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साहित्यिक आंदोलन और लेखक संगठन

पिछले दिनों प्रगतिशील लेखक संघ, जनवादी लेखक संघ और जन संस्कृति मंच तीनों ही लेखक संगठनों में एक उत्साहवर्धक सक्रियता दिखायी दी है. किन्हीं भी कारणों से, किन्ही भी उद्देश्यों से और किन्हीं भी लोगों के प्रयासों से यह संभव हुआ हो, स्वागतयोग्य है. इस संदर्भ में 'परिकथा' पत्रिका के नए अंक (जनवरी-फरवरी, 2018) में प्रकाशित हमारा लेख 'साहित्यिक आंदोलन और लेखक संगठन' प्रस्तुत है.--रमेश उपाध्याय


‘परिकथा’ के सितंबर-अक्टूबर, 2017 के अंक में शंकर ने अपने संपादकीय ‘लेखक संगठन और यह समय’ में बीसवीं सदी के अंतिम तीन दशकों और इक्कीसवीं सदी के पहले दो दशकों के हिंदी साहित्य की तुलना करते हुए कहा है कि तब के लेखन के एक बड़े हिस्से में जो गुण थे, वे अब के लेखन के एक बड़े हिस्से में या तो अनुपस्थित हैं या दुर्गुणों में बदल गये हैं। उनके अनुसार तब के लेखन में यथार्थवाद, लोकोन्मुखता और सामाजिक सरोकारों को सर्वोच्चता प्राप्त थी, अब के लेखन में या तो इनसे इनकार है या इनकी उपस्थिति बहुत धुँधली है। तब के लेखन में अंतर्वस्तु को प्रमुखता दी जाती थी, अब के लेखन में रूप को प्राथमिकता दी जाती है। तब के लेखन में निजी या वैयक्तिक किस्म के विषय कम होते थे, अब के लेखन में वे बहुतायत में पाये जाते हैं और महिमामंडित भी किये जाते हैं। तब के लेखन में आत्मालोचना दिखती थी, अब के लेखन में उसकी जगह गहरी आत्ममुग्धता दिखती है। तब की साहित्यिक आलोचना में जरूरी और उत्कृष्ट रचनाओं को महत्त्व दिया जाता था, अब की साहित्यिक आलोचना में गैर-जरूरी और घटिया रचनाओं को महत्त्वपूर्ण बताने की जिद भरी कोशिश की जाती है। तब के लेखन में अनुभवों की पुनर्रचना, सकारात्मक स्थितियों की परिकल्पना और बेहतर स्थितियों की कामना की जाती थी, अब के लेखन में विभ्रम, विफलता और विकल्पहीनता के ही आख्यान दिखायी देते हैं। 
आज के हिंदी साहित्य में आयी इस गिरावट के कारणों को आज के समय में खोजते हुए शंकर ने आज के समय को बाजार, उच्चस्तरीय भोग-संस्कृति, विलासितापूर्ण परिवेश की चकाचैंध, किसानों की आत्महत्याओं, असंगठित क्षेत्र के मजदूरों के लिए रोजगार के अभाव तथा दलितों, स्त्रियों और अल्पसंख्यकों के लिए मुश्किलों और अनिश्चितताओं का समय बताया है, जिसके कारण साहित्य, कला और संस्कृति के क्षेत्र में अवांतर मूल्य सर्वोपरि बन गये हैं। 
ऐसे समय की चुनौतियों का सामना करने की आशा और अपेक्षा शंकर विवेकवान और प्रबुद्ध सामाजिक इकाइयों के साथ-साथ लेखक संगठनों तथा उनके समानधर्मा संगठनों से करते हैं, जो उनके अनुसार इन्हीं प्रतिकूलताओं में आगे चलते रहेंगे, क्रियाशील बने रहेंगे और जो लोग जोखिमों के इस दौर में भी अपनी प्रतिबद्धता के अनुसार कुछ कर रहे हैं, उनके पीछे सुरक्षा-पंक्ति बनकर खड़े रहेंगे। 
‘‘विवेकवान और प्रबुद्ध सामाजिक इकाइयों’’ से उनका क्या आशय है, यह स्पष्ट नहीं है, लेकिन यह स्पष्ट है कि वे वाम-जनवादी लेखक संगठनों की बात कर रहे हैं और उनसे कुछ ज्यादा ही आशा और अपेक्षा कर रहे हैं। शायद उन्हें लगता है कि लेखक संगठन आज की प्रतिकूल परिस्थितियों में भी सक्रिय हैं, आगे बढ़ रहे हैं और प्रतिबद्ध लेखकों, लघु पत्रिकाओं के संपादकों और साहित्य को जनता तक पहुँचाने के कार्यों में लगे लोगों की सुरक्षा करने में समर्थ हैं। लेकिन उनका यह आकलन यथार्थ से बहुत दूर का लगता है। 
हिंदी साहित्य आंदोलनधर्मी रहा है। उसमें ‘छायावाद’ और ‘प्रगतिवाद’ से लेकर ‘नयी कविता’, ‘नयी कहानी’, ‘अकविता’, ‘अकहानी’, ‘सचेतन कहानी’, ‘समांतर कहानी’ आदि कई साहित्यिक आंदोलन चले हैं। इनमें से प्रगतिवादी आंदोलन को छोड़कर, जो साहित्यिक के साथ-साथ सामाजिक-राजनीतिक आंदोलन भी था, सभी आंदोलन निरे साहित्यिक और प्रायः किसी एक साहित्यिक विधा के आंदोलन रहे हैं। आजादी से पहले चले प्रगतिवादी आंदोलन जैसा ही एक आंदोलन आजादी के बाद बीसवीं सदी के आठवें और नवें दशकों में चला, जिसे वाम-जनवादी आंदोलन कहा जाता है। इन दोनों की विशेषता यह रही कि इनका जोर ‘लिखने’ के साथ-साथ कुछ ‘करने’ पर भी रहा। मसलन, साहित्य को समाज से जोड़ने के लिए सभाएँ, सम्मेलन, नाटक, नुक्कड़ नाटक आदि करना, जलसों-जुलूसों में गाकर सुनाये जाने वाले जनगीत लिखना और उन्हें हजारों श्रोताओं के बीच गाकर सुनाना, व्यावसायिक रंगमंच के विरुद्ध जन-रंगमंच का विकास करना, व्यावसायिक पत्रिकाओं के विरुद्ध जन-चेतना जगाने वाले साहित्य की लघु पत्रिकाओं तथा पुस्तकों का प्रकाशन करना इत्यादि। 
पुराने प्रगतिवादी आंदोलन से प्रगतिशील लेखक संघ और ‘इप्टा’ (इंडियन पीपुल्स थियेटर एसोसिएशन) का जन्म हुआ था। नये वाम-जनवादी आंदोलन से जनवादी लेखक संघ और जन संस्कृति मंच जैसे नये लेखक संगठन बने तथा जन नाट्य मंच और निशांत नाट्य मंच जैसी नयी नाटक मंडलियाँ अस्तित्व में आयीं। इस नये आंदोलन ने पुराने प्रगतिशील लेखक  संघ में तो नये प्राण फूँके ही, लेखन के पुराने तौर-तरीके भी बदले, जिससे साहित्य में एक नवोन्मेष हुआ और पोस्टर कविता, किस्सागोई, जनगीत तथा नुक्कड़ नाटक जैसी नयी साहित्यिक विधाओं का जन्म हुआ। इस आंदोलन से साहित्यिक आलोचना भी अभूतपूर्व रूप से समृद्ध हुई। लेखकीय पक्षधरता, प्रतिबद्धता, साहित्य के समाजशास्त्र, सौंदर्यशास्त्र आदि पर जैसा व्यापक विचार-विमर्श इस आंदोलन के दौरान हुआ, वैसा उसके बाद आज तक नहीं हुआ।  
वाम-जनवादी आंदोलन में शामिल लेखकों ने अपने समय और समाज की जरूरतों के मुताबिक साहित्य में कुछ नया करने का प्रयास किया। उन्होंने नये के नाम पर पुराने सब कुछ को नकारने के बजाय पुरानी रूढ़ियों को त्यागकर उसकी जीवंत परंपरा को अपनाया और आगे बढ़ाया। उन्होंने जो आंदोलन चलाया, वह किसी नये दशक, नयी पीढ़ी या किसी नये साहित्यिक फैशन के आधार पर नया नहीं था। वह नये विचारों, नये सरोकारों और साहित्य में एक नवोन्मेष करने के कारण नया था। उसमें विभिन्न पीढ़ियों के, विभिन्न विधाओं के और विभिन्न प्रकार की लेखन शैलियों वाले लेखक एकजुट थे। उसमें प्रगतिशील लेखक संघ, जनवादी लेखक संघ और जन संस्कृति मंच नामक तीनों लेखक संगठनों से जुड़े हुए तथा इन तीनों से स्वतंत्र भी ऐसे बहुत-से लेखक शामिल थे, जो वाम-जनवादी साहित्य में एक नवोन्मेष करना चाहते थे। 
आज लेखक संगठन तो हैं, पर कोई साहित्यिक आंदोलन नहीं है। और दिक्कत यह है कि आंदोलन से संगठन बनते हैं, संगठनों से कोई आंदोलन नहीं चलता। 
आज कोई साहित्यिक आंदोलन नहीं है, जबकि उसकी साहित्य को ही नहीं, समाज को भी सख्त जरूरत है। आज देश और दुनिया में प्रायः सर्वत्र यथार्थवाद, प्रगतिशीलता और जनवाद की विरोधी शक्तियाँ शासन कर रही हैं, जो वाम-जनवादी साहित्यिक-सांस्कृतिक गतिविधियों पर ही नहीं, सच बोलकर यथार्थ को सामने लाने की आजादी तक पर प्रत्यक्ष या परोक्ष प्रतिबंध लगा रही हैं। वे अज्ञान तथा अंधविश्वास फैलाने वाली अपनी विचारधाराओं तथा जन और जनतंत्र का दमन करने वाली अपनी तानाशाही नीतियों के चलते यथार्थवादी लेखकों-कलाकारों को आतंकित करने से लेकर उनकी हत्याएँ तक कराने से नहीं चूक रही हैं। आम लोगों के बीच फैले अज्ञान और अंधविश्वास को दूर करने तथा उन्हें बढ़ाने वाली राजनीति का विरोध करने वाले नरेंद्र दाभोलकर, गोविंद पानसरे, एम.एम. कलबुर्गी और गौरी लंकेश की हत्याएँ इसके ताजा उदाहरण हैं। लेखकों को आतंकित और प्रताड़ित करके उन्हें साहित्यकार के रूप में जीते जी मार डालने के उदाहरण (जैसे पेरुमल मुरुगन) भी सामने आ रहे हैं। इन स्थितियों के चलते एक नये साहित्यिक आंदोलन की जरूरत स्वतः स्पष्ट है।
और एक नये साहित्यिक आंदोलन की संभावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता। हम देख सकते हैं कि आज की अत्यंत प्रतिकूल परिस्थितियों में भी देश और दुनिया के जनगण सब कुछ सहते हुए चुपचाप नहीं बैठे हैं। सतही तौर पर सर्वत्र भय और आतंक का साम्राज्य नजर आता है, पर सतह के नीचे देखें, तो किसान, मजदूर, दलित, आदिवासी, स्त्रियाँ, छात्र, बेरोजगार युवा, लेखक, पत्रकार, कलाकार, रंगकर्मी, शिक्षक आदि अपने देश में और दुनिया के सभी देशों में तरह-तरह के आंदोलन चला रहे हैं। उन्हें आतंकित और गुमराह करके आंदोलन से विरत करने की तमाम कोशिशों और साजिशों के बावजूद उनके आंदोलनों की संख्या और आवृत्ति उत्तरोत्तर बढ़ती जाती है। पूँजीपतियों का खरीदा हुआ मीडिया चाहे उनके समाचार न देता हो, पर देश और दुनिया में आज ऐसे असंख्य आंदोलन चल रहे हैं। वे अभी अलग-अलग बहने वाली छोटी-छोटी धाराएँ हैं, जो भविष्य में मिलकर एक वेगवान और शक्तिशाली प्रवाह बन सकती हैं। इसी प्रकार साहित्य में यथार्थवादी, प्रगतिशील और जनवादी लेखन करने वाले लेखकों, उनके लेखन को सामने लाने वाली पत्रिकाओं के संपादकों तथा लेखक संगठनों के छोटे-छोटे प्रयास अलग-अलग जारी हैं। अनुकूल परिस्थिति पैदा होने पर ये प्रयास भी आपस में जुड़ सकते हैं और एक सशक्त साहित्यिक आंदोलन का रूप ले सकते हैं। 
मैं वाम-जनवादी आंदोलन में शामिल रहने, लगभग दो दशकों तक जनवादी लेखक संघ की केंद्रीय कार्यकारिणी के सदस्य के रूप में सक्रिय रहने तथा वाम-जनवादी साहित्य की पत्रिका ‘कथन’ के संस्थापक संपादक के रूप में उसके साठ अंक संपादित करने के अपने अनुभव के आधार पर कुछ बातें आज के वाम-जनवादी लेखकों, लेखक संगठनों और लघु पत्रिकाओं के संपादकों के समक्ष विचार-विमर्श के लिए रखना चाहता हूँ, ताकि एक नया साहित्यिक आंदोलन शुरू करने के बारे में सोचा जा सके और वाम-जनवादी आंदोलन में रही कमजोरी से बचा जा सके।  मेरे विचार से उसकी मुख्य कमजोरी थी: नवीनता, यथार्थवाद, पक्षधरता और प्रतिबद्धता की सही समझ का न होना या कम होना। 


नवीनता

मैंने 2000 में एक निबंध लिखा था ‘साहित्य में फैशन और नवोन्मेष’, जो मेरी पुस्तक ‘साहित्य और भूमंडलीय यथार्थ’ (2008) में संकलित है। उसमें मैंने लिखा था कि फैशन को अक्सर परिवर्तन और नयेपन के रूप में समझा जाता है, पर उसमें कोई वास्तविक परिवर्तन या नयापन नहीं होता। फैशन बहुत बड़े पैमाने पर किया जाने वाला अनुकरण होता है। साहित्य में भी फैशन चलते हैं। उदाहरण के लिए, बीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध के हिंदी साहित्य को देखें। एक समय आता है, जब बहुत-से लेखक सात्र्र, कामू, काफ्का आदि की चर्चा करते हुए ऊब, कुंठा, अकेलेपन, अजनबीपन आदि पर लिखने-बोलने लगते हैं। फिर एक समय आता है, जब बहुत-से लेखक माक्र्स, लेनिन, माओ आदि की चर्चा करते हुए वर्ग-संघर्ष, क्रांति, पक्षधरता, प्रतिबद्धता आदि पर लिखने-बोलने लगते हैं। इसी तरह फिर एक समय आता है, जब बहुत-से लेखक ल्योतार, फूको, दरीदा आदि की चर्चा करते हुए आख्यान, पाठ, अंत, विमर्श आदि पर लिखने-बोलने लगते हैं।
फैशनपरस्त लेखक अन्य लेखकों से भिन्न और विशिष्ट दिखने के लिए कोई नयी-सी विचारधारा तथा रचना-शैली अपनाकर स्वयं को नवीनतम सिद्ध करने का प्रयास करते हैं। फैशनपरस्त आलोचक भी चूँकि भिन्नता, विशिटता और नवीनता को बहुत मूल्यवान मानते हैं, इसलिए फैशनपरस्त लेखकों का ऊँचा मूल्य आँकते हैं। इससे प्रभावित होकर बहुत-से लेखक फैशनपरस्त लेखकों की नकल करते हुए उनके जैसा लिखने की चेष्टा करने लगते हैं। यह न जानते हुए--या जानते हुए भी--कि फैशनपरस्त लेखक स्वयं किन्हीं और लेखकों की नकल कर रहे हैं। इस प्रकार नकल-दर-नकल का एक सिलसिला चल पड़ता है, जिसमें साहित्यिक फैशन तेजी से पुराना पड़ता जाता है।
साहित्यिक फैशन और साहित्यिक आंदोलन में फर्क करना आवश्यक है। फैशनपरस्त लेखक हमेशा अद्वितीय होना चाहते हैं, अतः अन्य लेखकों के साथ एकजुट या संगठित होने में अपनी अद्वितीयता की हानि समझते हैं। इसी कारण वे स्वयं कोई आंदोलन चलाने या किसी आंदोलन में शामिल होने में विश्वास नहीं रखते। हाँ, ऐसा हो सकता है कि जब कोई आंदोलन अपने उत्कर्ष पर हो, तो वे उसे भी कोई नया फैशन मानकर उसके साथ चलते नजर आने लगें। मगर उत्कर्ष के समय वे जितनी तेजी के साथ उसमें आते हैं, अपकर्ष के समय उतनी ही तेजी के साथ उससे अलग भी हो जाते हैं। हिंदी के वाम-जनवादी आंदोलन में आने तथा उससे अलग हो जाने वाले लेखकों के उदाहरण से इस तथ्य को समझा जा सकता है। आंदोलन में आते समय ऐसे लेखक स्वयं को सबसे अधिक प्रगतिशील, सबसे अधिक जनवादी, सबसे अधिक क्रांतिकारी जताते हैं और उससे अलग होते समय उसकी निंदा करने या उसका मजाक उड़ाने में भी सबसे आगे दिखायी देते हैं।
हिंदी साहित्य में नवीनता को दशकों और पीढ़ियों से जोड़कर भी देखा जाता है और यह माना जाता है कि हर दशक के बाद लेखकों की जो ‘नयी’ या ‘युवा’ पीढ़ी आती है, वह साहित्य में नयापन लाती है। लेकिन यह बहुत ही गलत और भ्रामक मान्यता है। साहित्य में वास्तविक नयापन तब आता है, जब बहुत-से लेखक मिलकर रचना और आलोचना के पुराने तौर-तरीकों को बदलते समय की जरूरतों के मुताबिक बदलने का प्रयास करते हैं। उनका यह सामूहिक प्रयास ही साहित्यिक आंदोलन कहलाता है और इसी से साहित्य में एक नवोन्मेष होता है। 
वाम-जनवादी आंदोलन की शक्ति यही नवोन्मेष था, पर उसकी कमजोरी यह थी कि उसमें ऐसे भी बहुत-से लेखक शामिल थे, जो उसे एक नया साहित्यिक आंदोलन नहीं, बल्कि एक नया साहित्यिक फैशन मानकर चल रहे थे। इसीलिए बीसवीं सदी के अंतिम दशक में जब सोवियत संघ के विघटन और पूँजीवादी भूमंडलीकरण से वाम-जनवादी आंदोलन को एक जबर्दस्त धक्का लगा, तो उसमें शामिल फैशनपरस्त लोगों ने नये फैशन अपना लिये। 
वाम-जनवादी आंदोलन की कमजोरी यह रही कि उसने भूमंडलीय पूँजीवाद की विचारधारा उत्तर-आधुनिकतावाद के ‘पोस्ट-माकर््िसस्ट’ (माक्र्सवादोत्तर) और ‘पोस्ट-रियलिस्ट’ (यथार्थवादोत्तर) जैसे फैशनेबल नारों का सक्षम प्रतिकार नहीं किया और माक्र्सवाद तथा यथार्थवाद को दृढ़तापूर्वक अपनाये रखकर किसी नवोन्मेष के जरिये स्वयं को आगे नहीं बढ़ाया। उलटे, सोवियत संघ के विघटन को समाजवाद के अंत और पूँजीवादी भूमंडलीकरण को दुनिया की नयी नियति के रूप में स्वीकार कर लिया। इस प्रकार वह आंदोलन विघटित हो गया और हिंदी साहित्य में नयेपन को पुनः नये दशक और नयी पीढ़ी से जोड़कर या नये विमर्शवादी फैशन से जोड़कर देखा जाने लगा। अतः नये आंदोलन को नवीनता की सही समझ के साथ यह देखना होगा कि उसमें फैशन वाली नकली नवीनता नहीं, नवोन्मेष वाली असली नवीनता हो।

यथार्थवाद

सोवियत संघ के विघटन और पूँजीवादी भूमंडलीकरण के बाद अत्यंत आवश्यक था कि वाम-जनवादी लेखक और उनके संगठन यथार्थवाद को नये संदर्भों में पुनः परिभाषित करते हुए पूँजीवाद के इस मिथ्या प्रचार का जोरदार खंडन करते कि सोवियत संघ के विघटन के साथ ही माक्र्सवाद अप्रासंगिक हो गया है, पूँजीवाद और साम्राज्यवाद के बीच की लड़ाई में समाजवाद हार गया है और अब सारी दुनिया में और हमेशा पूँजीवाद ही चलेगा, क्योंकि उसका कोई विकल्प नहीं है। लेकिन वे न तो इस दुष्प्रचार का खंडन कर पाये और न ही नये पूँजीवाद का कोई नया विकल्प प्रस्तुत कर पाये। पूँजीवादी भूमंडलीकरण के बाद शीतयुद्ध के समय वाला पूँजीवाद बदल गया था। अतः उसका विकल्प रूसी या चीनी किस्म का समाजवाद नहीं, एक नया समाजवाद ही हो सकता था। नये पूँजीवाद और नये समाजवाद को स्पष्ट करने के लिए एक नये यथार्थवाद की जरूरत थी। मगर वाम-जनवादी लेखकों ने अपने बीच यथार्थवाद पर कोई बहस चलाना तक जरूरी नहीं समझा। 
हिंदी में उत्तर-आधुनिकतावाद के आने से पहले ही तरह-तरह के यथार्थवाद-विरोधी साहित्य-सिद्धांत प्रचारित किये जाने लगे थे, जिनमें सबसे सशक्त और प्रभावशाली साबित हुआ अनुभववाद, जो सतही तौर पर यथार्थवाद से मिलता-जुलता था, लेकिन वास्तव में उसका विरोधी था। अनुभववाद हिंदी में ‘नयी कहानी’ आंदोलन के दौरान ही बहुत-से लेखकों-आलोचकों ने अपना लिया था। उसके अनुसार लेखक के अनुभवों को (उसके ‘‘अपने जिये-भोगे यथार्थ’’ को) ही यथार्थ, बल्कि ‘‘प्रामाणिक यथार्थ’’,  और उसकी अभिव्यक्ति को ही यथार्थवाद माना जाता था। उसके अनुसार वर्तमान में ‘जो है’, उसी का चित्रण करने वाले लेखकों को यथार्थवादी माना जाता था। ‘जो होना चाहिए’ की बात करने वाले लेखकों को आदर्शवादी या नैतिकतावादी बताकर और भविष्य में ‘जो हो सकता है’ की बात करने  वाली रचनाओं को काल्पनिक, गढ़ी हुई या गैर-यथार्थवादी कहकर खारिज किया जाता था। इससे रचना में यथार्थ को देखने-दिखाने की दृष्टि अत्यंत संकुचित हुई तथा वाम-जनवादी रचना और आलोचना, दोनों की अपार क्षति हुई। वाम-जनवादी लेखक यथार्थवाद को दृढ़तापूर्वक अपनाये रहकर नयी परिस्थिति में एक नया यथार्थवाद विकसित नहीं कर पाये, इसलिए वे स्वयं को उत्तर-आधुनिकतावाद के हमले से नहीं बचा सके, जो साहित्य में ‘यथार्थवादोत्तर’ लेखन की सैद्धांतिकी प्रचारित कर रहा था। 
जरूरत इस बात की थी कि यथार्थवाद पर व्यापक बहस चलाकर देश और दुनिया के बदले हुए यथार्थ को सामने लाने के लिए यथार्थवाद को पुनः परिभाषित किया जाता और उसे एक नया नाम देकर आगे बढ़ाया जाता। इसके लिए यह समझना आवश्यक था कि वाम-जनवादी साहित्य उस माक्र्सवादी विश्व-दृष्टि से प्रेरित-परिचालित था, जो पूँजीवाद को ही नहीं, उसके विकल्प समाजवाद को भी एक विश्व-व्यवस्था के रूप में देखती थी। पूँजीवादी भूमंडलीकरण से यह बात स्पष्ट हो गयी थी कि अब पूँजीवाद का विकल्प किसी एक देश या कुछ देशों के स्तर पर नहीं, बल्कि भूमंडलीय स्तर पर ही खोजना होगा और यथार्थवादी लेखकों को अपने स्थानीय यथार्थ को भूमंडलीय यथार्थ से जोड़कर समझना होगा। इस प्रकार नया यथार्थवादी साहित्य अब भूमंडलीय यथार्थवादी साहित्य होगा और वह भूमंडलीय समाजवादी विश्व-व्यवस्था को भूमंडलीय पूँजीवादी विश्व-व्यवस्था का विकल्प मानकर चलेगा।  
जरूरत इस बात की भी थी कि भूमंडलीय यथार्थवाद को हिंदी साहित्य की अपनी परंपरा में विकसित किया जाये। हिंदी के वाम-जनवादी लेखन की आधारभूत विशेषता यथार्थवाद थी और यथार्थवाद का अर्थ यथार्थ का चित्रण करना मात्र नहीं, वर्तमान यथार्थ को बेहतर भविष्य की परिकल्पना के साथ बदलने के उद्देश्य से चित्रित करना भी था। लेकिन यथार्थ निरंतर बदलता रहता है, इसलिए उसे बदलने के तौर-तरीके भी बदलते रहते हैं। तदनुसार साहित्य में यथार्थवाद के रूप भी बदलते रहते हैं, जो साहित्यिक आलोचना तथा सौंदर्यशास्त्र को भी बदलते हैं। यह बात 1930 के दशक से 1950 के दशक तक जर्मनी में यथार्थवाद पर चली उस महान बहस से बखूबी स्पष्ट हो गयी थी, जिसमें भाग लेने वाली हस्तियाँ थीं--जाॅर्ज लुकाच, बर्टोल्ट बे्रष्ट, अंस्र्ट ब्लाॅख, वाल्टर बेंजामिन तथा थियोडोर एडोर्नो। हिंदी में प्रेमचंद ने भी अपने समय के बदलते यथार्थ के अनुसार यथार्थवाद को ‘आदर्शोन्मुख यथार्थवाद’ का नया नाम दिया था। लेकिन अधिकतर वाम-जनवादी लेखक यथार्थवाद के नाम पर प्रायः अनुभववाद को ही अपनाये रहे। 
उन्हें गर्व होना चाहिए था कि हमारे प्रेमचंद ने साहित्य को ‘आदर्शोन्मुख यथार्थवाद’ दिया। उन्हें प्रेमचंद की इस अद्भुत देन के लिए कृतज्ञ होना चाहिए था और इसे अपनाकर आगे बढ़ाना चाहिए था। लेकिन उन्होंने आदर्शवाद को प्रेमचंद की कमजोरी माना और खुद को खरा यथार्थवादी मानते हुए प्रेमचंद में भी खरा यथार्थवाद खोजा। नतीजा यह हुआ कि उन्हें प्रेमचंद की अंतिम कुछ रचनाओं में ही यथार्थवाद नजर आया। शेष रचनाओं कोे आदर्शवादी मानते हुए या तो उन्होंने खारिज कर दिया, या उनका मूल्य बहुत कम करके आँका। इससे उन्हें या साहित्य को फायदा क्या हुआ, यह तो पता नहीं, पर नुकसान यह जरूर हुआ कि स्वयं को यथार्थवादी समझने वाले लेखक ‘जो है’ उसी का चित्रण करने को यथार्थवाद समझते रहे और ‘जो होना चाहिए’ उसे आदर्शवाद समझकर उसका चित्रण करने से बचते रहे। 
लेखक के सामने जब कोई आदर्श नहीं होता, तो उसकी समझ में नहीं आता कि वह क्या लिखे और क्यों लिखे। किसी बड़ी प्रेरणा के अभाव में वह या तो लिखना छोड़कर कोई ऐसा काम करने लगता है, जो उसे ज्यादा जरूरी, ज्यादा लाभदायक या ज्यादा संतुष्टि देने वाला लगता है; या वह निरुद्देश्य ढंग का कलावादी अथवा पैसा कमाने के उद्देश्य से लिखने वाला बाजारू लेखक बन जाता है। आदर्शोन्मुख यथार्थवादी लेखक कुछ नैतिक मूल्यों से प्रेरित-परिचालित होने के कारण अपनी रचना में सत्य-असत्य, न्याय-अन्याय, उचित-अनुचित, आवश्यक-अनावश्यक तथा सुंदर-असुंदर के बीच विवेकपूर्वक फर्क करने में जितना समर्थ होता है, उतना आदर्शरहित निरा यथार्थवादी लेखक कभी नहीं हो सकता। इतना ही नहीं, निरा यथार्थवादी लेखक अपनी रचना को उस पूर्णता तक कभी नहीं पहुँचा सकता, जिससे उसे आत्मसंतोष और पाठक को आनंद मिलता है। कहानी, उपन्यास और नाटक के लेखन पर तो यह बात कुछ ज्यादा ही लागू होती है।
मैंने अपनी पत्रिका ‘कथन’ के जरिये वर्षों तक भूमंडलीय यथार्थ के विभिन्न पक्षों को सामने लाते हुए एक नये यथार्थवाद की जरूरत बतायी। दो पुस्तकें भी लिखीं--‘साहित्य और भूमंडलीय यथार्थ’ (2008) तथा ‘भूमंडलीय यथार्थवाद की पृष्ठभूमि’ (2014)। मेरा मानना है कि साहित्य और कला में वास्तविक नयापन तो यथार्थवाद ही लाता है, क्योंकि नये यथार्थों को सामने लाना या पुरानी वास्तविकताओं को नयी दृष्टि से देखना-दिखाना ही उसका काम है। यह काम हिंदी साहित्य में प्रेमचंद के बाद मुक्तिबोध ने सबसे ज्यादा और सबसे अच्छे ढंग से किया। उनके समय में भूमंडलीय शब्द नहीं था, लेकिन उनकी रचनाओं में जो यथार्थवाद है, वह भूमंडलीय यथार्थवाद ही है। यह बात मैंने अपनी पुस्तक ‘मुक्तिबोध का मुक्तिकामी स्वप्नद्रष्टा’ (2017) में विस्तार से स्पष्ट की है। अतः आज के हिंदी साहित्य को भूमंडलीय यथार्थवाद का विकास प्रेमचंद और मुक्तिबोध की यथार्थवादी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए करना होगा।   

पक्षधरता

किसी भी युग का और किसी भी देश का साहित्यकार सत्य, न्याय, नैतिकता, सुंदरता, प्रेम, समता, स्वतंत्रता जैसी सकारात्मक चीजों का पक्षधर और असत्य, अन्याय, अनैतिकता, कुरूपता, घृणा, विषमता, पराधीनता जैसी नकारात्मक चीजों का विरोधी होता है। यदि ऐसा नहीं है, तो वह साहित्यकार कहलाने का अधिकारी ही नहीं है। सच्चा साहित्यकार वह है, जिसे बड़े से बड़ा दमन या प्रलोभन भी ऐसी पक्षधरता से विचलित न कर सके। 
बीसवीं सदी के आठवें-नवें दशकों में हिंदी के वाम-जनवादी लेखकों के बीच मुक्तिबोध के दो कथन बहुत प्रचलित थे। एक  यह कि ‘‘पार्टनर, तुम्हारी पाॅलिटिक्स क्या है?’’ और दूसरा यह कि ‘‘बशर्ते तय करो किस ओर हो तुम’’। मुक्तिबोध ऐसी बातें पूँजीवादी और समाजवादी व्यवस्थाओं के बीच चलने वाले उस शीतयुद्ध के संदर्भ में कहा करते थे, जो विचारधारात्मक और प्रचारात्मक हथियारों से लड़ा जाता था। साहित्यकार भी, चाहे वे प्रतिबद्ध साहित्यकार हों या अप्रतिबद्ध साहित्यकार, अपनी वर्गीय स्थितियों अथवा सामाजिक परिस्थितियों के चलते अनजाने ही या सचेत रूप से उस युद्ध में शामिल रहते थे। जो लेखक सचेत रूप से समाजवाद के पक्ष में और पूँजीवाद के विरुद्ध लड़ते थे, वे अपनी पक्षधरता को छिपाते नहीं थे, क्योंकि वे स्वयं को देश और दुनिया के तमाम शोषित-उत्पीड़ित जनों की मुक्ति के लिए लड़ने वाला सिपाही मानते थे। प्रेमचंद की तरह ‘कलम का सिपाही’। वे शोषण, दमन, अन्याय और अत्याचार पर टिकी पूँजीवादी व्यवस्था के विरुद्ध एक शोषणमुक्त समतामूलक और न्यायपूर्ण व्यवस्था के लिए लड़ने वाले लेखक के रूप में अपने पक्ष को नैतिक आधार पर उचित समझते थे, इसलिए अपनी राजनीति को दूसरे पक्ष के साहित्यकारों की तरह छिपाते नहीं थे। जो लेखक अपनी राजनीति को छिपाते थे, उनसे वे पूछते थे कि ‘‘पार्टनर, तुम्हारी पाॅलिटिक्स क्या है?’’ और उचित-अनुचित, न्याय-अन्याय, सही-गलत आदि में फर्क न कर पाने के कारण दुविधा में पड़े साहित्यकारों को बताते थे कि लड़ाई तो तुम्हें लड़नी ही पड़ेगी, चाहे इस पक्ष में रहकर लड़ो या उस पक्ष में रहकर, इसलिए तय करो कि तुम किस पक्ष में हो। 
मुक्तिबोध जिस यथार्थ के संदर्भ में ऐसे प्रश्न उठा रहे थे, वह उनके समय का भूमंडलीय यथार्थ था। उस समय दुनिया तीन दुनियाओं में बँटी हुई थी--पूँजीवादी देशों वाली पहली दुनिया, समाजवादी देशों वाली दूसरी दुनिया और औपनिवेशिक गुलामी से नये-नये आजाद हुए देशों वाली तीसरी दुनिया। पहली और दूसरी दुनियाओं के बीच शीतयुद्ध चल रहा था, जिसके एक पक्ष का नेतृत्व अमरीका कर रहा था और दूसरे पक्ष का नेतृत्व सोवियत संघ। तीसरी दुनिया के देशों के सामने एक विकल्प यह था कि वे पूँजीवादी खेमे में रहें, दूसरा विकल्प यह था कि समाजवादी खेमे में चले जायें और तीसरा विकल्प यह कि वे दोनों गुटों से अलग रहें। भारत ने तीसरा विकल्प अपनाया और गुटनिरपेक्ष देशों का आंदोलन ही नहीं चलाया, उसका नेतृत्व भी किया। लेकिन वाम-जनवादी लेखक चाहते थे कि भारत वैश्विक राजनीति में खुल्लमखुल्ला पूँजीवाद के विरुद्ध समाजवाद के पक्ष में खड़ा हो। इसीलिए वे मुक्तिबोध के उपर्युक्त कथनों को बार-बार दोहराते थे। इसमें कहीं न कहीं यह भाव भी शामिल होता था कि जो हमारे साथ नहीं है, वह निश्चय ही दूसरे खेमे का है और हमारा शत्रु है। यदि ऐसा नहीं है, तो वह समाजवादी खेमे के पक्ष में खुलकर खड़ा हो। अर्थात् हमारे साथ आकर अपनी पक्षधरता का प्रमाण दे। 
आगे चलकर जब समाजवादी शिविर के अंदर आपसी मतभेद उभरे और भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन में यह सवाल उठा कि भारत में क्रांति रूसी रास्ते पर चलकर होगी या चीनी रास्ते पर चलकर, और इस सवाल पर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी में विभाजन तथा पुनर्विभाजन होने से एक की जगह तीन-तीन कम्युनिस्ट पार्टियाँ बन गयीं, और बाद में तीनों के अपने अलग-अलग लेखक संगठन भी बन गये, तो साहित्यकार की पक्षधरता का प्रश्न एक जटिल समस्या बन गया। लेखकों के लिए यह तय करना मुश्किल हो गया कि वे किसके पक्षधर हों। नेताओं ने इस समस्या का एक सरल समाधान यह बताया कि साहित्यकार उस दल और संगठन से जुड़ें, जो सबसे सही हो। लेकिन इससे हुआ यह कि वामपंथी दलों और उनसे जुड़े लेखक संगठनों में स्वयं को सही और दूसरों को गलत साबित करने की होड़ मच गयी। संकीर्णता और कट्टरता बढ़ी और इस विचार ने जोर पकड़ा कि जो लेखक हमारे दल और संगठन को सबसे सही नहीं मानता, वह हमारा शत्रु है। 
वाम-जनवादी साहित्यिक आंदोलन शोषित-उत्पीड़ित सभी मुक्तिकामी जनों का, अर्थात् किसानों, मजदूरों, स्त्रियों, दलितों, आदिवासियों, अल्पसंख्यकों आदि का साझा आंदोलन था, जो इनके सामाजिक-राजनीतिक आंदोलनों से जुड़कर चलता था। भूमंडलीय पूँजीवाद और उसकी विचारधारा उत्तर-आधुनिकतावाद ने इस समग्रता को तोड़कर इन्हें अलग किया और इनकी मुक्ति के साझे आंदोलन को अस्मिता के अलग-अलग विमर्शों में बाँट दिया। वाम-जनवादी लेखकों को यथार्थवादी ढंग से इस खेल को समझकर ‘आंदोलन’ और ‘विमर्श’ में फर्क करके इसके विरुद्ध वैचारिक संघर्ष चलाना चाहिए था। लेकिन वे ऐसा नहीं कर सके और नतीजा यह हुआ कि स्त्रियाँ, दलित, आदिवासी आदि सबकी पक्षधरताएँ अलग-अलग हो गयीं। मसलन, स्त्रियाँ पुरुषों के विरुद्ध स्त्रियों की पक्षधर होकर लिखने लगीं और दलित सवर्णों के विरुद्ध दलितों के पक्षधर होकर लिखने लगे। इससे सबका साझा संघर्ष, जो भूमंडलीय पूँजीवाद का एक सशक्त प्रतिरोध बन सकता था, विभाजित होकर कमजोर हो गया और ऐसा प्रतीत होने लगा कि जैसे भूमंडलीय पूँजीवाद का कोई विकल्प ही नहीं रह गया हो। 
आज विकल्पहीनता के निराशाजनक विचार के विरुद्ध विकल्प का आशाजनक विचार ही वाम-जनवादी आंदोलन को पुनर्जीवित कर सकता है। इसी विचार के आधार पर वह स्त्रियों, दलितों, आदिवासियों आदि को विमर्शों के विभ्रम से निकालकर आंदोलन के यथार्थ से जोड़ने में समर्थ हो सकता है।

प्रतिबद्धता

साहित्य में प्रतिबद्धता कोई नयी चीज नहीं है। और वह केवल वाम-जनवादी साहित्य की ही विशेषता नहीं है। यह विशेषता भी प्रत्येक देश-काल के महान साहित्य में मौजूद रही है। उदाहरण के लिए, भक्तिकाल के हिंदी साहित्य को देखें। उसमें सगुण भक्ति वाले कवि हों या निर्गुण भक्ति वाले कवि, रामभक्त कवि हों या कृष्णभक्त कवि, संत कवि हों या सूफी कवि--सब में वैचारिक प्रतिबद्धता देखी जा सकती है। सूर, तुलसी, कबीर, जायसी, मीरा आदि में से किसी को भी देख लीजिए। सभी में यह चीज मिलेगी। मीराबाई जब कहती हैं कि ‘‘मेरे तो गिरधर गुपाल दूसरो न कोई’’, तो अपनी प्रतिबद्धता ही व्यक्त करती हैं। इसी प्रकार तुलसीदास जब कहते हैं कि ‘‘जाके प्रिय न राम-वैदेही, तजिए ताहि कोटि बैरी सम, जद्यपि परम सनेही’’, तो अपनी प्रतिबद्धता ही प्रकट करते हैं। मुझे मीराबाई की-सी प्रतिबद्धता बेहतर लगती है, जिसमें अपनी प्रतिबद्धता की अभिव्यक्ति तो है, उसके लिए लोकलाज की परवाह न करने से लेकर विष का प्याला तक पी लेने की दृढ़ता भी है, लेकिन तुलसीदास की तरह दूसरों को यह उपदेश या आदेश देने वाली बात नहीं है कि जो हमारे राम-वैदेही से प्रेम नहीं करते--अथवा हमारी विचारधारा से सहमत नहीं हैं--उन्हें करोड़ों शत्रुओं के समान मानकर त्याग देना चाहिए। वाम-जनवादी लेखन की कमजोरी यह रही कि उसमें मीराबाई की-सी प्रतिबद्धता कम और तुलसीदास की-सी प्रतिबद्धता अधिक थी।  
प्रतिबद्धता दरअसल एक नैतिक निर्णय और उस पर आधारित नैतिक आचरण है। बीसवीं सदी के आठवें-नवें दशकों का वाम-जनवादी आंदोलन लेखकों को प्रतिबद्ध होने के लिए प्रेरित करता था। उस आंदोलन के समाप्त होने पर यह जिम्मेदारी स्वयं लेखकों पर आ पड़ी कि वे अपनी प्रतिबद्धता को बचाये रखें और उस पर दृढ़ रहें। प्रश्न उठता है--कैसे? मैं इसके उत्तर में वही कहना चाहता हूँ, जो अक्सर अपने-आप से कहता हूँ। 
मैं अपने-आप से कहता हूँ--क्या तुमसे किसी डाॅक्टर ने कहा था कि तुम्हें लेखक बनना है और प्रतिबद्ध लेखक ही बनना है? तुम स्वेच्छा से लेखक बने थे और प्रतिबद्ध लेखन करने का निर्णय तुम्हारा अपना निर्णय था। तुम जब चाहो, अपने इस निर्णय को बदल भी सकते हो। अगर तुम लिखना बंद कर दो, अथवा यह घोषणा कर दो कि अब तुम प्रतिबद्ध लेखक नहीं हो, तो तुम पर, समाज पर और साहित्य पर कोई कहर नहीं टूट पड़ेगा। उलटे, हो सकता है, तुम्हें इससे कुछ फायदा ही हो जाये। लेकिन जब तक तुम अपने निर्णय पर कायम हो, अपनी प्रतिबद्धता में कमी या शिथिलता आ जाने के लिए दूसरों को दोषी नहीं ठहरा सकते। प्रतिबद्ध लेखक बने रहने के लिए जो भी करना जरूरी है, तुमको ही करना है। परिस्थितियाँ प्रतिकूल हैं, तो उनको अनुकूल बनाने का काम किसी और का नहीं, तुम्हारा ही है। माना कि तुम्हारी सीमाएँ हैं, तुम अकेले सब कुछ नहीं कर सकते, लेकिन उस काम को तो ढंग से करो, जिसे करने का निर्णय तुमने लिया है। तुम वही करो, जो कर सकते हो; मगर उसे बेहतरीन ढंग से करना तुम्हारी जिम्मेदारी है। उसको न कर पाने के लिए वातावरण और परिस्थितियों को दोष देकर तुम अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकते। तुम लेखक हो और नहीं लिख पा रहे हो, या अच्छा नहीं लिख पा रहे हो, तो लिखना बंद कर देने का विकल्प तुम्हारे सामने हमेशा खुला है। यदि तुम प्रतिबद्ध लेखक नहीं बने रहना चाहते, तो अप्रतिबद्ध लेखक बन जाने का विकल्प भी तुम्हारे सामने हमेशा खुला है। मगर जब तक तुम लेखक हो, बेहतरीन ढंग से लिखने की कोशिश करना तुम्हारा काम है। जब तक तुम प्रतिबद्ध लेखक हो, प्रतिबद्ध लेखन के लिए अनुकूल वातावरण बनाना भी तुम्हारा काम है। प्रतिबद्ध लेखक का काम यथार्थ को केवल देखना-दिखाना ही नहीं, उसे बदलना भी है। मौजूदा परिस्थितियाँ वास्तव में प्रतिकूल हैं और उनसे जो निराशा पैदा होती है, वह भी एक यथार्थ है। लेकिन यथार्थ कभी इकहरा नहीं होता। वह द्वंद्वात्मक होता है। कोई भी स्थिति या परिस्थिति सर्वथा और सदा-सर्वदा के लिए निराशाजनक नहीं होती। घना अँधेरा, जिसमें रास्ता नहीं सूझता, एक यथार्थ है। उसमें भटकते हुए लोगों को यदि ऐसा लगता है कि कहीं कोई रास्ता नहीं है, तो उनका यह अनुभव भी यथार्थ है। इस अनुभव से उत्पन्न होने वाली उनकी निराशा भी यथार्थ है। लेकिन यथार्थ यही और इतना ही नहीं है। यथार्थ यह भी है कि प्रत्येक अंधकार में प्रकाश की संभावना मौजूद रहती है। उदाहरण के लिए, घने अँधेरे में माचिस की एक नन्ही-सी तीली या एक छोटी-सी टाॅर्च भी प्रकाश पैदा कर सकती है। यह संभावना भी यथार्थ है। इसलिए केवल अंधकार को देखना और उसमें प्रकाश की संभावना को न देखना यथार्थवाद नहीं है। यथार्थ को उसके द्वंद्वात्मक रूप में देखना ही यथार्थवाद है।


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शशिकांत - Thu, 01/02/2018 - 09:49
विफल प्यार, पुरुषों से मिले अनुभव और विवाहेतर संबंध को 
खुलेपन से व्यक्त करनेवाली लेखिका 

आज 1 फरवरी है. गूगल ने आज अँग्रेजी व मलयालम भाषा की भारतीय लेखिका कमला दास पर डूडल बनाकर उन्हें याद किया है. 1 फरवरी 1973 को आज ही के दिन उनकी विवादस्पद और बहुचर्चित किताब पहली बार 'Ente Kadha' शीर्षक से मलयालम में प्रकाशित हुई थी. कमला दास को कमला सुरैय्या के नाम से भी जाना जाता है. हालांकि मलयालम भाषा में वो माधवी कुटटी के नाम से लिखती थीं। 
31 मार्च 1934 को केरल के त्रिचूर जिले के पुन्नायुर्कुलम में जन्मी कमला की बहुत ही कम उम्र में शादी हो गई थी। उस वक्त उनकी उम्र मात्र पंद्रह साल की थी। 15 साल की उम्र से ही वे कवितायें लिखने लगी थीं। उनकी माँ बालमणि अम्मा एक बहुत अच्छी कवयित्री थीं. कमला दास पर उनकी माँ के  लेखन का खासा प्रभाव पड़ा।
पारिवारिक जिम्मेदारियों की वजह से परिवार के सो जाने के बाद वे रसोई में अपना लेखन जारी रखतीं और सुबह तक लिखती रहतीं। इससे उनकी सेहत ख़राब हो गई और वे बीमार रहने लगीं। अपने एक साक्षात्कार में कमला दास ने बताया, ''चूँकि मैं बीमार रहती थी, लिहाजा मुझे घर में आराम करने का ज्यादा वक्त मिलता था और इस तरह लिखने के लिए भी।'' 
एक ऐसे समय में जब किसी भी स्त्री के सामने अपने तौर-तरीके से ज़िंदगी जीने पर तमाम तरह की बंदिशें हों और घर, परिवार और समाज दकियानूसी मानसिकता से ग्रस्त हो और कई तरह की सामाजिक कुरीतियाँ जारी हों तब किसी भी लेखिका के लिए ख़ुद को अभिव्यक्त करना बहुत मुश्किल होता है. ऐसे विपरीत हालात में कमला दास ने अपने आत्मकथात्मक लेखन को 'माय स्टोरी' नाम से संग्रहित किया। 
1 फरवरी 1973 को आज ही के दिन कमला दास की यह किताब पहली बार 'Ente Kadha' शीर्षक से मलयालम में प्रकाशित हुई थी. मात्र 107 पृष्ठ की इस किताब को पहली बार प्रकाशित करने का श्रेय 'करंट बुक्स' नामक प्रकाशन को है. सन 1977 में स्टर्लिंग पब्लिशर्स ने इसका अंग्रेज़ी अनुवाद 'माय स्टोरी' शीर्षक से प्रकाशित किया. सन 2009 में इसके अंग्रेज़ी संस्करण के प्रकाशन का अधिकार हार्पर कॉलिंस के पास है. 
'माय स्टोरी' में लेखिका ने अपने विवाहेतर संबंधों, प्यार पाने की अपनी नाकामयाब कोशिशों औऱ पुरुषों से मिले अनुभवों को खुलेपन से व्यक्त किया है। वे उस समय की शायद एकमात्र ऐसी लेखिका थीं जिसने बिंदास ढंग से अपने जीवनानुभवों को बड़े ही साहस से वर्णित किया और कई मसलों पर अपनी बेबाक राय ज़ाहिर कीं, जिन पर लिखने से कई कतराते थे। 
यह किताब इतनी विवादास्पद हुई और इतनी पढ़ी गई कि उसका पंद्रह विदेशी भाषाओं में अनुवाद हुआ। इस किताब की बदौलत उन्हें राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ख्याति मिली।
कमला की अंग्रेजी में ‘द सिरेंस’, ‘समर इन कलकत्ता’, ‘दि डिसेंडेंट्स’, ‘दि ओल्डी हाउस एंड अदर पोएम्स ’, ‘अल्फाेबेट्स ऑफ लस्ट’’, ‘दि अन्ना‘मलाई पोएम्सल’ और ‘पद्मावती द हारलॉट एंड अदर स्टोरीज’ आदि बारह किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं। मलयालम में ‘पक्षीयिदू मानम’, ‘नरिचीरुकल पारक्कुम्बोल’, ‘पलायन’, ‘नेपायसम’, ‘चंदना मरंगलम’ और ‘थानुप्पू’ समेत उनकी पंद्रह किताबें हैं।                                                                                                                                                              .............

स्कूल में दाखिला- Twisted jokes of husband-wife- 46

स्कूल में दाखिले के समय-

अध्यापिका ने पप्पू से पूछा-
" बेटा तुम्हारे पिता क्या करते हैं ?"

पप्पू- जो मम्मी बोलती हैं ।

पहचान- twisted jokes of huband-wife :45

बीवी से परेशान पति बॉलकनी
से कूदने ही वाला था कि तभी
उसकी बीवी ने अंदर से आवाज दी...

मेरी सहेलियां आई हैं । आओ
आपकी पहचान करा दूं,.....

पति- आंसू पोछते हुए , हाँ-हाँ आया.... आया.... आया

ब्लू मून, सुपर मून और चंद्रग्रहण : देवेंद्र मेवाड़ी

लेखक मंच - Tue, 30/01/2018 - 22:35

आकाश के रंगमंच पर 31 जनवरी 2018 को एक अनोखा नजारा दिखाई देगा। इसके अभिनेता हैं सूर्य, चंद्रमा और पृथ्वी। आकाश में घूमते-घूमते कल ये तीनों एक ऐसी स्थिति में आ रहे हैं कि 150 वर्ष बाद यह नजारा देखने को मिल रहा है। इस घटना में आप ब्लू मून की पूर्णिमा भी देखेंगे, सुपर मून भी और तांबई चेहरे वाला ग्रहण लगा चांद भी। जानते हैं, क्या है यह ब्लू मून और सुपर मून? असल में आम तौर पर एक महीने में एक बार ही पूर्णिमा का चांद दिखाई देता है। लेकिन, कभी-कभी पृथ्वी की परिक्रमा करते-करते ऐसा संयोग हो जाता है कि चंद्रमा हमें एक महीने में दो बार दिख जाता है। आपको याद होगा, 1 जनवरी को भी पूर्णिमा का चांद निकला था और अब इसी महीने 31 जनवरी को भी पूर्णिमा का चांद निकल रहा है। आपने अंग्रेजी का मुहावरा सुना होगा – ‘वन्स इन अ ब्लू मून’। यानी, कभी-कभार। इस मुहावरे में नीला शब्द तो है लेकिन नीला रंग नहीं है। इसलिए 31 जनवरी का चांद भी ब्लू मून तो होगा लेकिन उसका रंग नीला नहीं होगा! वह तो ब्लू मून है यानी एक माह में दो बार पूर्णिमा का चांद! मतलब वही ‘वन्स इन अ ब्लू मून’ यानी कभी-कभार।

अब रही सुपर मून की बात। सुपर यानी बड़ा। अक्सर जो चीज अपने सामान्य आकार से बड़ी होती है उसे ‘सुपर’ कह देते हैं। कल का चांद भी अपने सामान्य आकार से करीब 13-14 प्रतिशत बड़ा दिखेगा। इसलिए वह सुपर मून होगा। तो क्या चांद का आकार अचानक बढ़ जाएगा? नहीं, लेकिन वह बड़ा जरूर दिखाई देगा। जिस तरह हमें दूर की चीज छोटी दिखाई देती है और पास आने पर वही चीज बड़ी दिखाई देती है, ठीक वही किस्सा ‘सुपर मून’ का भी है। चंद्रमा हमारी पृथ्वी के चारों ओर गोल नहीं बल्कि अंडाकार कक्षा में चक्कर लगाता है। इस कारण कभी तो वह 4 लाख किलोमीटर से भी दूर हो जाता है और कभी 3,56,000 किलोमीटर तक करीब आ जाता है। बस, तो जब चांद हमारी पृथ्वी के इतना करीब आ जाता है तो वह हमें बड़ा दिखाई देने लगता है। इसलिए ऐसा चांद ‘सुपर मून’ होता है।

अब रही बात चांद के तांबई, सिंदूरी या भूरे रंग की और उसके ग्रहण की। हालांकि आर्यभट तो छठी शताब्दी में ही बता गए थे कि चंद्रग्रहण चंद्रमा पर पृथ्वी की छाया पड़ने के कारण दिखाई देता है, लेकिन पंद्रह शताब्दियां बीतने के बाद आज भी कई लोग इस भ्रम में पड़े हैं कि चंद्रग्रहण कोई काल्पनिक राक्षसी कारनामा है! असल में होता यह है कि सूर्य के चारों और घूमते-घूमते, कभी-कभी सूर्य, पृथ्वी और चंद्रमा एक सीध में आ जाते हैं। चंद्रमा का अपना प्रकाश तो है नहीं। उस पर सूर्य का प्रकाश पड़ता है जो पलट कर यहां हमारी आंखों तक आ जाता है। इसीलिए हमें चांद चमकीला दिखाई देता है। लेकिन, जब सूर्य और चंद्रमा के बीच में पृथ्वी आ जाती है तो उसकी छाया सीधे चांद पर पड़ती है। वही छाया हमें ग्रहण के रूप में दिखाई देती है। चांद पर पृथ्वी की छाया के कारण कुल रोशनी कम पड़ती है, इसलिए वह हमें तांबई, सिंदूरी या भूरे रंग का दिखाई देता है। उसका भूरापन इस बात पर भी निर्भर करता है कि हमने अपने वायुमंडल को खुद कितना प्रदूषित कर दिया है। चंद्रमा से लौट कर आने वाली चांदनी प्रदूषित वायुमंडल को कितना पार करके हमारी आंखों में पहुंचती है, उससे भी चांद का रंग तय होगा। तो साथियो आप भी देखिएगा ब्लू मून, सुपर मून और चंदग्रहण का यह अनोखा नजारा।
फोटो: हमारी बालकनी से चांद (30 जनवरी 2018)
(देवेंद्र मेवाड़ी जी की फेसबुक वॉल से साभार)

लोग बर्फ बन गए हैं

'कादंबिनी' के ताज़ा अंक में प्रकाशित कविताएँ - 
इनको मैंने हैदराबाद लिट फेस्ट में भी पढ़ा था। A quick translation follows after the Hindi original.


सपनों में बर्फ होतीधरती
1चारों ओर लोग ठोस बर्फ बन गए हैंसूरज उन पर बरसते थक गया हैऔर वे पिघलते नहीं हैंसूरज पास आकर उनसे टकराता हैऔर मैं सोचता हूँ कि पिघल ही जाएँगेकि रोशनी उनके आरपार होगी तो वे यह सोच कर रोएँगेकि वे जिस जंग में शामिल हैंउसकी आग से धरती की सतह पर छायादार खयाल जल गए हैंसूरज थक गया हैकि वह छाया ओढ़ कर कहीं सो नहीं पाता सूरज ने कई जंगें देखी हैंउसे पता है कि हर जंग से पहले और कई जंगें होती हैंकि कहाँ शुरु कहाँ खत्मइस हिसाब में दुनिया भर में माँएँ रोती हैंचाहता हूँ कि लोग माँ के आँसू देखें
लोगों की नज़र बर्फ बन गई है।
2
मेरे पास से बर्फ बन चुका एक आदमी गुजर गयामुझे लगा कि वह पिघले तो मुझे ठंडा पानी पाने को मिलेगाउसके पास बैठूँ तो मुझपर छाया उतर आएगीमैं सोच रहा था कि वह बैठने देगा या नहीं देगाकि उसने एक साथ अल्लाह ओ अकबर और जै श्री राम कहामैंने सोचा कि उसमें धर्मों की ठंडक हैमन हुआ कि उस जैसा बर्फ बन जाऊँ बादल सा उड़कर कहीं बरसूँपर उसके अंदर तोप तलवारों से सजे मंदिर और मस्जिद थे।
3
फिलहाल इस सोच में हूँ कि और कब तक रहूँगाकोई धर्माधिकारी इस उधेड़बुन से मुझे निकालेबतलाए कि खुदा या ईश्वर जो भी ऊपर या नीचे हैउसे जंग के मुहावरे के अलावा और क्या आता हैहो सकता है कि मैं कुछ और दिन रह जाऊँबर्फीले लोगों के बीच गिलहरी या गौरैया बन फुदकूँ निहायत बेवकूफ सा कुछ और दिन समझौतापरस्ती के जी लूँबर्फ बने लोग कहाँ देखते हैंकि कैसा वर्चुअल जीवन ढो रहे हैं दरख्त जो बचे हुए हैं जंग की लपेट से अब तकतूफानों में कैसे बिना हिले-डुले देखते हैं।
4
ऐसा नहीं कि मैं सोया पड़ा थानींद में देखा कि पहाड़ों पर लगी है आगतो तड़पता उठ खड़ा थालोगों को चेताया थाकि यह आग तुम्हें बर्फ बना देगीहालाँकि अंदर तुम्हारे खौलेगा लावातह-दर-तह अणुओं को चूरमचूर ध्वस्त करती आग बंजर बना डालेगी धरती कोतुम्हारी बर्फीली हड्डियों तले जम जाएगी धरती की कंपनजो कुछ हरा है रंगो से भरा हैबेरंग खंदकों में बदल जाएगा
सपनों जैसी ही आग थी जागने के बाद।
5
जो मारा गया उसका मुँह खुला थाआँखें खुली थींबर्फ बन चुके लोगों ने उनमें बर्फ डाल दी थीकहते हैं कि कोई मजदूर थाघर से दूर बीबी-बच्चों की सोचता मेहनत करता थाकम खाता था कि कभी लौटकर बचाए पैसों से बच्चों को मिठाइयाँ खिलाएगाजब वह मरा तो उसकी जेब में से उसके सपने निकल आएसपने उड़कर उसके बच्चों तक पहुँचेबीबी रोई यह देखकर कि सपनों में बर्फ होती धरती का डर छिपा थारोते-रोते उसे उल्टी हुई इसके सिवा वह कर भी क्या सकती थीयहाँ सूरज भी थक गया है @page { margin: 2cm } p { margin-bottom: 0.25cm; direction: ltr; color: #00000a; line-height: 120%; text-align: left; orphans: 2; widows: 2 } p.western { font-family: "Liberation Serif", serif; font-size: 12pt; so-language: en-IN } p.cjk { font-family: "Noto Sans CJK SC Regular"; font-size: 12pt; so-language: zh-CN } p.ctl { font-family: "Lohit Devanagari"; font-size: 12pt; so-language: hi-IN }
लोग बर्फ बन गए हैं।
a quick translation:
People have frozen into ice
People have frozen into solid iceThe sun is tired of pouring onto themAnd they do not meltThe sun comes close and hits themAnd I think that they will surely meltThat when light passes through themThey will weep knowing of the war they have joinedThat it has charred comforting thoughts from the surface of EarthThe sun is tiredThat it cannot sleep covered with shadows on itThe sun has seen many warsIt knows That many wars precede any one warThat solving the riddles Of the beginnings and endsMothers all over the world weepI want people to see the tears in mothers' eyes
People have frozen eyesight.
2
A man frozen into ice walked by meI felt that if he melts I will have cold water to drinkIf I sit next to him then a shade will descend upon meAs I was wondering if he will let me sit next to himHe said in one voice Allah-ho-Akbar and Jai-Shree-RamaI thought that he may possess the comfort of religionsI felt like becoming ice-frozen like himThat I could fly like a cloud and pour as rainBut within him were temples and mosques decorated with swords and cannons.
3
And now I am wondering how long will I existI wish that a religious authority gets me out of this fixAnd tell me that Khoda or God whoever lives up there or down hereWhat else does he know other than metaphors of warsMay be I will live a few more daysAnd dance like a squirrel or a bird among ice-peopleA few more days of stupidityI may live with compromisesBut the ice-people never noticethe virtual lives that the trees liveThose that are still safely away from the throes of warHow they watch without being perturbed.
4
Not that I was caught unawaresWhen in my dreams I saw the fire on the hillsI was awake in agonyI warned peopleThat this fire will freeze you into iceEven though you will have within you boiling lavaThe fire will destroy depths within youIt will dry the lands barrenUnderneath your frozen bones the earth will freezeAll that is green and is full of colorswill turn colorless and will become large pits.
And when I was awake the fire was still razing just as in my dreams.
5
The killed one had his mouth agapeHis eyes were wide openThe ice-people had put ice in his orificesThey say he was some workerHe worked hard away from his family Thinking of his wife and childrenHe ate lessSo that he could bring sweets for his children with his money savedWhen he died, dreams flew out of his pocketsThe dreams reached his childrenThe wife wept that the dreams had the fear of freezing Earth hidden in themShe vomited while cryingWhat else could she do anyway
Even the sun is tired herePeople have turned into frozen ice. @page { margin: 2cm } p { margin-bottom: 0.25cm; line-height: 120% }

अफसोस- twisted jokes of husband wife-44

ताई - शादी हो गयी के बेटी तेरी ?

छोरी - हां ताई ।

ताई - छोरा के करे ?

छोरी - *अफसोस !!*

आरती- पति पत्नी के जोक्स का उल्टा पुल्टा रूप-43

Twisted jokes of huband-wife

*देव और पति देव*
*दोनों में क्या फर्क है*...?

*देव की आरती* -
*सुखकर्ता दुखहर्ता*...

*पति देव की आरती*-
*ऐसाकर्ता वैसाकर्ता*...
*यह नहीं करता*
*वो नहीं करता*

क्या करणी सेना के पास भूख से तड़पते और लेबर चौक पर खड़े राजपूतों के लिए भी कोई योजना है ?

जंतर-मंतर - Fri, 26/01/2018 - 08:54
  शेष नारायण सिंह
राजस्थान की  करणी माता के नाम पर बनी एक सेना के हवाले से एक फिल्म का विरोध आजकल राजनीतिक चर्चा के केंद्र में है.बिना फिल्म देखे लाखों नौजवान सड़क पर आ गए और तोड़ फोड़ शुरू कर दी. कुछ नेता भी पैदा हो गए और फिल्म पर प्रतिबन्ध लगाने की मांग शुरू कर दी . मैंने कई बार इन नेताओं से राजपूत हित की बात करने की  कोशिश की लेकिन वे फिल्म पर पाबंदी के अलावा कोई भी बात सुनने को तैयार नहीं थे.  अब फिल्म बहुत सारे लोगों ने देख लिया है और आम तौर  लोगों की राय यही है कि फिल्म में रानी पद्मिनी का कोई अपमान नहीं हुआ है और राजपूत  गौरव को पूरी तरह से सम्मान दिया गया है .सवाल उठता है कि बिना फिल्म देखे और उसके बारे में बिना जानकारी हासिल किये इतनी बड़ी संख्या में नौजवान  राजपूत लड़कों  को सड़क पर लाने वाले अब अपने आप को क्या जवाब देंगें . अब यह सवाल पूच्छे जायेंगे कि आप ने इतने बड़े पैमाने पर तोड़फोड़ का जो आयोजन किया  उसके पीछे आपकी मंशा क्या थी. कहीं कोई गुप्त एजेंडा तो नहीं था. के वास्तव में आपको राजपूतों के गौरव का उतना ही ध्यान रहता है जितना उन बेरोजगार नौजवानों को इकठ्ठा करने के समय आपने दिखाई थी. रानी पद्मिनी की ऐतिहासिकता पर चर्चा करने की ज़रूरत नहीं है. उनको ऐतिहासिक चरित्र माना जा सकता है और राजपूतों के एक बड़े वर्ग में उनको सम्मान का  मुकाम हासिल है. अब उनके सम्मान से समझौता करने वाली फिल्म का विवाद ख़त्म हो  जाएगा . क्या मौजूदा आन्दोलन के नेता अब भी  उनके आवाहन पर मरने मारने के लिए सड़क पर आये लोगों के कल्याण के बारे में कुछ सोचेंगे .आन्दोलन के दौरान राजपूतों के कई नेताओं से  मुलाक़ाते होती रही थीं.उनसे जब  ज़िक्र किया गया कि इन बेरोजगार लड़कों के लिए उनके दिमाग में क्या कोई योजना है . तो कई लोगों ने बताया कि सरकारी नौकरियों के रिज़र्वेशन के लिए आन्दोलन चलाया जाएगा . उनको भी मालूम है कि इस तरह की बात का कोई नतीजा  नहीं निकलने वाला है . लड़कों को किसी बेमतलब के झगडे में फंसाए रखना ही उद्देश्य है . ऐतिहासिक रूप से राजपूतों को शोषक और  उत्पीड़क के रूप में चित्रित किया  जाता रहा है . उनके तथाकथित उत्पीडन से मुक्ति के लिए ही दलितों और पिछड़ी जातियों  के लोगों को आरक्षण दिया गया था .  ज़ाहिर है उनके आरक्षण की मांग को  बिना विचार किये ही खारिज कर दिया जाएगा . इसलिए बेरोजगार राजपूत नौजवानों को सरकारी नौकरी के अलावा किसी और तरह का रोज़गार दिलाने के बारे में सोचना होगा. इन नेताओं के पास अवसर है कि राजपूतों को सामान्य इंसान के रूप में  भी पेश करने के लिए  प्रयास करें और उनकी जो शोषक की छवि बनी हुयी है उसको तोड़ें और पूर्व ज़मींदारों से गरीब राजपूतों  को अलग करके प्रस्तुत करें . आज की सच्चाई यह है कि दिल्ली और  नोयडा के किसी लेबर चौक पर सुबह पांच बजे चले जाइए ,वहां, उत्तर प्रदेश ,बिहार,मध्य प्रदेश और राजस्थान से दिल्ली आये राजपूत लड़के काम के इंतज़ार में खड़े मिल जायेगें . और अगर उसी चौक पर  ग्यारह बजे जाकर देहें तो क्चुह्ह नौजवान निराश खड़े मिले जायेगें क्योंकि मजदूरों की  मंडी में उस दिन उनको काम नहीं मिल पाया.
मेरा भी जन्म एक राजपूत परिवार में हुआ  है लेकिन  अपनी बिरादरी की पक्षधरता की बात करने से मैं बचता रहा हूँ. उत्तर प्रदेश में ज़मींदारी उन्मूलन के आस पास जन्मे राजपूत बच्चों ने अपने घरों के आस पास ऐसा कुछ नहीं देखा है जिस पर बहुत गर्व किया जा सके. अपने इतिहास में ही गौरव तलाश रही इस पीढी के लिए यह अजूबा ही रहा है कि राजपूतों पर शोषक होने का आरोप लगता रहा है . हालांकि शोषण राजपूत तालुकेदारों और राजओंने किया होगा लेकिन शोषक का तमगा सब पर थोप दिया जाता रहा है . आम राजपूत तो अन्य जातियों के लोगों की तरह गरीब ही है . मैंने अपने बचपन में देखा है कि मेरे अपने गांव में राजपूत बच्चे भूख से तडपते थे. मेरे अपने घर में भी मेरे बचपन में भोजन की बहुत किल्लत रहती थी. इसलिए राजपूतों को एक वर्ग के रूप में शोषक मानना मेरी समझ में कभी नहीं आया.. मेरे बचपन में मेरे गाँव में राजपूतों के करीब १६ परिवार रहते थे .अब वही लोग अलग विलग होकर करीब ४० परिवारों में बँट गए हैं . मेरे परिवार के अलावा कोई भी ज़मींदार नहीं था . सब के पास बहुत मामूली ज़मीन थी. कई लोगों के हिस्से में तो एक एकड़ से भी कम ज़मीन थी. तालाब और कुओं से सिचाई होती थी और किसी भी किसान के घर साल भर का खाना नहीं पूरा पड़ता था . पूस और माघ के महीने आम तौर पर भूख से तड़पने के महीने माने जाते थे. जिसके घर पूरा भी पड़ता था उसके यहाँ चने के साग और भात को मुख्य भोजन के रूप में स्वीकार कर लिया गया था. मेरे गांव में कुछ लोग सरकारी नौकरी भी करते थे हालांकि अपने अपने महकमों में सबसे छोटे पद पर ही थे. रेलवे में एक स्टेशन मास्टर ,तहसील में एक लेखपाल और ग्राम सेवक और एक गाँव पंचायत के सेक्रेटरी . तीन चार परिवारों के लोग फौज में सिपाही थे . सरकार में बहुत मामूली नौकरी करने वाले इन लोगों के घर से भूखे सो जाने की बातें नहीं सुनी जाती थीं . बाकी लोग जो खेती पर ही निर्भर थे उनकी हालत खस्ता रहती थी ..उत्तर प्रदेश के अवध इलाके में स्थित अपने गांव के हवाले से हमेशा बात को समझने की कोशिश करने वाले मुझ जैसे इंसान के लिए यह बात हमेशा पहेली बनी रही कि सबसे गरीब लोगों की जमात में खड़ा हुआ मेरे गाँव का राजपूत शोषक क्यों करार दिया जाता रहा है . मेरे गाँव के राजपूत परिवारों में कई ऐसे थे जो पड़ोस के गाँव के कुछ दलित परिवारों से पूस माघ में खाने का अनाज भी उधार लाते थे . लेकिन शोषक वही माने जाते थे. बाद में समझ में आया कि मेरे गाँव के राजपूतों के पिछड़ेपन का सबसे बड़ा कारण शिक्षा की उपेक्षा रही है . जिन घरों के लोग पढ़ लिख गए वे आराम से रहने लगे थे . वरना पिछड़ेपन का आलम तो यह है कि २०१० में उत्तर प्रदेश सरकार ने जब सफाईकर्मी भर्ती करने का फैसला किया तो मेरे गाँव के कुछ राजपूत लड़कों ने दरखास्त दिया था. जबकि सफाई कर्मी का काम ग्रामीण राजपूती पहचान के लिए बहुत ही अपमानजनक माना जाता  था. लेकिन गरीबी की मार ऐसी ज़बरदस्त होती  है कि कोई भी अहंकार उसके सामने ज़मींदोज़ हो जाता  है . जब गाँव से बाहर निकल कर देखा तो एक और बात नज़र आई कि हमारे इलाके में जिन परिवारों के लोग ,कलकत्ता,जबलपुर ,अहमदाबाद,सूरत या मुंबई में रहते थे उनके यहाँ सम्पन्नता थी. मेरे गाँव के भी एकाध लोग मुंबई में कमाने गए थे .वे भी काम तो मजूरी का ही करते थे लेकिन मनी आर्डर के सहारे घर के लोग दो जून की रोटी खाते थे . जौनपुर में मेरे ननिहाल के आस पास लगभग  सभी संपन्न राजपूतों के परिवार मुंबई की ही कमाई से आराम का जीवन बिताते थे. २००४ में जब मुझे मुंबई जाकर नौकरी करने का प्रस्ताव आया तो जौनपुर में पैदा हुई मेरी माँ ने खुशी जताई और कहा कि भइया चले जाओ , बम्बई लक्ष्मी का नइहर है . बात समझ में नहीं आई . जब मुंबई में आकर एक अधेड़ पत्रकार के रूप में अपने आपको संगठित करने की कोशिश शुरू की तो देखा कि यहाँ बहुत सारे सम्पन्न राजपूत रहते हैं . देश के सभी अरबपति ठाकुरों की लिस्ट बनायी जाय तो पता लगेगा कि सबसे ज्यादा संख्या मुंबई में ही है . दिलचस्प बात यह है कि इनमें ज्यादातर लोगों के गाँव तत्कालीन बनारस और गोरखपुर कमिश्नरियों में ही हैं .कभी इस मसले पर गौर नहीं किया था. २०१२ में मुंबई यात्रा के दौरान कांदिवली के ठाकुर विलेज में एक कालेज के समारोह में जाने का मौक़ा मिला . वहां राष्ट्रीय राजपूत संघ के तत्वावधान में उन बच्चों के सम्मान में एक कार्यक्रम आयोजित किया गया था जिनको २०११ की परीक्षाओं में बहुत अच्छे नंबर मिले थे. बहुत बड़ी संख्या में ७० प्रतिशत से ज्यादा नंबर पाने वाले बच्चों की लाइन लगी हुई थी और राजपूत समाज के ही सफल,संपन्न और वारिष्ठ लोगों के हाथों बच्चों को सम्मानित किया जा रहा था. उस सभा में मुंबई में राजपूतों के सबसे आदरणीय और संपन्न लोग मौजूद थे.उस कार्यक्रम में जो भाषण दिए गए उनसे मेरी समझ में आया कि माजरा क्या है . मुम्बई में आने वाले शुरुआती राजपूतों ने देखा कि मुंबई में काम करने के अवसर खूब हैं . उन्होंने बिना किसी संकोच के हर वह काम शुरू कर दिया जिसमें मेहनत की अधिकतम कीमत मिल सकती थी. और मेहनत की इज्ज़त थी .शुरुआत में तबेले का काम करने वाले यह लोग अपने समाज के अगुवा साबित हुए. उन दिनों माहिम तक सिमटी मुंबई के लोगों को दूध पंहुचाने काम इन लोगों ने हाथ में ले लिया . जो भी गाँव जवार से आया सबको इसी काम में लगाते गए. आज उन्हीं शुरुआती उद्यमियों के वंशज मुंबई की सम्पन्नता में महत्वपूर्ण हस्ताक्षर है . साठ और सत्तर के दशक में जो लोग मुंबई किसी मामूली नौकरी की तलाश में आये ,उन्होंने भी सही वक़्त पर अवसर को पकड़ा और अपनी दिशा में बुलंदियों की तरफ आगे चल पड़े,. आज शिक्षा का ज़माना है . बारम्बार कहा जा रहा  है कि भारत को शिक्षा के एक केंद्र के रूप में विकसित किया जाएगा. मुंबई के राजपूत नेताओं ने इस बयान के आतंरिक तत्व को पहचान लिया और आज उत्तर प्रदेश से आने वाले राजपूतों ने शिक्षा के काम में अपनी उद्यमिता को केन्द्रित कर रखा है .उत्तरी मुंबई में कांदिवली के ठाकुर ग्रुप आफ इंस्टीट्यूशनस की गिनती भारत के शीर्ष समूहों में होती है . इसके अलावा भी बहुत सारे ऐसे राजपूत नेताओं को मैं जानता हूँ जिन्होंने शिक्षा को अपने उद्योग के केंद्र में रखने का फैसला कर लिया है . लगता है कि अब यह लोग शिक्षा के माध्यम से उद्यम के क्षेत्र में भी सफलता हासिल करेगें और आने वाली पीढ़ियों को भी आगे ले जायेगें .फिर सवाल वहीं आकर बैठ जाता है कि श्री राजपूत करणी सेना के नेता लोग क्या  राजपूत लड़कों को अगले किसी काल्पनिक संघर्ष में फंसाने के लिए तैयार करेंगे  या उनके लिये उद्यमिता  के विकल्पों पर  विचार करने का अवसर उपलब्ध करायेंगें . मुंबई का जो उदाहरण दिया  गया  है उसमें कहीं भी किसी सरकार की कोई भूमिका नहीं है . अगर इन नौजवानों को सरकार से मिलने वाले  किसी लालीपाप का लालच देकर अपने की चंगुल में फंसाए रखना उद्देश्य है तो उसमें दीर्घकालिक सफलता नहीं मिलेगी लेकिन अगर इतने बड़े पैमाने पर मोबिलाइज़ किये गए बेरोजगार नौजवानों की ज़िंदगी में कुछ  अच्छा करने की कोशिश की जाए तो समाज का भला होगा .

मानव संसाधन विकास मंत्रालय में जूनियर मंत्री सत्यपाल सिंह टिके रहने पर सवालिया निशान

जंतर-मंतर - Fri, 26/01/2018 - 08:49


शेष नारायण सिंह
बीजेपी के  टिकट पर बागपत से चुनाव जीतकर आये पूर्व पुलिस अफसर सत्यपाल सिंह केंद्र सरकार में जूनियर मंत्री हो गए और उनको महत्वपूर्ण शिक्षा विभाग में कैबिनेट मंत्री प्रकाश जावडेकर के अधीन काम करने का मौक़ा भी मिल गया . लेकिन वे भूल गए कि उनको कुछ भी कह देने का अधिकार नहीं मिल गया है . अपनी धुन में आई आई टी गौहाटी में बोल गए कि मनुष्य के विकास का डार्विन का सिद्धांत वैज्ञानिक  नहीं है . उन्होंने  दावा किया कि डार्विन गलत थे, किसी ने बंदर को इंसान में बदलते नहीं देखा। मानव विकास संबंधी चार्ल्स डार्विन के विकासवाद के सिद्धांत वैज्ञानिक तौर पर गलत है।उन्होंने स्कूल और कॉलेज के पाठ्यक्रम में इसमें बदलाव की भी हिमायत  कर डाली . डार्विन के सिद्धांत पर सत्यपाल सिंह ने कहा कि जब से इस धरती पर इंसान आया है, तब से वह मानव रूप में ही है। यानी इंसान मानव के रूप में ही इस धरती पर आया है. उन्होंने और भी ज्ञान बघारा कि उनके किसी भी पूर्वज ने कभी भी किसी बंदर को इंसान बनते नहीं देखा . उन्होंने साथ साथ यह भी घोषणा कर दी कि सरकार एक  सेमीनार बुलाकर डार्विन के सिद्धांत की कमियों को उजागर करेगी. हो सकता है कि इस तरह के बयान  सत्यपाल सिंह पहले भी देते रहे हों . ज़ाहिर है उनको किसी ने गंभीरता से नहीं लिया होगा / लेकिन जब इस बार उन्होंने स्कूलों में पाठ्यक्रम बदलने की बात कर दी तो सरकार को  चिंता हो गयी और उनके बॉस प्रकाश जावडेकर ने उनको डांट दिया कि इस तरह के उल जलूल बयान न दिया करें . सत्यपाल सिंह के  बयान के बाद बीजेपी और सरकार के लिए मुश्किल बढ़ गयी थी. दुनिया भर में मजाक उड़ाया जा रहा  था . शायद इसी नुक्सान को कंट्रोल करने के लिए केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावडेकर ने अपने जूनियर मंत्री के बयान  पर सख्त हिदायत दी और कहा कि उनको ऐसे बयान देने से बाज़ आना चाहिए .  जावडेकर ने यह भी कहा कि डार्विन के सिद्धांत को गलत साबित करने के लिए किसी भी सेमिनार के  आयोजन की बात भी गलत  है . सरकार की  ऐसी कोई योजना नहीं है . सरकार की तरफ से ऐसे किसी भी आयोजन के लिए न तो कोई धन दिया जाएगा और न ही सरकार किसी भी सेमीनार का आयोजन करेगी .राज्यमंत्री सत्यपाल सिंह के बयान पर वैज्ञानिकों में भी तीखी प्रतिक्रिया हुई थी .देश  भर के  करीब  दो हज़ार वैज्ञानिकों ने केंद्र सरकार को एक ज्ञापन दिया जिसमें लिखा है कि ," यह कहना गलत है कि  डार्विन के विकास के सिद्धांत को वैज्ञानिकों ने रिजेक्ट कर दिया है .इसके विपरीत सच्चाई यह  है कि हर नई खोज डार्विन के सिद्धान्त को और मजबूती देती है .इस बात के बहुत सारे अकाट्य सबूत हैं कि बंदरों और मनुष्यों के पूर्वज एक ही थे. " इस ज्ञापन पर हस्ताक्षर करने वालों में  देश के सबसे  महान संस्थानों के वैज्ञानिक शामिल हैं . टाटा  इंस्टीट्यूट आफ फंडामेंटल रिसर्च, मुंबई, नैशनल सेंटर फार रेडियो एस्ट्रोफिजिक्स ,पुणे, नैशनल सेंटर फार सेलुलर एंड मालिकुलर बायोलाजी ,हैदराबाद जैसे संस्थानों के वैज्ञानिकों के सत्यपाल सिंह के बयान से असहमति  जताई और नाराज़गी भी ज़ाहिर की .अपने बॉस की परेशानी की चिंता किये  बगैर सत्यपाल सिंह अभी भी अपने बयान पर कायम हैं और कहते पाए गए हैं कि डार्विन का विकास का सिद्धांत वैज्ञानिक नहीं है . अब यह देखना दिलचस्प होगा कि अपनी इस जिद के बाद सत्यपाल सिंह कब  तक मंत्रिमंडल में टिके रह पायेगें . दिल्ली के सत्ता के गलियारों में तो यह   पक्का ही माना जा  रहा है कि उनका प्रकाश जावडेकर के मंत्रालय में काम कार पाना तो असंभव ही हो गया है . हाँ यह संभव है कि किसी अन्य विभाग में कोई काम देकर उनको मंत्री बना रहने दिया जाए 

१९८४ में सिखों के संहार के दिन दिल्ली में इंसानी मूल्यों की भी हत्या हुयी थी .

जंतर-मंतर - Fri, 26/01/2018 - 08:48


शेष नारायण सिंह
३१ अक्टूबर १९८४ के सिखों के नर संहार से सम्बंधित जांच को दोबारा खोले जाने की मांग को सुप्रीम कोर्ट ने आंशिक मंजूरी दे दी  है. करीब पौने दो सौ मामलों की फिर से जांच की जायेगी . वह दिन मेरी स्मृति में एक खौफनाक दिन के रूप में दर्ज है . ३१ अक्टूबर को सुबह अखबार देख रहां था कि मेरे दोस्त राम चन्द्र सिंह का फोन आया कि इंदिरा जी को किसी ने गोली मार दी हैं . जिंदा हैं  और आल इण्डिया मेडिकल इंस्टीटयूट  ले जाई गयी हैं .  इसके पांच महीने पहले आपरेशन ब्ल्यू स्टार हो चुका था.  पंजाब में आतंकवाद शिखर पर था . तुरंत शक हो गया कि  कोई खालिस्तानी आतंकवादी होगा. उन दिनों हम सफदरजंग इन्क्लेव में किराए के मकान में रहते थे. मैं १० मिनट के अन्दर आल इण्डिया मेडिकल इंस्टीटयूट अस्पताल के इमरजेंसी में हाज़िर . सीधे अन्दर चले गए. बहुत कम लोग थे .अरुण नेहरु आये, गौतम कौल आये. फिर मंत्री नेता आने लगे. उस इलाके में कांग्रेस के सबसे बड़े दादा अर्जुनदास हुआ करते थे. मैं जानता था उनको. उनका चेला गोस्वामी आया . उसने अरुण नेहरू को किसी से बात करते सुन लिया था . उसने ही बताया कि मैडम की मौत हो चुकी है लेकिन अभी पब्लिक को बताया नहीं जाएगा.करीब ४५ मिनट बाद ओ टी के बाहर जमा फालतू लोगों को भगा दिया गया . हम बाहर आ गए. बाहर बहुत सारे कांग्रेसी जमा थे. जगदीश  टाइटलर, सज्जन कुमार , ललित माकन , अर्जुन दास , एच के एल भगत, धर्मदास शास्त्री  सब अन्दर बाहर हो रहे थे. आल इण्डिया मेडिकल इंस्टीटयूट का चौराहा उन दिनों इतनी भीड़ वाला इलाका नहीं था लेकिन ११ बजे तक बहुत ज़्यादा लोगों की भीड़ जमा हो चुकी थी. तरह तरह के कयास चल रहे  थे . लेकिन किसी को नहीं मालूम था कि इंदिरा गांधी की मौत हो चुकी थी . हम भीड़ के बीच में घूमते रहे. करीब २ बजे अर्जुनदास बाहर आये  और अपने लोगों को कुछ समझाने लगे.  मिंटो रोड इलाके का एक  कांग्रेसी रमेश दत्ता भी वहीं अपने चेलों के साथ जमा  हुआ था . रमेश दत्ता की खासियत यह थी कि अगर किसी कांग्रेसी नेता के यहाँ कहीं भी कोई भी खुशी का माहौल होता तो वह ढोल बजाने वालों को लेकर वहां पंहुंच जाता. उसने एक संस्था नेहरू ब्रिगेड बना रखी  थी. अगर कहीं दुःख का माहौल होता तो वह रोने वालों को लेकर पंहुंच जाता . यहाँ  भी वह अपने रोने वालों के साथ आया था लेकिन सब को चुप करा रखा था क्योंकि  इंदिरा गांधी की मृत्यु की सूचना को अभी घोषित नहीं किया गया था. करीब दो बजे भीड़ में हरकत शुरू हुयी और ज़्यादातर लोग कहने लगे कि प्रधानमंत्री अब  जीवित नहीं हैं . इस बीच बीबीसी रेडियो पर उनकी मृत्यु की खबर आ चुकी थी. बीबीसी संवाददाता सतीश जैकब ने  इंदिरा जी की लाश देख ली थी और बीबीसी बहुत ही भरोसे के साथ खबर चला रहा था. अब तक सबको पता चल चुका था कि इंदिरा  गांधी की सुरक्षा में तैनात सिख पुलिसकर्मियों ने  ही उनको मारा था. लेकिन अस्पताल के बाहर जुटी भीड़ में सिखों की संख्या भी खासी थी . किसी को इमकान ही  नहीं था कि  अगले चार पांच घंटो के अन्दर सिखों पर कहर बरपा होने वाला है .उन दिनों २४ घंटे का टेलिविज़न होता नहीं था. ताज़ा ख़बरों का मुख्य स्रोत टेलीफोन ही होता था. ब्राउन विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर आशुतोष वार्ष्णेय उन दिनों हमारे घर के पड़ोस में ही रहते थे . वे तब एम आई टी के रोसर्च स्कालर थे , फील्ड स्टडी के लिए दिल्ली में रह रहे थे . एक स्कूटर था उनके पास . उसी स्कूटर से हम लोग  राजनीतिक दिल्ली में घूमते रहे. उन दिनों आकाशवाणी पर छः बजे हिंदी और अंग्रेज़ी समाचारों की बुलेटिन आती थी. पांच मिनट हिंदी में और पांच मिनट अंग्रेज़ी में . उसी बुलेटिन में खबर आ गयी कि  राजीव गांधी को प्रधानमंत्री पद की शपथ  दिला दी गयी है .अब सारे देश को मालूम था कि इंदिरा गांधी की मृत्यु हो चुकी है.करीब साढ़े छः बजे हमने सफदरजंग इन्केल्व और  भीकाजी कामा प्लेस के बीच वाली सड़क पर एक सिख को पिटते देखा . आदत से मजबूर बीच बचाव करने पंहुंचा . उन लोगो ने उस सिख को गाली दी और मुझे बताया कि इसने इंदिरा जी को मार डाला . अब इस तर्क का कोई मतलब नहीं था . भागकर मैं सरोजनी नगर थाने गया . वहां का दरोगा हरमीत सिंह था . यह इमरजेंसी में हौज़ ख़ास का दरोगा रह चुका था. जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय का इलाका उन दिनों हौज़ ख़ास थाने में ही पड़ता था. इन श्रीमानजी ने हमारे कई साथियों को गिरफ्तार किया था. हरमीत सिंह ने बताया कि पूरे इलाके में सिखों को मारा  जा रहा है .फ़ोर्स भेज दी गयी है .  हम वहां से जब वापस लौट रहे थे तो हुमायूं पुर के पास एक सिख को पकड़कर लोग मार रहे थे . देखते ही देखते उसके ऊपर एक बोतल से शायद शराब या पेट्रोल फेंका और उसको जला दिया . मैं अब घबडा गया था .रात हो चुकी थी .हम घर आ गए . समझ में आ गया था कि सब कुछ योजनाबद्ध तरीके से हो रहा है . घर के रास्ते में भी देखा कि कुछ न कुछ  हो रहा  है . सिखों के घर पहचान करके जलाए जा रहे थे .सबके मुंह पर एक ही नाम कि अर्जुन दास के लोग हैं . इंदिराजी की मौत का बदला ले  रहे हैं . मेरे घर से  थोड़ी दूर डी एल टी ए के  सामने बख्शी लिखा हुआ एक बहुत बड़ा मकान था.  उसको जलाने भी कुछ लोग पंहुचे थे लेकिन सुरक्षा वालों ने भगा दिया . शायद बाद में जला दिया क्योंकि जब हम सुबह उधर से निकले तो घर जल रहा था . हमने देखा कि उन दिनों सिखों के बारे में ज़्यादातर गैर सिख लोगों में अजीब बातें होती थीं. सिख आम तौर पर मेहनती और संपन्न होते थे लेकिन उन दिनों  उनको खालिस्तानियों के हमदर्द के रूप में देखा जाता था. एक अजीब बात यह भी थी कि मेरे मोहल्ले में ज्यादातर लोग सिखों के घरों के जलने से खुश थे . बहरहाल , सुबह मैं और आशुतोष स्कूटर पर बैठकर लाजपत नगर के विक्रम होटल के पीछे लाजपत भवन पंहुचे . वहां सर्वेन्ट्स आफ इण्डिया सोसाइटी के दफ्तर में रोमेश थापर, कुलदीप नय्यर , धर्मा कुमार , आई आई टी के प्रोफ़ेसर दिनेश मोहन ,जस्टिस राजिंदर सच्चर आदि सिख पीड़ितों को मदद पंहुचाने के काम में लगे हुए थे .पता लगा कि  जमुनापार त्रिलोक पुरी में बहुत बड़े पैमाने पर क़त्लो गारद हो रहा  है . एक टेम्पो पर कुछ राहत सामग्री रखी गयी . उसी में कुछ वालंटियर भी बैठे. वहां जाकर देखा कि सिखों के घर एक ही गली में एक तरफ हैं . कुछ घर जल चुके थे. कुछ घरों  में से  धीरे धीरे धुंआ निकल रहा था.घर भी क्या , बहुत छोटे छोटे दड़बानुमा  मकान .  वहां भी मोहल्ले के लोगों में पीड़ित लोगों के प्रति कोई ख़ास आत्मीयता नहीं थी. हमारे साथ जो सीनियर लोग थे उन्होंने  लूटमार कर रहे लोगों से बात करने की कोशिश की लेकिन ठग जैसे दिख रहे बदमाशों ने सब को डांट दिया. सड़क पर एक बुज़ुर्ग मिल  गए उन्होंने बताया कि इन लोगों को अगर रोकना है तो  केंद्रीय मंत्री एच के एल  भागत से बात करो. यह सब उनके ही आदमी हैं . यह इलाका पूर्वी दिल्ली संसदीय क्षेत्र में पड़ता है और वहां के एम पी उन दिनों भगत जी ही थे. उसके बाद क्या हुआ मुझे नहीं मालूम . एक स्कूल में पुलिस की सुरक्षा में छुपे हुए लोगों तक हमारे टेम्पो में गए लोग सहायता के लिए  लाये कपडे  , ब्रेड , दूध, दवाइयां आदि देकर बाहर आ गए.  पता लगा कि कीर्ति नगर में सबसे ज़्यादा नुक्सान हुआ है . जमुनापार से  कीर्तिनगर के रास्ते में हमने देखा  कि जनपथ होटल के पास वाले  टैक्सी स्टैंड पर  खड़ी सभी गाड़ियां जल गयी हैं . पूछने पर पता  लगा कि टैक्सी स्टैंड का लाइसेंस किसी सिख के पास था. सबसे हैरान कर देने वाला सीन रीगल बिल्डिंग में देखा.  ऊनी कपडे बनाने वाली किसी बड़ी कम्पनी की दुकान थी , वह जला दी गयी थी. लेकिन उसी बिल्डिंग में उसी कंपनी की एक दूसरी दुकान थी , उसमें कुछ नहीं हुआ था. पता लगा कि उसी दुकान वाले ने दूसरी दुकान जलवाई थी ,दूसरी दूकान का मालिक सिख था  और उनमें आपसी दुश्मनी थी.पूरे शहर में दिन भर घूमते रहे . एक बात जो सबसे ज्यादा परेशानी पैदा कर रही थी , वह यह थी कि पुलिस कहीं भी किसी को रोक नहीं रही थी. जितनी दुकाने जला सको ,जलाओ . दूसरी बात जो हैरानी पैदा कर रही थी वह यह कि कांग्रेसी नेता इसको एक ज़रूरी काम बता रहे थे . आर एस एस वालों ने भी कहीं भी किसी को रोकने का काम नहीं किया . दिल्ली में बाद में चाहे जो हुआ हो लेकिन उस वक़्त आम तौर पर दिल्ली शहर में गैर सिख लोग इससे खुश थे . इंदिरा गांधी की मृत्यु  के बाद जो चुनाव हुआ , उसमें तो लगभग सभी पार्टियों का सफाया  हो  गया था . १९८४-८५ के लोक  सभा चुनाव में दिल्ली में कांग्रेस के अलावा अन्य पार्टियों का पूरी तरह से  सफाया हो गया . सिखों पर हुए अत्याचार को इंदिरा गांधी की उस छवि से जोड़कर देखा जा रहा था जिसके तहत वे  हिन्दुओं की पक्षधर के रूप में अपनी ख्याति बना चुकी थीं. शायद इसलिए दिल्ली के शहरी हिन्दुओं में सिखों के क़त्ले आम की वह निंदा नहीं हुयी जो होनी चाहिए थी. लोग  बेपरवाह थे .यह वही आबादी थी जिसने आपरेशन ब्ल्यू स्टार के तहत हुए अमृतसर में सेना के काम को सही ठहराया था और जरनैल सिंह भिंडरावाले से नफरत करते थे.
दिल्ली शहर में नवम्बर १९८४ में पीड़ित सिखों के साथ वही लोग खड़े थे जिनको आम तौर पर लिबरल  बुद्धिजीवी माना जाता  है . यह अलग बात  है बाद में सत्तासीन सभी वर्गों ने उनको सम्मान  से नहीं देखा  . कांग्रेस नेताओं ने लिबरल बुद्धिजीवियों को अपना दुश्मन माना . सत्ताधारी वर्गों ने सज्जन कुमार, लालित माकन, एच के एल भगत ,अर्जुन दास आदि  को ही सही माना . लिबरल पत्रकारों और बुद्धिजीवियों ने राजीव राजीव गांधी की घोर निंदा की थी क्योंकि उन्होंने कह दिया था  कि जब कोई बड़ा पेड़ गिरता है तो कुछ प्रतिक्रिया तो होती ही है.  बाद में सिख वोटों के चक्कर में बहुत सारे लोग १९८४ के निंदक बन गए लेकिन उस वक़्त यही लिबरल लोग ही नज़र आते थे. यह वही लोग हैं  जो देश पर आये हर नैतिक संकट में न्याय के साथ खड़े होते हैं लेकिन हर दौर का शासक वर्ग इनको अपना दुश्मन मानता है .आज भी यही लिबरल लोग सत्ताधीशों की नफरत का शिकार बन रहे हैं . उनको कम्युनिस्ट कहकर गाली दी जाती है . इनकी संख्या भी धीरे धीरे कम हो रही है . जो हैं भी वे सत्ता के आतंक से डर के मारे चुप रहते हैं . देश के बड़े शिक्षा केन्द्रों पर एक तरह के लोगों का क़ब्ज़ा हो रहा है. ज़ाहिर है सोच विचार पर भी इसका असर पडेगा लेकिन यह दुआ तो की ही जा सकती है कि फिर किसी पर  वैसा कहर न टूटे जैसा दिल्ली के सिखों पर नवम्बर १९८४ में बरपा हुआ था .

निकोला टेस्ला की अनोखी दास्ता : रिचर्ड गुंडरमैन

लेखक मंच - Tue, 23/01/2018 - 02:21

जरा बताइये तो नीचे लिखे आंकड़े इन वैज्ञानिकों में से किस पर सबसे ज्यादा फिट बैठते हैं- अलबर्ट आइन्स्टाइन, थॉमस एडिसन, गुग्लिएल्मो मार्कोनी, अल्फ्रेड नोबेल और निकोला टेस्ला:

— वह आठ भाषाएं बोल लेता था।

— उसने लंबी दूरी के बीच संचार की बेतार तकनीक खोज निकाली।

— उसने एसी करेंट से चलने वाली पहली मोटर इजाद की।

— करीब 300 पेटेंट उसके नाम हैं।

— ऐसा ‘महा हथियार’ खोज निकालने का दावा किया जो सारे युद्धों का अंत कर देगा।

ये सारे तथ्य यकीनन टेस्ला के नाम की तस्दीक करते हैं। हैरान हैं न? ज्यादातर लोगों ने उसका नाम भर सुना होगा, मगर बहुत थोड़े लोगों को आधुनिक विज्ञान व टेक्नोलॉजी की दुनिया में टेस्ला के मुकाम का अंदाजा होगा।

इस वर्ष 7 जनवरी को टेस्ला की 75वीं पुण्यतिथि थी। यह मौका है कि हम ख़ाक से उठकर दुनिया पर छा जाने वाले इस वैज्ञानिक की ज़िन्दगी पर एक नज़र डालें। वह जीवन भर खोजों को समर्पित रहा और उसे एक शो-मैन जैसी शोहरत नसीब हुई। न जाने कितनी हसीनाएं उस पर मरती थीं, लेकिन कोई उसकी जीवन संगिनी न बन सकी। आम ज़िन्दगी को बदल डालने वाले न जाने कितने आविष्कारों से उसके बेशुमार दौलत कमाई, लेकिन अंततः कौड़ी-कौड़ी का मोहताज़ होकर इस दुनिया से रुख़सत हुआ।

शुरुआती जीवन

टेस्ला का जन्म 1856 की गर्मियों की एक तूफानी रात को सर्बिया में हुआ था। कहते हैं उसकी पैदाइश के वक्त इस कदर बिजलियां कड़क रही थीं कि दाई को कहना पड़ा, “यह बच्चा आगे चलकर तूफ़ान पैदा करेगा।” मगर उसकी मां ने कुछ और भविष्यवाणी की, “बिलकुल नहीं! देखना एक दिन वह उजाले का दूत बनेगा।”

एक विद्यार्थी के रूप में टेस्ला को गणित में ऐसी महारत हासिल थी कि उसके शिक्षकों को भरोसा नहीं होता और वे उस पर नक़ल करने का दोष मढ़ देते थे। अपनी किशोरावस्था में एक बार टेस्ला गंभीर रूप से बीमार पड़ गया और तभी ठीक हुआ जब उसके पिता ने पादरी बनाने की अपनी इच्छा को तिलांजलि देकर उसे मनमुताबिक़ इंजीनियरिंग पढ़ने की इजाज़त दी।

बेहतरीन छात्र होने के बावजूद टेस्ला ने आधे में ही पॉलीटेक्नीक स्कूल छोड़ दिया और कॉन्टिनेंटल एडिसन कंपनी में नौकरी पकड़ ली। यहां उन्होंने बिजली के प्रकाश और मोटरों पर ध्यान देना शुरू किया। मशहूर आविष्कारक एडिसन से मिलने की चाह में टेस्ला 1884 में अमेरिका चले आये। बाद में टेस्ला ने दावा किया कि एडिसन की कंपनी ने इंजीनियरिंग सम्बंधी कई अड़चनों को सुलझाने के एवज में उन्हें 50,000 अमेरिकी डॉलर के इनाम की पेशकश की थी। उन्होंने सारी अड़चनें दूर कीं, लेकिन टेस्ला के मुताबिक़ उन्हें कहा गया कि इनाम की बात तो एक मज़ाक थी। अलबत्ता छः महीने बाद टेस्ला ने कम्पनी छोड़ दी।

इसके बाद टेस्ला ने दो उद्योगपतियों से साझेदारी की और टेस्ला इलेक्ट्रिक लाइट एंड मेन्युफेक्चारिंग कंपनी की स्थापना की। अपने कई पेटेंट उन्होंने कम्पनी के नाम कर दिए। बाद में उनके साझेदारों ने सिर्फ बिजली उत्पादन तक सीमित रहने का फैसला किया और कम्पनी की बौद्धिक संपदा के सारे अधिकार हड़पकर एक दूसरी कम्पनी खड़ी कर ली1 टेस्ला दोबारा ठन-ठन गोपाल होकर सड़क पर आ गए।

टेस्ला लिखते हैं कि यह वो दौर था जब पेट भरने के लिए उन्हें 2 डॉलर रोजाना की दिहाड़ी पर गड्ढे खोदने का काम करना पड़ता था। यह बात उन्हें बेहद तकलीफ़ देती थी कि उनके जैसी प्रतिभा इस कदर गड्ढे खोदने में नष्ट हो रही है।

अन्वेषक के रूप में सफलता

1887 में टेस्ला दो अन्य खोजियों से मिले और उन्होंने टेस्ला इलेक्ट्रिक कंपनी को खड़ा करने में मदद के लिए सहमति जताई। टेस्ला ने मैनहट्टन में अपनी प्रयोगशाला स्थापित की और यहीं उन्होंने उस अनमोल उपकरण का आविष्कार किया जिसे आज हम अल्टरनेटिंग करेंट इंडक्शन मोटर (एसी मोटर) के नाम से जानते हैं। एसी मोटर ने उन तमाम दिक्कतों को दूर कर दिया जो अब तक प्रचलित मोटरों में आती थीं। टेस्ला ने इंजीनियरिंग सम्बंधी एक बैठक में अपनी एसी मोटर का प्रदर्शन किया।  यहीं जानी-मानी वेस्टिंगहाउस कम्पनी ने उनकी मोटर के लाइसेंस के लिए उनसे एक सौदा किया। इस सौदे के मुताबिक़ उनकी मोटर से पैदा होने वाले प्रत्येक हॉर्सपॉवर पर उन्हें एक निश्चित रॉयल्टी देने की पेशकश की गयी।

यह 1880 दशक के अंतिम वर्ष थे और ‘वार ऑफ़ करेंट्स’ अपने चरम पर था। थॉमस एडिसन डीसी करेंट को प्रचारित करने में जुटे थे।उनकी दलील थी कि डीसी करेंट एसी की तुलना में ज्यादा सुरक्षित है। जॉर्ज वेस्टिंगहाउस ने एसी का समर्थन किया, क्योंकि इससे लंबी दूरी तक विद्युत् ऊर्जा भेजी जा सकती थी। क्योंकि दोनों प्रतिस्पर्धी एक-दूसरे से दाम में होड़ कर रहे थे, वेस्टिंगहाउस के सामने वित्तीय संकट पैदा हो गया। उसने टेस्ला को अपनी दिक्कत बताई और उन्हें एकमुश्त राशि पर पेटेंट बेचने का आग्रह किया। टेस्ला सहमत हो गए, यह जानते हुए भी कि वह एक बेशकीमती खज़ाना औने-पौने दाम में बेच रहे हैं।

1893 में शिकागो में मशहूर विश्व कोलंबियन मेले का आयोजन हो रहा था। वेस्टिंगहाउस ने टेस्ला से आग्रह किया कि वह इसकी विद्युत आपूर्ति में उनकी मदद करें; क्योंकि इस बहाने उन्हें एसी करेंट की खूबियों के प्रदर्शन का मौका मिलेगा। टेस्ला ने मेले में इतने बल्ब जलाए जितने पूरे शिकागो शहर में भी नहीं जलते थे। इसके अलावा उन्होंने कई और अजूबों का भी प्रदर्शन किया, जैसे- बिना तार के विद्युत् प्रवाहित कर बल्ब जलाना। बाद में टेस्ला ने नियाग्रा प्रपात में विद्युत् उत्पादन का ठेका हासिल करने में भी वेस्टिंगहाउस की मदद की। यह दुनिया का पहला बड़ा एसी बिजलीघर था।

रास्ते की चुनौतियां

टेस्ला की राह में चुनौतियां भी कम नहीं आईं. 1895 में उनकी मैनहट्टन प्रयोगशाला अग्निकांड से तबाह हो गयी। उनके सारे नोट्स और नमूने भी आग में भस्मीभूत हो गए। 1998 में उन्होंने मेडिसन स्क्वायर गार्डन में एक नाव के वायरलेस कण्ट्रोल का प्रदर्शन किया। उस ज़माने के हिसाब से यह एक तरह का स्टंट था, जिसे कई लोगों ने तब फर्जी माना। जल्दी ही टेस्ला ने अपना ध्यान वायरलेस विद्युत् स्थानांतरण पर केन्द्रित किया। उन्हें भरोसा था कि उनकी इस तरकीब से न केवल पूरी दुनिया में बिजली भेजी जा सकेगी बल्कि बेतार संचार प्रणाली भी उपलब्ध हो सकेगी।

अपने इस विचार को अंजाम देने के लिए टेस्ला ने कोलोराडो स्प्रिंग्स नाम की एक कंपनी बनाई। यहां एक बार उन्होंने इतनी बिजली खर्च कर डाली कि पूरे इलाके की बत्ती गुल हो गयी। उन्होंने ऐसे संकेतों को ग्रहण करने के भी दावे किये जो उनके मुताबिक़ किसी बाहरी ग्रह से आए थे। 1901 में टेस्ला लॉन्ग आईलेंड नाम की जगह में एक ऐसे टावर की स्थापना के लिए जे.पी. मॉर्गन को पटाने में कामयाब हो गए, जो उनके मुताबिक़ पूरी दुनिया की बिजली आपूर्ति करने में सक्षम होता। मगर टेस्ला अपने मकसद में कामयाब नहीं हो सके और मॉर्गन ने भी जल्दी ही इस योजना से अपने हाथ खींच लिए।

1909 में मार्कोनी को रेडिओ की खोज के लिए नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया। 1915 में टेस्ला ने मार्कोनी पर उनके पेटेंट चुराने का आरोप लगाते हुए मुकदमा ठोक दिया, जिसमें वह हार गए। इसी वर्ष एडिसन और टेस्ला को नोबेल दिए जाने की भी अफवाह उड़ी, लेकिन ऐसा हुआ नहीं। कहा जाता है कि इन दोनों हस्तियों के बीच तीखे मन-मुटाव की वजह से वे नोबेल से वंचित रह गए। बावजूद इसके टेस्ला को ढेरों सम्मान और पुरस्कार मिले, जिनमें दुर्भाग्यवश अमेरिकन इंस्टीटयूट ऑफ़ इलेक्ट्रिकल इंजीनियर्स का एडिसन मैडल भी शामिल था।

एकाकी इंसान

टेस्ला एक शानदार व्यक्तित्व के मालिक थे। वह कहा करते थे कि उनकी याददाश्त फोटोग्राफिक है, जिसकी वजह से वह पूरी किताब को देखकर याद कर लेते हैं और आठ भाषाएं बोल सकते हैं। वह यह भी कहा करते थे कि उनके ज्यादातर आइडिया उन्हें अचानक कौंधे और वह अपनी खोजों के विस्तृत डाइग्राम या उनका नमूना बनाने से पहले ही अपने दिमाग में उकेर लेते हैं। यही वजह थी कि उन्होंने अपनी ज्यादातर खोजों के शुरूआती रेखाचित्र या खाके कभी कागज़ पर नहीं उतारे।

छः फीट दो इंच लम्बे और ख़ूबसूरत टेस्ला महिलाओं के बीच भी बेहद लोकप्रिय थे, मगर उनकी किस्मत में बीवी नहीं थी। वह कहते थे कि ब्रह्मचर्य ने उनकी रचनात्मकता में महत्वपूर्ण योगदान दिया। शायद किशोरावस्था की खतरनाक बीमारी की वजह से उन्हें जवाहरात से डर लगता था और वे साफ़-सफाई को लेकर सनक की हद तक सजग रहते थे। यहां तक कि उन्हें इनके नज़दीक जाने में भी हिचक होती थी। कई चीज़ों से उन्हें बहुत डर लगता था, जैसे मोतियों आदि से। इस कारण वे जवाहरात पहनने वाली महिलाओं से दूरी बनाकर रखते थे।

टेस्ला का मानना था कि उनके सबसे अच्छे आइडिया उन्हें अकेले में मिले। हालांकि वे स्वभाव से एकांतवासी नहीं थे और अपने समय की अनके मशहूर हस्तियों के साथ उनके दोस्ताना रिश्ते रहे। दोस्तों के लिए वे रात्रि भोज आयोजित करते थे। प्रख्यात साहित्यकार मार्क ट्वेन अक्सर उनकी प्रयोगशाला में आते थे और उनकी खोजों का प्रचार करते थे। टेस्ला केवल अन्वेषक के तौर पर ही मशहूर नहीं थे, बल्कि लोग उन्हें दार्शनिक, कवि और विशेषज्ञ भी मानते थे। उनके 75वें जन्मदिन पर आइन्स्टाइन ने उन्हें बधाई पत्र भेजा और जानी-मानी पत्रिका ‘टाइम’ ने अपने मुखपृष्ठ पर उनकी तस्वीर छापी।

टेस्ला के अंतिम वर्ष

लोक मानस में टेस्ला की छवि एक पागल वैज्ञानिक की है। उनके कुछेक दावों ने शायद ऐसी छवि बनाने में मदद पहुंचाई हो। वे एक ऐसी मोटर बना लेने का दावा करते थे जो कॉस्मिक किरणों से चलती है या वह एक नई आइन्स्टाइनेत्तर भौतिकी पर काम कर रहे हैं, जो ऊर्जा के एक बिलकुल नए प्रकार को जन्म देगी। इसी तरह एक बार उन्होंने कहा कि उन्होंने विचारों की तस्वीर उतारने वाली तकनीक ईजाद की है या उन्होंने एक ऐसी किरण की खोज की है, जिसे मृत्यु किरण या शान्ति किरण के रूप में अदल-बदलकर इस्तेमाल किया जा सकता है और यह नोबेल के विस्फोटक से भी ज्यादा खतरनाक है।

उनकी जमा-पूंजी कब की खत्म हो चुकी थी। टेस्ला ने अपने आखिरी वर्ष एक जगह से दूसरी जगह भटकते हुए गुज़ारे। आखिरकार वे न्यूयॉर्क के एक होटल में रहने लगे जिसका किराया वेस्टिंगहाउस चुकाया करता था। वे अक्सर नज़दीकी पार्क में अकेले टहलते हुए दिखाई देते थे जहां वे कबूतरों को दाना खिलाते थे। कबूतरों से उन्हें बड़ा लगाव था। 7 जनवरी 1943 को 86 वर्ष की उम्र में होटल की एक परिचारिका ने सुबह-सुबह उन्हें कमरे में मरा हुआ पाया।

टेस्ला का नाम आज भी अक्सर सुनाई देता है। बेलग्रेड हवाईअड्डे का नामकरण उन्हीं पर किया गया है। इसी तरह दुनिया की सबसे मशहूर विद्युत् चालित कार भी।  एमआरआई स्कैनर की क्षमता को टेस्ला इकाई में नापा जाता है। सच कहें तो टेस्ला असल जीवन में पौराणिक ग्रीन योद्धा प्रोमथीउस जैसे थे, जिसने मानव जाति के लिए आग के इंतजाम की खातिर स्वर्ग पर धावा बोला था और सज़ा के बतौर उसे एक चट्टान से बाँध दिया गया जहां हर रोज एक चील उसका कलेजा नोचने आती थी। टेस्ला ने भी धरती पर उजाला लाने के लिए आसमान जितनी ऊचाइयां चढ़ीं, लेकिन अपनी दुर्लभ मनोवृत्ति और असामान्य आदतों के कारण अंततः उनका पराभव हुआ और कौड़ी-कौड़ी के मोहताज होकर एकाकीपन में वह इस दुनिया से विदा हुए।

(अनुवाद: आशुतोष उपाध्याय)

Smithsonian magazine से साभार

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शशिकांत - Mon, 22/01/2018 - 14:49
किताब : कंप्यूटर और हिंदी भाषा (दिल्ली वि.वि. के C.B.C.S.  के अंतर्गत  बी.ए. हिंदी (ऑनर्स) द्वितीय वर्ष/बीए. प्रोग्राम, द्वितीय वर्ष, सेमेस्टर -  III/IV के विद्यार्थियों के लिए  हिंदी कौशल संवर्धक ऐच्छिक पाठ्यक्रम (HSEC)  की  किताब.) लेखक : डॉ शशि कुमार 'शशिकांत', मोतीलाल नेहरु कॉलेज, दिल्ली वि.वि., दिल्ली, भारत. 

शुक्रिया एन डी टी वी , आपने मुझे नौकरी से निकाल दिया था .

जंतर-मंतर - Mon, 22/01/2018 - 07:32

शेष नारायण सिंह 
आजकल एन डी टी वी से नौकरी से हटाये गए लोगों के बारे में चर्चा है . खबर है कि कंपनी की हालत खस्ता है .करीब पंद्रह साल पहले हम भी एन डी टी वी से हटाये गए थे .जब हम हटाये गए थे तो पैसे की कमी नहीं थी. खूब पैसा था . वहां खूब विस्तार हो रहा था, स्टार न्यूज़ से समझौता ख़त्म हो गया था और नए चैनल शुरू हो रहे थे. रोज़ ही दस पांच लोग भर्ती हो रहे थे, लेकिन हमको अलविदा कह दिया गया था . मेरी बेटी की शादी तय थी ,मैंने निवेदन किया कि तीन महीने बाद शादी है , तब तक पड़ा रहने दीजिये . श्री प्रणय राय ने बात तक नहीं की. हाँ उनकी पत्नी और एन डी टी वी की असली प्रमोटर राधिका रॉय ने मुझे नार्मल से ज़्यादा कई महीने की तनखाह दिलवा दी थी. उस वक़्त समझ में नहीं आया कि क्यों हटाया गया .प्रबंधन के लोग मेरे काम से बहुत खुश थे . जिस दिन हटाया गया उसके ठीक बीस दिन पहले वाहवाही की चिट्ठी मिली थी, तनखाह में बीस प्रतिशत की बढ़ोतरी मिली थी .
बाद में पता चला कि कुछ लोगों को मुझसे निजी तौर पर दिक्क़त थी. हालांकि उन लोगों को अपने आप को मुझसे बड़ा बना लेना चाहिए था. मैं छोटा ही रह जाता लेकिन अब समझ में आ रहा है कि जिन लोगों ने मुझे हटवाया था उनकी क्षमता ही नहीं थी कि अपने को बड़ा कर सकें . नतीजा यह हुआ कि आज वहां बौनों की जमात इकट्ठा है .
शुक्रिया एन डी टी वी के मालिकों की चापलूसी करके रोटी कमाने वाले देवियों और सज्जनों , आपने मुझे वहां की नौकरी से निकलवाया . आपकी कृपा से ही मैंने और रास्ते चुने , फिर से लिखना शुरू किया , उर्दू और हिंदी में खूब छपा , लिखने के कारण ही टेलिविज़न वालों ने अपने पैनल पर बुलाना शुरू किया. आज मन में संतोष है . यह भी संतोष है कि जिन लोगों ने मुझे अपनी असुरक्षा के कारण साज़िश करके बाहर करवाया था ,उनके खिलाफ आजतक कुछ नहीं कहा .आज पहली बार अपने उस अपमान को याद करके दर्द साझा कर रहा हूँ.
अपने बच्चों की शिक्षा के लिए मैं एन डी टी वी के अज्ञानी मूर्खों और मूर्खाओं की मूर्खता को विद्वत्ता कहने के लिए अभिशप्त था ,वे अभी उसी तरह की मूर्खताओं से एन डी टी वी की टी आर पी को रसातल पर ले जा रहे हैं और अपमान की ज़िन्दगी जी रहे हैं . मेरे वही बच्चे अब अपनी अपनी रोटी कमा रहे हैं , उनको अपने माता पिता की वह ज़िंदगी याद है इसलिए वे हमें अपने घर अक्सर बुलाते हैं . उनके बच्चे जब हमको टी वी पर देखते हैं तो उनको खुशी होती है . और हमें खुशी होती है कि हमको एन डी टी वी ने नौकरी से निकाल दिया था . शुक्रिया, न्यूज़ 18इण्डिया, शुक्रिया सी एन बी सी-आवाज़ ,शुक्रिया, एबीपी न्यूज़, शुक्रिया, लोकसभा टीवी , शुक्रिया टाइम्स नाउ , शुक्रिया सैयदेन ज़ैदी ,शुक्रिया न्यूज़ नेशन ,आपने मुझे इस लायक समझा कि मैं आपके पैनल पर आ सकूं ,आपने मुझे इज्ज़त बख्शी और एक नई पहचान और आत्मविश्वास दिया .आपकी वजह से आज मैं सडक चलते पहचाना जाता हूँ.शुक्रिया देश बन्धु,  इन्कलाब, उर्दू सहाफत,उर्दू सहारा रोजनामा ,आपने  काम करने का मौक़ा दिया . 

मन्नत का धागा-पति पत्नी के जोक्स का उल्टा पुल्टा रूप-42

बीवी पति के साथ मंदिर गयी
... और मन्नत का धागा बांधके मन्नत मांगी, फिर हड़बड़ाई और धागा खोल दिया

पति-  क्या हुआ, धागा क्यों खोला ?

पत्नी- मैंने मन्नत मांगी थी कि,आपकी ज़िंदगी की तमाम मुश्किल दूर हो जाएं

... फिर अचानक खयाल आया, कहीं मैं ही न निपट जाऊं

कश्मीर और आतंक- पति पत्नी के जोक्स का उल्टा पुल्टा रूप-41

पति :
शादीशुदा जिंदगी  *कश्मीर* जैसी है  ।

खूबसूरत तो है परंतु *आतंक* बहुत है!!!

जाति का विनाश,सामाजिक बराबरी का लक्ष्य और जिग्नेश मेवानी की राजनीति

जंतर-मंतर - Wed, 17/01/2018 - 13:36


शेष नारायण सिंह
भारत की राजनीतिक यात्रा में शोषित पीड़ित जनता को इज्ज़त की ज़िंदगी देने की बार बार कोशिश होती रही है. देश जातियों के खांचे में  बंटा हुआ है .जाति की संस्था इस देश को हज़ारों वर्षों से अलग अलग सांचों में बांधे हुए है . शुरू में तो वर्ण व्यवस्था थी और उसमें जन्म से जाति को तय करने की बात कहीं नहीं कही गयी थी लेकिन बाद  की सदियों में जन्म से ही जाति का निर्धरण होने लगा .उसके बाद से जाति इंसानी तरक्की के  रास्ते में बाधा बनती रही . करीब आठ सौ साल पहले जब एक आधुनिक धर्म, इस्लाम का भारत में प्रचार प्रसार हुआ तो भी यहाँ जाति का बंधन टूटा नहीं बल्कि इस्लाम अपनाने वाले भी अपनी जातियां साथ लेकर गए . मुसलमानों में भी बहुत सारी  जातियां बन गईं. दुनिया के विद्वानों का मानना  है कि इस्लाम और सिख मजहब  अपेक्षाकृत  नए धर्म हैं इसलिए इनको आधुनिक मान्यताओं को जगह देनी चाहिए थी लेकिन जाति के मसले पर यह नए धर्म  भी  भारतीय समाज की कमजोरियों को साथ लेकर ही चले  , जाति का शिकंजा  हमारे समाज के  विकास और एकजुटता में सबसे बड़ी बाधा बना रहा . जाति की सबसे बड़ी बुराइयों में छुआछूत को माना जाता है . महात्मा  गांधी ने छुआछूत को अपने आन्दोलन के प्रमुख आधारों में एक बनाया . उनके अस्सी साल पहले शुरू हुए प्रयासों को अब आंशिक सफलता मिलने लगी है . उनके समकालीन डॉ बी आर आम्बेडकर ने भी जाति के मुद्दे पर गंभीर चिंतन किया और जाति संस्था के विनाश को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक  विकास की पहली शर्त माना .  लेकिन राजनीतिक धरातल पर कहीं कुछ हुआ नहीं . डॉ  आंबेडकर के नाम पर राजनीति का धंधा करने वालों ने जाति के  विनाश की बात तो दूर उसको संभालकर बनाये रखने में ही सारा ध्यान दिया .  डॉ आंबेडकर के नाम पर वोट मांगने वाले नेताओं ने उनकी राजनीति के सबसे बुनियादी पक्ष का हमेशा विरोध किया. सवर्ण जातियों के विरोध की राजनीति से शुरुआत करके नेता लोग दलित जातियों को एकजुट करके वोट बैंक बना लेते हैं और उसके बाद उसी वोट बैंक की संख्या के आधार पर राजनीतिक सौदेबाजी करने लगते हैं . रिपब्लिकन पार्टी के विभिन्न गुटों, कांशी राम और मायावती की राजनीतिक यात्रा को देखने से तस्वीर साफ़ हो जाती है . आधुनिक राजनीतिक धरातल पर  दलित जाति में जन्मा एक नया राजनीतिक नेता उभर रहा  है . जिग्नेश मेवानी ने गुजरात के ऊना में दलितों पर हुए अत्याचार के बाद राजनीतिक शक्तियों को एकजुट करने का अभियान शुरू किया था. आज देश के राजनीतिक क्षितिज पर जिग्नेश मेवानी को शोषित पीड़ित जातियों की एकजुटता का केंद्र माना जाने  लगा  है . अभी  उत्तराखंड से खबर आई है कि जिग्नेश मेवानी के हल्द्वानी जाने की खबर उड़ गयी थी. जिले की पूरी पुलिस फ़ोर्स उनको तलाशने में जुट गयी . उधर जाने वाली हर गाडी की तलाश होने लगी .   दिल्ली के जन्तर मन्तर पर जिग्नेश की सभा  को तोड़ने के लिये सारी ताक़त लगा दी गयी .  ऐसा लगता है कि जाति की राजनीति को ज़बरदस्त झटका देने की किसी योजना पर काम चल  रहा है. जिस तरह से दलितों के उत्पीडन के केन्द्रों से जिग्नेश मेवानी की लोकप्रियता की ख़बरें आ रही हैं उससे लगता  है कि जाति के विनाश की राजनीति एक बार फिर राजनीतिक विमर्श के केंद्र में आने वाली  है . दलितों के नाम पर राजनीतिक लाभ लेने वाले अन्य नेता तो  जाति को बनाए रखने की ही बात करते हैं   लेकिन जिग्नेश की बातचीत में दूसरी बात निकलकर आ रही है . नैशनल दस्तक  पत्रिका को दिए गए एक इंटरव्यू में जिग्नेश मेवानी ने कहा कि," जाति के विनाश के बिना, वर्ग संघर्ष एक वास्तविक वास्तविकता नहीं बन जाएगा और वर्ग संघर्ष के बिना जाति का विनाश नहीं किया जा सकता है। "  इसका मतलब यह हुआ कि जाति और वर्ण आधारित शोषण का विरोध करने वाली सभी सियासी जमातों को एकजुट करने की कोशिश इस नौजवान नेता की तरफ से की जा रही है . जिससे  जाति के विनाश की संभावना एक बार फिर बनना शुरू हो गयी है .दुनिया भर के आधुनिक राजनीतिक और सामाजिक विचारक  मानते हैं कि जाति भारतीय समाज के विकास में सबसे बड़ी बाधा है . पिछली सदी के सामाजिक और राजनीतिक दर्शन के जानकारों में डा. बी आर आंबेडकर का नाम बहुत ही सम्मान के साथ लिया जाता है। महात्मा गांधी के समकालीन रहे डॉ आंबेडकर  ने अपने दर्शन की बुनियादी सोच का आधार जाति प्रथा के विनाश  को माना था उनको विश्वास था कि जाति के विनाश होने तक न तो राजनीतिक सुधार लाया जा सकता है और न ही आर्थिक सुधार लाया जा सकता है। The Annihilation of caste में डा.अंबेडकर ने बहुत ही साफ शब्दों में कह दिया है कि जब तक जाति प्रथा का विनाश नहीं हो जाता समता, न्याय और भाईचारे की शासन व्यवस्था नहीं कायम हो सकती। जाहिर है कि जाति व्यवस्था का विनाश हर उस आदमी का लक्ष्य होना चाहिए जो अंबेडकर के दर्शन में विश्वास रखता हो। अंबेडकर के जीवन काल में किसी ने नहीं सोचा होगा कि उनके दर्शन को आधार बनाकर राजनीतिक सत्ता हासिल की जा सकती है। लेकिन कांशीराम ने अपनी राजनीति के विकास के लिए अंबेडकर का सहारा लिया और अपनी पार्टी को  उत्तर प्रदेश की सत्ता तक पंहुचाया .लेकिन डॉ अंबेडकर के नाम पर सत्ता का सुख भोगने वाली उनकी पार्टी की सरकार ने बाबासाहेब के सबसे प्रिय सिद्धांत को आगे बढ़ाने के लिए कोई क़दम नहीं उठाया .

कांशी राम और मायावती की  पिछले पचीस वर्षों की राजनीति पर नज़र डालने से समझ में आ जाता है कि उन्होंने जाति प्रथा के विनाश के लिए कोई काम नहीं किया . बल्कि इसके उलट वे जातियों के आधार पर पहचान बनाए रखने की पक्षधर बने रहे . दलित जाति की अस्मिता को तो बनाये ही रखा अन्य जातियों को भी उनकी जाति सीमाओं में बांधे रखने के लिए बड़े पैमाने पर काम किया .जब उत्तर प्रदेश में मायावती की सरकार थी तो हर जाति का भाईचारा कमेटियाँ बना दी गई थीं .डाक्टर आंबेडकर ने साफ कहा था कि जब तक जातियों के बाहर शादी ब्याह की स्थितियां नहीं पैदा होती तब तक जाति का इस्पाती सांचा तोड़ा नहीं जा सकता। चार बार मुख्यमंत्री की कुर्सी पर विराजने वाली मायावती जी ने एक बार भी सरकारी स्तर पर ऐसी कोई पहल नहीं की जिसकी वजह से जाति प्रथा पर कोई मामूली सी भी चोट लग सके.मायावती के मुख्यमंत्री रहते कई मंत्रियों से बात करने का  मौक़ा मिलता था .एक अजीब बात देखने को मिलती थी  कि मायावती सरकार के कई मंत्रियों को यह भी नहीं मालूम है कि अंबेडकर के मुख्य राजनीतिक विचार क्या हैं उनकी सबसे महत्वपूर्ण किताब का नाम क्या है। यह ठीक वैसा ही है जैसे कम्युनिस्ट पार्टी का कोई नेता मार्क्स के सिद्धांतों को न जानता हो, या दास कैपिटल नाम की किताब के बारे में जानकारी न रखता हो। या बीजेपी का कोई नेता सावरकर की किताब," हिंदुत्व" का नाम न जानता हो .
डॉ बी आर आंबेडकर की सबसे महत्वपूर्ण किताब The Annihilation of caste के बारे में यह जानना दिलचस्प होगा कि वह एक ऐसा भाषण है जिसको पढ़ने का मौका उन्हें नहीं मिला . लाहौर के जात पात तोड़क मंडल की और से उनको मुख्य भाषण करने के लिए न्यौता मिला। जब डाक्टर साहब ने अपने प्रस्तावित भाषण को लिखकर भेजा तो ब्राहमणों के प्रभुत्व वाले जात-पात तोड़क मंडल के कर्ताधर्ता, काफी बहस मुबाहसे के बाद भी इतना क्रांतिकारी भाषण सुनने कौ तैयार नहीं हुए। शर्त लगा दी कि अगर भाषण में आयोजकों की मर्जी के हिसाब से बदलाव न किया गया तो भाषण हो नहीं पायेगा। अंबेडकर ने भाषण बदलने से मना कर दिया। और उस सामग्री को पुस्तक के रूप में छपवा दिया जो आज हमारी ऐतिहासिक धरोहर का हिस्सा है। इस पुस्तक में अंबेडकर ने अपने आदर्शों का जिक्र किया है। उन्होंने कहा कि जातिवाद के विनाश के बाद जो स्थिति पैदा होगी उसमें स्वतंत्रता, बराबरी और भाईचारा होगा। एक आदर्श समाज के लिए अंबेडकर का यही सपना था। एक आदर्श समाज को गतिशील रहना चाहिए और बेहतरी के लिए होने वाले किसी भी परिवर्तन का हमेशा स्वागत करना चाहिए। एक आदर्श समाज में विचारों का आदान-प्रदान होता रहना चाहिए।जिग्नेश मेवानी की राजनीतिक यात्रा पर नज़र रखने की  ज़रूरत है . यह मुकम्मल तरीके से नहीं कहा जा सकता कि वे राजनीतिक विमर्श को वह दिशा दे सकेंगे जो जाति के विनाश और सामाजिक बराबरी की बुनियादी शर्त है  लेकिन उम्मीद तो फिलहाल बन  रही  है .
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लेखक विषय संवाद साभार अनुवादक

पहले वो आए साम्यवादियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं साम्यवादी नहीं था

 

फिर वो आए मजदूर संघियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं मजदूर संघी नहीं था

 

फिर वो यहूदियों के लिए आए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं यहूदी नहीं था

 

फिर वो आए मेरे लिए

और तब तक बोलने के लिए कोई बचा ही नहीं था

 

मार्टिन नीमोलर (1892-1984)