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समाजवादी जनपरिषद

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वैश्वीकरण विरोध हेतु
Updated: 4 hours 50 min ago

फसल बीमा योजना: किसानों को लूट कर बीमा कंपनियों को एक साल में 12395 करोड रुपयों का लाभ पहुंचाया गया

Fri, 01/12/2017 - 08:12

देश का किसान जब अत्यंत कठिन परिस्थिति से गुजर रहा है। गरीबी और कर्ज के बोझ में दबा है। अपनी मेहनत का मोल और उपज के उचित दाम के लिये संघर्ष करने के लिये रास्तेपर उतर रहा है तब किसान को कुछ देने के बजाय केंद्र सरकार ने ऐसी फसल बीमा योजनाएं चला रखी है जिसमें खरीप 2016 और रबी 2016-17 के लिये सरकारी तिजोरी और किसानों की जेब से लूट कर 10 बीमा कंपनियों को 12395 करोड रुपये का लाभ पहुंचाया गया है। जिसके लिये देश में 5.65 करोड किसानों से जबरदस्ती बीमा करवाया गया लेकिन 82.43 प्रतिशत किसानों को किसी प्रकार की मदत नही मिली। जिन 17.57 प्रतिशत किसानों को नुकसान भरपाई मिल पाई है उनमें कई किसान ऐसे है की जिन्हे उनसे वसूले गये बीमा हप्ते से कम राशि मिली है।
केंद्र सरकार से प्राप्त जानकारी के अनुसार सभी फसल बीमा योजना के खरीप 2016 और रबी 2016-17 में देश भर से किसानों से जबरदस्ती उनके अनुमति के बिना 4231.16 करोड रुपये हप्ता वसूल कर फसल बीमा करवाया गया और किसान बजट से राज्य सरकार के 9137.02 करोड रुपये और केंद्र सरकार के 8949.35 करोड रुपये हप्ता मिलाकर कुल 22318.15 करोड रुपये राशी बीमा कम्पनियों को दी गयी। नुकसान भरपाई के रुप में केवल 9922.78 करोड रुपये नुकसान भरपाई दी गई है। कंपनियों को प्राप्त हुये कुल बीमा राशी के आधा भी किसानों को नही लौटाया गया। किसानों से 12395.37 करोड रुपये रुपये सरकार और बीमा कम्पनियों के मिली भगत से बीमा कम्पनियों ने लूटे है। प्रति किसान लगभग 2200 रुपये कंपनी ने लूट लिये है।
खरीप 2016 में देश भर के किसानों से 2980.10 करोड रुपये हप्ता वसूल कर फसल बीमा करवाया गया और किसान बजट से राज्य सरकार के 6932.38 करोड रुपये और केंद्र सरकार के 6759.72 करोड रुपये हप्ता मिलाकर कुल 16672.20 करोड रुपये बीमा कम्पनियों को दिये गये। नुकसान भरपाई के रुप में किसानों को केवल 8021.68 करोड रुपये नुकसान भरपाई दी गई है।
रबी 2016-17 में देश भर के किसानों से 1251.06 करोड रुपये हप्ता वसूल कर फसल बीमा करवाया गया और किसान बजट से राज्य सरकार के 2204.65 करोड रुपये और केंद्र सरकार के 2189.63 करोड रुपये हप्ता मिलाकर कुल 5645.95 करोड रुपये बीमा कंपनियों को दिये गये। नुकसान भरपाई के रुप में किसानों को केवल 3744.85 करोड रुपये नुकसान भरपाई दी गई है।
महाराष्ट्र में बीमा कंपनियों को सबसे अधिक 4621.05 करोड रुपये बीमा हप्ता प्राप्त हुआ। उसमें से किसानों को केवल 2216.66 करोड रुपये नुकसान भरपाई दी गयी। बाकी सारी रकम 2404.39 करोड रुपये कर्ज के बोझ में दबे किसानों की जेब से सरकार से मिली भगत कर बीमा कम्पनियों ने लूट लिये है।

प्रधानमंत्री फसल बिमा योजना सहीत सभी बीमा योजनाओं में हुयी यह पिछले बीमा योजनाओं से कई गुना अधिक है। नई योजना में निजी बीमा कंपनियों को बीमा क्षेत्र में प्रवेश देना, बैंक से कर्ज लेनेवाले ऋणी किसानों के लिये योजना अनिवार्य कर जबरदस्ती हप्ता वसूलना आदी कई सारे प्रावधान बीमा कंपनियों को लाभ पहुंचाने के लिये कानून में किये गये है। इस योजना से स्पष्ट है की कंपनियां और सरकार ने मिलकर योजनापूर्वक किसानों को लूटने का काम किया है। यह साजिसपूर्वक किया गया भ्रष्टाचार है। इसे उजागर करने के लिये बीमा कंपनियों ने किन किन पार्टियों को कितना कितना फंड दिया है इसकी जांच होनी आवश्यक है। यह उल्लेखनीय है कि यह योजना किसानों की आमदनी दोगुणी करने के लिये घोषित योजनाओं में से एक है। किसानों की आय दोगुणी करने के नामपर बनी दूसरी योजनाओं का स्वरुप भी इसी प्रकार का है।
प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना की शुरुआत करते समय माननीय प्रधानमंत्री मोदी जी ने कहा था की उनकी सरकार गरीबों को समर्पित सरकार हैं। किसान के कल्याण के लिये, किसान का जीवन बदलने के लिये, गांव की आर्थिक स्थिति बदलने के लिये प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना लायी गयी है। यह सरकार की ओर से किसानों के लिये तौफा है। यह योजना किसानों के जीवन में बहुत बडा परिवर्तन लायेगी।
लेकिन प्रत्यक्ष में केंद्र सरकार ने उल्टा किया है। देश के किसानों को लूट कर बीमा कंपनीयों को बडा लाभ पहुंचाया है। यह योजना किसानों को लूट कर बीमा कंपनीयों को लाभ पहूंचाने के लिये ही बनाई गई है। किसानों की यह लूट क्रियान्वयन के दोष के कारण नही बल्कि यह योजना तत्वत: किसानों के लूट की व्यवस्था है। जिन राज्य सरकारों ने यह योजना अपने राज्य में लागू नही की उन्हे किसानों को लूट से बचाने के लिये धन्यवाद देने चाहीये। दूसरे राज्यों को भी आगे से किसानों के हित में इस किसान विरोधी योजना का बहिष्कार करना चाहीये।
राष्ट्रीय किसान समन्वय समिति ने की मांग है कि देश के किसानों को लूट कर उनसे वसूला गया बीमा हप्ता किसानों को वापस लौटाया जाए। प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना बंद की जाए और उसके बदले में प्राकृतिक आपदाओं में किसानों को सरकार की तरफ से सिधे नुकसान भरपाई दी जाने की व्यवस्था की जाए।
विवेकानंद माथने,
विवेकानंद माथने
संयोजक
राष्ट्रीय किसान समन्वय समिति
vivekanand.amt@gmail.com
9822994821 / 9422194996


Filed under: kheti kisani, Uncategorized Tagged: mathane, phasal bima, pmpby, vivekanand_mathane

समाजवादी जन परिषद ,रांची प्रस्ताव

Tue, 05/09/2017 - 06:13

समाजवादी जन परिषद

राष्ट्रीय कार्यकारिणी बैठक

रांची, १-३ सितम्बर २०१७

आर्थिक-राजनैतिक-सामाजिक प्रस्ताव

१, २ और ३ सितम्बर को रांची में हुए राष्ट्रीय कार्यकारिणी बैठक में आर्थिक, सामजिक और राजनैतिक परिस्थिति पर गहन चर्चा हुई. उत्तर-प्रदेश, झारखण्ड, केरल, दिल्ली, उत्तर-बंगाल, ओडिशा, बिहार, राजस्थान एवं महाराष्ट्र से आये प्रतिनिधियों ने अपने-अपने राज्यों में मौजूदा राजनीतिक घटनाक्रम का व्योरा पेश किया. साथ ही सजप द्वारा किये जा रहे हस्तक्षेपों के बारे में भी जानकारी दी.

सभी क्षेत्रों से मिली जानकारी से यह पुष्ट हुआ कि २०१४ में भाजपा सरकार के सत्ता में आने के बाद, भाजपा और संघ ने समाज में घृणा और आतंक के माहौल को बहुत तेजी से बढाया है. भाजपा, धर्म के नाम पर समाज का ध्रुवीकरण करने में सफल हुइ है और बंटे हुए वोट के आधार पर चुनाव जीतती रही हैं. इस विभाजन का सामाजिक ताने-बाने पर गहरा दुष्प्रभाव पड़ा है. विभिन्न वर्ग के लोग, जो मिल-जुल कर साथ जीवन-यापन करते थे, अब संदेह और डर के माहौल में रहते है. सजप इस स्थिति को भयावह मानती है और अपनी और से वो सारे कदम उठाएगी जिससे सामाजिक सौहार्द्य बहाल हो सके. इसके लिए स्थानीय स्तर पर विभिन्न कार्यक्रम चलाये जायेंगे. साथ ही सजप सरकार और शासन से मांग करती है की ऐसे तत्वों पर जो समाज को बाँटने का काम करते है, उनपर कड़ी कार्यवाई की जाय.

बिहार में नीतीश कुमार ने जनादेश के साथ गद्दारी कर, सत्ता-सुख भोग के लिए जिस तरह रातों-रात पाला बदला, वह अब तक की सबसे शर्मनाक राजनैतिक कुकृत्य है. सजप यह मांग करती है की बिहार की सरकार को अविलम्ब भंग किया जाय और नया जनादेश लिया जाय.

सजप ऐसा महसूस करती है की भाजपा के आक्रामक रणनीति के सामने विपक्ष निष्क्रिय और निराश है. हजारों की संख्या में किसान आत्महत्या कर रहे हैं. पूरे भारत में कई आन्दोलन हो रहे है- जिनमे प्रमुख है हरयाणा का जाट आन्दोलन, गुजरात का पाटीदार आन्दोलन, महाराष्ट्र का मराठा आन्दोलन, मध्य प्रदेश/ महाराष्ट्र का किसान आन्दोलन आदि. इन आन्दोलनों में सैकड़ों बेगुनाहों की जान गयी. भाजपा सरकारें इन आन्दोलनों को नकारने और दमन करने में लगी रही. मध्य प्रदेश के मुख्य मंत्री ने किसानों से बातचीत करने की बजाय उपवास का हास्यास्पद नाटक किया. जब दो किसानों के परिवार ने मुआवजा लेने से मना किया तब जाकर पुलिस वालों पर हत्या का मामला दर्ज हो पाया. सजप का मानना है की ये सभी आन्दोलन कृषि के प्रति सरकार की उपेक्षा और उलटी नीतियों के कारण हो रहे हैं. उपज का उचित मूल्य न मिलने के कारण किसान और उनके बच्चे छोटी-मोटी नौकरी में ही अपनी भलाई समझते है, और इसीलिये आरक्षण की मांग करते है. सजप सरकार से मांग करती है की कृषि के लागत मूल्य पर नियंत्रण हो, कृषि-उत्पादों का लाभकारी मूल्य मिले और किसान के हित वाली फसल बीमा लागू हो. अभी लागू ‘प्रधानमंत्री कृषि बीमा योजना’ के बारे में सी ऐ जी ने अपने प्रतिवेदन में कहा है, कि इस योजना से सिर्फ बीमा कंपनियों को ही लाभ पहुँचा है.

सजप का आंकलन है की २०१४ में बीजेपी की सरकार बनने के बाद से हिंदुत्व-समूहों के द्वारा समाज में अल्पसंख्यकों के प्रति घोर विद्वेष फैलाया जा रहा है. गाय और गोमांस का अफवाह फैला कर निर्दोष मुसलामानों की दिन दहाडे हत्या की जा रही है. उन्हें अपने पारंपरिक व्यवसाय, जैसे पशु-कारोबार और मांस बेचने के काम से वंचित करने का षड़यंत्र किया जा रहा है. आम जनता को भैंस, सूअर आदि जैसे सस्ते प्रोटीन आहारों से वंचित किया जा रहा है. गौ-रक्षक दल गुंडों की तरह आतंक फैला कर वसूली कर रहे है. इससे पशु पालन करने वाले सभी धर्मों के गरीब किसान की रोजी-रोटी पर भी प्रश्न चिन्ह लग गया है. सजप, केंद्र और राज्य सरकारों से मांग करती है की गौ-गुंडों के विरूद्ध कड़ी कार्यवाही की जाय और कानून हाथ में लेने वाले हर व्यक्ति और समूह से समान रूप से निबटा जाय जिससे भय का माहौल समाप्त हो और हर नागरिक कानून-सम्मत रोजगार और जीविका निर्वाह के साधनों का उपयोग कर सके.

आम जनता के लिए स्वास्थ व्यवस्था पूरे देश में चरमरा गयी है. उत्तरोत्तर सरकारों ने स्वास्थ सम्बन्धी साधनों में कटौती की है. स्थिति इतनी भयावह हो गयी है की सरकारी अस्पतालों में सैकड़ों की संख्या में मूलभूत सुविधा और ऑक्सीजन के आभाव में बच्चों की मौत हो रही है. गोरखपुर, जमशेदपुर आदि के अस्पतालों की घटना अपराधिक श्रेणी में आती है लेकिन बीजेपी सरकारें बेशर्मी से इसे झुठला रही है.

भ्रष्टाचार मिटाने के जुमले पर चुनाव जीतने वाली बीजेपी सरकार ने लोकपाल बहाल करने में कोई दिलचस्पी नहीं ली है. देश में औद्योगिक घरानों से सम्बंधित भ्रष्टाचार बेइंतहा बढ़ रहा है. याराना पूंजीवाद की संस्कृति फल-फूल रही है. अब तो अंतर्राष्ट्रीय एजेंसीज द्वारा किये जा रहे सर्वेक्षणों में भी भारत अव्वल भ्रस्टाचारी देश बन गया है. सजप मांग करती है की लोकपाल की बहाली अविलम्ब की जाय, ‘व्हिसलब्लोअर बिल’ पास किया जाय और राजनीतिक दलों के चंदों को पूरी तरह से पारदर्शी बनाया जाय.

लोहिया जी आजाद भारत के पहले राजनेता थे जिन्होंने ‘निजता के अधिकार’ को प्रखरता से उठाया था. कालांतर में सभी सरकारों ने आम जनता से निजता का अधिकार छीनने का षड़यंत्र करती रही है. बीजेपी की फसीबादी सरकार ने तो सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दायर कर इस अधिकार को सिरे से नकारा. किन्तु माननीय सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में इस अधिकार को मौलिक माना है. सजप इस फैसले का स्वागत करती है साथ ही यह मानती है की इस घटना से फासीवादी ताकतों के मानवाधिकारों के हनन के घृणित इरादों पर भविष्य में भी रोक लगेगी.

सजप नर-नारी समता के सिधान्तों पर मुखर रही है. हाल के सुप्रीम कोर्ट के तीन तलाक के निर्णय का स्वागत करती है. लेकिन बीजेपी जिस तरह से इस मुद्दे को मुसलमानों को नीचा दिखने के लिए इस्तेमाल कर रही है, उसकी हम भर्त्सना करते है. सभी वर्गों में, जिनमे हिन्दू भी शामिल है, महिलाओं के साथ काफी भेद भाव किया जा रहा है. सजप उन सभी मुद्दों पर सुधार लाने का काम करती रही है. लेकिन बीजेपी मुसलमान महिलाओं के शिक्षा और रोजगार पर ध्यान नहीं देकर उनके शादी में ५०००० का अनुदान देने की पेशकश कर रही है, जो भेदभाव एवं विद्वेषपूर्ण है. साथ ही केरल में अखिला / हादिया के सन्दर्भ में जिस तरह सुप्रीम कोर्ट में भ्रामक एफिडेविट फाइल कर एन आई ए की जांच करवाई जा रही है. यह घटना नारी स्वतंत्रता, और वयस्क नारी अधिकारों पर सीधा प्रहार है. सजप इसका सभी स्तर पर पुरजोर विरोध करेगी.

नोटबंदी के कारण देश की अर्थ-व्यवस्था चरमरा गयी. लाखों छोटे उद्योग बंद हो गए और एक करोड से ज्यादा कर्मचारी की नौकरी चली गयी. मोदी और उनकी सरकार इस सम्बन्ध में हर स्तर पर लगातार झूठ बोलती रही है. अब रिज़र्व बैंक ने जो आंकड़े प्रसारित किये है उनसे पता चलता है की ९९% नोट वापिस आ गए. १७००० कड़ोर नोट पकड़ने के लिए २१००० कड़ोर, नए नोट छापने पर खर्च कर दिया गया. जी डी पी में २% से ज्यादा की कमी आई है. सजप यह मांग करती है की अपने वादे के अनुसार मोदी को नोटबंदी के भीषण परिणामों की जिम्मेवारी लेते हुवे अविलम्ब इस्तीफा दें.

पिछले कई दशकों में होने वाले आर्थिक बदलावों की अपेक्षा जी एस टी एक बहुत बड़ी और सर्वव्यापी घटना है. जी एस टी लागू होने से टैक्स-व्यवस्था का सरलीकरण होगा, सामान के लाने ले जाने में आसानी होगी और सही सरकारी नीतियां लाने से कुछ वस्तुओं के दाम कम सकते हैं . जी एस टी के मुख्य नुकसानों में – केंद्रीकृत कंप्यूटर आधारित टैक्स फाइलिंग सिस्टम के लिए कंप्यूटर, इन्टरनेट, और जानकार ऑपरेटर / सी ए की सेवा का खर्च छोटे व्यवसाइयों के लिए मंहगा पड़ेगा. छोटे उद्योग, जो पंजीकरण नहीं करवा पायेंगे उन्हें इनपुट क्रेडिट नहीं मिल पायेगा. फलस्वरूप उनका उत्पाद बड़े उद्योग के अपेक्षा मंहगा हो जायेगा. सैधांतिक तौर पर सजप केंद्रीकृत टैक्स ढांचे और याराना-पूंजीवाद आधारित विकास के अवधारणा के विरूद्ध है. जी एस टी भी उसी दिशा में एक और कदम है. सजप मांग करती है की जी एस टी में आवश्यक सुधार अविलम्ब लाकर छोटे और मध्यम कारबारियों के लिए लाभकारी बनाया जाय ताकि रोजगार बढे और छोटे तबकों में आमदनी का जरिया मुहय्या हो.

साथ ही सजप का विस्वास है की एक स्वस्थ एवं न्यायपूर्ण अर्थव्यवस्था की नीव में जो कर व्यवस्था होगी उसमे प्रत्यक्ष कर का हिस्सा दो तिहाई के आस पास होनी चाहिए जबकि अभी मात्र एक तिहाई है. सजप धनाढ्य वर्ग के कर प्रतिशत को बढ़ने के पक्ष में है और अप्रत्यक्ष कर, जो आम जनता से वसूला जाता है उसे अभी के स्तर से आधे पर लाया जाय. धनी व्यक्तियों से ज्यादा आय-कर लेना अनिवार्य ज़रुरत है.

झारखंड की बीजेपी सरकार निरंकुश शासन का प्रयास कर रही है. आदिवासियों के भूमि अधिग्रहण का इनका कानून, अत्यधिक विरोध के बाद निरस्त करना पड़ा. सजप ने भी इन विरोधों में अहम् भूमिका निभाई. झारखण्ड की सरकार ने, माओवादी होने के आरोप में हज़ारों आदिवासी युवा को वर्षों से जेल में बंद कर रखा हैं. उनपर मुकदमें में भी कोई प्रगति नहीं है. सजप की मांग है की न्याय सम्मत ढंग से इन व्यक्तिओं को तुरत रिहा किया जाय. साथ ही झारखंड में ज़मीन-बैंक बनाने के रास्ते, गाँव के चारागाह और सामूहिक इस्तेमाल की भूखंडों को पूंजीपतियों को हस्तांतरित करने के प्रक्रिया पर रोक लगाईं जाय.

सजप ‘Jharkhand Freedom of Religion Bill 2017’ (झारखण्ड फ्रीडम ऑफ़ रिलिजन बिल २०१७) को झारखण्ड सरकार द्वारा नागरिकों के धर्म अपनाने के मौलिक अधिकार को छीनने का षड्यंत्र मानती है. इस बिल के लागू होने से हर ऐसे व्यक्ति को जो धर्म परिवर्तन करता है, जिला अधिकारी को सूव्चना नहीं देने पर तीन साल की सजा का प्रवधान है. सजप झारखण्ड के माननीय राज्यपाल से अपील करती है की इस बिल पर अपनी स्वीकृति न दें.


Aflatoon अफ़लातून ,

महामंत्री,
समाजवादी जनपरिषद ,

Phone फोन : 0542-2300405


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लेखक विषय संवाद साभार अनुवादक

पहले वो आए साम्यवादियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं साम्यवादी नहीं था

 

फिर वो आए मजदूर संघियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं मजदूर संघी नहीं था

 

फिर वो यहूदियों के लिए आए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं यहूदी नहीं था

 

फिर वो आए मेरे लिए

और तब तक बोलने के लिए कोई बचा ही नहीं था

 

मार्टिन नीमोलर (1892-1984)