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बाजारोन्‍मुख हुई स्‍वातंत्र्योतर हिंदी कहानी : नरेंद्र अनि‍केत

लेखक मंच - Sat, 30/12/2017 - 02:08

नरेंद्र अनि‍केत

हिंदी कहानी पर जब भी विचार किया जाता है तो स्‍वतंत्रता प्राप्ति के बाद के हुआ तीव्र विकास विवेचना के केंद्र में रहता है। बीसवीं सदी के आठवें दशक तक हिंदी कहानी पांच आंदोलनों से गुजर चुकी थी। सबसे ध्‍यान देने योग्‍य बात यही है कि सभी कहानी आंदोलन स्‍वतंत्रता प्राप्ति के बाद हुए। 19वीं सदी के आखिर से हिंदी कहानी शुरू होती है। स्‍वतंत्रता प्राप्ति के समय तक हिंदी कहानी आदर्श के दायरे में बंधी रही। सदी के मध्‍य में देश आजाद हुआ और तीस साल बीतते-बीतते कथा लेखन में जिस तेजी से बदलाव आए, उस पर गौर करने की जरूरत है। छठे दशक के मध्‍य तक आते-आते कहानी में बदलाव आ जाता है। इसी बदलाव को ‘नई कहानी’ नाम दिया गया। नई कहानी को सबसे पहला कहानी आंदोलन कहा जाता है। आजादी मिले दस साल भी नहीं बीते थे और हिंदी कहानी के केंद्र में आदर्श के साथ जीने, संघर्ष करने वाला नायक गायब हो गया। उसकी जगह परिस्थिति की मार झेल समझौता करने वाला हताश नायक आ जाता है। यह हताश नायक तत्‍कालीन भारतीय समाज का यथार्थवादी चेहरा है।

कहानी में आए इस तरह के बदलाव का कारक आजादी के बाद देश में उत्‍पन्‍न परिस्थितियों को माना जाता है। देश में तैयार की जा रही बाजारोन्‍मुख व्‍यवस्‍था ने ही वैसी परिस्थितियां तैयार की थीं। स्‍वतंत्रता से पहले जो समाज अंग्रेजी राज की बाजार हितैषी व्‍यवस्‍था से उत्‍पीडि़त था, उसे सामंती व्‍यवस्‍था की मार झेलने वाला समाज माना गया। अंग्रेजों ने जो सामंती व्‍यवस्‍था तैयार की थी, वह केवल उनकी बाजार नीति को सहारा दे रही थी। सभी कर्णधारों ने इस बात की अनदेखी कर दी कि अंग्रेज भारत क्‍यों आए थे। उन्‍हें अपने औद्योगिक उत्‍पादों के लिए बाजार चाहिए था। दुनिया के जिन हिस्‍सों में मनुष्‍य श्रम और कृषि पर आश्रित था, उससे बेहतर क्रेता और कोई नहीं हो सकता था। ऐसे क्षेत्रों के लोगों को खरीदार बनाने के लिए अंग्रेजों ने वहां के पारंपरिक मूल्‍यों, मान्‍यताओं और जीवन शैली को पोंगापंथ कहा और उसे दरकिनार कराया। भारतीय इतिहास में अंग्रेजी राज की स्‍थापना से ही आधुनिककाल की शुरुआत माना गया है। मतलब औद्योगिक उत्‍पादों के विक्रय की परिस्थिति बनने के बाद के समय को ही आधुनिक काल कहा जाता है।

अंग्रेजी राज की स्‍थापना के बाद भारत में सुधार आंदोलन हुए। उसे अंग्रेजी संपर्क का प्रभाव माना गया। यह सच है कि कई कुरीतियों के खिलाफ आंदोलन हुए और सफलता भी मिली। लेकिन हमें अंग्रेजी राज की स्‍थापना के मूल में क्‍या था, उसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। यह भी नहीं भूलना चाहिए कि ईस्‍ट इंडिया कंपनी व्‍यापार करने आई थी और उसे यहां शासन स्‍थापित करने का अनुकूल माहौल मिल गया था। अपने हितों के लिए आज के छोटे-बड़े कारोबारी भी गार्ड रखते हैं। ये गार्ड हथियार बंद भी होते हैं और खाली हाथ भी। 18वीं सदी में कंपनी को तत्‍कालीन सत्‍ता को कर देने के अलावा और किन्‍हीं बंदिशों का सामना नहीं करना पड़ा था। कंपनी के पहरेदार चौकीदार हथियार बंद हो गए थे और इन्‍हीं गार्डों ने लॉर्ड क्‍लाइब को बिहार, बंगाल जीतकर दिया था। शासन स्‍थापित होने के बाद अंग्रेजों ने यहां के पारंपरिक उद्योगों को बंद कराया था। ढाका के मलमल से प्रतिस्‍पर्द्धा खत्‍म करने के लिए उन्‍होंने एक लाख बुनकरों का अंगूठा कटवा दिया था। घरेलू स्‍तर पर खांड, शक्‍कर और रवा बनाया जाता था। इन्‍हें खत्‍म करने के लिए अंग्रेजी राज में चीनी मिलों के हित में गन्‍ना रिजर्व एरिया एक्‍ट बनाया गया था। इस कानून को आजाद भारत की विधायिका भी अपनी स्‍वीकृति दे चुकी है और इसके प्रावधानों को और कड़ा कर चुकी है। इन दोनों बातों पर नजर डालने के बाद सबकुछ साफ हो जाता है। यह कहना कहीं से भी अनुचित नहीं होगा कि शासन व्‍यवस्‍था केवल और केवल अपने उद्योगों के लिए बाजार बनने का साधन थी। अपना मकसद साधने के लिए अंग्रेजी राज ने वहां की समाज व्‍यवस्‍था के प्रति हेय दृष्टि अपनाई और उन्‍हें अपनी परिभाषा के अनुसार ढालने के लिए अपने मतलब के उपकरण तैयार किए। उन्‍होंने इस‍के लिए पारंपरिक चीजों और मान्‍यताओं के विरुद्ध एक विचार स्‍थापित किया जिसे उन्‍होंने आधुनिकता कहा। आजादी के बाद अंग्रेजी राज के समय की आधुनिकता का बोलबाला बनता चला गया। असल में भारतीय समाज बाजार के अनुसार ढलता चला गया।

जब देश आजाद हुआ तो अंग्रेजी राज की व्‍यवस्‍था लोकतांत्रिक तरीके से आगे बढ़ने लगी। जिस व्‍यवस्‍था की उम्‍मीद थी, वह स्‍थापित नहीं हो पाई। इसका असर व्‍यक्ति और समाज पर पड़ा। इन्‍हीं परिस्थितियों ने आम आदमी को निराश किया और उसमें असुरक्षा की भावना भी पैदा की। निराशा ने पहले उसे एकाकी बनाया तो बाद में असुरक्षा ने आक्रामक बनाया। सातवें दशक तक का हिंदुस्‍तानी समाज इसी निराशा, एकाकीपन और आक्रोश के बीच झूलता दिखता है। सातवें दशक के अंतिम समय तक यही समाज आक्रामक होने लगता है और आठवें दशक के आखिर में वह तनाशाही से लोहा लेता है। देश में इस तरह की सामाजिक परिस्थिति निर्मित करने के लिए स्‍वतंत्र भारत के नेतृत्‍व को जवाबदेह माना जा सकता है। स्‍वतंत्रता प्राप्ति से पहले नेताओं ने आजाद भारत के जिस स्‍वरूप की कल्‍पना की थी, सत्‍ता मिलने के बाद वास्‍तविकता भिन्‍न थी। संघर्ष के दिनों में की गई कल्‍पना साकार नहीं होने पर व्‍यापक जनसमुदाय निराश हो गया था। स्‍वातंत्र्योत्‍तर भारतीय समाज सपने और वास्‍तविकता के बीच के द्वंद्व में फंस गया था। हिंदी कहानी इसी द्वंद्व में उलझे आदमी के सामूहिक मनोभावों को हमारे सामने रखती है।

असल में यह द्वंद्व महात्‍मा गांधी की कल्‍पना के भारत और नेहरू के सपनों के भारत के बीच का है। कहानी को यदि स्‍वतंत्रता प्राप्ति से पहले और स्‍वतंत्रता प्राप्ति के बाद के समय में विभाजित करें हमें सबकुछ साफ नजर आएगा।

भारतीय समाज अवतारवाद की कल्‍पना में जीता चला आया समाज है। मजेदार है कि भगवान बुद्ध जिन्‍होंने अपने तात्‍कालिक समाज को पदार्थवादी बनाया था। जिनका मुक्ति संबंधी विचार पारंपरिक विचार से भिन्‍न था। उनके पदार्थवादी चिंतन और मुक्ति या निर्वाण संबंधी विचार के कारण पारंपरिक वैदिक विचारकों ने उन्‍हें वाममार्गी घोषित किया था। इसके बाद भी भारतीय समाज ने उन्‍हें भगवान का दर्जा दिया और बाद में वैष्‍णव विचारकों ने उन्‍हें विष्‍णु के नौवें अवतार के रूप में मान्‍यता दी थी। भगवान बुद्ध ने तात्‍कालिक जीवन और शासन व्‍यवस्‍था को प्रभावित किया था। उपदेश देने से पहले उन्‍होंने स्‍वयं पालन किया और खुद पर ही प्रयोग भी किया था। उसे ग्राह्य और सुगम साबित किया था। यही कारण है कि समाज ने उसे सामूहिक रूप से स्‍वीकार किया था।

ठीक इसी तरह भगवान राम वनवास के लिए भेजे जाते हैं। राजमहल के ऐश्‍वर्य में जीने वाले राम वनवासियों की जीवनशैली अपनाते हैं। कंदमूल फल खाते हैं। राम की यही सादगी, यही त्‍याग भारतीय समाज को भाता है। एक तर्क दिया जाता है कि राम गरीबों के बीच गरीबों की तरह जीने के लिए मजबूर किए गए इसीलिए मजबूर भारतीय समाज ने उन्‍हें दयावश स्‍वीकार किया। भारतीय समाज पारंपरिक रूप से सहज और प्रकृति के साथ साम्‍य रखने वाला समाज है। सहजता ही वह मूल बिंदु है जो भारतीय समाज को राम और बुद्ध की तरफ ले जाता है। गौर करें तो भगवान बुद्ध और राम दोनों जीवन की कसौटी पर एक जगह ही खड़े नजर आते हैं। दोनों अवतारों के व्‍यापक आधार से स्‍वतंत्रता आंदोलन के समय गांधी को मिले जनसमर्थन का कारण भी साफ हो जाता है। गांधी भी अपनी निजी जीवनशैली और हर बुराई के खात्‍मे के प्रति अडिग रहने की अपनी प्रवृत्ति के कारण व्‍यापक रूप से स्‍वीकृत हुए थे। उन्‍हें उसी भारतीय समाज का आधार मिला था जिसे अवतारवाद का समर्थक माना जाता है। उस समाज ने गांधी के रामराज के नारे पर भरोसा किया था। उसे उम्‍मीद थी कि देश जब आजाद होगा तो उसके सभी दुखों का अंत हो जाएगा। भारतीय समाज के लिए गांधी एक अवतार की तरह थे इसलिए उनके हर आह्वान पर लोग गोलबंद हो रहे थे। आजादी के बाद गांधी की कल्‍पना का भारत खो गया। उसकी जगह एक ऐसी व्‍यवस्‍था आकार ले रही थी जिसमें आदमी खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहा था। यही वह परिस्थिति थी, जिसमें नई कहानी उठ खड़ी हुई थी।

जिन सामाजिक परिस्थितियों को नई कहानी आंदोलन की कहानियां हमारे सामने रखती हैं, उसके लिए पंडित जवाहरलाल नेहरू की नीतियों को जवाबदेह ठहराया जा सकता है। लेकिन मजेदार है कि नई कहानी के कथाकार त्रयी में से एक राजेंद्र यादव ने करीब ढाई दशक पहले एक विचार गोष्‍ठी में कहा था कि पंडित जवाहर लाल नेहरू के बाद देश में कोई विजनरी नेता नहीं हुआ। राजेंद्र यादव के मुताबिक, नेहरू के विजन ने देश की समाजव्‍यवस्‍था, अर्थव्‍यवस्‍था को प्रभावित किया था। राजेंद्र यादव ने नेहरू के सपने के भारत को सत्‍य मानते हुए उनके विजन के संबंध में यह विचार व्‍यक्‍त किया था। जीवन में बदलाव आया, उद्योगों की आधारशिला रखी गई, विकास के काम शुरू हुए और शहरों का विकास होने लगा। इन सभी बदलावों के मूल में नेहरू के विजन को मुख्‍य कारक माना जाता है। यह निर्विवाद सत्‍य है कि आजादी के बाद हुए विकास का लोगों के जीवन पर कई रूपों में असर पड़ा। लेकिन भारतीय समाज पर विकास का नकारात्‍मक असर भी पड़ा। लोगों में निराशा बढ़ी और जीवन की शर्तें आसान होने की जगह और दुरूह होती चली गईं। बेहतर जीवन की उम्‍मीद में लोग शहर की ओर बढ़ने लगे थे, लेकिन वहां उनके लायक रोजगार नहीं थे। अकेले आ रहे लोग अकेले हो रहे थे और जीवन का, पीछे छूटे परिवार की उम्‍मीदों का बोझ उठाए चल रहे थे। ऐसे में भारतीय जनमानस में निराशा का पनपना स्‍वाभाविक था। निराशा के उसी वातावरण से जूझ रहे शहरी समाज का चेहरा छठे दशक के मध्‍य में आई कहानियों में दिखाई देता है। कहा जा सकता है कि आजादी के बाद जो सामाजिक परिस्थिति विकसित हुई थी, वह नेहरू के विजन की ही देन थी।

नेहरू के सपनों के भारत में पश्चिम का ऐश्‍वर्य था। वह भारत को ब्रिटेन और दिल्‍ली को लंदन बनाना चाहते थे। यही गांधी और नेहरू के बीच का अंतर था। जब आजादी आसन्‍न हो गई थी, तब भावी भारत के स्‍वरूप को लेकर गांधी और नेहरू दो भिन्‍न सिरों पर खड़े हो चुके थे। नेहरू के सपनों का भारत जिस भ्रष्‍टाचार में डूबने वाला था, उसकी झलक मिलने लगी थी और कांग्रेस में जो लोग खादी पहन अपने लिए जगह बना रहे थे, वे आने वाले दिनों का संकेत दे रहे थे। इस स्थिति को फणीश्‍वरनाथ रेणु ने अपने उपन्‍यास ‘मैला आंचल’ में रखा है।

‘मैला आंचल’ का बामन दास गांधीवादी विचारधारा पर अडिग रहने वाला वह मनुष्‍य है, जिसे आजाद भारत या यह कहिए कि नेहरूबियन मॉडल का भारत बेकार या आउट डेटेड मान रहा है। ‘मैला आंचल’ में आजादी के आसपास के समय में गलत लोगों को कांग्रेस का नेता बनते दिखाया गया है। इस उपन्‍यास के अंतिम पड़ाव में भारत और पूर्वी पाकिस्‍तान के बीच चल रही तस्‍करी और उससे जुड़े लोगों को दर्शाया है। बैलगाडि़यों पर तस्‍करी का सामान ले जाया जा रहा है। नागर नदी को दोनों देशों की सीमा मान ली गई है। इसी नदी के चोर घाट से बैलगाडि़यां पार कराई जाती हैं। इस तस्‍करी में सप्‍लाई इंस्‍पेक्‍टर, हवलदार, सिपाही सभी मिले हुए हैं। इसका लीडर दुलारचंद कापरा है, जो अफसरों को मोरंगिया शराब (बिहार के सीमावर्ती इलाके में नेपाल को मोरंग कहा जाता है) परोसता है। कटहा का दुलारचंद जुआ घर चलाता है और मोरंगिया ल‍ड़कियों, गांजा शराब का कारोबार करता रहा है। वह कपड़ा, चीनी, सीमेंट पूर्वी पाकिस्‍तान भेजता है। यही दुलारचंद कापरा कटहा थाना कांग्रेस कमेटी का अध्‍यक्ष भी बन गया है। यहां दुलारचंद आजाद भारत में निचले स्‍तर पर शासकों के चरित्र की झलक देता है। इसके माध्‍यम से रेणु ने यह बताया है कि देश तो बस अंग्रेजी चंगुल से आजाद हुआ, लेकिन उसकी व्‍यवस्‍था से उसे मुक्ति नहीं मिल सकी।

नेहरू यूरोप के जिस वैभव से बंधे थे, गांधी पश्चिम के उसी ऐश्‍वर्य के विरुद्ध खड़े थे। गांधी भारतीय समाज के अनुरूप साबित हो रहे थे इसलिए उन्‍हें हर वर्ग का समर्थन प्राप्‍त हुआ था। प्रेमचंद ने अपने उपन्‍यास ‘रंगभूमि’ में सूरदास के माध्‍यम से गांधी के इसी रूप को सामने रखा है। आलोचकों की दृष्टि में यह उपन्‍यास दो संस्‍कृतियों के बीच के टकराव को सामने रखता है। लेकिन यह उपन्‍यास दो संस्‍कृतियों के वैचारिक टकराव तक ही सीमित नहीं है। यह बाजार में गांधीवाद के गुम हो जाने की दास्‍तां को भी सामने रखता है।

भारत में अंग्रेजी सामान या भारत को अपना बाजार बनाने के क्रम में अंग्रेजों ने आधुनिकता के बारे में जो दृष्टि फैलाई थी, इस उपन्‍यास में सूरदास उसी दृष्टि के खिलाफ भारतीय विचारधारा के प्रतीक के रूप में खड़े हैं। गौर किया जाए तो सूरदास उसी आधुनिक भोगवादी लालसा से लिप्‍त आधुनिक समाज के विरुद्ध दिखाई देते हैं। इस उपन्‍यास का नायक सूरदास उस भारतीय समाज का प्रतिनिधित्‍व कर रहे हैं, जो दूसरों के लिए त्‍याग करना धर्म समझता है। वह अपनी जमीन की कीमत नहीं देखते, अपने दुखों से मुक्ति पाने के लिए वह जमीन की ऊंची कीमत की लालसा नहीं पालते। जमीन पर मि. जान सेवक की नजर पड़ जाती है और वह उन्‍हें पांच रुपये देने लगता है। बग्‍गी के साथ मीलों दौड़ता चले आए सूरदास यह कहते हुए रुपये लेने से इन्‍कार कर देते हैं, ‘धर्म में आपका स्‍वार्थ मिल गया, अब यह धर्म नहीं रहा।’

इन दोनों उपन्‍यासों और उसके गांधीवादी नायकों का जिक्र इसलिए किया है कि दोनों के गांधीवादी नायक उसी शहरी प्रपंच के शिकार हो जाते हैं, जिसमें आजाद भारत का आम आदमी फंस गया है। दूसरे शब्‍दों में कहा जाए तो गांधी और गांधीवाद जिस बाजार के खिलाफ खड़े थे, आजाद भारत में उसी गांधीवाद को औद्योगिक साम्राज्‍य का बाजार निगल जाता है और बदलती सत्‍ता उन्‍हें समय-समय पर अप्रासंगिक करार देती रहती है। दोनों उपन्‍यासों में दोनों कहानीकारों ने प्रतीकात्‍मक ढंग से गांधीवाद की इसी स्थिति को दर्शाया है।

‘मैला आंचल’ के बामन दास नेहरूबियन मॉडल के भारत के विरोध में खड़े हो जाते हैं और नेहरूबियन मॉडल का भारत उन्‍हें कुचलकर मार डालता है। उनकी लाश नागर नदी के पार पूर्वी पाकिस्‍तान में फेंक दी जाती है। दूसरी तरफ के सिपाही बामन दास की लाश को नदी में प्रवाहित कर देते हैं और उनका झोला भारतीय सीमा में एक पीपल के पेड़ पर टांग देते हैं। समय के थपेड़े में झोला चीथड़ा हो जाता है और लोग पीपल को चे‍थरिया पीर समझने लगते हैं। फिर वहां पेड़ में कई चीथड़े लटक जाते हैं। ‘रंगभूमि’ में उद्योग से गांव का समाज बदल जाता है। लोगों का आपसी व्‍यवहार बदल जाता है और नायक सूरदास का अंत होता है, लेकिन उनके हठ और जनोन्‍मुखी स्‍वभाव के कारण उनकी मूर्ति लगाई जाती है। एक दिन उनकी प्रतिमा को उद्योग समर्थक राजा क्षतिग्रस्‍त कर देता है।

रेणु ने तो आजादी के बाद ‘मैला आंचल’ लिखा था, लेकिन प्रेमचंद ने ‘रंगभूमि’ आजादी से बहुत पहले लिखा था। तत्‍कालीन परिस्थितियों को देख प्रेमचंद भावी भारत के स्‍वरूप के बारे में सटीक अनुमान लगा बैठे थे। जिस समय ‘रंगभूमि’ की रचना हुई थी, उस समय आजादी के लिए संघर्ष ही चल रहा था। आजादी आसन्‍न भी नहीं थी, लेकिन प्रेमचंद ने यही कल्‍पना की थी कि यह देश गांधी को प्रतिमाओं में समेट देगा और उसी बाजार के व्‍यामोह में जा फंसेगा, जिसके खिलाफ गांधी खड़े हैं।

आजाद भारत में आधुनिक कौन इसकी परिभाषा बदल जाती है। शिक्षा और ज्ञान आधुनिक होने की पहचान के सबसे निचले पायदान पर आते हैं, लेकिन पहनावा आदमी को समाज में प्रतिष्‍ठा दिलाता है। नई पीढ़ी की नजर में खादी पहनना पिछड़ेपन की निशानी बन चुका है। एक पीढ़ी दूसरी पीढ़ी को अपने से अलग मानती है। मूल्‍यों और मान्‍यताओं में आए इस बदलाव को दीप्ति खंडेलवाल ने अपनी कहानी ‘मूल्‍य’ में बेहतर तरीके से चित्रित किया है – ‘ओ माई गॉड ! पिताजी, क्‍या हुलिया बनाए रहते हैं आप भी ? ढंग के कपड़े तो पहना कीजिए। कितनी बार आपको बताया कि टेरीकॉट का एक सूट बनवा लीजिए, तो झंझट मिटे। लेकिन आप तो खादी की लादी लादे रहेंगे और उन पर मां प्रेस करेगी, लोटे में कोयला डालकर। क्‍या आप लोगों के लिए ढंग से रहने की कोई वैल्‍यू नहीं ?’

वैल्‍यू ?
मूल्‍य ?

पंडित जी भरपूर नजर से बेटे को देखते हैं। टेरीकॉट की तंग पैंट और ब्‍लाउजनुमा चुस्‍त बुशर्ट में कलमें बढ़ाए यह उनका अपना खून कितने निर्द्वंद्व भाव से उन्‍हें मूल्‍यों का अर्थ समझा रहा है।1

इस तरह के बदलाव का शहरी जीवन और परंपरागत पेशा पर बुरा असर पड़ा था। बदीउज्‍जमा ने ‘चौथा ब्राह्मण’ कहानी संग्रह में ‘मिटते साए’ कहानी में इसी स्थिति को दर्शाया है। ये दोनों कहानियां आठवें दशक की हैं। इस दशक तक आते-आते हर दो-तीन साल बाद मानदंडों में तेजी से बदलाव आता है। इन बदलावों का कारण वैज्ञानिक उन्‍नति, औद्योगिक प्रगति, महानगरीय सभ्‍यता का तेजी से विकास, शिक्षा और कला आदि में परिवर्तन था। इन सबके मूल में पश्चिम का भौतिकवादी चिंतन था। जिस तरह की सोच और जिस तरह के चिंतन से महानगरीय संस्‍कृति लैस थी, उसमें पुराने मूल्‍यों और संस्‍कारों के लिए कोई जगह नहीं थी। महानगरों में रहने वाले और रहने आए लोगों ने अपने अनेक संस्‍कारों के विपरीत नई जीवन पद्धति अपनाई। इस बदलाव ने समाज को दिखावे के अध्‍यात्‍म से बांधा। यह अध्‍यात्‍म भी भौतिकता के रंग में डूबा और उसने भी बाजार बनाया। उस बाजार में आज के कई साधु-संत दिखते हैं।

शहरीकरण ने संयुक्‍त परिवार को तोड़ा, परिवार में भी तनाव, फूट और संबंधों में बिखराव पैदा हुआ। इसी स्थिति ने अकेलापन, सूनापन, बेगानापन और जटिलताओं को न केलव जन्‍म दिया, बल्कि उसे पाला भी। गोविंद मिश्र की ‘कचकौंध’ कहानी में पंडित जी जैसे पात्र इस व्‍यथा से पीडि़त हैं कि शहर आकर उनके बेटे-पोते उन सब प्रतिमानों को ध्‍वस्‍त कर रहे हैं, जिसका उन्‍होंने जीवनभर निष्‍ठापूर्वक पालन किया है। उन्‍हें लगता है कि शहर में आ गई उनकी अगली पीढ़ी ‘हर चीज को मटियामेट कर रही है।’2

इस नए पनप रहे समाज ने आठवें दशक में ही वैवाहिक संबंधों को लेकर भी भिन्‍न विचार को जगह दे दी थी। रमेश बक्षी ने ‘पिता दर पिता’ कहानी में इसे बखूबी दर्शाया है। कहानी की नायिका एनी विवाह को स्‍त्री के स्‍वतंत्र अस्तित्‍व के लिए हानिकारक मानती हुई कहती है, ‘विवाह का अर्थ खुद को समाप्‍त करना है।’3

बाजार के प्रभाव में सबसे पहले नगर ही आए। नगर से ही नई सोच का प्रसार शुरू हुआ। नौवें दशक के पहले तक टेलीविजन सिर्फ महानगर तक ही सीमित था। प्रचार का सबसे बड़ा माध्‍यम रेडियो था और दृश्‍य श्रव्‍य के रूप में सिनेमा। ऐसे में दबे पांव नई धारणाएं और विचार कस्‍बों तक पहुंचे। नगरों में नए-नए बोधों का जन्‍म हुआ। भैरू लाल गर्ग ने इस संबंध में लिखा है- ‘आधुनिकता, परंपरा से मुक्ति के लिए प्रयत्‍न, कृत्रिम जीवन प्रणाली, कालाबाजारी, अनैतिकता, काम की उग्रभूख, जीवन मूल्‍यों और जीवन दृष्टि में तीव्र परिवर्तन, संबंधों में परिवर्तन, प्राचीनता और नवीनता के मध्‍य संघर्ष, अपरिचय ऊब, अकेलापन, अविश्‍वास, फिट न होने की स्थिति, क्षण बोध, स्‍त्री-पुरुष का जूझना और अंत में टूटना, दिग्‍भ्रम आदि स्थितियों का प्रादुर्भाव हुआ है।’4

हिंमाशु जोशी की कहानी ‘कोई एक मसीहा’ में आजाद भारतीय राजनीतिक का चेहरा सामने रखा गया है। जनता के प्रतिनिधि सुरेश भाई आश्रम का निरीक्षण करने पहुंचे हैं। उनका ध्‍यान वहां की सुंदर कन्‍याओं पर है। आश्रम की संचालिका उनकी सेवा में सावित्री नाम की लड़की को भेज देती है। सुरेश भाई सावित्री को भी शराब पिलाते हैं और रात भर उसकी सेवा लेते हैं। सुबह जब जाने लगते हैं तो उसे खादी की धोती पुरस्‍कार में देने के लिए कह जाते हैं।5

गिरिराज किशोर की कहानी ‘मंत्रीपद’ में नेताओं के स्‍वार्थ को उजागर किया गया है। कहानी के पंडित भूतपूर्ण मंत्री और मौजूदा सांसद हैं। यह नेता बातें तो आदर्श की करते हैं, लेकिन व्‍यवहार में अत्‍यंत कुटिल हैं। पंडित जी कहते हैं, ‘बड़ा दुख होता है। मंत्री लोग शाहों में नौकरशाह हैं। जनतंत्र में नौकरशाह ही सबसे बड़ा शाह होता है। बाकी तो सब गुलाम हैं। वे लोग जनता चुने गए प्रतिनिधियों जैसा व्‍यवहार नहीं करते। उनका जनता से कोई संपर्क नहीं है। इनका तामझाम राजकुमारों वाला है। गांधी जी की आत्‍मा क्‍या कहती होगी। क्‍या मैंने इसलिए आजादी की लड़ाई लड़ी थी। पटेल की आत्‍मा रोती होगी। जब राजकुमारों को रहना ही था तो बेकार ही मैंने उन कदमी राजवाड़ों का खात्‍मा किया। धत्‍त तेरी की।’

गिरधर गोपाल की कहानी ‘मुझे बचाओ’ में स्‍वतंत्रता के बाद के भ्रष्‍टाचार का चित्रण किया गया है। सोमेश एक ईमानदार नागरिक है और आजादी की लड़ाई लड़ता है। देश में व्‍याप्‍त भ्रष्‍टाचार को देखकर सोमेश कहता है, ‘यहां आदमी इतना गिर चुका है कि थोड़े से लाभ के लिए देश का बड़े से बड़ा अहित करने में उसे शर्म नहीं आती। ईमान बेच सकता है और ईमान खरीद सकता है।’ स्थिति को देख सोमेश कहता है, ‘खादी और गांधी टोपी भ्रष्‍टाचार की ध्‍वजा बन गई है।’

इन कहानियों में जिस समाज और जिस राजनीतिक, प्रशासनिक व्‍यवस्‍था की तस्‍वीर को कहानीकारों ने समाज के सामने पेश किया है, वह उसका यथार्थवादी चेहरा है। यह पूरी व्‍यवस्‍था बाजार में खड़े सक्षम खरीदार और अक्षम खरीदार के बीच के भेद को स्‍पष्‍ट करता है। सच तो यही है कि आजादी के बाद बाजार में हेराए गांधीवाद को हिंदी कहानी ने परखा और पेश किया है।

संदर्भ संकेत

1 संपादक योगेंद्र कुमार (लल्‍ला) : श्रीकृष्‍ण, हिंदी लेखिकाओं की श्रेष्‍ठ कहानियां (कहानी संग्रह), राष्‍ट्रभाषा प्रकाशन 1991, पृष्‍ठ 38
2 गोविंद मिश्र, कचकौंध, सारिका 1972
3 रमेश बक्षी, पिता दर पिता, रूपांबरा प्रकाशन, इलाहाबाद, 1971, पृष्‍ठ 24
4 भैरू लाल गर्ग, स्‍वातंत्र्योत्‍तर हिंदी कहानी में सामाजिक परिवर्तन, चित्रलेखा प्रकाशन, 1979
5 हिंमाशु जोशी, चर्चित कहानिया, कोई एक मसीहा, सामयिक प्रकाशन, नई दिल्‍ली

साभार : अभि‍मत

गुजरात विधानसभा चुनाव:२०१७,राहुल गांधी को रोकने में आदित्यनाथ योगी की बड़ी भूमिका

जंतर-मंतर - Fri, 29/12/2017 - 19:06

 शेष नारायण सिंहगुजरात चुनाव के नतीजे आ गए . राज्य सरकार बीजेपी के हाथ रही लेकिन विपक्षी राजनीति का एक नया व्याकरण भी रचा गया . अभी बहुत ही  शुरुआती मामला है लेकिन राहुल गांधी ने कांग्रेस के नेता  के रूपमें राजनीति को प्रभावित करने की कोशिश की और कुछ हद तक सफल रहे . राजनीतिक प्रक्रिया कोई  एक दिन का काम नहीं है , उसको पकने में वक़्त लगता है लेकिन संकेत नज़र आने लगे हैं . बीजेपी ने  राजनीतिक मोबिलाइज़ेशन के लिए हिन्दू धर्म का प्रयोग करने की जो  योजना बनाई उसकी बहुत ही दिलचस्प कहानी है . १९७७ में जनता पार्टी में शामिल पुरानी जनसंघ के लोग अपने मूल संगठन ,आर एस एस के प्रति हमेशा वफादार रहे हैं . १९७८ में जब मधु लिमये ने ऐलान किया कि जनता पार्टी में शामिल लोग आर एस एस से नाता तोड़ लें तो बहुत विवाद हुआ. आर एस एस वालों ने कहा कि उनका संगठन राजनीतिक पार्टी नहीं है  लेकिन मधु लिमये  ने बात को  बहुत आगे बढ़ा दिया और बात इतनी बढ़ गयी कि आर एस एस ने अपने लोगों को जनता पार्टी से अलग कर लिया और भारतीय जनता पार्टी का गठन कर दिया .शुरू में इस नई पार्टी ने उदारतावादी राजनीतिक सोच को अपनाने की कोशिश की . दीन दयाल उपाध्याय के एकात्म मानववाद और गांधीवादी समाजवाद जैसे राजनीतिक दर्शन को अपनी बुनियादी सोच का आधार बनाने की बात की गयी . लेकिन जब १९८४ के लोकसभा चुनाव में ५४२ सीटों वाली लोकसभा में बीजेपी को केवल दो सीटें मिलीं तो उदार राजनीतिक संगठन के रूप में राजनीति करने  का विचार हमेशा के लिए दफन कर दिया गया . जनवरी १९८५ में कलकत्ता में आर एस एस के टाप नेताओं की बैठक हुई जिसमें तत्कालीन बीजेपी के कर्ता धर्ता ,अटल बिहारी वाजपेयी और लाल कृष्ण आडवाणी को भी बुलाया गया और साफ़ बता दिया गया कि अब हिन्दू राष्ट्रवाद की राजनीति को चलाया जाएगा . वहीं तय कर लिया गया कि अयोध्या के बाबरी मस्जिद-रामजन्मभूमि विवाद को केंद्र में रख कर राजनीतिक मोबिलाइज़ेशन किया जाएगा . आर एस एस के दो संगठनों, विश्व हिन्दू परिषद् और बजरंग दल को इस प्रोजेक्ट को चलाने का जिम्मा दिया गया. अयोध्या के  पड़ोसी जिले गोरखपुर में स्थित गोरक्षनाथ पीठ के महंत अवैद्यनाथ ने अपने कारणों से इसमें शामिल होने का फैसला किया .उनका कारण भावनात्मक ज्यादा था क्योंकि उनके गुरु महंत  दिग्विजय नाथ ने ही १९४९ में अयोध्या में राम मंदिर के आन्दोलन की अगुवाई की थी  और बाबरी मस्जिद में रामलला की मूर्तियाँ रखवाई थी .  विश्व हिन्दू परिषद् की स्थापना १९६६ में हो चुकी थी लेकिन वह सक्रिय नहीं था. १९८५ के बाद उसे सक्रिय किया गया . बीजेपी की राजनीति में शुद्ध हिन्दू राष्ट्रवाद की राजनीति का युग आ गया . १९८५ से अब तक बीजेपी हिन्दू राष्ट्रवाद की राजनीति को ही अपना स्थायी भाव मानकर चल रही है . जब बीजेपी ने हिन्दू राष्ट्रवाद को अपने राजनीतिक दर्शन के रूप में प्रचारित करना शुरू कर दिया तो हिन्दू धर्म को मानने वाले बड़ी संख्या में उसके साथ जुड़ते  गए  . अयोध्या के भगवान राम के इर्द गिर्द ही  बीजेपी ने जनता को एकजुट करने का फैसला किया .  राजनीतिक विचारक माज़िनी के विचारों से बहुत ज्यादा प्रभावित वी डी सावरकर की किताब हिंदुत्व की विचारधारा पर काम करने वाले आर एस एस ने हिंदुत्व और श्री राम को अपनी राजनीति के केंद्र में रखने का जो फैसला लिया वह आज तक चला आ रहा है .इस रणनीति का बीजेपी को फ़ायदा भी खूब  हुआ . १९८४ में दो सीट लाने  वाली पार्टी ने  अयोध्या के आन्दोलन के बाद अपनी राजनीतिक ताकत बहुत बढ़ा ली है. कांग्रेस में दरबारी संस्कृति के चलते किसी भी विचारधारा  को चुनौती देने की स्थिति  रह ही नहीं गयी है . जब वी एच पी ने भगवान राम को केंद्र में रख कर राजनीतिक लामबंदी की राजनीति शुरू की तो राजीव गांधी उनके  चक्रव्यूह में फंस गए . उसी तरह से पी वी  नरसिम्हा राव ने भी राम की राजनीति का कोई विकल्प तलाशने की कोशिश नहीं की . वे बार बार कहते तो थे कि वे  बीजेपी से तो लड़ सकते थे लेकिन राम जी से लड़ना उनके बस की बात नहीं थी. लेकिन उन्होंने भी किसी राजनीतिक योजना पर काम नहीं किया .भगवान राम वास्तव में विष्णु के अवतार  हैं . इसलिए वैष्णव  परम्परा के धार्मिक  अनुष्ठानों में उनका बहुत ही अधिक महत्व है . लेकिन आर एस एस की कोशिश यह है कि उनको  हिन्दू  धर्म के सभी सम्प्रदायों का आराध्य देव सिद्ध कर दिया जाए . पिछले तीस  वर्षों से इसी पर  बीजेपी का राजनीतिक  फोकस बना रहा . बीजेपी एजेंडा तय करती रही और कांग्रेस उस पर प्रतिक्रिया देती रही . बीजेपी के अभियान का ही नतीजा है कि कांग्रेस को राम विरोधी और हिन्दू विरोधी पार्टी के रूप में प्रस्तुत करने में बीजेपी को सफलता मिली . जहां पूरे देश में भगवान  राम की मान्यता है वहीं    कांग्रेस के कुछ लोग राम की ऐतिहासिकता पर बहस करते रहे . यह बीजेपी के लिए बहुत ही सुविधा जनक स्थिति  रही .  कभी दिग्विजय सिंह   को तो कभी शुशील कुमार शिंदे को हिन्दू विरोधी साबित  करने  का काम चलता रहा . कांग्रेस के मुख्यालय में  बैठे नेता लोग आपस में ही  एक दूसरे की जड़ों में  मट्ठा डालते रहे . भगवान  राम को केंद्र में रखकर एकेश्वरवादी हिन्दू समाज स्थापित करके उसका इंचार्ज बनने की आर एस एस की योजना को तीस वर्षों में एक बार भी ललकारा नहीं गया . लेकिन अब हालात बदले हैं. ऐसा लगता  है  कि राहुल  गांधी को को बहुत ही सुलझा  हुआ सलाहकार मिल गया है .इसी राजनीतिक घटनाक्रम का  नतीजा है कि इस बार के  गुजरात के चुनाव में राहुल गांधी मंदिर मंदिर घूमते रहे . उनके मंदिर जाने की राजनीति को बीजेपी और उसके मातहत लोगों ने बहुत ही ज्यादा चर्चा में लाने की कोशिश की . पूरी दुनिया को बता दिया गया कि राहुल  गांधी ने कांग्रेस को सेकुलर राजनीति से अलग कर दिया है . मुसलमानों  की मस्जिदों  या दरगाहो में नहीं जा रहे  हैं . ऐसा लगता है कि राहुल गांधी की मंदिर यात्राओं में एक नया पैटर्न था . इंदिरा गांधी के बाद वे पहले कांग्रेसी बने जिन्होंने अपना एजेंडा फिक्स करने की  कोशिश की . वे राम को एक मोनोलिथिक  देवता के रूप में स्थापित करने की कोशिशों पर सवालिया निशान लगाने की कोशिश कर रहे थे और उसमें पूरी तरह सफल हुए .  कुछ वैष्णव  ठिकानों को छोड़ दिया जाए तो तो ज़्यादातर ऐसे  मंदिरों में गए जो शैव मतावालाम्बियों के हैं , या शक्ति के उपासकों के हैं . शक्ति के उपासक शैव परम्परा  के बहुत ही  करीबी होते हैं .  सोमनाथ मंदिर के अलावा वे करीब बीस मंदिरों में  गए जो गैर वैष्णव हैं .राहुल गांधी ने बाक़यदा प्रेस  के सामने घोषित किया कि वे शिव भक्त हिन्दू  हैं . ऐसा लगता  है कि वे  यह बताने की कोशिश कर रहे थे कि  भगवान राम के नाम पर पूरे देश के धार्मिक लोगों को एक ही जगह पर इकठ्ठा करने की कोशिश को सफल नहीं होने देंगें . दुनिया में बहुत से राजनीतिक धर्म हैं , जहां एक ही आराध्य होता है और उसी के नाम पर समाज की एकता की कोशिश की जाती है . मसलन इसाई मजहब में बहुत सारे वर्ग ज़रूर हैं लेकिन सब का केंद्र बाइबिल में वर्णित ईश्वर ही है . पोप का असर सभी ईसाईयों पर है . इस्लाम में भी ७२  सम्प्रदाय हैं लेकिन सबके आराध्य हज़रत मुहम्मद ही हैं  और कुरआन में ही अंतिम सत्य अंकित है . आर एस एस की कोशिश भी यही रही होगी कि भगवान   राम को सब हिन्दुओं का आराध्य बना दिया जाए और उसी के ज़रिये हिन्दू मात्र की एकता का प्रयास किया जाए . प्राचीन काल में भारत में शैवों, वैष्णवों , शाक्तों, आदि के बीच बहुत सारे संघर्षों की बातों का भी इतिहास में उल्लेख है . ऐसी स्थिति में सारे हिन्दुओं को एक ही  रंग में रंग देने का प्रोजेक्ट  मुश्किल तो बहुत है लेकिन उस दिशा में भगवान राम के सहारे सफलता मिलना शुरू  हो गयी थी. राहुल गांधी का शंकर जी के विभिन्न स्वरूपों के मंदिरों में फेरी लगाना   एक राजनीतिक उदेश्य था .और बीजेपी की राम केन्द्रित राजनीति को आइना दिखाना  भी उनका मकसद लगता है .राहुल गांधी अपने गुजरात चुनाव के अभियान के दौरान  पूरे गुजरात में वे ज्यादातर ऐसे ही मंदिरों में गए जो शैव  परंपरा के मंदिर थे .वीर मेघमाया मंदिर, बहुचारजी मंदिर, खोडि़यार मंदिर, शामलाजी मंदिर,आदि मंदिर राजनीतिक हिंदुत्‍व की योजना पर सीध हमला करते हैं .  सावरकरवादी हिंदुत्‍व सब कुछ भगवान राम या वैष्णव मत में घेर देने की कोशिश करता है .जबकि हिन्दू धर्म की विविधता ही  यही है कि वह बहुत से देवताओं को आराध्य मानता है . मेरे गाँव में नीम के पेड़ में विराजने वाली काली माई पूरे गाँव की श्रद्धा की देवी हैं  जहां  दलित भी जाते हैं और ब्राह्मण भी . यह आदिकाल से चला  आ रहा है .इसी तरह से देश भर में  गांव का आदमी राम के अलावा भी तमाम भगवानों को पूजता है। उसके लिए उसका मुकामी देवता ज्‍यादा पूजनीय  है। राहुल गांधी के इस अभियान का मर्म बीजेपी को अच्छी तरह से मालूम था . इसीलिए जय श्री राम का नारा लागाने वालों के अलावा भी शिवभक्ति के राहुल  गांधी के काम  को उनसे बड़ी लाइन खींच कर छोटा करने की   कोशिश की गयी . इसी सिलसिले में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को गुजरात चुनाव में मुख्य स्टार प्रचारक के रूप में  प्रस्तुत किया गया . योगी आदित्य नाथ शैव  परम्परा के सबसे प्रमुख मठों में से एक , गोरक्षनाथ मंदिर एवं मठ के महंत हैं . उनकी परम्परा में मत्स्येन्द्र नाथ, गोरख नाथ , जालंधर नाथ  इत्यादि महत्वपूर्ण संत हुए हैं . नाथ परमपरा की शुरुआत स्वयं शंकर जी से होती है , वे ही उनके आदि नाथ हैं . इतिहास में सबसे ज़्यादा नाम गुरु गोरखनाथ का है.  उन्होंने चालीस ग्रंथों की रचना की थी , सभी उपलब्ध नहीं हैं लेकिन १४ आज भी मिल जाते हैं . उन्होंने पूरे भारत का भ्रमण किया था और जगह जगह मठों की स्थापना की थी .गुजरात में भी  शैव मतावलम्बियों में  गोरखनाथ मंदिर  का बहुत सम्मान है . शायद यही कारण है कि सौराष्ट्र  ,जहां बीजेपी की हालत बहुत ही खराब थी , वहां भी बड़ी संख्या में सीटें उसके  हाथ आई हैं  सौराष्ट्र के सभी सभी जिलों की कमज़ोर सीटों पर योगी आदित्यनाथ ने प्रचार किया था ..योगी आदित्यनाथ चुनाव  प्रचार के लिए गुजरात के ३३ में से २९ जिलों में गए , ३५ चुनाव सभाएं कीं . जहां भी गए सरकारी तामझाम से दूर आश्रमों में ही  ठहरे . शायद इसीलिये जहाँ जहां गए उन सभी सीटों पर एकाध को छोड़कर बीजेपी की जीत हुयी . जहां राहुल गांधी और नरेंद्र मोदी का स्ट्राइक रेट ५० प्रतिशत बताया  जा रहा है , वहीं योगी आदित्यनाथ का स्ट्राइक रेट ९५ प्रतिशत रहा .देश की राजनीतिक को धार्मिक बनाकर एक ही देवता को केंद्र में रखने की आर एस एस की योजना पर गुजरात  चुनाव में राहुल गांधी और योगी आदित्यनाथ  का यह एहसान रहेगा  कि उन्होंने हिन्दू धार्मिकता को उसकी विविधता का पुराना मौलिक आयाम फिर से दिया . इसके बाद यह भी तय हो गया कि कांग्रेस भी हिन्दू विरोधी टैग से बाहर आ चुकी है और यह भी कि एक ही देवता के नाम पर पूर्ण राजनीतिक मोबिलाइज़ेशन संभव नहीं है . इसके अलावा  अब यह भी तय है कि आने वाले चुनावों में योगी आदित्यनाथ की महत्वपूर्ण भूमिका रहने वाली है .

नया साल मुबारक

कुछ तो शरारत का हक मुझे भी :-)
आसान कविता

यह कविता आसान कविता है
फूल को फूल और चिड़िया को चिड़िया कहती है
मोदी को मोदी और हिटलर को हिटलर कहती है
बात तुम तक ले जाती है
प्रगति-प्रयोग-छायावाद नहीं
यहाँ तक कि रेटोरिक भी नहीं है
गद्यात्मक है, पर पद्य है
आदर्श कविता है
दिमाग के तालों को खोलने की कोशिश इसमें नहीं है
पढ़कर कवि को दरकिनार करने वाले खेमेबाज लोग
इसे तात्कालिक नहीं कहेंगे
इस पर जल्द ही किसी मुहल्ले से कोई सम्मान घोषित होगा
बिल्कुल आसान है कविता
जैसे सुबह का नित्य-कर्म
इसे साँचा मानकर चल सकते हैं
इसके आधार पर छपने लायक कविताएँ लिख सकते हैं
गौर करें कि इसमें कोई हिन्दू या मुसलमान नहीं है
दलित आदिवासी स्त्री तो क्या पंजाबी बंगाली नहीं है


कुछ नहीं कहती सिर्फ इसके कि
बात आप तक ले जाती है
बात कोई बात है ही नहीं तो मैं क्या करूँ।          (बनास जन - 2017)

मुश्किल कविता

ज़ुबान मुश्किलबातां मुश्किलकविता हे कि क्या हे रे
हल्लू हल्लू असर डालते
हौला कर दिया रे
भगाओ इसको
अरे मुश्किल अपने ग़ालिब क्या थोड़ा थे
होनाइच हे तो वैसा होवो
ख़लिश बोले तो ख़लिश बोलो
मुश्किल नीं करने का रे
हल्लू हल्लू नईं आने का रे
साफ-साफ बोलो कविता का खटिया मत खड़ा करो रे
क्याऽऽ मतलब कि पोस्ट-लेंग्वेज़
अपुन को इंगलिश में एम ए नहीं करना रे
बाप रे, क्या कविता बोले रे
तुम एक आदमी रे कि बोत सारे रे
कोन मुलुक का तुम एक मुलुक का कि बोत सारे
जो हो वहींच रहने का ना रे
कायकू बदलता रहता हम पकड़ीच नहीं पाता रे
तुम पॉलिटिक्स बोले तो पॉलिटिक्स करो
इश्क करो तो इश्कइच करो
दोनों साथ साथ नहीं होने का रे
अपना बारे में बोलो तो दूसरे को मत लाना
लोगां का बोलना तो अपने को छिपाना
हमूँ किधर शुरु करते रे
समझते तो समझ नहींच आते
पकड़ते तो पकड़ नहींच पाते
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कुछ तो रास्ता बतलाना रे। 
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हम नहीं हटे, डर हटा पीछे कदम दो-चार

आज 'द लल्लनटॉप' में आ रही कविताएँ - 

#1) यह मुश्किल साल थाइतना चाहता हूं कि सामने दिखते दरख्त पर
चढ़ने की मुकम्मल तैयारी कर सकूं
मसलन आबिदा परवीन की गायकी छूट न जाए
तनाव के पल कैसे कटेंगे उसके बिना
कुछ जैज़ बाजा भी साथ हो कि डालों पर फुदकने का मन हो तो…यह मुश्किल साल था
अब जान चुका हूं कि आने वाला हर साल मुश्किल ही होगा
इसलिए बिरियानी का पैक साथ ले जाना है
भले सब्जियां खाने की उम्र हो गई है
पर मछली थोड़े ही छोड़ सकते हैं
बुर्ज़ुआ आदतें हैं
तो जिन और टॉनिक भी चाहिए;
दरख्त पर साथी और भी होंगे
सबने कुछ इंतज़ाम किया ही होगा
कि साथ-साथ सितारों को देखें
नीहारिकाएं और हर कहीं प्यार अनंत
कल्पना करें कि सितारों के आगे से धरती कैसी दिखती होगी
इस तरह भूल जाएं थोड़ी देर सही
बीते साल भर की मुश्किलेंबीच-बीच में उतरना तो पड़ेगा
अभी ज़मीं पर रंग खिलने बाक़ी हैं
हमारे बच्चे जो युवा हो रहे हैं
रंगों की तलाश में जुटे हैं
उनकी कविताएं सुननी हैं
कुछ उन्हें सुनानी हैंकोई साथी दरख्त से उतर रहा होगा
देखेंगे हम उसका उतरना
फिर सपनों में तैयारी करेंगे खुद उतरने की
इस तरह यह धरती यह कायनात बेहतर होती जाएगी पल दर पल
साल दर साल.# 2) धरती ने अभी अरबों साल जीना हैसड़क के ठीक बीचोबीच जंगली गिरगिट;
हरे से भरा था उसका बदन
हरी गर्दन उठाकर उसने मेरी ओर देखा था
और रंग नहीं बदला थागर्दन उठाए और नज़र में अनगिनत सवाल लिए
वह नवजात मानव-शिशु सा था
निहायत कमजोर और अपने होने में मशगूल
किसी भी पल तेज चलती गाड़ी के नीचे कुचला जा सकता था
उसे बचाने का कोई तरीका सोचना मुश्किल थालापरवाह अराजक गर्दन कुछ कह रही थी
कि चारों ओर तेजी से बदलते रंगों के इन दिनों में
वह एक नाकाम मुहावरा नहीं था
हारी हुई फौजों का आखिरी सिपाही बन सड़क संभाले हुए था
उसे देखकर मुतमइन होना लाज़िम था कि
यह साल जैसा भी रहा
बदलते रहें रंग और कुचले जाएं हम बार-बार
धरती ने अभी अरबों साल जीना है.# 3) खरबों बीते सालों सा यह साल भी बीत गयासर्दी गर्मी बारिश के साथ झूठ और नफ़रत के व्यापार की
साल भर सूचनाएं आती रहीं
पंछी सुबह-शाम बहस-मशविरा करते
कि ऐसे प्रदूषण में रास्ता कैसे देखें
कभी अलग-थलग तो कभी मिल-जुलकर तरीके सोचे गए
यह साल हारते रहने का साल ही था
झूठ का दायरा इतना बढ़ गया
कि धरती के दोनों छोरों पर धुंध घनी थी
हर कोई याद करने की कोशिश में था कि
ऐसी धुंध पहले कब देखी गई थी
हालांकि इकट्ठे पंख फड़फड़ाने से धुंध छंटती नज़र आती
धरती पर बहुत कुछ स्थाई तौर पर बदल चुका था
चुंबकीय ध्रुव इस कदर हिल-डुल रहे थे
कि सही दिशाओं की पहचान करना मुश्किल हो चला था
बहरहाल धरती अपनी धुरी पर है
मौसम बदलते हैं जैसे उनको बदलना है
खरबों बीते सालों सा यह साल भी बीत गया
कायनात का सीना और चौड़ा हुआ
इतना कि अनगिनत छप्पन इंच मिट जाएंगे उसमें.# 4) हम नहीं हटे, डर ही हटा पीछे कदम दो-चारइस साल भी आस्मान में कई बार इंद्रधनुष खिला
नई कथाएं लिखी गईं, गीत रचे गए
बच्चे-बूढ़े सब ने पंख पसार सतरंगी धनुष छुआ कई बारचिंताएं थीं, ऊंचाइयों से कौन नहीं डरता
पंख पिघल भी सकते थे इकारस की तरह
जो गिरे उनके लिए हम सबने आंसू बहाए
हवाओं में अलविदा कहकर चुंबन उछाले
और हाथों में हाथ रख सड़कों पर उतर आए
इस तरह हमने हराया डर को जो हमारे पंख कुतर रहा था
हमने उन सबकी ओर से इंद्रधनुष को और-और छुआ
जिनके पंख कुतरे गए थे;मुश्किल रहा साल पर डर को घूरा हमने पुरजोर
हम नहीं हटे, डर ही हटा पीछे कदम दो-चार.# 5) वह भी प्यार हैजो छूट गया
वह प्यार
जो रह गया है वह भी प्यार है
पिछली सरसों का पीला छूटा है
तो आ रहा है फिर से बसंत
आएंगे और गीत-संगीत
घर-घर से निकलेंगी
आज़ादी और बराबरी की आवाज़ें
धरती खारिज करेगी तानाशाह का घमंड
तूफानी हवाओं में धुनें गूंजेंगी प्यार की और-और.

लोकतांत्रिक राष्ट्र में भाषा की उपेक्षा ने रोकी प्रगति: विजय नारायण

अंग्रेजी हटाओ आंदोलन की स्वर्ण जयंती के अवसर पर प्रबुद्धजन ने निकला कूच मार्च
द सहारा न्यूज ब्यूरो,वाराणसी।
अंग्रेजी हटाओ आंदोलन की स्वर्ण जयंती के अवसर पर भारतीय भाषा को बचाने के लिए बीएचयू के सिंह द्वार से संकल्प कूच ‘‘अंग्रेजी हटाओ, भारतीय भाषा लाओ’ रत्नाकर पार्क पहुंची। इसमें सैकड़ों समाजवादी और प्रबुद्धजन शामिल थे। डा. राममनोहर लोहिया के अंग्रेजी हटाओ आंदोलन से प्रेरणा लेते हुए प्रबुद्धजन के साथ युवाओं का हुजूम भी संकल्प कूच में शामिल हुआ। वर्ष 1967 से 2017 के बीच एक लंबी अवधि के बाद अंग्रेजी हटाओ आंदोलन के बाद इसे दूसरे आंदोलन के रूप में देखा जा सकता है। रविवार को हाथों में नारों की तख्तियां देश मे भारतीय भाषाओं की दुर्गति बयां कर रही थीं। संकल्प कूच रत्नाकर पार्क पहुंच कर सभा में तब्दील हो गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे वरिष्ठ समाजवादी चिंतक विजय नारायन ने कहा कि इस ऐतिहासिक पार्क में 1967 के दौरान अंग्रेजी के खिलाफ बगावत वाराणसी में दिखी थी। समाजवादी नेता देवव्रत मजूमदार के नेतृत्व में हजारों युवा आंदोलनरत थे। आज विदेशी भाषा ने राष्ट्र की उन्नति का रास्ता रोक दिया है। सरकारें भी भारतीय भाषाओं के प्रति बहुत संवेदनशील नही रहीं। भारत जैसे लोकतांत्रिक राष्ट्र में भाषा की उपेक्षा ने यहां की प्रगति रोक दी। चौधरी राजेन्द्र ने कहा कि देश में ऐसी व्यवस्था आई है कि अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों ने शिक्षा का पूर्णत: बाजारीकरण कर रखा है। अंग्रेजी पढ़ाने के नाम पर मनमाना फीस वसूलना इनका ध्येय है। जिस वजह से शिक्षा की गुणवत्ता गिरती जा रही है। यहां तक कि भारतीय युवाओं को चिकित्सा और इंजीनियरिंग सहित सभी पाठ्यक्रम अंग्रेजी में होने से काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। निजी कंपनियां, सार्वजनिक क्षेत्र की संस्थाएं अंग्रेजी को अधिक महत्व दे रही हैं। इसकी वजह से भारतीय भाषाओं में पढ़े युवा अवसरों से वंचित हो रहे है, जिनकी अपनी भाषा पर मजबूत पकड़ है। इस मौके पर देवव्रत मजमूनदार सहित दिवंगत सभी लोगो को श्रद्धांजलि दी गई तथा आंदोलन को आगे गति देने एवं अंग्रेजी स्कूलों का विरोध करने की दिशा में रणनीति तथा आगामी 23 मार्च को लोहिया के जन्मदिन पर एक बड़ा कार्यक्रम निर्धारित किया गया। सभा में डा. गया सिंह, डा. बहादुर यादव, संजीव सिंह, डा. रामाज्ञा शशिधर, डा. विास श्रीवास्तव, डा. प्रभात महान, शिवेंद्र मौर्य, रविन्द्र प्रकाश भारती, विजेंद्र मीणा ने भी विचार व्यक्त किये। डा. महेश विक्रम, डा. स्वाति, डा. नीता चौबे, डा. मुनीजा खान, पूर्व राज्यमंत्री सुरेंद्र पटेल, कुवंर सुरेश सिंह, श्यामबाबू मौर्य, राजीव मौर्य, आशीष मौर्य, अमन यादव, विनय आदि मौजूद थे। अध्यक्षता विजय नारायन, जबकि संचालन अफलातून ने किया।


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अगर ग्रामीण भारत मोदी सरकार से रुठ गया तो 2019 में बंटाधार

गुजरात के जनादेश ने संघ की नींद उड़ा दी है


केसरिया रंग देश के राजनीतिक सत्ता की हकीकत हो चुकी है। 19 राज्य केसरिया रंग में रंगे जा चुके हैं। पर इसी केसरिया रंग की प्रयोगशाला गुजरात में सात जिले मोरबी , गिर , सोमनाथ , अमरेली , नर्मादा , तापी , डांग , अरवल्ली  में तो एक भी सीट बीजेपी को नहीं मिली । जबकि सुरेन्द्र नगर , पोरबंदर , जूनागढ , बोटाड , द्वारका , पाटण , महिसागर और छोटा उदयपुर में सिर्फ 8 सीटें ही जीत पायी। यानी गुजरात के 15 ग्रामीण जिले में बीजेपी को सिर्फ 8 सीट मीली। तो  क्या गुजरात एक ऐसा अक्स है, जिसमें बीजेपी का सियासी उफान संघ परिवार का सामाजिक ढलान हो चला है। ये सवाल  इसलिये क्योंकि ग्रामीण भारत में जड जमाये आरएसएस के ज्यादातर संगठनों को समझ नहीं आ रहा है कि उनकी संघ की उपयोगिता सरकार की चुनावी सफलता पर टिकी है या फिर खुद के कार्यों पर। और इसकी सबसे बडी वजह तो यही है कि  मोदी सरकार की नीतियों से संघ परिवार के पांच संगठनों में तालमेल नहीं है। मसलन -बीएमएस, किसान संघ, स्वदेशी जागरण मंच, विहिप और बजरंग दल खुद को ठगे महसूस कर रहे हैं। और ऐसा भी नहीं है कि इन संगठनों का अपना कोई आधार नहीं है। बीएमएस के देशभर में 1 करोड 12 लाख सदस्य हैं। किसान संघ के 18 लाख सदस्य हैं। स्वदेशी जागरण मंच के 5 हजार पदाधिकारी हैं। जिनका दावा है कि डेढ करोड़ लोगों पर सीधा प्रभाव है। वही आर्थिक नीतियों पर बंटते शहरी और ग्रामीण भारत से परेशान संघ के इन संगठनों से इतर हिन्दुत्व के नाम पर विहिप-बंजरग दल को लगता है कि उन्हें ठगा जा रहा है। और  विहिप-बजरंग दल के देशभर में 40 लाख सदस्य है । और संयोग से 24 से 30 दिसबंर तक भुवनेश्वर में होनी वाली विहिप की बैठक में इन्हीं मुद्दों पर चर्चा होगी। जिसमें संघ के तमाम महत्वपूर्ण पदाधिकारियों की मौजूदगी होगी  ।

और 2014 के बाद पहली बार गुजरात चुनाव ने संघ के भीतर ही इस सवाल को जन्म दे दिया है कि बीजेपी की कमजोर जीत के पीछे मोदी सरकार की आर्थिक नीतियो को देखें या संघ के आंख मूंद लेने को। और ये सवाल बीजेपी के लिये भी महत्वपूर्ण है कि अगर ग्रामीण गुजरात की तर्ज पर देश का ग्रामीण समाज  भी बीजेपी से बिफरा तो 2019 में होगा क्या। क्योंकि देश में 26 करोड 11 लाख ग्रामीण किसान - मजदूर हैं। और 2014 के लोकसभा चुनाव का सच यही है कि 83 करोड वोटरों में से 2014 में बीजेपी को कुल वोट 17,14,36,400 मिले। यानी देश अगर राजनीतिक तौर पर ग्रामीण और शहरी मतदाता में बंट गया तो फिर ये बीजेपी के लिये ही नहीं बल्कि संघ परिवार के लिये भी खतरे की घंटी होगी। क्योंकि संघ की साख बीजेपी की चुनावी जीत-हार पर नहीं टिकी है और ये बात 2004 में शाइनिंग इंडिया तले वाजपेयी की हार के बाद भी उभरा था। पर अगला सवाल तो यही है कि क्या ग्रामीण भारत की तरफ मोदी सरकार की नीतियां देख भी रही है। क्योंकि ग्रामीण भारत को सिर्फ किसानों के नजरिये सेदेखने की भूल कमोवेश हर सरकार ने किया है जबकि सच तो यही है कि देश की इक्नामी में ग्रमीण बारत का योगदान करीब 48 फिसदी है। नेशनल अकाउंट स्टेटिक्स ने इसी बरस जो आंकडे जारी किये उसके मुताबिक खेती [96 फिसदी], पशुधन [ 95 फिसदी ] , खनन [53 फिसदी ], उत्पादन [51 फिसदी ], निर्माण [47 फिसदी ], गोदाम [ 40 पिसदी], रियल इस्टेट-रोजगार [39 फिसदी ], बिजली-पानी-गैस [33 फिसदी ], व्यापार- होटल [28 फिसदी],प्रशासन-डिफेन्स [19 फिसदी ], वित्तीय सेवा [13 फिसदी ] । ये ग्रामीण भारत का ऐसा सच है जो अक्सर सिर्फ किसानों तक ही गांव को सीमित कर छुपा दिया जाता है । नेशनल अंकाउंट स्टेटिक्स ने इसी बरस ग्रामीम भारत के इन आंकडों को जारी किया जो साफ तौर पर बताता है कि देश की इक्नामी में ग्रामीण भारत का योगदान करीब 48 फिसदी है।

ग्रामीण भारत की लूट पर शहरी विकास का मॉडल जा टिका है जो बाजारवाद को बढावा दे रहा है और लगातार शहरी व ग्रामीण जीवन में अंतर बढ़ता ही जा रहा है। तो सवाल तीन हैं। पहला, सिर्फ किसानों की दुगनी आय के नारे से ग्रामीणों की गरीबी दूर नहीं होगी । दूसरा, ग्रामीण भारत को ध्यान में रखकर नीतियां नहीं बनायी गई तो देश और गरीब होगा । तीसरा , ग्रामीण भारत की लूट पर विकास की थ्योरी चल रही है । ये तीनो सवाल ही देश के हकीकत है । क्योंकि एक तरफ देश की इक्नामी में ग्रामीण भारत का योगदान 50 फिसदी है। दूसरी तरफ ग्रमीण भारत में प्रति व्यक्ति आय शहरी भारत से आधे से भी कम है । आलम है कितने बुरे ये इससे भी समझा जा सकता है कि शहर में प्रति दिन प्रति व्यक्ति आय 281 रुपये है। गांव में प्रति व्यक्ति प्रति आय 113 रुपये है। यानी गांव में प्रति व्यक्ति आय मनरेगा में मिलने वाली मजदूरी से भी कम है। कागजों पर ही सही पर मनरेगा में सबसे कम 168 रुपये मजदूरी बिहार-झारखंड में मिलती है। तो हरियाणा में सबसे ज्यादा 277 रुपये मिलते है। तो कल्पना कीजिये ग्रामीण भारत से फलती बढती इक्नामी से ग्रामीण भारत को ही कौन अनदेखा कर रहा है। पर सवाल सिर्फ कम आय का नहीं है बल्कि ग्रामीण भारत की लूट का है, जो बाजार के जरीये देश की इक्नामी में चाहे चार चांद लगाती हो पर असल सच तो यही है कि खनिज संसाधनों से लेकर अनाज और बाकि माद्यमों से ग्रामीण भारत की इके्नामी पर ही देश की आधी भागेदारी टिकी है। और उसी तरफ किसी का ध्यान नहीं है। फसल-ग्रमीण और शहरी सोशल इंडक्स में अंतर क्योंकि खुद सरकार की ही रिपोर्ट बताती है कि जबकि इन आंकडो का सच तो यही है कि कि देश की इक्नामी में ग्रामीण भारत का योगदान करीब 48 फिसदी है। तो क्या गरीब गुरबों और गांव-खेत का जिक्र करते करते ही मोदी सरकार इन्हीं के कटघरे में जा खड़ी हुई है। या फिर चुनावी जीत के चक्कर में खामोश संघ परिवार के भीतर की कुलबुलाहट पहली बार बताने लगी है कि अगर वह भी खामोश रही तो आरएसएस के शताब्दी बरस 2025 तक उसकी साख का बांटाधार हो जायेगा।

"हिन्दुओं की भावनाओं से खिलावाड़ करती रही है बीजेपी की राजनीति"

तोगड़िया की किताब-सैफरान रिफलेक्शन: फेसेस एंड मास्क

तो जिस शख्स की पहचान ही अयोध्या में राम मंदिर आंदोलन से जुड़ी हुई हो, जिस शख्स ने अयोध्या आंदोलन के लिये देशभर के युवाओं को संघ परिवार से जोड़ा, राम मंदिर के लिये बजरंग दल से लेकर विश्व हिन्दूपरिषद को एक राम मंदिर संघर्ष के आसरे नई पहचान दी, हिन्दुत्व के आसरे देश भर संघ परिवार को विस्तार दिया, उसी प्रवीण तोगडिया को अब लगने लगा है सियासत ने हिन्दुओं को राम मंदिर के नाम पर ठग लिया है। सत्ता में आने के लिये बीजेपी ने हिन्दुओं की भावनाओं से खिलवाड़ किया है। और पहली बार बाकायदा सैफरान रिफलेक्शन: फेसेस एंड मास्क यानी केसरिया प्रतिबिंब-चेहरे और  मुखौटे नाम से किताब लिखकर सीधे सीधे बीजेपी की उस राजनीति को कठघरे में खडा कर दिया है जिस राजनीति में राम मंदिर की गूंज बार बार होती है।

तोगडिया के अपनी किताब में 1990 में निकाली गई आडवाणी की रथयात्रा और 6 दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद विध्वस के बाद से बीजेपी की उस राजनीति की नब्ज को पकड़ा है, जिसके आसरे बीजेपी सत्ता पाने के लिये छटपटाते रही। और संघ परिवार बेबस होकर हर हालात को सिर्फ देखता रहा। तोगडिया ने किताब में लिखा है राजनीति ने हिन्दुओं के सामने राम मंदिर को किसी गाजर की तरह ये कहकर हिलाया है कि , "आज बनेगा, कल बनेगा , राम मंदिर अवश्य बनेगा" खासबात ये है कि 80 के दशक से नरेन्द्र मोदी के करीबी रहे प्रवीण तोगडिया ने पहली बार केन्द्र की मोदी सरकार पर इस किताब में ये कहकर हमला बोला है  कि सरकार ने राम मंदिर के लिये संसद में कानून बनाने की जगह हिन्दुओं की आकांक्षा से खेलना शुरु किया तो अयोध्या तक नहीं गये उन्होने राम मंदिर को हिन्दुओं का लॉलीपाप बना दिया और भावनाओं को उभार कर चुनाव जीत लिया।

1983 में सिर्फ 22 बरस की उम्र में विहिप से जुडे प्रवीण तोगडिया पेशे से डाक्टर हैं पर राम मंदिर आंदोलन में उनकी सक्रिय भूमिका देखते हुये ही दो दशक पहले उन्हे विहिप का महासचिव और 2011 में अशोक सिंघल के जीवित रहते हुये विहिप का अंताराट्रीय अध्यक्ष बनाया गया। और अब हिन्दुओं को हिन्दुत्व के नाम पर बीजेपी की राजनीति जिस तरह छल रही है, उस पर अपनी किताब में तोगडिया ने सीधा हमला किया है। इसमें लिखा है कि राम मंदिर , धारा 370, कामन सिविल कोड बांग्लादेशी घुसपैठियों को वापस भेजना, गोवंश हत्या बंदी, विस्थापित कश्मीरी हिन्दुओं को फिर से बसाने के सवाल पर भीघोखा दिया गया। चुनाव के वक्त इन मुद्दो को उठा कर हिन्दू यूफोरिया खड़ा किया  गया और सत्ता मिलते ही यू टर्न ले लिया गया।

खास बात ये भी है कि एक तरफ मोदी विकास का नारा लगाते है ।तो दूसरी तरफ तोगड़िया ने अपनी किताब में लिखा है कि

-हिन्दुओं के मुद्दो से टोटल यू टर्न का नाम ही है विकास।

और गुजरात चुनाव के वक्त किसानो की त्रासदी और युवाओ की बेरोजगारी का सवाल उठाने वाले तोगडिया ने अपनी किताब केसरिया प्रतिबिंब : चेहरें और मुखौटे में साफ लिखा है कि हिन्दू एक वाइब्रेंट ज़िंदा समाज मन है। हिन्दू साँस लेते हैं, उन्हें नौकरी चाहिए, अच्छी सस्ती शिक्षा चाहिए, किसानों को उचित मूल्य चाहिए, महिलाओं को सुरक्षा चाहिए, महंगाई पर नियंत्रण चाहिए , आरोग्य की सुविधाएँ चाहिए। पर राजनीति के जरीये सत्ता साधने वाले राजनेताओं ने हिन्दूत्व आंदोलन को ही चुनावी कठपुतली बना दिया है। जाहिर है ये किताब अभी तक बाजार में आई नहीं है और प्रवीण तोगडिया अपनी इस किताब को बाजार में लाने के लिये खुद को विहिप से निकाले जाने का इंतजार कर रहे है। क्योंकि माना जा रहा है भुवनेशवर में 27, 28,29 दिसंबर को होने वाले विहिप के सम्मेलन में तोगडिया को विहिप से बाहर का रास्ता दिखा दिया जायेगा। क्योंकि प्रधानमंत्री मोदी को भी लगने लगा है कि उनकी राजनीतिक आंकाक्षा से हिन्दुत्व का सवाल टकराने लगा है और प्रवीण तोगडिया अब उनकी सियासत में फिट बैठते नहीं है तो फिर आरएसएस भी मोदी के इशारे पर चलने को मजबूर हो चला है या फिर उनके सामने बेबस है। और इसी कड़ी में छह महीने पहले से किसान संघ और मजदूर संघ में उलटफेर शुरु भी हो चुके हैं। पर हर की नजर इसी बात को लेकर है कि प्रवीण तोगडिया जो सौराष्ट्र के पटेल है । किसान परिवार से आते हैं। हिन्दुत्व के चेहरे बने। अब किताब लिखने के बाद उनका अगला कदम होगा क्या। क्योंकि ये सवाल तो हर जहन में है कि एक वक्त गोविन्दाचार्य ने वाजपेयी को मुखौटा कहा। और एक वक्त संजय जोशी गुजरात में ही मोदी को सांगठनिक तौर पर चुनौती देते दिखे। तो दोनों के सितारे कैसे अस्त हुये इसे आज दोहराने की जरुरत नहीं है। बल्कि प्रवीण तोगडिया की किताब जो नये बरस के पहले हफ्ते में बाजार में आयेगी उसके बाद उनकी राह कौन सी होगी इसका इंतजार अब हर किसी को है।

मोदी के लिये तोगड़िया की छुट्टी होगी होसबोले नये सरकार्यवाहक होंगे ?

गुजरात हिमाचल में भगवा फहराने के बाद अभी कांग्रेस गुजरात की टक्कर में ही अपनी जीत मान रही है. पर दूसरी तरफ अप्रैल में होने वाले कर्नाटक के चुनाव को लेकर बीजेपी तैयारी शुरु कर दी है। और ना सिर्फ बीजेपी बल्कि पहली बार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भी इसकी तैयारी में जुट गया है। जानकारी के मुताबिक स्वदेशी जागरण मंच से बीजेपी में आये मुरलीधर राव को बकायदा कर्नाटक का मैनिफेस्टो तैयार करने के लिये अभी से ही लगा दिया गया है। और मार्च के महीने में कर्नाटक से आने वाले दत्तात्रेय होसबोले को भैयाजी जोशी की जगह सरकार्यवाहक बनाने की तैयारी होने लगी है। खास बात ये भी है कि आरएसएस में सरकार्यवाहक ही प्रशासनिक और सांगठनिक तरीके से नजर रखता है। तो संघ के अलग अलग संगठनों में भी फेरबदल की तैयारी हो रही है । जिसमें नजरिया दो ही पहला, संघ के शताब्दी वर्ष यानी 2025 तक पूरे देश में विस्तार। दूसरा , मोदी सरकार की नीतियो के अनुकूल संघ के तमाम संगठनों का काम और जानकारी के मुताबिक इसके लिये  विहिप और भारतीय मजदूर संघ में बदलाव भी तय है।  माना जा रहा है कि विहिप के कार्यकारी अंतराष्ट्रीय अध्यक्ष प्रवीण तोगडिया और बीएमएस के महासचिव ब्रजेश उपाध्याय की छुट्टी तय है । और इसके पीछे बडी वजह तोगड़िया का मंदिर मुद्दे पर मोदी सरकार की पहल को टोकनिज्म बताना तो बीएमएस का मोदी सरकार की आर्थिक नीतियों पर सवाल खड़ा करना है। तो संघ के अलग अलग संगठनों से कोई आवाज सरकार के खिलाफ ना उठे अब संघ भी इसके लिये कमर कस रहा है। और इसीलिये विहिप और बीएमएस के अलावे किसान संघ और स्वदेशी जागरण मंच के अधिकारियों में भी फेरबदल होगा। और ये सारी प्रक्रिया मार्च में होने वाली संघ की प्रतिनिधि सभा से पहले हो जायेगी क्योकि नागपुर में होने वाली प्रतिनिधि सभा में सरकार्यवाहक भैयाजी जोशी की जगह सह सरकार्यवाहक दत्तत्रेय होसबोंले लेगे । मार्च 2018 में भैयाजी का कार्यकाल पूरा हो रहा है। जो इस बार बढ़ेगा नहीं। वही दूसरी तरफ हर तीन बरस में होने वाले विहिप का सम्मलन 24 से 30 दिसबंर को भुवनेश्वर में होगा,  जिसमें नये लोगों को मौका देने के नाम पर प्रवीण तोगडिया समेत कई अधिकारी बदले जायेंगे।

जानकारी के मुताबिक संघ और मोदी सरकार दोनों नहीं चाहते है किसरकार की नीतियों को लेकर कोई सवाल संघ के किसी भी संगठन में उठे। तो मोदी सरकार के अनुकूल संघ भी खुद को मथने के लिये तैयार हो रहा है । और गुजरात चुनाव में जिस तरह संघ के तमाम संघठन खामोश रहे । उससे भी सवाल उठे है कि कर्नाटक के चुनाव के लिये खास तैयारी के साथ अब टारगेट 2019 को इस तरह बनाना है जिससे 2019 के चुनाव में जनता 2022 के कार्यो को पूरा करने के लिये वोट दें । और 2025 में संघ के शाताब्दी वर्ष तक संघ का विस्तार समूचे देश में हो जाये । यानी 2019 की तैयारी 2004 के शाइनिंग इंडिया के आधार पर कतई नहीं होगी । और 2022 से आगे 2025 यानी संघ के शताब्दी वर्ष तक मोदी सत्ता बरकरार रहे तो ही संघ का विस्तार पूरे देश में हो पायेगा । सोच यही है इसीलिये 2019 में ये कतई नहीं कहा जायेगा कि बीजे पांच बरस में मोदी ने क्या किया । बल्कि 2022 का टारगेट क्या क्याहै इसे ही जनता को बताया जायेगा । जिससे जनता 2014 में मांगे गये 60 महीने को याद ना करें । यानी 2019 में  जिक्र 60 महीने का नहीं बल्कि 2022 में पूरी होने वाले स्वच्छ भारत, वैकल्पिक उर्जा और प्रधानमंत्री आवास योजना समेत दर्जन भर योजनाओं का होगा । जिससे जनता खुद की मोदी सरकार को 2022 तक का वक्त ये सोच कर दे दें कि तमाम योजनाये तो 2022 में पूरी होगी । और बहुत ही बारिकी से न्यू इंडिया का नारा भी 2022 तक का रखा गया है । जिसमें टारगेट करप्शन फ्री इंडिया से लेकर कालेधन से मुक्ति के साथ साथ शांति , एकता और भाईचारा का नारा भी दिया गया है । जाहिर है 2019 से पहले के हर विधानसभा चुनाव को जीतना भी जरुरी है । इसीलिये सबसे पैनी नजर कांग्रेस की सत्ता वाली कर्नाटक पर है । इसीलिये बीजेपी महासचिव मुरलीधर राव को अभी से से सोच कर लगाया गया है कि कर्नाटक में हर विधानसभा सीट को लेकर मैनिफेस्टो तैयार किया जाये ।

बकायदा हर विधानसभा क्षेत्र के 500 से 1000 लोगों से बातचीत कर मैनिपेस्टो की तैयारी शुरु हुई है । और जिन लोगो से बातचीत होगी उसमें हर प्रोफेशन से जुडे लोगो को शामिल किया जा रहा है। वही दूसरी तरफ संघ का सहर संघठन मोदी सरकार की नीतियो के साथ खडे रहे इसके लिये अब संघ को जो मथने का काम नागपुर में होने वाली प्रतिनिधी सभा के साथ ही शुरु होगा उसमें आरएसएस में फेरबदल के साथ बीजेपी में भी फेरबदल होगा । मसलन ये माना जा रहा है कि विघार्थी परिषद को बीजेपी का नया भर्ती मंच बनाया जायेगा । और इसके लिये विघार्थी परिषद में भी पेरबदल हो सकता है । विघार्थी परिषद की कमान संभाल रहे सुनिल आंबेकर की जगह बीजेपी के राष्ट्रीय संगठन महासचिव रामलाल  को विघार्थी परिषद की कमान दी जायेगी । यानी बीजेपी ही नहीं संघ के भीतर भी ये सवाल है कि 2025 में मोदी की उम्र भी 75 की हो जायगी तो उसके बाद युवा नेतृत्व को बनाने के तरीके अभी से विकसित करने होंगे । पर यहां सबसे बड़ा सवाल यही है कि काग्रेस के नये अध्यक्ष राहुल गांधी के नेतृत्व में काग्रेस की रणनीति क्या होगी । क्योकि गुजरात से बाहर जितनी जल्दी काग्रेस निकले ये उसके लिये उतना ही बेहतर है । और मोदी अंदाज से जितनी जल्दी मुक्ति पाये उतना ही बेहतर है । क्योकि राहुल गांधी के सामने सबसे बडा संकट यही है कि मोदी विरोध का राहुल तरीका मोदी स्टाइल है । नीतियो के विरोध का तरीका जनता के गुस्से को मोदी के खिलाफ भुनाने का है । करप्शन विरोध का तरीका जनविरोधी ठहराने की जगह मोदी से जवाब मांगने का है । यानी राहुल की राजनीति के केन्द्र में नरेन्द्र मोदी ही है । और कांग्रेस की राजनीति के केन्द्र में राहुल राज है । तो फिर जनता कहा है और जनता के सवाल कहां है । इस सवाल का जवाब संसद परिसर में मीडिया कैमरे के सामने खडे होकर कहने से मिलेगा नहीं।

गुजरात जनादेश ने निगाहें मिलाने के हालात पैदा तो कर ही दिये

याद कीजिये 2015 में सड़क पर पाटीदार समाज था। 2017 में सड़क पर कपड़ा व्यापारी थे। इसी बरस सड़क पर दलित युवा थे। और सभी सड़क पर से ही गुजरात मॉडल की धज्जियां उड़ा रहे थे। तो अगस्त 2015 में हार्दिक रैली के बाद भी कांग्रेस जागी नहीं। 2017 में सूरत के कपड़ा व्यापारियों के इस हंगामे के बाद भी कांग्रेस नहीं जागी। कुंभकरण की नींद में सोयी कांग्रेस जब जागी।  राहुल गांधी ने गुजरात की जमीं पर कदम जब रखे। तो कंधे का सहारा उस तिकड़ी ने दिया जो कांग्रेस के नहीं थे। और कांग्रेस के लिये इन कंधों ने आक्सीजन का काम किया। और पहली बार 22 बरस की बीजेपी सत्ता को शह देने की स्थिति  में कांग्रेस को ला खड़ा किया। 2014 से लगातार गुजरात मॉडल से घबराती कांग्रेस में 2019 की आस जगा दी। और गुजरात के नक्शे पर बीजेपी की जीत का रथ 22 बरस में सबसे कमजोर होकर जीतता हुआ थमा और कांग्रेस 22 बरस के दौर में सबसे मजबूत होकर हारते हुये दिखायी दी। तो पहली बार सवाल यही उठा कि क्या 2019 अब नरेन्द्र मोदी के लिये आसान नहीं है। और 2019 में टक्कर आमने सामने की होगी।

तो पन्नों को पलटिये। याद कीजिये। 2014 में मोदी थे। उनका गुजरात मॉडल था। और गुजरात मॉडल के ब्रांड एंबेसेडर बने मोदी का जवाब भी किसी के पास नहीं था। और साढे तीन बरस के दौर यही मॉडल। इसी ब्रांड एम्बेसेडर ने हर किसी को खाक में मिलाया। जनता ने भी माना एकतरफा जीत जरुरी है। तो सिलसिला महाराष्ट्र, हरियाणा, झारखंड, जम्मू कश्मीर में बीजेपी की सरकार बनी। तो दिल्ली और बिहार में बीजेपी हारी पर जनादेश एकतरफा ही आया। उसके बाद असम ,पं बंगाल, उत्तराखंड, यूपी में भी जनादेश एकतरफा ही आया। और पंजाब में भी काग्रेस जीती तो फैसला एकतरफा था। इस फेहरिस्त में आज हिमाचल भी जुड़ा, पर जिस गुजरात मॉडल की गूंज 2014 में थी । वही मॉडल गुजरात में लड़खड़ाया तो कांग्रेस टक्कर देने की स्थिति में आ गई। और पहली बार गुजरात के चुनाव परिणाम ने कांग्रेस को ये एहसास कराया कि वह लड़े तो जीत सकती है। और बीजेपी को सिखाया जब गुजरात में कांग्रेस बिना तैयारी टक्कर दे सकती है। तो फिर 2019 की बिछती बिसात इतनी आसान भी नहीं होगी। क्योंकि गुजरात चुनाव परिणाम ने सोयी कांग्रेस को जगाया है तो फिर अगले बरस जिन चार प्रमुख राज्यो में चुनाव होने है उसमें कर्नाटक छोड़ दे तो राजस्थान, मद्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में बीजेपी की ही सरकार है।  यानी गुजरात के आगे और 2019 से पहले एक ऐसी बिसात है जो चाहे अनचाहे देश में राजनीतिक टकराव को एक ऐसी स्थिति में ला खड़ी कर रही है, जहां आमने  सामने नरेन्द्र मोदी और राहुल गांधी होंगे ही। और 2019 की ये बिसात साफ तौर पर अभी से तय भी करेगी कि कौन किसके साथ खड़ा होगा। यानी क्षत्रपों को अपने आस्तित्व के लिये मोदी या राहुल की छांव में आना ही होगा। और मौजूदा वक्त की बिसात साफ बतलाती है कि मोदी के साथ अगर नीतीश कुमार, प्रकाश सिंह बादल,चन्द्रबाबू नायडू, महबूबा मुफ्ती है और पासवान हैं।

तो दूसरी तरफ राहुल गांदी के साथ लालू अखिलेश, ममता, नवीन पटनायक, करुणानिधि पवार, फारुख अब्दुल्ला, औवैसी हैं। और शायद जो अपनी भूमिका 2019 में नये सिरे से तय करेंगे उसमें शिवसेना कहां खड़ी होगी, कोई नहीं जानता। पर वामपंथी और बीएसपी यानी मायावती को राहुल साथ लाना चाहेंगे। और तेलंगाना के  चन्द्रशेखर राव के किस दिशा में जायेंगे। इसका इंतजार भी करना होगा। पर ये बिसात दो सवालों को भी जन्म दे रही है । पहला एक वक्त कांग्रेस के खिलाफ  गठबंधन का चक्र पूरा हुआ और 2019 में बीजेपी के खिलाफ विपक्ष गठबंधन की  सियासत जागेगी। और दूसरा क्या धर्म जाति से इतर आर्थिक मसलों पर टिके मुद्दे जो गुजरात माडल की मुश्किलों से निकले हैं, वह 2019 में पालिटिकल  डिसकोर्स ही बदल देंगे। पर पालिटिकल डिसकोर्स मोदी ने बदला या कांग्रेस की राह पर मोदी निकले। ये भी सवाल है क्योकि मोदी और अमित शाह की जोड़ी तले जिस सियासी मंत्र को अपना रही है। अपना चुकी है उसमें कद्दावरों की नहीं कार्यकर्ताओं की जरुरत है। इसीलिये कभी बीजेपी के कद्दावर रहे नेताओं की कोई अहमियत या कोई पकड़ है नहीं। उम्र के लिहाज से हाशिये पर जा चुके आडवाणी, मुरली मनमोहर जोशी और यशवंत सिन्हा कोई मायने रखते नहीं तो 2014 से पहले राजनाथ सिंह, सुषमा स्वराज गडकरी रविशंकर प्रसाद या उमा भारती की जो भी महत्ता रही हो उनकी तुलना में एक अदद लोकसभा सीट ना जीत पाने वाले संभालने वाले जेटली मजबूत हैं। कैबिनेट पदों पर आसीन निर्मला सीतारमण, स्मृति इरानी, पियूष गोयल, धर्मेन्द्र प्रधान , प्रकाश जावडेकर एक नयी ब्रिग्रेड है। यानी इस कतार में राज्यो में भी आसीन बीजेपी  मुख्यमंत्रियों की जमीन को परखे तो हर की डोर दिल्ली के हाथ में है। मसलन महाराष्ट्र में फडनवीस। हरियाणा में खट्टर, झरखंड में रघुवर दास,  उत्तराकंड में त्रिवेन्द्र रावत और असम में सर्वानंद सोनोवाल, मणिपुर में  बिरेन सिंह और यूपी में योगी आदित्यनाथ ऐसे नेता हैं, जो झटके में सीएम बने। और इनकी पहचान दिल्ली से इतर होती नहीं है। इस कडी में सिर्फ  योगी आदित्यनाथ ही ऐसे है जो अपने औरा को जी रहे हैं और खुद को मध्यप्रदेश के शिवराज सिंह चौहाण, छत्तीसगढ के रमन सिंह, राजस्थान की वसुंधरा राजे और गोवा के पारिर्कर की तर्ज पर पहचान बना रहे हैं। यानी चाहे अनचाहे बीजेपी या कहे मोदी उसी राह पर चल पड़े हैं, जिस राह पर कभी कांग्रेस थी। क्योंकि अस्सी के दशक तक कांग्रेस के क्षत्रप का कद दिल्ली हाईकमान तय करता था .

और ध्यान दे तो बीजेपी भी उसी राह पर है। पर कांग्रेस से हटकर बीजेपी में सबसे बडा अंतर सत्ता के लिये चुनावी मशकक्त जो बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह करते है और उसमें ब्रांड एंबेसेडर की तरह पीएम मोदी खुद को झौंक देते हैं। उसका कोई जोड़ कांग्रेस के पास नहीं है। क्योंकि कांग्रेस जबतक तैयार होती है बीजेपी जमीनी बिसात बिछा चुकी होती है। कांग्रेस जबतक क्षत्रपों  पर निर्णय लेती है तबतक बीजेपी बूथ स्तर पर पहुंच चुकी होती है। यानी गुजरात की सीख क्या कांग्रेस की कुभकर्णी नींद तोड़ पायेगी । और अब वजब  राहुल गांधी काग्रेस के अध्यक्ष है तो क्या पारंपरिक राजनीति करने के लिये जाने जाने वाली कांग्रेस खुद को कितना बदल पायेगी। तो राहुल गांधी  कैसे संघर्ष करेंगे। राहुल गांधी गैर कांग्रेसियो के कंधे के आसरे पर टिकेंगे या फिर क्षत्रपो को भी खड़ा करेंगे। ये सवाल इसलिये जरुरी है  क्योकि गुजरात में बीजेपी को टक्कर देने की खुशी हो सकती हैा पर हिमाचल में हार से आंखे ऐसी मूंद ली गई है जैसे काग्रेस वहा चुनाव लड ही नहीं  रही थी । और अब जब  बीजेपी के तीन राज्य चुनाव के लिये तैयार हो रहे है तब काग्रेस के किस नेता को किस राज्य की कमान सौपी गई है, ये अब भी संस्पेंस ही है । मसलन राजस्थान में गहलोत क्या करेंगे । और सचिन पायलट की भूमिका होगी क्या । कोई नहीं जानता । छत्तीसगढ में जोगी के बाद काग्रेस की कमान किसके हाथ में है । जो निर्णय ले तो सभी माने कोई नहीं जानता । और मध्यप्रदेश में कई दिग्गज है । ज्योतिरादित्य सिंदिया । कमलनाथ या दिग्विजिय सिंह । कमान किसके हाथ में रहेगी इसपर से अभी तक पर्दा उठा ही नहीं है । तो कांग्रेस क्या राहुल के भरोसे रहेगी । या फिर संगठानत्मक रुपरेखा होती क्या है अब इसपर भी विचार करने का वक्त आ गया है । क्योकि गुजरात के जनादेश ने ये संदेश तो दे दिया कि मोदी का मॉडल अगर वोटर फेल भी मान लें तो फिर वह चुने किसे ।  मोदी के विक्लप का इंतजार मोदी के फेल होने के इंतजार में जा टिका है । राहुल का नेतृत्व चुनाव को भी किसी संत की तरह लेने-कहने से हिचक नहीं रहा है । तो क्या पहली बार राहुल गांधी की परीक्षा बीजेपी से टकराने से पहले कांग्रेस को ही मथने की है । क्या पहली बार राहुल गांधी को कांग्रेसियों में विपक्ष के तौर पर संघर्ष करने का माद्दा जगाना है। क्योंकि सच तो यही है कि पारंपरिक
कांग्रेसी भी कांग्रेस से छिटके हैं। पारंपरिक वोट बैक भी कांग्रेस से छिटका है। क्योंकि काग्रेस के पास देश के आंकाक्षा से जोड़ने के लिये ना कोई विजन है ना ही कोई इक्नामिक रास्ता। और युवा तबके की आकांक्षा जब किसी की सत्ता तले पूरी हो नहीं पा रही है तो फिर राहुल के सामने ये सवाल आयेगा कि कि मोदी को जनता खारिज कर भी दें तो भी राहुल को विकल्प क्यों माने। क्योंकि चुनावी लोकतंत्र का आखरी सच तो ये भी है कि देश में बेरोजगारी का सवाल। किसानों की त्रासदी का सवाल । बढते एनपीए का सवाल, बैकिंग रिफार्म से जनता के सामने संकट पैदा होने के सवाल सबकुछ चुनावी जीत तले दब गये।

शिक्षा किसलिए है? : डेविड ओर

लेखक मंच - Mon, 18/12/2017 - 02:07

आधुनिक शिक्षा की नींव के छह भ्रम, और उन्हें बदलने के लिए छह नए सिद्धांत

डेविड ओर

हम सीखने को अपने-आप में अच्छा मानने के आदी हैं। मगर जैसा पर्यावरण शिक्षक डेविड ओर बताते हैं, हमारी अब तक की शिक्षा ने एक तरह से एक दानव को पैदा किया है. यह निबंध उनके 1990 में अरकांसस कॉलेज के अंतिम वर्ष के विद्यार्थियों को दिए गए वक्तव्य में से लिया गया है। इसे पढ़कर हमारे ऑफिस में कई लोगों को लगा कि ऐसे भाषण कॉलेज जीवन की शुरूआत के बजाय आखिर में क्यों कराए जाते हैं।

डेविड ओर मीडोक्रीक प्रोजेक्टके संस्थापक हैं, जो फॉक्स, एरिज़ोना, में एक पर्यावरण शिक्षा केंद्र है, और वे ओहायो के ओबर्लिन कॉलेज में शिक्षक भी हैं। आर्क इंटरनेशनल के त्रैमासिक पत्र ऐनल्स ऑफ़ अर्थ, वॉल्यूम VIII, नं. 2 से पुनर्प्रकाशित-

अगर आज पृथ्वी का कोई औसत दिन है, तो आज हम 116 वर्ग मील वर्षावन खो देंगे, यानी लगभग एक एकड़ प्रति सेकंड। इंसानों के कुप्रबंधन और अत्यधिक जनसंख्या के कारण बढ़ते हुए रेगिस्तानों के सामने हम 72 वर्ग मील वन और खो देंगे। आज हम 40 से 100 प्रजातियां खो देंगे, और कोई नहीं जानता है कि यह संख्या 40 है या 100। आज इंसानों की आबादी में 2,50,000 लोग और जुड़ जाएंगे। और आज हम 2,700 टन क्लोरोफ्लोरोकार्बन और डेढ़ करोड़ टन कार्बन वायुमंडल में डाल देंगे। आज रात पृथ्वी थोड़ी और गर्म हो जाएगी, इसका पानी थोड़ा और अम्लीय हो जाएगा, और जीवन का ताना-बाना थोड़ा और उधड़ जाएगा।

सच तो यह है कि ऐसी अधिकांश चीजें गंभीर खतरे में हैं, जिन पर आपके भविष्य का स्वास्थ्य और सम्पन्नता टिके हैं- पर्यावरणीय स्थिरता, प्राकृतिक तंत्रों की सहनशीलता और उत्पादकता, प्राकृतिक जगत की सुन्दरता, और जैव विविधता।

ध्यान देने लायक बात यह है कि यह सब कुछ अनपढ़ अज्ञानी लोगों का करा-धरा नहीं है। यह अधिकांशतः BA, BS, LLB, MBA जैसी ऊंची डिग्रियों वाले लोगों की करतूतों का परिणाम है। पिछले साल मोस्को के ग्लोबल फोरम में एली वीसल ने ऐसा ही कुछ कहा था, जब उन्होंने कहा कि नाज़ी होलोकॉस्ट की क्रूरता के योजनाकार और कर्ता, इमैनुएल कांट और योहान गेटे जैसे लोगों की धरोहर के उत्तराधिकारी थे। कई मामलों में जर्मन लोग दुनिया के सबसे बेहतरीन शिक्षित लोगों में से थे, मगर उनकी शिक्षा उनकी बर्बरता को रोकने में नाकाम रही। उनकी शिक्षा के साथ क्या गड़बड़ हुई? वीसल के शब्दों में, उनकी शिक्षा में “मूल्यों के बजाय थ्योरी की ज्यादा अहमियत थी, मनुष्यों के बजाय अवधारणाओं की, प्रश्नों के बजाय उत्तरों की, और विवेक के बजाय विचारधारा और कार्यक्षमता की।”

हम कह सकते हैं कि प्राकृतिक जगत के बारे में हमारी शिक्षा ने हमें भी ऐसा ही सोचने का आदी बनाया है। यह कोई मामूली बात नहीं है कि इस ग्रह पर लम्बे समय तक सामंजस्य और स्थिरता से रहने वाले लोग पढ़ नहीं सकते थे, या कम-से-कम पढ़ने की हवस नहीं रखते थे। मेरा कहने का तात्पर्य इतना है कि शिक्षा अपने आप में सभ्यता, बुद्धिमता या विवेक नहीं देती है। इसी तरह की शिक्षा जारी रखने से हमारी समस्याएं बढ़ने वाली ही हैं। मैं अज्ञानता की वकालत नहीं कर रहा हूं, बल्कि यह कह रहा हूं कि अब हमें शिक्षा का मोल सभ्य समाज के निर्माण और मनुष्यों के बचे रहने के पैमानों पर नापना होगा- 1990 और इसके बाद के दशकों में हमारे सामने मौजूद ये दो सबसे बड़े मुद्दे हैं।

सही साधन, वहशी उद्देश्य

आधुनिक संस्कृति और शिक्षा के साथ क्या गड़बड़ हुई? साहित्य में कुछ उत्तर मिलता है-  क्रिस्टफर मार्लो का फॉस्ट, जो ज्ञान और शक्ति पाने के लिए अपनी आत्मा बेच देता है; मैरी शेली का डॉक्टर फ्रेंकेंस्टाइन, जो अपने सृजन की जिम्मेदारी लेने से इनकार कर देता है; हर्मन मेलविल का कैप्टेन अहाब जो कहता है- “मेरे सारे साधन सही हैं, मेरी मंशा और उद्देश्य वहशी हैं।” इन पात्रों में हम आधुनिक समाज की प्रकृति को जीत लेने की उन्मादी हवस दिखती है।

ऐतिहासिक रूप से, फ्रांसिस बेकन ने ज्ञान और शक्ति का जो समागम सुझाया था, वह आज की सरकारों, उद्योगों और ज्ञान की मिलीभगत का पूर्व-सूचक था जिसकी वजह से इतना विनाश हुआ है। गैलिलीयो का बुद्धिमता को ऊंचा स्थान दिलाना विश्लेषक दिमाग का रचनात्मकता, हास्य और आतंरिक पूर्णता पर हावी होने का पूर्व-सूचक था। और देकार्ते की ज्ञानमीमांसा में स्वयं और वस्तु के जबरदस्त अलगाव की जड़ें दिखती हैं। इन तीनों ने मिलकर आधुनिक शिक्षा की नींव रखी, ऐसी नींव जो उन भ्रमों का हिस्सा बन चुकी है जिन्हें हम बिना सवाल किए स्वीकार कर चुके हैं। मैं ऐसे छह भ्रम बताऊंगा।

पहला भ्रम यह है कि अज्ञानता की समस्या सुलझाई जा सकती है। अज्ञानता की समस्या सुलझाई नहीं जा सकती है, बल्कि यह मानवीय अस्तित्व का अभिन्न अंग है। ज्ञान की बढ़ोतरी अपने साथ हमेशा किसी दूसरे तरह की अज्ञानता भी बढ़ाती है। 1930 में जब टॉमस मिज्ले जूनियर ने CFC खोजे, तो अभी तक जो सिर्फ एक मामूली अज्ञानता थी, अब वह मनुष्य की जीवमंडल (biosphere) के बारे में समझ की एक बेहद गंभीर और घातक कमी के रूप में उभरी। 1970 की शुरूआत तक किसी ने भी यह नहीं सोचा था कि “यह पदार्थ किस चीज को कैसे प्रभावित करता है?” और 1990 तक CFC से वैश्विक स्तर पर ओजोन परत पतली हो चुकी थी। CFC की खोज की वजह से हमारा ज्ञान बढ़ा; मगर एक फैलते हुए वृत्त की परिधि की तरह हमारी अज्ञानता भी बढ़ी।

दूसरा भ्रम यह है कि पर्याप्त ज्ञान और टेक्नोलॉजी के साथ हम पृथ्वी का प्रबंधन कर सकते हैं। “पृथ्वी का प्रबंधन करना” सुनने में बहुत अच्छा लगता है। यह हमारे कंप्यूटर, बटनों और गैजेटों के प्रति आकर्षण को बढ़ाता है। मगर पृथ्वी और इसके जैविक तंत्रों की जटिलता का कभी भी सुरक्षित प्रबंधन नहीं किया जा सकता है। हमें तो अभी ऊपरी मिट्टी के सबसे ऊपरी इंच की पारिस्थिकी (ecology) के बारे में ही ज्यादा कुछ नहीं पता है, और ना ही इसका जीवमंडल के विशाल तंत्रों के साथ सम्बन्ध के बारे में।

अगर किसी चीज का प्रबंधन किया जा सकता है तो वह हम  हैं: मानवीय इच्छाएं, आर्थिकी, राजनीति, और समुदाय। मगर राजनीति, नैतिकता और व्यावहारिक बुद्धि जो कठिन विकल्प सुझाते हैं, हम उनसे आंखें चुराते रहते हैं। यह कहीं ज्यादा बुद्धिमता भरा है कि हम खुद को एक सीमित ग्रह के अनुरूप ढाल लें। बजाय कि इस ग्रह को अपनी असीमित इच्छाओं के अनुरूप बदलें।

तीसरा भ्रम यह है कि ज्ञान बढ़ रहा है और इसके साथ मानवीय अच्छाई भी बढ़ रही है। अभी एक सूचना क्रान्ति हो रही है, जिससे मेरा तात्पर्य है डाटा, शब्द, कागज़ से। मगर इस सूचना क्रान्ति को ज्ञान या विवेक की क्रान्ति मानना बेवकूफी होगा, जिसे इतनी आसानी से नापा नहीं जा सकता है। सच तो यह है कि कुछ प्रकार का ज्ञान बढ़ रहा है और दूसरे प्रकार का ज्ञान खो रहा है। डेविड एहरन्फील्ड ने बताया है कि जीव विज्ञान विभाग अब वर्गीकरण-विज्ञान (taxonomy) और पक्षी-विज्ञान में नए लोगों को नहीं ले रहा है। यानी मॉलिक्यूलर बायोलॉजी और जेनेटिक इंजीनियरिंग, जो आकर्षक हैं मगर ज्यादा जरूरी नहीं, उन पर अत्यधिक जोर के कारण दूसरे तरह का महत्वपूर्ण ज्ञान खो रहा है। हमारे पास अभी भी भूमि स्वास्थ्य सम्बन्धी जरूरी विज्ञान नहीं है, जिसका आह्वान अल्डो लियोपोल्ड ने आधी सदी पहले किया था।

हम केवल कुछ ही क्षेत्रों में ज्ञान नहीं खो रहे हैं, बल्कि समुदायों का पारंपरिक ज्ञान भी खो रहे हैं। बैरी लोपेज़ के शब्दों में:-

“मैं यह निष्कर्ष निकालने के लिए बाध्य हो रहा हूं कि अगर खतरनाक नहीं तो कुछ अजीब जरूर हो रहा है। साल-दर-साल जमीनी अनुभव रखने वाले लोगों की संख्या घट रही है। ग्रामीण लोग शहर पलायन कर रहे हैं… यह व्यक्त कर पाना मुश्किल है, पर व्यक्तिगत और स्थानीय ज्ञान के पतन के इस दौर में, वह ज्ञान जिस पर वास्तविक समुदाय टिका होता है और जिस पर आखिरकार एक देश को खड़ा होना होता है, बहुत खतरनाक और असहज होता जा रहा है।”

सूचना और ज्ञान की इस भ्रान्ति में एक गहरी भूल छुपी हुई है, जो यह है कि ज्यादा सीखने से हम बेहतर इंसान बन जाएंगे। मगर सीखना, जैसा लोरेन ईज़्ली ने एक बार कहा था, अंतहीन है और “यह अपने-आप हमें ज्यादा नैतिक इंसान नहीं बना पाएगा1” आखिर में, बाकी सभी क्षेत्रों में हमारे विकास के कारण सबसे ज्यादा खतरा अच्छाई की हमारी समझ को है। सभी चीजों को मद्देनजर रखते हुए यह संभव है कि हम लोग ऐसी चीजों के बारे में अज्ञानी होते जा रहे हैं जो पृथ्वी पर सामंजस्य और स्थिरता से जीने के लिए जरूरी हैं।

उच्च शिक्षा का चौथा भ्रम है कि हम जो कुछ भी बिगाड़ चुके हैं, उसे फिर से पर्याप्त रूप से बहाल किया जा सकता है। आधुनिक पाठ्यक्रम में हमने प्रकृति को अलग-अलग अकादमिक विशेषज्ञताओं के टुकड़ों में बांट दिया है। इसलिए 12, 16 या 20 साल की शिक्षा के बाद अधिकतर छात्र सभी चीजों की परस्पर एकता की मोटी-मोटी समझ बनाए बिना ही स्नातक हो जाते हैं। उनके व्यक्तित्व और इस ग्रह के लिए इसके बहुत भीषण परिणाम होते हैं। उदहारण के लिए, हम लगातार ऐसे अर्थशास्त्री पैदा करते हैं जिन्हें पारिस्थिकी की बुनियादी जानकारी भी नहीं होती है। इससे पता चलता है कि क्यों हमारे राष्ट्रीय आर्थिक लेखा-जोखा तंत्र में सकल राष्ट्रीय उत्पाद (gross national product- GNP) से जैविक क्षति, भू-क्षरण, वायु-जल प्रदूषण, और संसाधनों का दोहन घटाया नहीं जाता है। हम 25 किलोग्राम गेहूं की कीमत तो GNP में जोड़ते हैं, लेकिन उसको उगाने में जो 75 किलोग्राम मिट्टी की ऊपरी परत नष्ट हुई है, उसे घटाना भूल जाते हैं। ऐसी अपूर्ण शिक्षा के कारण हमें लगता है कि हम दिन-ब-दिन संपन्न होते जा रहे हैं।

पांचवा भ्रम यह है कि शिक्षा का उद्देश्य आपको समाज में अपनी हैसियत ऊपर उठाना और सफल होने के औजार देना है। टॉमस मर्टन ने कहा था कि यह “ऐसे लोगों का व्यापक उत्पादन है जो कुछ भी करने लायक नहीं है, सिवाय एक विस्तृत और पूर्ण रूप से कृत्रिम ढोंग में भाग लेने के।” जब मर्टन से उनकी सफलता के बारे में लिखने को कहा गया, तो उन्होंने उत्तर दिया, “अगर मैंने कभी कोई सुप्रसिद्ध पुस्तक लिखी तो यह एक दुर्घटना मात्र थी, मेरी लापरवाही और अबोधता के कारण, और मैं बहुत ध्यान रखूंगा कि ऐसी गलती दोबारा न हो।” छात्रों को उनकी सलाह थी, “तुम जो बनना चाहते हो बनो, पागल, शराबी, हर किस्म का लफंगा, मगर एक चीज से हर कीमत पर दूर रहना: सफलता।”

सीधी सी बात यह है कि इस ग्रह को ज्यादा ‘सफल’ लोग नहीं चाहिए. मगर इसे शांतिदूतों, जख्म भरने वालों, पुनर्वास करने वालों, कहानियां सुनाने वालों, और हर किस्म के आशिकों की जरूरत है। इसे जरूरत है ऐसे लोगों कि जो जहां भी रहते हैं, अच्छे से रहना जानते हैं। इसे नैतिक साहस वाले ऐसे लोगों की जरूरत है जो इस दुनिया को मानवीय और रहने लायक बनाने की लड़ाई में हिस्सा लेने को राजी हैं। और ये सारी चीजें उस सब से कोसों दूर हैं, जिसे हमारी संस्कृति ‘सफलता’ मानती है।

आखिर में, हमें भ्रम है कि हमारी संस्कृति मानवीय उपलब्धि का चरम बिंदु है:- केवल हम ही आधुनिक, तकनीक-विज्ञ, और विकसित हैं। जाहिर है कि यह सांस्कृतिक घमंड का सबसे घटिया स्वरूप है, और साथ ही इतिहास और मानव-शास्त्र की गलत समझ भी। हाल ही में इस घमंड ने नया रूप ले लिया है- ‘हमने शीत युद्ध जीत लिया है और पूंजीवाद ने साम्यवाद को पूर्ण रूप से हरा दिया है।’ साम्यवाद इसलिए असफल हुआ क्योंकि वह बहुत अधिक कीमत पर बहुत कम उत्पादन करता था। मगर पूंजीवाद भी असफल ही है, क्योंकि यह यह बहुत ज्यादा उत्पादन करता है, बहुत कम बांटता है, और हमारे बच्चों और पोते-पोतियों की पीढ़ियों से बहुत बड़ी कीमत वसूलता है। साम्यवाद इसलिए असफल हुआ क्योंकि इसमें अभाव की नैतिकता थी। पूंजीवाद इसलिए असफल हुआ क्योंकि यह नैतिकता को ही समाप्त कर देता है। यह वह हसीन दुनिया नहीं है जो गैर-जिम्मेदार विज्ञापन निर्माता या राजनेता हमें दिखाते हैं। हमने एक ऐसी दुनिया बनाई है जहां मुट्ठी भर लोगों के पास अकूत संपत्ति है और बढ़ती हुई गरीब आबादी के पास भीषण विपन्नता है1 अपने सबसे वीभत्स रूप में यह दुनिया गलियों में पसरे नशे, अतृप्त हिंसा, अनैतिकता और सबसे विकराल तरह की गरीबी से भरी हुई है। सच तो यह है कि हम एक बिखरती हुई संस्कृति में जी रहे हैं. ‘होलिस्टिक रिव्यु’ के संपादक रॉन मिलर के शब्दों में:-

“हमारी संस्कृति मनुष्यों की अच्छाई और उत्कृष्टता का पोषण नहीं करती है। यह दूरदर्शिता, कल्पनाशीलता, सौन्दर्यबोध या आध्यात्मिक संवेदना विकसित नहीं करती है। यह कोमलता, उदारता, दूसरों का ख्याल रखना और करुणा प्रोत्साहित नहीं करती है। बीसवीं सदी का अंत आते-आते आर्थिक-तकनीकी-सांख्यिकीवादी नजरिया बड़ी क्रूरता से इंसानों में वह सब कुछ नष्ट कर रहा है जो प्रेमपूर्ण और जीवनदायी है।”

शिक्षा किसलिए होनी चाहिए

इंसानी जीवन संजोए रखने के उद्देश्य से, हम शिक्षा पर पुनर्विचार कैसे कर सकते हैं? मैं छह सिद्धांत सुझा रहा हूं-

पहला, सारी शिक्षा पार्यावरण शिक्षा है। हम शिक्षा में क्या शामिल करते हैं और क्या नहीं, इससे हम छात्रों को यह सिखाते हैं कि वे प्राकृतिक जगत हिस्सा हैं या उससे अलग. उदहारण के लिए, ऊष्मागतिकी (thermodynamics) या पारिस्थिकी के नियमों को सिखाए बिना अर्थशास्त्र पढ़ाने से छात्रों को एक महत्वपूर्ण बुनियादी सीख मिलती है:- कि भौतिकी और पारिस्थिकी का अर्थव्यवस्था से कोई लेना-देना नहीं है। यह साफ़ तौर पर गलत है।1 यही बात पाठ्यक्रम के अन्य विषयों पर भी लागू होती है। दूसरा सिद्धांत ग्रीक अवधारणा पाइडेआ (paideia) से आता है। शिक्षा का उद्देश्य विषय-वस्तु पर नहीं, बल्कि स्वयं पर महारथ पाना है। विषय-सामग्री तो साधन मात्र है। जिस तरह हथौड़ी और छेनी से कोई व्यक्ति पत्थर या लकड़ी को आकार देता है, उसी तरह विचारों और ज्ञान को हम अपना चरित्र ढालने के लिए इस्तेमाल करते हैं। ज्यादातर समय हम साधन और साध्य में भ्रमित रहते हैं, और यह सोचते हैं कि शिक्षा का उद्देश्य सिर्फ छात्र के मस्तिष्क में हर तरह के तथ्य, सूचना, पद्धतियां, तरीके ठूंसना है, भले ही इनका इस्तेमाल किसी भी उद्देश्य के लिए किया जाए। ग्रीक इस बारे में बेहतर समझ रखते थे।

तीसरा, ज्ञान अपने साथ यह जिम्मेदारी भी लेकर चलता है कि संसार में उसका उपयोग भले उद्देश्यों के लिए किया जाएा आज किए जाने वाले अधिकांश शोध मैरी शेली के उपन्यास जैसे हैं: तकनीक-जनित दानव जिनके लिए कोई जिम्मेदारी नहीं लेता है और न किसी से जिम्मेदारी लेने की उम्मीद की जाती है। लव कैनाल किसकी जिम्मेदारी है? चर्नोबिल? ओजोन का क्षरण? वैल्डेज़ तेल रिसाव? इनमें से हर त्रासदी इसलिए संभव हुई क्योंकि ऐसे ज्ञान का सृजन किया गया था जिसके लिए आखिरकार कोई भी जिम्मेदार नहीं था। अंततः इन्हें ‘बड़े पैमाने के उत्पादन से उपजी स्वाभाविक समस्या’ की नज़रों से देखा जाएगा। बेहद विशाल और जोखिम भरी परियोजनाओं को करने का ज्ञान हमारा उन्हें जिम्मेदारी से क्रियान्वित करने की क्षमता को पछाड़ चुका है। इसमें कुछ ज्ञान तो ऐसा है जो जिम्मेदारी से इस्तेमाल किया ही नहीं जा सकता है, यानी उसे सुरक्षित तरीके से और निरंतर भले उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है।

चौथा, हम तब तक यह नहीं कह सकते हैं कि हम कुछ समझते हैंजब तक हम उसका वास्तविक इंसानों और और उनके समुदायों पर पड़ने वाले प्रभावों को नहीं समझते हैं। मैं ओहायो के यंग्सटाउन शहर के नज़दीक बड़ा हुआ, जिसे मुख्य रूप से उद्योगों द्वारा उस क्षेत्र की अर्थव्यवस्था में निवेश न करने के निर्णय ने तबाह कर दिया। खरीद-बिक्री, कर छूट, पूंजी संचलन के दांव-पेंच में पारंगत MBA पढ़े लोगों ने वह कर दिखाया जो कोई आक्रमणकारी सेना भी नहीं कर सकती थी:- उन्होंने अपने मुनाफे की ‘बॉटम लाइन’ के खातिर एक अमरीकी शहर को पूरी कानूनी छूट के साथ तबाह कर दिया। मगर एक समुदाय को इस बॉटम लाइन की दूसरी कीमतें चुकानी पड़ती हैं, बेरोज़गारी, अपराध, बढ़ते तलाक, नशाखोरी, बाल उत्पीड़न, गवांई हुई बचत, और बर्बाद जिंदगियां। इस वाकिये में हम देख सकते हैं कि प्रबंधन कॉलेजों और अर्थशास्त्र विभागों ने इन छात्रों को जो सिखाया, उसमें अच्छे मानव समुदायों का मूल्य पहचानना शामिल नहीं था, और न ही कार्यक्षमता और अमूर्त आर्थिक अवधारणाओं को इंसानों और समुदायों से ज्यादा अहमियत देने वाली संकीर्ण आर्थिक नीति से उपजने वाली मानवीय त्रासदी की कीमत पहचानना।

मेरा पांचवा सिद्धांत विलियम ब्लेक से प्रेरित है। यह है बारीकियों पर ध्यान देना और शब्दों के बजाय कर्म से उदहारण पेश करना। छात्रों को वैश्विक जिम्मेदारी के पाठ पढ़ाए जाते हैं, जबकि उनके संस्थान खुद बहुत गैर जिम्मेदाराना चीजों में निवेश करते हैं। जाहिर है कि वास्तविकता में इससे छात्रों को पाखण्ड और अंततः निराशा का पाठ पढ़ाया जाता है। बिना किसी के बताए छात्र यह जान जाते हैं कि वे आदर्शों और यथार्थ के बीच की गहरी खाई पाट पाने में असहाय हैं। ऐसे शिक्षकों और प्रबंधकों की बेहद जरूरत है जो सत्यनिष्ठा, विवेक व संरक्षण का आदर्श प्रस्तुत करें और ऐसी संस्थानों की भी जो अपने हर कार्य में इन आदर्शों को जीएं।

आखिर में, सीखने की प्रक्रिया भी उतनी ही महत्वपूर्ण है जितनी विषय-वस्तु. सीखने की प्रक्रिया बहुत मायने रखती है। व्याख्यान की शैली में पढ़ाए गए विषयों से निष्क्रियता पैदा होती है। बंद कमरों में पढ़ते रहने से यह भ्रम पैदा होता है कि सीखना केवल चहारदीवारी के अन्दर होता है, उस संसार से कटकर जिसे हास्यास्पद तरीके से छात्र “वास्तविक दुनिया” कहते हैं। मेंढक का डाइसेक्शन करने से छात्र वह सीखता है जो कितने भी शब्द कहकर नहीं सिखाया जा सकता है। संस्थानों की बनावट भी अक्सर निष्क्रियता, संवाद-शून्यता, दमन और कृत्रिमता का भाव उपजती है। मेरा तात्पर्य है कि छात्र विषय-वस्तु के अलावा भी कई सारी चीजों से सीखते हैं।

आपके संस्थान के लिए एक असाइनमेंट

अगर शिक्षा को सामंजस्य और स्थिरता के पैमानों पर नापा जाए, तो क्या किया जा सकता है? सबसे पहले मैं यह प्रस्ताव रखना चाहूंगा कि आप परिसर-स्तर पर एक संवाद शुरू करें कि आप शिक्षक के रूप में अपना काम किस तरह से कर रहे हैं। क्या आपके संस्थान में चार साल बिताने के बाद आपके छात्र बेहतर वैश्विक नागरिक बन रहे हैं या वे, वेन्डेल बेरी के शब्दों में, “पेशेवर घुमंतू गुंडे” बन रहे हैं? क्या यह कॉलेज एक स्थिर क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था विकसित करने में योगदान दे रहा है, या कार्यक्षमता बढ़ाने के नाम पर विनाश के चक्र बढ़ा रहा है?

मेरा दूसरा प्रस्ताव है कि आप इस परिसर में संसाधनों के प्रवाह का निरीक्षण कीजिए:- भोजन, ऊर्जा, पानी, सामान, और कचरा। शिक्षक और छात्र साथ-साथ उन कुंओं, खदानों, खेतों, गोदामों, पशुबाड़ों, और जंगलों का अध्ययन करें जहां से परिसर में सामान आता है और उन जगहों का भी जहां यहां से कचरा भेजा जाता है। सामूहिक रूप से प्रयास कीजिए कि इस संस्थान की खरीद कैसे उन विकल्पों से की जाए जो पर्यावरण को कम नुकसान पहुंचाते हैं, कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन कम करते हैं, जहरीले पदार्थों का कम उपयोग करते हैं, ऊर्जा का बेहतर इस्तेमाल करते हैं व सौर ऊर्जा उपयोग में लाते हैं, स्थिर क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था विकसित करने में योगदान देते हैं, दीर्घकालीन लागत कम करते हैं, और दूसरे संस्थानों के लिए उदाहरण पेश करते हैं। फिर इन अध्ययनों की खोजों को पाठ्यक्रम में अलग-अलग विषयों, सेमिनारों, व्याख्यानों, और शोधों में शामिल करें। कोई भी छात्र यहां से न निकले जिसे संसाधनों के प्रवाह का विश्लेषण करना न आता हो और जिसने वास्तविक समस्याओं के वास्तविक समाधान खोजने में हिस्सा न लिया हो।

तीसरा, पुनर्विश्लेषण करें कि आपका संस्थान अपना पैसा कहां लगा रहा है। क्या आपका निवेश वैल्डेज़ के सिद्धांतों के अनुसार हो रहा है? क्या यह उन कंपनियों में लग रहा है जो ऐसे काम कर रही हैं जिनकी दुनिया को वाकई जरूरत है? क्या इसका कुछ हिस्सा स्थानीय तौर पर निवेश किया जा सकता है ताकि इस पूरे क्षेत्र में ऊर्जा का बेहतर इस्तेमाल और स्थिर अर्थव्यवस्था विकसित हो सके?

आखिर में, मैं सलाह दूंगा कि आप अपने सभी छात्रों के लिए पर्यावरण साक्षरता के लक्ष्य निर्धारित करें। इस या किसी भी अन्य संस्थान से एक भी छात्र ऐसा नहीं निकलना चाहिए जिसे इन चीजों की बुनियादी समझ न हो-

  • ऊष्मागतिकी के नियम
  • पारिस्थिकी के बुनियादी नियम
  • किसी तंत्र की वहनक्षमता (carrying capacity)
  • भौतिक, रासायनिक और जैविक तंत्रों के ऊर्जा सम्बन्ध और परिवर्तन (energetics)
  • न्यूनतम लागत और अंतिम-उपयोग (end–use) विश्लेषण
  • किसी स्थान में अच्छे से रहना
  • टेक्नोलॉजी की सीमाएं
  • उचित स्तर पर उत्पादन और विस्तार (appropriate scale)
  • सामंजस्यपूर्ण कृषि और वानिकी
  • स्थिर-स्तर अर्थशास्त्र (steady-state economics), जिसमें उत्पादन के हर कदम पर ऊर्जा और सामान के न्यूनतम उपयोग के जरिए संसाधनों और जनसख्या को एक स्थिर स्तर पर सीमित रखा जाता है
  • पर्यावरण सम्बन्धी नैतिकता

क्या इस संस्थान के स्नातक यह समझते हैं, जैसा अल्डो लियोपोल्ड ने कहा था, कि “वे एक विशाल पारिस्थिकी तंत्र का छोटा सा हिस्सा भर हैं; अगर वे इस तंत्र के साथ काम करेंगे तो वे अपनी मानसिक और भौतिक सम्पदा में असीमित बढ़ोतरी कर पाएंगे, और अगर वे इसके खिलाफ जाएंगे तो यह तंत्र उन्हें कुचल डालेगा”?

लियोपोल्ड ने पूछा था, “अगर शिक्षा हमें ये चीजें नहीं सिखाती, तो फिर शिक्षा किसलिए है?”

अनुवाद- आशुतोष भाकुनी

सोनिया गांधी ने कांग्रेस को दलदल से निकाला था , देखें राहुल क्या करते हैं .

जंतर-मंतर - Sun, 17/12/2017 - 07:14


शेष नारायण सिंह
राहुल गांधी को कांग्रेस अध्यक्ष पद की कुर्सी औपचारिक रूप से सम्भलवाकर सोनिया गांधी ने राजनीति से वानप्रस्थ की घोषणा की . वे कांग्रेस की राजनीति के शीर्ष तक पंहुची . इसके पीछे कारण यह था कि वे इंदिरा गांधी के बड़े बेटे की पत्नी थीं . सोनिया गांधी जब कांग्रेस की अध्यक्ष बनीं और जिस तरह से बनीं ,वह कांग्रेस पार्टी के चापलूसी की परम्परा का एक प्रतिनिधि नमूना  है . संसद भवन के दो-तीन किलोमीटर के दायरे में देश के सर्वोच्च चापलूस हमेशा से ही विराजते रहे हैं . सत्ता चाहे जिसकी हो ये लोग उसके करीबी आटोमेटिक रूट से हो जाते हैं . सोनिया गांधी को भी इन्हीं चापलूसों ने ही कांग्रेस अध्यक्ष पद पर आसीन किया था . लेकिन जिस तरह से उन्होंने खंड खंड होती कांग्रेस को फिर से केंद्रीय सत्ता के केंद्र में स्थापित करने का माहौल बनाया उससे लग गया कि वे संगठन के फन की माहिर हैं . सत्ता से पैदल कांग्रेस को अटल बिहारी वाजपेयी को हराने वाली पार्टी बना कर उन्होंने साबित कर दिया कि वे एक सक्षम नेता हैं . उन्होंने देश के गवर्नेंस माडल में बहुत सारे बदलाव किये . सूचना का अधिकार एक ऐसा हथियार है जो देश की ज़िम्मेदार राजनीति में हमेशा सम्मान से याद किया जाएगा . गड़बड़ तब शुरू हुई जब राहुल गांधी ने अपनी तरह के लोगों को कांग्रेस के केंद्र में घुसाना शुरू कर दिया .नतीजा यह हुआ कि तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह की अथारिटी धूमिल होना शुरू हो गयी . और कांग्रेस फिर पतन के रास्ते पर चल पड़ी . राहुल गांधी उस दौर में सी पी जोशी और मधुसूदन मिस्त्री नाम के लोगों पर बहुत ज़्यादा भरोसा करने लगे . सी पी  जोशी की एक उपलब्धि यह है कि वे विधान सभा का चुनाव एक  वोट से हारे थे और मधुसूदन मिस्त्री की सबसे बड़ी उपलब्धी यह है कि वे वडोदरा से कांग्रेस उम्मीदवार के रूप में अपने विरोधी उम्मीदवार नरेंद्र मोदी का पोस्टर फाड़ने बिजली के खम्बे पर चढ़े थे . राहुल की अगुवाई में यह उत्तर प्रदेश की राजनीति के इंतज़ाम के कर्ता  धर्ता बनाये गए थे . राहुल गांधी ने कांग्रेस को .ऐसे लोगों के हवाले कर दिया जिनकी राजनीति में समझ न के बराबर थी . नतीजा सामने है. कांग्रेस उत्तर प्रदेश में शून्य के आस पास पंहुच चुकी है .
अब राहुल गांधी कांग्रेस अध्यक्ष हैं .नई दिल्ली की राजनीति के बारे में रिपोर्ट करने वालों को मालूम है कि किस तरह से राहुल गांधी २०११ के बाद सोनिया गांधी के ज़्यादातर फैसलों को पलट दिया करते थे. नई दिल्ली के प्रेस क्लब में एक अध्यादेश के कागजों को फाड़ते हुए राहुल गांधी को जिन लोगों ने देखा है उनको मालूम है कि यू पी ए -२ के समय राहुल गांधी मनमानी पर आमादा रहते थे . प्रियंका गांधी को २०१४ में प्रचार करने से रोकने के पीछे भी यही उनकी अपनी असुरक्षा काम कर रही थी . उनको यह मुगालता भी रहता था की सभी कांग्रेसी उनके  दास हैं .लेकिन अब तस्वीर बदल चुकी है . गुजरात चुनाव के दौरान  उन्होंने सभ्य आचरण  किया था और अब दुनिया जानती है कि राहुल  गांधी बदल गए हैं .
उन लोगों की बात से  भी सहमत नहीं हुआ जा सकता  जो कहते रहते हैं कि कांग्रेस की राजनीति में वंशवाद की शुरुआत जवाहरलाल  नेहरू ने की थी . उन्होंने तो इंदिरा गांधी को कभी चुनाव तक नहीं लड़ने दिया था . नई दिल्ली में विराजने वाले चापलूसों ने ही उनको शास्त्रीजी के मंत्रिमंडल में शामिल करवा दिया था . इंदिरा गाधी को  संसद की राज्यसभा का सदस्य बनने का मौक़ा भी शास्त्री जी   ने दिया , नेहरू ने नहीं . हाँ इंदिरा गांधी ने बाकायदा वंशवाद की  स्थापना की . कांग्रेस की मूल मान्यताओं को इंदिरा गांधी ने ही धीरे धीरे दफ़न किया .इमरजेंसी में तानाशाही निजाम कायम करके इंदिरा गाँधी ने अपने एक बेरोजगार बेटे को सत्ता थमाने की कोशिश की थी . वह लड़का भी क्या था. दिल्ली में कुछ लफंगा टाइप लोगों से उसने दोस्ती कर रखी थी और इंदिरा गाँधी के शासन काल के में वह पूरी तरह से मनमानी कर रहा था . इमरजेंसी लागू होने के बाद तो वह और भी बेकाबू हो गया . कुछ चापलूस टाइप नेताओं और अफसरों को काबू में करके उसने पूरे देश में मनमानी का राज कायम कर रखा था. इमरजेंसी लगने के पहले तक आमतौर पर माना जाता था कि कांग्रेस पार्टी मुसलमानों और दलितों की भलाई के लिए काम करती थी .हालांकि यह सच्चाई नहीं थी क्योंकि इन वर्गों को बेवक़ूफ़ बनाकर सत्ता में बने रहने का यह एक बहाना मात्र था . इमरजेंसी में दलितों और मुसलमानों के प्रति कांग्रेस का असली रुख सामने आ गया . दोनों ही वर्गों पर खूब अत्याचार हुए . देहरादून के दून स्कूल में कुछ साल बिता चुके इंदिरा गाँधी के उसी बिगडैल बेटे ने पुराने राजा महराजाओं के बेटों को कांग्रेस की मुख्य धारा में ला दिया था जिसकी वजह से कांग्रेस का पुराना स्वरुप पूरी तरह से बदल दिया गया था . अब कांग्रेस ऐलानियाँ सामंतों और उच्च वर्गों की पार्टी बन चुकी थी. ऐसी हालत में दलितों और मुसलमानों ने उत्तर भारत में कांग्रेस से किनारा कर लिया . नतीजा दुनिया जानती है . कांग्रेस उत्तर भारत में पूरी तरह से हार गयी और केंद्र में पहली बार गैरकांग्रेसी सरकार स्थापित हुई संजय गांधी की मृत्यु के बाद भी इंदिरा गांधी ने अपने बड़े बेटे को राजनीति में  स्थापित करना शुरू किया .वह भी वंशवाद था . उनकी अकाल मृत्य के बाद फिर कुछ ऐसे लोगों  ने जो सत्ता   का आनंद लेना चाहते  थे उन्होंने राजीव गांधी को प्रधानमंत्री बनवा दिया . उनके भी  दून स्कूल टाइप  लोग ही दोस्त थे . मणिशंकर अय्यर उसी   वर्ग के नेता हैं . राजीव गांधी भी अपने संभ्रांत साथियों के भारी प्रभाव में रहते थे. मुख्यमंत्रियों को इस तरह से हटाते थे जैसे  बड़े लोग कोई अस्थाई नौकर को हटाते हैं .. उनके काल में भी दिल्ली की  संभ्रांत बस्तियों  में विराजने वाले लोगों  ने खूब माल काटा . लेकिन १९८९ में सत्ता से बेदखल होने के बाद वे काफी परिपक्व हो गए थे  लेकिन अकाल मृत्यु ने उनको भी काम नहीं करने दिया .सोनिया गांधी ने विपरीत परिस्थितियों में कांग्रेस का नेतृत्व सम्भाला और सत्ता दिलवाई . इसलिए सोनिया गांधी की  इज्ज़त एक राजनेता के रूप में की जा सकती है . अब राहुल गांधी को चार्ज दिया गया है . देखना दिलचस्प होगा कि वे कैसे अपनी दादी द्वारा स्थापित की गयी कांग्रेस को आगे बढाते हैं . इस कांग्रेस को महात्मा गांधी या जवाहरलाल नेहरू या सरदार पटेल या  की कांग्रेस मानना ठीक नहीं होगा क्योंकि उस कांग्रेस को तो इंदिरा गांधी ने १९६९ में ख़त्म करके इंदिरा   कांग्रेस की स्थापना कर दी थी.  मौजूदा कांग्रेस उसी इंदिरा  कांग्रेस की वारिस है . और राहुल गांधी उसी कांग्रेस के अध्यक्ष हैं .

गुजरात के नतीजे राहुल और मोदी की भावी राजनीति की दिशा तय करेंगे .

जंतर-मंतर - Sun, 17/12/2017 - 07:14


शेष नारायण सिंह . 
गुजरात का विधान सभा चुनाव बहुत ही महत्वपूर्ण राजनीतिक घटना हो गया है . १८ दिसंबर को जब नतीजे आयेंगे तो दोनों बड़ी पार्टियों के बड़े नेताओं के लिए बहुत ही अहम राजनीतिक भविष्य की भूमिका लिखेंगे . अगर प्रधानमंत्री  नरेंद्र मोदी की पार्टी चुनाव जीत  गयी तो आने वाले  लोकसभा चुनाव में २०१९ में वे  देश की राजनीति के निर्विवाद नेता बन जायेंगे . और अगर राहुल गांधी की पार्टी सरकार बनाने लायक बहुमत लाती  है तो भारत के राजनीतिक क्षितिज में राहुल गांधी एक गंभीर नेता के रूप में स्थापित हो जायेंगे.  उनके लिए यह बहुत ही महत्वपूर्ण मौक़ा है जब वे राजनीतिक रूप से अपने आपको स्थापित करने की बात सोच सकते हैं . अगर उनकी पार्टी गुजरात में सरकार  बनाने लायक  संख्या में सीटें जीत सकती है तो अगले साल होने वाले मध्य प्रदेश, छतीसगढ़ और राजस्थान के चुनावों में कांग्रेस की  जीत की संभावना बढ़ जायेगी  लेकिन अगर हार गए तो राहुल गांधी की उसी छवि की वापसी होगी जो उन्होंने २०१४ के चुनाव में  कांग्रेस  की पराजय के बाद  अर्जित की थी. राहुल गांधी की दादी, इंदिरा गांधी की राजनीति में भी यह मुकाम आया था  .  कांग्रेस की खासी दुर्दशा १९६७ के आम चुनावों में हो चुकी थी. उत्तर भारत के  ज्यादातर राज्यों में गैर कांग्रेसी सरकारें बन  गयी थीं. जिस तरह से आजकल बीजेपी के नेता राहुल गांधी को एक अगंभीर किस्म के नेता के रूप में स्थापित करने का प्रयास करते रहते हैं , उसी तरह  १९६७ के चुनावों में पंजाब से लेकर बंगाल तक कांग्रेस की हार के बाद कांग्रेस के अन्दर ही मौजूद   सिंडिकेट के नेता इंदिरा गांधी को  मामूली नेता साबित करने का प्रयास कर रहे थे. शास्त्री जी की मृत्यु के बाद १९६६ में इंदिरा गांधी को सिंडिकेट के प्रधान मंत्री तो बनवा दिया था लेकिन उनको अपने  प्रभाव के अन्दर ही काम करने को मजबूर करते रहते थे. विपक्ष ने भी  गैरकांग्रेसवाद की राजनीति के ज़रिये  कांग्रेस की स्थापित सत्ता को चुनौती देने का पूरा इंतज़ाम कर लिया था. १९६७ के चुनावों में  गैर कांग्रेसवाद को आंशिक सफलता मिल गयी थी . कई राज्यों में कांग्रेस की  सरकारें नहीं बनी थीं और कांग्रेस  विपक्षी पार्टी हो गयी थी. हालांकि केंद्र में कांग्रेस की सरकार थी लेकिन वह भी नेहरू युग की बहुमत वाली नहीं , काम चलाऊ बहुमत वाली सरकार थी . गैरकांग्रेसवाद की सफलता इंदिरा गांधी के  राजनीतिक अस्तित्व को चुनौती दे रही थी.गैरकांग्रेसवाद को समझने के लिए इतिहास की शरण में जाना पड़ेगा क्योंकि ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को समझे बिना भारत की राजनीति के इस महत्वपूर्ण अध्याय को समझना असंभव है .  कांग्रेस पार्टी कैसे  एक ऐसी राजनीतिक शक्ति बनी जो भारतीय जनता की अधिकतम भावनाओं की प्रतिनिधि और वाहक बनी और वही कांग्रेस १९६७ आते आते देश की बड़ी आबादी की नज़र में गिर गयी और कैसे इंदिरा गांधी  महात्मा गांधी और जवाहरलाल नेहरू की कांग्रेस को ख़त्म करके एक नई कांग्रेस को शक्ल  देने में कामयाब हुईं,यह इतिहास के पन्नों में साफ़ साफ़ अंकित है .
महात्मा के कांग्रेस की राजनीति में १९१६ में सक्रिय होने और अग्रणी भूमिका के पहले  कांग्रेस की पहचान एक ऐसे  संगठन के रूप में  होती थी  जो बंबई और कलकत्ता के कुछ वकीलों की अगुवाई में  अंग्रेजों के अधीन रहते हुए डोमिनियन स्टेटस टाइप कुछ  अधिकारों की बात करता था . लेकिन महात्मा गांधी के नेतृत्व में आधुनिक भारत की स्थापना और अंग्रेजों से राजनीतिक स्वतंत्रता की जो लड़ाई लड़ी गयी उसने कांग्रेस को एक जनसंगठन बना दिया .१९१६ में चंपारण में जो  प्रयोग हुआ वह १९२०  में एक बहुत बड़े आन्दोलन के रूप में बदल गया.  १९२० में आज़ादी की इच्छा रखने वाला हर भारतवासी महात्मा गांधी के साथ था, केवल अंग्रेजों के कुछ खास लोग उनके खिलाफ थे .आज़ादी  की लड़ाई में एक ऐतिहासिक मुकाम तब आया जब चौरीचौरा की हिंसक घटना के बाद महात्मा गांधी ने आंदोलन वापस ले लिया . उस वक़्त के ज्यादातर  बड़े नेताओं  ने महात्मा गांधी से आन्दोलन जारी रखने का आग्रह किया लेकिन महात्माजी ने साफ़ कह दिया कि भारतीयों की सबसे बड़ी ताक़त अहिंसा थी .  सच भी है कि अगर हिंसक  रास्ते अपनाए जाते तो अंग्रेजों ने तो़प खोल दिया होता और जनता की  महत्वाकांक्षाओं की वही दुर्दशा होती जो १८५७ में हुई थी. १९२९ और १९३० में जब जवाहरलाल नेहरू को कांग्रेस अध्यक्ष बनाया गया तो लाहौर की कांग्रेस में पूर्ण स्वराज का नारा दिया गया . ११९३० के दशक में भारत में जो राजनीतिक परिवर्तन हुए वे किसी भी देश के लिए पूरा इतिहास हो सकते हैं . गवर्नमेंट आफ इन्डिया एक्ट १९३५ के  बाद की अंग्रेज़ी साजिशों का सारा पर्दाफाश   हुआ. १९३७ में लखनऊ में  हुए मुस्लिम  लीग के सम्मेलन में मुहम्मद अली जिन्ना ने अंग्रेजों की शह पर द्विराष्ट्र सिद्धांत का प्रतिपादन किया .बाकी देश में  तुरंत से ही उसका विरोध शुरू हो गया . उस वक़्त के मज़बूत संगठन ,हिंदू महासभा के  राष्ट्रीय अध्यक्ष विनायक दामोदर सावरकार ने भी अहमदाबाद में हुए अपने वार्षिक अधिवेशन में द्विराष्ट्र सिद्धांत का नारा दे दिया  लेकिन  उसी साल हुए चुनावों में इस सिद्धांत की धज्जियां उड़ गयीं  क्योंकि  जनता ने सन्देश दे दिया था कि भारत एक है और वहाँ दो राष्ट्र वाले  सिद्धांत के लिए कोई जगह  नहीं है . मुस्लिम लीग और हिंदू महासभा को चुनावों में  जनता ने नकार दिया  . कांग्रेस के अंदर जो समाजवादी रुझान शुरू हुई और कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के ज़रिये आतंरिक लोकतंत्र को और मजबूती देने की जो कोशिश की गयी उसको  समाजवादी नेताओं ने भी ताकत  दी.  आचार्य नरेंद्र देव और डॉ राम मनोहर लोहिया भी कांग्रेस के सदस्य के रूप में इस अभियान में योगदान किया ...बाद में इन्हीं समाजवादियों ने कांग्रेस के विरोध में सबसे मुखर स्वर का नेतृत्व भी किया जब साफ़ हो गया कि आज़ादी के बाद गांधी का  रास्ता भूल कर कांग्रेस  की राजनीति फेबियन सोशलिज्म की तरफ बढ़  रही है .  भारतीय राजनीति में  कांग्रेस के विकल्प को तलाशने की गंभीर  कोशिश तब शुरू हुई . जब डॉ  राम मनोहर लोहिया ने गैर कांग्रेसवाद की अपनी राजनीतिक सोच को अमली जामा पहनाया .विपक्ष के तीन बड़े नेताओं ने उत्तर प्रदेश के फर्रुखाबाद,अमरोहा  और जौनपुर में १९६३ में हुए लोकसभा के उपचुनावों में हिस्सा लिया . संसोपा के डॉ लोहिया  फर्रुखाबाद ,प्रसोपा के आचार्य जे बी कृपलानी अमरोहा और जनसंघ के दीनदयाल उपाध्याय जौनपुर से गैर कांग्रेसवाद के उम्मीदवार बने . इसी प्रयोग के बाद  गैरकांग्रेसवाद ने एक शकल हासिल की और १९६७ में हुए आम चुनावों में अमृतसर से कोलकता तक के  इलाके में वह कांग्रेस चुनाव हार गयी जिसे जवाहर लाल  नेहरू के जीवनकाल में अजेय माना जाता रहा था . १९६७ में संविद सरकारों का जो प्रयोग हुआ उसे शासन  पद्धति का को बहुत बड़ा उदाहरण तो नहीं माना जा सकता लेकिन यह पक्का है कि उसके बाद से ही यह बात आम  जहनियत का हिस्सा बन गयी कि कांग्रेस को सत्ता से बेदखल किया जा सकता है .इस समय देश की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी थीं.  
गैर कांग्रेसवाद की आंशिक सफलता के बाद इंदिरा गांधी की अथारिटी को चुनौती  मिलना शुरू ही गयी थी .  कांग्रेस के बाहर से  तो हमला हो ही रहा था अंदर से भी उनको ज़बरदस्त विरोध का सामना करना पड़ रहा था.   इंदिरा गांधी ने हालात की चुनौती को स्वीकार किया और  १९६९ में कांग्रेस को तोड़ दिया . कांग्रेस के पुराने नेता मूल कांग्रेस में बचे रहे , पार्टी  का चुनाव निशान , दो बैलों की जोड़ी ज़ब्त हो गया , इंदिरा कांग्रेस का जन्म हुआ जिसकी एकछत्र  नेता के  रूप में इंदिरा गांधी ने अपनी नई राजनीति की फिर से स्शुरुआत की . प्रधानमंत्री के रूप में उन्होंने लोकसभा को भंग करने की सिफारिश की , समय से पहले चुनाव करवाया ., बैंकों का राष्ट्रीयकरण , प्रिवी पर्स की समाप्ति  और गरीबी हटाओं के वामपंथी रुझान के नारों के साथ १९७१ के चुनाव में भारी बहुमत हासिल किया . उनके विरोधी राजनीतिक रूप से  बहुत कमज़ोर हो   गए. कांग्रेस के अंदर  और बाहर वे एक मज़बूत नेता के  रूप में सामने आईं. १९७१ का चुनाव उनके राजनीतिक भविष्य की भूमिका बन  गया . दोबारा  भी इंदिरा  गांधी पर राजनीतिक संकट तब आया जब १९७७ में उनकी पार्टी  बुरी तरह से चुनाव  हार गयी . उसके बाद उन्होंने उत्तर प्रदेश के आज़मगढ़  में हुए उपचुनाव में मोहसिना किदवई को उमीदवार बनाया और उत्तर प्रदेश में  , जहां उनकी पार्टी शून्य पर पंहुच गयी थी ,लोकसभा में एक सीट पर कांग्रेस का क़ब्ज़ा हुआ . उसके बाद से कांग्रेस की नेता के रूप में दोबारा उन्होंने अपना मुकाम सुनिश्चित किया . एक चुनाव के नतीजों से  किसी नेता का भविष्य बन बिगड़ सकता है . गुजरात विधान सभा का चुनाव राहुल गांधी के लिए ऐसा ही चुनाव है यदि इस चुनाव में वे सफल होते हैं तो कांग्रेस के उन नेताओं से वे पिंड छुड़ा सकेंगें जो राजीव गांधी और सोनिया गांधी के कृपा पात्र रहे थे और अब पार्टी की केंद्रीय सत्ता पर कुण्डली मार कर बैठे हुए हैं. दस साल की डॉ मनमोहंन  सिंह के सत्ता के दौरान इन लोगों ने अपने चेला उद्योगपतियों और भ्रष्ट नेताओं के लिए जो चाहा करवाया और आज अपनी पार्टी को ऐसे  मुकाम पर ला चुके हैं जहां वह  मजाक का विषय बन चुकी है . इस चुनाव में जीत का मतलब यह होगा कि वे अपने साथ ऐसे लोगों को ले सकेंगें जिनके सहारे जनता को साथ लिया जा सकता है. गुजरात चुनाव में कांग्रेस के परंपरागत नेताओं में अशोक गहलौत और भरत सिंह सोलंकी के  अलावा  किसी की ख़ास  भूमिका  नहीं रही है . ज़ाहिर है गुजरात के अपने नए साथियों, हार्दिक पटेल,अल्पेश ठाकोर और जिग्नेश मेवानी की भूमिका को भी ध्यान में रखकर ही कोई काम करना होगा  .अब उनके पास अपनी पार्टी को नए हिसाब से चलाने का वैसा ही मौक़ा होगा जो  जो इंदिरा गांधी को १९६९ में मिला था जब नेहरू युग के पुराने नेताओं ने अपना कांग्रेस संगठन बना लिया था और कांग्रेस से इंदिरा गांधी को निकाल दिया था . लेकिन उनके पास  सरकार थी और वे खुद प्रधानमंत्री थीं. उनके साथ लोग जुड़ते चले गए और इंदिरा  कांग्रेस का जन्म हो गया . अगर गुजरात में राहुल गांधी सरकार बनवाने में कामयाब हो जाते हैं तो उनके  पास यह अवसर होगा .यह तो जीत की स्थिति का आकलन है . लेकिन अगर उनकी सरकार  नहीं बनी तो उनकी भावी राजीति पर बहुत ही भारी भरकम सवाल पैदा हो जायेगें . उनका राजनीतिक भविष्य क्या होगा उसका आकलन करना संभव नहीं है क्योंकि  उस तरह की कोई नजीर नहीं है .यही बात प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बारे में भी सच है . अगर वे गुजरात चुनाव जीत गए तो देश की राजनीति में बहुत ही भारी राजनीतिक हैसियत के मालिक हो जायेगें . पहले से ही भारी उनकी मौजूदा ताकत में  वृद्धि होगी  लेकिन अगर गुजरात में उनकी इतनी मेहनत के बाद  भी सत्ता बीजेपी के हाथ से छिटक गयी तो नरेंद्र मोदी की आगे की  राह मुश्किल हो जायेगी  . दिल्ली में जो लोग उनके गुणगान करते नहीं आघाते वे उनके व्यक्तित्व का विश्लेषण करते नज़र आयेगें .जाहिर है इस काम के बाद उनकी सत्ता कमज़ोर होगी . जो भीहो लेकिन एक बात  तय है कि गुजरात चुनाव देश की दोनों ही  बड़ी पार्टियों के वर्तमान शीर्ष नेताओं की राजनीति की भावी दिशा में बहुत ही अहम भूमिका निभाने जा रहा है .

शशि कपूर का सबसे बड़ा शाहकार -मुंबई का पृथ्वी थिएटर

जंतर-मंतर - Sun, 17/12/2017 - 07:12


शेष नारायण सिंह
पृथ्वी थियेटर ,मुंबई महानगर के उपनगर , जुहू में एक ऐसा मुकाम है जहां बहुत सारे लोगों ने अपने सपनों को रंग दिया है .यह थियेटर अपने पिता स्व पृथ्वीराज कपूर की याद में शशि कपूर और उनकी पत्नी जेनिफर कपूर से बनवाया था. शशि कपूर अपने परिवार में एक अलग तरह के इंसान थे .उनकी मृत्यु की खबर सुनकर उनके गैरफिल्मी काम की याद आ गयी जो दुनिया भर में नाटक की राजधानी के रूप में जाना जाता है .हमारी और हमारी पहले की पीढ़ी के ज़्यादातर लोग अकबर का वही तसव्वुर करते हैं जो के. आसिफ की फिल्म ‘मुगले-आज़म ‘ में दिखाया गया है . बहुत ही भारी भरकम आवाज़ में भारत के शहंशाह मुहम्मद जलालुद्दीन अकबर के डायलाग हमने सुने हैं . अकबर का नाम आते ही उन लोगों के सामने तस्वीर घूम जाती है जिसमें मुगले आज़म की भूमिका में पृथ्वीराज कपूर को देखा गया है .
पृथ्वीराज कपूर अपने ज़माने के बहुत बड़े अभिनेता थे. उन्हीं की याद में उनके बच्चों ने पृथ्वी थियेटर की इमारत की स्थापना की . पृथ्वीराज कपूर का 'पृथ्वी थियेटर शहर शहर घूमा कारता था. उसी सिलसिले में उनके सबसे छोटे पुत्र ,शशि कपूर की मुलाक़ात ,जेनिफर केंडल से कलकत्ता में हुई थी .पृथ्वीराज कपूर की इच्छा थी कि पृथ्वी थियेटर को एक स्थायी पता दिया जा सके. इस उद्देश्य से उन्होंने १९६२ में ही ज़मीन का इंतज़ाम कर लिया था लेकिन बिल्डिंग बनवा नहीं पाए. १९७२ में उनकी मृत्यु हो गयी .ज़मीन की लीज़ खत्म हो गयी .उनके बेटे शशि कपूर और जेनिफर केंडल लीज क नवीकरण करवाया और आज पृथ्वी थियेटर पृथ्वीराज कपूर के सम्मान के हिसाब से ही जाना जाता है . श्री पृथ्वीराज कपूर मेमोरियल ट्रस्ट एंड रिसर्च फाउन्डेशन नाम की संस्था इसका संचालन करती है . इसके मुख्य ट्रस्ट्री शशि कपूर थे और उनके बच्चे इसका संचालन करते हैं. आज मुंबई के सांस्कृतिक कैलेण्डर में पृथ्वी थियेटर का स्थान बहुत बड़ा है .जब १९७८ में जेनिफर केंडल और उनके पति , हिंदी फिल्मों के नामी अभिनेता शशि कपूर ने इस जगह पर पृथ्वी का काम शुरू किया तो इसका घोषित उद्देश्य हिंदी नाटकों को एक मुकाम देना था .लेकिन अब अंग्रेज़ी नाटक भी यहाँ होते हैं .जेनिफर केंडल खुद एक बहुत बड़ी अदाकारा थीं और अपने पिता की नाटक कंपनी शेक्स्पीयाराना में काम करती थीं. पृथ्वीराज कपूर ने पृथ्वी थियेटर की स्थापना १९४४ में कर ली थी. सिनेमा की अपनी कमाई को वे पृथ्वी थियेटर के नाटकों में लगाते थे . अपने ज़माने में उन्होंने बहुत ही नामी नाटकों की प्रस्तुति की .शकुंतला ,गद्दार, आहुति, किसान, कलाकार कुछ ऐसे नाटक हैं जिनका हिंदी/उर्दू नाटकों के विकास में इतिहास में अहम योगदान है और इन सबको पृथ्वीराज कपूर ने ही प्रस्तुत किया था .थियेटर के प्रति उनके प्रेम को ध्यान में रख कर ही उनके बेटे और पुत्रवधू ने इस संस्थान को स्थापित किया था . मौजूदा पृथ्वी थियेटर का उदघाटन १९७८ में किया गया . पृथ्वी के मंच पर पहला नाटक “ उध्वस्त धर्मशाला “ खेला गया जिसको महान नाटककार ,शिक्षक और बुद्दिजीवी जी पी देशपांडे ने लिखा था . नाटक की दुनिया के बहुत बड़े अभिनेताओं , नसीरुद्दीन शाह और ओम पूरी ने इसमें अभिनय किया था . इन दोनों को मैं महान कलाकार मानता हूँ .पृथ्वी से मेरे निजी लगाव का भी यही कारण है .अब तो खैर जब भी मुंबई आता हूँ यहाँ चला ही जाता हूँ क्योंकि यह मेरे बच्चों के घर के बहुत पास है .पृथ्वी की इस इस इमारत का दूसरा नाटक था बकरी , सर्वेश्वर दयाल सक्सेना के इस नाटक को इप्टा की ओर से एम एस सथ्यू ने निर्देशित किया था .यह वह समय है जबकि मुंबई की नाटक की दुनिया में हिंदी नाटकों की कोई औकात नहीं थी लेकिन पृथ्वी ने एक मुकाम दे दिया और आज अपने सपनों को एक शक्ल देने के लिए मुंबई आने वाले बहुत सारे संघर्षशील कलाकार यहाँ दिख जाते हैं .पृथ्वी के पहले मुंबई में अंग्रेज़ी, मराठी और गुजराती नाटकों का बोलबाला हुआ करता था लेकिन पृथ्वी थियेटर की स्थापना के करीब वर्षों में बहुत कुछ बदल गया है . अब हिंदी के नाटकों की अपनी एक पहचान है और मुंबई के हर इलाके में आयोजित होते है .इस सब में स्व शशि कपूर, उनकी पत्नी जेनिफर केंडल और उनकी बेटी संजना कपूर का बड़ा योगदान है 

जाति एक शिकंजा है ,तरक्की के लिए इसका विनाश ज़रूरी है.

जंतर-मंतर - Sun, 17/12/2017 - 07:11


शेष नारायण सिंह

डा.अंबेडकर के  निर्वाण को साठ साल से ऊपर हो गए .इस मौके पर उनको  हर साल याद किया जाता  है , इस साल भी किया जाएगा. इस अवसर पर ज़रूरी है कि उनकी सोच और दर्शन के सबसे अहम पहलू पर गौर किया जाए. सब को मालूम है कि डा. अंबेडकर के दर्शन ने २० वीं सदी के भारत के राजनीतिक आचरण को बहुत ज्यादा प्रभावित किया है . लेकिन उनके दर्शन की सबसे ख़ास बात पर जानकारी की भारी कमी है. शायद ऐसा इसलिए है कि उनके नाम पर राजनीति करने वाले उन्हीं बातों को प्रचारित करते है जो उनको  अपने  स्वार्थ के हिसाब से उपयोगी लगती  हैं . आम अवधारणा यह है कि बाबा साहेब जाति व्यवस्था के खिलाफ थे . यह सच है लेकिन इतना ही सच नहीं है . और  भी बहुत कुछ है . मसलन  डॉ साहब मानते थे कि  जाति की व्यवस्था शताब्दियों की साज़िश का नतीजा है और उसका खात्मा सामाजिक विकास की एक ज़रूरी शर्त है . अंबेडकर ने कहा था कि जब तक अंतरजातीय शादी-ब्याह नहीं होंगें , तब तक बात नहीं बनने वाली नहीं है, जाति प्रथा को तोड़ना नामुमकिन होगा . सहविवाह और सहभोजन  बहुत  ज़रूरी है .डॉ आंबेडकर के  दर्शन में इसके अलावा और भी बहुत कुछ है जो देश के हर नागरिक को जानना चाहिए .उनके दर्शन शास्त्र की  कई बातों के बारे में ज़्यादातर लोग अन्धकार में हैं. उन्हीं कुछ बातों का ज़िक्र करना आज के दिन सही रहेगा. डा. अंबेडकर को इतिहास एक ऐसे राजनीतिक चिन्तक के रूप में याद रखेगा जिन्होंने जाति के विनाश को सामाजिक,आर्थिक और राजनीतिक परिवर्तन की बुनियाद माना था. यह बात किसी से छुपी नहीं है कि उनकी राजनीतिक विरासत का सबसे ज्यादा फायदा उठाने वाली पार्टी की नेता, आज जाति की संस्था को संभाल कर रखना चाहती हैं ,उसके विनाश में उनकी कोई रूचि नहीं है . वोट बैंक राजनीति के चक्कर में पड़ गयी अंबेडकरवादी पार्टियों को अब वास्तव में इस बात की चिंता सताने लगी है कि अगर जाति का विनाश हो जाएगा तो उनकी वोट बैंक की राजनीति का क्या होगा. डा अंबेडकर की राजनीतिक सोच को लेकर कुछ और भ्रांतियां भी हैं . कांशीराम और मायावती ने इस क़दर प्रचार कर रखा है कि जाति की पूरी व्यवस्था का ज़हर मनु ने ही फैलाया था, वही इसके संस्थापक थे और मनु की सोच को ख़त्म कर देने मात्र से सब ठीक हो जाएगा. लेकिन बाबा साहेब ऐसा नहीं मानते थे . उनके एक बहुचर्चित, और अकादमिक भाषण के हवाले से कहा जा सकता है कि जाति व्यवस्था की सारी बुराइयों को लिए मनु को ही ज़िम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता .मनु के बारे में उन्होंने कहा कि अगर कभी मनु रहे भी होंगें तो बहुत ही हिम्मती रहे होंगें . डा. अंबेडकर का कहना है कि ऐसा कभी नहीं होता कि जाति जैसा शिकंजा कोई एक व्यक्ति बना दे और बाकी पूरा समाज उसको स्वीकार कर ले. उनके अनुसार इस बात की कल्पना करना भी बेमतलब है कि कोई एक आदमी कानून बना देगा और पीढियां दर पीढियां उसको मानती रहेंगीं. . हाँ इस बात की कल्पना की जा सकती है कि मनु नाम के कोई तानाशाह रहे होंगें जिनकी ताक़त के नीचे पूरी आबादी दबी रही होगी और वे जो कह देंगे ,उसे सब मान लेंगें और उन लोगों की आने वाली नस्लें भी उसे मानती रहेंगी.उन्होंने कहा कि , मैं इस बात को जोर दे कर कहना चाहता हूँ कि मनु ने जाति की व्यवस्था की स्थापना नहीं की क्योंकि यह उनके बस की बात नहीं थी  . मनु के जन्म के पहले भी जाति की व्यवस्था कायम थी. . मनु का योगदान बस इतना है कि उन्होंने इसे एक दार्शनिक आधार दिया. . जहां तक हिन्दू समाज के स्वरूप  और उसमें जाति के मह्त्व की बात है, वह मनु की हैसियत के बाहर था और उन्होंने वर्तमान हिन्दू समाज की दिशा तय करने में कोई भूमिका नहीं निभाई. उनका योगदान बस इतना ही है उन्होंने जाति को एक धर्म के रूप में स्थापित करने की कोशिश की . जाति का दायरा इतना बड़ा है कि उसे एक आदमी, चाहे वह जितना ही बड़ा ज्ञाता या शातिर हो, संभाल ही नहीं सकता. . इसी तरह से यह कहना भी ठीक नहीं होगा कि ब्राह्मणों ने जाति की संस्था की स्थापना की. मेरा मानना है कि ब्राह्मणों ने बहुत सारे गलत काम किये हैं लेकिन उनकी औक़ात यह कभी नहीं थी कि वे पूरे समाज पर जाति व्यवस्था को थोप सकते.  बाबा साहेब ने अपने इसी भाषण में एक चेतावनी और दी थी कि उपदेश देने से जाति की स्थापना नहीं हुई थी और इसको ख़त्म भी उपदेश के ज़रिये नहीं किया जा सकता. इस बात में दो राय नहीं है कि  डा अंबेडकर पर अपने पहले के महान समाज सुधारक ,ज्योतिबा फुले का बड़ा प्रभाव था . उन्हें यह पूरा विश्वास था कि जाति प्रथा को किसी व्यक्ति से जोड़ कर उसकी तार्किक परिणति तक नहीं ले जाया जा सकता. कहीं ऐसा न हो कि केवल मनु को लक्ष्य करने के चक्कर में  मनु के विचार तो ख़त्म हो जाएँ लेकिन  जाति प्रथा ज्यों की त्यों बनी रह जाये . जाति प्रथा का खात्मा ज़रूरी  है लेकिन अगर केवल मनु को टारगेट किया जाता रहा तो बात बनेगी नहीं . पूरे सिस्टम पर हमला करना पडेगा .

डा अंबेडकर के अनुसार हर समाज का वर्गीकरण और उप वर्गीकरण होता है लेकिन परेशानी की बात यह है कि इस वर्गीकरण के चलते वह ऐसे सांचों में फिट हो जाता है कि एक दूसरे वर्ग के लोग इसमें न अन्दर जा सकते हैं और न बाहर आ सकते हैं . यही जाति का शिकंजा है और इसे ख़त्म किये बिना कोई तरक्की नहीं हो सकती. सच्ची बात यह है कि शुरू में अन्य समाजों की तरह हिन्दू समाज भी चार वर्गों में बंटा हुआ था . ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र . यह वर्गीकरण मूल रूप से जन्म के आधार पर नहीं था, यह कर्म के आधार पर था .एक वर्ग से दूसरे वर्ग में आवाजाही थी लेकिन हज़ारों वर्षों की निहित स्वार्थों कोशिश के बाद इसे जन्म के आधार पर कर दिया गया और एक दूसरे वर्ग में आने जाने की रीति ख़त्म हो गयी. और यही जाति की संस्था के रूप में बाद के युगों में पहचाना जाने लगा. . अगर आर्थिक विकास की गति को तेज़ किया जाय और उसमें सार्थक हस्तक्षेप करके कामकाज के बेहतर अवसर उपलब्ध कराये जाएँ तो जाति व्यवस्था को जिंदा रख पाना बहुत ही मुश्किल होगा. और जाति के सिद्धांत पर आधारित व्यवस्था का बच पाना बहुत ही मुश्किल होगा.. अगर ऐसा हुआ तो जाति के विनाश के ज्योतिबा फुले, डा. राम मनोहर लोहिया और डा. अम्बेडकर की राजनीतिक और सामाजिक सोच और दर्शन का मकसद हासिल किया जा सकेगा..

समाज और राजनीति का फ़र्ज़ है लड़कियों को आत्मनिर्णय का अधिकार देना

जंतर-मंतर - Sun, 17/12/2017 - 07:09


शेष नारायण सिंह
केरल की हादिया के प्रेम और विवाह करने एक अधिकार के मामले में सुप्रीम कोर्ट में केस चल रहा है . हाई कोर्ट में उसके अपनी पसंद के पुरुष से शादी करने के  अधिकार को अनुपयुक्त पाया गया था जिसके खिलाफ  देश के सर्वोच्च न्यायलय में अपील की गयी है . फैसला अभी नहीं आया है इसलिए उस मामले में कोई टिप्पणी करना उचित नहीं   है. हादिया पहले अखिला थी , इस्लाम  क़ुबूल कर लिया और अपनी पसंद के मुस्लिम लड़के से शादी कर ली . उसके विवाह करने के अधिकार पर जब सुप्रीम कोर्ट का आदेश आ जाएगा तब उस पर चर्चा की जायेगी . सुनवाई के दौरान माननीय सुप्रीम कोर्ट ने उचित  समझा कि उसकी शिक्षा को जारी रखा जाना  चाहिए तो उसके लिए ज़रूरी निर्देश दे दिए गए हैं और वह तमिलनाडु के अपने मेडिकल कालेज में अपनी पढ़ाई से सम्बंधित कार्य कर रही है . लेकिन लव जिहाद के बारे में बात की जा सकती  है ,उसपर समाजशास्त्रीय  विमर्श और टिप्पणी की जा सकती है .वास्तव में एक लडकी और एक लड़के के बीच होने वाले प्रेम को लव जिहाद का नाम देना और इसको मुद्दा बनाना समाज में पुरुष आधिपत्य की मानसिकता का एक  नमूना है . लव  जिहाद वाले ज़्यादातर मामलों में यह देखा गया है कि जो गरीब या मध्य वर्ग के लोग हैं , उनको ही अपमानित करने के लिए लक्षित किया जाता है . यह नया भी नहीं है . हिन्दू लडकी और मुस्लिम लड़के के बीच प्रेम को हमेशा ही आर एस एस और उसके अधीन  संगठनों की राजनीति में हिकारत की नज़र से देखा जाता रहा   है .  बीजेपी के पूर्व उपाध्यक्ष सिकंदर बख्त को भी आर एस एस के इस क्रोध  को झेलना पड़ा था. बाद में तो वे बीजेपी की कृपा से केंद्रीय मंत्री  और राज्यपाल भी हुए लेकिन आर एस एस के अखबार आर्गनाइज़र के २ जून १९५२ के  अंक में उनके बारे में जो लिखा है उससे साफ़ हो जाता है कि आर एस एस ने  उनको शक की नज़र से देखा . सिकंदर बख्त एंड कंपनी शीर्षक के लेख में उनके बारे में जो बातें लिखीं थीं ,वे किसी को भी आपत्तिजनक लग सकती हैं. अखबार को शक था कि तब के कांग्रेसी नेता  सिकंदर बख्त किसी बड़ी कांग्रेसी महिला नेता के प्रेम में हैं और उसके साथ रह रहे हैं . इसी को केंद्र में रख कर काफी कुछ लिखा गया था . बाद में जब उन्होंने एक हिन्दू लडकी से शादी कर लिया तो दिल्ली शहर में भारी हल्ला  गुल्ला किया गया था . इसलिए यह कहना ठीक नहीं है कि हिन्दू-मुस्लिम प्रेम और विवाह पर आर एस एस के संगठन अब ज्यादा आक्रामक हो गए हैं . यह हमेशा से ही ऐसे ही थे. इनकी राजनीतिक  ताक़त बढ़ गयी  है और अब उनके  इस तरह के कारनामों को सरकारी संरक्षण मिलता है इसलिए वे  ज़्यादा मुखर  हो गए हैं .एक और दिलचस्प बात गौर करने लायक है . लव जिहाद और  उससे जुडी हिंसा का शिकार आम तौर पर गरीब या  सम्पन्नता के निचले पायदान पर  मौजूद लोग ही होते हैं .  सम्पन्न या राजनीतिक रूप से  ताक़तवर लोगों पर लव जिहाद के हमलावर कुछ नहीं बोलते .  देश  भर में ऐसे  लाखों जोड़े हैं जो हिन्दू  मुस्लिम विवाह के उदाहरण हैं लेकिन उनपर कभी किसी लव जिहादी ने जिहाद नहीं छेड़ा .शाहरुख ख़ान, आमिर ख़ान, सैफ़ अली ख़ान, इरफान ख़ान, सलीम ख़ानन नसीरूद्दीन शाह, साजिद नाडियावाला, , इमरान हाशमी, मुज़फ़्फ़र अली, इम्तियाज़ अली, अज़ीज़ मिर्ज़ा, फ़रहान अख़्तर, आदि बाहुत सारे  फ़िल्मी लोगों की पत्नियां हिन्दू हैं . यह ताक़तवर लोग हैं . शायद  इसीलिये इनके खिलाफ कभी कोई बयान भी नहीं आया है . बीजेपी के नेता  मुख्तार अब्बास नक़वी, शहनवाज़ हुसैन और एम  जे अकबर की पत्नियां भी हिन्दू लडकियां   हैं .  इनकी भी कभी चर्चा नहीं होती ,शायद  इसलिए कि यह तो अपने लोग हैं .असल मुद्दा सामाजिक और आर्थिक है . जो लोग समाज के सबसे गरीब तबके से हैं उनको सभी ब्रांड के राजनीतिक और धार्मिक शमशीर  चमकाने वाले निशाना  बनाते हैं . और यह समस्या केवल हिन्दू मुस्लिम जोड़ों  तक की सीमित नहीं है.  पिछले कई वर्षों से लगभग रोज़ ही अखबार में ऐसी कोई खबर नज़र आ जाती है   जिसमें पता  चलता है कि किसी लडकी की इसलिए हत्या कर दी गयी कि उसने अपने परिवार वालों की मर्जी के खिलाफ जाकर शादी  कर ली थी . इसी हफ्ते एक हैरतअंगेज़ खबर पढने को मिली जिसमे लिखा था  कि एक लडकी अपने  किसी पुरुष सजातीय दोस्त के साथ  सिनेमा देखने चली गयी . लडकी के पिता और भाई को वह लड़का पसंद नहीं था . बाप और भाइयों ने अपनी ही लडकी और बहन का गैंग रेप किया और उसको सबक सिखाने की कोशिश की . यह हैवानियत क्यों है ? यह  सवाल सरकार के दायरे में जाएगा ,तो वह इसको कानून व्यवस्था की नज़र से देखेगी . इस खबर  में भी पुलिस का पक्ष ही अखबार में छपा था लेकिन इसका असली हल पुलिस नहीं निकाल  सकती  है . इस समस्या के हल के लिए समाज को आगे आना पडेगा . इसका गहराई से  अध्ययन करना पड़ेगा और कोई सूरत सुझानी पड़ेगी . अब  तक तो जो भी तरीके बताये गए है वे ठीक नहीं हैं . शायद समाज और राष्ट्र ने इस समस्या की गहराई को समझा ही नहीं है .बहुत पहले सब इस  तरह  की खबरें   सार्वजनिक चर्चा में  आने लगी थीं तो कुछ हलकों से सुझाव आये थे कि शिक्षा के स्तर में तरक्की होने पर यह सब बदल जाएगा लेकिन अब देखा जा रहा  है कि आम तौर पर ऊंची औपचारिक शिक्षा प्राप्त लोग  इस तरह के असमाजिक और अमानवीय कार्यों में लगे हुए हैं . ज़ाहिर है केवल शिक्षा से  समस्या का हल   नहीं निकलने वाला है . इसके लिए    सम्पन्नता भी चाहिए और उससे भी  ज्यादा राजनीतिक स्तर पर सुरक्षा की व्यवस्था भी चाहिए .  न्यायपालिका की सुरक्षा तभी प्रभावी होगी जब  राजनीतिक स्तर पर उसको लागू करने की इच्छा शक्ति मौजूद हो . राजनीतिक इच्छा  शक्ति का तभी विकास होगा जब एक समाज के रूप में राजनीति कर्मियों को सामाजिक ज़िम्मेदारी और दायित्व से  बांधा जा सके .देश की राजधानी  के एक सौ किलोमीटर के दायरे में लगभग प्रति  दिन ' हानर किलिंग ' के नाम पर  लड़कियों को हलाल किया जा रहा है . अजीब बात यह है कि  इलाके के सभी मुकामी नेता इन हत्यारों का ही साथ देते हैं. इसका  कारण यह है कि नेताओं को वोट से मतलब है और  ग्रामीण समाजों में  परिवार का वोट देने का फैसला पुरुष ही करते  हैं . वोटबाज़ी की तिकड़म की राजनीति में लड़कियों की कोई भूमिका नहीं होती . ऐसा इलसिए होता है कि वे  लडकियां राजनीतिक शक्ति से संपन्न नहीं होती हैं .उनको शक्ति सम्पन्न बनाये बिना  समाज का भला नहीं होने वाला है .सरकार ने  लड़कियों को सक्षम बनाने के लिए कई योजनायें चला रखी हैं . बेटी बचाओ, बेटी पढाओ  , उज्जवला, स्वाधार ,महिलाओं के प्रशिक्षण और उनको जिम्मेवारी देने संबंधी योजनाएं कागजों में उपलब्ध हैं लेकिन उनको सही अर्थों में लागू करने के लिए राजनीतिक इच्छा शक्ति चाहिए . जिसकी भारी कमी है .संविधान के ७३ वें और ७४ वें   संसोधन के बाद पंचायतों के चुनावों में कुछ सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित कर दी गयी थीं लेकिन नतीजा क्या हुआ ? महिलाओं का पर्चा भरवाकर उनके पति गाँव पंचायत के प्रधान  बन बैठे . प्रधानपति नाम के एक अलग  किस्म के जीव  ग्रामीण भारत में विचरण करने लगे . ऐसा इसलिए हुआ कि लड़कियों की  शिक्षा पर ज़रूरी ध्यान नहीं दिया गया था. लेकिन अब  बहुत बड़े पैमाने पर बदलाव हो रहे हैं . ग्रामीण इलाकों की लडकियां उच्च और प्रोफेशनल शिक्षा के ज़रिये सफलता हासिल करने की कोशिश में लगे हुए हैं . अभी २५ साल पहले तक जिन गावों की लड़कियों को उनके माता पिता , दसवीं की पढ़ाई करने के लिए २ मील दूर नहीं जाने देते थे , उन इलाकों की लडकियां दिल्ली, पुणे, बंगलोर नोयडा ,ग्रेटर नोयडा में स्वतन्त्र रूप से रह रही हैं और शिक्षा हासिल कर रही हैं . उनके माता पिता को भी मालूम है कि बच्चे पढ़ लिख कर जीवन में कुछ हासिल करने लायक बन जायेंगें . लेकिन अभी भारत के मध्यवर्गीय समाज में यह जागरूकता नहीं है कि शिक्षा के विकास के बाद जब पश्चिमी देशों की तरह बच्चे आत्म निर्भर होंगें तो उनको अपनी निजी ज़िंदगी में भी स्पेस चाहिए . उनको अपनी ज़िंदगी के अहम फैसले खुद लेने की आज़ादी उन्हें देनी पड़ेगी लेकिन ऐसा हो नहीं रहा है .छः साल पहले की बात है . झारखण्ड की पत्रकार निरुपमा पाठक के मामले ने मुझको विचलित कर दिया था .  उसके माता पिता ने उसे पत्रकारिता की शिक्षा के लिए दिल्ली भेजा, लड़की कुशाग्रबुद्धि की थी, उसने अपनी कोशिश से नौकरी हासिल की और अपनी भावी ज़िंदगी की तैयारियां करने लगी. अपने साथ पढने वाले एक लडके को पसंद किया और उसके साथ घर बसाने का सपना देखने लगी. जब वह घर से चली थी तो उसके माता पिता अपने दोस्तों के बीच हांकते थे कि उनकी बेटी बड़ी सफल है और वे उसकी इच्छा का हमेशा सम्मान करते हैं . लेकिन  वे तभी तक अपनी बच्ची की इज्ज़त करते थे जब तक वह उनकी हर बात मानती थी लेकिन जैसे ही उसने उनका हुक्म मानने से इनकार किया , उन्होंने उसे मार डाला . यह तो बस एक मामला है . ऐसे बहुत सारे मामले हैं .. इसके लिए बच्चों के माँ बाप को कसाई मान लेने से काम नहीं चलने वाला है . वास्तव में यह एक सामाजिक समस्या है . अभी लोग अपने पुराने सामाजिक मूल्यों के साथ जीवित रहना चाहते हैं . इसका यह मतलब कतई नहीं है कि वे नए मूल्यों को अपनाना नहीं चाहते . शायद वे चाहते हों लेकिन अभी पूंजीवादी रास्ते पर तो विकास आर्थिक क्षेत्र में पींगें मार रहा है लेकिन परिवार और समाज के स्तर पर किसी तरह का मानदंड विकसित नहीं हो रहा है . नतीजा यह हो रहा है कि पूंजीवादी आर्थिक और राजनीतिक व्यवस्था में भारत के ग्रामीण समाज के लोग सामन्ती मूल्यों के साथ जीवन बिताने के लिए मजबूर हैं . खाप पंचायतों के मामले को भी इसी सांचे में फिट करके समझा जा सकता है . सूचना क्रान्ति के चलते गाँव गाँव में लडके लड़कियां वह सब कुछ देख रहे हैं जो पश्चिम के पूंजीवादी समाजों में हो रहा है . वह यहाँ भी हो सकता है . दो नौजवान एक दूसरे को पसंद करने लगते हैं लेकिन फिर उन्हें उसके आगे बढ़ने की अनुमति सामंती इंतज़ाम में नहीं मिल पाती .समाज और राजनीति को ऐसी ही परिस्थितियों में हस्तक्षेप करना पडेगा . समाज में  लड़के लड़कियों को सम्मान की ज़िंदगी देने के लिए उनको खुदमुख्तारी के अधिकार देने पड़ेगें . और यह  कम सरकार और राजनीतिक  बिरादरी ही कर सकती है 
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लेखक विषय संवाद साभार अनुवादक

पहले वो आए साम्यवादियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं साम्यवादी नहीं था

 

फिर वो आए मजदूर संघियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं मजदूर संघी नहीं था

 

फिर वो यहूदियों के लिए आए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं यहूदी नहीं था

 

फिर वो आए मेरे लिए

और तब तक बोलने के लिए कोई बचा ही नहीं था

 

मार्टिन नीमोलर (1892-1984)