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यही वह जगह है

Syndicate content यही है वह जगह
काशी विश्वविद्यालय और बनारस पर
Updated: 11 hours 1 min ago

‘सुन साहिबा सुन, अफ़लातून’

Thu, 08/02/2018 - 09:37

दो-तीन वाकये ऐसे हैं जब लड़कियों द्वारा मुझ पर खुले आम व्यक्तिगत टिप्पणी की गई थी।मैं उत्तर देने की स्थिति में न था।और मुझे बहुत अच्छा लगा था।
स्कूल से निकल कर उच्च शिक्षा के संस्थान में दाखिला हुआ था।हॉस्टल से करीब 500 मीटर चल कर पढ़ाई के लिए जाना होता था।इतनी सी दूरी में भी ढेर सारे पेड़ और पोखर रास्ते मे थे।संस्थान के संस्थापक का निवास भी रास्ते मे था।उस भवन की छत पर एक लड़की अपनी सहेलियों के साथ अक्सर खड़ी रहती थी।मुझे देख कर,’शुकनो चोख, शुकनो चोख’ (सूखी आंखें)! नकारात्मक होने के बावजूद बुरा नहीं लगता।
दूसरी-तीसरी घटना विश्वविद्यालय के महिला महाविद्यालय की थीं।मेरे सफेद,बैगनी और गुलाबी चेक्स वाले शर्ट को देख कर,’Look at the moving graph paper.’ में निरुत्तर किन्तु प्रसन्न था।
इस परिसर में अपने चुनाव प्रचार के दौरान एक फिल्मी गीत की पैरोडी जैसा,अराजनैतिक नारा सुना था-‘सुन साहिबा सुन अफलातून,,मैने तुझे चुन लिया तू भी मुझे चुन’! उल्लेखनीय है कि पहले चुनाव में मुझे मिले कुल वोटों में इस महाविद्यालय के सर्वाधिक थे।बाद के चुनाव में इस कॉलेज के अलावा प्रौद्योगिकी संस्थान,दृश्य कला संस्थान और चिकित्सा संस्थान में जब अन्य उम्मीदवारों से अधिक वोट मिलते थे तो उसका एक विश्लेषण भी होता था-इन चारों संस्थान/संकाय/कॉलेज में जाति,पैसे,गुंडई का असर न्यूनतम था।करीब 32-34 साल बाद कहने में फक्र है कि परिसर में नई राजनैतिक संस्कृति के सूत्रपात का यह प्रयास था।


लेखक विषय संवाद साभार अनुवादक

पहले वो आए साम्यवादियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं साम्यवादी नहीं था

 

फिर वो आए मजदूर संघियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं मजदूर संघी नहीं था

 

फिर वो यहूदियों के लिए आए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं यहूदी नहीं था

 

फिर वो आए मेरे लिए

और तब तक बोलने के लिए कोई बचा ही नहीं था

 

मार्टिन नीमोलर (1892-1984)