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Updated: 2 days 9 hours ago

Anaarkali Of Aarah | Official Trailer

Sun, 26/02/2017 - 09:20

Presenting the official trailer of Anaarkali Of Aarah. starring Swara Bhaskar, Sanjay Mishra & Pankaj Tripathi.
Written & Directed by Avinash Das
Produced by Sandiip Kapur & Priya Kapur
Music : Rohit Sharma
Lyrics : Ramkumar Singh, Ravinder Randhawa, Prashant Ingole, Dr Sagar & Avinash Das
Production House : Promodome Motion Pictures

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राष्ट्रीय सुरक्षा कवच पहन कर खेला गया एक काला हास्य

Sat, 11/02/2017 - 12:44

JOLLY LLB 2

➧ अभिषेक गोस्वामी

फिल्म जॉली एल एल बी टू एक ऐसे नवोदित महत्त्वाकांक्षी वकील जगदीश्वर मिश्रा ‘जॉली’ की कहानी है, जो किसी भी कीमत पर अपने आप को नामी वकीलों की जमात में लाना चाहता है। इसी क्रम में, लखनऊ के स्थानीय कोर्ट परिसर में अपना खुद का चेंबर पाने के लिए वह मामले की पेचीदगी और गंभीरता को बिना भांपे एक गर्भवती महिला हिना सिद्दीक़ी से धोखाधड़ी कर बैठता है, जो उसकी खुदकुशी का सबब बनती है। हिना सिद्दीकी के शौहर इक़बाल के फर्जी एंकाउंटर मामले की तहें जब खुलने लगती हैं और असलियत सामने आती है, तो उसे भीतर तक हिला देती है। लिहाजा अपने भीतर की ग्लानि से मुक्त होने के लिए वह अपनी वकालती जीवन के पहले केस के रूप में मरहूम हिना सिद्दीक़ी और उसके परिवार के साथ हुए दोहरे अन्याय के खिलाफ कोर्ट में लड़ाई लड़ता है। फिल्म का अंत न्याय (सत्य) की तलाश में जॉली द्वारा किये गये तर्क और पेश किये गये प्रमाणों की जीत के साथ होता है, जिसकी वजह से वह राज्य और न्याय व्यवस्था की मिलीभगत से रचे गये दुष्चक्र को भेदने में सफल होता है।

पिछले दस साल की हिंदी फिल्मों पर यदि हम नज़र डालें तो पाएंगे कि हिंदी सिनेमा का यह दौर एक ऐसा दौर रहा है, जिसने विषयवस्तु, प्रस्तुतिकरण और दर्शकों के रसास्वादन में बदलाव के लिहाज से सबसे अधिक विविधतापूर्ण फिल्में देखी हैं। जॉली एल एल बी टू उसी कड़ी की एक ऐसी फिल्म है, जिसके मूल में एक ऐसी विषयवस्तु जो सीधे सीधे आम जनमानस से जुड़ती है। अपने हक़ के लिए सवाल उठाने पर दबंग सत्तासीनों द्वारा रौंद दिये जाने के दौर में सिनेमा के पर्दे पर ही सही, मगर न्याय को मिलते हुए देखना किसको अच्छा नहीं लगेगा?

जहां तक फिल्म के प्रस्तुतिकरण का सवाल है, इस दौर की फिल्मों में कहानी को कहने की एक खास शैली विकसित हुई है, जिसका निर्वहन कमोबेश हर आने वाली नयी फिल्म कर रही है। खासकर वे फिल्में जिनके नायक अक्षय कुमार हैं। उत्तर भारतीय भाषा/बोली में मौजूद हास्यबोध को लिये जॉली एल एल बी टू भी कहानी कहने के उसी ढांचे का अनुसरण करती है, जो ‘विशेष’ से ‘सार्वभौमिक’ या ‘व्यापक’ की तरफ आगे बढ़ता है और जिसे कहानी कहने के एक सार्वभौमिक सिद्धांत के रूप में वर्तमान हिंदी सिनेमा जगत ने अंगीकार कर लिया है।

इन्हीं पिछले दस सालों में पैदा हुए अजीब से मासूम दर्शक वर्ग के लिहाज से देखें, तो यह फिल्म दर्शकों को न्यायिक महकमे की रोज़मर्रा की दिक्कतों से रूबरू कराते हुए उनके मन में न्याय व्यवस्था के प्रति आस्था जगाती है। निस्संदेह जिसका श्रेय इस फिल्म में काम कर रहे सभी गैर सितारा अभिनेताओं को दिया जाना चाहिए। विशेष रूप से जज की भूमिका में सौरभ शुक्ला, सीनियर लाॅयर की भूमिका में अन्नू कपूर, इंस्पेक्टर की भूमिका में कुमुद मिश्रा और हिना सिद्दीक़ी की भूमिका में सयानी गुप्ता को।

फिल्म के निर्देशक सुभाष कपूर मीडिया में अनेक जगहों पर जॉली एल एल बी टू को आधिकारिक रूप से एक ब्लैक कॉमेडी बताते हैं। ब्लैक कॉमेडी में मेरी अपनी निजी दिलचस्पी और सुभाष कपूर के इस दावे के चलते जब मैं इस फिल्म को इस एंगल से देखने लगता हूं, तो मुझे विषयवस्तु और प्रस्तुतिकरण की शैली दोनों ही लिहाज से यह फिल्म ब्लैक कॉमेडी होने की शर्तों को पूरा करती हुई नहीं दिखाई पड़ती। हां, थोड़ी कोशिश करती हुई ज़रूर दिखाई पड़ती है – मगर बहुत कम और सतही स्तर पर।

जज का नाचते हुए कोर्ट में प्रवेश, वकील की फीस का मेनू कार्ड, जज की कुर्सी पर टेबल लैंप का गिरना इत्यादि दृश्यबंध प्रस्तुतिकरण के लिहाज से ब्लैक कॉमेडी की तरफ इशारा ज़रूर करते हैं, मगर ब्लैक कॉमेडी का यह भुरभुरा किला फिल्म के अंत तक आते आते तब ध्वस्त हो जाता है, जब भारतीय जनमानस की मासूमियत को संतुष्ट करने के लिए निर्देशक फिल्म को ‘उपदेशात्मक/संदेशात्मक मोड’ में ले जाते हैं। एक विशुद्ध ब्लैक कॉमेडी इस ‘उपदेशात्मक/संदेशात्मक मोड’ की परवाह नहीं करती। अतः मेरा उनसे यह कहना होगा कि यदि वे इस फिल्म कों ब्लैक कॉमेडी न भी कहें तो चलेगा।

अंत में, मेरी राय में, फिल्म जॉली एल एल बी टू कुल मिलाकर ‘राष्ट्रीय सुरक्षा कवच पहन कर खेला गया एक ऐसा काला हास्य’ है जो भारतीय न्यायिक व्यवस्था में निहित विद्रूपताओं को मनोरंजक तरीके से उभारने में काफी हद तक सफल होती है।



अभिषेक गोस्वामी। शिक्षा में रंगमंच और नाट्यकला एवं वंचितों के रंगमंच में विशेषज्ञता के साथ पिछले 23 वर्षों से रंगकर्म में सक्रिय। अमरीका और चीन समेत अनेक देशों में रंगमंचीय प्रवास। शौक से कवि एवं छाया चित्रकार। फिलहाल अज़ीम प्रेमजी फाउंडेशन में नियमित कार्य करते हुए अपनी पहली शॉर्ट फिक्शन फिल्म ‘एक गैर इरादतन हत्या’ के निर्माण की तैयारी में व्यस्त। अभिषेक से alibaba.tie@gmail.com और 7742094646 पर संपर्क कर सकते हैं। उनका पोस्टल एड्रेस है 13, गायत्री नगर, अजमेर रोड, सोडाला, जयपुर 302006 (राजस्थान)।

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अकादमिक जवाब मत दो, अपना जवाब दो!

Sun, 05/02/2017 - 22:36

➧ अभिषेक गोस्वामी

वर्ष 1995, मार्च का महीना। सुबह नौ बजे। मैं जयपुर में धूलेश्वर गार्डन के पिछवाड़े, एक घर के दरवाजे के बाहर खड़ा हूं। दरवाजे पर सूत की एक डोरी लटक रही है। मैं उसे खींच देता हूं। भीतर से घंटी बजने की आवाज़ आती है। घंटी की यह आवाज़ वैसी नहीं है, जैसी मंदिरों में पीतल वाली घंटियों की होती है। कौतूहलवश मैं डोरी को एक बार और खींच देता हूं। प्रत्युत्तर में इस बार भीतर से एक आवाज़ आती है – ‘कौन? ‘अभिषेक गोस्वामी। साबिर ने भेजा है।’ ‘दरवाजे को थोड़ा ज़ोर से अपनी तरफ खींचो। खुल जाएगा। आ जाओ भीतर।’ दरवाजा खोलने के लिए सुझाये गये उपाय के मुताबिक दरवाजा खोलकर मैं घर के भीतर पहुंच जाता हूं और देखता हूं कि मेरे सामने सुनहरे सफ़ेद बालों वाली एक महिला बैठी हैं। उनकी आंखों पर नज़र का चश्मा लगा हुआ है, जिसकी डंडियों से एक डोरी लटक रही है।

यह महिला कोई और नहीं, श्रीलता जी हैं, जो इस वक्त अंग्रेज़ी का अखबार पढ़ रही हैं। अखबार के पन्ने पलटते हुए वे मुझे सामने सोफ़े पर बैठने का इशारा करती हैं और मैं बैठ जाता हूं। वे अखबार पलटती रहती हैं और बातचीत कुछ इस तरह जारी रहती है।

श्रीलता जी – तो तुम हो अभिषेक गोस्वामी?
मैं – जी।
श्रीलता जी – साबिर के साथ कब से काम कर रहे हो?
मैं – जी दो साल से।
श्रीलता जी – कितने नाटक किये हैं अब तक?
मैं – जी छह।
श्रीलता जी – क्यों जाना चाहते हो एन एस डी?
मैं – थिएटर सीखने के लिए।
श्रीलता जी – थिएटर ही क्यों करना चाहते हो?
मैं – अच्छा लगता है। इसलिए।
श्रीलता जी – यह तो साबिर का जवाब है। अपना जवाब दो। थिएटर ही क्यों करना चाहते हो?
मैं – थिएटर दुनिया को बदलने का सशक्त माध्यम है। इसलिए।
श्रीलता जी – यह तो अकादमिक जवाब है। अपना जवाब दो।

मैं निरुत्तर हो जाता हूं और अपना जवाब सोचने का नाटक करने लग जाता हूं। कुछ पलों के लिए खामोशी छा जाती है, जो श्रीलता जी के एक और सवाल से टूटती है।

श्रीलता जी – एन एस डी करने के बाद भी करोगे थिएटर?
मैं – जी। तब भी करूंगा। वापस यहीं आकर।
श्रीलता जी – क्यूं? मुंबई क्यूं नहीं जाओगे? फिल्म स्टार बनने? तुमने अब तक एक भी जवाब अपना खुद का नहीं दिया।
मैं – जी… वो।
श्रीलता जी – अच्छा अगर एन एस डी में नहीं हुआ तब भी करोगे थिएटर?
मैं – जी… वो।

श्रीलता जी हंसने लगती हैं और आखिर में पूछती हैं ‘कहां रहते हो जयपुर में?’

मैं – जी… वो।
श्रीलता जी – अरे भाई, तुम्हारे घर का पता पूछ रही हूं रेफरेंस लेटर के लिए। कहां खो गये?
मैं – जी। तेरह, गायत्री नगर, अजमेर रोड, सोडाला, जयपुर 302006

वह अखबार वहीं सेंटर टेबल पर छोड़ कर भीतर दूसरे कमरे में चली जाती हैं। मैं अपने ठीक ऊपर देखता हूं कि वहां मिट्टी की एक घंटी टंगी है, जो एक सूती डोरी से बंधी हुई है और वह डोरी उस दरवाजे तक जाती है, जिसको अपनी तरफ धकिया कर मैं भीतर आया था।

लगभग पांच से सात मिनट के अंतराल के बाद श्रीलता जी उस दूसरे कमरे से वापस आती हैं। उनके हाथ में एक लेटरहेड है, जिस पर मेरे बारे में कुछ लिखा हुआ है। वे उस कागज़ पर अपने दस्तखत करती हैं और मुझे दे देती हैं। मैं उस कागज़ को लेकर उठ जाता हूं। श्रीलता जी मुझसे पूरी गर्मजोशी से हाथ मिलती हैं और कहती हैं ‘विश यू आल द बेस्ट।’

मैं उस कागज़ को बिना मोड़े बाहर की तरफ चल देता हूं कि पीछे से आवाज़ आती है।

‘दरवाजा बंद कर देना अभिषेक।’


अभिषेक गोस्वामी। रंगकर्मी, लेखक, कवि, कलाकार। जयपुर में रहते हैं। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय की टाई कंपनी से जुड़े रहे। इन दिनों अजीम प्रेमजी फाउंडेशन से जुड़े हैं। अभिषेक से alibaba.tie@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं।

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अवाॅर्ड आप रखिए, मैं अपनी इज़्ज़त रखता हूं

Sun, 05/02/2017 - 17:59

उस्ताद इमरत खां ने पद्मश्री अवार्ड को ठुकराते हुए भारत सरकार को जो पत्र लिखा है, वह एक बड़े कलाकार की पीड़ा का दस्तावेज़ बन गया है। वेदना, व्यंग्य और कलाकार के आत्मस्वाभिमान में डूबा यह पत्र पढ़ने लायक ही नहीं, संजो कर रखने लायक है। भाषा और शैली ऐसी जैसे सआदत हसन मंटो ने ख़ुद, इमरत खां के लिए, जन्नत या दोज़ख जहां भी उनकी हाल रिहाइश है, आकर यह प्रतिरोध-पत्र लिखा हो! – असद ज़ैदी

इमरत खां साहब का वक्तव्य

मेरी ज़िंदगी के अाख़िरी दौर में, जबकि मैं 82 साल का हो चला हूं, भारत सरकार ने मुझे पद्मश्री अवार्ड देना तय किया है। मैं इसके पीछे जो नेक इरादा है उसकी क़द्र करता हूं, लेकिन इस अवार्ड के मक़सद को लेकर बिना किसी दुराग्रह के यह कह सकता हूं कि यह मेरे लिए ख़ुशी की नहीं, उलझन की बात है। यह अवार्ड अगर मिलना था तो कई दशक पहले मिल जाना चाहिए था – जबकि मुझसे जूनियर लोगों को पद्मभूषण दिया जा चुका है।

मैंने भी हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत में बहुत योगदान दिया है और उसके व्यापक प्रसार में लगा रहा हूं। ख़ासकर सितारवादन की विकसित शैली और अपने पूर्वजों के सुरबहार वाद्य को दुनिया भर में फैलाने में मैंने अपना जीवन समर्पित कर दिया। मुझे हिंदुस्तानी कला और संस्कृति के अाधारस्तंभों, अपने समय की महान विभूतियों, के साथ बराबरी की सोहबत में संगीत बजाने का सौभाग्य हासिल हुअा। इनमें उस्ताद विलायत खां साहब, उस्ताद बिस्मिल्लाह खां साहब, उस्ताद अहमद जान थिरकवा खां साहब, पंडित वीजी जोग और अन्य बड़ी हस्तियां शामिल हैं। इनमें से हरेक निर्विवाद रूप से हिंदुस्तानी संगीत के उच्चतम स्तर तक पहुंची हुई हस्ती हैं, और इन सभी को पद्मभूषण या पद्मविभूषण से नवाज़ा गया था।

मेरा काम और योगदान सबके सामने है और मेरे शिष्य, जिनमें मेरे बेटे भी शामिल हैं, अपने समय की कसौटी पर खरे उतरेंगे और इस बात का सबूत देंगे कि मैं किस हद तक अपने अादर्शों और अपनी जड़ों के प्रति सच्चा रहा हूं। संगीत ही मेरा जीवन है, और मैंने एकनिष्ठता से हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत के रंग-रूप और रूह की पाकीज़गी को बचाये रखा है, और किसी भी तरह के बिगाड़ से उसकी हिफ़ाज़त की है। मैं और मेरे शिष्य विश्व के सभी अालातरीन मंचों पर सितार और सुरबहार के माध्यम से इस धरोहर को पेश करते रहे हैं। ये संगीतकार इसी रिवायत को अाज की पीढ़ी तक पहुंचाने में कामयाब रहे हैं।

ज़िंदगी के इस मुक़ाम पर मुझे यह ठीक नहीं लगता कि उम्र या शोहरत के पैमाने पर मेरे काम और ख़िदमत को मेरे शागिर्दों और बेटों के स्तर से कम करके आंका जाए।

मैंने अपनी ज़िंदगी में कभी समझौते नहीं किये। अब जाकर ऐसे अवार्ड को लेना, जो भारतीय संगीत में मेरे योगदान और मेरी अंतर्राष्ट्रीय प्रतिष्ठा से क़तई मेल नहीं खाता, अपनी और अपनी कला की अवमानना करना होगा। मैं ख़ुदगर्ज़ नहीं हूं, लेकिन भारतीय शास्त्रीय संगीत के सुनहरे दौर के महानतम संगीतज्ञ मुझे जो प्यार, भरोसा और इज़्ज़त बख़्श चुके हैं, मुझे उसका भी ख़याल रखना है। मैं इसी धरोहर की अाबरू रखने के ख़याल से यह क़दम उठा रहा हूं।

विनीत
इमरत खां

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जहां जाति नहीं, वहां भी वह चिपका दी जाती है

Thu, 26/01/2017 - 10:26

♦शशिभूषण

छत्तीसगढ़ के बस्तर में काम कर रही सामाजिक कार्यकर्ता बेला भाटिया कुछ दलित बौद्धिकों की नज़र में सवर्ण महिला हैं। महानगरों में टिके हुए इन चिंतकों को इससे फ़र्क़ नहीं पड़ता कि बेला भाटिया छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में आदिवासी महिलाओं और वंचित तबके के लिए हर क़िस्म का जोख़िम उठाकर काम कर रही हैं।

उल्लेखनीय है कि बेला भाटिया को एक दिन पहले ही उनके घर में गोलबंद दबंगों द्वारा कुछ ही घंटों में छत्तीसगढ़ छोड़ देने की बेशर्त धमकी मिली है। इस प्रसंग में पुलिस से लेकर राज्य सरकार तक बेला भाटिया के ख़िलाफ़ हैं। समाचार तो ऐसे आ रहे हैं कि पुलिस के सबसे बड़े अधिकारी बेला भाटिया की महिला वकील को भी अश्लील धमकी दे रहे हैं।

इस आशंका को नज़र अंदाज़ नहीं किया जा सकता कि ऐसे घोर दमन के वक़्त और परिवेश में यदि बेला भाटिया के ख़िलाफ़ कुछ अप्रिय किया जाता है तो उन्हें समय रहते कोई मदद मिल भी पायेगी या नहीं!!!

हाल के कुछ वर्षों में जब वाम और दलित एकता की सबसे अधिक आवश्यकता महसूस की जा रही है तब वंचितों की ओर से कुछ ख़ास तरह के परिवर्तनकामी अम्बेडकरवादी जन्मना दलित या पिछड़े उभरकर सामने आये हैं। इनमें पत्रकार, शिक्षक से लेकर प्रशासनिक अधिकारी शामिल हैं।

दलित, पिछड़ों के मध्यवर्ग से सम्बन्ध रखने वाले ये अधिकांश विचारक किसी को भी जो जन्मना दलित या पिछड़ा नहीं है हमेशा जातिवाद के मोर्चे पर खींचकर बहस करना चाहते हैं। यह एक विचित्र धुन है जो अधिकतर कटुता को ही जन्म देती है। इनके लिए जाति ही सत्ता है। सत्ता के कुल चरित्र को इन्होंने केवल जाति से ही इस तरह नत्थी कर दिया है जैसे किसी ज़माने में लंगोट ही चरित्र की कसौटी हुआ करता था।

ऐसा खासतौर पर तब अतिरिक्त उत्साह से किया जाता है जब सामने कोई जन्मना सवर्ण हो। इसमें आसानी यह होती है कि बिना किसी तर्क के भी ब्राह्मणवादी आया ब्राह्मणवादी आया कहकर या तो बहस को काबू में किया जा सकता है या कम से कम भटकने को विवश किया ही जा सकता है।

इस नए क़िस्म के प्रायोजित दलित बौद्धिक कार्य व्यापार में एक मज़बूत आधार यह होता है कि कोई सचमुच का प्रगतिशील जन्मना सवर्ण गिरी हालत में भी दलित विरोधी बात नहीं कह पायेगा और जन्मना सवर्ण जातिवादी नहीं हो सकता दलित बौद्धिक कभी यह मानेंगे नहीं न मानने देंगे।

फिर क्या है? एक विचित्र विवेचना शुरू होती है जिसमें नेहरू केवल जनेऊधारी हैं। एक ओर गांधी के भी विखंडन की ज़बरदस्त तैयारी है तो वहीं दूसरी ओर ऐसे समकालीन कुख्यात नेताओं की वक़ालत की विवशता है जो कभी न घर के रहे हैं न कभी घाट के होंगे।

समकालीन राजनीति के ही वार, पलटवार के उपकरणों, सूचनाओं और लेखन कौशल से अपनी बौद्धिकता का समर्थन निर्मित कर रहे जनाधार पलट देने की महत्वाकांक्षा रखनेवाले कुछ नव दलित एक्टिविस्टों से बहस करते हुए यदि जातिवादी कहे जाने की व्यक्तिगत और निजी तक़लीफ़ छोड़ दी जाए तो आमतौर पर आगे कोई बड़ी चुनौती नहीं मिलती।

हर ऐतिहासिक उदाहरण को केवल खारिज़ करने की ज़िद तो खूब मिलती है लेकिन निर्मिति में दक्षता नहीं होती। सिर्फ़ इंकार और निंदा। तोड़ो और तोड़ो। मानो निर्माण और सहकार दैवी कृपा से अपने आप होता जायेगा।

कुल मिलाकर इस सब से वास्तव में कोई बड़ी तोड़ फोड़ तो नहीं दिखती लेकिन एक दुर्भाग्यपूर्ण बात तो है ही कि अपने करियरिस्ट लेखन और ज़बरदस्त बायोडाटा के बल पर ये कुछ नए सफलताकामी लोगों के भीतर गहरी सामाजिक तैयारी के स्थान पर अकारण जातीय दुराव पैदा करने में किंचित सफ़ल रहते हैं।

महान स्वप्न दृष्टा अम्बेडकर के प्रति अटूट और आलोचना से परे आस्था रखते दिखने वाले ये नव दलित चिंतक भूल ही जाते हैं कि इनकी आपस की बहसें, असहमतियां और झगडे कितने क्रूर और पश्चगामी हैं।

इनका झगड़ा विश्व के सबसे बड़े माने जानेवाले दक्षिण पंथी संगठन राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से है लेकिन ये फौरी तौर पर वामपंथियों को निशाने में रखना चाहते हैं क्योंकि कभी आंबेडकर ने संघ के प्रति उपेक्षा बरती थी।

शुक्र है कि अपने आरंभिक दौर में भी दलितवाद के पास ज्योतिबा फुले से लेकर प्रो तुलसी राम और ओमप्रकाश वाल्मीकि, शीतल साठे जैसे प्रकाश स्तंभ हैं। वरना केवल जाति की पहचान करके ही उग्र या शांत हो जानेवाली इनकी सक्रियता कितने विभ्रम रचती इसका अंदाज़ा ही लगाया जा सकता है।

एक तरफ़ छत्तीसगढ़ में बेला भाटिया हैं दूसरी तरफ़ जेएनयू में दिलीप यादव। इन दोनों के बीच में दलित, वाम सत्ता विमर्श। फ़ायदा चाहे जिसका हो लेकिन दूरी बेला और दिलीप के बीच ही बढ़ रही है इतना साफ़ है।

मज़े में हैं वे ताक़तें जो दलित और वाम एकता से संकट में हो सकती थीं।

Shashi Bhooshan


शशिभूषण। कवि-कथाकार। आकाशवाणी रीवा में क़रीब चार साल तक आकस्मिक उदघोषक रहे। बाद में यूजीसी की रिसर्च फेलोशिप भी मिली। फ़िलहाल मध्यप्रदेश के उज्जैन में हिंदी की अध्यापकी। gshashibhooshan@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं।

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कर्पूरी ठाकुर को जाति की चौखट पर मत टांगो!

Tue, 24/01/2017 - 11:05

राॅकेट साइंस पर भी बोलते थे और शास्त्रीय संगीत पर भी

➧ शिवानंद तिवारी

कर्पूरी जी की जयंती पर भारी मारामारी है। हर रंग की राजनीति के बीच हम ही कर्पूरी जी की राजनीति के असली वारिस हैं – यह साबित करने के लिए घमासान मचा हुआ है। मुख्यधारा की तमाम पार्टियां उनकी जयंती मनाकर उनको अपना साबित करने की कोशिश कर रही हैं। इस मारामारी और घमासान के पीछे एक ही मक़सद है। कमज़ोर जातियों को अपनी ओर आकर्षित कर अपने पीछे उनको गोलबंद करना। दूसरी ओर इन तमाम धूम-धड़ाकों से दूर छोटी-छोटी और कमज़ोर जातियों के लोग भी जहां -तहां इकट्ठा होकर कर्पूरी जी के चित्र पर फूल माला अर्पित कर उनके प्रति अपनी श्रद्धा निवेदित करेंगे। यह जमात कर्पूरी जी की राजनीति की विरासत की दावेदारी के लिए उनकी जयंती नहीं मनाती है। कर्पूरी जी उनके लिए वोट हासिल करने के माध्यम नहीं हैं। ये कर्पूरी जी पर गर्व करने वाले लोग हैं। उनको इस बात का फ़ख्र होता है कि उंगली पर गिनी जा सकने वाली जाति में पैदा होने वाला नाटे क़द का यह विलक्षण आदमी कैसे राजनीति के शीर्ष पर पहुंच गया! उनका दिल कचोटता है। हम जो कर्पूरी जी की जैसी छोटी और कमज़ोर जाति में पैदा होने वाले लोग हैं, आज की राजनीति में कहां है!

यह एक मौजूं सवाल है। हमारे सामने आज जो राजनीतिक परिदृश्य है, उसके देखते हुए क्या हम कल्पना कर सकते हैं कि कर्पूरी ठाकुर जैसी जाति में पैदा होने वाला व्यक्ति उनकी या उनके आस-पास की ऊंचाई तक पहुंच सकता है! फिर यह सवाल उठता है कि कर्पूरी जी ने कैसे वह मुकाम हासिल कर लिया! इस सवाल का जवाब हमें उनके राजनीतिक जीवन के सफ़र में तलाश करने की कोशिश करनी होगी।

कर्पूरी जी का जन्म ग़ुलाम भारत में हुआ था। जब वे जवान हो रहे थे, उस समय आज़ादी की लड़ाई परवान पर थी। संवेदनशील और युवा कर्पूरी इस लड़ाई से अपने आपको अलग नहीं रख पाये। पढ़ाई छोड़कर आजादी के उस संग्राम में शामिल हो गये। फलस्वरूप जेल यात्रा करनी पड़ी। जेल के भीतर भी चुपचाप जेल नहीं काटा। बल्कि वहां के भ्रष्टाचार और अन्याय के विरुद्ध लंबा उपवास किया। इसी दरम्यान वे कांग्रेस की भीतर समाजवादियों के साथ जुड़ गये।

आज़ादी के बाद कर्पूरी जी कांग्रेस के साथ नहीं गये। बल्कि समाजवादियों के ही साथ रहे। समतावादी समाज की स्थापना का सपना देखने वाले उस जमात में सिर्फ़ पिछड़े ही नहीं थे। बल्कि समाज के नवनिर्माण का साझा सपना देखने वालों की उस जमात में अगड़े-पिछड़े सब शामिल थे। शीर्ष पर तो अगड़ों की तादाद ही ज़्यादा थी। आज़ादी के बाद दो-तीन दशक तक समाजवादियों की गाथा संघर्ष की गाथा है। मार खाना, जेल जाना, उपवास करना प्राय: उस समय का नियम था। मजदूर संगठनों से भी कर्पूरी जी जुड़ाव था। डाक-तार विभाग के कर्मचारियों की हड़ताल में जेल गये। गोमिया ऑर्डिनेन्स फ़ैक्टरी (गिरडीह) में हड़ताल करवाया। वहां भूख-हड़ताल किया। 1965 में गांधी मैदान में मेरे सामने कर्पूरी जी, तिवारीजी, कम्युनिस्ट पार्टी के चंद्रशेखर सिंह, रामअवतार शास्त्री सहित कई नेताओं को गांधी मैदान में बुरी तरह पुलिस से पिटवाया गया। कर्पूरी जी के हाथ की हड्डी दो जगहों पर टूट गयी थी। उस समय बिहार में केबी सहाय की सरकार थी। हिंदी पट्टी में अपने संघर्ष के ज़रिये समाजवादियों ने समाज के शोषित और वंचित तबक़ों को जगाया। कर्पूरी जी उस संघर्ष के अगुआ नेता थे।

इन सबके अलावा कर्पूरी जी विलक्षण नैसर्गिक प्रतिभा के भी धनी थे। यहां उसका दो उदाहरण मैं देना चाहूंगा। पहला उदाहरण, जिसके विषय में उमेश्वर बाबू (उमेश्वर प्रसाद सिंह, बिहार सेवा के तत्कालीन पदाधिकारी जो कर्पूरी जी के आप्त सचिव हुआ करते थे) ने मुझे बताया था। कर्पूरी जी के मुख्यमंत्रीत्व काल में बीआईटी मेसरा, रांची में राॅकेट साइंस से जुड़े वैज्ञानिकों का राष्ट्रीय सम्मेलन हुआ था। मुख्यमंत्री के तौर पर कर्पूरी जी को उसका उद्घाटन करना था। सम्मेलन में जाने के लिए पटना से चलने के पहले ब्रिटानिका इनसाइक्लोपीडिया का राॅकेट साइंस वाला खंड ले लेने के लिए उमेश्वर बाबू को उन्होंने कह दिया था। सरकारी जहाज में बैठने के बाद उमेश्वर बाबू से ब्रिटानिका इनसाइक्लोपीडिया का वह खंड लेकर 40-50 मिनट की उस हवाई यात्रा के दरम्यान राॅकेट साइंस के विषय में जितना जानना था, उन्होंने जान लिया। उमेश्वर बाबू ने बताया कि कर्पूरी जी का उस सम्मेलन में जो भाषण हुआ, उसने सम्मेलन में शरीक राॅकेट साइंस के सभी वैज्ञानिकों को चकित कर दिया। कोई राजनेता राॅकेट साइंस जैसे दुरूह तकनीकी विषय पर इतनी जानकारी के साथ बोल सकता है, इसकी कल्पना उन लोगों को नहीं थी।

कर्पूरी जी की चकित करने वाली प्रतिभा की दूसरी घटना का गवाह मैं स्वयं हूं। भारतीय शास्त्रीय संगीत में उनकी गहरी रुचि थी। उन दिनों पटना के दशहरा पूजा के दरम्यान होने वाले संगीत समारोहों की देश भर में धूम थी। शहर में जगह-जगह देश भर के प्रतिष्ठित गायक, वादक और नर्तकों का जुटान होता था। इन समारोहों में कहीं न कहीं कर्पूरी जी संगीत का आनंद लेते बैठे ज़रूर दिखाई दे जाते थे। एक मर्तबा पटना काॅलेजिएट स्कूल के मैदान में स्व रामप्रसाद यादव की भारतमाता मंडली द्वारा आयोजित समारोह का अंतिम कार्यक्रम हो रहा था। मंच पर बिस्मिल्लाह खां साहब और उस्ताद अब्दुल हलीम जाफ़र खान साहब का संयुक्त कार्यक्रम था। अद्भुत था वह कार्यक्रम। समापन के बाद जब हमलोग चलने लगे, तब मेरी नज़र कर्पूरी जी पर पड़ी। वे भी चलने लगे थे। अचानक रामप्रसाद जी ने कार्यक्रम समापन पर धन्यवाद ज्ञापन के लिए कर्पूरी जी को आमंत्रित कर दिया। कर्पूरी जी ने धन्यवाद ज्ञापन भाषण में हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत के गंगा-जमुनी चरित्र पर चंद मिनटों में जो कुछ कहा, उसकी गूंज आज तक मुझसे अलग नहीं हुई है। उसके बाद तो दोनो कलाकारों ने कर्पूरी जी को पकड़ कर एक तरह से उठा लिया! बिस्मिल्लाह खां साहब ने कहा कि मैं इतने दिनों से पटना आ रहा हूं। अब तक आप कहां छिपे थे गुदड़ी के लाल!

आज हम सब लोगों ने कर्पूरी जी को अतिपिछड़ा के चौखट पर टांग दिया है। यह ठीक है कि सबकी तरह कर्पूरी जी की भी जाति थी। ऐसी जाति जो अतिपिछड़ों में भी पिछड़ी है। लेकिन कर्पूरी जी ने जो मुकाम हासिल किया है, उसका आधार उनकी जाति में देखना उनको छोटा बनाना होगा। कर्पूरी जी ने संघर्ष किया था। देश को आज़ाद कराने का संघर्ष। आज़ादी के बाद देश में समाजवादी समाज बनाने का संघर्ष। संघर्ष की आंच मे तप कर निखरे थे कर्पूरी जी। समाजवादी आंदोलन की ताक़त ने उनको उस ऊंचाई पर पहुंचने का आधार प्रदान किया था, जिसके वे हक़दार थे। समाजवादी आंदोलन की वह धारा आज सूख गयी है। इसलिए जब तक वह धारा पुनर्जीवित नहीं होगी, तब तक कमज़ोर समाज से तेजस्वी नेतृत्व उभरने की संभावना मुझे नहीं दिखाई दे रही है।


शिवानंद तिवारी। वरिष्ठ राजनेता और चिंतक। लंबे समय तक राज्यसभा सांसद रहे। जेडीयू के राष्ट्रीय महासचिव और प्रवक्ता भी रहे। जेडीयू में आने से पहले राष्ट्रीय जनता दल के प्रवक्ता थे। जयप्रकाश नारायण के संपूर्ण क्रांति आंदोलन में काफी सक्रिय हिस्सेदारी थी। इन दिनों सक्रिय राजनीति से अलग होकर पटना में रिहाइश।

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जीते रहो और किसी न किसी पर मरते रहो!

Mon, 23/01/2017 - 11:42

एक ख़त जॉन एलिया का, अनवर मक़सूद के नाम

26 नवंबर 2008 को कराची आर्ट्स कौंसिल में जॉन एलिया की याद में एक शाम मनायी गयी थी। उसमें अनवर मक़सूद साहब ने जन्नत से अपने नाम जॉन एलिया का ख़त पढ़ कर सुनाया। जिन लोगों ने वह नहीं सुना, उनके लिए…

अन्नो जानी!

तुम्हारा ख़त मिला। पाकिस्तान के हालात पढ़ कर कोई ख़ास परेशानी नहीं हुई। यहां भी इसी क़िस्म के हालात चल रहे हैं। शायरों और अदीबों ने मर मर कर यहां का बेड़ा ग़र्क़ कर दिया है। मुझे यहां भाइयों के साथ रहने के लिए कहा गया। मैंने कहा, मैं ज़मीन पर भी भाइयों से दूर रहना पसंद करता था, आप मुझे कोई क्वार्टर अता फरमा दें। मुस्तफा ज़ैदी ने यह काम कर दिया और मुझे क्वार्टर मिल गया। मगर इसका डिज़ाइन नासरी नज़्म की तरह है जो समझ में तो आ जाती है मगर याद नहीं रहती। रोज़ाना भूल जाता हूं कि बैडरूम किधर है। इस क्वार्टर में रहने का एक फ़ायदा है – मीर तक़ी मीर का घर सामने है। सारा दिन उन्हीं के घर रहता हूं। उनके 250 अशआर, जिनमें वज़न का फ़ुक़दान है, निकाल चुका हूं मगर मीर से कहने की हिम्मत नहीं हो रही। कूचा-ए-शेर-ओ-सुखन में सबसे बड़ा घर ग़ालिब का है। मैंने मीर से कहा आप ग़ालिब से बड़े शायर हैं, आपका घर ऐवान-ए-ग़ालिब से बड़ा होना चाहिए। मीर ने कहा दरअसल वो घर ग़ालिब की सुसराल का है, ग़ालिब ने उसपे क़ब्ज़ा जमा लिया है। मीर के घर कोई नहीं आता। साल भर के अरसे में सिर्फ एक मर्तबा नासिर काज़मी आये, वो भी मीर के कबूतरों को देखने। ऐवान-ए-ग़ालिब मग़रिब के बाद खुला रहता है, जिसकी वजह तुम जानते हो…

मुझे क्या बुरा था मरना अगर एक “बार” होता!

यहां आकर यह मिसरा मुझे समझ में आया। इस मिसरे में “बार” अंगरेज़ी का है।

दो मर्तबा ग़ालिब ने मुझे भी बुलवाया मगर मुनीर नियाज़ी ने यहां भी मेरा पत्ता काट दिया। सौदा का घर मेरे क्वार्टर से सौ क़दम पर है। यहां आने के बाद मैं उनसे मिलने गया। मुझे देखते ही कहने लगे – मियां! तुम मेरा सौदा ला दिया करो। मान गया! सौदा का सौदा लाना मेरे लिए बाइस-ए-इज़्ज़त है। मगर जानी! जब सौदा हिसाब मांगते थे तो मुझ पर क़यामत गुज़र जाती थी। मियां! जन्नत की मुर्ग़ी इतनी महंगी ले आये – हलवा क्या नियाज़ फतेहपुरी की दुकान से ले आये? तुम्हें टिंडों की पहचान नहीं है? हर चीज़ पे ऐतराज़! मुझे लगता था वो शक करने लगे हैं कि मैं सौदे में से पैसे रख लेता हूं। चार दिन पहले मैंने उनसे कह दिया – मैं उर्दू अदब की तारीख का वाहिद शायर हूं, जो 80 लाख कैश छोड़ कर यहां आया है। आपके टिंडों से क्या कमाऊंगा? आपको बड़ा शायर मानता हूं, इसीलिए काम करने को तैयार हुआ – मैंने आपकी शायरी से किसी क़िस्म का फ़ायदा नहीं उठाया, आपकी कोई ज़मीन इस्तेमाल नहीं की। आइंदा अपना सौदा फैज़ अहमद फैज़ से मंगवाया कीजिए ताकि वो आपका थोड़ा बहुत क़र्ज़ तो चुकाएं। मेरे हाथ में बैंगन था, वो मैंने सौदा को थमा दिया और कहा – बैंगन को मेरे हाथ से लेना के चला मैं…

इक शहद की नहर के किनारे अहमद फ़राज़ से मुलाक़ात हुई। मैंने कहा मेरे बाद आये हो, इस वजह से खुद को बड़ा शायर मत समझना। फ़राज़ ने कहा – मुशायरे में नहीं आया। फिर मुझसे पूछने लगे – उमराव जान कहां रहती है? मैंने कहा रुस्वा होने से बेहतर है घर चले जाओ – मुझे नहीं मालूम के वो कहां रहती है।

जानी! एक हूर है, जो मेरे घर हर जुमेरात की शाम आलू का भर्ता पका कर ले आती है। शायरी का भी शौक़ है, खुद भी लिखती है। मगर जानी जितनी देर वह मेरे घर रहती है, सिर्फ मुश्ताक़ अहमद यूसुफ़ी का ज़िक्र करती है। उसको सिर्फ मुश्ताक़ अहमद यूसुफ़ी से मिलने का शौक़ है। मैंने कहा ख़ुदा उनको लंबी ज़िंदगी दे, पाकिस्तान को उनकी बहुत ज़ुरूरत है। अगर मिलना चाहती हो तो ज़मीन पर जाओ, जिस क़िस्म की शायरी कर रही हो, करती रहो – वह खुद तुमको ढूंढ निकालेंगे और पिकनिक मनाने तुम्हें समंदर के किनारे ले जाएंगे।

इब्न-ए-इंशा, सय्यद मुहम्मद जाफरी, शौकत थानवी, दिलावर फ़िगार, फरीद जबलपुरी और ज़मीर जाफरी एक क्वार्टर में रहते हैं। इन लोगों ने 9 नवंबर को अल्लामा की पैदाइश के सिलसिले में डिनर का अहतमाम किया। अल्लामा इक़बाल, फैज़, क़ासमी, सूफी तबस्सुम, फ़राज़ और हम वक़्त-ए-मुक़र्रर पर पहुंच गये। क्वार्टर में अंधेरा था और दरवाज़े पर पर्ची लगी थी – हमलोग जहन्नुम की भैंस के पाये खाने जा रहे हैं, डिनर अगले साल 9 नवंबर को रखा है।

अगले दिन अल्लामा ने एक प्रेस कांफ्रेंस की और उन सबकी अदबी महफिलों में शिरकत पर पाबंदी लगा दी।

तुमने अपने ख़त में मुशफ़ाक़ ख्वाजा के बारे में पूछा। वह यहां अकेले रहते हैं, कहीं नहीं जाते। मगर हैरत की बात है … जानी! मैंने उनके घर उर्दू और फ़ारसी के बड़े बड़े शायरों को आते जाते देखा है। यहां आने की जल्दी मत करना क्योंकि तुम्हारे वहां रहने में मेरा भी फ़ायदा है। अगर तुम भी यहां आ गये, तो फिर वहां मुझे कौन याद करेगा?

जीते रहो और किसी न किसी पर मरते रहो!! हम भी किसी न किसी पर मरते रहे मगर जानी! जीने का मौक़ा नहीं मिला!

जॉन

आप जाॅन एलिया साहब के पूरे ख़त को इस वीडियो में सुन भी सकते हैं।

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लेखक विषय संवाद साभार अनुवादक

पहले वो आए साम्यवादियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं साम्यवादी नहीं था

 

फिर वो आए मजदूर संघियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं मजदूर संघी नहीं था

 

फिर वो यहूदियों के लिए आए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं यहूदी नहीं था

 

फिर वो आए मेरे लिए

और तब तक बोलने के लिए कोई बचा ही नहीं था

 

मार्टिन नीमोलर (1892-1984)