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जहर मिलता रहा..जहर पीते रहे....... बंदिशों में बेखौफ होने का मजा

यादें बेहद धूमिल है...कैसे जिक्र सिर्फ इंदिरा गांधी का होता था। कैसे नेताओं की गिरप्तारी की जानकारी अखबारों से नहीं लोगो की आपसी बातचीत से पता चलती थी । कैसे दफ्तरो के बाबू टाइम पर आने लगे थे । बसें वक्त पर चल रही थी । रेलगाडियां लेट नहीं हो रही थी । स्कूलो में टीचर भी क्लास में वक्त पर पहुंचते। जिन्दगी अपनी रफ्तार से हर किसी की चल रही थी । फिर इमरजेन्सी का मतलब या खौफजदा होने की वजह क्या है. ये सवाल उस दौर में हमेशा मेरे जहन में बना रहा। यादें धूमिल हैं लेकिन याद तो आता है कि गाहे-बगाहे कभी छुट्टी के दिन घर में पिता जी के मित्रों की चर्चा का जमावडा होता तो जिक्र इमरजेन्सी या इंदिरा गांधी के साथ साथ जेपी का भी होता । पांचवी-छठी क्लास में पढने के उस दौर की यादे सहेज कर रखना मेरे लिये इसलिये आसान था क्योंकि पिताजी का तबादला दिल्ली से बिहार होने की वजह इमरजेन्सी का लगना और जेपी के बिहार में होना ही था। और इसका जिक्र इतनी बार घर में हुआ कि मैं शुरु में सिर्फ इतना ही जान पाया कि1975 में दिल्ली छूट रहा है और रांची जा रहे हैं तो वजह इमरजेन्सी है ।
खैर ये अलग यादें हैं कि उस वक्त रेडियो का बुलेटिन ही कितना महत्वपूर्ण होता था ...और कैसे रांची में शाम 6 बजकर बीस मिनट का प्रादेशिक बुलेटिन शुरु करने के बाद पटना में साढ़े सात बजे के बुलेटिन के लिये पिताजी को जाना पड़ा और पूरा परिवार ही इमरजेन्सी में दिल्ली से रांची फिर पटना घूमता रहा । लेकिन आज संदर्भ इसलिये याद आ रहा है क्योंकि बीते कई महीनों से मुझे बार बार लग रहा है कि जो भी पढ़ाई की, या जिस वातावरण को जीते हुये हम स्कूल-कॉलेज से होते हुये पत्रकारिता के दौर को जीते हुये चर्चा करते रहे ...सबकुछ अचानक गायब हो गया है । पटना के बीएन कालेज में राजनीतिशास्त्र पढ़ते-पढ़ते हम कई मित्र छात्र देश के संविधान को ही नये सिरे से लिखने की बात तक करते । बकायदा जीने के अधिकार का जिक्र कर कैसे उसे लागू किया जाना चाहिये चर्चा बाखूबी होती । हिन्दी के शिक्षक गांधी मैदान के किनारे एलीफिस्टन सिनेमा हाल के मुहाने पर चाय की दुकान में नीबू की चाय की चुस्कियों में बता देते कि वसंत का मौसम हम युवाओं को जीने नहीं देता क्योंकि सारी परीक्षा वसंत में ही होती है । पटना साइंस कालेज के फिसड्डी छात्रों में होने के बावजूद जातिय राजनीति का ज्ञान पटना यूनिवर्सिटी में एक के बाद एक कर कई हत्याओं ने 1983 में ही समझा दिया था । और नागपुर में पत्रकारिता करते हुये दलित -संघ - नक्सलवाद को बाखूबी समझने के लिये उस वातावरण को जीया । यानी पत्रकारिता के आयाम या कहे उसका कैनवास इतनी विस्तृत था कि किसी खाके में किसी ने 1989 से 1995 तक बांटने की या कहे रखने की कोशिश नहीं की । जबकि उस वक्त के सरसंघचालक बालासाहेब देवरस के साथ सैकड़ों बार बैठना हुआ । उस वक्त दलित राजनीति के केन्द्र में नागपुर के रिपब्लिकन नेताओं के साथ कई कई दिन गुजारे। म्हारों की बस्ती में जा कर रहा । उनके बीच से दलित रंगभूमि को खड़ा किया । तब के नक्सली संगठन पीपुल्स वार ग्रूप के सर्वेसर्वा सीतारमैया से तेलगांना के जंगलों में जा कर मुलाकात की । और नागपुर में रहते हुये पत्रकारिता का एैसा अंदाज था कि क्या मुंब्ई क्या दिल्ली या क्या लंदन । देश दुनिया से कोई भी पत्रकार या रिसर्च स्कॉलर नागपुर पहुंचा तो या तो वह हमारी चौखट पर जानकारी के लिये या फिर हम जानकारीहासिल करने के लिये उसकी चौखट पर। याद नहीं आता इंदिरा गांधी के इमरजेन्सी के दौर को छोडकर कभी कोई प्रधानमंत्री बहस - चर्चा में आया । जेएनयू में रहते हुये मुनिस रजा तो शैक्सपियर और किट्स के जरीये क्लासिकल अंग्रेजी साहित्य को छात्रों के साथ शाम में घूमते-टहलते हुये बकायदा जीते । छात्र भी जीते । आगवानी साहेब तो जेएनयू की खूबसूरती तले पर्यावरण का जिक्र अक्सर करते । यूं हाल में रहे बीबी भट्टाचार्य भी सिर्फ देश ही नहीं बल्कि इंटरनेशनल इक्नामी पर चर्चा कर सामाजिक-राजनीतिक पहलुओं का जिक्र नई नई किताब या किसी रिसर्च पेपर के बताकर करते । फणीश्वरनाथ रेणु की दिनमान की पत्रकारिता । अज्ञेय का पेड़ पर घर बनाकर रहना । और उनकी मुश्किल हिन्दी । मुक्तीबोध के चांद के मुंह ढेडा । या फिर पाश का सबसे खतरनाक होता है सपनों का मर जाना । या फिर प्रेमचंद की ही दलित पत्रकारिता को लेकर बहस । कह सकते है सवाल और समझ जितने दायरे में घूमते रहे उस दायरे में गुरुदत की प्यासा भी रेंगी और घडकन बढाने वाली "ब्लेम इट आन रियो" भी।
मधुबाला की खूबसूरती से लेकर वहीदा का अंदाज और डिंपल का जादू भी चर्चा में शरीक रहा । रेखा-अमिताभ की जोड़ी के रोमानीपन तले विवाह के बंधन पर चर्चा हुई । मीना-कुमारी के इश्क और शराब में भी गोते लगाये । लेकिन कभी कुछ ठहरा नहीं । स्कूल कालेज या पत्रकारिता करते हुये समाज के हर क्षेत्र में घुमावड़ा। थमा कुछ भी नहीं। अंडरवर्ल्ड को जानने समझते बंबई भी पहंचे। भाई ठाकुर से भी मिले । उसके ज्ञान पर रश्क भी हुआ। और 1989 में शिवसेना की सामना के शुरुआत वाले दिन पत्रकारों की टोली के साथ गोवा से लौटते हुये बंबई में बालासाहेब ठाकरे से मुलाकात के मोह में रुक भी गये । और ठाकरे की ठसक को छत पर बीयर के साथ तौला भी । और लौटते वक्त फैज की नज्म ...जख्म मिलता रहा ..जख्म पीते रहे ...हम भी जीते रहे...को भी बखूबी गुनगुनाया । एसपी सिंह की पत्रकारिता को सलाम करते हुये अपने ही अखबार के मालिक के खिलाफ खडे होकर एसपी को सहयोग करते रहे । प्रभाष जोशी की पत्रकारिता के अंदाज को बखूबी जीते हुये अपने जन्मदिन वाले दिन संपादकीय पन्ने पर उस लेख को छापने की मांग रख दी जो बताता था,,,क्यों नहीं हो पा रहा है व्यवस्था परिवर्तन और 18 मार्च को बकायदा लेख छा पर प्रभाष जी का फोन लोकमत के संपादक को आया....बता देना आज छप गया है....क्यों नहीं हो पा रहा है व्यवस्था परिवर्तन...जन्मदिन की बधाई भी दे देना । और कहना कि जरा बाबरी मस्जिद को ढहाने वालों पर भी लेख लिखे..नागपुर में है तो दिल्ली का कुछ भला करे। यानी चर्चा बहस हर बात को लेकर ।
हालात तो इतने खुले हुये कि...6 दिसबंर 1992 का बाद देश में माहौल जो भी हो..लेकिन कहीं गोली नहीं चली..कोई मरा नहीं...मगर नागपुर के मोमिनपुरा में विरोध रैली सडक पर ना आ जाये तो तबके कमीश्नर ईनामदार ने गोली चलवा दी....12 लोग मारे गये ...मरने वालो में संयोग से वह लड़का भी जो चार दिन बाद दिलीप कुमार को मुशायरे में बुलवाने के लिये आमंत्रण देकर स्वीकृति लेकर नागपुर पहुंचा था । और मुशायरा रद्द हुआ तो ...आग्रह पर दिलीप कुमार ने भी खासकर अखबार में छापने के लिये पत्र लिखा...हालात पर लिखा और शायरी के अंदाज में मुश्यरा दिलों में जगाये रखने की तमन्ना भी जाहिर की । 10 या 11 दिसंबर 1992 को दिलीप कुमार का पत्र छपा भी । नागपुर यूनिर्वसिटी के पालेटिकल साइस के प्रोफेसर राणाडे ने घर बुलाकर चाय पिलाई । चर्चा की । चर्चा तो खूब होती रही । जब राहुल गांधी ने मनमोहन सिंह की इक्नामिक पालेसी पर अंगुली उठाई तब फिल्म दीवार के दृश्य ...मंदिर से निकल कर दो अलग अलग रास्तों पर जाते अमिताभ बच्चन और शशि कपूर की तर्ज पर मनमोहन सिंह और राहुल गांधी का जिक्र किया ...और भास्कर ने लेख छापा तो पीएमओ को अच्छा नहीं लगा । लेकिन पीएमओ का अंदाज भी चर्चा वाला ही रहा । क्या होना चाहिये ...पीएमओ बाहर से देखने में कितना अमानवीय है, इस पर भी खुल कर चर्चा की । मनमोहन सिंह के दौर में घोटाले दर घोटालों का जिक्र भी रिपोर्टो के जरीये खूब किया । कोयला से लेकर टू-जी । राडिया टेप से लेकर कलमाडी । खूब लिखा । सत्ता की एडवाइरी को भी देखा-सुना परखा । सत्ता की हेकडी को भी देखा । वाजपेयी की सादगी में मनमोहन सिंह को खोजना मूर्खता लगा। तो सत्ता की चौखट पर खडे होकर कहने से भी नहीं चूके । नागपुर से ए बी वर्धन की यारी जारी रही तो 2004 में इक्नामिस्ट मनमोहन की इक्नामिक पॉलिसी तले खडे होकर बर्धन ने जब एलान किया.....डिसइन्वेस्टमेंट को बंगाल की खाडी में डूबो देना चाहिये...फिर फोन कर पूछा ..समुद्र इतना गहरा होता कि उसमें से डिसइन्वेस्टमेंट वापस तो नहीं निकलेगा । और ठहाके के अंदाज में सत्ता को भी बिना लाल बत्ती जी लिया। यही खुलापन लगातार खोज रहा हूं..सोच रहा हूं कोई जिक्र किसी गजल का कोई क्यों नहीं कर रहा.....क्या वह आखिरी पाश था जो कलाई में बंधी खडी के कांटे को घूमते हुये ठहरा मान चुका था । आखिर साहित्य--संगीत पर देश में बात क्यों नहीं हो रही है । क्यों घर में जुटे चार दोस्त भी पकौडी-चाय पर ठहाके लगाते सुनाई दिखायी नहीं दे रहे हैं । क्यों खुफिया तरीके से कोई फोन कर बताता है ,,,बंधुवर प्रेमचंद की गोदान अब सिलेबस से बाहर कर दी गई है । क्यों मीडिया संस्धानों में जिन्दगी पर चर्चा नहीं हो पा रही है । क्यों सरकारी दफ्तरों में घुसते ही एक तरह की मुर्दानगी दिखायी दे रही है । ऐसा क्यो लग रहा है कि हर किसी ने लक्ष्य निर्धारित कर लिये है और उसे पाने में जुटा है । जैसे गुरुग्राम में सात बरस के प्रघुम्न की हत्या पर कंडक्टर को गिरफ्तार कर पुलिस सबूत जुटाने में जुटी । तो फिर देश भी चुनाव दर चुनाव जीतने के लिये माहौल बनाने के लिये ही काम करेगा । सत्ता हो या विपक्ष । और इस माहौल में जनता भी तो पहले ही तय कर रही है उसे किससे चाहिये । क्या चाहिये । देने वाले के सामने भी लक्ष्य है । और उसी आसरे वह भी तय कर रहा है किसे कितना देना है । तो फिर याद किजिये पंचतंत्र की कहा यो को । पंचतंत्र जो दुनिया के हर भाषा में अनुवादित है । और उसे दो हजार बरस पहले विष्णु शर्मा ने उस राजा के कहने पर लिखा । जिसके बच्चे बिगडे हुये थे । और वन में रह कर तपस्या कर रहे विष्णु शर्मा की तरफ भी राजा का ध्यान इसलिये गया क्योकि वह भोग-उपभोग से दूर वन में तपस्या कर रहे थे । यानी तब राजा भी जानते थे कि ज्ञान उसी के पास होगा जिसे कुछ चाहिये नहीं । यानी 2019 का लक्ष्य रखकर कौन का काम होगा और कौन सा ज्ञान किसके पास होगा । मुक्त हो कर जीने का मजा देखिये । ..जख्म मिलता रहा / जख्म पीते रहे / जख्म जब भी कोई जहन-ओ-दिल को मिला / जिन्दगी की तरफ एक दरीचा खुला / जिन्दगी हमें रोज आजमाती रही / हम भी उसे रोज आजमाते रहे....


करवा चौथ- कड़वा चौथ: पति पत्नी के जोक्स का उल्टा पुल्टा रूप-36

नए शोध से पता चला है –

“यदि पत्नी *करवाचौथ के व्रत*  की   बजाय  

उत्‍तेजना-तनाव बाकी मोल-भाव - कुमार मुकुल

कारवाँ - Thu, 14/09/2017 - 15:45
मोदी जी चुनाव जीतने के बाद भी चुनाव मे लगे हैं निरंतर। मिशन 2014, के बाद मिशन 2017, 2019, फिर 2025।  कोई काम ही नहीं है इनके पास, भाइयों लग जाइए मिशन में। मोदी लहर चल रही, दिल्‍ली में पिटे पर लहर चलती रही, बिहार में पिटे पर लहर चलती रही, जहां लहर का बहर नहीं सध रहा वहां मोल-भाव का कहर जारी है। अदालत पूछ रही कि पांच साल के बीच जिन माननीयों की संपत्ति पांच सौ गनी हुई उसका हिसाब दीजिए पर मोदी जी तो मिशन में लगे हैं। अब इस सतत मिशनरी उत्‍तेजना-तनाव में स्‍वाभाविक है कि आम जनता भी भिड़ी हुई है उनके साथ। चलो हम भी कुछ गोतस्‍करों से गायें लूट कर इसमें योगदान करें। गाय नहीं तो गधे सही, उन्‍हें ही लूट लाएं। ग तो लगा हे उसमें भी। तो इस उत्‍तेजनामय माहौल का असर हो रहा है आम जन पर। वह भी इस लहर मे डूबा लहर काटने में लगा है। उधर आपकी सरकारी गोशालाओं में हजारों गायें मर रहीं सड़ रहीं, उसका चारा भी खाए जा रहे सब। अब इसका असर तो होना है। सब काम धाम रामभरोसे होने लगा है। फिर दिन में तीन बार एक ही लाइन पर ट्रेंनें पल्‍टी ना मारें तो और क्‍या हो। सारी जनता मानसिक अशांति में जीएगी तो आपकी बुलेट क्‍या चलेगी बैलगाडी के दिन आ जाएंगे आप  बनाते और काटते रहिए लहर। शिक्षा में आप दुनिया में पिछड गये। भूखमरी के इंडेक्‍स में पडोसियों से पीछे हैं। खुशी का मंत्रालय बना डाला पर उसके इंडेक्‍स में भी पीछे चले जा रहे। कांग्रेस मुक्‍त बनाने से थक गये तो खरीद खरीद कर कांग्रेस युक्‍त करने का नया अभियान चला दिया। बस लहर चलनी चाहिए। मेक इन इंडिया के तहत असाल्‍ट राइफलें बनी पर आपकी सेना ने ही उसे बेकार साबित किया। बोफोर्स भी नहीं चली, पता चला उसके कल-पुर्जे चीन के थे। कहीं कुछ हो हवा नहीं रहा। बस पूरा मुल्‍क हो हा हू ही किये जा रहा। इससे कुछ नहीं होने का। करते रहिए कूद-फांद। 

एक करोड़ खाली पड़े सरकारी पदों पर भर्ती क्यों नहीं?

युवा भारत में सबसे बुरे हालात युवाओं के ही हैं....


रोजगार ना होने का संकट या बेरोजगारी की त्रासदी से जुझते देश का असल संकट ये भी है केन्द्र और राज्य सरकारों ने स्वीकृत पदो पर भी नियुक्ति नहीं की हैं। एक जानकारी के मुताबिक करीब एक करोड़ से ज्यादा पद देश में खाली पड़े हैं। जी ये सरकारी पद हैं। जो देश के अलग अलग विभागों से जुड़े हैं । दो महीने पहले ही जब राज्यसभा में सवाल उठा तो कैबिनेट राज्य मंत्री जितेन्द्र प्रसाद ने जवाब दिया। केन्द्र सरकार के कुल 4,20,547 पद खाली पड़े हैं। और महत्वपूर्ण ये भी है केन्द्र के जिन विभागो में पद खाली पड़े हैं, उनमें 55,000 पद सेना से जुड़े हैं। जिसमें करीब 10 हजार पद आफिसर्स कैटेगरी के हैं। इसी तरह सीबीआई में 22 फीसदी पद खाली हैं। तो प्रत्यर्पण विभाग यानी ईडी में 64 फीसदी पद खाली हैं। इतना ही नहीं शिक्षा और स्वास्थ्य सरीखे आम लोगो की जरुरतों से जुडे विभागों में 20 ले 50 फीसदी तक पद खाली हैं। तो क्या सरकार पद खाली इसलिये रखे हुये हैं कि काबिल लोग नहीं मिल रहे। या फिर वेतन देने की दिक्कत है । या फिर नियुक्ति का सिस्टम फेल है । हो जो भी लेकिन जब सवाल रोजगार ना होने का देश में उठ रहा है तो केन्द्र सरकार ही नहीं बल्कि राज्य सरकारों के तहत आने वाले लाखों पद खाली पडे हैं। आलम ये है कि देश भर में 10 लाख प्राइमरी-अपर प्राइमरी स्कूल में टीचर के पद खाली पड़े हैं। 5,49,025 पद पुलिस विभाग में खाली पडे हैं। और जिस राज्य में कानून व्यवस्था सबसे चौपट है यानी यूपी। वहां पर आधे से ज्यादा पुलिस के पद खाली पड़े हैं। यूपी में 3,63,000 पुलिस के स्वीकृत पदो में से 1,82,000 पद खाली पड़े हैं। जाहिर है सरकारों के पास खाली पदो पर नियुक्ति करने का कोई सिस्टम ही नहीं है। इसीलिये मुश्किल इतनी भर नहीं कि देश में एजुकेशन के प्रीमियर इंस्टीट्यूशन तक में पद खाली पड़े हैं। मसलन 1,22,000 पद इंजीनियरिंग कालेजो में खाली पडे है। 6,000 पद आईआईटी, आईआईएम और एनआईटी में खाली पड़े हैं।

6,000 पद देश के 47 सेन्ट्रल यूनिवर्सिटी में खाली पड़े हैं। यानी कितना ध्यान सरकारों को शिक्षा और स्वास्थ्य को लेकर हो सकता है, ये इससे भी समझा जा सकता है कि दुनिया में भारत अपनी तरह का अकेला देश है जहा स्कूल-कालेजों से लेकर अस्पतालो तक में स्वीकृत पद आधे से ज्यादा खाली पड़े है । आलम ये है कि 63,000 पद देश के 363 राज्य विश्वविघालय में खाली पडे हैं। 2 लाख से ज्यादा पद देश के 36 हजार सरकारी अस्पतालों में खाली पडे हैं। बुधवार को ही यूपी के स्वास्थ्य मंत्री सिद्दार्थ नाथ सिंह ने माना कि यूपी के सरकारी अस्पतालों में 7328 खाली पड़े पदो में से 2 हजार पदों पर जल्द भर्ती करेंगे। लेकिन खाली पदो से आगे की गंभीरता तो इस सच के साथ जुडी है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन का मानना है कि कम से कम एक हजार मरीज पर एक डाक्टर होना ही चाहिये । लेकिन भारत में 1560 मरीज पर एक डाक्टर है । इस लिहाज से 5 लाख डाक्टर तो देश में तुरंत चाहिये । लेकिन इस दिशा में सरकारे जाये तब तो बात ही अलग है । पहली प्रथमिकता तो यही है कि जो पद स्वीकृत है । इनको ही भर लिया जाये । अन्यथा समझना ये भी होगा कि स्वास्थय व कल्याण मंत्रालय का ही कहना है कि फिलहाल देश में 3500 मनोचिकित्सक हैं जबकि 11,500 मनोचिकित्सक और चाहिये ।

और जब सेना के लिये जब सरकार देश में ही हथियार बनाने के लिये नीतियां बना रही है और विदेशी निवेश के लिये हथियार सेक्टर भी खोल रही है तो सच ये भी है कि आर्डिनेंस फैक्ट्री में 14 फीसदी टैक्निकल पद तो 44 फिसदी नॉन-टेक्नीकल पद खाली पडे हैं।

यानी सवाल ये नहीं है कि रोजगार पैदा होंगे कैसे । सवाल तो ये है कि जिन जगहो पर पहले से पद स्वीकृत हैं, सरकार उन्हीं पदों को भरने की स्थिति में क्यों नहीं है। ये हालात देश के लिये खतरे की घंटी इसलिये है क्योंकि एक तरफ खाली पदों को भरने की स्थिति में सरकार नहीं है तो दूसरी तरफ बेरोजगारी का आलम ये है कि यूनाइटेड नेशन की रिपोर्ट कहती है कि 2016 में भारत में 1 करोड 77 लाख बेरोजगार थे । जो 2017 में एक करोड 78 लाख हो चुके हैं और अगले बरस 1 करोड 80 पार कर जायेंगे। लेकिन भारत सरकार की सांख्यिकी मंत्रालय की ही रिपोर्ट को परखे तो देश में 15 से 29 बरस के युवाओ करी तादाद 33,33,65,000 है । और ओईसीडी यानी आरगनाइजेशन फार इक्नामिक को-ओपरेशन एंड डेवलेपंमेंट की रिपोरट कहती है कि इन युवा तादाद के तीस पिसदी ने तो किसी नौकरी को कर रहे है ना ही पढाई कर रहे है । यानी करीब देश के 10 करोड युवा मुफलिसी में है । जो हालात किसी भी देश के लिये विस्पोटक है । लेकिन जब शिक्षा के क्षेत्र में भी केन्द्र और राज्य सरकारे खाली पद को भर नहीं रही है तो समझना ये बी होगा कि देश में 18 से 23 बरस के युवाओं की तादाद 14 करोड से ज्यादा है । इसमें 3,42,11,000 छात्र कालेजों में पढ़ाई कर रहे हैं। और ये सभी ये देख समझ रहे है कि दुनिया की बेहतरीन यूनिवर्सिटी की कतार में भारतीय विश्वविधालय पिछड चुके है । रोजगार ना पाने के हालात ये है कि 80 फीसदी इंजीनियर और 90 फिसदी मैनेजमेंट ग्रेजुएट नौकरी लायक नही है । आईटी सेक्टर में रोजगार की मंदी के साथ आटोमेशन के बाद बेरोजगारी की स्थिति से छात्र डरे हुये हैं। यानी कहीं ना कहीं छात्रों के सामने ये संकेट तो है कि युवा भारत के सपने राजनीति की उसी चौखट पर दम तोड रहे है जो राजनीति भारत के युवा होने पर गर्व कर रही है । और एक करोड़ खाली सरकारी पदों को भरने का कोई सिस्टम या राजनीतिक जिम्मेदारी किसी सत्ता ने अपने ऊपर ली नहीं है।

मां-बाप क्या करें ? जब हर जिम्मेदारी से है मुक्त चुनी हुई सरकार

तो सुप्रीम कोर्ट को ही तय करना है कि देश कैसे चले। क्योंकि चुनी हुई सरकारों ने हर जिम्मेदारी से खुद को मुक्त कर लिया है। तो फिर शिक्षा भी बिजनेस है। स्वास्थ्य सेवा भी धंधा है। और घर तो लूट पर जा टिका है। ऐसे में जिम्मेदारी से मुक्त सरकारों को नोटिस थमाने से आगे और संविधान की लक्ष्मण रेखा पार न करने की हिदायत से आगे सुप्रीम कोर्ट जा नहीं सकता। और नोटिस पर सरकारी जवाब सियासी जरुरतो की तिकड़मों से पार पा नहीं सकता। तो होगा क्या। सरकारी शिक्षा फेल होगी। प्राइवेट स्कूल कुकुरमुत्ते की  तरह फले-फुलेंगे। सरकारी हेल्थ सर्विस फेल होगी। निजी अस्पताल मुनाफे पर इलाज करेंगे। घर बिल्डर देगा। तो घर के लिये फ्लैटधारकों की जिन्दगी बिल्डर के दरवाजे पर बंधक होगी। यानी जीने के अधिकार के तहत ही जब न्यूनतम जरुरत शिक्षा, स्वास्थ्य और घर तक से चुनी हुई सरकारें पल्ला झाड़ चुकी हो तब सिवाय लूट के होगा क्या सियासत लूट के कानून को बनाने के अलावा करेंगी क्या। और सुप्रीम कोर्ट सिवाय संवैधानिक व्याख्या के करेगा क्या। हालात ये है कि 18 करोड़ स्कूल जाने वाले बच्चो में 7 करोड़ बच्चों का भविष्य निजी स्कूलों के हाथो में है। सरकार का शिक्षा बजट 46,356 करोड़ है तो निजी स्कूलों का बजट 8 लाख करोड से ज्यादा है। यानी देश की न्यूनतम जरुरत, शिक्षा भी सरकार नहीं बाजार देता है। जिसके पास जितना पैसा। और पैसे के साथ उन्हीं नेताओं की पैरवी, जो जिम्मेदारी मुक्त है। और तो और नेताओ के बडी कतार चाहे सरकारी स्कूल में बेसिक इन्फ्रस्ट्रक्चर ना दे पाती हो लेकिन उनके अपने प्राईवेट स्कूल खूब बेहतरीन हैं। इसीलिये निजी  स्कूलों की कमाई सरकारी स्कूलो के बजट से करीब सौगुना ज्यादा है। तो मां-बाप क्या करें । सुप्रीम कोर्ट के नोटिस पर 21 दिन बाद आने वाले जवाब का इंतजार करें ।

और इस बीच चंद दिनो पहले की खबर की तरह खबर आ जाये कि गोरखपुर में 125 बच्चे । तो फर्रुखाबाद में 38 और सैफई में 98 बच्चे मर  गये। बांसवाडा में भी 90 बच्चे मर गये। ये सच बीते दो महीने का है तो मां-बाप शिक्षा के साथ अब बच्चो के जिन्दा रहने के लिये इलाज की तालाश में भटके। और इलाज का आलम ये है कि 100 करोड जनसंख्या जिस सरकारी इलाज पर टिकी है उसके लिये बजट 41,878 करोड का है। 25 करोड नागरिकों के लिये प्राइवेट इलाज की इंडस्ट्री 6,50,000 करोड पार कर चुकी है। यानी इलाज की जगह सरकारी अस्पतालो में मौत और मौत की एवज में करोड रुपये का मुनाफा।  तो दुनिया में भारत ही एकमात्र एसा देश है जहा शिक्षा और हेल्थ सर्विस का सिर्फ निजीकरण हो चला है बल्कि सबसे मुनाफे वाली इडस्ट्री की तौर पर शिक्षा और हेल्थ ही है। तो मां-बाप क्या करें। जब शिक्षा के नाम पर  कत्ल हो जाये । इलाज की एवज में मौत मिले। और एक अदद घर के लिये खुद को ही बिल्डर के हाथो रखने की स्थिति आ जाये और चुनी हुई सरकार पल्ला झाड ले तो फिर सुप्रीम कोर्ट का ये कहना भर आक्सीजन का काम करता है कि , " बैंक बिल्डर का नहीं फ्लैटधारको को फ्लैट दिलाने पर ध्यान दें। बिल्डर डूबता है तो डूबने दें।" तो जो बात सुप्रीम कोर्ट संविधान की व्यख्या करते हुये कह सकता है उसके चुनी हुई सरकारे सत्ता भोगते हुये लागू नहीं कर  सकती। क्योंकि सवाल बच्चो की मौत के साथ हर पल मां बाप के मर के जीने का भी होता है। इसीलिये गुरुग्राम के श्यामकुंज की गली नं 2 में जब नजर कत्ल किये जा चुके प्रद्यु्म्न 50 गज के घर पर पडती है तो कई सवाल हर जहन  में रेंगते है। क्योंकि पूरी कालोनी जिस त्रासदी को समेटे प्रद्युम्न की मां ज्योति ठाकुर को सांतवना देने की जगह खुद के बच्चे की तस्वीर आंखों  में समेटे है। वह मौजूदा सिस्टम के सामने सवाल तो हैं। क्योंकि बच्चे का कत्ल ही नहीं बल्कि सिर्फ बच्चे को पालने के आसरे पूरा परिवार कैसे जिन्दगी जीता है उसकी तस्वीर ही प्रद्युम्न के घर पर मातम के बीच खामोशी तले पसरी हुई है।

और फैलते महानगरो में हाशिये पर पड़े लोगों के बीच देश के किसी भी हिस्से में चले जाइये इस तरह पचास गज की जमीन पर घर बनाकर बच्चो को बेहतर जिन्दगी देने की एवज में खुद जिन्दगी से दो दो हाथ करते  परिवार आपको दिखायी दे जायेगें । और बच्चो को पढाने के नाम पर इन्हीं परिवारो की जेब में डाका ढाल कर इस देश में सालाना दो लाख करोड़ की फिस-डोनेशन प्राइवेट स्कूलों से ली जाती है।  सबसे ज्यादा जमीन शिक्षा के  नाम पर प्राईवेट-कान्वेंट स्कूल को मिल गई। सिर्फ एक रुपये की लीज पर। तीस बरस के लिये। इसी दौर में प्राइवेट शिक्षा का बजट देश के शिक्षा बजट से 17 गुना ज्यादा का हो गया।  तो जो परिवार रेयान स्कूल में कत्ल के बाद फूट पडे । उन स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चो को मां-बाप के लिये चुनी हुई सरकारें क्या वाकई कुछ सोचती भी हैं। क्योंकि आज का सच यही है कि प्राइवेट स्कूलों की फीस भरने में मां-बाप की कमर दोहरी हो रही है। एसोचैम का सर्वे कहता है कि बीते चार साल में निजी स्कूलों की फीस 100 से 120 फीसदी बढ़ गई है । प्राइवेट स्कूलों की फीस हर साल औसतन 10 से 20 फीसदी बढ़ाई जाती है । बच्चो की पढाई को लेकर मंहगाई मायने नही रखती । स्कूलो की मनमानी पर कोई रोक लगती नहीं । मसलन महानगरो में एक बच्चे को पढाने का सालाना खर्च किस रफ्तार से बढा । उसका आलम ये है कि 2005 में 60 हजार । 2011 में 1 लाख बीस हजार । तो 2016 में 1 लाख 80 हजार सालाना हो चुका है।यानी महानगरो में किसी परिवार से पूछियेगा कि एक ही बच्चा क्यों तो जवाब यही आयेगा कि दूसरे बच्चे को पैदा तो कर लेंगे लेकिन पढायेंगे कैसे । यानी बच्चो की पढाई परिवार की वजह से पहचाने वाले देश में परिवार को ही खत्म कर रही है । लेकिन सिर्फ प्राइवेट स्कूल ही क्यो । पढाई के लिये ट्यूशन एक दूसरी ऐसी इंडस्ट्री है जिसके लिये स्कूल ही जोर डालते है । आलम ये है कि देश का शिक्षा बजट 46,356 करोड का है । और  ट्यूशन इंडस्ट्री तीन लाख करोड़ रुपए पार कर चुकी है । एसोचैम का सर्वे कहता है कि महानगरों में प्राइमरी स्कूल के 87 फीसदी छात्र और हाई स्कूल के 95 फीसदी छात्र निजी ट्यूशन लेते हैं । महानगरों में प्राइवेट ट्यूटर एक क्लास के एक हजार रुपए से चार हजार रुपए वसूलते हैं जबकि ग्रुप ट्यूशन की फीस औसतन 1000 रुपए से छह हजार रुपए के बीच है । यानी दो जून की रोटी में
मरे जा रहे देश में नौनिहालो की पढाई से लेकर इलाज तक की जिम्मेदारी से चुनी हुई सरकारे ही मुक्त है ।  क्योकि देश की त्रासदी उस कत्ल में जा उलझी है जिसका आरोपी दोषी नहीं है और दोषी आरोपी नहीं है क्योकि उसकी ताकत राजनीतिक सत्ता के करीब है । जब काग्रेस सत्ता में तो कांग्रेस के करीब और अब बीजेपी सत्ता में तो बीजेपी के करीब रेयान इंटरनेशनल की एमडी ग्रेस पिंटो । यू देश का सच तो ये भी है कि देश के 40 फीसदी निजी स्कूलों या शैक्षिक संस्थानों के मालिक राजनीतिक दलों से जुड़े हैं । बाकि अपने ताल्लुकात राजनीति सत्ता से रखते है । क्योंकि ध्यान दीजिए तो डीवाई पाटील,शरद पवार, सलमान खुर्शीद, छगन भुजबल, जगदंबिका पाल, जी विश्वानाथन,ज्योतिरादित्य सिंधिया, शिवपाल यादव, मनोहर जोशी,अखिलेश दास गुप्ता,सतीश मिश्रा जैसे नेताओं की लंबी फेहरिस्त है,जिनके स्कूल हैं या जो स्कूल मैनजमेंट में सीधे तौर पर शामिल हैं ।तमिलनाडु में तो 50 फीसदी से ज्यादा शैक्षिक संस्थान राजनेताओं के हैं । महाराष्ट्र में भी 40 से
50 फीसदी स्कूल राजनेताओं के हैं तो उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में भी यही हाल है । दरअसल, शिक्षा अब एक ऐसा धंधा है, जिसमें कभी मंदी नहीं आती। स्कूल की मंजूरी से लेकर स्कूल के लिए तमाम दूसरी सरकारी सुविधाएं लेना राजनेताओं के लिए अपेक्षाकृत आसान होता है और स्कूल चलाने के लिए जिस मसल पावर की जरुरत होती है-वो राजनेताओं के पास होती ही है। तो एक बच्चे की हत्या के बाद मचे बवाल से सिस्टम ठीक होगा यही ना देखियेगा । कुछ वक्त बाद परखियेगा रेयान इंटरनेशनल स्कूल में 7 बरस के बच्चे की हत्या ने किस किस को लाभ पहुंचाया।

भयानक बीमारी के एक साल बाद, बिलकुल निजी बात

जंतर-मंतर - Mon, 11/09/2017 - 16:45
शेष नारायण सिंह 


आज सुबह से मन बेचैन है . ठीक एक साल पहले ११ सितम्बर २०१६ के दिन ही मेरे बच्चे मुझे ग्रेटर नोयडा के एक कसाई अस्पताल से निकाल कर वंसत कुञ्ज, नई दिल्ली  के Institute of Lever and Biliary Sciences  लेकर गए थे . ३१ अगस्त को मुझे बुखार हो गया था . पड़ोस के एक नामी अस्पताल में दाखिल हो गया . दो दिन बाद ही वहां से छुट्टी मिल गयी . बाद में पता चला कि मुहे चिकनगुनिया था लेकिन उस अस्पताल  के डाक्टर ने वाइरल बुखार  बताकर , अच्छा पैसा लेकर मुझे विदा कर दिया . घर आया तो हालत फिर बिगड़ गयी . एक दूसरे अस्पताल में भर्ती हो गया . चिकनगुनिया की पहचान हो गयी लेकिन इलाज में भारी  लापरवाही शुरू हो गयी. हालत बिगडती गयी . उसके बाद तो पूरे परिवार पर मुसीबतों की बयार बहने लगी. मेरी बड़ी बेटी दिल्ली के अपने घर से अपने सास ससुर और पति के साथ मुझे देखने आ रही थी. कार का एक्सीडेंट हो गया . उसके ससुर जी के हाथ में बड़ा फ्रैक्चर हो गया . वह भी उसी अस्पताल में  भर्ती  हो गए.   जो भी मुझे देखने आता था उसका चेहरा देख कर मुझे शक होने लगा कि मेरी हालत  ठीक  नहीं है .मेरी बेटी  ने अपने भाई को मुंबई में बता दिया कि पापा बहुत बीमार हैं. बेटा अपनी बहू के साथ आ गया . बहू का बहनोई भी मुझे देखने आया था  . उसने भी उन लोगों को फोन पर बिगड़ते हालात की जानकारी दे दी थी. मेरी बहू ने मुझे  देखते ही इस अस्पताल से हटाने की जिद पकड़ ली. लेकिन मैं किसी अपोलो टाइप अस्पताल में जाने को  तैयार नहीं था . इस कसाई अस्पताल वाले इतने गैरज़िम्मेदार थे कि मेरे विजिटर्स को बताना शुरू कर चुके थे कि इनको सेप्टोसेमिया का शक है लेकिन मेरे बच्चों को  नहीं बता रहे थे . मेरी  दूर की एक बहन के पति ने मेरी सेवा के लिए  दो कर्मचारी तैनात कर दिया था . जब उनको पता चला कि मेरी हालत बिगडती जा रही  है तो उन्होंने मुझसे धीरे से कहा कि 'भाई साहब बच्चों की बात मान लीजिये '. इसी बीच मेरे एक बहुत बड़े नेता मित्र का फोन आया . उनको मैं बता नहीं पा रहा था  . फिर मेरे बेटे से उनकी बात हुयी और उन्होने फ़ौरन इंतज़ाम कर दिया. वसंत कुञ्ज वाले अस्पताल के निदेशक डाक्टर एस के सरीन उनके मित्र थे . रविवार का दिन था लेकिन जाते  ही भर्ती हो गयी .  फिर इलाज़ शुरू   हो गया . तीन दिन बाद डॉ सरीन ने कहा  कि अब आप खतरे से बाहर हैं . तब मुझे अंदाज़ लगा कि  मैं खतरे  में था, मेरी हालत बहुत खराब थी .  मेरी छोटी बेटी अपनी नौकरी की परवाह किये बिना  बंगलोर से आ गयी . मेरे भाई  और बहन गाँव से आ गए. मुझसे  छः साल छोटा मेरा भाई  बस जम गया . मेरे और अपनी भाभी के साथ हमेशा खड़ा  रहा. मेरी बहन ने सारा ज़िम्मा उठा लिया . मेरी छोटी बेटी ने अपने छोटे बेटे को अपनी बड़ी बहन के यहाँ दिन में छोड़कर लगभग पूरा समय अस्पताल में बिताया . बड़ी   बेटी के परिवार ने पूरा साथ दिया . मेरी बहू ने इलाज़ और बीमारी का हर स्तर पर मूल्यांकन किया  . ग्रेटर नोयडा के अस्पताल में डाक्टरों की लापरवाही के चलते   बीमारी बहुत बिगड़ गयी थी . सोडियम, किडनी, लिवर , यू टी  आई आदि   भांति भांति की बीमारियाँ हो गयी थीं.  पाँव और कमर की मांशपेशियाँ शिथिल हो गयी थीं, उठकर बैठ पाना असंभव हो गया था. सैकड़ों टेस्ट हुए. डॉ सरीन सब कुछ रूल आउट कर देना चाहते थे . मेरी छोटी बेटी इस बीमारी में मेरी मां बन गयी, बड़ी बेटी सब की गार्जियन बन गयी. हर शुक्रवार को मेरा बेटा मुंबई से दिल्ली आता  रहा  और मेरी बहू इसी बीमारी  में  तीसरी  बेटी बन गयी. सब कुछ रूल आउट करने के चक्कर में डॉ सरीन और डॉ  सुमन लता मेरी रीढ़ की  बायोप्सी  कराना चाहते थे. मेरे बच्चों के बीच  मतभेद हो गया और काफी विवाद  हो गया . शुरू में  मैने भी मना कर दिया था लेकिन डॉ सरीन के आग्रह के बाद वह  भी हो गया . उन्होंने कैंसर और टीबी के भी सारे टेस्ट करवा लिए  और रूल आउट किया . मैं ठीक होकर आ गया .  तीन महीने घर पर रहकर फिजियोथिरेपी करवाई तब चलना फिरना  शुरू हुआ. इस बीच चिंता  रहती थी  कि  जहां काम कर रहा था , वहां कोई  नुक्सान न हो जाए लेकिन देशबंधु और टीवी 18 के अधिकारियों ने  लगातार भरोसा दिलाया कि आप स्वास्थ्य ठीक करिए , सब ठीक हो जाएगा . मेरे खाते में नियमित रूप से  मेरा वेतन आता रहा .आज एक साल बाद उन घटनाओं को याद करता हूँ तो डर लग जाता है. इस बीमारी के  दौरान  मैंने  सब के चेहरे देखे और मुझे साफ़ लगता था कि  वे लोग  घबडाए हुए थे लेकिन मेरी पत्नी  चौबीसों घंटे अस्पताल में मेरे साथ रहते हुए  कहती रहीं कि सब ठीक  हो जाएगा . आज जो यह ज़िंदगी है यह इन्हीं लोगों की है जिन्होंने इसको बचाया . इंदु , पप्पू, गुड्डी,  टीनीचा, बुलबुल, लालन ,सूबेदार, मुन्नी आज एक साल बाद मन कह रहा है कि तुम सबको एक साथ बैठाकर देखूं . तुम लोगों  ने मुझे बचाया .  वरना आज मैं न होता 

गौरी लंकेश की शहादत ने पत्रकारिता के लिए बहुत सारे सवाल छोड़े हैं .

जंतर-मंतर - Mon, 11/09/2017 - 10:09


शेष नारायण सिंह
कर्नाटक की राजधानी बंगलूरू में पत्रकार गौरी लंकेश की हत्या कर दी गयी . ज़ाहिर है उनके  दुश्मनों ने उनको मार डाला.  कौन   हो सकते हैं यह दुश्मन ? कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने तुरंत आरोप लगा दिया कि आर एस एस और बीजेपी वालों का हाथ हो सकता  है . इस बात में दो राय नहीं  है कि गौरी लंकेश  बीजेपी और  दक्षिणपंथी राजनीति के खिलाफ खूब लिखती थीं . प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ भी खूब लिखती थीं लेकिन इसका मतलब यह कत्तई नहीं है कि प्रधानमंत्री की पार्टी के  लोग किसी पत्रकार की हत्या कर देंगें . राहुल गांधी के बयान के बाद केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने  टिप्पणी की है कि जब राहुल गांधी ने ऐलानियाँ बीजेपी और आर एस एस पर आरोप लगा दिया  है तो उनकी पार्टी की सरकार के लिए निष्पक्ष जांच कर पाना बहुत मुश्किल है . लिहाजा जांच किसी  निष्पक्ष एजेंसी से करवाई जानी चाहिए . एक बात साफ़ हो गयी है कि गौरी लंकेश की हत्या के बाद उस पर राजनीति शुरू हो गयी है . राजनीतिक रोटी सेंकने से लोगों को बाज आना चाहिए क्योंकि  अगर  जांच के बाद यह पाया गया कि  गौरी लंकेश की  हत्या उनके लेखन के कारण हुयी  है तो यह बहुत ही गंभीर  मामला है और इसका मतलब सीधे प्रेस और अभिव्यक्ति  की आज़ादी के सवाल से जुड़ जाता है . इसके अलावा उनकी हत्या के बाद  बहुत सारे सवाल एक बार फिर बहस के दायरे में आ  गए हैं .  गौरी लंकेश आर एस एस और बीजेपी के विचारों की धुर विरोधी थीं , उसके खिलाफ खूब जमकर लिखती थीं. उनकी हत्या के बाद सोशल मीडिया पर चर्चा शुरू हो गयी है कि आर एस एस के लोगों ने ही उनकी हत्या की है , एक दूसरा वर्ग भी है जो उनकी हत्या के लिए वामपंथी विचारों के टकराव को ज़िम्मेदार ठहरा रहा है . इस वर्ग में लोग उनके भाई को भी शामिल कर रहे  हैं. इसी वर्ग से यह बात भी कही जा रही है कि कर्नाटक के पड़ोसी राज्य केरल में  आर एस एस के कार्यकर्ताओं की बड़े पैमाने पर राजनीतिक हत्या  हो रही है और उस पर भी रोक लगाई जानी चाहिए. आरोप लगाए जा रहे हैं कि यह हत्याएं बाएं बाजू की राजनीति  के लोग ही कर रहे हैं . गौरी लंकेश को न्याय मिले इसके लिए ज़रूरी है कि अभी किसी को ज़िम्मेदार ठहराने की जल्दी  नहीं की जानी चाहिए  क्योंकि उस से जांच के काम में बाधा पड़ सकती  है.
अपने देश में प्रेस की आज़ादी की  व्यवस्था  संविधान में ही निहित ही . संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) में अभिव्यक्ति की स्वत्रंत्रता की व्यवस्था दी गयी है, प्रेस की आज़ादी उसी से निकलती  है . इस आज़ादी को सुप्रीम कोर्ट ने अपने बहुत से फैसलों में सही ठहराया है . १९५० के  बृज भूषण बनाम दिल्ली राज्य  और १९६२ के सकाळ पेपर्स  प्राइवेट लिमिटेड बनाम यूनियन आफ इण्डिया के फैसलों में  प्रेस की अभिव्यक्ति की आज़ादी को मौलिक अधिकार के  श्रेणी में रख दिया  गया है . प्रेस की यह आज़ादी निर्बाध ( अब्सोल्युट ) नहीं है . संविधान के मौलिक अधिकारों वाले अनुच्छेद 19(2) में ही उसकी सीमाएं तय कर दी गई हैं.  संविधान में लिखा है  कि  अभिव्यक्ति की आज़ादी के "अधिकार के प्रयोग पर भारत की प्रभुता और अखंडता, राज्य की सुरक्षा, विदेशी राज्यों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंधों, लोक व्यवस्था, शिष्टाचार या सदाचार के हितों में अथवा न्यायालय-अवमान, मानहानि या अपराध-उद्दीपन के संबंध में युक्तियुक्त निर्बंधन जहां तक कोई विद्यमान विधि अधिरोपित करती है वहां तक उसके प्रवर्तन पर प्रभाव नहीं डालेगी या वैसे निर्बंधन अधिरोपित करने वाली कोई विधि बनाने से राज्य को निवारित नहीं करेगी. "  यानी प्रेस की आज़ादी तो मौलिक अधिकारों के तहत कुछ भी लिखने की आज़ादी  नहीं है . शायद  संविधान के अनुच्छेद १९ (२)  के उन्लंघन के आरोप में ही  गौरी  लंकेश को मानहानि के एक मुक़दमे में सजा भी हो चुकी है और मामला  ऊंची अदालत में अपील में लंबित है.
लेकिन इसके साथ ही  और भी सवाल  उठ रहे  हैं  कि यदि किसी के लेखन से किसी को एतराज़ है और वह मानता है पत्रकार ने 19(2) का उन्लंघन किया  है तो क्या उसको मार डालना  सही है ? . इस तर्क की परिणति बहुत ही खतरनाक है और इसी तर्क से लोकशाही को ख़तरा  है . गौरी लंकेश की हत्या के बाद उनके पुराने लेखों का ज़िक्र किया जा  रहा है जिसमें उन्होंने ऐसी बातें लिखी थीं जो एक वर्ग को स्वीकार नहीं हैं. सोशल मीडिया पर सक्रिय यह वर्ग उनके चरित्र हनन का प्रयास भी कर रहा है और जो कुछ भी उस वर्ग से आ रहा है उसका सन्देश यह है कि गौरी की  हत्या ज़रूरी था और जो हुआ वह ठीक ही हुआ.  आज ज़रूरत इस बात की है कि इस तरह की प्रवृत्तियों की निंदा की जाये .निंदा हो भी  रही है.  गौरी लंकेश की हत्या के अगले ही दिन देश भर में पत्रकारों ने सभाएं कीं , जूलूस निकाले  , सरकारों से हत्या  जांच की मांग की और तय किया कि मीडिया को निडर रहना है . दिल्ली के  प्रेस क्लब में एक सभा का आयोजन हुआ जिसमें लगभग सभी बड़े पत्रकार शामिल हुए और गौरी लंकेश की ह्त्या करने वालों को फासिस्ट ताक़तों का प्रतिनिधि बताया. कोलकाता प्रेस क्लब के तत्वावधान में प्रेस क्लब से गांधी जी की मूर्ति तक एक जुलूस निकाला . मुंबई में सामाजिक कार्यकर्ता ,पत्रकार, फिल्मकार ,अभिनेत्ता इकठ्ठा हुए और असहमत होने के अधिकार को लोकशाही का सबसे महत्वपूर्ण अधिकार बताया और  गौरी लंकेश की  हत्या को प्रेस की आज़ादी की हत्या बताया .असुविधाजनक लेख लिखने के लिए अगर लोगों की हत्या को सही  ठहराया जाएगा तो बहुत ही मुश्किल होगी . लोकतंत्र के अस्तित्व पर ही  सवालिया निशान  लग जाएगा.  इस लोकतंत्र को बहुत ही मुश्किल से हासिल किया  गया है और उतनी ही मुश्किल इसको संवारा गया है . अगर मीडिया जनता को सही बातें और वैकल्पिक दृष्टिकोण नहीं पंहुचाएगा तो सत्ता पक्ष के  लिए भी मुश्किल होगी. इंदिरा  गांधी ने यह गलती १९७५ में की थी. इमरजेंसी में सेंसरशिप लगा दिया था . सरकार के खिलाफ कोई भी खबर नहीं छप सकती थी. टीवी और रेडियो पूरी तरह से सरकारी नियंत्रण में थे , उन के पास  तक  जा सकने वालों में सभी चापलूस होते थे, उनकी जयजयकार करते रहते थे इसलिए उनको  सही ख़बरों का पता  ही नहीं लगता था . उनको  बता दिया गया कि देश में उनके पक्ष में बहुत भारी माहौल है और वे दुबारा भी बहुत ही आराम से चुनाव जीत जायेंगीं .  चुनाव करवा दिया और उनकी राजनीति में १९७७ जुड़ गया  .
प्रेस की आज़ादी सत्ता पक्ष के लिए बहुत ज़रूरी है . सत्ताधारी जमातों को अगर वैकल्पिक दृष्टिकोण नहीं  मिलेंगे तो चापलूस नौकरशाह  और  स्वार्थी नेता  सच को ढांक कर राजा से उलटे सीधे  काम करवाते रहेंगें . भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को यह बात बहुत ही   अच्छी तरह  मालूम थी इसीलिए उन्होंने कहा था ," मैं पीत पत्रकारिता से नफरत करता हूँ , लेकिन आपके पीत पत्रकारिता करने के अधिकार की रक्षा के लिए हर संभव कोशिश करूंगा ".लोकतंत्र को अगर जनता के लिए उपयोगी बनाना है  तो सत्ताधारी जमातों  को निष्पक्ष और निर्भीक पत्रकारिता  को व्यावहारिकता के साथ लागू करने के उपाय करने होंगे .प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी पार्टी से  यह उम्मीद तो की ही जानी चाहिए  कि वे वह गलतियाँ न करें जो इंदिरा गांधी  ने की थी. इंदिरा गांधी के भक्त और तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष देवकांत बरुआ ने प्रेस सेंसरशिप के दौरान नारा दिया था कि  ' इंदिरा इज इण्डिया ,इण्डिया इज  इंदिरा ,' इसी .तरह से जर्मनी के तानाशाह हिटलर के तानाशाह बनने के पहले उसके एक चापलूस रूडोल्फ हेस ने नारा दिया था कि  ,' जर्मनी इस हिटलर , हिटलर इज जर्मनी '.   रूडोल्फ हेस नाजी पार्टी में बड़े पद पर था .मौजूदा शासकों को इस तरह की प्रवृत्तियों से बच कर रहना चाहिए  क्योंकि मीडिया का चरित्र बहुत ही अजीब होता  है . जब इंदिरा गांधी बहुत सारे लोगों को जेलों में बंद कर रही थीं , जिसमें पत्रकार भी शामिल थे तो चापलूसों और पत्रकारों का एक वर्ग किसी को भी आर एस एस या कम्युनिस्ट  पार्टी का सदस्य  बताकर गिरफ्तार करवाने की फ़िराक में रहता था . उस दौर में भी बहुत सारे पत्रकारों ने आर्थिक लाभ के लिए सत्ता की चापलूसी में चारण शैली में पत्रकारिता की . वह ख़तरा आज भी ख़तरा बना हुआ है . चारण पत्रकारिता  सत्ताधारी पार्टियों  की सबसे  बड़ी दुश्मन है क्योंकि वह सत्य पर पर्दा डालती है और सरकारें गलत फैसला लेती हैं . ऐसे माहौल में सरकार की ज़िम्मेदारी बनती है कि वह मीडिया को निष्पक्ष और निडर बनाए रखने में योगदान करे  . चापलूस पत्रकारों से पिंड छुडाये . इसके संकेत दिखने लगे हैं . एक आफ द रिकार्ड बातचीत में बीजेपी के मीडिया से जुड़े एक नेता ने बताया कि जो पत्रकार टीवी पर हमारे पक्ष में नारे लगाते रहते है , वे उनकी पार्टी का बहुत नुक्सान करते हैं . भारतीय जनता पार्टी के बड़े नेताओं में इस तरह की सोच एक  अच्छा संकेत है . गौरी लंकेश की हत्या की जांच पर अगर सच को  ढंकने की कोशिश करने वालों से बचा लिया गया तो यह देश की  पत्रकारिता  के लिए बहुत  ही अच्छा होगा  .  सरकार को चाहिए कि पत्रकारों के सवाल पूछने के  अधिकार और आज़ादी को सुनिश्चित करे . साथ ही संविधान के अनुच्छेद १९(२) की सीमा में  रहते हुए कुछ भी लिखने की  आज़ादी और अधिकार को सरकारी तौर पर गारंटी की श्रेणी में ला दे . इससे निष्पक्ष पत्रकारिता का बहुत लाभ होगा.  ऐसी कोई व्यवस्था कर दी जाए जो सरकार की चापलूसी करने को  पत्रकारीय  कर्तव्य पर कलंक माने और इस तरह का काम करें वालों को हतोत्साहित करे.

रामचंद्र छत्रपति : पब्लिक इंटेलक्चुअल जर्नलिस्ट एक्टिविस्ट

एक ज़िद्दी धुन - Sat, 09/09/2017 - 17:59
रामचंद्र छत्रपति : एक रोशन मशाल`असहमति का साहस और सहमति का विवेक``सच और झूठ के बीच कोई तीसरी चीज़ नहीं होती और मैं सच के साथ हूँ।`` मैं अपनी बात पत्रकार रामचंद्र छत्रपति के अखबार ``पूरा सच`` के इस मोटो से शुरु करना चाहता था पर अचानक रामचंद्र छत्रपति पर लिखे गए एक अन्य लेख पर नज़र पड़ी जिसकी शुरुआत इसी पंक्ति से थी तो लगा कि अब यह नकल करने वाली बात होगी। लेकिन इस पंक्ति को छोड़कर आगे बढ़ पाना संभव नहीं हो सका। ``बीच का रास्ता नहीं होता`` - यह पंजाबी कवि अवतार सिंह पाश की मशहूर पंक्ति है जो उनके एक काव्य संग्रह का भी नाम है। क्या यह मात्र संयोग है कि रास्ता चुनने को लेकर दोनों के बीच ऐसी स्पष्टता थी और दोनों को ही गोलियों का सामना करते हुए शहीद होना पड़ा? पाश की हत्या भी धर्म के नाम पर खालिस्तान की मांग के समर्थक आतंकवादियों ने कर दी थी तो छत्रपति को ``डेरा सच्चा सौदा` के नाम पर धर्म की आड़ में आतंक का पर्याय बने गुरमीत राम रहीम के गुर्गों ने मार दिया था। फिलहाल गुरमीत अपने डेरे की साध्वियों के साथ रेप के अपराध में जेल पहुंच चुका है और उस पर हत्या के मामलों में फैसला आना बाकी है। इसके बावजूद यह अपराधी और उसका डेरा अभी भी ताकतवर है तो समझ सकते हैं कि उस समय तो उसकी कारगुजारियों को लेकर मुंह खोलने का साहस प्राय: किसी में नहीं था।
 
यह बात साफ करता चलूं कि छत्रपति की महान शहादत को उनके महिमामंडन का जरिया न मान लिया जाए। उनका व्यक्तित्व और सचाई के प्रति उनकी ज़िद उनकी हत्या की गारंटी की तरह जरूर थी पर यह हादसा पेश नहीं आता तो भी वे इसी सम्मान से लिखे जाने के हकदार थे। यह जरूर है कि हम उन्हें उनकी शहादत की वजह से ही जान पाए। डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम का फैसला रोकने के लिए जिस तरह कोर्ट पर दबाव बनाया गया और जिसके लिए कोर्ट ने हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर व उनकी सरकार को फटकार भी लगाई, उससे भगवान होने का स्वांग रचने वाले इस अपराधी की ताकत का अंदाजा लगाया जा सकता है। यहां तक कि इस फेर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तक पर कोर्ट ने तीखी टिप्पणी की। गुरमीत को जैसे ही पंचकूला की सीबीआई कोर्ट ने साध्वियों के यौन शोषण का दोषी करार दिया, प्रदेश सरकार का संरक्षण पाकर इकट्ठा हुए कथित श्रद्धालुओं ने हिंसा और आगजनी शुरु कर दी। इस उपद्रव में पंचकूला व दूसरी कई जगहों पर निजी और सरकारी संपत्तियों के भारी नुकसान के साथ 36 लोगों की मौत हुई। गुरमीत राम-रहीम और उसके अनुयायियों की तरह उसके जलवे को जानने वाले किसी भी व्यक्ति के लिए यह अविश्वसनीय था कि धर्म का कवच पहने बैठे इस अपराधी को इस अंजाम तक पहुंचाया जा सकता है। इस संघर्ष में अडिग रही दोनों साध्वियों, सीबीआई के ईमानदार अधिकारियों, जज जगदीप सिंह सहित जिन कुछ लोगों की प्रतिबद्धता की वजह से यह संभव हो सका, उनमें एक नाम पत्रकार रामचंद्र छत्रपति का भी है।
छत्रपति उसी सिरसा शहर के रहने वाले थे जहां `डेरा सच्चा सौदा` का मुख्यालय है। छत्रपति सांध्य दैनिक `पूरा सच` निकालते थे। 1948 में शाह मस्ताना द्वारा शुरु किए गए `डेरा सच्चा सौदा` की गद्दी 1990 में गुरमीत सिंह ने हासिल कर ली थी और उसने अपने नाम के साथ राम रहीम भी जोड़ लिया था। 1998 में डेरे की जीप से कुचले गए बेगू गांव के एक बच्चे की मौत को लेकर हुए विवाद की खबर सिरसा के एक सांध्य दैनिक `रमा टाइम्स` ने छाप दी थी तो डेरे के अनुयायियों ने अखबार के दफ्तर पर जाकर पत्रकार विश्वजीत शर्मा को धमकी दी थी। तब पत्रकारों की एकजुटता के सामने डेरा प्रबंधन को लिखित माफी मांगनी पड़ी थी लेकिन देखते-देखते यह तय हो गया था कि डेरे की अनियमितताओं, अराजकता और भयंकर करतूतों के बारे में मुंह खोलना मौत को दावत देना है। 30 मई 2002 को छत्रपति ने अपने अखबार में डेरे की साध्वी की उस चिट्ठी को प्रकाशित किया था जिससे डेरे में साध्वियों के यौन शोषण की जानकारी पहली बार सार्वजनिक तौर पर दर्ज होकर लोगों में फैल गई थी। चिट्ठी बेनामी थी जो तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और पंजाब व हरियाणा उच्च न्यायलय को भेजी गई थी। शायद यह अखबारों के दफ्तरों में भी पहुंची थी पर इसे जगह `पूरा सच` में ही मिल सकी थी। दरअसल 30 मई को सिरसा के रोडी बाजार में डेरे के एक कार ड्राइवर की एक पुलिस अधिकारी से झड़प हो गई थी। पुलिस अधिकारी ने डेरे की साध्वी की ओर से लिखी गई चिट्ठी का जिक्र आम लोगों के बीच कर दिया था। छत्रपति ने अपने अखबार में एक खबर ``कार चालक के हठ ने खोल दिया धार्मिक डेरे का कच्चा चिट्ठा`` शीर्षक से प्रकाशित की थी और ``धर्म के नाम पर किए जा रहे साध्वियों के जीवन बर्बाद`` शीर्षक से बॉक्स में उस चिट्ठी के मजमून का खुलासा किया था। इस खबर के छपते ही डेरा प्रमुख बौखला उठा था।
  डेरे की ओर से फोन कर छत्रपति को धमकियां दी गईं। बौखला गए डेरे ने एक के बाद एक गुंडागर्दी की कई घटनाओं का अंजाम दिया। साध्वी की उस अनाम चिट्ठी की किसी ने फोटोस्टेट प्रतियां रोडी बाजार में बांट दी थीं। डेरे के गुंडों ने एक चाय विक्रेता प्यारे लाल सेठी को उठाकर प्रताड़ित किया। इस चिट्ठी की चर्चा को लेकर रतिया में भी फोटोस्टेट की दुकान चलाने वाले दो लोगों पर हमले से हंगामा खड़ा हुआ। पत्रकार आरके सेठी ने फतेहाबाद से निकलने वाले अपने सांध्य दैनिक `लेखा-जोखा` में 7 जून को चिट्ठी के बारे में जांच की मांग को लेकर खबर छापी तो उसी दिन इस अखबार के दफ्तर पर हमला कर दिया गया। पहले तो पुलिस ने डेरे के चार अनुयायियों का गिरफ्तार कर लिया पर बाद में डेरे के अनुयायियों की भीड़ के दबाव में संपादक सेठी को ही गिरफ्तार कर लिया। छत्रपति ने 7 जून को ही इस गुंडागर्दी के खिलाफ भी विस्तार से खबर छापी। इसी चिट्ठी के सिलसिले में डेरे से जुड़े लोगों ने 27 जून को डबवाली में एक वकील से बदतमीजी की और उनके चैम्बर का ताला तोड़ने की कोशिश की। `पूरा सच` ने डेरे के इस उपद्रव की खबर भी छापी। डबवाली में ही 14 जुलाई को डेरे के लोगों ने एक स्कूल में चल रही तर्कशीलों की बैठक पर हमला कर मारपीट की। डेरे को शक था कि तर्कशीलों की बैठक में साध्वी की चिट्ठी को लेकर कोई योजना बनाई जा रही थी। इस गुंडागर्दी को लेकर भी छत्रपति ने तथ्यों के साथ समाचार प्रकाशित किया। आखिरकार डेरे के प्रतिनिधिमंडल ने सिरसा के उपायुक्त से मिलकर मांग की कि `पूरा सच` अखबार में डेरे से जुड़ी खबरों के प्रकाशन पर रोक लगाई जाए।
  इस बीच 20 जुलाई को `डेरा सच्चा सौदा` की प्रबंधन समिति के सदस्य रहे कुरुक्षेत्र के रणजीत सिंह की हत्या कर दी गई। रणजीत सिंह और उनकी साध्वी बहन डेरे से निकल गए थे। माना जाता है कि डेरा प्रमुख को शक था कि चिट्ठी रणजीत सिंह ने ही लिखवाई थी और उसी ने चिट्ठी व डेरे से जुड़ी जानकारियां रामचंद्र छत्रपति को दी हैं। इसी साल 2002 में 24 सितंबर को हाई कोर्ट ने साध्वियों के यौन शोषण से जुड़ी बेनामी चिट्ठी का संज्ञान लेते हुए डेरे की सीबीआई जांच के आदेश दिए। 24 अक्तूबर 2002 को रामचन्द्र छत्रपति को घर से बाहर बुलाकर पांच गोलियां मारी गईं। दो हमलावरों को मौके पर ही पकड़ लिया गया। ``पूरा सच`` के मुताबिक, हमलावरों को डेरा प्रमुख के आदेश पर डेरा प्रबंधक किशन लाल ने भेजा था। बुरी तरह घायल छत्रपति ने 21 नवंबर 2002 को दिल्ली के अपोलो अस्पताल में दम तोड़ दिया था।
गौरतलब है कि उस दौरान हरियाणा में इनेलो-बीजेपी गठबंधन की सरकार थी और केंद्र में बीजेपी के नेतृत्व में एनडीए की सरकार थी। डेरे का मुख्यालय सिरसा तत्कालीन मुख्यमंत्री ओमप्रकाश चौटाला का भी गृह जिला है और उनके पिता पूर्व उप प्रधानमंत्री चौ. देवीलाल के जमाने से ही यहां इस परिवार का भी प्रभाव रहा है। चौटाला ने छत्रपति के परिवार को इंसाफ दिलाने का वादा किया था जिस पर वह कायम नहीं रह सके। मुख्यमंत्री ने इस मामले की सीबीआई जांच की संस्तुति के अनुरोध को भी अनसुना कर दिया। इस बारे में सिरसा में तमाम तरह की चर्चाएं रही हैं। पीड़ित परिवार का कहना था कि पुलिस उनकी मदद करने के बजाय आरोपी को बचाने की कोशिश कर रही है। प्रदेश और केंद्र सरकारों के रवैये से निराश होकर रामचंद्र छत्रपति के पुत्र अंशुल छत्रपति ने जनवरी 2003 में हाई कोर्ट में याचिका दायर कर डेरा प्रमुख गुरमीत सिंह राम रहीम पर हत्या का आरोप लगाते हुए इस केस की सीबीआई से जांच कराने का अनुरोध किया। रणजीत सिंह के पिता भी बेटे की हत्या की सीबीआई जांच की मांग लेकर हाई कोर्ट पहुंचे थे। हाई कोर्ट ने हत्या के दोनों मामलों में सीबीआई जांच शुरु करा दी।
साध्वियों के यौन शोषण के केस में गुरमीत उर्फ राम-रहीम अदालत के फैसले से जेल पहुंच चुका है। उम्मीद की जानी चाहिए कि छत्रपति की हत्या समेत दूसरे मामलों में भी अदालत गुरमीत को सजा सुनाएगी। एक अपराजेय लगने वाली अन्यायी शक्ति से लोहा लेते हुए रामचंद्र छत्रपति शहीद हुए थे तो राष्ट्रीय मीडिया ने खबर को समुचित सम्मान नहीं दिया था। इन दिनों अपराजेय सी मानी जा रही बीजेपी की सत्ता की गोद में बैठे होने के बावजूद राम-रहीम को जेल जाना पड़ा तो राष्ट्रीय मीडिया को रामचंद्र छत्रपति की शहादत की याद आ रही है। हालांकि, छत्रपति की हत्या को जनता ने खामोशी से नहीं गुजर जाने दिया था। उनकी हत्या के विरोध में सिरसा अभूतपूर्व रूप से बंद रहा था। छत्रपति की अंतिम यात्रा में शामिल होने के लिए जनता उमड़ पड़ी थी। छोटा सा स्थानीय सांध्य अखबार चलाने वाले शख्स के लिए जितनी जनता उमड़ी थी, सिरसा में कभी भी उतनी जनता किसी प्रभावी से प्रभावी शख्स की अंतिम यात्रा में शामिल नहीं हुई थी। इसकी वजह सिर्फ यह नहीं थी कि मर्डर में स्वयंभू `भगवान` का हाथ होने से यह केस बेहद चर्चा में आ चुका था। दरअसल, छत्रपति उस शहर के आम लोगों के लिए बंद कोठरी में रोशनी की तरह थे। यह आम शोहरत थी कि जिसकी सुनने वाला कोई नहीं है, उसकी सुनने के लिए छत्रपति है। मार खाए सताए गरीब-गुरबा ही नहीं, शहरी मध्य वर्ग या संपन्न वर्ग भी जानता था कि वह अपने से ज्यादा ताकत वालों की टेढ़ी नज़र का शिकार हो तो उसकी बात को छापने का साहस सिर्फ और सिर्फ `पूरा सच` में है। यह एक लोकप्रिय पत्रकार के लिए शोकाकुल जनसमूह था। बेशक, इसमें ऐसा तबका भी था जो डेरे के उत्पीड़न का शिकार था या समाज में उसके आतंक को पसंद नहीं करता था। इस पत्रकार-एक्टिविस्ट की मृत्यु ने भी उनकी खबरों की तरह यह यह संदेश दिया था कि किसी भी आततायी सत्ता के सामने समर्पण के बजाय मुखर होना एकमात्र रास्ता है और फर्ज भी। वोटों के लालच और अनैतिक सांठगांठ की वजह से डेरे के मामलों में चुप रहने वाले राजनीतिक दलों के प्रतिनिधि भी छत्रपति के अंतिम संस्कार और शोकसभा में शामिल हुए थे हालांकि बाद में वे डेरे के ही साथ खड़े होते नज़र आए थे।
छत्रपति की ताकत सिर्फ यह नहीं थी कि वे निर्भीक पत्रकार थे। अगर वे सिर्फ इतना ही होते तो भी कम बड़ी बात न होती। छत्रपति सच के सामने खड़े होने वाले मुफस्सिल पत्रकार थे जिनका हर तरह की सत्ता से बैर था। डेरे के अलावा भी उनके अखबार ने कई बड़े नेताओं के कारनामों का खुलासा किया था। अपनी पुश्तैनी खेती-बाड़ी पर आश्रित इस संपादक-पत्रकार के लिए रोज अखबार छापना हर तरह `घर फूंक तमाशे` की तरह था। विज्ञापनों के लिए दर-दर गुहार लगाना न उनके स्वभाव में शामिल था और न उनका अखबार किसी भी तरह की सत्ताओं को खुश रखना जानता था। एक सच्चा पत्रकार हर तरह की सत्ता का प्रतिरोध होता है, प्राय: सिर्फ बोले जाने वाला यह वाक्य सहज रूप से उनके जीवन का हिस्सा था। वे पत्रकार थे, एक्टिविस्ट थे और शहर के लिखने-पढ़ने वालों को प्रेरित करने वाले कवि-लेखक-बुद्धिजीवी थे, किसी शहर के लाइट हाउस की तरह। यह एक ऐसी चीज़ थी जो उन्हें किसी सत्ता से टकरा जाने वाले महज ज़िद्दी पत्रकार से अलग करती थी। असल में वे एक `पब्लिक इंटेलक्चुअल जर्नलिस्ट एक्टिविस्ट` थे। इस बात को समझना हमें उनके महत्व को ठीक-ठीक समझने के लिए भी जरूरी है। इस एक बात पर गौर करना किसी कस्बे-शहर में सत्ताओं के प्रतिरोध में लगभग निष्कवच खड़े होने वाले पत्रकार के लिए भी जरूरी है।
छत्रपति प्रगतिशील लेखक संघ की सिरसा इकाई के उपाध्यक्ष थे। सिरसा के लिखने-पढ़ने वाले मित्र उनकी स्मृति में हर साल एक बड़ा सेमिनार आयोजित करते हैं और उनके नाम पर किसी बुद्धिजीवी को सम्मानित भी करते हैं। छत्रपति सम्मान पाने वालों में गुरदयाल सिंह, प्रो. अजमेर औलख, कुलदीप नैयर, प्रो. जगमोहन, रवीश कुमार, अभय कुमार दुबे, ओम थानवी जैसे जाने-माने बुद्धिजीवी-पत्रकार शामिल हैं। सिरसा के शिक्षक-बुद्धिजीवी परमानंद शास्त्री बताते हैं कि शहर का कवि-लेखक, बुद्धिजीवी वर्ग छत्रपति को गणेश शंकर विद्यार्थी की परंपरा के पत्रकार के रूप में याद करता है। उस युग में भी जबकि देश और समाज के लिए सब कुछ उत्सर्ग कर देने की एक परंपरा थी और उसका सम्मान भी था, विद्यार्थी जी एक विरल व्यक्तित्व थे। छत्रपति का जमाना वह जमाना नहीं था। बड़े घरानों के अखबार जनपक्षधरता के दिखावे तक से पल्ला झाड़ चुके थे। लोकल अखबारों की छवि प्राय: ब्लेकमेलिंग और मांगने-खाने के धंधे की बन गई थी। ऐसे दौर में उन्होंने धारा के विपरीत चलकर एक सांध्य दैनिक के जरिये पत्रकारिता की विश्वसनीयता और जनपक्षधरता की मिसाल कायम की।
छत्रपति हरियाणा पत्रकार संघ की सिरसा इकाई के जिला प्रधान भी थे और इस वजह से उनका लकब प्रधानजी ही पड़ गया था। उनके निधन पर हरियाणा भर में पत्रकारों ने प्रदर्शन किए थे। सिरसा में पत्रकारों ने डेरे की खबरें नहीं छापने का फैसला भी लिया था जो कई साल जारी रहा पर बाद में यह बरकरार नहीं रह सका। इसकी एक वजह `बड़े` अखबारों का प्रबंधतंत्र भी रहा। डेरे की तरफ से पत्रकारों को कोई बहुत बड़े विज्ञापन या एकाध अपवाद को छोड़कर कोई बड़े निजी लाभ दिए जाते हों,ऐसा भी नहीं रहा। अखबारों से डेरे के संबंध डेरे के लोगों की अकड़ और शर्तों पर ही चलते रहे हैं। डेरे के खिलाफ पड़ने वाली बड़ी खबरें भी अक्सर सिरसा के बजाय चंडीगढ़ डेटलाइन से ही छपती रहीं। इन परिस्थितियों में सिरसा के पत्रकार किसी बड़े प्रतिरोध की परंपरा को भले ही कायम नहीं रख सके पर वे छत्रपति को हमेशा सम्मान के साथ याद करते हैं। छत्रपति को चाहने वालों को यह भी याद रखना होगा कि छत्रपति की तरह हमेशा ही कुछ लोग होते हैं जो आततायियों के सामने डटकर खड़े होते हैं। जैसे कि अंशुल ने एनडीटीवी पर लेखराज ढोंट, अश्विनी बख्शी, आरएस चीमा और राजेंद्र सच्चर जैसे वकीलों को याद किया कि कैसे उन लोगों ने बिना पैसा लिए उनका केस लड़ा। और जैसे कि सीबीआई के अफसर मुलिंजा नारायणन और सतीश डागर। शायद यह संयोग हो कि छत्रपति की मृत्यु के बाद उनके हत्यारों के खिलाफ संघर्ष से न भागने वाला उनका साथी पत्रकार भी एक स्थानीय अखबार का संपादक ही है। फतेहाबाद से निकलने वाले सांध्य दैनिक `जन सरोकार` के संपादक आरके सेठी जो खुद 1998 में डेरे के हमले का शिकार हुए थे, छत्रपति हत्याकांड में सीबीआई के गवाह हैं। उनका कहना है कि खतरा बरकरार है पर बात सिर्फ यह नहीं कि हो क्या रहा है या होगा क्या। बड़ी बात यह है कि इन सब हालात से सबको डरना छोड़ देना चाहिए।(लेख में डेरे की कारगुजारियों से जुड़ी घटनाओं का विवरण `पूरा सच` ब्लॉग से लिया गया है।)
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`समयांतर` के सितंबर 2017 अंक में `सच के लिए बीच का रास्ता नहीं होता` शीर्षक से प्रकाशित।
फोटो में स्पेशल इफेक्ट : अनुराग अन्वेषी

ये जो भक्त हैं ये उनका ही वक्त है

दखल की दुनिया - Fri, 08/09/2017 - 19:19
चन्द्रिका
(द वायर हिंदी में प्रकाशित)
गौरी लंकेश की हत्या को वे जायज ठहरा रहे हैं. वे उनकी हत्या का जश्न मना रहे हैं. हत्यारों को बधाई तक दे रहे हैं. उन्हें यह ठीक लग रहा है कि उनसे असहमत एक आवाज़ को किसी ने चुप करा दिया. उन्हें यह जायज लग रहा कि किसी ने उस आवाज़ की हत्या कर दी जो उनकी जुबान नहीं बोल रही थी. उनकी बातों में हत्या करने वालों को हौसला देना शामिल है. हत्या और नफरत को उकसाना शामिल है. यह सब देखकर ऐसा लगता है कि वे बहुतायत में हैं जो ऐसी हत्या किए जाने की मंशा रखते हैं. पिछले कुछ बरसों में जैसे बहुत से हत्यारे तैयार हुए हैं. सब अपनी-अपनी भूमिका निभा रहे हैं. ऊपर बैठकर चुप रहकर वह अपनी भूमिका निभा रहा है. कुछ हत्या को जायज ठहराने की भूमिका में हैं. कुछ हत्या कर रहे हैं और कुछ हत्यारों को बधाईयां दे रहे हैं. उन्होंने एक पूरी संरचना बना ली है. अलग-अलग तरह की भक्ति और उन्माद ने अब उन्हें यहां ला खड़ा किया है कि वे अपराधी से बन गए हैं. ऐसे अपराधी जिनके हाथों में हथियार भले ही न हो. उनके ज़ेहन अपराध से भरे हुए हैं. यहां किसी भी तरह की नैतिकता भुरभुरी सी हो गई है. यह ख़तरनाक है और दुख़द भी. यह उनकी राजनीति के लिए भी ख़तरनाक है जिन्होंने उन्हें उभारा है और जो लगातार उन्हें उभार रहे हैं. वे जो समाज बना रहे हैं उसके भीतर से वह चीज ख़त्म की जा रही है जो इंसान के भीतर बची रहनी चाहिए थी. इंसान और इंसानियत के बाद ही हम किसी भी राजनीति की कल्पना कर सकते हैं. 
जिनके विचार अपराध से भर गए हैं उन्हें भी हत्या के बाद चुप हो जाना चाहिए था. उन्हें कुछ नही बोलना चाहिए था. किसी की हत्या पर उन्हें दुख न भी हो तो भी. शायद उन्हें उस चीज को बचा लेना चाहिए था जिसकी जरूरत हमे और उन्हें भी है. और वह जरूरत हमेशा बनी रहेगी. वे उस इंसानियत को बचा लेते. उस मानवता को बचा लेते जो किसी भी पार्टी से पुरानी है. जो किसी भी संगठन की भक्ति से पुरानी है. जो किसी राजनीति से भी पुरानी है. जो उनकी देशभक्ति से बहुत ही पुरानी है. उन्हें उसे बचाने के लिए चुप होना चाहिए था. पर वे चुप नहीं हुए. वे हत्या के पक्ष में दलीलें देने लगे. वे हत्यारों को बधाईयां देने लगे. उन्होंने गौरी लंकेश की हत्या को सिर्फ जायज नहीं ठहराया. वे हत्या के बाद ठंडी पड़ चुकी उस लाश को गालियां देने लगे. जैसे वे उस पर और गोलियां चलाना चाहते हों. वे कितनी हद तक नफरत करने वाले लोग हैं. यह हत्या के बाद फैलाई जा रही उनकी बातों में देखा जा सकता है. जैसे वे एक हत्या के बाद और हत्याओं के लिए खुद को तैयार कर रहे हों. अपने भीतर और उन्माद भर रहे हों. और असहमति की सारी हत्याओं को जायज ठहराने का रास्ता बना रहे हों. जैसे उनकी गोलियां और चलना चाहती हों. वे और बींधना चाहते हों उस लाश को और उस लाश के आसपास को. वे उन सबको ख़त्म करना चाहते हों जो इस तरह की हत्याओं के खिलाफ हैं. जो उनसे असहमत हैं. उनके भीतर की नफरत उन तीन गोलियों से ख़त्म नहीं हुई हो जैसे. उनके हाथ और भी आतुर से लग रहे. ऐसा उनकी जुबान कह रही है. जो हत्या के पक्ष में अलग-अलग तरह से लिख रहे हैं. वे गौरी लंकेश को इसाई बता रहे हैं. उन्हें दफनाए जाने को लेकर तरह-तरह का झूठ फैला रहे हैं. वे दशहरे के पहले लंकेश की हत्या बता कर इसका जश्न मना रहे हैं. वे और भी बहुत कुछ कह रहे हैं. वे सब इस हत्या के साझीदार से बनने को तैयार हैं. उसे जायज ठहराने की बिनाह पर. वे उस विचार की पैरोकारी निबाह रहे हैं. जहां उनसे कोई असहमत न हो.  उन्हें यह साहस कहां से मिल रहा है. वह कौन सी राजनैतिक भक्ति है जो उन्हें यह ताकत दे रही है. शायद पुरानी हत्याओं पर न होने वाले इंसाफ उन्हें उत्साह दे रहे हैं. कलबुर्गी, दाभोलकर और पंसारे का हत्यारा अभी तक कोई नही है. क्योंकि किसी को अभी तक कोई सज़ा नहीं मिली है. किसी को पकड़ा नहीं गया है. उन्हें अभी तक खोजा भी नहीं गया है. वर्तमान सत्ता की नाकामी या नाचाही ने ही उन्हें यह साहस दिया हुआ है. सत्ता के संस्थानों ने हत्यारों को न खोज पाने की नाकामी से उन्हें मोहलत दी हुई है. यह मोहलत ही उन्हें और हत्याओं का साहस दे रही है.जरूरी नहीं कि वह कोई एक इंसान हो जिसने इन सारी हत्याओं को अंज़ाम दिया. यह भी जरूरी नहीं कि ये सारे लोग किसी एक संगठन के हों. पर ये ऐसे सभी विचारों के हत्यारे हैं जो उनके विचारों से मेल नहीं खाते. इस लिहाज से ये एक विचार के लोग हैं. सब के सब हत्याएं नहीं कर सकते. हत्या का जश्न मना सकते हैं. ये हत्यारों के लिए ताकत की तरह हैं. उन्हें हत्या करने के विचार यहीं से मिल रहे हैं. जहां एक देश में एक विचार ही सर्वश्रेष्ठ विचार बनाया जा रहा. यह लोकतंत्र का विचार नहीं है. लोकतंत्र का विचार और ज़्यादा विचारों को जगह देने और फलने-फूलने का विचार है. उन्हें सुन लेने का विचार है जो आपसे असहमत हैं. वह कहने का विचार है जिसे आप मानते हैं. इसलिए इन हत्याओं को शह देने वाले लोकतंत्र के खिलाफ के लोग हैं. वे यह सबकुछ कहते हुए, इतने सारे झूठ को फैलाते हुए सिर्फ हत्या को सही बताना चाहते हैं.वह एक अलग विचार है जो इन सारी हत्याओं से दुखी है. वह ऐसी हर हत्या के फिलाफ आवाज़ उठा रहा है. जबकि हत्यारा पकड़ा जाए इससे पहले एक और हत्या कर दी जा रही है. किसी की गिरफ्तारी संभव नहीं हो पा रही. क्योंकि इसे पकड़ने और सज़ा देने वाले संस्थानों को इसी विचार के मुखियाओं ने जकड़ रखा है. इसलिए हत्या पर जश्न मनाने वाले ही नहीं बल्कि हमारी सत्ता इन हत्याओं को उकसा रही है. वह हर रोज नए तरह की हत्याएं करवा रही है.    गौरी लंकेश पर गोलियां किसी एक ने चलाई होंगी. गालियां देने वालों की पूरी फौज सी आ गई है. यह वंदेमातरम और तिरंगे की फौज़ है. यह उन भक्तों की फौज है. जो असहमति की एक आवाज़ के चुप करने का जश्न मना रही है. वह देश और लोकतंत्र दोनों को एक संकरी गली में ले जा रही है. वह इससे पहले गौरी लंकेश को नही जानती थी. वे जो गालियां दे रहे हैं, जो हत्या को जायज ठहरा रहे हैं उनके कोई व्यक्तिगत मतभेद नहीं हैं. मतभेद विचारों का ही था कि गौरी भक्त पत्रकार नहीं थी. गौरी किसी और विचार को मानती थी. यह वक्त ऐसा बना दिया गया है. जहां गैर विचार रखना ही अपराध बनता जा रहा है. यही वह ख़तरा है जो लोकतंत्र को कमजोर कर रहा है. यही वह चीज है जो उससे भी हमारा भरोसा उठा रहा है जो लोकतंत्र और किसी भी तंत्र के पहले की चीज है. इंसानियत के बाद कोई भी तंत्र पैदा हुआ है. फिलवक्त वे सारी चीजें मिटाई जा रही हैं. जिसे हमे बचाना था, जिसे हमे समाज में और बढ़ाना था. उनकी राजनैतिक भक्ति इंसानियत तक पर भारी पड़ रही है. ये जो भक्त हैं ये उनका ही वक्त है. हमारा वक्त हमे लाना है. हमे उसे बचाना है जो इस भक्ति के पहले की चीज है. जो किसी भी राजनैतिक शक्ति के पहले की चीज है.

जहाँ मिलता है सुनहरे सपनों को अथाह ज्ञान :डॉ. दीनानाथ मौर्य

लेखक मंच - Fri, 08/09/2017 - 01:52

शैक्षिक सरोकारों को समर्पित शिक्षकों तथा नागरिकों के साझा मंच द्वारा प्रकाशित ‘शैक्षिक दखल’ पत्रिका का दसवां अंक (जुलाई 2017) स्कूलों की अवधारणा को सीखने की प्रक्रिया से जोड़ते हुए ‘परम्परागत स्कूलों’ से हटकर कुछ कुछ ऐसे स्कूलों की प्रक्रियाओं को सामने लाता है, जो न सिर्फ नवाचारी स्कूल हैं, बल्कि जहाँ पर यह विश्वास भी व्यवहार में लाया जाता है कि ‘‘स्वतंत्रता, विश्वास और संवाद, सीखने-सिखाने की प्रक्रिया के मूल तत्व हैं। इन तीनों तत्वों के सही तालमेल के बिना सीखना-सिखाना संभव नहीं लगता है। यह बात शिक्षक और शिक्षार्थी दोनों पर बराबर रूप से लागू होती है। शिक्षक सिखाने की प्रक्रिया में स्वतंत्र, संवाद और विश्वास चाहता है, तो बच्चे सीखने की प्रक्रिया में…।”

सामाजिक विकास की ऐतिहासिक प्रक्रिया को देखें तो यह साफ़ होता है कि सीखने की सामाजिकता और सामाजिकता को सीखने की प्रक्रिया दरअसल सामाजिक विकास की द्वंदात्मक स्थितियों के आपसी सम्वाद से ही आगे बढ़ी है। इसके लिए ही स्कूल जैसी अवधारणा भी विकसित हुई। किसी भी समाज में स्कूलों की जरूरत क्यों होती है ? स्कूल आखिरकार करते क्या हैं? समाज के बीच स्कूल जैसी अवधारणा क्यों आती है ? इन्हीं सवालों का दूसरा किनारा वह है, जहाँ से यह बात की जाती है कि स्कूल समाज के निर्माण में क्या योगदान देते हैं? जिसे हम शिक्षण कहते हैं, वह सभ्यता के विकास क्रम की वह अवस्था होती है, जहाँ से हम अपने ज्ञान के विस्तार को नया आयाम दे रहे होते हैं- न सिर्फ व्यापकता में, बल्कि उसकी गहरायी के तौर पर भी।

रानीबाग़, नैनीताल उत्तराखंड से निकलने वाली इस पत्रिका के संपादक महेश पुनेठा और दिनेश कर्नाटक है। पत्रिका का यह अंक अपने 20 विचारपरक लेखों को समेटे हुए है। इनमें शिक्षा जगत के नामी-गिरामी हस्तियों, शिक्षाविदों और शिक्षक साथियों के अपने अनुभव भी जगह पा सके हैं। ‘स्कूल कुछ हटकर’ यह पत्रिका के मुख्य पृष्ठ पर लिखा गया एक वाक्य है, जिसमें इस अंक की मूल भावना भी समाहित है। यह अंक कुछ नवाचारी स्कूलों की शैक्षिक प्रक्रियों को केंद्र में रखकर सिखाने और सीखने की पूरी प्रणाली को हमारे सामने लाता है। ये नवाचारी स्‍कूल परम्परागत स्कूलों से सही मायने में कुछ हटकर हैं। ‘बच्चे’ शीर्षक से डॉ. माया गोला वर्मा की कविता है, जो पत्रिका के अन्दर के कवर पर बड़े इत्मीनान से पाठक के शैक्षिक परिप्रेक्ष्य को झकझोरती है… ‘बच्चे को करनी है शरारतें/बच्चे को देखनी हैं चिड़ियाएँ/उड़ानी हैं पतंगें/फूलने हैं गुब्बारे/गाना है गीत/चीखना है/चिल्लाना है/हँसना है जी भरकर… परन्तु/बस्ते के भीतर भरे अथाह ज्ञान में/बच्चा डूब गया है/खुश हैं सब/डूबते बच्चे को देखकर/खुश हैं सब/उसके सुनहरे सपने को मरते देखकर….।’ पत्रिका की मूल भावना क्या है ? ‘अनुरोध’ में संपादक लिखते हैं- ‘बेहतर शिक्षा और स्वास्थ्य प्रदान करना एक लोकतान्त्रिक राज्य का पहला दायित्व है। सार्वजानिक शिक्षा का विशाल ढांचा सुविचारित प्रक्रिया के तहत ढहने के कगार पर खड़ा है। इस गफलत के दौर में यह आवश्‍यक हो जाता है कि हम सब शिक्षा से जुड़े हुए तथा शिक्षा को समाज निर्माण का महत्त्वपूर्ण तत्व मानने वाले लोग शिक्षा के लोकतान्त्रिक, उदार, बहुलतावादी, वैज्ञानिक तथा धर्मनिरपेक्ष स्वरूप को बचाने के लिए आगे आएं। यह पत्रिका इसी दिशा में एक प्रयास है…।’

‘स्वतंत्रता, संवाद और विश्वास’ शीर्षक सम्पादकीय में महेश पुनेठा का जोर इस बात पर है कि ‘शिक्षण एक कला है। कोई भी कला तब तक पूर्णरूप में विकसित नहीं हो सकती है, जब तक उसके लिए दबावमुक्त वातावरण न हो।’ संपादक इस बात से बाखबर भी है कि स्‍कूली शिक्षा में इस शब्द के मायनों को बहुत ही सरलीकृत करके उसकी मूल भावना से अलग करने का प्रयास भी क्या जा सकता है। इसीलिए वह यह भी लिखते है कि ‘स्वतंत्रता का मतलब यह कतई नहीं है कि बच्चों को उनके हाल पर छोड़ दिया जाए। वे जैसा चाहें, वैसा करते रहें। बच्चों के लिए स्वतंत्रता के साथ-साथ खुला संवाद भी बहुत जरूरी है…संवादहीन स्वतंत्रता को अराजकता में बदलने में देर नहीं लगती है। बच्चों को स्वतंत्रता देने के साथ ही उनसे और अधिक संवाद करना जरूरी हो जाता है। ऐसे में शिक्षक-अभिभावक की जिम्मेदारी बढ़ जाती है।’ स्वत्रंत्रता, संवाद और विश्वास को जैसे मूल्यों को विद्यालय की मूल भावना से जोड़ते हुए पत्रिका का यह अंक कुछ ऐसे स्कूलों की बानगी हमारे सामने पेश करता है, जहाँ नवाचार पूरे विद्यालयी परिवेश में फलता-फूलता है- किसी सैधांतिक अवधारणा के रूप में ही नहीं, व्यावहारिक प्रतिफलन में भी।

फेसबुक आज के समय में वर्चुअल दुनिया का एक ऐसा समाज बन गया है, जहाँ हम अपने विचारों के साथ दूसरे से मिलते-जुलते हैं, बतियाते हैं और समय के सवालों से दो–चार होते हैं। पत्रिका का एक पूरा लेख ही ‘फेसबुक परिचर्चा’ का है। इसमें शिक्षा से जुड़े हुए तमाम बिन्दुओं पर संपादक के साथ विभिन्न क्षेत्रों के लोगों से की गई बातचीत को संकलित किया गया है। सोशल मीडिया का यह सकारात्मक उपयोग तात्कालिक तौर पर सराहनीय और दीर्घकालिक तौर पर अनुकरणीय है। इसे संवाद की संस्कृति को प्रसारित करने में अहम् भूमिका निभाने वाले कारक के रूप में भी देख सकते हैं। संपादक ने इस तरह के प्रयोग से यह सिद्ध कर दिया है कि ‘विचारों का कभी अंत नहीं होता’ जरूरत उसकी अनन्तता की पहचान की है। कक्षा में अनुशासन को केंद्र में रखकर की गई बातचीत को इस लेख के माध्यम से कई आयामों में समझा जा सकता है। इस विषय पर हेमा तिवारी, अनिल अविश्रांत, मुकेश वशिष्ठ, रणजीत कुमार, जगमोहन कठैत, कमलेश जोशी तथा भाष्कर चौधरी के विचार महत्त्वपूर्ण हैं।

कवियित्री और शिक्षिका रेखा चमोली का आलेख ‘जहाँ बच्चे मनपसंद विषय से अपना दिन शुरू करते हैं’ विश्व प्रसिद्ध पुस्तक ‘तोतोचान’ को आधार बनाकर जापान के तोमोए गाकुएन स्कूल की शिक्षण पद्धति को बयाँ करता है। अपने अनुभव को स्कूल की प्रक्रिया से जोडती हुई लेखिका का यह निष्कर्ष है कि- “तोमोए की एक प्रमुख विशेषता थी स्वाभाविकता़। स्कूल चाहता था कि बच्चों के व्यक्तित्व यथासंभव स्वाभाविकता के साथ निखरें।” स्कूल का माहौल और समाज के साथ आपसी रिश्ते की ख़ूबसूरत सहजता ऊपर से शिक्षकों का विद्यार्थियों के साथ साहचर्य का सम्बन्ध ये सब कुछ मिलकर बच्चों को सीखने के जीवंत अनुभव देते थे। यहाँ विशिष्टता का सम्मान भी था और वि‍भिन्नता की कद्र भी थी। तोतोचान स्कूल की शिक्षण प्रक्रिया को समझने के लिए यह आलेख भी अनिवार्यतः पढ़ना चाहिए।

चिंतामणि जोशी का लेख ‘बाल ह्रदय की गहराइयों में पैठना शिक्षा का सार’ उक्रेन, अविभाजित सोवियत संघ के ‘खुशियों का स्कूल’ की कहानी कहता है। स्कूल के संस्थापक वसीली सुखोम्लिंस्खी के विजन को उद्धरित करते हुए लेखक का कहना है कि- ‘स्कूल में चरित्र निर्माण के दौरान इस बात पर विशेष ध्यान दिया जाता था कि ज्ञान प्राप्ति की प्रक्रिया में हर बच्चा मानव गरिमा का, गर्व का अनुभव करे। बाल ह्रदय की गहराइयों में पैठना वसीली की शिक्षण विधि का सार था।’ शिक्षा में बाल मनोविज्ञान की व्यावहारिकता के लिए इस आलेख को देखा जाना चाहिए।

तारा चन्द्र त्रिपाठी जिनका शिक्षा के क्षेत्र में लंबा अनुभव रहा है, का साक्षात्कार भी इस अंक की ख़ूबसूरती है। एक शिक्षाकर्मी की हैसियत से वे विभिन्न मुद्दों पर दर्शक की भांति अपनी राय नहीं देते होते हैं, बल्‍कि‍ भागीदार होकर चीजों को जानने और समझने का अनुभव उनके साक्षात्कार में दिखायी पड़ता है। ‘शैक्षिक दखल’ के साथ की गई लंबी बातचीत में वे अपने व्यावहारिक अनुभवों से बाल मनोविज्ञान को सामने रखने का प्रयास भी करते है।
समरहिल स्कूल, लन्दन को आधार बनाकर लिखा गया अंशुल शर्मा का आलेख शिक्षा सिद्धांतों और प्रयोग की जाने वाली विधियों को लेकर हमारे मन में बनी कुछ शंकाओं का समाधान करता है। लेखक ने अपने लेख का शीर्षक ‘मनमर्जी का स्कूल’ देते हुए लिखा है कि- ‘एक स्कूल है जिसमें बालकों को कक्षा में न जाने की आज़ादी है, बालकों को गाली निकालने की आज़ादी है, अपने निर्णय खुद लेने की आजादी है, बालकों को शिक्षकों के नाम लेकर संबोधित करने की आज़ादी है।’

नीलबाग स्कूल की शिक्षण प्रणाली पर राजाराम भादू का साक्षात्कार कई मायनों में अहम् है। डेविड आसबरा के शैक्षिक दर्शन को आधार बनाकर उन्होंने इस विद्यालय की सीखने-सिखाने की पूरी प्रक्रिया को डिटेल में बताया है।

इसी तरह से ऋषि वैली स्कूल चित्तूर, आंध्रप्रदेश पर राजीव जोशी, आनंद निकेतन डेमोक्रेटिक स्‍कूल भोपाल और इमली महुआ, कोंदागावं (बस्तर), छतीसगढ़ पर प्रमोद दीक्षित मलय, साल सबील ग्रीन स्कूल त्रिशूर, केरल पर सुनील, उमंग पाठशाला, गन्नूर(सोनीपत), हरियाणा पर मिनाक्षी गाँधी, रा.आ.प्रा.वि. कपकोट, बागेश्वर, उत्तराखंड पर डॉ. केवलानंद कांडपाल, रा.प्रा.वि. मेतली, पिथौरागढ़ पर दिनेश सिंह रावत, रा.उ.प्रा.वि.पौड़, पिथौरागढ़, उत्तराखंड पर नरेश पुनेठा, प्रा.वि.स्यूणी मल्ली, चमोली पर देवेश जोशी, रा.प्रा.वि. गणेशपुर, उत्तरकाशी, उत्तराखंड पर सुनीता के लेख इन स्कूलों की पूरी प्रक्रिया को हमारे सामने रखते है। शिक्षा जहाँ सीखने का दूसरा नाम ही नहीं है, बल्कि आनंद लेने और देने का जरिया भी है।
सुप्रसिद्ध विज्ञान लेखक देवेन्द्र मेवाड़ी की डायरी का वह अंश भी पत्रिका को इस मायने में वैचारिक गहरायी प्रदान करता है, जिसमें वे राजकीय पूर्व माध्यमिक विद्यालय, देहरा, देहरादून की शिक्षण प्रक्रिया का आँखों देखा और खुद का अनुभव किया हुआ सच बयाँ करते हैं। इस स्कूल में उन्हें सेवा, समर्पण और शिक्षा का अनूठा संगम दिखाई दिया।

सुप्रसिद्ध पर्यावरणविद अनुपम मिश्र का व्याख्यान ‘एक अजीब स्कूल’ गुमनाम स्कूल लापोड़िया जयपुर की कहानी कहता है, जहाँ परिवेश के साथ सीखने की प्रक्रिया सहजता के साथ अपना रूप ग्रहण करती है। वहां कोई बंधन नही है- सीखने में भी और जीने में भी। समाज और स्कूल का कोई बंटवारा नहीं, स्कूल समाज के साथ कुछ इस तरह घुला-मिला है कि‍ कौन किससे सीख रहा है, यह पता लगाना मुश्किल है अर्थात सब एक दूसरे के सानिध्य में आगे बढ़ रहे हैं। पसंद और नापसंद के साथ विषयों की दीवारें बनतीं और बिगड़ती रहती थीं और बच्चे इस गुमनाम स्कूल से शिक्षा की एक नई इबारत लिख रहे थे। सीखने की स्वाभाविकता और जीने की सहजता के आपसी संबध को समझने के लिए यह आलेख महत्त्वपूर्ण है।

‘और अंत में’ तीन स्कूलों 1. ग्राम भारती विद्या मंदिर, रानिचौरी, टेहरी गढ़वाल. 2. दून घाटी शिक्षण संस्थान, बापू ग्राम,ऋषिकेश. 3.जीवन जागृति निकेतन, ऋषिकेश के हवाले से दिनेश कर्नाटक ने गाँधीवादी शिक्षा के मूल्यों की व्यावहारिकता को दिखाया है। इन तीनों स्कूलों की स्थापना गाँधीवादी विचारक योगेश चन्द्र बहुगुणा ने की थी। उनके लिए शिक्षा का पेशा रोजगार का नहीं, सेवा का पेशा था। यह आलेख किसी शिक्षण संस्था के निर्माण के साथ उसमें विकसित होने वाली मूल्य-चिंता की पूरी प्रक्रिया को समझने के लिए पठनीय है।

‘आदमी बनने के क्रम में’ मिथिलेश कुमार राय की कविता शुरुआती कविता की तरह फिर एक बार हमारे परिपेक्ष्य को दुरुस्त करती जान पड़ती है- पिता मुझे रोज पीटते थे/गरियाते थे/कहते थे कि साले/राधेश्याम का बीटा दीपवा/पढ़-लिखकर बाबू बन गया/और चंद्नमा अफसर/और तू ढोर हांकने चल देता है/हँसियाँ लेकर गेहूं काटने बैठ जाता है/कान खोल कर सुन ले/आदमी बन जा/नहीं तो खाल खीचकर भूसा भर दूंगा/और बांस की फुनगी पर टांग दूंगा…/आदमियों की तरह सारी हरकतें करते पिता/क्या अपने आपको आदमी नहीं समझते थे/आदमी बनने के क्रम में/मैं यह सोचकर उलझ जाता हूँ…।’
कुल मिलाकर ‘शैक्षिक दखल’ का यह अंक काफी महत्त्वपूर्ण है। इसमें लिखे गये लेख रोचक, उपयोगी और संग्रहनीय हैं।

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शैक्षिक दख़ल (छमाही)
एक अंक- 40 रुपये
5+1 अंक- 200 रुपये
आजीवन-1500 रुपये
संस्थागत आजीवन सदस्यता-2000 रुपये
विशिष्ट सदस्यता-5000 रुपये
सम्‍पर्क : महेश चंद्र पुनेठा, शि‍व कॉलोनी,
न्‍यू पि‍याना, पो. ऑ डि‍ग्री कॉलेज श्‍जोशी भवन, नि‍कट लीड बैंक, पि‍थौरागढ़-262502, मोबाइल नम्‍बर- 09411707470
ईमेल- punetha.mahesh@gmail.com

हत्यारों को कठघरे में कौन खड़ा करेगा?

तो गौरी लंकेश की हत्या हुई। लेकिन हत्या किसी ने नहीं की। यह ऐसा सिलसिला है, जिसमें या तो जिनकी हत्या हो गई उनसे सवाल पूछा जायेगा, उन्होंने जोखिम की जिन्दगी को ही चुना। या फिर हमें कत्ल की आदत होती जा रही है क्योंकि दाभोलकर, पंसारे, कलबुर्गी के कत्ल का जब हत्यारा कोई नहीं है तो फिर गौरी लंकेश की हत्या के महज 48 घंटो के भीतर क्या हम ये एलान कर सकते हैं कि अगली हत्या के इंतजार में शहर दर शहर विरोध के स्वर सुनाई दे रहे हैं। पत्रकार, समाजसेवी या फिर बुद्दिजीवियों के इस जमावड़े के पास लोकतंत्र का राग तो है लेकिन कानून का राज देश में कैसे चलता है ये हत्याओ के सिलसिले तले उस घने अंधेरे में झांकने की कोशिश तले समझा जा सकता है। चार साल बाद भी नरेन्द्र दामोलकर के हत्यारे फरार हैं। दो बरस पहले गोविंद पंसारे की हत्या के आरोपी समीर गायकवाड को जमानत मिल चुकी है । कलबुर्गी की हत्या के दो बरस हो चुके है लेकिन हत्यारो तक पुलिस पहुंची नहीं है। कानून अपना काम कैसे कर रही है कोई नहीं जानता। तो फिर गौरी लंकेश की हत्या जिस सीसीटीवी कैमरे ने कैद भी की वह कैसे हत्यारों को पहचान पायेगी। क्योकि सीसीटीवी को देखने समझने वाली आंखें-दिमाग तो राजनीतिक सत्ता तले ही रेंगती हैं। और सत्ता को विचारधारा से आंका जाये या कानून व्यवस्था के कठघरे में परखा जाये। क्योंकि दाभोलकर और पंसारे की हत्या को अंजाम देने के मामले में सारंग अकोलकर और विनय पवार आजतक फरार क्यों हैं। और दोनों ही अगर हत्यारे है तो फिर 2013 में दाभोलकर की हत्या के बाद 2015 में पंसारे की हत्या भी यही दोनों करते हैं तो फिर कानून व्यवस्था का मतलब होता क्या है। महाराष्ट्र के पुणे शहर में दाभोलकर की हत्या कांग्रेस की सत्ता तले हुआ। महाराष्ट्र के ही कोल्हापुर में पंसारे की हत्या बीजेपी की सत्ता तले हुई। हत्यारों को कानून व्यवस्था के दायरे में खड़ा किया जाये। तो कांग्रेस-बीजेपी दोनों फेल है। और अगर विचारधारा के दायरे में खड़ा किया जाये तो दोनो की ही राजनीतिक जमीन एक दूसरे के विरोध पर खडी है।

यानी लकीर इतनी मोटी हो चली है कि गौरी लंकेश की हत्या पर राहुल गांधी से लेकर मोदी सरकार तक दुखी हैं। संघ परिवार से लेकर वामपंथी तक भी शोक जता रहे हैं। और कर्नाटक के सीएम भी ट्वीट कर कह रहे हैं, ये लोकतंत्र की हत्या है। यानी लोकतंत्र की हत्या कलबुर्गी की हत्या से लेकर गौरी शंकर तक की हत्या में हुई। दो बरस के इस दौर में दो दो बार लोकतंत्र की हत्या हुई। तो फिर हत्यारों के लोकतंत्र का ये देश हो चुका है। क्योंकि सीएम ही जब लोकतंत्र की हत्या का जिक्र करें तो फिर जिम्मेदारी है किसकी। या फिर हत्याओ का ये सिलसिला चुनावी सियासत के लिये आक्सीजन का काम करने लगा है। और हर कोई इसका अभयस्त इसलिये होते चला जा रहा है क्योंकि विसंगतियों से भरा चुनावी लोकतंत्र हर किसी को घाव दे रहा है। तो जो बचा हुआ है वह उसी लोकंतत्र का राग अलाप रहा हैं, जिसकी जरुरत हत्या है। या फिर हत्यारो को कानूनी मान्यता चाहे अनचाहे राजनीतिक सत्ता ने दे दी है। क्योंकि हत्याओं की तारीखों को समझे। अगस्त 2013 , नरेन्द्र दाभोलकर की हत्या। फरवरी 2015 गोविन्द पंसारे की हत्या। अगस्त 2015 एमएम कलबुर्गी की हत्या। 5 सितंबर 2017 गौरी लंकेश की हत्या। गौरतलब है कि तीनों हत्याओं में मौका ए वारदात से मिले कारतूस के खोलों के फोरेंसिक जांच से कलबुर्गी-पानसारे और दाभोलकर-की हत्‍या में इस्‍तेमाल हथियारों में समानता होने की बात सामने आई थी। बावजूद इसके हत्यारे पकड़े नहीं जा सके हैं। तो सवाल सीधा है कि गौरी लंकेश के हत्यारे पकड़े जाएंगे-इसकी गारंटी कौन लेगा? क्योंकि गौरी लंकेश की  हत्या की जांच तो एसआईटी कर रही है, जबकि दाभोलकर की हत्या की जांच को सीबीआई कर चुकी है, जिससे गौरी लंकेश की हत्या के मामले में जांच की मांग की जा रही है। तो क्या गौरी लंकेश की हत्या का सबक यही है कि हत्यारे बेखौफ रहे क्योकि राजनीतिक सत्ता ही लोकतंत्र है जो देश को बांट रहा है ।

या फिर अब ये कहे कि कत्ल की आदत हमें पड़ चुकी है क्योंकि चुनावी जीत के लिये हत्या भी आक्सीजन है। और सियासत के इसी आक्सीजन की खोज में जब पत्रकार और आरटीआई एक्टीविस्ट निकलते है तो उनकी हत्या हो जाती है। क्योंकि जाति, धर्म या क्षेत्रियता के दायरे से निकलकर जरा इन नामों की फेरहिस्त देखे। मोहम्मद ताहिरुद्दीन,ललित मेहता,सतीश शेट्टी,अरुण  सावंत ,विश्राम लक्ष्मण डोडिया ,शशिधर मिश्रा, सोला रंगा राव,विट्ठल गीते,दत्तात्रेय पाटिल, अमित जेठवा, सोनू, रामदास घाड़ेगांवकर, विजय प्रताप, नियामत अंसारी, अमित कपासिया,प्रेमनाथ झा, वी बालासुब्रमण्यम,वासुदेव अडीगा ,रमेश अग्रवाल ,संजय त्यागी ।

तो ये वो चंद नाम हैं-जिन्होंने सूचना के अधिकार के तहत घपले-घोटाले या गडबड़झालों का पर्दाफाश करने का बीड़ा उठाया तो विरोधियों ने मौत की नींद सुला दिया। जी-ये लिस्ट आरटीआई एक्टविस्ट की है। वैसे आंकड़ों में समझें तो सूचना का अधिकार कानून लागू होने के बाद 66 आरटीआई कार्यकर्ताओं की हत्या हो चुकी है ।159 आरटीआई कार्यकर्ताओं पर हमले हो चुके हैं और 173 ने धमकाने और अत्याचार की शिकायत दर्ज कराई है । यानी इस देश में सच की खोज आसान नहीं है। या कहें कि जिस सच से सत्ता की चूलें हिल जाएं या उस नैक्सस की पोल खुल जाए-जिसमें अपराधी और सत्ता सब भागीदार हों-उस सच को सत्ता के दिए सूचना के अधिकार से हासिल करना भी आसान नहीं है।  दरअसल, सच सुनना आसान नहीं है। और सच को उघाड़ने वाले आरटीआई एक्टविस्ट हों या जर्नलिस्ट-सब जान हथेली पर लेकर ही घूमते हैं। क्योंकि पत्रकारों की बात करें तो अंतरराष्ट्रीय संस्था कमेटी टू प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट की रिपोर्ट कहती है कि भारत में पत्रकारों को काम के दौरान पूरी सुरक्षा नहीं मिल पाती। भ्रष्टाचार और राजनीति तो खतरनाक बीट हैं । 1992 के बाद 27 ऐसे मामले दर्ज हुए,जिनमें पत्रकारों को उनके काम के सिलसिले में कत्ल किया गया लेकिन किसी एक भी मामले में आरोपियों को सजा नहीं हो सकी । तो गौरी लंकेश के हत्यारों को सजा होगी-इसकी बहुत उम्मीद नहीं की जा सकती। लेकिन-एक तरफ सवाल वैचारिक लड़ाई का है तो दूसरी तरफ सवाल कानून व्यवस्था का है। क्योंकि सच यही है कि बेंगलुरु जैसे शहर में अगर एक पत्रकार की घर में घुसकर हत्या हो सकती है तो देश के किसी भी शहर में पत्रकार-आरटीआई एक्टिविस्ट की हत्या हो सकती है-और उन्हें कोई बचा नहीं सकता। यानी अब गेंद सिद्धरमैया के पाले में है कि वो दोषियों को सलाखों के पीछे तक पहुंचवाएं। क्योंकि मुद्दा सिर्फ एक हत्या का नहीं-मीडिया की आजादी का भी है। और सच ये भी है कि मीडिया की आजादी के मामले में भारत की स्थिति बहुत अच्छी नहीं है। रिपोर्टर्स विदआउट बॉर्डर्स की 2107 की वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम रैकिंग कहती है कि भारत का 192 देशों में नंबर 136वां है । और इस रैंकिंग का आधार यह है कि किस देश में पत्रकारों को अपनी बात कहने की कितनी आजादी है। और जब आजादी कटघरे में है तो हत्यारे कटघरे में कैसे आयेंगे।

निजता पर लोहिया (2)

यही वह जगह है - Wed, 06/09/2017 - 09:19

… अब आखरी सवाल रह जाता है दखल वाला कि जीवन के ऐसे कुछ दायरे होने चाहिए कि जिनमें राज्य का,सरकार का,संगठन का,गिरोह का ,दखल न हो।जिस तरह हमारे जमीन की बेदखालियाँ हो जाती हैं,उसी तरह सरकार और राजनीतिक पार्टियां हमारे जीवन में बेदखालियाँ कर डालती हैं।कभी-कभी सोशलिस्ट पार्टी के लोगों के मन में भी आ जाया करता है कि वे व्यक्ति के जीवन में बेदखलियाँ शुरू कर दें।मान लो आदमी सार्वजनिक पैसा खा लेता है तो उसमें दखल देना समझ में आता है। लेकिन मान लो कोई आदमी है,मिसाल देने में झंझट भी खड़ी हो जाती है,कई लोग तिलमिला उठेंगे, पुरानी धारणाएं हैं इस कारण।वह मिसाल न लेकर हम दूसरी मिसाल लेंगे।जैसे,जब यह निश्चित हो जाए कि कोई आदमी मरने ही वाला है,एक नहीं कई डॉक्टर इस नतीजे पर पहुंच जाते हैं,तो क्या उस आदमी को यह अधिकार होना चाहिए कि वह कोई ऐसी सूई लगवा कर खत्म हो जाए और डॉक्टर का ऐसी सूई देना उचित है क्या? विशेष रूप में,ऐसी बीमारी में,जिसमें महीनों ही नहीं,बरसों रगड़ा लगता है,जिसमें बीमार ही नहीं,उसके घर वाले भी तबाह होते हैं । ऐसी चीज को दया-हत्या बोलते हैं।दया-हत्या का ऐसा दायरा है जिस पर सोच विचार करना चाहिए।मैं अपनी कोई आखिरी राय नहीं दे सकता।लेकिन आत्महत्या के बारे में तो मेरी पक्की राय है की हर मर्द-औरत को हक़ होना चाहिए कि वह अपनी जान ले ले।इसमें दूसरे को दखल देने का क्या हक है।लेकिन कई देशों में इसके खिलाफ कानून बने हुए हैं।अगर आत्महत्या करने में कोई सफल हो जाए तब तो ठीक है,और अगर असफल हो जाए तो ऐसा सिलसिला चलता है कि क्या कहने।बहुत कम ऐसे बेवकूफ जज होंगे जो दो-चार महीने की सजा दे दें।

इस मिसाल के अलावा और भी हैं जैसे घर मे कैसे रहें,शादी-विवाह के मामले-इन सबको लेकर राजनैतिक पार्टियों और सरकार को दखल नहीं देना चाहिए।किस राजनैतिक पार्टी में कोई रहे ,सरकार के नौकर भी,इसमें भी दखल नहीं होना चाहिए।ये कुछ बातें मैंने सिर्फ गिना दी हैं।असल में इन्हें उदाहरण स्वरूप ही लेना।इनके पीछे तर्क या सिद्धांत यह है कि व्यक्ति के जीवन में राज्य या राजनैतिक पार्टी को दखल देने का हक नही होना चाहिए ।हर एक व्यक्ति को एक हद तक अपने जीवन को अपने मन के मुताबिक चलाने का अधिकार होना चाहिए।हो सकता है कि वह उस अधिकार का दुरुपयोग करे।लेकिन जब उस अधिकार को मान लेते हैं और दुरुपयोग होता है तो क्या कर सकते हैं,सिर्फ अपना मुंह मटका के रह जाओ और क्या किया जा सकता है? उस पर ज्यादा चर्चा भी नहीं करनी चाहिए। समाज का गठन वैसा बन जाएगा तो उस पर चर्चा भी बहुत नहीं होगी।यूरोप के देशों में इन सब चीजों पर लोग चर्चा भी नहीं किया करते और कहीं करते भी हैं तो सैद्धांतिक तौर पर कर करा लिया करते हैं।रूस और अमेरिका का मुकाबला करें तो,मुक़ाबलतन,ऐसा नहीं कि रूस को मैं कोई प्रमाणपत्र दे रहा हूँ,रूस अच्छा है।अमरीका और फ्रांस भी इस दखल वाले मामले में अच्छे हैं।


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समूह के हस्तक्षेप से निजी जीवन की रक्षा / डॉ लोहिया

यही वह जगह है - Tue, 05/09/2017 - 20:11

…सातवीं क्रांति का लक्ष्य समूह के हस्तक्षेप से व्यक्ति के निजी जीवन की रक्षा करना है। संगठन लगातार व्यक्ति की स्वतंत्रता का अपहरण करता रहा है।इसका यह मतलब नहीं कि व्यक्ति के महत्त्व और कल्याण में जरूरी तौर पर कमी आई है।वास्तव में उसका महत्व भी बढ़ा है,हालत भी सुधरी है,खास तौर पर उन्हीं इलाकों में जहां स्वतंत्रता में कमी आई है।व्यक्ति का कल्याण और सुख,शिक्षा और स्वास्थ्य,और उसका आराम भी,दरअसल उसके जीवन और विचार का बड़ा हिस्सा विभिन्न प्रकार की योजनाओं का विषय बन गया है।यह नियोजन साम्यवादी देशों में अधिक कठोर है, लेकिन संगठनात्मक बाध्यता का एक तत्व हर जगह मौजूद है।व्यक्ति की स्वतंत्रता की क्रांति पर विचार करते हुए हमें भलाई के लिए आयोजन संबंधी अपने युग की ख़ासियत को ध्यान में रखना चाहिए।

सरकारी आयोजन का लक्ष्य हमेशा भलाई करना ही होता है।उसमें अगर कोई बुराई पैदा होती है तो अनिच्छित और प्रासंगिक परिणाम के रूप में।इस बुराई की जड़ बाध्यता में होती है।जब लोगों को मजबूर किया जाता है कि वे बुरे की जगह अच्छे को चुनें, तो अनिवार्य ही उसके कुछ बुरे परिणाम निकलते हैं।अच्छाई के विभिन्न प्रकार होते हैं और उनमें अलग अलग प्राथमिकताएं होती हैं।लेकिन इसके अलावा,क्या अच्छा है और क्या बुरा,यह बात हमेशा इतनी साफ नहीं होती जितनी योजनाएं बनाने वाले सोचते हैं।इसके अतिरिक्त सुरुचि,विवेक,ज्ञान और समझ का विकास ज्यादा अच्छा होता है जब चुनाव करने और गलती करने की आजादी होती है।जिन देशों में सरकारी नियोजन नही है,वहां निजी मुनाफे के संगठनों के भी लगभग वैसे ही परिणाम निकलते हैं।वरण की सारी घोषित स्वतंत्रता के बावजूद,जिन देशों में सरकारी नियोजन नहीं है,वहां भी शिक्षा,सूचना और मनोरंजन एक खास स्वीकृत दायरे के अंदर ही रहते हैं।इसके अलावा,इनका ज्यादा और नीचा एयर एकरसता-भर स्तर ही आमतौर पर चलता है।लक्ष्य चाहे मुनाफा हो या कोई आदर्श,संगठन व्यक्ति को बाध्य करते हैं।यद्यपि इससे इनकार करना व्यर्थ है कि तानाशाही बाध्यता ज्यादा गहरी और चतुराई भरी होती है।

भलाई करने का संगठित प्रयत्न हमारे युग की खासियत है।जो बिल्कुल पूंजीवादी समाज हैं,उनमें भी किसी प्रकार वे बेकारी भत्ते या बीमारी-बीमे की व्यवस्था जरूरी हो गई है।जिन क्षेत्रों या उद्योगों की ओर निजी पूंजी आकर्षित नहीं होती,उनमें राज्य का पूंजी लगाना भी काफी आम बात हो गई है।इसलिए ऐसा माना जा सकता है कि भलाई के उद्देश्य से नियोजन और बढ़ेगा।इसके साथ निजी जीवन में हस्तक्षेप भी बढ़ेगा।

क्या निजी हैऔर क्या सार्वजनिक इसकी परिभाषा करना आसान नहीं है।बहुत कुछ देश और पीढी की मान्यताओं पर निर्भर होता है।लेकिन बाध्यता और सार्वजनिकता के वातावरण से अलग स्वतंत्रता और निजता के वातावरण को पहचानना उतना मुश्किल नहीं।

सोवियत रूस में जो इस समय हो रहा है,वह इस संदर्भ में एक प्रवृत्ति के रूप में महत्वपूर्ण है।आज संगीत और अमूर्त चित्रकला की संगठन द्वारा जितनी आलोचना होती है,उतना ही कुछ निजी क्षेत्रों में उनकी लोकप्रियता बढ़ रही है।कवि और उपन्यासकार गाने या रोने की स्वतंत्रता माँग रहे हैं।किसी दिन ये सभी क्षेत्र निजी मान लिए जाएंगे जिन्हें राज्य या संगठन के हस्तक्षेप से बचाया जाए।इसके साथ ही संपत्ति सबंधी कुछ रूढ़ धारणाओं में भी ढीलापन आ रहा है।

गोरे लोगों के बीच यही असली बहस चल रही है।उनमें जो लोकतंत्र के समर्थक हैं उनका आग्रह है कि व्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार को स्वीकार करने पर किसी-न-किसी रूप में निजी संपत्ति और उसके पुरस्कार को भी मान्यता देने होगी।लेकिन तर्क की दृष्टि से संपत्ति और व्यक्ति-स्वातंत्र्य के बीच कोई सीधा संबंध आवश्यक नही प्रतीत होता।व्यवहार में संपत्ति के साम्यवादी स्वामित्व के फलस्वरूप बच्चे पैदा करने से लेकर भाषण देने तक सभी प्रकार के संबंधों में निजी जीवन में हस्तक्षेप हुआ है।अतः ख़तरे के ये संकेत हमेशा रहेंगे।निजी जीवन और स्वतंत्रता के अधिकार को उन सभी क्षेत्रों में स्वीकार करना होगा जिनका संपत्ति से कोई सीधा संबंध नहीं है।आधुनिक जीवन में पारस्परिक संबंध दरअसल इतने पेचीदा हैं कि सीधी या सरल परिभाषाओं से काम नहीं चल सकता।मिसाल के लिए घरेलू प्रबंध या मनोरंजन में निजी जीवन की स्वतंत्रता का संपत्ति की व्यवस्था पर अप्रत्यक्ष प्रभाव पड़ सकता है।तब क्या किया जाए? हमें जोखिम उठाने को तैयार रहना चाहिए।मिसाल के लिए संपत्ति की व्यवस्था अगर प्रभावित नही होती ,तो इस आधार पर निजी जीवन मे हस्तक्षेप की इजाजत नहीं मिलनी चाहिए कि निजी संपत्ति की भावना को प्रोत्साहन मिलता है।

(यह लेख डॉ लोहिया की अंग्रेजी किताब ‘ मार्क्स,गांधी एन्ड सोशलिज्म’ की भूमिका से उनके निकट साथी ओमप्रकाश दीपक द्वारा अनुदित है।लेख उन्होंने 1963 में लिखा था।अनुवाद 1970 में प्रकाशित हुआ।लोहिया का यह अंतिम लेख है।)


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समाजवादी जन परिषद ,रांची प्रस्ताव

समाजवादी जन परिषद

राष्ट्रीय कार्यकारिणी बैठक

रांची, १-३ सितम्बर २०१७

आर्थिक-राजनैतिक-सामाजिक प्रस्ताव

१, २ और ३ सितम्बर को रांची में हुए राष्ट्रीय कार्यकारिणी बैठक में आर्थिक, सामजिक और राजनैतिक परिस्थिति पर गहन चर्चा हुई. उत्तर-प्रदेश, झारखण्ड, केरल, दिल्ली, उत्तर-बंगाल, ओडिशा, बिहार, राजस्थान एवं महाराष्ट्र से आये प्रतिनिधियों ने अपने-अपने राज्यों में मौजूदा राजनीतिक घटनाक्रम का व्योरा पेश किया. साथ ही सजप द्वारा किये जा रहे हस्तक्षेपों के बारे में भी जानकारी दी.

सभी क्षेत्रों से मिली जानकारी से यह पुष्ट हुआ कि २०१४ में भाजपा सरकार के सत्ता में आने के बाद, भाजपा और संघ ने समाज में घृणा और आतंक के माहौल को बहुत तेजी से बढाया है. भाजपा, धर्म के नाम पर समाज का ध्रुवीकरण करने में सफल हुइ है और बंटे हुए वोट के आधार पर चुनाव जीतती रही हैं. इस विभाजन का सामाजिक ताने-बाने पर गहरा दुष्प्रभाव पड़ा है. विभिन्न वर्ग के लोग, जो मिल-जुल कर साथ जीवन-यापन करते थे, अब संदेह और डर के माहौल में रहते है. सजप इस स्थिति को भयावह मानती है और अपनी और से वो सारे कदम उठाएगी जिससे सामाजिक सौहार्द्य बहाल हो सके. इसके लिए स्थानीय स्तर पर विभिन्न कार्यक्रम चलाये जायेंगे. साथ ही सजप सरकार और शासन से मांग करती है की ऐसे तत्वों पर जो समाज को बाँटने का काम करते है, उनपर कड़ी कार्यवाई की जाय.

बिहार में नीतीश कुमार ने जनादेश के साथ गद्दारी कर, सत्ता-सुख भोग के लिए जिस तरह रातों-रात पाला बदला, वह अब तक की सबसे शर्मनाक राजनैतिक कुकृत्य है. सजप यह मांग करती है की बिहार की सरकार को अविलम्ब भंग किया जाय और नया जनादेश लिया जाय.

सजप ऐसा महसूस करती है की भाजपा के आक्रामक रणनीति के सामने विपक्ष निष्क्रिय और निराश है. हजारों की संख्या में किसान आत्महत्या कर रहे हैं. पूरे भारत में कई आन्दोलन हो रहे है- जिनमे प्रमुख है हरयाणा का जाट आन्दोलन, गुजरात का पाटीदार आन्दोलन, महाराष्ट्र का मराठा आन्दोलन, मध्य प्रदेश/ महाराष्ट्र का किसान आन्दोलन आदि. इन आन्दोलनों में सैकड़ों बेगुनाहों की जान गयी. भाजपा सरकारें इन आन्दोलनों को नकारने और दमन करने में लगी रही. मध्य प्रदेश के मुख्य मंत्री ने किसानों से बातचीत करने की बजाय उपवास का हास्यास्पद नाटक किया. जब दो किसानों के परिवार ने मुआवजा लेने से मना किया तब जाकर पुलिस वालों पर हत्या का मामला दर्ज हो पाया. सजप का मानना है की ये सभी आन्दोलन कृषि के प्रति सरकार की उपेक्षा और उलटी नीतियों के कारण हो रहे हैं. उपज का उचित मूल्य न मिलने के कारण किसान और उनके बच्चे छोटी-मोटी नौकरी में ही अपनी भलाई समझते है, और इसीलिये आरक्षण की मांग करते है. सजप सरकार से मांग करती है की कृषि के लागत मूल्य पर नियंत्रण हो, कृषि-उत्पादों का लाभकारी मूल्य मिले और किसान के हित वाली फसल बीमा लागू हो. अभी लागू ‘प्रधानमंत्री कृषि बीमा योजना’ के बारे में सी ऐ जी ने अपने प्रतिवेदन में कहा है, कि इस योजना से सिर्फ बीमा कंपनियों को ही लाभ पहुँचा है.

सजप का आंकलन है की २०१४ में बीजेपी की सरकार बनने के बाद से हिंदुत्व-समूहों के द्वारा समाज में अल्पसंख्यकों के प्रति घोर विद्वेष फैलाया जा रहा है. गाय और गोमांस का अफवाह फैला कर निर्दोष मुसलामानों की दिन दहाडे हत्या की जा रही है. उन्हें अपने पारंपरिक व्यवसाय, जैसे पशु-कारोबार और मांस बेचने के काम से वंचित करने का षड़यंत्र किया जा रहा है. आम जनता को भैंस, सूअर आदि जैसे सस्ते प्रोटीन आहारों से वंचित किया जा रहा है. गौ-रक्षक दल गुंडों की तरह आतंक फैला कर वसूली कर रहे है. इससे पशु पालन करने वाले सभी धर्मों के गरीब किसान की रोजी-रोटी पर भी प्रश्न चिन्ह लग गया है. सजप, केंद्र और राज्य सरकारों से मांग करती है की गौ-गुंडों के विरूद्ध कड़ी कार्यवाही की जाय और कानून हाथ में लेने वाले हर व्यक्ति और समूह से समान रूप से निबटा जाय जिससे भय का माहौल समाप्त हो और हर नागरिक कानून-सम्मत रोजगार और जीविका निर्वाह के साधनों का उपयोग कर सके.

आम जनता के लिए स्वास्थ व्यवस्था पूरे देश में चरमरा गयी है. उत्तरोत्तर सरकारों ने स्वास्थ सम्बन्धी साधनों में कटौती की है. स्थिति इतनी भयावह हो गयी है की सरकारी अस्पतालों में सैकड़ों की संख्या में मूलभूत सुविधा और ऑक्सीजन के आभाव में बच्चों की मौत हो रही है. गोरखपुर, जमशेदपुर आदि के अस्पतालों की घटना अपराधिक श्रेणी में आती है लेकिन बीजेपी सरकारें बेशर्मी से इसे झुठला रही है.

भ्रष्टाचार मिटाने के जुमले पर चुनाव जीतने वाली बीजेपी सरकार ने लोकपाल बहाल करने में कोई दिलचस्पी नहीं ली है. देश में औद्योगिक घरानों से सम्बंधित भ्रष्टाचार बेइंतहा बढ़ रहा है. याराना पूंजीवाद की संस्कृति फल-फूल रही है. अब तो अंतर्राष्ट्रीय एजेंसीज द्वारा किये जा रहे सर्वेक्षणों में भी भारत अव्वल भ्रस्टाचारी देश बन गया है. सजप मांग करती है की लोकपाल की बहाली अविलम्ब की जाय, ‘व्हिसलब्लोअर बिल’ पास किया जाय और राजनीतिक दलों के चंदों को पूरी तरह से पारदर्शी बनाया जाय.

लोहिया जी आजाद भारत के पहले राजनेता थे जिन्होंने ‘निजता के अधिकार’ को प्रखरता से उठाया था. कालांतर में सभी सरकारों ने आम जनता से निजता का अधिकार छीनने का षड़यंत्र करती रही है. बीजेपी की फसीबादी सरकार ने तो सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दायर कर इस अधिकार को सिरे से नकारा. किन्तु माननीय सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में इस अधिकार को मौलिक माना है. सजप इस फैसले का स्वागत करती है साथ ही यह मानती है की इस घटना से फासीवादी ताकतों के मानवाधिकारों के हनन के घृणित इरादों पर भविष्य में भी रोक लगेगी.

सजप नर-नारी समता के सिधान्तों पर मुखर रही है. हाल के सुप्रीम कोर्ट के तीन तलाक के निर्णय का स्वागत करती है. लेकिन बीजेपी जिस तरह से इस मुद्दे को मुसलमानों को नीचा दिखने के लिए इस्तेमाल कर रही है, उसकी हम भर्त्सना करते है. सभी वर्गों में, जिनमे हिन्दू भी शामिल है, महिलाओं के साथ काफी भेद भाव किया जा रहा है. सजप उन सभी मुद्दों पर सुधार लाने का काम करती रही है. लेकिन बीजेपी मुसलमान महिलाओं के शिक्षा और रोजगार पर ध्यान नहीं देकर उनके शादी में ५०००० का अनुदान देने की पेशकश कर रही है, जो भेदभाव एवं विद्वेषपूर्ण है. साथ ही केरल में अखिला / हादिया के सन्दर्भ में जिस तरह सुप्रीम कोर्ट में भ्रामक एफिडेविट फाइल कर एन आई ए की जांच करवाई जा रही है. यह घटना नारी स्वतंत्रता, और वयस्क नारी अधिकारों पर सीधा प्रहार है. सजप इसका सभी स्तर पर पुरजोर विरोध करेगी.

नोटबंदी के कारण देश की अर्थ-व्यवस्था चरमरा गयी. लाखों छोटे उद्योग बंद हो गए और एक करोड से ज्यादा कर्मचारी की नौकरी चली गयी. मोदी और उनकी सरकार इस सम्बन्ध में हर स्तर पर लगातार झूठ बोलती रही है. अब रिज़र्व बैंक ने जो आंकड़े प्रसारित किये है उनसे पता चलता है की ९९% नोट वापिस आ गए. १७००० कड़ोर नोट पकड़ने के लिए २१००० कड़ोर, नए नोट छापने पर खर्च कर दिया गया. जी डी पी में २% से ज्यादा की कमी आई है. सजप यह मांग करती है की अपने वादे के अनुसार मोदी को नोटबंदी के भीषण परिणामों की जिम्मेवारी लेते हुवे अविलम्ब इस्तीफा दें.

पिछले कई दशकों में होने वाले आर्थिक बदलावों की अपेक्षा जी एस टी एक बहुत बड़ी और सर्वव्यापी घटना है. जी एस टी लागू होने से टैक्स-व्यवस्था का सरलीकरण होगा, सामान के लाने ले जाने में आसानी होगी और सही सरकारी नीतियां लाने से कुछ वस्तुओं के दाम कम सकते हैं . जी एस टी के मुख्य नुकसानों में – केंद्रीकृत कंप्यूटर आधारित टैक्स फाइलिंग सिस्टम के लिए कंप्यूटर, इन्टरनेट, और जानकार ऑपरेटर / सी ए की सेवा का खर्च छोटे व्यवसाइयों के लिए मंहगा पड़ेगा. छोटे उद्योग, जो पंजीकरण नहीं करवा पायेंगे उन्हें इनपुट क्रेडिट नहीं मिल पायेगा. फलस्वरूप उनका उत्पाद बड़े उद्योग के अपेक्षा मंहगा हो जायेगा. सैधांतिक तौर पर सजप केंद्रीकृत टैक्स ढांचे और याराना-पूंजीवाद आधारित विकास के अवधारणा के विरूद्ध है. जी एस टी भी उसी दिशा में एक और कदम है. सजप मांग करती है की जी एस टी में आवश्यक सुधार अविलम्ब लाकर छोटे और मध्यम कारबारियों के लिए लाभकारी बनाया जाय ताकि रोजगार बढे और छोटे तबकों में आमदनी का जरिया मुहय्या हो.

साथ ही सजप का विस्वास है की एक स्वस्थ एवं न्यायपूर्ण अर्थव्यवस्था की नीव में जो कर व्यवस्था होगी उसमे प्रत्यक्ष कर का हिस्सा दो तिहाई के आस पास होनी चाहिए जबकि अभी मात्र एक तिहाई है. सजप धनाढ्य वर्ग के कर प्रतिशत को बढ़ने के पक्ष में है और अप्रत्यक्ष कर, जो आम जनता से वसूला जाता है उसे अभी के स्तर से आधे पर लाया जाय. धनी व्यक्तियों से ज्यादा आय-कर लेना अनिवार्य ज़रुरत है.

झारखंड की बीजेपी सरकार निरंकुश शासन का प्रयास कर रही है. आदिवासियों के भूमि अधिग्रहण का इनका कानून, अत्यधिक विरोध के बाद निरस्त करना पड़ा. सजप ने भी इन विरोधों में अहम् भूमिका निभाई. झारखण्ड की सरकार ने, माओवादी होने के आरोप में हज़ारों आदिवासी युवा को वर्षों से जेल में बंद कर रखा हैं. उनपर मुकदमें में भी कोई प्रगति नहीं है. सजप की मांग है की न्याय सम्मत ढंग से इन व्यक्तिओं को तुरत रिहा किया जाय. साथ ही झारखंड में ज़मीन-बैंक बनाने के रास्ते, गाँव के चारागाह और सामूहिक इस्तेमाल की भूखंडों को पूंजीपतियों को हस्तांतरित करने के प्रक्रिया पर रोक लगाईं जाय.

सजप ‘Jharkhand Freedom of Religion Bill 2017’ (झारखण्ड फ्रीडम ऑफ़ रिलिजन बिल २०१७) को झारखण्ड सरकार द्वारा नागरिकों के धर्म अपनाने के मौलिक अधिकार को छीनने का षड्यंत्र मानती है. इस बिल के लागू होने से हर ऐसे व्यक्ति को जो धर्म परिवर्तन करता है, जिला अधिकारी को सूव्चना नहीं देने पर तीन साल की सजा का प्रवधान है. सजप झारखण्ड के माननीय राज्यपाल से अपील करती है की इस बिल पर अपनी स्वीकृति न दें.


Aflatoon अफ़लातून ,

महामंत्री,
समाजवादी जनपरिषद ,

Phone फोन : 0542-2300405


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जरूरत नहीं है दुखहरण मास्टर की: संजीव ठाकुर

लेखक मंच - Tue, 05/09/2017 - 01:39

संजीव ठाकुर

हिन्दी के प्रसिद्ध कवि बाबा नागार्जुन की एक कविता में सुरती खाते और बात-बात पर छड़ी भाँजते जिन ‘दुखहरण मास्टर’ का वर्णन किया गया है, वे आमतौर पर भारतीय अध्यापकों के प्रतिनिधि के रूप में देखे जाते रहे हैं। लेकिन अब स्थितियाँ काफी बदल चुकी हैं। गाँवों के स्कूलों में कहीं-कहीं दुखहरण मास्टर के वंशज भले दिख जाएँ, लेकिन शहरों ने उनकी प्रजाति को विलुप्त करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। पब्लिक स्कूलों में तो पुरुषों के अध्यापक बनने के रास्ते लगभग बंद कर दिए गए हैं। अब चुस्त, सुंदर, आकर्षक, ‘मैम’ पब्लिक स्कूलों की शोभा बढ़ाने लगी हैं। ऐसे में दुखहरण मास्टर की प्रजाति का विलुप्त होना अनिवार्य हो गया है। और यह अच्छी खबर है। लेकिन क्या पहनावे और बोलने के ढंग के बदलने से दुखहरण मास्टर की छड़ी भाँजने की मानसिकता बदल गई है? शायद नहीं! आज भी अध्यापकों और अध्यापिकाओं में शारीरिक दंड देने की प्रवृत्ति विद्यमान है। डाँट-डपट की तो बात ही क्या? ऐसे स्कूल या शिक्षक ढूँढ़ने पर ही मिल सकते हैं जो अपने विद्यार्थियों को डाँट-डपट, दंड वगैरह देने से परहेज करते हों। कभी-कभी तो बच्चों को भयानक शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना देने की खबरें अखबारों और टी.वी. में आती रहती हैं। ऐसी खबरों को देखने, पढ़ने के बाद दुःख होता है कि हमारे शिक्षक इस स्तर पर भी उतर सकते हैं?

दूसरी तरफ, यह सुखद बात है कि सरकार, स्कूल प्रशासन, माता-पिता बच्चों को शारीरिक दंड देने के सख्त खिलाफ हो गए हैं। शिक्षकों की प्रवृत्ति भले ही नहीं बदली हो, लेकिन वे बच्चों को दंडित करने से पहले सौ बार जरूर सोचने लगे हैं। हालाँकि बच्चों को डाँट-डपट और तरह-तरह से भयभीत करने से वे अब भी बाज नहीं आ रहे हैं। इसके लिए उनके पास अपने तर्क हैं। उनका मानना है कि बच्चे अनुशासन में नहीं रहेंगे तो वे उन्हें पढ़ा कैसे पाएँगे? और उन्हें अनुशासन में रखने के लिए तो डाँट-डपट जरूरी है। सरकारी स्कूलों में शिक्षकों को बच्चों की बड़ी तादात को सँभालना होता है। वे आखिर उन्हें सँभालें भी तो कैसे? प्राइमरी स्तर पर एक ही शिक्षक पूरी क्लास को पढ़ाता है। पढ़ाने के साथ-साथ उसे यह भी देखना होता है कि बच्चे आपस में मार-पीट न करें। यहाँ तक कि पानी पीते या पेशाब को जाते भी वे अगर मार-पीट करें और किसी को खरोंच भी आ जाए तो संबंधित कक्षा का शिक्षक ही दोषी माना जाता है। ऐसे में, एक सरकारी स्कूल के युवा शिक्षक हेमेन्द्र मोहन की कही बात गौर करने लायक है, ‘‘पहले वाली स्थिति ही अच्छी थी। विद्यार्थी शिक्षकों का लिहाज करते थे, कहा मानते थे। अब तो सीनियर क्लास के लड़के शिक्षकों को ही धमकाते हैं कि आप कुछ कहोगे तो मैं प्रिसिंपल से शिकायत कर दूँगा।’’

जाहिर है, शिक्षकों और विद्यार्थियों के रिश्ते में दरार पैदा हो गई है। यह दरार पब्लिक स्कूलों में थोड़ी कम दिखाई देती है। वहाँ शिक्षकों और विद्यार्थियों के बीच माहौल अधिक दोस्ताना है। लेकिन दुर्भाग्यवश यह दोस्ताना स्वाभाविक नहीं, बल्कि व्यावसायिक दबाव की वजह से अधिक है। आज के माता-पिता यह नहीं चाहते कि उनके बच्चे महँगे स्कूलों में जाएँ और वहाँ से मुर्गा बनकर या पीठ पर छड़ी के निशान लेकर घर वापस आएँ। वे अपने बच्चों पर एक उँगली तक पड़ते नहीं देखना चाहते। ऐसे में पब्लिक स्कूलों की यह मजबूरी हो जाती है कि वे बच्चों को शारीरिक रूप से प्रताड़ित न होने दें। स्कूल-प्रशासन का अंकुश शिक्षकों पर रहता है, छात्र या माता-पिता की शिकायत पर किसी शिक्षक को निष्कासित करते उन्हें देर भी नहीं लगती। यही वजह है कि पब्लिक स्कूलों के शिक्षक/शिक्षिका विद्यार्थियों से बहुत सहज और फ्रेंडली दिखाई देते हैं। शिक्षकों की तरफ से देखें तो निश्चय ही उनके लिए यह भूमिका बड़ी कठिन हो सकती है। उन्हें अपने तन-मन को रोके रखकर बच्चों को अनुशासित रखना है और पढ़ाना है। शिक्षकों की इस कशमकश के बारे में पब्लिक स्कूल की एक शिक्षिका श्रीमती लीना का कहना है- ‘‘हमें बहुत मुश्किल हालात का सामना करना पड़ता है। मैं भी इस पक्ष में हूँ कि बच्चों को मारा-पीटा न जाए, डाँटा-डपटा न जाए, लेकिन बिना डाँटे-डपटे बच्चों को सँभालना आसान भी तो नहीं होता? आखिर कभी-कभार घर में हम अपने बच्चों को डाँटते-डपटते हैं या नही?’’

श्रीमती लीना भी अपनी जगह सही हैं, लेकिन बच्चों के कोण से देखें तो उन्हें न तो घर में डाँट-डपट पसंद है, न ही स्कूल में। न तो डाँटने-डपटने वाले माता-पिता उन्हें पसंद है, न ही शिक्षक। हाँ, वे डाँट-डपट के इतने आदी हो गए हैं कि वे थोड़ी बहुत डाँट सहन को भी तैयार रहते हैं। एक पब्लिक स्कूल की छठी कक्षा की छात्रा तृषा का कहना है, ‘‘मेरी कक्षा में सभी टीचर्स बहुत अच्छी हैं। हँसमुख और फ्रेंडली। पर कभी-कभी हमें डाँटती भी हैं। कभी-कभी जब उनका मूड ज्यादा खराब रहता है तो वे हमें ज्यादा डाँटती हैं। मेरे ख्याल से उन्हें डाँटना तो चाहिए, लेकिन कम!’’

सवाल है कि बच्चों को डाँटा-डपटा क्यों जाए? इसलिए कि वे बड़ों की बात नहीं मानते? शिक्षकों की नहीं सुनते?…बच्चों के जीवन और शिक्षण पर चिंतन और अपने चिंतन का क्रियान्वयन करने वाले दुनिया भर के शिक्षा शास्त्रियों ने इस बात का विरोध किया है। बच्चों से अपनी बात मनवाने के लिए जोर-जबरदस्ती करते माता-पिता और शिक्षक उनकी आलोचना के विषय रहे हैं। टॉल्सटॉय, ए.एस.नील, जॉन होल्ट, मकारांको, रवीन्द्रनाथ, गिजुभाई जैसे शिक्षा शास्त्री बच्चों की आजादी के पक्षधर रहे हैं। बच्चों को भयमुक्त वातावरण में पालने और पढ़ाने के पक्षधर रहे हैं। एस.एस. नील जैसे शिक्षक तो अपने विद्यार्थियों को इतनी आजादी देते थे कि विद्यार्थी उन्हें उनके नाम से पुकार सकते थे। गिजुभाई ने भी अपने विद्यार्थियों को इतनी आजादी दी थी कि ‘गिजुभाई पगला गए हैं’ कह सकते थे। विद्यार्थियों पर हर वक्त अंकुश रखने वाले शिक्षक इस आजादी की कल्पना तो नहीं ही कर सकते हैं। नील और गिजुभाई जैसे लोग उन्हें बेवकूफ भी लग सकते हैं। जबकि नील और गिजुभाई जैसे शिक्षक इसलिए बच्चों को आजादी देने के पक्ष में थे कि इससे वे आजाद और कुंठा रहित नागरिक के रूप में विकसित होंगे। नील और गिजुभाई के इस दर्शन को समझने और अपनाने वाले शिक्षकों की आज कितनी आवश्यकता है? शिक्षकों के द्वारा दी गई आजादी का उपभोग करते हुए भी शिक्षकों के प्रति आदर और सम्मान का भाव रखना विद्यार्थियों के लिए भी उतनी ही जरूरी है।

आज के हिसाब से देखें तो यह सच है कि हमारे यहाँ एकलव्य या आरुणि जैसे शिष्य नहीं रहे। सच तो यह भी है कि हमारे गुरु अब ब्रह्मा नहीं रहे? शिक्षा को व्यवसाय में बदल देने वाले गुरु राम और युधिष्ठिर जैसे शिष्य तैयार भी कैसे कर सकते हैं? इस मूल्यहीन समय में सद्गुरुओं की जितनी जरूरत है, उतनी ही उनकी कमी दिखाई देती है। सद्गुरु भाषण से नहीं, बल्कि अपने आचरण से अपने शिष्यों को शिक्षा दिया करते थे, दंड से नहीं, प्रेम, प्रोत्साहन से काम लिया करते थे। तभी उनकी दी हुई शिक्षा चिर स्थायी हुआ करती थी।

हरियाणा के जन्म की कहानी, आला हाकिम की ज़ुबानी

जंतर-मंतर - Sun, 03/09/2017 - 12:39


शेष नारायण सिंह
हरियाणा के विकास में तीन लालों का बहुत अहम योगदान है . देवी लाल, बंसी लाल और  भजन लाल  ने हरियाण को जो स्वरुप दिया , उसी से  हरियाणा की पहचान बनी है .१९६६ के पहले  हरियाणा पंजाब  का हिस्सा था  और  हरियाणा में रहने वाले लोग नहीं चाहते थे कि वे पंजाब से  अलग हों. हरियाणा की स्थापना के लिए किसी ने कोशिश नहीं की थी , बल्कि हरियाणा बन जाने के बाद इस राज्य के लोगों को नया राज्य मिलने से कोई खुशी नहीं हुयी थी, बस लोगों ने नियति मानकर इसको स्वीकार कर लिया था .पंजाबी सूबे की मांग को लेकर मास्टर तारा सिंह और संत फ़तेह सिंह ने जो आन्दोलन चलाया उसी के नतीजे में उनको पंजाब का पंजाबी भाषा के बहुमत वाला इलाका  मिल गया , जो  बच गया उसी में हरियाणा और हिमाचल प्रदेश बन गया .  नये राज्य की राजनीति में शुरू से ही देवी लाल का दबदबा रहा  है . शुरू  से ही हरियाणा की नई विधान सभा के हर सत्र के पहले वहां दल बदल का मौसम आ जाता था, दल बदल की स्वार्थी राजनीति के आदि पुरुष गया लाल की कथा भी बहुत दिलचस्प है. देवी लाल ने राव बीरेंद्र सिंह की सरकार को  गिराने के लिए  १९६७ में दल बदल की ललित कला का सफल प्रयोग किया था .उसी दौर में विधायक हीरा नन्द आर्य ने पांच बार दल बदला, उन दिनों के केंद्रीय गृहमंत्री यशवंत राव बलवंत राव चह्वाण ने संसद में बताया कि राज्यपाल की रिपोर्ट के अनुसार दल बदल बहुत ही घटिया रूप में प्रकट हुआ था. एक विधायक की कीमत बीस हज़ार से चालीस हज़ार रूपये के बीच कुछ भी हो सकती थी. गौर करने की बात यह है कि उन दिनों के चालीस हज़ार रूपये की कीमत आज से बहुत ज्यादा होगी . १९६७ में सोना १०२ रूपये प्रति दस ग्राम था यानी चालीस हज़ार रूपये में उन दिनों करीब ३९२० ग्राम सोना खरीदा जा   सकता था . आज  इतने सोने की कीमत अगर तीस हज़ार प्रति दस ग्राम मानें तो यह रक़म एक करोड़ बीस लाख रूपये के आस पास बैठती है . हालांकि आजकल विधायकों के रेट बहुत ज्यादा हैं  लेकिन चालीस हज़ार  रूपये  १९६७ में के बहुत बड़ी रक़म मानी जाती थी . इस दौर में गया लाल ऐतिहासिक पुरुष बने थे . गया लाल ने मुख्य मंत्री राव बीरेंद्र सिंह का साथ ३० अक्टूबर, १९६७ को छोड़ा था . कुछ ही घंटों में राव बीरेंद्र  सिंह ने उनको चंडीगढ़  प्रेस के सामने पेश किया और कहा कि ," गया लाल अब आया राम हो गए हैं " लेकिन जब तक गृहमंत्री वाई बी चाहवाण संसद में  भाषण देते तब  तक  गया लाल फिर दल बदल चुके थे . गृहमंत्री ने संसद में  कहा कि " अब तो गया लाल भी गया " इसी  भाषण में उन्होंने कालजयी अभिव्यक्ति, ' आया राम ,गया  राम ' की रचना की थी . उस दौर में  दल बदल  का स्कोर भी रिकार्ड किया गया . हीरा नन्द आर्य का स्कोर सबसे अच्छा था. उन्होंने पांच बार दल बदला, दो  विधायकों ने चार बार, तीन विधायकों ने तीन बार और ३४ विधायकों ने एक बार दल बदल का कार्य किया . इन्हीं लोगों की कृपा से हरियाणा को 'आया राम , गया राम ' राजनीति का केंद्र बताया गया .यह सारी बातें एक नई किताब में दर्ज है .इस किताब में  हरियाणा के जन्म के दौर की कहानी भी है और यह भी कि किस तरह  देश के सबसे पिछड़े राज्य को बंसी लाल के कठिन परिश्रम के कारण देश के शीर्ष राज्य का  दर्जा मिला . देवी लाल और भजन लाल के राजनीतिक उत्थान पतन की कहानी भी है .वास्तव में यह एक आई ए एस अधिकारी की अपनी कहानी है जिनको हरियाणा के अब तक के तीन सबसे महत्वपूर्ण नेताओं के साथ काम करने  का अवसर मिला है . राम वर्मा की किताब  ," Life in  the IAS  , My Encounters With the Three Lals of Haryana " इन तीनों ही नेताओं की अच्छाई बुराई को कबीरपंथी  इमानदारी से बताने की कोशिश इस किताब का निश्चित रूप से स्थाई  भाव  है. बंसीलाल के बारे में बहुत दिलचस्प जानकारी है. इमरजेंसी में संजय गांधी के अनुयायी के रूप में चर्चित हो चुके बंसीलाल की छवि अधिकतर लोगों की नज़र में अलग तरह की है .लेकिन जब उन्होंने सत्ता पाई थी तो एक अलग इंसान थे. तीनों लालों में केवल उन्होंने ही औपचारिक शिक्षा पाई थी. कानून की पढाई की थी , देवीलाल और भजनलाल को तो ज़िंदगी की हालात ने ही जो पढ़ा दिया ,वही शिक्षा थी उन दोनों के पास . जो भी हो हरियाणा के उतार  चढ़ाव में इन लोगों का अहम योगदान है .
तीनों  ही लालों में सबसे पहले बंसीलाल मुख्यमंत्री बने. देवीलाल अविभाजित पंजाब के नेता थे, देश के बंटवारे के  बाद जब प्रताप सिंह कैरों मुख्यमंत्री बने तो देवीलाल उनके बहुत ही करीबी थे . हरियाणा की  स्थापना के बाद वे नए राज्य के ताक़तवर नेता बन गए .  जब बी डी शर्मा और  राव बीरेंद्र सिंह के बीच मुख्यमंत्री के पद को लेकर उठापटक शुरू हुयी तो देवीलाल की अहम भूमिका थी. कभी इस  पार और कभी उस पार सक्रिय रहे . मुराद यह कि उनको मुख्यमंत्री की गद्दी तो नहीं मिली लेकिन मुख्यमंत्री बनाने  बिगाड़ने में वे बहुत सक्रिय भूमिका निभाते रहे. बंसीलाल को मुख्यमंत्री बी डी शर्मा गुट ने बनवाया था क्योंकि उनको उम्मीद थी कि  बंसीलाल एक कठपुतली के रूप में रहेंगें लेकिन वक़्त ने ऐसा नहीं होने दिया . बंसीलाल ने किस तरह से  नए राज्य को सिंचाई के मामले में आत्मनिर्भर बनाया  , यह  कहानी  अच्छी तरीके से किताब में  दर्ज है . हुआ  यह कि  बंसी लाल एक बार हिमाचल प्रदेश के सुन्दर नगर में बन रहे बाँध को देखने गए थे . वहां तैनात उनको एक इंजीनियर ,के एस पाठक मिले जिन्होंने कभी अमरीका के टेनेसी वैली अथारिटी में काम किया था. बंसीलाल ने उनसे कहा कि मैं यमुना के पानी को हिसार के रेगिस्तानी और ऊंचे इलाके में ले जाना चाहता हूँ. पाठक ने कहा कि बिलकुल हो जायेगा  और साहेब काम शुरू हो गया . लिफ्ट सिंचाई की योजनायें बाद में और राज्यों में भी शुरू हुईं लेकिन बंसीलाल ने इसको अच्छी तरह से राज्य के हित में चलाया . इन्हीं लिफ्ट  सिंचाई योजनाओं के कारण ही हरियाणा के सूखे इलाकों में पानी आया .हरियाणा में हर गाँव को सड़कों से  जोड़ने  का श्रेय भी बंसीलाल को जाता है .  हरियाणा में चिड़ियों के नाम पर हर सड़क पर बने पर्यटक स्थलों का काम भी बंसीलाल के प्रमुख सचिव एस के मिश्र ने किया . एक बार मुख्यमंत्री को शिकायत मिली कि  हरित क्रान्ति का फायदा गाँवों तक नहीं पंहुच रहा है क्योंकि नियम ऐसे हैं कि  गाँव तक तार खींचने का पैसा  किसान को देना पड़ता था.  बंसीलाल ने  नियम बदल दिया और हर गाँव में बिजली पंहुचाने वाला हरियाणा देश का पहला राज्य बना  गया .किताब में राम वर्मा की दिल को छू जाने वाली वह कहानी भी  है  कि किस तरह से वे मेडिकल कारणों से आई ए एस में चुने जाने के बावजूद रिजेक्ट होने से बाल बाल बचे . आई ए अकेडमी ,मसूरी में अपने साथियों को भी बहुत ही अपनेपन से याद किया गया है . अपने पहले बॉस एस के मिश्र के बारे में भी उनकी यादें बहुत ही मधुर हैं . अपनी शादी की कहानी भी बहुत ही दिलचस्प तरीके से बताया है लेखक ने . आजकल तो आई ए एस  के रिज़ल्ट  आते ही लोग करोडपति हो जाते हैं लेकिन अपना वाला आई ए एस सचिवालय में   डिप्टी सेक्रेटरी तैनात होने के बाद  सिटी बस से दफ्तर जाता था. उन्होंने बस में जाने के इरादे  को इसलिए बदला क्योंकि उसी बस में उनके दफ्तर के अधीनस्थ कर्मचारी भी होते थे  जो उनको देखकर असहज हो जाते थे . उन्होंने आफिस से लोन लेकर वेस्पा स्कूटर खरीदा और उस पर सवार होने पर जो अलौकिक आनंद मिला उसका भी बहुत  अच्छे गद्य में वर्णन  है . चार साल की सर्विस के बाद मुख्य सचिव की  मर्जी के खिलाफ उनको सूचना निदेशक बना दिया गया . और  फिर तो वे जीवन भर मीडिया से संपर्क में बने रहे.  बाद में मुख्य सचिव भी हुए .अपनी बच्चियों के जन्म को जिस मुहब्बत से याद किया है वह  मार्मिक है . पहली बच्ची जब पैदा हुयी तो वे एस डी एम थे ,सब कुछ सरकारी तौर पर हो गया .  लेकिन दूसरी बच्ची के जन्म के समय की जो दर्द भरी कहानी है , वह भी  मर्म  पर चोट करती  है. उनको उम्मीद थी कि अभी कुछ समय है . वे संपादकों से मिलने जालंधर जा रहे थे, लंच पर सबको बुलाया  था . पत्नी ने रोका लेकिन रुके नहीं . और जब  लौट कर आये तो पता लगा कि पी जी आई चंडीगढ़ में तुरंत भर्ती होना पड़ा और  बेटी पैदा हो गयी  है . पुस्तक  उनकी पत्नी सावित्री को समर्पित है , जिन्होंने घोंसला बनाया और बच्चियों को पाला पोसा और जब चहचहाती चिड़ियों ने घोसला छोड़कर अपना  घर बनाया तो छोड़कर चली गयीं .हरियाणा के शुरुआती विकास की बारीकी को समझने की इच्छा रखने वाले विद्यार्थी के लिए यह एक उपयोगी किताब है .    

देश में खस्ता स्वास्थ्य सेवाओं को दुरुस्त करना बहुत ज़रूरी है

जंतर-मंतर - Sat, 02/09/2017 - 05:09


शेष नारायण सिंह
देश में स्वास्थ्य सेवाओं की हालत बहुत खराब है . गोरखपुर में बच्चे मर  रहे हैं और राजनीति करने वाले अपना काम कर रहे  हैं. पता चला है कि वहां के मेडिकल कालेज के अफसरों ने घूस की मात्रा कम होने पर नाराज़ होकर आक्सीजन सप्लाई करने वाले ठेकेदार का भुगतान रोक दिया था . उसने इन लोगों  को बार बार चिट्ठी लिखी लेकिन पैसा नहीं मिला इसलिए सप्लाई को नियमित नहीं किया गया . सरकार की भूमिका भी संदेह के  घेरे में है , उस पर चर्चा बाद में की जायेगी अभी तो डाक्टरी के पेश इसे जुडी  नैतिकता पर चर्चा करना ही ठीक रहेगा . मेडिकल नैतिकता की धज्जियां  उड़ाता एक वाकया और अखबारों में छपा है . जोधपुर में डाक्टरों ने जो कुछ किया उसके लिए उनको कड़ी से कड़ी सज़ा  दी जानी चाहिए . एक महिला उनके सामने आपरेशन की मेज़ पर पडी कराह रही थी  और डाकटर लोग आपस में लड़ रहे थे. उनकी लापरवाही से महिला की नवजात बच्ची की मृत्यु हो गयी . बाद में सरकार ने वहां भी कार्रवाई की लेकिन उससे बहुत फर्क नहीं पड़ता . मरीज़ की तो जान ही चली गयी. इन दोनों  ही मामलों में डाक्टरों ने अपना काम सही तरीके से नहीं  किया वरना यह हालत नहीं होती.सवाल यह उठता है कि इतने  अच्छे काम के लिए शिक्षा लेने के बाद यह लोग ऐसा करते क्यों हैं . इस पवित्र पेशे में प्रवेश के समय प्रत्येक डाक्टर को एक  घोषणा करनी होती  है जिसमें साफ़ साफ़ लिखा है कि मैं अपने आप को मानवता की सेवा के लिए समर्पित करता हूँ. हर खतरे का सामना करूंगी/करूंगा लेकिन मानवता के कानून के खिलाफ अपने मेडिकल ज्ञान का उपयोग कभी नहीं करूंगी/करूँगा . मैं मानव जीवन का सदैव सर्वोच्च सम्मान करूंगी /करूँगा . मेरे मरीज़ और मेरे कर्त्तव्य के बीच कभी भी धर्म, राष्ट्रीयता,जाति , राजनीति, या सामाजिक  हैसियत को नहीं आने दिया जाएगा . मैं अपना काम गरिमा के साथ निभाउंगी/निभाऊंगा. मेरे मरीज़ का  स्वास्थ्य मेरे लिए  सर्वोच्च प्राथमिकता होगा. अपने काम के दौरान मरीज़ के बारे में जो भी जानकारी या  रहस्य मुझे पता लगेंगें उनको मैं पूर्ण सम्मान दूंगी/दूंगा. मेरे शिक्षकों को मेरी तरफ से पूरा सम्मान मिलेगा . मेरी पूरी शक्ति से मेडिकल पेशे की पवित्र परम्परा और गरिमा के साथ सम्मान किया जाएगा . मैं अपने साथ काम करने वाले डाक्टरों का सम्मान करुँगी/करूँगा और उनकी गरिमा को अक्षुण रखूंगी/रखूँगा .
इस शपथ के साथ डाकटर अपना काम शुरू करते हैं और जब हम  गोरखपुर और जोधपुर के काण्ड को देखते हैं तो सर शर्म से झुक जाता है .अपने व्यक्तिगत अनुभव से  भी हर व्यक्ति कुछ न कुछ ज़रूर जानता  होगा जहां इस  मेडिकल प्रोफेशन की बुलंदियां भी होंगी तो कहीं न कहीं डाक्टरों का कमीनापन भी होगा . मेरा अपना अनुभव भी है . ठीक एक साल पहले मैं चिकनगुनिया का शिकार हुआ था. ग्रेटर नोयडा के एक नामी प्राइवेट अस्पताल में दिखाने गया तो भर्ती कर लिया गया .दो दिन के अन्दर मुझसे ज़रूरी पैसे लेकर डिस्चार्ज कर दिया गया . हालत और बिगड़ गयी तो एक  दूसरे अस्पताल में दाखिल हो गया .  सोचा था मामूली  बुखार है , तब तक चिकनगुनिया का पता   नहीं चला था . एक  हफ्ते वहाँ रहा , तो यह तो पता लग गया कि चिकनगुनिया है . उसका  इलाज शुरू हो गया लेकिन अस्पताल के डाक्टरों का रवैया अजीब था. तरह तरह के टेस्ट कर रहे थे  लेकिन उनको पता नहीं लगा कि चिकनगुनिया के चलते सोडियम, किडनी और लीवर की बीमारियाँ भी शुरू हो  रही हैं. तीन चार दिन बाद वहां के बड़े  डाक्टर ने मेरे एक दोस्त को बताया कि लगता  है  कि इनको सेप्टोसेमिया हो रहा है . यानी मेरे  शरीर की हालत बिगड़ रही थी और वे लोग लाइफ सपोर्ट सिस्टम लगा कर  बिल बढाने के काम में लग गए थे . बहरहाल जब मेरे बच्चों को पता चला तो एक राजनेता मित्र की कृपा से  मुझे वसंत कुञ्ज के लीवर संस्थान में भर्ती करा दिया गया . करीब  दो हफ्ते वहां रहा और मैंने अपनी आँखों से मेडिकल एथिक्स को देखा . जब मैं भर्ती हुआ तो मैं   वहां के  किसी डाक्टर से परिचित नहीं था , लेकिन जिस तरह से मेरी देखभाल शुरू हुयी उसके बाद मुझे पता लगा कि मेडिकल एथिक्स का पालन करने वाले डाक्टर कैसे  होते हैं . संस्थान के निदेशक डॉ एस के सरीन दुनिया के बहुत बड़े डाक्टर हैं .उनके नाम से गैस्ट्रो इंटाइटिस के इलाज का ' सरीन प्रोटोकल'  है जिसका पूरी दुनिया में प्रचलन है .  उनको दिखाने के लिए तीन महीने का इंतजार करना पड़ता है लेकिन मुझे  रोज़ दो बार देखने आते थे . डॉ सरीन के बारे में अब तो दन्त कथाएं प्रचलित हो गयी हैं . वरिष्ठ पत्रकार मनोज मिश्र की पत्नी की बहन की हालत बहुत खराब थी . लोग उम्मीद छोड़ चुके थे . लीवर ख़त्म होने के कगार पर था , पेट में बहुत पानी भर गया था . उन्होंने डॉ सरीन से बात की तब वे जी बी पन्त अस्पताल में थे . उन्होंने स्टेशन से सीधे अस्पताल आने को कहा . जगह नहीं थी तो वहां बरामदे में ही इलाज शुरू कर दिया और वे बिलकुल स्वस्थ हो कर अपने घर गयीं. इसी तरह का मामला वरिष्ठ पत्रकार रवीश कुमार  के भाई  का है . उनका लीवर बिल्कुल खराब था , ट्रांसप्लांट के लिए भर्ती किए गए  लेकिन डॉ सरीन ने  सरीन प्रोटोकल से इलाज किया . लीवर सही  हो गया , कोई सर्जरी नहीं हुयी . और  मरीज़ बिल्लुल स्वस्थ होकर अमरीका चला गया . बी एच यू मेडिकल कालेज के डॉ ए के सिंह की कहानी भी ऐसी ही है . वे तब तक ओ पी डी में बैठे  रहते थे जब तक सारे मरीजों को देख न लें .
मेडिकल एथिक्स में लिखा है कि अपने मरीज़ को फालतू टेस्ट या अन्य  डाक्टरों से सलाह लेने के लिए रेफर न किया लेकिन हमने लखनऊ में देखा है कि डॉ लोग हर तरह के टेस्ट की सलाह दे देते हैं क्योंकि उनके पर्चे  पर उनको कट मिलता  है .  मेरी डॉ सुमन लता ने हमेशा फालतू के टेस्ट का विरोध किया . एक बार किसी जूनियर डॉ ने एहतियातन सी टी स्कैन के लिए लिख दिया , डॉ सुमन ने साफ़ कह दिया कि कोई ज़रुरत नहीं है. मुराद यह है कि जोधपुर और गोरखपुर के बेईमान डाक्टरों की दुनिया से अलग भले डाक्टर भी हैं और बड़ी संख्या में हैं . सच्ची बात यह है कि जब आदमी बीमार होता है तो वह डाक्टर को ईश्वर के समकक्ष मान कर चलता है लेकिन रास्ते में  बैठे लुटेरे उसको कहीं का नहीं छोड़ते .अभी एक लड़के का मुंबई  से फोन आया कि उसको डाक्टर ने टीबी   बताया है और सर्जरी की सलाह दी है . उसने कहा कि बस पंद्रह हज़ार  रूपये का खर्च होगा. यानी कम खर्च बताकर मरीज़ को सर्जरी की मेज़ पर लिटा देगा और उसके बाद उससे  बाकी खर्च माँगना  शुरू करेगा . यह भी आजकल बहुत हो रहा है . इस माहौल में ज़रूरी है कि देश की जनता भी मेडिकल एथिक्स के बारे में पूरी तरह से अवगत रहे .मेडिकल एथिक्स की कुछ बुनियादी  बातें आम आदमी को भी पता होनी चाहिए. डाक्टर के लिए हर मरीज़ को देख पाना संभव नहीं है और न ही वह लाजिम है लेकिन  हर मरीज़ या घायल इंसान की काल पर कार्रवाई  करनी चाहिए, और अपने पवित्र काम की गरिमा को बनाए रखना चाहिए . इलाज के दौरान यह बिलकुल नहीं भूलना चाहिए कि मरीज़ के जीवन की रक्षा सबसे बड़ी प्राथमिकता है और मरीज़ अपने डाक्टर पर पूरा भरोसा करके वहां आया है .मेडिकल एथिक्स में साफ़ लिखा है कि अगर इमरजेंसी हो तो किसी को रेफर न करके शुरुआती इलाज अवश्य करना चाहिए . हाँ यदि किसी बीमारी के बारे में डाक्टर का अनुभव और शिक्षा उपयुक्त नहीं  है तो मरीज़ को सही सलाह देकर  उपयुक्त सन्दर्भ देकर भेजना चाहिए .ऐसी हालत में डाक्टर को मरीज़  का इलाज नहीं करना चाहिए और सही जगह रेफर करना चाहिए .  डाक्टर के व्यक्तित्व में धैर्य और शालीन आचरण पूरी तरह से समाहित होना चाहिए . अगर मरीज़ ने अपनी कुछ  कमजोरियों के बारे में डाक्टर से बताया  है तो उसको किसी भी हालात में किसी और को नहीं बताना चाहिए.  ऐसी बीमारियों के बारे में ज़रूर बताना चाहिए जो कि संभावित हों और उनके इलाज का उपाय किया जाना चाहिए . मरीज़ की बीमारी को कभी घटा या बढ़ा कर नहीं बताना चाहिए . जो भी बीमारी हो मरीज़ के दोस्तों और   रिश्तेदारों को उसकी पूरी जानकारी होनी चाहिए .हालांकि डाक्टर को इस बात की आजादी है कि वह अपना मरीज़ खुद चुने या किसका इलाज करे लेकिन  इमरजेंसी में उसको हर हाल में मदद करने के लिए आगे  आना चाहिए .अपने मरीज़ के स्वास्थ्य और उसके हित के लिए डाक्टर को तत्पर रहना चाहिए.
जहां तक  डाक्टरों के कर्तव्य की बात है उसके बारे में तो मेडिकल काउन्सिल ने सारे नियमबना रखे  हैं  लेकिन देश की  जनता का  स्वास्थ्य   निश्चित रूप से सरकारों की ज़िम्मेदारी कीश्रेणी में आता है . प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने के साथ ही नरेंद्र मोदी ने जनता के स्वास्थ्य के बारे में अपनी  प्राथमिकता स्पष्ट कर दिया था. अक्टूबर २०१४ में मुंबई में अपने एक भाषण में उन्होंने कहा था कि " यह शर्म की बात है  जब हम अपने देश की स्वास्थ्य सेवाओं की तुलना विकसित देशों  से करते हैं.  नवजात शिशुओं और मां के स्वस्थ्य के बारे में हमारी प्रगति बहुत ही चिंता की बात है." जब बच्चों की प्राथमिकता के बारे में हम  प्रधानमंत्री की बात के बरक्स गोरखपुर में आक्सीजन की कमी और डाक्टरों के व्यवहार को देखते हैं तो साफ़ लग जाता है कि उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के जिले में प्रधानमंत्री की बात को उनके सन्देश के तीन साल बाद भी गंभीरता से नहीं लिया गया है .उसी भाषण में प्रधानमंत्री ने कहा था कि " कई बार जच्चा-बच्चा दोनों  ही  बुनियादी स्वास्थ्य सेवा की कमी के कारण मर जाते हैं ." और गोरखपुर में सरकारी डाक्टरों और अस्पताल की कुव्यवस्था के कारण मरने वाले बच्चों के बारे में उत्तर प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री यह कहकर सरकार को दोष मुक्त करने की कोशिश करते हैं कि अगस्त के महीने में तो बच्चे  मरते ही रहते हैं. एक तरफ देश के प्रधानमंत्री कह रहे होते हैं कि हमको सबके  जीवन का सम्मान करना चाहिए और सफाई को अपने जीवन का लक्ष्य बनाना चाहिए दूसरी तरफ उनकी पार्टी के ही सदस्य मुख्यमंत्री और स्वास्थ्य मंत्री घोषणा करते हैं कि गोरखपुर के बच्चों की मृत्यु में अस्पताल में सफाई की कमी  भी एक कारण थी . सवाल यह  है कि जब प्रधानमंत्री से स्वच्छता को देश के मिशन के रूप में आगे बढाने की बात की है तो उनकी बात को उत्तर प्रदेश या अन्य राज्यों के मंत्री क्यों नहीं मानते .इसलिए स्वास्थ्य सेवा  को उसी तरह से प्राथमिकता देना होगा जैसा कि  पश्चिमी देशों  में है या क्यूबा जैसे देश  में है . प्रधानमंत्री की इच्छा का आदर करते हुए सबको इस मिशन में जुटना पड़ेगा .Click here to Reply, Reply to all, or Forward

थारू समाज- एक समृद्ध विरासत का शोकगीत : अवैद्यनाथ दुबे

लेखक मंच - Fri, 01/09/2017 - 14:58

थारू समाज की महि‍लाओं से बात करते अवैद्यनाथ दुबे।

कहने को तो अन्य आदिवासी समाज की तरह उत्तर प्रदेश के तराई में बसा थारू आदिवासी समाज भी सांस्कृतिक-लोकपरम्पराओं के मामले में समृद्ध रहा है। आज भी यहाँ स्थानीय पर्व-त्योहारों के मौकों पर लोकधुनों पर थिरकते थारू स्त्री-पुरुषों का समूह दिख जाएगा। विडम्बना है कि दुधवा टाइगर रिज़र्व पहुँचने वाले देसी-विदेशी सैलानी, सत्ता में बैठे हुक्मरान और पैसेवाले थारू आदिवासियों के शोकगीतों में भी मनोरंजन खोजते हैं। यही वजह है कि‍ आज भी यह आदिवासी समुदाय खासतौर से महिलाएं हाशिये पर हैं। वरि‍ष्‍ठ पत्रकार अवैद्यनाथ दुबे की रि‍पोर्ट-

एक तरफ उत्तर प्रदेश का राष्ट्रीय उद्यान दुधवा अपने प्राकृतिक सौंदर्य और वैविध्यपूर्ण वन्य जीवन के लिए दुनिया भर में जाना जाता है, तो वहीं नेपाल से सटे तराई के इन जंगलों के बीच इंसानों की वह दुनिया भी है, जिसे यह ‘सभ्य’ समाज थारू आदिवासियों के नाम से जानता है। ‘सबका साथ, सबका विकास’ जैसे नारों के बीच थारू आदिवासियों का यह समाज आज भी हाशिये पर है और इसी समाज की आधी आबादी यानी महिलाएं तो हाशिये से भी गायब हैं।

कहने को तो अन्य आदिवासी समाज की तरह थारू आदिवासी समाज भी महिला प्रधान है, लेकिन हकीकत में यहाँ भी सत्ता पुरुषों के हाथों में रहती है। वैसे तो लोकतंत्र की पहली और सबसे अहम इकाई ग्राम पंचायतों में इनकी पैठ तो दूर, पहुंच भी नहीं है। खुदा न खास्ता कोई महिला ग्राम प्रधान बन भी जाती है तो हमारे तथाकथित सभ्य समाज की तरह यहाँ भी उसकी हैसियत रबर स्टाम्प तक ही सीमित रह जाती है। चलती ‘प्रधानपति’ की ही है।

खेती का काम हो या जंगल से जलावन की लकड़ी ढोकर लाना हो, ज्यादातर महिलाओं को ही हाड़तोड़ मेहनत करनी पड़ती है। यहां तक कि मछली के शिकार के लिए जाल बुनने का काम भी महिलाओं को करना पड़ता है। फिर मर्द क्या करते है? नेपाल सीमा से लगे लखीमपुर जिले के रामनगर गाँव की अचम्भी देवी कहती हैं, ‘उन्हें शराब (कच्ची) बनाने और पीने से फुर्सत मिले तो न।’ कोई 50 साल की अचम्भी को सबसे ज्यादा शिकायत वन विभाग महकमे से है। वह कहती हैं, ‘जंगल से हम जिंदा हैं, लेकिन जलावन के लिए सूखी लकड़ियां लाने पर भी विभाग वाले परेशान करते हैं। कभी हमारी कुल्हाड़ियाँ छीन लेते हैं, कभी हमसे बदसलूकी करते हैं।’

40 साल की भज्जो दो-तीन साल पुराना वाकया बताती हैं, ‘बनकटी के जंगल में जलावन लकड़ी लेने गई महिलाओं पर पुलिस और वन विभाग के लोगों ने हमला कर दिया था, जिसमें सूडा गांव की एक औरत बुरी तरह से घायल हो गई। दोषियों पर कार्रवाई के बजाय पुलिस ने उलटा जख्मी महिला और उसके पति को लूट व जंगल काटने की धाराएं लगाकर जेल भेज दिया।’ यह बात और है कि थारू महिलाओं के बड़े पैमाने पर हुए आंदोलन के बाद आरोपी दुधवा वार्डन और एक कोतवाल पर एससी-एसटी एक्ट के तहत मुकदमा कायम हुआ।

एक तरफ थारू समाज के लोग वक़्त के साथ चलने की कोशिश कर रहे हैं, तो वहीं कई ऐसे मसले हैं, जहां ये चाहकर भी अपने पुराने तौर-तरीके आजमाने पर मजबूर हैं। इनके लिए प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना भी उन योजनाओं में शुमार है, जो इन तक पहुंचनी तो दूर, जिनका नाम तक इन्होंने नहीं सुना। थारू समाज के लोग आज भी मिट्टी के चूल्हे पर खाना पकाते हैं। ईंधन के रूप में ये लकड़ी का इस्तेमाल करते हैं, जो थारू महिलाएं जंगल से लकड़ियां इकट्ठा करती हैं। फिर उनके गट्ठर बनाकर अपने सिर पर लादकर घर लाती हैं। एक गट्ठर का वज़न 50 से 60 किलो होता है।

थारू जीवन को करीब से जानने और इस आदिवासी समुदाय खासतौर से महिलाओं की दुश्वारियों को समझने के लिए इन पंक्तियों के लेखक ने दर्जन से ज्यादा गाँवों का दौरा किया, जिनमें नेपाल से सटे चंदन चौकी, रामगढ़, मसानखंभ, पुरैना, चमरौली, सौनहा, सोनारीपुर, बनकटी आदि शामिल हैं। कुछ मायनों में यहाँ बदलाव की बयार का असर होता दिखा। मसलन, लगभग सभी गांवों में प्राथमिक विद्यालय देखने को मिले। कुछ उच्च प्राथमिक विद्यालय भी दिखे। इनमें से कई गांव बॉर्डर एरिया डेवलपमेंट प्रोग्राम के तहत सड़क से भी जुड़ चुके हैं। लेकिन स्थानीय आदिवासी देश की मुख्यधारा से जुड़ सकें, उन्हें उनका अधिकार मिल सके, इस दिशा में कारगर पहल होती नहीं दिखती। कायदे से वन्य सम्पदा पर वन्यजीवों के बाद इनका हक बनता है, जिसके लिए यह थारू समुदाय जब-तब आंदोलन करता आया है, लेकिन ताल-तलैयों में शिकार तो दूर, जंगल की सूखी लकड़ियां बीनने पर भी धर लिया जाता है।

रामगढ़ गांव के बिस्सू को आरक्षण के बारे में ज्यादा नहीं पता। हां, उन्हें बखूबी याद है कि करीब दो साल पहले उनके पड़ोसी गांव चमरौली में एक युवक के फ़ौज में बतौर सिपाही भर्ती होने पर आस-पास के गाँवों के लोगों को दावत मिली थी। यह पूछने पर कि उनकी जानकारी में यहाँ कितने लोग सरकारी नौकरी में होंगे, बिस्सू ने आसानी से दो नाम गिना दिए- एक फ़ौज में सिपाही और दूसरा जिला प्रशासन में चपरासी। लड़कियां तो बस जंगल से लकड़ियां बीनने के लिए है, शादी के बाद भी।

थारू आदिवासियों के लिए बाढ़ भी बड़ी समस्या है। इस इलाके में कुल तीन प्रमुख नदियाँ हैं- शारदा, सुहेली और मुहाना। बरसात में जब नेपाल से भारी मात्रा में पानी छोड़ा जाता है, तो पूरा इलाका जलमग्न हो जाता है। फसलें चौपट हो जाती हैं। इनकी मुश्किलें और तब बाद जाती हैं, जब शासन-प्रशासन से कोई मदद या रियायत नहीं मिलती। पुरैना के राजाराम कहते हैं, ‘बाढ़ आती है, धान और सब्जियों की फसलें चौपट हो जाती हैं। ये लगभग हर बरसात की बात है।’ सरकारें शायद इसे नियति मान चुकी हैं, तभी तो इस दिशा में कुछ ठोस नहीं किया जाता।

परंपरा की खातिर

एक तरफ थारू जनजाति के लोगों में समाज की मुख्यधारा में शामिल होने की ललक बढ़ी है, वहीँ दूसरी तरफ इस समाज में सैकड़ों साल से चली आ रही तमाम चीजें आज भी परंपरा के तौर पर जीवित हैं। थारू जनजाति की महिलाएं एक खास किस्म की घास से डलिया और चटाई जैसी कई चीजें तैयार करती हैं। डलिया का इस्तेमाल ये रोटियां या खाने-पीने की बाकी चीजें रखने में करते हैं। इनकी बनाई गई चीजें काफी खूबसूरत होती हैं, लेकिन यह इनके धंधे में शामिल नहीं हो पाया है। हाथ से बुनी गई ऐसी तमाम चीजों का इस्तेमाल ये अपनी दिनचर्या में करते हैं। इनके पास एक और अनोखी चीज होती है लौका। लौका का इस्तेमाल ये मछली पकड़ने में करते हैं। पकी हुई लौकी को अंदर से खोखला करके उसे सुखाया जाता है। थारू जनजाति की औरतें मछली पकड़ते वक्त लौका को अपनी कमर से बंधती हैं और मछली पकड़ कर उसमें रखती जाती हैं।

पुस्तकालय, जो बंद रहता है…

लखीमपुर खीरी की एक तत्कालीन जिलाधिकारी ने कोई दो-ढाई साल पहले थारू आदिवासियों को मुख्यधारा से जोड़ने के लिए थारू महोत्सव, आदिवासी गांवों को गोद लेने जैसी कुछ पहल की थी। उन्होंने पलिया कलां से अंतरराष्ट्रीय बॉर्डर चंदन चौकी को जोड़ने वाले मुख्य मार्ग पर स्थित पुरैना गांव में पुस्तकालय की नीव रखी थी। इसके लिए छोटी ही सही, बिल्डिंग खड़ी हो गई, लेकिन बनने के डेढ़ साल बाद भी कुछ उत्साही स्थानीय आदिवासी युवा इसके खुलने का इंतजार कर रहे हैं। 12वीं पास पुष्पा कहती हैं, ‘आसपास ‘बड़ा’ स्कूल नहीं होने से हम आगे की पढाई तो नहीं कर सकते, लेकिन जब यहाँ लाइब्रेरी बनी तो लगा हमें यहाँ कुछ पढने को मिलेगा. लेकिन बनने के बाद से यह कभी खुली ही नहीं।’

 

थारू समाज का गौरवशाली अतीत

थारू जनजाति उत्तराखंड के खटीमा और सितारगंज, लखीमपुर समेत उत्तर प्रदेश के कुछ इलाके और नेपाल के दक्षिणी हिस्से के तराई क्षेत्र में रहती है। थारू जनजाति के इतिहास पर इतिहासकारों के बीच काफी मतभेद हैं। कुछ इतिहासकारों का मानना है कि थारू मुस्लिम आक्रमणकारियों से जान बचाकर भागीं राजपूत महिलाओं और उनके सेवकों के वंशज हैं, जो उस दौरान पहाड़ के दुर्गम इलाकों में बस गए थे। ऐसा उल्लेख मिलता है कि इनके समाज में महिलाएं खुद को श्रेष्ठ मानती हैं और कुछ इतिहासकार यहां तक कहते हैं कि महिलाएं अपने पति के साथ भोजन तक नहीं करती थीं। हालांकि अब काफी बदलाव आ चुका है। कुछ इतिहासकारों का मानना है कि ये राजस्थान के थार इलाके से आए हैं और महाराणा प्रताप के वंशज हैं। थारू अनुसूचित जनजाति की श्रेणी में आते हैं। समाज में पिछड़े वर्ग में आने की वजह से 1961 में इन्हें अनुसूचित जनजाति का दर्जा दिया गया था।

थारू आदिवासियों के ज्यादातर परिवार खेती पर निर्भर हैं। 60-70 के दशक तक इनके पास काफी जमीनें थीं, लेकिन अब ज्यादातर दूसरे के खेतों में काम करते हैं। इस समाज के ज्यादातर परिवारों ने कभी अपनी जरूरत तो कभी भूमाफियाओं के जाल में फंसकर अपनी जमीनें बेच दीं। कुछ लोग अभी भी अपनी जमीनों पर खेती करते हैं, लेकिन ज्यादातर लोग अब दूसरों के खेतों में मजदूरी करते हैं। यही इनकी आजीविका का मुख्य जरिया है। पारंपरिक रूप से ये धान और चावल की खेती किया करते थे, लेकिन खेती में लागत के हिसाब से फायदा नहीं हो पाता। लिहाजा, इन्होंने सब्जियों की खेती भी शुरू कर दी है। इसके अलावा ये पशुपालन, शिकार और मछली पकड़ने जैसे काम भी करते हैं।
थारू जनजाति के लोगों में अब अपनी ज़मीन को लेकर जागरूकता बढ़ रही है, ऐसे में वे अब सरकार से मदद की आस लगाए बैठे हैं। जनजातियों की जमीन पर कब्जे को रोकने संबंधी कानून के मुताबिक उनकी जमीन गैर जनजाति के लोग नहीं खरीद सकते, लेकिन पिछले कुछ दशकों में बड़े पैमाने पर इनकी जमीनों पर गैर-आदिवासियों का कब्ज़ा है। अपनी ज़मीनों को गैर जनजातियों को बेच चुके थारू जनजाति के लोग अब चाहते हैं कि सरकार इस कानून का सख्ती से पालन कराए।

शिक्षा की डिजिटल पहल

लेखक मंच - Thu, 31/08/2017 - 11:33

डि‍जि‍टल यात्रा के बारे में बताते प्रथम के सह-संस्थापक डॉ. माधव चह्वाण।

नई दिल्ली :  शिक्षा क्षेत्र में भारत के सबसे बड़े गैर-सरकारी संगठनों में शुमार- प्रथम एजुकेशन फाउंडेशन ने 29 अगस्त 2017 को शिक्षा सम्बंधी अपनी डिजिटल पहल का औपचारिक उद्घाटन किया। प्रथम एजुकेशन फाउंडेशन के चेयरमैन अजय पीरामल ने ‘प्रडिजि’ नाम से शुरू की जा रही इस पहल को नई दिल्ली स्थित विश्व युवा केंद्र में जारी किया।

उद्घाटन समारोह को संबोधित करते हुए प्रथम की सीईओ डॉ. रुक्मिणी बनर्जी ने कहा कि प्रथम ने पिछले लगभग 20 वर्षों के अपने कार्यकाल में बगैर डिजिटल संसाधनों ही काम किया है। लेकिन नई टेक्नोलॉजी की असीमित पहुंच और घटती कीमतों को देखते हुए अब समय आ गया है कि हम इसकी संभावनों को तलाशने का प्रयास करें। उन्होंने कहा कि स्कूली संसाधनों में वित्तीय निवेश बढ़ा देने भर से बच्चों की शैक्षिक उपलब्धियों में सुधार नहीं होता। प्रथम की सालाना असर (एनुअल स्टेटस ऑफ़ एजुकेशन रिपोर्ट) रिपोर्ट पिछले 12 वर्षों से इस तथ्य की पुष्टि कर रही है। इसलिए बेहतर शिक्षा के लिए प्रथम अब टेक्नोलॉजी के विभिन्न माध्यमों का परीक्षण करना चाहता है। उन्होंने कहा कि बच्चों की शिक्षा और विकास में इन माध्यमों की क्षमताओं का तुलनात्मक अध्ययन भी किया जाएगा।

इस मौके पर फाउंडेशन के चेयरमैन अजय पीरामल ने प्रडिजि ऐप भी जारी किया जो फिलहाल 11 भारतीय भाषाओं में उपलब्ध है। पूर्व प्राथमिक, प्राथमिक और उच्च प्राथमिक स्तर के बच्चों के लिए इसमें 20 अलग-अलग शैक्षिक गेम डाले गए हैं, जो हिंदी व अंग्रेजी के अलावा पंजाबी, असमी, बांग्ला, उड़िया, तेलुगु, तमिल, कन्नड़, मराठी और गुजराती में उपलब्ध हैं। संभवतः यह पहला मौका है, जब किसी भारतीय गैर-सरकारी संगठन ने इतनी सारी भारतीय भाषाओं में एक साथ शिक्षा सम्बंधी संसाधनों को तैयार किया है। प्रथम इन संसाधनों को समूचे देश में नि:शुल्क बांटना चाहता है। वह चाहता है कि विभिन्न स्तरों पर सरकारें, संस्थाएं, शिक्षण संस्थान, स्वयंसेवी संस्थाएं, समुदाय व परिवार प्रथम के डिजिटल कंटेंट का लाभ उठाएं। आज प्रडिजि प्ले-स्टोर पर उपलब्ध है। इसी तरह यह एक-स्टेप के प्लेटफार्म पर भी उपलब्ध होगा।

प्रथम की नई डिजिटल पहल के तीन आयाम हैं। पहला, डिजिटल गेम्स व गतिविधियों सहित बच्चों के सीखने के लिए नए शैक्षिक संसाधनों का सृजन। दूसरा, बच्चों के लिए वीडिओ का निर्माण और तीसरा, डिजिटल पहल के वास्तविक प्रभावों का मूल्यांकन। इस लक्ष्य के लिए 21 राज्यों में करीब 12,000 टेबलेट बांटे गए हैं, जो आगामी 12 महीनों के दौरान लगभग 7,000 गांवों व शहरी बस्तियों में इस्तेमाल किए जाएंगे। स्कूलों में चलाए जा रहे डिजिटल शिक्षा के अन्य प्रयोगों के विपरीत प्रथम की पहल घरों व बस्तियों में संपन्न होगी और माताएँ टेबलेट की संरक्षक बनाई जाएंग। जब बच्चे सीखना चाहेंगे, तब माताएँ ही  उन्हें टेबलेट देंगी। इस पहल के अंतर्गत समूह आधारित शिक्षा व स्व-शिक्षण के अलावा बच्चों के सीखने की प्रक्रिया में परिवार, ख़ास तौर पर मां, भाई-बहनों व परिवार के अन्य सदस्यों की भागीदार जैसी बातों को बढ़ावा दिया जाएगा।

इस मौके पर प्रथम के सह-संस्थापक डॉ. माधव चह्वाण ने कहा कि यह हमारी डिजिटल यात्रा की शुरुआत भर है; निसंदेह आगामी महीनों में कई सफलताओं व असफलताओं से भी सामना होगा। लेकिन यह जानना बहुत ज़रूरी है कि किस किस्म का डिजिटल कंटेंट बच्चों में सीखने की तल्लीनता पैदा करता है। एक बार बच्चे तल्लीन हो जाते हैं तो वे सीखने की उत्सुकता और उत्साह से भर जाते हैं। अगर वे उत्साहित नहीं हैं तो उनमें सीखने की प्रेरणा भी नहीं होगी। एक बार वे प्रेरित हो गए तो वे कई बाधाएं पार कर सकते हैं और जो चाहें सीख सकते हैं। प्रडिजि के पीछे मुख्य विचार यही है। डॉ. चह्वाण ने बताया कि प्रथम की डिजिटल पहल का दूसरा प्रमुख पहलू सभी भारतीय भाषाओं में पाठ्य सामग्री तैयार करने के लिए साझेदारियां विकसित करना भी है ताकि सभी बच्चों को नए-नए खेल और शैक्षिक गतिविधियों की निर्बाध आपूर्ति जारी रहे।

प्रडिजि के उद्घाटन पर सभी आगंतुकों व मेहमानों को नए ऐप को देखने व इसमें डाले गए गेम्स व गतिविधियों को डिजिटल उपकरणों पर परखने का मौका भी दिया गया। फिलहाल प्रथम की डिजिटल पहल को गूगल और सर्व मंगल परिवार ट्रस्ट का सहयोग प्राप्त है। इसके अलावा रिगली कंपनी फाउंडेशन ने भी इस प्रयास में मदद की है।

कार्यक्रम के दौरान ऐप देखते आगंतुक।

धर्म आधारित राजनीति देश की एकता के लिए ख़तरा है.

जंतर-मंतर - Thu, 31/08/2017 - 04:47


शेष नारायण सिंह  
 सिरसा के गुरमीत राम रहीम को पंचकुला की विशेष सी बी आई अदालत ने बलात्कार का दोषी माना है. अदालत के फैसले के आने  के तुरंत बाद उसके चेलों ने  पंचकुला में  तबाही मचाने  का काम शुरू कर दिया .लूट ,हत्या, आगजनी की वारदात को बेख़ौफ़ होकर अंजाम दिया .  शुरू में समझ में नहीं आया कि जब सरकार को पहले से मालूम था और हज़ारों की संख्या में बाबा के समर्थक पंचकुला में इकठ्ठा हो रहे थे ,सरकार ने बड़े पैमाने पर सुरक्षाबल की तैनाती कर रखी थी, सेना की टुकड़ियां भी मौजूद थीं तो इतनी बड़ी वारदात कैसे हो गयी . लेकिन अब समझ में आ गया है कि सरकार की मिलीभगत थी. पंजाब-हरियाणा हाई कोर्ट ने पंजाब सरकार और मुख्यमंत्री को इस हालत के लिए जिम्मेवार ठहराया है. हाई कोर्ट ने हरियाणा सरकार के वकील बलदेवराज महाजन  को फटकार लगाई और कहा कि आप सच्चाई को तोड़मरोड़ कर पेश कर रहे थे और कोर्ट को गुमराह कर रहे थे. कोर्ट ने कहा कि जिस हिंसा में बड़े पैमाने पर आगजनी हुयी , तोड़फोड़ हुयी ,उसके लिए मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ज़िम्मेदार हैं . कोर्ट ने सरकारी वकील से बताया कि मुख्यमंत्री खट्टर खुद डेरा सच्चा सौदा को बचाने के लिए ज़िम्मेदार हैं. . अदालत ने कहा कि प्रशासनिक और राजनीतिक फैसलों में बहुत बड़ा अंतर है .राजनीतिक फैसलों के कारण प्रशासन अपने कर्तव्य का निर्वहन नहीं कर सका और सरकारी व्यवस्था कोलकवा मार गया . इस सारी घटना के लिए सरकार ने पुलिस के एक डिप्टी सुपरिंटेंडेंट को मुअत्तल किया है . कोर्ट ने पूछा कि  सवाल है कि क्या वही अफसर अकेले ज़िम्मेदार था.?कोर्ट ने कहा  मुख्यमंत्री स्वयं ही गृहमंत्री भी हैं. सात दिन से पंचकुला में लोग इकट्ठा हो रहे थे और मुख्यमंत्री उनको  सुरक्षा दे रहे थे . . पंजाब-हरियाणा हाई कोर्ट की टिप्पणी हरियाणा सरकार की नाकामी को बहुत ही सही परिप्रेक्ष्य में रख देती  है . सवाल यह है कि स्पष्ट बहुमत वाली सरकार का मुख्यमंत्री एक अपराधी और उसके गिरोह से इतना डरता क्यों है /? प्रधानमंत्री ने भी अपने रेडियो कार्यक्रम , ' मन की बात  ' में डेरा सच्चा सौदा का नाम लिए बिना साफ़ कहा कि कि धर्म के नाम पर हिंसा बर्दाश्त नहीं की जा सकती है . ज़ाहिर है बीजेपी में भी और सरकार में भी धर्म के नाम पर होने वाली हिंसा से चिंता के संकेत नज़र आने लगे हैं . प्रधानमंत्री ने कहा कि यह महात्मा बुद्ध और महात्मा गांधी का देश है जिन्होंने अहिंसा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी . प्रधानमंत्री ने रेडियो कार्यक्रम में सरदार पटेल को याद किया और कहा कि सरदार ने देश की एकता के लिए पूरा जीवन ही लगा दिया .
धार्मिक सहिष्णुता और देश की एकता के हवाले से सरदार पटेल को याद करना एक महत्वपूर्ण  संकेत है . इसका सीधा मतलब यह है कि अब सरकार के सर्वोच्च स्तर पर यह बात मान ली गयी है कि धार्मिक झगडे देश की एकता के लिए चुनौती हैं . हालांकि प्रधानमंत्री ने धर्म के नाम  पर हिंसा न करने की बात कई बार कही है , लाल किले की प्राचीर से भी कही थी लेकिन  अभी तक निचले स्तर पर बीजेपी के नेता और मंत्री उनकी बातों को गंभीरता से नहीं ले रहे थे . उनके बार बार कहने के बाद भी हिंसा की वारदातें , मुसलमानों को  गौरक्षा के बहाने मार डालने की बातें बदस्तूर चल रही थीं . लेकिन ' मन की बात ' में प्रधानमंत्री ने देश की एकता से धार्मिक आधार पर हो रही असहिष्णुता को जोड़कर एक बड़ी बात कही है . उम्मीद की जानी  चाहिए कि बीजेपी के छुटभैया नेता, राज्यों के मुख्यमंत्री , सरकारी तंत्र और अफसर प्रधानमंत्री की बातों को गंभीरता से लेंगें और देश की एकता और सरदार पटेल के मिशन को ध्यान में रखते  हुए  धार्मिक हिंसा पर फ़ौरन से पेशतर लगाम लगायेंगें .प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश की एकता के लिए ज़रूरी धार्मिक  सहिष्णुता की जो बात कही है वास्तव में वही संविधान की धर्मनिरपेक्षता की  अवधारणा है . यह अलग बात है कि उनकी पार्टी और उसके कार्यकर्ता धर्मनिरपेक्षता की निंदा करते रहे हैं . उनके दिमाग में कहीं से यह बात भरी रहती  थी कि धर्मनिरपेक्षता कांग्रेस की विरासत है . लेकिन वह गलत हैं . धर्मनिरपेक्षता किसी  पार्टी की विरासत नहीं है . वह देश की विरासत है .इसी विचार धारा की बुनियाद पर इस देश की आज़ादी की लड़ाई लड़ी गयी थी. अंग्रेजों की सोच थी कि इस देश के हिन्दू और मुसलमान कभी एक साथ नहीं खड़े होंगें लेकिन जब १९२० का महात्मा गांधी का आन्दोलन शुरू हुआ तो हिन्दू और मुसलमान न केवल साथ साथ थे बल्कि मुसलमानों के सभी फिरके महात्मा गांधी के साथ हो गए थे . उसके बाद ही अंग्रेजों ने  दोनों धर्मो  में  गांधी विरोधी तबका तैयार किया और उसी हिसाब से राजनीतिक संगठन खड़े किये . लेकिन महात्मा गांधी के आन्दोलन का  स्थाई भाव सभी  धर्मों का साथ ही बना रहा और आजादी की लड़ाई उसी बुनियाद पर जीती गयी. जाते जाते अंग्रेजों ने अपने वफादार जिन्ना को पाकिस्तान तो बख्श दिया लेकिन भारत की एकता को तोड़ने में नाकाम रहे . धर्मनिरपेक्षता की विरोधी ताक़तों ने महात्मा गांधी की  ह्त्या भी कर दी लेकिन देश की एकता बनी रही .
राष्ट्र की एकता के लिए ज़रूरी  सर्व धर्म   समभाव  की बात को प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने तो आगे बढाया  ही, इस मिशन में  सरदार पटेल का योगदान  किसी से कम नहीं है .यह सच है कि जब तक कांग्रेस ने धर्मनिरपेक्षता की  राजनीति को अपनी  बुनियादी सोच का हिस्सा बना कर  रखा , तब तक कांग्रेस अजेय रही लेकिन जब साफ्ट हिंदुत्व की राजनीति को अपनाने की कोशिश की , इमरजेंसी के दौरान  दिल्ली और अन्य इलाकों में मुसलमानों को चुन चुन कर मारा तो देश की जनता कांग्रेस के खिलाफ  खड़ी हो गयी और पार्टी  १९७७ का चुनाव हार गयी .  जो काम वहां से शुरू हुआ था ,उसका नतीजा कांग्रेस के सामने है .  
कांग्रेस के इंदिरा गांधी युग में धर्मनिरपेक्षता के विकल्प की तलाश शुरू हो गई थी। उनके बेटे और उस वक्त के उत्तराधिकारी संजय गांधी ने 1975 के बाद से सरकारी मशीनरी का इस्तेमाल मुसलमानों के खिलाफ करना शुरू कर दिया था। खासतौर पर मुस्लिम बहुल इलाकों में इमारतें ढहाना और नसबंदी अभियान में उनको घेरना ऐसे उदाहरण हैं जो सॉफ्ट हिंदुत्व की तरफ इशारा करते हैं। 1977 के चुनाव में कांग्रेस की हार के बाद से ही कांग्रेस की सांप्रदायिक राजनीति की शुरुआत होने लगी। १९७७ की हार के बाद ही इंदिरा गांधी ने असम में छात्र असंतोष को हवा दी और पंजाब में अपने ख़ास भक्त ज्ञानी जैल सिंह की मदद से जनरैल सिंह भिंडरावाला को दी गयी कांग्रेसी शह इसी राजनीति का नतीजा है।हमारे अपने देश में सेकुलर राजनीति का विरोध करने वाले और हिन्दुराष्ट्र की स्थापना का सपना देखें वालों को पाकिस्तान की धार्मिक राजनीति से हुई तबाही पर भी नज़र डाल लेनी चाहिए .पकिस्तान की आज़ादी के वक़्त उसके संस्थापक मुहम्मद अली जिन्नाह ने  साफ़ ऐलान कर दिया था कि पाकिस्तान एक सेकुलर देश होगा .ऐसा शायद इसलिए था कि १९२० तक जिन्नाह मूल रूप से एक सेकुलर राजनीति का पैरोकार थे . उन्होंने १९२० के आंदोलन में खिलाफत के धार्मिक नारे के आधार पर मुसलमानों को साथ लेने का विरोध भी किया था लेकिन बाद में अंग्रेजों  की चाल में फंस गए और लियाकत अली ने उनको मुसलमानों का नेता बना दिया .नतीजा यह हुआ कि १९३६ से १९४७ तक हम मुहम्मद अली जिन्नाह को मुस्लिम लीग के नेता के रूप में देखते हैं जो कांग्रेस को हिंदुओं की पार्टी साबित करने के चक्कर में रहते थे . लेकिन  कांग्रेस का नेतृत्व महात्मा गांधी और जवाहरलाल नेहरू के पास था और उन्होंने कांग्रेस को किसी एक धर्म की पार्टी नहीं बनने दिया . लेकिन जब पाकिस्तान की स्थापना हो गयी तब जिन्नाह ने ऐलान किया कि हालांकि पाकिस्तान की स्थापना इस्लाम के अनुयायियों के नाम पर हुई है लेकिन वह एक सेकुलर देश बनेगा .अपने बहुचर्चित ११ अगस्त १९४७ के भाषण में पाकिस्तानी संविधान सभा के अध्यक्षता करते हुए जिन्नाह ने सभी पाकिस्तानियों से कहा कि ,” आप अब आज़ाद हैं . आप अपने मंदिरों में जाइए या अपनी मस्जिदों में जाइए . आप का धर्म या जाति कुछ भी हो उसका  पाकिस्तान के  राष्ट्र से कोई लेना देना नहीं है .अब हम सभी एक ही देश के स्वतन्त्र नागरिक हैं . ऐसे नागरिक , जो सभी एक दूसरे के बराबर हैं . इसी बात को उन्होंने फरवरी १९४८ में भी जोर देकर दोहराया . उन्होंने कहा कि कि, “ किसी भी हालत में पाकिस्तान  धार्मिक राज्य नहीं बनेगा . हमारे यहाँ बहुत सारे गैर मुस्लिम हैं –हिंदू, ईसाई और पारसी हैं लेकिन वे सभी पाकिस्तानी हैं . उनको भी वही अधिकार मिलेगें जो अन्य पाकिस्तानियों को और वे सब पाकिस्तान में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभायेगें .” लेकिन पाकिस्तान के  संस्थापक का यह सपना धरा का धरा रह गया और पाकिस्तान का पूरी तरह से इस्लामीकरण हो गया . पहले चुनाव के बाद ही  वहाँ बहुमतवादी राजनीति कायम हो चुकी थी और उसी में एक असफल राज्य के रूप में पाकिस्तान की बुनियाद पड़ चुकी थी. १९७१ आते आते तो  नमूने के लिए पाकिस्तानी संसद में एकाध हिंदू मिल जाता था  वर्ना पाकिस्तान पूरी तरह से इस्लामी राज्य बन चुका था. अलोकतांत्रिक  धार्मिक नेता राजकाज के हर क्षेत्र में हावी हो चुके थे.

आजकल भारत में भी धार्मिक बहुमतवाद की राजनीति को स्थापित करने की कोशिश की जा रही है .लेकिन उनको ध्यान रखना पडेगा कि धार्मिक कट्टरता किसी भी राष्ट्र का धर्म नहीं बन सकती . अपने पड़ोसी के उदाहरण से अगर सीखा न गया तो किसी को भी अंदाज़ नहीं है कि हम अपनी आने वाली पीढ़ियों को किस तरह का भारत देने जा रहे हैं .  लेकिन साथ ही यह भी ध्यान रखना पडेगा कि  धार्मिक समूहों को वोट की लालच में आगे भी न बढ़ाया जाये. जवाहरलाल नेहरू के युग तक तो किसी की हिम्मत नहीं पडी कि  धार्मिक समूहों का विरोध करे या पक्षपात करे लेकिन उनके जाने के बाद धार्मिक पहचान की राजनीति ने अपने देश में तेज़ी से रफ़्तार पकड़ी और आज राजनीतिक प्रचार में वोट हासिल करने के लिए धार्मिक पक्षधरता की बात करना राजनीति की प्रमुख धारा बन चुकी है।  कहीं मुसलमानों को  अपनी तरफ मिलाने की कोशिश की जाती है तो दूसरी तरफ हिन्दुओं का नेता बनने की होड़ लगी हुयी है।  इससे बचना पडेगा।  अगर न बच सके तो राष्ट्र और देश के सामने मुश्किल पेश आ सकती है। 
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लेखक विषय संवाद साभार अनुवादक

पहले वो आए साम्यवादियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं साम्यवादी नहीं था

 

फिर वो आए मजदूर संघियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं मजदूर संघी नहीं था

 

फिर वो यहूदियों के लिए आए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं यहूदी नहीं था

 

फिर वो आए मेरे लिए

और तब तक बोलने के लिए कोई बचा ही नहीं था

 

मार्टिन नीमोलर (1892-1984)