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पुण्य प्रसून बाजपेयी

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Updated: 3 hours 6 min ago

नववर्ष की पहली चाय की प्याली में 2018 का तूफान.....

Tue, 02/01/2018 - 14:27
सत्ता का राष्ट्रप्रेम ..विपक्ष की राजनीतिक शून्यता ...संघ पर अंधेरे के बादल

चाय में तूफान....सुना था . पर पहली बार महसूस किया..जब चाय की चुस्की के बीच कांग्रेस के दौर में लूटते देश से भी बुरी लकीर 2018-19 में कोई शख्सये कहकर  बताने लगा कि हालात तो मरने-मारने वाले होंगे । सवाल पेट से जुड़ रहा है । जो असंभव सियासी हालात को एकजुट करेगी और सामाजिक अंतर्विरोध भी विरोध के लिये एक साथ खडे होंगे । तो कल्पना कीजिय बीजेपी का भविष्य क्या होगा । बात तो अटल बिहारी वाजपेयी जी के जन्मदिन के दिन वाजपेयी जी के सक्रिय होने के दौर को याद करने से शुरु हुई थी । और संयोग से बातचीत का सिलसिला इस सच के साथ के साथ शुरु हुआ कि जो शख्स वाजपेयी जी के प्रधानमंत्री रहने के दौरान से लेकर उसके बाद भी जन्मदिन के दिन सुबह सुबह वाजपेयी जी के घर पर महाभिषेक पूजा करने पहुंच जाता था, संयोग से उसे भी 25 दिसंबर 2017 को सुबह वाजपेयी जी के घर आने की इजाजत नहीं मिली । क्यों क्या कहा गया आपसे .... कुछ नहीं सिर्फ  इतना की दस साढे दस बजे से पहले तो आप नहीं सकते । आइये तो पीएम के आने के वक्त या उसके बाद । तो  क्या परेशानी थी..अच्छा तो था कि आप पीएम से भी मिल लेते? तो पीएम से मिलने नहीं बल्कि वाजपेयी जी के घर पर सुबह तो पूजा करने   रहा हूं और इस बार भी सुबह ही जाना चाहता था । हर बरस की तरह । तो क्या वाजपेयी जी जब पीएम थे तब भी आप जाते थे । जी..बाप जी का ही ये प्रेम था ।  सफदर जंग रोड में जो पहला घर था पीएम वाजपेयी जी का । उसी घर में शिव जी की मूर्ति स्थापित की थी । और वहा से जब 3 रेसकोर्स में वाजपेयी जी पहुंचे तो शिव की मूर्ति भी वहा पहुंची । और ये सिलसिला तो हर जन्मदिन का रहा है । सुबह सात साढे सात बजे रुद्दाभिषेक । दो घंटे का पूजा पाठ । और फिर हम भी बा जी को प्रणाम और बधाई देकर निकल जाते ।

और उसी के बाद जन्मदिन के मौके पर वाजपेयी जी सभी से मिलते और दोपहर बाद कामकाज । तो मलाल है आपको । मलाल  हे का । हम तो कहीं भी पूजा कर लेते है । इस बार अपने घर पर ही कर ली...बस ये बात अटक गई कि वाजपेयी जी के जन्मदिन के मौके पर किसी को किसी ने कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण बना दिया....और परंपरा टूट गई । परंपरायें टूट नहीं रही बल्कि नई बनाने की कोशिश हो रही है । अचानक ही डीयू के एक कालेज की प्रिंसिपल बोल पडे । अरे आपको ऐसा क्यों लग रहा है । आप तो शानदार चाय का स्वाद लिजिये । जायके का जिक्र ना करें । क्यों । हालात को समझें । हालात क्या कहते हैं । हालात साफ बता रहे है जब लोकतंत्र में एक केन्द्र बिन्दु ही सारे अच्छे-बुरे परिणामों के लिये जिम्मेदार होता चला जाये तो फिर विरोध या सहमति के स्वर भी उसी के इर्द-गिर्द घुमड़ने लगते हैं। आप आथेटिरियन हालात के बारे में कह रहे है । मैं सिर्फ बिसात बताना चाह रहा हूं । कहना तो पंडित जी को चाहिये.जिनकी उम्र बीत गई संघियों के साथ । अरे आप इन्हें स्वयंसेवक भी कह सकते हैं । बीजेपी का भी कह सकते हैं। न न बीजेपी का नहीं । क्यों....क्योकि संघ की उम्र उसका अनुभव उसका राजनीतिक-सामाजिक शुद्दिकरण का सपना 100 बरस पूरे होने पर देख पायेगी या नहीं ..मौजूदा वक्त में ये सवाल तो है । क्या कह रहे है । और क्यों कह रहे है । देखिये भारते की सामाजिक व्यवस्था सियासत से नहीं सामाजिक ताने-बाने के बैलेंस से चलती है । और वह टूट रही है ....कैसे ये कैसे कह सकते है आप । मैं तो स्वयंसेवक होकर स्वयंसेवक की सोच तले संघ को ही भारत का आईना मानता हूं..और पहली बार उस आईने में आ रहे दरक को देख रहा हूं । आप कही भुवनेशवर में तोगडिया को हटाने की व्यूहरचना के वाबजूद तोगडिया के पक्ष में विहिप के खड़े होने के अक्स में तो बात नहीं कह रहे है । झटके में बेहद कम बोलने वाले स्वयंसेवक के ये शब्द पहली जनवरी की सर्द सुबह में अचानक गर्मी पैदा कर गये । तो मान्यवर लग रहा है बरस ही नहीं बदला..संघ भी बदल रहा है । चाय ठंडी ना हो चुस्की तो लीजिये...चाय ठंडी हो चुकी है जो घातक है । अरे आप तो बिंब में बात करने लगे ..सीधे कहिये...ये सवाल कल भी मौजू था और कल भी मौजू होगा । कौन सा सवाल। अब संघ अपने स्वयसेवक की सत्ता को सुझाव नहीं देता..बल्कि सत्ता संघ को निर्देश दे रही है । आपको ऐसा क्यो लगा ...भुवनेश्वर में कहा गया सत्ता को तकलीफ में लाने वाले कोई हालात पैदा ना करें और उज्जैन में कल यानी 2 जनवरी से शुरु हो रहे मंथन में कहा जायेगा सत्ता के अनुकूल संघ को चलना होगा । पर वाजपेयी के दौर में तो संघ ने इसे कभी नहीं माना । तो वाजपेयी के दौर में तो आपको भी किसी ने पूजा पाठ से नहीं रोका । हा ..हा हा हा ....ना न हंसिये मत ... वाजपेयी सत्ता के लिये नहीं थे ।

संघ सत्ता के लिये नहीं बना है । पर संघ अगर अब सत्ता के अनुकुल सत्ता बनी रहे इसके लिये है तो फिर चार संघठनो का अध्ययन कर लिजिये.....और उसी परिपेश्र्य में  राष्ट्रवाद का भी अध्ययन कर लिजिये । हा हा आप पत्रकार है तो आप राष्ट्रवाद के सवाल को उभार कर सत्ता पर चोट करना चाहते है । न न मुझे तो लगता है कि देश की सुरक्षा और राष्ट्रवाद का सवाल हर मुद्दे को बौना बना देता है और इसका सामना कैसे हो इसपर राजनीतिक शून्यता है । और पत्रकारीय शून्यता । बिलकुल मुझें इंकार नहीं है ..इसी दौर में मैने खेमो में पत्रकारिता को बंटते देखा । आप कही नहीं खडे है तो आप पत्रकार नहीं है । तो फिर पत्रकारिता का कैनवास कितनाी छोटा है ....इसीलिये मैं कह रहा है कि संघ के कैनवास तले सत्ता को समझिये और उस कोहरे को साफ किजिये जो हर दायरे में सत्ता का सुकून पाने को बेताब है पर पहली बार संघ के चार संगठनों के सामने ये सवाल है कि वह सत्ता के निर्देश पर खिंची जा रही लक्ष्मण रेखा पार करें या ना करें । और आप कोई भ्रम में ना रहे कि काग्रेस या विपक्ष की राजनीति मौजूदा सत्ता के पालेटिकल डिस्कोर्स का विकल्प पैदा कर पायेगी । अरे पंडित जी हम राजनीति अखाडे में अभी ना कूदे । पहले समझ लें ये कहना क्या चाहते है । क्यों..क्योकि मुवनेशवर में सत्ता के बोल थे..तोगडिया एक बडी वजह बने बीजेपी को 99 तक पहुंचाने में । इस हकीकत से सत्ता के आंख मूंदने पर संघ ने भी आंखे मूंद ली कि ग्रामिण इलाको की बदहाली की वजह क्या है । युवाओ में गुस्सा क्यों है । विकास का ककहरा कमजोर क्यों पड रहा है ।

तो क्या शाइनिंग इंडिया के दौर की तरह संघ ने गुजरात में सत्ता का साथ नहीं दिया ....इसलिये 99 पर अटके । पंडित जी ये आपको कहां से बात याद आ गई । इसलिये याद आ गई क्योकि उस वक्त बीजेपी पर संघ ने ही आरोप लगाया ता कि उसका काग्रेसीकरण हो चला है । हा हा ...यही बात तो मै कहना चाहता था कि जिस कांग्रेसी सत्ता को हराकर नये सत्ताधारी बने उनका भी काग्रेसी सत्ताकरण हो चला है । मतलब ..मतलब ये है कि जब आर्थिक नीतियों पर ट्रैक 2 का रास्ता वाजपेयी सरकार ने पकडा था तब संघ ने कहा बीजेपी का कांग्रेसी करण हो गया । और कांग्रेस के करप्शन-बैड गवर्नेंस को निशाने पर लेकर 2014 में मनमोहन को
हटाया गया  तो एहसास नयेपन का था । पर सत्ता की चाल ने कहा जो भी पर जमीन पर क्या-क्या लागू हुआ और लाभ किसको मिला ..मुश्किल में कौन आया ये सत्ता के काग्रेसीकरण की नई परिभाषा है । अंतर सिर्फ इतना है कि वाजपेयी के दौर में आर्थिक नीतियां थीं । मौजूदा दौर में आर्तिक नीतियां भी सत्ता बनाये रखने के विचार से जा जुड़ी है । वाजपेयी के दौर में क्रोनी कैपटलिज्म था । मौजूदा दौर में सत्ता बरकरार रखने का मैकेनिज्म है जो संयोग से हर संस्धान को प्रभावित कर रहा है । मसलन.....मसलन हर संस्धान को सत्ता के लिये सत्ता बरकरार रहे उसी लहजे में काम करना पड रहा है । वाजपेयी के दौर में ये दिखायी देता था क्योकि बाहर से प्रभावित किया जा रहा था । मौजूदा वक्त में ये दिखायी कम देता है क्योकि सिस्टम ही सत्ता बरकरार रखने के लिये है । हा हा ...आपने तो उस सवाल को जन्म दे दिया जिस सवाल का संघ को चाहिये । अच्छा किया जो आपने हालात कुछ पारदर्शी बना दिये...अब जरा एक दूसरी चाय बनावइये जब मैं आपको बताऊं कि चाय की प्याली में तूफान क्यों नहीं उठ रहा है या फिर तूफान संघ को खत्म कर दें उसके इंतजार में संघ क्यों है । दार्जिलिंग टी बनवाउ...या ये गरम मसाले वाली चाय चलेगी...। गरम मसाले वाली ही रहने दिजिये ...गर्मी तो उज्जैन के चितंन में होगी ...दिल्ली में तो ठंड है । ...............तो जरा समझने की कोशिश किजिये किसान संघ , भारतीय मजदूर संघ , स्वदेसी जागरण मंच और विश्व हिन्दु परिषद के अलावे संघ के किस संगठन की कितनी महत्ता सार्वजनिक राजनीतिक जीवन में आपको बीते पांच दशको में देखने को मिली हैा । क्यों आदिवासी कल्याण संघ और शिशु मंदिर चलाने वाले संगठन । अच्चा किया जो आपने इनका नाम भी ले लिया । तो जरा समझे किसान-मजदूर-आदिवासी-शिक्षा-अर्थव्यवस्था और राम मंदिर पर निर्णय किसे लेना है । और अगर सारे निर्णय सत्ता ले रही है उसे चुनावी जीत मिल रही है तो फिर संघ के संगठनो का काम क्या होगा । और अगर संघ के संगठनों की शिक्षा-दीक्षा जिस सोच के तहत हुई है और सरकारी की नीतिया उस लकीर पर नहीं चल रही है तो फिर संघ के ये संगठन क्या करेंगें । और अगर सत्ता और संघ चलाने में अलग अलग विजन जरुरी है तो फिर स्वयसेवक के राजनीतिक शुद्दिकरण की संघ की सोच का मतलब क्या है ।

तो आप कह रहे है कि संघ फेल हो गया । ना ना ..मैं ये नहीं कह रहा हूं..मेरा कहना है कि संघ की सोच के लिये जो बडा कैनवास स्वयंसेवक में होना चाहिये अगर वह कैनवास बडा नहीं हुआ तो फिर स्वयसेवक का कैनवास भी सत्ता पाने और उसे टिकाये रखने पर जा टिकेगा । एक मिनट..आपकी ये बात कहीं ये तो इंगित नहीं करती कि कांग्रेस जिस तरह सिर्फ सत्ताधारी होकर खत्म होने के रास्ते पर आ गई उसी रास्ते पर मौजूदा सत्ता  बीजेपी को ले आई है । और बीजेपी के कांग्रेसीकरण की ये नई परिभाषा है । आप पत्रकार है ...ये आपके कहने का अंदाज हो सकता है । पर मै  तो संघ के कमजोर होने के हालात को देख रहा हूं । तो इसका अर्थ ये भी लगाया जा सकता है जिस तरह काग्रेसी सिर्फ गांधी-नेहरु परिवार या कहे आजादी से पहले से अपने पारपरिक सियासत  की वजह से लोगों के जहन में बने हुये है उस पारंपरिक वोट बैक की ही देन है कि कांग्रेसी बने हुये है या उसका आस्त्तित्व बरकरार है । ठीक..अब आप उस महीन लकीर को पकड रहे है जहा भारत की युवा पीढी के सामने आने वाले वक्त में ना कांग्रेस मायने रखेगी और ना ही बीजेपी । बीजेपी क्यों ..उसकी परंपरा तो कांग्रेस सरीखी है नहीं .वह तो लगातार मशकक्त कर रही है । नई पीढी से जुडने के लिये सत्ता मन की बात कर रही है । हा हा ... मन की बात भी सत्ता में बने रहने के लिये है । पर बीजेपी के लिये परंपरा तो संघ है । और संघ को सत्ता के निर्देश पर अगर चलना है तो फिर बीजेपी से पहले संघ ढहेगी । उसकी साख खत्म होगी । उसके सरोकार खत्म होगें । जन से जुडाव खत्म होगा । और जो बीजेपी संघ पर आर्श्रित रही वही संघ बीजेपी पर आर्श्रित होने की स्थिति में आ रही है । तो क्या संघ खत्म हो जायेगा । आप संपादकीय टिप्पणी इतनी जल्दी ना करें । मैने संघ के चार संगठनो का जिक्र किया । तो जरा उनके भीतर की हलचल को समझे ।   इन चारो संगठनो के लिये काग्रेस की सत्ता के दौर में भी हालात ठीक नहीं थे और मौजूदा वक्त में भी ठीक नहीं है । पर संगठन तो काम कर रहे
है । और इनका काम ना करने पर इनकी जगह कौन लेगा ये भी सवाल होगा । इसे थोडा और साफ करें ....पंडित जी आप तो वाजपेयी जी के साथ रहे है । और मुझे याद है आपने एक बार वाजपेयी जी से कहा भी था..पीएम की कुर्सी की बायोप्सी होनी चाहिये ....। जो भी इस कुर्सी पर बैठता है.....हा हा आपको याद है...हा बिलकुल । और ये भी याद होगा कि वाजपेयी जी तब पीएम होते हुये भी ठहाका लगाकर हंस पडे थे । पर ये बात क्या किसी दूसरे से कही जा सकती है । सवाल ये है कि कांग्रेस का नजरिया भोगी-लोभी हो चला तो 2014 में वह खत्म होने वाले हालात में आ गई । और अब भोगी-लोभी की ही परिभाषा को बदल कर बीजेपी के भीतर का बडा कुनबा खामोशी से सत्ता के लिये काग्रेसी मन रखने से नहीं हिचक रहा । महाराष्ट्र, हरियाणा,झारखंड,कश्मीर, असम, बिहार ही नही हर उस राज्य को परख लिजिये जहा 2014 के बाद सीएम बने या सरकार बनाने
के लिये कही जाति तो कही तिकडमो का सहारा लिया गया । पर सत्ता है उसे भोगने है तो नये नवेले सीएम से लेकर हर हुनर को मान्ता दे दी गई । विचारधारा ताक पर आ गई । तो फिर ये क्यों ना मान लिया जाये कि बीजेपी के भीतर भी उबाल होगा । हो सकता है । पर उसका कोई महत्व नहीं है । और बीजेपी में उबाल भी आपको सत्ता के लिये ही दिखायीदेगा । यानी कल को बीजेपी हारने लगे तो कोई विरोध कर देगा ...पर वह विरोध सत्ता के लिये वैसे ही होगा जैसे सत्ता के लिये काग्रेस बनी हुई है ..वह मानती रही तो 24 अकबर रोड पर कौवे बोलने लगे । अब सत्ता के लिये कबूतरों का झुंड फिर जमा हो रहे है । पर महत्व तो संघ परिवार का है । काग्रेस भी निशाने पर संघ परिवार को लेती रही तो बीजेपी की सत्ता डोलती रही । पर जरा समझिये आज की तारिख में सत्ता संघ पर ऐसी हावी है कि संघ पर हमला करने से काग्रेस को कोई फायदा होगा नहीं क्योंकि सरसंघचालक का भाषण भी डीडी पर लाइव टेलिकास्ट होता है और भागवत जी भी किसी कैबिनेट मनिस्टर की तर्ज पर बोलते-सुनायी देते है । पर जरा हकीकत की जमीन पर पैर रखिये और सोचिये महाराष्ट्र में किसान आंदोलन हुआ ...मंदसौर में किसान संघर्ष हुआ । दिल्ली में देशभर के किसान-मजदूर जमा हुये । श्री श्री से लेकर स्वामी तक राम मंदिर बनाने निकल पडे..पर इस कडी में संघ के संगठनो ने क्या किया । जहा शिरकत की उनकी जुबा सत्ता ने सिल दी । कही पदाधिकारियो को हटा दिया गया । कहीं ये नाकाबिल साबित होते चले गये । गोवा में तो सत्ता के लिये स्वयंसेवक को दरकिनार किया गया । संघ का एंजेडा बीजेपी ने गोवा में बदल दिया । यानी चाहे अनचाहे संघ ने अपने को बचाने किये जब खुद को सत्ता से जोड लिया तो फिर हर स्वयसेवक को ये क्यों नहीं लगेगा कि वह भी अपने आप में सरकार हो सकता है.बीजेपी में घुस कर सत्ताधारी हो सकता है । दो सवाल , पहला अभी आपने कहा संघ ने खुद को बचाने के लिये..... और दूसरा क्या स्वयसेवक अपने आप में सक्षम नही है कि वह सामानांतर सत्ता बना लें । आप वाकई पत्रकार हो । बेहद बारीक लाइन पकड़ते हो । तो पहले सवाल का जवाब तो यही है कि सत्ता जब बेखौफ हो जाये तोडर किस बात का दिखलाती है इसके लिये आप कांग्रेस के दौर को याद कर लीजिये....यानी सत्ता में नहीं रहे तो हिन्दू आतंकवाद ...हा हा । और दूसरा..दूसरा तो यही है कि जिन चार संगठनों का मैंने जिक्र किया उसके स्वयसेवक त्यागी है । संघर्षशील है । अगर हालात यही रहे तो हो सकता है कोई सत्ता की संघ के जरीये खिंचवाई गई लक्ष्मण रेखा भी लांघ लें । और पहली बार सच तो यही है की संघ के भीतर का अंतर्विरोध कही नागपुर में सतह पर ना जाये । नागपुर से मतलब । नागपुर में ही मार्च में प्रतिनिधी सभा
होनी है । सहसरकार्यवाह भैयाजी जोशी की जगह दत्तात्रेय होसबोले लेंगे । वह सत्तानुकूल है तो हर संगठन को मथेंगे। और मथने की प्रक्रिया छह महीने से शुरु हो चुकी है । बीएमएस और किसान संघ के तीन प्रमुख पदाधिकारियों को हटाया गया या कहें बदला गया । पर विहिप में तोगडिया को हटाने से सफल हो नहीं पाये । तो क्या ये बदलाव संघ नहीं चाहता या संघ ही चाहता है । पंडित जी पत्रकार आपके मित्र है फिर भी आप ऐसे सवाल करते हो ...क्यों गलती हो गई क्या । न न गलती नहीं जब सत्ता संघ पर हावी है तो चाकू कद्दू पर गिरे या कद्दू चाकू पर होगा क्या । तो इसका मतलब है तोगडिया एक बडा चैलेंज है सत्ता के लिये । हा अब आपने सही लाइन पकडी । पर समझना ये भी होगी कि संघ बहुत धीरे धीरे बदलाव की दिशा में जाता है । और स्वयसेवक को राजनीतिक हुनरमंद होता नहीं । उसकी जरुरत ..उसकी समझ भी सामाजिक ट्रसंफारमेशन को ज्यादा परखती है । तो तोगडिया सरीखे स्वयंसेवकों राजनीति से दे दे हाथ करने का हुनर सिखना होगा । या क्या किसी को भी
सिखना होगा जो सत्ता के खोल से बाहर झांकना चाहता है । या कहे संघ का विस्तार चाहता है । उसे बचाये रखना चाहता है । अन्यथा 2025 में संघ का शताब्दी वर्ष कैसे मनेगा इसके सिर्फ सपने देख सकते हैं, दिखा सकते है । आज तो लंबी चर्चा हो गई चाय पर । हां हमे घर भी निकलना है फिर भी एक सवाल पत्रकार महोदय आप ही से...क्या राजनीति का मौजूदा रास्ता जारी रहेगा । मुशकिल है सटीक कहना । पर इससे इंकार तो नहीं किया जा सकता कि देश की सुरक्षा और राष्ट्रीयता का सवाल जिस तरह सत्ता उठाती है उसकी कोई काट किसी राजनीतिक दल के पास है । कोई नेता विपक्ष में है नहीं जिसकी साख मजबूत हो । राजनीतिक दलो में सहमती तक तो बनती नहीं । और विपक्षी नेताओ के आपसी अंतर्विरोध सत्ता की चाटुकारिता भी करते है और विरोध भी । तब तो मौजूदा सत्ता जो कर रही है उसे कोई डिगा नहीं सकता । हा हा यही तो सत्ता भी सोचती है । पर बिहार , दिल्ली और गुजरात चुनाव परिणामों के संकेत भी समझे । और देश के उन हालातों को भी परखे जहा ग्रामीण भारत की त्रासदी और युवा भारत की मुश्किले कैसे उसी इक्नामिक्स पर आ टिकी है जिसके भरोसे सत्ता के सेवक भोग लगा रहे है । और सपने दिखा रहे हैं । मतलब , पहली बार आर्थिक मुद्दे देश की सियासत की अगुवाई करने को तैयार हो रहे है । आर्थिक हालात समाज में आज नहीं तो कल टकराव भी पैदा करेंगे । कल तक भूख से मौत को सरकार स्वीकारती नहीं थी । अब भूख से मरना खबर है । देश के विकसित राज्यो में से एक महाराष्ट्र की 2016-17 में महाराष्ट्र अरोग्य और एकात्मिक बालविकास विभाग की रिपोर्ट के ही मुताबिक हर दिन महाराष्ट्र में  40 बच्चो की मौत हुई है । यानी बरस भर में 14,365 मौत ।  78 हजार शिशु गंभीर हालत में है । यानी जाति-धर्म की सियासत राजनीतिक अंतर्विरोध का सिलसिला है । ये तो पहले भी रहा है । आंकडे परखने होगें । पर चाय की आखरी चुस्की के साथ आपको मोजूदा सत्ता के बधाई देनी चाहिये कि जो सियासत बीते दौर में छुप कर होती थी । वह मौजूदा सत्ता के दौर में ये खुलकर उभरी है । यानी जनता ने पांच बरस के लिये चुना है तो फिर काहे का संधिय ढांचा या काहे  लोकतंत्र के खम्भे । न्यायपालिका हो या कार्यरपालिका या विधायिका या फिर मीडिया । सब को सत्ता के साथ चलना होगा क्योकि 2014 का जनादेश यही था  । हा हा तो फिर हमने बेकार ही वाजपेयी जी के घर पर पूजा का जिक्र किया । और हम बेकार ही संघ परिवार की चिंता किये हुये है । हो सकता है । तो नववर्ष की शुभकामनायें ले लिजिये । मंगलमय क्यों नहीं । क्योकि मंगलमय तो खुद बनाना होगा ।

अगर ग्रामीण भारत मोदी सरकार से रुठ गया तो 2019 में बंटाधार

Sat, 23/12/2017 - 10:33
गुजरात के जनादेश ने संघ की नींद उड़ा दी है


केसरिया रंग देश के राजनीतिक सत्ता की हकीकत हो चुकी है। 19 राज्य केसरिया रंग में रंगे जा चुके हैं। पर इसी केसरिया रंग की प्रयोगशाला गुजरात में सात जिले मोरबी , गिर , सोमनाथ , अमरेली , नर्मादा , तापी , डांग , अरवल्ली  में तो एक भी सीट बीजेपी को नहीं मिली । जबकि सुरेन्द्र नगर , पोरबंदर , जूनागढ , बोटाड , द्वारका , पाटण , महिसागर और छोटा उदयपुर में सिर्फ 8 सीटें ही जीत पायी। यानी गुजरात के 15 ग्रामीण जिले में बीजेपी को सिर्फ 8 सीट मीली। तो  क्या गुजरात एक ऐसा अक्स है, जिसमें बीजेपी का सियासी उफान संघ परिवार का सामाजिक ढलान हो चला है। ये सवाल  इसलिये क्योंकि ग्रामीण भारत में जड जमाये आरएसएस के ज्यादातर संगठनों को समझ नहीं आ रहा है कि उनकी संघ की उपयोगिता सरकार की चुनावी सफलता पर टिकी है या फिर खुद के कार्यों पर। और इसकी सबसे बडी वजह तो यही है कि  मोदी सरकार की नीतियों से संघ परिवार के पांच संगठनों में तालमेल नहीं है। मसलन -बीएमएस, किसान संघ, स्वदेशी जागरण मंच, विहिप और बजरंग दल खुद को ठगे महसूस कर रहे हैं। और ऐसा भी नहीं है कि इन संगठनों का अपना कोई आधार नहीं है। बीएमएस के देशभर में 1 करोड 12 लाख सदस्य हैं। किसान संघ के 18 लाख सदस्य हैं। स्वदेशी जागरण मंच के 5 हजार पदाधिकारी हैं। जिनका दावा है कि डेढ करोड़ लोगों पर सीधा प्रभाव है। वही आर्थिक नीतियों पर बंटते शहरी और ग्रामीण भारत से परेशान संघ के इन संगठनों से इतर हिन्दुत्व के नाम पर विहिप-बंजरग दल को लगता है कि उन्हें ठगा जा रहा है। और  विहिप-बजरंग दल के देशभर में 40 लाख सदस्य है । और संयोग से 24 से 30 दिसबंर तक भुवनेश्वर में होनी वाली विहिप की बैठक में इन्हीं मुद्दों पर चर्चा होगी। जिसमें संघ के तमाम महत्वपूर्ण पदाधिकारियों की मौजूदगी होगी  ।

और 2014 के बाद पहली बार गुजरात चुनाव ने संघ के भीतर ही इस सवाल को जन्म दे दिया है कि बीजेपी की कमजोर जीत के पीछे मोदी सरकार की आर्थिक नीतियो को देखें या संघ के आंख मूंद लेने को। और ये सवाल बीजेपी के लिये भी महत्वपूर्ण है कि अगर ग्रामीण गुजरात की तर्ज पर देश का ग्रामीण समाज  भी बीजेपी से बिफरा तो 2019 में होगा क्या। क्योंकि देश में 26 करोड 11 लाख ग्रामीण किसान - मजदूर हैं। और 2014 के लोकसभा चुनाव का सच यही है कि 83 करोड वोटरों में से 2014 में बीजेपी को कुल वोट 17,14,36,400 मिले। यानी देश अगर राजनीतिक तौर पर ग्रामीण और शहरी मतदाता में बंट गया तो फिर ये बीजेपी के लिये ही नहीं बल्कि संघ परिवार के लिये भी खतरे की घंटी होगी। क्योंकि संघ की साख बीजेपी की चुनावी जीत-हार पर नहीं टिकी है और ये बात 2004 में शाइनिंग इंडिया तले वाजपेयी की हार के बाद भी उभरा था। पर अगला सवाल तो यही है कि क्या ग्रामीण भारत की तरफ मोदी सरकार की नीतियां देख भी रही है। क्योंकि ग्रामीण भारत को सिर्फ किसानों के नजरिये सेदेखने की भूल कमोवेश हर सरकार ने किया है जबकि सच तो यही है कि देश की इक्नामी में ग्रमीण बारत का योगदान करीब 48 फिसदी है। नेशनल अकाउंट स्टेटिक्स ने इसी बरस जो आंकडे जारी किये उसके मुताबिक खेती [96 फिसदी], पशुधन [ 95 फिसदी ] , खनन [53 फिसदी ], उत्पादन [51 फिसदी ], निर्माण [47 फिसदी ], गोदाम [ 40 पिसदी], रियल इस्टेट-रोजगार [39 फिसदी ], बिजली-पानी-गैस [33 फिसदी ], व्यापार- होटल [28 फिसदी],प्रशासन-डिफेन्स [19 फिसदी ], वित्तीय सेवा [13 फिसदी ] । ये ग्रामीण भारत का ऐसा सच है जो अक्सर सिर्फ किसानों तक ही गांव को सीमित कर छुपा दिया जाता है । नेशनल अंकाउंट स्टेटिक्स ने इसी बरस ग्रामीम भारत के इन आंकडों को जारी किया जो साफ तौर पर बताता है कि देश की इक्नामी में ग्रामीण भारत का योगदान करीब 48 फिसदी है।

ग्रामीण भारत की लूट पर शहरी विकास का मॉडल जा टिका है जो बाजारवाद को बढावा दे रहा है और लगातार शहरी व ग्रामीण जीवन में अंतर बढ़ता ही जा रहा है। तो सवाल तीन हैं। पहला, सिर्फ किसानों की दुगनी आय के नारे से ग्रामीणों की गरीबी दूर नहीं होगी । दूसरा, ग्रामीण भारत को ध्यान में रखकर नीतियां नहीं बनायी गई तो देश और गरीब होगा । तीसरा , ग्रामीण भारत की लूट पर विकास की थ्योरी चल रही है । ये तीनो सवाल ही देश के हकीकत है । क्योंकि एक तरफ देश की इक्नामी में ग्रामीण भारत का योगदान 50 फिसदी है। दूसरी तरफ ग्रमीण भारत में प्रति व्यक्ति आय शहरी भारत से आधे से भी कम है । आलम है कितने बुरे ये इससे भी समझा जा सकता है कि शहर में प्रति दिन प्रति व्यक्ति आय 281 रुपये है। गांव में प्रति व्यक्ति प्रति आय 113 रुपये है। यानी गांव में प्रति व्यक्ति आय मनरेगा में मिलने वाली मजदूरी से भी कम है। कागजों पर ही सही पर मनरेगा में सबसे कम 168 रुपये मजदूरी बिहार-झारखंड में मिलती है। तो हरियाणा में सबसे ज्यादा 277 रुपये मिलते है। तो कल्पना कीजिये ग्रामीण भारत से फलती बढती इक्नामी से ग्रामीण भारत को ही कौन अनदेखा कर रहा है। पर सवाल सिर्फ कम आय का नहीं है बल्कि ग्रामीण भारत की लूट का है, जो बाजार के जरीये देश की इक्नामी में चाहे चार चांद लगाती हो पर असल सच तो यही है कि खनिज संसाधनों से लेकर अनाज और बाकि माद्यमों से ग्रामीण भारत की इके्नामी पर ही देश की आधी भागेदारी टिकी है। और उसी तरफ किसी का ध्यान नहीं है। फसल-ग्रमीण और शहरी सोशल इंडक्स में अंतर क्योंकि खुद सरकार की ही रिपोर्ट बताती है कि जबकि इन आंकडो का सच तो यही है कि कि देश की इक्नामी में ग्रामीण भारत का योगदान करीब 48 फिसदी है। तो क्या गरीब गुरबों और गांव-खेत का जिक्र करते करते ही मोदी सरकार इन्हीं के कटघरे में जा खड़ी हुई है। या फिर चुनावी जीत के चक्कर में खामोश संघ परिवार के भीतर की कुलबुलाहट पहली बार बताने लगी है कि अगर वह भी खामोश रही तो आरएसएस के शताब्दी बरस 2025 तक उसकी साख का बांटाधार हो जायेगा।

"हिन्दुओं की भावनाओं से खिलावाड़ करती रही है बीजेपी की राजनीति"

Wed, 20/12/2017 - 23:07
तोगड़िया की किताब-सैफरान रिफलेक्शन: फेसेस एंड मास्क

तो जिस शख्स की पहचान ही अयोध्या में राम मंदिर आंदोलन से जुड़ी हुई हो, जिस शख्स ने अयोध्या आंदोलन के लिये देशभर के युवाओं को संघ परिवार से जोड़ा, राम मंदिर के लिये बजरंग दल से लेकर विश्व हिन्दूपरिषद को एक राम मंदिर संघर्ष के आसरे नई पहचान दी, हिन्दुत्व के आसरे देश भर संघ परिवार को विस्तार दिया, उसी प्रवीण तोगडिया को अब लगने लगा है सियासत ने हिन्दुओं को राम मंदिर के नाम पर ठग लिया है। सत्ता में आने के लिये बीजेपी ने हिन्दुओं की भावनाओं से खिलवाड़ किया है। और पहली बार बाकायदा सैफरान रिफलेक्शन: फेसेस एंड मास्क यानी केसरिया प्रतिबिंब-चेहरे और  मुखौटे नाम से किताब लिखकर सीधे सीधे बीजेपी की उस राजनीति को कठघरे में खडा कर दिया है जिस राजनीति में राम मंदिर की गूंज बार बार होती है।

तोगडिया के अपनी किताब में 1990 में निकाली गई आडवाणी की रथयात्रा और 6 दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद विध्वस के बाद से बीजेपी की उस राजनीति की नब्ज को पकड़ा है, जिसके आसरे बीजेपी सत्ता पाने के लिये छटपटाते रही। और संघ परिवार बेबस होकर हर हालात को सिर्फ देखता रहा। तोगडिया ने किताब में लिखा है राजनीति ने हिन्दुओं के सामने राम मंदिर को किसी गाजर की तरह ये कहकर हिलाया है कि , "आज बनेगा, कल बनेगा , राम मंदिर अवश्य बनेगा" खासबात ये है कि 80 के दशक से नरेन्द्र मोदी के करीबी रहे प्रवीण तोगडिया ने पहली बार केन्द्र की मोदी सरकार पर इस किताब में ये कहकर हमला बोला है  कि सरकार ने राम मंदिर के लिये संसद में कानून बनाने की जगह हिन्दुओं की आकांक्षा से खेलना शुरु किया तो अयोध्या तक नहीं गये उन्होने राम मंदिर को हिन्दुओं का लॉलीपाप बना दिया और भावनाओं को उभार कर चुनाव जीत लिया।

1983 में सिर्फ 22 बरस की उम्र में विहिप से जुडे प्रवीण तोगडिया पेशे से डाक्टर हैं पर राम मंदिर आंदोलन में उनकी सक्रिय भूमिका देखते हुये ही दो दशक पहले उन्हे विहिप का महासचिव और 2011 में अशोक सिंघल के जीवित रहते हुये विहिप का अंताराट्रीय अध्यक्ष बनाया गया। और अब हिन्दुओं को हिन्दुत्व के नाम पर बीजेपी की राजनीति जिस तरह छल रही है, उस पर अपनी किताब में तोगडिया ने सीधा हमला किया है। इसमें लिखा है कि राम मंदिर , धारा 370, कामन सिविल कोड बांग्लादेशी घुसपैठियों को वापस भेजना, गोवंश हत्या बंदी, विस्थापित कश्मीरी हिन्दुओं को फिर से बसाने के सवाल पर भीघोखा दिया गया। चुनाव के वक्त इन मुद्दो को उठा कर हिन्दू यूफोरिया खड़ा किया  गया और सत्ता मिलते ही यू टर्न ले लिया गया।

खास बात ये भी है कि एक तरफ मोदी विकास का नारा लगाते है ।तो दूसरी तरफ तोगड़िया ने अपनी किताब में लिखा है कि

-हिन्दुओं के मुद्दो से टोटल यू टर्न का नाम ही है विकास।

और गुजरात चुनाव के वक्त किसानो की त्रासदी और युवाओ की बेरोजगारी का सवाल उठाने वाले तोगडिया ने अपनी किताब केसरिया प्रतिबिंब : चेहरें और मुखौटे में साफ लिखा है कि हिन्दू एक वाइब्रेंट ज़िंदा समाज मन है। हिन्दू साँस लेते हैं, उन्हें नौकरी चाहिए, अच्छी सस्ती शिक्षा चाहिए, किसानों को उचित मूल्य चाहिए, महिलाओं को सुरक्षा चाहिए, महंगाई पर नियंत्रण चाहिए , आरोग्य की सुविधाएँ चाहिए। पर राजनीति के जरीये सत्ता साधने वाले राजनेताओं ने हिन्दूत्व आंदोलन को ही चुनावी कठपुतली बना दिया है। जाहिर है ये किताब अभी तक बाजार में आई नहीं है और प्रवीण तोगडिया अपनी इस किताब को बाजार में लाने के लिये खुद को विहिप से निकाले जाने का इंतजार कर रहे है। क्योंकि माना जा रहा है भुवनेशवर में 27, 28,29 दिसंबर को होने वाले विहिप के सम्मेलन में तोगडिया को विहिप से बाहर का रास्ता दिखा दिया जायेगा। क्योंकि प्रधानमंत्री मोदी को भी लगने लगा है कि उनकी राजनीतिक आंकाक्षा से हिन्दुत्व का सवाल टकराने लगा है और प्रवीण तोगडिया अब उनकी सियासत में फिट बैठते नहीं है तो फिर आरएसएस भी मोदी के इशारे पर चलने को मजबूर हो चला है या फिर उनके सामने बेबस है। और इसी कड़ी में छह महीने पहले से किसान संघ और मजदूर संघ में उलटफेर शुरु भी हो चुके हैं। पर हर की नजर इसी बात को लेकर है कि प्रवीण तोगडिया जो सौराष्ट्र के पटेल है । किसान परिवार से आते हैं। हिन्दुत्व के चेहरे बने। अब किताब लिखने के बाद उनका अगला कदम होगा क्या। क्योंकि ये सवाल तो हर जहन में है कि एक वक्त गोविन्दाचार्य ने वाजपेयी को मुखौटा कहा। और एक वक्त संजय जोशी गुजरात में ही मोदी को सांगठनिक तौर पर चुनौती देते दिखे। तो दोनों के सितारे कैसे अस्त हुये इसे आज दोहराने की जरुरत नहीं है। बल्कि प्रवीण तोगडिया की किताब जो नये बरस के पहले हफ्ते में बाजार में आयेगी उसके बाद उनकी राह कौन सी होगी इसका इंतजार अब हर किसी को है।

मोदी के लिये तोगड़िया की छुट्टी होगी होसबोले नये सरकार्यवाहक होंगे ?

Tue, 19/12/2017 - 23:16
गुजरात हिमाचल में भगवा फहराने के बाद अभी कांग्रेस गुजरात की टक्कर में ही अपनी जीत मान रही है. पर दूसरी तरफ अप्रैल में होने वाले कर्नाटक के चुनाव को लेकर बीजेपी तैयारी शुरु कर दी है। और ना सिर्फ बीजेपी बल्कि पहली बार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भी इसकी तैयारी में जुट गया है। जानकारी के मुताबिक स्वदेशी जागरण मंच से बीजेपी में आये मुरलीधर राव को बकायदा कर्नाटक का मैनिफेस्टो तैयार करने के लिये अभी से ही लगा दिया गया है। और मार्च के महीने में कर्नाटक से आने वाले दत्तात्रेय होसबोले को भैयाजी जोशी की जगह सरकार्यवाहक बनाने की तैयारी होने लगी है। खास बात ये भी है कि आरएसएस में सरकार्यवाहक ही प्रशासनिक और सांगठनिक तरीके से नजर रखता है। तो संघ के अलग अलग संगठनों में भी फेरबदल की तैयारी हो रही है । जिसमें नजरिया दो ही पहला, संघ के शताब्दी वर्ष यानी 2025 तक पूरे देश में विस्तार। दूसरा , मोदी सरकार की नीतियो के अनुकूल संघ के तमाम संगठनों का काम और जानकारी के मुताबिक इसके लिये  विहिप और भारतीय मजदूर संघ में बदलाव भी तय है।  माना जा रहा है कि विहिप के कार्यकारी अंतराष्ट्रीय अध्यक्ष प्रवीण तोगडिया और बीएमएस के महासचिव ब्रजेश उपाध्याय की छुट्टी तय है । और इसके पीछे बडी वजह तोगड़िया का मंदिर मुद्दे पर मोदी सरकार की पहल को टोकनिज्म बताना तो बीएमएस का मोदी सरकार की आर्थिक नीतियों पर सवाल खड़ा करना है। तो संघ के अलग अलग संगठनों से कोई आवाज सरकार के खिलाफ ना उठे अब संघ भी इसके लिये कमर कस रहा है। और इसीलिये विहिप और बीएमएस के अलावे किसान संघ और स्वदेशी जागरण मंच के अधिकारियों में भी फेरबदल होगा। और ये सारी प्रक्रिया मार्च में होने वाली संघ की प्रतिनिधि सभा से पहले हो जायेगी क्योकि नागपुर में होने वाली प्रतिनिधि सभा में सरकार्यवाहक भैयाजी जोशी की जगह सह सरकार्यवाहक दत्तत्रेय होसबोंले लेगे । मार्च 2018 में भैयाजी का कार्यकाल पूरा हो रहा है। जो इस बार बढ़ेगा नहीं। वही दूसरी तरफ हर तीन बरस में होने वाले विहिप का सम्मलन 24 से 30 दिसबंर को भुवनेश्वर में होगा,  जिसमें नये लोगों को मौका देने के नाम पर प्रवीण तोगडिया समेत कई अधिकारी बदले जायेंगे।

जानकारी के मुताबिक संघ और मोदी सरकार दोनों नहीं चाहते है किसरकार की नीतियों को लेकर कोई सवाल संघ के किसी भी संगठन में उठे। तो मोदी सरकार के अनुकूल संघ भी खुद को मथने के लिये तैयार हो रहा है । और गुजरात चुनाव में जिस तरह संघ के तमाम संघठन खामोश रहे । उससे भी सवाल उठे है कि कर्नाटक के चुनाव के लिये खास तैयारी के साथ अब टारगेट 2019 को इस तरह बनाना है जिससे 2019 के चुनाव में जनता 2022 के कार्यो को पूरा करने के लिये वोट दें । और 2025 में संघ के शाताब्दी वर्ष तक संघ का विस्तार समूचे देश में हो जाये । यानी 2019 की तैयारी 2004 के शाइनिंग इंडिया के आधार पर कतई नहीं होगी । और 2022 से आगे 2025 यानी संघ के शताब्दी वर्ष तक मोदी सत्ता बरकरार रहे तो ही संघ का विस्तार पूरे देश में हो पायेगा । सोच यही है इसीलिये 2019 में ये कतई नहीं कहा जायेगा कि बीजे पांच बरस में मोदी ने क्या किया । बल्कि 2022 का टारगेट क्या क्याहै इसे ही जनता को बताया जायेगा । जिससे जनता 2014 में मांगे गये 60 महीने को याद ना करें । यानी 2019 में  जिक्र 60 महीने का नहीं बल्कि 2022 में पूरी होने वाले स्वच्छ भारत, वैकल्पिक उर्जा और प्रधानमंत्री आवास योजना समेत दर्जन भर योजनाओं का होगा । जिससे जनता खुद की मोदी सरकार को 2022 तक का वक्त ये सोच कर दे दें कि तमाम योजनाये तो 2022 में पूरी होगी । और बहुत ही बारिकी से न्यू इंडिया का नारा भी 2022 तक का रखा गया है । जिसमें टारगेट करप्शन फ्री इंडिया से लेकर कालेधन से मुक्ति के साथ साथ शांति , एकता और भाईचारा का नारा भी दिया गया है । जाहिर है 2019 से पहले के हर विधानसभा चुनाव को जीतना भी जरुरी है । इसीलिये सबसे पैनी नजर कांग्रेस की सत्ता वाली कर्नाटक पर है । इसीलिये बीजेपी महासचिव मुरलीधर राव को अभी से से सोच कर लगाया गया है कि कर्नाटक में हर विधानसभा सीट को लेकर मैनिफेस्टो तैयार किया जाये ।

बकायदा हर विधानसभा क्षेत्र के 500 से 1000 लोगों से बातचीत कर मैनिपेस्टो की तैयारी शुरु हुई है । और जिन लोगो से बातचीत होगी उसमें हर प्रोफेशन से जुडे लोगो को शामिल किया जा रहा है। वही दूसरी तरफ संघ का सहर संघठन मोदी सरकार की नीतियो के साथ खडे रहे इसके लिये अब संघ को जो मथने का काम नागपुर में होने वाली प्रतिनिधी सभा के साथ ही शुरु होगा उसमें आरएसएस में फेरबदल के साथ बीजेपी में भी फेरबदल होगा । मसलन ये माना जा रहा है कि विघार्थी परिषद को बीजेपी का नया भर्ती मंच बनाया जायेगा । और इसके लिये विघार्थी परिषद में भी पेरबदल हो सकता है । विघार्थी परिषद की कमान संभाल रहे सुनिल आंबेकर की जगह बीजेपी के राष्ट्रीय संगठन महासचिव रामलाल  को विघार्थी परिषद की कमान दी जायेगी । यानी बीजेपी ही नहीं संघ के भीतर भी ये सवाल है कि 2025 में मोदी की उम्र भी 75 की हो जायगी तो उसके बाद युवा नेतृत्व को बनाने के तरीके अभी से विकसित करने होंगे । पर यहां सबसे बड़ा सवाल यही है कि काग्रेस के नये अध्यक्ष राहुल गांधी के नेतृत्व में काग्रेस की रणनीति क्या होगी । क्योकि गुजरात से बाहर जितनी जल्दी काग्रेस निकले ये उसके लिये उतना ही बेहतर है । और मोदी अंदाज से जितनी जल्दी मुक्ति पाये उतना ही बेहतर है । क्योकि राहुल गांधी के सामने सबसे बडा संकट यही है कि मोदी विरोध का राहुल तरीका मोदी स्टाइल है । नीतियो के विरोध का तरीका जनता के गुस्से को मोदी के खिलाफ भुनाने का है । करप्शन विरोध का तरीका जनविरोधी ठहराने की जगह मोदी से जवाब मांगने का है । यानी राहुल की राजनीति के केन्द्र में नरेन्द्र मोदी ही है । और कांग्रेस की राजनीति के केन्द्र में राहुल राज है । तो फिर जनता कहा है और जनता के सवाल कहां है । इस सवाल का जवाब संसद परिसर में मीडिया कैमरे के सामने खडे होकर कहने से मिलेगा नहीं।

गुजरात जनादेश ने निगाहें मिलाने के हालात पैदा तो कर ही दिये

Mon, 18/12/2017 - 21:46
याद कीजिये 2015 में सड़क पर पाटीदार समाज था। 2017 में सड़क पर कपड़ा व्यापारी थे। इसी बरस सड़क पर दलित युवा थे। और सभी सड़क पर से ही गुजरात मॉडल की धज्जियां उड़ा रहे थे। तो अगस्त 2015 में हार्दिक रैली के बाद भी कांग्रेस जागी नहीं। 2017 में सूरत के कपड़ा व्यापारियों के इस हंगामे के बाद भी कांग्रेस नहीं जागी। कुंभकरण की नींद में सोयी कांग्रेस जब जागी।  राहुल गांधी ने गुजरात की जमीं पर कदम जब रखे। तो कंधे का सहारा उस तिकड़ी ने दिया जो कांग्रेस के नहीं थे। और कांग्रेस के लिये इन कंधों ने आक्सीजन का काम किया। और पहली बार 22 बरस की बीजेपी सत्ता को शह देने की स्थिति  में कांग्रेस को ला खड़ा किया। 2014 से लगातार गुजरात मॉडल से घबराती कांग्रेस में 2019 की आस जगा दी। और गुजरात के नक्शे पर बीजेपी की जीत का रथ 22 बरस में सबसे कमजोर होकर जीतता हुआ थमा और कांग्रेस 22 बरस के दौर में सबसे मजबूत होकर हारते हुये दिखायी दी। तो पहली बार सवाल यही उठा कि क्या 2019 अब नरेन्द्र मोदी के लिये आसान नहीं है। और 2019 में टक्कर आमने सामने की होगी।

तो पन्नों को पलटिये। याद कीजिये। 2014 में मोदी थे। उनका गुजरात मॉडल था। और गुजरात मॉडल के ब्रांड एंबेसेडर बने मोदी का जवाब भी किसी के पास नहीं था। और साढे तीन बरस के दौर यही मॉडल। इसी ब्रांड एम्बेसेडर ने हर किसी को खाक में मिलाया। जनता ने भी माना एकतरफा जीत जरुरी है। तो सिलसिला महाराष्ट्र, हरियाणा, झारखंड, जम्मू कश्मीर में बीजेपी की सरकार बनी। तो दिल्ली और बिहार में बीजेपी हारी पर जनादेश एकतरफा ही आया। उसके बाद असम ,पं बंगाल, उत्तराखंड, यूपी में भी जनादेश एकतरफा ही आया। और पंजाब में भी काग्रेस जीती तो फैसला एकतरफा था। इस फेहरिस्त में आज हिमाचल भी जुड़ा, पर जिस गुजरात मॉडल की गूंज 2014 में थी । वही मॉडल गुजरात में लड़खड़ाया तो कांग्रेस टक्कर देने की स्थिति में आ गई। और पहली बार गुजरात के चुनाव परिणाम ने कांग्रेस को ये एहसास कराया कि वह लड़े तो जीत सकती है। और बीजेपी को सिखाया जब गुजरात में कांग्रेस बिना तैयारी टक्कर दे सकती है। तो फिर 2019 की बिछती बिसात इतनी आसान भी नहीं होगी। क्योंकि गुजरात चुनाव परिणाम ने सोयी कांग्रेस को जगाया है तो फिर अगले बरस जिन चार प्रमुख राज्यो में चुनाव होने है उसमें कर्नाटक छोड़ दे तो राजस्थान, मद्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में बीजेपी की ही सरकार है।  यानी गुजरात के आगे और 2019 से पहले एक ऐसी बिसात है जो चाहे अनचाहे देश में राजनीतिक टकराव को एक ऐसी स्थिति में ला खड़ी कर रही है, जहां आमने  सामने नरेन्द्र मोदी और राहुल गांधी होंगे ही। और 2019 की ये बिसात साफ तौर पर अभी से तय भी करेगी कि कौन किसके साथ खड़ा होगा। यानी क्षत्रपों को अपने आस्तित्व के लिये मोदी या राहुल की छांव में आना ही होगा। और मौजूदा वक्त की बिसात साफ बतलाती है कि मोदी के साथ अगर नीतीश कुमार, प्रकाश सिंह बादल,चन्द्रबाबू नायडू, महबूबा मुफ्ती है और पासवान हैं।

तो दूसरी तरफ राहुल गांदी के साथ लालू अखिलेश, ममता, नवीन पटनायक, करुणानिधि पवार, फारुख अब्दुल्ला, औवैसी हैं। और शायद जो अपनी भूमिका 2019 में नये सिरे से तय करेंगे उसमें शिवसेना कहां खड़ी होगी, कोई नहीं जानता। पर वामपंथी और बीएसपी यानी मायावती को राहुल साथ लाना चाहेंगे। और तेलंगाना के  चन्द्रशेखर राव के किस दिशा में जायेंगे। इसका इंतजार भी करना होगा। पर ये बिसात दो सवालों को भी जन्म दे रही है । पहला एक वक्त कांग्रेस के खिलाफ  गठबंधन का चक्र पूरा हुआ और 2019 में बीजेपी के खिलाफ विपक्ष गठबंधन की  सियासत जागेगी। और दूसरा क्या धर्म जाति से इतर आर्थिक मसलों पर टिके मुद्दे जो गुजरात माडल की मुश्किलों से निकले हैं, वह 2019 में पालिटिकल  डिसकोर्स ही बदल देंगे। पर पालिटिकल डिसकोर्स मोदी ने बदला या कांग्रेस की राह पर मोदी निकले। ये भी सवाल है क्योकि मोदी और अमित शाह की जोड़ी तले जिस सियासी मंत्र को अपना रही है। अपना चुकी है उसमें कद्दावरों की नहीं कार्यकर्ताओं की जरुरत है। इसीलिये कभी बीजेपी के कद्दावर रहे नेताओं की कोई अहमियत या कोई पकड़ है नहीं। उम्र के लिहाज से हाशिये पर जा चुके आडवाणी, मुरली मनमोहर जोशी और यशवंत सिन्हा कोई मायने रखते नहीं तो 2014 से पहले राजनाथ सिंह, सुषमा स्वराज गडकरी रविशंकर प्रसाद या उमा भारती की जो भी महत्ता रही हो उनकी तुलना में एक अदद लोकसभा सीट ना जीत पाने वाले संभालने वाले जेटली मजबूत हैं। कैबिनेट पदों पर आसीन निर्मला सीतारमण, स्मृति इरानी, पियूष गोयल, धर्मेन्द्र प्रधान , प्रकाश जावडेकर एक नयी ब्रिग्रेड है। यानी इस कतार में राज्यो में भी आसीन बीजेपी  मुख्यमंत्रियों की जमीन को परखे तो हर की डोर दिल्ली के हाथ में है। मसलन महाराष्ट्र में फडनवीस। हरियाणा में खट्टर, झरखंड में रघुवर दास,  उत्तराकंड में त्रिवेन्द्र रावत और असम में सर्वानंद सोनोवाल, मणिपुर में  बिरेन सिंह और यूपी में योगी आदित्यनाथ ऐसे नेता हैं, जो झटके में सीएम बने। और इनकी पहचान दिल्ली से इतर होती नहीं है। इस कडी में सिर्फ  योगी आदित्यनाथ ही ऐसे है जो अपने औरा को जी रहे हैं और खुद को मध्यप्रदेश के शिवराज सिंह चौहाण, छत्तीसगढ के रमन सिंह, राजस्थान की वसुंधरा राजे और गोवा के पारिर्कर की तर्ज पर पहचान बना रहे हैं। यानी चाहे अनचाहे बीजेपी या कहे मोदी उसी राह पर चल पड़े हैं, जिस राह पर कभी कांग्रेस थी। क्योंकि अस्सी के दशक तक कांग्रेस के क्षत्रप का कद दिल्ली हाईकमान तय करता था .

और ध्यान दे तो बीजेपी भी उसी राह पर है। पर कांग्रेस से हटकर बीजेपी में सबसे बडा अंतर सत्ता के लिये चुनावी मशकक्त जो बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह करते है और उसमें ब्रांड एंबेसेडर की तरह पीएम मोदी खुद को झौंक देते हैं। उसका कोई जोड़ कांग्रेस के पास नहीं है। क्योंकि कांग्रेस जबतक तैयार होती है बीजेपी जमीनी बिसात बिछा चुकी होती है। कांग्रेस जबतक क्षत्रपों  पर निर्णय लेती है तबतक बीजेपी बूथ स्तर पर पहुंच चुकी होती है। यानी गुजरात की सीख क्या कांग्रेस की कुभकर्णी नींद तोड़ पायेगी । और अब वजब  राहुल गांधी काग्रेस के अध्यक्ष है तो क्या पारंपरिक राजनीति करने के लिये जाने जाने वाली कांग्रेस खुद को कितना बदल पायेगी। तो राहुल गांधी  कैसे संघर्ष करेंगे। राहुल गांधी गैर कांग्रेसियो के कंधे के आसरे पर टिकेंगे या फिर क्षत्रपो को भी खड़ा करेंगे। ये सवाल इसलिये जरुरी है  क्योकि गुजरात में बीजेपी को टक्कर देने की खुशी हो सकती हैा पर हिमाचल में हार से आंखे ऐसी मूंद ली गई है जैसे काग्रेस वहा चुनाव लड ही नहीं  रही थी । और अब जब  बीजेपी के तीन राज्य चुनाव के लिये तैयार हो रहे है तब काग्रेस के किस नेता को किस राज्य की कमान सौपी गई है, ये अब भी संस्पेंस ही है । मसलन राजस्थान में गहलोत क्या करेंगे । और सचिन पायलट की भूमिका होगी क्या । कोई नहीं जानता । छत्तीसगढ में जोगी के बाद काग्रेस की कमान किसके हाथ में है । जो निर्णय ले तो सभी माने कोई नहीं जानता । और मध्यप्रदेश में कई दिग्गज है । ज्योतिरादित्य सिंदिया । कमलनाथ या दिग्विजिय सिंह । कमान किसके हाथ में रहेगी इसपर से अभी तक पर्दा उठा ही नहीं है । तो कांग्रेस क्या राहुल के भरोसे रहेगी । या फिर संगठानत्मक रुपरेखा होती क्या है अब इसपर भी विचार करने का वक्त आ गया है । क्योकि गुजरात के जनादेश ने ये संदेश तो दे दिया कि मोदी का मॉडल अगर वोटर फेल भी मान लें तो फिर वह चुने किसे ।  मोदी के विक्लप का इंतजार मोदी के फेल होने के इंतजार में जा टिका है । राहुल का नेतृत्व चुनाव को भी किसी संत की तरह लेने-कहने से हिचक नहीं रहा है । तो क्या पहली बार राहुल गांधी की परीक्षा बीजेपी से टकराने से पहले कांग्रेस को ही मथने की है । क्या पहली बार राहुल गांधी को कांग्रेसियों में विपक्ष के तौर पर संघर्ष करने का माद्दा जगाना है। क्योंकि सच तो यही है कि पारंपरिक
कांग्रेसी भी कांग्रेस से छिटके हैं। पारंपरिक वोट बैक भी कांग्रेस से छिटका है। क्योंकि काग्रेस के पास देश के आंकाक्षा से जोड़ने के लिये ना कोई विजन है ना ही कोई इक्नामिक रास्ता। और युवा तबके की आकांक्षा जब किसी की सत्ता तले पूरी हो नहीं पा रही है तो फिर राहुल के सामने ये सवाल आयेगा कि कि मोदी को जनता खारिज कर भी दें तो भी राहुल को विकल्प क्यों माने। क्योंकि चुनावी लोकतंत्र का आखरी सच तो ये भी है कि देश में बेरोजगारी का सवाल। किसानों की त्रासदी का सवाल । बढते एनपीए का सवाल, बैकिंग रिफार्म से जनता के सामने संकट पैदा होने के सवाल सबकुछ चुनावी जीत तले दब गये।

स्वयंसेवक की चाय का तूफान तो मोदी-संघ दोनों को ले उड़ेगा...

Sun, 10/12/2017 - 18:50
राम मंदिर..राम मंदिर की रट लगाते लगाते उम्र पचास पार कर गयी,आंदोलन किया...सड़क पर संघर्ष  किया । देश भर के युवाओं को एकजुट किया । कार सेवा के लिये देश के कोने कोने से सिर्फ साधु संत ही नहीं निकले बल्कि युवा भी निकले...और आज जब चुनाव में विकास के बदले झटके में फिर राम मंदिर का जिक्र आ गया तो पहली बार लगा यही हिन्दुत्व भी ठगने की सियासत है । राम मंदिर सिर्फ सत्ता की दहलीज पर पड़ा एक पत्थर हो चला है । ऐसा क्या अचानक हुआ कि विकास का जो नारा गुजरात चुनाव में लगातार गूंज रहा था । झटके में वह 5 दिसबंर को गायब हो गया । और बहुत ही सलीके से राम मंदिर की इंट्री गुजरात चुनाव में हुई। आपको लगा होगा कि ये सुप्रीम कोर्ट में राम मंदिर के टाइटल केस को लेकर जो बहस हुई उसी के बाद गुजरात चुनाव में मंदिर-मस्जिद की इंट्री हुई ..पर मेरी मानिये सुप्रीम कोर्ट की तारीख भी 5 दिसबंर हो । 5 दिसबंर के अगले दिन 6 दिसबंर को देशभर में मंदिर की गूंज सुनाई दे.ये सब कुछ बहुत ही सिस्टेमिक तरीके से तय किया गया ।  तो क्या ये भी फिक्स था । हा हा ..आप चाय पीने आये हैं ....इसे पीजिये..खास गांव से मैंने मंगायी है । खूशबू से तो यही लग रहा है। .....वाकई शानदार है । हां इसमें दूध मिलाने की कोई जरुरत नहीं । जी..मैं बिना दूध वाली ही चाय यूं भी पीता हूं...पर ये तो बताईये कि क्या सुप्रीम कोर्ट में 5 को सुनवाई हो ये भी फिक्स था । देखिये ये तो लोअर कोर्ट में भी नहीं होता कि सबसे बड़ी सुनवाई की तैयारी ना हो और तैयारी के बाद सुनवाई 5 दिसंबर को होगी ये  कहने के बाद 5 दिसबंर को फिर अगली तैयारी की तारीख तय हो जाये ।...छोडिये इसे....पर आप कुछ क्यो नहीं बोलते । राम मंदिर का नाम आते ही आपका नाम तो हमारे जहन में आता ही है । ..ठीक कह रहे है आप ...मुझ पर भी  बहुत दबाव था मैं कुछ बोलू..मैं नहीं बोला । ना किसी को बोलने दिया । क्यों िआप खामोश क्यो रहे । जबकि आपकी पहचान तो राम मंदिर से जुड़ी हुई है । और आप बोलते तो सत्ता सरकार पर दवाब पडता। आपको लग सकता है कि दवाब पडता ।

सच तो यही है कि हम नहीं बोले तो राम मंदिर कहते हुये सत्ता की चौखट पर जा पहुंची नेताओ की चौखट पर फिर राम मंदिर आ जाता । यानी सिर्फ लाभ भुनाने की सियासत है ये । लाभ नहीं भावनात्मक तौर पर राजनीति साधने का मंत्र बना दिया गया राम मंदिर । और मैं तो इस हकीकत को समझ रहा हूं क्योंकि राम मंदिर के लिये ही समूचे देश के भ्रमण करने के दौरान देश के हालात को बेहद करीब से मैंने देखा है । देख रहा हूं ...तो क्या राम मंदिर की जरुरत अब देश के लोगो को नहीं है ? मैंने नहीं कहा ...मैं तो ये समझाना चाह  रहा हूं कि राम मंदिर सत्ता - सरकार -सियासत नहीं बनायेगी । राम मंदिर हमीं बनायेंगे । और हम भी तभी बना पायेंगे जब हिन्दुत्व के सवाल को  हम देश के मुद्दो से लोगो को जोड सके । यानी हिन्दुत्व ने क्या देश के मुद्दे को सामने आने नहीं दिया । हिन्दुत्व नहीं राम मंदिर को ही जिस तरह हिन्दुत्व का प्रतीक बना दिया गया । और इस दिशा में किसी ने सोचा ही नहीं कि इस प्रतीक को सियासत हड़प लेगी । तो हिन्दुत्व की परिकल्पना भी हवा हवाई हो जायेगी ।

हा हा हा..तो आप ये कह रहे है कि राम मंदिर शब्द को राजनीतिक सत्ता ने इस तरह परोसना शुरु किया कि हिन्दुत्व के असल मायने गायब हो जायें । मैं ये नहीं कह रहा है ..मेरा मानना है कि राम मंदिर के आसरे सत्ता ने अपनी कमजोरी ढंकना शुरु कर दिया । और हिन्दुत्व से जो जुडाव युवाओं का होना चाहिये .जो जुडाव किसानो का होना है वह तो हुआ ही नहीं ।  और ये गुजरात में नजर भी आ रहा है । कैसे....? देखिये गुजरात के युवा ने तो होश संभलाने के बाद से ही यहा उसीकी सत्ता देखी है जो राम मंदिर का जिक्र आते ही हिन्दु भावना को जाग्रत कर दें । पर इसी दौर में युवाओं की एस्पेरेशन उनकी सोच को किसी ने ना पूरा किया ...पूरा तो दूर ...समझा तक नहीं । तो क्या हार्दिक पटेल उसी एस्पेरेशन की उपज है । आप कह सकते हैं।  क्योंकि बेहतर जिन्दगी का मतलब ये तो कतई नहीं हो सकता है कि आपके पास खूब पैसा है तो आपका जीवन अच्छा होगा । पैसा नहीं है तो ना शिक्षा । ना स्वास्थ्य । ना रोजगार । फिर पॉलिटिक्स ही एकमात्र इंस्टीट्यूशन । आप और चाय लेंगे और साथ में कुछ मंगाऊ...ना ना साथ में कुछ और नहीं पर चाय जरुर मंगवाये ...इसकी खुशबू वाकई गर्म है । गर्म यानी ...ठंडे माहौल को भी गर्म कर देती है । खैर छोड़िये इसे आर ये बताईये कि आप ये तो ठीक कह रहे है कि राजनीतिक सत्ता ही सबकुछ हो चली है ....पर युवाओ का राजनीतिकरण भी इस दौर में तेजी से हुआ है । हो सकता है पर गुजरात का सच देखिये 20 लाख िसे ज्यादा बेरोजगार है । उनके भीतर के सवालों को कोई रिपरजेंट कर रहा है । कोई नहीं । इसी तरह किसानों की जो हालत है उनके हालात कैसे ठीक होंगे । इस
पर कहां किसी का ध्यान है । किसानो की जमीन सरकारी योजनाओं के तहत हथियाई भी गई । और फसल बर्बादी से लेकर कर्ज का जो बोझ किसानो पर है उसमें उसके पास युवाओ सरीखे एस्पेरेशन तो नहीं पर हर दिन जीने का संकट जरुर है। और किसान को आप  सिर्फ एक किसान भर ना मानिये । ये भी सोचिये कि उसके घर के बच्चे भी बडे हो रहे होंगे । वह भी स्कूल कालेज जाना चाहते होंगे । तो कौन सा हिन्दुत्व उनके लिये मायने रखेगा । हम तो उनके बीच जाते है और  उनकी मुश्किलो से जब खुद को जोडते है तो एक ही बात समझ में आती है कि युवाओं के एस्परेशन और किसानो की त्रासदी से खुद को कैसे जोडा जाये ।

तो क्या ये सरकार नहीं समझ पायी । सीधे कहे तो मोदी तो गुजरात में भी रहे और दिल्ली में भी पहुंच गये । तो जिन हालातो को आ परख रहे है ..समझ तो वह भी रहें होगें । फिर ये सवाल बीजेपी और संघ परिवार को क्या परेशान नहीं करते । अब बीजेपी या संघ परिवार के भीतर ये सवाल है या नहीं...ये तो सीधे वहीं बता पायेंगे ..लेकिन मेरी एक बात लिख लीजिये...संघ परिवार वक्त के साथ इरेलेवेंट हो जायेगेा । क्या कह रहे है आप । आप खुद संघ परिवार से ना सिर्फ जुडे है बल्कि आपकी तो पहचान भी संघ परिवार ही है । और देश का सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा कहिये या फिर संघ तो जिस राम मंदिर के आसरे  हिन्दुत्व को सुलगाता है आप उसके कर्णधार रहे है । आप जो कहे ..जो समझे...पर ये समझना होगा कि जबतक युवाओ और किसानो को वक्त की धारा के साथ नहीं जोडेगें तबतक कभी राम मंदिर तो कभी हिन्दुत्व तो कभी भारत पाकिसातन शब्द ही भारी पडेगें । और एक वक्त के बाद हम सभी इरेलेवेंट हो जायेंगे । तो ऐसे में तो आज की तारीख में नरेन्द्र मोदी शब्द ही सबसे रेलेंवेंट है । आप बीजेपी कहें या संघ परिवार या राम मंदिर ..मोदी शब्द के आगे कहां कोई टिकता है । ठीक कह रहे है आप मंहगाई, बेरोजगारी, किसान इसीलिये मायने नहीं रखते । क्योकि मोदी शब्द है । और ये भी समझ लिजिये कि इस बार गुजरात चुनाव को लेकर इतना हंगामा है फिर भी पहले चरण में दो फिसदी वोट पिछली बार की तुलना में कम पड़े । क्यों ? क्योंकि जो मोदी को वोट नहीं देना चाहते वह कांग्रेस को भी वोट देना नहीं चाहते थे । तो वोट डालने ही नहीं निकले । हिन्दुत्व फीका पड़ रहा है । तो ऐसे में आप जिस इक्नामी का सवाल उठा रहे हैं वही सवाल तो वामपंथी भी उठाते रहे है । पर उनके साथ को कोई खड़ा नहीं होता है । चुनाव दर चुनाव हार रहे हैं वामपंथी । देखिये कम्युनिस्टों का विचार सही है पर व्यवहार सही नहीं है । हिन्दुत्व को लेकर उनके भीतर अंतर्विरोध है । और भारतीय राजनीति का अनूठा सच तो यही है कि ज अंतर्विरोधो का लाभ उठा सके ..सत्ता उसी को मिल जायेगी । और मोदी फिलहाल सटीक है । और कम्युनिस्ट इसीलिये  सफल नहीं है । तो फिर आप अपने कन्ट्रडिक्शन को कैसे दूर करेंगे ? इसके लिये तरीके तो रिवोल्यूशन वाले ही अपनाने होंगे । यानी ? यानी जब राम मंदिर के लिये देश के लाखों-करोडों लोग सड़क पर उतर सकते है तो फिर जिन आर्थिक हालातो को लेकर देश में युवा मन सोच रहा है और किसान मुश्किल हालातो में जी रहे है उसे भी जोडना होगा । जेपी आंदोलन के वक्त तो हिन्दुत्व या राम मंदिर या धर्म का सवाल तो नहीं था । तब भी कितनी तादाद में लोग जुटे। और अन्ना आंदोलन के वक्त भी तो करप्शन का ही सवाल था । दिल्ली में लोग देशभर से पहुंच रहे थे कि नहीं । पाटिदारो का सवाल भी आरक्षण भर से नहीं है । आरक्षण पॉलिटिक्स का शार्ट-कट रास्ता है । युवा पाटिदार इसीलिये जुटे क्योकि वह मौजूदा हालात से नाराज है । नाराजगी समाधान नहीं होती । और समाधान सिर्फ नाराजगी से नहीं आती । हा हा ..जो समझे जो कहे ...मै कुछ कह नहीं रहा हूं पर ये तो समझ रहा हूं कि आपने जो संघर्ष राम मंदिर के लिये किया .उस संघर्ष को नये तरीके से रास्ता दिखाने की जरुरत क्या नहीं आन पडी है । और गुजरात चुनाव के परिणाम क्या कोई रास्ता दिखायेगें ?  मुझे तो भरोसा है गुजरात चुनाव के परिणाम से भी रास्ता निकलेगा । और  हिन्दुत्व की उस परिभाषा को भी आंदोलन से गढगें जिसपर बीजेपी-संघ परिवार तक चुप्पी मारे हुये है । रुकिये रुकिये ....आप कह रहे हैं बीजेपी गुजरात में हार रही है .... । अरे आप चाय पिजिये और 18 दिसंबर का इंतजार कीजिये । इंतजार तो हम कर ही रहे है । पर क्या वाकई बीजेपी हार रही है । हमें तो नहीं लगता ...दिल्ली की पत्रकारों की ये खासियत है । वह वे बात कहेंगे नहीं जो वह चाहते है । हा हा आप ही साफ कह दिजिये ....जो हालात है उसमें बीजेपी-संघ परिवार दोनों हार रही हैं । तो क्या हम माने गुजरात चुनाव परिणाम के बाद मुनादी होगी । हा हा हा....। तो पढ़ने वाले खुद समझ लें ये शख्स कौन है । क्योंकि इस शख्स के पास अभी उम्र भी है और हिन्दुत्व या राम मंदिर के मुद्दे पर मोदी और संघ परिवार से ज्यादा साख भी।




बीमार सरकारी इलाज और लूट पर टिका प्राइवेट इलाज ...शर्म क्यों नहीं आती ?

Fri, 08/12/2017 - 23:54
तो खबर अच्छी है। दिल्ली के शालीमार बाग के जिस मैक्स हॉस्पीटल ने जीवित नवजात शिशुओं को मरा बता दिया था, उसका लाइसेंस दिल्ली सरकार ने आज रद्द कर दिया। और दो दिन पहले हरियाणा सरकार ने गुरुग्राम के उस फोर्टिस हॉस्पीटल के खिलाफ एफआईआर दर्ज करा दी, जहां इलाज ना देकर लाखों की वसूली की  गई थी। और इंडियन मेडिकल एसोसियन ने बिना देर किये कह दिया कि ये तो गलत हो गया। क्योंकि गलती तो होती है और गलती होने पर लाइसेंस रद्द हो गया  तब तो देश के सभी सरकारी अस्पतालों को बंद करना पडेगा। यकीनन इंडियन मेडिकल एसोशियन ने सवाल तो जायज ही उठाया कि सरकारी अस्पतालों को सरकार  तब ठीक क्यों नहीं कर लेती। दो सवाल दो है। पहला, सरकार ने हेल्थ सर्विस से पल्ला क्यों झाड लिया है। दूसरा, भारत में हेल्थ सर्विस सबसे मुनाफे वाला धंधा कैसे बन गया। तो सरकार के नजरिये पर शर्म की जाये या फिर
जिन्दगी देने के नाम पर मुनाफा कमाने वाले निजी अस्पतालों पर शर्म की जाये। या मान लिया जाये कि जनता की चुनी हुई सरकारों ने ही जनता से पल्ला झाड़ कर पैसे वालों के हाथो में देश का भविष्य थमा दिया है। और उसमें हेल्थ  सर्विस अव्वल है। क्योकि देश में सरकारी हॉस्पीटल की तादाद 19817 है। वही प्राइवेट अस्पतालों की तादाद 80,671 है। यानी इलाज के लिये कैसे  समूचा देश ही प्राइवेट अस्पतालो पर टिका हुआ है। ये सिर्फ बड़े अस्पतालों की तादाद भर से ही नही समझा जा सकता बल्ति साढे छह लाख गांव वाले देश में  सरकारी प्राइमरी हेल्थ सेंटर और कम्युनिटी हेल्थ सेंटर की संख्या सिर्फ 29635 है। जबकि निजी हेल्थ सेंटरो की तादाद करीब दो लाख से ज्यादा है  । यानी जनता को इलाज चाहिये और सरकार इलाज देने की स्थिति में नहीं है। या कहें इलाज के लिये सरकार ने सबकुछ निजी हाथों में सौप दिया है।

क्योंकि सरकार देश के नागरिकों पर हेल्थ सेक्टर के लिये खर्च कितना करती है। ये भी देख कर शर्म ही आयेगी। क्योंकि सरकार प्रति महीने प्रति व्यक्ति पर 92 रुपये 33 पैसे खर्च करती है। और राज्यों में सबसे बेहतर स्थिति हिमाचल की है जहा प्रति नागरिक प्रति महीने 166 रुपये 66 पैसे प्रति व्यक्ति प्रति  महीने खर्च करता है। तो ये कल्पना के परे है कि देश में चुनी हुई सरकारें अपने नागरिकों के लिये कोई जिम्मेदारी लेने की स्थिति में भी है कि नहीं।  क्योंकि भारत सरकार के बजट से दुगने से ज्यादा तो प्राइवेट हेल्थ सेक्टर मुनाफा कमा लेता है। हालात है क्या ये इससे भी समझा जा सकता है कि 2009  में सरकारी का बजट था 16,543 करोड करोड और प्राइवेट हेल्थ केयर का बजट रहा 1,43,000 करोड रुपये। फिर 2015 में सरकारी बजट हुआ 33150 करोड तो प्रईवेट हेल्थ केयर का बजट हो गया 5,26,500 करोड़ । 2017 में सरकार का  बजट है 48,878 करोड तो प्राइवेट हेल्थ केयर बढ़कर हो गया 6,50,000 करोड़ रुपये। और जब सरकार को ही ये कहने में कोई शर्म नहीं आती कि देश में इलाज का ठेका तो पूरी तरह प्राइवेट अस्पतालों पर है और आंकड़े बताते हैं कि 70 फिसदी से ज्यादा हिन्दुस्तान इलाज के लिये प्राइवेट अस्पतालों पर टिका है। और ये सब किस तेजी से बडा है ये इससे भी समझा जा सकता है कि प्राइवेट  और सरकारी सेक्टर के तहत 17 बरस पहले यानी 2000 में हिस्सेदारी 50-50 फिसदी थी। और सन 2000 में हेल्थ पर सरकारी बजट 2474 करोड था। तो  प्राईवेट हेल्थ सेक्टर का बजट 50 हजार करोड का था। यानी आज जो देश के सरकारी हेल्थ सर्विस का बजट 48 हजार करोड का है 17 बरस पहले ही प्राइवेट क्षेत्र मुनाफे के लिये हैल्थ सर्विस में पैसा झोंक चुका था। तो ऐसे में  मौजूदा हालात को समझें। देश के 10 नामचीन हॉस्पीटल्स चेन का टर्नओवर करीब 50 हजार करोड़ के आसापस है। यानी देश के कुल स्वास्थ्य बजट से भी ज्यादा।  तो अगला सवाल यही है कि हेल्थ सर्विस को धंधा माना जाये या फेल हो चुकी सरकारो तले जनता की त्रासदी।

क्योंकि सरकार किस तरह के हेल्थ सर्विस को उपलब्ध कराती है। उसकी एक बानगी आईसीयू में पडे देश के किसी भी इलाके में किसी भी सरकारी अस्पतालो की देख लीजिये। कही अस्पताल में कुत्तों का झुंड तो कही स्टैचर तक नहीं। कही डॉक्टर के बदले प्यून ही टीका लगाते हुये। तो कही जमीन पर ही अस्पताल। कही पेड़ तले ही बच्चे को जनना। और सरकार की यही वह हेल्थ सेवा है जो हर उस शख्स को प्राइवेट अस्पतालों की तरफ ले जाती है,जिसकी जेब में जान बचाने के लिए थोड़ा भी पैसा है।और फिर शुरु होता है प्राइवेट अस्पतालों में मुनाफाखोरी का खेल क्योंकि फाइव स्टार सुविधाएं देते हुए अस्पताल सेवा भाव से कहीं आगे निकलकर लूट-खसोट  के खेल में शामिल हो चुके होते हैं,जहां डॉक्टरों को कारोबार का टारगेट दिया जाता है। छोटे अस्पतालों से मरीजों को खरीदा जाता है। यानी छोटे अस्पताल जो बडे अस्पातल के लिये रेफ्रर करते है वह भी मुनाफे का धंधा हो चुका है। फिर सस्ती दवाइयों को महंगे दाम में कई-कई बार बेचा जाता है। और जिन मरीजों का इंश्योरेंस है-उन्हें पूरा का पूरा सोखा जाता है। मुश्किल इतनी भर नहीं है कि जिीसकी जेब में पैसा है इलाज उसी के लिये है । मुश्किल तो ये भी है कि अब डाक्टरो को भी सरकारी सिस्टम पर भरोसा नहीं है। क्योंकि देश में 90 फिसदी डाक्टर प्राइवेट अस्पतालों में काम करते हैं।

इंडियन मेडिकल काउसिंल के मुताबिक देश में कुल 10,22,859 रजिस्टर्ड एलोपैथिक डाक्टर है । इनमें से सिर्फ 1,13,328 डाक्टर ही सरकारी अस्पतालों में हैं। तो फिर मरीजो को भी सरकारी अस्पतालो पर कितना भरोसा होगा। कौन भूल सकता है उड़ीसा के आदिवासी की उस तस्वीर को, जो कांधे पर पत्नी का शव लिये ही अस्पताल से निकल पड़ा। पर उस तस्वीर को याद कर विचलित होने से  पायदा नहीं क्योंकि सरकार के पास तो हेल्थ सर्विस के लिये अधन्नी भी नही। बीते 17 बरस में सरकारी हेल्थ बजट 2472 करोड से 48,878 करोड पहुंचा। इसी  दौर में प्राइवेट हेल्थ बजट 50 हजार करोड से साढ छह लाख करोड पहुंच गया ।यानी सरकारी सिस्टम बीमार कर दें और इलाज के लिये प्राईवेट अस्पताल  आपकी जेब के मुताबिक जिन्दा रखे। तो बिना शर्म के ये तो कहना ही पडेगा कि सरकार जिम्मेदारी मुक्त है और प्राईवेट हेल्थ सर्विस के लिये इलाज भी मुनाफा है और मौत भी मुनाफा है। क्योंकि दिल्ली के जिस मैक्स हास्पीटल का  लाइसेंस रद्द किया गया उस मैक्स ग्रुप का टर्न ओवर 17 हजार करोड पार कर चुका है। और सरकार के पास आम आदमी के सरकारी इलाज के लिये हर दिन का बजट सि 3 रुपये है।

बिगड़ी तबियत....चाय की चुस्की ....तो चाय की प्याली का तूफान थमे कैसे ?

Tue, 28/11/2017 - 21:28
हैलो....जी कहिये...सर तबियत बिगड़ी हुई है तो आज दफ्तर जाना हुआ नहीं...तो आ जाइये..साथ चाय पीयेंगे....सर मुश्किल है। गाड़ी चलाना संभव नही है। आपने सुना होगा...अभी से पांव के छाले न देखो/ अभी यारो सफर की इब्दिता है। वाह । अब ये ना पूछियेगा किसने लिखा। मैं मिजाज की बातकर रहा हूं। आपका गला बैठा हुआ है। मैं गाडी भेजता हूं आप आ जाइये। केसर के  साथ गरम मसालो से निर्मित चाय पीजियेगा..ठीक हो जायेंगे। ......और शीशे की केतली में गरम पानी ...उसमें चाय की पत्ती मिलाने के बाद हवा में यूं ही गरम मसाले की खूशबू फैल गई ।...और एक डिब्बी से केसर के चंद दाने..इसे कुछ देर घूलने दीजिये....क्या हो गया आपकी तबियत को। सर्दी-खासी..हल्का  सिर दर्द। शायद कुछ बुखार। आपको बिमारी नहीं बोरियत है। खबरो में कुछ बच नहीं रहा। एक ही तरीके की खबर। एक ही नायक। एक ही खलनायक। हा हा... नायक भी वहीं खलनायक भी वहीं। अब ये आप लोगों को सोचना है। आपका मीडिया तो बंट चुका है। वस्तु एक ही है..कोई इधर खड़ा है कोई उधर खड़ा है । कोई इधर से देख रहा है कोई उधर से। सही कह रहे हैं.. पहली बार मैंने देखा खबर के उपर खबर। मतलब ..जी कारंवा ने जस्टिस लोया पर जो रिपोर्ट  छापी। उसी रिपोर्ट को खारिज करते हुये इंडियन एक्सप्रेस ने रिपोर्ट छाप दी। ये तो आप लोगो को समझना चाहिये.....अरे चाय तो कप में डालिये । वाह क्या शानदार रंग है । पी कर देखिये ..तबियत कुछ ठीक होगी..हा अच्छा लग  रहा है । आप क्या कह रहे है क्यों समझना चाहिये । यही कि पत्रकारिता करनी है या साथ या विरोध करते हुये दिखना है। ये क्या तर्क हुआ। न न हालात को समझे....कानून मंत्री कहते हैं चीफ जस्टिस को समझना चाहिये कि पीएम को  जनता ने चुना है। और पीएम के निर्णय के विरोध का मतलब पीएम पर भरोसा नहीं करना है।

अब आप ही सोचिये। तब तो कल संपादक या कोई मीडिया हाउस पीएम के खिलाफ कुछ लिख देगा तो कहा जायेगा पीएम पर फला मीडिया को भरोसा ही नहीं है। याद कीजिये कांग्रेस क्या कहती थी। जब घोटाले हो रहे थे।  तो सवाल करने पर जवाब मिलता था हमें पांच साल के लिये जनता ने चुना है। यानी पांच साल तक तानाशाही चलेगी ...अब शब्द बदल गये हैं। अब कहा जा रहा है कि पीएम पर भरोसा नहीं है । तब तो लोकतंत्र ही गायब हो जायेगा । यानी  चैक एंड बैलेस डगमगा रहा है । सवाल डगमगाने का नहीं । सवाल लोकतंत्र की परिभाषा ही बदलने का है । ऐसे में तो कल चीफ जस्टिस हो या आपके मीडिया का  संपादक उसके लिये भी देश में चुनाव करा लें। और जब जनता उसे चुन लें तो उसे मान्यता दें। मै भी यही सवाल लगातार उठाता हूं कि देश में इंस्टिट्यूशन खत्म किये जा रहे है । सिर्फ खत्म ही नहीं किये जा रहे हैं  बल्कि राजनीतिक सत्ता को संविधान से ज्यादा ताकतवर बनाने की कोशिश हो रही है। पर ये हमारे देश में संभव है नहीं ...बडा मजबूत लोकतंत्र है। जनता देख समझ लेती है । हां, इंदिरा का भ्रम भी तो जनता ने ही तोड़ा। आपने फ्रंटलाइन की गुजरात रिपोर्ट देखी। नहीं। सर उसमें गुजरात को वाटर-लू लिखा गया है। क्या वाकई ये संभव है । देखिये ...संभव तो सबकुछ है ।

पर दो तीन बातों को समझें। गुजरात अब 2002 वाला गोधरा नहीं है। ये 2017 है जब गोधरा नहीं गोधरा से निकले व्यक्ति पर जनमत होना है। गोधरा से निकले व्यक्ति यानी। यानी क्या वाजपेयी जी ने यू ही राजधर्म का जिक्र नहीं किया था। और गोधरा की क्रिया की प्रतिक्रिया का जिक्र भी यूं ही नहीं हुआ  था। आप याद किजिये क्या कभी किसी भी राज्य में ऐसा हुआ । तो अतीत के हर सवाल तो हर जहन में होंगे ही। फिर आप ही तो लगातार प्रवीण तोगडिया को दिखा रहे हैं, जो राम मंदिर या हिन्दुत्व के बोल भूलकर किसानों के संकट और नौजवानों के रोजगार के सवाल उठा रहा है। यानी दिल्ली से याहे अयोध्या नजदीक हो पर समझना तो होगा ही कि आखिर जिस राम मंदिर के लिये विहिप को बनाया गया आज उसी का नायक मंदिर के बदले गुजरात के बिगड़े हालात को क्यों उठा रहा है। पता नहीं आप जानते भी है या नहीं तोगडिया तो उस झोपडपट्टी से निकला है जहां रहते हुये आज कोई सोच भी नहीं सकता कि वह डाक्टर बनेगा। तो छात्र तोगडिया के वक्त का गुजरात और विहिप के अध्यक्ष पद पर रहने वाले  तोगडिया के गुजरात में इतना अंतर आ गया है कि अब झोप़डपट्टी से कोई डाक्टर बन ही नहीं सकता। क्योंकि शिक्षा महंगी हो गई । माफिया के हाथ में आ गई।  तो तोगडिया कौन सी लड़ाई लड़ें। 90 के दशक में गुजरात के किसान और युवा स्वयंसेवक बनकर कारसेवा करने अयोध्या पहुंचे थे। लेकिन गर आप आज कहें तो  गुजरात से कोई कारसेवक बन नहीं निकलेगा। किसानों का भी तो यही हाल है। कीमत मिलती नहीं। मैंने कई रिपोर्ट दिखायीं। पर आपने इस अंतर को नहीं पकडा कि गुजरात का किसान देश के किसानो से अलग क्यों था और अब गुजरात का  किसान देश के किसानो की तरह ही क्यों हो चला है। यही तो लूट है । किसानी खत्म करेंगे । खेती की जमीन पर कब्जा करेंगे । बाजार महंगा होते चले
जायेगा। तो फिर योजना में लूट होगी। सरकारी नीतियों को बनाने और एलान कर प्रचार करने में ही सरकारे लगी रहेंगी। यही तो हो रहा है ।

हो तो यही रहा है...और शायद दिल्ली इस सच को समझ नहीं रही । खूब समझ रही है । अभी पिछले दिनो दिल्ली में किसान जुटे । उसमें शामिल होने अहमदाबाद से संघ  परिवार के लालजी पटेल आये। उनके साथ दो और लोग थे । लालजी पटेल वह शख्स है जिन्होंने गुजरात में किसान संघ को बनाया। खड़ा किया। आज वही सरकार  की नीतियों के विरोध में गुजरात के जिले-जिले घूम रहे हैं। उनके साथ जो शख्स दिल्ली आये थे । उनके पिताजी गुरु जी के वक्त यानी गोलवरकर के दौर  में सबसे महत्वपूर्ण स्वयंसेवक हुआ करते थे । तो क्या से माने कि संघ परिवार का भी भ्रम टूट गया है । सवाल भ्रम का नहीं विकल्प का है । और मौजूदा वक्त में विकल्प की जगह विरोध ले रहा है जो ठीक नही है । क्यों ?  क्योकि सभी तो अपने ही है । अब भारतीय मजदूर संघ में गुस्सा है । उसके सदस्य गुजरात भर में फैले हैं। वह क्या कर रहे है ये आप पता कीजिये।  देखिये हमारी मुश्किल यह नहीं है कि चुनाव जीतेंगे या हारेंगे। ये आपके लिये बडा खबर होगी। 18 दिसंबर को। आप तमाम विश्लेषण करेंगे। पर जरा सोचिये वाजपेयी जी चाहते तो क्या तेरह दिन की सरकार बच नहीं जाती। दरअसल वाजपेयी और कांग्रेस के बीच इतनी मोटी लकीर थी कि कांग्रेसियों को भी वाजपेयी का मुरीद होना पड़ा। वह आज भी है। पर मोटी लकीर तो आज भी कांग्रेस और मोदी के बीच में है। सही कह रहे है पर कांग्रेसी वाजपेयी के  लिये कांग्रेस छोड़ सकते थे। कांग्रेसी मोदी के लिये कांग्रेस नहीं छोड़ सकते । क्यों नारायण राणे ने छोड़ी। उत्ताराखंड में कांग्रेसियों ने बीजेपी के साथ  गये। अब आप हल्की बात कर रहे हैं। मेरा कहना है सत्ता के लिये कोई पार्टी छोड़े तो फिर वह कांग्रेसी या बीजेपी का नहीं होता। स्वयंसेवक यूं  ही स्वयंसेवक नहीं होता। ..एक कप गर्म पानी मंगा लें। चाय खत्म हो गई है । हा हां क्यों नहीं इसी पत्ती में गर्म पानी डालने से चाय बन जायेगी ।
आप एक काम किजिये थोडी सी चाय ले जाइये ... रात में पीजियेगा ..गले को राहत मिलेगी । तो केतली में गर्म पानी डलते ही घुआं उठने लगा और पानी का रंग भी चाय के रंग में रंगने लगा । ..आप क्या यही चाय पीते है । हमेशा नहीं । आप आ गये तो फिर ग्रीन टी या यही गांव की चाय । जब दूध के साथ चाय  वाले आते है तो उनके साथ उन्ही के मिजाज के अनुसार ।

सर आप स्वयंसेवकों का सवाल उठा रहे थे। हां .स्वयसेवक से मेरा मतलब है उसे फर्क नहीं पडता कि  कौन सत्ता में है और कौन सत्ता के लिये मचल रहा है । क्योंकि हम तो कांग्रेसी कल्चर से हटकर राजनीति देखने वाले लोग हैं। पर अब तो स्वयंसेवक की सत्ता कांग्रेस की भी बाप है। हा हा क्या बात है । ना ना आप समझे जरा  । वाजपेयी अगर पांच बरस और रह जाते तो लोग काग्रेस को भूल जाते । पर यही तो साढे तीन बरस में ही कांग्रेस की याद सताने लगी है। अरे भाई नारा देने से कांग्रेस मुक्त भारत नहीं होगा। काम से होगा। और गुजरात में ही देख लीजिये। कौन कौन काग्रेस के साथ खडा है। जो कांग्रेस का कभी था ही नहीं । पाटीदार तो चिमनभाई पटेल के बाद ही कांग्रेस का साथ छोड़ चुका था । और अब फिर से वह काग्रेस की गोद में जा रहा है। ठीक कह रहे है ...मैंने पढ़ा कि चिमनभाई देश के पहले सीएम थे जिन्होने गौ हत्या पर प्रतिबंध लगवाया।  हिन्दु-जैन के त्यौहारो में मीट पर प्रतिंबध लगाया। तो इससे क्या समझे आप। यही कि बीजेपी जिस हिन्दुत्व को उग्र अंदाज में रखती है उसे ही खामोशी से चिमनबाई ने अपनाया । नहीं , दरअसल , संघ का प्रभाव समाज में इतना था कि काग्रेस भी संघ की बातो पर गौर करती । और अब मुश्किल ये है कि संघ की बातो को आप भी एंजेडा कहते है और बीजेपी की तरह काग्रेस भी संघ को किसी राजनीतिक दल की तरह निशाने पर लेने से नहीं चुकती ।

तो क्या मान लें कि संघ का विस्तार थम गया । सवाल संघ परिवार का इसलिये नहीं है क्योकि प्रतिबद्द स्वयसेवक तो प्रतिबद्द ही रहेगा । मुश्किल ये है कि संघ के कामकाज का असर सत्ता के असर के सामने फीका हो चुका है । और एक तरह ही काम ना करने वाले हालात से स्वयसेवक भी गुजर रहा है क्योकि सत्ता ने खुद को राजनीतिक शुद्दीकरण से लेकर सामाजिक विस्तार तक मान लिया है । तो अच्छा ही है स्वयंसेवक पीएम, पीएम होकर भी स्वयंसेवक है। हा हा ठीक कहा आपने । ये बात कभी बुजुर्ग स्वयंसेवको से पूछिये...उनके साथ चाय पीजिये.....जरुर । और गाड़ी ने हमे घर छोड दिया ..अब यही समझिये कि चाय की प्याली के इस तूफान का इंतजार कौन कैसे कर रहा है।

चाय के प्याले से कहीं ज्यादा तूफान है चाय के साथ बात में

Sun, 26/11/2017 - 20:59
चाय की केतली से निकलता धुआं...और अचानक जवाब हमारी तो हालत ठीक नहीं है । क्यों इसमें आपकी हालत कहां से आ गई । अरे भाई पार्टी तो हमारी ही है। और जब उसकी हालत ठीक नहीं तो हमारी भी ठीक नहीं । यही तो कहेंगे । ठीक नहीं से मतलब । मतलब आप खुद समझ लीजिये । क्यों गली गली..बूथ बूथ ... घूम रहे हैं । हां जब कोई दरवाजे दरवाजे घूमने लगे तो समझ लीजिये। ये हालत यूपी में तो नहीं थी। नहीं पर गुजरात की गलियां तो उन्होंने ही देखी हैं । बाकी तो पहली बार गलियां देख रहे हैं। सही कहा आपने गुजरात की गलियां सिर्फ उन्होंने ने देखी हैं। बाकियों को कभी देखने दी ही नहीं गई। अब जब हालात बदल रहे हैं तो गली गली घूम रहे हैं । वर्ना ये घूमते ...फिर भी कितनी सीट मिलेंगी। सर्वे में तो 80 पार करना मुश्किल लग रहा है । सर्वे ना देखें मैनेज हो जायेगा । मैनेज हो जाये तो ठीक। क्यों ईवीएम ??? न न आप ईवीएम की गडबडी की बात मत करीये । ईवीएम में कोई गडबडी नहीं है ।

हमने तो 1972 का दौर भी देखा है जब इंदिरा गांधी जीत गई तो बलराज मघोक और सुब्रमण्यम स्वामी थे। उन्होंने कहा गडबडी बैलेट पेपर में थी। मास्को से बैलेट पेपर बन कर आये हैं। जिसमें ठप्पा कही भी लगाईये पर आखिर में दो बैलो की जोडी पर ही ठप्पा दिखायी देता है। ये सब बकवास तब भी था। अब भी है। तो अगर मैनेज हो ना पाया । तब क्या होगा । तब...संविधान कुछ और  तोड़-मरोड़ दिया जायेगा । आप देख नहीं रहे है संसद का शीत कालीन सत्र टालना । और टालते हुये एहसास कराना कि " हम कुछ भी कर सकते है " । ये खतरनाक है । लेकिन हमें लगता है गुजरात हार गये तो डर जायेंगे । कुछ लोकतांत्रिक मूल्यो की बात होगी। अरे..तो डर में ही तो सबकुछ होता है । डर ना होता तो गुजरात देश से बड़ा ना होता । लेकिन कोई है भी नहीं जो कहें कि गलत हो रहा है । ठीक कह रहे है ...मूछें एंठते रहिये ..हम कैबिनेट मंत्री है । सारी ठकुराई निकल गई । पर गुजरात के बाद हो सकता है कोई निकले ...अरे तब  निकलने से क्या होगा । याद कीजिये निकले तो जगजीवन राम भी थे । पर कब...और हुआ क्या । बहुगुणा को ही याद कर लीजिये । निकलने के लिये नैतिक
बल चाहिये । गाना सुना है ना आपने... "  सब कुछ लुटाकर होश में आये तो क्या मिला  " । तो पार्टी तो आपकी है ....फिर आप क्यों नहीं । देखिये अभी अपने अपने स्वार्थ के आसरे एकजूटता है । तो स्वार्थ हित कहता है विरोध मत करो । तो फिर हर कोई वैसे ही टिका है । और ये पार्टी दफ्तर नहीं रोजगार दफ्तर है । जो कार्यकत्ता बन गया उसे कुछ चाहिये । और कुछ चाहिये तो कुछ  का गुणगाण करने भी आना चाहिये । तो चल रहा है । पर ये कब तक चलेगा । जबतक जनता को लगेगा । और जनता को कब तक लगेगा । जब तक उसे भूख नहीं लगेगी। भूख नहीं लगेगी का क्या मतलब हुआ। देखिये आज आपका पेट भी आजाद नहीं है ।  दिमाग तो दूर की बात है । आप खुद को ही परख लिजिये ...और बताइये..मीडिया का क्या हाल है..सभी के अपने इंटरेस्ट हैं। तो झटके में संपादक कहां चला गया । इंदिरा के दौर में तो संपादक थे।  इमरेजेन्सी लगी तो
विरोध हुआ ।

अब देखिये वसुंधरा राज की नीतियों का विरोध करते हुये एक अखबार संपादकीय खाली छोड देता है तो आपके मन में ये सवाल नहीं आता जिस देश में सरकार ने आपकी जिन्दगी को कैशलैस कर अपनी मुठ्ठी में सबकुछ समेटने की कोशिश की है उसके खिलाफ क्यों नहीं कोई अखबार संपादकीय खाली  क्यो नहीं छोडता है। देखिये लोकतंत्र का स्वांग आप भी कर रहे हैं। और लोकतंत्र के इस स्वांग को जनता भी देख रही है । अगर लोकतंत्र के चारो पाये ही बताने लगे कि लोकतंत्र का मतलब वंदे मातरम् कहने में है तो जनता  क्या करेगी । उसकी लड़ाई तो भूख से है । रोजगार से है। हर कोई स्वांग कैसे कर रहा है आप खुद ही देख लिजिये...एक ने कहा गंगा में हाइट्रो पावर पोजेक्ट बनायेगे। दूसरा बोला गंगा में बडी बस चलायेगें । तीसरा बोला शुद्द करेंगे ....अविरल कौन करेगा कौई नहीं जानता । और हालात इतने बुरे हो चले है कि दुनिया के रिसर्च स्कालर गंगा पर शोध कर समूचा खाका रख दे रहे है । अरे उन्हें ही पढ लो । आप भी पढिए ..आक्सफोर्ड पब्लिकेशन से एक किताब आई है ..गंगा फॉर लाइफ ..गंगा फॉर डेथ । सबकुछ तो उसने लिख दिया । और जि गंगा पर देश की 41 फिसदी आबादी निर्भर है । उस गंगा को लेकर भी आप मजाक ही कर रहे है । अरे...चाय तो पिजिये । ग्रीन टी है । इसमें केसर मिलाकर पिया किजिये इस मौसम में तबियत बिगडेगी नहीं । जी..अच्छी है  चाय...हा हा इसमें शहद भी मिलाया कीजिये । गला साफ रहेगा...हां मेरी तो तबियत बिगडी हुई है । गला भी जाम है । पाल्यूशन दिल्ली में खासा बढा हुआ है । अब आप भी पल्यूशन के चक्कर मे ना रहिये ...दिल्ली कोई आज से पोल्यूटेड है ..याद कीजिये 70-80 के दशक से ही दिल्ली में राजस्थान से
रेगिस्तानी हवा उड़ कर आती थी । पूरा रिज का इलाका ...वहा भी सिर्फ धूल ही धूल.हम काली आंधी कहते थे ...घर के दरवाजे...खिड़की बंद करनी पडती थी । और ये गर्मी के वक्ततीन महीने मई से जुलाई के दौर में रहता था । तब पोल्यूशन नहीं रहता थाा क्या .....प्रदूषण पूरे देश में है । पर प्रदूषण से बचने के उपाय का बाजार दिल्ली में है । तो डर के इस बाजार को हर जगह पैदा किया  जा रहा है । देखिये जब कोई काम नहीं होता है तो ऐसा ही होता है ....दिल्ली-मुबई के जरीये बताया गया...इज आफ बिजनेस....अरे भाई मौका मिले तो एक बार विदेश मंत्रालय की आफिसियल साइट को ही देख लिजिये..अगर देश में  धंधा करना इतना शानदार है तो फिर बीते दो-तीन बरस में सबसे ज्यादा बारतीय देश छोडकर चले क्यो गये....लगातार जा रहे है ।

आपको आंकडे मिल जायेंगे.कैसे कब दो करोड से चार करोड भारतीय विदेश में बसने की स्थिति में आ गये....द इक्नामिक इंपोर्टेस आफ हंटिंग पढ़ें...आप बार बार किताबों का रेफरन्स देते है । तो क्या मौजूदा वक्त में कोई पढता नहीं ..पढ़ता होगा..पर आप जरा सोचिये जर्मनी की काउंसलर से लेकर हर कोई भारतीय प्रमुखों के सामने बैठे है...और अचनक एक नौकरशाह बताने लगे कैसे खास है हमारे वाले....बहुत बोलते नहीं ...पर बडे बडे काम खामोशी से करते है ....यानी राग दरबारी दुनिया के बाजार में भी...तो प्रभावित हर किसी को होना ही चाहिये...हो भी रहे है ...पहली बार हर कोई देख रहा है ...इस लहजे में भी  बात होती है । आप जरा रुस के राष्ठ्रपति पुतिन को ही देख लें । कैसे आज की तारिख में वह कितने ताकतवर है । और कैसे हो गये । रुस तो खुलापन खोजते खोजते ढह गया..औ पुतिन के ही सारे सगे संबंधी हर बडी कंपनी के सर्वोसर्वा है ...अब गैस की पाइपलाइन को थोडा सा ही ऐंठ दिया तो जर्मानी तक पर संकट आ जायेगा....हर हम तो इनर्जी से लेकर रोजगार तक को लेकर ड्राफ्ट तैयार किया । देश की आठ प्राथमिकता क्या होनी चाहिये इसे बताया। 2014 कै मैनीपेस्टो को ही पलट कर आप देख लिजिये...देखिये बौद्दिकता एक जगह....सत्ता हांकना एक जगह । दिल्ली से सटा इलाका है मनेसर । वहा पर  दिमाग का रिसर्च सेंटर है । पर जरा किसी से पूछिये दिमाग और माईंड में अंतर क्या है ..कौन बतायेगा । दरअसल ब्रेन इज द साउंड बाक्स आफ माइंड । या आप कहे ब्रेन कंप्यूटर है । पर माइंड साफ्टवेयर है । पर यहा तो बात हार्ड वर्क की हो रही है...कौन ज्यादा से ज्यादा दौडता नजर आ रहा है

......बाते चलती रही .चाय की और प्याली भी आ गई...पर ये बात किससे हो रही है,,कहा हो रही है । हमारे ख्याल से ये बताने की जरुरत नहीं होनी चाहिये..सिर्फ समझ लेना चाहिये हवा का रुख है कैसा..तो आप सोचिये कौन है ये शख्स ।

बदलती सियासी बिसात में संघ परिवार की भी मुश्किलें बढ़ी हैं

Wed, 22/11/2017 - 00:12
प्रधानमंत्री मोदी के सामने जिस दौर में राजनीतिक चुनौती लेकर राहुल गांधी आ रहे हैं, उस दौर का सच अनूठा है क्योंकि संघ के प्रचारक से पीएम बने मोदी के ही दौर में संघ परिवार का एंजेडा बिखरा हुआ है। संघ से जुड़े पहचान वाले स्वयंसेवक अलग थलग है। वहीं इंदिरा गांधी की तर्ज पर मोदी चल कर सफल हो रहे हैं। पर राहुल गांधी का कॉपी पेस्ट सफल हो नहीं पा रहा है। तो नेहरु गांधी की विरासत ढोती कांग्रेस को ही अब चुनावी लाभ नेहरु गांधी के नाम पर उतना मिल नहीं पा रहा है। तो कांग्रेस सिमट रही है। और मोदी के दौर में बीजेपी ने जिस विस्तार को पाया है, उसमें संघ के जरीये  चुनावी लाभ बीजेपी को कबतक मिलेगा ये सवाल सबसे बडी चुनौती के दौर पर 2019 में नजर भी आयेगा। क्योंकि तब संघ की मजबूरी नीतियों पर नहीं सियासी तिकड़मों पर चलने की होगी। क्योंकि संघ से जुडे लोगों की कतार जरा देखिये आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, गोविन्दाचार्य, प्रवीण तोगडिया, संजय जोशी  ऐसे नेता रहे हैं, जिनकी अपनी पहचान है पर मौजूदा वक्त ने इन्हें हाशिये पर ढकेल दिया है। इनकी खामोशी कांग्रेस का संघीकरण कर रही है। यानी मनमोहन सिंह की आर्थिक नीतियों को मोदी सरकार ने अपनाया।

और कांग्रेस मोदी सरकार की नीतियो में मीन-मेख पुराने स्वयंसेवकों की खामोशी से निकाल रही है। जबकि इसी दौर में कांग्रेस से कही ज्यादा तीखे तरीके से संघ के ही संगठन या पहचान पाये स्वयंसेवक उठा रहे हैं। मसलन भारतीय मजदूर संघ और स्वदेशी जागरण मंच ने मोदी सरकार की आर्थिक नीतियों के विरोध का दिन वही चुना जब मोदी सरकार को सबसे बडी राहत मूडीज ने दी थी। विहिप ना सिर्फ उसी दिन  खामोश रही जिस दिन श्री श्री राम मंदिर का रास्ता तलाशने अयोध्या पहुंचे । बल्कि सुब्रमण्यम स्वामी से लेकर यूपी के मुखिया योगी की राममंदिर पर हर पहल के बावजूद राम मंदिर आंदोलन से निकले प्रवीण तोगडिया ने बेरोजगारी और  किसान का मुद्दा उठाकर आर्थिक नीतियों पर ही चोट की। और इसी के समानांतर गुजरात में किसान संघ की नींव जालने वाले लालजी पटेल भी आर्थिक नीतियों को ही लेकर बीजेपी के खिलाफ चुनाव में मुखर हो गये। और इस कतार में ये भी पहला मौका है कि यशंवत सिन्हा गुजरात में ही बीजेपी के पूर्व सीएम सुरेश मेहता के बुलावे पर घूम घूम कर मोदी सरकार की बिगड़ी आर्थिक नीतियों का हाल बता रहे हैं। और संघ -बीजेपी की यही वह सारी कतार है, जिससे कांग्रेस में आक्सीजन आ रहा है। तो सवाल दो है। पहला, क्या संघ परिवार का बीजेपीकरण  हो रहा है और बीजेपी का कांग्रेसीकरण। दूसरा, क्या राहुल गांधी के दौर में स्वतंत्रता संग्राम से निकली कांग्रेस की उम्र खत्म हो चुकी है। यानी पारंपरिक चुनावी चुनौतियों का दौर खत्म हुआ और अब राहुल ही नहीं बल्कि  संघ परिवार और बीजेपी के सामने भी नयी चुनौतियां हैं। इसीलिये इस दौर ने बीजेपी और कांग्रेस दोनों को ही शार्टकट का रास्ता सिखला दिया है।

जाति को ना मानने वाली बीजेपी के सोशल इंजीनियरिंग से लेकर किसी भी पार्टी के दागी तक को जीत के लिये साथ लेने में बीजेपी को हिचकिचाहाट नहीं है तो कांग्रेस गठबंठन बगैर सत्ता मिल नहीं सकती ये मान चुकी है । और गुजरात में ही जिस तरह हार्दिक-जिग्नेश,राठौर के इशारे पर चल निकली है। उसमें नेहरु गांधी की विरासत का लाभ पाने की सोच खत्म हुई ये मान चुकी है। क्योंकि गुजरात में कांग्रेस के लिये दो सवाल सबसे बड़े हो चुके हैं। पहला, गुजरात  में धर्म की लकीर पर जाति की लकीर हावी होगी या नहीं। दूसरा , एससी,ओबीसी, पाटीदार गुटों के आसरे कांग्रेस जीत पायेगी या नहीं। यानी गुजरात में बीजेपी की धर्म से मोटी लकीर जाति के आधार पर खींचने के लिये कांग्रेस तैयार है। तो क्या अंतर सिर्फ लकीरो का है। और यही वह हालात  है जो बतलाते है कि राहुल के साथ बीजेपी की कमजोरी साधने वाली कोई टीम नहीं है। फिर हार्दिक-जिग्नेश-राठौर के अंतर्विरोध की आग से जुझने की क्षमता भी राहुल में है। यानी कांग्रेस की कमजोर विकेट पर बैटिंग करते करते क्या बीजेपी का कांग्रेसीकरण वाकई हो चुका है। क्योंकि कांग्रेस ने नेहरु गांधी का नाम हमेशा लिया। और बीजेपी हेडगेवार-गोलवलकर को ज्यादा  मुखर होकर बहुमत के साथ सत्ता में रहते हुये भी उठा रही है। ऐसे में पहली बार परीक्षा और चुनौती संघ परिवार के सामने भी है क्योंकि पहली बार संघ परिवार की छाया में सत्ता नहीं है बल्कि मोदी सरकार की छाया में संघ  परिवार है। फिर संघ ने अपने एंजेडे को सत्तानुकूल मुलायम बनाया है। मोदी चुनावी राजनीति को साधने में प्रैक्टिकल ज्यादा हो गये तो योगी प्रतीकात्मक ज्यादा है।

यानी चाहे अनचाहे पहली बार 2019 के लिये बिछती गुजरात की चुनावी बिसात उन आर्थिक हालातों को हवा दे रही है, जिसे हर बार हर पार्टी ने हाशिये पर ढकेला है। यानी संघ परिवार का सामाजिक शुद्दीकरण बेमानी हो रहा है। कांग्रेस का नेहरु-गांधी विरासत को ढोना मायने नहीं रख रहा है। बीजेपी का संघ परिवार के संगठनात्मक विस्तार से अपनी जीत की उम्मीद पालने के दिन लद रहे है। यानी चाहे अनचाहे ये सवाल धीरे धीरे संघ परिवार के लिये बडा होता जा रहा है कि जो स्वयंसेवक स्वयंसेवक रह गया वह तो संघ के एजेंडे पर खामोश रहेगा नहीं। और जो स्वयंसेवक संघ का एजेंडा छोड़ सत्ता के लिये खामोश है, वह स्वयंसेवक सियासी रंग में रंगा जा चुका है। तो मोदी की हर जीत हार तले बार बार संघ की जीत हार भी देखी जायेगी। जो शायद जीत तक तो ठीक है पर हार के बाद के हालात में बीजेपी से कही ज्यादा संघ को सामाजिक तौर पर खडा करने की मुश्किल ना आ जाये। सवाल तो ये उन्हीं कद्दावर नेताओं तले उठेगा तो फिलहाल हाशिये पर हैं।

बच्चों के लिये कौन सा भारत गढ़ रहे हैं हम ?

Wed, 15/11/2017 - 00:07
दूसरी में पढ़ने वाले प्रघुम्न की हत्या 11वीं के छात्र ने कर दी। और हत्या भी स्कूल में ही हुई। प्रद्युम्न पढ़ने में तेज था। हत्या का आरोपी 11वीं का छात्र पढ़ने में कमजोर था। परीक्षा से डरता था। यानी हत्या की वजह भी वजह भी स्कूल में परीक्षा का दवाब ही बन गया। तो कौन सी शिक्षा स्कूल दे रहे हैं। और कौन सा वातावरण हम बच्चों को दे पा रहे हैं। ये दोनों सवाल डराने वाले हैं। पर सरकारी गीत है स्कूल चले हम..इस गीत के आसरे 99 फीसदी बच्चों का इनरॉलमेंट स्कूल में हो तो गया। क्योंकि सर्वशिक्षा अभियान देश में चला। 27 हजार करोड़ का बजट बनाया गया। पर सरकारी सच यही है कि दसवीं तक पढ़ते पढ़ते देश के 47.4 फीसदी बच्चे पढ़ाई छोड़ देते हैं।  इनमें 19.8 फीसदी पांचवीं तक में तो 36.8 फीसदी आठवीं तक पढाई पूरी नहीं कर पाते और बच्चों के लिये पढाई के इस वातावरण का अनूठा सच यही है कि एक तरफ बिना इन्फ्रास्ट्रक्चर सरकारी स्कूलो में 11 करोड़ बच्चे जाते हैं। तो मोटी फीस देकर 7 करोड बच्चे निजी स्कूल जाते हैं।

सरकार का शिक्षा बजट 46,356 करोड़ है। निजी स्कूलो का बजट 8 लाख करोड़ का है। यानी जिस समाज को शिक्षा के आसरे अपने पैरो पर खड़े होना है उसके भीतर का सच यही है कि बच्चे देश का भविष्य नहीं होते बल्कि बच्चे वर्तमान में कमाई का जरिया  होते हैं। और मुनाफे के लिये भागते दौटते देश में बच्चे कैसे या तो पीछे छूट जाते हैं या फिर बच्चो को पढाने के लिये मां बाप बच्चों से देश ही छुड़वा देते हैं। जरा ये भी समझ लें। क्योंकि अनूठा सच है ये कि देश के 5 लाख 53 हजार बच्चे इस बरस देश छोड कर विदेशों में पढने चले गये। और उनके मां बाप इन बच्चो की पढाई के लिये 1 लाख 20 हजार करोड सिर्फ फीस देते हैं। जबकि देश में उच्च शिक्षा के नाम पर मौजूदा वक्त में 3 करोड 42 लाख 11 हजार बच्चे पढ़ाई कर रहे हैं। और उनके लिये सरकार का कुल बजट है 33 हजार 329 करोड है। यानी सरकार उच्च सिक्षा के लिये एक बच्चे पर 974 रुपये सालाना खर्च करती है। पर विदेश जाकर पढने वाले एक बच्चे पर औसतन 2,16,958 रुपये सालाना खर्च मां बाप का जेब से होता है। तो देश का भविष्य  कैसे गढ़ा जा रहा है। या फिर किस तरीके से देश के भविष्य की पौध को हम कैसे तैयार कर रहे हैं, उसके भीतर झांककर क्या कोई देखना चाहता है या फिर  सत्ता को भी विदेश लुभाने लगा है। क्योंकि फिलिपिन्स में प्रधानमंत्री मोदी वहां रह रहे नागरिकों से रुबरु हुये तो देश के मुनाफे का ही जिक्र किया। मसलन "  यूपीए में जिक्र होता था कितना गया। अब जिक्र होता है  कितना आया।"

यानी चाहे अनचाहे समूचा समाज ही मुनाफा पाने और कमाने की होड़ में है तो फिर जो बच्चे देश छोडकर विदेश जा रहे है वह भारत लौटेंगे क्यों। और एनआरआई होकर भारत की तरफ देखने का मतलब होगा क्या । क्योंकि आज की तारीख में 1,78,35,419 भारतीय दुनिया के अलग अलग हिस्सो में हैं। 1,30,08,407 एनआरआई हैं। यानी कुल 3 करोड से ज्यादा भारतीय देश छोड चुके हैं। तो फिर कौन सा देश हम तैयार कर रहे हैं। और बीते 5 बरस का अनूठा सच  ये भी है कि 90 फीसदी अप्रवासी भारतीय वापस लौटते नहीं हैं। तो क्या पढ़े लिखों के लिये या पैसे वालो के लिये देशप्रेम का पाठ देश छोडकर विदेश चले  जाना है । तो क्या देश वाकई बच्चों के लायक बच नहीं रहा । ये सवाल जहन में आना तो चाहिये । क्योंकि शिक्षा भी तो तभी होगी जब जिन्दा रहेगें । कह  सकते है सवा सौ करोड़ के देश में अगर लाखों बच्चों की मौत हो भी जाती है तो क्या हुआ। लाखों बच्चे फिर पैदा हो जायेंगे। यकीन जानिये यही हो रहा है । क्योंकि हर बरस देश में जन्मते ही 7लाख 30 हजार बच्चों की मौत हो जाती है । 10 लाख 50 हजार बच्चे एक बरस भी जी नहीं पाते और सिर्फ प्रदूषण से हर बरस औसतन 2 लाख 91 हजार 288 बच्चों की मौत हो जाती है । तो दोष कहा कहा किस किस को दिया जाये। मसलन दिल्ली में प्रदूषण कम नही हुआ बल्कि दिल्ली वाले अभ्यस्त हो गये। सरकार हांफने लगी। अदालतें बेजुबा हो गई एनजीटी की कोई सुनता नहीं। प्रदूषण और दो जून की रोटी आपस में ऐसी टकरायी कि  जहरीली धुंध का असर कम नहीं हुआ अलबत्ता पढ़ाई का बोझ जान की कीमत पर भारी पड गया । और अब बच्चे स्कूल जा रहे हैं, और मां-बाप उन्हें स्कूल  भेज रहे हैं।यानी बच्चों को भले सांस लेने में परेशानी हो रही है-आँखों से पानी आ रहा है लेकिन स्कूल खोल दिए गए हैं तो बच्चों के लिए जाना जरुरी है। तो  आज बाल दिवस पर कोई तो ये सवाल पूछ ही सकता है  । संविधान  में दिए जीने के अधिकार का सवाल क्या बच्चों पर लागू नहीं होता । क्योंकि दिल्ली की हवा  में 50 सिगरेट का धुआ है ।

यानी दिल्ली के बच्चे हर दिन 50 सिगरेट पी रहे है । सिगरेट के पैकेट पर लिखा है जानलेवा है . बर दिल्ली की हवा जानलेवा है ये कोई खुल कर क्यो नहीं कहता । वैसे,सवाल सिर्फ दिल्ली-एनसीआर का नहीं है। पूरे देश का है। आलम ये कि पर्यावरण इंडेक्स में भारत 178 देशों में 155वां स्थान पर हैं। तो फिक्र किसे है बच्चों की । या कहे जिन्दगी की । क्योकि आजादी के वक्त चाहे सुनहरे भविष्य  के सपने संजोये गये । पर आजादी के 70 बरस बाद का अनूठा सच यही है । देश के सभी बच्चो को स्कूल-स्वास्थय और पीने का साफ पानी देने में भी हम सक्षम हो नहीं पाये है । और असर इसी का है कि 14 बरस की उम्र तक पहुंचते पहुंचते  4,31,560 बच्चो की मौत हर बरस होती है । देश की राजधानी में एक तरफ प्रदूषण के बीच बच्चो को स्कूल भेजने के लिये मां बाप मजबूर है तो दूसरी तरफ दिल्ली में 13 लाख बच्चे स्कूल जाते ही नहीं है ।17 लाख बच्चे बिना इजाजत चल रहे स्कूलों में जाते हैं। यानी जब दिल्ली में ही 75 लाख बच्चो में से 30 लाख बच्चे क्या पढ़ रहे हैं। या क्यों पढ नहीं रहे हैं जब इससे ही ससंद सरकार बेफिक्र है तो फिर कौन सी दिल्ली कौन से देश को रच रही है ये भी सवाल ही है।

किसे फिक्र है दिल्ली की हवा में घुले जहर की

Fri, 10/11/2017 - 10:25
2675 करोड 42 लाख रुपये । तो ये देश का पर्यावरण बजट है । जी पर्यावरण मंत्रालय का बजट।  यानी जिस देश में प्रदूषण की वजह से हर मिनट 5 यानी हर बरस 25 लाख से ज्यादा लोग मर जाते है उस देश में पर्यावरण को ठीक रखने के लिये बजट सिर्फ 2675.42 हजार करोड हैं । यानी 2014 के लोकसभा चुनाव में खर्च हो गये 3870 करोड़। औसतन हर बरस बैंक से उधारी लेकर ना चुकाने वाले रईस 2 लाख करोड़ डकार रहे है । हिमाचल-गुजरात के चुनाव प्रचार में ही 3000 करोड़ से ज्यादा फूंके जा रहे हैं। पर देश के पर्यावरण के लिये सरकार का बजट है 2675.42 करोड़ । और उस पर भी मुश्किल ये है कि पर्यावरण मंत्रालय का बजट सिर्फ पर्यावरण संभालने भर के लिये नहीं है । बल्कि दफ्तरों को संभालने में 439.56 करोड खर्च होते हैं। राज्यों को देने में 962.01 करोड खर्च होते हैं।  तमाम प्रोजेक्ट के लिये 915.21 करोड़ का बजट है। तो नियामक संस्थाओं के लिये 358.64 करोड का बजट है। यानी इस पूरे बजट में से अगर सिर्फ पर्यावरण संभालने के बजट पर आप गौर
रकेंगे तो जानकार हैरत होगी कि  सिर्फ 489.53 करोड ही सीधे प्रदूषण से जुडा है जिस्स दिल्ली समेत समूचा उत्तर भारत परेशान है । और प्रदूषण को लेकर जब हर कोई सेन्ट्रल पौल्यूशन कन्ट्रोल बोर्ड से सवाल करता है तो सीपीसी का कुल बजट ही 74 करोड 30 लाख का है । तो पर्यावरण को लेकर जब देश के पर्यावरण मंत्रालय के कुल बजट का हाल ये है कि देश में  प्रति व्यक्ति 21 रुपये सरकार खर्च करती है । और इसके बाद इस सच को समझिये कि एक तरफ देश में पर्यावरण मंत्रालय का बजट 2675.42 करोड है । दूसरी तरफ पर्यावरण से बचने का उपाय करने वाली इंडस्ट्री का मुनाफा 3 हजार करोड से ज्यादा का है । तो पर्यावरण को लेकर इन हालातों के बीच ये सवाल कितना मायने रखता है कि देश के पर्यावरण मंत्री हर्षवर्धन उस वक्त जर्मनी में थे जब दिल्ली गैस चैबर हो चली । और लौट कर भी दिल्ली नहीं पहुंचे बल्कि वह अपनी बात गोवा से कर रहे है । तो जाहिर है पर्यावरण मंत्री भी इस सच को समझते है कि उनके मंत्रालय के बजट में सिर्फ प्रदूषण से मुक्ति के लिये ही जब 275 करोड रुपये है और प्रोजेक्ट टाइगर के लिये 345 करोड है ।

तो फिर पर्यावरण मंत्री का काम दुनियाभर में पर्यावरण को लेकर चिता के बीच अलग अलग कान्फ्रेस में शामिल होने के अलावे और क्या काम हो सकता है । और जर्मनी भी पर्यावरण मंत्री सयुक्त राष्ट्र के मौसम बदलाव के कान्प्रेस में शामिल होने ही गये थे । ऐसे में एक सवाल जीने के अधिकार का भी है क्योकि संविधान की धारा 21 में साफ साफ लिखा है जीने का अधिकार । और संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत स्वस्थ वातावरण में जीवन जीने के अधिकार को पहली बार उस समय मान्यता दी गई थी, जब रूरल लिटिगेसन एंड एंटाइटलमेंट केंद्र बनाम राज्य, AIR 1988 SC 2187 (देहरादून खदान केस के रूप में प्रसिद्ध) केस सामने आया था।   यह भारत में अपनी तरह का पहला मामला था, जिसमें सर्वोच्च  न्यायालय ने पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम 1986 के तहत पर्यावरण व पर्यावरण संतुलन संबंधी मुद्दों को ध्यान में रखते हुए इस मामले में गैरकानूनी खनन रोकने के निर्देश दिए थे।

वहीं एमसी मेहता बनाम भारतीय संघ, AIR 1987 SC 1086 के मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने प्रदूषण रहित वातावरण में जीवन जीने के अधिकार को भारतीय संविधान के अनु्छेद 21 के अंतर्गत जीवन जीने के मौलिक अधिकार के अंग के रूप में माना था। तो फिर दिल्ली के वातावरण में जब जहर धुल रहा है । देश में हर मिनट 5 लोगो की मौत पप्रदूषण से हो रही है । तो क्या सरकार इस चिंता से वाकई दूर है । खासकर तब जब देश में पीएम से लेकर सीएम और हर मंत्री ही नही हर संसद सदस्य तक संविधान की शपथ लेकर ही पद संबालता है । तो फिर जीने के अधिकार की खुली धज्जियां उड़ रही है तो संसद का विसेष सत्र क्यो नही बुलाया जा रहा है । सुप्रीम कोर्ट अपनी ही  व्याख्या के तहत केन्द्र को नोटिस देकर ये सवाल क्यो नहीं पूछ रहा है । क्योकि एम्स के डायरेक्टर तक कह रहे है कि दिल्ली में लंदन के 1952 के द ग्रेट स्मॉग जैसे हालात बन रहे हैं । और पर्यावरण को लेकर संसद तो दूर तमाम राज्यों के सीएम भी आपस में बैठने को तैयार नहीं है । केजरीवाल पंजाब
और हरियाणा के सीएम से मुलाकात का वक्त मांग रहे है । हर राज्य की मुस्किल तो ये भी है कि किसी के पास पर्यावरम से पैदा होते प्रदूषण को रोकने के लिये  अलग से बजट नहीं है । तो गैस चैंबर में तब्दील हो चुकी दिल्ली में लोगों की सांस कब सीने से उखड़ जाए-कहा नहीं जा सकता। देश की राजधानी में लोग स्मॉग में घुटकर नहीं मरेंगे-इसकी गारंटी लेने वाला कोई नहीं। क्योंकि सच यही है कि आम आदमी की जान की फ्रिक किसी को है नहीं। आलम ये सुप्रीम कोर्ट, हाईकोर्ट और एनजीटी ने तीन साल में केंद्र और दिल्ली सरकार को प्रदूषण रोकने में नाकाम रहने के लिए कई बार फटकार लगाई और तीनों अदालतों ने तीन साल में 44 से ज्यादा बार अलग अलग ऑर्डर दिए-जिनकी धज्जियां उड़ा दी गईं। मसलन , सुप्रीम कोर्ट ने तीन साल में 18 आदेश दिए । हाईकोर्ट ने तीन साल में 18 आदेश दिए । एनजीटी ने तीन साल में 8 आदेश दिए । और इन आदेशों पर अमल हुआ होता तो दिल्ली का आज यह हाल न होता। क्योंकि पराली जलाने से होने वाले प्रदूषण से लेकर डीजल गाड़ियों पर रोक तक कई आदेश दिए गए लेकिन अमली जामा किसी पर पहनाया नहीं जा सका।


और आज जब दिल्ली गैस चैंबर में तब्दील हो चुकी है-तब का हाल यह है कि धुंध की वजह से बीते 24 घंटे में 17 से ज्यादा लोगों की जान जा चुकी है । दिल्ली-पंजाब और हरियाणा के मुख्यमंत्रियों ने आपस में बात तक नही की है । कृत्रिम बारिश पर कोई फैसला हो नहीं सका। एक एजेंसी कहती है कि यह जरुरी है तो केंद्र सरकार खारिज करती है। सरकार के ही अलग अलग मंत्री अलग बात करते हैं । तो आखरी सच यही है कि  धुंध में पसरे जहर को सांसों में उतारना उस गरीब आदमी की मजबूरी है-जिसे रात को पेट भरने के लिए सुबह को काम पर निकलना जरुरी है। वो घर की चारदीवारी में नहीं बैठ सकता। वो एयर प्यूरीफायर नहीं खरीद सकता। वो अपनी कार में काम पर नहीं जाता। उसे काम पर निकलना ही होगा। उसे सांसों के जरिए जहर छाती में लेना ही होगा।

तो सवाल यही है कि क्या जहरीली धुंध पर सरकार कुछ करेगी या एक तमाशा जो जारी है-वो कुदरत के आसरे खुद की खत्म हो जाएगा। क्योंकि प्रृकति देर सबरे खुद धुंध छांटेगी ही और जनता-सरकार-अदालत सब फिर अपने काम में लग जाएंगे। जहरीले धुंध से बेपरवाह।

नोटबंदी के दिन कालेधन पर सत्ता-नेता दिल बहलायेंगे !

Tue, 07/11/2017 - 21:47
2008 से 2017 तक। यानी लिंचेस्टाइन बैंक के पेपर से लेकर पैराडाइज पेपर तक।इस दौर में पिछले बरस पनामा पेपर और बहमास लीक्स। 2015 में स्विस लीक्स। 2014 में लक्जमबर्ग लीक्स। 2013 में आफसोर लीक्स। 2011 में एचएसबीसी पेपर। 2010 में विकिलीक्स। और 2008 में लिंचिस्टाइन पेपर। यानी क्या मनमोहन का दौर या क्या मौजूदा दौर। किसी का नाम आजतक सामने आया नहीं कि कौन सा रईस टैक्स चोरी कर दुनिया में कहां कहां कितना पैसा छुपाये हुये है। या फिर ये भी पता नही चला कि जिनके नाम 2008 से लेकर 2017 तक लीक्स में निकल कर आये उनपर कार्रवाई क्या हुई। क्योंकि मंगलवार को भी वित्त मंत्री अरुण जेटली ने यही कहा कि पनामा पेपर की जांच हो रही  है। इनकम टैक्स नोटिस भेज रहा है। कार्रवाई या कहें जांच जारी है। तो अरुण जेटली गलत नहीं कह रहे हैं। बकायदा 450 लोगो को नोटिस दिया गया। और
जांच सीबीडीटी कर रही है यानी इनक्म टैक्स विभाग ही तय कर रहा है लीक्स में आये नामो के खिलाफ कौन सी जांच हो।

यानी दुनियाभर में जब अदालतों के जरीये जांच हो रही हैं और अदालती जांच के बाद ही पाकिस्तान में नवाज शरीफ की कुर्सी चली गई, तब हमारे सरकारी विभाग अगर जांच कर रहे हैं तो समझना होगा द बोस्टन कंसल्टिंग के मुताबिक दुनिया में आफ शोर के करीब 10 हजार  अरब डालर मौजूद हैं। और दुनिया के जिन लोगो का ये पैसा आफ शोर में है, वह उनकी हैसियत सत्ता चलाने वाले की है। मसलन राजनेता। सेलिब्रिटी। कारपोरेट ज्इट्स। कारोबारी। और तमाम जमा संपत्ति की 80 फिसदी जिनके पास है वह सिर्फ 0 .1 फीसदी है। और इस 0 .1 फिसदी के भी एक फीसदी अमीरों के पास इस 80 फिसदी का 50 फिसदी धन है। तो ऐसा भी नहीं है कि भारत में जिन लोगों के नाम लिंचेस्टाइन से लेकर पैराडाइज पेपर तक में आये होंगे, वह सिर्फ रईस होंगे। बल्कि उनकी रईसी दुनिया के उन्हीं सत्ताधारियों की तरह होगी जो हमेशा राज करते है चाहे सत्ता किसी की भी रहे। ऐसे में कालधन पर नकेल  कसने का सच यही है। देश की पांच सुप्रीम जांच एजेंसी सीबीडीटी, सेबी, ईडी, आरबीआई और एफईयू यानी फाइनेंशियल इंटेलिजेन्स यूनिट पैराडाइज पेपर्स लीक में आये 714 भारतीयों के खाते संपत्ति की जांच करेगी। और उससे पहले पनामा पेपर्स में आये तकरीबन 500 भारतीय के नामो की जांच इनकम टैक्स कर रहा है। जबकि 2011 में एचएसबीसी पेपर लीक में आये 1100 भारतीयों की जांच पूरी हो हो चुकी है। जिसकी जानकारी वित्त मंत्री ने इसी बरस 21 मार्च  में दी । तो जांच पूरी हुई पर निकला क्या ये कोई नहीं जानता। यानी दोषी कौन। नाम किस किस के। किसका कितना धन । यकीनन कोई नहीं जानता क्योंकि सारा कच्चा चिट्टा तो सरकार के ही पास है। ठीक उसी तरह जैसे कभी मनमोहन रकार के पास होता था और 2014 में कालेधन को लेकर ही बीजेपी इस अंदाज में यूपीए पर हमला करती थी कि सत्ता में आते ही वह सारे नाम सार्वजनिक कर देगी।

तो क्या चार बरस पहले का कालेधन को लेकर हंगामा सिर्फ चुनावी शोर था। या हर सरकार की तरह मौजूदा वक्त भी है। क्योंकि सच यह है कि कालेधन पर सरकार बनते ही एसआईटी बनाने के अलावा सरकार की हर उपलब्धि पर विरोधी निशाना साधते हैं क्योंकि नतीजा कुछ नहीं है। नोटबंदी से कितना कालाधन वापस आया-कोई नहीं बता पाया। उल्टा कहीं कालाधन धारकों ने कालाधन सफेद तो नहीं कर लिया-इसकी आशंका बरकरार है। कालाधन घोषित करने की दो सरकारी योजनाओं से सरकार को महज 69,357 करोड़ की रकम मिली-जो उम्मीद से खासी कम है। तो ऐसे में क्या याद करें कि बीजेपी ने 2014 चुनाव के वक्त 100 दिन के भीतर कालाधन वापस लाने का दावा किया था-लेकिन ऐसा हुआ नहीं। और फिर कालाधन के खिलाफ लड़ाई को विदेश के बजाय देश में सीमित कर दिया गया-जिसकी परिणिति नोटबंदी के रुप में दिखी। जबकि सच ये भी है कि 2014 से पहले कालाधन के खिलाफ लडाई का मतलब विदेशों में जमा कालाधन ही था। क्योंकि हर शख्स का आकलन विदेशों में जमाकालाधन ही था-जिसके आसरे देश की अर्थव्यवस्था को सुधारा जा सकता था। याद कीजिये सुब्रहणयम स्वामी कहते थे 120 लाख करोड। बाबा रामदेव कहते थे 400 लाख करोड। सीताराम येचुरी कहते थे 10 लाख करोड़। अर्थशास्त्री अरुण कुमार कहते थे 100 लाख करोड कालाधनहै। फिर अब इस कालेधन का जिक्र क्यों नहीं होता। यूं जिक्र तो सरकारी संस्थान भी किया करते थे। सीबीआई ने 29.5 लाख करोड बताया। तो एसोचैम ने ट्रिलियम डॉलर बताया। मनमोहन सिंह ही 23374 करोड़ का जिक्र करते थे। और स्व्जिजरलैंड का केन्द्रीय बैक 14,000 करोड के कालाधन के होने का जिक्र करता रहा । पर वक्त के साथ हर आकलन धरा का धरा रह गया । तो सवाल दो है । पहला, क्या कालाधन पर सारी कवायदें बेमानी हैं? दूसरा, क्या कालाधन पर लगाम लगाना संभव ही नहीं, और यह मुद्दा महज राजनीतिक मुद्दा भर है? तो ऐसे में अब नोटबंदी के दिन को ही सरकार कालाधन विरोधी दिवस या विपक्ष काला दिवस मनाती है तो इसका कोई मतलब नहीं है। और पैराडाइज पेपर्स ही  नहीं बल्कि किसी भी पेपर लीक्स में किसाका नाम है । किसको सजा हई ये देश
के नागरिक जान पायेगें इसकी उम्मीद भी बेमानी है।

गैर बराबरी की रोटी पर बराबरी का वोट ही है लोकतंत्र ?

Fri, 27/10/2017 - 23:49
जो 60 साल में नहीं हुआ वह 60 महीने में होगा। कुछ इसी उम्मीद के आसरे मई 2014 की शुरुआत हुई थी। और 40 महीने बीतने के बाद अक्टूबर 2017 में राहुल गांधी गुजरात को जब चुनावी तौर पर नाप रहे हैं तो अंदाज वही है जो  2013-14 में मोदी का था। तो क्या इसी उम्मीद के आसरे गुजरात में दिसंबर 2017 की शुरुआत होगी, जैसे 2014 मई में मोदी सरकार की शुरुआत हुई थी। तो फिर भारत कितना बदल चुका है। बदल रहा है या अब न्यू इंडिया के नारे  तले युवा भारत स्वर्णिम भविष्य देख रहा है। यानी हर चुनावी दौर में सत्ता के खिलाफ विपक्ष का नारा चाहे अनचाहे फैज की नज्म याद करा ही देता है ..सब ताज उछाले जाएंगे...सब तख्त गिराए जाएंगे..हम देखेंगे। तो क्या  विरोध और विद्रोह की ये अवाज चुनाव के वक्त अच्छी लगती है। क्योंकि सत्ता से उम्मीद खत्म होती है तो विपक्ष जनता बनकर सत्ता पर काबिज होने की मश्क्कत करती है। और चुनाव प्रक्रिया लोकतंत्र का राग बाखूबी जी लेती है। तो क्या चुनाव सत्ता-सियासत -राजनीति से खत्म होती जनता की उम्मीदों को बरकरार रखने का एक तरीका मात्र है। संसद से भरोसा ना डिगे। लोकतंत्र काराग बरकरार रहे। ये सारे सवाल इसलिये क्योकि श्रम व रोजगार मंत्रालय की  2016 की रिपोर्ट कहती है देश में 4,85,00,000 युवा बेरोजगार हैं। बेरोजगारी दर 12.90 फिसदी हो चुकी है। देश में सिर्फ 2,96,50,000 लोगों के पास रोजगार है। 9,26,76,000 किसान परिवारों की आय देश की औसत आय से  आधी से भी कम है। 11,90,98.000 मजदूर परिवारों की आय किसानो की औसत आय के आधे से कम है। यानी कौन सा भारत किस चुनावी उम्मीद और आस के साथ बनाया  जा रहा है। ये सवाल हर चुनाव को जीने के बाद देश के सामने कहीं ज्यादा बड़ा क्यों हो जाता है। जबकि चुनावी लोकतंत्र का अनूठा सच तो यही है कि हर  पांच बरस में देश और गरीब होता है। नेता रईस होते हैं। चुनावी खर्च बढ़ते चले जाता है। राजनीतिक पार्टियों का खजाना भरता चला जाता है।

यानी दुनिया में सबसे ज्यादा भूखे लोगों के देश में चुनाव पर सबसे ज्यादा रईसी के साथ खर्च कैसे किया जाता है और देश ही राजनीतिक सत्ता की हथेलियों पर नाचता हुआ दिखायी क्यों देता है जरा इसे चुनाव आयोग के अपने आंकडों से ही समझ लें। देश के पहले आम चुनाव 1951-52 में 10 करोड 45 लाख रुपये खर्च हुये। आर्थिक सुधार से एन पहले 1991 के आम चुनाव में 3 अरब 59 करोड 10 लाख रुपये खर्च हुये। 2004 के चुनाव में 13 अरब 20 करोड 55 लाख रुपयेखर्च हुये। और पिछले चुनाव यानी 2014 के चुनाव में 34 अरब 26 करोड 10 लाख रुपये खर्च हुये। यानी ये कल्पना के परे है कि देश की इक्नामी  में जितना उछाल आया। लोगों की आय में जितनी बढोतरी हुई। मजदूर-किसान को दो जून की रोटी के लिये जितना मिला, उससे हजार से कई लाख गुना ज्यादा की बढोतरी देश में चुनावी लोकतंत्र को जीने में खर्च हो गई। और इस तंत्र को  जीने के लिये अब हिमाचल और गुजरात तैयार हैं। जहां चुनाव कराने में जो भी खर्चा होगा उससे विकास की कितनी झडी लग जाती इस दिशा में ना भी सोचे तो भी 19 करोड भूखे नागरिको का पेट तो भरा ही जा सकता है । क्योंकि सिर्फ गुजरात में ही चुनाव कराने में ढाई अरब रुपये से ज्यादा देश के खर्च होगें । और चुनाव प्रचार में जब हर उम्मीदवार को 28 लाख रुपये खर्च करने इजाजत है तो दो अरब से ज्यादा सिर्फ उम्मीदवार अपने प्रचार में खपा देगें । क्योकि गुजरात की प्रति सीट पर अगर चार उम्मीदवारो के 28-28 लाख खर्च को जोडकर अगर चार उम्मीदवारो को ही माने तो एक करोड 12 लाख रुपये हो जाते है । और 182 सीट का मतलब है 2 अरब तीन करोड से ज्यादा ।

तो क्या वाकई चुनावी तंत्र इतना मजबूत हो चुका है कि वह लोकतंत्र पर हावी है या फिर लोकतंत्र के असल मिजाज को खारिज कर चुनाव को ही जानबूझ कर लोकतंत्र करार दिया गया है। क्योंकि सत्ता परिवर्तन की ताकत को ही लोकतंत्र मान लिया गया है। और बराबरी के वोट को ही गैर बराबरी की रोटी से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण मान लिया गया है ।

विकास की परिभाषा बदलने के लिये खड़ा हुआ है गुजरात का युवा

Fri, 27/10/2017 - 00:04
महंगी शिक्षा-बेरोजगारी के सवाल ने जातियों को एकजुट कर गुजरात चुनाव में बिछा दी है नई बिसात

गुजरात चुनाव में सड़कों पर अगर युवा नजर आने लगे हैं। तो उसके पीछे महज पाटीदार, दलित या ओबीसी आंदोलन नही है। और ना ही हार्दिक पटेल,अल्पेश या जिग्नेश के चेहरे भर है । दरअसल गुजरात का युवा जिस संकट से गुजर रहा है उसका सच महंगी शिक्षा और बेरोजगारी है। और छात्र-युवा के बीच के संकट को समझने के लिये पहले कालेजो की उस फेहरिस्त को समझें,जिसने गुजरात की समूची शिक्षा को ही निजी हाथों में सौंप दिया है। जिले दर जिले कालेज हो या यूनिवर्सिटी। टेक्निकल इस्टीट्यूट हो या फिर मेडिकल कालेज। कालेजों की समूची फेहरिस्त ही शिक्षा को इतना महंगा बना चुकी है कि गुजरात में हर परिवार के सामने दोहरा संकट है कि महंगी शिक्षा के साथ बच्चे पढ़ें। और पढ़ने के बाद नौकरी ही नहीं मिले। और गुजरात का सच ये है कि 91 डिप्लोमा कॉलेज प्राइवेट हैं। 21 में से 15 मेडिकल कालेज प्राइवेट है। दो दर्जन से ज्यादा यूनिवर्सिटी प्राइवेट है। और प्राइवेट कॉलेजो में शिक्षा महंगी कितनी ज्यादा है ये इससे भी समझा जा सकता है कि सरकारी कालेज में एक हजार रुपये सेमेस्टर तो निजी डिप्लोमा कालेज में 41 हजार रुपये प्रति सेमेस्टर फीस है। इसी तरह निजी मेडिकल कालेजों में पढ़ा कर अगर कोई गुजराती अपने बच्चे को डाक्टर बनाना चाहता है तो उसे करोड़पति तो होना ही होगा। क्योंकि अंतर खासा है । मसलन सरकारी मेडिकल  कालेज में 6 हजार रुपये सेमेस्टर फीस है । तो निजी मेडिकल कालेज में 3 से 6 लाख 38 हजार रुपये सेमेस्टर फीस है । और गुजरात के सरकारी मेडिकल कालेजो में 1080 छात्र तो निजी मेडिकल कालेज में 2300 छात्र पढाई कर रहे है । यानी  मुस्किल सिर्फ इतनी नहीं है कि पढाई मंहगी हो चली है । फिर भी मां बाप बच्चो को पढा रहे है । मुश्किल तो ये भी है मंहगी पढाई के बाद रोजगार ही नहीं है । हालात कितने बदतर है ये इससे भी समझा जा सकता है कि  प्राईवेट इंजीनियरिंग कालेजों में 25 से 30 हजार सीट खाली हैं । खाली इसलिये हैं क्योंकि डिग्री के बाद भी रोजगार नहीं है । सरकार का ही आंकडा कहता है कि 2014-15 में 20 लाख युवा रजिस्टर्ड बेरोजगार हैं ।

तो गुजरात की चुनावी राजनीति में ऊपर से हार्दिक पटेल , जिगनेश या अल्पेश के जरीये जातियों में बंटी राजनीति नजर आ सकती है लेकिन गुजरात के राजनीतिक इतिहास में ये भी पहली बार है कि जातियों में राजनीति बंट नहीं रही है बल्कि जातियों में बंटा समाज विकास के नाम पर  ही एकजुट हो रहा है । यानी विकास का जो सवाल गुजरात जाकर मोदी उठा रहे हैं । विकास के इसी सवाल को गुजराती भी उठा रहा है । यानी सवाल कांग्रेस की राजनीति का नहीं बल्कि गुजरात के विकास मॉडल का है, जहां हर परिवार के सामने संकट बीतते वक्त के साथ गहरा रहा है । तो विकास के नाम पर गुजरात के चुनाव में विकास का बुलबुला इसलीलिये फूट रहा है क्योंकि एक तरफ गुजरात के रजिस्ट्रड बेरोजगारो की तादाद  बीते 15 बरस में  20 लाख बढ़ गई । और दूसरी तरफ मनरेगा के तहत जाब कार्ड ना मिल पाने वालों की तादाद 31 लाख 65 हजार की है । और यही वह सवाल है जो विकास को लेकर मंच से जमीन तक पर गूंज रहा है । यानी राहुल गांधी कहते हैं कि विकास पगल हो गया है तो मोदी जवाब देते है कि मैं ही विकास हूं। यकीनन लड़ाई विकास को लेकर ही है । क्योंकि विकास के दायरे में अगर रोजगार नहीं है तो फिर छात्र-युवा और मनरेगा के बेरोजगारो के सामने संकट तो है । दरअसल 2016-17 का ही गुजरात का मनरेगा का आंकडा कहता है 3,47,000 लोगों ने मनरेगा जाब कार्ड के लिये अप्लाई किया और उसमें से सिर्फ 1,35, 000 लोगों को जाब कार्ड मिला । और जिन 39 फीसदी लोगों को मनरेगा के तहत काम भी मिला तो वह भी सिर्फ 19 दिनों का ही मिला ।

यानी काम 100 दिनों का देने की स्थिति में भी सरकार नहीं है । और मनरेगा के तहत ही बीते दस बरस में  38,45,000 में से 6,80,000 लोगों को ही काम मिला ।यानी रोजगार का संकट सिर्फ शहरों तक सीमित है ऐसा भी नहीं । मुश्किल ग्रामीण इलाको में कही ज्यादा है। और अगर विकास का कोई मंत्र रोजगार ही दिला पाने में सत्रम हो नहीं पाया है तो समझना गुजरात के उस समाज को भी होगा जहा कमोवेश हर तबका पढाई करता है । दलितों में भी 70 फिसदी साक्षरता है । पर शिक्षा कैसे महंगी होती चली गई और कैसे काम किसी के पास बच नहीं रहा है ये इससे भी समझा जा सकता है 60 फिसदी से ज्यादा बच्चे 12 वी से पहले ही पढाई छोड देते है । मसलन , 2006 में 15,83,000 बच्चो ने पहली में दाखिला लिया । 2017 में 11,80,000 छात्र दसवी की परिक्षा में बैठे । यानी करीब 4 लाख बच्चे दसवीं की पढाई तक पढ नहीं सके । और --मार्च 2017 में 12वी की परिक्षा  5,30,000 बच्चों ने दी । यानी हायर एजडूकेशन तक भी साढे छह लाख बच्चों ने पढाई छोड़ दी । तो गुजरात चुनाव का ये रास्ता ऐसे मोड़ पर जा खडा हुआ है जहां पहली बार जातियों में टकराव नहीं है । विकास की मोदी परिभाषा के सामानांतर हर गुजराती विकास की परिभाषा को अपनी मुश्किलो को खत्म करने से जोडना चाह रहा है । और ये हालात गुजरात में अगर राजनीतिक तौर पर कोई नया परिमाम देते है तो मान कर चलिये 2019 का रास्ता भी उस इकनामी से टकरायेगा जहां जाति - धर्म में बांटने वाली राजनीति नहीं चलेगी और जन समस्या एकजुट होकर नया रास्ता निकालेगी । 

1974 में गुजरात के छात्र थे, 2017 में गुजरात का युवा है

Thu, 26/10/2017 - 00:17
जुलाई 2015 में पाटीदारों की रैली को याद कीजिये। पहले सूरत फिर अहमदाबाद । लाखों लाख लोग। आरक्षण को लेकर सड़क पर उतरे लाखों पाटीदारों को देखकर किसी ने तब सोचा नहीं था कि 2017 के चुनाव की बिसात तले इन्हीं रौलियों से निकले युवा राजनीति का नया ककहरा गढेंगे। और जिस तरह सत्ता की बरसती लाठियों से भी युवा पाटीदार झुका नहीं और अब चुनाव में गांव गांव घूमकर रैली पर बरसाये गये डंडे और गोलियों को दिखा रहा है। तो कह सकते हैं आग उसके सीने में आज भी जल रही है और उसे बुझना देना वह चाहता नहीं है। दरअसल पाटीदारो के इस आंदोलन ने ही दलितों को आवाज दी और बेरोजगारी से लेकर शराब के अवैध धंधो को चलाने के खिलाफ उठती आवाज को जमीन मिली। तो कल्पेश या जिगनेश भी यूं ही नहीं निकले। कहीं ना कहीं हर तबके के युवा के बीच की उनकी अपनी जरुत जो पैसो पर आ टिकी। मुश्किल हालात में युवा के पास ना रोजगार है। ना ही सस्ती शिक्षा। ना ही व्यापार के हालात और ना ही कोई उन्हें सुनने को तैयार है तो राजनीतिक खांचे में बंटे ओबीसी , दलित, मुस्लिम हर तबके के युवाओ में हिम्मत आ गई है। तो आंदोलन की तर्ज पर चुनाव में कूदने की जो तैयारी गुजरात में युवा तबका कर रहा है। वह शायद इतिहास बना रहा है या इतिहास बदल रहा है। या पिर इतिहास दोहरा रहा । क्योंकि गुजात में छात्र आंदोलन को लेकर पन्नों को पलटिये तो आपके जहन में दिसंबर 1973 गूंजेगा। तब गुजरात के छात्रों ने ही जेपी की अगुवाई में आंदोलन की ऐसी शुरुआत की दिल्ली भी थर थर कांप उठी थी। तब करप्शन का जिक्र था। महंगाई की बात थी। भाई भतीजावाद की गूज थी। और तब अहमदाबाद के एलडी इंजीनियरिंग कालेज के छात्र सडक पर निकले थे। वह इसलिये निकले थे क्योंकि इंदिरा गांधी ने चुनाव के लिये गुजरात के सीएम चिमनभाई से 10 लाख रुपये मांगे थे। चिमनबाई ने मूंगफली तेल के व्यापारियों से 10 लाख रुपये वसूले थे। तेल व्यापारियो ने तेल की कीमत बढ़ा दी थी। छात्रों में गुस्सा तब पनपा जब अहमदाबाद के एलडी इंजिनियरिंग कालेज के छात्रोंवासों में कीमतें बढ़ा दी गई। तो क्या 1974 के बाद 2017 में छात्र सत्ता को ही चुनौती देने निकले है। और हालात कुछ ऐसे उलट चुके है कि तब कांग्रेस के चिमनबाई पटेल की सरकार के खिलाफ छात्रों में गुस्सा था। अब कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी के साथ हार्दिक, अल्पेश, जिग्नेश खड़े दिखायी दे रहे है। उस दौर में गुजरात के छात्र कालेजों से निकल कर नारे लगा रहे थे " हर बार विद्यार्थी जीता है, इस बार विद्यार्थी जीतेगा"। लेन मौजूदा वक्त में छात्रों के सामने शिक्षा के प्राइवेटाइजेशन की एसी हवा बहा दी जा चुकी है कि छात्र टूटे हुये है। तो क्या छात्रो के भीतर का असंतोष ही गुजरात में हर आंदोलन को हवा दे रहा है। और कांग्रेस को इसका लाभ मिल रहा है। इसीलिये राहुल गांधी 70 से 90 युवाओं को टिकट देने को तैयार है। हार्दिक, जिग्नेश और कल्पेश के साथी आंदोलनकारियों को 50 से ज्यादा टिकट देने को तैयार हैं। यानी चार दशक बाद गुजरात का युवा फिर संघर्ष की राह पर है। अंतर सिर्फ इतना है कि 1974 में निशाने पर कांग्रेस थी। 2017 में निशाने पर बीजेपी है। लेकिन छात्र तो सत्ता के खिलाफ हैं। पर गुजरात की इस राजनीति की धारा क्या वाकई 2019 की दिशा में बहेगी और क्या जेएनयू से लेकर हैदराबाद या पुणे से लेकर जाधवपुर यूनिवर्सिटी के भीतर उठते सवाल राजनीति गढने के लिये बाहर निकल पड़ेंगे। क्योंकि 1974 में भी चिमनभाई की सरकार हारी तो बिहार में नारे लगने लगे, गुजरात की जीत हमारी है, अब बिहार की बारी है। पर सियासत तो इस दौर में ऐसी पलट चुकी है कि बिहार जीत कर भी विपक्ष हार गया और बीजेपी हार कर भी सत्ता में आ गई । लेकिन गुजरात माडल के आईने में अगर देश की सियासत को ही समझे तो मोदी ऐसा चेहरा जिनके सामने बाजेपी का कद छोटा है । संघ लापता सा हो चला है । ऐसे में तीन चेहरे । हार्दिक पटेल । जिगनेश भिवानी । अल्पेश ठकौर । तीनो की बिसात । और 2017 को लेकर बिछाई है ऐसी चौसर जिसमें 2002 । 2007 । 2012 । के चुनाव में करीब 45 से 50 फिसदी तक वोट पाने वाली बीजेपी के पसीने निकल रहे है । यानी जिस मोदी के दौर में हार्दिक जवान हुये । जिगनेश और अल्पेश ने राजनीति का ककहरा पढा । वही तीनो 2017 में ऐसी राजनीति इबारत लिख रहे है । जहा पहली बार खरीद फरोख्त के आरोप बीजेपी पर लग रहे है । तो हवा इतनी बदल रही है कि राहुल गांधी भी अल्पेश ठकौर को काग्रेस में शामिल कर मंच पर बगल में बैठाने पर मजबूर है । गुपचुप तरीके से हार्दिक पटेल से मिलने को मजबूर है । चुनाव की तारिीखो के एलान के बाद जिग्नेश से भी हर समझौते के लिये तैयार है । यानी बीजेपी-काग्रेस दोनो इस तिकडी के सामने नतमस्तक है । ओबीसी-दलित-पाटिदार नये चुनावी समीकरण के साथ हर समीकरण बदलने को तैयार है । 18 से 35 बरस के डेढ करोड युवा अपनी शर्तो पर राजनीति को चलाना चाहते है ।तो क्या गुजरात बदल रहा है या नया इतिहास लिखने जा रहा है । क्योकि पटिदार समाज बीजेपी का पारपरिक वोट बैक रहा है । अल्पेश ठकोर के पिता खोडाजी ठाकोर काग्रेस में आने से पहले संघ से जुडे रहे है ।दलित समाज खुद को ठगा हुआ महसूस करता रहा । यानी चेहरे के आसरे अगर राजनीति होती है तो फिर समझना होगा 2002 से 2012 तक मोदी अपने बूते चुनाव जीतते रहे । दिल्ली से बीजेपी नेता के प्रचार की जरुरत कभी मोदी को गुजरात में नहीं पडी । तो मोदी के बाद बीजेपी का कोई ऐसा चेहरा भी नहीं बना जिसके आसरे बीजेपी चल सके । और अब मोदी दिल्ली में है और चेहरा खोजती गुजरात की राजनीति में कोई चेहरा काग्रेस के पास बी नहीं है । ऐसे में इन तीन चेहरे यानी हार्दिक पटेल । जिगनेश भिवानी। अल्पेश ठाकौर। ये सिर्फ चेहरे भर नहीं है बल्कि उनके साथ जुड़ा वही वोट बैंक है, जिस पर कभी बीजेपी काबिज रही। खासकर 54 फिसदी ओबीसी।18 फिसदी पाटीदार। पहली बार 7 फिसदी दलित भी उभर कर सामने है। तो क्या गुजरात चुनाव वोट बैंक के मिथ को भी तोड़ रहा है और युवाओं को आंदोलन की तर्ज पर राजनीति करने को भी ढकेल रहा है। यानी गुजरात के परिमाम सिर्फ 2019 को प्रबावित ही नहीं करेंगे बल्कि मान कर चलिये 2019 की चुनावी राजनीति सड़क से शुरु होगी। और जनता कोई ना कोई नेता खोज भी लेगी।

राजधर्म के रास्ते पर भटक तो नहीं गये मोदी-योगी ?

Fri, 20/10/2017 - 22:07
धर्म दीर्घकालीन राजनीति है और राजनीति अल्पकालीन धर्म । यूं तो ये कथन लोहिया का है । पर मौजूदा सियासत जिस राजधर्म पर चल पड़ी है, उसमें कह सकते है कि बीते 25 बरस की राजनीति में राम मंदिर का निर्माण ना होना धर्म की दीर्घकालीन राजनीति है । या फिर मंदिर मंदिर सीएम पीएम ही नहीं अब तो राहुल गांधी भी मस्तक पर लाल टिका लगाकर चुनाव प्रचार कर रहे हैं तो राजनीति अल्पकालीन धर्म है । या फिर पहली बार भारतीय राजनीति हिन्दुत्व के चोगे तले सत्ता पाने या बनाये रखने के ऐसे दौर में पहुंच चुकी है, जहां सिर्फ मंदिर है । यानी धर्म को बांटने की नहीं धर्म को सहेजकर साथ खड़ा होकर खुद को धार्मिक बताने की जरुरत ही हिन्दुत्व है । क्योंकि पहली बार राजधर्म गिरजाधर हो या गुरुद्वारा या फिर मस्जिद पर नहीं टिका है । यानी हिन्दु मुस्लिम के बीच लकीर खिंचने की जरुरत अब नहीं है । बल्कि हिन्दू संस्कृति से कौन कितने करीब से जुड़ा है राजनीति का अल्पकालीन धर्म इसे ही परिभाषित करने पर जा टिका है । इसलिये जिस गुजरात में अटल बिहारी वाजपेयी मोदी की सत्ता को राजधर्म का पाठ पढ़ा रहे थे । उसी गुजरात में राहुल गांधी को अब मंदिर मंदिर जाना पड़ रहा है । तो क्या हिन्दुत्व की गुजरात प्रयोगशाला राजनीतिक मिजाज इतना बदल चुका है कि मंदिर ही धर्म है । मंदिर ही सियासत ।

यानी नई राजनीतिक चुनावी लड़ाई हिन्दू वोट बैंक में साफ्ट-हार्ड हिन्दुत्व के आसरे सेंध लगाने की है । या फिर जाति-संप्रदाय की राजनीति पर लगाम लगती धर्म की राजनीति को नये सिरे से परिभाषित करने की कोशिश । क्योकि यूपी ने 1992 में राममंदिर के नाम पर जिस उबाल को देखा । और हिन्दु-मुस्लिम बंट गये । और 25 बरस बाद अयोध्या में ही जब बिना राम मंदिर निर्माण दीपावली मनी तो खटास कहीं थी । बल्कि समूचे पूर्वाचल में हर्षोउल्लास था । तो क्या हिन्दुत्व की राजनीतिक प्रयोगशाला में सियासत का ये नया घोल है जहा हिन्दु मुस्लिम के बीच लकीर खिंचने से आगे हिन्दुत्व की बडी लकीर खिंच कर सियासत को मंदिर की उस चौखट पर ले आया गया है जहा सुप्रीम कोर्ट का हिन्दुत्व को लेकर 1995 की थ्योरी फिट बैठती है पर 2017 की थ्योरी फिट नहीं बैठती। क्योंकि याद कीजिये सुप्रीम कोर्ट में जब हिन्दु धर्म और राजनीति में धर्म के प्रयोग को लेकर मामला पहुंचा तो दिसबर 1995 में जस्टिस वर्मा ने कहा , ' हिंदुत्व शब्द भारत यों की जीवन शैली की ओर इंगित करता है। इसे सिर्फ धर्म तक सीमित नहीं किया जा सकता। " और याद किजिये 22 बरस बाद जब एक बार पिर सुप्रीम कोर्ट में चुनाव प्रचार में धर्म के प्रयोग को लेकर मामला पहुंचा तो सात सदस्यीय संविधान पीठ ने 1995 की परिभाषा से इतर कहा , "धर्म इंसान और भगवान के बीच का निजी रिश्ता है और न सिर्फ सरकार को बल्कि सरकार बनाने की समूची प्रक्रिया को भी इससे अलग रखा जाना चाहिए। " तो सुप्रीम कोर्ट ने राजसत्ता के मद्देनजर धर्म की जो व्याख्या 1995 में की कमोवेश उससे इतर 22 बरस बाद 2017 में परिभाषित किया । पर 1995 के फैसले का असर अयोध्या में बीजेपी दिखा नहीं सकी । और जनवरी 2017 के पैसले के खिलाफ पहले यूपी में तो अब गुजरात के चुनावी प्रचार में हर नजारा उभर रहा है ।

और संयोग ऐसा है कि गुरात हो या अयोध्या । दोनो जगहो पर राजधर्म का मिजाज बीते डेढ से ढाई दशक के
दौर में बदल गया । ये सवाल वाकई बडा है कि 2002 के गुजरात दंगों के बाद सोनिया गांधी ने द्वारका या सोमनाथ में उसी तरह पूजा अर्चना क्यों नहीं की जैसी अब राहुल गांधी कर रहे है । 2002 के बाद पहली बार है कि काग्रेस नेता मंदिर मंदिर जा रहे हैं। और 1992 के बाद से अयोध्या में बीजेपी के किसी नेता ने दीपावली मनाने की क्यो नहीं सोची जैसे अब यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ ने दीपावली मनायी जबकि बीजेपी के कल्याण सिंह , रामप्रकाश गुप्ता और राजनाथ सिंह सीएम रहे । और कल्याण सिंह ने तो 1992 में बतौर सीएम धर्म की राजनीति की नींव रखी । तो तब कल्याण सिंह के मिजाज और अब योगी आदित्यनाथ के राजनीतिक मिजाज । अंतर खासा आ गया है । लेकिन मुश्किल ये नहीं कि राजनीति बदल रही है । मुश्किल ये है कि -कल्याण सिंह हार्ड हिन्दुत्व के प्रतीक रहे । योगी आदित्यनाथ हिन्दुत्व का टोकनइज्म यानी प्रतिकात्मक हिन्दुत्व कर रहे है । और समझना ये भी होगा कि पीएम बनने के साढे तीन बरस बाद भी पीएम मोदी अयोध्या नहीं गये । पर सीएम बनने के छह महीने पुरे होते होते योगी अयोध्या में दीपावली मना आये । यानी एक तरफ राहुल गांधी भी मंदिर मंदिर घूम कर साफ्ट हिन्दुत्व को दिखा रहे हैं। और दूसरी तरफ केदारनाथ जाकर पीएम मोदी तो अयोध्या में योगी हिन्दुत्व का टोकनइज्म कर रहे है । तो कौन सी राजनीति किसके लिये फायदेमंद या घाटे का सौदा समझना ये भी जरुरी है । क्योकि जनता सत्ता से परिणाम चाहती है। और गुजरात से लेकर 2019 तक के आम चुनाव के दौर में अगर कांग्रेस या कहे राहुल गांधी भी टोकनइज्म के हिन्दुत्व को पकड चुके है । तो मुश्किल बीजेपी के सामने कितनी गहरी होगी ये इससे भी समझा जा सकता है कि योगी का हिन्दुत्व और मोदी का विकास ही आपस में टकरायेगा । क्योंकि संयोग से दोनों का रास्ता टोकनइज्म का है । और गुजरात में बीजेपी के सामने उलझन यही है कि गुजरात माडल का टोकनइज्म टूट रहा है । औोर हिन्दुत्व के टोकनइज्म की सत्ता अभी बरकरार है ।

ना मोदी राहुल के विकल्प है ना राहुल मोदी के...दोनों को लड़ना खुद से है

Tue, 17/10/2017 - 21:52
दो चेहरे। एक नरेन्द्र मोदी तो दूसरे राहुल गांधी। एक का कद बीजेपी से बड़ा। तो दूसरे का मतलब ही कांग्रेस। एक को अपनी छवि को तोड़ना है। तो दूसरे को अपनी बनती हुई छवि को बदलना है। 2019 के आम चुनाव से पहले गुजरात से लेकर हिमाचल। और कर्नाटक से लेकर राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ तक के चुनावी रास्ते में टकरायेंगे मोदी और राहुल ही। पर दोनों के संकट अपने अपने दायरे में अलग अलग होते हुये भी एक सरीखे हैं। और 2019 से पहले नई छवि दोनों को गढ़नी है। क्योंकि मोदी के सामने अब मनमोहन सरकार  नहीं अपने किये वादों की चुनौती है। जिसे उन्होंने 2014 मे गढ़ा। मोदी को हिन्दुत्व का चोगा पहनकर विकास का मंत्र फूंकते हुये संघ से लेकर वोट बैंक तक के लिए उम्मीद को बरकरार रखना है। मोदी को गरीबों की आस को भी बरकरार रखना है और युवा भारते के सपनो को भी जगाये रखना है। यानी जिस  उल्लास-उत्साह के साथ 2014 में कांग्रेस को निशाने पर लेकर मोदी मनमोहन सरकार या गांधी परिवार की हवा निकाल रहे थे, उसने मोदी की छवि को ही इतना फूला दिया कि 2019 में खुद को कैसे मोदी पेश करेंगे ये चुनौती मोदी के सामने है। और गुजरात में इस चुनौती के सामने घुटने टेकते मोदी जीएसटी को लेकर नजर आये। जब वह ये कहने से नहीं चूके कि जीएसटी सिर्फ उनका  किया-धरा नहीं है। इसमें पंजाब-कर्नाटक की कांग्रेस सरकार का भी योगदान है। तो एक देश एक कानून की हवा क्या जीएसटी के साथ वैट व दूसरे टैक्स के लिये जाने की वजह से निकल रही है। हो जो भी मोदी को खुद से ही इसलिये  टकराना है क्योंकि सामने कोई ऐसा नेता नहीं जो मोदी का विकल्प हो। सामने राहुल गांधी हैं, जिन्हें खुद अपनी छवि गढ़नी है। राहुल कांग्रेस के अध्यक्ष बन सकते है पर पार्टी कैसे बदलेंगे। राहुल की सामूहिकता का बोध मुस्लिम-दलित-आदिवासी के बिखरे वोट को कैसे एकजुट करेंगे। राहुल की  राजनीतिक समझ क्या बार बार विरासत से नहीं टकरायेगी।

क्योंकि चाहे अनचाहे नेहरु-गांधी परिवार की राजनीतिक समझ के दायरे में राहुल गांधी की आधुनिक कांग्रेस टकरायेगी ही। यानी राहुल की चुनौती मोदी से टकराने की नहीं बल्कि खुद की छवि गढने की है। यानी मोदी और राहुल चाहकर भी ना तो  एक दूसरे का विकल्प हो सकते हैं और ना ही खुद को एक दूसरे के खिलाफ खड़ा कर चुनाव जीत सकते है। दोनों को ही खुद को गढना है। क्योंकि पहली बार जनता 2014 में पार्टी से बडे मोदी के कद को देखने की आदी हो चली है तो वह  जीतायेगी भी किसी चेहरे को और हरायेगी भी किसी चेहरे को ही। चाहे वह चेहरा मोदी हो या राहुल गांधी। राहुल गांधी पहली बार कांग्रेस को लेकर तब  मथ रहे है जब वह अपने इतिहास में सबसे कमजोर है। और मोदी ऐसे वक्त जीत के घोड़े पर सवार हैं, जब आरएसएस भी अपने विस्तार को मोदी की सत्ता तले देख  रही है। दोनों ही हालात जन-मन को भी कैसे प्रभावित कर रहे होंगे ये इससे
भी समझा जा सकता है कि 1991 के आर्थिक सुधार के घोडे पर सवार भारत 2017 में आते आते उन सवालों से जूझने लगा है, जो सवाल इससे पहले या तो इक्नामी के दायरे में आते रहे या फिर करप्शन या वोट बैंक को प्रबावित करते रहे। यानी नेता कौन होगा और भारत का अक्स कैसे शून्यता तले दुनिया के मानचित्र  पर उभर रहा है इस सवाल से हर भारतीय चाहे अनचाहे जूझने लगा है। यानी तकनीकी विस्तार ने सत्ता को हर नागरिक तक पहुंचा भी दिया और हर नागरिक सीधे सत्ता पर टिका टिप्पणी करने से चूक भी नहीं रहा है। तो हिन्दुस्तान  का सच अब छुपता भी नहीं। हालात सार्वजनिक होने लगे हैं कि एक तरफ देश में 36 करोड] लोग गरीबी की रेखा से नीचे है। तो दूसरी तरफ देश के 12 करोड़ कंज्यूमर हैं, जिन पर बाजार की रौनक टिकी है। लेकिन भारत का सच इसी पर टिक जाये तो भी ठिक सच तो ये है कि एक तरफ संयुक्त राष्ट्र के खाद्य व कृर्षि
संगठन की 2015 की रिपोर्ट कहती है कि भारत में 19 करोड से ज्यादा लोग भूखे सोते हैं। तो 2017 की विश्व भुखमरी सूचकांक में भारत सौवे नंबर पर नजर आता है। यानी मोदी या राहुल खुद को मथे कैसे। कैसे वह सरोकार की राजनीति करते हुये नजर आये । ये चुनौती भी दोनो के सामने है क्योंकि सत्ता  की निगाहबानी में दूसरी तरफ एक ऐसा भारत है जो हर तकलीफ से इतना दूर है कि हर दिन साढे सोलह टन अनाज बर्बाद कर दिया जाता है। 2015 से 2017 के  दौर में 11,889 टन अनाज बर्बाद हो गया।

इन हालातों के बीच झारखंड के सिमडेगा से जब ये खबर आती है कि एक बच्ची की मौत इसलिये हो गई क्योंकि राशन दुकान से अनाज नहीं मिला। अनाज इसलिये नहीं मिला क्योकि आधार कार्ड नहीं था तो राशन कार्ड भी नहीं था। तो क्या मौत दो जून की रोटी की तडप  तले जा छुपी है। और अगर भूख से हुई मौत को छुपाने में सियासत लग रही है,देश के इस सच को भी समझना जरुरी है कि एक तरफ भूख खत्म करने के लिये। गरीबी हटाओ के नारे तले. इंदिरा गांधी से लेकर मौजूदा मोदी सरकार भी गरीबो की मसीहा अलग अलग योजनाओ तले खुद को मान रही है। यानी राहुल सिर्फ मोदी पर चोट कर बच नहीं सकते और मोदी 70 बरस के गड्डो का जिक्र कर पीएम  बने भी नहीं रह सकते है । और यही से स्टेटसमैन की खोज भी शुरु होती है और सर्वसम्मति वाले नेता की चाहत भी लोगो में बढती है । क्योकि मोदी हो या राहुल दोनो ही इस सच को जानते समझते है कि गरीब सबसे बडा वोट बैक भी है  और गरीबी सबसे बडी त्रासदी भी । पर सरकारो की नीतियो ने कैसे देश को खोखला किया इससे दोनो ही क्या ज्यादा दिनो तक आंखे मूंद सकते है । क्योकि कहे कोई कुछ भी सच तो यही है कि 254 करोड रुपये का अनाज हर दिन बर्बाद हो  जाता है । 58 हजार करोड का बना हुआ भोजन हर बरस बर्बाद हो जाता है । और इस अंधेरे से दूर दिल्ली के रायसीमा हिल्स पर मौजूद साउथ-नार्थ ब्लाक की  इस जगमगाहट को देखकर कौन कह सकता है कि गरीबो के लिये यहा वाकई कोई नीतियां बनती होगी । क्योकि इनइमारतो से तो सबसे करीब संसद भवन ही है । जहा का सच ये है कि -बीते 10 बरस में 7 राष्ट्रीय दलों की कुल संपत्ति 431 करोड़ रुपए से बढकर 2719 करोड़ रुपए हो गई । जिसमें बीजेपी की संपत्ति 122 करोड़ रुपए से बढ़कर 893 करोड़ तो कांग्रेस की संपत्ति 167 करोड़ से 758 करोड़ पार कर गई । तो सत्ता की दिवाली तो हर दिन मनती ही होगी । पर नीतिया हर दौर में ऐसी रही है कि बीते 10 बरस में 2,06,390  मीट्रिक टन अनाज गोदामों में रखे रखे सड़ गया। इन्हीं10 बरस में 6400 लाख टन खाना बर्बाद हो गया लेकिन भूख से तरसते लोगों तक नहीं पहुंच सका । और इन्ही दस बरसो में जनता के नुमाइन्दो की संपत्ति सबसे तेजी से सबसे  ज्यादा बढी । तो मोदी हो या राहुल । मथना खुद को दोनों को ही है। क्योंकि दिल्ली की चकाचौंध देश का सच है नहीं और देश का सच दिल्ली से दूर होता चला जा रहा है।

एडहॉक सिस्टम पर चल रही है देश की हायर एजुकेशन

Thu, 05/10/2017 - 23:21
दिल्ली यूनिवर्सिटी के 45 कालेजों में 1734 पद खाली पड़े हैं। इसके लिये बकायदा 10 जून से लेकर 15 जुलाई 2017 के बीच विज्ञप्ति निकालकर बताया भी किया कि रिक्त पद भरे जायेंगे। कमोवेश हर विषय या कहें फैकल्टी के साथ रिक्त पदों का जिक्र किया गया  । यानी देश की टॉप  यूनिवर्सिटी में शुमार दिल्ली यूनिवर्सिटी का जब ये आलम है तो देश की बाकी सेन्ट्रल यूनिवर्सिटी में क्या हो सकता है ये सोचकर आपकी रुह कांप जायेगी। क्योंकि हायर एजुकेशन को लेकर  बकायदा हर राज्य में सेन्ट्रल यूनिवर्सिटी बनायी गई । और अव्वल नंबर पर जेएनयू का जिक्र बार बार बार होता है। और देश के आईआईटी, आईबीएम और एनआईटी को बेहतरीन .यूनिवर्सिटी माना जाता है । पर हालात कितने बदतर हैं जरा ये भी देख लिजिये । पहले देश के टॉप दस सेन्ट्रल यूनिवर्सिटी, जहा 70 फीसदी से ज्यादा पद रिक्त हैं। तो सिलसिलेवार समझें। सेन्ट्रल यूनिवर्सिटी ऑफ हरियाणा में 87.1 फिसदी पद रिक्त पड़े हैं तो सेन्ट्रल यूनिवर्सिटी आफ तमिलनाडु में 87.1 फिसदी। और इसी तरह सेन्ट्रल यूनिवर्सिटी आफ ओडिशा में 85 फिसदी । सेन्ट्रल यूनिवर्सिटी आफ बिहार में 84.4 फिसदी । सेन्ट्रल यूनिवर्सिटी आफ पंजाब में 80.7 फिसदी । सेन्ट्रल यूनिवर्सिटी आफ केरल में 78.6 फिसदी । सेन्ट्रल यूनिवर्सिटी आफ कश्मीर में 75.6 फिसदी । इंदिरा गांधी नेशनल  ट्राइबल यूनिवर्सिटी [ मध्यप्रेदश } में 75.4 फिसदी ।सेन्ट्रल यूनिवर्सिटी आफ हिमाचल में 73.4 फिसदी । सेन्ट्रल यूनिवर्सिटी आफ सिक्किम में 72.1 पिसदी पद रिक्त है । यूं यूनिवर्सिटी की फेहरिस्त में जेएनयू और बीएचयू में छात्रो का हंगामा तो हर किसी को याद है । सियासत भी खूब हुई ।

मसलन आप भूले नहीं होंगे जेएनयू में आजादी के नारे । पर इन नारों से इतर किसी ने नहीं पूछा कि जेएनयू में कितने पद रिक्त पडे हैं।  सरकार की रिपोर्ट कहती है 323 पद खाली पड़े हैं । भरे क्यों नहीं गये । तो कोई बोलने को तैयार नहीं । और जो बीएचयू फिल्हाल बिना वीसी के है और छात्राओं पर पुलिस ने डंडे क्यो बरसाये, ये सवाल अब भी बार बार गूंज रहा है और छात्राओं के सवाल अब भी कानो में गूंज रहे होंगे कि बीएचयू कैसे बिगड़ गया । उसे बचाना होगा तो  मदनमोहन मालवीय जी के बीएचयू का हाल ये है कि बीएचयू में 896 रिक्त पद है । यानी  सेन्ट्रल यूनिवर्सिटी के कुल 15862 पदों में से 5958 पद रिक्त पडे हैं । इसीलिये दुनियाभर में टाप यूनिवर्सिटी में अक्सर चर्चा होती है कि नौ छात्रो पर एक शिक्षक होना चाहिये । पर भारत में 23 छात्रों पर एक शिक्षक है । और देश में जिस आईआईटी, आईबीएम और  एनआईटी को बेहतरीन यूनिवर्सिटी का दर्जा दिया जाता है । वहां का हाल ये है कि  6000 से ज्याद पद रिक्त पडे है । और इसके अलावे सिर्फ देशभर के इंजीनियरिंग कालेजों को परख लें तो सरकारी आंकडे ही कहते हैं कि इंजीनिंयरिंग कालेजो के 4 लाख 2 हजार पदो में से एक लाख 22 हजार पद रिक्त पडे है । यानी मुश्किल इतनी भर नहीं है कि सरकार रिक्त पदो पर भर्ती क्यो नहीं करती मुस्किल तो ये भी है कि जिस यूजीसी के मातहत सेन्ट्रल यूनिवर्सिटी आती है । उस यूजीसी के पास कोई परमानेंट चेयरमैन तक नहीं है । एडहाक चैयरमैन है ।  वाइस चैयरमैन का पद भी खाली पडा है । फाइनेनसियल एडवाइजर ही सचिव का काम देख रहा है ।

तो हायर एजूकेशन के लिये यूजीसी से लेकर सेन्ट्रल यूनिवर्सिटी  जब एडहॉक चैयरमैन से लेकर एडहॉक प्रोफेसर पर  निर्भर होगी तो होगा क्या । हो ये रहा है कि बडी तादाद में हायर एजुकेशन के लिये देश के बच्चे दूसरे देशों में जा रहे हैं। और कल्पना कीजिये हायर एजुकेशन को लेकर देश का बजट 33323 करोड रुपये है । जबकि हर बरस दूसरे देसो में पढने जा रहे बच्चो के मां-बाप एक लाख 20 हजार करोड से ज्यादा की रकम खर्च कर रहे है । एसोचैम की रिपोर्ट कहती है 2012 में ही 6 लाख बच्चे हर बरस देओश छोड कर बाहर पढाई के लिये चले जाते थे । तो बीते पांच बरस में इसमें कितना इजाफा हो गया होगा और उनके लिये देश में हायर एजूकेशन की कोई व्यवस्था क्यों नहीं है । ये अपने आप में सवाल है ।

60 बरस पहले कांग्रेस थी..60 बरस बाद बीजेपी है

Wed, 04/10/2017 - 23:49
केरल में बीजेपी की जनरक्षा यात्रा का  नजारा राजनीति जमीन बनाने के लिये है । या फिर राज्य में राजनीतिक हिंसा को रोकने के लिये । ये सवाल अनसुलझा सा है । क्योंकि वामपंथी कैडर और संघ के स्वयंसेवकों का टकराव कितनी हत्या एक दूसरे की कर चुका है, इसे ना तो वामपंथियों के सत्ता पाने के बाद की हिंसा से समझा जा सकता है ना ही सत्ता ना मिल पाने की जद्दोजहद में संघ परिवार के सामाजिक विस्तार से जाना जा सकता है । मसलन एक तरफ बीजेपी और संघ के स्वयंसेवकों के नाम हैं तो दूसरी तरफ सीपीएम के कैडर के लोगो के नाम। सबसे खूनी जिले कुन्नुर में एक तरफ सीपीएम कैडर के तीस लोग हैं, दूसरी तरफ संघ के स्वयंसेवकों के 31 नाम है । सभी मारे जा चुके हैं। राजनीतिक हिंसा तले मारे गये। ये सब बीते 16 बरस की राजनीतिक हिंसा का
सच है। और कुन्नूर की इस हिंसा के परे समूचे केरल का सच यही है । 2001 से 2016 तक कुल 172 राजनीतिक हत्यायें हो चुकी है । जिसमें बीजेपी-संघ के स्वयसेवको की संख्या 65 है तो सीपीएम के कैडर के  85 लोग मारे गये हैं। इसके अलावे कांग्रेस के 11 और आईयूएमएल के भी 11 कार्यकत्ता मारे गये है ।  तो राजनीतिक हिंसा किस राज्य में कितनी है इसके आंकडों के लिये सरकारी एंजेसी एनसीआरबी के आंकडो को भी देखा जा सकता है। जहां देश में पहले नंबर पर यूपी है तो केरल टाप 10 में भी नहीं आता।

लेकिन लड़ाई राजनीतिक है तो राजनीति के अक्स में ही केरल का सच समझना भी जरुरी है । क्योंकि आाजादी के बाद पहली बार लोकतंत्र की घज्जियां उड़ाते हये किसी राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाया तो वह केरल ही था और तब दिल्ली में नेहरु थे। और केरल में नंबूदरीपाद यानी  60 बरस के पहले कांग्रेस ने राजनीति दांव केरल को लेकर चला था । 60 बरस बाद केरल में वामपंथी विजयन की सत्ता है तो दिल्ली में मोदी है । तो दिल्ली की सत्ता तो काग्रेस से खिसक कर बीजेपी के पास आ गई । पर 60 बरस के दौर में बीजेपी केरल की जमीन पर राजनीतिक पैर जमा नहीं पायी । बावजूद इसके की संघ परिवार की सबसे ज्यादा शाखा आजकी तारिख में केरल में ही है । 5000 से ज्यादा शाखा। तो  बीजेपी अब वाम सत्ता को लेकर आंतक-जेहाद और हिंसक सोच से जोड़ रही है । तो अब चाहे खूनी राजनीति को लेकर सियासत हो । लेकिन 60 बरस पहले चर्च के अधिन चलने वाले स्कूल कालेजो  पर नकेल कसने का सवाल था । तब नंबूदरीपाद चाहते थे निजी स्कूलो में वेतन बेहतर हो । काम काज का वातावरण अच्छा हो ।

और इसी पर 1957 में शिक्षा विधेयक लाया गया । कैथोलिक चर्च ने विरोध कर दिया । क्योकि उसके स्कूल-कालेजो की तादाद खासी ज्यादा थी । नायर समुदाय के चैरिटेबल स्कूल-कालेज थे । तो उसने भी विरोध कर दिया । तो उस वक्त काग्रेस नायर समुदाय के लीडर मनन्त पद्ननाभा पिल्लई के पीछे खडी हो गई । और आंदोलन को उसने राजनीतिक हवा दी । हडताल, प्रदर्शन, दंगे से होते हुये  आंदोलन इतना हिसंक हो गया कि  पुलिस ने 248 जगहो पहर लाठीचार्ज किया और तीन जगहो पर गोली चला दी ।डेढ लाख प्रदर्शन कारियो को जेल में ढूसा गया । और जुलाई 1959 में जब एक गर्भवती मधुआरिन पुलिस की गोली से मारी गई तो  उसने आंदोलन की आग में धी का काम किया । और नंबूदरीपाद के मुरीद नेहरु भी तब काग्रेसी सियासत के दवाब में आ गये । वित्त मंत्री मोरारजी देसाई के विरोध और राष्ट्रपति राजेन्द्र प्रसाद के अनिच्छा भरी सहमति के वाबजूद आजाद भारत में पहली बार  चुनी हुई सरकार को बर्खास्त कर राष्ट्रपति शासन लगाने का एलान 31 जुलाई 1959 को कर दिया गया । उसके बाद काग्रेस अपने बूते तो नहीं लेकिन यूडीएफ गठबंधन के आसरे सत्ता में जरुर आई । पर सीपीएम को पूरी तरह डिगा नहीं पायी । पर संघ अपने विस्तार को अब राजनीतिक जुबान देना चाहता है तो पहली बार जनरक्षा यात्रा के दौरान मोदी सरकार के हर  मंत्री को केरल की सडक पर कदमताल करना है । जिससे मैसेज यही जाये कि सवाल सिर्फ केरल का नहीं बल्कि देश का है । तो केरल की वामपंथी सरकार अपना
किला कैसे बचायेगी या फिर किला नहीं ढहा तो जो प्रयोग नेहरु ने राष्ट्रपति शासन लगाकर किया था क्या उसी रास्ते मोदी चल निकलेगें । ये सवाल तो है ।

लेखक विषय संवाद साभार अनुवादक

पहले वो आए साम्यवादियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं साम्यवादी नहीं था

 

फिर वो आए मजदूर संघियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं मजदूर संघी नहीं था

 

फिर वो यहूदियों के लिए आए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं यहूदी नहीं था

 

फिर वो आए मेरे लिए

और तब तक बोलने के लिए कोई बचा ही नहीं था

 

मार्टिन नीमोलर (1892-1984)