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आरक्षण में आरक्षण की राजनीति और भविष्य की राजनीतिक संभावनाएं

जंतर-मंतर - Thu, 31/08/2017 - 04:45


शेष नारायण सिंह
केंद्रीय मंत्रिमंडल ने एक ऐसे प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है जिसके बाद एक ऐसे आयोग का गठन किया जायेगा जो केंद्र सरकार की  नौकरियों में  पिछड़ी जाति के कोटे से मिलने वाले आरक्षण की समीक्षा करेगा . कोशिश यह होगी कि ओबीसी आरक्षण का फायदा उन् सभी पिछड़ी जातियों तक पंहुचे जो अभी तक भी हाशिये पर हैं. सरकार ने दावा किया है कि यह आयोग ओबीसी लिस्ट में शामिल जातियों को आरक्षण से मिलने वाले लाभ का न्यायपूर्ण वितरण उन जातियों को नहीं मिल पा रहा है जिनकी संख्या कम है .इस आयोग  से यह भी अपेक्षा की जायेगी कि वह अब तक नज़रंदाज़ की गयी पिछड़ी जातियों को न्याय दिलाने के तरीके भी सुझाए . केंद्रीय सूची में मौजूद सभी ओबीसी जातियों की नए सिरे से समीक्षा करने के लिए बनाए जा रहे इस आयोग के दूरगामी राजनीतिक पारिणाम  होंगें . मंत्रिमंडल के फैसले की जानकारी देते हुए केंद्रीय वित्तमंत्री अरुण जेटली ने बताया कि अभी तक  होता यह रहा  है कि संख्या में अधिक और राजनीतिक रूप से सक्षम जातियां अति पिछड़ों को नज़रंदाज़ करती रही हैं लेकिन उसको दुरुस्त करना ज़रूरी हो गया था इसलिए सरकार को यह फैसला करना पड़ा .२०१५ में हुए बिहार विधान सभा के चुनाव के दौरान आर एस एस के प्रमुख ,मोहन भागवत ने कहा था कि आरक्षण नीति की समीक्षा की जानी चाहिए . लालू प्रसाद यादव और उनके तब के चुनाव के सहयोगी  नीतीश कुमार ने मोहन भागवत के इस बयान को इतना बड़ा मुद्दा बना दिया था कि पिछड़ी जातियों की भारी संख्या वाले बिहार में बीजेपी बुरी तरह से चुनाव हार गयी  . मंत्रिमंडल की बैठक के बाद फैसलों की जानकारी देने आये अरुण जेटली से जब पूछा गया की क्या केंद्र सरकार मोहन भागवत की बात को ही अमली जामा पंहुचाने की दिशा में चल रही है तो उन्होंने साफ़ कहा कि ' सरकार के पास इस तरह का कोई प्रस्ताव नहीं है और न ही भविष्य में ऐसा प्रस्ताव होगा यानी उन्होंने मोहन भागवत की बात को लागू करने की किसी संभावना से साफ़ इनकार कार दिया . प्रस्तावित आयोग का सीमित उद्देश्य केवल मंडल कमीशन की जातियों की योग्यता की  श्रेणी का पुनार्विभाजन ही है और कुछ नहीं . केंद्रीय मंत्री की बात अपनी जगह है लेकिन यह तय है कि ओबीसी लिस्ट में संशोधन की बात पर ताक़तवर जातियों के नेता राजनीतिक स्तर पर हल्ला गुल्ला ज़रूर करेंगे . लगता  है कि लालू प्रसाद यादव की  २७ अगस्त की प्रस्तावित  रैली के लिए केंद्र सरकार और बीजेपी ने  बड़ा मुद्दा दे दिया है . यह भी संभव  है कि केंद्र सरकार लालू यादव और उनके साथ आने वाली पार्टियों की ताकत को भी इसी फैसले की कसौटी पर कसना चाह रही हो . ओबीसी की राजनीति के बड़े पैरोकार नीतीश कुमार शरणागत होने के बाद केंद्र सरकार को लालू यादव को चिढाने का भी एक अवसर हाथ आया है जिसका राजनीतिक लाभ होगा और केंद्र सरकार उसको लेने की कोशिश अवश्य करेगी .
मीडिया से मुखातिब अरुण जेटली ने बताया कि ग्यारह राज्यों में इस तरह की सूची पहले से  ही है जिसमे आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, झारखण्ड ,पश्चिम बंगाल, जम्मू, आदि शामिल हैं . ओबीसी   वर्ग में आरक्षण लेने के लिए क्रीमी लेयर की बात भी हुयी . अब तक सालाना आमदनी छः लाख रूपये वाले लोगों के बच्चे आरक्षण के लिए योग्य होते थे. अब वह सीमा बढाकर आठ लाख कर दी गयी है .बिहार और उत्तर प्रदेश दलित और ओबीसी राजनीति का एक प्रमुख केंद्र है . दक्षिण भारत में तो यह राजनीति स्थिर हो चुकी है बिहार और उत्तर प्रदेश में  ओबीसी की सबसे ताक़तवर जातियों यादव और कुर्मी का दबदबा  है . बीजेपी प्रमुख अमित शाह लोकसभा २०१४ चुनाव के दौरान उत्तर प्रद्देश के प्रभारी थे और विधानसभा २०१७ के दौरान तो वे पार्टी के  अध्यक्ष ही थे . इन दोनों चुनावों में उन्होंने गौर यादव ओबीसी और गैर जाटव दलितों को अपने साथ लेने का बड़ा राजनीतिक प्रयास किया . केशव प्रसाद मौर्य को राज्य की राजनीति में महत्व देना इसी रणनीति का हिस्सा था . यादव जाति को अलग थलग  करके समाजवादी पार्टी को  पराजित करने की  योजना की सफलता के बाद से ही ओबीसी जातियों को फिर से समायोजित करने की बात चल रही थी. ऐसा लगता है कि केंद्र सरकार को पिछड़ी जातियों के बारे में प्रस्तावित आयोग इसी राजनीति का हिस्सा है .
आरक्षण की राजनीति को  डॉ राम मनोहर लोहिया ने अफर्मेटिव एक्शन यानी सकारात्मक हस्तक्षेप नाम दिया था  . उनका दावा था कि  अमरीका में भी  इस तरह की राजनीतिक योजना पर काम किया गया था . अपने देश में सकारात्मक हस्तक्षेप के पुरोधा डॉ भीमराव आंबेडकर और डॉ राम मनोहर लोहिया माने जाते हैं . इन नेताओं की सोच को कांग्रेस ने भी अपनाया और संविधान में ऐसी व्यवस्था की गयी कि दलितों को सरकारी नौकरियों में आरक्षण दिया गया. संविधान के लागू होने के इतने  साल बाद सकारात्मक हस्तक्षेप के राजनीतिक दर्शन में अब कुछ सुधार की ज़रुरत महसूस की जा रही है . हालांकि आज के नेताओं में किसी की वह ताक़त नहीं है कि वह आज़ादी की लड़ाई में शामिल नेताओं की तरह वे तरीके भी अपना सकें जो चुनाव के गणित के हिसाब से अलोकप्रिय हों . लेकिन इतना तय है कि चुनावी लाभ हानि को ध्यान में रख कर ही सही सामाजिक बराबरी के बारे में चर्चा हो रही है . उस समय  दलितों को आरक्षण दिया  गया था. पिछड़ी जातियों को तो आरक्षण विश्वनाथ प्रताप सिंह के प्रधानमंत्री रहते दिया गया .उत्तर प्रदेश में  ओबीसी की राजनीति में सही तरीके से आरक्षण की बात हमेशा उठती रही है . ताक़तवर यादव और कुर्मी जाति के लोग बड़ी संख्या में  सरकारी नौकरियों पर मंडल कमीशन लागू होने के बाद से ही काबिज़ हो रहे थे और अति पिछड़ी जातियों में बड़ा असंतोष था .बीजेपी की ओर से जब राजनाथ सिंह मुख्यमंत्री बनाए गए तो उन्होंने राज्य की भावी राजनीति की इस दस्तक को पहचान लिया था .पिछड़ों की राजनीति के मामले में उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव की ताक़त बहुत ज्यादा थी. पिछड़े और दलित वोट बैंक को छिन्न भिन्न करके अपनी पार्टी की स्थिति को मज़बूत बनाने के लिए राजनाथ सिंह ने वही करने की कोशिश की जिसे बाद में बिहार की राजनीति में नीतीश कुमार ने अपनाया . नीतीश अपनी पार्टी के सबसे बड़े नेता हैं इसलिए वे अपनी योजना को लागू करने में सफल हुए लेकिन राजनाथ सिंह की किस्मत वैसी नहीं थी. उनकी टांग खींचने के लिए तो उत्तर प्रदेश में ही बहुत लोग मौजूद थे और उन लोगों को दिल्ली के नेताओं का आशीर्वाद भी मिलता रहता था .उत्तर प्रदेश के मुख्य मंत्री के रूप में राजनाथ सिंह ने सामाजिक न्याय समिति बनायी थी जिसने अति पिछड़ों के लिए आरक्षण के अन्दर आरक्षण की सिफारिश की थी . राजनाथ सिंह ने कहा था कि पिछड़ों के लिए तय आरक्षण में कुछ जातियां ही आरक्षण का पूरा लाभ ले लेती हैं जबकि अन्य पिछड़ी जातियां वंचित रह जाती हैं। समिति की सिफारिशें के आधार पर काम शुरू भी हो गया था . बहुत ही शुरुआती दौर था . यह योजना परवान चढ़ पाती कि आम चुनाव हो गए और भाजपा सत्ता में लौटी ही नहीं। मायावती ने बाद में इस श्रेणी को ख़त्म कर दिया . इसके बाद भाजपा ने भी समिति की रिपोर्ट को भुला दिया। बाद में तो बीजेपी में भी सामाजिक न्याय और आरक्षण के मामले पर गंभीर आन्तरिक चिंतन हुआ और अमित शाह ने २०१४ में उस चिंतन का  लाभ उठाया . चल रहा है . ज़ाहिर है आरक्षण से जुड़े मुद्दों की राजनीति करवट ले रही है .
संविधान निर्माताओं ने आरक्षण को सामाजिक  बराबरी के एक हथियार के रूप में लागू किया था लेकिन आरक्षण से उम्मीद के मुताबिक़ नतीजे नहीं मिले इसलिए उसे और संशोधित भी किया गया लेकिन आजकल एक अजीब बात देखने में आ रही है . वे जातियां जिनकी वजह से देश और समाज में दलितों को शोषित पीड़ित रखा गया था , वही आरक्षण की बात करने लगी हैं . पिछड़ी जातियों को सरकारी नौकरियों में आरक्षण देने के लिए बनी काका कालेलकर और मंडल कमीशन की सिफारिशों में क्रीमी लेयर की बात की गयी थी . इसका मतलब यह था कि जो लोग आरक्षण के लाभ को लेकर आर्थिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े नहीं रह गए हैं, उनके घर के बच्चों को आरक्षण के लाभ से अलग कर दिया जाना चाहिए लेकिन बहुत दिनों तक ऐसा नहीं हुआ. 
सामाजिक बराबरी के दर्शन शास्त्र के आदिपुरुष महात्मा फुले ने इसे एक बहुत ही गंभीर राजनीतिक परिवर्तन का हथियार माना है . उनका मानना था कि दबे कुचले वर्गों को अगर बेहतर अवसर दिए जाएँ तो सब कुछ बदल सकता है ... महात्मा फुले के चिंतन के केंद्र में मुख्य रूप से धर्म और जाति की अवधारणा है। वे कभी भी हिंदू धर्म शब्द का प्रयोग नहीं करते। वे उसे ब्राह्मणवाद के नाम से ही संबोधित करते हैं। महात्मा फुले ने समझाया कि जाति की संस्था समाज के प्रभुता संपन्न वर्गों के आधिपत्य को स्थापित करने का एक हथियार है.उनके हिसाब से जाति भारतीय समाज की बुनियाद का काम भी करती थी और उसके ऊपर बने ढांचे का भी। उन्होंने शूद्रातिशूद्र राजा,बालिराज और विष्णु के वामनावतार के संघर्ष का बार-बार ज़िक्र किया है। स्थापित व्यवस्था के खिलाफ महात्मा फुले के हमले बहुत ही ज़बरदस्त थे। वे एक मिशन को ध्यान में रखकर काम कर रहे थे। उन्होंने इस बात के भी सूत्र दिये,जिसके आधार पर शूद्रातिशूद्रों का अपना धर्म चल सके। वे एक क्रांतिकारी सामाजिक परिवर्तन की बात कर रहे थे। ब्राह्मणवाद के चातुर्वर्ण्‍य व्यवस्था को उन्होंने ख़ारिज़ किया,ऋग्वेद के पुरुष सूक्त का, जिसके आधार पर वर्णव्यवस्था की स्थापना हुई थी, को फर्ज़ी बताया और द्वैवर्णिक व्यवस्था की बात की।महात्मा फुले एक समतामूलक और न्याय पर आधारित समाज की बात कर रहे थे इसलिए उन्होंने अपनी रचनाओं में किसानों और खेतिहर मजदूरों के लिए विस्तृत योजना का उल्लेख किया है। स्त्रियों के बारे में महात्मा फुले के विचार क्रांतिकारी थे। मनु की व्यवस्था में सभी वर्णों की औरतें शूद्र वाली श्रेणी में गिनी गयी थीं। लेकिन फुले ने स्त्री पुरुष को बराबर समझा। उन्होंने औरतों की आर्य भट्ट यानी ब्राह्मणवादी व्याख्या को ग़लत बताया।
एक लम्बा इतिहास है सकारात्मक हस्तक्षेप का और इसे हमेशा ही ऐसा राजनीतिक विमर्श माना जाता रहा है जो मुल्क और कौम के मुस्तकबिल को प्रभावित करता है .केंद्रीय मंत्रिमडल की ओबीसी जातियों के फिर से वर्गीकरण की नीति का महत्व है और यह निश्चित रूप से उन  वर्गों को कष्ट देगी जो जन्म से तो ओबीसी हैं लेकिन कर्म से महात्मा फुले के प्रभुता संपन्न वर्ग में शामिल हो चुके हैं . हो सकता है कि बीजेपी ने राजनीतिक लाभ लेने और विरोधी को कमज़ोर करने के लिए ही यह कदम उठाया हो लेकिन इसके नतीजे महत्वपूर्ण होंगें .

निजता का अधिकार- पति पत्नी के जोक्स का उल्टा पुल्टा रूप-35

निजता का अधिकार ..... RIGHT TO PRIVACY !
,( शादीशुदा मर्दों के लिए )
अब पत्नी अपने पतिसे पूछ नहीं सकेगी ...
- वो कहाँ है ?
-कब आरहे हो ?
-किसके साथ हो ?
-किस से बातीं कर रहे हो ?
-तुम्हारी आय कितनी है ?
-कहाँ जा रहे हो ?
- अब तक कहाँ थे ?
इत्यादि ...इत्यादि
.
.
साथियों क्या सुप्रीम कोर्ट के निर्णय का मैंने सही अर्थ समझा है ? कृपया मेरी मदद करें और अपनी राय अवश्य दे।
निजता का अधिकार ..... RIGHT TO PRIVACY !
,( शादीशुदा औरतों के लिए )
अब पति अपनी पत्नी से पूछ नहीं सकेंगे...
- वो कहाँ है ?
-कब आ रही हो ?
-किसके साथ हो ?
-किस से बातें कर रही हो ?
-तुम्हारी आय कितनी है ?
-कहाँ जा रही हो ?
- अब तक कहाँ थी ?
इत्यादि ...इत्यादि
.
.
साथियों! क्या सुप्रीम कोर्ट के निर्णय का मैंने सही अर्थ समझा है ? कृपया मेरी मदद करें और अपनी राय अवश्य देI

किस्सा नेपाली बाबा

शैशव - Fri, 25/08/2017 - 21:06

ओडीशा के अनुगुल शहर के पास रंतलेई नामक एक गांव है। 1952 के आसपास वहां एक 14-15 वर्ष के किशोर को बाबा बना दिया गया। उसे स्थानीय मारवाड़ियों और व्यापारियों का सरंक्षण मिला हुआ था।हर तरह के रोग तथा विकलांगता बाबा की दवा से ठीक हो जाती है,यह प्रचार हो गया था।मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र से काफी पीड़ित रंतलेई पहुंचने लगे।मेले में व्यापारियों की कमाई होने लगी।इस इलाके की मशहूर समाज सेवी मालती चौधरी को परिस्थिति चिंताजनक लगी।वे कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी की ओडीशा में संस्थापकों में थीं। 1946 में प्रदेश कांग्रेस कमिटी की अध्यक्ष थी तथा संविधान सभा की सदस्य भी थीं ।दलित और आदिवासी बच्चों के लिए एक छात्रावास उसी इलाके में चलाती थीं।उन्होंने इस बाबा की चिकित्सा पर संदेह जताया तो बाबा के प्रायोजकों ने कहा कि इस वजह से मालतीदेवी के पांव में कीड़े पड़ गए हैं।गांव की कुछ महिलाएं पता करने आईं तब वे बर्तन साफ कर रही थीं।महिलाओं ने उनके पांव देखे और अफवाह के बारे में बताया।मालती देवी ने अपने पति नवकृष्ण चौधरी को हस्तक्षेप करने को कहा।वे तब ओडीशा के मुख्य मंत्री थे।उन्होंने कहा कि कानून व्यवस्था का उल्लंघन न होने पर हस्तक्षेप न होगा।बाबा के पास भीड़ इतनी होने लगी थी कि वहां हैजा फैलने लगा।तत्कालीन गवर्नर भी अपने पांव की विकलांगता को दिखाने नेपाली बाबा के पास पहुंचे थे।बहरहाल मालतीदेवी अपने दो युवा साथियों जगन्नाथ दास तथा दिवाकर प्रधान के साथ नेपाली बाबा के पास पहुंची और उससे कहा कि तुम्हारे जुटाए मेले से हैजा फैल रहा है और 400 के करीब लोग मर चुके हैं,इसलिए यह बन्द करो।नेपाली बाबा किशोर था उसके बदले उसके पृष्ठपोषक बोले,’यह कलकि है।जो हैजे से मर रहे हैं वे पापी हैं।’इस पर मालती देवी ने कहा कि एक थप्पड़ से इसका इलाज हो जाएगा’! जगन्नाथ दास ने इतने में एक थप्पड़ जड़ ही दिया।बाबा भागा और एक पेड़ पर चढ़ गया।जगन्नाथ दास शांति निकेतन में नंदलाल बसु के शिष्य थे तथा अनुगुल के बेसिक ट्रेनिंग कॉलेज में कला शिक्षक थे।

कानून-व्यवस्था का मामला बना तो पुलिस बाबा को जेल ले गई।शीघ्र ही वह रिहा हुआ।कुछ वर्ष बाद किसी अन्य मामले में वह जेल गया।जेल में उसकी मृत्यु हुई।

राम रहीम के भक्तों का ताण्डव देखने के बाद मालतीदेवी की बेटी श्रीमती कृष्णा मोहंती से किस्सा सुना।उन्हें राम रहीम के बारे में नहीं पता था।सुनने पर बताया कि ओडीशा में ऐसे दो तीन बाबा अभी जेल में हैं।

कृष्णा जी मेरी प्रिय मौसी हैं।


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गुम चोट : रेखा चमोली

लेखक मंच - Fri, 25/08/2017 - 12:35

रेखा चमोली

 नीलिमा हतप्रभ है। उसे समझ नहीं आ रहा, यह सब क्या हो रहा है। सीमा के पिताजी, मनोज की दादी, पडो़स के दिनेश चाचा और बाकि सारे लोग क्यों उसकी माँ पर इतना गुस्सा हो रहे हैं।

उसकी माँ तो चुपचाप अपना काम कर रही थी। वह भी बडी मैडम से पूछकर। सारे बच्चे मैडम के साथ कक्षा में काम कर रहे थे। अचानक बाहर शोर होने पर जब मैडम बाहर देखने आयीं तो वे सब भी पीछे-पीछे बाहर आ गये। बाहर आकर देखा, उनके गाँव के खूब सारे लोग बडी़ जोर-जोर की आवाज में बातें कर रहे हैं। उनकी बातों में अपनी माँ का नाम सुनकर वह पहले चौंकी, फिर घबरा गयी। शोर सुनकर उसकी माँ भी रसोईघर से बाहर आ गयी। सबने माँ को घेर लिया। वे सब माँ से बहुत नाराज थे। नीलिमा ने माँ की ओर देखा। माँ के चेहरे पर डर देखकर उसकी आँखों में आँसू आ गये। पिछले कई दिनों से जो अन्जाना डर उसे महसूस हो रहा था, उसके चलते उसे आज कुछ बुरा होने की आशंका होने लगी। वह दरवाजे का कोना थामकर चुपचाप एकटक माँ को देखने लगी। बडी़ मैडम ने लोगों से आराम से बैठकर बात करने को कहा, पर वे फिर भी शोर मचाते रहे।

‘‘मैडम जी, मेरे नातियों ने दो दिन से स्कूल में खाना नहीं खाया।’’ मनोज की दादी ने बडी़ मैडम से कहा।

‘‘क्यों ? क्यों नहीं खाया उन्होंने खाना?’’ बडी़ मैडम ने पूछा।

‘‘आपने जो नयी भोजनमाता लगायी है, उस कारण।’’

‘‘नयी भोजनमाता ने क्या खाना अच्छा नहीं बनाया या साफ-सफाई से नहीं बनाया।’’

‘‘ऐसी बात नहीं है बेटी, तुम तो सब समझती हो। यहाँ ये बच्चे इसके हाथ का बना खाना खाएँगे और घर आकर हमारे साथ खाना खाएँगे तो हमारा धर्मभ्रष्ट होगा कि नहीं। हम तो इन बच्चों का जूठा भी खाते हैं।’’ गोलू के दादाजी आगे आकर बोले, ‘‘हम जानते हैं, तुमने तो अपनी ड्यूटी निभानी ही थी, पर इन लोगों को तो विवेक होना चाहिये कि नहीं?’’

‘‘ये आप किस जमाने की बात कर रहे हैं?’’ नीरा मैडम बोलीं।

‘‘हम इसी जमाने की बात कर रहे हैं, मैडम जी। आप अभी के अभी नीलिमा की माँ को स्कूल से बाहर करो वरना ठीक नहीं होगा।’’ सीमा के पिताजी ने गुस्से से कहा।

‘‘हमने तो इसके घरवाले को पहले ही समझाने की कोशिश की थी, पर वो माना ही नहीं।’’पीछे से एक आवाज आयी।

बडी़ मैडम बार-बार आराम से बैठकर बात करने को कह रही थीं, पर लोग उनकी बात सुनने को राजी ही नहीं हो रहे थे। इतने में कुछ लोगों ने रसोई में जाकर खाना गिरा दिया और बाकि सामान भी इधर -उधर फेंक दिया। मनोज की दादी ने नीलिमा की माँ को रसोई के पास से खींचकर बाहर निकाला और जोर से धक्का दिया, जिससे वह नीचे गिर पडी़। नीलिमा दौड़कर माँ के पास गयी, तो मनोज की दादी ने ‘पीछे हट छोकडी़’ कहकर उसे दूर धकेल दिया।

नीलिमा रोने लगी। उसका छोटा भाई भी उसके पास आकर रोने लगा। मैडम और बाकि सारे लोगों की बातें सुनकर नीलिमा को ध्यान आया कि पिछले दो दिनों से उसकी माँ दूसरी भोजनमाता के साथ मिलकर स्कूल का खाना बना रही थी और पिछले दो दिनों से ही कुछ बच्चे स्कूल में खाना नहीं खा रहे थे। उन्हें मैडम ने डाँटा, जबरदस्ती खाना खाने बिठाया, लेकिन उन्होंने भूख नहीं है या मन नहीं कर रहा, कहकर खाना खाने से मना कर दिया। इस पर मैडम ने कहा कि कुछ दिनों में सब फिर से खाना खाने लगेंगे।

इन्होंने तो सारा खाना गिरा दिया। अब कहाँ से खाएँगे बच्चे खाना, नीलिमा सोचने लगी। अभी दो दिन पहले तक तो सब ठीक चल रहा था। उसकी माँ उसे और उसके छोटे भाई को सुबह जगाती, उनका हाथ मुँह धुलाती, स्कूल के लिए तैयार करती और दोनों भाई-बहन चल पड़ते स्कूल की तरफ। जिस दिन माँ को जंगल या खेतों में काम करने जल्दी जाना होता, उस दिन उसके पिता या दादी उन्हें तैयार करते। कभी-कभी जब सब लोग जल्दी काम पर चले जाते तो पडो़स की दादी या बुआ उन्हें आवाज देकर जगाते। उस दिन नीलिमा खुद को ज्यादा जिम्मेदार महसूस करती। वह छोटे भाई को जगाती, उसका नित्यक्रम करवाकर, हाथ-मुँह धुलवाकर तैयार करती। माँ की रखी रोटी और गुड टोकरी में से निकालकर खुद भी खाती, भाई को भी खिलाती। अगर स्कूल के लिए देर हो रही होती तो गुड को रोटी के अन्दर रखकर भाई के हाथ में दे देती, जिसे वह रास्ते में खाते-खाते जाता। कभी-कभी उसका भाई उठने में बहुत नखरे दिखाता, तब उसका मन करता कि उसे दो थप्पड लगा दे, पर थप्पड लगाने से वह रोने लगता और बहुत देर में चुप होता। इसलिए वह उसे कोई-न-कोई बहाना बनाकर उठाती। रास्ते में उन्हें और भी बच्चे मिलते। सारे बच्चे गपियाते, बतियाते, धकियाते, मस्ती करते स्कूल की तरफ चल पड़ते। स्कूल पहुँचकर स्कूल की सफाई करते, प्रार्थना करते, कविता-कहानी कहते-सुनते, कक्षा में काम करते। मध्यान्तर होने पर सारे बच्चे आँगन में लाइन बनाकर बैठते। भोजनमाता राहुल की माँ सबको बारी-बारी से दाल-भात परोसती। सारे बच्चे खाना खाते, अपनी-अपनी थाली धोते और खेलते। शुरू-शुरू में कुछ बच्चे अपनी थाली उठाकर बाकि बच्चों से दूर जाकर बैठते थे। कुछ बच्चे रसोई में ही खाना खाते थे। नीरा मैडम ने सारे बच्चों को एक साथ बिठाकर भोजनमाता को खाना परोसने को कहा, तबसे सारे बच्चे एक साथ बैठकर ही खाना खाते हैं। उसने कई बार नीरा मैडम को यह कहते हुए सुना कि ‘यह सब स्कूल में नही चलेगा। दुनिया कहाँ की कहाँ पहुँच गई और हम इन्हीं सब बातों में उलझे पडे़ हैं।’

कुछ दिनों पहले स्कूल में सारे अभिभावकों की एक बैठक हुई थी, जिसमें नीलिमा के पिताजी भी आए थे। उन्होंने घर आकर बताया कि स्कूल में एक और भोजनमाता की नियुक्‍त‍ि होने वाली है और नियमानुसार वह भोजनमाता अनुसूचित जाति की व बीपीएल कार्ड वाली ही होनी चाहिए। उन्होंने कल ही नीलिमा की माँ की अर्जी देने की बात घर में कही।

‘‘तेरा दिमाग तो खराब नहीं हो गया। कैसे बनाएगी तेरी बुवारी(बहू) स्कूल में खाना। उसका बनाया खाना बामनों और ठाकुरों के बच्चे कैसे खाएँगे?’’ दादा जी ने कहा।

‘‘खाएँगे कैसे नहीं। मेरी बुवारी को क्या खाना बनाना नहीं आता? वैसे भी उसे कौन सा अकेले खाना बनाना है। जोशी भाभी जी तो हैं ही वहाँ।’’

‘‘फालतू बात मत कर बेटा, शादी-ब्याह में तो तेरी बुवारी जाती नहीं खाना खाने कि वहाँ उसे सबसे बाद में खाना खाना पड़ता है। वो भी कोई दूसरा किनारे पर लाकर दे, तब। दाल-भात, हलवा-पूरी सब एक साथ मिलकर ‘कल्च्वाडी’ बन जाता है। अभी भी तेरी माँ ही जाती है, शादी-ब्याह में खाना लेने। तेरी बुवारी तो कहती है कि वैसे खाने से तो भूखा रहना ही ठीक है।’’

‘‘पिताजी, घर गाँव की बात और है, स्कूल में ऐसा कुछ नहीं होगा। सरकार चाहती है कि स्कूल में छोटा-बडा़, जात-पात का भेदभाव न रहे। बच्चों के मन में किसी तरह की हीनभावना न रहे, जिससे कि आने वाले समय में हमारे समाज से ये कुप्रथाएँ हमेशा के लिए खत्म हो जाएँ। इसलिए सरकार ने यह नियम निकाला है कि भोजनमाता अनुसूचित जाति की भी होनी चाहिए।’’

‘‘सरकार के चाहने से कुछ नहीं होता, बेटा। सरकार के चाहने से मदनू का बाप प्रधान बन गया तो बता, गाँव के कितने लोगों ने खाना खा लिया, उसके घर पर। अरे चार लोग उसके साथ बाहर कहीं चाय भी पीते हैं, तो अपना गिलास पहले ही अलग कर लेते हैं। बेटा क्यों पड़ रहा है इस चक्कर में, क्‍यों बैर ले रहा है सबसे, नी खाने देगा दो रोटी चैन से इस गाँव में।’’

‘‘पिताजी, क्या तुम यह चाहते हो कि जो दुर्व्‍यवहार  तुम्हारे-मेरे साथ हुआ, वो हमारे बच्चों के साथ भी हो। तुम भूल सकते हो, पर मैं वो दुत्कारना, हमारे साथ जानवरों से भी बदतर व्यवहार करना, हमें अपना जडखरीद गुलाम समझना, वो सब नहीं भूल सकता। हम सब सहन करते रहे तो क्या हमारे बच्चे भी करेंगे, नहीं बिल्कुल नहीं। मैं मर जाऊॅगा, पर अर्जी वापस नहीं लूँगा।’’

‘‘लेकिन बेटा।’’

‘‘पिताजी! तुम चुप रहो, मैंने जो सोच लिया वो सोच लिया। किसी-न-किसी को तो शुरुआत करनी ही होगी। देख लेंगे, जो होगा।’’

उसके पिता, दादाजी, दादी, चाचा, माँ सब देर तक जाने क्या-क्या बातें करते रहे। नीलिमा दादी की गोद में लेटे-लेटे सुनती रही। उसे भी ध्यान आया, पिछली बार जब वह दीपिका की बुआ की शादी में गयी थी, तो गुलाबजामुन देने वाले रविन्दर ने कैसे उसे डाँटा था और बाद में आने को कहा था। लेकिन जब सूरज और निशा ने गुलाबजामुन माँगें थे तो उन्हें कुछ भी नहीं कहा और गुलाबजामुन दे दिए थे। स्कूल में भी जब भोजनमाता बच्चों से पानी मॅगवाती तो उसे मना कर देती और डाँट देती। और उस दिन, जब पकड़न पकडा़ई खेलते-खेलते वह गरिमा के पीछे दौड़ते हुए उसकी रसोई तक पहुँच गयी थी, तो उसकी दादी ने उसको गाली देते हुए कैसे बाहर भेजा था। वह समझ नहीं पाती कि ऐसा उसी के साथ क्यों होता है, स्कूल में तो वह सारे बच्चों के साथ खेलती, पर घर आकर वे ही बच्चे अपने भाई-बहनों के साथ खेलने लगते और उसकी तरफ ध्यान ही नहीं देते। जब उनकी तरफ वाले नल पर पानी बन्द हो जाता तो वह बडे़ धारे पर पानी भरने जाती। वहाँ या तो उसकी बारी सबसे बाद में आती या फिर कोई महिला किनारे पर ही अपने बर्तन से उसका बर्तन भरकर उसे जाने को कहती। जबकि उसका मन पानी की मोटी धारा के नीचे भीगने, पानी पीने का हो रहा होता। कभी-कभी जब धारे पर कोई न होता, वह देर तक पानी से खेलती, हाथ-मुँह धोती, धारे के नरसिंह वाले मुँह पर प्यार से हाथ फेरती, इधर-उधर देखकर पता लगाना चाहती कि धारे के अंदर इतना पानी आता कहाँ से है। ऐसे में अगर ऊपर मोहल्ले से कोई पानी भरने आ जाता तो वह जल्दी से पानी भरकर लौट आती। पीछे से उसे सुनाई पड़ता, ‘‘सारा धारा गन्दा कर दिया।’’ वह जानती थी कि‍ वह आदमी पहले धारा खूब धोएगा फिर पानी भरेगा। वह सोचती- मैंने धारा कैसे गन्दा कर दिया। जब धारे के नीचे कपडे़ धोते हैं, नहाते हैं, बर्तन धोते हैं, तब तो धारा गन्दा नहीं होता! उसकी माँ तो कपडे़ धोने गधेरे पर ले जाती है। माँ कपडे़ धोती है और वह अपने भाई के साथ उन्हें पत्थरों पर सुखाने डालती है। बडा़ मजा आता है। गर्मियों में उनकी माँ उन्हें वहाँ नहला भी देती है।

कभी-कभी वह अपने भाई को लेकर ऊपर वाले मुहल्ले में खेलने जाती तो उसे वहाँ कोई-न-कोई ऐसा जरूर मिल जाता, जो बिना बात उनको वहाँ से डाँट कर भगा देता। वह घर आकर अपने पिता से उसकी शिकायत करती तो वह हँसकर उसकी बात टाल देते, पर वह देखती कि हँसने के बावजूद उसके पिता के चेहरे पर अजीब सा भाव आ जाता। उसके पिता दसवीं फेल थे और खच्चर चलाते हैं। उनकी बडी़ इच्छा है कि वह और उसका भाई खूब पढ़ें-लिखें और बडा़ आदमी बनें। वह कक्षा तीन में पढ़ती है और उसका भाई एक में। वह खूब मन लगाकर पढ़ती है। उसकी दोनों मैडम उससे बहुत प्यार करती हैं। जब भी स्कूल में कोई आता है, तो उसका नाम लेकर कुछ-न-कुछ बात जरूर करती हैं। उसे यह सब बडा़ अच्छा लगता है। उसे नीरा मैडम बहुत अच्छी लगती है। वह सारे बच्चों से प्यार से बात करती हैं। उनके साथ खेलती हैं और कभी-कभी उन्हें स्कूल के आसपास घूमाने भी लेकर जाती हैं। उसने सोचा है कि‍ वह भी बडी़ होकर मैडम बनेगी।

दूसरे दिन उसके पिता स्कूल में अर्जी दे आए। उसके बाद उनके घर में अक्सर उसके दादाजी और पिता में बहस होने लगी। उसके दादाजी बार-बार उसके पिता से अर्जी वापस लेने के लिए कहते, पर उसके पिता ने तो जैसे इस मामले में दादाजी की बात न मानने की कसम ही खा रखी थी। नीलिमा को अपने घर में छिडी़ इस बहस से इतना ही लेना-देना था कि खाना खाते समय अनचाहे ही उसे यह सब सुनना पड़ता था। एक बार उसने अपनी माँ से पूछा भी कि दादाजी उसको भोजनमाता क्यों नहीं बनना देना चाहते तो माँ ने ‘तेरे मतलब की बात नहीं है’ कहकर डपट दिया था। इसी तरह की बहस स्कूल में बडी़ मैडम और नीरा मैडम के बीच भी होती रहती। नीलिमा का ध्यान अपने आप इस बहस की तरफ चला जाता क्योंकि बहस के बीच में उसकी माँ को लेकर भी बातें होतीं। बडी़ मैडम नहीं चाहती थीं कि उसकी माँ भोजनमाता बने। इस पर नीरा मैडम कहती, ‘‘नियमानुसार जो ठीक है, वो ही होना चाहिए। हम जैसे पढे़-लिखे लोग सामाजिक कुरीतियों से नहीं लडे़ंगे, तो कौन लडे़गा।’’ बीच-बीच में और लोग भी स्कूल में आकर भोजनमाता बनने की बात करते। जब स्कूल में साहब आए तो बडी़ मैडम ने उनसे कहा, ‘‘आपने मुझे किस मुसीबत में डाल दिया। मैं किस-किस को समझाऊँ।’’

‘‘मैडम, हम क्या करें। नौकरी करनी है तो सरकारी आदेशों का पालन करना ही होगा। वैसे भी आपके स्कूल में अनुसूचित जाति के बच्चे बहुत ज्यादा हैं।’’ साहब ने कहा था।

नीलि‍मा को पता था कि‍ वह और उसका भाई भी अनुसूचित जाति के बच्चे हैं क्योंकि उन्हें छात्रवृत्ति मिलती है। एक बार गरिमा ने पंचगारे खेलते हुए जल्दी आउट होने पर उसे गाली भी दी थी, ‘‘तुम्हें तो छात्रवृत्ति भी मिलती है। फिर भी तुम गरीब हो! भिखमंगे कहीं के!’’ उसकी क्या गलती, अगर गरिमा को छात्रवृत्ति नहीं मिलती तो। वो भी बन जाए अनुसूचित जाति की। उसके पिताजी तो कागज बना कर लाए थे। मैडम को दिया था। ये अनुसूचित जाति क्या होता है, हम क्यों हैं अनुसूचित जाति के, सारे बच्चे अनुसूचित जाति के क्यों नहीं हैं, फिर सबको छात्रवृत्ति मिलती, गरिमा भी मुझसे नाराज नहीं होती। वह जाने क्या-क्या सोचती। जब माँ से कुछ पूछती तो माँ कहती, बडी़ होकर समझ जाएगी। उसे अपने बडे़ होने का इन्तजार होता।

कुछ भी हो नीलिमा और उसका भाई दोनों बहुत खुश थे। अब उनकी माँ भी रोज उनके स्कूल आएगी। जब वह स्कूल में उनको खाना देगी तो क्या के शर्माएँगे। दोनों भाई-बहन जाने क्या-क्या सोचते। नीलिमा सोचती- अगर उनको स्कूल में कोई बच्चा तंग करेगा तो वह उसकी शिकायत अपनी माँ से कर देगी। राहुल कितनी तडी मारता है, अपनी माँ की और उसकी माँ सब बच्चों को डाँटती रहती है। जैसे कि हमारी मैडम होगी हुँअ।

नीलिमा की माँ उठो! लो पानी पी लो। नीरा मैडम की आवाज से उसका ध्यान टूटा। नीरा मैडम उसकी माँ को उठाती हैं। उसकी माँ के नाक से खून निकल रहा है, जिसको वह अपने धोती के पल्लू से साफ करने की कोशिश कर रही है। रसोई घर के बाहर दाल-भात गिरा पडा़ है। बच्चों की थालियाँ इधर-उधर बिखरी हैं। नीलिमा अपनी माँ के पास जाना चाहती है, पर जा नहीं पा रही। उसका भाई उससे चिपक कर खडा़ रो रहा है। अचानक नीलिमा ने अपने भाई का हाथ पकडा़, अपना व उसका बस्ता उठाया और दौड़ पडी़ अपने घर की ओर। वह जल्द से जल्द अपने पिता के पास पहुँच जाना चाहती थी।

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संग्रह की दुंदुभी -  उम्मीद कि जल्दी ही प्रकट होगा।


श्रम की गांठ से उपजी कविताएं - राजू रंजन प्रसाद

कारवाँ - Tue, 22/08/2017 - 17:07
अपनी पीढ़ी के एक कवि की चर्चा धूमिल की पंक्ति से शुरू करने के लिए विज्ञजन से क्षमा की आशा रखता हूं। ‘कविता भाषा में आदमी होने की तमीज है।’ मैं इसे थोड़ा सुधारकर कहना चाहता हूं कि ‘आदमी’ होना कविता लिखे जाने की पहली और अनिवार्य शर्त है। व्यक्तित्व के फ्रॉड से ‘बड़ी’ कविता नहीं लिखी जा सकती। बड़ी कविता से मेरा मतलब महान कविता से कतई नहीं है। बड़ी कविता अपनी संपूर्ण रचना-प्रक्रिया में ‘जेनुइन’ होती है। यहां रचना-प्रक्रिया का उल्लेख अकारण नहीं है। समीक्ष्य काव्य-संग्रह ‘परिदृश्य के भीतर’ के कवि को मैंने पूरे एक दशक तक (यह क्रम अब भी जारी है) जाना और ‘झेला’ है। एक ईमानदार और मुखर आदमी को ‘झेलना’ सहज और आसान नहीं होता। इस कवि को मैंने जब भी अपने पास पाया-उसे बोलता-बड़बड़ाता हुआ ही पाया। इतने दिनों तक चप्पलें साथ चटखाने (घसीटने) के बाद मैंने यही महसूस किया कि ‘चुप्पी उसके लिए मौत से भी ज्यादा त्रासद और भयावह है।’
‘परिदृश्य के भीतर’ में सन् 1988 से 99 तक की कुल इक्यानवे कविताएं शामिल हैं। इन तमाम कविताओं का प्रथम पाठक/श्रोता होने का सौभाग्य मुझे प्राप्त हुआ है। इसलिए इन कविताओं की रचना-प्रक्रिया में आनेवाली एक-एक चीज से परिचित हूं। कइयों के तो मुझे दृश्य तक याद हैं कि किन परिस्थितियों में वह कविता जन्म ले रही थी। कहना होगा कि कुमार मुकुल की कविताओं का क्षितिज काफी विस्तृत है। घर-परिवार और आस-पास की चीज से लेकर अंतर्राष्ट्रीय परिदृश्य तक इनकी कविताओं में सहज भाव से शामिल होते हैं। इनकी कविता सोमालिया की दैन्य स्थिति से शुरू होती है और पहाड़, पत्नी से होती हुई महानगरीय जीवन से पलायन करती संवेदना तक को अपना निशाना बनाती है। प्रकृति पर इनके पास सबसे अधिक कविताएं हैं मानो वह उनकी मुट्ठी में हो।
‘सोमालिया’ संग्रह की सबसे छोटी कविता है, लेकिन इस छोटी-सी कविता के माध्यम से कवि विश्वव्यापी ‘कुलीन’ और बर्बर संस्कृति का सबसे अधिक प्रत्याख्यान करती है। पूंजीवाद के भ्रष्टतम रूप ने पूरी मानवीय संवेदना को किस हद तक अमानवीय बना डाला है,उसके पूरे अर्थशास्त्र को इन दो पंक्तियों की कविता से जाना जा सकता है। कविता की पूरी विकास-यात्रा को समझने के लिए इसको उद्धृत करना अत्यंत अनिवार्य है;
‘मुट्ठी भर
अन्न के लिए
गोलियां
मुट्ठी भर
और सभ्यता के कगार पर
आ पहुंचे हम।’
इसे उद्धृत करने का एकमात्र कारण यह नहीं है कि यह छोटी है और ऐसा करना मितव्ययी होना अथवा सुविधाजनक है, बल्कि यह संग्रह की कविता एवं कुमार मुकुल की चेतना का प्रस्थान-बिंदु है। यहां से मुकुल की कविता के कैनवास खुलते हैं।
इस ‘कुलीन’ और बर्बर संस्कृति का रक्तबीज है महान औद्योगिक क्रांति के गर्भ से उपजी बाजार की फासीवादी संस्कृति। उपभोक्तावाद ने हमारी तमाम संवेदना को ग्रस रखा है और बहुराष्ट्रीय कंपनियों की शक्ल में नव-फासीवादी ताकतें हमारे बीच फिर से पसरने लगी हैं। एक ईमानदार और संवेदनशील कवि भला इस अमानवीय, त्रासद स्थिति को अपनी नियति मानकर चुप कैसे बैठा रह सकता है। उसके पास इतने तफसील हैं इसके कि वह पूरी विनाशलीला को बगैर किसी धुंध के साफ-साफ देख रहा है। संग्रह की दूसरी कविता ‘कउआ’ इसी सत्य को उद्घाटित करती है। कउए को शायद पता नहीं कि बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने कितना खाद्य-अखाद्य बना डाला है। किसी को अलग से बताने की जरूरत शायद ही अब शेष हो कि प्रति-वर्ष लाखों की संख्या में गायों का निधन पॉलिथीन खाने से हो रहा है और हमारी अत्यंत ‘सहनशील’ हिंदू सभ्यता कुछ भी कर पाने में असमर्थ साबित हो रही है।
बहुराष्ट्रीय कंपनियों के आगमन को आये दिन सरकारी वक्तव्यों में जिस तरह पेश किया जा रहा है,लगता है, यह कोई महान् उपलब्धि हो। पचास वर्षों से अधिक के आजाद भारत के इतिहास में गुलामी की याद अब भी ताजा है और कवि की सचेत आंखें उसके फैलते जाल को अपनी पराधीनता का तंबू मान रही हैं। कहना होगा कि भारत में अंग्रेजों का आगमन एक विशुद्ध व्यापारिक कंपनी के रूप् में हुआ था लेकिन धीरे-धीरे देशी निजामों की अदूरदर्शिता और सामान्य जन की ‘कोउ नृप होहिं हमें का हानि’ वाली मुद्रा की वजह से शासक बन बैठे थे। आज स्थिति उससे दो कदम आगे तक जा चुकी है जब हम खुद उसके आने का जश्न मना रहे हैं और सारी दुनिया के सामने दांतें निपोरकर अपना अहोभाग्य बता रहे हैं। सूत्र रूप में यह कहना होगा कि कवि अपने दैनिक जीवन में गांधीवादी शैली से काम चलाते हैं। अपने आस-पास अभावों की एक दुनिया सृजित कर।
कुमार मुकुल से असहमति की गुंजाइश तब होती है जब वे कहते हैं,
‘संस्कृतियों के
इतने रंग-बिरंगे टीलों को छोड़
गंगा की ओर मुंह किए
कहां भागा जा रहा है कउवा।’
हमारे प्यारे कवि के लिए शहर संस्कृति के रंग-बिरंगे टीले से ज्यादा कुछ भी नहीं है। ‘कउवा’ मुकुल की अकेली कविता नहीं है जिसमें शहर के प्रति उपेक्षा का भाव है बल्कि संगह की जिस किसी कविता में भी शहर आता है,वह हीनता-बोध और अपराध-बोध की भावना से ग्रस्त होता है और कवि की कुपित संवेदना का शिकार होता है। इस प्रसंग में कवि की भिन्न-भिन्न कविताओं से चुनी गई पंक्तियों को यहां रखने की अनुमति चाहूंगा। ‘मर्यादाएं हम तोड़ेंगे’ कविता की अंतिम पंक्तियां कुछ इस तरह की हैं,
‘बंदरों-भालुओं से अंटी अयोध्या को
पीटेंगे बांधकर
इसी कंकरीट के जंगल में।’
ऐसा कहते हुए कवि अयोध्या की संपूर्ण ऐतिहासिक गरिमा और उससे जुड़ी हमारी जातीय स्मृतियों को एक गैर-जरूरी चीज साबित कर डालता है। एक और कविता है जिसका शीर्षक है-‘प्यार में’। कविता यों शुरू होती हैः
‘प्यार में महानगरों को छोड़ा हमने
और कस्बों की राह ली
अमावस को मिले हम और
आंखों के तारों की रोशनी में
नाद के चबूतरे पर बैठे हमने
दूज के चांद का इंतजार किया
और भैंस की सींग के बीच से
पश्चिमी कोने पर डूबते चांद को देखा।’
इससे पहले कि मैं कुछ कहूं कवि अपनी ‘पुतैये’ कविता का स्मरण करे। क्या शहर इतना अमानवीय है कि प्यार करने के लिए अब किसी को कस्बों की राह थामनी होगी ? कवि स्वयं लिखता है;
‘महानगर में अब भी तीखा है महुआ
अब भी सुंदर हैं लड़कियां यहां।’
कवि को शायद इस बात का अंदाजा हो कि कस्बों में जो प्रेम-संबंध हैं, जीवन का जो माधुर्य है, उसकी रक्षा के लिए लाखों मजदूर और भिन्न-भिन्न पेशों की चाह लिए नौजवान प्रति-वर्ष किसी-न-किसी शहर को अपना गंतव्य बनाते हैं। यहां उनके हाथों को काम और गांवों में चल रहे/पल रहे प्रेम-संबंधों को खुराक की नमी मिलती है।
शहर के प्रति कवि का जो नजरिया है वह ऐतिहासिक विकास की गलत समझ से बना लगता है। बाजार-संस्कृति का विरोध करने का यह मतलब कतई नहीं होता कि आप प्रगति ही के महत्व को नकार दें। शहर सिर्फ विषैला सर्प नहीं है जो हमेशा फन काढ़े बैठा हो कि कब आदमी आये और उसे डंस लें। अज्ञेय के यहां शहरों के लिए तिरस्कार का भाव है और गांवों का चित्रण ऐसा करते हैं मानों वहां हमेशा ‘ढोल और मादल’ बजते हों। कवि केदारनाथ सिंह के लिए शहर वैसी जगह है जहां इच्छाएं पलती हैं। अब इस सवाल का जवाब तो कुमार मुकुल ही देंगे कि क्या शहरों में स्वयं इसका विरोध करनेवाले कवि और लेखक नहीं बसते ? आपके पास आंकड़ों की कमी नहीं, और आप बता सकते हैं कि शहरों से गांवों के लिए दया की भीख मांगनेवाले कितने गंवई कवि हैं जिन्हें हम भी जानते हों। क्या हम इस बात को कहने का साहस कर सकते हैं कि कविता के जन्म लेने से पाठकों तक लाने का सारा कारोबार इन्हीं नगरों-महानगरों में अंजाम पाता है। हमारे ज्ञान को दुरुस्त करनेवाली कौन-सी किताब और ‘कठिन वक्त की कविता’ की कौन-सी पत्रिका है जिसके कारखाने गांव में हैं ?
शहरों का इतिहास हमारी प्रगति की कहानी कहता है जिसमें लाखों-करोड़ों मजदूरों का श्रम लगा है। संस्कृति के इन टीलों को निर्मित करने में हमारे फौलादी हाथ काम आये हैं। इन्हीं टीलों में किताबों से अंटे तंग से तंग कमरे में अरुण कमल जैसे सुकवि की आत्मा बसती है। उसके एक कोने में सूर्य की तरह उद्भाषित होता पितरिया लोटा भी होता है।
इसी प्रसंग से संबंधित ‘चबूतरा’ शीर्षक की दो कविताएं भी चर्चा की खासतौर से अपेक्षा रखती हैं। इसमें भी कुएं के माध्यम से गांव और शहर (माफ कीजिए, कवि इसे महानगर कहता है) की आत्मा का हमें फर्क बताया गया है। एक कुआं कवि के गांव में है जिसके
‘चबूतरे के पास ही
मेंहदी लगी थी
जो आज तक हरी है
दिन में जिस पर लंगोट सूखते हैं
और रात में उगते हैं सफेद सपने।’
आगे
‘एक कुआं है
महानगर में भी
बिना चबूतरे के
उसके निकट जाने पर ही
पता चलता है कि कुआं है।’
और ऐसा शायद इसलिए है कि ‘महानगर’ के कुएं के लिए कवि की कोई स्मृति नहीं है। इस कुएं के पास कवि ने शाम भी न गुजारी होगी, रात की कौन पूछे। इसीलिए कवि और उनके वर्ग के लोगों के लिए इसका महातम साल में केवल एक बार छठ के अवसर पर जगता है। लेकिन चाय की गुमटीवाला ऐसा नहीं सोचता जिसकी चाय के लिए पानी इसी कुएं से जाता है। सुबह-सुबह कुछ दूधिए भी अपना गेरू वहीं धोते हैं। भिखमंगे भी भरी दोपहरी में वहीं नहाते हैं। कवि को शायद यह मालूम हो कि यह मुहल्ला शहर का वह हिस्सा है जिसका शहरीकरण होना अभी बाकी है। पड़ोस के कई भूखंड अब भी खाली पड़े हैं जिनमे बिल्लियां चूहों के साथ बेखौफ खेलती हैं। जैसे ही अगहन में धान पकते हैं कि उसकी एक लरछी अपनी चोंच में दबाए गौरैया कवि के घर में दाखिल हो जाती है। लेकिन कवि हैं कि
‘कंक्रीट के इस जंगल में
मौसम की निर्जनता
मुझे ही नहीं
इस घरेलू चिड़िया को भी खलेगी।’
कविता का पैरा अभी खत्म भी न होने पाया कि कवि की राय महानगर को लेकर बदल जाती है। वे लिखते हैं, ‘इस नये बसते शहर के पड़ोस में धान की फसल कटेगी।’ शहर के गिर्द फसल की हरियाली हो तो कवि को भला क्या उज्र!
कुमार मुकुल की कविता की विशेषता इस बात में है कि बड़ी-से-बड़ी बात को कम-से-कम शब्दों में कह डालती है। इस लिहाज से संग्रह में कई ऐसी कविताएं हैं जिनमें स्थितियों का ऐसा जबर्दस्त चित्रण है कि एक साथ भाव के कई स्तर खुलते हैं। सामंती व्यवस्था और मानसिकता के विरुद्ध चल रहे नक्सलबाड़ी आन्दोलन को कवि दृश्य-चित्रण प्रस्तुत कर शब्दों की कितनी मितव्ययिता प्रदर्शित करता है-इसका बेहतर नमूना पेश करती है ‘पुतैये’ कविता। कविता की पंक्तियां कुछ इस तरह हैं;
‘यूं चरमराया तो था बांस की चांचर का दरवाजा
प्रतिरोध किया था जस्ते के लोटे ने
ढनमनाया था जोर से
चूल्हे पर पड़ा काला तावा भी
खड़का था
नीचे गिरते हुए।’
कितने कम शब्द और कहने के लिए कितनी बड़ी बात। कविता की इन पंक्तियों को पढ़ते हुए मुझे अनायास शमशेर की ‘उषा’ कविता की याद हो आई। अद्भुत चित्रात्मकता इन दोनों कविताओं की जान है। ऐसे ही विरल अवसर के लिए एंगेल्स ने कभी लिखा था कि विचार जितने ही छिपे हों लेखक के लिए उतना ही अच्छा है। क्या इन कविताओं में विचार छिप सके हैं ? एंगेल्स की इस उलटबांसी( ?) का कई जनवादी आलोचक तक ने अर्थ लगाया कि विचार कविता के लिए उपयुक्त नहीं है!
कवि जब अपनी दैनिक जिंदगी में बातचीत या बहसों में होता है तो सीधे हमला करता है लेकिन कविताओं में कई बार प्रकारांतर से चीजों को बे-पर्द करता है। एक कविता ‘बाई जी’ शीर्षक से है जो दरअसल पत्नी को संबोधित करके लिखी गई है। इस कविता के माध्यम से कवि ने घर के सामंती ढांचे की विद्रूपताओं को दिखाने की कोशिश की है। यह घर जिसे हमने सभ्यता-संस्कृति के विकास की एक खास अवस्था में गढ़ा था,आज इस बीसवीं शती के अंतिम दौर में भी एक स्त्री के अस्तित्व को लील जाना चाहता है। संस्कृति की सुरक्षा में खड़ी की गईं ये दीवारें एक स्त्री के गुनगुनाने मात्र से कैसे बेतरह कांपने लगती हैं। जिस भयावह स्थिति की ओर कुमार मुकुल ने ईशारा किया है, उसी भयावहता को दूर तक तानते हुए आलोक ने लिखा है घर की जंजीरें कितनी बड़ी दिखायी देती हैं जब कोई लड़की घर से भागती है। यहां नाटकीयता थोड़ी ज्यादा है।
मुकुल जी का संग्रह इस कारण से भी महत्वपूर्ण है कि वह श्रम की महत्ता को सीधे-सीधे स्थापित करता है। पूरा संग्रह ऐसी पंक्तियों से भरा है जो श्रम की दुनिया से कवि के जुड़ाव को प्रदर्शित करती है। निम्न मध्यवर्ग का वह तबका जो महान श्रम से जुड़ा नहीं होता शीघ्र ही अवसाद के गहरे अंधेरे में चला जाता है। बारी-बारी से तमाम चीजों की अर्थवत्ता समाप्त होने लगती है। श्रम हमें ऐसे अवसाद से बचाता है और व्यक्तित्व को एक दृढ़ आधार प्रदान करता है। इसीलिए हमारे कवि के जीवन में अवसाद पल-दो-पल की चीज है। उदासी डरावनी नहीं है बल्कि एक ‘धारदार हीरा’ है। कवि गहरे आत्मविश्वास से कहता है, ‘उदासी आंखों में पैठ गयी तो
सोचता हूं दौड़ूं और उदासी को
पीछे छोड़ दूं।’
ऐसा वही कह सकता है जिसमें काम करने की अदम्य लालसा हो। मुझे नेहरु की याद आती है जब वे कहते हैं, ‘शायद मुझे एक उड़ाका होना चाहिए था-इसलिए कि जब जिन्दगी का धीमापन और उदासी मुझ पर छाये, तो मैं उड़कर बादलों के कोलाहल में समा जाता।’ विज्ञजन कहेंगे, यह तो एक तरह का रोमान है। सही है; किन्तु यह जीवन और श्रम के महान उद्येश्यों से पैदा हुआ है। मुकुल की कविताएं श्रम की गांठ से उपजी कविताएं हैं।

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जंतर-मंतर - Mon, 21/08/2017 - 10:56
चर्चिल और जिन्ना की साज़िश का नतीजा था देश का बंटवारा
शेष नारायण सिंह
भारत का बँटवारा एक  बहुत बड़ा धोखा था  जो कई स्तरों पर खेला गया था. अँगरेज़ भारत को आज़ाद किसी कीमत पर नहीं करना चाहते थे लेकिन उनके प्रधानमंत्री विन्स्टन चर्चिल को सन बयालीस के बाद जब अंदाज़ लग गया कि अब महात्मा  गांधी की आंधी के सामने टिक पाना नामुमकिन है तो उसने देश के टुकड़े करने की योजना पर काम करना शुरू कर दिया .जिन्नाह अंग्रेजों के वफादार थे ही , चर्चिल ने देसी राजाओं को भी हवा देना शुरू कर दिया था . उसको उम्मीद थी कि राजा लोग कांग्रेस के अधीन भारत में शामिल नहीं होंगें . पाकिस्तान तो उसने बनवा लिया लेकिन राजाओं को सरदार पटेल ने भारत में शामिल होने के लिए राजी कर लिया. जो नहीं राजी हो रहे थे उनको नई हुकूमत की ताकत दिखा दी . हैदराबाद का  निजाम और जूनागढ़ का नवाब कुछ पाकिस्तानी मुहब्बत में नज़र आये तो उनको सरदार पटेल की राजनीतिक अधिकारिता के दायरे  में ले लिया  गया और कश्मीर का राजा  शरारत की बात सोच रहा था तो उसको भारत की मदद की ज़रुरत तब पड़ी जब पाकिस्तान की तरफ से कबायली हमला हुआ . हमले के बाद राजा डर गया और सरदार ने  उसकी मदद करने से इनकार कर दिया . जब राजा ने भारत के साथ विलय के दस्तावेज़ पर दस्तखत कर  दिया तो  पाकिस्तानी फौज और कबायली हमले को भारत की सेना ने वापस भगा दिया .लेकिन यह सब देश के बंटवारे के बाद हुआ . १९४५ में  तो चर्चिल ने इसे एक ऐसी योजना के रूप में सोचा रहा होगा जिसके बाद भारत  के टुकड़े होने से कोई रोक नहीं सकता था .  चर्चिल का सपना था कि दूसरे विश्वयुद्ध के बाद  जिस तरह से यूरोप के देशों का विजयी देशों ने यूरोप के देशों में प्रभाव क्षेत्र का बंदरबाँट किया था , उसी तरह से भारत में भी कर लिया जाएगा .अंग्रेजों ने भारत को कभी भी अपने से अलग करने की बात सोची ही  नहीं थी. उन्होंने तो दिल्ली में एक खूबसूरत राजधानी बना ली थी .  प्रोजेक्ट नई दिल्ली १९११ में शुरू हुआ था और महात्मा गांधी के असहयोग आन्दोलन और  सिविल नाफ़रमानी आन्दोलन की सफलता के बावजूद भी नयी इंपीरियल कैपिटल में ब्रिटिश हुक्मरान  पूरे  ताम झाम से आकर बस गए थे . 10 फरवरी 1931 के दिन नयी दिल्ली को औपचारिक रूप से ब्रिटिश भारत की राजधानी बनाया गया. उस वक़्त के वाइसराय लार्ड इरविन ने नयी दिल्ली शहर का विधिवत उदघाटन किया . १९११ में जार्ज पंचम के राज के दौरान दिल्ली में दरबार हुआ और तय हुआ कि राजधानी दिल्ली में बनायी जायेगी. उसी फैसले को कार्यरूप देने के लिए रायसीना की पहाड़ियों पर नए शहर को बसाने का फैसला हुआ और नयी दिल्ली एक शहर के रूप में विकसित हुआ . इस शहर की डिजाइन में एडविन लुटियन क बहुत योगदान है . १९१२ में एडविन लुटियन की दिल्ली यात्रा के बाद शहर के निर्माण का काम शुरू हो जाना था लेकिन विश्वयुद्ध शुरू हो गया और ब्रिटेन उसमें बुरी तरह उलझ गया इसलिए नयी दिल्ली प्रोजेक्ट पर काम पहले विश्वयुद्ध के बाद शुरू हुआ. यह अजीब इत्तिफाक है कि भारत की आज़ादी की लडाई जब अपने उरूज़ पर थी तो अँगरेज़ भारत की राजधानी के लिए नया शहर बनाने में लगे हुए थे. पहले विश्वयुद्ध के बाद ही महात्मा गाँधी ने कांग्रेस और आज़ादी की लड़ाई का नेतृत्व संभाला और उसी के साथ साथ अंग्रेजों ने राजधानी के शहर का निर्माण शुरू कर दिया . १९३१ में जब नयी दिल्ली का उदघाटन हुआ तो महात्मा गाँधी देश के सर्वोच्च नेता थे और पूरी दुनिया के राजनीतिक चिन्तक बहुत ही उत्सुकता से देख रहे थे कि अहिंसा का इस्तेमाल राजनीतिक संघर्ष के हथियार के रूप में किस तरह से किया जा रहा है . १९२० के महात्मा गाँधी के आन्दोलन की सफलता और उसे मिले हिन्दू-मुसलमानों के एकजुट समर्थन के बाद ब्रिटिश साम्राज्य के लोग घबडा गए थे . उन्होंने हिन्दू मुस्लिम एकता को तोड़ने के लिए सारे इंतज़ाम करना शुरू कर दिया था . हिन्दू महासभा के नेता वी डी सावरकर को माफी देकर उन्हें किसी ऐसे संगठन की स्थापना का ज़िम्मा दे दिया था जो हिन्दुओं और मुसलमानों में फ़र्क़ डाल सके . उन्होंने अपना काम बखूबी निभाया .उनकी  नयी किताब ‘ हिंदुत्व’ इस मिशन में बहुत काम आई . १९२० के आन्दोलन में दरकिनार होने के बाद कांग्रेस की राजनीति में निष्क्रिय हो चुके मुहम्मद अली जिन्ना को अंग्रेजों ने सक्रिय किया और उनसे मुसलमानों के लिए अलग देश माँगने की राजनीति पर काम करने को कहा . देश का राजनीतिक माहौल इतना गर्म हो गया कि १९३१ में नयी दिल्ली के उदघाटन के बाद ही अंग्रेजों की समझ में आ गया था कि उनके चैन से बैठने के दिन लद चुके हैं .
लेकिन अँगरेज़ हार मानने  वाले नहीं थे . उन्होंने जिस डामिनियन स्टेटस की बात को अब तक लगातार नकारा था , उसको लागू करने की बात करने लगे .१९३५ का गवर्नमेंट आफ इण्डिया एक्ट इसी दिशा में एक कदम था लेकिन कांग्रेस ने  लाहौर में १९३० में ही तय कर लिया था कि अब पूर्ण स्वराज चाहिए ,उस से कम कुछ नहीं . १९३५ के बाद यह तय हो गया था कि अँगरेज़ को जाना ही पड़ेगा . लेकिन वह तरह तरह के तरीकों से उसे टालने की कोशिश कर रहा था . अपने सबसे बड़े खैरख्वाह जिन्ना को भी नई दिल्ली के क्वीन्स्वे ( अब जनपथ ) पर  अंग्रेजों ने एक घर  दिलवा दिया था . जिन्ना उनके मित्र थे इसलिए उन्हें एडवांस में मालूम पड़ गया था कि बंटवारा होगा और फाइनल होगा . शायद इसीलिये जिन्ना की हर चाल में चालाकी नजर आती थी . बंटवारे के लिए अंग्रेजों ने अपने वफादार मुहम्मद अली जिन्ना से द्विराष्ट्र सिद्धांत का प्रतिपादन करवा दिया. वी डी सावरकार ने भी इस  सिद्धांत को हिन्दू महासभा के अध्यक्ष के रूप में १९३७ में अहमदाबाद के  अधिवेशन में अपने भाषण में कहा लेकिन अँगरेज़ जानता था कि सावरकर के पास कोई राजनीतिक समर्थन नहीं है इसलिए  वे जिन्ना को उकसाकर महात्मा गांधी और कांग्रेस को हिन्दू पार्टी के रूप में ही पेश करने की कोशिश करते रहे.आज़ादी की लड़ाई सन बयालीस के बाद बहुत तेज़ हो गयी .  ब्रिटेन के युद्ध कालीन प्रधानमंत्री  विन्स्टन चर्चिल को साफ़ अंदाज़ लग गया कि अब भारत से ब्रिटिश  साम्राज्य का दाना पानी उठ चुका है . इसलिए उसने बंटवारे का नक्शा बनाना शुरू कर दिया था . चर्चिल को उम्मीद थी कि वह युद्ध के बाद होने वाले चुनाव में फिर चुने जायेगें और प्रधानमंत्री  वही  रहेंगे इसलिए उन्होंने भारत के तत्कालीन वायसराय लार्ड वाबेल को पंजाब और बंगाल के विभाजन का नक्शा भी दे दिया था. उनको शक था कि आज़ाद भारत सोवियत रूस  की तरफ  जा सकता है और उसको कराची का बेहतरीन बंदरगाह मिल सकता है . उसक एबाद पश्चिम एशिया के तेल पर उसका अधिकार ज्यादा हो जाएगा .शायद इसीलिये चर्चिल ने जिन्ना को इस्तेमाल करके कराची को भारत से अलग करने की साज़िश रची थी .वाबेल तो चले गए लेकिन वह नक्शा कहीं नहीं गया . जब लार्ड माउंटबेटन भारत के वायसराय तैनात हुए तो  लार्ड हैस्टिंग्ज  इसमे ने जुगाड़ करके अपने आपको वायसराय  की चीफ आफ स्टाफ नियुक्त करवा लिया . उन्होंने युद्ध काल में चर्चिल के साथ काम किया था  इसलिये लार्ड इसमे बहुत भरोसे के आदमी थे और  चर्चिल ने  अपनी योजना को लागू  करने के लिए इनको सही समझा . प्रधानमंत्री एटली को भरोसे में लेकर  लार्ड हैस्टिंगज लायनेल इसमे , नए वायसराय के साथ ही आ गए . चर्चिल की बंटवारे की योजना के वे ही भारत में सूत्रधार बने . वे युद्ध काल में चर्चिल के चीफ मिलिटरी असिस्टेंट रह चुके थे .बाद में वे ही नैटो के गठन के बाद उसके पहले सेक्रेटरी जनरल भी बने. जब लार्ड माउंटबेटन  मार्च १९४७ में भारत आये तो उनका काम भारत में एक नई सरकार को अंग्रेजों की सत्ता  को सौंप देने का एजेंडा था . उनको क्या पता था कि चर्चिल ने पहले से ही तय कर रखा था कि देश का बंटवारा करना है .इसी विषय पर ब्रितानी फ़िल्मकार गुरिंदर चड्ढा की नई फिल्म आई है .फिल्म मूल रूप से अंग्रेज़ी में बनी है लेकिन हिंदी वालों के लिए डब कर के पेश की गयी है . अंग्रेज़ी फिल्म का नाम‘वायसरायज हाउस’ है जबकि हिंदी में इसका नाम ‘पार्टीशन:१९४७’ दिया गया है . हालांकि माउंटबेटन १९४७ में भारत आए  थे लेकिन उनको क्या करना है यह पहले से ही तय हो चुका था . यह अलग बात है उनको पूरी जानकारी नहीं थी .वे अपने हिसाब से ट्रांसफर आफ पावर के कार्य में  लगे हुए थे . फिल्म में लार्ड माउंटबेटन की शख्सियत को शुरू में इरादे के एक पक्के इंसान  के रूप में पेश किया गया है लेकिन बाद में वे एक निहायत ही लाचार और बेचारे व्यक्ति के रूप में नज़र आते हैं . फिल्म की अंतिम रीलों में उनको पता लगता है कि  उनको चर्चिल ने इस्तेमाल कर लिया है लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी  . गुरिंदर चड्ढा ने भारत के अंतिम वायसराय की  दुविधा को बहुत ही सलीके से फिल्माया है . दावा किया गया है कि यह फिल्म लैरी कालिंस और डामिनिक लैपियर की किताब ‘फ्रीडम ईट मिडनाईट ‘ और  नरेंद्र सिंह सरीला की किताब ‘ शैडो आफ द ग्रेट गेम : द अनटोल्ड स्टोरी आफ इंडियाज़ पार्टीशन ‘ से प्रेरणा ले कर बनाई गयी है .भारत के बंटवारे में अंग्रेजों की साज़िश की जानकारी तो शुरू से थी लेकिन नरेंद्र सिंह सरीला की किताब के हवाले से पता चला है कि उनको ब्रिटिश लायब्रेरी में एक ऐसा दस्तावेज़ मिला है जो यह बताता है कि चर्चिल ने १९४५ में ही पंजाब और बंगाल को बांटकर नक़्शे की शक्ल दे दी थी .  सरीला ने दावा किया है कि जब माउंटबेटन को पता चला कि वे  इस्तेमाल हो गए हैं तो उन्होंने बहुत गुस्सा किया और  अपने चीफ आफ स्टाफ हैस्टिंग्ज इसमे से कहा  कि आप लोगों के हाथ खून से  रंगे हैं तो जवाब मिला कि लेकिन तलवार तो आपके हाथ में थी.  उनको याद  दिलाया  गया कि  भारत के बंटवारे की योजना का नाम ‘ माउंटबेटन प्लान ‘ भी उनके ही नाम पर है . फिल्म में इस दृश्य को  बहुत ही अच्छी तरह से फिल्माया गया   है . एक दृश्य और भी यादगार है . जब पाकिस्तान के उद्घाटन के अवसर पर माउंटबेटन कराची गए तो जिन्नाह ने उनको  धन्यवाद किया . वायसराय ने जवाब दिया कि आप धन्यवाद तो चर्चिल को दीजिये क्योंकि आप के साथ मिलकर उन्होंने ही यह साज़िश रची थी . मैं तो इस्तेमाल हो गया . जिन्नाह ने जवाब दिया कि हम दोनों ही इस्तेमाल हुए हैं, हम दोनों ही  शतरंज की चाल में मोहरे बने हैं . नरेंद्र सिंह सरीला कुछ समय ताज लार्ड माउंटबेटन के ए डी सी रहे थे इसलिए उनकी बात पर विश्वास करने के अवसर उपलब्ध हैं . जानकार बताते हैं कि चर्चिल ने जिन्नाह को ऐसा पाकिस्तान देने का सब्ज़बाग़ दिखाया था  जिसमें बंगाल और पंजाब तो होगा ही , बीच का पूरा इलाका होगा जहां से होकर जी टी रोड गुजरती है ,वहा भी पाकिस्तान में ही रहेगा . शायद इसीलिये जब दो दूर  दराज़ के दो हिस्सों में फैला पाकिस्तान बना तो जिनाह  की पहली प्रतिक्रिया थी कि उनको ‘ माथ ईटेन पाकिस्तान ‘ मिला  है.बंटवारे के विषय पर एक और अच्छी फिल्म आई है और इतिहास के उस दौर में जाने का एक और मौक़ा मिलता है जिसके बारे में जानकारी अभी पता नहीं कब तक ताज़ा होती रहेगी 

मेरी बेटी का जन्मदिन यादों सिलसिला लेकर आता है

जंतर-मंतर - Mon, 21/08/2017 - 10:43


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शेष नारायण सिंह
आज से चालीस साल पहले इक्कीस अगस्त के दिन मेरी गुड्डी पैदा हुयी थी , इमरजेंसी हट चुकी थी, जनता पार्टी  की सरकार बन  चुकी थी. मोरारजी देसाई को प्रधानमंत्री बनाकर यथास्थितिवादियों ने यह सुनिश्चित कर लिया था कि इमरजेंसी  जैसे राजनीतिक काले अध्याय के बाद भी केवल इंदिरा गांधी की सरकार बदले ,बाकी कुछ न बदले . जो लोग इमरजेंसी के खिलाफ हुए जन आन्दोलन को राजनीतिक परिवर्तन की शुरुआत मान रहे थे , उनका मोहभंग हो चुका था . मैं दिल्ली में रहता था. आया तो  रोज़गार की तलाश में था लेकिन इमरजेंसी में कहीं कोई नौकरी नहीं मिल रही थी. मजबूरी में कुछ पढाई लिखाई भी कर रहा था , इसी दौर में कोई मामूली नौकरी मिली थी . जिन दिन नौकरी की खबर  मिली उसी दिन गाँव से कोई आया था ,उसने बताया कि घर पर बेटी का जन्म हुआ है. मैं दो साल से ठोकर खा रहा था , नौकरी की खबर के साथ ही बेटी के जन्म की खबर भी आई तो लगा कि बिटिया भाग्यशाली है, बाप को कहीं पाँव जमाने की जगह लेकर आयी है .  उससे  दो साल बड़ा उनक एक भाई है और उनसे छः साल छोटी एक बहन भी है . गुड्डी मंझली औलाद हैं.इमरजेंसी के दौरान  इंदिरा-संजय की टोली ने देश में तरह तरह के अत्याचार किये थे .इमरजेंसी लगने के पहले मैं अच्छा भला लेक्चरर था, मान्यताप्राप्त ,सहायता प्राप्त डिग्री कालेज का लेकिन अगस्त १९७५ में नौकरी छोड़नी पड़ी थी. उत्तर प्रदेश में कालेजों के प्रबंधन अब तो माफियातंत्र में बदल चुके हैं लेकिन उन  दिनों भी किसी से कम नहीं होते थे . बहरहाल इमरजेंसी लगने के बाद मेरी जो नौकरी छूटी तो उसके हटने के बाद ही लगी.  इमरजेंसी के दौर में मैंने बहुत सी बुरी ख़बरें सुनीं और देखीं लेकिन गुड्डी के जन्म के बाद लगता   था कि शायद चीज़े बदल रही थीं. लेकिन ऐसा नहीं था. मेरे जिले का ग्रामीण समाज अभी पुरानी सोच के दायरे में ही था . दहेज़ अपने विकराल रूप में नज़र आना शुरू हो गया था. हमारे इलाके के बिकुल अनपढ़ या दसवीं फेल लड़कों की शादियाँ ऐसी लड़कियों से हो रही थीं जो बी ए  या एम ए तक पढ़ कर आती थीं . ज़ाहिर है मेरी बेटी के जन्म के बाद भी इसी तरह की सोच  समाज में थी . लेकिन मैंने ठान लिया था कि अपनी बेटी को बदलते समाज के आईने के रूप में ही देखूँगा.  गुड्डी सांवली थी, बेटी थी, और एक गोरे रंग के अपने दो साल बड़े भाई की छोटी बहन थी. मेरे परिवार के शुभचिंतक अक्सर चिंता जताया करते थे . लेकिन गुड्डी की मां और दादी का फैसला था कि बच्ची को दिल्ली में उच्च शिक्षा दी जायेगी और समाज की रूढ़ियों को चुनौती दी जायेगी . गुड्डी दिल्ली आयीं , यहाँ के बहुत अच्छे स्कूल से दसवीं पास किया लेकिन इतने नम्बर नहीं आये कि उस स्कूल में उनको अगली क्लास में साइंस मिल सके .  आर्ट्स मिला और गुड्डी की समझ में आ  गया कि मेहनत से पढ़ाई किए बिना बात बनेगी नहीं.  बस फिर क्या था .गुड्डी ने कठिन परिश्रम किया और  दिल्ली विश्वविद्यालय के बहुत अच्छे कालेज, वेंकटेश्वर कालेज में दाखिला पहली लिस्ट में ही ले लिया .
गुड्डी जो भी तय कर लेती हैं उसको हासिल करती हैं . आज वे चालीस साल की हो गयी हैं , जीवन में अच्छी तरह से व्यवस्थित हैं, खुद भी बहुत अच्छे स्कूल में टीचर हैं और उनका बेटा दिल्ली के सबसे अच्छे स्कूल में छात्र है .अपनी पसंद के लड़के से अन्तर्जातीय शादी की और सामंती शादी ब्याह के बंधन को तोड़कर मुझे गौरवान्वित किया .  दिल्ली के एक पुराने परिवार में ब्याही गयी हैं . परिवार के सबसे आदरणीय व्यक्ति उनके अजिया ससुर समाज और क्षेत्र के बहुत ही मानिंद व्यक्ति हैं , रेलवे से अवकाश प्राप्त अधिकारी हैं , गुड्डी को बहुत स्नेह  करते हैं . नई दिल्ली स्टेशन के पास घर है , व्यापारिक परिवार है.दिल्ली में गुड्डी हमारी गार्जियन भी हैं .अपनी अम्मा की हर ज़रूरत का ख्याल रखती  हैं . थोड़ी जिद्दी हैं. उसी जिद को अन्य माँ बाप अपने बच्चों की दृढ़ निश्चय की प्रवृत्ति बताते हैं .अपनी शर्तों पर ज़िंदगी जीने वाली मेरी बेटी को आज उसका जन्मदिन बहुत बहुत मुबारक होगा , ऐसा मेरा विश्वास है. 

प्रीतीश नंदी

रविवार - Sun, 20/08/2017 - 21:30
सरकार के हाथ में आपकी प्राइवेसी

राम पुनियनी

रविवार - Sun, 20/08/2017 - 21:30
गांधी की जाति और कांग्रेसी विचारधारा

संदीप पांडे

रविवार - Sun, 20/08/2017 - 21:30
भारत में महिलाओं की स्थिति
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लेखक विषय संवाद साभार अनुवादक

पहले वो आए साम्यवादियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं साम्यवादी नहीं था

 

फिर वो आए मजदूर संघियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं मजदूर संघी नहीं था

 

फिर वो यहूदियों के लिए आए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं यहूदी नहीं था

 

फिर वो आए मेरे लिए

और तब तक बोलने के लिए कोई बचा ही नहीं था

 

मार्टिन नीमोलर (1892-1984)