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पीठ, बेंच, डेस्क और चेयर

इयत्ता - Sat, 13/01/2018 - 13:47
इष्ट देव सांकृत्यायन 
-नारायण नारायण!-कहिए देवर्षि, क्या हाल है मृत्युलोक का?-हाल तो ठीक नहीं है प्रभु! माँ भारती तो आक्रांतप्राय हैं. वहाँ तो लोकतंत्र को लेकर चतुर्दिक शोर मचा हुआ है. -शोर मचा हुआ है? कैसा शोर मचा है? -भारत में लोकतंत्र के चारों खंबे चीख-चीख कर कह रहे हैं कि अब मेरा तारणहार ख़तरे में है. -चारों खंबे? उनका तारणहार? कौन है इन खंबों का तारणहार? -हे प्रभु, ये उसे ही अपना तारणहार मानते हैं, जिसने इन्हें नौकरी पर रखा. यानी लोकतंत्र. -ओह! तो लोकतंत्र वहाँ ख़तरे में है? -हाँजी प्रभू! लोकतंत्र वहाँ ख़तरे में है. भयंकर ख़तरे में. -अच्छा, तो अब इसका क्या निदान हो सकता है देवर्षि? आप ही कुछ सुझाएँ! -क्या सुझाएँ प्रभू! इस पर शोध के लिए क़ायदे से तो हमें पीठ गठित करनी चाहिए. लेकिन पीठ तो आजकल बार-बार बेंच की ओर भाग रही है.-तो एक फुल बेंच ही गठित कर दीजिए. -कैसे करें प्रभु! रोज़-रोज़ मीडिया ट्रायल-मीडिया ट्रायल रटने वाले बेंच तो कल डेस्क के पास पहुँच गई.-तो डेस्क ही के पास चले जाइए.-क्या करेंगे डेस्क के पास जाकर प्रभु! डेस्क के पायों को बेंच पहले ही उनकी औकात बता चुकी है. ख़ुद उसकी ही अवमानना करने वाले डेस्क के महाप्रभुओं को बेंच ने अवमाननाकार तो माना, पर उनके द्वारा की गई अवमानना को 'नॉट विलफुल' करार दे चुकी है.-अच्छा तो ऐसा करिए कि चेयर के पास चले जाइए. -नारायण नारायण नारायण... आप भी क्या कहते हैं प्रभु! -क्यों? क्या हुआ? -चेयर वाले तो सब पहले ही मिले हुए हैं जी! चेयर वाले तो आजकल चेयर वालों की भी नहीं सुनते प्रभु! हमारी वहाँ कौन सुनेगा प्रभु! -क्यों? क्या चेयर वालों ने आपकी भी सुननी बंद कर दी है? -नारायण नारायण नारायण... आप सुनने की बात करते हैं प्रभु! सुनने का तो वहाँ यज्ञ चल रहा है, चेयर से लेकर बेंच और डेस्क तक. मृत्युलोक की भारतभूमि पर आप जहाँ जाएँ वहीं चारों तरफ़ सुनने का अश्वमेध चल रहा है. हालत यह है कि सभी सुनने की गलाकाट प्रतिस्पर्धा में जुटे हुए हैं, अहमअहमिका वृत्ति से. सुनने में सब एक दूसरे से आगे निकल जाना चाहते हैं.
-कुछ समझ नहीं आया देवर्षि! सब सुनने की प्रतिस्पर्धा में भी लगे हुए हैं और कोई सुन भी नहीं रहा... अर्थात?-अर्थात यह प्रभू कि जहाँ-जहाँ सुनने का महायज्ञ चल रहा है, वहाँ-वहाँ यज्ञक्षेत्र में हर प्रार्थी के स्वागत के लिए नगाड़े रखे हुए हैं. ये नगाड़े उसके आगे-पीछे, ऊपर-नीचे, दाएँ-बाएँ हर तरफ़ रखे हुए हैं. नगाड़ों से बनाए उस घेरे में जैसे ही प्रार्थी पहुँचता है, परम कर्तव्यपरायण नगाड़े स्वयमेव सक्रिय हो जाते हैं और तब तक पूरी तत्परता से सक्रिय ही रहते हैं जब तक कि प्रार्थी अपनी पूरी प्रार्थना न सुना ले. और जैसे ही प्रार्थी की प्रार्थना पूरी होती है, नगाड़े तो बंद हो जाते हैं लेकिन चेयर से लेकर बेंच और डेस्क हर तरफ़ से आनंद का अट्टहास होने लगता है. इसके साथ ही प्रार्थी पर आकाश से ऐतिहासिक महत्त्व वाली पुरावस्तुरूपी पुष्पों की दारुण वर्षा होने लगती है और प्रतापी प्रार्थी उनके ढेर में ही दब जाता है.-ओssssssssssssह! फिर तो आप अतीत के गौरव में ही झाँकें देवर्षि. कदाचित वहाँ कोई हल मिले. -झाँका प्रभु!-कुछ दिखा क्या देवर्षि? -दिखा प्रभू! -क्या दिखा देवर्षि? -एक कालखंड दिखा प्रभु!-कब से कब तक का कालखंड है वह देवर्षि? -25 जून 1975 से 2 मार्च 1977 का कालखंड है वह प्रभु! -ना, पिछली शताब्दी के काल की गति को नई शताब्दी में लाना मुझसे न हो सकेगा देवर्षि. कुछ और करें. -अब क्या करें प्रभु?-अब ऐसा करें कि वर्तमान में ही देखें. -कैसे देखें प्रभु? -ऐसा है कि इतिहास के बाद भूगोल देखने की परंपरा है देवर्षि. अतएव आप भारतभूमि के आस-पड़ोस में देखें. -हाँ, ठीक है प्रभु! देवर्षि ने धीरे-धीरे आँखें बंद कीं. आधे घंटे बाद धीरे-धीरे आँखें खोलनी शुरू कीं. खुलते ही उन्होंने पुनः टेर लगाई, -नारायण नारायण-कहिए देवर्षि. क्या समाचार है. -बहुत अच्छा समाचार है प्रभु! -हूँ... तो बताइए. हम भी जानें. -प्रभू भारतभूमि के बगल में ही पाकिस्तान है. वहाँ फुलटॉस लोकतंत्र है. दूसरी तरफ़ चीन है. वहाँ तो और भी फुलटॉस लोकतंत्र है. वहाँ तो 1989 में लोकतंत्र का एक बहुत बड़ा महोत्सव भे हुआ था, जिसे इतिहास के पन्नों में जून फोर्थ इंसिडेंट के नाम से स्वर्णाक्षरों में दर्ज है प्रभू! -हूँ... बात तो ठीक है, लेकिन इतने निकट से .. आइ मीन इमिडिएट पड़ोसी से नकल नहीं करनी चाहिए. कॉपी मिलने के चांसेज़ बढ़ जाते हैं और एग़्ज़ामिनर विदहेल्ड कर सकता है. कोई और उदाहरण दें देवर्षि. -प्रभू ऐसे तो भारतभूमि में सिर्फ़ यूरोप और अमेरिका ही ऐसी जगह है जहाँ की नकल को नकल नहीं माना जाता और अगर कभी पता भी चल जाए कि यह तो नकल है तो उसे स्वयमेव महाअकल सिद्ध मान लिया जाता है. लेकिन बीते दिनों रूस और चीन की नकल की वहाँ बड़ी उदात्त परंपरा स्थापित हुई थी. ख़ैर, अब ये बीते दिनों की बात हो गई. इधर नया ट्रेंड वहाँ थोड़े दूर के पड़ोसी नॉर्थ कोरिया के नकल की है. अब तो पोस्टर पर भी लेनिन-मार्क्स की जगह उनके महान राष्ट्रनायक महामहिम जननेता श्री किम जोंग उन दिखाई देने लगे हैं. आजकल उनके महान देश में जनता बहुत सुखी-संपन्न है और चतुर्दिक लोकतंत्र का रंग-बिरंगा उत्सव चल रहा है. सड़कों पर दौड़ने, छतों पर सुखाए जाने, खेतों में उगने, घास के मैदानों में चरे जाने और तोपों में बतौर बारूस भरे जाने से लेकर गाँवों-शहरों की नालियों एवं सीवर तक में लोकतंत्र ही बह रहा है. -हूँ... आप ठीक कहते हैं. वैसे ये नॉर्थ कोरिया है कहाँ देवर्षि? -नारायण नारायण... क्यों मज़ाक करते हैं प्रभू? अरे ये उसी साउथ कोरिया का एकदम से इमिडिएट नेबर है प्रभू जिससे आपकी रिश्तेदारी रही है. -मेरी रिश्तेदारी? -हांजी-हांजी प्रभू! भूल गए आप अपना रामावतार? आपके रामावतार के महान कुल की रिश्तेदारी प्रभू! -ओह! आइ नो... आपने ठीक कहा. ठीक है तो ऐसा करिए कि मृत्युलोक की भारतभूमि के निवासियों से कहिए कि यथाशीघ्र वे लोकतंत्र का नॉर्थ कोरिया मॉडल ही अपना लें. वहाँ के लिए केवल यही श्रेयस्कर रहेगा.



dhanyavad

The Defining Feature of 21C

Full-fledged eruption of planetary pestilence called Homo Sapiens. If only there was a God who could set it right. Oh, come on! There is no Apocalypse in 21C! Perhaps. Still, you can see far better the skull beneath the Sapien skin. By the way, my Air Quality Index app does indeed say ‘Airpocalypse’. Advertisements

अलविदा, चिरयुवा साथी दूधनाथ सिंह!

लेखक मंच - Fri, 12/01/2018 - 12:53

दूधनाथ सिंह

नई दि‍ल्‍ली : ‘आख़िरी क़लाम’ जैसे अविस्मरणीय महाकाव्यात्मक उपन्यास और ‘रक्तपात’, ‘रीछ’, ‘धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे’, ‘माई का शोकगीत’ जैसी लम्बे समय तक चर्चा में बनी रहने वाली कहानियों के लेखक, जनवादी लेखक संघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष दूधनाथ सिंह नहीं रहे। उनका न रहना हिन्दी की दुनिया के लिए और विशेष रूप से जनवादी लेखक संघ के लिए एक अपूरणीय क्षति है। वे एक साल से प्रोस्ट्रेट कैंसर से पीड़ित थे। लगभग एक हफ़्ते पहले हालत बहुत बिगड़ने पर इलाहाबाद के फिनिक्स अस्पताल के गहन चिकित्सा कक्ष में उन्हें भर्ती कराया गया था। वहीं 11 जनवरी की रात 12 बजे उनका इंतकाल हुआ।

17 अक्टूबर 1936 को उत्तर प्रदेश के बलिया ज़िले के एक गाँव में जन्मे दूधनाथ जी अपनी शुरुआती कहानियों के साथ ही हिन्दी में साठोत्तरी पीढ़ी के प्रमुख हस्ताक्षर के रूप में उभरे थे। सत्तर के दशक की शुरुआत में आलोचना-पुस्तक ‘निराला: आत्महंता आस्था’ के साथ वे आलोचना के क्षेत्र में भी प्रतिष्ठित हुए। सन साठ के आसपास शुरू हुए, तकरीबन साठ वर्षों के अपने रचनात्मक जीवन में उन्होंने कहानी, उपन्यास, कविता, नाटक, संस्मरण और आलोचना—इन सभी क्षेत्रों में महत्वपूर्ण योगदान किया। पूर्वोल्लिखित रचनाओं के अलावा ‘यमगाथा’ नाटक, महादेवी पर लिखी आलोचना-पुस्तक, और संस्मरणों की पुस्तक ‘लौट आ ओ धार’ उनकी यादगार कृतियाँ हैं।

इलाहाबाद विश्वविद्यालय से 1957 में हिन्दी में एम.ए. करने के बाद दूधनाथ जी ने 1959 में कलकत्ता के रुंगटा कॉलेज से अध्यापन की शुरुआत की। कलकत्ता रहते हुए ही उन्होंने ‘चौंतीसवां नरक’ शीर्षक से एक उपन्यास-अंश और ‘बिस्तर’ कहानी लिखी जिसे कमलेश्वर के सम्पादन में निकलनेवाली ‘सारिका’ पत्रिका ने छापा और पुरस्कृत किया। दो साल बाद वे नौकरी छोड़कर इलाहाबाद लौट आये जहां कुछ समय बेरोज़गारी में गुज़ारने के बाद उन्हें इलाहाबाद विश्वविद्यालय में तदर्थ प्राध्यापक के रूप में नौकरी मिली। रचनात्मक कार्य इस बीच लगातार जारी रहा। 1963 में प्रकाशित ‘रक्तपात’ कहानी के साथ कहानीकारों की उस समय उभर रही पीढ़ी के प्रमुख हस्ताक्षर के रूप में उनकी पहचान बनी।

दूधनाथ जी की महत्वपूर्ण पुस्तकों की संख्या बीस से ऊपर है: उपन्यास—‘आख़िरी क़लाम’, ‘निष्कासन’, ‘नमो अन्धकारम’; कहानी-संग्रह—‘सपाट चेहरे वाला आदमी’, ‘सुखान्त’, ‘प्रेमकथा का अंत न कोई’, ‘माई का शोकगीत’, ‘धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे’, ‘तू फू’; कविता-पुस्तकें—‘अगली शताब्दी के नाम’, ‘एक और भी आदमी है’, ‘युवा खुशबू’, ‘सुरंग से लौटते हुए’; नाटक—‘यमगाथा’; संस्मरण—‘लौट आ ओ धार’; आलोचना—‘निराला: आत्महंता आस्था’, ‘महादेवी’, ‘मुक्तिबोध: साहित्य में नई प्रवृत्तियां’; साक्षात्कार—‘कहा-सुनी’. इनके अलावा उन्होंने ‘भुवनेश्वर समग्र’ और शमशेर पर केन्द्रित पुस्तक ‘एक शमशेर भी है’ का सम्पादन किया।उन्हें मिलनेवाले पुरस्कारों और सम्मानों में भारत भारती सम्मान, भारतेंदु हरिश्चंद्र सम्मान, शरद जोशी स्मृति सम्मान और कथाक्रम सम्मान प्रमुख हैं।

सामाजिक-राजनीतिक मसलों पर सजग और पैनी निगाह रखनेवाले दूधनाथ जी का लेखन अपने समय को इतने कोणों से पकड़ता है कि उन्हें पढ़ना एक युग के आरपार गुज़रने की तरह है।आज हमारा मुल्क जिस दौर में है, वहाँ 2003 में प्रकाशित, बाबरी मस्जिद ध्वंस पर केन्द्रित ‘आख़िरी क़लाम’ को बार-बार पढ़े जाने की ज़रूरत है, जिसकी भूमिका के रूप में लिखे शुरुआती हिस्से में आया यह वाक्य जैसे हमारे समय पर एक इल्हामी टिप्पणी है: ‘हमें इस बात का डर नहीं कि लोग कितने बिखर जायेंगे, डर यह है कि लोग नितांत ग़लत कामों के लिए कितने बर्बर ढंग से संगठित हो जायेंगे।’

ऐसे दूधनाथ जी अब हमारे बीच नहीं हैं। वे हमारी स्मृतियों में सदा बसे रहेंगे और अपनी रचनाओं से हमारा मार्गदर्शन करते रहेंगे।

(जनवादी लेखक संघ के महासचि‍व मुरली मनोहर प्रसाद सिंह और उप-महासचिव संजीव कुमार की ओर से जारी)

 

 

 

दूधनाथ सिंह : एक प्रतिबद्ध स्वर

जनपक्ष - Fri, 12/01/2018 - 11:06

कुलदीप कुमार ने यह लेख आज द हिन्दू के अपने कॉलम "हिन्दी बेल्ट" लिए लिखा था...किसे पता था कि यह श्रद्धांजलि लेख में बदल जाएगा। जनपक्ष की ओर से हिन्दी के प्रतिबद्ध कहानीकार और आलोचक दूधनाथ सिंह जी को सादर श्रद्धांजलि। 
A committed voice
  • Kuldeep Kumar

News from Allahabad is very depressing as it tells us that top Hindi writer Doodhnath Singh, 81, is lying at home in a critical condition due to serious kidney failure. I have fond memories of a chance meeting with him in early February last year at Allahabad’s famous Indian Coffee House in Civil Lines. In the early 1970s, when I was acquiring familiarity with contemporary Hindi literature, Doodhnath Singh was one of the writers whom I read with great interest. A line from his early poems still resonates in my ears: “Lift ke andhere mein brain haimrej ho rahe hain” (Brain haemorrhages are taking place in the darkness of the elevator). Later, I came to know him as a friend although he was much older than me.  
Doodhnath Singh is a committed Left-wing writer and happens to be the national president of the pro-CPI (M) Janwadi Lekhak Sangh. When he exploded on the Hindi literary scene with his collection of short stories Sapaat Chehrewala Aadmi (Man with a Plain Face), published by Rajendra Yadav’s Akshar Prakashan in 1967, the new talent was viewed with awe and nearly all the short stories, be it Reechh (Bear), Raktapaat (Bloodletting), Duhswapna (Nightmare) or Iceberg, acquired near-iconic status. He also made his mark as a significant poet of his generation as well as a novelist, playwright and critic.
His book on great Hindi poet Suryakant Tripathi Nirala, published by Lokbharati Prakashan in 1972, was tantalisingly titled Nirala: Aatmahanta Aastha (Nirala: A Self-destructive Belief) and Doodhnath Singh had to explain in the introductory note that he did not mean that Nirala was suicidal. What he actually meant was that once a writer had devoted himself completely to his art, he had to go through the process of continuous self-annihilation, savouring the taste of his own blood on the tip of his tongue. One could discern in this formulation an unmistakable influence of T. S. Eliot but the book was in fact an intimate conversation between two poets. It was a collection of observations made on the margin of Nirala’s books as well as scattered entries in Singh’s diaries but they somehow formed an integrated whole and offered a palpably new interpretation of the great poet and his work. In 1975, when the country’s politics was experiencing a paradigm shift, Doodhnath Singh brought out a literary journal of uncertain periodicity and appropriately christened it Pakshdhar (Partisan). Although it did not have a long life, the journal proved to be an effective political-literary intervention and confirmed Singh’s status as an important writer with a social conscience. Most of his books have been published by Lokbharati Prakashan, Radhakrishna Prakashan and Rajkamal Prakashan and they include his novels Aakhiri Kalaam (Last Discourse), Nishkasan (Expulsion) and Namo Andhakaram (Salute to Darkness), collections of short stories Mai ka Shokgeet (The Sad Song of Mother), Sukhant (Happy Ending) and Katha Samagra (Collected Stories), play Yamgatha (The Story of Yama), poetry collections such as Tumhare Liye (For You) and Laut Aa O Dhaar (Return! O, Stream), and books of literary criticism like Muktibodh Sahitya Mein Nayee Pravrittiyan (New trends in Muktibodh’s writings). He has also edited great Hindi woman poet Mahadevi’s writings with his critical comments. And, this is by no means an exhaustive list of his works.
While Doodhnath Singh’s early work expressed the angst felt by the youth of the 1960s due to an all-pervasive collapse of social, moral, economic and political values, his later work voiced a powerful protest against the evolving realities. His short story “Mai ka Shokgeet” is a hair-raising document of domestic violence against women while “Aakhiri Kalaam” is a post-Babri masjid polemics involving our past as well as present. In fact most of his post-1990 writings are imbued with a sense of deep frustration, anguish, anger and protest against the formation of a political culture that is destructive by its very nature. Singh tries to marshal multi-layered history, myths, fables and cultural interpretations to express his deeply felt revulsion against an ideology that tears asunder the intricately woven fabric of our composite culture. And, being a creative writer, he accomplishes this feat without resorting to sloganeering or explicit portrayals. Little wonder that veteran theatre critic Romesh Chandra had this to say about Singh’s play “Yamgatha” in his review published in The Hindu on February18, 2005: “In the past we have seen quite a few plays that have tried to draw a parallel between mythology and the current socio-political scene with varying degrees of success but "Yama Gatha" brings the message home without being propagandist.”
His book on Muktibodh, published in 2013 by Rajkamal Prakshan, proved that the critical acumen that he displayed in his study of Nirala had become even sharper over the decades as he offered radically different interpretation of the iconic poet’s work and brought out several new facets of his poetry.
Doodhnath Singh’s writings have been translated into English, German, Marathi, Bengali, Gujarati, Punjabi and Malayalam. He is a recipient many literary awards including Bharat Bharati Samman, Bharatendu Samman, Sharad Joshi Samman and Kathakram Samman.

(द हिन्दू से साभार) 

गुजरात चुनाव में राहुल गांधी का ‘जबरदस्त झटका’

हाशिया - Mon, 08/01/2018 - 19:31

अपने नियमित स्तंभ में आनंद तेलतुंबड़े इस बार गुजरात चुनावों के नतीजों का विश्लेषण कर रहे हैं. अनुवाद: रेयाज उल हक
 
कांग्रेस के नए-नए अध्यक्ष नियुक्त हुए राहुल गांधी ने गुजरात चुनावों के नतीजों पर यह कहते हुए प्रतिक्रिया दी कि चुनावों ने भाजपा को जबरदस्त झटका दिया है और नरेंद्र मोदी की विश्वसनीयता के संकट को उजागर किया है. (टाइम्स ऑफ इंडिया, 20 दिसंबर 2017) गुजरात के चुनाव कोई मामूली चुनाव नहीं थे, उन्हें 2019 के आम चुनाव की आजमाइश के रूप में लिया जा सकता है, जिनमें अगर भाजपा के रथ को जीत का अपना सफर जारी रखने की इजाजत मिल गई तो भारत के औपचारिक रूप से एक फासीवादी हिंदू राष्ट्र में बदल दिए जाने का एक सचमुच का खतरा सामने आ खड़ा होगा.

गुजरात ने कांग्रेस को जीतने के लिए एक अनोखा मौका मुहैया कराया था. पिछले 22 सालों में यह पहला चुना था, जिसमें करिश्माई मोदी को राज्य मुख्यमंत्री के रूप में पेश नहीं किया गया और न ही उनकी जगह किसी भरोसेमंद चेहरे को लाया गया. इसने सत्ताधारी दल के लिए मुश्किलें खड़ी कीं, जिसमें भाजपा के अपने स्थायी आत्मविश्वास और उद्दंडता का भी योगदान था, खास कर जब मोदी के गुजरात मॉडल का खोखलापन जगजाहिर हो गया है. इन चुनावों में सभी उल्लेखनीय समुदाय मुखर रूप से भाजपा के खिलाफ थे – हार्दिक पटेल के पीछे खड़े पाटीदार भाजपा को सबक सिखाने का ऐलान कर रहे थे, अन्य पिछड़े वर्ग (ओबीसी) अल्पेश ठाकुर के साथ कांग्रेस के पक्ष में खड़े थे और जिग्नेश मेवाणी द्वारा गोलबंद किए गए दलित भाजपा को हराने की कसमें खा रहे थे. किसान सबसे बुरे खेतिहर संकट झेल रहे हैं, नौजवान बढ़ती हुई बेरोजगारी का सामना कर रहे हैं, भाजपा का मुख्य जनाधार रहे व्यापारी और छोटे कारोबारी नोटबंदी और जीएसटी से परेशान होकर खुलेआम अपनी नाराजी जाहिर कर रहे थे और आम जनता भी गैरमामूली तौर पर चुनावों को लेकर अपनी बेपरवाही दिखा रही थी. विपक्ष इससे और ज्यादा क्या उम्मीद कर सकता था? अगर इन सारी मुश्किलों के बावजूद, भाजपा वोट प्रतिशत में इजाफे के साथ ही विधानसभा में एक आरामदेह बहुमत से जीत गई तो हैरानी होती है कि राहुल गांधी किस झटके की बात कर रहे हैं.
 
होड़ में पिछड़ी कांग्रेस 

इस बार गुजरात में वोटों का कुल प्रतिशत 68.3 फीसदी था, जो 2012 के 71.3 फीसदी से कम है. यह लोगों में उत्साह की कमी को जाहिर करता है. इसे नोटा को भारी संख्या में मिले वोटों ने भी रेखांकित किया है. 5.52 लाख वोटरों ने, जो कुल वोटों का 1.8 फीसदी है, नोटा विकल्प को चुना और सियासत के हालात को लेकर अपनी मौन असहमति जाहिर की. नोटा को मिले वोटों की तादाद बहुजन समाज पार्टी और नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी को मिले क्रमश: 2.07 और 1.85 लाख वोटों से कहीं अधिक है. ज्यादातर टिप्पणीकारों ने कांग्रेस के प्रदर्शन की तारीफ की है, जिसे पांच साल पहले मिली सीटों से 16 सीटें ज्यादा हासिल हुई हैं. भाजपा का कुल वोट शेयर 2014 के लोक सभा चुनावों के 60.11 फीसदी से गिर कर 49.1 फीसदी पर आ गया, लेकिन 2012 के विधानसभा चुनावों के 47.85 फीसदी वोट शेयर के मुकाबले इजाफा ही हुआ है. इस बार कांग्रेस का वोट शेयर भी बढ़ कर 41.4 हो गया है, जबकि यह 2014 के लोकसभा चुनावों में 33 फीसदी और 2012 के विधान सभा चुनावों में 38.9 फीसदी था. उनके बीच के वोट शेयर का फर्क भी 2012 के 8.85 फीसदी से घट कर इस बार 7.7 फीसदी पर आ गया है, जो 2002 में गुजरात दंगों के फौरन बाद हुए चुनावों में 10.4 फीसदी और 2007 के चुनावों में 9.49 फीसदी था. लोक सभा चुनाव 2014 के आधार पर देखें तो भाजपा ने 66 सीटें खोई हैं और कांग्रेस ने 63 हासिल की हैं. भारत में सबसे ज्यादा वोट पाने वाले उम्मीदवार को विजेता घोषित करने (एफपीटीपी) की चुनाव प्रणाली  की बदौलत, अपने वोट शेयर में 1.25 फीसदी इजाफे के बावजूद भाजपा ने 17 सीटें खोईं. बेशक कांग्रेस को 19 सीटों का फायदा हुआ. यकीनी रूप से, कांग्रेस ने पहले से बेहतर प्रदर्शन किया है, लेकिन एफपीटीपी चुनाव प्रणाली में इसका क्या फायदा है?

इस बार कांग्रेस को अनोखी और साफ-साफ दिखने वाली बढ़त हासिल थी. परंपरागत रूप से भाजपा को वोट करने वाला समुदाय पाटीदार या पटेल आबादी का 14 फीसदा हिस्सा बनाते हैं और पिछली विधान सभा में इस समुदाय के 25 फीसदी विधायक थे. इस बार के चुनावों में 182 विधानसभा सीटों में से 65 पर उन्हें प्रभावशाली माना गया और वे आरक्षण के मुद्दे पर भाजपा के खिलाफ कमर कसे हुए थे. लेकिन वोटिंग में वे बंटे हुए दिखे. ग्रामीण आबादी ने कांग्रेस को वोट दिया, जबकि शहरी मतदाताओं ने भाजपा के लिए वोट किया. कुछ हद तक इसकी उम्मीद की जा रही थी, लेकिन भाजपा ने निश्चित रूप से हार्दिक पटेल के कुछ साथियों को खरीद कर, हार्दिक के नेतृत्व वाले पाटीदार अनामत आंदोलन समिति (पास) में अपनी पैठ बना ली थी. ओबीसी वोट गुजरात में कुल वोटों का 45 से 50 फीसदी है और वे 71 सीटों पर प्रभावशाली हैं और इसलिए उन पर मोदी का रहमोकरम खूब रहा है. लेकिन इस बार उन्होंने ऐलानिया तौर पर कांग्रेस की हिमायत की. आबादी में 7 फीसदी तादाद वाले दलि परंपरागत रूप से कांग्रेस को वोट देते आए हैं और खुलेआम भाजपा के खिलाफ थे. राज्य की आबादी का 14.75 फीसदी हिस्सा, आदिवासी कुल 37 सीटों पर प्रभावशाली थे और भाजपा और कांग्रेस में बंटे हुए थे. भले ही ऐसी उम्मीद नहीं की जा सकती कि ये सारे समुदाय एकजुट होकर एक जगह वोट डालेंगे, लेकिन जब चुनावों का ऐलान हुआ तो साफ तौर पर कांग्रेस की ओर उनका झुकाव था. इसके बावजूद कांग्रेस इन समुदायों में भाजपा को मात नहीं दे पाई. उन 52 सीटों में से भाजपा ने 28 सीटें जीतीं, जहां पाटीदार आबादी 20 फीसदी या उससे ज्यादा है, जबकि कांग्रेस को सिर्फ 23 सीटें ही मिलीं, और एक सीट एक निर्दलीय को गई. अनुसूचित जातियों में, भाजपा ने 8 सीटें जीतीं और कांग्रेस को 5 सीटें हासिल हुईं, जिनमें जिग्नेश मेवाणी की निर्दलीय सीट भी शामिल है, जिनको कांग्रेस ने समर्थन दिया था. सिर्फ अनुसूचित जनजातियों में ही भाजपा की 9 सीटों के मुकाबले कांग्रेस को 16 सीटें हासिल हुईं. लेकिन आदिवासी बहुल सीटों पर, भाजपा ने 19 सीटें जीतीं जबकि कांग्रेस ने सिर्फ 15, दो सीटें भारतीय ट्राइबल पार्टी (बीटीपी) और एक सीट निर्दलीय को गई.
 
मोदी की मुकाबले की ताकत 

गुजरात में हालात ऐसे थे कि मोदी के बिना भाजपा यकीनी रूप से चुनाव हार जाती. मोदी 2019 के आम चुनावों के अभ्यास के रूप में गुजरात की अहमियत को जानते थे और अपने पद की गरिमा और मर्यादा को भुला कर किसी भी कीमत पर इसे जीतने पर उतारू हो गए. शुरुआत में, दब्बू चुनाव आयोग के जरिए चुनावों को भाजपा के लिए एक सुविधाजनक समय आने तक तक टाला जाता रहा. संसद के शीत सत्र को बुलाने की रिवायत को भी इसके लिए तोड़ा गया. आचार संहिता की धज्जियां उड़ाते हुए नाराज वोटरों को मनाने के लिए जीएसटी में सुधार किए गए. लेकिन इन सबके बावजूद, गुजरात जब उनकी गिरफ्त से फिसलता हुआ दिखा तो वे हरसंभव घटिया स्तर पर उतरने से भी नहीं हिचके, जब उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, पूर्व उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी, एक पूर्व भारतीय सेना प्रमुख दीपक कपूर, चार विदेश सचिवों और पाकिस्तान में एक पूर्व भारतीय कूटनीतिज्ञ और साथ ही कुछ फौजी मामलों के माहिर लोगों पर आरोप मढ़ दिया कि वे गुजरात चुनावों को प्रभावित करने की कोशिश कर रहे हैं. यहां तक कि उन्होंने हिंदुओं को सांप्रदायिक रूप से उकसाने की अपनी पुरानी तरकीब के तहत, सोमनाथ मंदिर में दाखिले के लिए किसी द्वारा राहुल गांधी का नाम गैर हिंदुओं के रजिस्टर में लिख दिए जाने को और अयोध्या मामले में कपिल सिब्बल की दखल को भी कांग्रेस को बदनाम करने के लिए इस्तेमाल किया. राष्ट्रवाद पर खड़े किए गए अंधराष्ट्रवादी शोरशराबे में गुजरात मॉडल या विकास पर एक शब्द नहीं कहा गया, जिसके बूते उन्होंने 2014 चुनावों में लोगों को बेवकूफ बना कर उनका वोट हासिल किया और सत्ता में आए.

उन्होंने शहरी मतदाताओं को आसानी से मना लिया कि वे नोटबंदी और जीएसटी की अपनी शिकायतों को भूल जाएं और शहरों के 48 में से 42 सीटें उनकी झोली में डाल दें. यह शहरी स्थानीय निकाय के चुनावों का दोहराव ही था, जिसमें 2016 की शुरुआत में भाजपा ने विजयी रही थी. लेकिन वे गांवों के मतदाताओं को प्रभावित नहीं कर पाए जो गहराते खेतिहर संकट और भाजपा शासन की आपराधिक अनदेखी का खामियाजा भुगत रहे हैं, जो राज्य में क्रोनी-पूंजीवाद को बढ़ावा दे रही है. इससे कांग्रेस को ग्रामीण और अर्ध-शहरी इलाकों में 50 फीसदी से ज्यादा सीटें हासिल हुईं, खास कर मूंगफली और कपास के किसानों के बीच. कांग्रेस का प्रदर्शन सौराष्ट्र इलाके में सबसे प्रभावशाली रहा, जहां उसने अमरेली, मोरबी, गिर सोमनाथ और सुरेंद्रनगर जिलों में भारी जीत दर्ज की. इन नतीजों के लिए इन इलाकों में पाटीदारों के संगठन पास की जिस ताकत से जोड़ा जा रहा है, वह अपने आप में खेतिहर संकट की ही अभिव्यक्ति है. 182 सदस्यों वाली विधानसभा में 134 सीटें ग्रामीण और अर्ध-शहरी इलाकों से आती हैं. कांग्रेस को उनमें से 71 सीटें मिलीं, इसके बाद 57 सीटों के साथ भाजपा, दो सीटों के साथ बीटीपी, एक सीट के साथ एनसीपी और तीन निर्दलीय हैं. एक तरह से ये चुनावी नतीजे करीब दो साल पहले के जिला पंचायत और तालुका पंचायत चुनावों का दोहराव भी थे. इस तरह से, कहा जा सकता है कि मोदी का जादू चल रहा है और यह सिर्फ बदतर रुझानों की तरफ ही ले जा रहा है.
 
राहुल का नाकाबिल प्रदर्शन
 
यह तो तय है कि राहुल गांधी ने गुजरात चुनावों को गंभीरता से लिया, 23 दिन वहां गुजारे और राज्य भर में 65 से ज्यादा रैलियों या सभाओं को संबोधित किया. इस बार उनके नारे भी थोड़े बेहतर थे जैसे कि ‘विकास गांडो थायो छे’ या ‘शाह-ज्यादा’ (अमित शाह के बेटे के लिए). लेकिन कुछ मुर्खता भरे नारे भी थे जैसे ‘गब्बर सिंह टैक्स’ या अपने वंश की तरक्की के बचाव में ‘अभिषेक बच्चन भी डायनेस्ट है’. लेकिन मीडिया के जायजे और अपने अंध-समर्थकों की तारीफों के उलट, वे अपने ताकतवर प्रतिद्वंद्वी के मुकाबले टिक पाने में फिर से नाकाम रहे. कांग्रेस अभी भी शतुरमुर्ग की तरह बैठी मतदाताओं के भाजपा से मोहभंग होने का इंतजार कर रही है और अपनी ही घटती जा रही प्रासंगिकता को देखने से इन्कार कर रही है. भाजपा की ठोक-बजा कर बनाई गई चुनावी मशीन का रणनीतिक रूप से जवाब देने के बजाए गांधी बेवकूफी भरे तरीके से ‘मैं भी किसी से कम नहीं’ की रणनीति पर चल रहे हैं और खुद को सीधे सीधे मोदी के मुकाबले में खड़ा कर रहे हैं. वे यह नहीं समझ पा रहे हैं कि तय है कि इस तरह की रणनीति से वे नुकसान में ही रहेंगे. एक नेता की काबिलियत इसमें होती है कि वह अपने अनुयायियों को इसके लिए प्रेरित करे कि वे उसके विजन, उसके नजरिए को, जमीन पर उतार सकें, न कि इसमें होती है कि वह खुद को एक योद्धा के रूप में पेश करे. मोदी के पास उनकी गैरमामूली भाषणबाजी और ड्रामेबाजी का हुनर है, जिसकी मदद से वे झांसा देने वाली बातों और झूठों को बड़ी महारत के साथ फैलाते रहते हैं और भारतीय जनता को प्रभावित किया है, जिसकी परवरिश ही नायक पूजा पर हुई है. लेकिन साथ ही, मोदी वैश्विक पूंजी की पसंद भी हैं. गांधी के पास इनमें से कुछ भी नहीं है और वे सीधी टक्कर में उनसे होड़ नहीं ले सकते. उनके लिए जरूरी है कि वे एक तरह की स्वोट एनालिसिस यानी ताकत-कमजोरी-मौका-जोखिम का जायजा लें- ऐसा न सिर्फ वे अपनी पार्टी के साथ करें बल्कि अपने साथ भी करें और फिर एक व्यावहारिक रणनीति तैयार करें जो मोदी की राह रोक सके. उन्हें बार बार जो नाकामियां हासिल हुईं हैं उनको देखते हुए उनमें ऐसा कोई विजन दिखाई नहीं देता और न ही ऐसी सियासी समझ दिखाई देती है जो यह महसूस कर सके कि उनके सामने कैसा फौरी खतरा मौजूद है.

भाजपा की कामयाबी उसकी अकेली अपनी कामयाबी नहीं है. उसे काफी कुछ यह कामयाबी कांग्रेस की नालायकी की बदौलत भी हासिल हुई है. अगर महज हाल की ही कुछ घटनाओं को याद करें तो अगर राजीव गांधी ने शाहबानो फैसले को नहीं पलटा होता या अयोध्या में बाबरी मस्जिद के ताले खुलवाए होते या नरसिंह राव ने बाबरी मस्जिद के पास हिंदुत्ववादी गुंडों को जमा होने की इजाजत नहीं दी होती, तो मोदी वहां कभी नहीं पहुंच पाते जहां वे आज हैं. यह सड़न और गहराई तक जाती है, उन दिनों तक पहुंचती है जब कांग्रेस के क्रूर बहुमत के तहत उत्तर-औपनिवेशिक राज्य का निर्माण किया जा रहा था और इसने संविधान में ही जातियों और धर्म के लिए जगह तैयार की थी. आज भी, बहुसंख्यक आबादी भाजपा के पक्ष में नहीं है, 2014 में इसका लोकप्रिय वोट महज 31 फीसदी था. कांग्रेस के पुराने गुनाहों को जानने के बावजूद भारत के सारे प्रगतिशील लोग चुनावों में कांग्रेस के समर्थन में उतरे हैं, सिर्फ इसलिए कि भाजपा के शैतानी मकसद को साकार होने से रोका जा सके. लेकिन राहुल गांधी अपने उलझन भरे व्यवहारों से उन्हें निराश करते रहेंगे. वे मोदी के फंदे में फंस गए और गुजरात में 27 हिंदू मंदिरों का दौरा किया और यह भी दावा किया किया कि वे एक जनेऊ-धारी ब्राह्मण हैं. इस तरह न सिर्फ उन्होंने ‘नरम हिंदुत्व’ का प्रदर्शन किया, बल्कि घिनौने ऊंची-जातिवाद की शेखी भी बघारी. इससे पूरी निचली जातियां, खास कर दलित आसानी से उनसे अलग हो सकती हैं. वे बुजुर्ग गांधी (मोहनदास करमचंद) की तरह यह दावा क्यों नहीं कर सकते कि वे हिंदू होने के चलते अपनी मर्जी से एक भंगी हैं? यह कल्पना करना एक रणनीतिक दिवालियापन है कि वे अपने हिंदूपन और ब्राह्मणपन के बूते भाजपा को मात दे देंगे. बल्कि वे इस तरह भाजपा की सियासत को ही जायज ठहराते हैं, जैसा कि उनसे पहले के कांग्रेसी करते आए हैं.

बदकिस्मती से, जितना वक्त हमारे हाथ में है उसे देखते हुए, जनता के पास उन पर भरोसा करने के अलावा और कोई चारा नहीं है कि वे भारत को फासीवादी होने से बचाएंगे.

सावित्रीबाई फुले का संघर्ष भारतीय समाज के नवनिर्माण का संघर्ष था: डा. रामायन राम    

लेखक मंच - Mon, 08/01/2018 - 02:35

अमेठी : 3 जनवरी 2018 की सर्द सुबह देश के विभिन्न हिस्सों से जुटे साहित्यकार, लेखक, बुद्धिजीवी, शिक्षक सुल्तानपुर से लगे रामगंज बाजार के पास स्थित गाँव अग्रेसर में सावित्रीबाई फुले के जन्मदिन के अवसर पर ‘सावित्रीबाई फुले पुस्तकालय’ के उद्घाटन के साक्षी बने। पुस्तकालय का उद्घाटन प्रेमचंद, रेणु और श्रीलाल शुक्ल की परंपरा के वाहक और वारिस, ग्रामीण जीवन के यथार्थ के सजग चितेरे कथाकार शिवमूर्ति ने किया। इस पुस्तकालय का निर्माण इसी गांव में रहने वाली युवा लेखिका और शिक्षिका ममता सिंह ने अपने मित्रों, परिवार और स्थानीय लोगों की सहायता से किया है और वही इसका संयोजन, संचालन करेंगी।

उद्घाटन सत्र को संबोधित करते हुए कथाकार शिवमूर्ति ने अपने बचपन की यादें साझा कीं। उन्होंने बताया कि किस तरह उन्हें अपने बचपन में एक मित्र के यहाँ किताबें पढ़ने को मिलती थीं, जिससे उनके भीतर पढ़ने की जिज्ञासा और लालसा पैदा हुई। उन्‍होंने कहा कि जिस प्रकार हमारे पारिवारिक वारिस होते हैं, ठीक उसी प्रकार हमारे लेखकीय, साहित्यिक वारिस भी होते हैं। अगर मैं कहानीकार के रूप में अपने को प्रेमचंद, रेणु और संजीव का वारिस मानूं तो ममता के रूप में हमें हमारा साहित्यिक वारिस मिल गया है, जो हमारे लिए बहुत गौरव की बात है। सावित्रीबाई फुले के स्त्री शिक्षा और समाज में दिए योगदान को याद करते हुए शिवमूर्ति ने बताया कि जब सावित्रीबाई ने स्त्रियों के लिए विद्यालय खोलने का निर्णय लिया तो लोगों ने उन्हें अनेक प्रकार से तंग किया। विद्यालय जाते समय उनके ऊपर छतों पर से कूड़ा फेंका जाता था, किंतु वे अपने संकल्प पर अडिग रहीं और भारत की पहली महिला शिक्षिका के रूप में जानी गईं।

शिवमूर्ति जी ने पुस्तकालय को आधुनिक और डिजिटल बनाने की आवश्यकता पर भी बल दिया।

वरिष्ठ साहित्यकार प्रो. रामदेव शुक्ल ने  लेखि‍का बेबी हालदार की कहानी के ज़रिए बताया कि पढ़ने और लिखने के अवसर मनुष्य को किस तरह बदल देते हैं। घरों में चौका-बर्तन करने वाली  एक स्त्री को  लिखने-पढ़ने का अवसर मिला और आज वह अंतरराष्ट्रीय ख्याति की लेखिका हैं। ‘आलो आंधारि’ उनकी चर्चित पुस्तक है। उनके बच्चे बहुत गर्व से कहते हैं कि उनकी माँ ऑथर हैं ।

दिल्ली से आईं लेखिका और शिक्षिका मृदुला शुक्ल ने आज के समाज में स्त्रियों की भयानक दुर्दशा और शोषण के ज़रिए सावित्रीबाई फुले के संघर्षों के महत्व को याद किया। आज आधुनिक कहा जाने वाला हमारा समाज स्त्रियों को एक खास तरह की सामंती और पितृसत्तात्मक सोच के दायरे से बाहर निकल कर नहीं देख पाता तो डेढ़ सौ साल पहले के हमारे रूढ़िवादी समाज में स्त्रियों के लिए विद्यालय खोलने और स्त्री शिक्षा के लिए काम करने का निर्णय कितना चुनौतीपूर्ण रहा होगा, इसकी कल्पना की जा सकती है। उन्‍होंने सावित्रीबाई फुले को इस रूप में भी याद किया कि वे न होतीं तो शायद हमारी स्त्रियों को इस तरह के पढ़ने के मौके न मिल पाते।

पहले सत्र की अध्यक्षता ‘युग तेवर’ पत्रिका के संपादक कमल नयन पाण्डेय ने की। उन्‍होंने अपने वक्तव्य में बच्चों, स्त्रियों, युवाओं, किसानों, कामकाजी महिलाओं सभी के लिए पुस्तकें रखने का सुझाव दिया। संचालन पुस्तकालय के सह संयोजक गीतेश ने तथा धन्यवाद ज्ञापन पुस्तकालय की संयोजक ममता सिंह ने किया। अनेक शुभचिंतकों प्रो. राजेन्द्र कुमार, मीना राय, अनीस सिद्दीकी साहब आदि ने पुस्तकालय के लिए पुस्तकें भेंट की तथा शिवमूर्ति जी ने भविष्य में महत्वपूर्ण पुस्तकों, पत्रिकाओं के रूप में पुस्तकालय का सहयोग करते रहने का आश्वासन दिया।

पहला सावित्रीबाई फुले व्याख्यान

इस मौके पर ललितपुर से आए युवा आलोचक और जन संस्कृति मंच उत्‍तर प्रदेश के राज्य सचिव डॉ. रामायन राम ने पहला सावित्रीबाई फुले व्याख्यान दिया। उन्‍होंने न केवल सावित्रीबाई के स्त्री शिक्षा में योगदान को याद किया, बल्कि हमारे समाज के लिए सावित्रीबाई के संपूर्ण योगदान को रेखांकित किया। सावित्रीबाई फुले जब स्त्री शिक्षा के लिए निकलीं तो उनका विरोध सिर्फ रूढ़ विचार से ही नहीं, बल्कि शारीरिक हमलों के द्वारा भी किया गया। सावित्रीबाई फुले ने पुणे में विधवा गर्भवती स्त्रियों की प्रसूति के लिए आश्रम का निर्माण कराया तथा अपने जीवन काल में लगभग पाँच हजार ऐसी स्त्रियों को प्रसूति का अवसर उपलब्ध कराया। उन्होंने पूना में नाइयों की एक ऐतिहासिक हड़ताल कराई जिसमें शहर के नाइयों ने विधवा स्त्रियों का मुंडन करने से इन्कार कर दिया ।

रामायन ने इस बात की ओर ध्यान दिलाया कि हमारे समाज के वे तत्व जो जाति के भेदभाव और शोषण को और सघन बनाना चाहते थे, वे जानते थे कि सामंतवाद और स्त्री की यौनिकता पर नियंत्रण उनका प्रमुख हथियार होगा। यही कारण है कि सावित्रीबाई के प्रयासों का इतना भयंकर विरोध हुआ।

कोरेगांव में दलितों पर हुए ताजा हमले को याद करते हुए रामायन ने कहा कि आज की सामंती और साम्प्रदायिक ताकतें नया इतिहास गढ़ने का काम कर रही हैं और इसमें सोशल मीडिया पर झूठ और नफ़रत का जहर फैलाया जा रहा है, जिसके प्रतिरोध के लिए हमें किताबों की दुनिया में जाना होगा। यह पुस्तकालय इस लिहाज़ से भी एक महत्त्वपूर्ण पहल है।

अंत में रामायन राम ने सावित्रीबाई फुले की मौत को भी एक महान और प्रेरक मौत की तरह याद किया। उन्होंने बताया कि जब पुणे में प्लेग की महामारी फैली थी तो प्लेग रोगियों की सेवा करते हुए वे बीमार हुईं जो उनकी मौत का सबब बना, किंतु वे अपने अंतिम समय तक रोगियों की सेवा में लगी रहीं। सावित्रीबाई फुले का अभियान केवल शिक्षा के लिए नहीं था। वह भारतीय समाज के नवनिर्माण का आन्दोलन था। शिक्षा से शुरू करके उन्होंने स्त्री मुक्ति तक का सफर तय किया जो जाति उन्मूलन की लड़ाई से जुड़ा, जिसे बाद में अम्बेडकर ने हिन्दू कोड बिल के जरिए उठाया। लोकतंत्र, समता, बराबरी अचानक से नहीं आते हैं। वे समाज के भीतर के आंतरिक संघर्षों और विचार को लेकर लोगों के संघर्ष से आता है। भारतीय समाज एक जटिल समाज है, इसमें आधुनिकता के एक-एक कदम के लिए संघर्ष करना पड़ा है। सावित्रीबाई फुले ने ऐसे ही समाज के भीतर स्त्री शिक्षा और विधवा पुनर्वास के लिए संघर्ष किया। यह सिर्फ स्त्री शिक्षा के लिए चलने वाला आन्दोलन नहीं था, बल्कि समाज को भीतर से बदलने वाला, उसे जड़ से हिलाने वाला आन्दोलन/अभियान था। सावित्रीबाई फुले के इस आन्दोलन को आज फिर से नए सिरे से शुरू करने का समय है, जिसका एक रूप यह पुस्तकालय है।

सावित्रीबाई के नाम पर आयोजित यह व्याख्यान वार्षिक रूप में उनके जन्मदिन पर मनाने की योजना है।

हिंदी की साहित्यिक पत्रिका ‘कथा’ का लोकार्पण

तमाम तामझाम से दूर ‘कथा’ के 21वें अंक का लोकार्पण ‘सावित्रीबाई फुले पुस्तकालय’ अग्रेसर के उद्घाटन समारोह के दौरान  सादगी के साथ हुआ।   कथा के संपादक दुर्गा सिंह, कथाकार शिवमूर्ति, प्रो. प्रणय कृष्ण, प्रो. रामदेव शुक्ल और कमल नयन पाण्डेय ने पत्रिका का लोकार्पण किया। कथा का यह अंक अपनी सामग्री में बहुत समृद्ध और पठनीय है। पत्रिका का प्रकाशन कथाकार मार्कण्डेय की परंपरा को आगे बढ़ाने वाला है तथा सम्पादक दुर्गा सिंह से उम्मीद है कि इसे आगे भी जारी रखेंगे।

 रंगकर्मी, निर्देशक सफ़दर हाशमी की शहादत को याद किया गया

‘समकालीन जनमत’ के संपादक केके पाण्डेय ने इस अवसर पर रंगकर्मी, निर्देशक सफ़दर हाशमी की शहादत को याद किया। सफ़दर को याद करते हुए  पाण्डेय ने उनकी रंगकर्म के प्रति निष्ठा, राजनीतिक चेतना, किसान-मजदूरों के बीच उनके काम और उनकी लोकप्रियता का जिक्र किया तथा उनकी एक कविता का पाठ भी किया जो पुस्तकालय स्थापना के लिहाज से भी बहुत मौजूँ है-

किताबें करती हैं बातें
बीते जमानों की
दुनिया की, इंसानों की
आज की कल की
एक-एक पल की।
खुशियों की, गमों की
फूलों की, बमों की
जीत की, हार की
प्यार की, मार की।
सुनोगे नहीं क्या
किताबों की बातें?

 पुस्तकालय का एक हॉल होगा त्रिलोचन के नाम पर

पुस्तकालय से जुड़े हुए एक रीडिंग हॉल को सुल्तानपुर की धरती के महाकवि त्रिलोचन के नाम पर ‘त्रिलोचन सभागार’ नाम दिया गया। ललित कला अकादमी से पुरस्कृत चित्रकार प्रभाकर राय द्वारा बनाये गए त्रिलोचन के पोर्ट्रेट कथाकार शिवमूर्ति ने ममता सिंह को भेंट किया,  जिसे हॉल में लगाया जाएगा।

दूसरा सत्र रहा कविताओं के नाम

 कार्यक्रम के दूसरे सत्र में केके पाण्डेय के संचालन में कविता पाठ हुआ जिसमें सर्वश्री ओमप्रकाश मिश्र, प्रदीप कुमार सिंह,  डॉ. सी.बी. भारती, अनिल सिंह , बृजेश यादव,  मृदुला शुक्ल, आशा राम जागरथ और बालेन्द्र परसाई ने कविता पाठ किया।

इस गरिमामय आयोजन में मध्य प्रदेश के पिपरिया से एकलव्य के गोपाल राठी ने शिरकत। उन्‍होंने अपने विचार साझा करते हुए पाठकों की गिरती संख्या और पढ़ने के प्रति अरुचि पर चिंता जाहिर की और इस विपरीत समय में इस प्रयास की सराहना की। कार्यक्रम में ममता सिंह की अर्मेनियाई मित्र  लूसी ने  अपने हिंदी भाषा के प्रति प्रेम को व्यक्त किया। अनुराग सिंह ने इस पूरे कार्यक्रम को अपने सपने के पूरा होने की शुरुआत के रूप में रेखांकित किया। इस कार्यक्रम में सम्भावना कला मंच, गाजीपुर  के राजकुमार, ममता और  टीम ने शानदार कविता पोस्टर  तैयार किये और प्रदर्शनी लगायी। कार्यक्रम में उपस्थित अनेक मित्रों ने अपने यहाँ भी इस तरह की पहल का वायदा किया और हम उम्मीद करते हैं कि इस अभियान का हम अन्य जगहों पर तेजी से प्रसार कर सकेंगे।

गीतेश सिंह द्वारा सावित्रीबाई फुले पुस्तकालय के लिए जारी

अगर औद्योगिक विकास और रोज़गार नहीं बढे तो बेरोज़गार नौजवानों का असंतोष बढेगा

जंतर-मंतर - Fri, 05/01/2018 - 09:02

शेष नारायण सिंह
प्रधानमंत्री ने देश में औद्योगिकीकरण के ज़रिये रोज़गार बढ़ाने और सम्पन्नता की बात अपने २०१३-१४ के चुनावी अभियान में की थी . सरकार में आने के बाद उन्होने इस काम को पूरा करने के लिए कई तरह की पहल भी की . मेक इन इण्डिया, स्टार्ट अप इण्डिया ,कौशल विकास, मुद्रा ,सौ स्मार्ट शहर आदि योजनायें  इसी लक्ष्य को हासिल  करने के लिए घोषित की गईं थीं .  लेकिन संबंधित विभागों विभागों के मंत्री ऐसे मिले कि कहीं कुछ  शुरू ही नहीं हो सका  . कौशल विकास के मंत्री को हटाया भी लेकिन उसके बाद भी कहीं कुछ नज़र नहीं आया. वास्तव में औद्योगिक विकास में केंद्र सरकार की भूमिका नीतियों तक ही  होती है. ज़मीन पर उनको लागू करने का काम राज्य सरकारों का होता है . ऐसा लगता  है कि या तो राज्य  सरकारों ने प्रधानमंत्री की घोषणाओं को ज़रूरी अहमियत नहीं दी या उनको पता ही नहीं था कि उद्योगों को ही विकास का इंजन बनाने से सम्पन्नता आती है और उसके लिए करना क्या है . दिल्ली से लगे हुए फरीदाबाद, गुरुग्राम, सोनीपत, गाज़ियाबाद, गौतमबुद्ध नगर जिलों में जो गतिविधियाँ चल रही थीं, वे भी लगभग ठप्प ही पड़ी हैं . नए उद्योग न लगने से माहौल में निराशा बढ़ रही  है और देश के अलग अलग क्षेत्रों से नौजवानों के असंतोष की ख़बरें आ रही हैं . गुजरात का आन्दोलन सबने देखा और अब महाराष्ट्र से भी युवकों में बड़े पैमाने पर असंतोष की ख़बरें आ रही हैं . इन घटनाओं का तात्कालिक कारण जो भी हो सबके मूल में मुख्य कारण एक ही है. बहुत बड़े पैमाने पर बेरोजगार नौजवान किसी भी विरोध प्रदर्शन के आवाहन पर मैदान ले रहे हैं . एक बार चिंगारी लग जाने के बाद आन्दोलन तरह तरह के रूप लेने लगते हैं. इनका हल समस्या की जड़ में जाकर ही पाया जा सकता है .इस संतोष को कानून और व्यवस्था की बात मानना बिलकुल गलत होता है . नौजवानों को किसी काम से लगाया जाना चाहिये  . इसके लिए राज्यों में औद्योगिक  विकास को बढ़ावा देना ज़रूरी  है .संतोष की बात यह है कि राज्य सरकारों को यह बात समझ में आना शुरू हो गयी है .पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने बंगाल ग्लोबल समिट  २०१८ का आयोजन किया है . जनवरी के तीसरे हफ्ते में कोलकता में पूरी दुनिया के  उद्योगपतियों को आमंत्रित किया गया है . जहां उनको बंगाल में उद्योग लगाने के लिए प्रेरित किया जाएगा और स्थिर विकास और रोज़गार के अधिक से अधिक अवसर उपलब्ध करवाने के लिए प्रयास किया जाएगा . बंगाल के बाद असम में भी पहली बार ग्लोबल इन्वेस्टर समिट  का आयोजन किया जा रहा है .३ फरवरी को होने वाले इस शिखर सम्मलेन का उदघाटन ,प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी करेंगे .असम में हर १६० किलोमीटर पर एक  बड़ा आद्योगिक क्षेत्र स्थापित करने की योजना है . राज्य सरकार ने निवेश बढाने के लिए उद्योग नीति में भी ज़रूरी बदलाव कर दिया है . राज्य की चीनी नीति में भी बदलाव कर दिया गया है और उम्मीद की जा रही है कि शिखर सम्मलेन के बाद राज्य में चीनी मिलें लगेंगी और गन्ना की खेती को भी प्रोत्साहन मिलेगा .बंगाल कभी देश की औद्योगिक गतिविधियों का केंद्र  हुआ करता था. राज्य सरकार अपनी पुरानी विरासत को फिर से  पाने की कोशिश कर रही है लेकिन असम में चाय  बागानों के अलावा और कोई ख़ास गतिविधि थी ही नहीं, वह नए सिरे से देश के औद्योगिक विकास के नक्शे पर नज़र आने की कोशिश कर रहा है . उत्तर प्रदेश में भी २१-२२ फरवरी को लखनऊ में इन्वेस्टर समिट होने जा रही है . दिल्ली से सटे हुए उत्तर प्रदेश सरकार के गाजियाबाद और गौतमबुद्ध नगर जिले हैं . यहाँ बहुत बड़े पैमाने पर औद्यगिक विकास के लिए बुनियादी ढांचे लगाए गए हैं .लेकिन कानून व्यवस्था और सरकारों के अल्गर्ज़ रुख के कारण कुछ ख़ास  हो नहीं पा रहा है . ज्यादातर सरकारें यही सोचती रहीं कि उद्योग लगाने वाले अपने आप दौड़े चले  आयेगें . लेकिन यह गलत सोच थी . गुजरात जैसे राज्य दुनिया भर के उद्योगपतियों को अपनी तरफ खींचने के लिए तरह तरह की सुविधाएं देते थे . लोग उन्हीं राज्यों में  जाते रहे . अपने कार्यकाल के अंतिम दो वर्षों में अखिलेश यादव ने राज्य में उद्योग लगवाने और बुनियादी ढाँचे के विकास के लिए गंभीर प्रयास किया था . करीब पचास हज़ार करोड़ के औद्योगिक निवेश के समझौते भी हुए थे लेकिन असली निवेश पांच सौ करोड़ से कम ही हुआ . उनके पास समय कम था और  उनके परिवार के लोग भी उनकी टांग पूरी तरह से खींचते रहे . अपने कार्यकाल के अंतिम  दो वर्षों में उन्होंने खुद फैसले लेने का फैसला किया . नतीजा या हुआ कि बुनियादी ढाँचे और निवेश की दिशा में कुछ अहम क़दम उठाये गए लेकिन तब तक देर हो चुकी थी.आगरा-लखनऊ सडक एक प्रमुख उदाहरण है . विधान सभा चुनाव आये और निजाम बदल गया .उतर प्रदेश के नए मुख्यमंत्री ने राज्य में औद्योगिक विकास के लिए कुछ  क़दम उठाया है .. इसी सिलसिले में वे हैदराबाद, बंगलूरू और मुंबई गए थे . मुंबई में उन्होंने बाकायदा रोड शो किया . देश के बहुत बड़े उद्यमियों से मुलाक़ात की . रतन टाटा, मुकेश अंबानी, एचडीएफसी के दीपक पारेख के अलावा कुमारमंगलम बिड़ला ग्रुप, महिंद्रा, एलएंडटी, टोरंट ग्रुप,बजाज ग्रुप के प्रतिनिधियों ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मुलाकात की और प्रदेश में निवेश में रूचि दिखाई .सभी उद्यमियों ने कानून व्यवस्था की बात को गंभीरता से उठाया क्योंकि जैसी कानून व्यवस्था गाज़ियाबाद,नोयडा और ग्रेटर नोयडा में हैं उसके सहारे तो कोई भी उद्योगपति यहाँ उद्योग नहीं लगाना चाहेगा .मुख्यमंत्री ने भरोसा दिलाया कि कानून व्यवस्था की स्थति सुधर रही है. उसको और भी मज़बूत किया जायेगा ..आम तौर पर इस तरह के रोड शो के बाद मान लिया जाता  है कि सब ठीक   हो गया है लेकिन इस बार उत्तर प्रदेश में ऐसा नहीं हो रहा है.जो भी बातें योगी की मुंबई यात्रा के दौरान हुयी हैं उनके फालो अप के लिए एक कोर कमेटी बनाई गयी  है. इस कमेटी में उद्योग मंत्री सतीश महाना के अलावा इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट के कमिश्नर अनूप पाण्डेय , औद्योगिक विकास के प्रमुख सचिव आलोक सिन्हा और  खादी एवं  हैंडलूम के प्रमुख सचिव नवनीत सहगल को शामिल किया गया है .मुख्यमंत्री के सूचना सलाहकार मृत्युंजय कुमार ने बताया कि हर बड़े औद्योगिक केंद्र के लिए बिलकुल अलग नीतियाँ रहेंगी. उसमें किसी तरह की दुविधा नहीं है .  मुख्यमंत्री फरवरी में होने वाली इन्वेस्टर सम्मिट के लिए निजी तौर पर हर काम की निगरानी कर रहे हैं . अधिकारियों को ज़िम्मा दिया गया है कि मुख्यमंत्री से बातचीत में उद्योगपतियों ने जो वायदे किये हैं उनका सही फालो अप किया जाए .
यह सारी बातें तो पिछली सरकारों में भी होती रही हैं लेकिन ज़रूरी है कि बुंदेलखंड और पूर्वांचल के पिछड़े जिलों में बड़े पैमाने पर औद्योगिक निवेश की हालात पैदा किये जाएँ .अगर बुन्देलखंड और पूर्वांचल को प्राथमिकता दी गयी तो फर्क पडेगा और यही योगी सरकार की परीक्षा भी है . यह दोनों ही इलाके राज्य में सबसे पिछड़े और पीड़ित हैं . ग्रामीण नौजवानों की बहुत बड़ी संख्या इन्हीं इलाकों से बड़े शहरों के लिए पलायन करती है . सरकार को प्रयास करना चाहिए  कि इन क्षेत्रों में उद्योग लगाये और उसके  साथ साथ ऐसे नए शहरों की स्थापना की जाए जहां उद्योगों में काम करने वाले लोगों को शिक्षा,इलाज और यातायात की सुविधा मिल सके. खेती से सम्बंधित उद्योगों की भी बड़े पैमाने पर स्थापना होनी चाहिए जिससे किसान को खेती छोड़ कर  मजदूरी करने के लिए मजबूर  न होना पड़े. इन कार्यों के  लिए राजनीतिक इच्छा शक्ति सबसे ज़रूरी शर्त है लेकिन उनको लागू करने के लिए सक्षम नौकरशाही भी बहुत ज़रूरी है . यह देखना दिलचस्प होगा कि योगी सरकार पूर्वाग्रहों से मुक्त होकर क्या राज्य के विकास के लिए ज़रूरी राजनीतिक इच्छाशक्ति जुटाकर राज्य के हित में मज़बूत फैसले ले सकती है कि नहीं . हालांकि सरकार की तरफ से यह दावा किया गया कि सब को मिलाजुला कर काम किया जा रहा है .उत्तर प्रदेश में पिछले पचीस वर्षों में विकास की सारी योजनायें मुकामी विधायकों और सांसदों की लालच की भेंट चढ़ जाती रही हैं . गौतमबुद्ध नगर जिले में देखा गया है कि हर विकास कार्य  राजनीतिक नेताओं और दलालों की स्वार्थ की भेंट चढ़ जाता है . तर्क यह भी दिया जाता रहा है कि मायावती और अखिलेश यादव के अलावा सभी सरकारें गठबंधन सरकारें थीं इसलिए सहयोगी पार्टियों और नेताओं की मनमानी को रोकना संभव नहीं था .वर्तमान सरकार में भी पुरानी सरकारों के बहुत सारे कार्यकर्ता हिन्दू युवा वाहिनी के सदस्य के रूप में अपना धंधा शुरू करने की कोशिश कर रहे हैं . योगी सरकार को इन तत्वों पर लगाम लगाना होगा . कुछ  मंत्री और नेता अभी भी वसूली के काम में पहले की तरह की लग गए हैं .इन लोगों को भी काबू में करना पडेगा .अगर सही औद्योगिक विकास का इंजन मुख्यमंत्री की निजी निगरानी में चल पडेगा तो राज्य में आर्थिक विकास  की संभावना बढ़ेगी और छोटे मोटे दलाल और नेता खुद ही शांत हो जायेगें . राज्य सरकार को यह समझना पडेगा कि तेज़ औद्योगिक विकास के बिना न तो बेरोजगारी की समस्या ख़त्म होगी और न ही आम नागरिक का जीवन सुगम होगा .और अगर  नौजवानों में बेरोजगारी की समस्या ख़त्म न हुयी तो असंतोष की जो ज्वाला महाराष्ट्र में देखने को मिली है वह उत्तर प्रदेश में भी देखी जायेगी . शिक्षा माफिया , नक़ल माफिया आदि से भी राज्य को मुक्त कराना पडेगा . इस तरह के ज़्यादातर अपराधी देश के भविष्य के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं . इनको हर हाल में नेस्तनाबूद करना पड़ेगा . यह  आसान नहीं है क्योंकि शिक्षा माफिया तो ज्यादातर सत्ताधारी पार्टी और विपक्षी पार्टी के नेता ही हैं . इनकी गतिविधियों के कारण जो बच्चे यहाँ से शिक्षा लेकर काम की तलाश में निकलते हैं , उनको कहीं काम नहीं मिलता. इसलिए औद्योगिक विकास से रोज़गार पैदा करने के साथ साथ समाज में शिक्षा के नाम पर हो रही ठगी को भी रोकना होगा .

उत्तर कर्नाटक में किसानों का आन्दोलन ९०० दिन से लगातार जारी

जंतर-मंतर - Fri, 05/01/2018 - 08:59

शेष नारायण सिंह
बंगलूरू ,२ जनवरी . उत्तर कर्नाटक के गदग जिले के नारगुंड में चल रहे किसानों का संघर्ष ९०० दिन से अधिक से लगातार जारी है. महादायी नदी के पानी में  कर्नाटक के अधिकार को लेकर चल रहा आन्दोलन राज्य के इतिहास में सबसे अधिक समय तक चलने वाला किसान आन्दोलन है .किसानों ने नए साल पर संकल्प लिया है कि जब तक मामले का संतोषजनक हल नहीं हो जाता ,संघर्ष जारी रहेगा .कर्नाटक रैयत सेना के अध्यक्ष वीरेश सोबरदमथ का कहना है कि किसानों की एक ही मांग है कि गोवा और महाराष्ट्र की ओर से कलसा-बन्दूरी नहर प्रोजेक्ट में पड़ रहे अड़ंगे का हल निकाल लिया जाए . जिससे ७.५ टी एम सी पानी  मलप्रभा नदी में डाला जा सके .कई दशक से सूखा पड़ रहा है और सरकार से किसी तरह की मदद नहीं मिल रही है  . कर्नाटक रैयत सेना इस आन्दोलन की अगुवाई कार रही  है . वीरेश सोबरदमथ का कहना है कि २००९ की बाढ़ के बाद उत्तर कर्नाटक में जो सूखा  पड़ा उसने किसानों को तबाह कर दिया . पानी के बंटवारे को लेकर नेताओं की बेरुखी ने  किसानों को कहीं का नहीं छोड़ा है .उनका दावा है कि उनको संघर्ष का रास्ता  मजबूरी में अपनाना पड़ा है .  किसानों का दावा है कि अगर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किसानों की मांग पर सकारात्मक रुख अपनाया होता और गोवा ,महारष्ट्र और कर्नाटक के मुख्यमंत्रियों के बीच एक सर्वमान्य हल निकलवाया होता तो समस्या कभी की हल हो चुकी होती .

कर्नाटक विधानसभा चुनाव में नदी जल बंटवारा भी एक मुद्दा

जंतर-मंतर - Fri, 05/01/2018 - 08:58

शेष नारायण सिंह 
बंगलूरू, ३० दिसंबर. कर्णाटक में चुनाव में जातियां प्रमुख भूमिका निभाती हैं ,लेकिन इस बार  गोवा और कर्नाटक के बीच में महादायी नदी के पानी के बंटवारे को मुख्यमंत्री सिद्दिरमैया ने बड़ा मुद्दा बना दिया है . राज्य के पांच उत्तरी  जिलों में यह विवाद राजनीति का मुख्य मुद्दा है . गदग,धारवाड़ बेलगावी ,हावेरी,और बागलकोट जिलों की पानी की ज़रूरत को पूरा करने में महादायी नदी का बड़ा योगदान है .इन राज्यों में बाक़ायदा बंद का नारा दिया गया ज बहुत ही सफल रहा . गोवा सरकार और उसके मुख्यमंत्री मनोहर पर्रीकर के खिलाफ हुए इस बंद में किसान संगठनों की मुख्य भूमिका थी लेकिन फिल्म उद्योग सहित और भी कई संगठनों ने बंद का समर्थन किया .
महादायी नदी को  गोवा में मंडोवी नदी कहते हैं . दोनों राज्यों के बीच तीस साल से पानी के बंटवारे के बारे में विवाद चल रहा है . बात बहुत बढ़ गयी जब २००२ में कर्नाटक के तत्कालीन मुख्यमंत्री एस एम कृष्णा ने महादायी की दो सहायक  नदियों पर बाँध बना कर सूखा प्रभावित उत्तर कर्नाटक के जिलों के लिए पानी का इंतज़ाम करने के लिए बाँध बनाने का फैसला किया . केंद्र की अटल बिहारी बाजपेयी सरकार ने मंजूरी भी दे दी लेकिन गोवा के मुख्यमंत्री ने अडंगा लगा दिया . मनोहर पर्रीकर ही तब भी मुख्यमंत्री थे.
कर्णाटक के मुख्यमंत्री सिद्दिरमैया ने आरोप लगाया है कि गोवा के भाजपाई मुख्यमंत्री पानी नहीं दे रहे हैं और राज्य के बीजेपी नेता कुछ भी नहीं कर रहे हैं . उनका आरोप  है कि पानी की कमी के लिए बीजेपी ही ज़िम्मेदार है. उत्तर कर्णाटक में चल  रहे आन्दोलन के नेता भी मुख्यमंत्री की बात को सही मान रहे  हैं .वे भी बीजेपी के कर्णाटक अध्यक्ष बी एस येदुरप्पा को ही सारी मुसीबत के लिए ज़िम्मेदार साबित करने की कोशिश का रहे हैं .येदुरप्पा के नाम गोवा के मुख्यमंत्री ने एक चिट्ठी भी लिख दी है लेकिन आन्दोलन कारी कहते हैं कि किसी पार्टी नहीं राज्य सरकार के पास चिट्ठी आनी चाहिए थी. चुनाव नतीजों पर महादायी नदी का पानी एक अहम भूमिका निभाने वाला है . आज बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह बेंगलूरू पंहुच रहे हैं उनका राज्य के नेताओं से बेंगलूरू में मिलकर चुनाव की तैयारी की समीक्षा की योजना है. दस जनवरी से वे यहाँ सघन अभियान चलाने वाले हैं.  अमित शाह चुनाव जीतने की कला  के ज्ञाता हैं . चर्चा यह भी है कि क्या वे गुजरात की तरह वे कर्णाटक में भी जीत दर्ज कर  पाते हैं कि नहीं .

कर्नाटक विधानसभा चुनाव येदुरप्पा और सिद्दिरमैया की हैसियत का पैमाना होगा

जंतर-मंतर - Fri, 05/01/2018 - 08:56


शेष नारायण सिंह  

गुजरात के बाद अगला बड़ा चुनाव कर्णाटक विधान सभा का होगा . चुनाव की तैयारी  पूरी शिद्दत से शुरू ही गयी है . बीजेपी ने भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों के बाद  तत्कालीन मुख्यमंत्री येदुरप्पा को हटा दिया था  लेकिन अब उनके पास ही राज्य में पार्टी की कमान थमा है . पार्टी में भारी मतभेद हैं  लेकिन  पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ने उम्मीद का दिया जला दिया है . अमित शाह मूल रूप से आशावादी हैं . उन्होंने आशा की किरण तो  त्रिपुरा और केरल में भी दिखाना शुरू कर दिया है , कर्नाटक में तो खैर उनकी अपनी सरकार रह चुकी है .अब  बीजेपी को राजनीतिक जीवन में शुचिता भी बहुत ज़्यादा नहीं चाहिए क्योंकि हाल के यू पी और उत्तराखंड के  विधानसभा चुनावों में पार्टी ने कांग्रेस सहित विपक्षी पार्टियों के उन नेताओं को टिकट दिया और मंत्री बनाया जिनके खिलाफ बीजेपी के ही प्रवक्ता  गंभीर भ्रष्टाचार के आरोप लगाते रहते तह. गोवा और मणिपुर में भी जिस स्टाइल में सरकारें बनायी  गयीं, वह भी बीजेपी की पुरानी वाली शुचिता की राजनीति से बहुत दूर माना जा रहा है . इस पृष्ठभूमि में जब दोबारा येदुरप्पा को कर्नाटक की पार्टी सौंपने का  फैसला आया तो कोई ख़ास चर्चा नहीं हुयी.कर्नाटक की प्रभावशाली जाति लिंगायत से आने वाले  येदुरप्पा का प्रभाव राज्य में है .पार्टी को उम्मीद है कि लिंगायत समूह का साथ तो मिल ही जाएगा और अगर पार्टी के अन्य बड़े नेता ईश्वरप्पा का जातिगत असर चल गया तो अच्छी संख्या में समर्थन मिल जाएगा  . यह देखना दिलचस्प कि कुरुबा जाति के ईश्वरप्पा  की ही बिरादरी के मुख्यमंत्री सिद्दिरमैया भी हैं . उनकी जाति की संख्या खासी है .जाति के दोनों नेता आमने सामने हैं ,नतीजों पर इस का भी असर पडेगा .
विधान सभा चुनावों की तैयारी सिद्दिरमैया ने बहुत पहले से शुरू कर दी थी  . उन्होंने दलितों को अपने कार्यकाल की शुरुआत से ही साधना शुरू कर दिया था. दलितों के लाभ के लिए मुख्यमंत्री ने २०१७ के बजट में  ही  बहुत सारी योजनायें लागू कर दी थीं .बजट के बाद भी ऐसी योजनाओं की घोषणा की जिसके तहत जून २०१७ में ही दलितों के लिए बहुत सारी योजनायें तुरंत प्रभाव से लागू की कर दी गईं . सरकारी संस्थाओं में उच्च शिक्षा प्राप्त कर रहे दलित छात्रों को मुफ्त में लैपटाप तो पहले से ही था , अब  निजी स्कूल कालेजों में पढने वाले  दलित छात्रों को भी यह सुविधा दी जा रही है .दलित छात्रों को   बस पास बिलकुल मुफ्त में मिलता है.  . दलित जाति के लोगों को ट्रैक्टर या टैक्सी खरीदने पर  दो लाख रूपये की सब्सिडी  मिलती थी ,उसको अब  तीन लाख कर दिया गया है . ठेके  पर काम करने वाले गरीब मजदूरों , पौरकार्मिकों, को अब तक रहने लायक घर बनाने के लिए  दो लाख रूपये का अनुदान मिलता था,अब उसे चार लाख कर दिया गया है .  यह सब काम डेढ़ साल पहले से ही योजनाबद्ध तरीके से किया जा रहा है .
कर्णाटक में  माना जाता था कि वोक्कालिगा और लिंगायत, संख्या के हिसाब से  प्रभावशाली जातियां हैं . सत्ता में आने के बाद मुख्यमंत्री सिद्दिरमैया  ने जाति के आधार पर जनगणना करवाई . इस जनगणना के नतीजे सार्वजनिक नहीं किये जाने थे लेकिन करीब दो साल पहले  कुछ पत्रकारों के मार्फ़त यह जानकारी सार्वजनिक कर दी गयी  . सिद्दिरामैया की जाति के लोगों की संख्या ४३ लाख यानी करीब ७ प्रतिशत बतायी गयी . यह जानकारी अब पब्लिक डोमेन में आ गयी है जिसको सही माना जा रहा है. इस नई जानकारी के  बाद कर्णाटक की चुनावी राजनीति का हिसाब किताब बिलकुल नए सिरे से शुरू हो गया है .नई जानकारी के बाद लिंगायत ९.८ प्रतिशत और वोक्कालिगा ८.१६ प्रतिशत रह गए हैं .  कुरुबा ७.१ प्रतिशत , मुसलमान १२.५ प्रतिशत ,  दलित २५ प्रतिशत ( अनुसूचित  जाती १८ प्रतिशत और अनुसूचित जन जाति ७ प्रतिशत ) और ब्राह्मण २.१ प्रतिशत की संख्या में राज्य में रहते हैं .अब तक कर्नाटक में माना जाता था कि लिंगायतों की संख्या १७ प्रतिशत है और वोक्कालिगा १२ प्रतिशत हैं . इन आंकड़ों को कहाँ से निकाला गया ,यह किसी को पता नहीं था लेकिन यही आंकड़े चल रहे थे और सारा चुनावी विमर्श इसी पर केन्द्रित हुआ करता था  . नए आंकड़ों के आने के बाद सारे समीकरण बदल गए हैं .  इन आंकड़ों की विश्वसनीयता पर भी सवाल राज्य की प्रभावशाली जातियों ने सवाल उठाये हैं लेकिन यह भी सच है कि दलित  नेता इस बाद को बहुत पहले से कहते  हैं . दावा किया जाता रहा है कि अहिन्दा ( अल्पसंख्यक,हिन्दुलिदा यानी ओबीसी  और दलित )  वर्ग एक ज़बरदस्त समूह है . जानकार मानते हैं  कि  समाजवादी सिद्दिरामैया ने चुनावी फायदे के लिए अहिन्दा का गठन गुप्त रूप से करवाया  है . मुसलमान , दलित और सिद्दिरामैया की अपनी जाति कुरुबा मिलकर करीब ४४ प्रतिशत की आबादी बनते हैं .  जोकि मुख्यमंत्री के लिए बहुत उत्साह का कारण हो सकता है .इसीलिये दलितों को साथ लेने के लिए मुख्यमंत्री ने अपने कार्यकाल के शुरू से ही कई योजनाओं को लागू किया था .
जातियों के आधार पर चुनाव के गणित को उत्तर प्रदेश विधानसभा के लिए हुए चुनावों में बुरी तरह से चुनौती मिल चुकी है .वहां नरेंद्र मोदी की लहर में सभी जातियों के कुछ लोगों ने बीजेपी को  वोट दिया लेकिन  कर्नाटक में ऐसी कोई लहर नहीं दिख रही है . ज़ाहिर है यहाँ विकास और राज्य स्तर के मुद्दे चुनाव को प्रभावित करेंगे .
जातियों के इस भ्रम जाल में एक और मुद्दा पूरी गंभीरता से चुनाव में शामिल हो गया है . गोवा और कर्नाटक के बीच में महादायी नदी के पानी के बंटवारे पर आजकल राज्य में ज़बरदस्त राजनीति चल रही है . राज्य के पांच उत्तरी  जिलों में यह विवाद राजनीति का मुख्य मुद्दा है . गदग,धारवाड़ बेलगावी ,हावेरी,और बागलकोट जिलों की पानी की ज़रूरत को पूरा करने में महादायी नदी का बड़ा योगदान है .इन राज्यों में बाक़ायदा बंद का नारा दिया गया ज बहुत ही सफल रहा . गोवा सरकार और उसके मुख्यमंत्री मनोहर पर्रीकर के खिलाफ हुए इस बंद में किसान संगठनों की मुख्य भूमिका थी लेकिन फिल्म उद्योग सहित और भी कई संगठनों ने बंद का समर्थन किया .
महादायी नदी को  गोवा में मंडोवी नदी कहते हैं . दोनों राज्यों के बीच तीस साल से पानी के बंटवारे के बारे में विवाद चल रहा है . बात बहुत बढ़ गयी जब २००२ में कर्नाटक के तत्कालीन मुख्यमंत्री एस एम कृष्णा ने महादायी की दो सहायक  नदियों पर बाँध बना कर सूखा प्रभावित उत्तर कर्नाटक के जिलों के लिए पानी का इंतज़ाम करने के लिए बाँध बनाने का फैसला किया . केंद्र की अटल बिहारी बाजपेयी सरकार ने मंजूरी भी दे दी लेकिन गोवा के मुख्यमंत्री ने अडंगा लगा दिया . मनोहर पर्रीकर ही तब भी मुख्यमंत्री थे.
कर्णाटक के मुख्यमंत्री सिद्दिरमैया ने आरोप लगाया है कि गोवा के भाजपाई मुख्यमंत्री पानी नहीं दे रहे हैं और राज्य के बीजेपी नेता कुछ भी नहीं कर रहे हैं . उनका आरोप  है कि पानी की कमी के लिए बीजेपी ही ज़िम्मेदार है. उत्तर कर्णाटक में चल  रहे आन्दोलन के नेता भी मुख्यमंत्री की बात को सही मान रहे  हैं .वे भी बीजेपी के कर्णाटक अध्यक्ष बी एस येदुरप्पा को ही सारी मुसीबत के लिए ज़िम्मेदार साबित करने की कोशिश का रहे हैं .येदुरप्पा के नाम गोवा के मुख्यमंत्री ने एक चिट्ठी भी लिख दी है लेकिन आन्दोलन कारी कहते हैं कि किसी पार्टी नहीं राज्य सरकार के पास चिट्ठी आनी चाहिए थी. चुनाव नतीजों पर महादायी नदी का पानी एक अहम भूमिका निभाने वाला है . दिसम्बर के अंतिम दिन बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह का राज्य के नेताओं से बेंगलूरू में मिलकर चुनाव की तैयारी की समीक्षा की योजना है. दस जनवरी से वे यहाँ सघन अभियान चलाने वाले हैं.  अमित शाह चुनाव जीतने की कला  के ज्ञाता हैं . देखना होगा कि गुजरात की तरह वे कर्णाटक में भी जीत दर्ज कर  पाते हैं कि नहीं .
चुनाव अभियान शुरू हो गया है लेकिन अभी चर्चा में पूर्व प्रधानमंत्री एच डी देवेगौडा की पार्टी का ज़िक्र बहुत कम आ रहा है . उनके बेटे एच डी कुमारस्वामी मज़बूत नेता रहे हैं , मुख्यमंत्री भी रह चुके हैं लेकिन अब लगता है कि अमित शाह के पूरे समर्थन से मैदान में आये येदुरप्पा और कांग्रेस की अकेली उम्मीद सिद्दिरमैया के बीच होने जा रहे चुनाव में वे या तो वोटकटवा साबित होंगें या किसी के साथ मिल जायेगें .

नववर्ष की पहली चाय की प्याली में 2018 का तूफान.....

सत्ता का राष्ट्रप्रेम ..विपक्ष की राजनीतिक शून्यता ...संघ पर अंधेरे के बादल

चाय में तूफान....सुना था . पर पहली बार महसूस किया..जब चाय की चुस्की के बीच कांग्रेस के दौर में लूटते देश से भी बुरी लकीर 2018-19 में कोई शख्सये कहकर  बताने लगा कि हालात तो मरने-मारने वाले होंगे । सवाल पेट से जुड़ रहा है । जो असंभव सियासी हालात को एकजुट करेगी और सामाजिक अंतर्विरोध भी विरोध के लिये एक साथ खडे होंगे । तो कल्पना कीजिय बीजेपी का भविष्य क्या होगा । बात तो अटल बिहारी वाजपेयी जी के जन्मदिन के दिन वाजपेयी जी के सक्रिय होने के दौर को याद करने से शुरु हुई थी । और संयोग से बातचीत का सिलसिला इस सच के साथ के साथ शुरु हुआ कि जो शख्स वाजपेयी जी के प्रधानमंत्री रहने के दौरान से लेकर उसके बाद भी जन्मदिन के दिन सुबह सुबह वाजपेयी जी के घर पर महाभिषेक पूजा करने पहुंच जाता था, संयोग से उसे भी 25 दिसंबर 2017 को सुबह वाजपेयी जी के घर आने की इजाजत नहीं मिली । क्यों क्या कहा गया आपसे .... कुछ नहीं सिर्फ  इतना की दस साढे दस बजे से पहले तो आप नहीं सकते । आइये तो पीएम के आने के वक्त या उसके बाद । तो  क्या परेशानी थी..अच्छा तो था कि आप पीएम से भी मिल लेते? तो पीएम से मिलने नहीं बल्कि वाजपेयी जी के घर पर सुबह तो पूजा करने   रहा हूं और इस बार भी सुबह ही जाना चाहता था । हर बरस की तरह । तो क्या वाजपेयी जी जब पीएम थे तब भी आप जाते थे । जी..बाप जी का ही ये प्रेम था ।  सफदर जंग रोड में जो पहला घर था पीएम वाजपेयी जी का । उसी घर में शिव जी की मूर्ति स्थापित की थी । और वहा से जब 3 रेसकोर्स में वाजपेयी जी पहुंचे तो शिव की मूर्ति भी वहा पहुंची । और ये सिलसिला तो हर जन्मदिन का रहा है । सुबह सात साढे सात बजे रुद्दाभिषेक । दो घंटे का पूजा पाठ । और फिर हम भी बा जी को प्रणाम और बधाई देकर निकल जाते ।

और उसी के बाद जन्मदिन के मौके पर वाजपेयी जी सभी से मिलते और दोपहर बाद कामकाज । तो मलाल है आपको । मलाल  हे का । हम तो कहीं भी पूजा कर लेते है । इस बार अपने घर पर ही कर ली...बस ये बात अटक गई कि वाजपेयी जी के जन्मदिन के मौके पर किसी को किसी ने कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण बना दिया....और परंपरा टूट गई । परंपरायें टूट नहीं रही बल्कि नई बनाने की कोशिश हो रही है । अचानक ही डीयू के एक कालेज की प्रिंसिपल बोल पडे । अरे आपको ऐसा क्यों लग रहा है । आप तो शानदार चाय का स्वाद लिजिये । जायके का जिक्र ना करें । क्यों । हालात को समझें । हालात क्या कहते हैं । हालात साफ बता रहे है जब लोकतंत्र में एक केन्द्र बिन्दु ही सारे अच्छे-बुरे परिणामों के लिये जिम्मेदार होता चला जाये तो फिर विरोध या सहमति के स्वर भी उसी के इर्द-गिर्द घुमड़ने लगते हैं। आप आथेटिरियन हालात के बारे में कह रहे है । मैं सिर्फ बिसात बताना चाह रहा हूं । कहना तो पंडित जी को चाहिये.जिनकी उम्र बीत गई संघियों के साथ । अरे आप इन्हें स्वयंसेवक भी कह सकते हैं । बीजेपी का भी कह सकते हैं। न न बीजेपी का नहीं । क्यों....क्योकि संघ की उम्र उसका अनुभव उसका राजनीतिक-सामाजिक शुद्दिकरण का सपना 100 बरस पूरे होने पर देख पायेगी या नहीं ..मौजूदा वक्त में ये सवाल तो है । क्या कह रहे है । और क्यों कह रहे है । देखिये भारते की सामाजिक व्यवस्था सियासत से नहीं सामाजिक ताने-बाने के बैलेंस से चलती है । और वह टूट रही है ....कैसे ये कैसे कह सकते है आप । मैं तो स्वयंसेवक होकर स्वयंसेवक की सोच तले संघ को ही भारत का आईना मानता हूं..और पहली बार उस आईने में आ रहे दरक को देख रहा हूं । आप कही भुवनेशवर में तोगडिया को हटाने की व्यूहरचना के वाबजूद तोगडिया के पक्ष में विहिप के खड़े होने के अक्स में तो बात नहीं कह रहे है । झटके में बेहद कम बोलने वाले स्वयंसेवक के ये शब्द पहली जनवरी की सर्द सुबह में अचानक गर्मी पैदा कर गये । तो मान्यवर लग रहा है बरस ही नहीं बदला..संघ भी बदल रहा है । चाय ठंडी ना हो चुस्की तो लीजिये...चाय ठंडी हो चुकी है जो घातक है । अरे आप तो बिंब में बात करने लगे ..सीधे कहिये...ये सवाल कल भी मौजू था और कल भी मौजू होगा । कौन सा सवाल। अब संघ अपने स्वयसेवक की सत्ता को सुझाव नहीं देता..बल्कि सत्ता संघ को निर्देश दे रही है । आपको ऐसा क्यो लगा ...भुवनेश्वर में कहा गया सत्ता को तकलीफ में लाने वाले कोई हालात पैदा ना करें और उज्जैन में कल यानी 2 जनवरी से शुरु हो रहे मंथन में कहा जायेगा सत्ता के अनुकूल संघ को चलना होगा । पर वाजपेयी के दौर में तो संघ ने इसे कभी नहीं माना । तो वाजपेयी के दौर में तो आपको भी किसी ने पूजा पाठ से नहीं रोका । हा ..हा हा हा ....ना न हंसिये मत ... वाजपेयी सत्ता के लिये नहीं थे ।

संघ सत्ता के लिये नहीं बना है । पर संघ अगर अब सत्ता के अनुकुल सत्ता बनी रहे इसके लिये है तो फिर चार संघठनो का अध्ययन कर लिजिये.....और उसी परिपेश्र्य में  राष्ट्रवाद का भी अध्ययन कर लिजिये । हा हा आप पत्रकार है तो आप राष्ट्रवाद के सवाल को उभार कर सत्ता पर चोट करना चाहते है । न न मुझे तो लगता है कि देश की सुरक्षा और राष्ट्रवाद का सवाल हर मुद्दे को बौना बना देता है और इसका सामना कैसे हो इसपर राजनीतिक शून्यता है । और पत्रकारीय शून्यता । बिलकुल मुझें इंकार नहीं है ..इसी दौर में मैने खेमो में पत्रकारिता को बंटते देखा । आप कही नहीं खडे है तो आप पत्रकार नहीं है । तो फिर पत्रकारिता का कैनवास कितनाी छोटा है ....इसीलिये मैं कह रहा है कि संघ के कैनवास तले सत्ता को समझिये और उस कोहरे को साफ किजिये जो हर दायरे में सत्ता का सुकून पाने को बेताब है पर पहली बार संघ के चार संगठनों के सामने ये सवाल है कि वह सत्ता के निर्देश पर खिंची जा रही लक्ष्मण रेखा पार करें या ना करें । और आप कोई भ्रम में ना रहे कि काग्रेस या विपक्ष की राजनीति मौजूदा सत्ता के पालेटिकल डिस्कोर्स का विकल्प पैदा कर पायेगी । अरे पंडित जी हम राजनीति अखाडे में अभी ना कूदे । पहले समझ लें ये कहना क्या चाहते है । क्यों..क्योकि मुवनेशवर में सत्ता के बोल थे..तोगडिया एक बडी वजह बने बीजेपी को 99 तक पहुंचाने में । इस हकीकत से सत्ता के आंख मूंदने पर संघ ने भी आंखे मूंद ली कि ग्रामिण इलाको की बदहाली की वजह क्या है । युवाओ में गुस्सा क्यों है । विकास का ककहरा कमजोर क्यों पड रहा है ।

तो क्या शाइनिंग इंडिया के दौर की तरह संघ ने गुजरात में सत्ता का साथ नहीं दिया ....इसलिये 99 पर अटके । पंडित जी ये आपको कहां से बात याद आ गई । इसलिये याद आ गई क्योकि उस वक्त बीजेपी पर संघ ने ही आरोप लगाया ता कि उसका काग्रेसीकरण हो चला है । हा हा ...यही बात तो मै कहना चाहता था कि जिस कांग्रेसी सत्ता को हराकर नये सत्ताधारी बने उनका भी काग्रेसी सत्ताकरण हो चला है । मतलब ..मतलब ये है कि जब आर्थिक नीतियों पर ट्रैक 2 का रास्ता वाजपेयी सरकार ने पकडा था तब संघ ने कहा बीजेपी का कांग्रेसी करण हो गया । और कांग्रेस के करप्शन-बैड गवर्नेंस को निशाने पर लेकर 2014 में मनमोहन को
हटाया गया  तो एहसास नयेपन का था । पर सत्ता की चाल ने कहा जो भी पर जमीन पर क्या-क्या लागू हुआ और लाभ किसको मिला ..मुश्किल में कौन आया ये सत्ता के काग्रेसीकरण की नई परिभाषा है । अंतर सिर्फ इतना है कि वाजपेयी के दौर में आर्थिक नीतियां थीं । मौजूदा दौर में आर्तिक नीतियां भी सत्ता बनाये रखने के विचार से जा जुड़ी है । वाजपेयी के दौर में क्रोनी कैपटलिज्म था । मौजूदा दौर में सत्ता बरकरार रखने का मैकेनिज्म है जो संयोग से हर संस्धान को प्रभावित कर रहा है । मसलन.....मसलन हर संस्धान को सत्ता के लिये सत्ता बरकरार रहे उसी लहजे में काम करना पड रहा है । वाजपेयी के दौर में ये दिखायी देता था क्योकि बाहर से प्रभावित किया जा रहा था । मौजूदा वक्त में ये दिखायी कम देता है क्योकि सिस्टम ही सत्ता बरकरार रखने के लिये है । हा हा ...आपने तो उस सवाल को जन्म दे दिया जिस सवाल का संघ को चाहिये । अच्छा किया जो आपने हालात कुछ पारदर्शी बना दिये...अब जरा एक दूसरी चाय बनावइये जब मैं आपको बताऊं कि चाय की प्याली में तूफान क्यों नहीं उठ रहा है या फिर तूफान संघ को खत्म कर दें उसके इंतजार में संघ क्यों है । दार्जिलिंग टी बनवाउ...या ये गरम मसाले वाली चाय चलेगी...। गरम मसाले वाली ही रहने दिजिये ...गर्मी तो उज्जैन के चितंन में होगी ...दिल्ली में तो ठंड है । ...............तो जरा समझने की कोशिश किजिये किसान संघ , भारतीय मजदूर संघ , स्वदेसी जागरण मंच और विश्व हिन्दु परिषद के अलावे संघ के किस संगठन की कितनी महत्ता सार्वजनिक राजनीतिक जीवन में आपको बीते पांच दशको में देखने को मिली हैा । क्यों आदिवासी कल्याण संघ और शिशु मंदिर चलाने वाले संगठन । अच्चा किया जो आपने इनका नाम भी ले लिया । तो जरा समझे किसान-मजदूर-आदिवासी-शिक्षा-अर्थव्यवस्था और राम मंदिर पर निर्णय किसे लेना है । और अगर सारे निर्णय सत्ता ले रही है उसे चुनावी जीत मिल रही है तो फिर संघ के संगठनो का काम क्या होगा । और अगर संघ के संगठनों की शिक्षा-दीक्षा जिस सोच के तहत हुई है और सरकारी की नीतिया उस लकीर पर नहीं चल रही है तो फिर संघ के ये संगठन क्या करेंगें । और अगर सत्ता और संघ चलाने में अलग अलग विजन जरुरी है तो फिर स्वयसेवक के राजनीतिक शुद्दिकरण की संघ की सोच का मतलब क्या है ।

तो आप कह रहे है कि संघ फेल हो गया । ना ना ..मैं ये नहीं कह रहा हूं..मेरा कहना है कि संघ की सोच के लिये जो बडा कैनवास स्वयंसेवक में होना चाहिये अगर वह कैनवास बडा नहीं हुआ तो फिर स्वयसेवक का कैनवास भी सत्ता पाने और उसे टिकाये रखने पर जा टिकेगा । एक मिनट..आपकी ये बात कहीं ये तो इंगित नहीं करती कि कांग्रेस जिस तरह सिर्फ सत्ताधारी होकर खत्म होने के रास्ते पर आ गई उसी रास्ते पर मौजूदा सत्ता  बीजेपी को ले आई है । और बीजेपी के कांग्रेसीकरण की ये नई परिभाषा है । आप पत्रकार है ...ये आपके कहने का अंदाज हो सकता है । पर मै  तो संघ के कमजोर होने के हालात को देख रहा हूं । तो इसका अर्थ ये भी लगाया जा सकता है जिस तरह काग्रेसी सिर्फ गांधी-नेहरु परिवार या कहे आजादी से पहले से अपने पारपरिक सियासत  की वजह से लोगों के जहन में बने हुये है उस पारंपरिक वोट बैक की ही देन है कि कांग्रेसी बने हुये है या उसका आस्त्तित्व बरकरार है । ठीक..अब आप उस महीन लकीर को पकड रहे है जहा भारत की युवा पीढी के सामने आने वाले वक्त में ना कांग्रेस मायने रखेगी और ना ही बीजेपी । बीजेपी क्यों ..उसकी परंपरा तो कांग्रेस सरीखी है नहीं .वह तो लगातार मशकक्त कर रही है । नई पीढी से जुडने के लिये सत्ता मन की बात कर रही है । हा हा ... मन की बात भी सत्ता में बने रहने के लिये है । पर बीजेपी के लिये परंपरा तो संघ है । और संघ को सत्ता के निर्देश पर अगर चलना है तो फिर बीजेपी से पहले संघ ढहेगी । उसकी साख खत्म होगी । उसके सरोकार खत्म होगें । जन से जुडाव खत्म होगा । और जो बीजेपी संघ पर आर्श्रित रही वही संघ बीजेपी पर आर्श्रित होने की स्थिति में आ रही है । तो क्या संघ खत्म हो जायेगा । आप संपादकीय टिप्पणी इतनी जल्दी ना करें । मैने संघ के चार संगठनो का जिक्र किया । तो जरा उनके भीतर की हलचल को समझे ।   इन चारो संगठनो के लिये काग्रेस की सत्ता के दौर में भी हालात ठीक नहीं थे और मौजूदा वक्त में भी ठीक नहीं है । पर संगठन तो काम कर रहे
है । और इनका काम ना करने पर इनकी जगह कौन लेगा ये भी सवाल होगा । इसे थोडा और साफ करें ....पंडित जी आप तो वाजपेयी जी के साथ रहे है । और मुझे याद है आपने एक बार वाजपेयी जी से कहा भी था..पीएम की कुर्सी की बायोप्सी होनी चाहिये ....। जो भी इस कुर्सी पर बैठता है.....हा हा आपको याद है...हा बिलकुल । और ये भी याद होगा कि वाजपेयी जी तब पीएम होते हुये भी ठहाका लगाकर हंस पडे थे । पर ये बात क्या किसी दूसरे से कही जा सकती है । सवाल ये है कि कांग्रेस का नजरिया भोगी-लोभी हो चला तो 2014 में वह खत्म होने वाले हालात में आ गई । और अब भोगी-लोभी की ही परिभाषा को बदल कर बीजेपी के भीतर का बडा कुनबा खामोशी से सत्ता के लिये काग्रेसी मन रखने से नहीं हिचक रहा । महाराष्ट्र, हरियाणा,झारखंड,कश्मीर, असम, बिहार ही नही हर उस राज्य को परख लिजिये जहा 2014 के बाद सीएम बने या सरकार बनाने
के लिये कही जाति तो कही तिकडमो का सहारा लिया गया । पर सत्ता है उसे भोगने है तो नये नवेले सीएम से लेकर हर हुनर को मान्ता दे दी गई । विचारधारा ताक पर आ गई । तो फिर ये क्यों ना मान लिया जाये कि बीजेपी के भीतर भी उबाल होगा । हो सकता है । पर उसका कोई महत्व नहीं है । और बीजेपी में उबाल भी आपको सत्ता के लिये ही दिखायीदेगा । यानी कल को बीजेपी हारने लगे तो कोई विरोध कर देगा ...पर वह विरोध सत्ता के लिये वैसे ही होगा जैसे सत्ता के लिये काग्रेस बनी हुई है ..वह मानती रही तो 24 अकबर रोड पर कौवे बोलने लगे । अब सत्ता के लिये कबूतरों का झुंड फिर जमा हो रहे है । पर महत्व तो संघ परिवार का है । काग्रेस भी निशाने पर संघ परिवार को लेती रही तो बीजेपी की सत्ता डोलती रही । पर जरा समझिये आज की तारिख में सत्ता संघ पर ऐसी हावी है कि संघ पर हमला करने से काग्रेस को कोई फायदा होगा नहीं क्योंकि सरसंघचालक का भाषण भी डीडी पर लाइव टेलिकास्ट होता है और भागवत जी भी किसी कैबिनेट मनिस्टर की तर्ज पर बोलते-सुनायी देते है । पर जरा हकीकत की जमीन पर पैर रखिये और सोचिये महाराष्ट्र में किसान आंदोलन हुआ ...मंदसौर में किसान संघर्ष हुआ । दिल्ली में देशभर के किसान-मजदूर जमा हुये । श्री श्री से लेकर स्वामी तक राम मंदिर बनाने निकल पडे..पर इस कडी में संघ के संगठनो ने क्या किया । जहा शिरकत की उनकी जुबा सत्ता ने सिल दी । कही पदाधिकारियो को हटा दिया गया । कहीं ये नाकाबिल साबित होते चले गये । गोवा में तो सत्ता के लिये स्वयंसेवक को दरकिनार किया गया । संघ का एंजेडा बीजेपी ने गोवा में बदल दिया । यानी चाहे अनचाहे संघ ने अपने को बचाने किये जब खुद को सत्ता से जोड लिया तो फिर हर स्वयसेवक को ये क्यों नहीं लगेगा कि वह भी अपने आप में सरकार हो सकता है.बीजेपी में घुस कर सत्ताधारी हो सकता है । दो सवाल , पहला अभी आपने कहा संघ ने खुद को बचाने के लिये..... और दूसरा क्या स्वयसेवक अपने आप में सक्षम नही है कि वह सामानांतर सत्ता बना लें । आप वाकई पत्रकार हो । बेहद बारीक लाइन पकड़ते हो । तो पहले सवाल का जवाब तो यही है कि सत्ता जब बेखौफ हो जाये तोडर किस बात का दिखलाती है इसके लिये आप कांग्रेस के दौर को याद कर लीजिये....यानी सत्ता में नहीं रहे तो हिन्दू आतंकवाद ...हा हा । और दूसरा..दूसरा तो यही है कि जिन चार संगठनों का मैंने जिक्र किया उसके स्वयसेवक त्यागी है । संघर्षशील है । अगर हालात यही रहे तो हो सकता है कोई सत्ता की संघ के जरीये खिंचवाई गई लक्ष्मण रेखा भी लांघ लें । और पहली बार सच तो यही है की संघ के भीतर का अंतर्विरोध कही नागपुर में सतह पर ना जाये । नागपुर से मतलब । नागपुर में ही मार्च में प्रतिनिधी सभा
होनी है । सहसरकार्यवाह भैयाजी जोशी की जगह दत्तात्रेय होसबोले लेंगे । वह सत्तानुकूल है तो हर संगठन को मथेंगे। और मथने की प्रक्रिया छह महीने से शुरु हो चुकी है । बीएमएस और किसान संघ के तीन प्रमुख पदाधिकारियों को हटाया गया या कहें बदला गया । पर विहिप में तोगडिया को हटाने से सफल हो नहीं पाये । तो क्या ये बदलाव संघ नहीं चाहता या संघ ही चाहता है । पंडित जी पत्रकार आपके मित्र है फिर भी आप ऐसे सवाल करते हो ...क्यों गलती हो गई क्या । न न गलती नहीं जब सत्ता संघ पर हावी है तो चाकू कद्दू पर गिरे या कद्दू चाकू पर होगा क्या । तो इसका मतलब है तोगडिया एक बडा चैलेंज है सत्ता के लिये । हा अब आपने सही लाइन पकडी । पर समझना ये भी होगी कि संघ बहुत धीरे धीरे बदलाव की दिशा में जाता है । और स्वयसेवक को राजनीतिक हुनरमंद होता नहीं । उसकी जरुरत ..उसकी समझ भी सामाजिक ट्रसंफारमेशन को ज्यादा परखती है । तो तोगडिया सरीखे स्वयंसेवकों राजनीति से दे दे हाथ करने का हुनर सिखना होगा । या क्या किसी को भी
सिखना होगा जो सत्ता के खोल से बाहर झांकना चाहता है । या कहे संघ का विस्तार चाहता है । उसे बचाये रखना चाहता है । अन्यथा 2025 में संघ का शताब्दी वर्ष कैसे मनेगा इसके सिर्फ सपने देख सकते हैं, दिखा सकते है । आज तो लंबी चर्चा हो गई चाय पर । हां हमे घर भी निकलना है फिर भी एक सवाल पत्रकार महोदय आप ही से...क्या राजनीति का मौजूदा रास्ता जारी रहेगा । मुशकिल है सटीक कहना । पर इससे इंकार तो नहीं किया जा सकता कि देश की सुरक्षा और राष्ट्रीयता का सवाल जिस तरह सत्ता उठाती है उसकी कोई काट किसी राजनीतिक दल के पास है । कोई नेता विपक्ष में है नहीं जिसकी साख मजबूत हो । राजनीतिक दलो में सहमती तक तो बनती नहीं । और विपक्षी नेताओ के आपसी अंतर्विरोध सत्ता की चाटुकारिता भी करते है और विरोध भी । तब तो मौजूदा सत्ता जो कर रही है उसे कोई डिगा नहीं सकता । हा हा यही तो सत्ता भी सोचती है । पर बिहार , दिल्ली और गुजरात चुनाव परिणामों के संकेत भी समझे । और देश के उन हालातों को भी परखे जहा ग्रामीण भारत की त्रासदी और युवा भारत की मुश्किले कैसे उसी इक्नामिक्स पर आ टिकी है जिसके भरोसे सत्ता के सेवक भोग लगा रहे है । और सपने दिखा रहे हैं । मतलब , पहली बार आर्थिक मुद्दे देश की सियासत की अगुवाई करने को तैयार हो रहे है । आर्थिक हालात समाज में आज नहीं तो कल टकराव भी पैदा करेंगे । कल तक भूख से मौत को सरकार स्वीकारती नहीं थी । अब भूख से मरना खबर है । देश के विकसित राज्यो में से एक महाराष्ट्र की 2016-17 में महाराष्ट्र अरोग्य और एकात्मिक बालविकास विभाग की रिपोर्ट के ही मुताबिक हर दिन महाराष्ट्र में  40 बच्चो की मौत हुई है । यानी बरस भर में 14,365 मौत ।  78 हजार शिशु गंभीर हालत में है । यानी जाति-धर्म की सियासत राजनीतिक अंतर्विरोध का सिलसिला है । ये तो पहले भी रहा है । आंकडे परखने होगें । पर चाय की आखरी चुस्की के साथ आपको मोजूदा सत्ता के बधाई देनी चाहिये कि जो सियासत बीते दौर में छुप कर होती थी । वह मौजूदा सत्ता के दौर में ये खुलकर उभरी है । यानी जनता ने पांच बरस के लिये चुना है तो फिर काहे का संधिय ढांचा या काहे  लोकतंत्र के खम्भे । न्यायपालिका हो या कार्यरपालिका या विधायिका या फिर मीडिया । सब को सत्ता के साथ चलना होगा क्योकि 2014 का जनादेश यही था  । हा हा तो फिर हमने बेकार ही वाजपेयी जी के घर पर पूजा का जिक्र किया । और हम बेकार ही संघ परिवार की चिंता किये हुये है । हो सकता है । तो नववर्ष की शुभकामनायें ले लिजिये । मंगलमय क्यों नहीं । क्योकि मंगलमय तो खुद बनाना होगा ।
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लेखक विषय संवाद साभार अनुवादक

पहले वो आए साम्यवादियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं साम्यवादी नहीं था

 

फिर वो आए मजदूर संघियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं मजदूर संघी नहीं था

 

फिर वो यहूदियों के लिए आए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं यहूदी नहीं था

 

फिर वो आए मेरे लिए

और तब तक बोलने के लिए कोई बचा ही नहीं था

 

मार्टिन नीमोलर (1892-1984)