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फसल बीमा योजना: किसानों को लूट कर बीमा कंपनियों को एक साल में 12395 करोड रुपयों का लाभ पहुंचाया गया

देश का किसान जब अत्यंत कठिन परिस्थिति से गुजर रहा है। गरीबी और कर्ज के बोझ में दबा है। अपनी मेहनत का मोल और उपज के उचित दाम के लिये संघर्ष करने के लिये रास्तेपर उतर रहा है तब किसान को कुछ देने के बजाय केंद्र सरकार ने ऐसी फसल बीमा योजनाएं चला रखी है जिसमें खरीप 2016 और रबी 2016-17 के लिये सरकारी तिजोरी और किसानों की जेब से लूट कर 10 बीमा कंपनियों को 12395 करोड रुपये का लाभ पहुंचाया गया है। जिसके लिये देश में 5.65 करोड किसानों से जबरदस्ती बीमा करवाया गया लेकिन 82.43 प्रतिशत किसानों को किसी प्रकार की मदत नही मिली। जिन 17.57 प्रतिशत किसानों को नुकसान भरपाई मिल पाई है उनमें कई किसान ऐसे है की जिन्हे उनसे वसूले गये बीमा हप्ते से कम राशि मिली है।
केंद्र सरकार से प्राप्त जानकारी के अनुसार सभी फसल बीमा योजना के खरीप 2016 और रबी 2016-17 में देश भर से किसानों से जबरदस्ती उनके अनुमति के बिना 4231.16 करोड रुपये हप्ता वसूल कर फसल बीमा करवाया गया और किसान बजट से राज्य सरकार के 9137.02 करोड रुपये और केंद्र सरकार के 8949.35 करोड रुपये हप्ता मिलाकर कुल 22318.15 करोड रुपये राशी बीमा कम्पनियों को दी गयी। नुकसान भरपाई के रुप में केवल 9922.78 करोड रुपये नुकसान भरपाई दी गई है। कंपनियों को प्राप्त हुये कुल बीमा राशी के आधा भी किसानों को नही लौटाया गया। किसानों से 12395.37 करोड रुपये रुपये सरकार और बीमा कम्पनियों के मिली भगत से बीमा कम्पनियों ने लूटे है। प्रति किसान लगभग 2200 रुपये कंपनी ने लूट लिये है।
खरीप 2016 में देश भर के किसानों से 2980.10 करोड रुपये हप्ता वसूल कर फसल बीमा करवाया गया और किसान बजट से राज्य सरकार के 6932.38 करोड रुपये और केंद्र सरकार के 6759.72 करोड रुपये हप्ता मिलाकर कुल 16672.20 करोड रुपये बीमा कम्पनियों को दिये गये। नुकसान भरपाई के रुप में किसानों को केवल 8021.68 करोड रुपये नुकसान भरपाई दी गई है।
रबी 2016-17 में देश भर के किसानों से 1251.06 करोड रुपये हप्ता वसूल कर फसल बीमा करवाया गया और किसान बजट से राज्य सरकार के 2204.65 करोड रुपये और केंद्र सरकार के 2189.63 करोड रुपये हप्ता मिलाकर कुल 5645.95 करोड रुपये बीमा कंपनियों को दिये गये। नुकसान भरपाई के रुप में किसानों को केवल 3744.85 करोड रुपये नुकसान भरपाई दी गई है।
महाराष्ट्र में बीमा कंपनियों को सबसे अधिक 4621.05 करोड रुपये बीमा हप्ता प्राप्त हुआ। उसमें से किसानों को केवल 2216.66 करोड रुपये नुकसान भरपाई दी गयी। बाकी सारी रकम 2404.39 करोड रुपये कर्ज के बोझ में दबे किसानों की जेब से सरकार से मिली भगत कर बीमा कम्पनियों ने लूट लिये है।

प्रधानमंत्री फसल बिमा योजना सहीत सभी बीमा योजनाओं में हुयी यह पिछले बीमा योजनाओं से कई गुना अधिक है। नई योजना में निजी बीमा कंपनियों को बीमा क्षेत्र में प्रवेश देना, बैंक से कर्ज लेनेवाले ऋणी किसानों के लिये योजना अनिवार्य कर जबरदस्ती हप्ता वसूलना आदी कई सारे प्रावधान बीमा कंपनियों को लाभ पहुंचाने के लिये कानून में किये गये है। इस योजना से स्पष्ट है की कंपनियां और सरकार ने मिलकर योजनापूर्वक किसानों को लूटने का काम किया है। यह साजिसपूर्वक किया गया भ्रष्टाचार है। इसे उजागर करने के लिये बीमा कंपनियों ने किन किन पार्टियों को कितना कितना फंड दिया है इसकी जांच होनी आवश्यक है। यह उल्लेखनीय है कि यह योजना किसानों की आमदनी दोगुणी करने के लिये घोषित योजनाओं में से एक है। किसानों की आय दोगुणी करने के नामपर बनी दूसरी योजनाओं का स्वरुप भी इसी प्रकार का है।
प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना की शुरुआत करते समय माननीय प्रधानमंत्री मोदी जी ने कहा था की उनकी सरकार गरीबों को समर्पित सरकार हैं। किसान के कल्याण के लिये, किसान का जीवन बदलने के लिये, गांव की आर्थिक स्थिति बदलने के लिये प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना लायी गयी है। यह सरकार की ओर से किसानों के लिये तौफा है। यह योजना किसानों के जीवन में बहुत बडा परिवर्तन लायेगी।
लेकिन प्रत्यक्ष में केंद्र सरकार ने उल्टा किया है। देश के किसानों को लूट कर बीमा कंपनीयों को बडा लाभ पहुंचाया है। यह योजना किसानों को लूट कर बीमा कंपनीयों को लाभ पहूंचाने के लिये ही बनाई गई है। किसानों की यह लूट क्रियान्वयन के दोष के कारण नही बल्कि यह योजना तत्वत: किसानों के लूट की व्यवस्था है। जिन राज्य सरकारों ने यह योजना अपने राज्य में लागू नही की उन्हे किसानों को लूट से बचाने के लिये धन्यवाद देने चाहीये। दूसरे राज्यों को भी आगे से किसानों के हित में इस किसान विरोधी योजना का बहिष्कार करना चाहीये।
राष्ट्रीय किसान समन्वय समिति ने की मांग है कि देश के किसानों को लूट कर उनसे वसूला गया बीमा हप्ता किसानों को वापस लौटाया जाए। प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना बंद की जाए और उसके बदले में प्राकृतिक आपदाओं में किसानों को सरकार की तरफ से सिधे नुकसान भरपाई दी जाने की व्यवस्था की जाए।
विवेकानंद माथने,
विवेकानंद माथने
संयोजक
राष्ट्रीय किसान समन्वय समिति
vivekanand.amt@gmail.com
9822994821 / 9422194996


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सरल-सहज भाषा में विज्ञान – ‘विज्ञान और हम’ : सुन्दर नौटियाल

लेखक मंच - Thu, 30/11/2017 - 02:17

‘विज्ञान और हम’ विज्ञान गल्प के सिद्धहस्त जाने-माने वैज्ञानिक-लेखक देवेन्द्र मेवाड़ी जी की ‘लेखक मंच प्रकाशन’ से प्रकाशित विज्ञान पुस्तक है। विज्ञान की पुस्तकों और लेखों में सरल-सहज हिंदी के प्रयोग से विज्ञान की जटिलता के हौवे को दूर करते मेवाड़ी जी का पाठक समाज को ये एक बेहतरीन तोहफा है। यह किताब बच्चों तक विज्ञान के सन्दर्भों को पहुँचाने की सरस और रोचक कोशिश है। इसका मतलब यह कतई नहीं है कि यह किताब केवल बच्चों के लिए ही बनी है। न जाने कितने ही प्रसंगों को कल्पना, तथ्यों, संस्मरणों, नाटकों, कवितांशों आदि के माध्यम से सामान्य विज्ञान और तत्कालीन पर्यावरणीय चुनौतियों से रूबरू करवाती यह किताब पाठक में मानवीय मूल्यों, तर्कपूर्ण चिंतन, सामाजिक दायित्वों, जीवों के प्रति दया, जैव विविधता की समझ आदि विकसित करती है। साथ ही यह नए पाठकों को और अधिक पढ़ने की प्रेरणा के साथ-साथ अपने संस्मरणों को लिखित रूप देने के लिए भी प्रोत्साहन देती है।

19 विभिन्न शीर्षकों से प्रस्तुत सन्दर्भ बहुत ही व्यवस्थित ढंग से सजे हुए हैं। ‘सुनो मेरी बात’ शीर्षक से जहाँ लेखक ने अपने जीवन के अंशों को बच्चों के साथ साझा किया है, अपने आंचलिक शब्दों के प्रयोग से मात्रभाषा के प्रति अपने प्रेम को व्यक्त किया है, वह किसी भी नव पाठक को अपनी मातृभाषा पर गर्व करने और इसे प्रसारित करने के लिए योगदान देने के लिए प्रेरित करता है। किताब के पन्ने दर पन्ने आगे बढ़ता पाठक देवीदा के साथ कभी ‘अनोखे सौरमंडल’ के तथ्यों से विस्मित होता है तो कभी एलियन के साथ कल्पना के यान पर सवार हो ‘प्यारी और निराली धरती’ की समझ विकसित करने आकाश में उड़ने लगता है। देवीदा की आँखों से उनकी लेखनी के शब्द समुंदर में ‘समन्दर के अन्दर की अनोखी दुनिया’ देख आता है, तो कभी ‘लो आ गया वसंत’ पाठ में शब्दों के गुलदस्तों में सजे फूलों, कलियों और नयी अंगडाई लेती धरती की महक को महसूस करता है। वसंत के खुशनुमा अहसास से पाठक अचानक ही गर्म होती धरती की उष्मता से पसीने में नहाने लगता है, जब वह रूबरू होता है ‘क्यों तपती है धरती’ से | बादलों के बनने-बरसने की घटनाओं से परिचय करने के लिए पाठक ‘कैसे-कैसे मेघ’ पढ़ता है और अचानक ही ‘आये पंछी दूर देश से’ पढ़कर प्रवासी पक्षियों के साथ सायबेरिया से भारत तक की यात्रा पर उड़ चलता है। घर के आंगन में गौरैया के घोंसले में नवान्गंतुक बाल पक्षी की पहली उड़ान ‘उड़ गयी गौरैया’ तो किसी भी उम्र के पाठक को सरल, सहज भाषा में अपने अनुभवों को संजोने की अद्भुत प्रेरणा दे जाती है। देवीदा के साथ ‘पेड़ों को प्रणाम’ करते गार्गी, शेफाली, गौरव, माधवी जैसे बच्चे चिप्स खाते-खाते बच्चों के साथ पाठक भी ‘आलू की कहानी’ सुनने लगता है, चिप्स, नमकीन, बिस्कुट खाते-खिलाते बच्चे फ्रैंक स्मिथ द्वारा खोजी गयी ‘फूलों की घाटी में’ कब पहुँच जाते हैं, उनके साथ-साथ पाठक को भी पता नहीं चलता। आगे के पाठों में ‘बच्चों का विज्ञान और कवि के कबूतर’ उड़ाते बच्चे, ‘आ गये रोबोट’ पाठ से मानव जीवन में मशीनी मानवों की धमक को महसूस करते हैं। ‘ताबीज़’ पहने एक बेरोजगार युवक कहानी के माध्यम से समाज में फैले ‘चमत्कार या विज्ञान’ के अन्धविश्वास पर तो कटाक्ष करता ही है, साथ ही में मजबूरी को अन्धविश्वास से जोड़कर भी दिखाता है। एक नाटक में बच्चों को ‘पर्यावरण के प्रहरी’ बनाकर ‘वृक्ष बचाओ-वृक्ष लगाओ’ की प्रेरणा देते लेखक जाते-जाते बच्चों को ‘आर्यभट्ट’ और ‘मेघनाथ साहा’ जैसे भारतीय विभूतियों से परिचित करवाते हैं और ‘माइकल फैराडे’ की जीवनी के एक प्रेरक प्रसंग ‘अनजान से बना महान’ से बच्चों को आत्मविश्वास से सरोबार कर जाते हैं |

विशेष– सुन्‍दर नौटि‍याल पेशे से शि‍क्षक हैं। उन्‍होंने मवोड़ी जी की यह किताब अपनी एक छात्रा नवमी को पढ़ने को दी। उसके अन्दर इस किताब से उमड़े-उपजे भावों की झलक देखने लायक है–

किताब में लिखे गये एक संस्मरण ‘उड़ गयी गौरैया’ को पढ़कर वह कहती है –“सर! हमने भी कई बार चिड़ियों को घोंसले में बच्चों को दाना देते और उन्हें उड़ाते हुए देखा है। आपने लिख दिया और हम लिखते नहीं हैं, परन्तु यह पाठ पढ़कर मुझे विश्वास हो गया है कि हम भी ऐसा ही अच्छा लिख सकते हैं |”

वैज्ञानिक, विज्ञान कथा लेखक को सम्बोधित करते हुए वह लिखती है– “सर! आपकी लिखी हुई किताब बहुत ही सरल भाषा में लिखी हुई है और इसमें कोई भी पाठ ऐसा नहीं था, जिसे मैं समझी न हूँ। आपने अपने बचपन की बातें लिखीं जो मुझे बहुत अच्छी लगीं। अनोखा सौरमंडल, फूलों की घाटी, ताबीज़, रोबोट और मेघनाथ साहा, ये सब कहानियां बहुत ही अच्छी लगीं।”

“हमारे सर भी आपके जैसे ही हैं। उन्होंने एक कविता लि‍खी जो मुझे बड़ी अच्छी लगी। उन्होंने मेरी एक कविता भी अपने पास रखी हुई है। शायद उनका सपना हमें आपके जैसा वैज्ञानिक बनाने का है।”

वह देवीदा से गुजारिश करती है– “आपसे बस यह कहना है कि सर ! यदि कभी मौका मिले तो हमारे विद्यालय में जरूर आना। हम आपसे सवाल करना चाहते हैं, आपसे कुछ सीखना चाहते हैं। शायद! हमने आज तक वैज्ञानिक नहीं देखे हैं, किन्तु हमारे सर हमारे लिए दुनिया के सबसे बड़े और सबसे अच्छे वैज्ञानिक हैं। हमारे सर हमसे कहानियां पढ़वाते हैं, गाना गाने को कहते हैं, हमें नयी चीज़ें दिखाते हैं और सबसे बड़ी बात– हमे लिखने पर जोर देते हैं।”

इस पुस्तक से प्रभावित होकर उसने इस लेख में तीन कवितायें भी लिखीं– ‘बच्चों का अपना सपना है’, ‘ये दुनियां किसकी?’ और ‘वैज्ञानिक सोच’।

वैज्ञानिक सोच’

सर तक लदे विज्ञान से,
फिर भी कहे भगवान है।
जीवित हैं विज्ञान से,
फिर भी कहें भगवान है।
विज्ञान तो हर तरफ बस चुका,
भगवान कहाँ है आपका?
कोई दर्शन करवा दे भगवान के,
हम घुटने टेकें, माफ़ी मांग के।
बस सोच का फरक पड़ चुका
अन्धविश्वास बहुत ही बढ़ चुका।
वैज्ञानिक सोच अपनाकर बनें
वैज्ञानिक नए विचार के।
दुनियां चाहे कुछ भी कहे,
हम वैज्ञानिक नये संसार के।

नवमी, कक्षा 9
रा.इं.का. कोटधार गमरी, उत्तरकाशी

बिगड़ी तबियत....चाय की चुस्की ....तो चाय की प्याली का तूफान थमे कैसे ?

हैलो....जी कहिये...सर तबियत बिगड़ी हुई है तो आज दफ्तर जाना हुआ नहीं...तो आ जाइये..साथ चाय पीयेंगे....सर मुश्किल है। गाड़ी चलाना संभव नही है। आपने सुना होगा...अभी से पांव के छाले न देखो/ अभी यारो सफर की इब्दिता है। वाह । अब ये ना पूछियेगा किसने लिखा। मैं मिजाज की बातकर रहा हूं। आपका गला बैठा हुआ है। मैं गाडी भेजता हूं आप आ जाइये। केसर के  साथ गरम मसालो से निर्मित चाय पीजियेगा..ठीक हो जायेंगे। ......और शीशे की केतली में गरम पानी ...उसमें चाय की पत्ती मिलाने के बाद हवा में यूं ही गरम मसाले की खूशबू फैल गई ।...और एक डिब्बी से केसर के चंद दाने..इसे कुछ देर घूलने दीजिये....क्या हो गया आपकी तबियत को। सर्दी-खासी..हल्का  सिर दर्द। शायद कुछ बुखार। आपको बिमारी नहीं बोरियत है। खबरो में कुछ बच नहीं रहा। एक ही तरीके की खबर। एक ही नायक। एक ही खलनायक। हा हा... नायक भी वहीं खलनायक भी वहीं। अब ये आप लोगों को सोचना है। आपका मीडिया तो बंट चुका है। वस्तु एक ही है..कोई इधर खड़ा है कोई उधर खड़ा है । कोई इधर से देख रहा है कोई उधर से। सही कह रहे हैं.. पहली बार मैंने देखा खबर के उपर खबर। मतलब ..जी कारंवा ने जस्टिस लोया पर जो रिपोर्ट  छापी। उसी रिपोर्ट को खारिज करते हुये इंडियन एक्सप्रेस ने रिपोर्ट छाप दी। ये तो आप लोगो को समझना चाहिये.....अरे चाय तो कप में डालिये । वाह क्या शानदार रंग है । पी कर देखिये ..तबियत कुछ ठीक होगी..हा अच्छा लग  रहा है । आप क्या कह रहे है क्यों समझना चाहिये । यही कि पत्रकारिता करनी है या साथ या विरोध करते हुये दिखना है। ये क्या तर्क हुआ। न न हालात को समझे....कानून मंत्री कहते हैं चीफ जस्टिस को समझना चाहिये कि पीएम को  जनता ने चुना है। और पीएम के निर्णय के विरोध का मतलब पीएम पर भरोसा नहीं करना है।

अब आप ही सोचिये। तब तो कल संपादक या कोई मीडिया हाउस पीएम के खिलाफ कुछ लिख देगा तो कहा जायेगा पीएम पर फला मीडिया को भरोसा ही नहीं है। याद कीजिये कांग्रेस क्या कहती थी। जब घोटाले हो रहे थे।  तो सवाल करने पर जवाब मिलता था हमें पांच साल के लिये जनता ने चुना है। यानी पांच साल तक तानाशाही चलेगी ...अब शब्द बदल गये हैं। अब कहा जा रहा है कि पीएम पर भरोसा नहीं है । तब तो लोकतंत्र ही गायब हो जायेगा । यानी  चैक एंड बैलेस डगमगा रहा है । सवाल डगमगाने का नहीं । सवाल लोकतंत्र की परिभाषा ही बदलने का है । ऐसे में तो कल चीफ जस्टिस हो या आपके मीडिया का  संपादक उसके लिये भी देश में चुनाव करा लें। और जब जनता उसे चुन लें तो उसे मान्यता दें। मै भी यही सवाल लगातार उठाता हूं कि देश में इंस्टिट्यूशन खत्म किये जा रहे है । सिर्फ खत्म ही नहीं किये जा रहे हैं  बल्कि राजनीतिक सत्ता को संविधान से ज्यादा ताकतवर बनाने की कोशिश हो रही है। पर ये हमारे देश में संभव है नहीं ...बडा मजबूत लोकतंत्र है। जनता देख समझ लेती है । हां, इंदिरा का भ्रम भी तो जनता ने ही तोड़ा। आपने फ्रंटलाइन की गुजरात रिपोर्ट देखी। नहीं। सर उसमें गुजरात को वाटर-लू लिखा गया है। क्या वाकई ये संभव है । देखिये ...संभव तो सबकुछ है ।

पर दो तीन बातों को समझें। गुजरात अब 2002 वाला गोधरा नहीं है। ये 2017 है जब गोधरा नहीं गोधरा से निकले व्यक्ति पर जनमत होना है। गोधरा से निकले व्यक्ति यानी। यानी क्या वाजपेयी जी ने यू ही राजधर्म का जिक्र नहीं किया था। और गोधरा की क्रिया की प्रतिक्रिया का जिक्र भी यूं ही नहीं हुआ  था। आप याद किजिये क्या कभी किसी भी राज्य में ऐसा हुआ । तो अतीत के हर सवाल तो हर जहन में होंगे ही। फिर आप ही तो लगातार प्रवीण तोगडिया को दिखा रहे हैं, जो राम मंदिर या हिन्दुत्व के बोल भूलकर किसानों के संकट और नौजवानों के रोजगार के सवाल उठा रहा है। यानी दिल्ली से याहे अयोध्या नजदीक हो पर समझना तो होगा ही कि आखिर जिस राम मंदिर के लिये विहिप को बनाया गया आज उसी का नायक मंदिर के बदले गुजरात के बिगड़े हालात को क्यों उठा रहा है। पता नहीं आप जानते भी है या नहीं तोगडिया तो उस झोपडपट्टी से निकला है जहां रहते हुये आज कोई सोच भी नहीं सकता कि वह डाक्टर बनेगा। तो छात्र तोगडिया के वक्त का गुजरात और विहिप के अध्यक्ष पद पर रहने वाले  तोगडिया के गुजरात में इतना अंतर आ गया है कि अब झोप़डपट्टी से कोई डाक्टर बन ही नहीं सकता। क्योंकि शिक्षा महंगी हो गई । माफिया के हाथ में आ गई।  तो तोगडिया कौन सी लड़ाई लड़ें। 90 के दशक में गुजरात के किसान और युवा स्वयंसेवक बनकर कारसेवा करने अयोध्या पहुंचे थे। लेकिन गर आप आज कहें तो  गुजरात से कोई कारसेवक बन नहीं निकलेगा। किसानों का भी तो यही हाल है। कीमत मिलती नहीं। मैंने कई रिपोर्ट दिखायीं। पर आपने इस अंतर को नहीं पकडा कि गुजरात का किसान देश के किसानो से अलग क्यों था और अब गुजरात का  किसान देश के किसानो की तरह ही क्यों हो चला है। यही तो लूट है । किसानी खत्म करेंगे । खेती की जमीन पर कब्जा करेंगे । बाजार महंगा होते चले
जायेगा। तो फिर योजना में लूट होगी। सरकारी नीतियों को बनाने और एलान कर प्रचार करने में ही सरकारे लगी रहेंगी। यही तो हो रहा है ।

हो तो यही रहा है...और शायद दिल्ली इस सच को समझ नहीं रही । खूब समझ रही है । अभी पिछले दिनो दिल्ली में किसान जुटे । उसमें शामिल होने अहमदाबाद से संघ  परिवार के लालजी पटेल आये। उनके साथ दो और लोग थे । लालजी पटेल वह शख्स है जिन्होंने गुजरात में किसान संघ को बनाया। खड़ा किया। आज वही सरकार  की नीतियों के विरोध में गुजरात के जिले-जिले घूम रहे हैं। उनके साथ जो शख्स दिल्ली आये थे । उनके पिताजी गुरु जी के वक्त यानी गोलवरकर के दौर  में सबसे महत्वपूर्ण स्वयंसेवक हुआ करते थे । तो क्या से माने कि संघ परिवार का भी भ्रम टूट गया है । सवाल भ्रम का नहीं विकल्प का है । और मौजूदा वक्त में विकल्प की जगह विरोध ले रहा है जो ठीक नही है । क्यों ?  क्योकि सभी तो अपने ही है । अब भारतीय मजदूर संघ में गुस्सा है । उसके सदस्य गुजरात भर में फैले हैं। वह क्या कर रहे है ये आप पता कीजिये।  देखिये हमारी मुश्किल यह नहीं है कि चुनाव जीतेंगे या हारेंगे। ये आपके लिये बडा खबर होगी। 18 दिसंबर को। आप तमाम विश्लेषण करेंगे। पर जरा सोचिये वाजपेयी जी चाहते तो क्या तेरह दिन की सरकार बच नहीं जाती। दरअसल वाजपेयी और कांग्रेस के बीच इतनी मोटी लकीर थी कि कांग्रेसियों को भी वाजपेयी का मुरीद होना पड़ा। वह आज भी है। पर मोटी लकीर तो आज भी कांग्रेस और मोदी के बीच में है। सही कह रहे है पर कांग्रेसी वाजपेयी के  लिये कांग्रेस छोड़ सकते थे। कांग्रेसी मोदी के लिये कांग्रेस नहीं छोड़ सकते । क्यों नारायण राणे ने छोड़ी। उत्ताराखंड में कांग्रेसियों ने बीजेपी के साथ  गये। अब आप हल्की बात कर रहे हैं। मेरा कहना है सत्ता के लिये कोई पार्टी छोड़े तो फिर वह कांग्रेसी या बीजेपी का नहीं होता। स्वयंसेवक यूं  ही स्वयंसेवक नहीं होता। ..एक कप गर्म पानी मंगा लें। चाय खत्म हो गई है । हा हां क्यों नहीं इसी पत्ती में गर्म पानी डालने से चाय बन जायेगी ।
आप एक काम किजिये थोडी सी चाय ले जाइये ... रात में पीजियेगा ..गले को राहत मिलेगी । तो केतली में गर्म पानी डलते ही घुआं उठने लगा और पानी का रंग भी चाय के रंग में रंगने लगा । ..आप क्या यही चाय पीते है । हमेशा नहीं । आप आ गये तो फिर ग्रीन टी या यही गांव की चाय । जब दूध के साथ चाय  वाले आते है तो उनके साथ उन्ही के मिजाज के अनुसार ।

सर आप स्वयंसेवकों का सवाल उठा रहे थे। हां .स्वयसेवक से मेरा मतलब है उसे फर्क नहीं पडता कि  कौन सत्ता में है और कौन सत्ता के लिये मचल रहा है । क्योंकि हम तो कांग्रेसी कल्चर से हटकर राजनीति देखने वाले लोग हैं। पर अब तो स्वयंसेवक की सत्ता कांग्रेस की भी बाप है। हा हा क्या बात है । ना ना आप समझे जरा  । वाजपेयी अगर पांच बरस और रह जाते तो लोग काग्रेस को भूल जाते । पर यही तो साढे तीन बरस में ही कांग्रेस की याद सताने लगी है। अरे भाई नारा देने से कांग्रेस मुक्त भारत नहीं होगा। काम से होगा। और गुजरात में ही देख लीजिये। कौन कौन काग्रेस के साथ खडा है। जो कांग्रेस का कभी था ही नहीं । पाटीदार तो चिमनभाई पटेल के बाद ही कांग्रेस का साथ छोड़ चुका था । और अब फिर से वह काग्रेस की गोद में जा रहा है। ठीक कह रहे है ...मैंने पढ़ा कि चिमनभाई देश के पहले सीएम थे जिन्होने गौ हत्या पर प्रतिबंध लगवाया।  हिन्दु-जैन के त्यौहारो में मीट पर प्रतिंबध लगाया। तो इससे क्या समझे आप। यही कि बीजेपी जिस हिन्दुत्व को उग्र अंदाज में रखती है उसे ही खामोशी से चिमनबाई ने अपनाया । नहीं , दरअसल , संघ का प्रभाव समाज में इतना था कि काग्रेस भी संघ की बातो पर गौर करती । और अब मुश्किल ये है कि संघ की बातो को आप भी एंजेडा कहते है और बीजेपी की तरह काग्रेस भी संघ को किसी राजनीतिक दल की तरह निशाने पर लेने से नहीं चुकती ।

तो क्या मान लें कि संघ का विस्तार थम गया । सवाल संघ परिवार का इसलिये नहीं है क्योकि प्रतिबद्द स्वयसेवक तो प्रतिबद्द ही रहेगा । मुश्किल ये है कि संघ के कामकाज का असर सत्ता के असर के सामने फीका हो चुका है । और एक तरह ही काम ना करने वाले हालात से स्वयसेवक भी गुजर रहा है क्योकि सत्ता ने खुद को राजनीतिक शुद्दीकरण से लेकर सामाजिक विस्तार तक मान लिया है । तो अच्छा ही है स्वयंसेवक पीएम, पीएम होकर भी स्वयंसेवक है। हा हा ठीक कहा आपने । ये बात कभी बुजुर्ग स्वयंसेवको से पूछिये...उनके साथ चाय पीजिये.....जरुर । और गाड़ी ने हमे घर छोड दिया ..अब यही समझिये कि चाय की प्याली के इस तूफान का इंतजार कौन कैसे कर रहा है।

16 दिसंबर 2002: हमारे समय की राजनीति

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(पंद्रह साल पुराना लेख)
दैनिक भास्कर, चंडीगढ़, सोमवार 16 दिसंबर 2002


यह हमारे समय की राजनीति है ! 



प्रसिद्ध अफ्रीकी-अमेरिकी कवि लैंग्सटन ह्यूज की पंक्तियां हैं - एक अपूर्ण स्वप्न का क्या हश्र होगा ? क्या वह धूप में किशमिश दाने जैसा सूख जाएगा? या एक घाव सा पकता रहेगा - और फिर दौड़ पड़ेगा ? क्या वह सड़े मांस सा गंधाएगा ? या दानेदार शहद सा मीठा हो जाएगा? शायद वह एक भारी वजन सा दबता जाएगा ? या वह विस्फोट बन फटेगा?

इस साल लैंग्सटन ह्यूज की शतवार्षिकी मनाई जा रही है। इस देश में अंग्रेजी साहित्य पढ़ने वाले लोग भी इस बात से अनजान ही हैं। जैसे पंजाब में करतार सिंह सराभा से अनजान युवाओं की पीढ़ी है। अपने समय की सीमाओं से जूझकर बेहतरी का सपना देखने वालों को हम तब याद करते हैं, जब हम में अपने सपनों को पूराकरने के लिए निरंतर संघर्ष की हिम्मत होती है। परिस्थितियों से हारते हुए हमारे सपने घाव से पकते हैं, उनमें से सड़े मांस की बदबू निकलती है। और विस्फोट जब होता है, तो उसमें जुझारू संघर्षों की जीत नहीं, अज्ञानता और पिछड़ेपन का कायर संतोष होता है। जर्मनी में सत्तर साल पहले ऐसा ही हुआ था। आर्थिक मंदी और बेरोजगारी का फायदा उठाकर नात्सी पार्टी और उसके नेता एडोल्फ हिटलर ने जनता को एक ऐसे राष्ट्रवाद का नारा दिया, जिसमें बहुसंख्यकों का अहम संतुष्ट हुआ, पर जर्मनी समेत दुनिया का बड़ा हिस्सा अंततः तबाही और ध्वंस का शिकार हुआ। 1984 के दंगों के बाद कांग्रेस की भारी बहुमत से जीत भारत के बहुसंख्यकों की ऐसी ही कायरतापूर्ण जीत थी। आज एक बार फिर गुजरात में ऐसा ही हुआ है।  
ऐसा नहीं कि इसकी अपेक्षा नहीं थी। दुनिया भर में करोड़ों लोग पक्ष-विपक्ष की बात करते हुए यही सोच रहे थे कि गुजरात में भाजपा जीतेगी। फिर भी जैसे एक हल्की आशा दो महीने पहले पाकिस्तान के चुनावों या अभी कुछ समय पहले हुए अमेरिका के सीनेट के चुनावों को लेकर असंख्य लोगों में थी कि शायद जनमत एक नई दिशा के लिए होगा, लोग संकीर्ण राष्ट्रवाद से परे हटकर मानवीय दृष्टिकोण के लिए आएंगे। इन सभी चुनावों में दूध का धुला कोई विपक्ष नहीं था। आखिर जिनके सपने पूरे नहीं हुए जो अमेरिका के काले लोग हैं जो सराभा के पंजाब के खेत-मजदूर हैं या जो मध्य गुजरात के आदिवासी हैं उनके पिछड़ेपन के लिए जिम्मेदार वह विपक्ष भी है जो आज प्रगतिशीलता या विकास की बात करता है। सच तो यह है कि दबे-कुचले लोगों को अधिकतर राजनीतिक दल एक सा ही कुचलते हैं। अशिक्षा और बेबसी से लाचार लोगों को झूठे वादों और दावों, शराब या अन्य प्रलोभनों से खरीदा जाता है। पर गुजरात का प्रसंग अधिक महत्वपूर्ण इसलिए है कि मुख्यधारा की भ्रष्ट राजनीति उन मूलवादियों, सांप्रदायिक कट्टरपंथियों और राष्ट्रवादियों को संगठित होने का मौका देती है, जो देश और समाज को निश्चित विनाश की ओर ले जाते हैं।  
एक कहावत है कि गरीब की आह हमेशा न्यायसंगत हो यह जरुरी नहीं, पर अगर तुम उसे न सुनो तो जान न पाओगे कि सच्चाई क्या है। मध्य गुजरात का आदिवासी भारत के अन्य दलित वर्गों की तरह ऐसा पिछड़ा वर्ग है जो लगातार सामंती शोषण से और सूदखोरों के हाथ पिसता रहा है। पिछड़ापन इतना भयंकर है कि आधुनिक तर्क और प्रगतिशील सोच की कोई जगह नहीं है। पारंपरिक मूल्यों के टूटने से और आधुनिकता के संकटों में फंसा आदिवासी अगर शोषण के खिलाफ आवाज उठाता है तो वह राजद्रोही माना जाता है। विदेशों से करोड़ों रूपए इकट्ठे कर सांप्रदायिक मनोभाव से कार्यरत कोई भी संगठन बेरोक उनके बीच काम कर सकता है। यह हमारे समय की राजनीति है। ऐसा ही सच अहमदाबाद या बड़ोदा के शहरी दलित और बेकारी से मारे गरीबों का है जिनको बड़ी तादाद में दंगों के लिए इस्तेमाल किया गया।  
इसलिए 27 फरवरी 1933 को जब राइश्टाख (संसद) में आग लगी तो उसे आधार बनाकर वामपंथियों, यहूदियों और कलाकारों पर जिस तरह का हमला शुरू हुआ वैसा ही 27 फरवरी 2002 को गोधरा स्टेशन पर साबरमती एक्सप्रेस में आग लगने के बाद हुआ। सांप्रदायिक राष्ट्रवाद आक्रामक मिथ्या-वचन के रथ पर सवार होता है। इसलिए गुजरात का चुनाव पाकिस्तान में फूटने वाले पटाखों की बात करता है और किसी इमाम के इस आग्रह कि मुसलमान सौ फीसदी वोट दें को फतवा कहता है।  
बार-बार कहा हुआ झूठ सच बन जाता है। पढ़े-लिखे लोग भी इसे सच मानने लगते हैं। एक वामपंथी मित्र सांप्रदायिकता शब्द का अर्थ भूल गए क्योंकि उन्हें समझ में नहीं आया कि किसी ने बढ़ती हुई सांप्रदायिकता का जिक्र क्यों किया है। निजी जीवन से सामाजिक दायरे तक में पाखंड और स्वार्थ की जिंदगी जीता हुआ अंग्रेजीदां मध्य-वर्ग इस बात से खुश है कि अंग्रेजी मीडिया में बहुसंख्यक समुदाय की उदारवादी छवि स्पष्ट दिखती है। यह ऐसा समुदाय है जिसे गुजरात का थप्पड़ भी नहीं लगता।

गुजरात का सबक एक लंबे अरसे से चल रहे हताशा के दौर में एक और अध्याय है। 1930 के दशक के जर्मनी में इस दौर में बहुत सारे काबिल लोग देश छोड़ गए थे। इनमें वैज्ञानिक, कलाकार और साहित्यिक आदि शामिल थे। हमारे यहां पढ़े-लिखे लोगों में लाखों ऐसे हैं जो मौका मिलते ही यहां की गरीबी और गंदगी से दूर भागने को तैयार हैं। इन सबको भूलकर हमें एक बार फिर गुजरात और आने वाले समय के भारत के बारे में सोचना है। जैसे रवींद्रनाथ ठाकुर ने सौ साल पहले लिखा था , हमें इसी भारत माता को अपना दुखड़ा सुनाना है। घोर तिमिर घन निविड़ निशीथे, पीड़ित मूर्छित देशे, जागृत तब अविचल मंगल नत नयन अनिमेषे। दुःस्वप्ने आतंके रक्षा की अंके स्नेहमयी तुम माता।(p { margin-bottom: 0.25cm; line-height: 120%; }ঘোর তিমির-ঘন নিবিড় নিশীথে, পীড়িত মূর্ছিত দেশে জাগ্রত ছিল তব অবিচল মঙ্গল, নত নয়নে অনিমেষে দুঃস্বপ্নে আতঙ্কে, রক্ষা করিল অঙ্কে স্নেহময়ী তুমি মাতা।) हे मातृ! इस पीड़ित मूर्छित देश को एक बार फिर घोर अंधेरे भरी घनी रात से निकलने के लिए प्रेरणा दो। दुःस्वप्न और आतंक भरे इन दुर्दिनों में हमारी रक्षा करो। आह्वान करो कि युवा आगे आएं, खोखले भाषणों, अंधविश्वाস और कर्मकांडों से दूर हटकर संकीर्ण राष्ट्रवाद से देश को बचाएं। गुजरात का महासमर एक शुरुआत है - देखना यह है कि संघर्षशील लोग किस तरह इस संकट का सामना करते हैं।







चाय के प्याले से कहीं ज्यादा तूफान है चाय के साथ बात में

चाय की केतली से निकलता धुआं...और अचानक जवाब हमारी तो हालत ठीक नहीं है । क्यों इसमें आपकी हालत कहां से आ गई । अरे भाई पार्टी तो हमारी ही है। और जब उसकी हालत ठीक नहीं तो हमारी भी ठीक नहीं । यही तो कहेंगे । ठीक नहीं से मतलब । मतलब आप खुद समझ लीजिये । क्यों गली गली..बूथ बूथ ... घूम रहे हैं । हां जब कोई दरवाजे दरवाजे घूमने लगे तो समझ लीजिये। ये हालत यूपी में तो नहीं थी। नहीं पर गुजरात की गलियां तो उन्होंने ही देखी हैं । बाकी तो पहली बार गलियां देख रहे हैं। सही कहा आपने गुजरात की गलियां सिर्फ उन्होंने ने देखी हैं। बाकियों को कभी देखने दी ही नहीं गई। अब जब हालात बदल रहे हैं तो गली गली घूम रहे हैं । वर्ना ये घूमते ...फिर भी कितनी सीट मिलेंगी। सर्वे में तो 80 पार करना मुश्किल लग रहा है । सर्वे ना देखें मैनेज हो जायेगा । मैनेज हो जाये तो ठीक। क्यों ईवीएम ??? न न आप ईवीएम की गडबडी की बात मत करीये । ईवीएम में कोई गडबडी नहीं है ।

हमने तो 1972 का दौर भी देखा है जब इंदिरा गांधी जीत गई तो बलराज मघोक और सुब्रमण्यम स्वामी थे। उन्होंने कहा गडबडी बैलेट पेपर में थी। मास्को से बैलेट पेपर बन कर आये हैं। जिसमें ठप्पा कही भी लगाईये पर आखिर में दो बैलो की जोडी पर ही ठप्पा दिखायी देता है। ये सब बकवास तब भी था। अब भी है। तो अगर मैनेज हो ना पाया । तब क्या होगा । तब...संविधान कुछ और  तोड़-मरोड़ दिया जायेगा । आप देख नहीं रहे है संसद का शीत कालीन सत्र टालना । और टालते हुये एहसास कराना कि " हम कुछ भी कर सकते है " । ये खतरनाक है । लेकिन हमें लगता है गुजरात हार गये तो डर जायेंगे । कुछ लोकतांत्रिक मूल्यो की बात होगी। अरे..तो डर में ही तो सबकुछ होता है । डर ना होता तो गुजरात देश से बड़ा ना होता । लेकिन कोई है भी नहीं जो कहें कि गलत हो रहा है । ठीक कह रहे है ...मूछें एंठते रहिये ..हम कैबिनेट मंत्री है । सारी ठकुराई निकल गई । पर गुजरात के बाद हो सकता है कोई निकले ...अरे तब  निकलने से क्या होगा । याद कीजिये निकले तो जगजीवन राम भी थे । पर कब...और हुआ क्या । बहुगुणा को ही याद कर लीजिये । निकलने के लिये नैतिक
बल चाहिये । गाना सुना है ना आपने... "  सब कुछ लुटाकर होश में आये तो क्या मिला  " । तो पार्टी तो आपकी है ....फिर आप क्यों नहीं । देखिये अभी अपने अपने स्वार्थ के आसरे एकजूटता है । तो स्वार्थ हित कहता है विरोध मत करो । तो फिर हर कोई वैसे ही टिका है । और ये पार्टी दफ्तर नहीं रोजगार दफ्तर है । जो कार्यकत्ता बन गया उसे कुछ चाहिये । और कुछ चाहिये तो कुछ  का गुणगाण करने भी आना चाहिये । तो चल रहा है । पर ये कब तक चलेगा । जबतक जनता को लगेगा । और जनता को कब तक लगेगा । जब तक उसे भूख नहीं लगेगी। भूख नहीं लगेगी का क्या मतलब हुआ। देखिये आज आपका पेट भी आजाद नहीं है ।  दिमाग तो दूर की बात है । आप खुद को ही परख लिजिये ...और बताइये..मीडिया का क्या हाल है..सभी के अपने इंटरेस्ट हैं। तो झटके में संपादक कहां चला गया । इंदिरा के दौर में तो संपादक थे।  इमरेजेन्सी लगी तो
विरोध हुआ ।

अब देखिये वसुंधरा राज की नीतियों का विरोध करते हुये एक अखबार संपादकीय खाली छोड देता है तो आपके मन में ये सवाल नहीं आता जिस देश में सरकार ने आपकी जिन्दगी को कैशलैस कर अपनी मुठ्ठी में सबकुछ समेटने की कोशिश की है उसके खिलाफ क्यों नहीं कोई अखबार संपादकीय खाली  क्यो नहीं छोडता है। देखिये लोकतंत्र का स्वांग आप भी कर रहे हैं। और लोकतंत्र के इस स्वांग को जनता भी देख रही है । अगर लोकतंत्र के चारो पाये ही बताने लगे कि लोकतंत्र का मतलब वंदे मातरम् कहने में है तो जनता  क्या करेगी । उसकी लड़ाई तो भूख से है । रोजगार से है। हर कोई स्वांग कैसे कर रहा है आप खुद ही देख लिजिये...एक ने कहा गंगा में हाइट्रो पावर पोजेक्ट बनायेगे। दूसरा बोला गंगा में बडी बस चलायेगें । तीसरा बोला शुद्द करेंगे ....अविरल कौन करेगा कौई नहीं जानता । और हालात इतने बुरे हो चले है कि दुनिया के रिसर्च स्कालर गंगा पर शोध कर समूचा खाका रख दे रहे है । अरे उन्हें ही पढ लो । आप भी पढिए ..आक्सफोर्ड पब्लिकेशन से एक किताब आई है ..गंगा फॉर लाइफ ..गंगा फॉर डेथ । सबकुछ तो उसने लिख दिया । और जि गंगा पर देश की 41 फिसदी आबादी निर्भर है । उस गंगा को लेकर भी आप मजाक ही कर रहे है । अरे...चाय तो पिजिये । ग्रीन टी है । इसमें केसर मिलाकर पिया किजिये इस मौसम में तबियत बिगडेगी नहीं । जी..अच्छी है  चाय...हा हा इसमें शहद भी मिलाया कीजिये । गला साफ रहेगा...हां मेरी तो तबियत बिगडी हुई है । गला भी जाम है । पाल्यूशन दिल्ली में खासा बढा हुआ है । अब आप भी पल्यूशन के चक्कर मे ना रहिये ...दिल्ली कोई आज से पोल्यूटेड है ..याद कीजिये 70-80 के दशक से ही दिल्ली में राजस्थान से
रेगिस्तानी हवा उड़ कर आती थी । पूरा रिज का इलाका ...वहा भी सिर्फ धूल ही धूल.हम काली आंधी कहते थे ...घर के दरवाजे...खिड़की बंद करनी पडती थी । और ये गर्मी के वक्ततीन महीने मई से जुलाई के दौर में रहता था । तब पोल्यूशन नहीं रहता थाा क्या .....प्रदूषण पूरे देश में है । पर प्रदूषण से बचने के उपाय का बाजार दिल्ली में है । तो डर के इस बाजार को हर जगह पैदा किया  जा रहा है । देखिये जब कोई काम नहीं होता है तो ऐसा ही होता है ....दिल्ली-मुबई के जरीये बताया गया...इज आफ बिजनेस....अरे भाई मौका मिले तो एक बार विदेश मंत्रालय की आफिसियल साइट को ही देख लिजिये..अगर देश में  धंधा करना इतना शानदार है तो फिर बीते दो-तीन बरस में सबसे ज्यादा बारतीय देश छोडकर चले क्यो गये....लगातार जा रहे है ।

आपको आंकडे मिल जायेंगे.कैसे कब दो करोड से चार करोड भारतीय विदेश में बसने की स्थिति में आ गये....द इक्नामिक इंपोर्टेस आफ हंटिंग पढ़ें...आप बार बार किताबों का रेफरन्स देते है । तो क्या मौजूदा वक्त में कोई पढता नहीं ..पढ़ता होगा..पर आप जरा सोचिये जर्मनी की काउंसलर से लेकर हर कोई भारतीय प्रमुखों के सामने बैठे है...और अचनक एक नौकरशाह बताने लगे कैसे खास है हमारे वाले....बहुत बोलते नहीं ...पर बडे बडे काम खामोशी से करते है ....यानी राग दरबारी दुनिया के बाजार में भी...तो प्रभावित हर किसी को होना ही चाहिये...हो भी रहे है ...पहली बार हर कोई देख रहा है ...इस लहजे में भी  बात होती है । आप जरा रुस के राष्ठ्रपति पुतिन को ही देख लें । कैसे आज की तारिख में वह कितने ताकतवर है । और कैसे हो गये । रुस तो खुलापन खोजते खोजते ढह गया..औ पुतिन के ही सारे सगे संबंधी हर बडी कंपनी के सर्वोसर्वा है ...अब गैस की पाइपलाइन को थोडा सा ही ऐंठ दिया तो जर्मानी तक पर संकट आ जायेगा....हर हम तो इनर्जी से लेकर रोजगार तक को लेकर ड्राफ्ट तैयार किया । देश की आठ प्राथमिकता क्या होनी चाहिये इसे बताया। 2014 कै मैनीपेस्टो को ही पलट कर आप देख लिजिये...देखिये बौद्दिकता एक जगह....सत्ता हांकना एक जगह । दिल्ली से सटा इलाका है मनेसर । वहा पर  दिमाग का रिसर्च सेंटर है । पर जरा किसी से पूछिये दिमाग और माईंड में अंतर क्या है ..कौन बतायेगा । दरअसल ब्रेन इज द साउंड बाक्स आफ माइंड । या आप कहे ब्रेन कंप्यूटर है । पर माइंड साफ्टवेयर है । पर यहा तो बात हार्ड वर्क की हो रही है...कौन ज्यादा से ज्यादा दौडता नजर आ रहा है

......बाते चलती रही .चाय की और प्याली भी आ गई...पर ये बात किससे हो रही है,,कहा हो रही है । हमारे ख्याल से ये बताने की जरुरत नहीं होनी चाहिये..सिर्फ समझ लेना चाहिये हवा का रुख है कैसा..तो आप सोचिये कौन है ये शख्स ।

क्या गरीब राजपूत लड़के लड़कियों की भी सुध ली जायेगी ?

जंतर-मंतर - Sun, 26/11/2017 - 05:05


शेष नारायण सिंह
चित्तौड़ की रानी पद्मिनी और चित्तौड़ गढ़ के हवाले से एक  फिल्म बनी है और उस पर विवाद हो  रहा है. जिस अभिनेत्री ने रानी पद्मिनी की भूमिका अदा की है उसको जला डालने और उसकी नाक काट लेने के लिए इनामों  की घोषणा हो रही है . राजपूतों के  कुछ संगठन इसमें आगे आ गए हैं . राजपूती आन बान और शान पर खूब चर्चा  हो रही है . ऐसा लगता है कि कुछ लोग राजपूतों की एकता की कोशिश कर रहे हैं और उसको बतौर वोट  बैंक विकसित करने का कोई कार्यक्रम चल रहा है . इसका आयोजन कौन कर रहा है,अभी इसकी जानकारी सार्वजनिक चर्चा में नहीं आयी है . राजपूतों के इतिहास पर बहुत कुछ लिखा गया  है . नामी गिरामी विद्वानों  ने शोध किया  है और  क्षत्रियों और राजपूतों में तरह तरह के भेद बताये गए हैं . वह बहसें आकादमिक हैं लेकिन आम तौर पर ठाकुर, क्षत्रिय और राजपूत को एक ही माना जाता है . इसलिए इस लेख में ठाकुरों और राजपूतों के बारे में अकादमिक चर्चाओं से दूर सामाजिक सवालों पर बात करने की कोशिश की जायेगी . मैं राजपूत परिवार में  पैदा हुआ था . लेकिन राजपूत  जाति की राजनीति से मेरा साबका १९६९ में पडा जब जौनपुर के मेरे कालेज में अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा का अधिवेशन हुआ . देश के कोने  कोने से राजपूत राजा महाराजा आये थे . मेवाड़ के स्व महाराणा भगवत सिंह  ने  अध्यक्षता की थी. डूंगरपुर के महारावल लक्ष्मण सिंह भी आये  थे.  और भी बहुत से राजा आये थे .  उस अधिवेशन में पूरी चर्चा इस बात पर होती रही  कि इंदिरा गांधी ने राजाओं का प्रिवी पर्स छीन कर राजपूतों की आन बान पर बहुत बड़ा हमला किया था . आजादी के बाद सरदार पटेल ने जिन राजाओं के राजपाट का भारत में विलय करवाया था उनको कुछ विशेषाधिकार और उनके राजसी जीवन निर्वाह के लिए प्रिवी पर्स देने का वायदा  भी किया था . कुछ राजाओं को को १९४७   में लाखों रूपया  मिलता था . मसलन मैसूर के राजा को २६ लाख रूपये मिलते थे .  सन १९५०  में सोने का भाव करीब १०० रूपये प्रति दस ग्राम  होता था .आज करीब  तीस हज़ार रूपये है. आज की कीमत से इसकी तुलना की जाए तो यह ७८  करोड़  रूपये हुए. 1970 में जब इंदिरा गांधी ने प्रिवी पर्स ख़त्म किया तब  भी सोना १८४ रूपये प्रति दस ग्राम था . ऐसे सैकड़ों राज थे हालांकि कुच्छ को तो बहुत कम रक़म मिलती थी .  यानी प्रिवी पर्स देश  संपत्ति पर बड़ा बोझ था . इसलिए स्वतंत्र भारत में प्रिवी पर्स के मामले  पर आम नाराज़गी की थी .उस समय की देश की आर्थिक स्थिति  के लिहाज़ से इस को  देश पर  बोझ माना जाता था .राजाओं के ख़िताबों की आधिकारिक मान्यता को भी पूर्णतः असंवैधानिक व अलोकतांत्रिक प्रक्रिया के रूप में देखा जाता था। प्रिवी पर्स को  हटाने का प्रस्ताव १९६९ में जब संसद में लाया गया तो प्रस्ताव राज्य सभा पारित नहीं हो  सका और मामला टल गया . बाद में  इंदिरा गांधी ने  नागरिकों के लिये सामान अधिकार एवं सरकारी धन के दुरूपयोग का हवाला देकर  १९७१ में २६वें संविधानिक संशोधन के रूप में पारित कर दिया . और प्रिवी पर्स ख़त्म हो गया .कई राजाओं ने १९७१ के चुनावों में इस मुद्दे पर इंदिरा गांधी को चुनौती दी , लोक सभा का चुनाव लड़ने  लिए मैदान लिया और सभी बुरी तरह से हार गए .
इंटरमीडिएट के छात्र के रूप में मैंने इस अधिवेशन को देखा और इसमें शामिल हुआ. अजीब लगा कि अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा के अधिवेशन में राजाओं के प्रिवी पर्स और विशेषाधिकारों के पक्ष में क्षत्रिय समाज को एकजुट  करने की आयोजकों की तरफ से  की गयी .  मेरे दर्शनशास्त्र के  और मेरे गुरू ने मुझे समझाया कि इस बहस का  कोई मतलब नहीं है . उत्तर प्रदेश ,जहां यह बहस हो रही थी , वहां किसी भी  राजपूत या क्षत्रिय राजा को प्रिवी पर्स नहीं मिलता था . उत्तर प्रदेश में प्रिवी पर्स वाले लेवल तीन राजा थे, काशी नरेश ,नवाब रामपुर और समथर के राजा.. इन तीनों में कोई भी राजपूत नहीं था. जबकि उसी उत्तर प्रदेश में लगभग सभी  गाँवों  में राजपूत  रहते हैं . उनकी समस्याओं पर  अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा के अधिवेशन में कोई चर्चा नहीं हुयी .उस दौर में किसानो को खाद,  चीनी ,सीमेंट आदि काले बाज़ार से दुगुनी कीमत पर खरीदना पड़ता था ,उन  किसानों में बड़ी संख्या में राजपूत थे  लेकिन महासभा में इस विषय पर कहीं कोई बात नहीं हो रही थी.  एक छात्र को भी भाषण करने का अवसर मिलना था . जिसके लिए मुझे कालेज की तरफ से बुलाया गया . मैंने किसान राजपूतों , चपरासी राजपूतों, क्लर्क राजपूतों , बेरोजगार राजपूतों  की समस्याओं का ज़िक्र कर दिया और राजाओं के लाभ के  एजेंडे से बात फिसल गयी. उसके बाद से सरकार से किसानों की समस्याओं  पर बात शुरू हो गयी . राजपूती शान और आन बान की  बहस के बीच राजपूतों की बुनियादी समस्याओं पर भी बहस  शुरू हो गयी .
यह काम मैं कसर करता हूँ . अभी पिछले दिनों  रानी पद्मिनी को केंद्र में रख कर बनाई फिल्म की बहस में जब मुझे शामिल होने का अवसर मिला तो मैंने रानी पद्मिनी के इतिहास और जौहर के हवाले से उन समस्याओं का भी उल्लेख कर दिया जो आज के राजपूत रोज़ ही  झेल रहे हैं . मेरे गाँव और आस पास के इलाके में  राजपूतों की बड़ी आबादी  है . सैकड़ों  किलोमीटर तक राजपूतों के ही गाँव हैं . बीच बीच में और भी जातियां हैं .ज्यादातर लोग  बहुत ही गरीबी की ज़िंदगी बिता  रहे  हैं . दिल्ली , मुंबई, जबलपुर, नोयडा , गुरुग्राम आदि शहरों में हमारे इलाके के राजपूत भरे पड़े हैं . वे अपना गाँव छोड़कर आये हैं . वहां खेती है लेकिन ज़मीन के रकबा इतना कम हो गया है कि परिवार का भरण पोषण नहीं हो  सकता . शिक्षा की कमी है इसलिए यहां मजदूरी करने पर विवश हैं . मजदूरी भी ऐसी कि न्यूनतम मजदूरी से बहुत कम कमाते हैं . किसी झुग्गी में  चार -पांच लोग रहते हैं . राजपूती आन की ऐसी चर्चा गाँव में होती रहती है कि वहां चल रही मनरेगा योजनाओं में काम   नहीं कर सकते ,  खानदान की नाक कटने का डर है . यह तो उन लोगों की हाल है जो अभी   दस पांच साल पहले घर से आये हैं . जो लोग यहाँ चालीस साल से रह रहे  हैं , उनकी हालत बेहतर बताई जाती है . एक उदाहरण पूर्वी दिल्ली के मंडावली का दिया जा सकता है . पटपडगंज की पाश सोसाइटियों से लगे हुए  मंडावली गाँव की खाली पडी ज़मीन पर १९८० के आस पास पूर्वी दिल्ली के बड़े नेता , हरिकिशन लाल  भगत के  गुंडों ने पुरबियों से दस दस हज़ार रूपये लेकर ३५ गज ज़मीन के प्लाट पर क़ब्ज़ा करवा दिया था. सब बस गए .बाद में वह कच्ची कालोनी मंज़ूर हो गयी और अब ३५ साल बाद उस ज़मीन की कीमत बहुत बढ़ गयी  है लेकिन उस  ज़मीन की कीमत बढवाने में वहां रहने वालों की दो पीढियां लग गईं . वहां ठाकुरों , ब्राहमणों आदि के जाति के आधार मोहल्ले बना दिए गए थे . उनमें राजपूत भी बड़ी संख्या में थे. दिल्ली के संपन्न इलाकों में भी राजपूत रहते थे . सुल्तानपुर के सांसद भी उन दिनों राजपूत थे और राजपूत वोटों के बल  पर जीत कर आये थे लेकिन उनको  भी उन गंदी बस्ती में रह रहे लोगों की परवाह   नहीं थी . जब  पांच साल बाद फिर चुनाव हुए तो उन्होंने जिले में जाकर ठाकुर एकता का नारा दिया था .  इसी तरह की एक  कालोनी दिल्ली के वजीराबाद पुल के आगे है . सोनिया विहार नाम की इस कालोनी में भी लाखों की संख्या में राजपूत रहते हैं और आजकल  उस फिल्म में रानी  पद्मावती के चित्रण को लेकर गुस्से में हैं .
बुनियादी सवाल यह है कि  चुनाव के समय या किसी आन्दोलन के समय राजपूतों का आवाहन करने वालों को क्या  इस बात का ध्यान नहीं रखना चाहिए कि राजपूतों में जो गरीबी , अशिक्षा , बेरोजगारी आदि समस्याएं हैं उनको भी विचार के दायरे में रखना बाहुत ज़रूरी है .  मेरे गाँव में  राजपूतों के पास बहुत कम ज़मीन है . १९६१ में जब जनगणना हुयी थी तो मैं अपने गाँव के लेखपाल  के साथ घर घर घूमा  था .  राजपूतों के १५ परिवार थे . अब वही अलग बिलग होकर करीब चालीस परिवार  हो गए हैं . ज़मीन  जितनी थी ,वही है. यानी सब की ज़मीन  के बहुत ही छोटे  छोटे टुकड़े  हो गए हैं . पहले भी किसी तरह पेट पलता था , अब तो सवाल ही नहीं है . उन्हीं परिवारों के राजपूत लड़के , महानगरों में मेहनत मजूरी करके पेट पाल रहे हैं. मालिन बस्तियों में रह  रहे  हैं , राजपूत एकता का जब भी नारा दिया जाता है , वे ही लोग  भीड़ का हिस्सा बनते हैं और राजपूत नेताओं की कमियों को छुपाने के लिए चलाई गयी बहसों में भाग लेते हैं . सवाल यह  है कि क्या इन लोगों के बुनियादी  शिक्षा और स्वास्थ्य के अधिकारों के लिए कोई आन्दोलान नहीं चलाया जाना  चाहिए . अगर राजपूतों के नाम पर  राजनीति करने वालों और राजपूत भावनाओं से लाभ लेने वालों से यह सवाल पूछे जाएँ तो समाज का भला होना निश्चित है . लेकिन यह सवाल   पूछने के लिए गरीबी और सरकारी उपेक्षा का जीवन जी रहे लोगों  को ही आगे आना पड़ेगा. राजपूती आन बान और शान के आंदोलनकारियों के नेताओं से यह  सवाल भी पूछे जाने चाहिए .
रानी पद्मिनी के संदर्भ में एक बात और बहुत ज़रूरी पूछी  जानी है लेकिन वह सवाल पीड़ित पक्ष के लोग पूछने नहीं आयेगें . किसान राजपूतों के  परिवार में लड़कियों की शिक्षा आदि का सही ध्यान  नहीं दिया जाता . जहां लड़कों के लिए गरीबी  में भी कुछ न कुछ इंतज़ाम किया जाता  था , लड़कियों को पराया धन मान कर  उपेक्षित किया जाता था . आज ज़रूरी यह है कि राजपूत नेताओं से समाज के वरिष्ठ लोग यह सवाल पूछें कि क्या राजपूत लड़कियों की शिक्षा आदि के लिए कोई ख़ास इंतजाम नहीं किया  जाना चाहिए . क्या उनके अधिकारों की बात को हमेशा नज़र अंदाज़ किया जाता रहेगा .  अगर लड़कियों  को सही शिक्षा दी जाए और उनको भी अवसर उपलब्ध कराये जाएँ तो सामाजिक परिवर्तन की बात को रफ्तार मिलेगी . ऐसा हर वह आदमी जानता  है जिसकी सोचने समझने की शक्ति अभी बची हुयी  है . आज एक सिनेमा के विरोध के नाम पर जो नेता आन्दोलन की अगुवाई कर रहे  हैं क्या उनको अपने गिरेबान में झाँक कर नहीं देखना चाहिए कि लड़कियों को सम्मान की ज़िन्दगी देने में समाज और सरकार का भी कुछ योगदान होता है . जो लोग राजपूतों के इतिहास की बात करके राजपूत लड़कों को  किसी की नाक काटने और किसी को जिंदा जला देने की राह पर डाल रहे हैं क्या उनको राजपूतों की आर्थिक और सामाजिक स्थिति को दुरुस्त करने के लिए आन्दोलन नहीं शुरू करना  चाहिए .  हर राजपूत को  अत्याचारी के रूप में चित्रण करने की परम्परा  को दुरुस्त करने के लिए क्या कोई राजपूत नेता आन्दोलन की डगर  पर जाने  के बारे में विचार करेगा  क्योंकि ऐसे बहुत सारे इलाके हैं जहां राजपूत परिवार की आर्थिक हालत दलितों से भी बदतर है . इन सवालों को पूछने  वालों की समाज  और देश को सख्त ज़रूरत  है . क्या राजपूतों के कुछ नौजवान यह सवाल पूछने के लिए आगे आयेंगें ?

सलाह

कबाड़खाना - Thu, 23/11/2017 - 08:00

पलायन की मजबूरी और छटपटाहट का चि‍त्रण- ‘नेचुरल रिंगटोन’  

लेखक मंच - Wed, 22/11/2017 - 14:09

चित्तौडगढ़ : ‘सम्भावना’ की ओर से आयोजित कार्यक्रम में कहानीकार कर्नल मुकुल जोशी ने अपनी कहानी ‘नेचुरल रिंगटोन’ का पाठ किया।

विजन स्कूल ऑफ मैनेजमेंट में 14 नवंबर को आयोजि‍त कार्यक्रम में कर्नल जोशी ने प्रभावपूर्ण ढंग से कहानी सुनाई। कहानी में पहाडी़ गांव के वातावरण, खानपान, आस्थाओं, मानवीय पारिवारिक सम्बन्धों से लेकर गीत और परम्पराओं को पिरोया गया है। कुमाऊंनी भाषा के आंचलिक शब्दों ने कहानी को मर्मस्पर्शी बना दिया। आधुनिक जीवन में पढा़ई या आजीविका के कारण गांव छोड़कर मजबूरी में शहर में बस जाने पर होने वाली छटपटाहट भी कहानी में बारिकी से चित्रित हुई है।

कहानी पाठ के बाद महेंद्र खेरारू के प्रश्‍न के जवाब में कहानीकार ने बताया कि आधुनिक सोशल मीडिया के कारण बडी़ संख्या में रचनाएं इन पर आ रही हैं, पर जल्दबाजी के चलते इनमें सार्थकता की कमी है। हालांकि नये रचनाकारों को इससे प्रोत्साहन मिल रहा है। इन रचनाओं में से वे ही बचेंगी, जो शाश्‍वत होंगी। एम.एल. डाकोत ने पश्‍चि‍मी संस्कृति ओैर भारतीय संस्कृति में बेहतर कौन का सवाल उठाया। जोशी ने बताया कि भारतीय संस्कृति विश्‍व में प्राचीन और श्रेष्ठतम मानी जाती है, पर हमें सभी से उपयोगी तत्वों को ग्रहण करना चाहिए। कवि नन्दकिशोर निर्झर ने कहानी पर अपने विचार प्रकट करते हुए कहा कि रचना में रचनाकार बोलता है। कहानी पर योगेश शर्मा ने भी अपने विचार प्रकट किये। कार्यक्रम का संचालन कर रहे लक्ष्मण व्यास के प्रश्‍नों के जवाब में कर्नल जोशी ने बताया कि सेना में काम करना नौकरी मात्र नहीं है, यह देश की सेवा और जीवन जीने की शैली और कला है।

प्रारम्भ में कहानीकार का परिचय देते हुए डॉ. कनक जैन ने बताया कि मुकूल जोशी का कहानी संग्रह ‘मैं यहां कुशल से हूं’  प्रकाशि‍त हो चुका हैं। उनकी कहानियां हंस, ज्ञानोदय, कथादेश जैसी साहित्यिक पत्रिकाओं में प्रकाशि‍त हो चुकी हैं। वे चित्तौड़गढ़ के सैनिक स्कूल सहित ऑफिसर्स ट्रेनिंग एकेडमी चेन्नई एवं पंचमढ़ी आदि स्थानों पर कार्य कर चुके हैं। कार्यक्रम में स्थानीय कॉलेज में हिन्दी विभागाध्यक्ष अखिलेश चाष्टा, चित्रकार मुकेश शर्मा, वरिष्ठ पत्रकार नटवर त्रिपाठी, विकास अग्रवाल, गोपाल जाट,  पूजा जोशी आदि‍ साहित्य प्रेमी उपस्थित थे। विजन कॉलेज की निदेशक डॉ. साधना मण्डलोई ने कहानीकार जोशी का स्वागत कि‍या। संभावना के अध्यक्ष डॉ. के.सी. शर्मा ने सभी का आभार व्यक्त किया।

प्रस्‍तुति‍ : डॉ. कनक जैन

बदलती सियासी बिसात में संघ परिवार की भी मुश्किलें बढ़ी हैं

प्रधानमंत्री मोदी के सामने जिस दौर में राजनीतिक चुनौती लेकर राहुल गांधी आ रहे हैं, उस दौर का सच अनूठा है क्योंकि संघ के प्रचारक से पीएम बने मोदी के ही दौर में संघ परिवार का एंजेडा बिखरा हुआ है। संघ से जुड़े पहचान वाले स्वयंसेवक अलग थलग है। वहीं इंदिरा गांधी की तर्ज पर मोदी चल कर सफल हो रहे हैं। पर राहुल गांधी का कॉपी पेस्ट सफल हो नहीं पा रहा है। तो नेहरु गांधी की विरासत ढोती कांग्रेस को ही अब चुनावी लाभ नेहरु गांधी के नाम पर उतना मिल नहीं पा रहा है। तो कांग्रेस सिमट रही है। और मोदी के दौर में बीजेपी ने जिस विस्तार को पाया है, उसमें संघ के जरीये  चुनावी लाभ बीजेपी को कबतक मिलेगा ये सवाल सबसे बडी चुनौती के दौर पर 2019 में नजर भी आयेगा। क्योंकि तब संघ की मजबूरी नीतियों पर नहीं सियासी तिकड़मों पर चलने की होगी। क्योंकि संघ से जुडे लोगों की कतार जरा देखिये आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, गोविन्दाचार्य, प्रवीण तोगडिया, संजय जोशी  ऐसे नेता रहे हैं, जिनकी अपनी पहचान है पर मौजूदा वक्त ने इन्हें हाशिये पर ढकेल दिया है। इनकी खामोशी कांग्रेस का संघीकरण कर रही है। यानी मनमोहन सिंह की आर्थिक नीतियों को मोदी सरकार ने अपनाया।

और कांग्रेस मोदी सरकार की नीतियो में मीन-मेख पुराने स्वयंसेवकों की खामोशी से निकाल रही है। जबकि इसी दौर में कांग्रेस से कही ज्यादा तीखे तरीके से संघ के ही संगठन या पहचान पाये स्वयंसेवक उठा रहे हैं। मसलन भारतीय मजदूर संघ और स्वदेशी जागरण मंच ने मोदी सरकार की आर्थिक नीतियों के विरोध का दिन वही चुना जब मोदी सरकार को सबसे बडी राहत मूडीज ने दी थी। विहिप ना सिर्फ उसी दिन  खामोश रही जिस दिन श्री श्री राम मंदिर का रास्ता तलाशने अयोध्या पहुंचे । बल्कि सुब्रमण्यम स्वामी से लेकर यूपी के मुखिया योगी की राममंदिर पर हर पहल के बावजूद राम मंदिर आंदोलन से निकले प्रवीण तोगडिया ने बेरोजगारी और  किसान का मुद्दा उठाकर आर्थिक नीतियों पर ही चोट की। और इसी के समानांतर गुजरात में किसान संघ की नींव जालने वाले लालजी पटेल भी आर्थिक नीतियों को ही लेकर बीजेपी के खिलाफ चुनाव में मुखर हो गये। और इस कतार में ये भी पहला मौका है कि यशंवत सिन्हा गुजरात में ही बीजेपी के पूर्व सीएम सुरेश मेहता के बुलावे पर घूम घूम कर मोदी सरकार की बिगड़ी आर्थिक नीतियों का हाल बता रहे हैं। और संघ -बीजेपी की यही वह सारी कतार है, जिससे कांग्रेस में आक्सीजन आ रहा है। तो सवाल दो है। पहला, क्या संघ परिवार का बीजेपीकरण  हो रहा है और बीजेपी का कांग्रेसीकरण। दूसरा, क्या राहुल गांधी के दौर में स्वतंत्रता संग्राम से निकली कांग्रेस की उम्र खत्म हो चुकी है। यानी पारंपरिक चुनावी चुनौतियों का दौर खत्म हुआ और अब राहुल ही नहीं बल्कि  संघ परिवार और बीजेपी के सामने भी नयी चुनौतियां हैं। इसीलिये इस दौर ने बीजेपी और कांग्रेस दोनों को ही शार्टकट का रास्ता सिखला दिया है।

जाति को ना मानने वाली बीजेपी के सोशल इंजीनियरिंग से लेकर किसी भी पार्टी के दागी तक को जीत के लिये साथ लेने में बीजेपी को हिचकिचाहाट नहीं है तो कांग्रेस गठबंठन बगैर सत्ता मिल नहीं सकती ये मान चुकी है । और गुजरात में ही जिस तरह हार्दिक-जिग्नेश,राठौर के इशारे पर चल निकली है। उसमें नेहरु गांधी की विरासत का लाभ पाने की सोच खत्म हुई ये मान चुकी है। क्योंकि गुजरात में कांग्रेस के लिये दो सवाल सबसे बड़े हो चुके हैं। पहला, गुजरात  में धर्म की लकीर पर जाति की लकीर हावी होगी या नहीं। दूसरा , एससी,ओबीसी, पाटीदार गुटों के आसरे कांग्रेस जीत पायेगी या नहीं। यानी गुजरात में बीजेपी की धर्म से मोटी लकीर जाति के आधार पर खींचने के लिये कांग्रेस तैयार है। तो क्या अंतर सिर्फ लकीरो का है। और यही वह हालात  है जो बतलाते है कि राहुल के साथ बीजेपी की कमजोरी साधने वाली कोई टीम नहीं है। फिर हार्दिक-जिग्नेश-राठौर के अंतर्विरोध की आग से जुझने की क्षमता भी राहुल में है। यानी कांग्रेस की कमजोर विकेट पर बैटिंग करते करते क्या बीजेपी का कांग्रेसीकरण वाकई हो चुका है। क्योंकि कांग्रेस ने नेहरु गांधी का नाम हमेशा लिया। और बीजेपी हेडगेवार-गोलवलकर को ज्यादा  मुखर होकर बहुमत के साथ सत्ता में रहते हुये भी उठा रही है। ऐसे में पहली बार परीक्षा और चुनौती संघ परिवार के सामने भी है क्योंकि पहली बार संघ परिवार की छाया में सत्ता नहीं है बल्कि मोदी सरकार की छाया में संघ  परिवार है। फिर संघ ने अपने एंजेडे को सत्तानुकूल मुलायम बनाया है। मोदी चुनावी राजनीति को साधने में प्रैक्टिकल ज्यादा हो गये तो योगी प्रतीकात्मक ज्यादा है।

यानी चाहे अनचाहे पहली बार 2019 के लिये बिछती गुजरात की चुनावी बिसात उन आर्थिक हालातों को हवा दे रही है, जिसे हर बार हर पार्टी ने हाशिये पर ढकेला है। यानी संघ परिवार का सामाजिक शुद्दीकरण बेमानी हो रहा है। कांग्रेस का नेहरु-गांधी विरासत को ढोना मायने नहीं रख रहा है। बीजेपी का संघ परिवार के संगठनात्मक विस्तार से अपनी जीत की उम्मीद पालने के दिन लद रहे है। यानी चाहे अनचाहे ये सवाल धीरे धीरे संघ परिवार के लिये बडा होता जा रहा है कि जो स्वयंसेवक स्वयंसेवक रह गया वह तो संघ के एजेंडे पर खामोश रहेगा नहीं। और जो स्वयंसेवक संघ का एजेंडा छोड़ सत्ता के लिये खामोश है, वह स्वयंसेवक सियासी रंग में रंगा जा चुका है। तो मोदी की हर जीत हार तले बार बार संघ की जीत हार भी देखी जायेगी। जो शायद जीत तक तो ठीक है पर हार के बाद के हालात में बीजेपी से कही ज्यादा संघ को सामाजिक तौर पर खडा करने की मुश्किल ना आ जाये। सवाल तो ये उन्हीं कद्दावर नेताओं तले उठेगा तो फिलहाल हाशिये पर हैं।

६३ साल की उम्र में जाना भी कोई जाना है , के वी एल नारायण राव नहीं

जंतर-मंतर - Mon, 20/11/2017 - 13:31


के वी एल नारायण राव नहीं रहे . एन डी टी वी को राधिका रॉय की बहुत छोटी कंपनी से बड़ी कंपनी बनाने में जिन लोगों का योगदान है , नारायण राव उसमें सरे फेहरिस्त हैं . ६३ साल की उम्र में कूच करके नारायण राव ने बहुत लोगों को तकलीफ पंहुचाई है , मुझे भी . 

बृहस्पतिवार दिनांक २० नवम्बर १९९७ के दिन मैं नारायण राव से पहली बार मिला था. एन डी टी वी में मुझे पंकज पचौरी ने प्रवेश दिलाया था. हिंदी विभाग की प्रमुख मृणाल पांडे ने किसी ऐसे पत्रकार को अपने नए कार्यक्रम के लिए लेने का फैसला किया था, जो बीबीसी के कार्य पद्धति को जानता हो. पंकज ने कहा कि बीबीसी छोड़कर तो कोई नहीं आएगा लेकिन अगर आप कहें तो एक आउटसाइड कंट्रीब्यूटर को बुला दूं . मृणाल जी ने पंकज से सुझाव माँगा तो उन्होंने मेरा नाम बता दिया . मृणाल जी ने मुझे राधिका रॉय से मिलवाया और वहीं , प्रणय रॉय और आई पी बाजपाई भी आ गए और मेरा इंटरव्यू हो गया . चुन लिया गया . राधिका ने कहा अब आप नरायन के पास जाइए क्योंकि Only he negotiates the money . इस तरह मेरी ,के वी एल नारायण राव से डब्लू-१७ गेटर कैलाश-१ वाले दफ्तर में मुलाक़ात हुयी .

नारायण राव उन दिनों जनरल मैनेजर थे . मालिकों के बाद सबसे बड़ी पोजीशन वही थी. मैं अख़बार से गया था , मुझे पता ही नहीं था कि एन डी टी वी में तनखाहें बहुत ज्यादा होती थीं. मुझे जो मिल रहा था मैने उस से काफी आगे बढ़ कर बताया . नारायण राव ने कहा कहा कि सोच लीजिये . मुझे नौकरी ज़रूर चाहिए थी , मैंने थोडा कम कर दिया . मुस्कराते हुए टोनी ग्रेग की लम्बाई वाले गंभीर आवाज वाले शख्स ने कहा कि आपने जो पहले कहा था , कंपनी ने आपको उस से ज्यादा धन देने का फैसला लिया है . अगर आप उससे ज्यादा कहते तो भी मिल सकता था . बहरहाल अब आप जाइए ,, काम शुरू करिए . आपकी उम्मीद से ज्यादा तनखाह आपको मिलेगी.

आज उस दिन को बीस साल हो गए थे . मैं आज ही सोच रहा था कि अपने बीस साल पहले के दिन को याद करूंगा और कुछ लिखूंगा . मैंने बिलकुल नहीं सोचा था कि उस दिन को याद करते हुए मैं आज के वी एल नारायण राव के लिए श्रद्धांजलि लिखूंगा . दिल एकदम टूट गया है .

मैं एन डी टी वी में ज़्यादातर सुबह ही शिफ्ट में काम करता था . सुबह छः बजे से दिन के दो बजे तक . उसी शिफ्ट में अंग्रेज़ी बुलेटिन की इंचार्ज रेणु राव भी हुआ करती थीं. रेनू ने नारायण राव से विवाह किया था. रेनू . स्व. हेमवती नंदन बहुगुणा की भांजी थीं . मैं बहुगुणा जी को जानता था और इन दोनों की शादी में बहुगुणा जी के आवास सुनहरी बाग़ रोड पर शामिल हुआ था . यह दोनों इन्डियन एक्सप्रेस में मिले थे जहां राधिका रॉय डेस्क की इंचार्ज हुआ करती थीं . बाद में नारायण राव , आई आर एस में चुन लिए गए . कुछ साल वहां काम किया लेकिन जब राधिका रॉय ने एन डी टी वी को बड़ा बनाने का फैसला किया तो उन्होंने नारायण राव को अपने साथ आने का प्रस्ताव दिया . उन्होंने नौकरी छोड़ी और एन डी टी वी आ गए . रेनू वहां पहले से ही थीं. एन डी टी वी में काम करने का जी बेहतरीन माहौल था , अब शायद नहीं है , उसको राधिका रॉय की प्रेरणा से नारायण राव ने ही बनाया था.

नारायण राव से किसी ने पूछा कि इनकम टैक्स के बड़े पद पर आप थे, उसको छोड़कर प्राइवेट कंपनी में क्यों आ गए . उन्होंने कहा कि वहां तनखाह कम थी , यहाँ पैसे बनाने आया हूँ . नारायण राव ने इनकम टैक्स विभाग में भी बहुत इमानदारी का जीवन जिया था .उनके पिता , स्व.जनरल के वी कृष्णा राव ,भारतीय सेना के प्रमुख रह चुके थे . रिटायर होने के बाद जम्मू-कश्मीर, त्रिपुरा,नगालैंड और मणिपुर के राज्यपाल भी हुए ..नारायण राव ने अपने बहुत ही बड़े इन्सान और आदरणीय पिता के गौरव को अपना आदर्श मानते थे . के वी एल नारायण राव को मैं कभी नहीं भुला पाऊंगा .
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लेखक विषय संवाद साभार अनुवादक

पहले वो आए साम्यवादियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं साम्यवादी नहीं था

 

फिर वो आए मजदूर संघियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं मजदूर संघी नहीं था

 

फिर वो यहूदियों के लिए आए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं यहूदी नहीं था

 

फिर वो आए मेरे लिए

और तब तक बोलने के लिए कोई बचा ही नहीं था

 

मार्टिन नीमोलर (1892-1984)