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विकास के शोषण के रास्ते को नकार कर गांधी के रास्ते चलना होगा.

जंतर-मंतर - Sat, 10/06/2017 - 07:45


शेष नारायण सिंह

मध्य प्रदेश में  किसानों के लोकतांत्रिक विरोध प्रदर्शन पर सरकार ने गोलियां चलाकर कम से कम पांच किसानों को मार डाला है , अभी घायल लोग अपनी ज़िंदगी की लड़ाई लड़ रहे हैं .राज्य के  मुख्यमंत्री ने बताया है कि जिन लोगों को मारा गया है वे कांग्रेसी कार्यकर्ता थे. जिन को मारा गया है उनके परिवार वालों  को एक एक कारोड़ रूपये की सरकारी सहायता भी देने की घोषणा की गयी है .  सत्ताधारी पार्टी के नेता लोग दावा कर रहे हैं कि मरने वाले गुंडे थे . सरकार की तरफ से इस दिशाभ्रम पर बहुत सारे सवाल पैदा होते हैं और वे पूछे जाने चाहिए . विपक्ष की कहीं कोई खबर नहीं आ रही है . कांग्रेस के ऊपर तोड़ फोड़ का आरोप बीजेपी वाले ऐलानियाँ लगा रहे हैं लेकिन कांग्रेस की तरफ से कोई राजनीतिक बयान नहीं आया है . आमतौर पर जो कुछ भी कांग्रेसी नेता लोग कह रहे हैं उसको प्रतिक्रिया  की  श्रेणी में  रखा जा सकता है . मध्य प्रदेश की मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के सचिव बादल सरोज का बयान आया है और उन्होंने राज्य में  किसानों समेत अन्य राजनीतिक पार्टियों को लामबंद करना शुरू कर दिया है . सी पी एम के बयान में कहा गया है कि "  पीपल्या मंडी जिला मंदसौर में जैन मंदिर के सामने, बही पार्श्वनाथ फंटा (तिराहा) पर आंदोलनरत किसानों पर भीषण गोलीचालन की खबर विचलित कर देने वाला समाचार  है।  पुलिस द्वारा की गयी इस गोलीबारी  में अपुष्ट समाचारों के अनुसार तीन किसान मारे गए हैं तथा कोई दर्जन भर घायल हुए हैं। सीपीएम बेहद शर्मनाक मानती है कि जिस सरकार के मुख्यमंत्री ने इतने दिनों से शांतिपूर्ण तरीके से अपनी जायज मांगों को लेकर आंदोलनरत किसानों से कोई संवाद तक करना जरूरी नहीं समझा उलटे उन्हें अपमानित और लांछित करने वाली बयानबाजी करते रहे - उसी सरकार के गृह मंत्री द्वारा इस गोलीबारी पर कथित रूप से बयान दिया है कि किसानों ने खुद ही गोली मार ली होगी।  यह संवेदनहीनता और अशिष्टता की पराकाष्ठा है। ऐसे गृहमंत्री को बर्खास्त किया जाना चाहिए। 
किसान का बेटा होने का दावा करने वाले मुख्यमंत्री में  ज़रा भी नैतिकता है तो उन्हें इस्तीफा दे देना चाहिए। " इसके बाद शिवराज सरकार का राजनीतिक विरोध शुरू हो गया  है . खबर है कि कांग्रेस वाले भी कुछ कर रहे  हैं .
मध्यप्रदेश में तो  गोली चल गयी तो बड़ी खबर बन गयी लेकिन देश के कई  राज्यों में सरकारों के खिलाफ किसानों का आन्दोलन चल रहा है . महाराष्ट्र में तो एक दिन खबर आई कि आन्दोलन में समझौता हो गया है और किसानों ने अपना संघर्ष वापस ले लिया है . बाद में पता चला कि वह खबर गलत थी. हुआ यों था कि बीजेपी के सहयोगी एक किसान संगठन के लोग भी आन्दोलन में शामिल हो गए थे और जब  संघर्ष जोर पकड़ने लगा तो उन  लोगों ने सरकार से समझौता कर लिया . जब असली आन्दोलन के नेताओं को पता चला तो समझौता करने वाले नेताओं को अलग करके फिर से संघर्ष  शुरू हुआ.  संघर्ष जारी है .इसके पहले महाराष्ट्र के किसान आन्दोलन में सत्ताधारी पार्टी के प्रिय , अन्ना  हजारे भी शामिल होने के  फ़िराक में थे लेकिन उनको भी भगाया गया क्योंकि  किसानों को मालूम है  अन्ना हजारे  बीजेपी के बहुत करीबी माने जाते हैं .उनको यह भी पता है कि जो भी मिलेगा,  संघर्ष से ही मिलेगा क्योंकि १९९१ के बाद से डॉ मनमोहन सिंह ने अर्थव्यवस्था को पूंजीवादी विकास के पक्ष में खड़ा कर दिया है और उसके बाद से देश की सरकारें कल्याणकारी राज्य की  सीमा से  बाहर हो गयी हैं और बड़ी पूंजी की  पोषक सरकारें बन गयी हैं .  हर   सरकार का घोषित उद्देश्य बड़े औद्योगिक विकास को बढ़ावा देना है क्योंकि उनकी समझ  में औद्योगीकरण को विकास की मुख्य    धारा में रखने से ही देश और अर्थव्यवस्था ढर्रे पर चलेगी. पूंजीवादी विकास में गरीब आदमी या ग्रामीण आदमी की भूमिका केवल उपभोक्ता की होती है .किसान  खेती से जो भी उत्पादन करता है उसपर पूंजी का पूरी तरह नियंत्रण होता है और ग्रामीण इंसान औद्योगिक विकास का कच्चा माल भर होता है .  यहाँ यह देखना दिलचस्प होगा कि कोई भी प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री इस सांचे के बाहर नहीं जा सकता .  हां यह ज़रूर है कि किसान और गरीब का  नाम लोकसभा या  विधानसभा में बहुमत हासिल करने के लिए किया जाता है क्योंकि १२५ करोड़ लोगों  में उनका बहुत है और वे सरकार बनाने लायक बहुमत दे  सकते हैं . इसीलिये  किसानों की मुख्य समस्याएं चुनाव  अभियान के दौरान विमर्श का मुख्य विषय होती हैं और  चुनाव के बाद उनको टाल दिया जाता है . शिवराज सिंह  या नरेंद्र मोदी की  सरकार के लिए वे प्राथमिकता सूची से  बाहर रहती हैं क्योंकि किसानों  के कल्याण की योजनायें केवल  जुमला होती हैं , मनमोहन सिंह के आर्थिक दर्शन की अनुयाई कोई भी पार्टी  किसानों के भले के लिए कोई आर्थिक नीति बना ही नहीं सकती. चुनावी शिकंजे में किसान की बहुसंख्यक  वोट शक्ति को  फंसाने के लिए किसान की भलाई के नारे लगाए जाते हैं .
वास्तव में आज किसान जिस दुर्दशा  को झेल रहा है , महात्मा गांधी को उसका अनुमान शुरू से था. उन्होंने  देखा था कि किस तरह से ब्रिटिश साम्राज्य ग्रामीण क्षेत्रों और वहां रहने वालों का शोषण कर रहा था. सारी सरकारी स्कीमें बड़े और आद्योगिक शहरों या अंग्रेजों की सैरगाहों के लिए होती थीं. ऐसा इसलिए होता था कि औद्योगिक उत्पादन अंग्रेजों की शोषण की बुनियादी अवधारणा थी. इसीलिये गाँधी जी ने बताया था कि स्वतंत्र भारत में विकास की यूनिट गावों को रखा जाएगा. उसके लिए सैकड़ों वर्षों से चला आ रहा परंपरागत ढांचा उपलब्ध था . आज की तरह ही गावों में उन दिनों भी गरीबी थी .गाँधी जी ने अपनी किताब ग्राम स्वराज्य में लिखा है कि   " आर्थिक विकास की ऐसी तरकीबें ईजाद की जाएँ जिस से ग्रामीण इलाकों में रहने वाले लोगों की आर्थिक दशा सुधारी जा सके और उनकी गरीबी को ख़त्म करके उन्हें संपन्न बनाया सके.. अगर ऐसा हो गया तो गाँव आत्मनिर्भर भी हो जायेंगें और राष्ट्र की संपत्ति और उसके विकास में बड़े पैमाने पर योगदान भी करेंगें . " उनका यह दृढ विश्वास था कि जब तक भारत के लाखों गाँव स्वतंत्र ,शक्तिशाली और स्वावलंबी बनकर राष्ट्र के सम्पूर्ण जीवन में पूरा भाग नहीं लेते ,तब तक भारत का भावी उज्जवल हो ही नहीं सकता ....

लेकिन ऐसा हुआ नहीं. महात्मा गाँधी की सोच को राजकाज की शैली बनाने की सबसे ज्यादा योग्यता सरदार पटेल में थी . देश की बदकिस्मती ही कही जायेगी कि आज़ादी के कुछ महीने बाद ही महात्मा गाँधी की मृत्यु हो गयी और करीब २ साल बाद सरदार पटेल चले गए.. उस वक़्त के देश के नेता और प्रधान मंत्री जवाहरलाल नेहरु ने देश के आर्थिक विकास की नीति ऐसी बनायी जिसमें गावों को भी शहर बना देने का सपना था. उन्होंने ब्लाक को विकास की यूनिट बना दी.यहीं से गलती का सिलसिला शुरू हो गया..ब्लाक को विकास की यूनिट बनाने  का सबसे बड़ा नुकसान यह हुआ कि गाँव का विकास गाँव वालों की सोच और मर्जी की सीमा से बाहर चला गया और सरकारी अफसर ग्रामीणों का भाग्यविधाता बन गया. फिर शुरू हुआ रिश्वत का खेल और ग्रामीण विकास के नाम पर खर्च होने वाली सरकारी रक़म ही राज्यों के अफसरों की रिश्वत का सबसे बड़ा साधन बन गयी जो आज तक जारी है . नेहरू के बाद की सरकारें भी उसी रास्ते चलती रहीं लेकिन नेहरू की आर्थिक विकास की सोच में बड़े उद्योगों पर सरकारी नियंत्रण को प्रमुखता दी गयी थी. जिससे मुकामी पूंजीवादी उद्योगपति देश के आर्थिक विकास का लाभ तो ले सकते थे लेकिन देश की अर्थव्यवस्था को कंट्रोल नहीं कर सकते थे.डॉ मनमोहन सिंह ने जिस आर्थिक विकास की बुनियाद रखी उसके बाद बड़ी पूंजी के मालिकों  को अर्थव्यवस्था पर नियंत्रण करने के बहुत   अधिक अवसर मिल गए. आज जब लोग कुछ उद्योगपतियों द्वारा लाखों करोड़ रूपया डकार जाने की बात करते हैं तो उनको पता होना चाहिए कि पूंजीवादी आर्थिक विकास में  धन का मालिक औद्योगिक विकास पर तो नियंत्रण रखता है ,वह यह भी सुनिश्चित करता  है कि जो भी सरकारें जहां भी हों वे केवल और केवल उसके  हित में काम करें. मध्यप्रदेश , तमिलनाडु ,महाराष्ट्र, कर्नाटक,  राजस्थान, छतीसगढ़ आदि के सरकारें पूंजीपति वर्ग के हित में काम  कर रही हैं और वह अपनी तथाकथित विकास की नीतियों को लागू कर रही हैं . और जब उस मार्ग में कोई भी वर्ग बाधा डालने की कोशिश  करेगा तो उसको दण्डित किया जाएगा. मध्य प्रदेश के पीपल्या में सरकारी गोली  से हुयी किसानों की हत्या उसी पूंजीवादी अर्थशास्त्र को लागू करने की कोशिश है . जब तक लोगों की समझ में यह नहीं आयेगा कि सरकारें पूंजीवादी ताक़तों के हित में काम करती हैं तब तक किसी बदलाव की उम्मीद करना बहुत मतलब नहीं रखता.जिस तरह की सरकारों  की स्थापना १९९२ के बाद इस देश में होना शुरू हुयी है ,उनका उद्देश्य ही पूंजी पर आधारित विकास को बढ़ावा देना  है, औद्योगीकरण के विकास के लिए धन  और अवसर उपलब्ध कराना है . और  हर सरकार वही कर रही है . अगर इस   रास्ते से देश को बचाना होगा तो वैकल्पिक आर्थिक विकास  की बात करनी होगी जिसमें किसान और खेती को विकास की बुनियाद माना जाए, विकास का कच्चा माल नहीं . इसके लिए फिर से गांधी के  रास्ते पर लौटना होगा. ज़ाहिर है न्यस्त स्वार्थ ऐसा होने नहीं देगें लेकिन ब्रिटिश साम्राज्यवाद भी तो गांधी को वह नहीं करने देना चाहता था . लेकिन  गांधी  की बात मानी गयी और अंग्रेजों को जाना पड़ा . ऐसा इसलिए संभव हुआ कि महात्मा गांधी के साथ आम आदमी की ताकत थी . गांधी के   रास्ते पर दुबारा आर्थिक विकास को लाने के लिए गांधी का रास्ता ही अपनाना पडेगा .

ब्रिटेन में आम चुनाव के नतीजे: व्यवस्था के विकल्प की उम्मीदों के लिए शुभ संकेत- अक्षत

जनपक्ष - Fri, 09/06/2017 - 13:59
ब्रिटेन में आम चुनाव के परिणाम कॉर्पोरेट मीडिया घरानों और सर्वेक्षण एजेंसियों के लिए झटका हैं जिन्होंने इस बार प्रधानमंत्री थेरेसा मे और उनकी कंजरवेटिव पार्टी को जिताने के लिए पूंजीवादी लोकतंत्र के बुनियादी मानकों को भी ताक पर रख दिया था। ज्ञात हो कि यह चुनाव प्रधानमंत्री मे ने यूरोपीय संघ से पिछले वर्ष ब्रिटेन के निकल जाने के जनमत संग्रह के बाद पिछली कंज़र्वेटिव सरकार के कार्यकाल के बीच ,में ही रखवा दिए थे। पर लगता है मतदाताओं को उनकी यूरोपीय संघ से अलगाव की शर्तों पर वार्ता के लिए एक 'मज़बूत ' और 'स्थिर' नेतृत्व की अपील ज़्यादा भायी नहीं। सभी सर्वेक्षणों में थेरेसा में व कंज़र्वेटिव पार्टी को पिछली बार से ज़्यादा सीट और विपक्षीय लेबर पार्टी के आज की तमाम आर्थिक व अंतर्राष्ट्रीय नीतियों पर सुलझी हुई राय रखने वाले नेता जेरेमी कोर्बिन के लिए ज़बरदस्त हार और अस्तित्व की लड़ाई का डंका पीटा गया। अब तक आये नतीजों में सत्तापक्ष को सबसे ज़्यादा लेकिन पिछली बार से कहीं कम सीट मिली हैं , और नवउदारवाद और जनविरोधी नीतियों के समाज के निछले तबकों पर पड़ने वाले असर पर खुलकर बोलने वाले जेरेमी कोर्बिन की पार्टी ने अपेक्षा से ज़्यादा बेहतर प्रदर्शन किया है।
पिछले तीस वर्ष से पूंजीवादी सब्बसे भयानक स्वरुप नवउदारवाद की आर्थिक, राजनैतिक और सामाजिक जकड का कोई उत्तर नज़र नहीं आ रहा था। ब्रिटेन जैसे देशों में अस्पतालों, स्कूल व सार्वजनिक सेवाओं में फण्ड कटौती व निजीकरण से समाज में लोगों के भीख मांगने और सरकारी दया पर ज़िंदा रहने की नौबत आ गयी थी। सोवियत रूस के टूटने और यूरोपीय संघ के फैलने के साथ बड़ी कंपनियों ने मुनाफे के लिए पूर्वी यूरोप के सस्ते पड़ने वाले मज़दूर भरभर कर ब्रिटेन लाये। इधर मध्य पूर्व में अमेरिका की दखलंदाज़ी का पिछलग्गू बनकर अपने पूर्व साम्राज्यवादी स्वरुप के लौट आने के मुगालते में रहने वाले ब्रिटेन की सरकारों ने न सिर्फ एक बड़ा शरणार्थी संकट खड़ा किया बल्कि कट्टरपंथ के लिए रास्ते खोले और आतंरिक सुरक्षा पर भी ख़तरा मोल लिया। इन तीस सालों में यूरोप और अमेरिका के विकसित देशों में राजनैतिक पार्टियों में अंतर ख़त्म हो चला- सब एक सी आर्थिक नीतियां, मध्यवर्गीय अधिनायकवाद और मज़दूर वर्ग के प्रतिरोध को छितरा देने और उन्हें निराशाओं के जंजाल में अकेला घुटता छोड़ देने का पर्याय बन गयीं। खुद को सोशल डेमोक्रेटिक कहने वाली सेण्टर-लेफ्ट पार्टियों में 'लैफ्ट के नाम पर जनविरोधी आर्थिक नीतिओं पर थोथे अस्मितावाद और 'सामाजिक न्याय' की लफ़्फ़ाज़ी का कलफ चढ़ा दिया गया। ब्रिटैन में कभी ट्रेड यूनियन संघर्षों का पर्याय मानी जाने वाली लेबर पार्टी नब्बे के दशक में टोनी ब्लेयर के नेतृत्व में 'न्यू लेबर' में बदल गयी जहाँ बात-बात पर दुसरे देशों पर बम गिराना और अस्थिरता पैदा करना विदेश नीति का पर्याय बन गया और आर्थिक नीतियों में बड़ी कॉर्पोरेट कंपनियों को ज़बरदस्त छूट दी गयी। सन 2008 में स्टॉक मार्किट और हवा-हवाई विकास दर पर आधारित र्नीतियों का बुलबुला लालची शेयर दलाल और कंपनियों के लालच की अति से फुस्स हो गया। सरकारों ने घाटे में जा रहीं कंपनियों को बचाने के लिए रही-सही सामाजिक सुरक्षा में और ज़्यादा कटौती शुरू की, जिसका प्रभाव हताश निम्न-वर्ग में रोष उतपन्न करने वाला था। अमेरिका में इस रोष का फायदा रिपब्लिकन पार्टी के धूर दक्षिणपंथ ने डोनाल्ड ट्रम्प की जीत से उठाया। ब्रिटेन में शुरू में कोई वाम विकल्प न होने से पलड़ा नस्लभेदी समझ रखने वाली यूके इंडिपेंडेंस पार्टी की और मुड़ा। फिर 2015 का चुनाव आया और टोनी ब्लेयर की दोगली नीतियों ने लेबर पार्टी का आधार और खिसका दिया। अस्तित्व को जूझ रही पार्टी में शीर्ष नेतृत्व के लिए फिर चुनाव हुए। पार्टी के मूल में उभर रहे असंतोष को शांत करने के लिए एक सतही कदम के रूप में अब तक पार्टी के हाशिये पर रहे लेबर सोशलिस्ट धड़े के एक नेता को 'चुनाव को ज़्यादा लोकतान्त्रिक' बनाने के नाम पर खड़ा करवा दिया गया। पार्टी नेतृत्व का दांव उनपर तब उलटा पड़ गया जब बहसों और प्रचार के दौरान जेरेमी कोर्बिन अब तक हताश ट्रेड यूनियन, युवाओं और प्रगतिशील तबके के लिए विकल्प बनकर उभरे। तीस से ज़्यादा सालों से ट्रेड यूनियन संगठनकर्ता, पार्टी की सरकार में रहते हुए आर्थिक नीतियों और इराक युद्ध से लेकर परमाणु हथियारों का जमकर विरोध करने वाले कोर्बिन अपने प्रतिद्वंदियों पर भारी पड़े। लेबर पार्टी के ब्लेयरवादी धड़े में हड़कंप मच गया और तत्कालीन कंज़र्वेटिव प्रधानमंत्री डेविड कैमरन ने सोशल मीडिया पर लिखा कि 'लेबर पार्टी अब राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा ख़तरा है'. सन 2016 में यूरोपीय संघ में रहने का जनमत संग्रह कैमरन के लिए वॉटरलू साबित हुआ जब वे कॉर्पोरेट के फायदे के लिए लायी गयी नीतियों से श्रमिक वर्ग में उभरे असंतोष का अंदाज़ा लगाने में नाकाम रहे। उनके इस्तीफे के बाद थेरेसा में ने खुद को मार्गरेट थैचर की तर्ज पर सशक्त नेत्री के रूप में पेश किया। इधर ब्लेयरवादी धड़े ने कोर्बिन को निकलवाने के लिए पार्टी सांसदों का अविश्वास प्रस्ताव पारित करवाया और दोबारा नेतृत्व के लिए चुनाव हुए। पर अब लेबर पार्टी की सदस्य्ता में न सिर्फ तीव्र संख्यात्मक वृद्धि हुयी बल्कि गुणात्मक बदलाव आया। पढ़ाई में क़र्ज़ और नौकरियों में कटौती से हताश अब तक के अराजनैतिक युवा वर्ग ने कोर्बिन के लिए व्यापक समर्थन जुटाया। कोर्बिन फिर जीते और ब्लेयरवादियों का मुंह बंद हो गया। जैसे-जैसे कोर्बिन ने रोज़गार, शिक्षा, स्वस्थ्य, सार्वजनिक सेवाओं के निजीकरण वगैरह का सवाल उठाया और सीधे तौर पर उच्च वर्ग को निशाने पर लेते हुए उनके टैक्स में कटौती की जगह बढ़ौतरी की बात की, उनपर भीतरी और बाहरी हमले तेज़ हो गए। सनसनी जुटाने के लिए सेलिब्रिटी सितारों के घर के बाहर पहुँचने, उनके फोन हैक करने और ब्लैकमेल के लिए कुख्यात ब्रिटैन की टेबलायड प्रेस ने इसका बीड़ा उठाया। कोर्बिन को व्यक्तिगत रूप से निशाने पर लेकर उनकी छवि धूमिल किये जाने के प्रयास होने लगे। इराक युद्ध और दखलंदाज़ी की विदेशी नीति का उनका विरोध राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए ख़तरा बताया जाने लगा। उनकी आर्थिक नीतियों को 'कोरी कल्पना' बोला जाने लगा। यहाँ तक कि उनके व्यक्तिगत जीवन पर सवाल उठाये गए और उन्हें फिलिस्तीन और आयरलैंड में शांति बहाली का समर्थन करने के लिए आतंकवादियों के समर्थक का लेबल भी चस्पा कर दिया गया।
मज़ेदार बात यह है कि कोर्बिन का अजेंडा आर्थिक रूप से पिछली सदी के छठे दशक की वेलफेयर स्टेट नीति को जीवंत करना है, न कि आर्थिक संबंधों में मूल परिवर्तन करके पूंजीवाद ख़त्म करना। पर कॉर्पोरेट कंपनियों की मुनाफे की हवस इतनी बढ़ गयी है कि मोटे तौर पर आर्थिक दक्षिणपंथ और बाज़ारवादी तर्क समाज और राजनीती का कॉमन सेंस बना दिया गया है। इससे उपजे असंतोष, बेकारी, युद्ध और कट्टरपंथ पर ज़रा सुलझी बात करने वाला व्यक्ति अब 'हार्ड लैफ्ट या 'धुर वामपंती हो जाता है। ब्रिटिश प्रेस ने इस जुमले का इस्तेमाल कर लोगों के पूर्वाग्रहों को भड़काने की पूरी कोशिश की।
चुनाव घोषित होने पर जहाँ कोर्बिन ने मुफ्त शिक्षा, मुफ्त स्वस्थ्य, पेंशन बढ़ौतरी और रेल के दोबारा राष्ट्रीयकरण का प्रश्न उठाया, थेरेसा मे और उनके पिछलग्गू मीडिया ने इसे व्यक्ति-केंद्रित कर दिया। इधर ब्लेयरवादी लॉबी ने खुलेआम यह प्रचार शुरू किया कि कोर्बिन तो चुनाव जीत नहीं सकते, अतः उनकी 'अतीवादी' छवि से परेशान लेबर समर्थकों को ज़्यादा व्यवहारिक और माध्यममार्गीय सांसदों को चुन लेना चाहिए। चुनाव घोषणा की शुरुआत में सर्वेक्षण कंज़र्वेटिव पार्टी के लिए प्रचंड बहुमत और लेबर के लिए भारी नुक्सान दर्शाते रहे। पर समय के साथ सत्तापक्ष की बढ़त घटने लगी। प्रधानमंत्री में ने पूरा चुनाव यूरोपीय संघ से बाहर निकलने को लेकर होने वाले समझौते के लिए एक सशक्त छवि के ऊपर लड़ा। उन्होंने टेलीविज़न डिबेट भी हिस्सा नहीं लिया। वहीँ उनके लापरवाही से तैयार घोषणापत्र में वृद्धों को अपनी पेंशन के बदले ज़्यादा टैक्स देने की बात लीक हो गयी जिससे प्रधानमंत्री को बीच चुनाव पीछे हटना पड़ा। इधर लेबर के मैनिफेस्टो ने युवाओं और समाज के निम्न वर्ग में ज़बरदस्त उत्साह पैदा किया।
इसी बीच ब्रिटैन के अंदर एक बाद एक मेनचेस्टर और लंदन में दो आतंकी घटनाएं घटीं। पूरा विमर्श राष्ट्रीय सुरक्षा पर आ गया और मध्य पूर्व में आक्रामकता का विरोध करने का सुलझा पक्ष लेने वाले कोर्बिन मीडिया में देश के लिए खतरे का पर्याय बना दिए गए। इधर कंज़र्वेटिव पार्टी को नस्लभेदी यूकेआईपी का वोट स्थानांतरित होने लगा और इनके कैंप में प्रवासी विरोधी पक्ष का असर बढ़ने लगा। थेरेसा में ने ब्रिटिश भारतीय समुदाय को लेबर से तोड़कर रिझाने के लिए कोई कसर न छोड़ी। जेरेमी कोर्बिन का गुजरात दंगों पर मोदी का विरोध और उनकी आर्थिक नीतियां अभिजात्य व प्रतिक्रियावादी प्रवासी भारतीय हलकों में वैसे उल्लास नहीं जगा रहीं थीं। थेरेसा में ने बड़ी चालाकी से नरम हिंदुत्व का कार्ड खेला। कोर्बिन ने थेरेसा में के गृहमंत्री रहते पुलिस संख्या में की गयी भारी कटौती का बुनियादी सवाल उठाया, हालाँकि मुस्लिम आबादी की भावनाओं को ध्यान में रखकर ब्रिटैन के सऊदी अरब जैसे देशों से रिश्ते और कट्टरपंथी मदरसों की उसकी फंडिंग पर ज़्यादा खुलके न बोला। थेरेसा में ने चुनाव का अंत आतेआते अपना आधार खिसकता देखकर नस्लभेदी भावनाओं को भड़काने के लिए मानवाधिकार क़ानूनों को फाड़कर फेंक देने और संदेह के आधार पर हिरासत में लिए जा सकने जैसे काले क़ानून बनाने का वायदा किया। मीडिया में अंत तक इस बात पर जनता को बेवकूफ बनाया जाता रहा कि जहाँ कोर्बिन के लिए युवाओं का ज़बरदस्त समर्थन है, युवा वोट करने नहीं आते।
चुनाव में इन सभी झूठों की पोल खुल गयी है। कंज़र्वेटिव पार्टी और मीडिया की मुंगेरीलाली आकांक्षाओं पर पानी डालते हुए युवाओं ने इस चुनाव में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है। कोर्बिन का मुफ्त यूनिवर्सिटी शिक्षा का वायदा इनके लिए उम्मीद की किरण है। ध्यान रहे कि न सिर्फ कोर्बिन कॉर्पोरेट दुष्प्रचार, व्यक्तिवादी तुलनाओं और पूर्वाग्रहों से लड़ रहे थे, बल्कि ब्लेयराइट लॉबी ने पार्टी की एकता तोड़ने और अंदरूनी साज़िश में कोई कसर न छोड़ी। उसके बावजूद लेबर के वोट और सीट में ज़बरदस्त इज़ाफ़ा हुआ है। प्रतिकूल हालातों में यह बड़ी उपलब्धी है। सबसे ज़्यादा यह लेबर के विरोधियों को एक जवाब है कि कोर्बिन के नेतृत्व में पार्टी कभी चुनी नहीं जा सकती। कहाँ बहुमत बढ़ाने का लक्ष्य और कहाँ ब्रेक्सिट पर वार्ता से ठीक पहले त्रिशंकु संसद। बेशर्म मीडिया और बिके हुए विश्लेषक बड़ी बेशर्मी से अपने झूठ को छिपाकर स्क्रीन पर मुस्कुरा रहे हों पर भीतर हलचल है। निर्मम शोषण पर आधारित सामान्य दिन अब दूर की कौड़ी हैं। शायद थेरेसा में का इस्तीफा हो और छोटे दलों के समर्थन से एक अनिश्चित कंज़र्वेटिव सरकार बने।
इस नतीजे के भारत के लिए क्या मायने हैं? ब्रिटेन संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् का स्थायी सदस्य है। पुराने दिनों जैसी न सही, अभी भी उसकी एक अंतर्राष्ट्रीय साख है। वहां के प्रमुख विपक्ष में प्रगतिशील तबके का मज़बूत होना भारत में लोकतंत्र की लड़ाई में कुछ सहायता पहुंचा सकता है। कोर्बिन ने मोदी के गुजरात के नरसंहार की भूमिका पर ब्रिटिश संसद में कई निंदा प्रस्ताव लाये हैं। यहाँ साम्प्रदायिकता के खतरे से निबटने के तरीकों में अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मदद मिलना निश्चित तौर पर शुभ होगा। ज्ञातब्य रहे कि थेरेसा में ने इस बार ब्रिटिश भारतीय समुदाय को रिझाने के लिए हिंदी में अटपटे प्रमोशनल वीडियो बनवाने से लेकर मंदिर दर्शन तक हिंदुत्व और उच्च जातीय/वर्गीय चेतना को खूब सहलाया है। इधर कोर्बिन ने ब्रिटैन में जाति के आधार पर भेदभाव पर अंकुश लगाने के पक्ष में स्टैंड लिया है।
वे मध्य सीरिया और लीबिया में सैन्य हस्तक्षेप और शरणार्थी संकट के विरुद्ध खड़े हुए हैं। पर्यावरण और प्रवासी श्रमिकों के हक़ पर भी उनकी आवाज़ बुलंद रही है।
मुझे कोर्बिन के उभार का सबसे सकारात्मक पक्ष दुनियाभर में दमनकारी आर्थिक नीतियों और साम्प्रदायिकता/कटटरपंथ के ज़हर से लड़ रहे लोगों के लिए एक रोशनी की किरण का आना लगता है। अब तक पूरी दुनिया में विभिन्न तरह के शोषण-आत्याचारों का विरोध भी दक्षिणपंथ ने हाईजैक कर रखा था। अमेरिकी साम्राज्यवाद का इस्लामिक जिहाद व ट्रम्प की जीत इसके उदाहरण हैं। लेकिन भूमंडलीकरण के सपने बेचने वाली व्यवस्था जिस बर्बरता का डर दिखाकर विपक्ष समेट रही थी, उसके विकल्प में एक रेडिकल प्रगतीशील विकल्प उभरकर आने लगा है।यह सवाल कि क्या कोर्बिन वाम विपक्ष कहलाने के लायक हैं इस बात पर निर्भर करता है कि सिर्फ कुछ प्रतीकों तक सिमटना ही वाम है या सही समय पर सुलझे ढंग से सही बात कहना। कोर्बिन न तो माओ, लेनिन या स्टालिन का नाम जपते हैं न पूंजीवाद को उखाड़ फेंकने की बात करते हैं। उनकी पार्टी और उनका खुद का रुझान भी क्लासिकीय मार्क्सवादी दायरे में सोशल डेमोक्रेटिक ही होगा। पर क्या उन्होंने अब तक कोई ग़लत बात की है? मुझे कोर्बिन हमेशा वंचितों के पक्ष में खड़े बोलने वाले प्रतिकूल परिस्थितियों में डटे रहने वाले और नक़्क़ाली और ट्रम्प जैसे वाहियातपने के बरक्स एक मनुष्य लगते हैं। एक ऐसा मनुष्य जिसने अपने पूरे कैंपेन में व्यक्तिगत स्तर पर हमलों को नज़रअंदाज़ कर बड़े धैर्य से समाज के बीच की गैर-बराबरी पर अपनी बातें दुहरायी हैं। वाम उम्मीद की राजनीति होनी चाहिए और कोर्बिन निश्चित रूप से वह लेकर आये हैं।

वोट डालें, या राजनीति को फिर से गढ़ें?: आलें बादिऊ

हाशिया - Fri, 09/06/2017 - 12:32

दुनिया के जाने माने दार्शनिक, राजनीति और गणित के जानकार, उपन्यासकार और नाटककार आलें बादिऊ ने हाल में हुए फ्रांसीसी चुनावों के दौरान कुछ महत्वपूर्ण लेख लिखे हैं, जिनमें उन्होंने फ्रांस के खास राजनीतिक संदर्भ में राष्ट्रपति पद के उम्मीदवारों, पार्टियों और धाराओं पर बहस करते हुए मौजूदा दौर में पूरी दुनिया में दक्षिणपंथी रुझानों पर गौर किया है और ऐसे माहौल से आगे जाने और इंसानियत की मुक्ति के सवाल पर आगे की राह तलाशने की जरूरत पर जोर दिया है. इन लेखों में से हम दो लेखों को यहां पेश कर रहे हैं, जिनमें से मुख्यत: फ्रांस के स्थानीय चुनावी संदर्भ वाले अंशों को हटा दिया गया है. यहां पर दो भागों में पेश किए जा रहे इन लेखों के मूल फ्रांसीसी से अंग्रेजी अनुवाद क्रमश: “वोट, ऑर री-इन्वेंट पॉलिटिक्स” और “लेट्स लूज़ इंटरेस्ट इन इलेक्शंस, वंस एंड फॉर ऑल!” शीर्षक से वर्सो बुक्स के ब्लॉग पर पढ़ा जा सकता है. ये लेख भारत सहित दुनिया भर में मौजूदा राजनीतिक हालात की एक बेहतर समझ बनाने की दिशा में उपयोगी हैं, इस यकीन के साथ इन्हें यहां पेश किया जा रहा है. अनुवाद एवं प्रस्तुति: रेयाज उल हक

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पुरानी और जानी-मानी भूमिकाओं के इस रंगमंच में, राजनीतिक प्रतिबद्धता का बहुत थोड़ा सा ही मोल है, या फिर यह सियासी करतब के लिए एक बहाना भर है. इसलिए बेहतर होगा कि हम इस सवाल से शुरू करें: राजनीति क्या है? और एक पहचानी जा सकने वाली, घोषित राजनीति क्या है?

चार बुनियादी राजनीतिक नजरिए

कोई राजनीति हमेशा तीन तत्वों के आधार पर खुद को परिभाषित कर सकती है. इनमें से पहला तत्व है सामान्य जनता का समूह और साथ ही उसके काम और उसकी सोच. आइए, हम इसे “जनता” कहें. इसके बाद विभिन्न सामूहिक संगठन आते हैं: असोसिएशन, यूनियन, पार्टियां – कुल मिला कर वे सभी समूह जो सामूहिक कार्रवाई करने के काबिल होते हैं. आखिर में राजसत्ता के अंग – सांसद, सरकार, सेना, पुलिस – आते हैं लेकिन साथ ही आर्थिक और/या मीडिया सत्ता के हिस्से भी इसके भीतर आते हैं (यह एक ऐसा फर्क है जो अब करीब करीब ऊपर से दिखाई नहीं देता), या फिर हर वो चीज जिसे आज हम एक खूबसूरत लगने वाले और लोगों के दिलो-दिमाग पर छा जाने तरीके से “फैसला लेने वाले लोग” कहा करते हैं.

राजनीति, हमेशा ही इन तीन तत्वों के जरिए मकसद को हासिल करने से बनती है. इस तरह हम देख सकते हैं कि आधुनिक दुनिया में मोटे तौर पर चार बुनियादी राजनीतिक नजरिए पाए जाते हैं: फासीवादी, रूढ़िवादी, सुधारवादी और कम्युनिज्म (साम्यवादी).

रूढ़िवादी और सुधारवादी नजरिए विकसित पूंजीवादी समाजों का मध्यमार्गी संसदीय धड़ा (ब्लॉक) बनाते हैं: फ्रांस में वामपंथ और दक्षिणपंथ, संयुक्त राज्य अमेरिका में रिपब्लिकन और डेमोक्रेट वगैरह. इन दोनों नजरियों में बुनियादी तौर पर जो बात आपस में मिलती है वह ये है कि ये दोनों ही दावा करते हैं कि उनके बीच एक टकराव मौजूद है – खास तौर से इन तीनों तत्वों की अभिव्यक्ति के अर्थ में – इसके बावजूद इनमें से दोनों ही नजरिए संवैधानिक सीमाओं के भीतर रह सकते हैं और निश्चित रूप से रहते हैं.

इनसे अलग बचे दूसरे दोनों नजरियों, फासीवाद और कम्युनिज्म में, मकसद को लेकर अपने बीच के हिंसक विरोध के बावजूद जो बात एक जैसी है वो यह है कि दोनों ही मानते हैं कि राजसत्ता के सवाल पर विभिन्न पार्टियों के बीच के टकराव में, सुलह-समझौता नामुमकिन है: इसको किसी संवैधानिक सर्वसहमति का पाबंद नहीं बनाया जा सकता है. ये नजरिए अपने से विरोधी या यहां तक कि अपने से अलग किसी भी मकसद को समाज और राज्य की अपनी अवधारणाओं में शामिल करने से इन्कार करते हैं.

चहेता फासीवाद-परस्त नजरिया

हम राजसत्ता के उस संगठन के लिए “संसदीयतावाद” के नाम का इस्तेमाल कर सकते हैं जो चुनावी मशीनरी, अपने दलों और उनके अनुयायियों के जरिए रूढ़िवादियों और सुधारवादियों के साझे वर्चस्व को सुनिश्चित करता है. यह वर्चस्व हर जगह राज सत्ता पर फासीवादियों या कम्युनिस्टों के दखल की किसी भी गंभीर संभावना को खत्म करता है. हम जिसे “पश्चिम” कहते हैं, वहां पर यही राज्य का प्रभुत्वशाली रूप है. खुद इसके लिए एक तीसरे नाम की जरूरत है, जो इन दोनों मुख्य नजरियों के बीच आपस में तालमेल का एक साझा और ताकतवर आधार हो और जो इन दोनों का अटूट अंग हो और इनके अलावा भी जिसका वजूद हो. यह साफ है कि हमारे समाजों में नवउदारवादी पूंजीवाद यही आधार है. कारोबार और निजी दौलत को बढ़ाते जाने की बेपनाह आजादी, निजी संपत्ति के लिए पूरा सम्मान (अदालती व्यवस्था और भारी पुलिस बंदोबस्त जिसकी गारंटी करती है), बैंकों में भरोसा, युवाओं की शिक्षा, “लोकतंत्र” की ओट में होड़ (प्रतिस्पर्धा), “कामयाबी” की भूख,  बराबरी के नुकसानदेह और काल्पनिक चरित्र का बार-बार दावा करना: यह आम राय से कबूल की गई “आजादियों” का एक सांचा (मैट्रिक्स) है. ये वो आजादियां हैं जिनकी हमेशा गारंटी करने के लिए दोनों तथाकथित “शासनकारी” पार्टियां कमोबेश प्रतिबद्ध हैं.

पूंजीवाद का होना, संसदीय सर्वसहमति के मूल्य में कुछ अनिश्चितताएं लेकर आता है, और इस तरह चुनावी रस्मों के दौरान “बड़े” रूढ़िवादी या सुधारवादी पार्टियों में भरोसे को जाहिर किया जाता है. यह खास तौर से निम्न बुर्जुआ के लिए सही है, जिसकी सामाजिक हैसियत खतरे में होती है, या फिर मेहनतकश वर्ग के लिए, जो उद्योगों के धीरे-धीरे बंद होने से तबाह हो गए हैं. पश्चिम में हम यही देख रहे हैं, जहां एशियाई देशों की उभरती हुई ताकत के मुकाबले, हम एक तरह का पतन देख सकते हैं. आज का यह खास संकट साफ तौर पर फासीवादी, राष्ट्रवादी, धार्मिक, इस्लामविरोधी और युद्ध को पसंद करने वाले नजरिए का समर्थन करता है, क्योंकि खौफ एक बहुत बुरा सलाहकार है और संकट में डूबे ये खास समाज पहचान पर आधारित मिथकों की गिरफ्त में जाने को बेकरार हैं. सबसे बढ़कर इसलिए कि कम्युनिस्ट परिकल्पना मुख्यत: सोवियत संघ और चीन के जनवादी गणतंत्र के अपने पहले और राज्य आधारित संस्करणों की ऐतिहासिक नाकामियों की वजह बहुत बुरी तरह कमजोर होकर सामने आई है.

इस नाकामी के नतीजे खुद ब खुद जाहिर हैं: नौजवानों, वंचितों और बदहाल लोगों, रोजगार से बेदखल मजदूरों और हमारे उपनगरों के घुमंतू सर्वहारा इस बात पर यकीन करने लगे हैं कि कड़वाहट भरी पहचानों (अस्मिताओं), नस्लवाद और राष्ट्रवाद की फासीवादी राजनीति ही हमारी संसदीय सर्वसहमति का अकेला विकल्प है.

कम्युनिज्म, इंसानियत की मुक्ति

हालात ने जो रुख लिया है, अगर हम उसके खिलाफ हैं तो हमारे सामने सिर्फ एक ही रास्ता है: हमें कम्युनिज्म को फिर से गढ़ना होगा, उसमें जरूरी बदलाव करके उसे फिर से पेश करना होगा. अब यह जरूरी हो गया है कि बहुत अपमानित हो चुके इस शब्द को हम फिर से उठाएं, इसे साफ करें और फिर से इसकी रचना करें. यह इंसानियत की मुक्ति का हरकारा है, करीब दो सदियों से इसकी यही भूमिका रही है और ऐसा करते हुए इस महान नजरिए को हकीकत का समर्थन हासिल होता रहा है. अभूतपूर्व कोशिशों के कुछ दशक (जो इसलिए हिंसक थे कि इस दौरान बेरहमी से इसकी घेरेबंदी करके इस पर हमला किया गया जिसकी वजह से यह हार जाने के लिए अभिशप्त था) मजबूत इरादों वाले लोगों को इस बात का कायल नहीं बना सकते कि इस संभावना को हमेशा के लिए दफ्न कर दिया जाना चाहिए. वे हमें इसके लिए मजबूर भी नहीं कर सकते कि हम इसको जमीन पर उतार लाने की जिम्मेदारियों को हमेशा के लिए छोड़ दें.

इसलिए, क्या तब हमें वोट डालना चाहिए? बुनियादी तौर पर राज्य और इसके संगठनों की ओर से आने वाली इस मांग से हमें कोई फर्क नहीं पड़ना चाहिए. अब तक हमें यह मालूम हो जाना चाहिए कि वोट डालने का मतलब और कुछ नहीं बल्कि मौजूदा व्यवस्था के रूढ़िवादी नजरियों में से किसी एक को मजबूत करना है.

अगर हम इसके असली मतलब तक जाएं तो वोट जनता को राजनीति से दूर करने यानी उनको अराजनीतिक बनाने का एक उत्सव है. हमें जरूरी तौर पर शुरुआत यह करनी है कि हम हर जगह पर भविष्य के लिए कम्युनिस्ट नजरिए को फिर से बाकायदा स्थापित करें. इस पर पक्के तौर पर यकीन रखने वाले जुझारू लोगों को जरूरी तौर पर दुनिया भर के लोकप्रिय संदर्भों यानी हालात में, जगह-जगह पर जाकर इसके उसूलों की चर्चा करनी होगी. जैसा कि माओ ने कहा था, हमें जरूरी तौर पर “उलझन और भ्रम के बीच से जो कुछ भी हासिल है, उसे उसकी खासियत के साथ, जनता को समझाना होगा.” और राजनीति को फिर से गढ़ने का मतलब यही तो है.

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मैं खास कर मेलेनकोनिज्म से नाउम्मीद हो चुके लोगों की कड़वाहट को समझता हूं, जो चुनावों के पहले दौर के बाद अपने गुस्से और नाराजगी को जाहिर कर रहे हैं. इसके बावजूद, वे चाहे जो भी करें या कहें, इस चुनाव में कोई खास गैरमामूली बात या धांधली नहीं हुई थी.

हालांकि असल में पार्टियों में दो अंतर्विरोध रहे हैं, जिन्होंने अफसोसनाक रूप से (वास्तव में मौजूद शक्तियों के लिए) केंद्रीय संसदीय धड़े को बिखेर दिया. यह धड़ा परंपरागत वाम और दक्षिण से मिल कर बना था. चालीस बरसों से – बल्कि दो सदियों से – यह धड़ा स्थानीय पूंजीवाद के फलने-फूलने की हिमायत करता आ रहा है. इसके बावजूद तथाकथित वामपंथ के स्थानीय प्रतिनिधि ओलां फिर से खड़े नहीं हुए, और इससे उनकी पार्टी की कमर टूट गई. दूसरी तरफ परंपरागत दक्षिणपंथ है. चुनावों की अपनी बदनसीब प्रक्रिया (प्राइमरी) की बदौलत यह अपने बेहतरीन बूढ़े घोड़े आलें युप्पे को उम्मीदवार नहीं बना पाया, बल्कि इसकी मनहूस चेहरे वाली, मुफस्सिल की एक बुर्जुआ उम्मीदवार के बतौर चुनी गई, जो आधुनिक पूंजीवाद की “सामाजिक” पसंद से कोसों दूर है.

“सामान्य” दूसरा दौर (राउंड) ओलां बनाम युप्पे का रहा होता, या फिर सबसे खराब हालात में भी मुकाबला ले पां बनाम युप्पे का रहा होता, और इन दोनों ही हालात में युप्पे आसानी से जीत जाते. सरकार की दो जर्जर पार्टियों की गैरमौजूदगी में, दो सदियों से हमारे असली मालिक यानी पूंजी के मालिक और उसके प्रबंधकों को थोड़ी परेशानी उठानी पड़ी. किस्मत से (यानी अपनी किस्मत से), अपने हमेशा के राजनीतिक किरदारों के साथ मिलकर, प्रतिक्रियावाद के पुराने दिग्गजों और सामाजिक लोकतंत्र के बचे-खुचे तत्वों (वॉल, ले द्रिएं, सेगोलें रॉयल एंड कंपनी) की मदद से, उन्होंने दम तोड़ रहे लावारिस केंद्रीय संसदीय धड़े की जगह लेने के लिए एक लायक चेहरा जुटा लिया. और वह चेहरा थे: इमानुएल मैक्रों. बहुत उपयोगी तरीके से और भविष्य को देखते हुए बहुत अहम तरीके से उन्होंने अपने मकसद के लिए फ्रांसुआ बेरो को भी इसमें लगा दिया, जो एक पुराने अनुभवी मध्यमार्गी संत हैं और सभी चुनावी जंगों और सबसे मुश्किल जंगों को भी देख चुके हैं. यह सारा कुछ बड़ी ठाठ-बाट के साथ अंजाम दिया गया और इतनी फुर्ती से किया गया कि यह एक रेकॉर्ड ही है. इसके नतीजे में अंतिम कामयाबी की तो खास गारंटी थी.

इन हालात में, जिनको समझाना पूरी तरह से मुमकिन है, वोट ने पहले की तुलना में कहीं अधिक साफ तौर पर इसकी तस्दीक कर दी है कि एक पूंजीवाद परस्त और दक्षिणपंथी नजरिया (जिसमें फासीवादी रूप भी शामिल है) इस मुल्क में चरम बहुमत में है.

बुद्धिजीवियों और नौजवानों का एक हिस्सा इसे देखने से इन्कार कर रहा है या फिर इस पर कड़वाहट भरे तरीके से अफसोस जाहिर कर रहा है. लेकिन यह क्या है? क्या लोकतांत्रिक चुनावों के ये आशिक लोग ये चाहते हैं कि कोई आए और इसे बदल दे कि लोग किसको वोट करें, जैसे कि आप अपनी गंदी कमीज बदलते हैं? जो लोग वोट डालते हैं, उन्हें हर हालत में बहुमत की मर्जी को कबूल करना होता है. सचमुच, नौजवानों और बुद्धिजीवियों के ये दो उक्त समूह दुनिया को अपने हालात और अपने सपनों के पैमाने से ही मापते हैं, और किसी नतीजे पर नहीं पहुंचते जहां पहुंचना जरूरी है: वह नतीजा यह है कि “लोकतांत्रिक” शब्द से उम्मीद करने लायक कुछ भी नहीं है.

1850 में नेपोलियन तृतीय ने यह देख लिया था कि वोट डालने का आम अधिकार (सार्वभौम मताधिकार) कोई खौफनाक चीज नहीं थी, जैसा कि रूढ़िवादी बुर्जुआ ने इसके बारे में कल्पना की थी, बल्कि यह एक सचमुच का वरदान था जो प्रतिक्रियावादी ताकतों के लिए एक अभूतपूर्व और अनमोल वैधता मुहैया कराता था. यह बात आज भी पूरी दुनिया में हर जगह सही है. नेपोलियन के वारिसों ने यह समझ लिया है कि कमोबेश सामान्य और स्थिर ऐतिहासिक हालात में, आबादी की बहुसंख्या हमेशा बुनियादी तौर पर रूढ़िवादी होती है.

इसलिए आइए, शांत दिमाग से एक नतीजे पर पहुंचने की कोशिश करते हैं. उन्माद में भर कर चुनावी नतीजों का मतलब लगाना और कुछ नहीं बल्कि एक बेकार की हताशा है. आइए, इसकी आदत डाल लें: अगर चार कारकों को ऐतिहासिक रूप से एक साथ नहीं लाया गया तो हमारी मौजूदा गुलामी की हालत पर कभी भी जानलेवा चोट नहीं पहुंचाई जा सकती है. और ये बातें चुनावी रस्मों से उतनी ही दूर हैं, जितनी दूर उनसे कोई चीज हो सकती है.

    1. ऐतिहासिक अस्थिरता की स्थिति, जो रूढ़िवादी जनमत पर हावी होकर उसे काबू में कर लेती है. अफसोस की बात ये है कि यह स्थिति संभावित रूप से ठीक ठीक एक युद्ध भी हो सकती है, जैसा कि 1870 में पेरिस कम्यून, 1917 में रूसी क्रांति या फिर 1937 और 1947 के बीच चीनी क्रांति के समय था.

    2. एक मजबूती से कायम किया गया विचारधारात्मक बंटवारा – विचारधारा के स्तर पर हमें यह बंटवारा करना है कि रास्ता सिर्फ एक नहीं है, बल्कि हमारे सामने दो रास्ते हैं. स्वाभाविक रूप से इसे सबसे पहले बुद्धिजीवियों के बीच अंजाम देना होगा लेकिन अंतिम तौर पर इसे खुद व्यापक जनता में स्थापित करना होगा. हमें राजनीतिक सोच के पूरे मुकाम को इस तरह खड़ा करने की जरूरत है कि हर चीज पूंजीवाद और कम्युनिज्म के बीच दुश्मनी भरे विरोध के इर्द-गिर्द स्थापित हो. इसमें इस विरोध के दूसरे आयामों की मदद भी ली जा सकती है. सरसरी तौर पर अपने पाठकों को मैं इस दूसरे रास्ते यानी कम्युनिज्म के उसूलों की याद दिलाना चाहता हूं: उत्पादन के साधनों, कर्ज और लेन-देन और निजी संपत्ति के खिलाफ प्रबंधन के सामूहिक स्वरूपों की स्थापना, श्रम को एक ही साथ अनेक रूपों में जाहिर होने को मुमकिन बनाना जिसे खास तौर से शारीरिक और बौद्धिक श्रम के रूपों के बीच फर्क ने अभी कुचल रखा है, हमेशा अंतरराष्ट्रीयतावाद पर अमल करना, और लोकप्रिय शासन के स्वरूपों पर काम करना, जो अलग-थलग राज्यों की किसी भी व्यवस्था के खात्मे के लिए काम करें.

    3. एक लोकप्रिय उभार – हमेशा की तरह यह पक्के तौर पर आबादी के एक छोटे से हिस्से का उभार होगा, लेकिन जो कम से कम राजसत्ता को स्थगित कर देगा. ऐसा एक उभार ऊपर दिए गए पहले बिंदु से जुड़ा हुआ है.

    4. एक मजबूत संगठन जो पहले तीनों बिंदुओं के बीच एक सक्रिय तालमेल को पेश करे, अपने दुश्मनों के बिखराव की दिशा में काम करे, जितनी जल्दी संभव हो उतनी जल्दी दूसरे बिंदु यानी कम्युनिस्ट रास्ते के ऊपर दिए गए उसूलों को अमल में लाने के लिए काम करे.

    इन चार बिंदुओं में से दो – पहले और तीसरे – एक खास हालात के बनने पर निर्भर हैं. लेकिन दूसरे बिंदु पर तो हम अभी से ही सक्रिय रूप से काम शुरू कर सकते हैं. और यही सबसे नाजुक पहल है. हम खास कर दूसरे बिंदु की रोशनी में बुद्धिजीवियों और सर्वहारा के तीनों रूपों की साझी बैठकों और कार्रवाइयों का समर्थन करते हुए चौथे बिंदु पर भी काम कर सकते हैं. बुद्धिजीवियों और सर्वहारा के जिन तीन रूपों के बीच काम किया जाना जरूरी है, वो हैं: सक्रिय मजदूर और निचले दर्जे के सरकारी कर्मचारी; पिछले तीन दशकों में उद्योगों की अंधाधुंध कमी का सबसे बुरा असर झेल रहे और नैतिक रूप से टूट चुके मजदूर परिवार; और अफ्रीका, मध्य-पूर्वी और एशियाई मूल के घुमंतू सर्वहारा.

    चुनावी नतीजों के बारे में जज्बाती होते हुए अवसाद में डूब जाना या शोर मचाना न सिर्फ बेकार है बल्कि नुकसानदेह भी है. यह एक दुश्मन इलाके में जाकर मोर्चा लेने जैसी बात है, जिसका कोई फायदा नहीं है और न ही जिससे कोई हल निकलने वाला है. हमें जरूरी तौर पर चुनावों से बेपरवाह होना होगा, जो अधिक से अधिक, शुद्ध रूप से एक रणनीतिक चुनाव होते हैं कि इस “लोकतांत्रिक” किस्से में हिस्सा लेने से बचा जाए, या फिर अपने माफिक एक खास हालात पैदा करने के नजरिए से इस या उस उम्मीदवाद का समर्थन किया जाए. ये खास हालात भी हम कम्युनिस्ट राजनीति के ढांचे के भीतर सटीक रूप से परिभाषित करते हैं, जिसका इस राजसत्ता की रस्मों से कोई रिश्ता नहीं होता. हमें अपना कीमती समय अपनी सच्ची राजनीतिक मेहनत में लगाना चाहिए. और यह काम ऊपर दिए गए चार बिंदुओं के दायरे में ही होना चाहिए.

    समयांतर, जून 2017 में प्रकाशित

    न कोई सरोकार, न कोई पॉलिसी फिर भी कहा "अन्नदाता सुखी भव"

    बीते 25 बरस का सच तो यही है कि देश में सत्ता किसी की रही हो लेकिन किसान की खुदकुशी रुकी नहीं। और हर सत्ता के खिलाफ किसान का मुद्दा ही सबसे बड़ा मुद्दा होकर उभरा। तो क्या ये मान लिया जाये कि विपक्ष के लिये किसान की त्रासदी सत्ता पाने का सबसे धारधार हथियार है और सत्ता के लिये किसान पर खामोशी बरतना ही सबसे शानदार सियासत। क्योंकि राहुल गांधी तो विपक्ष की राजनीति करते हुये मंदसौर पहुंचे लेकिन पीएम खामोशी बरस कजाकस्तान चले गये। कृषि मंत्री राधा मोहन सिंह दिल्ली छोड़ मंदसौर जाने के बदले बिहार चले गये। बाब रामदेव के साथ मोतीहारी में योग करने  लगे और किसानों के हालात पर बोलने की जगह योग पर ही बोलने लगे। तो क्या ये कहा जा सकता है कि राजनीति अपना काम कर रही है और किसान की त्रासदी जस की तस। यानी एक तरफ सत्ता योग कर रही है तो दूसरी तरफ विपक्ष सियासी स्टंट हो रहा है । दरअसल राजनीति के इसी मिजाज को समझने की जरुरत है क्योंकि किसान की फसल बर्बाद हो जाये तो मुआवजे के लाले पड़ जाते हैं।

    कर्ज में डूब वह खुदकुशी कर लेता है लेकिन भारत में विधायक-सांसद चुनाव हार कर भी विशेषाधिकार पाये रहता है। हर पूर्व विधायक सांसद को भी किसान की आय से 300 से 400 गुना ज्यादा कम से कम मिलता ही है। देश में किसान की औसत महीने की आय 6241 रुपये है लेकिन विधायक सांसद को पेंशन-सुविधा के  नाम पर हर महीने 2 से ढाई लाख मिलते हैं। तो नेताओं के सरोकार किसान के साथ कैसे हो सकते हैं और संसद के भीतर याद कीजिये तो किसानों को लेकर किसी भी बहस को देख लीजिये संकट कोरम पूरा करने तक का आ जाता है। यानी 15 फिसदी  संसद में किसानों की समस्या पर चर्चा में शामिल नहीं होते। तो फिर किसानों का नाम लेकर राजनीति साधने या सत्ता चलाने का मतलब होता क्या है। क्योंकि राजनीति कर सत्ता पाने के लिये हर राजनीतिक दल को चंदा लेने की छूट है। और चंदा संयोग से ज्यादातर वही कारपोरेट और औघोगिक घराने देते हैं, जिनका  मुनाफा सरकार की उन नीतियो पर टिका होता है जो किसानों के हक में नहीं होती। मसलन खनन से लेकर सीमेंट-स्टील प्लांट की ज्यादातर जमीन खेती की जमीन पर या उसके बगल में होती है।

    लेकिन मुश्किल इतनी भर नहीं है। राजनीति कैसे सांसद विधायक के सरोकार किसान-मजदूर से खत्म कर सिर्फ पार्टी के लिये हो जाते है ये एंटी डिफेक्शन बिल के जरीये समझा जा सकता है । मसलन मंदसौर की घटना पर मंदसौर के ही बीजेपी सांसद किसानों पर संसद में वोटिंग होने पर अपनी पार्टी के खिलाफ वोट नहीं दे सकते। यानी मंदसौर के किसान अगर एकजुट होकर स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशो को लागू कराने पर  अड जाये तो मंदसौर का ही सांसद क्या करेगा। व्हिप जारी होने पर पार्टी का साथ देना होगा । क्योंकि याद कीजिये बीजेपी ने भी 2014 के चुनावी  घोषणापत्र में 50 फीसदी न्यूनतम समर्थन मूल्य बढ़ाने का वादा किया। लेकिन 21 फरवरी 2015 को कोर्ट में एफिडेविट देकर कहा कि 50 फीसदी न्यूनतम  समर्थन मूल्य बढ़ाना संभव नहीं है। क्योंकि ऐसा करने से बाजार पर विपरित प्रभाव होगा । यानी चुनावी घोषणापत्र जैसे दस्तावेज में किए वादे का भी  कोई मतलब नहीं। तो फिर चुनावी घोषमापत्र और सरकारो के होने का मतलब ही किसानो के लिये क्या है। क्योंकि महाराष्ट्र में तो बकायदा पीएम और सीएम दोनो ने ही लागत से पचास फिसदी ज्यादा देने का वादा किया था । यानी नेताओं  के सरोकार जब सामाजिक और आर्थिक तौर पर किसानों के साथ होते नहीं है तो  पिर किसानों की बात करने वाला विपक्ष हो किसानों के बदले योग करते हुये कृषि मंत्री हैं। किसानों के जीवन पर फर्क पड़ेगा कैसे। क्योंकि देश की अर्थव्यस्था में किसानी कही टिकती नहीं मसलन देश के ही सच को परख लें।  किसानो पर कुल कर्ज है 12 लाख साठ हजार करोड का है जिसमें फसली कर्ज 7 लाख 70 हजार करोड का है तो टर्म लोन यानी खाद बीज का लोन 4 लाख 85 हजार  करोड का है। और उसके नीचे की लकीर बताती है कि देश के 50 कॉरपोरेट का चार लाख सत्तर हजार करोड़ रुपए का कर्ज संकटग्रस्त है यानी बैंक मान चुकी  है कि वापस आने की संभावना बहुत कम है। कॉरपोरेट को चिंता नहीं कि संकटग्रस्त कर्ज चुकाएगा नहीं तो क्या होगा क्योंकि उसे एनपीए मानने से लेकर री-स्ट्रक्चर करने की जिम्मेदारी सरकार की है। और एनपीए का आलम ये है कि वह 6 लाख 70 हजार करोड़ का हो चुका है । और इन सब के बीच बीते तीन बरस में केन्द्र सरकार ने देश के ओघोगिक घरानों को 17 लाख 14 हजार 461 करोड़ की रियायत टैक्स इंसेटिव के तौर पर दे दी है। तो देश में कभी एनपीए, टैक्स माफी या सकंटग्रस्त तर्ज पर बहस नहीं होती। हंगामा होता है तो किसानों के सवाल पर । क्योंकि देस में 26 करोड पचास लाख परिवार किसानी से जुडे है । तो फिर राजनीति तो किसानी के नाम पर ही होगी । और बाजार इक्नामी के साये तले किसान की अर्थव्यवस्था कहा मायने रखती है। और शायद यही से सवाल खडा होता है कि कर्जमाफी से भी किसान का जीवन बदलता क्यों नहीं।  

    ये सवाल इसलिए क्योंकि कर्ज माफी तात्कालिक उपाय से ज्यादा कुछ नहीं-लेकिन किसानों के दर्द पर अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकते हुए राजनेताओं ने इसी उपाय को केंद्रीय उपाय करार दे डाला है। सच तो यह है कि 70 बरस में ऐसी व्यवस्था नहीं हो पाई कि किसान खुद अपने पैर पर खड़ा हो सके। सिर्फ किसान ही क्यो पूंजी से पूंजी बनाने के खेल में जो नहीं है उसके लिये आगे बढने का या कहे जिन्दगी बेहतर बनाने को कोई इक्नामी प्लानिंग देश में हुई ही नहीं है । मसलन यूपी की दो तस्वीरों को याद कर लीजिये। राहुल गांधी की खाट सभा में लोग तीस सौ रुपये की खाट लूटने में ही लग गये और योगी की सभा के बाद लोग 40 रुपये का डस्टबीन लूटने में ही लग गये। जबकि दोनों ही किसान-मजदूर। सिस्टम को बेहतर बनाने की बात कर रहे थे। यानी देश में किसानों की जो माली हालत है, उसमें सुधार कैसे आये और किसान भी गर्व से सीना चौडा कर खेती करें, क्या ऐसे हालात देश में आ सकते है। ये सवाल इसलिये क्योंकि किसानी को बेहतर करने के लिए जो इंतजाम किए जाने चाहिए थे-वो तो हुए नहीं अलबत्ता दर्द से कराहते किसानों को कर्जमाफी के रुप में लॉलीपॉप थमाया गया। तो एक सवाल अब है कि क्या राज्य सरकारें किसानों का कर्ज माफ कर सकती हैं और क्या ऐसा करने से किसानों की दशा सुधरेगी। तो दोनों सवालों का जवाब है कि ये आसान नहीं। क्योंकि कई राज्यों का वित्तीय घाटा जीडीपी के 5 फीसदी से 10 फीसदी तक पहुंच गया है, जबकि नियम के मुताबिक कोई भी राज्य अपने जीडीपी के 3 फीसदी तक ही कर्ज ले सकता है । यानी पहले से खस्ता माली हालत के बीच किसानों की कर्ज माफी का उपाय आसान नहीं है क्योंकि राज्यों के पास पैसा है ही नहीं और विरोध प्रदर्शन के बीच कर्ज माफी का ऐलान हो जाए, बैंक कर्ज माफ भी कर दें तो भी साहूकारों से लिया लोन माफ हो नहीं सकता ।-किसान कर्ज माफी के बाद भी बैंक से कर्ज लेंगे और एक फसल खराब होते ही उनके सामने जीने-मरने का संकट खड़ा हो जाता है,जिससे उबारने का कोई सिस्टम है नहीं । फसल बीमा योजना अभी मकसद में नाकाम साबित हुई है । और कर्ज माफी की संभावनाओं के बीच भी किसान की मुश्किलें बढ़ती ही हैं,क्योंकि वो कर्ज चुकाना नहीं चाहता या चुका सकता अलबत्ता नए कर्ज मिलने की संभावना बिलकुल खत्म हो जाती है। तो सवाल कर्ज माफी का नहीं,सिस्टम का है। और सिस्टम का मतलब ही जब राजनीतिक सत्ता हो जाये तो कोई करें क्या  । तो होगा यही कि आलू दो रुपये किलो होगा और आलू चिस्प 400 रुपये किलो । टमाटर 5 रुपये होगा और टमौटो कैचअप 200 रुपये किलो । और संसद की कैंटीन में चिप्स है, कैचअप है । और पीएम भी कैंटीन की डायरी में लिख देते है, अन्नदाता सुखी भव ।

    २०१८ में होने वाले कर्नाटक विधानसभा चुनाव की पेशबंदी शुरू

    जंतर-मंतर - Wed, 07/06/2017 - 07:07



    शेष नारायण सिंह

    कर्णाटक विधान सभा का चुनाव मई २०१८  में होने की संभावना है . लेकिन राज्य में  अभी से चुनाव की तैयारी  पूरी शिद्दत से शुरू ही गयी है . बीजेपी ने भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों के बाद  तत्कालीन मुख्यमंत्री येदुरप्पा को हटा दिया था  लेकिन अब उनको फिर वापस लाकर राज्य में पार्टी की कमान थमा दिया है . पार्टी में भारी मतभेद हैं  लेकिन  पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ने उम्मीद का दिया जला दिया है . अमित शाह मूल रूप से आशावादी हैं . उन्होंने आशा की किरण तो  त्रिपुरा और केरल में भी दिखाना शुरू कर दिया है , कर्नाटक में तो खैर उनकी अपनी सरकार थी.अब बीजेपी को राजनीतिक जीवन में शुचिता भी बहुत ज़्यादा नहीं चाहिए क्योंकि हाल के यू पी और उत्तराखंड के  विधानसभा चुनावों में पार्टी ने कांग्रेस सहित विपक्षी पार्टियों के उन नेताओं को टिकट दिया और मंत्री बनाया जिनके खिलाफ बीजेपी के ही प्रवक्ता गण गंभीर भ्रष्टाचार के आरोप लगाते रहे हैं . गोवा और मणिपुर में भी जिस स्टाइल में सरकारें बनायी  गयीं, वह भी बीजेपी की पुरानी वाली शुचिता की राजनीति से बहुत दूर माना जा रहा है . इस पृष्ठभूमि में जब दोबारा येदुरप्पा को कर्नाटक की पार्टी सौंपने का  फैसला आया तो कोई ख़ास चर्चा नहीं हुयी.कर्नाटक की प्रभावशाली जाति लिंगायत से आने वाले  येदुरप्पा का प्रभाव राज्य में है . यह बात और साफ़ हो गयी थी जब उन्होंने बीजेपी से  अलग होने के बाद अपनी पार्टी बनाकर चुनाव को ज़बरदस्त तरीके से प्रभावित किया था . बीजेपी को उम्मीद है कि लिंगायत समूह का साथ तो मिल ही जाएगा और अगर पार्टी के अन्य बड़े नेता ईश्वरप्पा का जातिगत असर चल गया तो अच्छी संख्या में समर्थन मिल जाएगा  . यह देखना दिलचस्प कि कुरुबा जाति के ईश्वरप्पा  की ही बिरादरी के मुख्यमंत्री सिद्दिरामैया भी हैं . उनकी जाति की संख्या खासी है . ज़ाहिर है सिद्दिरमैया को कमज़ोर करने के लिए यह बाज़ी चली गयी है .
    जानकार बताते हैं कि कर्णाटक के वर्तमान मुख्यमंत्री को  कमज़ोर करके आंकने  की ज़रुरत नहीं है . कांग्रेसी आलाकमान की संस्कृति में  उनका मुख्यमंत्री के रूप में बचे रहना उनकी राजनीतिक  क्षमता का ही एक संकेत है . जब उनको २०१३ में मुख्यमंत्री बनाया गया तो कांग्रेस की अगुवाई वाली केंद्र में सरकार थी. उस वक़्त कर्णाटक के  इंचार्ज महामंत्री दिग्विजय सिंह थे . ऐसा माहौल बना कि कांग्रेस की सरकार बन गयी और बड़े बड़े कांग्रेसी वफादारों को दरकिनार करके सिद्दिरमैया ने सत्ता हासिल कर ली . उनके साथ बहुत सारे नेगेटिव भी थे . मसलन वे समाजवादी पृष्ठभूमि से आये थे और कांग्रेस की धुर विरोधी जनता पार्टी के सदस्य रह चुके थे लेकिन वफादार कांग्रेसियों के विरोध के बावजूद जमे रहे और आज तक जमे हुए हैं . अब बेंगलूरू में जो चर्चा है उसके अनुसार कांग्रेस के दिल्ली के नेताओं  में अब हिम्मत नहीं  है कि चुनाव के  पहले उनको हटा दिया जाए .२०१८ के मई महीने में संभावित विधान सभा चुनावों की तैयारी सिद्दिरमैया ने बहुत पहले से शुरू कर दी थी  . इस हफ्ते उन्होंने एक ऐसा फैसला किया है जो  निश्चित रूप से चुनाव के नतीजों को प्रभावित करेगा . दलितों के लाभ के लिए मुख्यमंत्री ने बजट में  ही  बहुत सारी योजनायें लागू कर दी थीं . अब उनको और बढ़ा दिया गया है .इन नयी योजनाओं की जानकारी मीडिया को इसी २ जून को दी गयी . मुख्यमंत्री सिद्दिरमैया ने घोषणा की कि  दलितों के लिए बहुत सारी योजनायें तुरंत प्रभाव से लागू की जा रही हैं . सरकारी संस्थाओं में उच्च शिक्षा प्राप्त कर रहे दलित छात्रों को मुफ्त में लैपटाप तो पहले से ही था , अब  निजी स्कूल कालेजों में पढने वाले  दलित छात्रों को भी यह सुविधा दी जायेगी . अभी दलित छात्रों को बस में चौथाई कीमत पर बस पास मिलते हैं . अब  बस पास  बिलकुल मुफ्त में मिलेगा  . दलित जाति के लोगों अभी तक ट्रैक्टर या टैक्सी खरीदने पर  दो लाख रूपये की सब्सिडी  पाते थे अब वह तीन लाख कर दिया गया है . ठेके  पर काम करने वाले गरीब मजदूरों , पौरकार्मिकों, को अब तक रहने लायक घर बनाने के लिए  दो लाख रूपये का अनुदान मिलता था ,अब उसे चार लाख कर दिया गया है .  इसी साल करीब एक हज़ार दलित किसानों को  विदेश यात्रा पर ले जाने के लिए समाज कल्याण और कृषि विभाग के अधिकारियों को निर्देश दे दिए गए हैं .  दलितों के कल्याण के लिए पिछले चार वर्षों में करीब पचपन हज़ार करोड़ रूपये खर्च किये जा  चुके हैं . इस साल के लिए  करीब अट्ठाईस हज़ार करोड़ रूपये की अतिरिक्त  व्यवस्था कर दी गयी है . जो दक्षिण भारत की राजनीति को समझता है उसे मालूम है कि कांग्रेसी मुख्यमंत्री चुनाव को अपने पक्ष में करने के लिए ही सारे क़दम उठा रहे हैं .
    यह सारा कार्य योजनाबद्ध तरीके से हो रहा  है . अब तक माना जाता था कि कर्णाटक में वोक्कालिगा और लिंगायत, संख्या के हिसाब से  प्रभावशाली जातियां हैं . . लेकिन चुनाव के नतीजों पर यह नज़र नहीं आता था.  सत्ता में आने के बाद मुख्यमंत्री सिद्दिरमैया  ने जाति के आधार पर जनगणना करवाई . इस जनगणना के नतीजे सार्वजनिक नहीं किये जाने थे लेकिन पिछले साल अप्रैल  में कुछ पत्रकारों ने जानकारी सार्वजनिक कर दी . सिद्दिरामैया की जाति के लोगों की संख्या ४३ लाख यानी करीब ७ प्रतिशत बतायी गयी . इसी वजह से यह चर्चा भी शुरू हो गयी कि मुख्यमंत्री के दफ्तर से ही जानकारी लीक की गयी थी . बहरहाल लीक किसी ने  किया हो लेकिन जानकारी अब पब्लिक डोमेन में आ गयी है जिसको सही माना जा रहा है. इस नई जानकारी के  बाद कर्णाटक की चुनावी राजनीति का हिसाब किताब बिलकुल नए सिरे से शुरू हो गया है .नई जानकारी के बाद लिंगायत ९.८ प्रतिशत और वोक्कालिगा ८.१६ प्रतिशत रह गए हैं .  कुरुबा ७.१ प्रतिशत , मुसलमान १२.५ प्रतिशत ,  दलित २५ प्रतिशत ( अनुसूचित  जाती १८ प्रतिशत और अनुसूचित जन जाति ७ प्रतिशत ) और ब्राह्मण २.१ प्रतिशत की संख्या में राज्य में रहते हैं .अब तक कर्नाटक में माना जाता था कि लिंगायतों की संख्या १७ प्रतिशत है और वोक्कालिगा १२ प्रतिशत हैं . इन आंकड़ों को कहाँ से निकाला गया ,यह किसी को पता नहीं था लेकिन यही आंकड़े चल रहे थे और सारा चुनावी विमर्श इसी पर केन्द्रित हुआ करता था  . नए आंकड़ों के आने के बाद सारे समीकरण बदलेगें, इसमें दो राय नहीं है .  इन आंकड़ों की विश्वसनीयता पर भी सवाल उठाये जा रहे हैं लेकिन यह भी सच है कि दलित  नेता इस बाद को बहुत पहले से कहते  हैं . दावा किया जाता रहा है कि अहिन्दा ( अल्पसंख्यक,हिन्दुलिदा यानी ओबीसी  और दलित )  वर्ग एक ज़बरदस्त समूह है . जानकार मानते हैं  कि  समाजवादी सिद्दिरामैया ने चुनावी फायदे के लिए अहिन्दा का गठन गुप्त रूप से करवाया  है . मुसलमान , दलित और  सिद्दिरामैया की अपनी जाति कुरुबा मिलकर करीब ४४ प्रतिशत की आबादी बनते हैं .  जोकि मुख्यमंत्री के लिए बहुत उत्साह का कारण हो सकता है .दलितों के लिए बहुत बड़ी योजनाओं के पीछे यही नए आंकड़े काम कर रहे बताये जा रहे हैं  .इन आंकड़ों का कर्णाटक की ताक़तवर जातियां विरोध कर रही हैं . बहुत ही प्रभावशाली लिंगायत मठों से भी इन आंकड़ों की विश्वसनीयता पर सवाल उठाये जा रहे हैं  .वे कहते हैं कि इससे समाज में बंटवारा और बढेगा . यह सारी चिंता शायद इसलिए है कि संख्या के बल  पर राजनीतिक सत्ता को खिसकते देख कर शासक वर्गों को परेशानी तो  हो ही रही है
    अगले साल जनवरी में चुनाव अभियान शुरू होगा लेकिन कर्णाटक में अभी से किलेबंदी शुरू हो गयी है . इस  चर्चा में पूर्व प्रधानमंत्री एच डी देवेगौडा की पार्टी का ज़िक्र नहीं आया है . उनके बेटे एच डी कुमारस्वामी मज़बूत नेता रहे हैं , मुख्यमंत्री भी रह चुके हैं लेकिन अब लगता है कि अमित शाह के पूरे समर्थन से मैदान में आये येदुरप्पा और कांग्रेस की अकेली उम्मीद सिद्दिरमैया के बीच होने जा रहे चुनाव में वे या तो वोटकटवा साबित होंगें या किसी के साथ मिल जायेगें , क्योंकि देश की राजनीति की तरह ही कर्णाटक का चुनाव स्वार्थ की स्थाई धरा की मुख्य प्रेरणा से लड़ा जायेगा .

    क्या देश मरघट हो चला है ?

    हर घंटे खुदकुशी करता है किसान-छात्र-बेरोजगार युवा


    छात्र हो किसान हो या बेरोजगार युवक हो । खुदकुशी लगातार जारी है । साल दर साल जारी है । और सत्ता किसी की भी रहे हालात इतने बदतर हैं कि बीते 15 बरस के दौर में 99 हजार 756 छात्रों ने देश में खुदकुशी कर ली। किसानों की खुदकुशी इन्ही 15 बरस में 2 लाख 34 हजार 642 तक हो गई । और बेरोजगारी भी कैसे देश के युवा को लील रही है, उसकी खुदकुशी के आंकड़े भी 1 लाख 44 हजार 974 है । और साल दर साल छात्र, किसान और बेरोजगारों की खुदकुशी के ये आंकडे सरकारी संगठन एनसीआरबी यानी नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो के हैं । यानी बरस दर बरस खुदकुशी देश में कोई रुदन पैदा नही करती । और इन 15 बर के दायरे में कोई राजनीतिक दल ये कह नही सकता कि उसने सत्ता नहीं भोगी।

    क्योंकि न 15 बरस में अटल बिहारी वाजपेयी से लेकर मनमोहन सिंह की सत्ता रही है । और मौजूदा वक्त में मोदी की सत्ता में भी खुदकुशी ना तो छात्रों की रुकी है ना किसानों की ना ही बेरोजगारों की। और सत्ता के लिये सत्ताधारियों से गठबंधन इन 15 बरस में देश की 37 राजनीतिक दलों ने किया । तो दोष दिया किसे जाये? कटघरा बनाया किसके लिये जाये? या फिर उलझ जाया जाये कि किसकी सत्ता में सबसे ज्यादा मौत हुई । सोचिये जो भी लेकिन इस सच के आईने में उस घने अंधेरे पर प्रहार जरुर कीजिये जो सत्ता की राजनीति तले ऐसे सच को भी सही तरीके से बता नहीं पाती । और लगता है जिन्दगी मौत पर भारी हो चली है और उसी जिन्दगी की जद्दोजहद में समाज कुंद हो चला है ।

    और धीरे धीरे देश के हालात बताते है कि शिक्षा व्यवस्था चरमरा रही है तो छात्रो के सामने मुश्किल है। रोजगार निकल नहीं रहे तो बेरोजगारी कही ज्यादा मुश्किल हालात पैदा कर रही है। और किसान वह तो हमेशा ही संघर्ष की राह पर है वह पीढियों से देश को अन्न खिलाता जरुर आया है लेकिन खुद के भाग्य का पैसला वह आज भी नहीं कर सकता । और उसकी नियती खुदकुशी ही कैसे होती जा रही है। मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ में बीजेपी लगातार चुनाव जीत रही है । शिवराज और रमन सिंह जीत की हैट्रिक लगाकार 15 बरस से सत्ता में है । वही महाराष्ट्र में कांग्रेस स्तात में 15 बरस रही और ढाई बरस पहले ही बीजेपी की सत्ता आई । लेकिन किसानो की खुदकुशी थमी नहीं । तो आंदोलन की तस्वीर से इतर खुदकुशी की तस्वीर है क्या । आलम ये है कि बीते 15 बरस में महाराष्ट्र में 56215 किसानों ने खुदकुशी की तो मध्यप्रदेश में 19778 किसानों ने खुदकुशी कर ली । ौर इन्ही 15 बरस में छत्तीसगढ में 16,153 किसानों ने खुदकुशी की ।

    यानी 15 बरस का एनसीआरबी का ये खुदकुशी का आंकडा ये बताने के लिये काफी है कि किसी सरकार को कभी किसानों की खुदकुशी की फिक्र नहीं रही । यानी एनसीआरबीत हर दूसरे बरस किसानों की खुदकुशी का
    आंकडा जारी करती है । तो पांच बरस के लिये सत्ता में आई सरकार को भी दो बरस बाद पता चलता है कि कितने किसानों ने खुदकुशी की । लेकिन बरस दर बरस जिस तरह किसानो की खुदकुशी तीनो राज्यो में होती रही उसमें सबसे बडा सवाल तो यही है कि फिर किसानो की फिक्र है किसे । और खुदकुशी से लेकर फसल के
    समर्थन मूल्य और फसल बीमा के सवाल ही नहीं बल्कि खुदकुशी करने वाले किसानो के परिवार को राहत देने के एलान कितने पोपले होते है उसका अंदाज इसी से लग सकता है कि 15 फीसदी किसान परिवार तो ऐसे है जो खुदकुशी को भी विरासत के तौर पर अपना चुके है । और राज्य ही नहीं केन्द्र सरार के राहत पैकेज भी खुदकुशी क्यो रोक नहीं पा रहे है । ये सिर्फ सवाल नहीं बल्कि देश का ऐसा सच है जिससे हर सत्त आंख चुराती है लेकिन किसानो के हर में बोलने से नहीं घबराती । लेकिन कोई सरकार किसानों के हक में क्यो खडी हो नहीं पाती । ये सवाल कोई भी पूछ सकता है ।

    तो किसान तो दूर देश में उपभोक्ता संस्कृति और सरकार का कारपोरेटीकरण किस दिसा में देश को ले जा रहा है इसका अंदाजा इससे भी लग सकता है कि सेन्ट्रल इस्टीट्यूट आफ पोस्ट हारवेस्टिंग इंजिनियरिंग एंड टेक्नालाजी ने रिपोर्ट जारी की और बताया कि हर बरस औसतन 92 हजार 651 करोड रुपये का अनाज सरकार ही ब्रबाद कर देती है । और जो किसान आज पर दूध, सब्जी फल उडेल रहा है उसके पीछे का सच तो ये भी है कि सरकार ही हर बरस 31 करोड रुपये से ज्यादा की सब्जी और फल बर्बाद कर देती है । क्योकि सरकार के पास भंडारण के व्यवस्था नहीं है । किसानो की फसल की किमत देने तो दूर उसकी आधी किमत भी उन्हे मिल नही पा रही है । कल्पना किजिये कि हर बरस औसतन 7186 करोड का आम । 3903 करोड का केला । 5005 करोड का आलू और 3666 करोड़ का टमाटर यू ही बर्बाद हो जाता है । वह बी सरकार की ही नीतियों से । तो फिर सड़क पर बहते दूध या फल सब्जी के फेकें जाने से क्या वाकई सरकार दुखी है । ये मुश्किल है । क्योकि कोलकत्ता के इंडियन इंसट्टीटूट आफ मैनेजमेंट की रिसर्च कहती है कि देश में सरकार के पास सिर्फ 10 पिसदी के ही बंडारण के व्यवस्था है । जिस जहब से 2011-12 से लेकर 2016-17 के बीच 61 हजार 824 टन अनाज बर्बाद हो गया ।और जिस महाराष्ट्र में सत्ता किसानो के हक की बात करने के लिये अब बेताब नजर आ रही है उसका सच तो ये बी है कि 2016-17 में देश में कुल 8679 टन अनाज बर्बाद हुआ , उसमें सिर्फ महारा,्ट्र में 7963 टल अनाज बर्बाद हो गया । तो कौन सी सस्कृति में हम जी रहे है ये सवाल तो कोई बच्चा भी पूछ सकता है । खासकर जब देश में बात उपनिषद और गीता से लेकर गाय की हो रही है। पशुधन बचाने का जिक्र हो चला है । ऐसे में किसे फिक्र है कि देश में बीते 15 बरस में औसतन हर एक धंटे में दो किसान खिदकुशी कर रहा है । और छात्र और बेरोजगार युवाओ की तादाद मिला दे तो हर घंटे एक छात्र और एक युवा खुदकुशी कर रहा है । लेकिन इस सच से हर कोई आंख मूंदे हुये है कि जिसनी तादाद में इंसानो की मौत हो रही है उसके सामने संयोग से जानवरो की मौत भी कम पड जायेगी।

    निर्भया फैसला: इंसाफ या प्रतिशोध

    हाशिया - Tue, 06/06/2017 - 12:08

    आनंद तेलतुंबड़े का नियमित स्तंभ इस बार निर्भया बलात्कार मामले में आए अंतिम फैसले के बारे में है, जिसके तहत कसूरवार ठहराए गए युवकों को फांसी की सजा की पुष्टि की गई है. अनुवाद: रेयाज उल हक

    पिछले महीने सर्वोच्च न्यायालय ने निर्भया मामले के नाम से जाने जाने वाले, 16 दिसंबर 2012 के सामूहिक बलात्कार मामले में चार कसूरवारों की फांसी की सजा की पुष्टि की तो अदालत में मौजूद लोग खुशी से झूम उठे. यह खुशी उस अभूतपूर्व गुस्से और आक्रोश के माफिक ही है, जो 23 साल की फिजियोथेरेपी इंटर्न ज्योति सिंह के बलात्कार और उस पर हुए क्रूर हमले से देश भर में पैदा हुआ था. सुप्रीम कोर्ट के लिए यह एक गैरमामूली मौका रहा होगा जब उसके किसी फैसले को लोगों का इतना व्यापक समर्थन हासिल हुआ, जिसकी गूंज देश के कोने-कोने में सुनने को मिली. लोगों की राय सुनकर ऐसा जाहिर होता है कि उन्हें इस बात की तसल्ली मिली है कि आखिरकार इस मामले में इंसाफ हो गया. लेकिन सवाल है कि क्या वाकई ऐसा हुआ है? बलात्कार और हत्या के अपराध के लिए मध्यकालीन और बर्बर मौत की सजा दिया जाना इंसाफ नहीं है, बल्कि यह एक ऐसी चीज है, जिसकी जड़ें मध्यकालीन संस्कृति में ही हैं और जिसे प्रतिशोध या बदला कहा जाएगा. अदालत ने मामले की सुनवाई करते हुए ऐसा नहीं किया कि वो इसको पूरी गंभीरता में देखे और अपराधियों की सजा में कमी लाने वाले कारकों पर सावधानी से गौर करते हुए इसे एक दुर्लभतम (दुर्लभ में भी दुर्लभ) मामले के रूप में स्थापित करे, बल्कि उसने “सामूहिक विवेक” की बात का हवाला दिया है, जिसका सीधा सीधा मतलब यह है कि फैसले को सही ठहराने के लिए भीड़ की मानसिकता का उपयोग किया गया. इस फैसले में उम्र, सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि, सुधार की संभावना या किसी भी ऐसी बात पर गौर नहीं किया गया है, जो कसूरवारों से जुड़ी है और उनकी सजा में कमी करने की वजह बनती. न ही उसने पुलिस की नाकामी की तरफ रत्ती भर भी इशारा किया, जो ऐसे अपराधों में काफी हद तक जिम्मेदार होते हैं. न ही अदालत ने भविष्य में ऐसे अपराधों को होने से रोकने के बारे में उठाए जाने वाले कदमों के बारे में कोई सवाल किया. जबकि ये सारे मुद्दे इंसाफ के सरोकार के दायरे में आते हैं.

    दुर्लभ में भी दुर्लभ मामला

    इसमें कोई शक नहीं है कि यह उस लड़की के खिलाफ एक घिनौना अपराध था. छहों अपराधियों ने न सिर्फ उसका यौन शोषण किया, बल्कि जैसा कि मीडिया में बताया गया था, उसके यौनांगों में धातु का सरिया डाल कर उसकी आंतें तक खींच ली थीं. कोई भी सभ्य समाज ऐसी घटना पर उसी तरह की प्रतिक्रिया देगा, जैसी प्रतिक्रिया भारत में हुई. लेकिन अगर इस समाज ने इससे पहले बलात्कार और हत्याओं के लाखों मामलों में से कुछ पर भी ऐसी ही संवेदना दिखाई होती, तो यह एक पूरी तरह से सराहनीय बात होती. क्योंकि आखिरकार ऐसा अपराध पहली बार नहीं हुआ था. लेकिन अपनी टीआरपी के उन्माद में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने इसे अपने पर्दे पर एक ऐसी क्रूरता का मामला बना दिया जो पहले कभी देखी-सुनी नहीं गई. निर्भया नाम भी मीडिया का ही दिया हुआ है और इसी तरह धातु के सरिए वाली बात भी इसकी अपनी खोज थी, जिसे निचली से लेकर सर्वोच्च अदालत तक ने बिना किसी आलोचना के स्वीकार कर लिया और इसे दुर्लभतम मामला बना दिया. 400 पन्नों के फैसले में ‘लोहे का सरिया (आयरन रॉड)’ शब्द 104 बार आया है, जो दिखाता है कि किस तरह इस बात ने अदालत द्वारा अपराधियों को मौत की सजा को कायम रखने में निर्णायक भूमिका निभाई है. सच्चाई यह है कि सिंगापुर के हॉस्पीटल द्वारा (जहां पीड़िता का इलाज किया गया था) तैयार पोस्ट-मॉर्टम रिपोर्ट ने इसकी पुष्टि की थी कि उसका गर्भाशय और अंडाशय सही-सलामत थे. यह सीधे-सीधे सरिए वाले सिद्धांत को गलत साबित करता है, क्योंकि गर्भाशय को नुकसान पहुंचाए बिना सरिया आंतों तक नहीं पहुंच सकता. तब, मीडिया इस घटना पर सामूहिक उन्माद खड़ा करने में कैसे कामयाब रहा था? इसका जबाव शायद मीडिया द्वारा फैलाई गई इस खबर में है कि इस मध्यवर्गीय लड़की का कम से कम एक बलात्कारी दलित समुदाय से आता है. हालांकि यह बात चुपके-चुपके ही फैलाई गई, लेकिन इसने मध्यवर्ग के गुस्से को भड़काने में अहम भूमिका अदा की, जो देश भर में व्यापक रैलियों और कैंडल मार्च की शक्ल में सामने आई. दूसरे वर्ग इसमें जुड़ते गए और इसने विरोध आंदोलनों की एक सुनामी की शक्ल ले ली.

    निर्भया के पहले और बाद में भी ऐसी अनेक घटनाएं हुई हैं, जिनकी तुलना इस मामले से की जा सकती है, लेकिन उन पर ऐसी किसी प्रतिक्रिया की बात तो छोड़ दी दीजिए, उस वर्ग के कानों पर जूं तक न रेंगी, जो निर्भया के लिए सड़कों पर उतरा था. 2006 में खैरलांजी में दिल को दहला देने वाली एक घटना में एक दलित मां और उसकी 19 साल की बेटी का गांव की एक भीड़ द्वारा क्रूर बलात्कार किया गया था और यातना दे-दे कर उन्हें मार दिया गया था. इसके बाद उसके दो बेटों को भी पीट-पीट कर मार डाला गया. बाद में उनकी निर्वस्त्र लाशें बरामद की गईं, जिनके यौनांगों में छड़ियां पाई गईं. लेकिन गैरदलितों में इस पर कोई सुगबुगाहट नहीं हुई. जब दलितों ने स्वत:स्फूर्त तरीके से इस मामले पर अपने गुस्से को जाहिर किया, तो पुलिस ने बहुत बुरी तरह उनकी पिटाई की और उन्हें नक्सली कहा, जिसकी शुरुआत महाराष्ट्र के तत्कालीन गृह मंत्री ने की थी. लेकिन यह भी इस वर्ग की संवेदना को जगा पाने में नाकाम रहा. इसके उलट इस वर्ग ने इस पूरे मामले की गंभीरता को कम करते हुए इसे एक ऐसी दुर्भाग्यशाली घटना का रंग दिया, जिसकी वजह एक औरत की गुस्ताखी थी, जिसने मासूम गांववालों के नैतिक गुस्से को भड़का दिया था. ऐसा नहीं है कि खैरलांजी दलित महिलाओं के खिलाफ ऐसे अपराधों की पहली और आखिरी घटना थी. दलित उत्पीड़न के ऐसे हजारों मामले खैरलांजी से पहले हो चुके हैं और उसके बाद उनमें तेजी ही आई है.  आज, हर रोज छह दलित औरतों का बलात्कार होता है, जिनमें से ज्यादातर में अमानवीय निर्ममता से हमला किया जाता है. लेकिन न तो उन घटनाओं पर व्यापक समाज में ही कोई प्रतिक्रिया हुई और न ही उन्होंने जजों की चेतना को झकझोरा कि वे उन बलात्कारों को दुर्लभतम मानें. शायद उनके लिए दलितों के साथ होने वाले बलात्कार एक मामूली बात, यानी सामान्यता है!

    एक असामान्य सामान्यता

    असल में भारतीय समाज में बलात्कार खुद एक असामान्य सामान्यता है. भारत में औरत की देह को सांस्कृतिक रूप से सामाजिक-राजनीतिक हिसाब बराबर करने की एक निशानी के रूप में लिया जाता है. समाज का टुकड़ों-टुकड़ों में अपार बिखराव और ऊंच-नीच की व्यवस्था इस स्थिति को संभावित रूप से व्यापक बना देती है और इसलिए यह औरतों की देह पर हमलों की संभावनाओं को भी बढ़ा देती है. किसी भी सांप्रदायिक या राष्ट्रीय संघर्ष में औरत की देह मुख्य निशाना बनती है. भारत के बंटवारे के दौरान सरहद के दोनों तरफ 100,000 से ज्यादा औरतों का अपहरण और बलात्कार किया गया था. उन पर सिर्फ यौन हमले ही नहीं हुए बल्कि हमलावरों की जीत की निशानी के तौर पर उनको निर्मम यातनाएं भी दी गई. अनेक औरतों के स्तन काट दिए गए, दूसरी अनेक औरतों के यौनांगों के साथ दुर्व्यवहार किया गया और यातना दी गई – जिनमें से ज्यादातर मामलों में अंजाम मौत के रूप में सामने आया.  यहां तक कि 1984 के सिख कत्लेआम में भी औरतों का व्यापक अपहरण और बलात्कार किया गया. गुजरात में 2002 में मुसलमान औरतों और बच्चियों के साथ बेरहमी से सरेआम बलात्कार किया गया और उन्हें मार कर उनकी लाशें जला दी गईं. अनेक औरतों ने यौन हिंसा का सबसे वहशी रूप देखा – जिसमें बलात्कार, सामूहिक बलात्कार, सार्वजनिक बलात्कार, निर्वस्त्र किया जाना, उनकी देह में वस्तुएं घुसाना और छेड़खानी आदि शामिल हैं.  औरतों की देह एक राजनीतिक अखाड़ा बना दी गई है, जो राष्ट्रवाद और ताकत के प्रदर्शन के काम में लाई जाती है. विरोधी द्वारा बलात्कार की गई हरेक औरत जीत की एक वस्तु, एक तमगा, बन जाती है. इसी सोच के मुताबिक तरह राष्ट्र राज्य “भारत माता” बन जाता है, जो एक ऐसी महिला है जिसे बाहरी दुश्मनों से बचाने की जरूरत है.

    असल में बलात्कार को रोजमर्रा की मामूली बात बनाने की जड़ें जातीय संस्कृति में धंसी हुई हैं, जिनमें एक प्रभुत्वशाली जाति के पास निचली जातियों की औरतों की देहों पर नियंत्रण हासिल होता है. ऐसे रिवाज थे कि निचली जातियों की नई दुल्हनों को अपनी शादी को मुकम्मल बनाने के लिए अपनी पहली रात में उन्हें ब्राह्मणों के पास भेजा जाता था. केरल में पिछली सदी की शुरुआत तक तो यह चलन में था ही, सामंती भारत के दूसरे हिस्सों में भी यह अलग-अलग रूपों में मौजूद था. संयोग से, संघ परिवार के विचारक इस रिवाज को गर्व से सही ठहराते हुए इसे गैर ब्राह्मणों की नस्लों को सुधारने का एक वैज्ञानिक तरीका बताते हैं.  इस रिवाज को पूंजीवादी आधुनिकता ने पीछे धकेल दिया है, लेकिन दलितों और आदिवासियों का बलात्कार कम नहीं हुआ है. वो लाखों की संख्या में अब भी होते हैं और इस तरह वे भारतीयों के रोजमर्रा के अनुभव और उनके आसपास की दुनिया को रचते हैं.

    भारतीयों की सांस्कृतिक मानसिकता औरतों को मर्दों की जायदाद के रूप में देखती है, जिनको दूसरों से बचाना जरूरी होता है, जाहिर सी बात है कि बलात्कार ऐसा यौन प्रसंग बन जाता है जो इस पूरे नजरिए के साथ अटूट रूप से जुड़ा हुआ है. औरतों के शुद्ध, पवित्र और विनम्र होने का विचार बलात्कार संस्कृति की गंभीरता को हल्के-फुल्के तरीके से पेश करने और उसे आम बनाने का लक्षण है. यह प्रभुत्वशाली विचार कि औरतों की भूमिका मर्दों की सेवा करने की होती है, यौन इच्छाएं मर्दों का विशेषाधिकार हैं, बलात्कार जायदाद पर एक हमला है, लेकिन मर्दों को उकसाने का दोष औरतों पर आता है, बलात्कार की पीड़िता और उसके परिवार को सामाजिक रूप से अपमानित और अलग-थलग कर देना, इन सबने बलात्कार के प्रति संस्थागत (यानी पुलिस और न्यायपालिका के) रवैयों को भी अपने मुताबिक ढाल दिया है. बदकिस्मती से, औरतों ने भी इन्हें अपने भीतर उतार लिया है. वे सामाजिक दायरों में अपनी अलग जगहों (मसलन आरक्षित डिब्बे, सार्वजनिक परिवहन सेवाओं में सीटें आदि) की जो मांगें खुशी खुशी करती हैं, वो इस संस्कृति के आपराधिक चरित्र को हल्का करने और बलात्कार संस्कृति को सामान्य बनाने में योगदान देती है.

    क्या मौत इसका इलाज है?

    मौत की सजा को लेकर लोगों में पाई जाने वाली सनक भी दुश्मन से बदला लेने की भारतीय संस्कृति में रची-बसी है, क्योंकि यहां इंसाफ का विचार जाति-सापेक्ष होता है. आंकड़े दिखाते हैं कि मौत की सजा के पीड़ितों/कसूरवारों की एक व्यापक बहुसंख्या दलित, आदिवासी और अल्पसंख्यक समुदाय से आती है. मौत की सजा का रिश्ता, उस विषय की सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि से होता है.  1992 में निचली जातियों द्वारा ऊंची जाति के भूमिहारों के जनसंहार, बारा जनसंहार, के जवाब में भूमिहार जमींदारों की निजी सेना सवर्ण लिबरेशन फ्रंट ने 23 दिसंबर 1991 को पड़ोस के माने और बरसिम्हा गांवों के 10 दलितों की हत्या की. इस मामले में बड़ी तेजी से चार लोगों को मौत की सजा सुनाई गई, जिनमें से तीन दलित हैं (राष्ट्रपति ने हाल ही में इन सजाओं को आजीवन कारावास में बदल दिया है), लेकिन बिहार में कई दर्जन जनसंहार करने वाले ऊंची जातियों के हत्यारों को पटना उच्च न्यायालय एक जैसे मिलते जुलते फैसलों के जरिए जल्दी-जल्दी बरी कर रहा है.  नागरिक अधिकार संगठनों में काम करने वाले हम लोग मौत की सजा के खात्मे की मांग करते रहे हैं, क्योंकि यह सजा देने के किसी मकसद को पूरा नहीं करती, और यह किसी अपराधी को अपराध करने से तो और भी कम रोकती है. बल्कि अंतरराष्ट्रीय आंकड़े इसकी ओर इशारा करते हैं कि मौत की सजा को खत्म कर चुके देशों में, मौत की सजा को कायम रखने वाले देशों के मुकाबले अपराध की दरें कहीं कम हैं.

    इस पर गौर करना आंखें खोल देने वाला होगा कि निर्भया के बाद के चार बरसों में खुद दिल्ली में ही बलात्कार के मामले तीन गुना बढ़ गए हैं.  एनसीआरबी आंकड़े बलात्कार के मामलों में अबाध इजाफे के रुझान को भी उजागर करते हैं. 2011 में कुल बलात्कारों की संख्या 24,206 से 2.97 फीसदी बढ़ कर 2012 में 24,923 हुई थी. लेकिन इसके बाद के साल में 35.24 फीसदी की भारी वृद्धि देखने को मिली जब यह 2013 में 33,707 हो गया और 2014 में यह 8.98 फीसदी के इजाफे के साथ 36,735 हो गया. सर्वोच्च अदालत द्वारा फांसी की सजा की तस्दीक करने के बाद चार दिनों के भीतर मीडिया में बलात्कार की तीन घटनाओं की खबरें आईं, जिनमें से एक रोहतक की घटना थी, जिसे निर्भया से भी कहीं अधिक क्रूर तरीके से अंजाम दिया गया था. मुक्त बाजार के कायदों ने जिस तरह के बहुआयामी संकट को जन्म दिया है, जिसके तहत युवाओं में जिंदगी को लेकर एक अनिश्चितता जुड़ी हुई है, यह उनके बीच अलगाव और हताशा को जन्म देती है जो बलात्कारों के रूप में सामने आता हुआ दिखाई देता है.

    इसका इलाज कानून के शासन को समान रूप से लागू करने में है. निर्भया का मामला इस बात की बेहतरीन मिसाल है कि मीडिया अपने कारोबारी हितों की भरपाई के लिए कैसे लोगों के बीच की घटिया प्रवृत्तियों को हवा देता है और उसके पीछे-पीछे सरकार (और न्यायपालिका) आखिरकार देश को मध्ययुगीन अंधेरी खाई में खींच कर ले जा रहे हैं.

    समयांतर जून 2017 में प्रकाशित

    आनंद कुरेशी के कहानी संग्रह ‘औरतखोर’ का लोकार्पण

    लेखक मंच - Tue, 06/06/2017 - 02:21

    डूंगरपुर: बहुत सा श्रेष्ठ साहित्य भी विभिन्न कारणों से पाठकों तक पहुँच नहीं पाता। आनंद कुरेशी जैसे कथाकार को भी व्यापक हिन्दी पाठक वर्ग तक पहुंचाने के लिए हम सबको प्रयास करने होंगे। हिन्दी के प्रसिद्ध लेखक असग़र वजाहत ने डूंगरपुर के दिवंगत लेखक आनंद कुरेशी के ताजा प्रकाशित कहानी संग्रह ‘औरतखोर’ के लोकार्पण समारोह में कहा कि डूंगरपुर आकर उन्हें साहित्य की ऐसी गोष्ठियों की अर्थवत्ता का फिर से गहरा अहसास हुआ है। श्रोताओं के सवालों का जवाब देते हुए उन्होंने कहा कि साहित्य के भी अनेक स्तर होते हैं। आवश्यक नहीं कि लोकप्रिय समझे जाने वाले साहित्य का पाठक आगे जाकर गंभीर साहित्य का पाठक नहीं हो सकता। उन्होंने एक अन्य सवाल का जवाब देते हुए कहा कि श्रेष्ठ साहित्य मुद्दों की पहचान से ही नहीं बनता। इसके लिए अनेक कारक जिम्मेदार होते हैं। जिला पुस्तकालय के सभागार में हुए इस समारोह में राजस्थान विश्वविद्यालय की सहायक आचार्य  डॉ रेणु व्यास ने आनंद कुरेशी जी के संस्मरण सुनाए तथा पूना विश्वविद्यालय की डॉ शशिकला राय के कुरेशी की कहानी कला पर लिखे आलेख का वाचन किया। कुरेशी के अभिन्न मित्र और शायर इस्माइल निसार ने भावुक होकर कहा कि कुरेशी जी के साथ व्यतीत आत्मीय पलों को शब्दों में बयान कर पाना उनके लिए संभव नहीं है। वागड़ विभा के सचिव सत्यदेव पांचाल ने कहा कि आनंद कुरेशी जी आज भी अपनी कहानियों के माध्यम से जीवित हैं, जो बताता है कि साहित्यकार कभी नहीं मरता। पांचाल ने कहा कि कुरेशी जैसे लेखक हमारे लिए सदैव प्रेरणा स्रोत रहेंगे। चित्तौडगढ़ से आए कुरेशी जी के मित्र और ‘औरतखोर’ के सम्पादक डॉ. सत्यनारायण व्यास ने कहा कि अपने अभिन्न मित्र के बारे में बात करना जैसे अपने ही बारे में बात करना है। उन्होंने कुरेशी को याद करते हुए कहा कि उनका स्वाभिमान राजहंस की तरह गर्दन उठाए रहता है। स्थानीय महावि‍द्यालय में हिन्दी प्राध्यापक डॉ. हिमांशु पंडया ने सत्तर के दशक के एक हिन्दी कहानीकार की व्यापक जागरूकता को रेखांकित करते हुए कहा कि ऐसी दोस्तियाँ और साहित्यिक अड्डेबाजी बची रहनी चाहिए ताकि आनंद कुरेशी जैसे कई लेखक इस शहर को पहचान दिलाएं।

    इससे पहले प्रो. असग़र वजाहत, उदयपुर विश्वविद्यालय के पूर्व आचार्य नवल किशोर, कवि-समालोचक डॉ. सत्यनारायण व्यास, वागड़ विभा के सचिव और स्थानीय कवि सत्यदेव पांचाल तथा दिल्ली से प्रकाशित साहित्यिक पत्रिका ‘बनास जन’ के सम्पादक डॉ. पल्लव ने आनंद कुरेशी के ताजा प्रकाशित कहानी संग्रह ‘औरतखोर’ का  लोकार्पण किया। डॉ. पल्लव ने मंच पर मौजूद सभी साहित्यकारों का सारगर्भित परिचय देते हुए कहा कि आनंद कुरेशी जैसे लेखक एक शहर, अंचल या राज्य की नहीं अपितु समूचे साहित्य की धरोहर होते हैं। कुरेशी जी के सुपुत्रों  हरदिल अजीज और इसरार ने आयोजन में अपने परिवार की तरफ से आभार दर्शाया।

    अध्यक्षता कर रहे प्रो. नवल किशोर ने कहा कि हार एक सापेक्ष शब्द है। आनंद कुरेशी जिन्दगी की लड़ाई हार गए, पर लेखकीय जीवन में नहीं। आनंद कुरेशी को उन्होंने अभावग्रस्त समाज के लिए संघर्ष करने वाला लेखक बताते हुए कहा कि उनके जैसे लेखकों को आगे लाना चाहिए, जो अन्याय व अत्याचार का विरोध करने का साहस दर्शाते हैं। उन्होंने कहा कि आज संचार माध्यमों में शुद्ध मनोरंजन परोसा जा रहा है, जो मनुष्य को सोचने को विवश नहीं करता। प्रो. नवल किशोर ने कुरेशी की कुछ चर्चित कहानियों का भी उल्लेख किया। संयोजन प्रसिद्ध कहानीकार दिनेश पांचाल ने किया और अंत में कवि जनार्दन जलज ने धन्यवाद ज्ञापन किया। आयोजन में राजकुमार कंसारा, चंद्रकांत वसीटा, मधुलिका, हर्षिल पाटीदार, हीरालाल यादव, डॉ कपिल व्यास, प्रज्ञा जोशी, चन्द्रकान्ता व्यास तथा हेमंत सहित शहर अनेक साहित्य प्रेमी उपस्थित थे।

    प्रस्तुति‍ : डॉ कपिल व्यास

    Vishunpur (Rarhi ka Pura ) Azamgarh

    इयत्ता - Sun, 04/06/2017 - 15:25
    विशुनपुर (राढ़ी का पूरा), आजमगढ़  का                                           --हरिशंकर राढ़ी राढ़ियों का गांव विशुनपुर महराजगंज क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है और इसकी चर्चा पहले के लेखों में की जा चुकी है। दरअसल महराजगंज बाजार का अधिकांश हिस्सा विशुनपुर की जमीन में ही आता है और वहां इनका वर्चस्व सदैव से रहा है। महराजगंज का नया चौक पूर्णतया विशुनपुर की कृषिभूमि में बसा है और अब यह बाजार का सबसे मंहगा और रौनक वाला क्षेत्र है। महेशपुर की भांति विशुनपुर (राढ़ी के पूरा) की स्थापना का समय बताया नहीं जा सकता। आजमगढ़ गजेटियर में महराजगंज के साथ इसका जिक्र बिशनपुर के नाम से है। नाम में आंशिक परिवर्तन निश्चित रूप से अंगरेजों की टेढ़ी जबान के कारण होगा जिससे उन्होंने भारत के अधिकांश शहरों और गांवों की वर्तनी का सत्यानाश कर दिया।
    विशुनपुर गांव बांगर क्षेत्र में होने के कारण अपेक्षाकृत समृद्ध था और बाजार के निकट होने से पहुंच में आसान भी। इस गांव के राढ़ी मुख्यतः तीन पूरवे में बसे हुए हैं। सबसे पश्चिम, अक्षयबट से सटा हुआ पोखरा वाला पूरा, फिर बीच का जो सबसे बड़ा है और कुछ घर महराजगंज-कप्तानगंज सड़क से पूरब की ओर। पूरा विशुनपुर महराजगंज टाउन एरिया में आता है अतः साफ-सफाई आदि का विकास हुआ है। गांव के वर्तमान से ज्यादा महत्त्वपूर्ण इसका इतिहास रहा है। एक जमाने में क्षेत्रीय स्तर पर इस गांव का कोई शानी नहीं था। ऐसे कई लोग हुए जो अपनी ताकत और बुद्धि से सम्मानित और विख्यात हुए। हाँ, यह कहा जा सकता था कि राज्य और राष्ट्र स्तर पर पहचान बनाने या बड़े सामाजिक उत्तरदायित्व निभाने में किसी ने बहुत रुचि नहीं दिखाई। बहुत पहले का तो नहीं, किंतु पिछले 70-80 वर्षों का इतिहास कमोबेश बताया जा सकता है, हालांकि यह इतिहास अलिखित है। इसमें से कुछ तो मुझे पिताजी से ज्ञात हुआ था क्योंकि उनका विशुनपुर के राढ़ियों से बहुत अच्छे संबंध थे, आना जाना था और दूसरे वे किस्सागोई में बहुत माहिर थे। कुछ अंश मैंने महेशपुर के बुजुर्गों से सुना था और बहुत कुछ श्री जे0के0 मिश्र का बताया हुआ है। दरअसल, महराजगंज, विशुनपुर और महेशपुर के विषय में इतना लिखने के पीछे श्री मिश्र जी का आग्रह, उत्साहवर्धन, लगातार तकाजे और उनके द्वारा उपलब्ध कराई गई जानकारी का बहुत बड़ा हाथ है। भैरोजी पर लिखने का विचार तो बहुत पुराना था किंतु पिछले साल भैरोजी पर लिखे और ब्लाॅग पर प्रकाशित लेख के बाद मैं इतनी कड़ियां शायद ही इतनी जल्दी लिख पाता। भैरोजी पर लिखे लेख पर पाठकों ने जो रुचि दिखाई, (ब्लाॅग की रीडरशिप काउंटिंग के आधार पर) उससे भी उत्साहवर्धन हुआ। लोग अपने क्षेत्र एवं अपनी श्रद्धा के प्रतीकों के विषय में जानना तो चाहते हैं, किंतु इस पर लेखन कम हो रहा है।
    महराजगंज चौक पर लक्ष्मी कांत मिश्र की प्रतिमा 
    वह समय था जब क्षेत्र में उच्च तो क्या, माध्यमिक शिक्षा व्यवस्था नहीं थी। ले-देकर एक प्राइमरी विद्यालय और कूपर साहब के जाने के बाद भैरोजी में एक मिडिल स्कूल। हाँ, एक संस्कृत पाठशाला भी भैरोजी में थी जिससे आधुनिक और रोजगारपरक शिक्षा की आवश्यकता की पूर्ति नहंी हो सकती थी। मिडिल से ऊपर की शिक्षा में महराजगंज इंटर काॅलेज की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही।(मैं भी इस काॅलेज का छात्र रह चुका हूँ।) महराजगंज इंटर काॅलेज की स्थापना एक विद्यालय के रूप में सर्वप्रथम विशुनपुर के पोखरे के पास- महराजगंज बाजार के बजरंग चैक से देवतपुर जाने वाली सड़क पर- हुई थी। इसके संस्थापक सदस्यों में इस क्षेत्र के प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी और सामाजिक कार्यकर्ता स्व0 श्री कृष्णमाधव लाल, अक्षयबट गांव के श्री बाबूराम सिंह और विशुनपुर पोखरा के स्व0 श्री कमलाकांत  मिश्र जी थे। एक शिक्षक के तौर पर मिडिल स्कूल भैरोजी के प्रधानाध्यापक श्री इदरीश मौलवी भी सहायता कर जाते थे। उल्लेखनीय है कि मौलवी इदरीश यहां एक शिक्षक के तौर पर बहुत सम्मानित व्यक्ति थे। कालांतर में यह विद्यालय अधिक जगह की तलाश में अपने वर्तमान स्थान पर स्थापित कर दिया जो गांव प्रतापपुर की जमीन में है। तब यहां जमीन की समुचित उपलब्धता थी। बाद में बगल में थाना स्थापित हो गया और सामने आम की विशाल बाग का उपयोग छात्रगण खेलकूद के लिए करने लगे। जब मैं महराजगंज इंटर काॅलेज का छात्र था (1980 के आसपास) तब इस बाग में प्राय स्वतंत्रता दिवस के कार्यक्रम होते थे और नागपंचमी पर होने वाली कुश्ती भी यहीं आयोजित होने लगी। संभवतः यह 1935-36 की बात होगी।

    महराजगंज इंटर काॅलेज के पहले प्रधानाचार्य स्व0 श्री सुदर्शन शुक्ल हुए। आज भी उनकी चर्चा एक योग्य, कर्मठ, सीधे-सरल किंतु सत्यनिष्ठ एवं न्यायनिष्ठ प्राचार्य के रूप में होती है। उनके समय तक इस इंटर काॅलेज की उच्च प्रतिष्ठा थी। हाँ, शुक्ल जी की कृपणता की चर्चा भी बहुत विस्तार से सुनी-सुनाई जाती है। वे काॅलेज में ही रहते थे। तत्कालीन अध्यापकों ने बताया कि वे चपरासी से एक पाव छोटे बताशे मंगाते थे और उसकी गिनती करते थे, क्योंकि वे प्रतिदिन सुबह एक बताशा खाकर पानी पीते थे। यदि किसी दिन बताशा साइज में बड़ा होेने कारण गिनती में एक भी कम होता तो उस चपरासी को दुबारा कन्हैया हलवाई की दुकान पर वापस भेजते और संख्या में पूरे बताशे मंगाते। बाद में स्व0 श्री बाबूराम सिंह प्रधानाचार्य हुए। कठोर तो वे भी बहुत थे, किंतु तब शिक्षा जगत में राजनीति घुस चुकी थी। शिक्षा और विद्यालय खोलना समाजसेवा न होकर निज सेवा होती जा रही थी। परिणाम यह हुआ कि प्रबंधन, प्राचार्य और वरिष्ठ अध्यापकों के झगड़े में शिक्षा पतन की ओर अग्रसर होती गई। आज तो शायद ही कोई इंटर काॅलेज होगा जो स्वस्थ हो, जहां नकल और राजनीति का बोलबाला न हो।

    अगर पिछली सदी के मध्य दशक में विशुनपुर के प्रभावी और ताकतवर लोगों की बात की जाए तो कुछ नाम स्वतः ही उभरकर क्षेत्रीय लोगों के मस्तिष्क में आ जाते हैं। इनमें सर्वप्रमुख स्व0 श्री रामनारायण मिश्र, श्री विजय नारायण मिश्र और स्व0 श्री शिवपूजन मिश्र थे। इन लोगों की लंबी जमींदारी और रुतबा था तथा प्रभाव एवं स्वभाव में ये किसी ़क्षत्रिय से कम नहीं  थे। बाद में श्री रामनारायण राढ़ी के पुत्र स्व0 श्री त्रिवेणी मिश्र ने अपने पिता की विरासत को संभाला। वास्तविकता यह थी कि एक समय श्री त्रिवेणी मिश्र से आँख मिलाकर बात करने की हिम्मत रखने वाला या उनसे शत्रुता मोल लेने वाला क्षेत्र में कोई नहीं था। हाँ, राढ़ी बिरादरी के लोगों का वे बहुत सम्मान करते थे और भाईचारा रखते थे। श्री त्रिवेणी मिश्र और श्री शिवपूजन मिश्र जब हाथी पर बैठकर अपने क्षेत्र में घूमते तो इनका जलवा होता था। श्री त्रिवेणी मिश्र का निधन अस्सी के दशक में हुआ होगा और श्री शिवपूजन मिश्र दीर्घजीवी रहे। श्री शिवपूजन मिश्र तो अंततः आर्थिक पतन को प्राप्त हुए और क्षेत्र के लोग उनका उत्थान - पतन, संपन्नता - विपन्नता के उदाहरण में उनके नाम का प्रयोग करने लगे। एक समय स्व0 श्री कामेश्वर मिश्र ने भी अपना परचम लहराया। उनका लंबा कुर्ता उनकी पहचान गया और वे भाजपा के स्थानीय नेता के रूप में स्थापित हुए। मधुमेह और सड़क दुर्घटना ने उन्हें लील लिया। प्रभाव और रुतबे के क्रम में स्व0 श्री राजेश्वरी मिश्र भी खड़े दिखते हैं और उनके पुत्र स्व0 श्री शीतला मिश्र ने भी वह विरासत संभाली। समय के साथ परिवर्तन आया और अब जातीय प्रभाव और आर्थिक शक्ति के बजाय आपराधिक प्रवृत्ति के लोग हर जगह प्रभावशाली हो रहे हैं, भले ही उनकी अपनी कोई औकात न हो।

    ब्राह्मणत्व, विद्वता, सामथ्र्य, शक्ति और सज्जनता का समन्वय एक साथ यदि राढ़ी के पूरा में देखना होता तो उस समय पोखरा वाले पुरवे की ओर रुख करना पड़ता था। मैं अपने लेख में आदरणीय श्री जाह्नवी कांत  मिश्र का कई बार उल्लेख कर चुका हूँ। आप इसी टोले के हैं। श्री मिश्र जी के पिता स्व0 श्री कमलाकांत मिश्र (1914-2003) उस समय एक अच्छे पढ़े-लिखे व्यक्ति थे जो अंगरेजी सरकार में रेलवे अधिकारी थे। तब रेलवे को ई आई आर (ईस्ट इंडिया रेलवे) के नाम से जाना जाता था। एक अधिकारी होने के कारण उन्होंने कई लोगों की नौकरियां लगवाई थीं। श्री जे0के0 मिश्र ने इंजीनियरिंग पास की और भारत सरकार की सेवा से सेवानिवृत्त होकर इस समय बैंगलुरु में जीवन व्यतीत कर रहे हैं।
    राढ़ी के पूरा  का पोखरा 
    इसी पोखरा टोले के स्व0 श्री रामप्यारे मिश्र भी बहुत सम्मानित व्यक्ति रहे। मध्य शिक्षा प्राप्त श्री रामप्यारे मिश्र एक शिष्ट, योग्य, विनम्र किंतु निडर व्यक्ति थे। अदालती कार्यवाही, कानून और संगीत के वे अच्छे जानकार थे और हारमोनियम में निष्णात थे। उनके पास बैठने का सौभाग्य इस लेखक को भी बहुत मिला था क्योंकि पहले पिताजी से उनके संबंध बहुत अच्छे थे और बाद में मैं स्वयं बहुत निकट पहुंच  गया। उनकी संगीत की विरासत को उनके छोटे पुत्र श्री जगदीश मिश्र ने बखूबी संभाला। स्व0 श्री रामप्यारे मिश्र के बड़े पुत्र श्री त्रिलोकी नाथ मिश्र इंटर काॅलेज के प्रधानाचार्य पद से सेवानिवृत्त हैं और अच्छे अध्येता और ज्ञाता हैं और आज भी उनके अंदर का विद्यार्थी जीवित है। भैरोजी के विषय में मुझे उनसे भी अच्छी जानकारी मिली थी।

    विशुनपुर, महाराजगंज की बात की जाए तो आस-पास के कुछ महत्त्वपूर्ण गांवों को उपेक्षित नहीं किया जा सकता। महराजगंज का दूसरा निकटतम और सशक्त गांव अक्षयबट है जिससे स्थानीय अपभ्रंश में अखैबर कहा जाता है। प्रमुखतया यह क्षत्रियों का गांव है और गांव की प्रसिद्धि क्षत्रियोचित कारणों से ही है। किसी समय भैरोजी के मंदिर पर मुसलमानों का आक्रमण हुआ था और शायद वह फारूख शेख का समय था, तब अक्षयबट के क्षत्रियों ने हमले का जवाब बड़ी बहादुरी से दिया था। उस आक्रमण में फारूख शेख के सिपाहियों ने हिंदुओं का कत्लेआम शुरू किया था किंतु अक्षयबट के क्षत्रियों ने विशुनपुर के राढ़ियों के साथ मिलकर उनका सामना किया था, अगुवाई की थी और आक्रांताओं को मुंह की खानी पड़ी थी। अक्षयबट की बाग में अंगरेजों के खिलाफ सभाएं हुई थीं और विद्रोह का बिगुल बजा था।
    श्री जे- के - मिश्र के माता-पिता (स्व० श्री कमला कांत मिश्र )
    मिश्रपुर (चांदपुर) की चर्चा किए बिना इस क्षेत्र का इतिहास अधूरा ही रहेगा। किसी समय जब संस्कृत, वैदिक आचार और शुचिता का बोलबाला था तो मिश्रपुर इसका ध्वजारोही था। इसे छोटा काशी कहा जाता था, और यह प्रकरण 1950 के आस-पास तक का होगा। कई जिलों के पंडित, शास्त्रज्ञ और विद्वान यहां के पंडितों से शास्त्र समझने आते थे। शास्त्रार्थ में चुनौती देने का साहस शायद किसी में रहा हो। न जाने कितनी किंवदंतियां यहां के विषय में प्रचलित हैं। सुना तो यह भी जाता है कि लगभग 100 साल पहले संस्कृत यहां की बोलचाल की भाषा थी। यदि अपुष्ट प्रमाणों की बात की जाय तो कहा जाता है कि एक बार बनारस में यहां के पंडितों के ज्ञान की चर्चा चली तो कुछ बनारसी विद्वान मिश्रपुर के पंडितों की परीक्षा लेने पहुंच  आए। बरसात का मौसम था। मुख्यमार्ग से गांव के बीच में कोई बरसाती नाला था जिसमें पानी भरा था । एक बनारसी विद्वान ने पास में खड़ी एक महिला (जो संभवतः कहार जाति से थी) से पूछा - नाले में कितना पानी है? इसपर महिला ने कहा- भीतो मा भव, केवलं कटिमानं जलं वर्तते’’। संस्कृत में दिए गए उसके इस उत्तर को सुनकर बनारसी विद्वान वहीं से उल्टे पांव वापस लौट गए। इस गांव के दो शास्त्रज्ञ विभूतियों को देखने का अवसर इस लेखक को भी मिला है। स्व0 त्रिवेणी तिवारी तो एक मिथक थे ही, स्व0 श्री रामदरश मिश्र भी कम विद्वान नहीं थे। यह मेरा सौभाग्य है कि श्री रामदरश मिश्र जी का बहुत ही अधिक स्नेह मुझे प्राप्त हुआ था।

    कुल मिलाकर यह क्षेत्र भारतीय संस्कृति का एक उन्नत उदाहरण रहा है। भौतिकता के इस युग में भी अभी यह बड़े दावे के साथ कहा जा सकता है कि पूर्वी उत्तर प्रदेश भाईचारा, प्रेम, सौहार्द और अपनत्व में अपना शानी नहीं रखता। सीधी-सपाट जिंदगी, न दिखावा न अतिशयता। आजमगढ़ का यह क्षेत्र हर काल में अपना महत्त्व रखता रहा है। भैरोजी की यह पावन भूमि अतुलनीय है और रहेगी।
    dhanyavad

    विज्ञान जन-जन के लिए

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    सामयिक वार्ता के ताज़ा अंक में प्रकाशित आलेख  हमें भी सड़कों पर उतरना होगा - मार्च फॉर साइंस
    कोलकाता में हिंदुत्ववादी लोग 'गर्भ संस्कार' का कार्यक्रम कर रहे हैं। कहा जा रहा है कि वेदों और शास्त्रों में ऐसे उपाय बतलाए गए हैं जो जन्म से पहले ही यह तय कर सकते हैं कि बच्चा आगे जाकर क्या कुछ बनेगा। वैज्ञानिकों और चिंतकों ने चिंता जताई है कि आम लोगों को इस तरह बेवकूफ बनाकर उनमें अंधविश्वास फैलाए जा रहे हैं। पर यह कोई नई बात नहीं है, हमें अचंभा भी नहीं होना चाहिए कि ऐसा हो रहा है। आखिर जब मुल्क का प्रधान मंत्री ही अतीत के तथाकथित विज्ञान पर ऊल-जलूल बयान दे चुका है तो बाक़ी पर क्या उँगली उठाई जाए। पर अमेरिका में वैज्ञानिक सड़क पर उतर आए – दसों हजारों की तादाद में लोगों ने विज्ञान को बचाने के लिए जुलूस निकाला, जिसमें इस वक्त के बड़े से बड़े वैज्ञानिकों ने हिस्सा लिया, यह खबर चौंकाती है। 22 अप्रैल को अर्थ डे यानी धरती दिवस वाले दिन अमेरिका की राजधानी वाशिंगटन डी सी समेत दुनिया भर में 600 से अधिक शहरों में रैली और जुलूस आयोजित हुए। आयोजकों ने इसे विज्ञान के पक्ष में गैर-राजनैतिक आंदोलन कहा।
    आधुनिक विज्ञान ने कुछ मुद्दों पर हमारी बुनियादी सोच में ऐसे बदलाव लाए हैं कि पश्चिमी मुल्कों में भी इससे कई हलकों में बेचैनी फैली है। पहले वैज्ञानिकों में अधिकतर आस्तिक होते थे, पर अब यह माना जाता है कि विज्ञान हमें नास्तिक बनाता है। जाहिर है धार्मिक संस्थाओं को यह बात पसंद नहीं है। खास तौर पर अमेरिका में पिछली सदी में यह बहस चलती रही है कि कायनात खुदा ने बनाई या जैसा कि आधुनिक विज्ञान में माना जाता है, वह एक बड़े धमाके से शुरु हुई। तरक्की पसंद तबकों के पुरजोर विरोध के बावजूद सरमाएदारों ने डार्विन के विकासवाद और जीवों के विकास में कुदरती चयन के सिद्धांत का भरपूर फायदा खुले बाज़ार के पक्ष में तर्क बढ़ाने के लिए किया। पर आज जब आधुनिक विज्ञान से धरती की आबोहवा में आ रहे खतरनाक बदलावों और तापमान बढ़ने का पता चलता है और सरमाएदारों को इसमें उनकी मुनाफाखोरी पर रोक का खतरा दिखता है, तो विज्ञान का विरोध करना उनके लिए लाजिम हो जाता है। गौरतलब बात यह है कि अमेरिका में विज्ञान को बचाने के लिए जुलूस तब निकला जब वहाँ डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व में हाल की सबसे ज्यादा दक्षिणपंथी और सरमाएदारों की कट्टर पक्षधर माने जाने वाली सरकार सत्ता में आई। ट्रंप के आने के बाद अनुदानों में भारी कटौती हुई है। इससे संस्थानों के सामने संकट है कि वे शोध-कार्य कैसे चलाएँ। वैज्ञानिक जानकारियों पर आधारित पर्यावरण रक्षा या ऐसे दूसरे कानूनों को हटाया जा रहा है। सरकारी वेबसाइट्स पर से आँकड़े हटाए जाने का खतरा है, कई सरकारी वैज्ञानिकों को या तो उनके काम से रोका गया है या रोके जाने का अंदेशा है। ट्रंप के राष्ट्रपति चुने जाने से पहले से ही उसने वैज्ञानिकों के खिलाफ मुहिम छेड़ रखी थी। आबोहवा में हो रहे बदलाव पर वैज्ञानिक जानकारी को उसने ढकोसला कहा था। इससे परेशान होकर वैज्ञानिकों ने कई हफ्तों तक सोशल मीडिया आदि में कैंपेन किया और मार्च के लिए पैसे इकट्ठे किए।
    हमारे देश में विज्ञान के लिए जनांदोलनों का पुराना इतिहास है। आज़ादी के पहले जहाँ अंग्रेज़ी तालीम जड़ पकड़ चुकी थी और साथ ही अंग्रेज़ी राज का तीखा विरोध भी था, उन इलाकों में, जैसे बंगाल में, सैंकड़ों विज्ञान सभा या क्लब थे। आज़ादी के बाद भी ये क्लब सक्रिय रहे और कहीं-कहीं रेशनलिस्ट यानी तर्कशील आंदोलन की रीढ़ बने। पर गंभीर विज्ञान चर्चा हर जगह आम बातचीत का हिस्सा नहीं बन पाई। खास तौर पर हिन्दीभाषी इलाकों में विज्ञान पिछड़ा रहा और कभी भी मुख्यधारा का हिस्सा नहीं बन पाया। नतीजतन जहाँ आज भी बांग्ला में दर्जनों विज्ञान आधारित पत्रिकाएँ हैं, हिन्दी प्रदेशों में सरकारी पत्रिकाओं को छोड़ कर एक भी ऐसी पत्रिका नहीं है, जिसमें विज्ञान के सामान्य सवालों या खोजों पर केंद्रित चर्चाएँ हों। अंग्रेज़ी में 'द हिन्दू' जैसे अखबार में हफ्ते में एक दिन एक पूरा पन्ना विज्ञान पर निकलता है, पर हिन्दी में ऐसा सोचना भी मुश्किल है।
    सत्तर और अस्सी के दशकों में मादरी ज़ुबान में साइंस की तालीम पर बहुत सारा ज़मीनी काम हुआ। मध्य प्रदेश के होशंगाबाद जिले से शुरु हुआ 'होशंगाबाद विज्ञान शिक्षा कार्यक्रम' कई जिलाओं में फैला। पहले किशोर भारती और बाद में एकलव्य संस्थाओं ने इस कार्यक्रम को चलाया। अस्सी के दशक के आखिरी सालों में देश भर में विज्ञान के जनांदोलन हुए। अखिल भारतीय जनविज्ञान नेटवर्क नामक संगठन बना, जिसके झंडे तले देश भर में विज्ञान-आंदोलन हुए और 1987 में हजारों की तादाद में विभिन्न वर्गों से आए लोग गाँधी के जन्मदिन 2 अक्तूबर से यात्रा शुरु करते हुए रमन के जन्मदिन 7 नवंबर को भोपाल में इकट्ठे हुए। इन आंदोलनों में विशुद्ध विज्ञान-कर्मियों के अलावा समाजवादियों से लेकर साम्यवादियों तक हर तरह के वामपंथी सक्रिय थे। इन आंदोलनों का मुख्य नारा था कि विज्ञान जन-जन के लिए है और हर किसी तक पहुँचे।
    विज्ञान को आगे बढ़ाने में तरक्कीपसंद सोच के लोगों की भागीदारी को देखते हुए यह मानना पड़ेगा कि आधुनिक विज्ञान का एक स्पष्ट राजनैतिक पक्ष है। अपनी तमाम सीमाओं के बावजूद यह बराबरी के समाज के लिए हमारी राजनैतिक सोच को आगे बढ़ाता है।
    एक क़ॉलेज की छात्र ऐलिसन वोंग ने http://synapse.ucsf.edu/articles/2017/05/01/march-science-politicalवेबसाइट पर लिखा कि वह मानती है कि विज्ञान के लिए आंदोलन राजनैतिक है। अमेरिका में इस तरह की बहस जारी है और कई लोग इस विचार के पक्ष-विपक्ष में तर्क दे रहे हैं।
    क्या ऐसा जुलूस हमारे यहाँ निकल सकता है? हमारा मुल्क कहने को तो विविधताओं से भरा है, पर ऊँची तालीम और खास तौर पर विज्ञान में सुविधा-संपन्न अगड़ी जातियों के पुरुषों का वर्चस्व है। यह सही है कि उन्हीं में से एक छोटा हिस्सा उन साहसी दोस्तों का है जिन्होंने अपना बहुत सारा वक्त समाज में वैज्ञानिक चेतना फैलाने में लगाया है और हर तरह के तरक्कीपसंद कदम को बढ़ावा दिया है। पिछले साल ऐसे ही एक समूह ने वर्तमान हाकिमों और उनके सांगोपांग द्वारा अंधविश्वासों को विज्ञान कहने पर विरोध जताया था। इनसे अलग कूढ़मगज पुरातनपंथी हमारे विज्ञान-संस्थानों में भरे हुए हैं, प्रधान मंत्री बकवास ऐसे ही नहीं करते। ये लोग अति-राष्ट्रवादी किस्म के लोग हैं, जो थोड़ा बहुत संस्कृत सीख कर उसे तोड़-मरोड़ कर पुनरुत्थानवादी वक्तव्य देते रहते हैं। कहने को यह ज्ञान-विज्ञान की दुनिया में पश्चिम के वर्चस्व के खिलाफ लड़ाई है, पर सचमुच यह ज्यादातर पोंगापंथी ही है - वाकई संस्कृत का अच्छा ज्ञान रखने वाले और गंभीर अध्येता इनमें से कम ही लोग होते हैं। इसलिए इन वैज्ञानिकों से यह अपेक्षा नहीं की जा सकती कि वे सबके लिए विज्ञान की माँग का समर्थन करें। संयोग की बात है कि डोनाल्ड ट्रंप के पास बकवास करने के लिए वेदों या शास्त्रों का सहारा नहीं है। इसलिए इस मामले में हमारे पोंगापंथी अमेरिकियों से ज्यादा ताकतवर हैं। एक नासमझ पत्रकार ने यह सुझाया है कि सरकारी संस्थानों में होने की वजह से ही भारतीय वैज्ञानिक जुलूस नहीं निकाल सकते, जबकि सच यह है कि निजी संस्थानों में वैज्ञानिक कहीं ज्यादा असुरक्षा की भावना से ग्रस्त होते हैं।
    हमारे यहाँ की फासिस्ट संघी सरकार ने भी बुनियादी तालीम और शोध-कार्य पर हमला बोला हुआ है। हर यूनिवर्सिटी में बजट में कटौती हुई है। पंजाब यूनिवर्सिटी में एकमुश्त बेहिस बढ़ाई गई फीस के खिलाफ आंदोलन करने वाले 63 छात्रों पर एक दिन के लिए राजद्रोह का इल्ज़ाम भी लगा दिया गया था, पुलिस की मार जो पड़ी वह अलग। जाहिर है कि वक्त और माहौल हमारे लिए भी न केवल विज्ञान विरोधी है, बल्कि बुनियादी तालीम के खिलाफ है। इसलिए हमें भी सड़कों पर तो उतरना होगा। संघर्ष का कोई विकल्प नहीं बचा है।

    सरकारी शिक्षा का भस्मासुर :  महेश पुनेठा

    लेखक मंच - Sat, 03/06/2017 - 23:33

    महेश पुनेठा

    शिक्षा अधिकार अधिनियम 2009 आने के बाद देश भर से लगातार सरकारी स्कूलों के बंद होने की खबर आ रही हैं। महाराष्ट्र, गुजरात, राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, उत्तराखंड सहित देश के विभिन्न राज्यों में अब तक हजारों सरकारी स्कूल बंद किए जा चुके हैं। सरकारी स्कूलों में प्रवेश लेने वाले बच्चों की संख्या साल दर साल घटती जा रही है। सरकारी स्कूलों के प्रति विश्‍वास लगातार कम होता जा रहा है। यही सिलसिला जारी रहा तो आने वाले पांच-सात सालों के भीतर सरकारी प्राथमिक स्कूलों की संख्या अँगुलियों में गिने जाने लायक रह जाएगी।

    इसके पीछे सबसे बड़ा और तात्कालिक कारण है- शिक्षा अधिकार अधिनियम-09 के अंतर्गत 25 प्रतिशत वंचित वर्ग के बच्चों को निजी विद्यालयों में प्रवेश देने सम्बन्धी प्रावधान है। इसने सरकारी प्राथमिक विद्यालयों में जनता के रहे-सहे विश्वास को भी ख़त्म करने का काम किया है। यह प्रावधान सरकारी शिक्षा के लिए भस्मासुर बन चुका है। उल्लेखनीय है कि इस क़ानून के अंतर्गत व्यवस्था है कि प्रत्येक निजी विद्यालय अपनी कुल छात्र संख्या के 25 प्रतिशत वंचित वर्ग के बच्चों को प्रवेश देगा, जिनका शुल्क राज्य सरकार द्वारा उस विद्यालय के खाते में जमा कर दिया जाएगा। ऐसा नहीं है कि इससे पहले अभिभावकों में निजी स्कूलों के प्रति आकर्षण नहीं था। पिछले लम्बे समय से निजी स्कूलों में बच्चों को पढ़ाना स्टेटस सिम्बल बन चुका है। लेकिन उक्‍त प्रावधान का सबसे बड़ा सन्देश यह जा रहा है कि सरकारी स्कूलों से अच्छी शिक्षा निजी स्कूलों में दी जा रही है इसलिए सरकार भी बच्चों को वहां भेजने को प्रोत्साहित कर रही है। इस प्रकार पहले से कमतर शिक्षा का आरोप झेल रहे सरकारी स्कूलों में स्वयं सरकार ने कमतरी की मुहर लगा दी है। जब सरकार स्वयं यह स्वीकार कर रही हो तो भला कोई क्यों अपने बच्चों को कमतर स्कूलों में डालना चाहेगा और जब सरकार निजी स्कूल में पढ़ाने का खर्चा देने को तैयार हो तो फिर भला कोई क्यों अपने बच्चों को सरकारी स्कूल में डालेगा। सरकार ने बहुत चालाकी से शिक्षा के निजीकरण का रास्ता प्रशस्त कर दिया है। बहुत जल्दी ही सरकार गरीब बच्चों को वाउचर थमाकर सार्वजनिक शिक्षा की जिम्मेदारी से मुक्त हो जाएगी। वह दिन दूर नहीं जब दूर-दराज के गांवों में ऐसे निजी स्कूल खुल जाएंगे, जहाँ 75 प्रतिशत बच्चों से भारी-भरकम शुल्क वसूल किया जाएगा और 25 प्रतिशत बच्चों का सरकार से वाउचर प्राप्त किया जाएगा। निजी स्कूलों की पाँचों अंगुलियाँ घी में होंगी। इसका सबसे अधिक बुरा प्रभाव वंचित/दलित वर्ग के बच्चों पर पड़ना है, क्योंकि वर्तमान में सरकारी स्कूलों में सबसे अधिक बच्चे इसी वर्ग के पढ़ रहे हैं। आज जहाँ इसके शत-प्रतिशत बच्चे निशुल्क शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं, वहां सरकारी स्कूल बंद होने के बाद केवल 25 प्रतिशत ही निशुल्क शिक्षा प्राप्त कर पाएंगे। उनके साथ भी भेदभाव होने की आशंका अलग से रहेगी। जैसा कि जो बच्चे अभी सरकारी खर्चे से निजी स्कूलों में जा रहे हैं, उनके बारे में समय-समय पर भेदभाव की ख़बरें सुनने को मिलती रहती हैं। बताया जाता है कि बहुत सारे निजी स्कूलों ने उनकी एक अलग कैटेगरी बना दी है। एक आशंका और है- वंचित/दलित वर्ग के बच्चों का शिक्षण शुल्क तो सरकार देगी, लेकिन निजी स्कूलों द्वारा शिक्षण शुल्क के अलावा आए दिन लिए जाने वाले शुल्कों का क्या होगा? ये ऐसे शुल्क हैं, जिन्होंने मध्यवर्ग के नाक पर ही दम किया है, गरीब वर्ग इनको कैसे वहन करेगा? जहाँ तक शिक्षा का सवाल है, सच कहा जाए तो निजी स्कूलों में भी भाषा-गणित और विज्ञान जैसे विषयों को मात्र रटाया जा रहा है। सच्चे अर्थों में जिसे शिक्षा कहा जाता है, जो एक संवेदनशील, विवेकवान और जिम्मेदार नागरिक बनाती है, उससे निजी स्कूल कोसों दूर हैं। बावजूद इसके उन्हें ही मानक माना जा रहा है।

    कैसी विडंबना है कि एक ओर वाउचर देकर बच्चों को निजी स्‍कूलों में भेजने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है तथा दूसरी ओर सरकारी स्कूल के शिक्षकों से पूछा जा रहा है कि उनके स्कूलों में छात्र संख्या कम क्यों हो रही है ? प्रकारांतर से उन्हें  इस बात के लिए जिम्मेदार ठहराया जा रहा है। जबकि हकीकत यह है कि शिक्षक से सारे काम खूब करवा जा रहे हैं और उसके मूल काम से उसको दूर किया जा रहा है। गलत सरकारी नीतियों ने सरकारी स्कूलों और शिक्षकों के प्रति इतना अधिक अविश्‍वास पैदा कर दिया है कि जिन सरकारी स्कूलों में बहुत अच्छी पढा़ई भी हो रही है, वहां भी आज अभिभावक अपने बच्चों को भेजने के लिए तैयार नहीं हैं। उक्त प्रावधान के आने से पहले तक गरीब परिवार के बच्चे तो सरकारी स्कूलों में आते थे, लेकिन अब उन्हें भी निंजी स्कूलों में बच्चे पढ़ाने के झूठे गौरव में डुबाया जा रहा है। होना यह चाहिए था कि सरकार निजी स्‍कूलों में पढ़ने वाले बच्चों को भी सरकारी स्कूलों में आने के लिए प्रोत्साहित करती। उन कमियों को दूर किया जाता, जिनके चलते सरकारी स्कूलों की गुणवत्ता में कमी आ रही है, लेकिन हो उसका उल्टा रहा है।

    वरिष्ठ शिक्षाविद योगेश बहुगुणा का यह कहना सही है कि  सरकारी स्कूलों की जो दुर्दशा है, उन्हें देखकर तो गरीब से गरीब आदमी भी वहां अपने बच्चों को भर्ती नहीं करना चाहेगा। अपवादस्वरूप कुछ अच्छे स्कूल हो सकते हैं। लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि इस दुर्दशा के मूल कारणों को दूर करने के ईमानदार प्रयास अभी तक नहीं किए गए। सुधार के नाम पर जड़ का इलाज करने के बजाय उसके तनों को काटने-छांटने और सींचने की नौटंकी ही अधिक की जाती रही है। शिक्षा अधिनियम-2009 में कुछ अच्छे प्रावधान भी हैं। जैसे- हर स्कूल में पूर्ण प्रशिक्षित शिक्षक, पुस्तकालय, प्रयोगशाला, खेल का मैदान, पर्याप्त कक्षा-कक्ष आदि, लेकिन आठ साल गुजरने को हैं इनकी ओर कोई विशेष ध्यान नहीं दिया गया। आज भी कमोबेश वही स्थित है जो इस अधिनियम के आने से पहले थी। छात्र-शिक्षक मानक के आधार और शिक्षकों को गैर शिक्षण कार्यों से मुक्त करने की मांग हमेशा से की जाती रही है, पर इस ओर कोई ध्यान नहीं दिया जाता है।

    आश्चर्य होता है कि‍ सरकारी शिक्षा को ख़त्म करने की इतनी गहरी चाल चली गयी है, लेकिन कहीं से कोई विरोध की आवाज नहीं सुनाई दे रही है। औरों की तो छोडिये शिक्षक संगठन भी इस पर चुप्पी साधे हुए हैं। उनके अधिवेशनों में भी इस पर कोई खास चर्चा नहीं होती है। और यदि कोई शिक्षक इस पर बात करता है, तो उसे अजीब सी नज़रों से देखा जाता है। कह दिया जाता है कि‍ यह हमेशा ऐसी ही नकारात्मक बात करता है। वरिष्ठ शिक्षाविद अनिल सदगोपाल के नेतृत्व में ‘अखिल भारतीय शिक्षा अधिकार मंच’ इस मुद्दे पर लगातार मुखर विरोध करता रहा है। इस बारे में अनिल सदगोपाल ने खूब लिखा भी है लेकिन बहुसंख्यक लोग उसे अनसुना करते रहे हैं। यह स्थिति बहुत चिंताजनक है। इसे देखकर तो लगता है कि आज अगर सरकार एक झटके में सार्वजनिक शिक्षा के निजीकरण की घोषणा भी कर दे तो कहीं कोई ख़ास हलचल नहीं होने वाली है। इस स्थिति के लिए देशी-विदेशी बाजारवादी शक्तियां पिछले पच्चीस वर्षों से वातावरण बनाने में लगी हुई हैं क्योंकि शिक्षा आज मुनाफे का सबसे बड़ा क्षेत्र है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि सार्वजनिक शिक्षा के निजीकरण से न केवल गरीब वर्ग के बच्चों की शिक्षा पर संकट आएगा, बल्कि स्थायी रोजगार का एक बड़ा क्षेत्र भी समाप्त हो जाएगा।

    एक पगला है सैफू

    असगर वजाहत पर 'बनास जन' के विशेषांक में प्रकाशित:

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    'मैं हिंदू हूँ' पढ़ते हुए
    - लाल्टू
    एक पागल है टोबा टेक सिंह और एक पगला है सैफू।
    टोबा टेक सिंह जाने कब से यह जानने की कोशिश में है कि उसका गाँव टोबा टेक सिंह हिंदुस्तान में है या पाकिस्तान में। उसे पता चल जाए कि गाँव वाकई कहीं स्यालकोट के पास है तो कितना अच्छा हो। सैफू जान जाए कि पाकिस्तान में भी मिट्टी होती है तो कितना बढ़िया।
    असगर वजाहत हमारे वक्त के उन रचनाकारों में से हैं जो अपने देश-काल की संकीर्णताओं से परे मानवीय विड़ंबनाओं से हमें रूबरू करवाते हैं। ऐसा करने के लिए वे सरल-सहज देसी भाषा में बेबाक किस्सागोई करते हैं और इस तरह समकालीन हिंदी कथा-साहित्य में अपनी अप्रतिम जगह बनाते हैं।
    एक कहानी 'डंडा' में असगर की पंक्ति है - 'डंडा होने पर हाथी वैसी ही हँसी हँसने लगा जैसी हँसी हम सब रोज हँसते हैं।' हम कैसी हँसी रोज हँसते हैं? हमारी रोजाना की हँसी हमारी अपनी हँसी है या कि उस सधे हुए हाथी की है जिसे समाज, परंपरा, धर्म, जाति, लिंग आदि की संस्थाओं ने निरंतर डंडा किया हुआ है! सामूहिक अश्लीलता के प्रति असहाय समर्पण हमारी नियति है। हालाँकि असगर को यह तकलीफ ज़रूर है कि 'तब दंगे ऐसे नहीं हुआ करते थे जैसे आजकल होते हैं।' सच यह है कि तब भी दंगे ऐसे होते थे, नफ़रत की सौदागरी कमोबेश एक जैसी ही रही है; फ़र्क यह है कि आज हममें से कई यह जानकर शामिल होते हैं कि सब कुछ ग़लत है। सामंती काल में गैरबराबरी को ही सही माना जाता था। या यूँ कहें कि आज भी कुछ लोग उन्हीं कारणों से दंगों में शामिल होते हैं, जैसे पिछले जमानों में होते थे। पर अधिकतर जानते हैं कि हत्याएँ और कत्लेआम हमारे अंदर के शैतानों का खेल है, पर यह हमारी नियति है कि हम इसमें शामिल हैं। अक्सर लोग यह भ्रम फैलाते हैं कि आम लोगों के दिलों में शैतान बिल्कुल नहीं होता। अगर सचमुच ऐसा होता तो राष्ट्रवाद और इसके नाम पर भुनाई जाने वाली राजनीति कैसे पनपती! असगर व्यावहारिक सीमाओं की ओर संकेत करते हैं - 'जबानी जमा-खर्च तक तो सब ठीक था लेकिन उसके आगे. . . संकट (पी ए सी को बूटों की मार) एकता सिखा देता है।’ पर सचमुच इंसान के आज़ाद खयाल कितने आज़ाद होते हैं, यह संशय हमें कम या ज्यादा हो, पर हुक्मरानों को नहीं होता। वे जानते हैं कि बकौल फूको आज़ाद खयाल ज्ञान के संस्थानों की निर्मिति हैं। ये संस्थान संगठित या असंगठित ढंग से हमारे इर्द-गिर्द फैले हुए हैं। ये संस्थान हमें अपनी जकड़ में लिए हुए हैं। ये वही डंडा करने वाले संस्थान हैं, जिसका फायदा हुक्मरान उठाते हैं।
    तो क्या हम स्वस्थ मानसिकता से सामूहिक विक्षिप्तता को कभी समझ नहीं पाएँगे? क्या यह मानव 'सभ्यता' के लिए चिरंतन शाप है? असगर और मंटो की कहानियों में हम खुद से पूछते रहेंगे कि हम रोज वाली हँसी कब तक हँसते रहेंगे। सैफू पागल है या कि उसे समझने, उससे जूझने में असफल हम लोग पागल हैं। फूको ने कहा है कि पागलपन या अ-युक्ति (अन-रीज़न) अक्सर एक दूसरे का हिस्सा होते हैं। इनका आपस में संबंध बदलता रहता है। हम व्यक्ति के स्तर पर इस संबंध को तभी देखते हैं, जब हम पर सामूहिक विक्षिप्तता हावी रहती है। इसीलिए तो, राष्ट्र नामक विक्षिप्तता को हमने शाश्वत सत्य मान लिया है; यही नहीं इस पागलपन में अ-युक्ति को ज़बरन युक्तिसंगत मानने के लिए हमने मनगढ़ंत इतिहास, भूगोल, विज्ञान तक बना लिए हैं।
    राष्ट्र की जो अवधारणा पश्चिम से हमें मिली है, वह आम तौर पर अल्पसंख्यकों के लिए अभिशाप है, क्योंकि यह राष्ट्र की संरचना में निहित है कि अपने ही अंदर दुश्मन ढूँढा जाए। कुछ सदी पहले तक उत्तरी यूरोप के मुल्कों में, जहाँ प्रोटेस्टेंट ईसाई बहुसंख्यक थे, कैथोलिक समुदाय को गद्दार समझा जाता था और इसी तरह दक्षिणी यूरोप के मुल्कों में, जहाँ कैथोलिक बहुसंख्यक थे, प्रोटेस्टेंट ईसाइयों को दुश्मन माना जाता था। यहूदी हर जगह इस भेदभाव का शिकार रहे। अल्पसंख्यकों को ज़ुल्म सहने पड़ते हैं, वे दंगों और कत्लेआम के शिकार होते हैं। इससे भी बढ़कर तकलीफ की बात यह है कि परिस्थितियों के मारे वे उस गतिकी को समझने लगते हैं जिसे बहुसंख्यक नहीं समझ पाते कि आज़ाद खयाल डंडा करने वाले ज्ञान के संस्थानों की निर्मिति हैं। भौतिक यातनाओं से भरे अपने अस्तित्व के साथ बहुसंख्यकों के दृष्टिहीनता वाले शापग्रस्त जीवन को देखते रहना और भी अधिक पीड़ादायक है। अल्पसंख्यक होना अपने चारों ओर ऐसे बहुसंख्यक लोगों से घिरे होना है जो सच नहीं देख पाने को अभिशप्त हैं। इसलिए सैफू रोता रहेगा, खुद को बहुसंख्यकों में से एक साबित करता रहेगा, पर वह बेहोश होकर ही बच पाएगा। होश में रहकर उसे मुक्ति नहीं मिलेगी। इसी तकलीफ में बेचैन होकर हम अतीत में सहारा ढूँढते हैं - 'तब दंगे ऐसे नहीं हुआ करते थे जैसे आजकल होते हैं।' पर इतिहास वर्तमान से कम निष्ठुर नहीं है। स्टीवेन पिंकर की मानें तो मानव सभ्यता लगातार पहले से कम हिंसा की ओर बढ़ती रही है। हिंसा के भयंकर साधन हमारे पास हैं, जो पल भर में पूरी धरती और इस जैसी दस हजार धरतियों को तबाह कर सकते हैं, पर हिंसा की आलोचना का दायरा बढ़ा है। हमने अपने अंदर शैतान को देखना शुरु किया है। घनी हताशा के बीच इसी थोड़ी सी उम्मीद को सँजोए हम जीते चले हैं।
    ऊपर मंटो की कहानी के चरित्र का जिक्र हमने इसलिए नहीं किया है कि हमें असगर वजाहत को मंटो की परंपरा में खड़ा करना है, बल्कि यह महज यह दिखलाने के लिए है कि यातना कैसी विकट हो चली है कि निश्छल होना सपनों में चीखने के लिए, खड़े-खड़े सोने के लिए मजबूर होना है। कहने को 'मैं हिंदू हूँ' कहानी हमें इस सच का सामना करने को तैयार करती है कि हमने अपने इर्द-गिर्द ऐसा समाज बनाया है, जहाँ हर वक्त जंग जिड़ी हुई है। कथाकार तो कहानी ही लिख सकता है। पर कितनी कहानियाँ पढ़ कर हम उन सच्चाइयों को देखने के काबिल हो पाएँगे, जो हमारी आँखों के सामने होकर भी नहीं हैं। घर-वापसी का नारा देने वाले कब जानेंगे कि हममें से हर किसी पर यह डर हावी है कि हमें मुख्यधारा से अलग मान लिया जा सकता है, हमारे अंदर कोई तड़पता हुआ मुख्यधारा में शामिल होने की जद्दोजहद में शामिल है।
    'मैं हिंदू हूँ' कहानी और भी बहुत कुछ कहती है, यह हमें दिमागी कमजोरी के प्रति अपनी संवेदना की कमी को भी दिखलाती है। वही मुसलमान लड़के जो खुद को कहीं और बहुसंख्यकों में शामिल होने के कायर ख्वाब देख कर अपनी मौजूदा यातनाओं से जूझते हैं, वे अपने साथ एक अधपागल को डरा कर मजा लेते हैं। असगर सर्जनात्मक लेखन से अलग सोशल मीडिया जैसे मंचों पर अपनी दीगर टिप्पणियों में कट्टर धर्म-निरपेक्ष दिखते हैं। नाम से मुसलमानी पहचान से मजबूर, उन्होंने बार-बार हुक्मरानों को कोसा है कि उन्होंने राजनैतिक फायदों के लिए मुस्लिम तुष्टीकरण के तरीके अपनाए हैं। क्रीएटिव लेखन में उनके सरोकार सामाजिक बराबरी के लिए संघर्ष के हैं और इसमें भी उनकी धर्म-निरपेक्षता प्रखर होकर सामने आती है। "… शहर में दंगा करने वाले हिंदू और मुसलमान बदमाशों को मिला भी दिया जाए तो कितने होंगे. . . ज्यादा से ज्यादा एक ... दो हज़ार मान लो ... लाखों लोगों की जिंद़गी को जहन्नुम बनाए हुए हैं… ये तो वही हुआ कि दस हज़ार अंग्रेज़ करोड़ों हिंदुस्तानियों पर हुकूमत किया करते थे … इन दंगों से फ़ायदा किसका है … हाजी अब्दुल करीम को फ़ायदा है जो चुंगी का इलेक्शन लड़ेगा और उसे मुसलमान वोट मिलेंगे। पंडित जोगेश्वर को है जिन्हें हिंदुओं के वोट मिलेंगे… क्या हम लोगों को पढ़ा नहीं सकते? समझा नहीं सकते? … मान लो इस देश के सारे मुसलमान हिंदू हो जाएं?… मान लो इस देश के सारे हिंदू मुसलमान हो जाएं? … तो क्या दंगे रुक जाएंगे? … तो क्या … इंसान साला है ही ऐसा कि जो लड़ते ही रहना चाहता है? वैसे देखो तो जुम्मन और मैकू में बड़ी दोस्ती है। तो … हम मैकू और जुम्मन बन जाएं. . .”। सारों का हिंदू हो जाना या कि मुसलमान हो जाना इंसानियत और हैवानियत के फ़र्क को नहीं मिटा सकता। मैकू और जुम्मन हिंदू नहीं, मुसलमान भी नहीं हैं, वे महज इंसान हैं, इसलिए उनमें दोस्ती है।
    असगर वजाहत का कैनवस बड़ा है। उनके उपन्यासों के अलावा छोटी-छोटी कहानियों, नाटकों में बहुत बड़ी बातें कहने की कोशिश दिखती है। उनका लेखन हमें अपनी असभ्यताओं के प्रति सचेत करता है। अक्सर उनकी कोशिश निरपेक्षता के मानदंड स्थापित करने की दिखती है, पर सचमुच उन्हें पढ़ते हुए हम यह सोचने को मजबूर होते हैं कि क्या बहुसंख्यक अस्मिता को बनाए रखते हुए किसी तरह की मुक्ति संभव भी है या नहीं! जो सच हमें शाश्वत दिखते हैं, उन पर सवाल खड़ा करते हुए ही हम मुक्ति के सही विकल्प खड़े कर पाएँगे। हमारी रोज की हँसी की अश्लीलता से मुक्त हो पाएँगे। एकता की सीख पी ए सी की बूटों की मार से नहीं, साहित्य और कला की मदद से, अपने नैतिकता के बोध से ही मिलेगी। 'हज़ारों लोगों के मारे जाने के बाद भी मुख्यमंत्री मूछों पर ताव देकर घूमता और कहता कि जो कुछ हुआ सही हुआ' का सच एक ओर है तो व्यापक जनविरोध भी है। दंगों की राजनीति होती रहेगी और हम प्रतिरोध की संस्कृति बनाते चलेंगे। इसी उम्मीद के साथ असगर वजाहत की कलम पर सवार होकर 'शाह आलम कैम्प की रूहें' हमें खुद के रूबरू कराती हैं। 'मैं हिंदू हूँ' को पढ़ते हुए यही खयाल ताकत पाते हैं।





    सावधान ,गाय के नाम पर उत्तर में हिंसा ,कहीं दक्षिण पर भारी न पड़ जाय

    जंतर-मंतर - Fri, 02/06/2017 - 08:19


    शेष नारायण सिंह  
    अखबार में खबर है कि राजस्थान हाई कोर्ट ने सुझाव  दिया है कि गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित कर दिया जाय . माननीय हाई कोर्ट ने यह भी सुझाव दिया है कि गाय को जान से मारने वाले को आजीवन कारावास की सज़ा का प्रावधान कानून में होना चाहिए . एक मुक़दमे की सुनवाई के दौरान कोर्ट का यह सुझाव आया है . यह बताना ज़रूरी है कि यह माननीय हाई कोर्ट का आर्डर नहीं है . अगर आर्डर होता तो सरकार को इस पर विचार करने की बाध्यता होती , क्योंकि कोर्ट का आर्डर  सरकार को लागू करना होता है . इसी बीच मद्रास हाई कोर्ट की मदुरै बेंच ने एक आर्डर  दे दिया है . मंगलवार को हाई कोर्ट ने प्रिवेंशन आफ क्रुएल्टी टू एनिमल्स रूल्स २०१७ के नियम २२ ( बी )  और २२ (इ ) पर स्टे दे दिया है . केंद्र सरकार ने २३ मई को एक  आदेश पास करके नए नियम बना दिए थे जिसके बाद पशु मेलों और बाज़ार में , वध के लिए पशुओं की बिक्री पर रोक लगा दी गयी थी. इस नए नियम को मद्रास हाई कोर्ट ने रोक दिया है , स्टे चार हफ्ते के लिए है . ज़ाहिर है पूरा आर्डर कोर्ट  में विधिवत सुनवाई के बाद ही आयेगा .
    मदुरै की एक  वकील एस सेल्वगोमती ने एक जनहित याचिका दायर करके माननीय हाई कोर्ट से प्रार्थना की थी कि केंद्र सरकार का नया नियम  संविधान में दिए गए मौलिक अधिकारों का हनन करता है . उन्होंने यह भी दावा किया था कि केंद्र सरकार को यह नियम नहीं बनाना चाहिए क्योंकि पशुओं  से  सम्बंधित सभी विषय राज्य सरकारों के कार्यक्षेत्र में आते हैं  . संविधान की आत्मा मौलिक अधिकार और संघीय ढांचा हैं  और यह नियम दोनों का ही उन्लंघन करता है .
    याचिकाकर्ता का दावा है कि पी  सी ए एक्ट के नए नियम संविधान में गारंटी किये गए मौलिक अधिकारों को अप्रभावी कर देते हैं क्योंकि  संविधान के अनुच्छेद २५ में किसी भी व्यक्ति को अपने धर्म का पालन  करने के अधिकार की गारंटी दी गयी है .इसके अलावा मौलिक अधिकारों के  अनुच्छेद २९ में  अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा करने की गारंटी भी दी गयी है. कई धर्मों में पशु बलि का प्रावधान है और कुछ धर्मों के मतावलंबी पशुओं का वध भी करते हैं और उनके मांस का भोजन  भी करते हैं . संविधान और कानून की बारीकियों के बीच सरकार का नया नियम चर्चा का विषय है . सरकार तो सरकार है , संसद में स्पष्ट बहुमत है, विपक्ष किसी भी मुद्दे पर  चौकन्ना नहीं है, इसलिए जो भी प्रधानमंत्री और सरकार चाहेंगें पास कर लेंगें  और उसी हिसाब से नियम कानून बना लेगें . लेकिन सरकार को यह ध्यान देना ज़रूरी है कि इस एक नियम से कहीं वह उन भावनाओं को हवा तो नहीं दे रही  है जो देश के संघीय ढाँचे को ही नुक्सान पंहुचा दें .
    मैं आजकल दक्षिण  भारत में हूँ . दिल्ली में रह कर अंदाज़ नहीं लगता लेकिन यहाँ आकर एक अजीब सी तस्वीर नज़र आ रही है . ट्विटर पर #द्रविड़नाडु ट्रेंड कर रहा है जहां अजीबोगरीब बातें लिखी जा रही हैं . एक ट्वीट में लिखा है कि खाने पीने की रिवाज़ पर हमला और हिंदी थोपने की केंद्र सरकार की कोशिश को बर्दाश्त नहीं किया जा सकता .   एक अन्य ट्वीट के अनुसार लोग मांग कर रहे हैं कि द्रविड़नाडू की राजधानी बैंगलोर, हैदराबाद, त्रिवेंद्रम और चेन्नई में से किसी एक शहर को बना देना चाहिए . इस तरह की मांग दक्षिण में पहले भी उठती रही है लेकिन उसको  हमेशा  करीने से सम्भाला जाता रहा है . करीब पचास साल पहले जब  उत्तर भारत में हिंदी को देश की भाषा बनाने की बात बड़े जोर शोर से चली थी तो दक्षिण भारत में हिंदी के विरोध में ज़बरदस्त आन्दोलन शुरू हो गया था. के करूणानिधि और अन्य कई नेता उसी आन्दोलन के बाद देश की राजनीति में नोटिस होना शुरू हो गए थे.
    अभी अलगाववाद की आवाज़ बहुत ही क्षीण है लेकिन इस आवाज़ के जड़ तक जाने की ज़रूरत है . १९२० में महात्मा गांधी के सविनय अवज्ञा आन्दोलन के बाद अंग्रेजों को भारतवासियों की एकता ने डरा दिया था . अँगरेज़ इस मुगालते में थे कि धर्मों और जातियों में बंटा भारत देश कभी एक नहीं हो सकता लेकिन जब १९२० में गांधी जी के नेतृत्व में हिन्दू-मुसलमान , उत्तर-दक्षिण , सब एक हो गए तो अंग्रेजों ने अपने  भारतीय भक्तों को आगे करके कई संगठन बनवाए . मजदूरों में भेद पैदा करने की कोशिश की . हिन्दू और मुसलमान में भेद डालने की कोशिश उत्तर में हुयी तो दक्षिण में अंग्रेजों ने यह बताने की कोशिश की कि ऊंची  जातियों के लोग कांग्रेस की राजनीति में हावी  हैं इसलिए कांग्रेस में गैर ब्राह्मण जातियों की अनदेखी होगी. जिन्ना महात्मा गांधी से नाराज़ चल ही रहे थे, कांग्रेस  से अलग होकर मुसलमानों की राजनीति का विकल्प तलाश रहे थे .उनकी राजनीति को भी अंग्रेजों से समर्थन देना शुरू कर दिया ,  वी डी सावरकर वफादारी का वचन देकर जेल से रिहा हुए थे उनको भी आगे करके  गांधी और कांग्रेस के विरोध की राजनीति को गर्माया गया और कुछ संगठन बनवाये गए .इसी  अभियान में अंग्रेजों ने अपने कुछ वफादार लोगों को आगे करके  द्रविड़ लोगों को आर्यों से अलग देश  बनवाने की बात को हवा दी और उनको  आगे कर दिया .दक्षिण भारत में भी एक संगठन खडा कर दिया गया . दरअसल  ब्राह्मण मान्यताओं के खिलाफ मद्रास में १९१६ में ही जस्टिस पार्टी बन गयी थी . नाममात्र की इस पार्टी को  अंग्रेजों ने अपनी छत्रछाया में ले लिया और १९२१ में अंग्रेजों के कुछ वफादार , सर पी टी चेट्टी , टी एम नायर  जैसे लोगों को आगे करके बाकायदा चुनाव जीतने लायक राजनीतिक पार्टी बना  दिया गया .इस जस्टिस पार्टी ने  मद्रास प्रेसीडेंसी की  सत्ता पर क़ब्ज़ा जमा लिया . और यह सत्ता गवर्नमेंट आफ इण्डिया एक्ट के बाद तक रही. जब १९३७ में चुनाव हुए तब यह पार्टी कामजोर पडी क्योंकि तब तक  तो हर कोने में गांधी का नाम जीत का पर्याय बन चुका था. लेकिन अंग्रेजों की वफादारी से यह लोग बाज़ नहीं आ रहे थे . गौर करने की बात है कि जिन्ना ने अंग्रेजों  के हुकुम से पाकिस्तान बनाये जाने का प्रस्ताव  २३ मार्च १९४० को लाहौर में मुस्लिम लीग की वार्षिक बैठक में पास करवा लिया था . यह वह दौर था जब भारत की आज़ादी की लड़ाई लड़ने वाले सारे नेता महात्मा गांधी के नेतृत्व  में अंग्रेजों का ज़बरदस्त विरोध कर रहे  थे और अंग्रेजों के भक्त लोग दो राष्ट्रों के सिद्धांत का प्रतिपादन कर रहे थे . इसी सिलसिले में १९४० में ही जस्टिस पार्टी ने द्रविड़नाडु की मांग को लेकर प्रस्ताव  पास किया।  जिन्ना ने तो अपने समर्थकों को अंधेरे में रखा था और यह नहीं बताया था कि पाकिस्तान कहाँ बनेगा लेकिन दक्षिण में बात अलग थी . वहां द्रविड़नाडु का नक्शा  ई वी रामास्वामी नायकर यानी पेरियार ने जारी कर दिया था  जिसमें तमिल, तेलुगु, कन्नड़ और मलयालम भाषा बोलने वालों के लिए एक अलग देश यानी  द्रविड़नाडू की मांग की गयी थी.  
     ई वी रामस्वामी नायकर बाद में  इस पार्टी के सर्वेसर्वा हो गए . उन्होंने ही इस पार्टी का नाम बदल कर द्रविड़ कषगम दिया और इस तरह से 'द्रविड़ कड़गम' नाम की संस्था का जन्म हुआ. शुरू में पेरियार ने दावा किया था कि यह गैरराजनीतिक  संगठन है . द्रविड़नाडू का आन्दोलन जोर पकड़ रहा था.  उस वक्त मद्रास प्रेसिडेंसी के अन्दर आने वाले सारे दक्षिण भारत को द्रविडनाडु   बनाने की बात की जा रही थी. आज उसी मांग को नये सिरे से उभारने की कोशिश की जा रही है और यहाँ की गैर ब्राह्मण आबादी को यह बताने की कोशिश चल रही है कि  पशुओं के वध पर जो रोक लगाई जा रही है ,वह वास्तव में ब्राह्मण आधिपत्य को स्थापित करने की कोशिश है .ऐसा इसलिए संभव हो रहा है कि आज दक्षिण में एक भावना घर कर गयी है कि ब्राहमणों की खाने पीने की परंपरा को द्रविड़ों पर लादा जा रहा है और केंद्र की सत्ताधारी पार्टी के  बड़े नेताओं का हिंदी प्रेम भी दक्षिण में चर्चा का विषय है . ऐसी ही हालत आजादी के बाद के दशक में भी पैदा हो गयी थी.
    जब आज़ादी के बाद दक्षिण भारत से भाषा और ब्राह्मण आधिपत्य की बोगी चलाने की कोशिश की गयी तो जवाहरलाल नेहरू का नेतृत्व देश को उपलब्ध था .आज उनको सत्ताधारी पार्टी के समर्थक बहुत ही घटिया रोशनी में पेश करने की कोशिश करते हैं लेकिन जवाहरलाल सही अर्थों में राष्ट्र के नेता थे.  उन्होंने दक्षिण से उठ रही विभाजन की आवाज़ को दबा दिया और  दक्षिण से आने वाले अपने नेताओं के ज़रिये  विभाजन की आवाज़ को  देश की एकता के पक्ष में ढाल दिया था.  उन्होंने भाषा के आधार पर राज्यों का पुनर्गठन करके मद्रास प्रेसीडेंसी के इलाके को चार राज्यों में बाँट दिया और हर  राज्य में अलग तरह की राजनीतिक संस्कृति विकसित होने का माहौल  बनाया .  दक्षिण भारत के मज़बूत नेताओं को समर्थन दिया और वे राष्ट्रीय मंच पर पहचाने गए . हिंदी के विरोध को एकदम से शांत कर दिया . अंग्रेज़ी को काम काज की भाषा बना दिया और हर इलाकाई भाषा को उस राज्य की भाषा बना दिया .  चीन से युद्ध के बाद आम तौर पर जवाहरलाल का आत्म विश्वास डिगा हुआ था लेकिन उन्होंने संविधान में सोलहवां संशोधन करके कर सांसद या विधायक को भारत की अखण्डता की शपथ लेने की पाबंदी लगा दी. इस तरह से विभाजनकारी ताक़तों की राजनीति को बहुत कमज़ोर कर दिया . आज भी ज़रूरत इस बात की है  कि मामूली राजनीतिक स्वार्थों के लिए सत्ताधारी पार्टी देश की एकता  को किसी तरह के ख़तरे में न पड़ने दे. हालांकि यह भी सच है कि सत्ताधारी पार्टी हिन्दू धर्म की मान्यताओं को प्राथमिकता देती है , उनकी राजनीति में हिन्दू धर्म का माहात्म्य बहुत है लेकिन देश में एक बड़ी आबादी ऐसे लोगों की भी है जो हिन्दू नहीं हैं . वैष्णव हिन्दू व्यवस्था में मांस खाने पर भी पाबंदी है लेकिन देश में गैर वैष्णव हिन्दुओं की बड़ी संख्या है . सरकार को सब की भावनाओं को ध्यान में रखना होगा क्योकि देश की एकता और अखंडता सर्वोच्च  है और उसकी हर हाल में हिफ़ाज़त होनी चाहिए .

    फिर क्या हुआ: अनवर सुहैल

    लेखक मंच - Thu, 01/06/2017 - 02:15

    अनवर सुहैल

    लोग मुझसे अक्सर पूछते हैं कि फिर सनूबर का क्या हुआ…

    आपने उपन्यास लिखा और उसमें यूनुस को तो भरपूर जीवन दिया। यूनुस के अलावा सारे पात्रों के साथ भी कमोबेश न्याय किया। उनके जीवन संघर्ष को बखूबी दिखाया, लेकिन उस खूबसूरत प्यारी सी किशोरी सनूबर के किस्से को अधबीच ही छोड़ दिया।

    क्या समाज में स्त्री पात्रों का बस इतना ही योगदान है कि कहानी को ट्विस्ट देने के लिए उन्हें प्रकाश में लाया गया और फिर जब नायक को आधार मिल गया तो भाग गए नायक के किस्से के साथ। जैसा कि अक्सर फिल्मों में होता है कि अभिनेत्रियों को सजावटी रोल दिया जाता है।

    अन्य लोगों की जिज्ञासा का तो जवाब मैं दे ही देता, लेकिन मेरे एक पचहत्तर वर्षीय प्रशंसक पाठक का जब मुझे एक पोस्ट कार्ड मिला कि बरखुरदार, उपन्यास में आपने जो परोसना चाहा बखूबी जतन से परोसा…लेकिन नायक की उस खिलंदड़ी सी किशोरी प्रेमिका ‘सनूबर’ को आपने आधे उपन्यास के बाद बिसरा ही दिया। क्या सनूबर फिर नायक के जीवन में नहीं आई  और यदि नहीं आई तो फिर इस भरे-पूरे संसार में कहाँ गुम हो गई सनूबर….
    मेरी कालेज की मित्र सुरेखा ने भी एक दिन फोन पर याद किया और बताया कि कालेज की लाइब्रेरी में तुम्हारा उपन्यास भी है। मैंने उसे पढ़ा है और क्या खूब लिखा है तुमने। लेकिन यार, उस लड़की ‘सनूबर’ के बारे में और जानने की जिज्ञासा है।
    वह मासूम सी लड़की ‘सनूबर’…तुम तो कथाकार हो, उसके बारे में भी क्यों नहीं लिखते। तुम्हारे अल्पसंख्यक-विमर्श वाले कथानक तो खूब नाम कमाते हैं,  लेकिन क्या तुम उस लड़की के जीवन को सजावटी बनाकर रखे हुए थे या उसका इस ब्रह्माण्ड में और भी कोई रोल था…क्या नायिकाएं नायकों की सहायक भूमिका ही निभाती रहेंगी..?
    मैं इन तमाम सवालों से तंग आ गया हूँ और अब प्रण करता हूँ कि सनूबर की कथा को ज़रूर लिखूंगा…वाकई कथानक में सनूबर की इसके अतिरिक्त कोई भूमिका मैंने क्यों नहीं सोची थी कि वो हाड-मांस की संरचना है…मैंने उसे एक डमी पात्र ही तो बना छोड़ा था। क्या मैं भी हिंदी मसाला फिल्मों वाली पुरुष मानसिकता से ग्रसित नहीं हूँ, जिसने बड़ी खूबसूरती से एक अल्हड पात्र को आकार दिया और फिर अचानक उसे छोड़ कर पुरुष पात्र को गढने, संवारने के श्रम लगा दिया।
    मुझे उस सनूबर को खोजना होगा…वो अब कहाँ है, किस हाल में है…क्या अब भी वो एक पूरक इकाई ही है या उसने कोई स्वतंत्र इमेज बनाई है ?

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    तब पंद्रह वर्षीय सनूबर कहाँ जानती थी कि उसके माँ-बाप उसे जमाल साहब के सामने एक उत्पाद की तरह प्रस्तुत कर रहे हैं। हाँ, उत्पाद ही तो थी सनूबर…विवाह-बाज़ार की एक आवश्यक उत्पाद…एक ऐसा उत्पाद जिसका मूल्य कमसिनी में ही अधिकतम रहता है…जैसे-जैसे लडकी की उम्र बढ़ती जाती है, उसकी कीमत घटती जाती है। सनूबर की अम्मी के सामने अपने कई बच्चों की ज़िन्दगी का सवाल था। सनूबर उनकी बड़ी संतान है…गरीबी में पढा़ई-लिखाई कराना भी एक जोखिम का काम है। कौन रिस्क लेगा। जमाना ख़राब है कितना..ज्यादा पढ़ लेने के बाद बिरादरी में वैसे पढ़े-लिखे लड़के भी तो नहीं मिलेंगे?

    चील-गिद्धों के संसार में नन्ही सी मासूम सनूबर को कहीं कुछ हो-हुआ गया तो कहीं मुंह दिखाने लायक नहीं रहेंगे। फिर उसके बाद और भी तो बच्चे हैं। एक-एक करके पीछा छुडा़ना चाह रही थीं सनूबर की अम्मी।

    सनूबर की अम्मी अक्सर कहा करतीं–“ जैसे भिन्डी-तुरई..चरेर होने के बाद किसी काम की नहीं होती, दुकानदार के लिए या किसी ग्राहक के लिए..कोई मुफ्त में भी न ले..ऐसे ही लड़कियों को चरेर होने से पहले बियाह देना चाहिए…कम उमिर में ही नमक रहता है उसके बाद कितना स्नो-पाउडर लगाओ, हकीकत नहीं छुपती…!”

    सनूबर की अम्मी जमाल साहब के सामने सनूबर को अकारण डांटती और जमाल साहब का चेहरा निहारती। इस डांटने-डपटने से जमाल साहब का चेहरा मुरझा जाता। जैसे- यह डांट सनूबर को न पड़ी हो, बल्कि जमाल साहब को पड़ी हो। यानी जमाल साहब उसे मन ही मन चाहने लगे हैं।
    जमाल साहब का चेहरा पढ़ अम्मी खुश होतीं और सनूबर से चाय बनाने को कहती या शरबत लाने का हुक्म देतीं।
    कुल मिलाकर जमाल साहब अम्मी की गिरफ्त में आ गये थे।
    बस एक ही अड़चन थी कि उन दोनों की उम्र में आठ-दस बरस का अंतर था।
    सनूबर की अम्मी तो आसपास के कई घरों का उदाहरण देतीं, जहां पति-पत्नी की उम्र में काफी अंतर है। फिर भी जो राजी-ख़ुशी जीवन गुज़ार रहे हैं।
    ऐसा नहीं है कि सनूबर यूनुस की दीवानी है….या उसे शादी-बियाह नहीं करवाना है।
    यूनुस जब तक था, तब तक था….वो गया और फिर लौट के न आया…
    सुनने में आता कि कोरबा की खुली खदानों में वह काम करता है। बहुत पैसे कमाने लगा है और अपने घरवालों की मदद भी करने लगा है।
    यूनुस ने अपने खाला-खालू को जैसे भुला ही दिया था। यह तो ठीक था, लेकिन सनूबर को भूल जाना उसे कैसे गवारा हुआ होगा। वही जाने…
    सनूबर तो एक लड़की है…लडकी यानी पानी…जिस बर्तन में ढालो वैसा आकार ग्रहण कर लेगी।
    सनूबर तो एक लड़की है। लड़की यानी पराया धन, जिसे अमानत के तौर पर मायके में रखा जाता है और एक दिन असली मालिक ढोल-बाजे-आतिशबाजी के साथ आकर उस अमानत को अपने साथ ले जाते हैं।
    सनूबर इसीलिए ज्यादा मूंड नही खपाती- जो हो रहा है ठीक हो रहा है, जो होगा ठीक ही होगा।
    आखिर अपनी माँ की तरह उसका भी कोई घर होगा, कोई पति होगा, कोई नया जीवन होगा।

    हर लडकी के जीवन में दोराहे आते हैं। ऐसे ही किसी दोराहे पर ज्यादा दिन टिकना उसे भी पसंद नहीं था। क्या मतलब पढा़ई-लिखाई का, घर में माहौल नहीं है। स्कूल भी कोई ऐसा प्रतिस्पर्धा वाला नहीं कि जो बच्चों को बाहरी दुनिया से जोड़े और आगे की राह दिखलाए। सरकारी स्कूल से ज्यादा उम्मीद क्या रखना। अम्मी-अब्बू वैसे भी लड़की जात को ज्यादा पढा़ने के पक्षधर नहीं हैं। लोक-लाज का डर और पुराने खयालात- लड़कियों को गुलाबी उम्र में सलटाने वाली नीति पर अमल करते हैं।बस जैसे ही कोई ठीक-ठाक रिश्ता जमा नहीं कि लड़की को विदा कर दो। काहे घर में टेंशन बना रहे। हाँ, लड़कों को अच्छे स्कूल में पढा़ओ और उन पर शिक्षा में जो भी खर्च करना हो करो।
    अब वो जमाल साहब के रूप में हो तो क्या कहने। साहब-सुह्बा ठहरे।अफसर कालोनी में मकान है उनका। कितने सारे कमरे हैं ।दो लेट्रिन-बाथरूम हैं। बड़ा सा हाल और किचन कितना सुविधाजनक है।
    सनूबर का क्वार्टर तो दो कमरे का दडबा है। उसी में सात-आठ लोग ठुंसे पड़े रहते हैं। आँगन में बाथरूम के नाम पर एक चार बाई तीन का डब्बा, जिसमे कायदे से हाथ-पैर भी डुलाना मुश्किल।
    यदि ये शादी हो जाती है तो कम से कम उसे एक बड़ा सा घर मिल जाएगा।
    घूमने-फिरने के लिए कार और इत्मीनान की ज़िन्दगी।
    इसलिए सनूबर भी अपनी अम्मी के इस षड्यंत्र में शामिल हो गई कि उसकी शादी जमाल साहब से हो ही जाये।

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    ये अलग बात है कि उसे यूनुस पसंद है।
    सनूबर का कजिन यूनुस…
    सनूबर अपनी अम्मी की इसीलिए कद्र नही करती कि उनकी सोच का हर कोण सनूबर की शादी की दिशा में जाता है। अम्मी हमेशा बच्चियों की शादी के लिए अब्बू को कोसती रहती हैं कि वे काहे नहीं इतना कमाते कि बच्चियों के लिए गहने-जेवर ख़रीदे जाएँ, जोड़े जाएँ…फिक्स्ड डिपोजिट में रकम जमा की जाए और नाते-रिश्तेदारों में उठे-बैठें ताकि बच्चियों के लिए अच्छे रिश्ते आनन-फानन मिल जाएँ।
    लड़कियों के बदन का नमक ख़त्म हो जाए तो रिश्ता खोजना कितना मुश्किल होता है, ये वाक्य सनूबर अम्मी के मुख से इतना सुन चुकी है कि उसने अपने बदन को चखा भी एक बार और स्वाद में बदन नमकीन ही मिला।
    इसका मतलब कि‍ उम्र बढ़ने के साथ लड़कियों के बदन में नमक कम हो जाता होगा।
    इस बात की तस्दीक के लिए उसने खाला की लड़की के बदन को चाट कर देखा था। उसके तो तीन बच्चे भी है और उम्र यही कोई पच्चीस होगी, लेकिन उसका बदन का स्वाद नमकीन था।
    एक बार सनूबर ने अम्मी के बदन को चाट कर देखा। वह भी नमकीन था। फिर अम्मी ऐसा क्यों कहती हैं कि उम्र बढ़ने के साथ बदन में नमक कम हो जाता है।
    ये सब देहाती बातें हैं और तेरी अम्मी निरी देहातन है।
    ऐसा अब्बू ने हंसते हुए कहा था, जब सनूबर ने बताया कि सबके बदन में नमक होता है, क्योंकि इंसान का पसीना नमकीन होता है और इस नमक का उम्र के साथ कोई ताल्लुक नहीं होता है।
    अम्मी को सोचना चाहिए कि स्कूल में पढ़़ने वाली लड़की ये तो कतई नहीं सोचती होगी कि उसकी शादी हो जाए और वो लड़की अपने आस-पास के लड़कों या मर्दों में पति तलाशती नहीं फिरती है।
    फिर लड़कियों की बढ़ती उम्र या बदन की रानाइयां माँ-बाप और समाज को क्यों परेशान किये रहते हैं। उठते-बैठते, सोते-जागते, घुमते-फिरते बस यही बात कि मेरी सनूबर की शादी होगी या नहीं।
    सनूबर कभी खिसिया जाती तो कहती, “मूरख अम्मी…शादी तो भिखारन की, कामवाली की, चाट-वाले की बिटिया की भी हो जाती है। और तो और तुम्हारी पड़ोसन पगली तिवारिन आंटी की क्या शादी नहीं हुई, जो बात-बेबात तिवारी अंकल से लड़ती रहती है और दिन में पांच बार नहाती है कि कहीं किसी कारण अशुद्ध तो नहीं हो गई हो।दुनिया में काली-गोरी, टेढ़ी-मेढ़ी, लम्बी-ठिगनी सब प्रकार की लडकियाँ तो ब्याही जाती हैं अम्मी। और तुम्हारी सनूबर तो कित्ती खूबसूरत है।जानती हो मैथ के सर मुझे नेचुरल ब्यूटी कहते हैं।तो क्या मेरी शादी वक्त आने पर नहीं होगी?”
    सनूबर के तर्क अपनी जगह और अम्मी का लड़का खोज अभियान अपनी जगह।
    उन्हें तो जमाल साहब के रूप में एक दामाद दिखलाई दे रहा था।

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    निकिता स्कूल में आज संजीदा दिखी।
    सनूबर ने कारण जानने की कोशिश नही की। यह सनूबर की स्टाइल है। वह ज़बरदस्ती किसी के राज उगलवाने में यकीन नहीं करती। उसे मालूम है कि जिसे सुख या दुःख की बात शेयर करनी होगी, वो खुद करेगी। यदि बात एकदम व्यक्तिगत होगी तो फिर काहे किसी के फटे में टांग अड़ाना।
    टिफिन ब्रेक में जब दोनों ने नाश्ते की मिक्सिंग की तो निकिता आहिस्ता से फूट पड़ी- “जानती है सनूबर, कल गज़ब हो गया रे !”
    सनूबर के कान खड़े हुए लेकिन उसने रुचि का प्रदर्शन नहीं किया।
    निकिता फुसफुसाई- “कल शाम मुझे देखने लड़के वाले आने वाले हैं!”
    जैसे कोई बम फटा हो, निकिता का मुंह उतरा हुआ था। सनूबर भी जैसे सकते में आ गई। यह क्या हुआ, अभी तो मिडिल स्कूल में नवमी ही तो पहुँची हैं सखियाँ। उम्र पंद्रह या कि सोलह साल ही तो हुई है। इतनी जल्दी शादी!
    -“तेरी मम्मी ने ऐतराज़ नहीं किया पगली।”
    -“काहे, मम्मी की ही तो कारस्तानी है यह। उन्होंने मेरी दीदी की शादी भी तो जब वह सत्रह साल की थीं, तभी करा दी थी। कहती हैं कि उम्र बढ़ जाने के बाद लड़के वाले रिजेक्ट करने लगते हैं और हमें पढ़ा-लिखा कर नौकरी तो करानी नहीं बेटियों से।चार बहनों के बाद एक भाई है। एक-एक कर लड़कियाँ निपटती जाएँ, तभी सुकून मिलेगा उन्हें !”
    सनूबर क्या कहती..कितने बेबस हैं सखियाँ इस मामले में।
    उन्हें घर का सदस्य कब समझा जाता है।हमेशा पराई अमानत ही तो कहते हैं लोग।उनका जन्म लेना ही दोख और असगुन की निशानी है।
    लड़कियों के सतीत्व की रक्षा और दहेज़ ऐसे मसले हैं, जिनसे उनके परिवार जूझते रहते हैं।

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    निकिता की चिंता, “मुझे आगे पढा़ई करना है रे।अभी शादी नहीं करनी।क्या मेरी कोई सुनेगा?”
    सनूबर क्या जवाब देती।
    लड़कियों की कहाँ सुनी जाती है। उन्हें तो हुकुम सुनने और तामील करने की ट्रेनिंग मिली होती है।
    अजब समाज है, जहां लड़कियों को एक बीमारी की तरह ट्रीट किया जाता है। बीमारी हुई नहीं कि जो भी कीमत लगे लोग, उस बीमारी से निजात पाना चाहते हैं।
    और जब बिटिया बियाह कर फुर्सत पाते हैं लोग तब दोस्त-अहबाबों में यही कहते फिरते हैं- “गंगा नहा आये भाई…अच्छे से अच्छा इंतज़ाम किया। लेन-देन में कोई कसर नहीं रक्खी।”
    सनूबर की भी तो अपने घर में यही समस्या थी।
    आये दिन अम्मी अब्बू को ताने देती हैं- “कान में रुई डाले रहते हैं और बिटिया है कि ताड़ की तरह बढ़ी जा रही है। सोना दिनों-दिन महंगा होता जा रहा है। न जेवर बनाने की चिंता न कहीं रिश्तेदारी में उठाना-बैठना। क्या घर-बैठे रिश्ता आएगा? जूते घिस जाते हैं, तब कहीं जाकर ढंग का रिश्ता मिलता है ?”
    अब्बू मजाक करते, “तुम्हारे माँ-बाप के कितने जूते घिसे थे।कुछ याद है, जो मैं मिला।ऐसे ही अल्लाह हमारी बिटिया सनूबर का कोई अच्छा सा रिश्ता करा ही देगा।”
    अम्मी गुस्सा जातीं, “अल्लाह भी उसी की मदद करता है, जो खुद कोई कोशिश करे। हाथ पे हाथ रखकर बैठे आदमी के मुंह में अल्लाह निवाला नहीं डालता।आप मज़ाक में बात न टालिए और दुनियादार बनिए। अभी से जोड़ेंगे, तभी आगे जाकर बोझा नहीं लगेगा।”
    सनूबर ने अपनी व्यथा निकिता को सुनाई।
    दोनों सहेलियाँ उदास हो गईं.।
    तभी टिफिन खत्म होने की घंटी बजी और वे क्लास-रूम की तरफ भागीं।

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    सनूबर को स्कूल जाना बहुत पसंद है। इस बहाने उसे घर-परिवार की बेढंगी वयस्तता से मुक्ति मिलती है। अम्मी चिल्लाती रहती है कि इतनी जल्दी क्यों स्कूल भागने की फिराक में रहती है सनूबर। टाइम होने से पांच मिनट पहले घर छोड़ना चाहिए। कितना नजदीक है स्कूल।
    -“का करती है माटीमिली इत्ता पहले जाकर, झाडू लगाती है का वहां?”
    सनूबर का स्कूल में बहुत मन लगता है। वहाँ तमाम सहेलियाँ मिल जाती हैं। उनके सुख-दुःख सुनना, बेहिसाब गप्पें मारना। एक-दूसरे की ज़िन्दगी में समानता-असमानता की विवेचना करना। टीवी पर देखी फिल्म या सीरियल पर बहस करना।
    और भी इधर-उधर की लटर-पटर…लंतरानियाँ….
    घर में क्या हो सकता है। बस अम्मी के आदेश सुनते रहो। काम हैं कि ख़तम ही नहीं होते हैं। जब कुछ काम न हो तो कपड़ों का ढेर लेकर प्रेस करने बैठो। ये भी कोई ज़िन्दगी है।
    सनूबर के घर में तो और भी मुसीबतें हैं।कोई न कोई मेहमान आता रहता है। उनकी खातिरदारी करना कितना बोरिंग होता है। उस पर अम्मी-अब्बू के नए दोस्त जमाल साहेब। वह आये नहीं कि जुट जाओ खिदमत में। प्याज काटो, बेसन के पकौड़े बनाओ। बार-बार चाय पेश करो। अम्मी भी उनके सामने जमीन्दारिन बन कर हुकुम चलाती हैं-“कहाँ मर गई रे सनूबर, देखती नहीं..कित्ती देर हो गई साहब को आये। तेरी चाय न हुई मुई बीरबल की खिचड़ी हो गई।जल्दी ला!”
    सनूबर न हुई नौकरानी हो गई।
    -“कहाँ मर गई रे।देख, तेरे अब्बू का मोजा नहीं मिल रहा है।जल्दी खोज कर ला!”
    -“मेरा पेटीकोट कहाँ रख दि‍या तूने।पेटी के ऊपर रखा था, नहीं मिल रहा है…जल्दी खोज कर ला!”
    -“जा जल्दी से चावल चुन दे।फिर स्कूल भागना। बस सबेरे से स्कूल की तैयारी करती रहती है, पढ़-लिख कर नौकरी करेगी क्या। तेरी उम्र में मेरी शादी हो गई थी और तू जाने कब तक छोकरी बनी रहेगी।”
    ऐसे ही जाने-कितने आदेश उठते-बैठते, सोते-जागते सनूबर का जीना हराम करते रहते।
    सनूबर स्कूल के होमवर्क हर दिन निपटा लेती थी।
    उसके टीचर इस बात के लिए उसकी मिसाल देते।
    उससे गणित न बनती थी इसलिए उसने गणित की कुंजी अब्बू से खरीदवा ली थी।
    बाकी विषय को किसी तरह वह समझ लेती।
    वैसे भी बहुत आगे पढ़ने-पढ़ाने के कोई आसार उसे नज़र नहीं आते थे, यही लगता कि दसवीं के बाद अगर किस्मत ने साथ दिया तो बारहवीं तक ही पढ़ पाएगी वर्ना उसके पहले ही बैंड बज सकता है। अम्मी बिटिया को घर में बिठा कर नहीं रखेंगी- “जमाना खराब है।जवान लड़की घर में रखना बड़ा जोखिम भरा काम है। कुछ ऊंच-नीच हो गई तो फिर माथा पीटने के अलावा क्या बचेगा। इसलिए समय रहते लड़कियों को ससुराल पहुंचा दो। एक बार विदा कर दो। बाद में सब ठीक हो जाता है। घर-परिवार के बंधन और जिम्मेदारियां उलटी-सीधी उड़ान को ज़मीन पर ला पटकती हैं।”
    अम्मी कहती भी हैं- “अपने घर जाकर जो करना हो करियो।यह घर तुम्हारा नहीं सनूबर!”
    तो क्या लड़की अपने माँ-बाप के घर में किरायेदार की हैसियत से रहती है?
    यही तो निकिता ने भी थक-हार कर कहा- “मुझे उन लोगों ने पसंद कर लिया है सनूबर। इस साल गर्मियों में मेरी शादी हो जायेगी रे!”
    सनूबर का दिल धड़क उठा।
    -“गज़ब हो गया। पिछले साल यास्मीन ने इस चक्कर में पढाई छोड़ दी और ससुराल चली गई। कितनी बढ़िया तिकड़ी थी अपनी। जानती है- मार्केट में यास्मीन की अम्मी मिलीं थीं। उन्होंने बताया कि यास्मीन बड़ी बीमार रहती है। उसका ससुराल गाँव में है, जहां आसपास कोई अस्पताल नहीं है। उसकी पहली डिलवरी होने वाली थी और कमजोरी के कारण बच्चा पेट ही में मर गया। बड़ी मुश्किल से यास्मीन की जान बची। ईद में यास्मीन आएगी, तो उससे मिलने चलेंगे न। पता नहीं तुम्हारा साथ कब तक का है!”
    निकिता की आँखों में आंसू थे।
    उसने स्कूल के मैदान में बिंदास क्रिकेट खेलते लडकों को देखा।
    सनूबर की निगाह भी उधर गई।
    लडकों की ज़िन्दगी में किसी तरह की आह-कराह क्यों नहीं होती।
    सारे दुःख, सारी दुश्वारियां लड़कियों के हिस्से क्यों दी मेरे मौला…मेरे भगवान।
    और तभी निकिता ने घोषणा की- “हम लड़कियों का कोई भगवान या अल्लाह नहीं सनूबर!”
    सनूबर ने भी कुछ ऐसा ही सोचा था, कहा नहीं कि कहीं ईमान न चला जाए।अल्लाह की पाक ज़ात पर ईमान और यकीन तो इस्लाम की पहली शर्त है।
    लेकिन निकिता ठीक ही तो कह रही है।
    कितनी तनहा, कितनी पराश्रित, कितनी समझौता-परस्त होती हैं लड़कियाँ।

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    लड़कियाँ ज़िन्दगी के तल्ख़ हकीकतों से कितनी जल्दी वाकिफ होती जाती हैं।
    लड़के जो लड़कियों को सिर्फ एक ‘माल’ या ‘कमोडिटी’ के रूप में देखते हैं, वे कहाँ जान पाते हैं कभी कि इन शोख चुलबुली लड़कियों को प्रतिदिन ज़िन्दगी की कई नई सच्चाइयों से दो-चार होना पड़ता है।
    ऐसे ही एक दिन सनूबर और निकिता यास्मीन से मिलने उसके घर गई।
    मस्जिद-पारा में घर है यास्मीन का।
    बड़ी मस्जिद के पीछे वाली गली में रहती है वह।
    निकिता ने जींस-टॉप पहना था, जबकि सनूबर सलवार-सूट में थी। सनूबर मस्जिद-पारा आती है, तो बाकायदा सर पर दुपट्टा डाले रहती है।
    यास्मीन ने घर का दरवाज़ा खोला था।
    आह, कितना बेरौनक चेहरा हो गया है…गाल पिचके हुए और आँखों के इर्द-गिर्द काले घेरे। जैसे लम्बी बीमारी से उठी हो। तभी पीछे से यास्मीन की अम्मी भी आ गईं और उन्हें अन्दर आकर बैठने को कहा।
    निकिता और सनूबर चुपचाप यास्मीन का चेहरा निहारे जा रही थीं। कितनी खूबसूरत हुआ करती थी यास्मीन, शादी ने उससे ख़्वाब और हंसी छीन ली थी।
    यास्मीन स्कूल भर के तमाम बच्चों और टीचरों की मिमिक्री किया करती और खुद न हंसती, जब सब उसके मजाक को समझ कर हंसते तब ठहाका मार कर हंसती थ। उसकी हंसी को ग्रहण लग गया था।
    निकिता और सनूबर उसकी दशा देख खौफज़दा हो चुकी थीं। क्या ऐसा ही कोई भविष्य उनकी बाट जोह रहा है। कम उम्र में शादी का यही हश्र होता है।फिर उनकी मांए ये क्यों कहती हैं कि उनकी शादियाँ तब हुई थीं, जब वे तेरह या चौदह साल की थीं। लेकिन वे लोग तो मस्त हैं, अपनी ज़िन्दगी में। फिर ये स्कूल पढ़ने वाली लड़कियाँ क्यों कम उम्र में ब्याहे जाने पर खल्लास हो जाती हैं?
    ऐसे ही कई सवालात उनके ज़ेहन में उमड़-घुमड़ रहे थे।
    यास्मीन शादी का एल्बम लेकर आ गई और उन लोगों ने देखा कि यास्मीन का शौहर नाटे कद का एक मजबूत सा युवक है। दिखने में तो ठीक-ठाक है, फिर उन लोगों ने क्यों कम उम्र में बच्चों की ज़िम्मेदारी का निर्णय लिया। मान लिया शादी हो ही गई है, फिर इतनी हड़बडी़ क्यों की? बच्चे दो-चार साल बाद भी हो जाते तो क्या संसार का काम रुका रह जाता?
    यास्मीन बताने लगी- “उनका मोटर-साइकिल रिपेयर की गैरेज है। सुबह दस बजे जाते हैं तो रात नौ-दस के बाद ही लौटते हैं। गैरेज अच्छी चलती है, लेकिन काम तो मेहनत वाला है। मेरी जिठानी मेरी ही उम्र की है और उसके दो बच्चे हैं। इस हिसाब से तो उस परिवार में मैं बच्चे जनने के काबिल तो थी ही। मुझे वैसे भी कहानियों की किताब पढ़ने का शौक है। वहां पढाई-लिखाई से किसी का कोई नाता नहीं। बस कमाओ और डेली बिस्सर खाना खाओ- मटन न हो तो मछली और नहीं तो अंडा।इसके बिना उनका निवाला मुंह के अन्दर नहीं जाता। ये लोग औरत को चारदीवारी में बंद नौकरानी और बच्चा जनने की मशीन मानते हैं!”
    तो ये सब होता है शादी के बाद और अपनी निकिता भी इस घनचक्कर में फंसने वाली है।
    सनूबर ने गौर किया कि निकिता के चेहरे पर डर के भाव हैं।आशंकाओं के बादल तैर रहे हैं, उसके चेहरे पर।
    लड़के वालों ने उसे पसंद कर लिया है।
    निकिता को जो मालूम हुआ है, उसके मुताबिक बीस एकड़ की खेती है उनकी, एक खाद-रसायन की दूकान है। दो लड़के और दो लड़कियाँ हैं वहां। निकिता का होने वाला पति बड़ा भाई है, बीए करने के बाद खेती संभालता है और छोटा भाई इंजीनियरिंग कर रहा है। दोनों लड़कियों की शादी हो चुकी है। इसका मतलब निकिता घर की बड़ी बहू होने जा रही है।
    ससुराल झारखण्ड के गढ़वा में है।नगर से सटा गाँव है उनका। वैसे तो कोई दिक्कत नहीं है, लेकिन निकिता की इच्छा किसी ने जाननी चाही। क्या निकिता अभी विवाह की जिम्मेदारियों में बंधने के लिए मानसिक और शारीरिक रूप से तैयार है? कहाँ बच्चियों की इच्छा पूछी जाती है। माँ-बाप पर एक अघोषित बोझ जो होती हैं लड़कियाँ।
    यास्मीन का इलाज चल रहा है, डॉक्टर खान मेडम उसका इलाज कर रही हैं। उसे रक्ताल्पता है और ससुराली दिक्कतों ने मानसिक रूप से उसे कन्फ्यूज़ का कर दिया है।
    -“अल्ला जाने कब उसका आत्म-विश्वास लौटेगा।कितनी बिंदास हुआ करती थी अपनी यास्मीन !” घर लौटते हुए सनूबर ने गहरी सांस लेकर यही तो कहा था, और निकिता भी भर रास्ता खामोश बनी रही।

    (उपन्यास अंश)

    भीम आर्मी को भाजपा ने नहीं, बसपा की करतूतों ने जन्म दिया है

    हाशिया - Wed, 31/05/2017 - 17:10

    आनंद तेलतुंबड़े उत्तर प्रदेश के सहारनपुर में भीम आर्मी के उभार के बारे में बता रहे हैं. अनुवाद: रेयाज उल हक

    मायावती ने सहारनपुर का दौरा करते हुए भीम आर्मी का नाम नहीं लिया, लेकिन 25 मई को उन्होंने लखनऊ में इसका जिक्र किया. उन्होंने अपने भाई आनंद कुमार का रिश्ता भीम आर्मी से जोड़ने वाली खुफिया रिपोर्ट को खारिज करते हुए इसे भाजपा द्वारा पैदा किया गया एक संगठन कहा, जिसका मकसद मायावती के असर को नाकाम करना है. उनकी दलील यह थी कि भीम आर्मी के नेता हिंसा में शामिल हैं, फिर भी उन्हें पुलिस गिरफ्तार नहीं कर रही है, जो भाजपा के साथ इस समूह के भीतरी समर्थन की ओर इशारा करता है.

    यह बदकिस्मती ही है कि बेहद संभावनाओं वाले इस संगठन को समर्थन देने के बजाए वे इसे दुश्मन के हाथ का एक औजार बता कर इसकी आलोचना कर रही हैं. इस संगठन के नौजवान उन जातिवादी गुंडों से सीधी टक्कर ले रहे हैं, जिनका मनोबल अपने सरपरस्त के राज्य का मुख्यमंत्री बन जाने से बढ़ा हुआ है. मायावती के पास अपने जन्म के उत्सवों के लिए दलितों की भारी गोलबंदी रहती रही है और वे आसानी से सहारनपुर में हुए अत्याचारों के खिलाफ लखनऊ में एक बड़ा प्रदर्शन आयोजित कर सकती थीं. लेकिन वे ऐसा नहीं करेंगी. चुनावों में शर्मनाक हार के बावजूद उन्हें यह बात समझ में नहीं आई है कि दलितों की जमीनी समस्याओं से उनका कभी भी कोई रिश्ता नहीं रहा है और उल्टे उन्होंने खोखले भावनात्मक मुद्दों के साथ दलितों को बेवकूफ ही बनाया है. ‘दलित की बेटी’ जैसी लफ्फाजियों से भ्रमित दलित यह कल्पना करने लगे थे कि बसपा की ताकत दलितों की ताकत है और खुशफहमी का यह जुनून दो दशकों तक जारी रहा. अब मुखर ब्राह्मणवादी ताकतों के उभार के साथ उनका सामना कठोर हकीकत से हुआ है और उनकी आंखें खुली हैं और उन्होंने अपनी सियासत को नए तरह से एक नई शक्ल देने की शुरुआत की है. भीम आर्मी इसी प्रक्रिया की अभिव्यक्ति है, यह सीधे-सीधे बसपा की अपनी करतूतों के नतीजे में पैदा हुई है.

    इससे इन्कार नहीं किया जा सकता कि बसपा ने जिस तरह मुख्यधारा की पार्टियों को उनके अपने ही खेल में मात दी वह एक ऐतिहासिक उपलब्धि थी और यह कांशीराम की रणनीतिक महारत से ऐसा कर पाई. हालांकि एक बार सत्ता में पहुंच कर यह सियासत के एक दूसरे रास्ते पर चलने की कोशिश कर सकती थी, जिससे इसकी पहचान गरीब और सताई हुई जनता के लिए काम करने वाली, उन्हीं की एक पार्टी के रूप में बनती. राजनीतिक सत्ता पाने के लिए जातीय गुना-भाग का खेल खेलना एक बात थी, और सत्ता से चिपके रहना एक बिल्कुल ही दूसरी बात. जैसा कि कांशीराम ने दावा किया था, राजनीतिक सत्ता हर समस्या का हल थी और मायावती को उसका इस्तेमाल कम से कम दलितों के सामने खड़ी सबसे बड़ी समस्याओं से निबटने में करना चाहिए था. हालांकि मायावती ने जान-बूझ कर इस मौके को गंवाया और इसके बजाए उन्होंने हर वह काम करने के लिए इसका इस्तेमाल किया, जो शासक पार्टियां कहीं अधिक धड़ल्ले से करती रही हैं. मिसाल के लिए वो बेजमीन परिवारों के लिए जमीन का वितरण करने का रेडिकल कदम उठा सकती थीं (उस दिखावटी कार्रवाई से आगे जाकर, जैसा करने का उन्होंने दावा किया था), दलितों के लिए शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं में बुनियादी बेहतरी ला सकती थीं (जिसको भीम सेना ने अपने मुख्य अभियान के रूप में उठाया है), और बेशक दलितों पर की जा रही जातीय अत्याचारों पर लगाम लगा सकती थीं. अगर उन्होंने इतना भी किया होता, तो लोगों के दिमाग में उनकी और बसपा की एक खास छवि बन गई होती कि यह गरीब-सताए गए लोगों की और उन्हीं लोगों के लिए काम करने वाली पार्टी है. यह कहा जा सकता है कि भारतीय राजनीतिक ऐसी नीतियों का आदी नहीं है. सिर्फ लोगों का भला करना इसकी गारंटी नहीं है कि वे आपको वोट भी करेंगे. अगर यह सही है, तब बसपा अपने जनाधार के बीच इस राजनीतिक व्यवस्था की नुकसानदेह संरचना को उजागर कर सकती थी और अपने समर्थकों को इसके खिलाफ गोलबंद कर सकती थी. लेकिन बसपा इनमें से किसी भी रास्ते पर नहीं चली और न आगे चलने वाली है. यह इतनी सारी पार्टियों में एक और पार्टी है, जो उसी व्यवस्था को वैधता दिलाती है, जो दलितों के उत्पीड़न का साकार रूप है.

    मायावती ने जाटव-चमारों के अपने मुख्य जनाधार पर भी गौर नहीं किया और उन्हें महज अपने बंधुआ के रूप में लेती रहीं. दलितों पर अत्याचारों के मामले में उत्तर प्रदेश की अपनी खास जगह बनी हुई है. इस पर चर्चा करते हुए मुख्यमंत्री के रूप में उनके पहले दोनों कार्यकालों को हम छोड़ सकते हैं, क्योंकि वे जून 1995 से अक्तूबर 1995 और मार्च 1997 से सितंबर 1997 तक बहुत थोड़े समय के लिए सत्ता में रही थीं. लेकिन मई 2002 से अगस्त 2003 तक और मई 2007 से मार्च 2012 तक के उनके बाद के दोनों कार्यकालों ने उन्हें एक दलित पार्टी के रूप में खुद को पेश करने का भरपूर मौका मुहैया कराया था, खास कर अपने अंतिम कार्यकाल में जब उनके पास विधानसभा में पूरा बहुमत था. एनसीआरबी के आंकड़ों को देखें तो राज्य में 2002 और 2003 में कुल अत्याचारों की संख्या क्रमश: 7927 और 2821 थी, जो बढ़ कर 2004 में 3785, 2005 में 4397 और 2006 में 4960 हो गई. यह वो वक्त था जब वे सत्ता से बाहर थीं और यह बसपा की राजनीति की वजह से दलितों पर होने वाली बदले की कार्रवाइयों और उनकी राजनीतिक असुरक्षा को दिखाता है. उनके आखिरी कार्यकाल के दौरान छह वर्षों (2007 से 2012 तक) के अत्याचारों के आंकड़े क्रमश: ये हैं: 6144, 8009, 7522, 6222, 7702 और 6202. इनमें हमें इनके पहले के तीन सालों के मुकाबले न सिर्फ अहम इजाफा देखने को मिलता है (औसतन 4381 से 6967), बल्कि हम यह भी देखते हैं कि अत्याचार एक ऊंची दर पर आ गए और उनकी दर ऊंची ही बनी रही. बेशक, जब सत्ता मायावती के हाथ से चली गई तो ये आंकड़े और भी बढ़ कर 2013, 2014 और 2015 में क्रमश: 7078, 8075 और 8358 हो गए. यह उनके मुख्य जनाधार दलितों की बदतर होती हालत की निशानी है. अत्याचारों के आंकड़ों में इजाफा सीधे सीधे उनकी ‘सर्वजन’ रणनीति से निकली राजनीतिक करतब का नतीजा है. आखिरकार 2007 में उनकी शानदार कामयाबी की वजह यही थी, जिसका प्रतिनिधित्व उनके इस भड़कीले नारे में दिखता है: ‘हाथी नहीं, गणेश हैं, ब्रह्मा विष्णु महेश हैं’.

    बसपा की ब्राह्मणवाद-विरोधी लफ्फाजियों पर चलने वाले दलित इस कलाबाजी से बेचैन तो हुए लेकिन वे जिस सत्ता को हासिल करने के लिए बेकरार थे, उसे मिलने की संभावना में उन्होंने बसपा को वोट दिया. लेकिन जब बसपा ने संतुलन साधने के लिए दलितों की अनदेखी करनी शुरू की, तब वे इसकी कठोर हकीकत से रू ब रू हुए. अब 2012 से, जब बसपा ने अपनी सत्ता गंवाई, ऊंची जातियों के पलटवार के साथ, और खास कर मार्च 2017 से, जब एक युद्धोन्मादी हिंदुत्व कट्टरपंथी राज्य का मुख्यमंत्री बना, दलितों की प्रतिक्रिया स्वाभाविक ही थी. भीम आर्मी बस इसी की अभिव्यक्ति है और इसे बसपा की राजनीति का एक स्वाभाविक सह-उत्पाद माना जाना चाहिए.

    भीम आर्मी के उभार की तुलना 1972 में महाराष्ट्र में दलित पैंथर्स से की जा सकती है, जो तब की रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया (आरपीआई) की दिवालिया राजनीति के नतीजे में पैदा हुई थी. हालांकि दोनों के बीच में कुछ फर्क है. दलित पैंथर्स के उलट, भीम आर्मी महज जुझारू और आक्रामक शोरशराबे और नारेबाजी तक सीमित नहीं है. बल्कि खबरों के मुताबिक इसके नेताओं चंद्रशेखर आजाद और विनय रत्न सिंह ने 2015 में भीम आर्मी एकता मिशन की स्थापना की थी, जिसका रचनात्मक मकसद दलित बच्चों को मुफ्त शिक्षा मुहैया कराना है. भीम आर्मी सहारनपुर और इसके आसपास 300 से ज्यादा स्कूल चला रहा है. निश्चित रूप से भीम आर्मी के नेताओं ने मायावती की शैली की राजनीति के साथ अपने मोहभंग की बात की है, लेकिन साथ ही उन्होंने सार्वजनिक रूप से कांशीराम के नाम से शपथ भी ली है. चंद्रशेखर आजाद ने अपने लिए रावण की उपाधि रखी है, जिसमें भाजपा के राम के सांस्कृतिक जवाब की झलक मिलती है.

    मौजूदा तौर पर जो दिखाई दे रहा है उसके मुताबिक भीम आर्मी की जड़ें असल में बसपा के अंदाज वाली पहचान की राजनीति की रूढ़ छवियों में ही धंसी नजर आती हैं. लेकिन जिस तरह सहारनपुर में उन्होंने जातिवादी गुंडों के साथ टक्कर ली है, अपने आप में यही तथ्य इस बात की पूरी संभावना को जाहिर कर देता है कि वे इससे आगे जाएंगे और दलितों की मुक्ति की एक नई राजनीति पेश करेंगे. रावण और उनके साथियों को इस चुनौती के लिए तैयार रहना होगा.

    सहारनपुर के हवाले से जाति के विनाश की पहल की जा सकती है .

    जंतर-मंतर - Tue, 30/05/2017 - 07:41
    शेष नारायण सिंहउत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले में आजकल जाति के नाम पर खूनी संघर्ष जारी है .जिले  में जातीय हिंसा एक बार फिर भड़क गई है . दोनों पक्षों की ओर से हिंसा और आगज़नी करने की घटनाएं जारी हैं .सारे विवाद के केंद्र में शब्बीर पुर गाँव है . वहां बड़ी संख्या में पुलिस बल तैनात किए गए हैं और लखनऊ के अफसर वहां पहुंच गए हैं और जो समझ में आ रहा है ,कर रहे हैं .पुलिस ने हिंसक घटनाओं की पुष्टि हर स्तर  पर  की है लेकिन समस्या इतनी विकट है कि कहीं कोई हल नज़र नहीं आ रहा है .ताज़ा हिंसा भड़कने से इलाक़े में ज़बरदस्त तनाव की स्थिति है. मंगलवार की सुबह बीएसपी नेता मायावती ने शब्बीरपुर गांव का दौरा किया. खबर है कि मायावती के शब्बीरपुर पहुंचने से पहले ही कुछ दलितों ने ठाकुरों के घर पर पथराव करने के बाद आगजनी की थी.जबकि  मायावती की बैठक के बाद  ठाकुरों ने दलितों के घरों पर कथित तौर पर हमला बोल दिया.
    अब तक की सरकारी कार्यवाही को देख कर साफ़ लग रहा है कि सरकार सहारनपुर की स्थिति की गंभीरता को नहीं समझ रही है . जैसा कि आम तौर पर होता है , सभी सरकारें  बड़ी राजनीतिक और सामाजिक समस्याओं को कानून व्यवस्था की समस्या मानकर काम करना शुरू कर देती हैं . सहारनपुर में भी वही हो रहा है . पिछले करीब तीन दशकों  ने उत्तर प्रदेश में ऐसी सरकारें आती रही हैं जिनके गठन में दलित जातियों की खासी भूमिका रहती रही है . लेकिन इस बार उत्तर प्रदेश में ऐसी सरकार आई है जिसके गठन में सरकारी पार्टी के समर्थकों के अनुसार दलित जातियों का कोई योगदान नहीं है . विधान सभा चुनाव में बीजेपी को भारी बहुमत मिला था जिसके बाद योगी आदित्य नाथ को उत्तर प्रदेश का मुख्य मंत्री बनाया गया . ज़मीनी स्तर पर उनकी पार्टी के कार्यकर्ताओं को मालूम है  कि विधान सभा चुनावों में दलित वर्गों ने बीजेपी की धुर विरोधी मायावती की पार्टी को वोट दिया था. इस बात की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता कि बीजेपी के समर्थन में  रही जातियों के लोगों ने अपनी पार्टी के खिलाफ वोट देने वालों को सबक सिखाने के उद्देश्य से उनको दण्डित करने के  लिए यह कारनामा किया हो . हालांकि यह भी सच है कि दलित जातियां अब उतनी कमज़ोर नहीं हैं जितनी महात्मा गांधी या डॉ आम्बेडकर के समय में हुआ करती थीं. वोट के लालच में ही सही लेकिन उनके वोट की याचक जातियों ने उनका सशक्तीकरण किया है और वह साफ़ नज़र भी आता है . इसलिए सहारनपुर में राजपूतों ने अगर हमला किया  है तो  कुछ मामलों में दलितों ने भी हमला किया है . आजकल उत्तर प्रदेश समेत ज़्यादातर राज्यों में चुनाव का सीज़न जातियों की गिनती का होता है . इ सबार के चुनाव में यह कुछ ज़्यादा ही था. मायावती को मुगालता था कि उनकी अपनी जाति के लोगों  के साथ साथ अगर मुसलमान भी उनको  वोट कर दें तो वे फिर एक बार मुख्यमंत्री बन जायेंगी  ऐसा नहीं हुआ लेकिन चुनाव ने एक बार मोटे तौर पर साबित कर दिया कि दलित जातियों के लोग अभी भी मायावती को समर्थन देते हैं और उनके साथ हैं .उत्तर प्रदेश के ग्रामीण इलाकों की सवर्ण जातियों में अभी भी यह भावना है कि मायावती ने दलितों को बहुत मनबढ़ कर दिया है. इस  भावना की सच्चाई पर चर्चा करने का कोई मतलब नहीं है क्यों जब समाज में एकता लाने वाली राजनीतिक शक्तियों का ह्रास हो जाए तो इस तरह की भावनाएं बहुत जोर मारती हैं . सहारनपुर में वही हो रहा है . सहारनपुर में जिला प्रशासन ने वही गलती की जो २०१३ के मुज़फ्फरनगर दंगों के शुरुआती  दौर में वहां के जिला अधिकारियों ने की थी . उस दंगे की ख़ास बात तो यह थी कि ज़्यादातर राजनीतिक पार्टियाँ यह उम्मीद लगाए बैठी थीं कि पश्चिम उत्तर प्रदेश में धार्मिक ध्रुवीकरण का फायदा उनको ही होगा . जिसको फायदा होना था , हो गया , बाकी लोगों को और राष्ट्र और समाज को भारी नुक्सान हुआ . ऐसा लगता है कि सहारनपुर में जातीय विभेद की जो चिंगारी शोला बन गयी है , अगर उसको राजनीतिक स्तर पर संभाल न लिया गया तो वह समाज का मुज़फ्फरनगर के साम्प्रदायिक दंगों से ज़्यादा नुक्सान करेगी. जाति के हिंसक  स्वरूप का अनुमान आज़ादी की लड़ाई के दौरान ही महात्मा गांधी और डॉ भीमराव आंबेडकर  को था . इसीलिये  दोनों ही दार्शनिकों ने साफ़ तौर पर बता दिया था कि जाति की बुनियाद पर होने वाले सामाजिक बंटवारे को ख़त्म किये जाने की ज़रूरत है और उसे ख़त्म किया जाना चाहिए . महात्मा गांधी ने छुआछूत को खत्म करने की बात की जो उस दौर में जातीय पहचान का सबसे मज़बूत आधार था लेकिन डॉ आंबेडकर ने जाति की संस्था के विनाश की ही बात की और बताया कि वास्तव  में हिन्दू समाज कोई एकीकृत समाज नहीं है , वह वास्तव  में बहुत सारी जातियों का जोड़ है . इन जातियों में कई बार आपस में बहुत विभेद भी देखा जाता है .  शायद इसीलिये उन्होंने जाति संस्था को ही खत्म करने की बात की और अपने राजनीतिक दर्शन को जाति के विनाश के  आधार पर स्थापित किया .
    डॉ आंबेडकर के राजनीतिक दर्शनशास्त्र में महात्मा फुले के चिंतन का साफ़ असर देखा जा सकता है .महात्मा गांधी के समकालीन रहे अंबेडकर ने अपने दर्शन की बुनियादी सोच का आधार जाति प्रथा के विनाश को माना था उनको विश्वास था कि तब तक न तो राजनीतिक सुधार लाया जा सकता है और न ही आर्थिक सुधार लाया जा सकता है।  जाति के विनाश के सिद्धांत को प्रतिपादित करने वाली उनकी किताब,"जाति का विनाश " , ने   हर तरह की राजनीतिक सोच  को प्रभावित किया है. पश्चिम और दक्षिण भारत में सामाजिक परिवर्तन के जो भी आन्दोलन चले हैं उसमें इस किताब का बड़ा  योगदान  है. यह  काम महाराष्ट्र में उन्नीसवीं सदी में ज्योतिबा फुले ने शुरू किया था . उनके बाद के क्रांतिकारी सोच के नेताओं ने उनसे बहुत कुछ सीखा .. डॉ अंबेडकर ने महात्मा फुले की शिक्षा संबंधी  सोच को परिवर्तन की राजनीति के केंद्र में रख कर काम किया और आने वाली नस्लों को जाति के विनाश के रूप में एक ऐसा गुरु मन्त्र दिया जो सही मायनों  में परिवर्तन का वाहक बनेगा.  डॉ अंबेडकर ने ब्राह्मणवाद के खिलाफ शुरू किये गए ज्योतिबा फुले के अभियान को एक अंतरराष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य दिया.

    अपनी किताब में डा.अंबेडकर ने बहुत ही साफ शब्दों में कह दिया है कि जब तक जाति प्रथा का विनाश नहीं हो जाता तो  समता, न्याय और भाईचारे की शासन व्यवस्था नहीं कायम हो सकती। अंबेडकर के जीवन काल में किसी ने नहीं सोचा होगा कि उनके दर्शन को आधार बनाकर राजनीतिक सत्ता हासिल की जा सकती है। लेकिन ऐसा हुआ और मायावती उत्तर प्रदेश की एक मज़बूत नेता के रूप में  उभरीं .मायावती और उनके राजनीतिक गुरू कांशीराम ने अपनी राजनीति के विकास के लिए अंबेडकर का सहारा लिया और सत्ता भी पायी लेकिन अंबेडकर के नाम पर सत्ता का सुख भोगने वाली  सरकार ने उनके सबसे प्रिय सिद्धांत को आगे बढ़ाने के लिए कोई क़दम नहीं उठाया .इस बात  के भी पुख्ता सबूत हैं कि मायावती जाति प्रथा का विनाश चाहती ही नहीं हैं क्योंकि उनका वोट बैंक एक ख़ास जाति से आता है .इसके उलट वे जातियों के आधार पर पहचान बनाए रखने की पक्षधर है.  जब मुख्यमंत्री थीं तो हर  जाति की भाईचारा कमेटियाँ बना दी थीं और उन कमेटियों को उनकी पार्टी का कोई बड़ा नेता संभालता था .डाक्टर भीम राव आंबेडकर ने साफ कहा था कि जब तक जातियों के बाहर शादी ब्याह की स्थितियां नहीं पैदा होती तब तक जाति का इस्पाती सांचा तोड़ा नहीं जा सकता। चार बार मुख्यमंत्री की कुर्सी पर विराजने वाली मायावती जी ने एक बार भी सरकारी स्तर पर ऐसी कोई पहल नहीं की जिसकी वजह से जाति प्रथा पर कोई मामूली सी भी चोट लग सके। जाहिर है जब तक समाज जाति के बंधन के बाहर नहीं निकलता आर्थिक विकास का लक्ष्य भी नहीं हासिल किया जा सकता।
    " जाति का विनाश " नाम की अपनी पुस्तक में अंबेडकर ने अपने आदर्शों का जिक्र किया है। उन्होंने कहा कि जातिवाद के विनाश के बाद जो स्थिति पैदा होगी उसमें स्वतंत्रता, बराबरी और भाईचारा होगा। एक आदर्श समाज के लिए अंबेडकर का यही सपना था। एक आदर्श समाज को गतिशील रहना चाहिए और बेहतरी के लिए होने वाले किसी भी परिवर्तन का हमेशा स्वागत करना चाहिए। एक आदर्श समाज में विचारों का आदान-प्रदान होता रहना चाहिए।अंबेडकर के आदर्श समाज में सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा है, बराबरी . बराबरी के लक्ष्य को हासिल करने के लिए आज से सौ साल पहले डॉ आंबेडकर ने जो दर्शन कोलंबिया विश्वविद्यालय के अपने पर्चे में प्रतिपादित किया था , आज सहारनपुर के जातीय दंगों ने उनको बहुत निर्दय तरीके से नकारने की दिशा में महत्वपूर्ण क़दम उठा लिया है .ग्रामीण समाज में गरीबी स्थाई भाव  है और दलित शोषित वर्ग उसका सबसे बड़ा शिकार है . यह  भी सच  है कि तथाकथित सवर्ण जातियों के लोगों में भी बड़ी संख्या में लोग गरीबी का शिकार हैं . कल्पना कीजिये कि अगर ग्रामीण भारत में लोग अपनी पहचान जाति के रूप में न मानकर आर्थिक आधार पर मानें तो गरीब आदमियों का एक बड़ा हुजूम तैयार हो जाएगा जो राजनीतिक स्तर पर अपनी समस्याओं के समाधान के लिए प्रयास करेगा लेकिन शासक वर्गों ने ऐसा नहीं होने दिया . जाति के सांचों में बांधकर ही उनको अपनी राजनीतिक रोटियाँ सेंकनी थीं और वे लगातार सेंक रहे  हैं .


     लोक जीवन और बाजारीकरण : गिरीश चंद्र पांडेय प्रतीक 

    लेखक मंच - Mon, 29/05/2017 - 02:04

    कर्म की भाषा / त्रिलोचन

    रात ढली, ढुलका बिछौने पर,
    प्रश्‍न किसी ने किया,
    तू ने काम क्या किया
    नींद पास आ गई थी
    देखा कोई और है
    लौट गई
    मैंने कहा, भाई, तुम कौन हो.
    आओ। बैठो। सुनो।
    विजन में जैसे व्यर्थ किसी को पुकारा हो,
    ध्वनि उठी, गगन में डूब गई
    मैंने व्यर्थ आशा की,
    व्यर्थ ही प्रतीक्षा की।
    सोचा, यह कौन था,
    प्रश्‍न किया,
    उत्तर के लिए नहीं ठहरा
    मन को किसी ने झकझोर दिया
    तू ने पहचाना नहीं ?
    यही महाकाल था
    तुझ को जगा के गया
    उत्तर जो देना हो
    अब इस पृथिवी को दे
    कर्मों की भाषा में।

    बहुत कुछ बदल रहा है भौगोलिक, सांस्कृतिक, सामाजिक सरोकारों के रूप में, प्रकृति से लेकर पुरुष तक सब में परिवर्तन देखा जा सकता है। हमारे गाँव शहर बन जाने को आतुर है। और गाँव और शहर में बंटा लोक जीवन के संघर्ष भी कहीं न कहीं बदले हैं। और यह परिवर्तन न पूरी तरह नकारात्मक है न सकारात्मक, इसे हम इस रूप में समझने का प्रयास करेंगे तो पाएंगे परिवर्तन के मायने आखिर हैं क्या।
    लोक जीवन और उसके संघर्षों से उपजे पर्व शहरीकरण के साथ बदलाव की ओर या दूसरे शब्दों में कहा जाए तो ह्रास की ओर अग्रसर हैं। क्या कारण है कि लाखों-करोडों लोग मुँह से यही बोलते भी हैं कि लोक पर्वों का स्वरूप बदल गया है। आखिर इसके लिए जिम्मेदार है कौन। क्या केवल समाज जिम्मेदार है । इस मामले में केवल समाज को दोष देना उचित नहीं लगता। जिन संघर्षों और परिस्तिथियों में इन पर्वों को लोगों ने अपने मनोरंजन और सामजिक चेतना को जागृत करने के लिए शुरू किया होगा, उस समय पर्वों का स्वरूप कुछ और रहा होगा। साल दर साल भौतिक विकास के साथ मानवीय चेतना और रहने खाने-पीने के तारीकों में  बदलाव के फलस्वरूप पर्वों के भी रूप और रंग बदलते गए। उनको मनाने के तरीके बदलते गए। पहले ग्रामीण जीवन की सामूहिकता और सरलता में रचे पगे तीज त्यौहार समूह में ही पूर्ण किये जाते थे। किसी भी लोक में नृत्य, गीत, सामूहिकता के द्योतक ही नहीं, उसका जीवन थे। जैसे- पहाड़ विशेषकर उत्तराखण्ड के आलोक में होली, बग्वाल, हिलजात्रा, पांडव नृत्य आदि विधाओं को देखें तो पूर्णतः सामूहिकता से पोषित लोक विधाएं हैं। और इनके पीछे श्रम की महत्ता रही है। यह केवल कोरा मनोरंजन नहीं था। इसकी पहली शर्त और आवश्यकता सामूहिकता और संवेदनशीलता थी, जो समय और विद्रूप विकास के साथ सामूहिकता से एकात्मकता की ओर अग्रसर है । जिसने तीज त्योहारों के स्वरूप को ही नहीं बदला वरन हमारे जीने के, सोचने के, खाने-पीने और रहने के तरीकों को बदला है। हम हर स्तर पर समाजोन्मुखी से आत्मोन्मुखी हुए हैं। श्रम के प्रति धारणा बदली है। उसके प्रति जो नकारत्मकता बाजार ने बड़ी ही चालाकी से परोसी है, उसके परिणामों का ही असर है। हम हर पर्व को बाजार से रेडीमेड खरीद लाना चाहते हैं। उसे अपना सामाजिक स्टेटस भी मान बैठे हैं। हम थोड़ा गहराई से लोक पर्वों की प्रकृति को देखेंगे तो उनका सौंदर्य सामूहिकता, साहस, श्रमशील जीवन, ऐंचे-पेंचे, में था, जिस ढांचे को समाज और उसके द्वारा पोषित बाजार ने लगभग ढहा दिया है।

    अगर उत्तराखण्ड के परिपेक्ष में बात करें तो पलायन ने यहाँ की लोक संस्कृति को कमजोर किया है। संस्कृति मंचों पर दो-तीन दिन के ढोल पीटने और नाचने-गाने से नहीं बचने वाली। कोई भी त्यौहार केवल मनोरंजन नहीं होता। वह उस समाज की सभ्यता का द्योतक  भी होता है। और इसके लिए उस क्षेत्र की आबो हवा, पानी, गाड़- गधेरे, जंगल, पेड़-पौधे, पशु-पक्षी या कहा जाए- पारिस्तिथिकी  जिम्मेदार ही नहीं पोषक, और तोषक भी होती है। हमें पहले गांवों को बचाना होगा। नहीं तो समाज जहाँ जाएगा वहां की पारिस्तिथिकी के अनुसार लोक को तोड़ेगा मरोड़ेगा, गमले में केले के पेड़ लगायेगा, पैकेट में बंद घुघुते, रेडिमेड ऐपण, और पिछौड़े ही संस्कृति होंगे। और वही लोक भी लोक की पहिचान भी और बाजारीकरण से प्रभावित लोक भाषा भी। ऐसा नहीं की लोक अब है ही नहीं, लोक अभी भी है । पर लोक जीवन अपनी पहिचान बदल रहा है। लोक जीवन को अगर हम संकुचित दृष्टि से देखेंगे तो वो लोक के साथ अन्याय होगा। लोक किसी एक जगह या परिवेश में बंध नहीं सकता। उसकी सीमाएं असीमित हैं। वो शहर की गलियों में भी उतना ही है, जितना गाँव के चौपालों में। बस उसे पहिचानने की और सहेजने की आवश्यकता है।

    लोक की धूल से सने लोग बड़े सरल और सहज होते हैं। उनके लिए लोक की हवा और पानी प्राकृतिक और परिष्कृत चीजें हैं। वो धारे, नौले से डबका कर भर लाते हैं फौले, गगरी और पी लेते हैं गट-गट। उन्हें उबालने और परिष्कृत करने की जरूरत महसूस नहीं होती । पर अब बाजार के उपकरणों डिब्बे बंद खाने, ने लोक को लोक न रहने देने की कसम खा ली है। इस बाजारीकरण के दुष्प्रभावों से बचना तो बहुत मुश्किल है, लेकिन कुछ जागरूकता लायी जाए तो इसके प्रभावों को कुछ कम तो किया ही जा सकता है। लोक भी गतिशील होता है और होना भी चाहिए। लोक जीवन और उसके संघर्षों को रेखांकित किया जाना चाहिए। उसका सबसे बड़ा अस्त्र श्रम है, जिसे आज की पीढ़ी को जानना और समझना होगा।

    (बाखली, जनवरी-जून का संपादकीय)

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    लेखक विषय संवाद साभार अनुवादक

    पहले वो आए साम्यवादियों के लिए

    और मैं चुप रहा क्योंकि मैं साम्यवादी नहीं था

     

    फिर वो आए मजदूर संघियों के लिए

    और मैं चुप रहा क्योंकि मैं मजदूर संघी नहीं था

     

    फिर वो यहूदियों के लिए आए

    और मैं चुप रहा क्योंकि मैं यहूदी नहीं था

     

    फिर वो आए मेरे लिए

    और तब तक बोलने के लिए कोई बचा ही नहीं था

     

    मार्टिन नीमोलर (1892-1984)