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इयत्ता

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The term IYATTA means the essence of existence. I think this is nothing, but an exploration. Exploration for absolute pleasure of human being. Not for a person, but for entire world. Let us be together, for a great exploration. May we be associates of one another!
Updated: 9 hours 48 min ago

Maheshpur Azamgarh ka

Wed, 21/06/2017 - 23:46
महेशपुर (आजमगढ़ )
  - हरिशंकर राढ़ी समाज में आए व्यापक परिवर्तनों से कोई अछूता रह गया हो, यह संभव नहीं है। भौतिक प्रगति के साथ वैचारिक बदलाव हर जगह दिख रहा है और उसके साथ-साथ जीवन पद्धति में भी बड़ा बदलाव आया है। रूढ़ियां तो टूटी ही हैं, कुछ अच्छी परंपराएं भी बिखरी हैं। आदमी सुविधाभोगी हुआ है और उसके अनुसार उसने सिद्धांत और व्यवसाय भी बदला है। अन्य क्षेत्रों की भांति राढ़ियों के दोनों गांवों में व्यवसाय और सोच में काफी परिवर्तन आया है। नयी पीढ़ी बेहतर सुविधाओं और रोजगार की तलाश में शहरों की ओर पलायन कर रही है, खेती पर निर्भरता कम हुई है। किंतु सबसे अधिक असर जातिगत तानेबाने पर हुआ है और उसमें भी सकारात्मक ताने-बाने पर। बिरादरी की परंपराओं का जो जुनून और कानून 30-40 साल पहले तक था, वह बिखर रहा है।

महेश और विष्णु में बड़ा भाई कौन था, इसे निश्चित रूप से निर्धारित नहीं किया जा सकता। महेश ने महराजगंज से उत्तर देवारा क्षेत्र चुना और बस गए। उनके बसाए गांव का नाम महेशपुर हुआ। वह जमाना निश्चित ही सुविधाओं के घोर अभाव का रहा होगा। न कोई रास्ता, न यातायात और न कोई नगरीय जुड़ाव। न जाने महेश बाबा की क्या मानसिकता रही होगी कि छोटी सरयू और बड़ी सरयू (घाघरा) के बीच के कछार क्षेत्र में उन्होंने बसने की ठानी होगी, जबकि दो-तीन सौ साल पहले देश में न कृषियोग्य भूमि की कमी थी और न इतनी आबादी का घनत्व। ऊपर से दूर आए हुए ज्ञानी ब्राह्मण। शायद उन्हें प्रकृति का सान्निध्य प्रिय रहा हो, बड़े साहसी रहे हों या एकांतवासी।
 महेशपुर  में शस्य साम्राज्य :                  छाया हरिशंकर राढ़ी जो भी हो, मेरे बचपन का महेशपुर आज से बहुत भिन्न था। महराजगंज बाजार के पुराने चैक से बनियों और कुम्हारों के मोहल्ले से होते हुए छोटी सरयू नदी को पार करिए और वहां से एक पतली सी गहरी कच्ची सड़क (जिसे हम खोर कहते थे, खोर की कोई सही उत्पत्ति मुझे तो नहीं मिली, हो सकता है कि खोह का अपभ्रंश हो क्योंकि यह रास्ता किसी खोह जैसा ही गहरा था।) सर्पीले आकार में चली जाती थी। कुल जमा चैड़ाई एक बैलगाड़ी निकलने भर को। खोर के दोनों ओर सरपत और मेउड़ी की बाड़। मेउड़ी अब नहीं दिखती और न मैं इस वनस्पति शास्त्र का इतना बड़ा ज्ञाता हूँ कि उसका सर्वव्यापी या वानस्पतिक नाम बता सकूँ। इतना याद है कि इस मेउड़ी का उपयोग टोकरियां (जिन्हें आजमगढ़ मंे खांची कहा जाता है) बनाने में किया जाता था क्योंकि इसके लरछे बड़े मजबूत और चिम्मड़ होते थे। इसके अतिरिक्त छप्पर का बंधन बांधने में भी ये काम आती थीं, जलावन भी होता था किंतु मेउड़ी का सर्वाधिक सदुपयोग अध्यापकों द्वारा छात्रों की पिटाई और चमड़ा उतारने में किया जाता था। यह सर्वसुलभ शस्त्र था और इससे देश की शिक्षा व्यवस्था आगे बढ़ती थी। मैं इस मामले में सौभाग्यशाली था कि मुझे इसके प्रहार का स्वाद नहीं मिला था। कारण दो थे-- एक तो मेरी माता जी उसी विद्यालय में पढ़ाती थीं और दूसरे यह कि मैं अपने काम में किसी प्रकार की कमी नहीं रखता था। हाँ, बाकी बहुत से सहपाठियों को मेउड़ी का प्रहार सहते जरूर देखा था। पूरे मन से पढ़ाने और पीटने के मामले में तब प्राइमरी पाठशाला के अनेक शिक्षक बहुत विख्यात होते थे।

 महेशपुर  में लेखक का पैतृक आवास                  छाया :        हरिशंकर राढ़ीमहराजगंज और महेशपुर के बीच पुराने बाजार से लगभग दो किमी की दूरी थी। इस बीच में न कोई घर और न कोई ठांव। राहगीर अकेला हो और हिम्मती न हो तो उसका मालिक भगवान ही। हाँ, लगभग बीच में मुंडीलपुर गांव जरूर पड़ता था, कितु रास्ते से काफी दूर। बीच में पकवा इनार (पक्का कुआं)। पकवा इनार मुड़ीलपुर के ठाकुर जगन्नाथ सिंह का बगीचा और उसमें बना ऊंची जगत का पक्का कुआं जो शायद आम के बाग के लगने के समय सिंचाई के लिए बनवाया गया होगा। वहां से आगे निकले तो बौलिया नामक एक पोखरी और पेड़ों की घनी झुरमुट। कोढ़ में खाज यह कि बौलिया पर भूतों और चुड़ैलों का बसेरा होने का अंधविश्वास। बच्चे तो क्या, बड़ों की हिम्मत नहीं पड़ती थी शाम ढलते ही वहां से गुजरने की। कुछ लोग थे जो रात में देर से आते, उन्हें बड़ा हिम्मती मर्द माना जाता था। मौसम गर्मियों का हो तो, गनीमत। सबसे भयंकर दृश्य होता था बारिश के मौसम का। छोटी सरयू उफान पर और वहां से गांव तक की खोर पानी से भरी हुई। घुटनों तक पानी, तैरते हुए सांप बिच्छू और उनमें से होकर निकलना। मुझे ठीक से याद है कि बरसात के चार महीनों में हम बच्चों का बाजार जाना बिलकुल बंद। घर का कोई बड़ा सप्ताह में एक दिन बाजार जाता तो नमक, मिट्टी का तेल और माचिस जैसी आवश्यक वस्तुएं ले आता। दो-चार पड़ोसी भी कुछ न कुछ लाने को दे दिया करते। जहां तक मुझे याद है, सन् 1975 के बाद कच्ची सड़क पटनी शुरू हुई थी और सन 1984 में छोटी सरयू पर लकड़ी का पुल बनकर तैयार हुआ था।

महेशपुर आज एक विकसित गांव है और बैंक के अलावा सारी सुविधाएं मौजूद हैं। भारतीय स्टेट बैंक भी लगभग खुल गया था किंतु गांव के प्रभावी लोगों के झगड़े में निरस्त हो गया। महेशपुर में कुल सात पुरवे हैं जिसमें दक्षिण का पूरा और उत्तर के पूरा में राढ़ी ब्राह्मणों के कुल मिलाकर 40 घर होंगे। इसके अतिरिक्त गांव में जातिगत आबादी में यादव बहुसंख्यक हैं। अनुसूचित जाति, कोइरी और गड़ेरिया जाति की भी जनसंख्या अच्छी है। महेशपुर गांव के लोग सामान्यतः शांतिप्रिय हैं और जाति आधारित विवाद कभी भी नहीं हुआ है। जो भी विवाद हैं, वे संपत्ति से संबंधित हैं और न्यायालय के अलावा हिंसा के स्तर पर प्रायः नहीं आते। जातिगत मतभेद या जातिवाद चुनावों के अतिरिक्त कभी मुखर नहीं होता। एक -दूसरे के सुख-दुख में शरीक होने के पुरानी भारतीय संस्कृति अभी भी इस गांव में चल रही है।

जनगणना विभाग के आंकड़ों के हिसाब से (2011की जनगणना, जो वेबसाइट पर उपलब्ध है) इस गांव में कुल 212 परिवार हैं और कुल आबादी 1526 है जिसमें 762 पुरुष और 764 महिलाएं हैं। महेशपुर की साक्षरता दर 66.4 है जो औसत से जरा सा कम है किंतु लिंगानुपात सकारात्मक है। समुद्रतल से ऊँचाई 91 मीटर है।
वैसे वेबसाइट सर्च के दौरान मुझे महेशपुर के विषय में जो जानकारियां मिलीं, वे बड़ी हास्यास्पद और अविश्वसनीय थीं। न जाने किन लोगों ने किस आधार पर कहां से सूचना एकत्रित की तथा पूरी तरह से दिग्भ्रमित करने का प्रयास किया है। उदाहरण के तौर पर एक वेबसाइट ने बताया कि महेशपुर महराजगंज तहसील में पड़ता है जबकि महराजगंज तहसील है ही नहीं। पता नहीं किस जिले के महराजगंज को महेशपुर की तहसील बना दिया। मैंने इस वेबसाइट को काफी पहले मेल भी लिखा किंतु उनके कान पर जूँ नहीं रेंगी। इसी प्रकार एक दूसरी वेबसाइट ने महेशपुर का निकटतम अस्पताल बलरामपुर लिखा है जो गोंडा जिले में है और निकटतम हवाई अड्डा अकबरपुर बताया है जबकि अकबरपुर मे हवाई अड्डा है ही नहीं। इन भ्रामक सूचनाओं के आधार पर कोई महेशपुर के विषय में क्या जानकारी इकट्ठा करेगा, सोचने वाली बात है।

मेरा बचपन और पूरी किशोरावस्था इसी महेशपुर में गुजरी है। युवावस्था का प्रथम चरण भी कमोवेश यहीं बीता है और इस गांव की मिट्टी मेरे तन-मन में बसी है। इस गांव में एक प्राइमरी स्कूल था, कालांतर में एक इंटर कालेज बना। पहली से लेकर आठवीं तक की शिक्षा गांव के प्राथमिक पाठशाला और आदर्श इंटर काॅलेज में हुई। तब यह दसवीं तक ही था। विज्ञान पढ़ने के लिए मैं नौवीं कक्षा में इंटर काॅलेज महराजगंज चला गया किंतु महेशपुर की यादें साथ लगी रहीं। अपने शुरुआती दिनों में आदर्श इंटर काॅलेज वाकई आदर्श रहा। यह बात अलग है कि बाद में विभिन्न कारणों और स्वार्थों के चलते यह अपने नाम का पूरा विरोधी हो गया। गांव में शाखा डाकघर, सहकारी खाद-बीजगोदाम, पशु चिकित्सालय, सरकारी नलकूल और न जाने कितनी सरकारी योजनाएं तबसे हैं जब ये विरली होती थीं। इनमें अधिकांश विकास कार्य एवं संस्थाओं की स्थापना स्वतंत्रता संग्राम सेनानी स्व0 पं0 लक्ष्मीकंात मिश्र के अथक प्रयासों एवं प्रभाव से हुई थीं। आदर्श इंटर काॅलेज की स्थापना भी इन्हीं की देन है जिसमें विवाद के चलते अलग होना पड़ा। इसके बाद पं0 लक्ष्मीकांत मिश्र जी ने दक्षिण पूरा में इंटर काॅलेज की जमीन पर सन 1986 के आसपास बालिका विद्यालय की नींव डाली। उनके समय तक बालिका विद्यालय में विकास कार्य होता रहा, अनेक कमरे बने किंतु 90 के दशक में उनका निधन हो जाने के बाद विद्यालय उसी स्थिति में रह गया। उनके सामाजिक अवदान को देखते हुए महराजगंज के नए  पर चौक  उनकी प्रतिमा स्थापित की गई। वह समय बदलाव का था। निजीकरण शुरू हो गया था, शिक्षा संस्थान समाज सेवा न होकर आय के स्रोत बन गए, सरकारी विद्यालयों का स्तर गिरने लगा, सरकार ने अनुदान देना बंद कर वित्तविहीन मान्यता देनी शुरू कर दी। व्यावसायिक बुद्धि न रखने वाले समाजसेवी पिछड़ते गए और शिक्षा पूर्णरूपेण शिक्षा माफिया के हाथों में चली गई।
 महेशपुर  में अपने पैतृक आवास पर लेखक                  छाया :      हरिशंकर राढ़ी
गांव का व्यासायिक और सामाजिक ताना-बाना बदलता गया। कुछ राढ़ी जो जमींदार थे, जमींदारी उन्मूलन के बाद जमीन पर आ गए। खेतों की सीमा निर्धारित कर दी गई और कालांतर में चकबंदी भी हो गई। महेशपुर के राढ़ियों में सबसे बड़ी जमींदारी रामानंद-रामशरण राढ़ी की थी जो देवारा कदीम से लेकर मथुरा ठेकेदार के पूरा तक फैली थी। समय की मार और कुप्रबंधन ने इनके बिखरने में बहुत योगदान दिया। यह मलाल इस पूरे खानदान को अभी भी सालता है और यह लेखक भी उनकी चौथी पीढ़ी का हिस्सा है। बिखराव के बाद चौथी पीढ़ी ने स्वयं को संभाला और अपनी मेधा और शिक्षा के बल पर अब इनमें से अधिकांश विकसित या विकास की ओर अग्रसर हैं। वैसे भी इस गांव के अनेक राढ़ियों ने मेधा और शिक्षा के बल पर तमाम सरकारी नौकरियां प्राप्त कीं और उच्च पदों पर रहे। इनमें से उत्तर के पूरा  कई लोग उल्लेखनीय हैं। पुरानी पीढ़ी में उत्तर के पूरा में रमाशंकर मिश्र की भी ख्याति थी। आज महेशपुर गांव में अनेक लोग पीएच. डी और उच्च पदस्थ हैं।

महेशपुर का पश्चिमी पूरा यहां की कुल आबादी का एक बड़ा हिस्सा है। इसे पहले इसे ‘सनपुर’ के नाम से जाना जाता था। कागजों में इसे महेशपुर भले ही लिखा जाता हो, स्थानीय लोग इसे सनपुर के नाम से ही जानते हैं। सनपुर की अधिकांश आबादी यादवों की है और मुख्य महेशपुर से इसकी दूरी एक किमी से अधिक ही होगी।
महेशपुर और सनपुर को जोड़ने वाला रास्ता अब पक्की के सड़क के रूप में है और इसके मध्य में श्री मोतीलाल यादव (पूर्व ब्लंाॅक प्रमुख) द्वारा स्थापित स्व0 ईशदत्त स्मारक डिग्री काॅलेज है। हालांकि यह देवारा कदीम के नाम से पंजीकृत है किंतु वास्तव में महेशपुर में स्थापित होने से महेशपुर की शोभा और गरिमा को यह चार चांद लगाता है। गांव की लड़कियों को अब उच्च शिक्षा आंगन में ही मिलने लगी है। चूंकि श्री मोतीलाल यादव के पुत्र श्री राकेश यादव गुड्डू इस क्षेत्र से एमएलसी हैं, अतः विकासकार्य को गति मिलना स्वाभााविक है।

सनपुर से अविछिन्न खेमानंदपुर महेशपुर का छोटा भाई सा लगता है और इन दोनों गांवों  को  मिलाकर ग्रामपंचायत का निर्माण हुआ है। पड़ोसी गांव सादातपुर और खोजापुर आकार और आबादी में बहुत छोटे हैं इसलिए ये भी महेशपुर के अभिन्न अंग से लगते हैं। आपसी भाई-चारा और न्योता-भोज में ये महेशपुर से अलग नहीं होते। दरअसल, दूर के क्षेत्रों में इन दोनों गांवों के लोग स्वयं को महेशपुर का ही निवासी बताते हैं....महेशपुर ख्यातिप्राप्त तो है ही।

 महेशपुर  में शस्य साम्राज्य                           छाया  :     हरिशंकर राढ़ीअब वे असुविधाओं वाले दिन गए। गांव से सटती हुई सड़क घाघरा के बांध सहदेव गंज तक जाती है जिस पर बढ़ते यातायात को देखकर देश की प्रगति का विश्वास होता है। लगभग हर घर में दुपहिया वाहन,  अनेक ट्रैक्टर, गाड़ियां और आधुनिक सुविधाओं से सुसज्जित हो चुका है महेशपुर। अब न वो बाढ़, न खोर और न सांप-बिच्छू। दिन-रात फर्राटे भरती गाड़ियों को देखकर और महराजगंज आजमगढ़ को पैरों के तले देखकर बड़ा संतोष मिलता है, नहीं मिलते तो यहां की पगडंडियों पर बिताए बचपन केे दिन... मेरे बचपन का महेशपुर....

dhanyavad

Vishunpur (Rarhi ka Pura ) Azamgarh

Sun, 04/06/2017 - 15:25
विशुनपुर (राढ़ी का पूरा), आजमगढ़  का                                           --हरिशंकर राढ़ी राढ़ियों का गांव विशुनपुर महराजगंज क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है और इसकी चर्चा पहले के लेखों में की जा चुकी है। दरअसल महराजगंज बाजार का अधिकांश हिस्सा विशुनपुर की जमीन में ही आता है और वहां इनका वर्चस्व सदैव से रहा है। महराजगंज का नया चौक पूर्णतया विशुनपुर की कृषिभूमि में बसा है और अब यह बाजार का सबसे मंहगा और रौनक वाला क्षेत्र है। महेशपुर की भांति विशुनपुर (राढ़ी के पूरा) की स्थापना का समय बताया नहीं जा सकता। आजमगढ़ गजेटियर में महराजगंज के साथ इसका जिक्र बिशनपुर के नाम से है। नाम में आंशिक परिवर्तन निश्चित रूप से अंगरेजों की टेढ़ी जबान के कारण होगा जिससे उन्होंने भारत के अधिकांश शहरों और गांवों की वर्तनी का सत्यानाश कर दिया।
विशुनपुर गांव बांगर क्षेत्र में होने के कारण अपेक्षाकृत समृद्ध था और बाजार के निकट होने से पहुंच में आसान भी। इस गांव के राढ़ी मुख्यतः तीन पूरवे में बसे हुए हैं। सबसे पश्चिम, अक्षयबट से सटा हुआ पोखरा वाला पूरा, फिर बीच का जो सबसे बड़ा है और कुछ घर महराजगंज-कप्तानगंज सड़क से पूरब की ओर। पूरा विशुनपुर महराजगंज टाउन एरिया में आता है अतः साफ-सफाई आदि का विकास हुआ है। गांव के वर्तमान से ज्यादा महत्त्वपूर्ण इसका इतिहास रहा है। एक जमाने में क्षेत्रीय स्तर पर इस गांव का कोई शानी नहीं था। ऐसे कई लोग हुए जो अपनी ताकत और बुद्धि से सम्मानित और विख्यात हुए। हाँ, यह कहा जा सकता था कि राज्य और राष्ट्र स्तर पर पहचान बनाने या बड़े सामाजिक उत्तरदायित्व निभाने में किसी ने बहुत रुचि नहीं दिखाई। बहुत पहले का तो नहीं, किंतु पिछले 70-80 वर्षों का इतिहास कमोबेश बताया जा सकता है, हालांकि यह इतिहास अलिखित है। इसमें से कुछ तो मुझे पिताजी से ज्ञात हुआ था क्योंकि उनका विशुनपुर के राढ़ियों से बहुत अच्छे संबंध थे, आना जाना था और दूसरे वे किस्सागोई में बहुत माहिर थे। कुछ अंश मैंने महेशपुर के बुजुर्गों से सुना था और बहुत कुछ श्री जे0के0 मिश्र का बताया हुआ है। दरअसल, महराजगंज, विशुनपुर और महेशपुर के विषय में इतना लिखने के पीछे श्री मिश्र जी का आग्रह, उत्साहवर्धन, लगातार तकाजे और उनके द्वारा उपलब्ध कराई गई जानकारी का बहुत बड़ा हाथ है। भैरोजी पर लिखने का विचार तो बहुत पुराना था किंतु पिछले साल भैरोजी पर लिखे और ब्लाॅग पर प्रकाशित लेख के बाद मैं इतनी कड़ियां शायद ही इतनी जल्दी लिख पाता। भैरोजी पर लिखे लेख पर पाठकों ने जो रुचि दिखाई, (ब्लाॅग की रीडरशिप काउंटिंग के आधार पर) उससे भी उत्साहवर्धन हुआ। लोग अपने क्षेत्र एवं अपनी श्रद्धा के प्रतीकों के विषय में जानना तो चाहते हैं, किंतु इस पर लेखन कम हो रहा है।
महराजगंज चौक पर लक्ष्मी कांत मिश्र की प्रतिमा 
वह समय था जब क्षेत्र में उच्च तो क्या, माध्यमिक शिक्षा व्यवस्था नहीं थी। ले-देकर एक प्राइमरी विद्यालय और कूपर साहब के जाने के बाद भैरोजी में एक मिडिल स्कूल। हाँ, एक संस्कृत पाठशाला भी भैरोजी में थी जिससे आधुनिक और रोजगारपरक शिक्षा की आवश्यकता की पूर्ति नहंी हो सकती थी। मिडिल से ऊपर की शिक्षा में महराजगंज इंटर काॅलेज की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही।(मैं भी इस काॅलेज का छात्र रह चुका हूँ।) महराजगंज इंटर काॅलेज की स्थापना एक विद्यालय के रूप में सर्वप्रथम विशुनपुर के पोखरे के पास- महराजगंज बाजार के बजरंग चैक से देवतपुर जाने वाली सड़क पर- हुई थी। इसके संस्थापक सदस्यों में इस क्षेत्र के प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी और सामाजिक कार्यकर्ता स्व0 श्री कृष्णमाधव लाल, अक्षयबट गांव के श्री बाबूराम सिंह और विशुनपुर पोखरा के स्व0 श्री कमलाकांत  मिश्र जी थे। एक शिक्षक के तौर पर मिडिल स्कूल भैरोजी के प्रधानाध्यापक श्री इदरीश मौलवी भी सहायता कर जाते थे। उल्लेखनीय है कि मौलवी इदरीश यहां एक शिक्षक के तौर पर बहुत सम्मानित व्यक्ति थे। कालांतर में यह विद्यालय अधिक जगह की तलाश में अपने वर्तमान स्थान पर स्थापित कर दिया जो गांव प्रतापपुर की जमीन में है। तब यहां जमीन की समुचित उपलब्धता थी। बाद में बगल में थाना स्थापित हो गया और सामने आम की विशाल बाग का उपयोग छात्रगण खेलकूद के लिए करने लगे। जब मैं महराजगंज इंटर काॅलेज का छात्र था (1980 के आसपास) तब इस बाग में प्राय स्वतंत्रता दिवस के कार्यक्रम होते थे और नागपंचमी पर होने वाली कुश्ती भी यहीं आयोजित होने लगी। संभवतः यह 1935-36 की बात होगी।

महराजगंज इंटर काॅलेज के पहले प्रधानाचार्य स्व0 श्री सुदर्शन शुक्ल हुए। आज भी उनकी चर्चा एक योग्य, कर्मठ, सीधे-सरल किंतु सत्यनिष्ठ एवं न्यायनिष्ठ प्राचार्य के रूप में होती है। उनके समय तक इस इंटर काॅलेज की उच्च प्रतिष्ठा थी। हाँ, शुक्ल जी की कृपणता की चर्चा भी बहुत विस्तार से सुनी-सुनाई जाती है। वे काॅलेज में ही रहते थे। तत्कालीन अध्यापकों ने बताया कि वे चपरासी से एक पाव छोटे बताशे मंगाते थे और उसकी गिनती करते थे, क्योंकि वे प्रतिदिन सुबह एक बताशा खाकर पानी पीते थे। यदि किसी दिन बताशा साइज में बड़ा होेने कारण गिनती में एक भी कम होता तो उस चपरासी को दुबारा कन्हैया हलवाई की दुकान पर वापस भेजते और संख्या में पूरे बताशे मंगाते। बाद में स्व0 श्री बाबूराम सिंह प्रधानाचार्य हुए। कठोर तो वे भी बहुत थे, किंतु तब शिक्षा जगत में राजनीति घुस चुकी थी। शिक्षा और विद्यालय खोलना समाजसेवा न होकर निज सेवा होती जा रही थी। परिणाम यह हुआ कि प्रबंधन, प्राचार्य और वरिष्ठ अध्यापकों के झगड़े में शिक्षा पतन की ओर अग्रसर होती गई। आज तो शायद ही कोई इंटर काॅलेज होगा जो स्वस्थ हो, जहां नकल और राजनीति का बोलबाला न हो।

अगर पिछली सदी के मध्य दशक में विशुनपुर के प्रभावी और ताकतवर लोगों की बात की जाए तो कुछ नाम स्वतः ही उभरकर क्षेत्रीय लोगों के मस्तिष्क में आ जाते हैं। इनमें सर्वप्रमुख स्व0 श्री रामनारायण मिश्र, श्री विजय नारायण मिश्र और स्व0 श्री शिवपूजन मिश्र थे। इन लोगों की लंबी जमींदारी और रुतबा था तथा प्रभाव एवं स्वभाव में ये किसी ़क्षत्रिय से कम नहीं  थे। बाद में श्री रामनारायण राढ़ी के पुत्र स्व0 श्री त्रिवेणी मिश्र ने अपने पिता की विरासत को संभाला। वास्तविकता यह थी कि एक समय श्री त्रिवेणी मिश्र से आँख मिलाकर बात करने की हिम्मत रखने वाला या उनसे शत्रुता मोल लेने वाला क्षेत्र में कोई नहीं था। हाँ, राढ़ी बिरादरी के लोगों का वे बहुत सम्मान करते थे और भाईचारा रखते थे। श्री त्रिवेणी मिश्र और श्री शिवपूजन मिश्र जब हाथी पर बैठकर अपने क्षेत्र में घूमते तो इनका जलवा होता था। श्री त्रिवेणी मिश्र का निधन अस्सी के दशक में हुआ होगा और श्री शिवपूजन मिश्र दीर्घजीवी रहे। श्री शिवपूजन मिश्र तो अंततः आर्थिक पतन को प्राप्त हुए और क्षेत्र के लोग उनका उत्थान - पतन, संपन्नता - विपन्नता के उदाहरण में उनके नाम का प्रयोग करने लगे। एक समय स्व0 श्री कामेश्वर मिश्र ने भी अपना परचम लहराया। उनका लंबा कुर्ता उनकी पहचान गया और वे भाजपा के स्थानीय नेता के रूप में स्थापित हुए। मधुमेह और सड़क दुर्घटना ने उन्हें लील लिया। प्रभाव और रुतबे के क्रम में स्व0 श्री राजेश्वरी मिश्र भी खड़े दिखते हैं और उनके पुत्र स्व0 श्री शीतला मिश्र ने भी वह विरासत संभाली। समय के साथ परिवर्तन आया और अब जातीय प्रभाव और आर्थिक शक्ति के बजाय आपराधिक प्रवृत्ति के लोग हर जगह प्रभावशाली हो रहे हैं, भले ही उनकी अपनी कोई औकात न हो।

ब्राह्मणत्व, विद्वता, सामथ्र्य, शक्ति और सज्जनता का समन्वय एक साथ यदि राढ़ी के पूरा में देखना होता तो उस समय पोखरा वाले पुरवे की ओर रुख करना पड़ता था। मैं अपने लेख में आदरणीय श्री जाह्नवी कांत  मिश्र का कई बार उल्लेख कर चुका हूँ। आप इसी टोले के हैं। श्री मिश्र जी के पिता स्व0 श्री कमलाकांत मिश्र (1914-2003) उस समय एक अच्छे पढ़े-लिखे व्यक्ति थे जो अंगरेजी सरकार में रेलवे अधिकारी थे। तब रेलवे को ई आई आर (ईस्ट इंडिया रेलवे) के नाम से जाना जाता था। एक अधिकारी होने के कारण उन्होंने कई लोगों की नौकरियां लगवाई थीं। श्री जे0के0 मिश्र ने इंजीनियरिंग पास की और भारत सरकार की सेवा से सेवानिवृत्त होकर इस समय बैंगलुरु में जीवन व्यतीत कर रहे हैं।
राढ़ी के पूरा  का पोखरा 
इसी पोखरा टोले के स्व0 श्री रामप्यारे मिश्र भी बहुत सम्मानित व्यक्ति रहे। मध्य शिक्षा प्राप्त श्री रामप्यारे मिश्र एक शिष्ट, योग्य, विनम्र किंतु निडर व्यक्ति थे। अदालती कार्यवाही, कानून और संगीत के वे अच्छे जानकार थे और हारमोनियम में निष्णात थे। उनके पास बैठने का सौभाग्य इस लेखक को भी बहुत मिला था क्योंकि पहले पिताजी से उनके संबंध बहुत अच्छे थे और बाद में मैं स्वयं बहुत निकट पहुंच  गया। उनकी संगीत की विरासत को उनके छोटे पुत्र श्री जगदीश मिश्र ने बखूबी संभाला। स्व0 श्री रामप्यारे मिश्र के बड़े पुत्र श्री त्रिलोकी नाथ मिश्र इंटर काॅलेज के प्रधानाचार्य पद से सेवानिवृत्त हैं और अच्छे अध्येता और ज्ञाता हैं और आज भी उनके अंदर का विद्यार्थी जीवित है। भैरोजी के विषय में मुझे उनसे भी अच्छी जानकारी मिली थी।

विशुनपुर, महाराजगंज की बात की जाए तो आस-पास के कुछ महत्त्वपूर्ण गांवों को उपेक्षित नहीं किया जा सकता। महराजगंज का दूसरा निकटतम और सशक्त गांव अक्षयबट है जिससे स्थानीय अपभ्रंश में अखैबर कहा जाता है। प्रमुखतया यह क्षत्रियों का गांव है और गांव की प्रसिद्धि क्षत्रियोचित कारणों से ही है। किसी समय भैरोजी के मंदिर पर मुसलमानों का आक्रमण हुआ था और शायद वह फारूख शेख का समय था, तब अक्षयबट के क्षत्रियों ने हमले का जवाब बड़ी बहादुरी से दिया था। उस आक्रमण में फारूख शेख के सिपाहियों ने हिंदुओं का कत्लेआम शुरू किया था किंतु अक्षयबट के क्षत्रियों ने विशुनपुर के राढ़ियों के साथ मिलकर उनका सामना किया था, अगुवाई की थी और आक्रांताओं को मुंह की खानी पड़ी थी। अक्षयबट की बाग में अंगरेजों के खिलाफ सभाएं हुई थीं और विद्रोह का बिगुल बजा था।
श्री जे- के - मिश्र के माता-पिता (स्व० श्री कमला कांत मिश्र )
मिश्रपुर (चांदपुर) की चर्चा किए बिना इस क्षेत्र का इतिहास अधूरा ही रहेगा। किसी समय जब संस्कृत, वैदिक आचार और शुचिता का बोलबाला था तो मिश्रपुर इसका ध्वजारोही था। इसे छोटा काशी कहा जाता था, और यह प्रकरण 1950 के आस-पास तक का होगा। कई जिलों के पंडित, शास्त्रज्ञ और विद्वान यहां के पंडितों से शास्त्र समझने आते थे। शास्त्रार्थ में चुनौती देने का साहस शायद किसी में रहा हो। न जाने कितनी किंवदंतियां यहां के विषय में प्रचलित हैं। सुना तो यह भी जाता है कि लगभग 100 साल पहले संस्कृत यहां की बोलचाल की भाषा थी। यदि अपुष्ट प्रमाणों की बात की जाय तो कहा जाता है कि एक बार बनारस में यहां के पंडितों के ज्ञान की चर्चा चली तो कुछ बनारसी विद्वान मिश्रपुर के पंडितों की परीक्षा लेने पहुंच  आए। बरसात का मौसम था। मुख्यमार्ग से गांव के बीच में कोई बरसाती नाला था जिसमें पानी भरा था । एक बनारसी विद्वान ने पास में खड़ी एक महिला (जो संभवतः कहार जाति से थी) से पूछा - नाले में कितना पानी है? इसपर महिला ने कहा- भीतो मा भव, केवलं कटिमानं जलं वर्तते’’। संस्कृत में दिए गए उसके इस उत्तर को सुनकर बनारसी विद्वान वहीं से उल्टे पांव वापस लौट गए। इस गांव के दो शास्त्रज्ञ विभूतियों को देखने का अवसर इस लेखक को भी मिला है। स्व0 त्रिवेणी तिवारी तो एक मिथक थे ही, स्व0 श्री रामदरश मिश्र भी कम विद्वान नहीं थे। यह मेरा सौभाग्य है कि श्री रामदरश मिश्र जी का बहुत ही अधिक स्नेह मुझे प्राप्त हुआ था।

कुल मिलाकर यह क्षेत्र भारतीय संस्कृति का एक उन्नत उदाहरण रहा है। भौतिकता के इस युग में भी अभी यह बड़े दावे के साथ कहा जा सकता है कि पूर्वी उत्तर प्रदेश भाईचारा, प्रेम, सौहार्द और अपनत्व में अपना शानी नहीं रखता। सीधी-सपाट जिंदगी, न दिखावा न अतिशयता। आजमगढ़ का यह क्षेत्र हर काल में अपना महत्त्व रखता रहा है। भैरोजी की यह पावन भूमि अतुलनीय है और रहेगी।
dhanyavad

Rarh and Rarhi

Sat, 25/03/2017 - 00:22
राढ़ और  राढ़ी--हरिशंकर राढ़ी 
(यह आलेख किसी जातिवाद या धर्म-संप्रदाय की भावना से नहीं लिखा गया है। इसका मूल उद्देश्य एक समुदाय के ऐतिहासिक स्रोत और महत्त्व को रेखांकित करना तथा वास्तविकता से अवगत कराना है।)

महराजगंज के इतिहास और वर्तमान की बात हो तो राढ़ियों की चर्चा के बिना अधूरी ही रहेगी। जैसा कि पहले ही उल्लेख किया जा चुका है, महराजगंज बाजार प्रमुखतया विशुनपुर (राढ़ी का पूरा) की ही जमीन पर बसा हुआ है और इसकी स्थापना से लेकर विकास में राढ़ियों का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है। आज बाजार का विकास और विस्तार बहुत हद तक हो चुका है तथा आज के दौर में समाज के हर वर्ग और क्षेत्र का सहयोग और समर्पण है।
बहुत दिनों तक यह अज्ञात ही रहा कि महराजगंज के राढ़ी किस मूल क्षेत्र के निवासी हैं क्योंकि सामान्यतः हमारे देश में इतिहास और आत्मकथा लेखन की परंपरा नहीं रही है। मुगलकाल और अंगरेजी राज्य में साक्षरता दर और स्वस्थ परंपराओं का लोप होता गया। स्थिति ऐसी आई लोग या तो रोजी-रोटी में फंस गए या फिर पोंगापंथी परंपराओं में। अंगरेजों की ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति ने बहुत नुकसान पहुंचाया।
‘राढ़ी’ शब्द से सामान्यतः झगड़ालू प्रवृत्ति का बोध होता है और यही धारणा विशुनपुर और महेशपुर के राढ़ियों के विषय में पाई जाती रही है। कुछ हद तक इनमें क्षत्रियत्व और स्वाभिमान (अक्खड़पन की सीमा तक) पाया जाता है इसलिए इस अर्थ की सामान्यतः पुष्टि भी हो जाती है। किंतु वास्तविक इतिहास कुछ और ही है और वह बंगाल की उच्च बौद्धिक क्षमता और परंपराओं वाले गौरवशाली इतिहास का हिस्सा है।
वस्तुतः राढ़ी की उत्पत्ति किसी अनुमानित अर्थ या प्रवृत्ति से नहीं हुई है। यह शब्द बंगाल के राढ़ क्षेत्र से संबंधित है। ़राढ़ क्षेत्र विश्व के प्राचीनतम क्षेत्रों में एक है। उपलब्ध कुछ स्रोतों को सही मानें तो राढ़ क्षेत्र का अस्तित्व तब था जब हिमालय का अस्तित्व नहीं था। यह एक मान्यताप्राप्त संकल्पना है कि जहां आज हिमालय है, वहां पहले टेथिस सागर था और उसके दोनों ओर दो भू़क्षेत्र थे जिनके परस्पर टकराने से हिमालय का जन्म हुआ। तो भी, राढ़ क्षेत्र राढ़ नामक नदी द्वारा लाई गई मिट्टी से बना था और आदिम काल से यह आबाद था। राढ़ क्षेत्र को दो भागों में बांटा गया - पूर्वी राढ़ और पश्चिमी राढ़।
पूर्वी राढ़ के अंतर्गत ये क्षेत्र आते हैं: 1- पश्चिमी मुर्शिदाबाद, 2- बीरभूम जिले का उत्तरी भाग, 3-पूर्वी बर्धमान, 4- हुगली, 5- हावड़ा क्षेत्र, 6- पूर्वी मेदिनीपुर तथा 7- बांकुड़ा जनपद का इन्दास थाना क्षेत्र।
पश्चिमी राढ़ में ये क्षेत्र सम्मिलित हैं: 1- संथाल परगना, 2- बीरभूम के अन्य क्षेत्र, 3- बर्धमान का पश्चिमी भाग, 4- बांकुडा (इन्दास थाना क्षेत्र को छोड़कर), 5-पुरुलिया, 6- धनबाद, 7-हजारीबाग के कुछ इलाके, 8- रांची के कुछ इलाके, 9-सिंहभूम तथा 10- मेदिनीपुर का कुछ इलाका ।
आनंदमार्ग प्रकाशन तिलजला, कोलकाता द्वारा प्रकाशित और श्री प्रभात रंजन सरकार द्वारा लिखित पुस्तक ‘सभ्यता का आदि बिंदु -राढ़’ के तथ्यों को प्रामाणिक मानें तो राढ़ क्षेत्र में सभ्यता विकसित ही नहीं हुई थी, अपितु सभ्यता का यहां जन्म हुआ था। एक समय था जब राढ़ क्षेत्र का ध्वज विदेशों तक लहराता था। यहां केे लोगों ने जय का दंभ पालने के बजाय मानवसेवा को अपना धर्म माना।
प्रभात रंजन के अनुसार मंगलकाव्य और वैष्णव काव्य साथ - साथ चल रहे थे। इस क्रम में जयदेव को वे प्रमुखता देते हैं जिन्होंने गीत गाविंद की रचना की और वैसा लालित्य शायद ही किसी अन्य गीत में हो। राढ़ क्षेत्र के प्रमुख लोगों में रवीन्द्रनाथ टैगोर, राजशेख बसु, रासबिहारी बसु, सुभाषचंद्र बोस, रामकृष्ण परमहंस और विवेकानंद ( नरेंद्रनाथ दत्त) की गणना की जा सकती है। रामकृष्ण परमहंस जहां राढ़ी ब्राह्मण थे, वहीं विवेकानंद राढ़ी कायस्थ। राढ़ क्षेत्र में इतनी प्रसिद्ध और महान विभूतियाँ हुईं कि उनको सूचीबद्ध कर पाना बहुत दुष्कर कार्य है। वैसे तो ्राढ़ क्षे़त्र की सभी जातियां अपने को राढ़ी लिखती हैं किंतु राढ़ी ब्राह्मण और राढ़ी कायस्थ स्वयं को ‘राढ़ी’ के नाम से ही कहलाना पसंद करते हैं।
इसमें संदेह नहीं कि यह क्षेत्र विकसित था। चहुंओर से समतल और जलोढ़ मिट्टी, विदेशी आक्रमण से दूर, हरीतिमा से भरपूर था यह क्षेत्र। हर प्रकार से संपन्न होने के कारण सभ्यता और संस्कृति का विकास तो होना ही था। कालांतर में राढ़ क्षेत्र शैव मतावलंब के गहरे प्रभाव में पड़ा। जगह - जगह शिव के मंदिर इसके प्रमाण हैं। किंतु वैष्णव प्रभाव भी कम नहीं हुआ।
राढ़ क्षेत्र में राढ़ी ब्राह्मणों की उपस्थिति और इतिहास का विवेचन करना बहुत सहज नहीं है। ये इस क्षेत्र के ज्यातिपुंज रहे हैं। राढ़ियों को कुलीन ब्राह्मणों के वर्ग में रखा जाता है। यह तो बहुत स्पष्ट नहीं है कि इनकी उत्पत्ति यहीं की है या ये विस्थापित होकर आए हैं, किंतु इनकी परंपराओं, ज्ञान और उपलब्धियों को देखकर तार्किक रूप से यह कहा जा सकता है कि ये यहां के आदि निवासी थे। ब्राह्मण वंशावली का ज्ञान रखने वाले और विवेचन करने वाले भिन्न -भिन्न मत रखते हैं।
राढ़ क्षेत्र का इतिहास लिखना यहां मेरा उद्देश्य नहीं है, हालांकि मेरे पास कुछ शोधपरक जानकारी जरूर है। यह तो प्रसंगवश है। मेरा लेखनक्रम यहां महराजगंज (आजमगढ़) के राढ़ी ब्राह्मणों और उनके स्थानीय महत्त्व को रेखांकित करना है।
जैसा कि मैंने पहले उल्लेख किया, इस बात का कोई बड़ा प्रमाण नहीं है कि राढ़ी ब्राह्मण यहां के मूल निवासी थे या कहीं से विस्थापित होकर आए थे। विकीपीडिया एवं कुछ अन्य वेबसाइटों का अध्ययन करने से मालूम होता है कि राढ़ी ब्राह्मण मूलतः कन्नौज के कुलीन ब्राह्मण थे और किसी अज्ञात समय और अज्ञात कारणों से बंगाल के इस क्षेत्र में पहुंचे। कन्नौज क्षेत्र के ब्राह्मणों को कान्यकुब्ज ब्राह्मण भी कहा जाता है।
बंगाली कुलीन ब्राह्मण कुल पांच प्रसिद्ध गोत्रों में आते हैं जिनमें- शांडिल्य, भारद्वाज, कश्यप, वत्स और सावण्र्य या स्ववर्ण हैं। इन्हें यहां दो प्रमुख वर्गों में रखा गया है -राढ़ी और वरेन्द्र। बंगाल मंे इनके होने के प्राचीनतम प्रमाण कुमारगुप्त के ताम्रपत्रों से 433 ईस्वी में मिले हैं। एक ताम्रपत्र में राढ़ी ब्राह्मण द्वारा किसी जैन विहार को भूमिदान करने का उल्लेख है। वैसे पौराणिक एवं प्रागैतिहासिक ग्रंथों में भी इनके वहां होने का प्रमाण मिलता है। कुछ पारंपरिक ग्रंथों एवं कथाओं में भी, जिन्हें कुलग्रंथ या कुलपंजिका कहा जाता है, इनकी उत्पत्ति का उल्लेख मिलता है। बंगाल के राजाओं के दरबारी ग्रंथों में भी राढी ब्राह्मणों का जिक्र है। इनके प्रमुख लेखक हरि मिश्र, एदू मिश्र, वाचस्पति मिश्र, राजेन्द्रलाल मित्र हैं और ये लगभग 13वीं से 15वीं सदी के अभिलेख हैं।
कहा जाता है कि आदिसुर नामक किसी राजा को यज्ञ कराने हेतु योग्य वैदिक ब्राह्मणों की आवश्यकता थी और उसके राज्य में वैदिक विशेषज्ञ ब्राह्मण नहीं थे। (एदू और हरि मिश्र के आख्यान के आधार पर) उसने कोलांचल और कान्यकुब्ज के पांच ब्राह्मणों को यज्ञकार्य हेतु आमंत्रित किया। यह वृत्तांत आठवीं सदी का होगा। इतिहास के जानकारों के अनुसार आदिसुर बंगाल के बजाय उत्तरी बिहार का था। यह तर्क भी पूरी तरह स्वीकार्य नहीं है क्योंकि आदिसुर का राज्य मिथिला क्षेत्र के सन्निकट है और मिथिला में योग्य वैदिक ब्राह्मणों की कमी रही होगी।
कहा जाता है कि बंगाल के सेन राजाओं ने ब्राह्मणों को भूमि और धन खूब दिया। वे समाज मंे वैदिक प्रथाएं और मूल्य स्थापित करना चाहते थे। वे समाज में पूर्ण अनुशासन चाहते थे और यह अनुशासन उन्होंने ब्राह्मणों पर भी लागू किया। कुलीन ब्राह्मण उसे ही माना जाता था जिसके मातृ और पितृ दोनों पक्ष 14 पीढ़ियों तक कुलीन रहे हों। हालांकि ब्राह्मणों ने इसका विरोध भी किया, किंतु कुलीनता की यह प्रथा परंपरा में बदल ही गई।
बंगाल मंे जो भी राढ़ी ब्राह्मण हैं, उनके साथ प्रतिष्ठा जुड़ी हुई है। उनमें प्रमुख जातिनाम व गोत्र निम्नवत हैं:
1. मुखर्जी या मुखोपाध्याय (भारद्वाज गोत्र)
2. बनर्जी या बंदोपाध्याय (शांडिल्य गोत्र)
3. चटर्जी या चट्टोपाध्याय (कश्यप गोत्र)
4. गांगुली या गंगोपाध्याय (सावर्ण गोत्र)
इसके अतिरिक्त लाहिड़ी, सान्याल, मोइत्रा और बागची वरेंद्र समूह के राढ़ी ब्राह्मण हैं।
जो राढ़ी ब्राह्मण राढ़ क्षेत्र छोड़कर दूसरे राज्यों में चले गए, उनमें अधिकांशतः अपना जातिनाम ‘मिश्र’ लगाते हंै। इनमें भी प्रायः वे लोग हैं जिनका गोत्र कश्यप है। उत्तरी भारत के मिश्र जातिनाम के ब्राह्मणों में कश्यप गोत्र शामिल नहीं है। इस प्रकार की चर्चा मुझसे एक बार काशी विद्यापीठ से सेवानिवृत्त प्रो0 वंशीधर त्रिपाठी जी से हो गई। वे ‘कश्यप’ गोत्र सुनते ही बोल पड़े कि इस जातिनाम ‘मिश्र’ में कश्यप गोत्रीय ब्राह्मण हो ही नहीं सकता। वह या तो किसी की गद्दी यानी ‘नेवासा’ (ससुराल या ननिहाल में वंशहीनता की स्थिति में उसी वंश की संपत्ति और घर पर स्थायी रूप से निवास करने वाला) पर होगा या किसी अन्य कारण से अपना जातिनाम बदल लिया है। जब उन्हें पता लगा कि कुछ मिश्र लोग मूलतः राढी हैं तो उन्होंने कहा कि यही कारण है कि उन्हें कश्यप और मिश्र में तुल्यता का संदेह हुआ। राढ़ी तो मूलतः बंगाली ब्राह्मण हैं और मिश्र जातिनाम बंगाल में नहीं होता। प्रो0 वंशीधर त्रिपाठी एक सुदीर्घ अध्येता रहे हैं। आज उनकी वय 85 से ऊपर की है। वे एक अत्यंत अच्छे और गंभीर लेखक रहे हैं। आप मनोविज्ञान, समाज विज्ञान और दर्शनशास्त्र में एम ए तथा डबल पीएच. डी हैं। उन्होंने भारतीय साधु समाज पर शोध किया था और उसके लिए विधिवत दीक्षा लेकर साधु समाज में एक लंबा समय बिताया था। उनकी पुस्तक ‘साधूज आॅफ इंडिया’ एक प्रसिद्ध और मान्यताप्राप्त ग्रंथ है जो अमेरिका के पुस्तकालयों में तथा विश्वविद्यालयों में चर्चित है।
महराजगंज के राढ़ी निश्चित रूप से इसी राढ़ क्षेत्र से विस्थापित हैं। उनकी अधिकांश परंपराएं बंगाल के ब्राह्मणों से मिलती हैं। अंतर एक ही है कि यहां के राढ़ी मूलतः और अधिकांशतः शाकाहारी हैं। वे वैष्णव एवं शैव दोनों ही पंथों में विश्वास रखते हैं और आदिशक्ति दुर्गा उनकी कुल अधिष्ठात्री देवी हैं। वे ही उनकी अंतिम शरण हैं। महराजगंज के राढ़ी राढ़ क्षेत्र से विस्थापित होकर कब और क्यों आए, इसका कोई स्पष्ट उत्तर नहीं है। हो सकता है कि अतिरिक्त स्वतंत्रता, रिक्तता और अस्तित्व की तलाश में राढ़ को छोड़ दिया हो। किसी प्राकृतिक आपदा का संकेेत तो मिलता नहीं। यह भी कहा जाता है कि नवाव शुजाउद्दौला के समय युद्ध और धर्मपरिवर्तन से भयभीत होकर पलायन करना पड़ा हो।
महाराजगंज के राढ़ियांे की मान्यता के अनुसार उनके पूर्वज पहले सुगौटी में आकर बसे। यह गांव भैरव स्थान से लगभग एक किमी की दूरी पर छोटी सरयू के उत्तरी तट पर है। तब शायद बाढ़ का प्रकोप ज्यादा हुआ करता था। कालांतर में विष्णु और महेश दो सगे भाइयों ने एक और विस्थापन लिया। विष्णु ने महराजगंज के पास बांगर क्षेत्र को चुना और बस गए तथा महेश भैरोजी से लगभग तीन किलोमीटर उत्तर पूर्व कछार क्षेत्र में बस गए। यहीं से विष्णु के नाम पर विष्णुपुर (विशुनपुर) तथा महेश के नाम पर महेशपुर आबाद हुआ। आज दोनों ही गांवों में इन्हीं के वंशजों की एक बड़ी आबादी है। अब समय परिवर्तित हो गया है, पहले इन्हें लोग मिश्र के बजाय राढ़ी कहकर ही बुलाते थे।
जैसा कि मैंने पहले कहा, राढ़ी ब्राह्मणों में ब्राह्मणत्व के साथ क्षत्रियत्व अधिक है। ये लोग बड़े अभिमानी, सुपठित, तार्किक और ज्ञानी थे। पंडिताई, यजमानी और व्यावसायिक पूजा-पाठ जैसे ब्राह्मणोचित कार्य में कभी संलग्न नहीं हुए। अधिकांशत: राढ़ी अच्छे किसान भी थे और इनके पास कृषियोग्य भूमि की अधिकता थी। जमींदार भी थे ये।
क्रमशः...........





dhanyavad

लेखक विषय संवाद साभार अनुवादक

पहले वो आए साम्यवादियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं साम्यवादी नहीं था

 

फिर वो आए मजदूर संघियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं मजदूर संघी नहीं था

 

फिर वो यहूदियों के लिए आए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं यहूदी नहीं था

 

फिर वो आए मेरे लिए

और तब तक बोलने के लिए कोई बचा ही नहीं था

 

मार्टिन नीमोलर (1892-1984)