल जा रहे हैं, और मां-बाप उन्हें स्कूल  भेज रहे हैं।यानी बच्चों को भले सांस लेने में परेशानी हो रही है-आँखों से पानी आ रहा है लेकिन स्कूल खोल दिए गए हैं तो बच्चों के लिए जाना जरुरी है। तो  आज बाल दिवस पर कोई तो ये सवाल पूछ ही सकता है  । संविधान  में दिए जीने के अधिकार का सवाल क्या बच्चों पर लागू नहीं होता । क्योंकि दिल्ली की हवा  में 50 सिगरेट का धुआ है ।

यानी दिल्ली के बच्चे हर दिन 50 सिगरेट पी रहे है । सिगरेट के पैकेट पर लिखा है जानलेवा है . बर दिल्ली की हवा जानलेवा है ये कोई खुल कर क्यो नहीं कहता । वैसे,सवाल सिर्फ दिल्ली-एनसीआर का नहीं है। पूरे देश का है। आलम ये कि पर्यावरण इंडेक्स में भारत 178 देशों में 155वां स्थान पर हैं। तो फिक्र किसे है बच्चों की । या कहे जिन्दगी की । क्योकि आजादी के वक्त चाहे सुनहरे भविष्य  के सपने संजोये गये । पर आजादी के 70 बरस बाद का अनूठा सच यही है । देश के सभी बच्चो को स्कूल-स्वास्थय और पीने का साफ पानी देने में भी हम सक्षम हो नहीं पाये है । और असर इसी का है कि 14 बरस की उम्र तक पहुंचते पहुंचते  4,31,560 बच्चो की मौत हर बरस होती है । देश की राजधानी में एक तरफ प्रदूषण के बीच बच्चो को स्कूल भेजने के लिये मां बाप मजबूर है तो दूसरी तरफ दिल्ली में 13 लाख बच्चे स्कूल जाते ही नहीं है ।17 लाख बच्चे बिना इजाजत चल रहे स्कूलों में जाते हैं। यानी जब दिल्ली में ही 75 लाख बच्चो में से 30 लाख बच्चे क्या पढ़ रहे हैं। या क्यों पढ नहीं रहे हैं जब इससे ही ससंद सरकार बेफिक्र है तो फिर कौन सी दिल्ली कौन से देश को रच रही है ये भी सवाल ही है।

उल्टे पुल्टे जोक्स-40

इसे ज़रा ऐसे देखिए और महसूस कीजिये तो!

एक महिला ने jio के कस्टमर केयर पे फोन करके गुस्साते हुए कहा कि पिछले तीन घंटे से आपकी कम्पनी का इंटरनेट नहीं चल रहा है बताइये मैं क्या करूँ..??

दिल को छू जाये कुछ ऐसा जवाब दिया कस्टमर केयर वाले ने..

"बहनजी तब तक कुछ घर के काम ही कर लो "

गिरगिट : अन्तोन चेखव

लेखक मंच - Sat, 11/11/2017 - 14:32

अन्तोन चेखव

पुलिस का दारोगा ओचुमेलोव नया ओवरकोट पहने, बगल में एक बण्डल दबाये बाजार के चौक से गुजर रहा था। उसके पीछे-पीछे लाल बालोंवाला पुलिस का एक सिपाही हाथ में एक टोकरी लिये लपका चला आ रहा था। टोकरी जब्त की गई झड़बेरियों से ऊपर तक भरी हुई थी। चारों ओर खामोशी।…चौक में एक भी आदमी नहीं। ….भूखे लोगों की तरह दुकानों और शराबखानों के खुले हुए दरवाजे ईश्वर की सृष्टि को उदासी भरी निगाहों से ताक रहे थे, यहां तक कि कोई भिखारी भी आसपास दिखायी नहीं देता था।
“अच्छा! तो तू काटेगा? शैतान कहीं का!” ओचुमेलोव के कानों में सहसा यह आवाज आयी, “पकड़ तो लो, छोकरो! जाने न पाये! अब तो काटना मना हो गया है! पकड़ लो! आ…आह!”
कुत्ते की कि‍कि‍याने की आवाज सुनायी दी। आचुमेलोव ने मुड़कर देखा कि व्यापारी पिचूगिन की लकड़ी की टाल में से एक कुत्ता तीन टांगों से भागता हुआ चला आ रहा है। कलफदार छपी हुई कमीज पहने, वास्कट के बटन खोले एक आदमी उसका पीछा कर रहा है। वह कुत्ते के पीछे लपका और उसे पकड़ने की कोशिश में गिरते-गिरते भी कुत्ते की पिछली टांग पकड़ ली। कुत्ते के कि‍कि‍याने और वहीं चीख- ‘जाने न पाये!’ दोबारा सुनाई दी। ऊंघते हुए लोग दुकानों से बाहर गरदनें निकालकर देखने लगे, और देखते-देखते एक भीड़ टाल के पास जमा हो गयी, मानो जमीन फाड़कर निकल आयी हो।
“हुजूर! मालूम पड़ता है कि कुछ झगड़ा-फसाद हो रहा है!” सिपाही बोला।
आचुमेलोव बाईं ओर मुड़ा और भीड़ की तरफ चल दिया। उसने देखा कि टाल के फाटक पर वही आदमी खड़ा है। उसकी वास्कट के बटन खुले हुए थे। वह अपना दाहिना हाथ ऊपर उठाये, भीड़ को अपनी लहूलुहान उँगली दिखा रहा था। लगता था कि उसके नशीले चेहरे पर साफ लिखा हुआ हो, “अरे बदमाश!” और उसकी उँगली जीत का झंडा है। आचुमेलोव ने इस व्यक्ति को पहचान लिया। यह सुनार खूकिन था। भीड़ के बाचोंबीच अगली टांगें फैलाये अपराधी, सफेद ग्रेहाउँड का पिल्ला, छिपा पड़ा, ऊपर से नीचे तक कांप रहा था। उसका मुंह नुकिला था और पीठ पर पीला दाग था। उसकी आंसू-भरी आंखों में मुसीबत और डर की छाप थी।
“यह क्या हंगामा मचा रखा है यहां?” आचुमलोव ने कंधों से भीड़ को चीरते हुए सवाल किया। “यह उॅँगली क्यों ऊपर उठाये हो? कौन चिल्ला रहा था?”
“हुजूर! मैं चुपचाप अपनी राह जा रहा था, बिल्कुल गाय की तरह,” खूकिन ने अपने मुँह पर हाथ रखकर, खाँसते हुए कहना शुरू किया, “मिस्त्री मित्रिच से मुझे लकड़ी के बारे में कुछ काम था। एकएक, न जाने क्यों, इस बदमाश ने मरी उँगली में काट लिया।..हुजूर माफ करें, पर मैं कामकाजी आदमी ठहरा,… और फिर हमारा काम भी बड़ा पेचीदा है। एक हफ्ते तक शायद मेरी उँगुली काम के लायक न हो पायेगी। कुछ  मुझे हर्जाना दिलवा दीजिए। और हुजूर, कानून में भी कहीं नहीं लिखा है कि हम जानवरों को चुपचाप बरदाश्त करते रहें।..अगर सभी ऐसे ही काटने लगें, तब तो जीना दूभर हो जायेगा।”

“हुंह..अच्छा..” ओचुमेलाव ने गला साफ करके, त्योरियाँ चढ़ाते हुए कहा, “ठीक है।…अच्छा, यह कुत्ता है किसका? मैं इस मामले को यहीं नहीं छोडूँगा! कुत्तों को खुला छोड़ रखने के लिए मैं इन लोगों को मजा चखाऊँगा! जो लोग कानून के अनुसार नहीं चलते, उनके साथ अब सख्ती से पेश आना पड़ेगा! ऐसा जुर्माना ठोकूँगा कि छठी का दूध याद आ जायेगा। बदमाश कहीं के! मैं अच्छी तरह सिखा दूँगा कि कुत्तों और हर तरह के ढोर-डंगर को ऐसे छुट्टा छोड़ देने का क्या मतलब है! मैं उसकी अक्‍ल दुरुस्त कर दूँगा, येल्दीरिन!”

सिपाही को संबोधित कर दरोगा चिल्लाया, “पता लगाओ कि यह कुत्ता है किसका, और रिपोर्ट तैयार करो! कुत्ते को फौरन मरवा दो! यह शायद पागल होगा।…मैं पूछता हूं, यह कुत्ता किसका है?”
“शायद जनरल जिगालोव का हो!” भीड़ में से किसी ने कहा।
“जनरल जिगालोव का? हुँह…येल्दीरिन, जरा मेरा कोट तो उतारना। ओफ, बड़ी गरमी है।…मालूम पड़ता है कि बारिश होगी। अच्छा, एक बात मेरी समझ में नही आती कि इसने तुम्हें काटा कैसे?” ओचुमेलोव खूकिन की ओर मुड़ा, “यह तुम्हारी उँगली तक पहुंचा कैसे? यह ठहरा छोटा-सा जानवर और तुम हो पूरे लम्बे-चौड़े। किसी कील-वील से उँगली छील ली होगी और सोचा होगा कि कुत्ते के सिर मढ़कर हर्जाना वसूल कर लो। मैं खूब समझता हूं! तुम्हारे जैसे बदमाशों की तो मैं नस-नस पहचानता हूं!”
“इसने उसके मुंह पर जलती सिगरेट लगा दी थी, हुजूर! यूं ही मजाक में और यह कुत्ता बेवकूफ तो है नहीं, उसने काट लिया। यह शख्स बड़ा फिरती है, हुजूर!”
“अबे! झूठ क्यों बोलता है? जब तूने देखा नहीं, तो गप्प क्यों मारता है? और सरकार तो खुद समझदार हैं। वह जानते हैं कि कौन झूठा है और कौन सच्चा। और अगर मैं झूठा हूँ तो अदालत में फैसला करा लो। कानून में लि‍खा है… अब हम सब बराबर हैं। खुद मेरा भाई पुलिस में है..बताये देता हूं….हाँ…।”
“बंद करो यह बकवास!”
“नहीं, यह जनरल साहब का कुत्ता नहीं है।” सिपाही ने गंभीरतापूर्वक कहा, “उनके पास ऐसा कोई कुत्ता है ही नहीं, उनके तो सभी कुत्ते शिकारी पौण्डर हैं।”
“तुम्हें ठीक मालूम है?”
“जी सरकार।”
“मैं भी जनता हूं। जनरल साहब के सब कुत्ते अच्छी नस्ल के हैं। एक-से-एक कीमती कुत्ता है उनके पास। और यह तो बिल्कुल ऐसा-वैसा ही है, देखो न! बिल्कुल मरियल है। कौन रखेगा ऐसा कुत्ता? तुम लोगों का दिमाग तो खराब नहीं हुआ? अगर ऐसा कुत्ता मास्‍को या पीटर्सबर्ग में दिखाई दे तो जानते हो क्या हो? कानून की परवाह  किये बिना, एक मिनट में उससे छुट्टी पा ली जाये! खूकिन! तुम्हें चोट लगी है। तुम इस मामले को यों ही मत टालो।…इन लोगों को मजा चखाना चाहिए! ऐसे काम नहीं चलेगा।”
“लेकिन मुमकिन है, यह जनरल साहब का ही हो।” सिपाही बड़बड़ाया, “इसके माथे पर तो लिखा नहीं है। जनरल साहब के अहाते में मैंने कल बिल्कुल ऐसा ही कुत्ता देखा था।”
“हां-हां, जनरल साहब का तो है ही!” भीड़ में से किसी की आवाज आयी।
“हुँह।…येल्दीरिन, जरा मुझे कोट तो पहना दो। अभी हवा का एक झोंका आया था, मुझे सर्दी लग रही है। कुत्ते को जनरल साहब के यहां ले जाओ और वहां मालूम करो। कह देना कि मैने इस सड़क पर देखा था और वापस भिजवाया है। और हॉँ, देखो, यह कह देना कि इसे सड़क पर न निकलने दिया करें। मालूम नहीं, कितना कीमती कुत्ता हो और अगर हर बदमाश इसके मुँह में सिगरेट घुसेड़ता रहा तो कुत्ता बहुत जल्दी तबाह हो जायेगा। कुत्ता बहुत नाजुक जानवर होता है। और तू हाथ नीचा कर, गधा कहीं का! अपनी गन्दी उँगली क्यों दिखा रहा है? सारा कुसूर तेरा ही है।”
“यह जनरल साहब का बावर्ची आ रहा है, उससे पूछ लिया जाये।…ऐ प्रोखोर! जरा इधर तो आना, भाई! इस कुत्ते को देखना, तुम्हारे यहां का तो नहीं है?”
“वाह! हमारे यहां कभी भी ऐसा कुत्ता नहीं था!”
“इसमें पूछने की क्या बात थी? बेकार वक्त खराब करना है,” ओचुमेनलोव ने कहा, “आवारा कुत्ता है। यहां खड़े-खड़े इसके बारे में बात करना समय बरबाद करना है। तुमसे कहा गया है कि आवारा है तो आवारा ही समझो। मार डालो और छुट्टी पाओ?’’
“हमारा तो नहीं है।” प्रोखोर ने फिर आगे कहा, “यह जनरल साहब के भाई का कुत्ता है। हमारे जनरल साहब को ग्रेहाउँड के कुत्तों में कोई दिलचस्पी नहीं है, पर उनके भाई साहब को यह नस्ल पसन्द है।”
“क्या? जनरल साहब के भाई आये हैं? ब्लादीमिर इवानिच?” अचम्भे से ओचुमेलोव बोल उठा, उसका चेहरा आह्वाद से चमक उठा। “जर सोचो तो! मुझे मालूम भी नहीं! अभी ठहरेंगे क्या?”
“हां।”
“वाह जी वाह! वह अपने भाई से मिलने आये और मुझे मालूम भी नहीं कि वह आये हैं! तो यह उनका कुत्ता है? बहुत खुशी की बात है। इसे ले जाओ। कैसा प्यारा नन्हा-सा मुन्ना-सा कुत्ता है। इसकी उँगली पर झपटा था! बस-बस, अब कांपों मत। गुर्र…गुर्र…शैतान गुस्से में है… कितना बढ़िया पिल्ला है!
प्रोखोर ने कुत्ते को बुलाया और उसे अपने साथ लेकर टाल से चल दिया। भीड़ खूकिन पर हंसने लगी।
“मैं तुझे ठीक कर दूंगा।” ओचुमेलोव ने उसे धमकाया और अपना लबदा लपेटता हुआ बाजार के चौक के बीच अपने रास्ते चला गया।

फ़टपाथ पर पीपल के नीचे बिकती पूडि़यों का स्‍वाद - कुमार मुकुल - कुछ डायरीनुमा

कारवाँ - Sat, 11/11/2017 - 12:28
ना दोस्‍त है ना रकीब है,तेरा शहर कितना अजीब है...

सुबह जगा तो धुंधलका छंटने लगा था और पड़ोसी के लौपडॉग को प्रशिक्षण देने को उसका ट्रेनर उसे पार्क ले जाने की तैयारी में था। रविवार को मेरी फुर्ती भी कुछ बढ जाती है सो दिशा-फरागत हो मैंने वह टेपडांस बजाया जो ऑरकुट मित्र और कथाकार उदय प्रकाश के जर्मन साथी के प्रोफाइल से अपने यहां जोड़ रखा है,और उस पर उतनी देर लगातार कसरतनुमा डांस किया सेहत के लिहाज से। फिर सोचा कि आज पार्क चला जाए और अपने अग्रज कविमित्र लीलाधर मंडलोई के साथा टहला जाए और गुमटी की चाय पीते दुनिया जहान की लानत-मलामत और व्‍याख्‍या की जाए।
तभी याद आया कि आज अपनी नेट की इकलौती नियमित पर अदेखी चैट साथी अरूणा राय भी तो इंतजार करेंगी। ओह यह लड़की भी न लड़की कहो तो नाराज, तू तड़ाक मत कीजिए,पच्‍चीस की हूं पर पचास सी सोचती हूं,ओह बाबा तो चलिए आप मेरी बच्‍ची हुईं अपनी प्‍यारी अरूणा जी। दारोगा की नौकरी और उस पर ईमानदारी का तमगा और आजादी की असीम उड़ानें भरने की तैयारी तो उसे मैं मिल गया एक कविकाठी उसके शब्‍दों में नेट पर सकून का साथी।
ऑरकुट पर उसने ही खोज की थी मेरी और लिख मारा - ना दोस्‍त है ना रकीब है
तेरा शहर कितना अजीब है...

मैंने भी लिखा - ऐसी दुनिया में जुनूं, ऐसे जमाने में वफा
इस तरह खुद को तमाशा न बना मान भी जा...

फिर तो जो रोज की शाब्दिक जद्दोजहद शुरू हुई तो जबरदस्‍त तकरारों के बीच जारी है। अब स्थिति यह है कि घर में झगडूं तो अपनी आभा मैडम कहती हैं कि अभी करती हूं अरूणा से शिकायत।
तो उसे मैसेज किया कि आज तो मंडलोई जी के साथ गुजरेगी सुबह, आने पर ही चैट होगी। तो पार्क पहुंचकर पास से जनसत्‍ता लिया और उनका इंतजार करते पढने लगा। उसमें अपने जवारी भाई कुमार वीरेंद्र की कविता थी , पढकर एक अलग ही दुनिया में चला गया, गांव-देहात की। कुमार ने अपनी अलग ही सहज गंवई भाषा अर्जित की है उसकी छटा इस कविता में दिख रही थी- छत पे घरनी ने
पसार दिया है धान
धूप में भूख के,सुख रहे धान...

कुमार पिछले साल मुबई में थे पर वहां से भी वे गंवई कविता को ही स्‍वर दे रहे थे और आखिर उस स्‍वर ने उनका रूख गांव की ओर कर दिया। पिछले माह उनका फोन आया था, कि अभी तो वे यहीं रहकर खेती-बधारी कराएंगे। उनसे बात कर मेरा मन केदारनाथ सिंह की कविता के धान के बच्‍चों की तरह उन्‍मन हो गया। कि मैं यहां क्‍या कर रहा हूं इस रौशन वीराने में।
अब मंडलोई जी आ गए हैं और मैं उनके साथ पार्क के चक्‍कर लगाते बाते करने लगा हूं दुनिया जहान की। वे पूछते हैं ये क्‍या है यार दिल्‍ली के इन कवियेां में , कि वे इस पर कविता का मूल्‍यांकन करते हैं कि कौन किसके साथ धूम रहा है। मैंने कहा हा यह तो दिल्‍ली की फितरत है,मुझे विनय कुमार की पंक्तियां याद आईं-
हर मंजहब तंदूर छाप , हर नीयत खुद में खोयी सी
खंजर जिसके हाथ लगा वह शख्‍स शिकारी दिल्‍ली में।

फिर मंडलोई कसरत करने लगे और बोले कि यार अब तो मैं बूढा हो रहा हूं । वे पचपन के हैं , मैंने कहा, ऐसा ना कहिए नहीं तो मुझे आपकी तरह कसरत शुरू करनी पड़ेगी, कि अभी तो आप पूरी तरह दुरूस्‍त हैं। फिर हम पीपल के नीचे की गुमटी पर गए पहले पत्र-पत्रिकाएं देखीं फिर कम चीनी की चाय पीते हुए यह येाजना बनाने लगे कि कुछ अलग जीवंत होना चाहिए , कि कविता कहानी काफी नहीं है। कि अगले रविवार को जरा देर से आएंगे और यह जो यहां कोने पर फुटपाथ पर जो दाल की पूडि़या बेच रहा है मजदूरेां के लिए उसका स्‍वाद लेंगे हम। फिर उन्‍होंने कहा कि क्‍यों न इन लेागों की कहानी को हम दर्ज करें इनका जीवन, कि कविता में वह कहां अंट पाता है। तो इस पर सहमति बन गई कि आगे इस पर काम करेंगे हमलेाग मिलकर।
फिर बातें करते हम उनके घर आगए और भाभी जी ने फिर चाय का आग्रह किया तो चाय नमकीन लेते हुए मंडलोई जी ने रात लिखी कविताएं सुनाई तीन चार। उन कविताओं में कविता का शमशेरियता वाला शिल्‍प उभर रहा था कुछ कविताएं पच्‍चासी साल की अपनी मां और भाईयेां के बहाने अपने गांव-कस्‍बे को याद करते लिखी थीं उन्‍होंने। एक कविता संयोग से आज के आलोचना के माहौल पर भी थी। मैंने कहा कि ये कविताएं दे दीजिए मैं उन्‍हें अपने ब्‍लाग पर डाल दूंगा। वे असमंजस में पड़ गए कि रात तेा लिखी ही हैं अभी इन पर कलम चलानी है। मैंने कहा वह पहला ड्राफ्ट होगा फिर आप उस पर काम करते रहेंगे। पर वे उलझन में थे , तेा बोले कि तुम्‍हें लगता है यह आलोचना की राजनीति पर जो कविता है वह ज्‍यादा रूच गई है तेा उसे ले लो। तब उन्‍होंने वह कविता वहीं बैठे-बैठे फेयर की। फिर बताया कि कविता एकादश करके एक संकलन किया है मैंने ,मेधा से आया है , और किताब दी । वाकई अपने तरह का संकलन लगा वह, जिसमें विजेन्‍दे,ऋतुराज,वेणुगोपाल आदि इधर के दौर में चर्चा से करीब - करीब बाहर रहे कवि शामिल दिखे। तब दुखी होते उन्‍होंने बताया कि वेणु गोपाल को कैंसर हो गया है, ओह, पिछले सालों गैंगरीन से उनकी एक टांग काट दी गई थी और अब यह त्रासदी। मैं हैदराबाद में वेणु जी के साथ एक ही अखबार में काम कर चुका था। उस समय साठ के आस-पास के उस कवि को जिस मस्‍ती में देखा था उसे इन घटनाओं से जेाड़़कर देखता हूं तेा जी उन्‍मन हो जाता है। वाराणसी में पहल सम्‍मान के समय उनसे भेंट भी हुई थी। अपने एक पैर के साथ भी वे उसी तरह अलमस्‍त दिखे।
क्‍या हो रहा है हमारे समय के इन लेखकों के साथ । अपने प्‍यारे कवि वीरने डंगवाल केा भी जब गले में कैंसर और उसके आपरेशन की बात सुनी और देखी तो धक्‍का लगा था। पर जब उनसेआपरेशन थियेटर में मिला था तेा कैसेी गर्मजोशी से हाथ मिलाया था उन्‍होंने , वैसे वे गले मिलते थे भर बांह और मैं संकोच में पड़ जाता था।
ओह ... यह दिल्‍ली भी क्‍या-क्‍या दिखाती है या जीवन ही दिखाता है क्‍या क्‍या - पर फिर वेणु गेापाल की कविता हमारा सम्‍मोहन तोड़ती है- ऐसा ही क्‍यों होता है-
कि हिन्‍दी का कवि।
बहता या डूबता तो
अपनी कविता में है
लेकिन उसकी लाश
अक्‍सर दिल्‍ली में मिलती है.....

किसे फिक्र है दिल्ली की हवा में घुले जहर की

2675 करोड 42 लाख रुपये । तो ये देश का पर्यावरण बजट है । जी पर्यावरण मंत्रालय का बजट।  यानी जिस देश में प्रदूषण की वजह से हर मिनट 5 यानी हर बरस 25 लाख से ज्यादा लोग मर जाते है उस देश में पर्यावरण को ठीक रखने के लिये बजट सिर्फ 2675.42 हजार करोड हैं । यानी 2014 के लोकसभा चुनाव में खर्च हो गये 3870 करोड़। औसतन हर बरस बैंक से उधारी लेकर ना चुकाने वाले रईस 2 लाख करोड़ डकार रहे है । हिमाचल-गुजरात के चुनाव प्रचार में ही 3000 करोड़ से ज्यादा फूंके जा रहे हैं। पर देश के पर्यावरण के लिये सरकार का बजट है 2675.42 करोड़ । और उस पर भी मुश्किल ये है कि पर्यावरण मंत्रालय का बजट सिर्फ पर्यावरण संभालने भर के लिये नहीं है । बल्कि दफ्तरों को संभालने में 439.56 करोड खर्च होते हैं। राज्यों को देने में 962.01 करोड खर्च होते हैं।  तमाम प्रोजेक्ट के लिये 915.21 करोड़ का बजट है। तो नियामक संस्थाओं के लिये 358.64 करोड का बजट है। यानी इस पूरे बजट में से अगर सिर्फ पर्यावरण संभालने के बजट पर आप गौर
रकेंगे तो जानकार हैरत होगी कि  सिर्फ 489.53 करोड ही सीधे प्रदूषण से जुडा है जिस्स दिल्ली समेत समूचा उत्तर भारत परेशान है । और प्रदूषण को लेकर जब हर कोई सेन्ट्रल पौल्यूशन कन्ट्रोल बोर्ड से सवाल करता है तो सीपीसी का कुल बजट ही 74 करोड 30 लाख का है । तो पर्यावरण को लेकर जब देश के पर्यावरण मंत्रालय के कुल बजट का हाल ये है कि देश में  प्रति व्यक्ति 21 रुपये सरकार खर्च करती है । और इसके बाद इस सच को समझिये कि एक तरफ देश में पर्यावरण मंत्रालय का बजट 2675.42 करोड है । दूसरी तरफ पर्यावरण से बचने का उपाय करने वाली इंडस्ट्री का मुनाफा 3 हजार करोड से ज्यादा का है । तो पर्यावरण को लेकर इन हालातों के बीच ये सवाल कितना मायने रखता है कि देश के पर्यावरण मंत्री हर्षवर्धन उस वक्त जर्मनी में थे जब दिल्ली गैस चैबर हो चली । और लौट कर भी दिल्ली नहीं पहुंचे बल्कि वह अपनी बात गोवा से कर रहे है । तो जाहिर है पर्यावरण मंत्री भी इस सच को समझते है कि उनके मंत्रालय के बजट में सिर्फ प्रदूषण से मुक्ति के लिये ही जब 275 करोड रुपये है और प्रोजेक्ट टाइगर के लिये 345 करोड है ।

तो फिर पर्यावरण मंत्री का काम दुनियाभर में पर्यावरण को लेकर चिता के बीच अलग अलग कान्फ्रेस में शामिल होने के अलावे और क्या काम हो सकता है । और जर्मनी भी पर्यावरण मंत्री सयुक्त राष्ट्र के मौसम बदलाव के कान्प्रेस में शामिल होने ही गये थे । ऐसे में एक सवाल जीने के अधिकार का भी है क्योकि संविधान की धारा 21 में साफ साफ लिखा है जीने का अधिकार । और संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत स्वस्थ वातावरण में जीवन जीने के अधिकार को पहली बार उस समय मान्यता दी गई थी, जब रूरल लिटिगेसन एंड एंटाइटलमेंट केंद्र बनाम राज्य, AIR 1988 SC 2187 (देहरादून खदान केस के रूप में प्रसिद्ध) केस सामने आया था।   यह भारत में अपनी तरह का पहला मामला था, जिसमें सर्वोच्च  न्यायालय ने पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम 1986 के तहत पर्यावरण व पर्यावरण संतुलन संबंधी मुद्दों को ध्यान में रखते हुए इस मामले में गैरकानूनी खनन रोकने के निर्देश दिए थे।

वहीं एमसी मेहता बनाम भारतीय संघ, AIR 1987 SC 1086 के मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने प्रदूषण रहित वातावरण में जीवन जीने के अधिकार को भारतीय संविधान के अनु्छेद 21 के अंतर्गत जीवन जीने के मौलिक अधिकार के अंग के रूप में माना था। तो फिर दिल्ली के वातावरण में जब जहर धुल रहा है । देश में हर मिनट 5 लोगो की मौत पप्रदूषण से हो रही है । तो क्या सरकार इस चिंता से वाकई दूर है । खासकर तब जब देश में पीएम से लेकर सीएम और हर मंत्री ही नही हर संसद सदस्य तक संविधान की शपथ लेकर ही पद संबालता है । तो फिर जीने के अधिकार की खुली धज्जियां उड़ रही है तो संसद का विसेष सत्र क्यो नही बुलाया जा रहा है । सुप्रीम कोर्ट अपनी ही  व्याख्या के तहत केन्द्र को नोटिस देकर ये सवाल क्यो नहीं पूछ रहा है । क्योकि एम्स के डायरेक्टर तक कह रहे है कि दिल्ली में लंदन के 1952 के द ग्रेट स्मॉग जैसे हालात बन रहे हैं । और पर्यावरण को लेकर संसद तो दूर तमाम राज्यों के सीएम भी आपस में बैठने को तैयार नहीं है । केजरीवाल पंजाब
और हरियाणा के सीएम से मुलाकात का वक्त मांग रहे है । हर राज्य की मुस्किल तो ये भी है कि किसी के पास पर्यावरम से पैदा होते प्रदूषण को रोकने के लिये  अलग से बजट नहीं है । तो गैस चैंबर में तब्दील हो चुकी दिल्ली में लोगों की सांस कब सीने से उखड़ जाए-कहा नहीं जा सकता। देश की राजधानी में लोग स्मॉग में घुटकर नहीं मरेंगे-इसकी गारंटी लेने वाला कोई नहीं। क्योंकि सच यही है कि आम आदमी की जान की फ्रिक किसी को है नहीं। आलम ये सुप्रीम कोर्ट, हाईकोर्ट और एनजीटी ने तीन साल में केंद्र और दिल्ली सरकार को प्रदूषण रोकने में नाकाम रहने के लिए कई बार फटकार लगाई और तीनों अदालतों ने तीन साल में 44 से ज्यादा बार अलग अलग ऑर्डर दिए-जिनकी धज्जियां उड़ा दी गईं। मसलन , सुप्रीम कोर्ट ने तीन साल में 18 आदेश दिए । हाईकोर्ट ने तीन साल में 18 आदेश दिए । एनजीटी ने तीन साल में 8 आदेश दिए । और इन आदेशों पर अमल हुआ होता तो दिल्ली का आज यह हाल न होता। क्योंकि पराली जलाने से होने वाले प्रदूषण से लेकर डीजल गाड़ियों पर रोक तक कई आदेश दिए गए लेकिन अमली जामा किसी पर पहनाया नहीं जा सका।


और आज जब दिल्ली गैस चैंबर में तब्दील हो चुकी है-तब का हाल यह है कि धुंध की वजह से बीते 24 घंटे में 17 से ज्यादा लोगों की जान जा चुकी है । दिल्ली-पंजाब और हरियाणा के मुख्यमंत्रियों ने आपस में बात तक नही की है । कृत्रिम बारिश पर कोई फैसला हो नहीं सका। एक एजेंसी कहती है कि यह जरुरी है तो केंद्र सरकार खारिज करती है। सरकार के ही अलग अलग मंत्री अलग बात करते हैं । तो आखरी सच यही है कि  धुंध में पसरे जहर को सांसों में उतारना उस गरीब आदमी की मजबूरी है-जिसे रात को पेट भरने के लिए सुबह को काम पर निकलना जरुरी है। वो घर की चारदीवारी में नहीं बैठ सकता। वो एयर प्यूरीफायर नहीं खरीद सकता। वो अपनी कार में काम पर नहीं जाता। उसे काम पर निकलना ही होगा। उसे सांसों के जरिए जहर छाती में लेना ही होगा।

तो सवाल यही है कि क्या जहरीली धुंध पर सरकार कुछ करेगी या एक तमाशा जो जारी है-वो कुदरत के आसरे खुद की खत्म हो जाएगा। क्योंकि प्रृकति देर सबरे खुद धुंध छांटेगी ही और जनता-सरकार-अदालत सब फिर अपने काम में लग जाएंगे। जहरीले धुंध से बेपरवाह।
Syndicate content

लेखक विषय संवाद साभार अनुवादक

पहले वो आए साम्यवादियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं साम्यवादी नहीं था

 

फिर वो आए मजदूर संघियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं मजदूर संघी नहीं था

 

फिर वो यहूदियों के लिए आए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं यहूदी नहीं था

 

फिर वो आए मेरे लिए

और तब तक बोलने के लिए कोई बचा ही नहीं था

 

मार्टिन नीमोलर (1892-1984)