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इयत्ता

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The term IYATTA means the essence of existence. I think this is nothing, but an exploration. Exploration for absolute pleasure of human being. Not for a person, but for entire world. Let us be together, for a great exploration. May we be associates of one another!
Updated: 13 hours 12 min ago

Azamgarh : History, Culture and People

Wed, 05/07/2017 - 02:05
आजमगढ़ : इतिहास और संस्कृति                          - हरिशंकर राढ़ी आजमगढ़ रेलवे स्टेशन    फोटो : हरिशंकर राढ़ी रामायणकालीन महामुनि अत्रि और सतीत्व की प्रतीक उनकी पत्नी अनुसूया के तीनों पुत्रों महर्षि दुर्वासा, दत्तात्रेय और महर्षि चन्द्र की कर्मभूमि का गौरव प्राप्त करने वाला क्षेत्र आजमगढ़ आज अपनी सांस्कृतिक विरासत और आधुनिकता के बीच संघर्ष करता दिख रहा है। आदिकवि महर्षि वाल्मीकि के तप से पावन तमसा के प्रवाह से पवित्र आजमगढ़ न जाने कितने पौराणिक, मिथकीय, प्रागैतिहासिक और ऐतिहासिक तथ्यों और सौन्दर्य को छिपाए अपने अतीत का अवलोकन करता प्रतीत हो रहा है। आजमगढ़ को अपनी आज की स्थिति पर गहरा क्षोभ और दुख जरूर हो रहा होगा कि जिस गरिमा और सौष्ठव से उसकी पहचान थी, वह अतीत में कहीं खो गयी है और चंद धार्मिक उन्मादी और बर्बर उसकी पहचान बनते जा रहे हैं। आजमगढ़ ने तो कभी सोचा भी न होगा कि उसे महर्षि दुर्वासा, दत्तात्रेय, वाल्मीकि, महापंडित राहुल    सांकृत्यायन, अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’, शिक्षाविद अल्लामा शिबली नोमानी, कैफी आजमी और श्यामनारायण पांडेय के बजाय बटला हाउस, आतंकवाद, जातिवादी राजनीति और अपराध से जाना जाएगा।
इतिहास- पौराणिक आख्यानों और रामायण काल की भौगोलिक स्थिति का आकलन करें तो यह कोशल राज्य का एक हिस्सा था। ऋषि विश्वामित्र राम-लक्ष्मण को सरयू (घाघरा) के किनाने-किनारे लेकर बलिया होते हुए जनकपुर सीता स्वयंवर में ले गए थे। जनश्रुति के अनुसार वे एक रात्रि सरयूतट पर दोहरीघाट में विश्राम किए थे, इसीलिए इसका नाम दोहरीघाट पड़ा। महराजगंज स्थित भैरव बाबा का स्थान एक विचित्र बिंदु पर पड़ता है और यह तत्कालीन संस्कृति के एक केंद्र  के रूप में था। विचित्रता यह है कि भैरव जी से पश्चिम में अयोध्या, उत्तर में गोरखनाथ की भूमि गोरखपुर और दक्षिण में बाबा विश्वनाथ की नगरी और भारत की सांस्कृतिक राजधानी वाराणसी बराबर दूरी पर हैं। यहां से ये तीनों स्थान लगभग चालीस कोस (120 किमी) की दूरी पर हैं। यह अपनी संस्कृति, शौर्य और आस्था के लिए प्रसिद्ध था और जनश्रुति के अनुसार यहां पर राजा दक्ष ने यज्ञ किया था।
आजमगढ़ की सरकारी वेबसाइट और कुछ अन्य स्रोतों की मानें तो रामकाल में आजमगढ़ में राजभर या भर समुदाय का वर्चस्व था और उसी की सत्ता थी। चूंकि इस क्षेत्र में बाहरी शक्तियों के आक्रमण का भय कम था, इसलिए यहां किलों तथा अन्य राजकीय महलों का कोई अवशेष नहीं मिलता। यदि आजमगढ़ में किलों की बात की जाए तो एक किला घोसी में है जो राजा घोष ने बनवाया था। किंतु, इस पर भी मतभेद है। कुछ लोगों का कहना है कि इसे असुरों ने बनवाया था।

महराजगंज, आजमगढ़ में  (भैरोजी मंदिर )  
फोटो : हरिशंकर राढ़ीआजमगढ़ का प्राचीन इतिहास अन्य भारतीय स्थानों की भांति अप्रमाणित ही है क्योंकि भारत में कभी इतिहास लिखने की परंपरा ही नहीं रही। देश का इतिहास और इतिहास लेखन पहले अंगेरेजों ने सत्यानाश को समर्पित किया और बाद में प्रायोजित तौर पर लिखने वाले ‘महान वामपंथी इतिहासकारों’ ने। भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण ने भी कुछ पाने के लिए कोई खास जहमत नहीं उठाई और यदि कहीं उठाई और प्रमाण भी दिया तो सरकारों और ‘बुद्धिजीवियों’ ने मानने से साफ इन्कार कर दिया। विश्वास न हो तो अयोध्या प्रकारण देख सकते हैं। आजमगढ़ में ऐसे अनेक स्थल हैं जिनकी खुदाई की गई होती तो अनेक रहस्यों से पर्दा उठता। भैरोजी में जहां मिडिल स्कूल  यदि वहां के ऊँचे टीले की खुदाई होती तो कुछ रहस्योद्घाटन हो सकता था। किसी समय यहां कूपर साहब का बंगला था और उससे पहले यहां शुजाउद्दौला के समय हिंदुओं और मुसलमानों में संघर्ष हुआ था।
1192 के तराइन के युद्ध में पृथ्वीराज चैहान मुहम्मद गोरी के हाथों पराजित हुआ तथा उसे बंदी बनाकर गजनी ले जाया गया और वहीं उसे मार डाला गया। 1193 में जयचंद भी मारा गया और वाराणसी सहित आजमगढ़ (तब आजमगढ़ वाराणसी का ही एक भाग था और आजमगढ़ नामकरण नहीं हुआ था) गोरी के नुमाइंदों के हाथ में आ गया।
आजमगढ की स्थापना और नामकरणयह एक निर्विवाद तथ्य माना जाता है कि आजमगढ़ की स्थापना आजमशाह ने की थी और उसी के नाम पर इस शहर का नाम आजमगढ़ रखा गया। जनश्रुतियों, विकीपीडिया और आजमगढ़ गजेटियर (Azamgarh Gazetteer, Vol XXXIII, of the District Gazetteer of the United Province of Agra and Oudh, Edited and Compiled by DRAKE –BROCKMAN – ICS. Published in 1911) के अनुसार आजमगढ़ की स्थापना ऐलवल और फुलवरिया गांवों के ध्वंशावशेषों पर की थी। किसी समय मेहनगर के गौतम राजपूत शासक विक्रमाजीत बहुत प्रभावशाली थे किंतु कालांतर में टैक्स इत्यादि की अदायगी न कर पाने के कारण उन्हें शुजाउद्दौला के दरबार में पेश होना पड़ा। उसके सामने दो स्थितियां थी - या तो अपने राज्य से हाथ धोएं या फिर इस्लाम स्वीकार करें। हालांकि इन शर्तों का कोई ठोस प्रमाण नहीं मिलता, किंतु उस समय की मुगल प्रवृत्ति को देखते हुए इस पर सहज विश्वास हो उठता है। विक्रमाजीत ने अपनी सत्ता बचाने के लिए इस्लाम धर्म स्वीकार कर लिया। उसने एक मुस्लिम युवती से शादी की जिससे दो पुत्र - आजमशाह और अजमत शाह पैदा हुए। आजमशाह ने आजमगढ़ की स्थापना की और अजमत शाह ने अजमतगढ़ बसाया जो जीयनपुर बाजार के पास सगड़ी तहसील में पड़ता है। आजमगढ़ की सरकारी वेबसाइट और आजमगढ़ गजेटियर के अनुसार आजमगढ़ की स्थापना सन् 1665 ई0 में हुई, हालांकि कुछ स्थानीय जानकारों का मानना है कि यह वाकया सन् 1770 के आस-पास का होगा क्योंकि शुजाउद्दौला का शासनकाल तभी माना जाता है। विकीपीडिया के मुताबिक विक्रमाजीत मुगलों के दिल्ली दरबार अपनी राज्य सीमा बढ़ाने की इच्छा लेकर गए थे। उन्हें वहां आजमगढ़ के इर्द-गिर्द 22 परगना दे दिए गए किंतु इसके बदले उन्हें इस्लाम कुबूल करना पड़ा।

आजमशाह की कन्नौज में 1675 ई0 में मृत्यु हो गई। अजमत शाह ने अजमतगढ़ में शासन करना शुरू तो किया किंतु वह कभी मजबूत शासक नहीं बन पाया। छबीले राम ने 1688 में अजमतगढ़ पर धावा बोल दिया और अजमत शाह जान बचाने के लिए गोरखपुर की ओर भागा। दोहरीघाट के निकट जब वह घाघरा पार कर रहा था तभी चिल्लूपार (बड़हलगंज) की ओर से उसे रोक लिया गया। अजमत शाह घाघरा मेें डूब गया या मार दिया गया। उसका पुत्र इकराम शासन व्यवस्था देखता था। उसके छोटे भाई  का नाम मोहब्बत था। अंततः इस परिवार से केवल मोहब्बत का पुत्र इरादत ही बचा जो सिमटी हुई जमींदारी संभालने लगा।

अंगरेजों के शासनकाल में 18 सितंबर, 1832 को आजमगढ़ आधिकारिक रूप से जिला बना और अलग से कलेक्टरेट बनाई गई। मि0 थामसन जनपद के पहले कलेक्टर बने जो आगे चलकर कंपनी के ले0 गवर्नर बने।


स्वाधीनता का प्रथम संग्राम और आजमगढ़अंगरेजों ने आजमगढ़ के भौगोलिक, ऐतिहासिक महत्त्व और यहां के लोगों का जुझारूपन देखते हुए सदैव बड़ी गंभीरता से लिया। सन् 1857 के आंदोलन में आजमगढ़ में अंगरेजों की 17वीं बटालियन डेरा जमाए थी। आंदोलनकारियों से भयंकर युद्ध हुआ और एक बार अंगरेजों के पांव उखड़ने लग गए थे। फिर लखनऊ से 19वीं और 34वीं बटालियन की मदद मिली और वे आंदोलन को कुचलने में कामयाब रहे।

प्रथम स्वाधीनता संग्राम में लखनऊ एक महत्त्वपूर्ण केंद्र रहा था। बेगम हजरत महल के संघर्ष के किस्से मशहूर हैं। एक बार लखनऊ जीत के बाद भी अंगेरजों के हाथ से निकल गया था और स्वाधीनता सेनानियों की विजय हो गई थी। किंतु उसके बाद अंगरेजों ने दूसरी टुकड़ियां और कप्तान भेजकर लखनऊ को जीत लिया। इस जीत का जश्न इंग्लैंण्ड में जोर-शोर मनाया गया और मरने वाले अंगरेज सिपाहियों को शहीद की संज्ञा दी गई। अंगरेज कवि अल्फ्रेड लार्ड टेन्नेशन की कविताओं के प्रशंसक भारत में भी बहुत से हैं। वह रानी विक्टोरिया का जमाना था और इंग्लैण्ड में उपनिवेश विस्तार की देशभक्ति चरम पर थी। विक्टोरिया काल में अंगरेजी साहित्य पूरी तरह राजभक्त हो चुका था और साहित्य में प्रेम, शृंगार और कोमल भावनाओं को निंदनीय दृष्टि से देखा गया। विक्टोरिया कालीन अंगरेजी साहित्य की प्रमुख विशेषता यह थी कि इंग्लैण्ड की शासक महिला होने के बावजूद महिलाओें को पथभ्रष्टिका के रूप में देखा गया और उन्हें विकास और विस्तार के मार्ग में बाधा माना गया। उनके यौन आकर्षण और प्रेम की निंदा की गई और शारीरिक संबंधों के लिए दंडित किया गया। राबर्ट ब्राउनिंग की कविता ‘माई लास्ट डचेस’ और ‘परफीरिया’ज लवर’ उनकी महिला विरोधी प्रतिनिधि कविताएं हैं। इस क्रम में लाॅर्ड टेन्नेशन का उल्लेख करना परमावश्यक है जिन्हें एक कवि के तौर पर बहुत सम्मान मिलता है। बहुत कम लोग जानते हैं कि टेन्नेशन ने ‘डिफेंस आॅफ लकनाॅऊ’ नाम की एक लंबी कविता लिखी है जिसमें 1857 के युद्ध में लखनऊ युद्ध गंवाने वाले अंगरेज सैनिकों को शहीद के तौर पर श्रद्धांजलि दी गई है और पुनः जीतने वालों की स्तुति की गई । इतना ही नहीं, भारतीय विद्रोहियों को अपशब्द भी कहा गया है। पढ़कर ऐसा लगता है कि लखनऊ टेन्नेशन की पुश्तैनी जायदाद रही हो और भारतीयों ने उस पर जबरन कब्जा कर लिया हो।

अठारहवीं सदी के प्रारंभ में आजमगढ़ जौनपुर और गाजीपुर की सरकारों के अधीन रहा। उस समय आजमगढ़ का राजा मोहब्बत शाह था। सन् 1857 की क्रांति में आजमगढ़ ने बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया और वीर कुंवर सिंह के नेतृत्व में भयंकर संघर्ष हुआ। 3 अक्टूबर, 1929 को महात्मा गंाधी ने आजमगढ़ का दौरा किया और श्रीकृष्ण पाठशाला में एक सभा का आयोजन हुआ जिसमें लगभग 75000 लोगों ने हिस्सा लिया तथा 5000 रुपये गांधी जी को भेंट किया गया।

भारत छोड़ो आंदोलन में भी आजमगढ़ ने अपने हिस्से की क्रांति में कोई कसर नहीं छोड़ी। सरायमीर के निकट रेलवे लाइन उखाड़ दी गई, तरवां थाना फूंक दिया गया और महराजगंज थाने को भी लगभग कब्जे में ले लिया गया। अंततः आजादी का जश्न मनाने में भी आजमगढ़ पीछे नहीं रहा।
तमसा: आजमगढ़ को पवित्र तमसा तट पर स्थित सबसे बड़ा शहर होने का सौभाग्य प्राप्त है। तमसा आज भी बह रही है और आजमगढ़ का लगभग तीन ओर से परिवेष्टित किए हुए है, ठीक वैसे ही जैसे काशी को गंगा ने कर रखा है। लेकिन, भौतिकता और लालच के दौर में होने वाले विकास और असंवेदनशीलता से वह भी धीरे-धीरे अन्य नदियों की भांति काली और मैली हो रही है। तमसा छोटी भले हो, उसका सांस्कृतिक, पौराणिक और ऐतिहासिक महत्त्व कम नहीं है। इसी के पावन तट पर आदि कवि महर्षि वाल्मीकि का आश्रम था, जहां आदिकाव्य रामायण का सृजन हुआ। इसी आश्रम में सीता का वनवास कटा और लव-कुश का जन्म हुआ। यहीं महर्षि वाल्मीकि को प्रथम छंद ज्ञान हुआ और उनका विश्वविख्यात श्लोक ‘मा निषाद प्रतिष्ठाम...’ प्रकट हुआ। इसी के तट पर भगवान दत्तात्रेय का आश्रम भी है जहां तमसा अपनी छोटी बहन कुंवर नदी से संगम करती है तो दुर्वासा का आश्रम तमसा और मझुई के संगम पर है।

तमसा आज जैसी भी स्थिति में हो, रामायण काल में यह एक पवित्र और महत्त्वपूर्ण नदी थी। गोस्वामी तुलसीदास ने अयोध्या कांड में इसका कई बार उल्लेख किया है। राम वनगमन और भरत के मनाने जाने के क्रम में तुलसीदास जी ने इसके महत्त्व को रेखांकित किया है। राम को वन में छोड़कर वापस आए सुमंत्र महाराज दशरथ को राम के वनगमन का वृत्तांत सुनाते हुए कहते हैं -
प्रथम बासु तमसा भयउ, दूसर सुरसरि तीर।
न्हाइ रहे जलपान करि सिय समेत रघुबीर ।। रामचरित मानस, अयो0 150।।

जब भरत राम को मनाने चित्रकूट के लिए गए तो उनका प्रथम रात्रि विश्राम तमसा तट पर ही हुआ था। रामचरित मानस का प्रसंग देखिए-
तमसा प्रथम दिवस करि बासू। दूसर गोमति तीर निवासू ।। अयोध्या0 187-8 ।।

भरत ने वापसी में चित्रकूट से अयोध्या की यात्रा कुल चार दिनों में की थी। उनकी दुखकातर मानसिकता को समझा जा सकता है। वापसी में पहला दिन तो बिना आहार के ही बीत गया था, ऐसी स्थिति में न गंगा ही अच्छी लगी होगी और न तमसा ही।
महर्षि वाल्मीकि के जीवन में तो तमसा बहुत गहराई तक समाई हुई थी। उन्होंने तमसा को और तमसा ने उन्हें गरिमा प्रदान की। ‘रामायण’ बालकांड के द्वितीय सर्ग में ही महर्षि वाल्मीकि तमसा को लेकर लिखते हैं-
स तु तीरं समासाद्य तमसाया मुनिस्तदा।
शिष्यमाह स्थितं पाश्र्वे दृष्ट्वा तीर्थकर्दमम् ।।4।।
अकर्दममिदं तीर्थं भरद्वाज निशामय।
रमणीयं प्रसन्नाम्बु सन्मनुष्यो यथा ।।5।।
न्यस्यतां कलशस्तात दीयतां वल्कलं मम।
इदमेवावगाहिष्ये तमसातीर्थमुत्तमम् ।।6।।

अर्थात् तमसा के तट पर पहुंचकर वहां के घाट को कीचड़ से रहित देखकर मुनि ने अपने पास खड़े हुए शिष्य से कहा - भरद्वाज देखो, यहां का घाट बहुत सुंदर है। इसमंे कीचड़ का नाम नहीं है। यहां का जल वैसा ही स्वच्छ है, जैसा सत्पुरुष का मन होता है। तात, यहीं कलश रख दो और मुझे मेरा वल्कल वस्त्र दो। मैं तमसा के इसी उत्तम तीर्थ में स्नान करूंगा।’
वनगमन के समय राम ने सीता और लक्ष्मण सहित तमसा तट पर रात्रि विश्राम किया था, जिसका उल्लेख रामचरित मानस में सुमंत्र के मुख से मिलता है। इसका वर्णन महर्षि वाल्मीकि ने भी किया है-
ततस्तु तमसातीरं रम्याश्रित्य राघवः ।
सीतामुद्वीक्ष्य सौमित्रिमिदं वचनमब्रवीत ।। रामायण, अयो0 सर्ग 46, श्लोक -1

उसी तमसा को हमारी विकसित सभ्यता और सुख-सुविधा मुंह चिढ़ा रही है। शायद ही उसे विश्वास होता हो कि कभी उसके तट पर भगवान श्रीराम को आश्रय मिला होगा और उन्होंने उसके सौन्दर्य और पवित्रता की भूरि-भूरि प्रशंसा की होगी। ऐसा भी एक दिन रहा होगा कि उसने न जाने कितने ऋषियों को अपने तट पर बसाया होगा और उनकी प्रशंसा पाई होगी। अब तो हमें भौतिक और अंधाधंुध विकास चाहिए।

तमसा, जिसे स्थानीय तौर पर प्रायः टौंस या टौंसिया के नाम से पुकारा जाता है, आजमगढ़ को पश्चिम, दक्षिण और पूरब से घेरे हुए है। पहले इस पर एक मात्र पुल था जो आजमगढ़ को जौनपुर-वाराणसी रोड से जोड़ता था। अंगरेजों का बनवाया हुआ। बाद में कलेक्टरी मैदान के पास एक और पुल बना जो अब अपर्याप्त सिद्ध होता है। आजकल अंगरेजों के बनाए पुल को तोड़कर नया पुल बनाया जा रहा है। सिधारी के पास का पुल पूरबी हिस्सों को जोड़ता है।
आजमगढ़ रेलवे स्टेशन    फोटो : हरिशंकर राढ़ीरेल यातायात:  रेल यातायात की दृष्टि से आजमगढ़ अब देश के प्रमुख हिस्सों से ठीक से जुड़ गया है। एक समय था कि यह जनपद रेलवे से लगभग वंचित था। सन 1997 में ब्राड गेज के चालू होने से पूर्व यहां के लोगों के लिए वाराणसी या शाहगंज ही आश्रय हुआ करता था। ऐसा नहीं था कि आजमगढ़ में रेल लाइन नहीं थी, थी किंतु मीटर गेज और प्रमुख मार्ग पर न होने से वह नहीं के बराबर ही थी। आज का आजमगढ़ रेलवे स्टेशन तब स्थानीय आजमगढ़ियों की बोली में पल्हनी स्टेशन के नाम से जाना जाता था और 75-80 की उम्र वाले आज भी उसे पल्हनी ही कहते हैं क्योंकि मुख्य शहर से लगभग तीन किमी की दूरी पर पल्हनी नामक गांव में यह बना था। आजमगढ़ गजेटियर के अनुसार आजमगढ़ 8 जून 1898 को तुर्तीपार मऊ रेलखंड से कनेक्ट हुआ था जो उस समय बंगाल और उत्तर पश्चिम रेल प्रखंड में पड़ता था। इसी तिथि पर मऊ- आजमगढ़ खंड को भी चालू किया गया जिस पर खुरहट, मोहम्दाबाद गोहना और जहानागंज रोड स्टेशन थे। 15 मार्च 1899 को इंदारा स्टेशन से बलिया लाइन को खोला गया और तुर्तीपार लाइन को बनारस तक विस्तारित किया गया। 14 फरवरी 1903 को मऊ-आजमगढ़ लाइन को शाहगंज से जोड़ दिया गया, अर्थात आजमगढ़ मुख्य रेलपथ से जुड़ गया और जौनपुर-वाराणसी पहुंचना आसान हो गया। 1904 में घोसी होते हुए दोहरीघाट के लिए रेलवे लाइन खोल दी गई और बाद में शाहगंज से गोशाईंगंज होते हुए फैजाबाद के लिए ट्रैक बिछाने का सर्वेक्षण किया गया।
आजमगढ़ रेलवे स्टेशन का एक दृश्य  
 फोटो : हरिशंकर राढ़ीकालांतर में वाराणसी - शाहगंज - फैजाबाद लाइन ब्राडगेज बन गई और आजमगढ़ -शाहगंज लाइन मीटर गेज ही। परिणाम यह हुआ कि यह रेल सेक्शन लगभग अनुपयोगी और अन्य क्षेत्रों से कटा ही रह गया। सन 2000 के आसपास आजमगढ़- दिल्ली (1997 के आसपास ब्राडगेज बन जाने पर ) कैफियात एक्सप्रेस चलने के पूर्व मैं भी दिल्ली की ट्रेन पकड़ने या तो गोरखपुर या फैजाबाद जाया करता था।

रेलवे के सुविधा अच्छी न होने से आजमगढ़ का रोडवेज बसस्टेशन काफी विकसित हुआ और यह आज भी उत्तर प्रदेश के बड़े बस स्टेशनों में एक है। यहां से प्रदेश के लगभग हर जिले के लिए बसें हैं और गाजीपुर तथा बलिया डिपो की बसें भी इसकी संख्या और सुविधा में वृद्धि करती हैं।
आजमगढ़ रेलवे स्टेशन पर  लेखक  हरिशंकर राढ़ी






विकास के इस युग में भी आजमगढ़ एक अदद हवाई अड्डे के लिए तरस रहा है। लखनऊ से पूरब जाने पर अगला हवाई अड्डा गया और पटना ही है जो बिहार में लगभग 500 किमी की दूरी पर है। मजे की बात है कि आजमगढ़ फैजाबाद रोड पर कप्तानगंज के पास मंदुरी में हवाई अड्डा बनकर तैयार है और इसका ट्रायल भी हो चुका है। न जाने कौन सी समस्या है कि इसे चालू नहीं किया जा सका।  इसके चालू होते ही आजमगढ़ ही नहीं, बलिया, दक्षिणी गोरखपुर, अंबेडकरनगर देश की हरेक हिस्से से जुड़ जाएंगे। जब सन 2014 के चुनाव में यहां से सांसद के तौर पर श्री मुलायम सिंह यादव चुने गए थे और उन्हीं के पुत्र श्री अखिलेश यादव की प्रदेश में सरकार थी, तब लोगों की आशाएं आसमान चूमने लगी थीं। किंतु ढाक के वही तीन पात। मंदुरी हवाई अड्डा उस दिन की बाट देख रहा है जब उसके रनवे पर कोई ऐसा विमान उतरे जिसमें आजमगढ़ की मिट्टी का कोई नाॅन वीआईपी हो।

आजमगढ़ विकास की राह पर है। यहां के लोग सीधे-सरल जरूर हैं किंतु वे विरोध और परिवर्तन की राजनीति में गहरा विश्वास करते हैं। इधर जब से जाति और धर्म की राजनीति का बोलबाला हुआ है, आजमगढ़ उसमें बहुत आगे है। कभी वामपंथियों का गढ़ था, अब जातिवादियों का है। यहां से अनेक कद्दावर नेता निकले किंतु आजमगढ़वासियों को तकलीफ है कि उनमें से किसी ने जिले के विकास के लिए कुछ नहीं किया। पहले स्व0 चंद्रजीत यादव इंदिरा गंाधी की कैबिनेट में मंत्री रहे। उन्होंने कुछ निजी परिचय के लोगों की सुधि ली। जनता सरकार के समय स्व0 रामनरेश यादव उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री हुए। उन्होंने कुछ करने की सोची कि 19 माह में उनकी सरकार का पतन हो गया। बाद में बहुत दिनों तक वे राज्यपाल रहे किंतु आजमगढ़ की याद उन्हें नहीं आई। यह भी दुखद रहा कि आजमगढ़ की जनता ने प्रायः सत्ताविरोध में मतदान किया और उसका दंश झेलने को मिला। हाँ, घोसी के सांसद और इंदिरा गांधी के करीबी स्व0 कल्पनाथ राय ने अपने क्षेत्र में बहुत विकास किया और मऊ को अलग जिला बनवाने में उनका प्रयास स्मरणीय है।
आजमगढ़ की बोली भोजपुरी है। एक अलग सी भोजपुरी जो बनारस और आजमगढ़ के लिए ही बनी है। इसमें न तो बिहार, बलिया और गोरखपुर का दीर्घ विस्तार है और न उच्चारण में ‘ओ’ या बंगाली पुट। यह अवधी और भोजपुरी का एक सीधा मिश्रण है, सपाट है। न तो मिठास की अधिकता और न अवधी की रूक्षता। आजमगढ़ की भोजपुरी यानी बनारसी भाषा। भोजपुरी भाषी क्षेत्रों में आजमगढ़ और बनारस ही ऐसे हैं जहां ‘है’ के लिए ‘हौ’ का प्रयोग होता है और ‘का हो गुरू, का हालि हौ?’ का एकात्म प्रयोग। अभी भी आजमगढ़ में दिखावा और प्रपंच का प्रकोप नहीं है। लोग राजनीति कैसी भी करें, जीवन बड़ी सादगी से जीते हैं।

dhanyavad

Bhairo Baba :Azamgarh ke

Thu, 29/06/2017 - 10:00
स्थानीय आस्था के केंद्र : आजमगढ़ के भैरव बाबा                                                                         -हरिशंकर राढ़ीआस्था तो  बस आस्था ही होती है, न उसके पीछे कोई तर्क और  न सिद्धांत। भारत जैसे धर्म और आस्था प्रधान देश में आस्था के प्रतीक कदम-दर कदम बिखरे मिल जाते हैं। यह आवश्यक भी है। जब आदमी आदमी और प्रकृति के प्रकोपों से आहत होकर टूट रहा होता है, उसका विश्वास और साहस बिखर रहा होता है तो वह आस्था के इन्हीं केंद्रों से संजीवनी प्राप्त करता है और अपने बिगड़े समय को साध लेता है। भारत की विशाल जनसंख्या को यदि कहीं से संबल मिलता है तो आस्था के इन केंद्रों से ही मिलता है। तर्कशास्त्र कितना भी सही हो, इतने व्यापक स्तर पर वह किसी का सहारा नहीं बन सकता !
भैरव बाबा मंदिर का शिखर : छाया - हरिशंकर राढ़ी
 ऐसे ही आस्था का एक केंद्र उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जनपद में महराजगंज बाजार स्थित भैरव बाबा का विशाल एवं अति प्राचीन मंदिर है। प्रशासनिक स्तर पर महराजगंज ब्लॉक भले ही विख्यात हो, भैरव जी की महत्ता और लोकप्रियता दूर-दूर तक फैली है। श्रद्धा और आस्था की दृष्टि से महराजगंज भैरव बाबा के अस्तित्व के कारण जाना जाता है, न कि महराजगंज के कारण भैरव जी को।

भैरव बाबा का यह मंदिर पचास किलोमीटर की परिधि से श्रद्धालुओं को सामान्य दर्शन के लिए खींचा करता है किंतु विशेष मेलों और मनौतियों की दृष्टि से यह आसपास के कई जिलों तक आकर्षण और श्रद्धा का केंद्र है। मनौतियां पूरी होने पर, मुंडन और जनेऊ संस्कार के लिए गोरखपुर, मऊ, बलिया, गाजीपुर, बनारस, जौनपुर और फैजाबाद तक के लोग आया करते हैं। ज्येष्ठ मास के गंगा दशहरा पर लगने वाले सप्ताह भर के मेले में लाखों श्रद्धालुओं का आगमन होता है।

भैरव बाबा का यह मंदिर निस्संदेह बहुत प्राचीन है। इसकी उत्पत्ति के विषय में किंवदंतियां और जनश्रुतियां पौराणिक काल तक ले जाती हैं। सामान्यतः माना यह जाता है कि दक्षिणमुखी ये काल भैरव भगवान शिव के उन गणों के प्रमुख हैं जिन्होंने राजा दक्ष का यज्ञ विध्वंश किया था। यह कथा लगभग हर हिंदू को मालूम है कि राजा दक्ष ने एक यज्ञ किया था जिसमें उन्होंने अपनी पुत्री पार्वती और दामाद शिव को नहीं आमंत्रित किया था। कारण यह था कि वे शिव के अवधूत स्वभाव से चिढ़े हुए थे। पार्वती अनामंत्रित ही पिता के यज्ञ में गई और पति का अपमान देखकर भस्म हो गईं। तब भगवान शिव ने भयंकर क्रोध किया और काल भैरव को आदेश दिया कि वे राजा दक्ष का यज्ञ विध्वंश कर दें। यज्ञ विध्वंश के बाद काल भैरव दक्षिणाभिमुखी होकर यहीं बैठ गए और तबसे यह स्थान भैरव बाबा के रूप में प्रसिद्ध हुआ।
अतृप्त हवन कुंड  : छाया - हरिशंकर राढ़ी
भैरव जी के इस क्षेत्र में इस कथा का प्रतिवाद करने वाला कोई नहीं है। यह सर्वमान्य हो चुका है कि राजा दक्ष का यज्ञ यहीं हुआ था। मेरे पैत्रिक निवास से इस स्थान की दूरी तीन किलोमीटर से कम है और पहले मुझे भी इस कथा का स्थल यही होने में कोई संदेह नहीं था। िंकंतु यज्ञस्थल यही था, ऐसा मान लेना पूरी तरह उचित नहीं होगा। प्रमाणों के आधार पर यह निश्चित सा हो गया है कि राजा दक्ष का वह यज्ञ हरिद्वार में गंगातट पर कनखल में हुआ था और क्योंकि राजा दक्ष हिमालय या हिमाचल के राजा थे, इसलिए हरिद्वार के प्रमाण में तथ्य मजबूत दिखते हैं।परंतु संदेह इसमें भी नहीं है कि इस भैरव स्थान पर भी एक यज्ञ हुआ था। उसके प्रमाण हैं। यह स्थल भी छोटी सरयू नदी के किनारे है जहां कभी सरयू नदी स्वयं बहा करती थी। लगभग चालीस वर्ष पहले यहां सैकड़ों कुएं थे जिनमें कई का व्यास चार-पांच फीट ही था। पिताजी के अनुसार उनके बचपन में यहां दो सौ से कम कुएं नहीं रहे होंगे। इसके पीछे कारण यह बताया गया था कि राजा दक्ष के यज्ञ में 360 पंडितों ने भाग लिया था और हर पंडित के लिए एक अलग कुआं था। दूसरा प्रमाण यह दिया जाता है कि मंदिर परिसर में एक हवन कुंड है जिसमें विधिपूर्वक कितनी भी आहुति दी जाए, यह कभी भरता नहीं। कारण कि इस हवन कुंड में पार्वती कूद कर भस्म हुई थीं। आज भी इस हवन कुंड में श्रद्धालू हवन कराते रहते हैं। इसकी पूर्णता की सच्चाई पर दावे से कुछ नहीं कहा जा सकता।


मंदिर में स्थापित भैरो बाबा का विग्रह (मूर्ति )भैरो जी के विषय में 'आजमगढ़  गजेटियर' लिखता है-
भैरों जी देवस्थान को देवतरी के नाम से भी जाना जाता है और यहां के परिचारक ब्राह्मणों के अनुसार यह प्राचीन अयोध्या नगर का द्वार है, जो यहां से 40 कोस दूर है। इस देव स्थान पर हर माह की पूर्णिमा को एक छोटा मेला लगता है किंतु  जेठ माह के शुक्लपक्ष की दशमी को बहुत बड़ा मेला लगता है जिसमें हजारों लोग शामिल होते हैं...पहले का भैरव मंदिर बहुत छोटा सा था - बिलकुल किसी अति प्राचीन सिद्धपीठ की भांति। आज यहां पर अत्यंत ऊंचा मंदिर है जिसका शिखर दस-बारह किलोमीटर की दूरी से भी दिख जाता है। कहा जाता है कि पार्वती का श्राप था कि यहां कोई यज्ञ सफल नहीं होगा। सन 1971-72 के दौरान एक युवा ब्रह्मचारी का आगमन हुआ और उन्होंने मंदिर परिसर से हटकर एक बड़ा यज्ञ करवाया। अपने क्षेत्र का यह अपूर्व एवं अप्रतिम आयोजन था। यज्ञ सफल ही नहीं हुआ, इतना जनसमूह आया और इतना चढ़ावा चढ़ा कि िंकंवदंती बन गई। ब्रह्मचारी जी ने उसी चढ़ावे का उपयोग करके नए उच्च मंदिर का निर्माण कराया. म्ंदिर का ढांचा बहुत पहले ही बनकर तैयार हो गया था और बीसों साल तक यथावत पड़ा रहा। भैरो जी का प्राचीन मंदिर इस विशाल मंदिर के अंदर ही था और स्थानीय लोगों को यह बात पीड़ा पहुंचाती रही। काफी दिनों बाद जब महराजगंज बाजार टाउन एरिया के अंतर्गत आया तो टाउन एरिया निवासी व्यापारियां ने मंदिर की प्लास्टर और साज-सज्जा हेतु कमर कसी। जहां तक मुझे याद है, अपने कार्यकाल में टाउन एरिया चेयरमैन श्री लक्ष्मी जायसवाल ने नेतृत्व का बीड़ा उठाया। स्थानीय सहयोग से मंदिर को साज-सज्जा और भव्यता प्रदान की गई। मंदिर के कलश को सुधारा गया और उसे स्वर्णिम रंगत प्रदान की गई। परिक्रमा पथ बनवाया गया और भैरो विग्रह को बड़े मंदिर में स्थापित किया गया। छोटे मंदिर में भीड़ के दिनों में दर्शन दुर्लभ हो जाता था। अब कुछ आसानी जरूर हुई है। हां, दर्शन की लाइन अभी भी नहीं लगती और पूर्णिमा के दिन धक्कामुक्की चलती रहती है। यह सुनसान सा स्थान आज आजमगढ़ के प्रमुख दर्शनीय स्थलों में एक है।ग्रामीण क्षेत्र में स्थित होने से इसे प्राकृतिक हरीतिमा का वरदान प्राप्त है। मंदिर से सटा एक विशाल तालाब जिसे यहां पोखरा कहा जाता है, इसके सौंदर्य में वृद्धि करता है। पोखरे में आनंद और श्रद्धा के लिए डुबकी लगाते हैं। स्थल से सटी छोटी सरयू नदी भी वातावरण को रसमय करती है।
मंदिर के पास का पोखरा      छाया - हरिशंकर राढ़ी         
 आसपास मंदिरों की एक कतार सी है। हनुमान मंदिर (जिसका हाल में ही जीर्णोद्धार हुआ है), मेवालाल का बनवाया हुआ शिव मंदिर भी श्रद्धालुओं के लिए महत्त्वपूर्ण है।ज्येष्ठ में गंगा दशहरा से पूर्णिमा तक एक सप्ताह का विशाल मेला लगता है। हमारे बचपन का यह बड़ा आकर्षण हुआ करता था। यहीं हमें कठपुतली की नाच, सर्कस, चिड़ियाघर और न जाने कितने अजूबों का दर्शन और परिचय हुआ करता था। हर स्थानीय परिवार में कुछ रिश्तेदार आया करते थे जिसके बहाने मेला घूमने और मिठाइयां खाने का अवसर मिलता था। दूर-दूर से कड़ाही चढ़ाने भक्त आया करते थे। कड़ाही चढ़ाना पूर्वी उत्तर प्रदेश की एक विशेष श्रद्धा है जिसमें देवस्थान पर पूड़ी और हलवा बनाकर इष्टदेव को अर्पित किया जाता है। हर माह की पूर्णिमा को बड़ा और मंगलवार को छोटा मेला लगता है। यातायात के साधनों की प्रचुरता और

आर्थिक स्तर में उन्नयन के साथ श्रद्धालुओं की                                                                                           संख्या बढ़ती जा रही है।

राजेंद्र हलवाई अपनी दूकान पर                                                           किशोरावस्था के अंतिम वर्षों में हर मंगलवार को यहां जाने का नियम सा हो गया था। जाना, दर्शन करना और उसके बाद राजेन्द्र हलवाई की दूकान पर बैठकर गप्पें मारना एक सुखद एहसास था। मिठाइयों की दूकानें अब भी सजती हैं किंतु वह रस शायद कहीं बिला गया है। व्यापारीकरण की मार यहां तक पहुंची है। इस साल फरवरी में गया तो जहां सैकड़ों कुएं थे, उनका निशान तक नहीं मिला। कुआें को बंद करके निर्माण कार्य और दूकानें सजा ली गई हैं। आखिर आर्थिक विकास और रोजगार के आगे श्रद्धा, परंपरा, संस्कृति और नैतिकता कहां तक ठहर सकती है।


भैरव स्थान पर  छोटी  सरयू के किनारे लेखक गंगा  दशहरा पर लगने वाले मेले   का एक दृश्य कैसे पहुंचें बाहरी लोगों के लिए यह बता देना ठीक रहेगा कि भैरव बाबा का यह स्थान आजमगढ़ जनपद मुख्यालय, रेलवे स्टेशन या रोडवेज बस स्टेशन से लगभग  पचीस किमी की दूरी पर है। आजमगढ़ फैजाबाद राजमार्ग पर आजमगढ़ से 16 किमी की दूरी पर कप्तानगंज बाजार है और वहां से सात किमी महराजगंज बाजार है। भैरव बाबा महराजगंज से बिलकुल सटा हुआ हे और बाजारीकरण के विकास में महराजगंज और भैरव बाबा के बीच की सीमा समाप्त हो चुकी है। फैजाबाद या अकबरपुर से आने वाले सड़क यात्रियों के लिए कप्तानगंज से ही मुड जाना होगा । गोरखपुर की ओर से आने पर आजमगढ़ से पहले जीयन पुर बाजार से महराजगंज मार्ग पर 25 किमी आना पड़ता है।  
महराजगंज और भैरव बाबा में आज भी कोई होटल/लॉज या ठहरने योग्य धर्मशाला नहीं है। अतः यदि कोई व्यक्तिगत परिचय या रिश्ता न हो तो यहां ठहरने का कार्यक्रम बनाकर नहीं आना चाहिए। हां, यह प्रशंसनीय है कि यहां कोई लूट-खसोट या धोखेबाजी नहीं है। हालांकि मंदिर की व्यवस्था पंडों के जिम्मे है लेकिन उनका भी कोई आतंक नहीं है।  दस-पांच रुपये में मान जाते हैं। आवश्यकता के सभी सामान और जलपान गृह उपलब्ध हैं।आखिर ग्रामीण क्षेत्र की संस्कृति और श्रद्धा समेटे इस स्थान का भ्रमण कर लेने में बुरा ही क्या है ?



dhanyavad

लेखक विषय संवाद साभार अनुवादक

पहले वो आए साम्यवादियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं साम्यवादी नहीं था

 

फिर वो आए मजदूर संघियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं मजदूर संघी नहीं था

 

फिर वो यहूदियों के लिए आए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं यहूदी नहीं था

 

फिर वो आए मेरे लिए

और तब तक बोलने के लिए कोई बचा ही नहीं था

 

मार्टिन नीमोलर (1892-1984)