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कारवाँ

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नयी मंज़िल के मीरे-कारवाँ भी और होते हैं पुराने ख़िज़्रे-रह बदले वो तर्ज़े-रहबरी बदला -फ़िराक़ गोरखपुरी
Updated: 9 hours 46 min ago

लेखक विषय संवाद साभार अनुवादक

पहले वो आए साम्यवादियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं साम्यवादी नहीं था

 

फिर वो आए मजदूर संघियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं मजदूर संघी नहीं था

 

फिर वो यहूदियों के लिए आए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं यहूदी नहीं था

 

फिर वो आए मेरे लिए

और तब तक बोलने के लिए कोई बचा ही नहीं था

 

मार्टिन नीमोलर (1892-1984)