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कारवाँ

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Updated: 4 hours 47 min ago

फ़टपाथ पर पीपल के नीचे बिकती पूडि़यों का स्‍वाद - कुमार मुकुल - कुछ डायरीनुमा

Sat, 11/11/2017 - 12:28
ना दोस्‍त है ना रकीब है,तेरा शहर कितना अजीब है...

सुबह जगा तो धुंधलका छंटने लगा था और पड़ोसी के लौपडॉग को प्रशिक्षण देने को उसका ट्रेनर उसे पार्क ले जाने की तैयारी में था। रविवार को मेरी फुर्ती भी कुछ बढ जाती है सो दिशा-फरागत हो मैंने वह टेपडांस बजाया जो ऑरकुट मित्र और कथाकार उदय प्रकाश के जर्मन साथी के प्रोफाइल से अपने यहां जोड़ रखा है,और उस पर उतनी देर लगातार कसरतनुमा डांस किया सेहत के लिहाज से। फिर सोचा कि आज पार्क चला जाए और अपने अग्रज कविमित्र लीलाधर मंडलोई के साथा टहला जाए और गुमटी की चाय पीते दुनिया जहान की लानत-मलामत और व्‍याख्‍या की जाए।
तभी याद आया कि आज अपनी नेट की इकलौती नियमित पर अदेखी चैट साथी अरूणा राय भी तो इंतजार करेंगी। ओह यह लड़की भी न लड़की कहो तो नाराज, तू तड़ाक मत कीजिए,पच्‍चीस की हूं पर पचास सी सोचती हूं,ओह बाबा तो चलिए आप मेरी बच्‍ची हुईं अपनी प्‍यारी अरूणा जी। दारोगा की नौकरी और उस पर ईमानदारी का तमगा और आजादी की असीम उड़ानें भरने की तैयारी तो उसे मैं मिल गया एक कविकाठी उसके शब्‍दों में नेट पर सकून का साथी।
ऑरकुट पर उसने ही खोज की थी मेरी और लिख मारा - ना दोस्‍त है ना रकीब है
तेरा शहर कितना अजीब है...

मैंने भी लिखा - ऐसी दुनिया में जुनूं, ऐसे जमाने में वफा
इस तरह खुद को तमाशा न बना मान भी जा...

फिर तो जो रोज की शाब्दिक जद्दोजहद शुरू हुई तो जबरदस्‍त तकरारों के बीच जारी है। अब स्थिति यह है कि घर में झगडूं तो अपनी आभा मैडम कहती हैं कि अभी करती हूं अरूणा से शिकायत।
तो उसे मैसेज किया कि आज तो मंडलोई जी के साथ गुजरेगी सुबह, आने पर ही चैट होगी। तो पार्क पहुंचकर पास से जनसत्‍ता लिया और उनका इंतजार करते पढने लगा। उसमें अपने जवारी भाई कुमार वीरेंद्र की कविता थी , पढकर एक अलग ही दुनिया में चला गया, गांव-देहात की। कुमार ने अपनी अलग ही सहज गंवई भाषा अर्जित की है उसकी छटा इस कविता में दिख रही थी- छत पे घरनी ने
पसार दिया है धान
धूप में भूख के,सुख रहे धान...

कुमार पिछले साल मुबई में थे पर वहां से भी वे गंवई कविता को ही स्‍वर दे रहे थे और आखिर उस स्‍वर ने उनका रूख गांव की ओर कर दिया। पिछले माह उनका फोन आया था, कि अभी तो वे यहीं रहकर खेती-बधारी कराएंगे। उनसे बात कर मेरा मन केदारनाथ सिंह की कविता के धान के बच्‍चों की तरह उन्‍मन हो गया। कि मैं यहां क्‍या कर रहा हूं इस रौशन वीराने में।
अब मंडलोई जी आ गए हैं और मैं उनके साथ पार्क के चक्‍कर लगाते बाते करने लगा हूं दुनिया जहान की। वे पूछते हैं ये क्‍या है यार दिल्‍ली के इन कवियेां में , कि वे इस पर कविता का मूल्‍यांकन करते हैं कि कौन किसके साथ धूम रहा है। मैंने कहा हा यह तो दिल्‍ली की फितरत है,मुझे विनय कुमार की पंक्तियां याद आईं-
हर मंजहब तंदूर छाप , हर नीयत खुद में खोयी सी
खंजर जिसके हाथ लगा वह शख्‍स शिकारी दिल्‍ली में।

फिर मंडलोई कसरत करने लगे और बोले कि यार अब तो मैं बूढा हो रहा हूं । वे पचपन के हैं , मैंने कहा, ऐसा ना कहिए नहीं तो मुझे आपकी तरह कसरत शुरू करनी पड़ेगी, कि अभी तो आप पूरी तरह दुरूस्‍त हैं। फिर हम पीपल के नीचे की गुमटी पर गए पहले पत्र-पत्रिकाएं देखीं फिर कम चीनी की चाय पीते हुए यह येाजना बनाने लगे कि कुछ अलग जीवंत होना चाहिए , कि कविता कहानी काफी नहीं है। कि अगले रविवार को जरा देर से आएंगे और यह जो यहां कोने पर फुटपाथ पर जो दाल की पूडि़या बेच रहा है मजदूरेां के लिए उसका स्‍वाद लेंगे हम। फिर उन्‍होंने कहा कि क्‍यों न इन लेागों की कहानी को हम दर्ज करें इनका जीवन, कि कविता में वह कहां अंट पाता है। तो इस पर सहमति बन गई कि आगे इस पर काम करेंगे हमलेाग मिलकर।
फिर बातें करते हम उनके घर आगए और भाभी जी ने फिर चाय का आग्रह किया तो चाय नमकीन लेते हुए मंडलोई जी ने रात लिखी कविताएं सुनाई तीन चार। उन कविताओं में कविता का शमशेरियता वाला शिल्‍प उभर रहा था कुछ कविताएं पच्‍चासी साल की अपनी मां और भाईयेां के बहाने अपने गांव-कस्‍बे को याद करते लिखी थीं उन्‍होंने। एक कविता संयोग से आज के आलोचना के माहौल पर भी थी। मैंने कहा कि ये कविताएं दे दीजिए मैं उन्‍हें अपने ब्‍लाग पर डाल दूंगा। वे असमंजस में पड़ गए कि रात तेा लिखी ही हैं अभी इन पर कलम चलानी है। मैंने कहा वह पहला ड्राफ्ट होगा फिर आप उस पर काम करते रहेंगे। पर वे उलझन में थे , तेा बोले कि तुम्‍हें लगता है यह आलोचना की राजनीति पर जो कविता है वह ज्‍यादा रूच गई है तेा उसे ले लो। तब उन्‍होंने वह कविता वहीं बैठे-बैठे फेयर की। फिर बताया कि कविता एकादश करके एक संकलन किया है मैंने ,मेधा से आया है , और किताब दी । वाकई अपने तरह का संकलन लगा वह, जिसमें विजेन्‍दे,ऋतुराज,वेणुगोपाल आदि इधर के दौर में चर्चा से करीब - करीब बाहर रहे कवि शामिल दिखे। तब दुखी होते उन्‍होंने बताया कि वेणु गोपाल को कैंसर हो गया है, ओह, पिछले सालों गैंगरीन से उनकी एक टांग काट दी गई थी और अब यह त्रासदी। मैं हैदराबाद में वेणु जी के साथ एक ही अखबार में काम कर चुका था। उस समय साठ के आस-पास के उस कवि को जिस मस्‍ती में देखा था उसे इन घटनाओं से जेाड़़कर देखता हूं तेा जी उन्‍मन हो जाता है। वाराणसी में पहल सम्‍मान के समय उनसे भेंट भी हुई थी। अपने एक पैर के साथ भी वे उसी तरह अलमस्‍त दिखे।
क्‍या हो रहा है हमारे समय के इन लेखकों के साथ । अपने प्‍यारे कवि वीरने डंगवाल केा भी जब गले में कैंसर और उसके आपरेशन की बात सुनी और देखी तो धक्‍का लगा था। पर जब उनसेआपरेशन थियेटर में मिला था तेा कैसेी गर्मजोशी से हाथ मिलाया था उन्‍होंने , वैसे वे गले मिलते थे भर बांह और मैं संकोच में पड़ जाता था।
ओह ... यह दिल्‍ली भी क्‍या-क्‍या दिखाती है या जीवन ही दिखाता है क्‍या क्‍या - पर फिर वेणु गेापाल की कविता हमारा सम्‍मोहन तोड़ती है- ऐसा ही क्‍यों होता है-
कि हिन्‍दी का कवि।
बहता या डूबता तो
अपनी कविता में है
लेकिन उसकी लाश
अक्‍सर दिल्‍ली में मिलती है.....

मिथक प्‍यार का

Tue, 24/10/2017 - 15:01
बेचैन सी एक लड़की जब झांकती है मेरी आंखों में...
बेचैन सी एक लड़की जब झांकती है मेरी आंखों में
वहां पाती है जगत कुएं का
जिसकी तली में होता है जल
जिसमें चक्‍कर काटत हैं मछलियों रंग-बिरंगी

लड़की के हाथों में टुकड़े होते हैं पत्‍थर के
पट-पट-पट
उनसे अठगोटिया खेलती है लड़की
कि गिर पड़ता है एक पत्‍थर जगत से लुडककर पानी में
टप...अच्‍छी लगती है ध्‍वनि
टप-टप-टप वह गिराती जाती है पत्‍थर
उसका हाथ खाली हो जाता है
तो वह देखती है
लाल फ्राक पहने उसका चेहरा
त ल म ला रहा होता है तली में
कि
वह करती है कू...
प्रतिध्‍वनि लौटती है
कू -कू -कू
लड़की समझती है कि मैंने उसे पुकारा है
और हंस पड़ती है
झर-झर-झर
झर-झर-झर लौटती है प्रतिध्‍वनि
जैसे बारिश हो रही हो
शर्म से भीगती भाग जाती है लड़की
धम-घम-घम

इसी तरह सुबह होती है शाम होती है
आती है रात
आकाश उतराने लगता है मेरे भीतर
तारे चिन-चिन करते
कि कंपकंपी छूटने लगती है
और तरेगन डोलते रहते हैं सारी रात
सितारे मंढे चंदोवे सा

फिर आती है सुबह
टप-झर-धम-धम-टप-झर-झर-झर

कि जगत पर उतरने लगते हैं
निशान पावों के

इसी तरह बदलती हैं ऋतुएं
आती है बरसात
पानी उपर आ जाता है जगत के पास
थोडा झुककर ही उसे छू लिया करती है लड़की
थरथरा उठता है जल

फिर आता है जाड़ा
प्रतिबंधों की मार से कंपाता

और अंत में गर्मी
कि लड़की आती है जगत पर एक सुबह
तो जल उतर चुका होता है तली में

इस आखिरी बार
उसे छू लेना चाहती है लडकी
कि निचोडती है खुद को
और टपकते हैं आंसू
टप-टप
प्रतिध्‍वनि लौटती है टप-टप-टप
लड़की को लगता है कि मैं भी रो रहा हूं
और फफक कर भाग उठती है वह
भाग चलता है जल तली से।पर जुलाई 09, 2010
9 टिप्‍पणियां:
L.Goswamiने कहा…
मिथक को परिभाषित करती अच्छी कविता.
preetiने कहा…
behtareen ...
वन्दनाने कहा…
गज़ब्…………………बेहतरीन्…………………शानदार ………………लाजवाब्…………………अब तो शब्द भी कम पड रहे हैं।
वन्दनाने कहा…
फिर क्‍यों खींचते हैं पहाड़

बेहद गहन सोच का पर्याय है आपका लेखन्।
वन्दनाने कहा…
इच्छाओं की उम्र नहीं होती

क्या गज़ब का लेखन है……………नतमस्तक हूँ।
आज आपका ही लिखा पढ रही हूँ और अपने को धन्य कर रही हूँ।
shabdsrijanने कहा…
आपकी यह कविता अपनी सहजता में उदात्त की ओर ले जाने वाली खिडकियां खोलती है।
योगेंद्र कृष्णा
सूर्यकान्त गुप्ताने कहा…
इस आखिरी बार
उसे छू लेना चाहती है लडकी
कि निचोडती है खुद को
और टपकते हैं आंसू
टप-टप भावपूर्ण रचना।
वाणी गीतने कहा…
इस आखिरी बार
उसे छू लेना चाहती है लडकी
कि निचोडती है खुद को
और टपकते हैं आंसू
टप-टप
प्रतिध्‍वनि लौटती है टप-टप-टप
लड़की को लगता है कि मैं भी रो रहा हूं

अद्भुत ...!
arun c royने कहा…
मुकुल जी आपकी कवितायेँ पढना ए़क अनुभव है.. किसी और लोक में ले जाती है आपकी कविताएं, आपके गीत ... पहली कविता आपकी.. इच्छाओं की उम्र नहीं होती पढ़ी थी और आज भी जेहन में ताज़ी है कविता ... बेचैन सी एक लड़की जब झांकती है मेरी आंखों में... पढ़ कर तो अपने बचपने में चला गया जब ए़क लड़की यूं ही झाँका करती थी मेरे घर के आगे के कुए में ! समय बीतता गया वो लड़की बड़ी हुई लेकिन उस बूढ़े कुए की तरह उसके सपने सूख गए और वो लड़की पांच लड़कियों को जन्म देकर पिछले साल जुगार गयी... लगता है ... आज भी वो लड़की झांकती है मेरी आँखों में... उस बूढ़े कुए में... जो सूख गया है अब ! झकझोर दी है आपकी कविता !
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सोमरस क्‍या है ?

Fri, 13/10/2017 - 16:33
ऋग्‍वेद के अनुसार - मन्‍द्रस्‍यरूपंविविदुर्मनीषिण: - विद्वान लोग मदकर सोमरस का स्‍वरूप जानते हैं। स: पवस्‍वमदिन्‍तम। सोम को अत्‍यंत प्रमत्‍त करने वाला बताया गया है। सोम को स्‍वर्ग से बाज ले आया था। एक जगह इसके पृथ्‍वी से पैदा होने का भी जिक्र है। सोम धुनष से छूटे बाण की तरह और अश्‍व की तरह और बाज पक्षी की तरह स्‍वर करता है। सेाम को अधिकतर हरित रंग का बताया गया है ओर पत्‍थरों से कुचलकर इसका रस निकलता है। सोम को कवि, क्रान्‍तकर्मा कहा गया है। सोम गोचर्म के उपर पत्‍थरों के साथ क्रीड़ा करते हैं। उनसे धन-धान्‍य, संतति और शुत्रु के विनाश की कामना की जाती है। सोम के शोधक गोचर्म और मेषचर्म हैं। सोम बाहुओं द्वारा सांशोधित, वसतीवरी-जल से  सिंचित काष्‍ठपात्र में निहित अपने स्‍थान को गमन करते हैं। स:पवश्‍च मदाय कंनृचक्षा:देववीतये। इन्‍द्रो इति इन्‍द्राय पीतये।।1।।सोम तुम नेताओं के दर्शक हो। तुम देवों के आगमन या यज्ञ के लिए इन्‍द्र के पान, मद और सुख के लिए क्षरित होओ।उतत्‍वामरूणंवयं गोणिअहमोमदायकम। ।3।।सोम मद के लिए रक्‍त-वर्ण तुम्‍हें हम दुग्‍ध अादि से संस्‍कृत करते हैं। गोणि:श्रीणीतमत्‍सरम।मदकर सोम को दूध आदि से संस्‍कृत करते हैं।परीतो वायवे सुतं गिर: इन्‍द्राय मत्‍सरम। अव्‍योवारेषु सिंचत।।10।।31।। ऋग्‍वेदस्‍तोताओ तुमलोग वायु और इन्‍द्र के लिए अभिषुत और मदकर सोम को अभिषव देश से लेकर सिंचित करो।सोम के लिए मद चुलाने वाले और मदकर का प्रयोग पचासों बार हुआ है। इंद्र के मद के लिए हम सोम को बनाते हैं ऐसा लिखा गया है। सोम के क्षरित होने का जिक्र भी बार बार है। ऋत्विक लोग सोम को मेष के रोएं से यानि उन से छानते हैं। सोम की माताएं नदियां हैं। सोम ने वृत्र का वध करते समय इंद्र की रक्षा की थी।   सोम तुम अतीव मादक हो, चमसों में बैठते हो, तुम बहुसंख्‍यक और शोभन वीर्य धन क्षरित करो। सोम दूध व दधि संस्‍कृत होकर क्षरित होकर दशापवित्र की ओर द्रोण कलश में जाते हैं। रक्‍त-वर्ण, हरितवर्ण, पिंगलवर्ण सोम। काम वर्षक सोम जलधारा से बनाए जाते हैं। सोम राक्षसों को नष्‍ट करते हैं मतलब राक्षस सोमपान नहीं करते थे। सोम उसी तरह तरंग पैदा करते हैं जैसे रथी अश्‍व को चलाता है। शोधित गतिपरायण सोम सरलता से आकाश की ओर जाते हैं, वे जलपात्र की ओर जाते हैं। सोम को मनुष्‍य बनाते हैं और देवता पीते हैं। सोम तुम उस इन्‍द्र के लिए बहो जिसने 99 शत्रु पुरियाें को नष्‍ट किया है। एक जगह लिखा है - कार्यकुशल स्त्रियां सुंदर वीर्यवाले अपने पति सोम के क्षरणशील होने की इच्छा करती हैं। यस्‍य:तेमद्यंरसमतीव्रमदुहन्ति। तुम्‍हारे मदकर और क्षिप्र मददाता रस को हम पत्‍थरों से दुहते हैं। जैसे घोड़े को जल में मार्जित किया जाता है उसी तरह सोम को दूध-दहि आदि से मार्जित किया जाता है। सोम हर तरह के भय को नष्‍ट करते हैं। सोम जौ के सत्‍तू में मिलाया जाता है ऐसा भी जिक्र है। इंद्र के लिए सोम काले चमड़े वाले राक्षसाें को दूर हटाते हैं। सोम शिशु के समान नीचे मुंह करके रोते भी हैं। एक जगह सोम को इंद्र भी कहा गया है। सोमपान कर ही इंद्र युद्ध को जाते हैं। अंतरिक्ष की अप्‍सराएं यज्ञ में बैठकर पात्राों में सोम को क्षरित करती हैं। सोम को पृथवी का पुत्र भी कहा गया है। जैसे स्‍त्री पुरूष को सुख देती है उसी तरह सोम यजमान को सुख देते हैं। जो तुम्‍हारा पान करता है उसके सारे अंगों में प्रभु होकर तुम विस्‍तृत हो जाते हो। परिपक्‍व शरीर वाले ही तुम्‍हें ग्रहण व धारण कर सकते हैं। तुम्‍हारे रस को पीकर पापी लोग प्रमत्‍त वा आनन्दित न हों ऐसी भी प्रार्थना की गयी है। मधुरभाषी वेन लोग यज्ञ में सोमाभिषव करत हैं। सोम युद्ध में जाते हें और महान अन्‍न को जीतते हैं। ---------------------------------------------------------------ऋग्‍वेद संहिता - सायण भाष्‍य संवलित, चौखंबा प्रकाशन - सप्‍तम अष्‍टक - प्रथम अध्‍याय से सोम वर्णन आरंभ होता है। मंडल 9 अध्‍याय 2 सूक्‍त 45 से लेकर अध्‍याय 7 सूक्‍त 113 तक करीब साढे तीन सौ पृष्‍ठों मे लगातार सोम का वर्णन है।

मीडिया कब तक बेचेगा समोसा और चाय

Thu, 05/10/2017 - 15:03
बीबीसी सहित तमाम मीडिया ने पिछले दिनों एक खबर चलाई थी 'आइआइटी में समोसे बेचने वाले का बेटा'। यह क्‍या तरीका है खबरें बनाने का। कल को अमित शाह जैसे राजनीतिज्ञ इसे 'बनिये का बेटा बना आइआइटीयन'  कह सकते हैं। जब वे गांधी को बनिया कह सकते हैं तो फिर उनसे और क्‍या उम्‍मीद की जा सकती है।
यह मीडिया क्‍यों राजनीतिज्ञों की भ्रष्‍ट भाषा को अपना आधार बना रहा। यह प्रवृत्ति इधर बढती जा रही, किसी भी सफल युवा को उसके आर्थिक हालातों के लिए सार्वजनिक तौर पर शर्मिंदा करना, जैसे जरूरी हो। समोसा बेचे या चाय कोई काम मीडिया की नजर में छोटा क्‍यों हो। केवल पैसे वालों के ही बेटे क्‍यों बढें आगे।
यह जाति, पेशे, धर्म,गरीबी आदि के आधार पर बांटने की राजनीतिज्ञों की बीमारी को मीडिया क्‍यों हवा दे रहा। एक ओर गुड़,तेल,चूरन बेचने वाले रामदेव को मीडिया योगिराज बताता है जब कि रामदेव खुद अपना टर्नओवर(मुनाफा) बताते हुए खुद को मुनाफाखोर घोषित करते हैं।
यह लोकतंत्र है तो यह तो सहज होना चाहिए कि गरीब आदमी जिसकी संख्‍यां ज्‍यादा है उसको हर जगह ज्‍यादा जगह मिलनी चाहिए। खबर तो यह होनी चाहिए कि इस बार भी मुटठी भर अमीरजादों ने कब्‍जा कर लिया तमाम पदों पर।
संसद में साढे चार सौ के आसपास करोडपति हैं। तो यह सवाल बार-बार क्‍यों नहीं उठााया जाता कि भारत में अगर गरीब आ‍बादी है तो उसके प्रतिनिधि क्‍यों तमाम अमीर लोग होते जा रहे। अखि‍र इस करोडपति तंत्र को लोकतंत्र लिखने की क्‍या मजबूरी है मीडिया की।

हिन्‍दी की कछुआ दौड़

Tue, 03/10/2017 - 16:22
हिन्दी के वरिष्ठ कवियों में शुमार रघुवीर सहाय ने हिन्दी को कभी दुहाजू की बीबी का संबोधन देकर उसकी हीन अवस्था की ओर इशारा किया था। इस बीच ऐसी कोई क्रांतिकारी बात हिन्दी को लेकर हुयी हो ऐसा भी नहीं है। हां, यह सच्चाई जरूर है कि पिछले पचास-साठ वर्षों में हिन्दी भीतर ही भीतर बढ़ती पसरती जा रही है और आज की तारीख में वह बाजार के तौर तरीके को प्रभावित करने की स्थिति में आ चुकी है। इस आमदरफ्त में उसके स्वरूप में भी कुछ सतही परिवर्तन होते दिख रहे हैं। पिछले पचास सालों में अगर हिन्दी ने अपनी जड़ें लगातार फैलायी हैं और अपना बाजार खड़ा कर लिया है तो यह सहज ही है। ध्यान देने योग्य है कि लगातार विपरीत परिस्थितियों में ही हिन्दी का विकास हुआ है। मुगलकाल में हिन्दी का विकास तेजी से हुआ था। तब भक्ति आंदोलन ने हिन्दी को जन जन से जोड़ा था। अंग्रेजी राज में भी स्वतंत्रता आंदोलन की मुख्य भाषा होने के चलते हिन्दी का विकास हुआ। अगर इन पचास-साठ सालों में हिन्दी ने धीरे धीरे ही सही अपनी पकड़ मजबूत की है तो इसका कारण इसका राजकाज की भाषा नहीं बन पाना ही है। अपनी इस सुस्त रफ्तार से ही एक दिन हिन्दी कछुआ दौड़ में अंग्रेजी को परास्त कर दे तो अजूबा नहीं।
पिछले सालों में हिन्दी का जिन दो क्षेत्रों में अप्रत्याशित विकास हुआ है वह है मीडिया और राजनीति। पिछले पचास सालों में हिन्दी के अखबारों की पाठक संख्या करोड़ तक पहुंच चुकी है और लाख तक नहीं पहुंच पाने पर अब हिन्दी के अखबार लोकप्रिय नहीं माने जाते। यह सब हिन्दी के बढ़ते बाजार का ही परिणाम है।
आज आम भारतीय जब अपनी खबर अपनी भाषा में पढ़ना चाहता है तो हिन्दी का मीडिया में पकड़ बढ़ते जाना स्वाभाविक है। सारे टेलिविजन चैनल हिन्दी की कमाई खााते हैं पर यह दुर्भाग्य ही है कि चैनलों की वेबसाइट का कंटेंट हिन्दी में नहीं है। जबकि हिन्दी अखबारों के न्यूज पोर्टल अब ह्टिस देने और खुद को अपडेट करने में अंग्रेजी से आगे निकल रहे हैं। भारत में तेजी से हुए कंम्प्यूटराइजेशन के चलते हिन्दी का बाजार इंटरनेट पर लगातार गर्म हो रहा है। यह हिन्दी की बाजार में मजबूत होती स्थिति ही है कि बीबीसी जैसा चैनल जिसके पास हिन्दी के पर्याप्त कंटेंट नहीं होते और जिनका काम हिन्दी की कमाई से नहीं चलता, वह भी हिन्दी वेबसाइट चला रहा है। पहले हिन्दी में मेल करना आसान नहीं था पर अब हिंदी के मंगल फान्ट और बहुत सारे फान्ट कान्वर्टरों के चलते हिंदी में लिखना आसान हो गया है और इससे तेजी से हिन्दी का क्षेत्र बढ़ रहा है, यह पूरी दुनिया के हिन्दी भाषियों को जोड़ रहा है और  यह भविष्य में हिन्दी के विकास को नयी जमीन मुहैय्या कराता जाएगा। इसके साथ रोमन में  नेट पर हिन्दी ही नहीं भोजपुरी कविताओं की मांग भी बढ़ती जा रही है। जगह बना लेने के बाद उसके स्तर पर भी बात शुरू होगी। 
मीडिया के बाद राजनीति हिन्दी की ऐसी दूसरी रणभूमि है जहां वह लगातार मैदान मार रही है। वहां तो हिन्दी की सहायक लोकभाषाओं तक ने अपना रंग दिखा दिया है। लालू प्रसाद की भाषा इसका अच्छा् उदाहरण है। संसद से सड़क तक वे अपनी भोजपुरी मिश्रित हिन्दी का लोहा मनवा चुके हैं। प्रधानमंत्री होने की तो अहर्ता ही हिन्दी बोलना है। इस क्षेत्र में अंग्रेजी को लगातार मुंह की खानी पड़ी है। मनमोहन सिंह ने खुद को हिंदी से दूर रखा तो वे भारतीय जनता से भी दूर हुए।
बाजार जिस आम जन की गांठ ढीली करना चाहता है उसका चालीस फीसदी हिन्दी भाषी है और अंग्रेजी भाषी मात्र तीन फीसदी हैं। यह हिन्दी जन जैसे जैसे शिक्षित होता जाएगा बाजार को अपना सामान लेकर उस तक जाना होगा। यह हिन्दी के बाजार का दबाव ही है कि आज बहुत से अंग्रेजी अखबार हिन्दी की हेडिंग लगा रहे हैं। यह हिन्दी का बाजार ही है कि चाय, पानी, चाट, पूरी, दोसा, दादा, पंचायत जैसे शब्दों को अंग्रेजी की आक्सफोर्ड डिक्शनरी में शामिल करना पड़ा है। कुल मिलाकर हिन्दी का बजार बढ़ा है और लोकतंत्र के विकास के साथ आमजन की भाषा के बाजार का बढ़ना सहज भी है। हां बाकी हिन्दी की जो दुर्दशा हो रही है उस पर ध्यान देने की जरूरत है और यह काम हम आपको ही करना होगा।अंग्रेजों की अंग्रेजी से तो हम पार पा चुके थे पर अब नया हमला अमेरिकी बाजार की अंग्रेजी का है और  हिंदी, हिंदू, हिंन्‍दुस्‍तान वाली इस सरकार को भी मोदी फेस्‍ट, मिशन 2019, मेक इन इंडिया, रोड शो आदि से कुछ फुर्सत मिले तो हिंदी को कुछ राहत मिले।

वायरल हो जाइए बनाम जूता मारो भेजे पर

Tue, 03/10/2017 - 16:16


कुछ हो नहीं रहा आपसे या जम नहीं रहा या आप बोर हो रहे तो आप वायरल हो जाइए। इसके लिए कुछ खास नहीं करना। आप ऐसे व्‍यक्ति की पहचान कीजिए जो जवाब मेंजूते ना मार सके। (इस लोकतंत्र को ऐसे लोगों से भरा जा रहा है।) फिर उसे गिन कर कुछ जूते मारिए। फिर जूतों की या उसके जूता खाए चेहरे की तस्‍वीर नेट पर डालिए। और बोलिए कि यह शख्‍स सपने मेंमेरे महान बाप को गालियां दे रहा था। हो सके तो अपने महान बाप की तस्‍वीर शेयर कीजिए। महान बाप की तस्‍वीर ऐसी बनाइए कि लगे कि जो गालियां दी गयी हैं उसने उनको आहत किया है और अगर आपने कुछ नहीं किया तो वे आत्‍महत्‍या कर लेंगे। अगर महान बाप स्‍वर्ग में हों तो भी कोई बात नहीं, आत्‍मा तो स्‍वर्ग में भी रहती है और वहां भी आहत हो ही सकती है। अपने महान बाप और पिटे हुए व्‍यक्ति की तस्‍वीरें आजू-बाजू डालिए और उसके साथ फूल और चप्‍पल पास ही रख दीजिए। और चूंकि यह लोकतंत्र है तो लोगों को छूट दीजिए कि वे अपनी खुशी या सुविधा या भावनाओं के हिसाब से उसके पिता को फूल चढाएं और पिटे हुए को जूते मारें या संभव हो तो दोनों करें। इसके एवज में कुछ हल्‍का फुल्‍का चार्ज भी कर सकते हैं आप। फूल चढाने के साथ जूते मारना फ्री भी कर सकते हैं। लोगों को छूट दीजिए कि वे इसे अपने बाप भाई मां बहनों के साथ शेयर करें या टैग करें। कमजोर दिल वालों को आप कुछ किफायत दे सकते हैं या उनके जूते आप फूलों से बना सकते हैं या कम से कम फूलों जैसे वे दिखें ऐसा तो कर ही सकते हैं।यूं आप अपने बाप, भाई या लंगोटिया यार को भी जूतेमार सकते हैं बस उसे पता होना चाहिए कि यह सब आप अपने या उसके वायरल होने के लिए कर रहे। कहीं बिना पहले बताए आपने ऐसा कर दिया तो आपकी वही दशा होगी जो पिलपिल बेशर्मा की हुई है। यूं चिंता की कोई बात नहीं। बाद में आप चांदी के जूतों से पीटकर उसे शांत कर सकते हैं और वापिस अपने चंडूखाने में शामिल कर सकते हैं। हां, चांदी के जूते मारते समय आप एक गाना (जूतामारो भेजे पर तेरा भेजा शोर करता है) गाएं तो सड़े पर सुहागा हो जाए। देखिए भिगाकर इतने जूते मारे मैंने, आपको बुरा तो नहीं लगा ना। हां, आपको कुछ लगेगा ही नहीं बस दिमाग में रहना चाहिए कि वायरल होना है।

उत्‍तेजना-तनाव बाकी मोल-भाव - कुमार मुकुल

Thu, 14/09/2017 - 15:45
मोदी जी चुनाव जीतने के बाद भी चुनाव मे लगे हैं निरंतर। मिशन 2014, के बाद मिशन 2017, 2019, फिर 2025।  कोई काम ही नहीं है इनके पास, भाइयों लग जाइए मिशन में। मोदी लहर चल रही, दिल्‍ली में पिटे पर लहर चलती रही, बिहार में पिटे पर लहर चलती रही, जहां लहर का बहर नहीं सध रहा वहां मोल-भाव का कहर जारी है। अदालत पूछ रही कि पांच साल के बीच जिन माननीयों की संपत्ति पांच सौ गनी हुई उसका हिसाब दीजिए पर मोदी जी तो मिशन में लगे हैं। अब इस सतत मिशनरी उत्‍तेजना-तनाव में स्‍वाभाविक है कि आम जनता भी भिड़ी हुई है उनके साथ। चलो हम भी कुछ गोतस्‍करों से गायें लूट कर इसमें योगदान करें। गाय नहीं तो गधे सही, उन्‍हें ही लूट लाएं। ग तो लगा हे उसमें भी। तो इस उत्‍तेजनामय माहौल का असर हो रहा है आम जन पर। वह भी इस लहर मे डूबा लहर काटने में लगा है। उधर आपकी सरकारी गोशालाओं में हजारों गायें मर रहीं सड़ रहीं, उसका चारा भी खाए जा रहे सब। अब इसका असर तो होना है। सब काम धाम रामभरोसे होने लगा है। फिर दिन में तीन बार एक ही लाइन पर ट्रेंनें पल्‍टी ना मारें तो और क्‍या हो। सारी जनता मानसिक अशांति में जीएगी तो आपकी बुलेट क्‍या चलेगी बैलगाडी के दिन आ जाएंगे आप  बनाते और काटते रहिए लहर। शिक्षा में आप दुनिया में पिछड गये। भूखमरी के इंडेक्‍स में पडोसियों से पीछे हैं। खुशी का मंत्रालय बना डाला पर उसके इंडेक्‍स में भी पीछे चले जा रहे। कांग्रेस मुक्‍त बनाने से थक गये तो खरीद खरीद कर कांग्रेस युक्‍त करने का नया अभियान चला दिया। बस लहर चलनी चाहिए। मेक इन इंडिया के तहत असाल्‍ट राइफलें बनी पर आपकी सेना ने ही उसे बेकार साबित किया। बोफोर्स भी नहीं चली, पता चला उसके कल-पुर्जे चीन के थे। कहीं कुछ हो हवा नहीं रहा। बस पूरा मुल्‍क हो हा हू ही किये जा रहा। इससे कुछ नहीं होने का। करते रहिए कूद-फांद। 

लेखक विषय संवाद साभार अनुवादक

पहले वो आए साम्यवादियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं साम्यवादी नहीं था

 

फिर वो आए मजदूर संघियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं मजदूर संघी नहीं था

 

फिर वो यहूदियों के लिए आए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं यहूदी नहीं था

 

फिर वो आए मेरे लिए

और तब तक बोलने के लिए कोई बचा ही नहीं था

 

मार्टिन नीमोलर (1892-1984)