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जनपक्षधर चेतना का सामूहिक मंच
Updated: 5 hours 56 min ago

संगीत और सांप्रदायिक पूर्वाग्रह : कुलदीप कुमार

Wed, 09/08/2017 - 21:28



पश्चिम के साथ साक्षात्कार की प्रक्रिया में उन्नीसवीं सदी में हिंदुओं और मुसलमानों ने अपनी-अपनी अस्मिता को अपने “गौरवपूर्ण अतीत” के आलोक में समझने और परिभाषित करने का प्रयास किया और इस प्रक्रिया में स्वयं को न केवल सांस्कृतिक बल्कि एक राजनीतिक समुदाय के रूप में भी पुनर्गठित किया। सांप्रदायिकता इसी प्रक्रिया के दौरान उत्पन्न विचारधारा है जिसकी बुनियाद अपने समुदाय के हितों को दूसरे समुदाय के हितों के खिलाफ समझने पर रखी गई है। ज़ाहिर है कि इस क्रम में अपने समुदाय का गौरवगान करने और दूसरे समुदाय से नफरत करने की प्रवृत्ति का पैदा होना बहुत स्वाभाविक है। 
भारतीय उपमहाद्वीप का संगीत उसमें रहने वाले सभी निवासियों के योगदान से बना संगीत है जिस पर किसी एक समुदाय का एकाधिकार नहीं है। ऐतिहासिक कारणों से किसी एक समुदाय का अल्प या दीर्घ अवधि के लिए वर्चस्व तो स्थापित हो सकता है लेकिन एकाधिकार कभी भी स्थापित नहीं हो सकता; और, यह वर्चस्व भी स्थायी नहीं होता क्योंकि दूसरा समुदाय स्थापित सत्ता-समीकरण को बदलने के लिए हमेशा सक्रिय रहता है। यदि इस सक्रियता के पीछे केवल बेहतर कलासृजन की प्रेरणा हो तो किसी को कोई आपत्ति नहीं हो सकती। लेकिन यदि इसके पीछे शुद्ध सांप्रदायिक आग्रह हो समस्या पैदा होती है। 
संगीतकार संगीत को ईश्वर की आराधना बताते हैं। अक्सर उन्हें यह कहते हुए भी पाया जाता है कि संगीत उनके लिए ईश्वर तक पहुँचने का साधन है। नाद को ब्रह्म भी माना जाता है और कहा जाता है कि संगीत देश, काल, जाति, धर्म और संप्रदाय---सभी सीमाओं का अतिक्रमण करता है क्योंकि वह सार्वदेशिक एवं सार्वकालिक है। संगीतकार का धर्म केवल संगीत है क्योंकि स्वरों का कोई धर्म नहीं होता। लेकिन यह आदर्श स्थिति का वर्णन है, वास्तविक स्थिति का नहीं। उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध से लेकर अब तक सम्पूर्ण भारतीय उपमहाद्वीप में जिस तरह सांप्रदायिकता की विषबेल फली-फूली है, उसके कारण देश का विभाजन करने वाली इस विचारधारा के जहरीले असर से संगीत भी अछूता नहीं रह सका है। 
पुरानी पत्रिकाएँ उलटने-पलटने के क्रम में ‘अकार’ का एक अंक (अगस्त 2013-नवंबर 2013) हाथ में आया जिसमें सैयद जुल्फिकार अली बुखारी की आत्मकथा ‘सरगुजश्त’ का एक अंश छपा है। सैयद जुल्फिकार अली बुखारी सैयद अहमद शाह बुखारी (उर्दू के मशहूर व्यंग्यकार पितरस बुखारी) के छोटे भाई थे और आजादी के पहले इन दोनों भाइयों का ऑल इंडिया रेडियो पर ऐसा वर्चस्व था कि उसे मज़ाक में लोग बीबीसी (बुखारी ब्रदर्स कॉर्पोरेशन) कहने लगे थे। विभाजन के बाद जुल्फिकार बुखारी रेडियो पाकिस्तान में काफी समय तक काम करने के बाद उसके महानिदेशक भी बने। यह आत्मकथा उन्होंने पाकिस्तान में ही लिखी लेकिन इस अंश का संबंध 1930 के बाद के विभाजनपूर्व भारत से है। 
बुखारी लिखते हैं: “अब इनको कौन बताए कि मद्रास को छोड़कर बाकी तमाम हिंदुस्तान में अगर मौसिकी का इल्म है तो सिर्फ मुसलमानों को, मौसिकी हिंदुओं के नजदीक भी नहीं गई। मैं ये बात किसी तअस्सुब (पूर्वाग्रह) की बिना पर नहीं कहता, इल्म के मामले में तअस्सुब कैसा? हकीकत ये है कि हमारे हिंदुस्तान में आने से कब्ल (पहले) यहाँ सिर्फ चार सुर रायज (प्रचलित) थे। मुसलमानों ने सात सुर यहाँ आकर रायज किए। ये तमाम मौसिकी मुसलमानों की आवरदा (लाई हुई) है। मद्रास में इस मौसिकी को अरब लाये और शुमाली (उत्तरी) हिंदुस्तान में ईरान के रास्ते से आने वाले मुसलमान।” विष्णु दिगंबर पलुस्कर--- जिनके ओंकारनाथ ठाकुर, विनायकराव पटवर्धन, नारायणराव व्यास, डी. वी. पलुस्कर और बी. आर. देवधर जैसे यशस्वी शिष्य हुए--- के बारे में बुखारी साहब के उद्गार कुछ यूं निकले हैं: “भाईजान मरहूम और मैं दोनों विष्णु दिगंबर के लाहौर वाले स्कूल में दाखिल हुए ताकि देखें तो सही कि ये लोग क्या करते हैं। मगर चंद ही दिनों में लाहौल पढ़कर बाहर आ गए। अब कौन बैठकर भजन गाता और वो भी बेसुरे उस्ताद की आवाज के साथ आवाज मिलाकर।” 
पाकिस्तानी फिल्मों के मशहूर संगीत निर्देशक खुर्शीद अनवर ने वॉइस ऑफ अमेरिका की उर्दू सर्विस के प्रमुख ब्रायन सिल्वर को दिये एक इंटरव्यू में भी यही बात कही थी कि हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत मुसलमानों का है। कान्हड़ा का जिक्र आने पर उन्होंने कहा कि सभी तरह के कान्हड़े, चाहे वह दरबारी कान्हड़ा हो या कौंसी कान्हड़ा या हुसैनी कान्हड़ा या नायकी कान्हड़ा—ये सभी मुसलमानों के ही बनाए हुए हैं। यूं सभी यह जानते हैं कि दरबारी कान्हड़ा, मियां की तोड़ी, मियां की सारंग, मियां मल्हार जैसे मशहूर राग तानसेन के बनाए हुए हैं जिनके बारे में अभी तक तय नहीं हो पाया है कि वे अपना धर्म छोड़कर मुसलमान बने थे या नहीं। आचार्य बृहस्पति जैसे प्रकांड विद्वान और संगीतशास्त्री का मत है कि तानसेन ने कभी इस्लाम स्वीकार नहीं किया क्योंकि समकालीन ऐतिहासिक दस्तावेजों में इस बात का कोई जिक्र नहीं है और इसका पहले-पहल उल्लेख अठारहवीं सदी में मिलता है।
संगीत जगत हिन्दू सांप्रदायिक भावनाओं और उद्देश्यों से अछूता रहा हो, ऐसा भी नहीं है। विष्णु दिगंबर पलुस्कर और विष्णु नारायण भातखंडे ने संगीत-शिक्षण की जो संस्थाएं खोलीं, उनके द्वारा काफी हद तक इनकी पूर्ति हुई। पलुस्कर के यशस्वी शिष्यों ने उनकी परंपरा को देश भर में फैलाया और आज वह लगभग वर्चस्व वाली स्थिति में है। लेकिन यह भी एक विचारणीय विषय है कि उनकी शिष्य-परंपरा में एक भी ऐया मुस्लिम संगीतकार क्यों नहीं है जो संगीत सम्मेलनों के मंचों पर नज़र आता हो। जबकि सच्चाई यह है कि अगर ग्वालियर घराने के संस्थापक हद्दू खां-हस्सू खां अपनी गायकी हिन्दू शिष्यों को न सिखाते तो विष्णु दिगंबर पलुस्कर का उदय ही न होता। शिक्षित हिन्दू मध्यवर्ग में संगीत के प्रचार के उद्देश्य से पलुस्कर ने तुलसीदास, सूरदास, मीरा और नानक जैसे संत कवियों की पंक्तियां लेकर उन्हें रागों में बांधा, भजन के अतिरिक्त संगीत के अन्य प्रकारों को त्याज्य माना और इस तरह इस धारणा को बल प्रदान किया कि भारतीय संगीत मुख्यतः धर्म से जुड़ा है और मुस्लिम शासकों के दौर में संगीतकारों और संगीत, दोनों के (चारित्रिक) स्तर में गिरावट आई। 
सांप्रदायिक दृष्टि से संगीत को देखने के परिणामस्वरूप पाकिस्तान और भारत, दोनों में एक अजीब किस्म की कोशिश की गई और रागों के नाम बदले गए। सौभाग्य से यह कोशिश कामयाब नहीं हो सकी। पाकिस्तान में रामकली, दुर्गा, भैरव, शंकरा, श्याम कल्याण जैसे उन रागों के नाम बदलने की कोशिश हुई जिनमें  हिन्दू देवी-देवताओं के नाम आते थे और बन्दिशों में भी ऐसे ही परिवर्तन किए गए लेकिन यह कोशिश विफल रही। भारत में ओंकारनाथ ठाकुर ने राग जौनपुरी को जीवनपुरी कहना शुरू किया जबकि यह सर्वमान्य तथ्य है कि इस राग की रचना जौनपुर के सुल्तान हुसैन शाह शर्क़ी ने की थी। पुराने लोग अभी भी याद करते हैं कि ओंकारनाथ ठाकुर संगीत सम्मेलन के मंच को गंगाजल से शुद्ध करके और उस पर अपनी मृगछाला बिछाकर बैठने के बाद ही अपना गायन शुरू करते थे। इसी तरह यमन को केवल कल्याण कहने की परंपरा भी डाली जा रही है। लेकिन सौभाग्य से यह प्रयास भी परवान नहीं चढ़ पा रहा है। 
विष्णु नारायण भातखंडे ने संगीत के हिंदूकरण की कोशिश नहीं की, लेकिन उनका संस्कृत में लिखे गए प्राचीन संगीत ग्रन्थों पर ज़रूरत से ज़्यादा ज़ोर था। जानकी बाखले ने अपनी पुस्तक “टु मेन एंड म्यूज़िक” में विस्तार से वर्णन किया है कि किस तरह वे मुस्लिम उस्तादों से संस्कृत ग्रन्थों के बारे में सवाल करते थे और यह सिद्ध करते थे कि उनकी गायकी का कोई प्रामाणिक सैद्धान्तिक आधार नहीं है। लेकिन इन्हीं उस्तादों की सहायता लेना उनकी मजबूरी थी और उनसे ही राग-चर्चा करके और बन्दिशें एकत्रित करके भातखंडे ने अपनी पुस्तकें लिखीं। यही नहीं, जब उन्होंने लखनऊ में संगीत शिक्षण के लिए मैरिस कॉलेज की स्थापना की तब खानदानी संगीतजीवी मुस्लिम संगीतकारों को अध्यापन के लिए नियुक्त करना पड़ा। मैक्स कैट्ज़ ने ‘सांस्थानिक सांप्रदायिकता’ पर लखनऊ में किए गए अपने शोध के आधार पर दर्शाया है कि किस तरह इस विद्यालय में, जिसे अब भातखंडे संगीत संस्थान के नाम से जाना जाता है और 2000 से जिसे विश्वविद्यालय का दर्जा भी प्राप्त है, मुस्लिम उस्तादों और छात्रों की संख्या में लगातार कमी आती गई। यह प्रक्रिया इस विद्यालय में ही नहीं, समूचे संगीत जगत में चली है जिसके कारण मुस्लिम उस्तादों से संगीत सीखने वाले शिक्षित हिन्दू मध्यवर्ग के संगीतकारों की व्यापक उपस्थिति के कारण खानदानी मुस्लिम संगीतकार लगातार हाशिये की तरफ ठेले जाते रहे। इन संगीत विद्यालयों के कारण संगीत का प्रचार-प्रसार तो हुआ लेकिन ये एक भी बड़ा कलाकार देने में असमर्थ रहे। 
यह मान्यता भी फैलाई गई कि मुसलमानों के आगमन के कारण उत्तर भारत का संगीत दूषित हो गया लेकिन दक्षिण भारत का संगीत इससे बचा रहा। 1974 में प्रकाशित पुस्तक “मुसलमान और भारतीय संगीत” में आचार्य बृहस्पति ने इस धारणा का खंडन करते हुए सिद्ध किया कि किस तरह मुसलमानों के साथ आए ईरानी संगीत के साथ संपर्क में आने से भारतीय संगीत की श्रीवृद्धि हुई और उसमें परिवर्तन आए। मूर्छना-पद्धति के स्थान पर मेल-पद्धति आ गई और “संस्कृत के अनेक ग्रंथ मेल पद्धति के आधार पर लिखे गए”। भातखंडे ने भी मेल-पद्धति के आधार पर ही रागों का वर्गीकरण और रूप-निर्धारण किया। उन्होंने तो अपने विचारों को मनवाने के लिए ‘चतुर पंडित’ के छद्मनाम ने संस्कृत में ग्रन्थों की रचना भी कर डाली ताकि उन पर प्राचीनता की प्रामाणिकता का ठप्पा लग जाए। 
अब तो कैथरीन बटलर स्कोफील्ड जैसे शोधकर्ताओं ने निर्णायक रूप से सिद्ध कर दिया है कि मुग़ल बादशाह औरंगज़ेब ने संगीत को देशनिकाला नहीं दिया था, केवल पकी उम्र होने पर दरबार में उसके इस्तेमाल पर पाबंदी लगा दी थी। लेकिन आचार्य बृहस्पति ने तो 1974 में प्रकाशित इस पुस्तक में ही स्पष्ट शब्दों में लिख दिया था कि “1667-1668 में औरंगजेब ने आदेश दिया कि गायक लोग दरबार में आयें, पर गाना न गायें। इस आदेश के कारण विशुद्ध राजनीतिक थे। इटालियन इतिहासकर मनुक्कि के अनुसार इस प्रतिबंध के बाद भी औरंगजेब बेगमों और शाहज़ादियों के मनोरंजन के लिए गायिकाओं और नर्तकियों की नियुक्ति करता था और अंतःपुर में गाना-बजाना होता था”। लेकिन सांप्रदायिक पूर्वाग्रहों के कारण औरंगजेब की संगीत-विरोधी कट्टर मुस्लिम शासक वाली छवि आज भी बनी हुई है जबकि आचार्य बृहस्पति उसके इस प्रकार के निर्णयों के पीछे विशुद्ध राजनीतिक कारण मानते हैं।  
इस सबके बावजूद अच्छी बात यह है कि इन सांप्रदायिक रुझानों के बावजूद अभी तक हिंदुस्तानी संगीत जगत में सांप्रदायिक सद्भाव बना हुआ है।  हालांकि इसके साथ ही यह भी सही है कि खानदानी घरानेदार मुस्लिम गायकों और वादकों की संख्या में लगातार कमी आती जा रही है। खयाल के कुछ घरानों में तो मुस्लिम गायक लगभग विलुप्त-से होते जा रहे हैं। संगीत सम्मेलनों के मंच पर अब ग्वालियर, आगरा और जयपुर जैसे घरानों समादृत मुस्लिम कलाकार ढूँढने पर ही मिलेंगे। संगीत को समाज और राज्य की ओर से मिलने वाले आर्थिक-राजनीतिक समर्थन और संरक्षण की संरचनागत समस्याओं की भी इस प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका है। इस महत्वपूर्ण विषय पर आगे कभी चर्चा करेंगे। 

नब्बे के दशक में कश्मीरी पंडितों का पलायन : कुछ तथ्य

Wed, 05/07/2017 - 14:47

·         अशोक कुमार पाण्डेय
1-     1990 के दशक में कश्मीर घाटी में आतंकवाद के चरम के समय बड़ी संख्या में कश्मीरी पंडितों ने घाटी से पलायन किया. पहला तथ्य संख्या को लेकर. कश्मीरी पंडित समूह और कुछ हिन्दू दक्षिणपंथी यह संख्या चार लाख से सात लाख तक बताते हैं. लेकिन यह संख्या वास्तविक संख्या से बहुत अधिक है. असल में कश्मीरी पंडितों की आख़िरी गिनती 1941 में हुई थी और उसी से 1990 का अनुमान लगाया जाता है. इसमें 1990 से पहले रोज़गार तथा अन्य कारणों से कश्मीर छोड़कर चले गए कश्मीरी पंडितों की संख्या घटाई नहीं जाती. अहमदाबाद में बसे कश्मीरी पंडित पी एल डी परिमू ने अपनी किताब “कश्मीर एंड शेर-ए-कश्मीर : अ रिवोल्यूशन डीरेल्ड” में 1947-50 के बीच कश्मीर छोड़ कर गए पंडितों की संख्या कुल पंडित आबादी का 20% बताया है. (पेज़-244) चित्रलेखा ज़ुत्शी ने अपनी किताब “लेंग्वेजेज़ ऑफ़ बिलॉन्गिंग : इस्लाम, रीजनल आइडेंटीटी, एंड मेकिंग ऑफ़ कश्मीर” में इस विस्थापन की वज़ह नेशनल कॉन्फ्रेंस द्वारा लागू किये गए भूमि सुधार को बताया है (पेज़-318) जिसमें जम्मू और कश्मीर में ज़मीन का मालिकाना उन ग़रीब मुसलमानों, दलितों तथा अन्य खेतिहरों को दिया गया था जो वास्तविक खेती करते थे, इसी दौरान बड़ी संख्या में मुस्लिम और राजपूत ज़मींदार भी कश्मीर से बाहर चले गए थे. ज्ञातव्य है कि डोगरा शासन के दौरान डोगरा राजपूतों, कश्मीरी पंडितों और कुलीन मुसलमानों के छोटे से तबके ने कश्मीर की लगभग 90 फ़ीसद ज़मीनों पर कब्ज़ा कर लिया था. (विस्तार के लिए देखें “हिन्दू रूलर्स एंड मुस्लिम सब्जेक्ट्स”, मृदु राय) इसके बाद भी कश्मीरी पंडितों का नौकरियों आदि के लिए कश्मीर से विस्थापन जारी रहा (इसका एक उदाहरण अनुपम खेर हैं जिनके पिता 60 के दशक में नौकरी के सिलसिले में शिमला आ गए थे) सुमांत्रा बोस ने अपनी किताब “कश्मीर : रूट्स ऑफ़कंफ्लिक्ट, पाथ टू पीस” में यह संख्या एक लाख बताई है,( पेज़ 120)  राजनीति विज्ञानी अलेक्जेंडर इवांस विस्थापित पंडितों की संख्या डेढ़ लाख से एक लाख साठ हज़ार बताते हैं, परिमू यह संख्या ढाई लाख बताते हैं. सी आई ए ने एक रिपोर्ट में यह संख्या तीन लाख बताई है. एक महत्त्वपूर्ण तथ्य अनंतनाग के तत्कालीन कमिश्नर आई ए एस अधिकारी वजाहत हबीबुल्लाह कश्मीरी पंडित संघर्ष समिति श्रीनगर की 7 अप्रैल, 2010 प्रेस रिलीज़ के हवाले से बताते हैं कि लगभग 3000 कश्मीरी पंडित परिवार स्थितियों के सामान्य होने के बाद 1998 के आसपास कश्मीर से पलायित हुए थे. (देखें, पेज़ 79,माई कश्मीर : द डाइंग ऑफ़ द लाईट, वजाहत हबीबुल्ला). बता दूँ कि कश्मीरी पंडित संघर्ष समिति इन भयानक स्थितियों के बाद भी कश्मीर से पलायित होने से इंकार करने वाले पंडितों का संगठन है. अब भी कोई साढ़े तीन हज़ार कश्मीरी पंडित घाटी में रहते हैं, बीस हज़ार से अधिक सिख भी हैं और नब्बे के दशक के बाद उन पर अत्याचार की कोई बड़ी घटना नहीं हुई, हाँ हर आम कश्मीरी की तरह उनकी अपनी आर्थिक समस्याएं हैं जिस पर अक्सर कोई ध्यान नहीं देता. हाल में ही तीस्ता सीतलवाड़ ने उनकी मदद के लिए अपील जारी की थी. साथ ही एक बड़ी समस्या लड़कों की शादी को लेकर है क्योंकि पलायन कर गए कश्मीरी पंडित अपनी बेटियों को कश्मीर नहीं भेजना चाहते.
गुजरात हो कि कश्मीर, भय से एक आदमी का भी अपनी ज़मीन छोड़ना भयानक है, लेकिन संख्या को बढ़ा कर बताना बताने वालों की मंशा तो साफ़ करता ही है.  
2-     उल्लिखित पुस्तक में ही परिमू ने बताया है कि उसी समय लगभग पचास हज़ार मुसलमानों ने घाटी छोड़ी. कश्मीरी पंडितों को तो कैम्पों में जगह मिली, सरकारी मदद और मुआवज़ा भी. लेकिन मुसलमानों को ऐसा कुछ नहीं मिला (देखें, वही) सीमा क़ाज़ी अपनी किताब “बिटवीन डेमोक्रेसी एंड नेशन” में ह्यूमन राईट वाच की एक रपट के हवाले से बताती हैं कि 1989 के बाद से पाकिस्तान में 38000 शरणार्थी कश्मीर से पहुँचे थे. केप्ले महमूद ने अपनी मुजफ्फराबाद यात्रा में पाया कि सैकड़ों मुसलमानों को मार कर झेलम में बहा दिया गया था. इन तथ्यों को साथ लेकर वह भी उस दौर में सेना और सुरक्षा बलों के अत्याचार से 48000 मुसलमानों के विस्थापन की बात कहती हैं. इन रिफ्यूजियों ने सुरक्षा बलों द्वारा, पिटाई, बलात्कार और लूट तक के आरोप लगाए हैं. अफ़सोस कि 1947 के जम्मू नरसंहार (विस्तार के लिए इंटरनेट पर वेद भसीन के उपलब्ध साक्षात्कार या फिर सईद नक़वी की किताब “बीइंग द अदर” के पेज़ 173-193) की तरह इस विस्थापन पर कोई बात नहीं होती.
3-     1989-90 के दौर में कश्मीरी पंडितों की हत्याओं के लेकर भी सरकारी आँकड़े सवा सौ और कश्मीरी पंडितों के दावे सवा छः सौ के बीच भी काफ़ी मतभेद हैं. लेकिन क्या उस दौर में मारे गए लोगों को सिर्फ़ धर्म के आधार पर देखा जाना उचित है.
परिमू के अनुसार हत्यारों का उद्देश्य था कश्मीर की अर्थव्यवस्था, न्याय व्यवस्था और प्रशासन को पंगु बना देने के साथ अपने हर वैचारिक विरोधी को मार देना था. इस दौर में मरने वालों में नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेता मोहम्मद युसुफ़ हलवाई,  मीरवायज़  मौलवी फ़ारूक़, नब्बे वर्षीय पूर्व स्वतन्त्रता संग्राम सेनानी मौलाना मौदूदी, गूजर समुदाय के सबसे प्रतिष्ठित नेता क़ाज़ी निसार अहमद, विधायक मीर मुस्तफ़ा,  श्रीनगर दूरदर्शन के डायरेक्टर लासा कौल, एच एम टी के जनरल मैनेज़र एच एल खेरा, कश्मीर विश्वविद्यालय के उपकुलपति प्रोफ़ेसर मुशीर उल हक़ और उनके सचिव अब्दुल गनी, कश्मीर विधान सभा के सदस्य नाज़िर अहमद वानी आदि शामिल थे (वही, पेज़ 240-41) ज़ाहिर है आतंकवादियों के शिकार सिर्फ़ कश्मीरी पंडित नहीं, मुस्लिम भी थे. हाँ, पंडितों के पास पलायित होने के लिए जगह थी, मुसलमानों के लिए वह भी नहीं. वे कश्मीर में ही रहे और आतंकवादियों तथा सुरक्षा बलों, दोनों के अत्याचारों के शिकार होते रहे.
जगमोहन के कश्मीर में शासन के समय वहाँ के लोगों के प्रति रवैये को जानने के लिए एक उदाहरण काफी होगा. 21 मई 1990 को जब मौलवी फ़ारूक़ की हत्या के बाद जब लोग सड़कों पर आ गए तो वह एक आतंकवादी संगठन के ख़िलाफ़ थे लेकिन जब उस जुलूस पर सेना ने गोलियाँ चलाईं और भारतीय प्रेस के अनुसार 47 (और बीबीसी के अनुसार 100 लोग) गोलीबारी में मारे गए तो यह गुस्सा भारत सरकार के ख़िलाफ़ हो गया. (देखें, कश्मीर : इंसरजेंसी एंड आफ़्टर, बलराज पुरी, पेज़-68) गौकादल में घटी यह घटना नब्बे के दशक में आतंकवाद के मूल में मानी जाती है. इन दो-तीन सालों में मारे गए कश्मीरी मुसलमानों की संख्या 50000 से एक लाख तक है. श्रीनगर सहित अनेक जगहों पर सामूहिक क़ब्रें मिली हैं. आज भी वहाँ हज़ारो माएं और व्याह्ताएं “आधी” हैं – उनके बेटों/पतियों के बारे में वे नहीं जानती कि वे ज़िंदा हैं भी या नहीं, बस वे लापता हैं.  (आप तमाम तथ्यों के अलावा शहनाज़ बशीर का उपन्यास “द हाफ़ मदर” पढ़ सकते हैं.)
4-     कश्मीर से पंडितों के पलायनों में जगमोहन की भूमिका को लेकर कई बातें होती हैं. पुरी के अनुसार जगमोहन को तब भाजपा और तत्कालीन गृह मंत्री मुफ़्ती मोहम्मद सईद के कहने पर कश्मीर का गवर्नर बनाया गया था. उन्होंने फ़ारूक़ अब्दुल्ला की सरकार को बर्ख़ास्त कर सारे अधिकार अपने हाथ में ले लिए थे. अल जज़ीरा को दिए एक साक्षात्कार में मृदु राय ने इस संभावना से इंकार किया है कि योजनाबद्ध तरीक़े से इतनी बड़ी संख्या में पलायन संभव है. लेकिन वह कहती हैं कि जगमोहन ने पंडितों को कश्मीर छोड़ने के लिए प्रेरित किया.  वजाहत हबीबुल्लाह पूर्वोद्धरित किताब में बताते हैं कि उन्होंने जगमोहन से दूरदर्शन पर कश्मीरी पंडितों से एक अपील करने को कहा था कि वे यहाँ सुरक्षित महसूस करें और सरकार उनकी पूरी सुरक्षा उपलब्ध कराएगी. लेकिन जगमोहन ने मना कर दिया, इसकी जगह अपने प्रसारण में उन्होंने कहा कि “पंडितों की सुरक्षा के लिए रिफ्यूजी कैम्प बनाये जा रहे हैं, जो पंडित डरा हुआ महसूस करें वे इन कैम्पस में जा सकते हैं, जो कर्मचारी घाटी छोड़ कर जायेंगे उन्हें तनख्वाहें मिलती रहेंगी.” ज़ाहिर है इन घोषणाओं ने पंडितों को पलायन के लिए प्रेरित किया. (पेज़ 86 ;मृदु राय ने भी इस तथ्य का ज़िक्र किया है). कश्मीर के वरिष्ठ राजनीतिज्ञ और पत्रकार बलराज पुरी ने अपनी किताब “कश्मीर : इंसरजेंसी एंड आफ़्टर” में जगमोहन की दमनात्मक कार्यवाहियों और रवैयों को ही कश्मीरी पंडितों के विस्थापन का मुख्य ज़िम्मेदार बताया है.(पेज़ 68-73). ऐसे ही निष्कर्ष वर्तमान विदेश राज्य मंत्री और वरिष्ठ पत्रकार एम जे अकबर ने अपनी किताब “बिहाइंड द वेल” में भी दिए हैं. (पेज़ 218-20) कमिटी फॉर इनिशिएटिव ऑन कश्मीर की जुलाई 1990 की रिपोर्ट “कश्मीर इम्प्रिजंड” में नातीपुरा, श्रीनगर में रह रहे एक कश्मीरी पंडित ने कहा कि “इस इलाक़े के कुछ लोगों ने दबाव में कश्मीर छोड़ा. एक कश्मीरी पंडित नेता एच एन जट्टू लोगों से कह रहे थे कि अप्रैल तक सभी पंडितों को घाटी छोड़ देना है. मैंने कश्मीर नहीं छोड़ा, डरे तो यहाँ सभी हैं लेकिन हमारी महिलाओं के साथ कोई ऐसी घटना नहीं हुई.” 18 सितम्बर, 1990 को स्थानीय उर्दू अखबार अफ़साना में छपे एक पत्र में के एल कौल ने लिखा – “पंडितों से कहा गया था कि सरकार कश्मीर में एक लाख मुसलमानों को मारना चाहती है जिससे आतंकवाद का ख़ात्मा हो सके. पंडितों को कहा गया कि उन्हें मुफ़्त राशन,घर, नौकरियाँ आदि सुविधायें दी जायेंगी. उन्हें यह कहा गया कि नरसंहार ख़त्म हो जाने के बाद उन्हें वापस लाया जाएगा.”  हालाँकि ये वादे पूरे नहीं किये गए पर कश्मीरी विस्थापित पंडितों को मिलने वाला प्रति माह मुआवज़ा भारत में अब तक किसी विस्थापन के लिए दिए गए मुआवज़े से अधिक है. समय समय पर इसे बढ़ाया भी गया, आख़िरी बार उमर अब्दुल्ला के शासन काल में. आप गृह मंत्रालय की वेबसाईट पर इसे देख सकते हैं. बलराज पुरी ने अपनी किताब में दोनों समुदायों की एक संयुक्त समिति का ज़िक्र किया है जो पंडितों का पलायन रोकने के लिए बनाई गई थी. इसके सदस्य थे – पूर्व हाईकोर्ट जज मुफ़्ती बहाउद्दीन फ़ारूकी (अध्यक्ष), एच एन जट्टू (उपाध्यक्ष) और वरिष्ठ वक़ील ग़ुलाम नबी हग्रू (महासचिव). ज्ञातव्य है कि 1986 में ऐसे ही एक प्रयास से पंडितों को घाटी छोडने से रोका गया था. पुरी बताते हैं कि हालाँकि इस समिति की कोशिशों से कई मुस्लिम संगठनों, आतंकी संगठनों और मुस्लिम नेताओं से घाटी न छोड़ने की अपील की, लेकिन जट्टू ख़ुद घाटी छोड़कर जम्मू चले गए. बाद में उन्होंने बताया कि समिति के निर्माण और इस अपील के बाद जगमोहन ने उनके पास एक डीएसपी को जम्मू का एयर टिकट लेकर भेजा जो अपनी जीप से उन्हें एयरपोर्ट छोड़ कर आया, उसने जम्मू में एक रिहाइश की व्यवस्था की सूचना दी और तुरंत कश्मीर छोड़ देने को कहा! ज़ाहिर है जगमोहन ऐसी कोशिशों को बढ़ावा देने की जगह दबा रहे थे. (पेज़ 70-71)
कश्मीरी पंडितों का पलायन भारतीय लोकतंत्र के मुंह पर काला धब्बा है, लेकिन यह सवाल अपनी जगह है कि क़ाबिल अफ़सर माने जाने वाले जगमोहन कश्मीर के राज्यपाल के रूप मे लगभग 400000 सैनिकों की घाटी मे उपस्थिती के बावज़ूद इसे रोक क्यों न सके? अपनी किताब “कश्मीर : अ ट्रेजेडी ऑफ़ एरर्स” में तवलीन सिंह पूछती हैं – कई मुसलमान यह आरोप लगाते हैं कि जगमोहन ने कश्मीरी पंडितों को घाटी छोड़ने के लिए प्रेरित किया. यह सच हो या नहीं लेकिन यह तो सच ही है कि जगमोहन के कश्मीर में आने के कुछ दिनों के भीतर वे समूह में घाटी छोड़ गए और इस बात के पर्याप्त सबूत हैं कि जाने के लिए संसाधन भी उपलब्ध कराये गए.”

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मित्रों से अनुरोध है कि कश्मीर में रह रहे कश्मीरी पंडितों के संगठन कश्मीरी पंडित संघर्ष समिति और उसके कर्ता धर्ता संजय टिक्कू के बयान और साक्षात्कार पढ़ लें। मिल जाएंगे इंटरनेट पर बिखरे। 

असल मे जैसा कि एक कश्मीरी पंडित उपन्यासकार निताशा कौल कहती हैं - कश्मीरी पंडित हिंदुत्व की ताक़तों के राजनीतिक खेल के मुहरे बन गए हैं। विस्तार के लिए वायर में छपा उनका 7 जुलाई 2016 का लेख पढ़ लें। जब निताशा ने अल जज़ीरा के एक प्रोग्राम में राम माधव का प्रतिकार किया तो कश्मीरी पंडितों के संघ समर्थक समूह के युवाओं ने उनको भयानक ट्रॉल किया। दिक़्क़त यह है कि भारतीय मीडिया संघ से जुड़े पनुन कश्मीर (पूर्व में सनातन युवक सभा) को ही कश्मीरी पंडितों का इकलौता प्रतिनिधि मानता है। वह दिल्ली में रह रहे बद्री रैना जैसे कश्मीरी पंडितों के पास भी नहीं जाना चाहता। -----

ये बस कुछ तथ्य हैं, लेकिन इनके आधार पर आप चीज़ों का दूसरा चेहरा दिखा सकते हैं. एक सवाल और है – क्या कश्मीरी पंडित कभी घाटी में लौट सकेंगे?
अभी मै दो सवाल छोड़कर जा रहा हूँ –
क्या कश्मीरी पंडित घाटी लौटना चाहते हैं?क्या दिल्ली और श्रीनगर चाहते हैं कि कश्मीरी पंडित घाटी में लौटें?

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लेखक इन दिनों “कश्मीरनामा : भविष्य की क़ैद में इतिहास” नामक किताब लिख रहे हैं)


सबरंग हिन्दी से साभार 

ब्रिटेन में आम चुनाव के नतीजे: व्यवस्था के विकल्प की उम्मीदों के लिए शुभ संकेत- अक्षत

Fri, 09/06/2017 - 13:59
ब्रिटेन में आम चुनाव के परिणाम कॉर्पोरेट मीडिया घरानों और सर्वेक्षण एजेंसियों के लिए झटका हैं जिन्होंने इस बार प्रधानमंत्री थेरेसा मे और उनकी कंजरवेटिव पार्टी को जिताने के लिए पूंजीवादी लोकतंत्र के बुनियादी मानकों को भी ताक पर रख दिया था। ज्ञात हो कि यह चुनाव प्रधानमंत्री मे ने यूरोपीय संघ से पिछले वर्ष ब्रिटेन के निकल जाने के जनमत संग्रह के बाद पिछली कंज़र्वेटिव सरकार के कार्यकाल के बीच ,में ही रखवा दिए थे। पर लगता है मतदाताओं को उनकी यूरोपीय संघ से अलगाव की शर्तों पर वार्ता के लिए एक 'मज़बूत ' और 'स्थिर' नेतृत्व की अपील ज़्यादा भायी नहीं। सभी सर्वेक्षणों में थेरेसा में व कंज़र्वेटिव पार्टी को पिछली बार से ज़्यादा सीट और विपक्षीय लेबर पार्टी के आज की तमाम आर्थिक व अंतर्राष्ट्रीय नीतियों पर सुलझी हुई राय रखने वाले नेता जेरेमी कोर्बिन के लिए ज़बरदस्त हार और अस्तित्व की लड़ाई का डंका पीटा गया। अब तक आये नतीजों में सत्तापक्ष को सबसे ज़्यादा लेकिन पिछली बार से कहीं कम सीट मिली हैं , और नवउदारवाद और जनविरोधी नीतियों के समाज के निछले तबकों पर पड़ने वाले असर पर खुलकर बोलने वाले जेरेमी कोर्बिन की पार्टी ने अपेक्षा से ज़्यादा बेहतर प्रदर्शन किया है।
पिछले तीस वर्ष से पूंजीवादी सब्बसे भयानक स्वरुप नवउदारवाद की आर्थिक, राजनैतिक और सामाजिक जकड का कोई उत्तर नज़र नहीं आ रहा था। ब्रिटेन जैसे देशों में अस्पतालों, स्कूल व सार्वजनिक सेवाओं में फण्ड कटौती व निजीकरण से समाज में लोगों के भीख मांगने और सरकारी दया पर ज़िंदा रहने की नौबत आ गयी थी। सोवियत रूस के टूटने और यूरोपीय संघ के फैलने के साथ बड़ी कंपनियों ने मुनाफे के लिए पूर्वी यूरोप के सस्ते पड़ने वाले मज़दूर भरभर कर ब्रिटेन लाये। इधर मध्य पूर्व में अमेरिका की दखलंदाज़ी का पिछलग्गू बनकर अपने पूर्व साम्राज्यवादी स्वरुप के लौट आने के मुगालते में रहने वाले ब्रिटेन की सरकारों ने न सिर्फ एक बड़ा शरणार्थी संकट खड़ा किया बल्कि कट्टरपंथ के लिए रास्ते खोले और आतंरिक सुरक्षा पर भी ख़तरा मोल लिया। इन तीस सालों में यूरोप और अमेरिका के विकसित देशों में राजनैतिक पार्टियों में अंतर ख़त्म हो चला- सब एक सी आर्थिक नीतियां, मध्यवर्गीय अधिनायकवाद और मज़दूर वर्ग के प्रतिरोध को छितरा देने और उन्हें निराशाओं के जंजाल में अकेला घुटता छोड़ देने का पर्याय बन गयीं। खुद को सोशल डेमोक्रेटिक कहने वाली सेण्टर-लेफ्ट पार्टियों में 'लैफ्ट के नाम पर जनविरोधी आर्थिक नीतिओं पर थोथे अस्मितावाद और 'सामाजिक न्याय' की लफ़्फ़ाज़ी का कलफ चढ़ा दिया गया। ब्रिटैन में कभी ट्रेड यूनियन संघर्षों का पर्याय मानी जाने वाली लेबर पार्टी नब्बे के दशक में टोनी ब्लेयर के नेतृत्व में 'न्यू लेबर' में बदल गयी जहाँ बात-बात पर दुसरे देशों पर बम गिराना और अस्थिरता पैदा करना विदेश नीति का पर्याय बन गया और आर्थिक नीतियों में बड़ी कॉर्पोरेट कंपनियों को ज़बरदस्त छूट दी गयी। सन 2008 में स्टॉक मार्किट और हवा-हवाई विकास दर पर आधारित र्नीतियों का बुलबुला लालची शेयर दलाल और कंपनियों के लालच की अति से फुस्स हो गया। सरकारों ने घाटे में जा रहीं कंपनियों को बचाने के लिए रही-सही सामाजिक सुरक्षा में और ज़्यादा कटौती शुरू की, जिसका प्रभाव हताश निम्न-वर्ग में रोष उतपन्न करने वाला था। अमेरिका में इस रोष का फायदा रिपब्लिकन पार्टी के धूर दक्षिणपंथ ने डोनाल्ड ट्रम्प की जीत से उठाया। ब्रिटेन में शुरू में कोई वाम विकल्प न होने से पलड़ा नस्लभेदी समझ रखने वाली यूके इंडिपेंडेंस पार्टी की और मुड़ा। फिर 2015 का चुनाव आया और टोनी ब्लेयर की दोगली नीतियों ने लेबर पार्टी का आधार और खिसका दिया। अस्तित्व को जूझ रही पार्टी में शीर्ष नेतृत्व के लिए फिर चुनाव हुए। पार्टी के मूल में उभर रहे असंतोष को शांत करने के लिए एक सतही कदम के रूप में अब तक पार्टी के हाशिये पर रहे लेबर सोशलिस्ट धड़े के एक नेता को 'चुनाव को ज़्यादा लोकतान्त्रिक' बनाने के नाम पर खड़ा करवा दिया गया। पार्टी नेतृत्व का दांव उनपर तब उलटा पड़ गया जब बहसों और प्रचार के दौरान जेरेमी कोर्बिन अब तक हताश ट्रेड यूनियन, युवाओं और प्रगतिशील तबके के लिए विकल्प बनकर उभरे। तीस से ज़्यादा सालों से ट्रेड यूनियन संगठनकर्ता, पार्टी की सरकार में रहते हुए आर्थिक नीतियों और इराक युद्ध से लेकर परमाणु हथियारों का जमकर विरोध करने वाले कोर्बिन अपने प्रतिद्वंदियों पर भारी पड़े। लेबर पार्टी के ब्लेयरवादी धड़े में हड़कंप मच गया और तत्कालीन कंज़र्वेटिव प्रधानमंत्री डेविड कैमरन ने सोशल मीडिया पर लिखा कि 'लेबर पार्टी अब राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा ख़तरा है'. सन 2016 में यूरोपीय संघ में रहने का जनमत संग्रह कैमरन के लिए वॉटरलू साबित हुआ जब वे कॉर्पोरेट के फायदे के लिए लायी गयी नीतियों से श्रमिक वर्ग में उभरे असंतोष का अंदाज़ा लगाने में नाकाम रहे। उनके इस्तीफे के बाद थेरेसा में ने खुद को मार्गरेट थैचर की तर्ज पर सशक्त नेत्री के रूप में पेश किया। इधर ब्लेयरवादी धड़े ने कोर्बिन को निकलवाने के लिए पार्टी सांसदों का अविश्वास प्रस्ताव पारित करवाया और दोबारा नेतृत्व के लिए चुनाव हुए। पर अब लेबर पार्टी की सदस्य्ता में न सिर्फ तीव्र संख्यात्मक वृद्धि हुयी बल्कि गुणात्मक बदलाव आया। पढ़ाई में क़र्ज़ और नौकरियों में कटौती से हताश अब तक के अराजनैतिक युवा वर्ग ने कोर्बिन के लिए व्यापक समर्थन जुटाया। कोर्बिन फिर जीते और ब्लेयरवादियों का मुंह बंद हो गया। जैसे-जैसे कोर्बिन ने रोज़गार, शिक्षा, स्वस्थ्य, सार्वजनिक सेवाओं के निजीकरण वगैरह का सवाल उठाया और सीधे तौर पर उच्च वर्ग को निशाने पर लेते हुए उनके टैक्स में कटौती की जगह बढ़ौतरी की बात की, उनपर भीतरी और बाहरी हमले तेज़ हो गए। सनसनी जुटाने के लिए सेलिब्रिटी सितारों के घर के बाहर पहुँचने, उनके फोन हैक करने और ब्लैकमेल के लिए कुख्यात ब्रिटैन की टेबलायड प्रेस ने इसका बीड़ा उठाया। कोर्बिन को व्यक्तिगत रूप से निशाने पर लेकर उनकी छवि धूमिल किये जाने के प्रयास होने लगे। इराक युद्ध और दखलंदाज़ी की विदेशी नीति का उनका विरोध राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए ख़तरा बताया जाने लगा। उनकी आर्थिक नीतियों को 'कोरी कल्पना' बोला जाने लगा। यहाँ तक कि उनके व्यक्तिगत जीवन पर सवाल उठाये गए और उन्हें फिलिस्तीन और आयरलैंड में शांति बहाली का समर्थन करने के लिए आतंकवादियों के समर्थक का लेबल भी चस्पा कर दिया गया।
मज़ेदार बात यह है कि कोर्बिन का अजेंडा आर्थिक रूप से पिछली सदी के छठे दशक की वेलफेयर स्टेट नीति को जीवंत करना है, न कि आर्थिक संबंधों में मूल परिवर्तन करके पूंजीवाद ख़त्म करना। पर कॉर्पोरेट कंपनियों की मुनाफे की हवस इतनी बढ़ गयी है कि मोटे तौर पर आर्थिक दक्षिणपंथ और बाज़ारवादी तर्क समाज और राजनीती का कॉमन सेंस बना दिया गया है। इससे उपजे असंतोष, बेकारी, युद्ध और कट्टरपंथ पर ज़रा सुलझी बात करने वाला व्यक्ति अब 'हार्ड लैफ्ट या 'धुर वामपंती हो जाता है। ब्रिटिश प्रेस ने इस जुमले का इस्तेमाल कर लोगों के पूर्वाग्रहों को भड़काने की पूरी कोशिश की।
चुनाव घोषित होने पर जहाँ कोर्बिन ने मुफ्त शिक्षा, मुफ्त स्वस्थ्य, पेंशन बढ़ौतरी और रेल के दोबारा राष्ट्रीयकरण का प्रश्न उठाया, थेरेसा मे और उनके पिछलग्गू मीडिया ने इसे व्यक्ति-केंद्रित कर दिया। इधर ब्लेयरवादी लॉबी ने खुलेआम यह प्रचार शुरू किया कि कोर्बिन तो चुनाव जीत नहीं सकते, अतः उनकी 'अतीवादी' छवि से परेशान लेबर समर्थकों को ज़्यादा व्यवहारिक और माध्यममार्गीय सांसदों को चुन लेना चाहिए। चुनाव घोषणा की शुरुआत में सर्वेक्षण कंज़र्वेटिव पार्टी के लिए प्रचंड बहुमत और लेबर के लिए भारी नुक्सान दर्शाते रहे। पर समय के साथ सत्तापक्ष की बढ़त घटने लगी। प्रधानमंत्री में ने पूरा चुनाव यूरोपीय संघ से बाहर निकलने को लेकर होने वाले समझौते के लिए एक सशक्त छवि के ऊपर लड़ा। उन्होंने टेलीविज़न डिबेट भी हिस्सा नहीं लिया। वहीँ उनके लापरवाही से तैयार घोषणापत्र में वृद्धों को अपनी पेंशन के बदले ज़्यादा टैक्स देने की बात लीक हो गयी जिससे प्रधानमंत्री को बीच चुनाव पीछे हटना पड़ा। इधर लेबर के मैनिफेस्टो ने युवाओं और समाज के निम्न वर्ग में ज़बरदस्त उत्साह पैदा किया।
इसी बीच ब्रिटैन के अंदर एक बाद एक मेनचेस्टर और लंदन में दो आतंकी घटनाएं घटीं। पूरा विमर्श राष्ट्रीय सुरक्षा पर आ गया और मध्य पूर्व में आक्रामकता का विरोध करने का सुलझा पक्ष लेने वाले कोर्बिन मीडिया में देश के लिए खतरे का पर्याय बना दिए गए। इधर कंज़र्वेटिव पार्टी को नस्लभेदी यूकेआईपी का वोट स्थानांतरित होने लगा और इनके कैंप में प्रवासी विरोधी पक्ष का असर बढ़ने लगा। थेरेसा में ने ब्रिटिश भारतीय समुदाय को लेबर से तोड़कर रिझाने के लिए कोई कसर न छोड़ी। जेरेमी कोर्बिन का गुजरात दंगों पर मोदी का विरोध और उनकी आर्थिक नीतियां अभिजात्य व प्रतिक्रियावादी प्रवासी भारतीय हलकों में वैसे उल्लास नहीं जगा रहीं थीं। थेरेसा में ने बड़ी चालाकी से नरम हिंदुत्व का कार्ड खेला। कोर्बिन ने थेरेसा में के गृहमंत्री रहते पुलिस संख्या में की गयी भारी कटौती का बुनियादी सवाल उठाया, हालाँकि मुस्लिम आबादी की भावनाओं को ध्यान में रखकर ब्रिटैन के सऊदी अरब जैसे देशों से रिश्ते और कट्टरपंथी मदरसों की उसकी फंडिंग पर ज़्यादा खुलके न बोला। थेरेसा में ने चुनाव का अंत आतेआते अपना आधार खिसकता देखकर नस्लभेदी भावनाओं को भड़काने के लिए मानवाधिकार क़ानूनों को फाड़कर फेंक देने और संदेह के आधार पर हिरासत में लिए जा सकने जैसे काले क़ानून बनाने का वायदा किया। मीडिया में अंत तक इस बात पर जनता को बेवकूफ बनाया जाता रहा कि जहाँ कोर्बिन के लिए युवाओं का ज़बरदस्त समर्थन है, युवा वोट करने नहीं आते।
चुनाव में इन सभी झूठों की पोल खुल गयी है। कंज़र्वेटिव पार्टी और मीडिया की मुंगेरीलाली आकांक्षाओं पर पानी डालते हुए युवाओं ने इस चुनाव में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है। कोर्बिन का मुफ्त यूनिवर्सिटी शिक्षा का वायदा इनके लिए उम्मीद की किरण है। ध्यान रहे कि न सिर्फ कोर्बिन कॉर्पोरेट दुष्प्रचार, व्यक्तिवादी तुलनाओं और पूर्वाग्रहों से लड़ रहे थे, बल्कि ब्लेयराइट लॉबी ने पार्टी की एकता तोड़ने और अंदरूनी साज़िश में कोई कसर न छोड़ी। उसके बावजूद लेबर के वोट और सीट में ज़बरदस्त इज़ाफ़ा हुआ है। प्रतिकूल हालातों में यह बड़ी उपलब्धी है। सबसे ज़्यादा यह लेबर के विरोधियों को एक जवाब है कि कोर्बिन के नेतृत्व में पार्टी कभी चुनी नहीं जा सकती। कहाँ बहुमत बढ़ाने का लक्ष्य और कहाँ ब्रेक्सिट पर वार्ता से ठीक पहले त्रिशंकु संसद। बेशर्म मीडिया और बिके हुए विश्लेषक बड़ी बेशर्मी से अपने झूठ को छिपाकर स्क्रीन पर मुस्कुरा रहे हों पर भीतर हलचल है। निर्मम शोषण पर आधारित सामान्य दिन अब दूर की कौड़ी हैं। शायद थेरेसा में का इस्तीफा हो और छोटे दलों के समर्थन से एक अनिश्चित कंज़र्वेटिव सरकार बने।
इस नतीजे के भारत के लिए क्या मायने हैं? ब्रिटेन संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् का स्थायी सदस्य है। पुराने दिनों जैसी न सही, अभी भी उसकी एक अंतर्राष्ट्रीय साख है। वहां के प्रमुख विपक्ष में प्रगतिशील तबके का मज़बूत होना भारत में लोकतंत्र की लड़ाई में कुछ सहायता पहुंचा सकता है। कोर्बिन ने मोदी के गुजरात के नरसंहार की भूमिका पर ब्रिटिश संसद में कई निंदा प्रस्ताव लाये हैं। यहाँ साम्प्रदायिकता के खतरे से निबटने के तरीकों में अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मदद मिलना निश्चित तौर पर शुभ होगा। ज्ञातब्य रहे कि थेरेसा में ने इस बार ब्रिटिश भारतीय समुदाय को रिझाने के लिए हिंदी में अटपटे प्रमोशनल वीडियो बनवाने से लेकर मंदिर दर्शन तक हिंदुत्व और उच्च जातीय/वर्गीय चेतना को खूब सहलाया है। इधर कोर्बिन ने ब्रिटैन में जाति के आधार पर भेदभाव पर अंकुश लगाने के पक्ष में स्टैंड लिया है।
वे मध्य सीरिया और लीबिया में सैन्य हस्तक्षेप और शरणार्थी संकट के विरुद्ध खड़े हुए हैं। पर्यावरण और प्रवासी श्रमिकों के हक़ पर भी उनकी आवाज़ बुलंद रही है।
मुझे कोर्बिन के उभार का सबसे सकारात्मक पक्ष दुनियाभर में दमनकारी आर्थिक नीतियों और साम्प्रदायिकता/कटटरपंथ के ज़हर से लड़ रहे लोगों के लिए एक रोशनी की किरण का आना लगता है। अब तक पूरी दुनिया में विभिन्न तरह के शोषण-आत्याचारों का विरोध भी दक्षिणपंथ ने हाईजैक कर रखा था। अमेरिकी साम्राज्यवाद का इस्लामिक जिहाद व ट्रम्प की जीत इसके उदाहरण हैं। लेकिन भूमंडलीकरण के सपने बेचने वाली व्यवस्था जिस बर्बरता का डर दिखाकर विपक्ष समेट रही थी, उसके विकल्प में एक रेडिकल प्रगतीशील विकल्प उभरकर आने लगा है।यह सवाल कि क्या कोर्बिन वाम विपक्ष कहलाने के लायक हैं इस बात पर निर्भर करता है कि सिर्फ कुछ प्रतीकों तक सिमटना ही वाम है या सही समय पर सुलझे ढंग से सही बात कहना। कोर्बिन न तो माओ, लेनिन या स्टालिन का नाम जपते हैं न पूंजीवाद को उखाड़ फेंकने की बात करते हैं। उनकी पार्टी और उनका खुद का रुझान भी क्लासिकीय मार्क्सवादी दायरे में सोशल डेमोक्रेटिक ही होगा। पर क्या उन्होंने अब तक कोई ग़लत बात की है? मुझे कोर्बिन हमेशा वंचितों के पक्ष में खड़े बोलने वाले प्रतिकूल परिस्थितियों में डटे रहने वाले और नक़्क़ाली और ट्रम्प जैसे वाहियातपने के बरक्स एक मनुष्य लगते हैं। एक ऐसा मनुष्य जिसने अपने पूरे कैंपेन में व्यक्तिगत स्तर पर हमलों को नज़रअंदाज़ कर बड़े धैर्य से समाज के बीच की गैर-बराबरी पर अपनी बातें दुहरायी हैं। वाम उम्मीद की राजनीति होनी चाहिए और कोर्बिन निश्चित रूप से वह लेकर आये हैं।

लेखक विषय संवाद साभार अनुवादक

पहले वो आए साम्यवादियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं साम्यवादी नहीं था

 

फिर वो आए मजदूर संघियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं मजदूर संघी नहीं था

 

फिर वो यहूदियों के लिए आए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं यहूदी नहीं था

 

फिर वो आए मेरे लिए

और तब तक बोलने के लिए कोई बचा ही नहीं था

 

मार्टिन नीमोलर (1892-1984)