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कारवाँ

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Updated: 13 hours 14 min ago

सोमरस क्‍या है ?

Fri, 13/10/2017 - 16:33
ऋग्‍वेद के अनुसार - मन्‍द्रस्‍यरूपंविविदुर्मनीषिण: - विद्वान लोग मदकर सोमरस का स्‍वरूप जानते हैं। स: पवस्‍वमदिन्‍तम। सोम को अत्‍यंत प्रमत्‍त करने वाला बताया गया है। सोम को स्‍वर्ग से बाज ले आया था। एक जगह इसके पृथ्‍वी से पैदा होने का भी जिक्र है। सोम धुनष से छूटे बाण की तरह और अश्‍व की तरह और बाज पक्षी की तरह स्‍वर करता है। सेाम को अधिकतर हरित रंग का बताया गया है ओर पत्‍थरों से कुचलकर इसका रस निकलता है। सोम को कवि, क्रान्‍तकर्मा कहा गया है। सोम गोचर्म के उपर पत्‍थरों के साथ क्रीड़ा करते हैं। उनसे धन-धान्‍य, संतति और शुत्रु के विनाश की कामना की जाती है। सोम के शोधक गोचर्म और मेषचर्म हैं। सोम बाहुओं द्वारा सांशोधित, वसतीवरी-जल से  सिंचित काष्‍ठपात्र में निहित अपने स्‍थान को गमन करते हैं। स:पवश्‍च मदाय कंनृचक्षा:देववीतये। इन्‍द्रो इति इन्‍द्राय पीतये।।1।।सोम तुम नेताओं के दर्शक हो। तुम देवों के आगमन या यज्ञ के लिए इन्‍द्र के पान, मद और सुख के लिए क्षरित होओ।उतत्‍वामरूणंवयं गोणिअहमोमदायकम। ।3।।सोम मद के लिए रक्‍त-वर्ण तुम्‍हें हम दुग्‍ध अादि से संस्‍कृत करते हैं। गोणि:श्रीणीतमत्‍सरम।मदकर सोम को दूध आदि से संस्‍कृत करते हैं।परीतो वायवे सुतं गिर: इन्‍द्राय मत्‍सरम। अव्‍योवारेषु सिंचत।।10।।31।। ऋग्‍वेदस्‍तोताओ तुमलोग वायु और इन्‍द्र के लिए अभिषुत और मदकर सोम को अभिषव देश से लेकर सिंचित करो।सोम के लिए मद चुलाने वाले और मदकर का प्रयोग पचासों बार हुआ है। इंद्र के मद के लिए हम सोम को बनाते हैं ऐसा लिखा गया है। सोम के क्षरित होने का जिक्र भी बार बार है। ऋत्विक लोग सोम को मेष के रोएं से यानि उन से छानते हैं। सोम की माताएं नदियां हैं। सोम ने वृत्र का वध करते समय इंद्र की रक्षा की थी।   सोम तुम अतीव मादक हो, चमसों में बैठते हो, तुम बहुसंख्‍यक और शोभन वीर्य धन क्षरित करो। सोम दूध व दधि संस्‍कृत होकर क्षरित होकर दशापवित्र की ओर द्रोण कलश में जाते हैं। रक्‍त-वर्ण, हरितवर्ण, पिंगलवर्ण सोम। काम वर्षक सोम जलधारा से बनाए जाते हैं। सोम राक्षसों को नष्‍ट करते हैं मतलब राक्षस सोमपान नहीं करते थे। सोम उसी तरह तरंग पैदा करते हैं जैसे रथी अश्‍व को चलाता है। शोधित गतिपरायण सोम सरलता से आकाश की ओर जाते हैं, वे जलपात्र की ओर जाते हैं। सोम को मनुष्‍य बनाते हैं और देवता पीते हैं। सोम तुम उस इन्‍द्र के लिए बहो जिसने 99 शत्रु पुरियाें को नष्‍ट किया है। एक जगह लिखा है - कार्यकुशल स्त्रियां सुंदर वीर्यवाले अपने पति सोम के क्षरणशील होने की इच्छा करती हैं। यस्‍य:तेमद्यंरसमतीव्रमदुहन्ति। तुम्‍हारे मदकर और क्षिप्र मददाता रस को हम पत्‍थरों से दुहते हैं। जैसे घोड़े को जल में मार्जित किया जाता है उसी तरह सोम को दूध-दहि आदि से मार्जित किया जाता है। सोम हर तरह के भय को नष्‍ट करते हैं। सोम जौ के सत्‍तू में मिलाया जाता है ऐसा भी जिक्र है। इंद्र के लिए सोम काले चमड़े वाले राक्षसाें को दूर हटाते हैं। सोम शिशु के समान नीचे मुंह करके रोते भी हैं। एक जगह सोम को इंद्र भी कहा गया है। सोमपान कर ही इंद्र युद्ध को जाते हैं। अंतरिक्ष की अप्‍सराएं यज्ञ में बैठकर पात्राों में सोम को क्षरित करती हैं। सोम को पृथवी का पुत्र भी कहा गया है। जैसे स्‍त्री पुरूष को सुख देती है उसी तरह सोम यजमान को सुख देते हैं। जो तुम्‍हारा पान करता है उसके सारे अंगों में प्रभु होकर तुम विस्‍तृत हो जाते हो। परिपक्‍व शरीर वाले ही तुम्‍हें ग्रहण व धारण कर सकते हैं। तुम्‍हारे रस को पीकर पापी लोग प्रमत्‍त वा आनन्दित न हों ऐसी भी प्रार्थना की गयी है। मधुरभाषी वेन लोग यज्ञ में सोमाभिषव करत हैं। सोम युद्ध में जाते हें और महान अन्‍न को जीतते हैं। ---------------------------------------------------------------ऋग्‍वेद संहिता - सायण भाष्‍य संवलित, चौखंबा प्रकाशन - सप्‍तम अष्‍टक - प्रथम अध्‍याय से सोम वर्णन आरंभ होता है। मंडल 9 अध्‍याय 2 सूक्‍त 45 से लेकर अध्‍याय 7 सूक्‍त 113 तक करीब साढे तीन सौ पृष्‍ठों मे लगातार सोम का वर्णन है।

मीडिया कब तक बेचेगा समोसा और चाय

Thu, 05/10/2017 - 15:03
बीबीसी सहित तमाम मीडिया ने पिछले दिनों एक खबर चलाई थी 'आइआइटी में समोसे बेचने वाले का बेटा'। यह क्‍या तरीका है खबरें बनाने का। कल को अमित शाह जैसे राजनीतिज्ञ इसे 'बनिये का बेटा बना आइआइटीयन'  कह सकते हैं। जब वे गांधी को बनिया कह सकते हैं तो फिर उनसे और क्‍या उम्‍मीद की जा सकती है।
यह मीडिया क्‍यों राजनीतिज्ञों की भ्रष्‍ट भाषा को अपना आधार बना रहा। यह प्रवृत्ति इधर बढती जा रही, किसी भी सफल युवा को उसके आर्थिक हालातों के लिए सार्वजनिक तौर पर शर्मिंदा करना, जैसे जरूरी हो। समोसा बेचे या चाय कोई काम मीडिया की नजर में छोटा क्‍यों हो। केवल पैसे वालों के ही बेटे क्‍यों बढें आगे।
यह जाति, पेशे, धर्म,गरीबी आदि के आधार पर बांटने की राजनीतिज्ञों की बीमारी को मीडिया क्‍यों हवा दे रहा। एक ओर गुड़,तेल,चूरन बेचने वाले रामदेव को मीडिया योगिराज बताता है जब कि रामदेव खुद अपना टर्नओवर(मुनाफा) बताते हुए खुद को मुनाफाखोर घोषित करते हैं।
यह लोकतंत्र है तो यह तो सहज होना चाहिए कि गरीब आदमी जिसकी संख्‍यां ज्‍यादा है उसको हर जगह ज्‍यादा जगह मिलनी चाहिए। खबर तो यह होनी चाहिए कि इस बार भी मुटठी भर अमीरजादों ने कब्‍जा कर लिया तमाम पदों पर।
संसद में साढे चार सौ के आसपास करोडपति हैं। तो यह सवाल बार-बार क्‍यों नहीं उठााया जाता कि भारत में अगर गरीब आ‍बादी है तो उसके प्रतिनिधि क्‍यों तमाम अमीर लोग होते जा रहे। अखि‍र इस करोडपति तंत्र को लोकतंत्र लिखने की क्‍या मजबूरी है मीडिया की।

हिन्‍दी की कछुआ दौड़

Tue, 03/10/2017 - 16:22
हिन्दी के वरिष्ठ कवियों में शुमार रघुवीर सहाय ने हिन्दी को कभी दुहाजू की बीबी का संबोधन देकर उसकी हीन अवस्था की ओर इशारा किया था। इस बीच ऐसी कोई क्रांतिकारी बात हिन्दी को लेकर हुयी हो ऐसा भी नहीं है। हां, यह सच्चाई जरूर है कि पिछले पचास-साठ वर्षों में हिन्दी भीतर ही भीतर बढ़ती पसरती जा रही है और आज की तारीख में वह बाजार के तौर तरीके को प्रभावित करने की स्थिति में आ चुकी है। इस आमदरफ्त में उसके स्वरूप में भी कुछ सतही परिवर्तन होते दिख रहे हैं। पिछले पचास सालों में अगर हिन्दी ने अपनी जड़ें लगातार फैलायी हैं और अपना बाजार खड़ा कर लिया है तो यह सहज ही है। ध्यान देने योग्य है कि लगातार विपरीत परिस्थितियों में ही हिन्दी का विकास हुआ है। मुगलकाल में हिन्दी का विकास तेजी से हुआ था। तब भक्ति आंदोलन ने हिन्दी को जन जन से जोड़ा था। अंग्रेजी राज में भी स्वतंत्रता आंदोलन की मुख्य भाषा होने के चलते हिन्दी का विकास हुआ। अगर इन पचास-साठ सालों में हिन्दी ने धीरे धीरे ही सही अपनी पकड़ मजबूत की है तो इसका कारण इसका राजकाज की भाषा नहीं बन पाना ही है। अपनी इस सुस्त रफ्तार से ही एक दिन हिन्दी कछुआ दौड़ में अंग्रेजी को परास्त कर दे तो अजूबा नहीं।
पिछले सालों में हिन्दी का जिन दो क्षेत्रों में अप्रत्याशित विकास हुआ है वह है मीडिया और राजनीति। पिछले पचास सालों में हिन्दी के अखबारों की पाठक संख्या करोड़ तक पहुंच चुकी है और लाख तक नहीं पहुंच पाने पर अब हिन्दी के अखबार लोकप्रिय नहीं माने जाते। यह सब हिन्दी के बढ़ते बाजार का ही परिणाम है।
आज आम भारतीय जब अपनी खबर अपनी भाषा में पढ़ना चाहता है तो हिन्दी का मीडिया में पकड़ बढ़ते जाना स्वाभाविक है। सारे टेलिविजन चैनल हिन्दी की कमाई खााते हैं पर यह दुर्भाग्य ही है कि चैनलों की वेबसाइट का कंटेंट हिन्दी में नहीं है। जबकि हिन्दी अखबारों के न्यूज पोर्टल अब ह्टिस देने और खुद को अपडेट करने में अंग्रेजी से आगे निकल रहे हैं। भारत में तेजी से हुए कंम्प्यूटराइजेशन के चलते हिन्दी का बाजार इंटरनेट पर लगातार गर्म हो रहा है। यह हिन्दी की बाजार में मजबूत होती स्थिति ही है कि बीबीसी जैसा चैनल जिसके पास हिन्दी के पर्याप्त कंटेंट नहीं होते और जिनका काम हिन्दी की कमाई से नहीं चलता, वह भी हिन्दी वेबसाइट चला रहा है। पहले हिन्दी में मेल करना आसान नहीं था पर अब हिंदी के मंगल फान्ट और बहुत सारे फान्ट कान्वर्टरों के चलते हिंदी में लिखना आसान हो गया है और इससे तेजी से हिन्दी का क्षेत्र बढ़ रहा है, यह पूरी दुनिया के हिन्दी भाषियों को जोड़ रहा है और  यह भविष्य में हिन्दी के विकास को नयी जमीन मुहैय्या कराता जाएगा। इसके साथ रोमन में  नेट पर हिन्दी ही नहीं भोजपुरी कविताओं की मांग भी बढ़ती जा रही है। जगह बना लेने के बाद उसके स्तर पर भी बात शुरू होगी। 
मीडिया के बाद राजनीति हिन्दी की ऐसी दूसरी रणभूमि है जहां वह लगातार मैदान मार रही है। वहां तो हिन्दी की सहायक लोकभाषाओं तक ने अपना रंग दिखा दिया है। लालू प्रसाद की भाषा इसका अच्छा् उदाहरण है। संसद से सड़क तक वे अपनी भोजपुरी मिश्रित हिन्दी का लोहा मनवा चुके हैं। प्रधानमंत्री होने की तो अहर्ता ही हिन्दी बोलना है। इस क्षेत्र में अंग्रेजी को लगातार मुंह की खानी पड़ी है। मनमोहन सिंह ने खुद को हिंदी से दूर रखा तो वे भारतीय जनता से भी दूर हुए।
बाजार जिस आम जन की गांठ ढीली करना चाहता है उसका चालीस फीसदी हिन्दी भाषी है और अंग्रेजी भाषी मात्र तीन फीसदी हैं। यह हिन्दी जन जैसे जैसे शिक्षित होता जाएगा बाजार को अपना सामान लेकर उस तक जाना होगा। यह हिन्दी के बाजार का दबाव ही है कि आज बहुत से अंग्रेजी अखबार हिन्दी की हेडिंग लगा रहे हैं। यह हिन्दी का बाजार ही है कि चाय, पानी, चाट, पूरी, दोसा, दादा, पंचायत जैसे शब्दों को अंग्रेजी की आक्सफोर्ड डिक्शनरी में शामिल करना पड़ा है। कुल मिलाकर हिन्दी का बजार बढ़ा है और लोकतंत्र के विकास के साथ आमजन की भाषा के बाजार का बढ़ना सहज भी है। हां बाकी हिन्दी की जो दुर्दशा हो रही है उस पर ध्यान देने की जरूरत है और यह काम हम आपको ही करना होगा।अंग्रेजों की अंग्रेजी से तो हम पार पा चुके थे पर अब नया हमला अमेरिकी बाजार की अंग्रेजी का है और  हिंदी, हिंदू, हिंन्‍दुस्‍तान वाली इस सरकार को भी मोदी फेस्‍ट, मिशन 2019, मेक इन इंडिया, रोड शो आदि से कुछ फुर्सत मिले तो हिंदी को कुछ राहत मिले।

वायरल हो जाइए बनाम जूता मारो भेजे पर

Tue, 03/10/2017 - 16:16


कुछ हो नहीं रहा आपसे या जम नहीं रहा या आप बोर हो रहे तो आप वायरल हो जाइए। इसके लिए कुछ खास नहीं करना। आप ऐसे व्‍यक्ति की पहचान कीजिए जो जवाब मेंजूते ना मार सके। (इस लोकतंत्र को ऐसे लोगों से भरा जा रहा है।) फिर उसे गिन कर कुछ जूते मारिए। फिर जूतों की या उसके जूता खाए चेहरे की तस्‍वीर नेट पर डालिए। और बोलिए कि यह शख्‍स सपने मेंमेरे महान बाप को गालियां दे रहा था। हो सके तो अपने महान बाप की तस्‍वीर शेयर कीजिए। महान बाप की तस्‍वीर ऐसी बनाइए कि लगे कि जो गालियां दी गयी हैं उसने उनको आहत किया है और अगर आपने कुछ नहीं किया तो वे आत्‍महत्‍या कर लेंगे। अगर महान बाप स्‍वर्ग में हों तो भी कोई बात नहीं, आत्‍मा तो स्‍वर्ग में भी रहती है और वहां भी आहत हो ही सकती है। अपने महान बाप और पिटे हुए व्‍यक्ति की तस्‍वीरें आजू-बाजू डालिए और उसके साथ फूल और चप्‍पल पास ही रख दीजिए। और चूंकि यह लोकतंत्र है तो लोगों को छूट दीजिए कि वे अपनी खुशी या सुविधा या भावनाओं के हिसाब से उसके पिता को फूल चढाएं और पिटे हुए को जूते मारें या संभव हो तो दोनों करें। इसके एवज में कुछ हल्‍का फुल्‍का चार्ज भी कर सकते हैं आप। फूल चढाने के साथ जूते मारना फ्री भी कर सकते हैं। लोगों को छूट दीजिए कि वे इसे अपने बाप भाई मां बहनों के साथ शेयर करें या टैग करें। कमजोर दिल वालों को आप कुछ किफायत दे सकते हैं या उनके जूते आप फूलों से बना सकते हैं या कम से कम फूलों जैसे वे दिखें ऐसा तो कर ही सकते हैं।यूं आप अपने बाप, भाई या लंगोटिया यार को भी जूतेमार सकते हैं बस उसे पता होना चाहिए कि यह सब आप अपने या उसके वायरल होने के लिए कर रहे। कहीं बिना पहले बताए आपने ऐसा कर दिया तो आपकी वही दशा होगी जो पिलपिल बेशर्मा की हुई है। यूं चिंता की कोई बात नहीं। बाद में आप चांदी के जूतों से पीटकर उसे शांत कर सकते हैं और वापिस अपने चंडूखाने में शामिल कर सकते हैं। हां, चांदी के जूते मारते समय आप एक गाना (जूतामारो भेजे पर तेरा भेजा शोर करता है) गाएं तो सड़े पर सुहागा हो जाए। देखिए भिगाकर इतने जूते मारे मैंने, आपको बुरा तो नहीं लगा ना। हां, आपको कुछ लगेगा ही नहीं बस दिमाग में रहना चाहिए कि वायरल होना है।

उत्‍तेजना-तनाव बाकी मोल-भाव - कुमार मुकुल

Thu, 14/09/2017 - 15:45
मोदी जी चुनाव जीतने के बाद भी चुनाव मे लगे हैं निरंतर। मिशन 2014, के बाद मिशन 2017, 2019, फिर 2025।  कोई काम ही नहीं है इनके पास, भाइयों लग जाइए मिशन में। मोदी लहर चल रही, दिल्‍ली में पिटे पर लहर चलती रही, बिहार में पिटे पर लहर चलती रही, जहां लहर का बहर नहीं सध रहा वहां मोल-भाव का कहर जारी है। अदालत पूछ रही कि पांच साल के बीच जिन माननीयों की संपत्ति पांच सौ गनी हुई उसका हिसाब दीजिए पर मोदी जी तो मिशन में लगे हैं। अब इस सतत मिशनरी उत्‍तेजना-तनाव में स्‍वाभाविक है कि आम जनता भी भिड़ी हुई है उनके साथ। चलो हम भी कुछ गोतस्‍करों से गायें लूट कर इसमें योगदान करें। गाय नहीं तो गधे सही, उन्‍हें ही लूट लाएं। ग तो लगा हे उसमें भी। तो इस उत्‍तेजनामय माहौल का असर हो रहा है आम जन पर। वह भी इस लहर मे डूबा लहर काटने में लगा है। उधर आपकी सरकारी गोशालाओं में हजारों गायें मर रहीं सड़ रहीं, उसका चारा भी खाए जा रहे सब। अब इसका असर तो होना है। सब काम धाम रामभरोसे होने लगा है। फिर दिन में तीन बार एक ही लाइन पर ट्रेंनें पल्‍टी ना मारें तो और क्‍या हो। सारी जनता मानसिक अशांति में जीएगी तो आपकी बुलेट क्‍या चलेगी बैलगाडी के दिन आ जाएंगे आप  बनाते और काटते रहिए लहर। शिक्षा में आप दुनिया में पिछड गये। भूखमरी के इंडेक्‍स में पडोसियों से पीछे हैं। खुशी का मंत्रालय बना डाला पर उसके इंडेक्‍स में भी पीछे चले जा रहे। कांग्रेस मुक्‍त बनाने से थक गये तो खरीद खरीद कर कांग्रेस युक्‍त करने का नया अभियान चला दिया। बस लहर चलनी चाहिए। मेक इन इंडिया के तहत असाल्‍ट राइफलें बनी पर आपकी सेना ने ही उसे बेकार साबित किया। बोफोर्स भी नहीं चली, पता चला उसके कल-पुर्जे चीन के थे। कहीं कुछ हो हवा नहीं रहा। बस पूरा मुल्‍क हो हा हू ही किये जा रहा। इससे कुछ नहीं होने का। करते रहिए कूद-फांद। 

श्रम की गांठ से उपजी कविताएं - राजू रंजन प्रसाद

Tue, 22/08/2017 - 17:07
अपनी पीढ़ी के एक कवि की चर्चा धूमिल की पंक्ति से शुरू करने के लिए विज्ञजन से क्षमा की आशा रखता हूं। ‘कविता भाषा में आदमी होने की तमीज है।’ मैं इसे थोड़ा सुधारकर कहना चाहता हूं कि ‘आदमी’ होना कविता लिखे जाने की पहली और अनिवार्य शर्त है। व्यक्तित्व के फ्रॉड से ‘बड़ी’ कविता नहीं लिखी जा सकती। बड़ी कविता से मेरा मतलब महान कविता से कतई नहीं है। बड़ी कविता अपनी संपूर्ण रचना-प्रक्रिया में ‘जेनुइन’ होती है। यहां रचना-प्रक्रिया का उल्लेख अकारण नहीं है। समीक्ष्य काव्य-संग्रह ‘परिदृश्य के भीतर’ के कवि को मैंने पूरे एक दशक तक (यह क्रम अब भी जारी है) जाना और ‘झेला’ है। एक ईमानदार और मुखर आदमी को ‘झेलना’ सहज और आसान नहीं होता। इस कवि को मैंने जब भी अपने पास पाया-उसे बोलता-बड़बड़ाता हुआ ही पाया। इतने दिनों तक चप्पलें साथ चटखाने (घसीटने) के बाद मैंने यही महसूस किया कि ‘चुप्पी उसके लिए मौत से भी ज्यादा त्रासद और भयावह है।’
‘परिदृश्य के भीतर’ में सन् 1988 से 99 तक की कुल इक्यानवे कविताएं शामिल हैं। इन तमाम कविताओं का प्रथम पाठक/श्रोता होने का सौभाग्य मुझे प्राप्त हुआ है। इसलिए इन कविताओं की रचना-प्रक्रिया में आनेवाली एक-एक चीज से परिचित हूं। कइयों के तो मुझे दृश्य तक याद हैं कि किन परिस्थितियों में वह कविता जन्म ले रही थी। कहना होगा कि कुमार मुकुल की कविताओं का क्षितिज काफी विस्तृत है। घर-परिवार और आस-पास की चीज से लेकर अंतर्राष्ट्रीय परिदृश्य तक इनकी कविताओं में सहज भाव से शामिल होते हैं। इनकी कविता सोमालिया की दैन्य स्थिति से शुरू होती है और पहाड़, पत्नी से होती हुई महानगरीय जीवन से पलायन करती संवेदना तक को अपना निशाना बनाती है। प्रकृति पर इनके पास सबसे अधिक कविताएं हैं मानो वह उनकी मुट्ठी में हो।
‘सोमालिया’ संग्रह की सबसे छोटी कविता है, लेकिन इस छोटी-सी कविता के माध्यम से कवि विश्वव्यापी ‘कुलीन’ और बर्बर संस्कृति का सबसे अधिक प्रत्याख्यान करती है। पूंजीवाद के भ्रष्टतम रूप ने पूरी मानवीय संवेदना को किस हद तक अमानवीय बना डाला है,उसके पूरे अर्थशास्त्र को इन दो पंक्तियों की कविता से जाना जा सकता है। कविता की पूरी विकास-यात्रा को समझने के लिए इसको उद्धृत करना अत्यंत अनिवार्य है;
‘मुट्ठी भर
अन्न के लिए
गोलियां
मुट्ठी भर
और सभ्यता के कगार पर
आ पहुंचे हम।’
इसे उद्धृत करने का एकमात्र कारण यह नहीं है कि यह छोटी है और ऐसा करना मितव्ययी होना अथवा सुविधाजनक है, बल्कि यह संग्रह की कविता एवं कुमार मुकुल की चेतना का प्रस्थान-बिंदु है। यहां से मुकुल की कविता के कैनवास खुलते हैं।
इस ‘कुलीन’ और बर्बर संस्कृति का रक्तबीज है महान औद्योगिक क्रांति के गर्भ से उपजी बाजार की फासीवादी संस्कृति। उपभोक्तावाद ने हमारी तमाम संवेदना को ग्रस रखा है और बहुराष्ट्रीय कंपनियों की शक्ल में नव-फासीवादी ताकतें हमारे बीच फिर से पसरने लगी हैं। एक ईमानदार और संवेदनशील कवि भला इस अमानवीय, त्रासद स्थिति को अपनी नियति मानकर चुप कैसे बैठा रह सकता है। उसके पास इतने तफसील हैं इसके कि वह पूरी विनाशलीला को बगैर किसी धुंध के साफ-साफ देख रहा है। संग्रह की दूसरी कविता ‘कउआ’ इसी सत्य को उद्घाटित करती है। कउए को शायद पता नहीं कि बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने कितना खाद्य-अखाद्य बना डाला है। किसी को अलग से बताने की जरूरत शायद ही अब शेष हो कि प्रति-वर्ष लाखों की संख्या में गायों का निधन पॉलिथीन खाने से हो रहा है और हमारी अत्यंत ‘सहनशील’ हिंदू सभ्यता कुछ भी कर पाने में असमर्थ साबित हो रही है।
बहुराष्ट्रीय कंपनियों के आगमन को आये दिन सरकारी वक्तव्यों में जिस तरह पेश किया जा रहा है,लगता है, यह कोई महान् उपलब्धि हो। पचास वर्षों से अधिक के आजाद भारत के इतिहास में गुलामी की याद अब भी ताजा है और कवि की सचेत आंखें उसके फैलते जाल को अपनी पराधीनता का तंबू मान रही हैं। कहना होगा कि भारत में अंग्रेजों का आगमन एक विशुद्ध व्यापारिक कंपनी के रूप् में हुआ था लेकिन धीरे-धीरे देशी निजामों की अदूरदर्शिता और सामान्य जन की ‘कोउ नृप होहिं हमें का हानि’ वाली मुद्रा की वजह से शासक बन बैठे थे। आज स्थिति उससे दो कदम आगे तक जा चुकी है जब हम खुद उसके आने का जश्न मना रहे हैं और सारी दुनिया के सामने दांतें निपोरकर अपना अहोभाग्य बता रहे हैं। सूत्र रूप में यह कहना होगा कि कवि अपने दैनिक जीवन में गांधीवादी शैली से काम चलाते हैं। अपने आस-पास अभावों की एक दुनिया सृजित कर।
कुमार मुकुल से असहमति की गुंजाइश तब होती है जब वे कहते हैं,
‘संस्कृतियों के
इतने रंग-बिरंगे टीलों को छोड़
गंगा की ओर मुंह किए
कहां भागा जा रहा है कउवा।’
हमारे प्यारे कवि के लिए शहर संस्कृति के रंग-बिरंगे टीले से ज्यादा कुछ भी नहीं है। ‘कउवा’ मुकुल की अकेली कविता नहीं है जिसमें शहर के प्रति उपेक्षा का भाव है बल्कि संगह की जिस किसी कविता में भी शहर आता है,वह हीनता-बोध और अपराध-बोध की भावना से ग्रस्त होता है और कवि की कुपित संवेदना का शिकार होता है। इस प्रसंग में कवि की भिन्न-भिन्न कविताओं से चुनी गई पंक्तियों को यहां रखने की अनुमति चाहूंगा। ‘मर्यादाएं हम तोड़ेंगे’ कविता की अंतिम पंक्तियां कुछ इस तरह की हैं,
‘बंदरों-भालुओं से अंटी अयोध्या को
पीटेंगे बांधकर
इसी कंकरीट के जंगल में।’
ऐसा कहते हुए कवि अयोध्या की संपूर्ण ऐतिहासिक गरिमा और उससे जुड़ी हमारी जातीय स्मृतियों को एक गैर-जरूरी चीज साबित कर डालता है। एक और कविता है जिसका शीर्षक है-‘प्यार में’। कविता यों शुरू होती हैः
‘प्यार में महानगरों को छोड़ा हमने
और कस्बों की राह ली
अमावस को मिले हम और
आंखों के तारों की रोशनी में
नाद के चबूतरे पर बैठे हमने
दूज के चांद का इंतजार किया
और भैंस की सींग के बीच से
पश्चिमी कोने पर डूबते चांद को देखा।’
इससे पहले कि मैं कुछ कहूं कवि अपनी ‘पुतैये’ कविता का स्मरण करे। क्या शहर इतना अमानवीय है कि प्यार करने के लिए अब किसी को कस्बों की राह थामनी होगी ? कवि स्वयं लिखता है;
‘महानगर में अब भी तीखा है महुआ
अब भी सुंदर हैं लड़कियां यहां।’
कवि को शायद इस बात का अंदाजा हो कि कस्बों में जो प्रेम-संबंध हैं, जीवन का जो माधुर्य है, उसकी रक्षा के लिए लाखों मजदूर और भिन्न-भिन्न पेशों की चाह लिए नौजवान प्रति-वर्ष किसी-न-किसी शहर को अपना गंतव्य बनाते हैं। यहां उनके हाथों को काम और गांवों में चल रहे/पल रहे प्रेम-संबंधों को खुराक की नमी मिलती है।
शहर के प्रति कवि का जो नजरिया है वह ऐतिहासिक विकास की गलत समझ से बना लगता है। बाजार-संस्कृति का विरोध करने का यह मतलब कतई नहीं होता कि आप प्रगति ही के महत्व को नकार दें। शहर सिर्फ विषैला सर्प नहीं है जो हमेशा फन काढ़े बैठा हो कि कब आदमी आये और उसे डंस लें। अज्ञेय के यहां शहरों के लिए तिरस्कार का भाव है और गांवों का चित्रण ऐसा करते हैं मानों वहां हमेशा ‘ढोल और मादल’ बजते हों। कवि केदारनाथ सिंह के लिए शहर वैसी जगह है जहां इच्छाएं पलती हैं। अब इस सवाल का जवाब तो कुमार मुकुल ही देंगे कि क्या शहरों में स्वयं इसका विरोध करनेवाले कवि और लेखक नहीं बसते ? आपके पास आंकड़ों की कमी नहीं, और आप बता सकते हैं कि शहरों से गांवों के लिए दया की भीख मांगनेवाले कितने गंवई कवि हैं जिन्हें हम भी जानते हों। क्या हम इस बात को कहने का साहस कर सकते हैं कि कविता के जन्म लेने से पाठकों तक लाने का सारा कारोबार इन्हीं नगरों-महानगरों में अंजाम पाता है। हमारे ज्ञान को दुरुस्त करनेवाली कौन-सी किताब और ‘कठिन वक्त की कविता’ की कौन-सी पत्रिका है जिसके कारखाने गांव में हैं ?
शहरों का इतिहास हमारी प्रगति की कहानी कहता है जिसमें लाखों-करोड़ों मजदूरों का श्रम लगा है। संस्कृति के इन टीलों को निर्मित करने में हमारे फौलादी हाथ काम आये हैं। इन्हीं टीलों में किताबों से अंटे तंग से तंग कमरे में अरुण कमल जैसे सुकवि की आत्मा बसती है। उसके एक कोने में सूर्य की तरह उद्भाषित होता पितरिया लोटा भी होता है।
इसी प्रसंग से संबंधित ‘चबूतरा’ शीर्षक की दो कविताएं भी चर्चा की खासतौर से अपेक्षा रखती हैं। इसमें भी कुएं के माध्यम से गांव और शहर (माफ कीजिए, कवि इसे महानगर कहता है) की आत्मा का हमें फर्क बताया गया है। एक कुआं कवि के गांव में है जिसके
‘चबूतरे के पास ही
मेंहदी लगी थी
जो आज तक हरी है
दिन में जिस पर लंगोट सूखते हैं
और रात में उगते हैं सफेद सपने।’
आगे
‘एक कुआं है
महानगर में भी
बिना चबूतरे के
उसके निकट जाने पर ही
पता चलता है कि कुआं है।’
और ऐसा शायद इसलिए है कि ‘महानगर’ के कुएं के लिए कवि की कोई स्मृति नहीं है। इस कुएं के पास कवि ने शाम भी न गुजारी होगी, रात की कौन पूछे। इसीलिए कवि और उनके वर्ग के लोगों के लिए इसका महातम साल में केवल एक बार छठ के अवसर पर जगता है। लेकिन चाय की गुमटीवाला ऐसा नहीं सोचता जिसकी चाय के लिए पानी इसी कुएं से जाता है। सुबह-सुबह कुछ दूधिए भी अपना गेरू वहीं धोते हैं। भिखमंगे भी भरी दोपहरी में वहीं नहाते हैं। कवि को शायद यह मालूम हो कि यह मुहल्ला शहर का वह हिस्सा है जिसका शहरीकरण होना अभी बाकी है। पड़ोस के कई भूखंड अब भी खाली पड़े हैं जिनमे बिल्लियां चूहों के साथ बेखौफ खेलती हैं। जैसे ही अगहन में धान पकते हैं कि उसकी एक लरछी अपनी चोंच में दबाए गौरैया कवि के घर में दाखिल हो जाती है। लेकिन कवि हैं कि
‘कंक्रीट के इस जंगल में
मौसम की निर्जनता
मुझे ही नहीं
इस घरेलू चिड़िया को भी खलेगी।’
कविता का पैरा अभी खत्म भी न होने पाया कि कवि की राय महानगर को लेकर बदल जाती है। वे लिखते हैं, ‘इस नये बसते शहर के पड़ोस में धान की फसल कटेगी।’ शहर के गिर्द फसल की हरियाली हो तो कवि को भला क्या उज्र!
कुमार मुकुल की कविता की विशेषता इस बात में है कि बड़ी-से-बड़ी बात को कम-से-कम शब्दों में कह डालती है। इस लिहाज से संग्रह में कई ऐसी कविताएं हैं जिनमें स्थितियों का ऐसा जबर्दस्त चित्रण है कि एक साथ भाव के कई स्तर खुलते हैं। सामंती व्यवस्था और मानसिकता के विरुद्ध चल रहे नक्सलबाड़ी आन्दोलन को कवि दृश्य-चित्रण प्रस्तुत कर शब्दों की कितनी मितव्ययिता प्रदर्शित करता है-इसका बेहतर नमूना पेश करती है ‘पुतैये’ कविता। कविता की पंक्तियां कुछ इस तरह हैं;
‘यूं चरमराया तो था बांस की चांचर का दरवाजा
प्रतिरोध किया था जस्ते के लोटे ने
ढनमनाया था जोर से
चूल्हे पर पड़ा काला तावा भी
खड़का था
नीचे गिरते हुए।’
कितने कम शब्द और कहने के लिए कितनी बड़ी बात। कविता की इन पंक्तियों को पढ़ते हुए मुझे अनायास शमशेर की ‘उषा’ कविता की याद हो आई। अद्भुत चित्रात्मकता इन दोनों कविताओं की जान है। ऐसे ही विरल अवसर के लिए एंगेल्स ने कभी लिखा था कि विचार जितने ही छिपे हों लेखक के लिए उतना ही अच्छा है। क्या इन कविताओं में विचार छिप सके हैं ? एंगेल्स की इस उलटबांसी( ?) का कई जनवादी आलोचक तक ने अर्थ लगाया कि विचार कविता के लिए उपयुक्त नहीं है!
कवि जब अपनी दैनिक जिंदगी में बातचीत या बहसों में होता है तो सीधे हमला करता है लेकिन कविताओं में कई बार प्रकारांतर से चीजों को बे-पर्द करता है। एक कविता ‘बाई जी’ शीर्षक से है जो दरअसल पत्नी को संबोधित करके लिखी गई है। इस कविता के माध्यम से कवि ने घर के सामंती ढांचे की विद्रूपताओं को दिखाने की कोशिश की है। यह घर जिसे हमने सभ्यता-संस्कृति के विकास की एक खास अवस्था में गढ़ा था,आज इस बीसवीं शती के अंतिम दौर में भी एक स्त्री के अस्तित्व को लील जाना चाहता है। संस्कृति की सुरक्षा में खड़ी की गईं ये दीवारें एक स्त्री के गुनगुनाने मात्र से कैसे बेतरह कांपने लगती हैं। जिस भयावह स्थिति की ओर कुमार मुकुल ने ईशारा किया है, उसी भयावहता को दूर तक तानते हुए आलोक ने लिखा है घर की जंजीरें कितनी बड़ी दिखायी देती हैं जब कोई लड़की घर से भागती है। यहां नाटकीयता थोड़ी ज्यादा है।
मुकुल जी का संग्रह इस कारण से भी महत्वपूर्ण है कि वह श्रम की महत्ता को सीधे-सीधे स्थापित करता है। पूरा संग्रह ऐसी पंक्तियों से भरा है जो श्रम की दुनिया से कवि के जुड़ाव को प्रदर्शित करती है। निम्न मध्यवर्ग का वह तबका जो महान श्रम से जुड़ा नहीं होता शीघ्र ही अवसाद के गहरे अंधेरे में चला जाता है। बारी-बारी से तमाम चीजों की अर्थवत्ता समाप्त होने लगती है। श्रम हमें ऐसे अवसाद से बचाता है और व्यक्तित्व को एक दृढ़ आधार प्रदान करता है। इसीलिए हमारे कवि के जीवन में अवसाद पल-दो-पल की चीज है। उदासी डरावनी नहीं है बल्कि एक ‘धारदार हीरा’ है। कवि गहरे आत्मविश्वास से कहता है, ‘उदासी आंखों में पैठ गयी तो
सोचता हूं दौड़ूं और उदासी को
पीछे छोड़ दूं।’
ऐसा वही कह सकता है जिसमें काम करने की अदम्य लालसा हो। मुझे नेहरु की याद आती है जब वे कहते हैं, ‘शायद मुझे एक उड़ाका होना चाहिए था-इसलिए कि जब जिन्दगी का धीमापन और उदासी मुझ पर छाये, तो मैं उड़कर बादलों के कोलाहल में समा जाता।’ विज्ञजन कहेंगे, यह तो एक तरह का रोमान है। सही है; किन्तु यह जीवन और श्रम के महान उद्येश्यों से पैदा हुआ है। मुकुल की कविताएं श्रम की गांठ से उपजी कविताएं हैं।

आभा की कविताएं

Sat, 05/08/2017 - 13:59
लड़कियां
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घर-घर
खेलती हैं लडकियाँ
पतियों की सलामती के लिए
रखती हैं व्रत

दीवारों पर
रचती हैं साझी
और एक दिन
साझी की तरह लडकियाँ भी
सिरा दी जाती हैं
नदियों में

आख़िर
लडकियाँ
कब सोचना शुरू करेंगी
अपने बारे में ...।

एक शब्‍द

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शादी का
लाल जोडा पहनाया था
माँ ने

उसकी रंगत ठीक ही थी
पर उसमें टँके सितारे
उसकी रंगत
ढँक रहे थे

मुझे दिखी नहीं वहाँ
मेरी खुशियाँ
मुझ पर पहाड़-सा टूट पडा
एक शब्‍द-
शादी

बागों में सारे फूल खिल उठे
पर मेरी चुनरी की लाली
फीकी पडती गई
बक्‍से में बंद
बंद।

उस फूल का नाम
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मेरी तकदीर पर
वाहवाही
लूटते हैं लोग

पर अपने घ्रर में ही
घूमती परछाई
बनती जा रही मैं

मैं ढूंढ रही पुरानी ख़ुशी
पर मिलती हैं
तोडती लहरें
ख़ुद से सुगंध भी आती है एक

पर
उस फूल का नाम
भ्रम ही रहा
मेरे लिए।

उन आंसुओं का अर्थ
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बचपन में पराई
कहा
फिर सुहागन
अब विधवा

ओह!
किसी ने भी पुकारा नहीं
नाम लेकर

मेरे जन्‍म पर खूब रोई माँ
मैं नवजात
नहीं समझ पाई उन आँसुओं का अर्थ

क्‍या वाकई माँ
पुत्र की चाहत में रोई थी।

उद्धत भाव से
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मोहित करती है
वह तस्‍वीर
जो बसी है रग-रग में

डरती हूँ
कि छू कर उसे
मैली ना कर दूँ

हरे पत्‍तों से घिरे गुलाब की तरह
ख़ूबसूरत हो तुम
पर इसकी उम्‍मीद नहीं
कि तुम्‍हें देख सकूँ

इसलिए
उद्धत भाव से
अपनी बुद्धि मंद करना चाहती हूँ।

वक्‍तव्‍य न दो
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घृणा से
टूटे हुए लोगो!

दर्पण
और अनास्‍था से
असंतुष्‍ट महिलाओं को

वक्‍तव्‍य न दो।

जाने कौन हो तुम
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जाने कौन हो
तुम

यह
तुम्‍हारी झलक है
या कोई झील है

जिसमें
डूबी जा रही मैं।

मेरे आंसू
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कभी कभी
ऐसा क्यों लगता है
कि सबकुछ निरर्थक है

कि तमाम घरों में
दुखों के अटूट रिश्ते
पनपते हैं
जहाँ मकडी भी
अपना जाला नहीं बना पाती

ये सम्बन्ध हैं
या धोखे की टाट
अपने इर्द-गिर्द घेरा बनाए

चेहरों से डर जाती हूँ
और मन होता है
कि किसी समन्दर में छलांग लगा दूँ।

मेरी आंखों का नूर
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लोग कहते हैं
कि बेटे को
ज़िन्दगी दे दी मैंने

पर उसके कई संगी नहीं रहे
जिनकी बड़ी-बड़ी आँखें
आज भी घूरती कहती हैं-
आंटी, मैं भी कहानी लिखूंगी
अपनी

उसकी आवाज़ आज भी
गूँजती है कानों में

बच्‍ची!
कैसी आवाज़ लगाई तूने
जो आज भी गूँज रही है फिजाँ में

ओह!
व्‍हील-चेयर पर
दर्द से तड़पती आँखें वे

वह दर्द
आज मेरी आँखों का नूर बन
चमक रहा है।

लेखक विषय संवाद साभार अनुवादक

पहले वो आए साम्यवादियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं साम्यवादी नहीं था

 

फिर वो आए मजदूर संघियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं मजदूर संघी नहीं था

 

फिर वो यहूदियों के लिए आए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं यहूदी नहीं था

 

फिर वो आए मेरे लिए

और तब तक बोलने के लिए कोई बचा ही नहीं था

 

मार्टिन नीमोलर (1892-1984)