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पुण्य प्रसून बाजपेयी

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Updated: 4 hours 57 min ago

ट्रंप-मोदी का गले मिलना गले की फांस ना बन जाये !

Tue, 27/06/2017 - 21:35
अमेरिका में ट्रंप -मोदी का गले मिलना चीन से लेकर पाकिस्तान और ईरान तक के गले नहीं उतर रहा है । तो चीन सिक्किम और अरुणाचल में सक्रिय हो चला है। तो पाकिस्तान कश्मीर और अफगानिस्तान के लिये नई रणनीति बना रहा है और पहली बार अमेरिका के इस्लामिक टैररइज्म के जिक्र के बीच ईरान ने बहरीन, यमन के साथ साथ कश्मीर को लेकर इस्लामिक एकजुटता का जिक्र कहना शुरु कर दिया है। और इन नये हालातो के बीच चीन ने एक तरफ मानसरोवर यात्रा पर अपने दरवाजे से निकलता रास्ता बंद कर दिया है । तो दूसरी तरफ कल जम्मू से शुरु हो रही अमरनाथ यात्रा में अब तक सबसे कम रजिस्ट्रेशन  हुआ है। जबकि परसों से भक्त बाबा बर्फानी के दर्शन कर सकेंगे। तो क्या आतंकवाद के खिलाफ भारत के साथ खडे हुये अमेरिका को लेकर साउथ-इस्ट एशिया नये तरीके से केन्द्र में आ गया है।

तो पहली बार अमेरिका ने आतंकवाद को इस्लाम से जोड़ा और भारत ने इस्लामिक आंतकवाद का शब्द इस्तेमाल ना कर आतंकवाद को कट्टरता से जोड़ा है। बावजूद इसके तीन हालातो पर अब गौर करने की जरुरत है। पहला, ट्रंप ने नार्थ कोरिया का नाम लिया लेकिन पाकिस्तान का नाम नहीं लिया। दूसरा, ईरान को इस्लामिक टैररइज्म से ट्रंप जोड़ चुके हैं। लेकिन भारत ईरान पर खामोश है। तीसरा,ईरान कश्मीर के आतंक को इस्लाम से जोड़ इस्लामिक देशों के सहयोग की बात कर रही है। तो सवाल कई हैं  मसलन आतंक को इस्लामिक टैररइज्म माना जाये। आतंक को दहशतगर्दों का आतंक माना जाये। आतंक को पाकिसातन की स्टेट पॉलेसी माना जाये। और अगर तीनों हालात एकसरीखे ही हैं सिर्फ शब्दो के हेर फेर का खेल है तो नया सवाल  अमेरिका के अंतराष्ट्रीय आतंकवादियों की सूची सैयद सलाउद्दीन के डालने का है। क्योंकि अमेरिकी सूची में लश्कर का हाफिज सईद है। आईएसएस का बगदादी है। हक्कानी गुट का सिराजुद्दीन हक्कानी है । अलकायदा का जवाहरी है।

लेकिन इन तमाम आतंकवादियो की हिंसक आतंकी कार्रवाई लगातार जारी है । और अमेरिकी आंतकी सूची पर यूनाइटेड नेशन ने भी कोई पहल नही की । और खास बात ये है कि अमेरिका के ग्लोबल आतंकवादियों की सूची में 274 नाम है । इसी बरस 25 आतंकवादियों को इस सूची में डाला गया है । यानी नया नाम सैययद सलाउद्दीन का है तो नया सवाल कश्मीर का है। क्योंकि 1989 में सलाउद्दीन  घाटी के इसी आतंकी माहौल के बीच सीमापार गया था और तभी से पाकिस्तान ने अभी तक सैय्यद सलाउ्द्दीन को अपने आतंक के लिये सलाउद्दीन को ढाल बनाया  हुआ था। लेकिन सवाल है कि क्या वाकई अमेरिकी ग्लौबल टैरर लिस्ट में सैयद सलाउद्दीन का नाम आने से हिजबुल के आंतक पर नकेल कस जायेगी। तो जरा आतंक को लेकर अमेरिकी की समझ को भी पहले समझ लें । दरअसल 16 बरस पहले अमेरिकी  वर्लड ट्रेड टावर पर अलकायदा के हमले ने अमेरिका को पहली बार आतंकवादियों की लिस्ट बनाने के लिये मजबूर किया ।

और बीते 16 बरस में अलकायदा के 34 आतंकवादियों को अमेरिका ने ग्लोबल टैरर लिस्ट में रख दिया । लेकिन आतंक का विस्तार जिस तेजी से दुनिया में होता चला गया उसका सच ये भी रहा कि बीते सोलह बरस में एक लाख से ज्यादा लोग आतंकी हिंसा में मारे गये । और अमेरिकी टेरर लिस्ट में अलकायदा के बाद इस्लामिक स्टेट यानी आईएस के 33  आतंकवादियों के नाम शामिल हुये। लेबनान में सक्रिय हिजबुल्ला के 13 आतंकवादी तो हमास के सात आंतकवादियो को ग्लोबल टैटरर लिस्ट में अमेरिका  ने डाल दिया । अमेरिकी लिस्ट में लश्कर और हक्कानी गुट के चार चार आतंकवादियों को भी डाला गया । यानी कुल 274 आंतकवादी अमेरिकी लिस्ट में  शामिल है । और अब कल ही सैयद सलाउद्दीन का नाम भी अमेरिकी ग्लोबल टैरर लिस्ट में आ गया । तो याद कर लीजिये जब पहली बार सलाउद्दीन ने बंदूक ठायी थी । 1987 के चुनाव में कश्मीर के अमिरकदल विधानसभा सीट से सैयद सलाउद्दीन जो तब मोहम्मद युसुफ शाह के नाम से जाना जाता था। मुस्लिम यूनाइटेड फ्रांट के टिकट पर चुनाव लड़ा। हार गया। या कहें हरा दिया गया। तब युसुफ शाह का पोलिंग एंजेट यासिन मलिक था। जो अभी जेकेएलएफ का मुखिया  है। और पिछले दिनो पीडीपी सांसद मुज्जफर बेग ने कश्मीर के हालात का बखान करते करते जब 1987 का जिक्र ये कहकर किया कि सलाउद्दीन हो या यासिन मलिक  उनके हाथ में बंदूक हमने थमायी। यानी उस चुनावी व्यवस्था ने दिल्ली के इशारे पर हमेशा लूट लिया गया। तो समझना होगा कि अभी कश्मीर में सत्ता पीडीपी की ही है। और पहली बार कश्मीर की सत्ता में पीडीपी की साथी  बीजेपी है जिसे घाटी में एक सीट पर भी जीत नहीं मिली।

इसी दौर में पहली बार किसी कश्मीरी आतंकवादी का नाम अमेरिका के अपनी ग्लोबल टैरर लिस्ट में डाला है। यानी उपरी तौर पर कह सकते हैं कि पाकिस्तान को पहली बार इस मायने में सीधा झटका लगा है कि कश्मीर की हिंसा को वह अभी तक फ्रीडम स्ट्रगल कहता रहा। कभी मुशर्रफ ने कहा तो पिछले दिनो नवाज शरीफ ने यूनाइटेड नेशन में कहा। और इसकी वजह यही रही कि भारत ने कश्मीरियों की हिसा को आतंकवाद से सीधे नहीं जोडा लेकिन अब जब सैयद सलाउद्दीन का नाम  ग्लौबल टैरर लिस्ट में डाला जा चुका है तो अब कशमीरियो की हिसा भी आंतकवाद के कानूनी दायरे में ही आयेगी । लेकिन भारत के लिये आंतक से  निपटने का रास्ता अमेरिकी सूची पर नहीं टिका है । क्योंकि सच तो ये भी है कि अमेरिकी ग्लोबल लिस्ट में जिस भी संगठन या जिस भी आतंकवादी का नाम है  उसकी आंतकवादी घटनाओ में कोई कमी आई नहीं है । यानी सिर्फ ग्लोबल टैरर लिस्ट का कोई असर पड़ता नहीं । और तो और यूएन की लिस्ट में लश्कर के हाफिज  सईद का नाम है । लेकिन हाफिज की आतंकी कार्रवाई थमी नहीं है । कश्मीर में आये दिन लश्कर की आंतकी सक्रियता आंतक के नये नये चेहरो के जरीये जारी है । यानी अमेरिकी पहल जब तक पाकिसातन को आंतकी देश घोषित नहीं करती तब तक पाकिस्तान पर कोई आर्थिक प्रतिबंध लग नहीं सकता । और प्रतिबंध ना लगने का मतलब अरबो रुपयो की मदद का सिलसिला जारी रहेगा । यानी अमेरिका अपनी सुविधा के लिये भारत के साथ खडा होकर उत्तर कोरिया का नाम लेकर चीन पर निशाना साध सकता है । लेकिन पाकिसातनी आंतकी संगठन जैश ए मोहम्मद के मुखिया अजहर मसूद को यूएन में चीन के क्लीन चीट पर भारत के साथ भी खडा नहीं होता। पाकिस्तान को आंतकी राज्य नहीं मानता क्योंकि अफगानिस्तान में उसे पाकिसातन की जरुरत है । तो फिर गले लगकर आतंक से कैसे लड़ा जा सकता है जब गले लगना गले की फांस बनती हो ।

क्या 2019 में किसान राजनीति का कोई नया मॉडल दे सकती है ?

Wed, 14/06/2017 - 20:25
मोदी के सामने कोई नेता नहीं टिकता। लेकिन देश में कोई मुद्दा बड़ा हो जाये तो क्या मोदी का जादू गायब हो जायेगा। ये सवाल इसलिये क्योंकि इंदिरा गांधी के दौर को याद कर लीजिये। कहां कोई विपक्ष का नेता इंदिरा गांधी के सामने टिकता था। खासकर 1971 के बाद इंदिरा लारजर दैन लाइफ की इमेज वाली जीती जागती नेता थीं। और कोई सोच भी नहीं सकता था कि इंदिरा की सत्ता जो 1973 तक अजेय दिखायी दे रही थी, 1974 के आते आते वही सत्ता डगमगाते दिखी । उस वक्त जेपी कोई इंदिरा के विकल्प नहीं थे। जेपी सिर्फ जनता के भीतर के सवालों को सतह पर ला रहे थे। और देखते देखते गुजरात से बिहार तक इंदिरा के खिलाफ आम जनता की गोलबंदी ही कुछ इस तरह होती चली गई कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भी आंदोलन में शरीक हो गया। और संघ के भीतर की राजनीतिक कुलबुलाहट को भी पहली बार देवरस ने राजनीतिक शुद्दिकरण से कहीं आगे ला खड़ा किया। ठीक इसी तरह नया सवाल मोदी या कोई विकल्प के ना होने का नहीं बल्कि बेरोजगारी के बाद किसान के मुद्दों को लेकर जो कुलबुलाहट समाज के भीतर पनप रही है, अगर वह सतह पर आ जाये तो क्या देश की राजनीति बदल सकती है।

जाहिर है किसान या युवाओं से जुड़ा मुद्दा राष्ट् य राजनीति में ही उठा-पटक ना कर दे। इस पर बाखूबी मौजूदा सत्ता की नजर भी होगी और मौजूदा सत्ता को भी इंदिरा का दौर याद होगा। तो मुद्दा उभरेगा तो संघ की सक्रियता भी होगी। जैसे किसानों के मुद्दे पर किसान संघ सक्रिय है। यानी आने वाले वक्त में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की पहल मौजूदा सत्ता के लिये तमाम अवरोधों को दूर कर रास्ता निकालने की होगी ही। और मौजूदा हालात को देख कर कोई भी नौसिखिया राजनीतिज्ञ पहली जुबां में ये कह सकता है कि अब संघ स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों को लागू करने के लिये दबाव बनायेगा और  आखिर में मोदी सरकार स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों को लागू कर खुद को नायक के तौर पर स्थापित कर लेगी। ये हो भी सकता है कि ये सब गुजरात चुनाव से एन पहले हो।

लेकिन ये भी पहली बार हो रहा है कि कोई एक दल यानी बीजेपी चुनाव दर चुनाव तो जीत रही है लेकिन देश में राजनीतिक शून्यता और गहरी होती जा रही है। यानी सवाल ये नहीं है कि कांग्रेस हो या वामपंथी या फिर कोई भी विपक्ष या समूचा विपक्ष भी मौजूदा मोदी सरकार का विकल्प बन नहीं पा रहा है या इनका इकट्टा होना भी बीजेपी के लिये कोई खतरे की घंटी नहीं है। क्योंकि जब केन्द्र समेत 17 राज्यों में बीजेपी की सरकार हो चुकी हो और आने वाले वक्त में कर्नाटक, हिमाचल, ओड़िशा को लेकर भी लग रहा हो कि वहा भी बीजेपी आ जायेगी। तो फिर कह सकते है कि बीजेपी स्वर्णिम काल को  जी रही है। संघ के लिये बेहतरीन दौर है जब उसके प्रचारक सत्ता में है और एजेंडा देश में लकीर खींच रहा है। लेकिन इस दौर की बारीकी को समझें तो मुश्किल ये है कि बीजेपी जीत कर भी कमजोर हो रही है। संघ की सत्ता में होने के वाबजूद वह अपने ढलान पर है। और इसी कोई दूसर वजह नहीं बल्कि सिर्फ इतनी सी वजह है कि जिन मुद्दों के कटघरे में देश खड़ा है, उन मुद्दों को अभी तक सुलझाने के लिये जनता ने संघ परिवार या बीजेपी की तरफ देखा।


कांग्रेस सत्ताधारी है और उसकी सत्ता तले ही गरीबी, महंगाई, भ्रष्टाचार , दलाली या संस्थानों के खत्म होने की शुरुआत हुई। और इन्हीं सवालों को नरेन्द्र मोदी ने चुनाव प्रचार के वक्त मुद्दा भी बनाया। लेकिन मोदी के सत्ता में आने के बाद अगर वही सवाल फन उठाये हुये हैं तो नया सवाल ये नहीं है कि फिर से जनता कांग्रेस को ले आये । नया सवाल ये है कि राजनीतिक व्यवस्था से मोहभंग के हालात बनना है। कांग्रेस की राजनीति का पर्याय बीजेपी में नहीं देखना है या कहें कमोवेश हर राजनीतिक दल का मतलब सत्ता में आने के बाद उसका कांग्रेसीकरण हो जाना है। ये भी कोई सोच सकता है। क्योंकि सरकारी आंकडो के लिहाज से ही समझें तो बीते 15 बरस में कमोवेश हर राजनीतिक दल ने एनडीए-यूपीए गठबंधन के दौर में सत्ता की मलाई चखी। लेकिन इन्ही 15 बरस में किसान ही नहीं बल्कि छात्र और बेरोजगार युवाओं की खुदकुशी के सच को परख लें तो हर घंटे दो किसान ने भी खुदकुशी की और हर घंटे दो छात्र या युवा बेरोजगार ने भी खुदकुशी की। 15 बरस में किसानों की खुदकुशी का आंकड़ा 2 लाख 34 हजार से ज्यादा का है। और इन्हीं 15 बरस में छात्रो की खुदकुशी 95 हजार से जेयादा तो युवा बेरोजगारों की खुदकुशी की संख्या एक लाख 44 हजार से ज्यादा की है। तो फिर सत्ता के परिवर्तन ने ही क्या किसान-युवाओ में उम्मीद जगाये रखी कि हालात ठीक हो जायेंगे। अगर ऐसा है तो अगला सवाल ये भी है कि पहली बार किसान जिस तरह अपनी फसल की किमत ना मिलने से परेशान है और सरकार को भी सुझ नहीं रहा है कि आखिर कैसे फसल की किमत को भी देने की व्यवस्था वह कर दें । तो समाधान के रास्ते कर्ज माफी और फसल बीमा से सुलझाने के प्रयास तल खोजे जा रहे हैं। लेकिन राजनीति इस सच से आखे मूंदे हुये है कि किसानों के मुद्दे से आंखे नेहरु के दौर में भी मूंदी गईं। तब लाल बहादुर सास्त्री ने जय जवान का नारे के साथ जय किसान को भी जोड़ा। लेकिन इंदिरा गांधी से लेकर मोदी तक के दौर में किसान कभी पंचवर्षीय योजनाओं में ही नहीं बल्कि हर बरस के बजट मे भी जगह पा नहीं पाया। और 1991 के बाजार इकनॉमी से पहले या बाद के 25 बरस के दौर में ये मान कर हर राजनीतिक सत्ता ने काम किया कि खेती पर जितनी बडी तादाद टिकी हुई है उसमें जीडीपी में खेती का योगदार कम होगा ही। यानी रुपया कहा से कमाया जाये और कहां खर्च किया जाए।

अर्थव्यवस्था की सारी थ्योरी इसी पर टिकी रही। यानी किसान का पेट भरा रहे । किसान के बच्चों को शिक्षा-स्वास्थ्य सर्विस मिले। देश के सोशल इंडेक्स को छूने की स्थिति में किसान भी रहे। ये कभी किसी सरकार ने सोचा ही नहीं। और चुनावी राजनीति को ही लगातार लोकतंत्र का जामा पहनाकर किसान ही नही युवा बेरोजगार और हाशिये पर तबको में जब यही आस जगायी गयी की सत्ता बदलने से हालात बदल जायेंगे तो क्या 2019 का चुनाव इस सोच के विकल्प के तौर पर याद किया जायेगा। क्योंकि 2014 में जो भी वादे गढ़े गये। जो भी राजनीतिक आरोप गढ़े गये, वह सही - गलत जो भी हो लेकिन पहली बार देश प्रचार प्रसार या कहे टेक्नालाजी के जरीये ऐसे चुनावी दौर में आया, जहां जो दिल्ली में दिखायी देता वही मंदसौर में दिखायी दे रहा था । जो मुंबई की हवा में राजनीतिक माहौल की गर्मी थी वही यूपी के किसी गांव में तपिश महसूस की जा रही थी । यानी आर्थिक असामनता के बावजूद चुनावी लोकतंत्र ने महानगर से लेकर गांव तक को एक प्लेटफार्म पर ला खडा कर दिया । और चाहे अनचाहे मोदी सरकार से नहीं बल्कि वोटरो की तादाद से भी चुनावी लोकतंत्र का आकलन होने लगा। और जब देश इतना राजनीतिक हो गया कि हर मुद्दे का राजनीतिक समाधान ही खोजने लगा तो फिर 2019 के चुनाव में ये अक्स क्या हालात पैदा कर सकता है ये किसे पता है। क्योंकि जिस तरह किसानों के संघर्ष व किसानों की त्रासदी , उनके दर्द को हडपने की राजनीतिक दल सोच रहे है उसमें पहली नजर में लग तो यही रहा है कि मोदी की राजनीति के सामने बौने पडते हर राजनीतिक दलों को पहली बार किसान संघर्ष में अपनी सियासी जमीन दिखायी देने लगी है। दरअसल, संसदीय चुनावी राजनीति के अक्स में अगर किसान को वोटर मान कर लोकतंत्र की धार को परखे तो फिर देश के इस अनूठे सच को भी समझ लें कि 2014 के लोकसभा चुनाव में कुल वोटर 83करोड 40 लाख , 82 हजार 814 वोटर थे । जिनमे से बीजेपी को 17 करोड 14 लाख 36 हजार 400 वोट मिले और दूसरी तरफ कांग्रेस को 10 करोड 67 लाख 32 हजार 985 वोट मिले । और देश में किसान मजदूर का सच ये है कि कुल 26 करोड 29 लाख किसान-मजदूर देश में है । जिनमें 11 करोड 86 लाख किसान तो 14 लाख 43 हजार मजदूर । यानी देश के ससंदीय राजनीति के इतिहास में 1951 से लेकर 2014 तक कभी किसी एक पार्टी को देश में मौजूद किसान-मजदूरों की तादाद से ज्यादा वोट नहीं मिला । लेकिन हर राजनीतिक दल के चुनावी घोषणापत्र में किसानों के हक की बात हर किसी ने जरुर की। 2014 में काग्रेस और बीजेपी दोनो ने बकायदा अपने अपने मैनिफेस्टो में किसानो  पर पन्ना भर खर्च भी किया गया। कांग्रेस ने उपलब्धियां गिनायी तो बीजेपी ने भी 2014 के चुनावी घोषणापत्र में 50 फीसदी न्यूनतम समर्थन मूल्य बढ़ाने का वादा किया । और सत्ता में आने अगले बरस ही केन्द्र सरकार 50 फिसदी समर्थन मूल्य बढाने से 2015 में ही पलट गई । बकायदा 21 फरवरी 2015 को कोर्ट में एफिडेविट देकर कहा कि 50 फीसदी न्यूनतम समर्थन मूल्य बढ़ाना संभव नहीं है। सरकार के मुताबिक ऐसा करने से बाजार पर विपरित प्रभाव होगा। और तो और जिन राज्यों में किसानों को प्रति क्विंटल धान पर तीन सौ रुपये का बोनस मिलता था वह भी बंद कर दिया गया । तो सवाल सिर्फ चुनावी वादे और उससे पलटने भर का नहीं है। सवाल तो ये भी है कि भारत ने डब्ल्यूटीओ के साथ समझौता कर 10 फिसदी से ज्यादा समर्थन मूल्य ना बढाने पर हस्ताक्षर किये हुये हैं। तो आखिरी सवाल ये भी है कि जब राजनीतिक सत्ता के लिये बाजार ही मायने रखता है। और बाजार अर्थव्यवस्था में किसान को कोई जगह है ही नहीं तो फिर संसदीय चुनावी लोकतंत्र का मतलब किसान के लिये है क्या। और अगर किसानों की खुदकुशी तले ही चुनावी राजनीति का लोकतंत्र जी रही है तो फिर किसान को करना क्या
चाहिये। क्योंकि एक सच तो ये भी है कि किसानों से जुडे देश भर में 62 किसान संघ काम कर रहे हैं यानी राजनीति कर रहे हैं। और राजनीति करने वाले किसानों की जिन्दगी बदल गई लेकिन किसान की हालत बद से बदतर ही हुई। तो फिर 2019 में राजनीति को ही चुनावी लोकतंत्र की चौखट पर किसान खारिज कर दें या नये तरीके से परिभाषित कर दें । मानिये या ना मानिये हालात उसी दिशा में जा रहे है। जो खतरे की घंटी है। सवाल यही है कि राजनीतिक सत्ता इसे समझेगी या सत्ता के लिये राजनीति इस आग को और भड़कायेगी। और किसान राजनीति के इस सच को समझेंगे और देश को ही राजनीति का नया मॉडल देंगे।

संघर्ष की मुनादी के लिये 72 बरस के बूढ़े का इंतजार

Mon, 12/06/2017 - 23:50
इंदिरा गांधी कला केन्द्र से प्रेस क्लब तक
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खलक खुदा का, मुलुक बाश्शा का / हुकुम शहर कोतवाल का... / हर खासो-आम को आगह किया जाता है / कि खबरदार रहें / और अपने-अपने किवाड़ों को अन्दर से / कुंडी चढा़कर बन्द कर लें /गिरा लें खिड़कियों के परदे /और बच्चों को बाहर सड़क पर न भेजें /क्योंकि , एक बहत्तर बरस का बूढ़ा आदमी अपनी काँपती कमजोर आवाज में / सड़कों पर सच बोलता हुआ निकल पड़ा है ! धर्मवीर भारती ने मुनादी नाम से ये कविता नंवबर 1974 में जयप्रकाश नारायण को लेकर तब लिखी जब इंदिरा गांधी के दमन के सामने जेपी ने झुकने से इंकार कर दिया । जेपी इंदिरा गांधी के करप्शन और तानाशाही के खिलाफ सड़क से आंदोलन की अगुवाई कर रहे थे । और संयोग देखिये या कहे विडंबना देखिये कि 43 बरस पहले 5 जून 1974 को जेपी ने  इंदिरा गांधी के खिलाफ संपूर्ण क्रांति का नारा दिया । और 5 जून 2017 को ही दिल्ली ने हालात पलटते देखे । 5 जून को ही इंदिरा गांधी की तर्ज पर मौजूदा सरकार ने निशाने मीडिया को लिया । सीबीआई ने मीडिया समूह एनडीटीवी के प्रमोटरो के घर-दफ्तर पर छापा मारा । और 5 जून को ही  संपूर्ण क्रांति दिवस के मौके पर दिल्ली में जब जेपी के अनुयायी जुटे तो उन्हे जगह और कही नहीं बल्कि इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र में मिली । यानी जिस दौर में जेपी के आंदोलन से निकले छात्र नेता ही सत्ता संभाल रहे हैं, उस वक्त भी दिल्ली में जेपी के लिये कोई इमारत कोई कार्यक्रम लायक हाल नहीं है जहा जेपी पर कार्यक्रम हो सके । तो जेपी का कार्यक्रम उसी इमारत में हुआ जो इंदिरा गांधी के नाम पर है । और जो सरकार या नेता अपने ईमानदार और सरोकार पंसद होने का सबूत इंदिरा के आपातकाल का जिक्र कर देते है । उसी सरकार , उन्हीं नेताओं ने भी खुद को इंदिरा गांधी की तर्ज पर खडा करने में कोई हिचक नहीं दिखायी ।

तो इमरजेन्सी को  लोकतंत्र पर काला धब्बा मान कर जो सरकार मीडिया पर नकेल कसने निकली उसने खुद को ही जब इंदिरा के सामानातंर खडा कर लिया तो क्या ये मान लिया जाये कि मौजूदा वक्त ने सिर्फ इमरजेन्सी की सोच को  परिवर्तित कर दिया है । उसकी परिभाषा बदल दी है । हालात उसी दिशा में जा रहे हैं? ये सवाल इसलिये  क्योंकि इंदिरा ने तो इमरजेन्सी के लिये बकायदा राष्ट्रपति से दस्तावेज पर हस्ताक्षर करवाये थे । लेकिन मौजूदा वक्त में कोई दस्तावेज नहीं है । राष्ट्रपति के कोई हस्ताक्षर नहीं है । सिर्फ संस्थानों ने कानून या
संविधान के अनुसार काम करना बंद कर दिया है । सत्ता की निगाहबानी में तमाम संस्धान काम कर रहे है । तो इससे बडी विडंबना और क्या हो सकती है कि जेपी का नाम भी लेंगे । और जेपी के संघर्ष के खिलाफ भी खड़े होंगे । इंदिरा का विरोध भी करेंगे और इंदिरा के रास्ते पर भी चलेंगे । दरअसल संघर्ष के दौर में जेपी के साथ खडे लोगों के बीच सत्ता की लकीर खिंच चुकी है । क्योंकि एक तरफ वैसे है जो सत्ताधारी हो चुके है और सत्ता के लिये चारदिवारी बनाने के लिये अपने  एजेंडे के साथ है तो दूसरी तरफ वैसे है जो सत्ता से दूर है और उन्हे लगता है सत्ता जेपी के संघर्ष का पर्याय नहीं  था बल्कि क्रांति सतत प्रक्रिया है। इसीलिये दूसरी तरफ खड़े जेपी के लोगों में गुस्सा है। संपूर्ण क्राति दिवस पर जेपी को याद करने पहुंचे कुलदीप नैयर हो या वेदप्रताप वैदिक दोनो ने माना कि मौजूदा सत्ता जेपी की लकीर  को मिटा कर आगे बढ रही है। वहीं दूसरी तरफ मीडिया पर हमले को लेकर दिल्ली के प्रेस क्लब में 9 जून को जुटे पत्रकारो के बीच जब अगुवाई करने बुजुर्ग  पत्रकारों की टीम सामने आई तो कई सवालो ने जन्म दे दिया। मसलन निहाल सिंह , एचके दुआ, अरुण शौरी , कुलदीप नैयर , पाली नरीमन सरीखे पत्रकारों, वकील जो जेपी के दौर में संघर्षशील थे उन्होंने मौजूदा वक्त के एहसास तले 70-80 के दशक को याद कर तब के सत्ताधारियों से लेकर इमरजेन्सी और प्रेस बिल को याद कर लिया तो लगा ऐसे ही जैसे सिर्फ धर्मवीर भारती की कमी है । जो मुनादी लिख दें । तो देश में नारा लगने लगे कि सिंहासन खाली करो की जनता आती है । लेकिन ना तो इंदिरा गांधी कला केन्द्र में संपूर्ण क्रांति दिवस के जरीय जेपी को याद करते हुये और ना ही प्रेस क्लब में अभिव्यक्ति की आजादी के सवाल भागेदारी के लिये जुटे पत्रकारो को देखकर कही लगा कि वाकई संघर्ष का माद्दा कहीं  है क्योकि सिर्फ मौजूदगी संघर्ष जन्म नहीं देती । संघर्ष वह दृश्टी देती है जिसे 72 बरस की उम्र में जेपी ने संघर्ष वाहिनी से लेकर तमाम युवाओ को ही सडक पर खडा कर उन्ही के हाथ संघर्ष की मशाल थमा दी । और मशाल थामने वालो ने माना कि कोई गलत रास्ता पकडेंगे तो जेपी रास्ता दिखाने के लिये है ।

लेकिन मौजूदा वक्त का सब बडा सच संघर्ष ना कर मशाल थामने की वह होड है जो सत्ता से सौदेबाजी करते हुये दिके और सत्ता जब अनुकुल हो जाये तो उसकी छांव तले अभिव्यक्ति की आजादी के नारे भी लगा लें । और इंदिरा गांधी कला केन्द्र के कमान भी संभाल लें । अंतर दोनों में नहीं है । एक तरफ इंदिरा गांधी कला केन्द्र में जेपी का समारोह करा कर खुश हुआ जा सकता है कि चलो कल तक जहा सिर्फ नेहरु से लेकर राजीव गांधी के गुण गाये जाते थे अब उस इमारत में जेपी का भूत भी घुस चुका है । और प्रेस क्लब में पत्रकारो का जमावडे को जेखकर खुश हुआ जा सकता है चलो सत्ता के  खिलाफ संघर्ष की कोई मुनादी सुनाई तो दी । वाकई ये खुश होने वाला ही माहौल है । संघर्ष करने वाला नहीं । क्योकि जेपी के अनुयायी हो मीडिया  घराने संभाले मालिकान दोनो अपने अपने दायरे में सत्ताधारी है । और सत्ताधारियो का टकराव तभी होता है जब किसी एक की सत्ता डोलती है या दूसरे की सत्ता पहले वाले के सत्ता के लिए खतरे की मुनादी करना लगती है । लेकिन इसका ये मतलब कतई नहीं कि सत्ता इमानदार हो गई है । या सत्ता सरोकार की भाषा सीख गई है । ये खुद में ही जेपी और खुद में ही इंदिरा को बनाये रखने का ऐसा हुनर है जिसके साये में कोई संघर्ष पनप ही नहीं सकता है । क्योकि दोनो तरफ के हालातो को ही परख लें । मसलन जेपी के सत्तादारी अनुनायियो की फेहरिस्त को परखे तो आपके जहन में सवाल उटेगा चलो अच्छा ही किया जो जेपी  के संघर्ष में इनके साथ खडे नहीं हुए । लालू यादव, रामविलास पासवान , राजनाथ सिंह , रविशंकर प्रसाद , नीतीश कुमार से लेकर नरेन्द्र मोदी ही नहीं बल्कि मौजूदा केन्द्र में दर्जनों मंत्री और बिहार-यूपी और गुजरात में मंत्रियो की लंबी फेरहिस्त मिल जायेगी जो खुद को जेपी का अनुनायी । उनके संघर्ष में साथ खडे होने की बात कहेगे । और दूसरी तरफ जो मीडिया समूह घरानो में खुद को तब्दील कर चुके है वह भी इंदिरा के आपातकाल के खिलाफ संघर्ष करने के अनकहे किस्से लेकर मीडिया मंडी में घुमते हुये नजर आ जायेंगे । बीजेपी के तौर तरीके इंदिरा के रास्ते पर नजर आ सकते है और काग्रेस का संघर्ष बीजेपी के इंदिराकरण के विरोध दिखायी भी दे सकता है।

इंदिरा का राष्ट्रवाद संस्थानों के राष्ट्रीकरण में छुपा था । मौजूदा सत्ता का राष्ट्रवाद निजीकरण में छुपा है । इंदिरा के दौर में मीडिया को रेंगने कहा गया तो वह लेट गया और मौजूदा वक्त में मीडिया को साथ खडे होने कहा जा रहा है तो वह नतमस्तक है । इंदिरा के दौर में मीडिया की साख ने मीडिया घरानो को बडा नहीं किया था । लेकिन मौजूदा दौर में पूंजी ने मीडिया को विस्तार दिया है उसकी सत्ता को स्थापित किया है । इंदिरा गांधी के सामने सत्ता के जरीये देश की राजनीति को मुठ्ठी में करने की चुनौती थी । मौजूदैा वक्त में सत्ता के सामने पूंजी के जरीये देश के लोगो को अपने राजनीति एजेंडे तले लाने की चुनौती है । तब करप्शन का सवाल था । तानाशाही का सवाल था । अब राजनीति एजेंडे को देश के एजेंडे में बदलने का सवाल है। सत्ता को ही देश बनाने- मनवाने का सवाल है । तब देश में सत्ता के खिलाफ लोगो की एकजुटता  ही संघर्ष की मुनादी थी । अब सत्ता के खिलाफ पूंजी की एकजूटता ही सत्ता बदलाव की मुनादी होती है । इसीलिये मनमोहन सिंह को गवर्नेंस पाठ कारपोरेट घराने पढाने से नहीं चुकते । 2011-12 में देश के 21 कारपोरेट बकायदा पत्र लिखकर सत्ता को चुनौती देते है । और  मौजूदा वक्त में कारपोरेट की इसी ताकत को सत्ता अपने चहेते कॉरपोरेट में समेटने के लिये प्रयासरत है । तो लडाई है किसके खिलाफ । लड़ा किससे जाये । किसके साथ खड़ा हुआ जाये । इस सवाल को पूंजी की सत्ता ने इस लील लिया है कि कोई संपादक भी किसी को सत्ताधारी का दलाल नजर आ सकता है । और कोई सत्ताधारी भी कारपोरेट का दलाल नजर आ सकता है । लोकतंत्र की परिभाषा वोटतंत्र में इस तरह जा सिमटी है कि जितने वाले को ये गुमान होता है कि चुनावी जीत सिर्फ राजनीतिक दल की जीत नहीं बल्कि देश जीतना हो चुका है और उसकी मनमर्जी से ही अब लोकतंत्र का हर पहिया घुमना चाहिये । और लोकतंत्र के हर पहिये को लगने लगा है कि राजनीतिक सत्ता से आगे फिर वही वोटतंत्र है जिसपर राजनीतिक सत्ता खडी है तो वह करे क्या । ये ठीक वैसे ही है जैसे एक वक्त  राडिया टेप सिस्टम था । एक वक्त संस्थानो को खत्म करना सिस्टम है । एक वक्त बाजार से सबकुछ खरीदने की ताकत विकास था । एक वक्त खाने-जीने को तय करना विकास है । एक वक्त मरते किसानों के बदले सेंसेक्स को बताना ही विकास था । एक वक्त किसान-मजदूरो में ही विकास खोजना है । सिर्फ राजनीतिक सत्ता ने ही नहीं हर तरह की सत्ता ने मौजूदा दौर में सच है क्या । ठीक है क्या । संविधान के मायने क्या है । कानून का मतलब होना क्या चाहिये । आजादी शब्द का मतलब हो क्या । भ्रम पैदा किया और उस भ्रम को ही सच बताने का काम सियासत करने लगी । इसी के सामानांतर अगर मीडिया की स्तात को समझे तो राजनीतिक सत्ता या कहे राजनीतिक पूंजी का सिस्टम उसके जरुरत बना दी गई । प्रेस क्लब में अरुण शौरी इंदिरा-राजीव गांधी के दौर को याद कर ये बताते है कि कैसे अखबारो ने तब सत्ता का बायकॉट किया । प्रेस बिल के दौर में जिस नेता-मंत्री  ने कहा कि वह प्रेस बिल के साथ है तो उसकी प्रेस कान्फ्रेस से पत्रकारों ने उठकर जाने का रास्ता अपनाया । लेकिन प्रेस क्लब में जुटे मीडिया कर्मीयो में जब टीवी पत्रकारों के हुजूम को देखा तो ये सवाल जहन में आया । कि क्या बिना नेता-मंत्री के टीवी न्यूज चल सकती है । क्या नेताओं-मंत्रियों का बायकॉट कर चैनल चलाये जा सकते हैं। क्या सिर्फ मुद्दों के आसरे , खुद को जनता की जरुरतो से जोडकर खबरों को परोसा जा सकता है । जी हो सकता है । लेकिन पहली लड़ाई सस्ंथानों को बचाने की लड़नी होगी । फिर चुनावी राजनीति को ही लोकतंत्र मानने से बचना होगा । पूंजी पर टिके सिस्टम को नकारने का हुनर सिखना होगा । जब सरकार से लेकर नेताओं के स्पासंर मौजूद है तो प्रचार के भोंपू के तौर पर टीवी न्यूज चैनलों के आसरे कौन सी लडाई कौन लडेगा । जेपी की याद तारिखो में सिमटाकर इंदिरा कला केन्द्र अमर है तो दूसरी तरफ प्रेस कल्ब में इंदिरा की इमरजेन्सी को याद कर संघर्ष का रईस मिजाज भी जिवित है ।

मनाइए सिर्फ इतना कि जब मुनादी हो तब धर्मवीर भारती की कविता ' मुनादी ' के शब्द याद रहे......बेताब मत हो / तुम्हें जलसा-जुलूस, हल्ला-गूल्ला, भीड़-भड़क्के का शौक है / बादश्शा को हमदर्दी है अपनी रियाया से / तुम्हारे इस शौक को पूरा करने के लिए / बाश्शा के खास हुक्म से / उसका अपना दरबार जुलूस की शक्ल में निकलेगा / दर्शन करो ! /वही रेलगाड़ियाँ तुम्हें मुफ्त लाद कर लाएँगी / बैलगाड़ी वालों को दोहरी बख्शीश मिलेगी / ट्रकों को झण्डियों से सजाया जाएगा /नुक्कड़ नुक्कड़ पर प्याऊ बैठाया जाएगा / और जो पानी माँगेगा उसे इत्र-बसा शर्बत पेश किया जाएगा / लाखों की तादाद में शामिल हो उस जुलूस में / और सड़क पर पैर घिसते हुए चलो / ताकि वह खून जो इस बुड्ढे की वजह से / बहा, वह पुँछ जाए ! / बाश्शा सलामत को खूनखराबा पसन्द नहीं !.

न कोई सरोकार, न कोई पॉलिसी फिर भी कहा "अन्नदाता सुखी भव"

Thu, 08/06/2017 - 23:15
बीते 25 बरस का सच तो यही है कि देश में सत्ता किसी की रही हो लेकिन किसान की खुदकुशी रुकी नहीं। और हर सत्ता के खिलाफ किसान का मुद्दा ही सबसे बड़ा मुद्दा होकर उभरा। तो क्या ये मान लिया जाये कि विपक्ष के लिये किसान की त्रासदी सत्ता पाने का सबसे धारधार हथियार है और सत्ता के लिये किसान पर खामोशी बरतना ही सबसे शानदार सियासत। क्योंकि राहुल गांधी तो विपक्ष की राजनीति करते हुये मंदसौर पहुंचे लेकिन पीएम खामोशी बरस कजाकस्तान चले गये। कृषि मंत्री राधा मोहन सिंह दिल्ली छोड़ मंदसौर जाने के बदले बिहार चले गये। बाब रामदेव के साथ मोतीहारी में योग करने  लगे और किसानों के हालात पर बोलने की जगह योग पर ही बोलने लगे। तो क्या ये कहा जा सकता है कि राजनीति अपना काम कर रही है और किसान की त्रासदी जस की तस। यानी एक तरफ सत्ता योग कर रही है तो दूसरी तरफ विपक्ष सियासी स्टंट हो रहा है । दरअसल राजनीति के इसी मिजाज को समझने की जरुरत है क्योंकि किसान की फसल बर्बाद हो जाये तो मुआवजे के लाले पड़ जाते हैं।

कर्ज में डूब वह खुदकुशी कर लेता है लेकिन भारत में विधायक-सांसद चुनाव हार कर भी विशेषाधिकार पाये रहता है। हर पूर्व विधायक सांसद को भी किसान की आय से 300 से 400 गुना ज्यादा कम से कम मिलता ही है। देश में किसान की औसत महीने की आय 6241 रुपये है लेकिन विधायक सांसद को पेंशन-सुविधा के  नाम पर हर महीने 2 से ढाई लाख मिलते हैं। तो नेताओं के सरोकार किसान के साथ कैसे हो सकते हैं और संसद के भीतर याद कीजिये तो किसानों को लेकर किसी भी बहस को देख लीजिये संकट कोरम पूरा करने तक का आ जाता है। यानी 15 फिसदी  संसद में किसानों की समस्या पर चर्चा में शामिल नहीं होते। तो फिर किसानों का नाम लेकर राजनीति साधने या सत्ता चलाने का मतलब होता क्या है। क्योंकि राजनीति कर सत्ता पाने के लिये हर राजनीतिक दल को चंदा लेने की छूट है। और चंदा संयोग से ज्यादातर वही कारपोरेट और औघोगिक घराने देते हैं, जिनका  मुनाफा सरकार की उन नीतियो पर टिका होता है जो किसानों के हक में नहीं होती। मसलन खनन से लेकर सीमेंट-स्टील प्लांट की ज्यादातर जमीन खेती की जमीन पर या उसके बगल में होती है।

लेकिन मुश्किल इतनी भर नहीं है। राजनीति कैसे सांसद विधायक के सरोकार किसान-मजदूर से खत्म कर सिर्फ पार्टी के लिये हो जाते है ये एंटी डिफेक्शन बिल के जरीये समझा जा सकता है । मसलन मंदसौर की घटना पर मंदसौर के ही बीजेपी सांसद किसानों पर संसद में वोटिंग होने पर अपनी पार्टी के खिलाफ वोट नहीं दे सकते। यानी मंदसौर के किसान अगर एकजुट होकर स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशो को लागू कराने पर  अड जाये तो मंदसौर का ही सांसद क्या करेगा। व्हिप जारी होने पर पार्टी का साथ देना होगा । क्योंकि याद कीजिये बीजेपी ने भी 2014 के चुनावी  घोषणापत्र में 50 फीसदी न्यूनतम समर्थन मूल्य बढ़ाने का वादा किया। लेकिन 21 फरवरी 2015 को कोर्ट में एफिडेविट देकर कहा कि 50 फीसदी न्यूनतम  समर्थन मूल्य बढ़ाना संभव नहीं है। क्योंकि ऐसा करने से बाजार पर विपरित प्रभाव होगा । यानी चुनावी घोषणापत्र जैसे दस्तावेज में किए वादे का भी  कोई मतलब नहीं। तो फिर चुनावी घोषमापत्र और सरकारो के होने का मतलब ही किसानो के लिये क्या है। क्योंकि महाराष्ट्र में तो बकायदा पीएम और सीएम दोनो ने ही लागत से पचास फिसदी ज्यादा देने का वादा किया था । यानी नेताओं  के सरोकार जब सामाजिक और आर्थिक तौर पर किसानों के साथ होते नहीं है तो  पिर किसानों की बात करने वाला विपक्ष हो किसानों के बदले योग करते हुये कृषि मंत्री हैं। किसानों के जीवन पर फर्क पड़ेगा कैसे। क्योंकि देश की अर्थव्यस्था में किसानी कही टिकती नहीं मसलन देश के ही सच को परख लें।  किसानो पर कुल कर्ज है 12 लाख साठ हजार करोड का है जिसमें फसली कर्ज 7 लाख 70 हजार करोड का है तो टर्म लोन यानी खाद बीज का लोन 4 लाख 85 हजार  करोड का है। और उसके नीचे की लकीर बताती है कि देश के 50 कॉरपोरेट का चार लाख सत्तर हजार करोड़ रुपए का कर्ज संकटग्रस्त है यानी बैंक मान चुकी  है कि वापस आने की संभावना बहुत कम है। कॉरपोरेट को चिंता नहीं कि संकटग्रस्त कर्ज चुकाएगा नहीं तो क्या होगा क्योंकि उसे एनपीए मानने से लेकर री-स्ट्रक्चर करने की जिम्मेदारी सरकार की है। और एनपीए का आलम ये है कि वह 6 लाख 70 हजार करोड़ का हो चुका है । और इन सब के बीच बीते तीन बरस में केन्द्र सरकार ने देश के ओघोगिक घरानों को 17 लाख 14 हजार 461 करोड़ की रियायत टैक्स इंसेटिव के तौर पर दे दी है। तो देश में कभी एनपीए, टैक्स माफी या सकंटग्रस्त तर्ज पर बहस नहीं होती। हंगामा होता है तो किसानों के सवाल पर । क्योंकि देस में 26 करोड पचास लाख परिवार किसानी से जुडे है । तो फिर राजनीति तो किसानी के नाम पर ही होगी । और बाजार इक्नामी के साये तले किसान की अर्थव्यवस्था कहा मायने रखती है। और शायद यही से सवाल खडा होता है कि कर्जमाफी से भी किसान का जीवन बदलता क्यों नहीं।  

ये सवाल इसलिए क्योंकि कर्ज माफी तात्कालिक उपाय से ज्यादा कुछ नहीं-लेकिन किसानों के दर्द पर अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकते हुए राजनेताओं ने इसी उपाय को केंद्रीय उपाय करार दे डाला है। सच तो यह है कि 70 बरस में ऐसी व्यवस्था नहीं हो पाई कि किसान खुद अपने पैर पर खड़ा हो सके। सिर्फ किसान ही क्यो पूंजी से पूंजी बनाने के खेल में जो नहीं है उसके लिये आगे बढने का या कहे जिन्दगी बेहतर बनाने को कोई इक्नामी प्लानिंग देश में हुई ही नहीं है । मसलन यूपी की दो तस्वीरों को याद कर लीजिये। राहुल गांधी की खाट सभा में लोग तीस सौ रुपये की खाट लूटने में ही लग गये और योगी की सभा के बाद लोग 40 रुपये का डस्टबीन लूटने में ही लग गये। जबकि दोनों ही किसान-मजदूर। सिस्टम को बेहतर बनाने की बात कर रहे थे। यानी देश में किसानों की जो माली हालत है, उसमें सुधार कैसे आये और किसान भी गर्व से सीना चौडा कर खेती करें, क्या ऐसे हालात देश में आ सकते है। ये सवाल इसलिये क्योंकि किसानी को बेहतर करने के लिए जो इंतजाम किए जाने चाहिए थे-वो तो हुए नहीं अलबत्ता दर्द से कराहते किसानों को कर्जमाफी के रुप में लॉलीपॉप थमाया गया। तो एक सवाल अब है कि क्या राज्य सरकारें किसानों का कर्ज माफ कर सकती हैं और क्या ऐसा करने से किसानों की दशा सुधरेगी। तो दोनों सवालों का जवाब है कि ये आसान नहीं। क्योंकि कई राज्यों का वित्तीय घाटा जीडीपी के 5 फीसदी से 10 फीसदी तक पहुंच गया है, जबकि नियम के मुताबिक कोई भी राज्य अपने जीडीपी के 3 फीसदी तक ही कर्ज ले सकता है । यानी पहले से खस्ता माली हालत के बीच किसानों की कर्ज माफी का उपाय आसान नहीं है क्योंकि राज्यों के पास पैसा है ही नहीं और विरोध प्रदर्शन के बीच कर्ज माफी का ऐलान हो जाए, बैंक कर्ज माफ भी कर दें तो भी साहूकारों से लिया लोन माफ हो नहीं सकता ।-किसान कर्ज माफी के बाद भी बैंक से कर्ज लेंगे और एक फसल खराब होते ही उनके सामने जीने-मरने का संकट खड़ा हो जाता है,जिससे उबारने का कोई सिस्टम है नहीं । फसल बीमा योजना अभी मकसद में नाकाम साबित हुई है । और कर्ज माफी की संभावनाओं के बीच भी किसान की मुश्किलें बढ़ती ही हैं,क्योंकि वो कर्ज चुकाना नहीं चाहता या चुका सकता अलबत्ता नए कर्ज मिलने की संभावना बिलकुल खत्म हो जाती है। तो सवाल कर्ज माफी का नहीं,सिस्टम का है। और सिस्टम का मतलब ही जब राजनीतिक सत्ता हो जाये तो कोई करें क्या  । तो होगा यही कि आलू दो रुपये किलो होगा और आलू चिस्प 400 रुपये किलो । टमाटर 5 रुपये होगा और टमौटो कैचअप 200 रुपये किलो । और संसद की कैंटीन में चिप्स है, कैचअप है । और पीएम भी कैंटीन की डायरी में लिख देते है, अन्नदाता सुखी भव ।

क्या देश मरघट हो चला है ?

Tue, 06/06/2017 - 23:26
हर घंटे खुदकुशी करता है किसान-छात्र-बेरोजगार युवा


छात्र हो किसान हो या बेरोजगार युवक हो । खुदकुशी लगातार जारी है । साल दर साल जारी है । और सत्ता किसी की भी रहे हालात इतने बदतर हैं कि बीते 15 बरस के दौर में 99 हजार 756 छात्रों ने देश में खुदकुशी कर ली। किसानों की खुदकुशी इन्ही 15 बरस में 2 लाख 34 हजार 642 तक हो गई । और बेरोजगारी भी कैसे देश के युवा को लील रही है, उसकी खुदकुशी के आंकड़े भी 1 लाख 44 हजार 974 है । और साल दर साल छात्र, किसान और बेरोजगारों की खुदकुशी के ये आंकडे सरकारी संगठन एनसीआरबी यानी नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो के हैं । यानी बरस दर बरस खुदकुशी देश में कोई रुदन पैदा नही करती । और इन 15 बर के दायरे में कोई राजनीतिक दल ये कह नही सकता कि उसने सत्ता नहीं भोगी।

क्योंकि न 15 बरस में अटल बिहारी वाजपेयी से लेकर मनमोहन सिंह की सत्ता रही है । और मौजूदा वक्त में मोदी की सत्ता में भी खुदकुशी ना तो छात्रों की रुकी है ना किसानों की ना ही बेरोजगारों की। और सत्ता के लिये सत्ताधारियों से गठबंधन इन 15 बरस में देश की 37 राजनीतिक दलों ने किया । तो दोष दिया किसे जाये? कटघरा बनाया किसके लिये जाये? या फिर उलझ जाया जाये कि किसकी सत्ता में सबसे ज्यादा मौत हुई । सोचिये जो भी लेकिन इस सच के आईने में उस घने अंधेरे पर प्रहार जरुर कीजिये जो सत्ता की राजनीति तले ऐसे सच को भी सही तरीके से बता नहीं पाती । और लगता है जिन्दगी मौत पर भारी हो चली है और उसी जिन्दगी की जद्दोजहद में समाज कुंद हो चला है ।

और धीरे धीरे देश के हालात बताते है कि शिक्षा व्यवस्था चरमरा रही है तो छात्रो के सामने मुश्किल है। रोजगार निकल नहीं रहे तो बेरोजगारी कही ज्यादा मुश्किल हालात पैदा कर रही है। और किसान वह तो हमेशा ही संघर्ष की राह पर है वह पीढियों से देश को अन्न खिलाता जरुर आया है लेकिन खुद के भाग्य का पैसला वह आज भी नहीं कर सकता । और उसकी नियती खुदकुशी ही कैसे होती जा रही है। मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ में बीजेपी लगातार चुनाव जीत रही है । शिवराज और रमन सिंह जीत की हैट्रिक लगाकार 15 बरस से सत्ता में है । वही महाराष्ट्र में कांग्रेस स्तात में 15 बरस रही और ढाई बरस पहले ही बीजेपी की सत्ता आई । लेकिन किसानो की खुदकुशी थमी नहीं । तो आंदोलन की तस्वीर से इतर खुदकुशी की तस्वीर है क्या । आलम ये है कि बीते 15 बरस में महाराष्ट्र में 56215 किसानों ने खुदकुशी की तो मध्यप्रदेश में 19778 किसानों ने खुदकुशी कर ली । ौर इन्ही 15 बरस में छत्तीसगढ में 16,153 किसानों ने खुदकुशी की ।

यानी 15 बरस का एनसीआरबी का ये खुदकुशी का आंकडा ये बताने के लिये काफी है कि किसी सरकार को कभी किसानों की खुदकुशी की फिक्र नहीं रही । यानी एनसीआरबीत हर दूसरे बरस किसानों की खुदकुशी का
आंकडा जारी करती है । तो पांच बरस के लिये सत्ता में आई सरकार को भी दो बरस बाद पता चलता है कि कितने किसानों ने खुदकुशी की । लेकिन बरस दर बरस जिस तरह किसानो की खुदकुशी तीनो राज्यो में होती रही उसमें सबसे बडा सवाल तो यही है कि फिर किसानो की फिक्र है किसे । और खुदकुशी से लेकर फसल के
समर्थन मूल्य और फसल बीमा के सवाल ही नहीं बल्कि खुदकुशी करने वाले किसानो के परिवार को राहत देने के एलान कितने पोपले होते है उसका अंदाज इसी से लग सकता है कि 15 फीसदी किसान परिवार तो ऐसे है जो खुदकुशी को भी विरासत के तौर पर अपना चुके है । और राज्य ही नहीं केन्द्र सरार के राहत पैकेज भी खुदकुशी क्यो रोक नहीं पा रहे है । ये सिर्फ सवाल नहीं बल्कि देश का ऐसा सच है जिससे हर सत्त आंख चुराती है लेकिन किसानो के हर में बोलने से नहीं घबराती । लेकिन कोई सरकार किसानों के हक में क्यो खडी हो नहीं पाती । ये सवाल कोई भी पूछ सकता है ।

तो किसान तो दूर देश में उपभोक्ता संस्कृति और सरकार का कारपोरेटीकरण किस दिसा में देश को ले जा रहा है इसका अंदाजा इससे भी लग सकता है कि सेन्ट्रल इस्टीट्यूट आफ पोस्ट हारवेस्टिंग इंजिनियरिंग एंड टेक्नालाजी ने रिपोर्ट जारी की और बताया कि हर बरस औसतन 92 हजार 651 करोड रुपये का अनाज सरकार ही ब्रबाद कर देती है । और जो किसान आज पर दूध, सब्जी फल उडेल रहा है उसके पीछे का सच तो ये भी है कि सरकार ही हर बरस 31 करोड रुपये से ज्यादा की सब्जी और फल बर्बाद कर देती है । क्योकि सरकार के पास भंडारण के व्यवस्था नहीं है । किसानो की फसल की किमत देने तो दूर उसकी आधी किमत भी उन्हे मिल नही पा रही है । कल्पना किजिये कि हर बरस औसतन 7186 करोड का आम । 3903 करोड का केला । 5005 करोड का आलू और 3666 करोड़ का टमाटर यू ही बर्बाद हो जाता है । वह बी सरकार की ही नीतियों से । तो फिर सड़क पर बहते दूध या फल सब्जी के फेकें जाने से क्या वाकई सरकार दुखी है । ये मुश्किल है । क्योकि कोलकत्ता के इंडियन इंसट्टीटूट आफ मैनेजमेंट की रिसर्च कहती है कि देश में सरकार के पास सिर्फ 10 पिसदी के ही बंडारण के व्यवस्था है । जिस जहब से 2011-12 से लेकर 2016-17 के बीच 61 हजार 824 टन अनाज बर्बाद हो गया ।और जिस महाराष्ट्र में सत्ता किसानो के हक की बात करने के लिये अब बेताब नजर आ रही है उसका सच तो ये बी है कि 2016-17 में देश में कुल 8679 टन अनाज बर्बाद हुआ , उसमें सिर्फ महारा,्ट्र में 7963 टल अनाज बर्बाद हो गया । तो कौन सी सस्कृति में हम जी रहे है ये सवाल तो कोई बच्चा भी पूछ सकता है । खासकर जब देश में बात उपनिषद और गीता से लेकर गाय की हो रही है। पशुधन बचाने का जिक्र हो चला है । ऐसे में किसे फिक्र है कि देश में बीते 15 बरस में औसतन हर एक धंटे में दो किसान खिदकुशी कर रहा है । और छात्र और बेरोजगार युवाओ की तादाद मिला दे तो हर घंटे एक छात्र और एक युवा खुदकुशी कर रहा है । लेकिन इस सच से हर कोई आंख मूंदे हुये है कि जिसनी तादाद में इंसानो की मौत हो रही है उसके सामने संयोग से जानवरो की मौत भी कम पड जायेगी।

टकराव में फंसी दुनिया के लिये आतंकवाद भी मुनाफे का बाजार

Tue, 23/05/2017 - 23:50
भारत ने पहली बार पाकिस्तानी पोस्ट को फायर एसाल्ट से उडाने की विडियो जारी कर खुद को अमेरिका और इजरायल की कतार में खड़ा कर दिया । क्योंकि सामान्य तौर पर भारत या पाकिस्तान ही नहीं बल्कि चीन और रुस भी अपनी सेना का कार्रवाई का वीडियो जारी तो नहीं ही करते हैं। तो इसका मतलब है क्या । क्या अब पाकिसातन अपने देश में राष्ट्रवाद जगाने के लिए कोई वीडियो जारी कर देगा । या फिर समूची दुनिया ही जिस टकराव के दौर में जा फंसी है, उसी में भारत भी एक बडा खिलाड़ी खुद को मान रहा है । क्योंकि दुनिया के सच को समझे तो गृह युद्द सरीखे अशांत क्षेत्र के फेहरिस्त में सीरिया ,यमन , अफगानिस्तान ,सोमालिया , लिबिया , इराक , सूडान और दक्षिण सूडान हैं । तो आतंक की गिरप्त में आये देशों की फेरहिस्त में पाकिस्तान , बांग्लादेश , म्यानमार ,टर्की और नाइजेरिया है।

तो आंतकी हमले की आहट के खौफ तले भारत , फ्रास ,बेल्जियम ,जर्मनी ,ब्रिटेन और स्वीडन हैं । वहीं देशों के टकराव का आलम ये हो चला है कि अलग अलग मुद्दों पर उत्तर कोरिया , दक्षिण कोरिया ,चीन ,रुस ,फिलीपिंस , जापान, मलेशिया ,इंडोनेशिया ,कुर्द और रुस तक अपनी ताकत दिखाने से नहीं चूक रहे। तो क्या दुनिया का सच यही है दुनिया टकराव के दौर में है । या फिर टकराव के पीछे का सच कुछ ऐसा है कि हर कोई आंख मूंदे हुये है क्योकि दुनिया का असल सच तो ये है कि 11 खरब , 29 अरब 62 करोड रुपये का धंधा या हथियार बाजार । जी दुनिया में सबसे बडा धंधा अगर कुछ है तो वह है हथियारों का । और जब दुनिया का नक्शा ही अगर लाल रंग से रंगा है तो मान लीजिये अब बहुत कम जमीन बची है जहा आतंकवाद, गृह युद्द या दोनों देशों का टकराव ना हो रहा हो । और ये तस्वीर ही बताती है कि कमोवेश हर देश को ताकत बरकरार रखने के लिये हथियार चाहिये । तो एक तरफ हथियारों की सलाना खरीद फरोख्त का आंकडा पिछले बरस तक करीब 11 सौ 30 खरब रुपये हो चुका है।

तो दूसरी तरफ युद्द ना हो इसके लिये बने यूनाइटेड नेशन के पांच वीटो वाले देश अमेरिका, रुस , चीन , फ्रासं और ब्रिटेन ही सबसे ज्यादा हथियारो के बेचते है । आंकडो से समझे तो स्टाकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्त इस्टीटयूट के मुताबिक अमेरिका सबसे ज्यादा 47169 मिलियन डालर तो रुस 33169 मिलियन डालर , चीन 8768 मिलियन डालर , फ्रास 8561 मिलियन डालर और ब्रिट्रेन 6586 मिलियन डालर का हथियार बेचता है । यानी दुनिया में शांति स्तापित करने के लिये बने यूनाइटेड नेशन के पांचो वीटो देश के हथियारो के धंधे को अगर जोड दिया जाये तो एक लाख 4 हजार 270 मिलियन डालर होता है । यानी चौथे नंबर पर आने वाले जर्मनी को छोड़ दिया जाये तो हथियारों को बेचने के लिये पांचो वीटो देशो का दरवाजा ही सबसे बडा खुला हुआ है । आज की तारीख में अमेरिका-रुस और चीन जैसे देशों की नजर में हर वो देश है,जो हथियार खऱीद सकता है। क्योंकि हथियार निर्यात बाजार का सबसे बड़ा हिस्सा इन्हीं तीन देशों के पास है । अमेरिका के पास 33 फीसदी बाजार है तो रुस के पास 23 फीसदी और चीन के पास करीब 7 फीसदी हिस्सा है ।यानी अमेरिकी राष्ट्रपति जो दो दिन पहले ही रियाद पहुंचे और दनिया में बहस होने लगी कि इस्लामिक देसो के साथ अमेरिकी रुख नरम क्यो है तो उसके पीछे का सच यही है कि अमेरिका ने साउदी अरब के साथ 110 बिलियन डालर का सौदा किया । यानी सवाल ये नहीं है कि अमेरिका इरान को बुराई देशों की फेहरिस्त में रख कर विरोध कर रहा है । सवाल है कि क्या आने वाले वक्त में ईरान के खिलाफ अमेरिकी सेन्य कार्रवाई दिखायी देगी । और जिस तरह दुनिया मैनेचेस्टर पर हमला करने वाले आईएस पर भी बंटा हुआ है उसमें सिवाय हथियारो को बेच मुनापा बनाये रखने के और कौन सी थ्योरी हो सकती है ।

और विकसित देसो के हथियारो के धंधे का असर भारत जैसे विकासशील देसो पर कैसे पडता है ये भारत के हथियारों की खरीद से समझा जा सकता है । फिलहाल , भारत दुनिया का सबसे बडा या कहे पहले नंबर का देश का जो हथियार खरीदता है । आलम ये है कि 2012 से 2016 के बीच पूरी दुनिया में हुए भारी हथियारों के आयात का अकेले 13 फ़ीसदी भारत ने आयात किया. । स्कॉटहोम इंटरनेशनल पीस रीसर्च इंस्टीट्यूट की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ भारत ने 2007-2016 के दौरान भारत के हथियार आयात में 43 फ़ीसद की बढ़ोतरी दर्ज की गई । और जिस देश में जय जवान-जय किसान का नारा आज भी लोकप्रिय है-उसका सच यह है कि 2002-03 में हमारा रक्षा बजट 65,000 करोड़ रुपये का था जो 2016-17 तक बढ़कर 2.58 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच चुका है. । जबकि 2005-06 में कृषि को बजट में 6,361 करोड़ रुपये मिले थे जो 2016-17 में ब्याज सब्सिडी घटाने के बाद 20,984 करोड़ रुपये बनते हैं । यानी रक्षा क्षेत्र में 100 फीसदी विदेशी निवेश की इजाजत के बावजूद भारत के लिए विदेशों से हथियार खरीदना मजबूरी है। जिसका असर खेती ही नहीं हर दूसरे क्षे6 पर पड रहा है । और जानकारों का कहना है कि भारत हथियार उद्योग में अगले 10 साल में 250 अरब डॉलर का निवेश करने वाला है । यानी ये सवाल छोटा है कि मैनचेस्टर में इस्लामिक स्टेट का आंतकी हमला हो गया । या भारत ने पाकिसातनी सेना की पोस्ट को आंतक को पनाह देने वाला बताया । या फिर सीरिया में आईएस को लेकर अमेरिका और रुस ही आमने सामने है । सवाल है कि टकराव के दौर में फंसी दुनिया के लिये आंतकवाद भी मुनाफे का बाजार है ।

इंसाफ पर ना-पाक मुहर क्यों ?

Thu, 18/05/2017 - 23:29
क्या भारत को वाकई कुलभूषण जाधव मामले में काउंसलर एक्सेस मिल जायेगा। ये सबसे बड़ा सवाल है क्योंकि पाकिस्तान के भीतर का सच यही है कि कुलभूषण जाघव को राजनयिक मदद अगर पाकिस्तान देने देगा तो पाकिस्तान के भीतर की पोल पट्टी दुनिया के सामने आ जायेगी । और पाकिस्तान के भीतर का सच आतंक, सेना और आईएसआई से कैसे जुड़ा हुआ है इसके लिये चंद घटानाओं को याद कर लीजिये। अमेरिकी ट्विन टावर यानी 2001 में 9/11 का हमला। और पाकिस्तान ने किसी अमेरिकी एजेंसी को अपने देश में घुसने नहीं दिया । जबकि आखिर में लादेन पाकिस्तान के एबटाबाद में मिला । इसी तरह अमेरिकी पत्रकार डेनियल पर्ल की हत्या आतंकवादियों ने 2002 में की । लेकिन डेनियल के अपहरण के बाद से लगातार पाकिस्तान ने कभी अमेरिकी एजेंसी को पाकिस्तान आने नहीं दिया। फिर याद कीजिये मुबंई हमला । 26/11 के हमले के बाद तो बारत ने पांच डोजियर पाकिस्तान को सौंपे। सबूतों की पूरी सूची ही पाकिस्तान को थमा दी लेकिन लश्कर-ए-तोएबा को पाकिस्तान ने आंतकी संगठन नहीं माना । हाफिज सईद को आतंकवादी नहीं माना । भारत की किसी एजेंसी को जांच के लिये पाकिस्तान की जमीन पर घुसने नहीं दिया । फिर सरबजीत को लेकर एकतरफा जांच की । पाकिस्तान के ही मानवाधिकार संगठन ने सरबजीत को लेकर पाकिस्तानी सेना की संदेहास्पद भूमिका पर अंगुली उठायी तो भी किसी भारतीय एजेंसी को पाकिस्तान में पूछताछ की इजाजत नहीं दी गई । और जेल में ही सरबजीत पर कैदियों का हमला कर हत्या कर दी।

और दो बरस पहले पठानकोट हमले में तो पाकिस्तान की जांच टीम बाकायदा ये कहकर भारत आई कि वह भी भारतीय टीम को पाकिस्तान आने की इजाजत देगी । लेकिन दो बरस बीत गये और आजतक पाकिस्तान ने पठानकोट हमले की जांच के लिये भारतीय टीम को इजाजत नही दी । यानी अगला सवाल कोई भी पूछ सकता है कि क्या वाकई पाकिस्तान जाधव के लिये भारतीय अधिकारियों को मिलने की इजाजत देगा । यकीनन ये अंसभव सा है । क्योंकि पाकिस्तान के भीतर का सच यही है कि सत्ता तीन केन्द्रों में बंटी हुई है । जिसमें सेना और आईएसआई के सामने सबसे कमजोर चुनी हुई सरकार है. और तीनों को अपने अपने मकसद के लिये आतंकवादी या कट्टरपंछी संगठनो की जरुरत है। और सत्ता के इसी चेक एंड बैलेस में फंसे पाकिस्तान के भीतर कोई भी विदेशी अधिकारी अगर जांच के लिये जायेगा या पिर जाधव से मिलने ही कोई राजनयिक चला गया। तो पाकिस्तान का कौन सा सच दुनिया के सामने आ जायेगा।

लेकिन इंटरनेशनल कोर्ट आफ जस्टिस के फैसले को अगर पाकिस्तान नहीं मान रहा है तो मान लीजिये इसके पीछे बडी वजह पाकिस्तान के पीछे चीन खड़ा है,जो भारत के लिये अगर ये सबसे मुश्किल सबब है , तो पाकिस्तान के लिये सबसे बडी ताकत है । क्योंकि इंटरनेशनल कोर्ट आफ जस्टिस के फैसले को जिस तरह पाकिस्तान ने बिना देर किये खारिज किया उसने नया सवाल तो ये खडा कर ही दिया है कि क्या आईएसजे के फैसले को ना मान कर पाकिस्तान यून में जाना चाहता है । यून में चीन के वीटो का साथ पाकिस्तान को मिल जायेगा ।जैसे जैश के मुखिया मसूद अजहर पर वीटो पर चीन ने बचाया । जाहिर है चीन के लिये पाकिस्तान मौजूदा वक्त में स्ट्रेटजिक पार्टनर के तौर पर सबसे जरुरी है और भारत चीन के लिये चुनौती है । और ध्यान दें तो कश्मीर में आंतकवाद से लेकर इकनामिक कॉरीडोर तक में जो भूमिका चीन पाकिस्तान के साथ खडा होकर निभा रहा है उसमें जाधव मामले में भ चीन पाकिस्तान के साथ खडा होगा इंकार इससे भी नहीं किया जा सकता । लेकिन जाधव मामले में पाकिस्तान का साथ देना चीन को भी कटघरे में खड़ा सकता है । क्योंकि मौजूदा वक्त में इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ जस्टिस के 15 जजो की कतार में चीन के भी जज जियू हनक्वीन भी है । और आज फैसला सुनाते हुये दो बार रोनी अब्राहम ने सर्वसम्मति से दिये जा रहे फैसले का जिक्र किया । तो एक तरफ चीन के जज अगर फैसले के साथ है तो फिर मामला चाहे यूएन में चला जाये वहा चीन कैसे पाकिस्तान के लिये वीटो कर सकता है । लेकिन ये तभी संभव है जब चीन भी जाधव मामले पर आईएसजे के फैसेल को सिर्फ कानूनी फैसला माने । लेकिन सच उल्टा है . कोर्ट का फैसला भारत पाकिस्तान के संबंधो के मद्देनजर सिर्फ कानून तक सीमित नहीं है और चीन का पाकिस्तान के साथ खडे होना या भारत के खिलाफ जाना कानूनी समझ भर नहीं है । बल्कि राजनीयिक और राजनीति से आगे न्यू वर्ल्ड आर्डर को ही चीन जिस तरह अपने हक में खडा करना चाह रहा है उसमें भारत के लिये सवाल पाकिस्तान नहीं बल्कि चीन है । जिससे टकराये बगैर पाकिस्तान के ताले की चाबी भी नहीं खुलेगी ये भी सच है ।

क्योंकि इससे पहले कभी इंटरनेशनल कोर्ट आफ जस्टिस के पैसले को लेकर पाकिस्तान का रुख इस तरह नहीं रहा । क्योकि ये चौथी बार है, जब भारत और पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय कोर्ट में आमने-सामने हैं। और 1945 में बने इंटरनेशनल कोर्ट आफ जस्टिस के इतिहास में ये पहला मौका है जब किसी देश के खिलाफ इतना कडा पैसला दिया गया हो । और याद किजिये तो 18 बरस पहले पाकिस्तान ने इसी इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ जस्टिस का दरवाजा ये कहकर खटखटा था कि भारत ने जानबूझ कर पाकिस्तान के टोही विमान को मार गिराया । जबकि सच यही था कि सोलह सैनिकों को ले जा रहा पाकिस्तान का विमान जासूसी के इरादे से भारत के कच्छ में घुस आया था । और तब कोर्ट की 15 जजो की पीठ ने 21 जून 2000 को पाकिस्तानं के आरोपों को बहुमत से खारिज कर दिया था । और आज पाकिस्तान की दलील जाधव को जासूस बताने की खारिज हुई ।तो पाकिस्तान को दोनो बार मात मिली है। और पन्नों को पलटें तो 1971 के युद्द के बाद पूर्वी पाकिस्तान को भारत ने जब बांग्लादेश नाम का देश ही खडा कर दिया । और 90 हजार पाकिस्तानी सैनिको को बंदी बनाया । युद्द के बाद 1973 में पाकिस्तान भारत के खिलाफ आसीजे पहुंचा। पाकिस्तान ने आरोप लगाया कि भारत 195 प्रिजनर्स ऑफ वॉर्स को बांग्लादेश शिफ्ट कर रहा है, जबकि उन्हें भारत में गिरफ्तार किया गया है। ये गैरकानूनी है। भारत ने इस मामले लड़ाई लड़ी लेकिन जब तक कुछ फैसला हो पाता दोनों देशों ने 1973 में न्यू दिल्ली एग्रीमेंट साइन कर लिया। और उससे पहले 1971 में भारत ने अंतरराष्ट्रीय नागरिक उड्डयन संगठन के अधिकार क्षेत्र के खिलाफ एक मामला दायर किया था। पाकिस्तान ने इस संगठन में भारत की शिकायत की थी। इसमें संगठन ने पाकिस्तान का साथ दिया था इसीलिए इस संगठन के खिलाफ भारत ने अंतरराष्ट्रीय न्यायालय का रुख किया। लेकिन-आसीजे से भारत को निराशा हाथ लगी क्योंकि 18 अगस्त 1972 को फैसला पाकिस्तान के पक्ष में गया था। उस वक्त पाकिस्तान के राष्ट्रपति जुल्फिकार अली भुट्टो ने इंटरनेशनल कोर्ट आफ जस्टिस की खूब वाहवाही की थी । और आज पाकिस्तान उसी इंटरनेशनल कोर्ट आफ जस्टिस के फैसले को गलत बता रहा है । तो सवाल अब कुलभूषण जाधव पर अंतरराष्ट्रीय कोर्ट के फैसले का नहीं बल्कि इंसाफ पर पाकिस्तान के नापाक मुहर का है ।


घाटी के सफर पर 24 घंटे

Fri, 12/05/2017 - 12:34
कल तक बंदूक का मतलब आतंक था, आज वादी की हवाओं में बारुद है......


जहाज ने जमीन को छुआ और तो खिड़की से बाहर का मौसम कुछ धुंधला धुंधला सा दिखायी दिया। तब तक एयर-होस्टेज की आवाज गूंज पड़ी...बाहर का तापमान 27 डिग्री है । उमस भी है। सुबह के 11 बजे थे और जहाज का दरवाजा खुलते ही गर्म हवा का हल्का सा झोंका चेहरे से टकराया। सीट आगे की थी तो सबसे पहले श्रीनगर की हवा का झोंका चेहरे से टकराया। घाटी आना तो कई बार हुआ और हर बार आसमान से कश्मीर घाटी के शुरु होते ही कोई ना कोई आवाज कानों से टकराती जरुर रही कि कश्मीर जन्नत क्यों है। लेकिन पहली बार जन्नत शुरु हुई और जहाज जमीन पर आ गया और कोई आवाज नहीं आई। गर्मी का मौसम है जहाज खाली। किराया भी महज साढे तीन हजार। यानी सामान्य स्थिति होती तो मई में किराया सात से दस हजार के बीच होता। लेकिन वादी की हवा जिस तरह बदली। या कहें लगातार टीवी स्क्रीन पर वादी के बिगड़ते हालात को देखने के बाद कौन जन्नत की हसीन वादियों में घूमने निकलेगा । ये सवाल जहन में हमेशा रहा लेकिन जहाज जमीन पर उतरा तो हमेशा की तरह ना तो कोई चहल-पहल हवाई अड्डे पर नजर आई ना ही बहुतेरे लोगों की आवाजाही। हां, सुरक्षाकर्मियों की सामान्य से ज्यादा मौजूदगी ने ये एहसास जरुर करा दिया कि फौजों की आवाजाही कश्मीर हवाई अड्डे पर बढ़ी हुई है। और बाहर निकलते वक्त ना जाने क्यों पहली बार इच्छा हुई कि हर एयरपोर्ट का नाम किसी शक्स के साथ जुड़ा होता है तो श्रीनगर अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट किसके नाम पर है। और पहली बार नजर गई एक किनारे में लिखा है शेख-उल-आलम एयरपोर्ट। कौन है शेख-उल-आलम...ये सोच
बाहर निकला तो इकबाल हाथ में मेरे नाम का प्लेकार्ड लिये मिल गया। इकबाल । श्रीनगर के डाउन टाउन में रहने वाला। टैक्सी चलाता है । और आज से नहीं 1999 से इकबाल में पहली बार एयरपोर्ट पर ही मिला था । तब मैं भी पहली बार श्रीनगर पहुंचा था। लेकिन तब साथ में कैमरा टीम थी। क्योंकि अमरनाथ यात्रा के दौरान आतंकी हिंसा की रिपोर्ट करने पहुंचा। और उसके बाद दर्जनों बार इकबाल ही हवाईअड्डे पर दिल्ली से एक फोन करने पर पहुंच जाता । और हर बार मेरे सवालों का जबाब देते देते वह शहर पहुंचा देता। ये शेख-उल-आलम कौन थे । जिनके नाम पर श्रीनगर हवाई अड्डा है।

आप पहले व्यक्ति है जो पूछ रहे हैं। जनाब वो संत थे । उन्हें नुन्द श्रृषि । यहां से 60 किलोमीटर दूर कुलगाम के क्योमोह गांव में जन्म हुआ था । बहुत नामी संत थे । कुलगाम चलेंगे क्या । श्रीनगर से अनंतनाग। वहां से 10 किलोमीटर ही दूर है । न न । मैं झटके में बोला । कल सुबह लौटना भी है। कुछ घंटों के लिये इस बार आये है। हां ..रोज टीवी पर रिपोर्ट दिखाते दिखाते सोचा शनिवार का दिन है छुट्टी है। रविवार को लौट जाऊंगा । जरा हालात देख आऊं । लोग हालात देख कर नहीं आते और आप हालात देखने आये हो। अब ये किसी से संभल नहीं रहा है। या कहे कोई संभाल नहीं रहा। आप जो भी कहो। लेकिन हर कोई तो सड़क पर ह। ना कोई काम है । ना कमाई। स्कूल कालेज चलते नहीं। बच्चे क्या करें। और मां बाप परेशान हैं। ये देखिये गिलानी का घर। चारों
तरफ पुलिस वाले क्यों है। सिर्फ सिक्यूरिटी फोर्स ही तो है हर जगह। और इकबाल के कहते ही मेरी नजर बाहर सड़क पर गई तो बख्तरबंद गाडियों में सिक्यूरिटी फोर्स की आवाजाही ने खींच लिया। ये सिर्फ हैदरपुरा [ गिलानी का घर ] में है या पूरे शहर में । शहर में आप खुद ही देख लेना । कहां जायेंगे पहले। सीधे लाल चौक ले चलो। जरा हालात देखूंगा । चहल-पहल देखूंगा । फिर यासिन मलिक से मिलूंगा । अब चलती नहीं है सेपरिस्टों की। क्यों दिल्ली से तो लगता है कि अलगाववादी ही कश्मीर को चला रहे हैं। इकबाल हंसते हुये बोला । जब महबूबा दिल्ली की गुलाम हो गई तो आजाद तो सिर्फ सेपरिस्ट ही बचे। फिर चलती क्यों नहीं। क्योंकि अब लोगों में खौफ नहीं रहा । नई पीढी बदल चुकी है । नये हालात बदल चुके हैं । लेकिन सरकारों के लिये कश्मीर अब भी नब्बे के युग में है। आप खुद ही यासिन से पूछ लेना, नब्बे में वह जवान था। बंदूक लिये घाटी का हीरो था । अब सेपरिस्टों के कहने पर कोई सड़क पर नहीं आता । सेपरिस्ट ही हालात देखकर सड़क पर निकले लोगों के साथ खड़े हो जाते हैं। पूछियेगा यासिन से ही कैसे वादी में हवा बदली है और बच्चे-बच्चियां क्यों सडक पर है । रास्ते में मेरी नजरें लगातार शनिवार के दिन बाजार की चहल-पहल को भी खोजती रही । सन्नाटा ज्यादा नजर आया । सड़क पर बच्चे खेलते नजर आये। डल लेक के पास पटरियों पर पहली बार कोई जोड़ा नजर नहीं आया। और लाल चौक। दुकानें खुली थीं। कंटीले तारों का झुंड कई जगहों पर पड़ा था। सुरक्षाकर्मियों की तादाद हमेशा की तरह थी। लाल चौक से फर्लांग भर की दूरी पर यासिन मलिक का घर। पतली सी गली । गली में घुसते ही चौथा मकान। लेकिन गली में घुसते ही सुरक्षाकर्मियों की पहली आवाज किससे मिलना है । कहां से आये है । खैर पतली गली । और घर का लकड़ी का दरवाजा खुलते ही। बेहद संकरी घुमावदार सीढ़ियां । दूसरे माले पर जमीन पर बिछी कश्मीरी कारपेट पर बैठ यासिन मलिक। कैसे आये । बस आपसे मिलने और कश्मीर को समझने देखने आ गये । अच्छा है जो शनिवार को आये । जुम्मे को आते तो मिल ही नहीं पाते। क्यों ? शुक्रवार को सिक्यूरिटी हमें किसी से मिलने नहीं देती और हमारे घर कोई मिलने आ नहीं पाता । यानी । नजरबंदी होती है । तो सेपरिस्टो ने अपनी पहचान भी तो जुम्मे के दिन पत्थरबाजी या पाकिस्तान का झंडा फरहाने वाली बनायी है । आप भूल कर रहे हैं । ये 90 से 96 वाला दौर नहीं है । जब सेपरिस्टो के इशारे पर बंदूक उठायी जाती। या सिक्यूरिटी के खिलाफ नारे लगते । क्यों 90 से 96 और अब के दौर में अंतर क्या आ गया है। हालात तो उससे भी बुरे लग रहे हैं। स्कूल जलाये जा रह हैं। लड़कियां पत्थर फेंकने सड़क पर निकल पड़ी हैं। आतंकी खुलेआम गांव में रिहाइश कर रहे है । किसी आतंकी के जनाजे में शामिल होने  लिये पूरा गांव उमड़ रहा है । तो आप सब जानते ही हो तो मैं क्या कहूं । लेकिन ये सब क्यों हो रहा है ये भी पता लगा लीजिये । ये समझने तो आये हैं। और इसीलिये आपसे मिलने भी पहुंचे हैं। देखिये अब सूचना आप रोक नहीं सकते। टेक्नालाजी हर किसी के पास है । या कहे टेक्नालाजी ने हर किसी को आपस मे मिला दिया है । 90-96 के दौर में कश्मीरियों के टार्चर की कोई कहानी सामने नहीं आ पाई । जबकि उस दौर में क्या कुछ हुआ उसकी निशानी तो आज भी मौजूद है । लेकिन देश – दुनिया को कहां पता चला । और अब जीप के आगे कश्मीरी को बांध कर सेना ने पत्थर से बचने के लिये ढाल बनाया तो इस एक तस्वीर ने हंगामा खड़ा कर दिया । पहले कश्मीर से बाहर पढ़ाई कर रहा कोई छात्र परेशान होकर वापस लौटता तो कोई नहीं जानता था। अब पढे-लिखे कश्मीरी छात्रों के साथ देश के दूसरे
हिस्से में जो भी होता है, वह सब के सामने आ जाता है । कश्मीर के बाहर की दुनिया कश्मीरियों ने देख ली है। इंडिया के भीतर के डेवलेपमेंट को देख लिया है । वहां के कालेज, स्कूल, हेल्ख सेंटर , टेक्नालाजी सभी को देखने
के बाद कश्मीरियों में ये सवाल तो है कि आखिर ये सब कश्मीर में क्यों नहीं । घाटी में हर चौराहे पर सिक्यूरिटी क्यों है ये सवाल नई पीढ़ी जानना चाहती है । उसे अपनी जिन्दगी मे सिक्यूरिटी दखल लगती है। आजादी के मायने बदल गये है बाजपेयी जी । अ

अब  आजादी के नारो में पाकिस्तान का जिक्र कर आप नई पीढी को गुमराह नहीं कर सकते हैं। तो क्या सेपरिस्टो की कोई भूमिका नहीं है । आतंकवाद यूं ही घाटी में चल रहा है। गांव के गांव कैसे हथियारों से
लैस हैं। लगातार बैंक लूटे जा रहे हैं। पुलिस वालों को मारा जा रहा है । क्या ये सब सामान्य है । मैं ये कहां कह रहा हू सब सामान्य है । मैं तो ये कह रहा हूं कि कश्मीर में जब पीढी बदल गई, नजरिया बदल गया । जबकि दिल्ली अभी भी 90-96 के वाकये को याद कर उसी तरह की कार्रवाई को अंजाम देने की पॉलिसी क्यों अपनाये हुये है । क्या किसी ने जाना समझा कि वादी में रोजगार कैसे चल रहा है । घर घर में कमाई कैसे हो रही है । बच्चे पढाई नही कर पा रहे है । तो उनके सामने भविष्य क्या होगा । तो स्कूल जला कौन रहा है । स्कूल जब नहीं जले तब पांच महीने तक स्कूल बंद क्यों रहे...ये सवाल तो आपने कभी नहीं पूछा । तो क्या सेपरिस्ट स्कूल जला रहे हैं । मैंने ये तो नहीं कहा। मेरे कहने का मतलब है जनता की हर मुश्किल के साथ अगर दिल्ली खड़ी नहीं होगी तो उसका लाभ कोई कैसे उठायेगा, ये भी जले हुये स्कूलों को देखकर समझना चाहिये। हुर्रियत ने तो स्कूलों की जांच कराने को कहा । मैंने खुद कहा कौन स्कूल जला रहा है सरकार को बताना चाहिये। आप नेताओं से मिलें तब आपको सियासत समझ में समझ में आयेगी । फिर आप खुद ही लोगों से मिलकर पूछें कि आखिर ऐसा क्या हआ की जो मोदी जी चुनाव से पहले कश्मीरियत का जिक्र कर रहे थे वह वही मोदी जी चुनाव परिणाम आने के बाद कश्मीरियो से दूरी क्यों बना बैठे । और चुनी हुई महबूबा सरकार का मतलब है कितना । यासिन से कई
मुद्दो पर खुलकर बात हुई । बात तो इससे पहले भी कई बार हुई थी । लेकिन पहली बार यासिन मलिक ने देश की राजनीति के केन्द्र में खडे पीएम मोदी को लेकर कश्मीर के हालात से जोडने की वकालत की । सीरिया और आईएसआईएस के संघर्ष तले कश्मीर के हालात को उभारने की कोशिश की । करीब दो घंटे से ज्यादा वक्त गुजारने के बाद मोहसूना [ यासिन का घर } से निकला तो श्रीनगर में कई लोगो से मुलाकात हुई । लेकिन जब बात एक पूर्व फौजी से हुई और उसने जो नये सवाल खडे किये । उससे कई सवालों के जबाव पर ताले भी जड दिये। मसलन पूर्व फौजी ने साफ कहा , जिनके पास पैसा है । जिनका धंधा बडा है । कमाई ज्यादा है । उनपर क्या असर पडा । क्या किसी ने जाना । और जब वादी के हालात बिगड चुके है जब उसका असर जम्मू पर कैसे पड रहा होगा क्या किसी ने जाना । क्या असर हो रहा है । आप इंतजार किजिये साल भर बाद आप देखेगें कि
जम्मू की डेमोग्राफी बदल गई है । वादी में जो छह महीने काम-कमाई होती थी जब वह भी ठप पडी चुकी है तो फिर धाटी के लोग जायेगें कहा । कमाई-धंधे का केन्द्र जम्मू बन रहा है । सारे मजदूर । सारे बिजनेस जम्मू शिफ्ट हो रहे है ।जिन हिन्दु परिवारो को लगता रहा कि घाटी में मिस्लिम बहुतायत है और जम्मू में हिन्दू परिवार तो हालात धीरे धीरे इतने बदल रहे है कि आने वाले वक्त में मुस्लिमो की तादाद जम्मू में भी ज्यादा हो जायेगी । और जम्मू से ज्यादा बिसनेस जब कश्मीर में है तो फिर जम्मू के बिजनेस मैन भी कश्मीरियो पर ही टिके है । लेकिन चुनी हुई सरकार के होने के बावजूद सेना ही केन्द्र में क्यो है । और सारे सवाल सेना को लेकर ही क्यू है । कोई महबूबा मुफ्ती को लेकर सवाल खडा क्यो नहीं करता । ये बात आप नेशनल कान्प्रेस वालो से पूछिये या फिर किसी भी नेता से पूछिये आपको समझ में आ जायेगा । लेकिन आपको क्या मानना है कि महबूबा बेहद कमजोर सीएम साबित हुई है । महबूबा कमजोर नहीं मजबूत हो रही है । उसका कैडर । उसकी राजनीति का विस्तार हो
रहा है । वह कैसे । हालात को बारिकी से समझे । घाटी में जिसके पास सत्ता है उसी की चलेगी । सिक्यूरटी उसे छुयेगी नहीं । और सिक्रयूरटी चुनी हुई सरकार के लोगोग को छेडेगी भी नहीं । महबूबा कर क्या रही है । उसने
आंतकवादियो को ढील दे रखी है । सेपरिस्टो [ अलगाववादियों ] को ढील दे रखी है । पत्थरबाजो के हक में वह लगातार बोल रही है । तो फिर गैर राजनीतिक प्लेयरो की राजनीतिक तौर पर  नुमाइन्दगी कर कौन रहा है । पीडीपी कर रही है । पीडीपी के नेताओ को खुली छूट है । उन्हे कोई पकडेगा नहीं । क्योकि
दिल्ली के साथ मिलकर सत्ता की कमान उसी के हाथ में है । और दिल्ली की जरुरत या कहे जिद इस सुविधा को लेकर है कि सत्ता में रहने पर वह अपनी राजनीति या एंजेडे का विस्तार कर सकती है । लेकिन बीजेपी इस सच को ही समझ नहीं पा रही है कि पीडीपी की राजनीति जम्मू में भी दखल देने की स्थिति में आ रही है । क्योकि जम्मू सत्ता चलाने का नया हब है । और कमान श्रीनगर में है । फिर जब ये खबर ती है कि कभी सोपोर में या कभी शोपिया में सेना ने पत्थरबाजो या तकवादियो को पनाह दिये गांववालो के खिलाफ आपरेशन शुरु कर
दिया है तो उसका मतलब क्या होता है । ठीक कहा आपने दो दिन पहले ही 4 मई को शोपिया में सेना के आपरेशन की खबर तमाम राष्ट्रीय न्यूज चैनलो पर चल रही थी । जबकि शोपियां का सच यही है कि वहा गांव-दर-गांव आंतकवादियो की पैठ के साथ साथ पीडीपी की भी पैठ है । अब सत्ताधारी दल के नेताओ को सिक्यूरिटी देनी है और नेता उन्ही इलाको में कश्मीरियों को साथ खडाकर रहे है जिन इलाको में आंतक की गूंज है । तो सिक्यूरटी वाले करे क्या । इस हालात में होना क्या चाहिये । आप खुद सोचिये । सेना में कमान हमेशा एक के पास होती है तभी कोई आपरेशन सफल होता है लेकिन घाटी में तो कई हाथो में कमान है । और सिक्यूरटी फोर्स सिवाय सुरक्षा देने के अलावे और कर क्या सकती है । हम बात करते करते डाउन-टाउन के इलाके में पहुंच चुके थे । यहां इकबाल का घर था तो उसने कारपेट का बिजनेस करने वाले शौहेब से मुलाकात
करायी । और उससे मिलते ही मेरा पहला सवाल यही निकला कि बैंक लूटे जा रहे है । तो क्या लूट का पैसा आंतकवादियो के पास जा रहा है । शौहेब ने कोई जबाव नहीं दिया । मैने इकबाल  तरफ देखा । तो आपस में कस्मीरी में दोनों ने जो भी बातचीत की उसके बाद शौहेब हमारे साथ खुल गया । लेकिन जवाबा इतना ही
दिया कि मौका मिले तो जे एंड के बैंक के बारे में पता कर लीजिये । ये किसको लोन देते है । कौन  जिन्होने लोन नहीं लौटाया । और जिन्होंने लोन लिया वह है भी की नहीं । तो क्या एनपीए का आप जिक्र कर रहे है । आप कह
सकते है एनपीए । लेकिन जब आपने बैंक के लूटने का जिक्र किया तो मै सिर्फ यहीं समझाना चाह रहा हूं कि बैक बिना लूटे भी लूटे गये है । लूटे जा रहे है । लूटने का दिखावा अब इसलिये हो रहा है जिससे बैक को कोई जवाब ना देना पडे । डाउन डाउन में ही हमारी मुलाकात दसवी में पढाई करने वाले छात्र मोहसिन वानी से हुई । निहायत शरीफ  । जानकारी का मास्टर । परीक्षा देकर कुछ करने का जनुन पाले मोहसिन से जब हमने उसके स्कूल के बार में पूछा तो खुद सेना के स्कूल में अपनी पढाई से पहले उसने जो कहा , वह शायद भविष्य
के कश्मीर को पहला दागदार चेहरा हमें दिखा गया । क्योंकि जिक्र तो सिर्फ उसकी पढाई का था । और उसने झटके में घाटी में स्कूल-कालेजो का पूरा कच्चा-चिट्टा ये कहते हुये हमारे सामने रख दिया कि अगर अब मुझसे स्कूल और हमारी पढाई के बारे में पूछ रहे है तो पहले ये भी समझ लें सिर्फ 20 दिनों में कोई स्कूल साल भर की पढाई कैसे करा सकता है । लेकिन घाटी में ये हो रहा है । क्योंकि कश्मीर घाटी में बीते 10 महीनो में कुल जमा 46 दिन स्कूल कालेज खुले । आर्मी पब्लिक स्कूल से लेकर केन्द्रीय विद्यालय तक और हर कान्वेंट से लेकर हर लोकल स्कूल तक । आलम ये है कि वादी के शहरों में बिखरे 11192 स्कूल और घाटी के ग्रामीण इलाको में सिमटे 3 280 से ज्यादा छोटे बडे स्कूल सभी बंद हैं । और इन स्कूल में जाने वाले करीब दो लाख से ज्यादा छोटे बडे बच्चे घरो में कैद हैं । ऐसे में छोटे छोटे बच्चे कश्मीर की गलियों में घर के मुहाने पर खड़े होकर टकटकी लगाये सिर्फ सड़क के सन्नाटे को देखते रहते हैं। और जो बच्चे कुछ बड़े हो गये हैं, समझ रहे हैं कि पढ़ना जरुरी है । लेकिन उनके भीतर का खौफ उन्हे कैसे बंद घरों के अंधेरे में किताबो से रोशनी दिला पाये ये किसी सपने की तरह है। क्योंकि घाटी में बीते 10 महीनो में 169 कश्मीरी युवा मारे गये हैं। और इनमें से 76 बच्चे हाई स्कूल में पढ़ रहे थे । तो क्या बच्चो का ख्याल किसी को नहीं । नही हर कोई हिंसा के बीच आतंक और राजनीतिक समाधान का जिक्र तो कर रहा है लेकिन घरो में कैद बच्चो की जिन्दगी कैसे उनके भीतर के सपनों को
खत्म कर रही है और खौफ भर रही है , इसे कोई नहीं समझ रहा है । लेकिन अब तो सरकार कह रही है स्कूल कालेज खुल गये । और बच्चे भटक कर हाथो में पत्थर उठा लिये है तो वह क्या करें । ठीक कह रहे है आप । आप दिल्ली से आये है ना । तो ये भी समझ लिजिये स्कूल कालेज खुल गये हैं लेकिन कोई बच्चा इसलिये स्कूल नहीं आ पाता क्योंकि उसे लगता है कि स्कूल से वह जिन्दा लौटेगा या शहीद कहलायेगा। बच्चे के भीतर गुस्सा देख मै खुद सहम गया । मै खुद भी सोचने लगा जिन बच्चो के कंघे पर कल कश्मीर का भविष्य होगा उन्हे कौनसा भविष्य मौजूदा वक्त में समाज और देश दे रहा है इसपर हर कोई मौन है । और असर इसी का है कि घाटी में 8171 प्राइमरी स्कूल, 4665 अपर प्राईमरी स्कूल ,960 हाई स्कूल ,300 हायर सेकेंडरी स्कूल, और सेना के दो स्कूल में वाकई पढाई हो ही नही रही है ।  श्रीनगर से दिल्ली तक कोई सियासतदान बच्चों के बार में जब सोच नहीं रहा है । हमारी बातचीत सुन खालिद भी आ गया था । जो बेफ्रिकी से हमे सुन रहा था । लेकिन जब मैने टोका खालिद आप कालेज में पढते है । तो उसी बेफ्रिकी के अंदाज में बोला...पढता था । क्यों अब । वापस आ गया । कहां से । कोटा से । राजस्थान में है । वापस क्यो आ गये । खबर तो बनी थी कश्मीर के लडको को राजस्थान में कैसे कालेज छोडने को कहां गया । मुझे भी याद आया कि सिर्फ राजस्तान ही नहीं बल्कि यूपी में कश्मीरी छात्रो को वापस कश्मीर लौटने के लिये कैसे वही के छात्र और कुछ संगठनो ने दवाब बनाया । बाद में गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने इसका विरोध किया । लेकिन ये मुझे खालिद से मिलकर ही पता चला कि दिल्ली की
आवाज भी कश्मीरी छात्रों के लिये बे-असर रही । फिर भी मैने खालिद को टटोला अब आगे की पढाई । तो उसी गुस्से भरे अंदाज में खालिद बोल पडा सीरिया में बीते 725 दिनों से बच्चों को नहीं पता कि वह किस दुनिया में जी रहे हैं। स्कूल बंद हैं। पढ़ाई होती नहीं । तो ये बच्चे पढ़ना लिखना भी भूल चुके हैं। और समूची दुनिया में इस सच को लेकर सीरिया में बम बरसाये जा रहे हैं कि आईएसआईएस को खत्म करना है तो एक मात्र रास्ता हथियारों का है । युद्द का है। लेकिन वक्त के साथ साथ बड़े होते बच्चों को दुनिया कौन सा भविष्य दे रही है इसपर समूची दुनिया ही मौन है । इसके बाद बातचीत को कईयो से हुई । 90-96 के आंतकवाद के जख्मो को भी टटोला और अगले दिन यानी रविवार को सुबह सुबह जब एयरपोर्ट के निकल रहा था तो चाहे अनचाहे इकबाल बोला , सर
आपको सीएम के घर की तरफ से ले चलता हूं । वक्त है नहीं । फिर मिलना भी नहीं है । अरे नहीं सर ..मिलने नहीं कह रहा हू । आपने फिल्म हैदर देखी थी । हां क्यों । उसमें सेना के जिन कैंपों का जिक्र है । जहां आतंकवादियो को रखा जाता था । कन्सनट्रेशन कैंप । हा, वही कैंप, जिसमें कश्मीरियों को बंद रखा
जाता था । उसे श्रीनगर में पापा कैंप के नाम से जानते हैं। और श्रीनगर में ऐसे तीन कैंप थे । लेकिन मैं आपको पापा-2 कैंप दिखाने ले जा रहा हूं । कन्सनट्रैशन कैंप अब तो खाली होगा । नहीं.. वही तो दिखाने ले जा रहा हूं
। और जैसे ही सीएम हाउस शुरु हुआ ...इकबाल तुरंत बोल प़डा , देख लीजिए,,यही है पापा-2 । तो 1990-96 के दौर के कन्सनट्रैशन कैप को ही सीएम हाउस मे तब्दील कर दिया गया । मैंने चलती गाड़ी से ही नजरों को घुमा कर देखा और सोचने लगा कि वाकई घाटी में जब आंतकवाद 90-96 के दौर में चरम पर था और अब जब आतंकवाद घाटी की हवाओ में समा चुका है तो बदला क्या है आंतकवाद...कश्मीर या कश्मीर को लेकर सियासत का आंतकी चेहरा ।

क्योंकि मेरे जहन में सीएम हाउस को देखकर पापा-टू कैप में रखे गये उस दौर के आंतकवादी मोहम्मद युसुफ पैरी  याद आ गया । जिसने आंतक को 90 के दशक में अपनाया । पाकिस्तान भी गया । पाकिस्तान में हथियार चलाने की ट्रेनिंग भी ली । उसकी पहचान कूकापैरी के तौर पर बनी । वह उस दोर में जेहादियो का आदर्श था । लेकिन पाकिसातन के हालात को देखकर लौटा तो भारतीय सेना के सामने सरेंडर कर दिया । फिर मुख्यधारा में शामिल होने के लिये इखवान नाम का संगठन शुरु किया । जो आतंकवाद के खिलाफ था । और कूकापैरी जो कि मुसलमान था । कश्मीरी था । आतंकवादी बन कर आजादी के लिये निकला था । वही कूकापैरी जब आंतकवाद के खिलाफ खडा हुआ तो कश्मीर में हालात सामान्य होने लगे । उसी के आसरे 1996 में भारत कश्मीर में चुनाव करा सका । वह खुद भी चुनाव लड़ा । जम्मू कश्मीर आवामी लीग नाम की पार्टी बनायी ।  विधायक बना । और आंतकवाद के जिस दौर में फारुख अबंदुल्ला लंदन में गोल्फ खेल रहे थे । वह चुनाव लडने 1996 में वापस इंडिया लौटे । और चुनाव के बाद फारुख अब्दुल्ला को दिल्ली ने सत्ता थमा दी । और कूकापैरी को जब बांदीपूरा के हसैन सोनावारी में जेहादियो ने गोली मारी तो उसके अंतिम संस्कार में सत्ताधारी तो दूर । डीएम तक नहीं गया । कश्मीर के आतंक के दौर की ऐसी बहुतेरी यादें लगातार जहन में आती रही और सोचने लगा कि वाकई घाटी में जब आंतकवाद 90-96 के दौर में चरम पर था और अब जब आतंकवाद घाटी की हवाओं में समा चुका है तो बदला क्या है आतंकवाद...कश्मीर या कश्मीर को लेकर सियासत का आतंकी चेहरा । ये सोचते सोचते कब दिल्ली दिल्ली आ गया और कानों में एयर होस्टेज की आवाज सुनाई पड़ी कि बाहर का तापमान 36 डिग्री है । सोचने लगा सुबह 11 बजे दिल्ली इतनी गर्म । और जन्नत की गर्माहट के बीच सुकून है कहां ।






सवाल जन-विश्वास का है ना कि केजरीवाल-कुमार विश्वास का

Wed, 03/05/2017 - 23:08
आप की राजनीति चुक गई लेकिन आंदोलन की जमीन जस की तस है

तो क्या केजरीवाल-विश्वास के बीच दरार की वजह सिर्फ अमानतुल्ला थे । और अब अमानतुल्ला को पार्टी से सस्पेंड कर दिया गया तो क्या केजरीवाल का विश्वास कुमार पर लौट आया । या फिर कुमार के भीतर केजरीवाल को लेकर विश्वास जाग गया । क्योंकि केजरीवाल से लंबी बैठक के बाद मनीष सिसोदिया के साथ खड़े होकर कुमार ने अपना विश्वास आप में लौटते हुये दिखाया जरुर । लेकिन आप के भीतर का संकट ना तो अमानतुल्ला है ना ही कुमार विश्वास का गु्स्सा। और ना ही केजरीवाल की लीडरशिप। और ना ही आरोप-प्रत्यारोप का सिलसिला । आप के संकट तीन हैं। पहला , आप नेताओ को लगता है वही आंदोलन है । दूसरा, आंदोलन की तर्ज पर गवर्नेंस चलाने की इच्छा है । तीसरा , चुनावी जीत के लिये पार्टी संगठन का ताना-बाना बुनना है। यानी करप्शन और आंदोलन की बात कहते कहते कुमार विश्वास राजस्थान के प्रभारी बनकर महत्व पा गये।
यानी पारंपरिक राजनीतिक दल के पारपंरिक प्रभावी नेता का तमगा आप और कुमार विश्वास के साथ भी जुड़ गया । तो क्या आने वाले वक्त में कुमार की अगुवाई में आप राजस्थान जीत लेगी । यकीनन इस सवाल को दिल्ली के बाद ना तो पंजाब में मथा गया। ना गोवा में मथा गया । ना ही राजस्थान समेत किसी भी दूसरे राज्य में मथा जा रहा है। चूंकि आप के नेताओं को लगता है कि वही आंदोलन है । तो चुनाव को भी आप आंदोलन की तरह ना मान कर पारंपरिक लीक को ही अपना रही है। तो बड़ा सवाल है, जनता डुप्लीकेट को क्यों जितायेगी। और दिल्ली चुनाव के वक्त को याद किजिये। 2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी का परचम देश भर में कांग्रेस की सत्ता के खिलाफ लहराया। लेकिन दिल्ली में आप इसलिये जीत गई क्योंकि चुनाव आप नहीं आम जनता लड़ रही थी। आम जनता के भीतर पारंपरिक बीजेपी-काग्रेस को लेकर सवाल थे । यानी आप में ठहराव आ गया । चुनावी जीत की रणनीति को ही जन-नीति मान लिया गया । सिस्टम से लड़ते हुये दिखना ही सिस्टम बदलने की कवायद मान लिया गया । तो याद कीजिये आंदोलन की इस तस्वीर को। आप के नेता जनता को रामलीला मैदान में बुला नहीं रहे थे। जनता खुद ब खुद रामलीला मैदान में आ रही थी । यानी आंदोलन से विकल्प पैदा हो सकता है ये जनता ने सोचा । और विकल्प चुनाव लड़कर, जीत कर किया जा सकता है ये उम्मीद आप पार्टी बनाकर केजरीवाल ने जगायी। लेकिन चुनावी जीत के बाद के तौर तरीके उसी गवर्नेंस में खो गये, जिस गवर्नैंस में पद पर बैठकर खुद को सेवक मानना था । वीआईपी लाल बत्ती कल्चर को छोडना था । जन सरकार में खुद को तब्दील करना था । तो बदला कौन । जनता तो जस की तस है । आंदोलन के लिये जमीन भी बदली नही है । सिर्फ आंदोलन की पीठ पर सवार होने की सोच ने सत्ता की लड़ाई में हर किसी को फंसा दिया है । इसलिये चुनाव आप हार रही है । हार की खिस आंदोलन को परफ्यूम मान रही है । और केजरीवाल हो या कुमार विश्वास बार बार सत्ता की जमी पर खडे होकर आंदोलन का रोना रो रहे है ।

तो फिर याद किजिये 2011 में हो क्या रहा था । कोयला घोटाला ,राडिया टेप , आदर्श घोटाला , 2 जी घोटाला ,कामनवेल्थ घोटाला ,कैश फार वोट, सत्यम घोटाला ,एंथेक्स देवास घोटाला । यानी कांग्रेस के दौर के घोटालो ने रामलीला मैदान को रेडिमेड आंदोलन की जमीन दे दी थी । यानी लोगों में गुस्सा था । जनता विकल्प चाहती थी । तब बीजेपी लड़खड़ा रही थी और चुनावी राजनीति से इतर रामलीला मैदान बिना किसी नेता के आंदोलन में इसलिये बदल रहा था क्योंकि करप्शन चरम पर था। और तब की मनमोहन सरकार ही कटघरे में थी और मांग उच्च पदों पर बैठे विशेषाधिकार प्राप्त लोगों के खिलाफ जनलोकपाल की नियुक्ति का सवाल था । तब रामलीला मैदान की भीड़ को नकारने वाली संसद भी झुकी। और लोकपाल प्रस्ताव पास किया गया। तो हालात ने रामलीला मैदान के मंच पर बैठे लोगो को लीडर बना दिया और यही लीडरई आप बनाकर चुनाव जीत गई । लेकिन मौजूदा सच यही है लोकपाल की नियुक्ति अभी तक हुई नहीं है। रोजगार का सवाल लगातार बड़ा हो रहा है । महंगाई जस की तस है/ । कालाधन का सवाल वैसा ही है । किसी का नाम सामने आया नही । कश्मीर के हालत बिगडे हुये है । किसानो की खुदकुशी कम हुई नहीं है । पाकिस्तान की नापाक हरकत लगातार जारी है । यानी मुद्दे अपने अपने दायरे में सुलझे नहीं है । लेकिन आप चुनाव जीतने के तरीकों को मथ रही है । और मुद्दों के आसरे चुनाव जीतने की सोच में बीजेपी से आगे आज कौन हो सकता है । जिसके अध्यक्ष अमित शाह बूथ लेवल पर संगठन बना रहे हैं । अभी से 2019 की तैयारी में लग चुके हैं । अगले 90 दिनो में 225 लोकसभा सीट को कवर करेंगे। तो चुनाव जीतने की ही होड़ में जब आप भी जा घुसी है तो वह टिकेगी कहां और जनता -डुप्लीकेट को जितायेगी क्यों। यानी आप के भीतर का झगडा सिर्फ चुनावी हार का झगड़ा भर नहीं है । बल्कि आंदोलन की राजनीतिक जमीन को गंवाना भी है । जिसके भरोसे आप को राजनीतिक साख मिली। वह खत्म हो चली है । लेकिन समझना ये भी होगा कि देश में आंदोलन की जमीन जस की तस है । नया सवाल ये हो सकता
है कि गैर चुनावी राजनीति से इतर किस मुद्दे पर नया आंदोलन कब कहां खड़ा होगा ।

पाकिस्तान से ना युद्द, ना दोस्ती में फंसा भारत?

Mon, 01/05/2017 - 21:07
तो नॉर्दन कमान ने बकायदा प्रेस विज्ञप्ति जारी कर कहा कि पुंछ जिले में कृष्णा घाटी सेक्टर में लाइन आफ कन्ट्रोल के दो पोस्ट पर रॉकेट और मोर्टार से पाकिस्तान ने गोलाबारी की, जिसमें एक सेना का जवान और एक बीएसएफ का जवान शहीद हो गया। लेकिन पाकिस्तानी फौज ने भारतीय सैनिकों के शव को क्षत-विक्षत कर दिया। तो ये ना तो पहली घटना है। और हालात बताते हैं कि ये ना ही आखिरी घटना होगी। क्योंकि करगिल युद्द के बाद से पाकिस्तान ने आधे दर्जन से ज्यादा बार जवानों के सिर काटे हैं। मई 1999 में जवान सौरभ कालिया का सिर काटा। जून 2008 में 2/8 गोरखा रेजिमेंट के एक जवान का सिर काटा। जुलाई 2011 में कुमाऊं रेजिमेंट के जयपाल सिंह अधिकारी और लांस नायक देवेन्द्र सिंह के सर काटे। 8 जनवरी 2013 लांस नायक हेमराज का सिर काटा। अक्टूबर 2016 जवान मंजीत सिंह का सिर काटा। नवंबर 2016 तीन जवानों का शव क्षत-विक्षत किया। और 5 महीने बाद यानी 1 मई 2017 को पुंछ जिले के कृष्णा सेक्टर में दो जवानों के शव के साथ खिलवाड़ किया गया। और याद कीजिये 2013 में एलओसी पर लांस नायक हेमराज का सिर कटा हुआ पाया गया था तो उसके बाद संसद में तब की विपक्षी पार्टी जो अब सत्ता में है वह बिफर पड़ी थी। और सत्ता में आने पर एक सिर के बदले दस सिर काटने का एलान भी किया था। तब सभी ने तालियां बजायी थीं। लेकिन उसके बाद तो वही विपक्ष सत्ता में आया और पहली बार 29 सितबंर 2016 को सर्जिकल स्ट्राइक किया गया । और माना गया कि पाकिस्तान को सीख दे दी गई है। लेकिन हुआ क्या । ना सीजफायर थमा, ना आतंकी घुसपैठ थमी। ना सैनिकों की शहादत रुकी, ना पाकिस्तान ने कभी अपना दोष माना। और इस दौर में ये सवाल ही बना रहा कि पाकिस्तान को पडोसी मान कर युद्द ना किया जाये। या फिर युद्द से पहले बातचीत को तरजीह दी जाये । या फिर परमाणु हथियारों से लैस पाकिस्तान के साथ युद्द का मतलब विनाश तो नहीं होगा। तो आईये जरा परख ही लें कि ना युद्द ना दोस्ती के बीच अटके संबंध में भारत ने क्या और कितना गंवाया है। विभाजन के बाद युद्द और बिना युद्द के बीच फंसे भारत के जवानों की शहादत कभी रुकी नहीं। कुल 13,636 जवान सीमा पर या फिर कश्मीर में शहीद हो चुके हैं।

लेकिन ये भी देश की त्रासदी है कि इनमें से 7295 जवान तो युद्द में शद हुये जबकि 6341 जवान बिना युद्द ही शहीद हो गये। और इन हालातों को परखें तो पाकिस्तान से तीन युद्द। पहला 1965 में हुआ जिसमें 2815 जवान शहीद हुये। दूसरा युद्द 1971 में हुआ जिसमें 3900 जवान शहीद हुये और 1999 में हुये करगिल युद्द के वक्त 530 जवान शहीद हुये। और इन तीन युद्द से इतर भी कश्मीर और पाकिस्तान से लगी सीमा के हालातो में कुल शहीद हुये 6341 जवानों में से 6286 जवान आतंकी हमले में शहीद हुये । जबकि 55 जवान सीमा पर शहीद हुये । इनमें से 40 जवान एलओसी पर तो 15 जवान अंतरराष्ट्रीय सीमा पर शहीद हुय़े । यानी युद्द भी नहीं और दोस्ता भी नहीं । सिर्फ बातचीत का जिक्र और कश्मीर में आतंक को शह देते पाकिस्तान को लेकर दिल्ली से श्रीनगर तक सिर्फ खामोश निगाहो से हालातों को परखते हालात कैसे युद्द से भी बुरे हालात पैदा कर रहे हैं। ये इससे भी समझा जा सकता है कि पाकिस्तान का कश्मीर राग पाकिस्तान की हर सरकार को राजनीतिक ताकत देता है। पाकिस्तान का सीजपायर उल्लघन पाकिस्तानी सेना को पाकिस्तानी सरकार से बड़ा करता है। पाकिस्तान से आतंकी घुसपैठ आईएसाई को ताकत देती है। यानी एक तरफ विभाजन के बाद से ही पाकिसतान की चुनी हुई सत्ता हो या सेना या आईएसआई । जब तीनों की जरुरत कश्मीर में हिसा को अंजाम देना है तो फिर भारत के लिये सही रास्ता होगा कौन सा । क्योंकि विभाजन के बाद से पाकिस्तान से हुये हर युद्द में जितने जवान शहीद हुये जितने घायल हुये । जितने नागरिक मारे गये अगर उन तमाम तादाद को जोड भी दे । तो भी सच यही है कि कश्मीर में आंतक के साये 1988 से अप्रैल 2017 तक 44211 मौतें हो चुकी हैं। जिसमें 6286 जवान शहीद हुये । वही 14,751 नागरिक आतंकी हिंसा में मारे गये । जबकि सुरक्षाकर्मियों ने 23,174 आतंकवादियो को मार गिराया। यानी एक वक्त समूचे कश्मीर को जीतने का जिक्र होता था और अब कश्मीर में आतंकी हिसा पर पाकिस्तान को आतंकी देश कहने से आगे बात बढ नहीं रही है ।

तो सारे सवाल क्या पाकिस्तान को आतंकी देश कहने भर से थम जायेंगे। क्योंकि कश्मीर के हालात को समझे उससे पहले इस सच को भी जान लें कि 1947 में विभाजन के वक्त भी दोनो तरफ से कुल 7500 मौते हुई थीं। 18,000 घायल हुये थे । लेकिन अब उससे कई गुना जवान बिना युद्द शहीद हो चुके हैं। तो सवाल सिर्फ भारत के गुस्से भर का नहीं है । सवाल आगे की कार्वाई का भी है क्योंकि पाकिस्तान लगातार सीजफायर उल्लंघन कर रहा है । कश्मीर घाटी में लगातार हिंसक घटनाओं में ईजाफा हो रहा है। आलम ये है कि 2017 में पाकिस्तानी सेना 65 बार सीजफायर उल्लघन कर चुकी है। 2016 में 449 बार सीजफायर उल्लंघन की थी। 2015 में 405 बार सीजफायर उल्लंघन किया था। यानी सितंबर 2016 में हुये सर्जिकल स्ट्राइक का कोई असर पाकिस्तान पर दिखायी नहीं दे रहा है। और उस पर पाकिस्तान का सच यही है कि वह पाकिस्तान की रणनीति के केंद्र में कश्मीर है, और कश्मीर को सुलगाए रखना उसका मुख्य उद्देश्य। यही वजह है कि आतंकवादी और सेना अगर जमीन पर कश्मीर के हालात को बिगाड़ने का काम करते हैं तो कूटनीतिक और राजनीतिक तौर पर सरकार कश्मीर को गर्माए रखना चाहती है। आलम ये कि सिर्फ 2016 में यानी बीते साल कश्मीर मुद्दे पर चार बार पाकिस्तानी संसद में प्रस्ताव पास हुए। 8 जुलाई को पहला 22 जुलाई को दूसरा। 29 अगस्त को तीसरा और 7 अक्टूबर को चौथा प्रस्ताव पाकिस्तान की संसद में पास किया गया । तो क्या वाकई पाकिस्तान को लेकर भारत के पास कोई रणनीति नहीं है। और जो सवाल हर बार युद्द को लेकर हर जहन में दशहत भर देता है वह परमाणु युद्द की आहट का हो। तो इसका भी सच परख लें। यूं परमाणु बम भारत के पास भी हैं लेकिन भारत का दुनिया से वादा है कि किसी भी युद्ध में पहले परमाणु बम का इस्तेमाल वो नहीं करेगा अलबत्ता दुनिया को पाकिस्तान से इसलिए डर लगता है या कहें कि आशंका रहती है कि कहीं पाकिस्तान परमाणु बम का इस्तेमाल न कर दे। तो आइए पहले समझ लें कि परमाणु बम का इस्तेमाल हुआ तो क्या होगा। परमाणु विस्फोट विश्लेषण करने वाली साइट न्यूकमैप के मुताबिक अगर पाकिस्तान का 45 किलो टन का सबसे शक्तिशाली परमाणु बम भारत के तीन शहरों दिल्ली-मुंबई और कोलकाता पर गिरता है तो दिल्ली में करीब 3 लाख 67 हजार लोग मारे जाएंगे और 12 लाख 85 हजार से ज्यादा लोग रेडिएशन से प्रभावित होंगे । मुंबई में परमाणु बम गिरा तो 5 लाख 86 हजार लोग मारे जाएंगे और करीब 20 लाख 37 हजार लोग प्रभावित होंगे ।कोलकातामें बम गिरा तो करीब 8 लाख 66 हजार लोग मारे जाएंगे और करीब 19 लाख 25 हजार लोग प्रभावित होंगे। जाहिर है ये सिर्फ मौत का आंकड़ा है क्योंकि परमाणु बम का नुकसान तो बरसों बरस पर्यावरण से लेकर बीमारियों के हालात के रुप में शहर को देखना पड़ता है। जैसे हीरोशिमा और नागासाकी को देखना पड़ा है। लेकिन-दूसरा सच यह भी है कि परमाणु बम से शहर खत्म नहीं हो जाता। क्योंकि अगर पाकिस्तान के पास 100 से 120 परमाणु बम हैं तो भारत के पास भी 90-100 परमाणु बम हैं । लेकिन बारत की सैन्य शक्ति पाकिसातन से कई गुना ज्यादा है । आलम ये कि अमेरिका-चीन-रुस और सऊदी अरब के बाद भारत अपनी रक्षा ताकत बढ़ाने पर सबसे ज्यादा पैसा खर्च करने वाला देश है । स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रीसर्च इंस्टीट्यूट की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ भारी हथियार खरीद के मामले में भारत दुनिया का सबसे बड़ा आयातक देश है और इसने 2012 से 2016 के बीच पूरी दुनिया में हुए भारी हथियारों के आयात का अकेले 13 फ़ीसद आयात किया। दुनिया के 126 देशों मे सैन्य ताकत के मामले में भारत का नंबर चौथा और पाकिस्तान का 13वां है । ऐसे में सच ये भी है कि चाहे परमाणु युद्ध ही क्यों न हो। नुकसान भारत का होगा तो पाकिस्तान पूरा खत्म हो जाएगा। लेकिन सवाल यही है कि युद्ध नहीं होगा तो पाकिस्तान से कैसे निपटें-इसकी रणनीति भारत के पास नहीं है।

आखिर अंबेडकर को पीएम के तौर पर देखने की बात कभी किसी ने क्यों नहीं की ?

Sun, 23/04/2017 - 09:58
नेहरु की जगह सरदार पटेल पीएम होते तो देश के हालात कुछ और होते । ये सवाल नेहरु या कांग्रेस से नाराज हर नेता या राजनीतिक दल हमेशा उठाते रहे हैं। लेकिन इस सवाल को किसी ने कभी नहीं उठाया कि अगर नेहरु की जगह अंबेडकर पीएम होते तो हालात कुछ और होते । दरअसल अंबेडकर को राजनीतिक तौर पर किसीने कभी मान्यता दी ही नहीं। या तो संविधान निर्माता या फिर दलितों के मसीहा के तौर पर बाबा साहेब अंबेडकर को कमोवेश हर राजनीतिक सत्ता ने देश के सामने पेश किया । लेकिन इतिहास के पन्नों को अगर पलटे और आजादी से पहले या तुरंत बाद में या फिर देश के हालातों को लेकर अंबेडकर तब क्या सोच रहे थे और क्यों अंबेडकर को राजनीतिक तौर पर उभारने की कोई कोशिश हुई नहीं । और मौजूदा वक्त में भी बाबा साहेब अंबेडकर का नाम लेकर राजनीतिक सत्ता जिस तरह भावुक हो जाती है लेकिन ये कहने से बचती है कि अंबेडकर पीएम होते तो क्या होता ।

तो आईये जरा आंबेडकर के लेखन, अंबेडकर के कथन और अंबेडकर के अध्ययन को ही परख लें कि वह उस वक्त देश को लेकर वह क्या सोच रहे थे, जिस दौर देश गढ़ा जा रहा था । तो संविधान निर्माता की पहचान लिये बाबा साहेब अंबेडकर ने संविधान की स्वीकृति के बाद 25 नवंबर 1949 को कहा, " 26 जनवरी 1950 को हम अंतर्विरोधों के जीवन में प्रवेश करने जा रहे हैं । राजनीति में हम समानता प्राप्त कर लेंगे । परंतु सामाजिक-आर्थिक जीवन में असमानता बनी रहेगी। राजनीति में हम यह सिद्दांत स्वीकार करेंगे कि एक आदमी एक वोट होता है और एक वोट का एक ही मूल्य होता है । अपने सामाजिक और आर्थिक जीवन में अपनी सामाजिक और आर्थिक संरचना के कारण हम यह सिद्दांत नकारते रहेंगे कि एक आदमी का एक ही मूल्य होता है। कब तक हम अंतर्विरोधों का ये जीवन बिताते रहेंगे। कह तक हम अपने सामाजिक और आर्थिक जीवन में समानता को नकारते रहेंगे ? बहुत दिनो तक हम उसे नकारते रहे तो हम ऐसा राजनीतिक लोकतंत्र खतरे में डाल कर ही रहेंगे । जिसनी जल्दी हो सके हमें इस अंतर्विरोध को दूर करना चाहिये ।वरना जो लोग इस असमानता से उत्पीडि़त है वे इस सभा द्वारा इतने परिश्रम से बनाये हुये राजनीतिक लोकतंत्र के भवन को ध्वस्त कर देंगे। "   यानी संविधान के आसरे देश को छोड़ा नहीं जा सकता है बल्कि अंबेडकर असमानता के उस सच को उस दौर में ही समझ रहे थे जिस सच से अभी भी राजनीतिक सत्ता आंखे मूंदे रहती है या फिर सत्ता पाने के लिये असमानता का जिक्र करती है ।

यानी जो व्यवस्था समानता की होनी चाहिये, वह नहीं है तो इस बात की कुलबुलाहट अंबेडकर में उस दौर में इतनी ज्यादा थी कि 13 दिसंबर 1949 को जब नेहरु ने संविधान सभा में संविधान के उद्देश्यों पर प्रस्ताव पेश किया तो बिना देर किये अंबेडकर ने नेहरु के प्रस्ताव का भी विरोध किया । अंबेडकर की राइटिंग और स्पीचीज की पुस्तक माला के खंड 13 के पेज 8 में लिखा है कि आंबेडकर ने कितना तीखा प्रहार नेहरु पर भी किया। उन्होने कहा, " समाजवादी के रुप में इनकी जो ख्याती है उसे देखते हुये यह प्रसताव निराशाजनक है । मैं आशा करता था, कोई ऐसा प्रावधान होगा जिससे राज्यसत्ता आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक न्याय को यथार्थ रुप दे सके । उस नजरिए से मै आशा करता था कि ये प्रस्ताव बहुत ही स्पष्ट शब्दों में घोषित करे कि देश में सामाजिक आर्थिक न्याय हो । इसके लिये उघोग-धंधों और भूमि का राष्ट्रीयकरण होगा । जबतक समाजवादी अर्थतंत्र न हो तबतक मै नहीं समझता , कोई भावी सरकार जो सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय करना चाहती है वह ऐसा कर सकेगी । " तो अंबेडकर उन हालातों को उसी दौर में बता रहे थे जिस दौर में नेहरु सत्ता के लिये बेचैन थे और उसके बाद से बीते 70 बरस में यही सवाल हर नई राजनीतिक सत्ता पूर्व की सरकारों को लेकर यही सवाल खड़ा करते करते सत्ता पाती रही है फिर आर्थिक असमानता तले उन्हीं हालातों में को जाती है । यूं याद तो ठीक दो बरस संसद में संविधान दिवस मनाये जाने के दौर को भी याद किया किया सकता है, जब 26 नवंबर 2015 को संविदान दिवस मनाते मनाते कांग्रेस हो या बीजेपी यानी विपक्ष हो या सत्तादारी सभी ने एक सुर में माना कि अंबेडकर जिन सवालों को संविधान लागू होने से पहले उठा रहे थे , वही सवाल संविधान लागू होने के बाद देश के सामने मुंह बाये खड़े हैं।

ये अलग बात है कि कांग्रेस हो या बीजेपी दोनों ने खुद को आंबेडकर के सबसे नजदीक खड़े होने की कोशिश संसद में बहस के दौरान की । लेकिन दोनो राजनीतिक दलों में से किसी नेता ने यह कहने की हिम्मत नहीं की कि आजादी के बाद अगर अंबेडकर देश के पीएम होते तो देश के हालात कुछ और होते । क्योंकि अंबेडकर एक तरफ भारत की जातीय व्यवस्था में सबसे नीचे पायदान पर खडे होकर देश की व्यवस्था को ठीक करने की सोच रहे थे । और दूसरा उस दौर में अंबेडकर किसी भी राजनेता से सबसे ज्यादा सुपठित व्यक्तियो में से थे । जो अमेरिकी विश्वविघालय में राजनीति और सामाजिक अध्ययन करने के साथ साथ भारत की अर्थ नीति कैसे हो इसपर भी लिख रहे थे। यानी अंबेडकर का अध्ययन और भारत को लेकर उनकी स च कैसे दलित नेता के तौर पर स्थापना और संविधान निर्माता के तौर पर मान्यता तहत दब कर रह गई ये किसी ने सोचा ही नहीं । क्योंकि जिस दौर में महात्मा गांधी हिन्द स्वराज लिख रहे थे और हिन्द स्वराज के जरीये संसदीय प्रणली या आर्थिक हालातों का जिक्र भारत के संदर्भ में कर रहे थे । उस दौर में अंबेडकर भारत की पराधीन अर्थव्यवस्था को मुक्त कराने के लिये स्वाधीन इक्नामिक ढांचे पर भी कोलंबिया यूनिवर्सिटी में कह-बोल रहे थे । और भारत के सामाजिक जीवन में झांकने के लिये संस्कृत का धार्मिक पौराणिक और वेद संबंधी समूचा वाड्मंय अनुवाद में पढ़ रहे थे । और भोतिक स्थापनायें लोगों के सामने रख रहे थे । इसलिये जो दलित नेता आज सत्ता की गोद में बैठकर अंबेडकर को दलित नेता के तौर पर याद कर नतमस्तक होते है , वह इस सच से आंखे चुराते हैं कि आंबेडकर ब्रहमण व्यवस्था को सामाजिक व्यवस्था से आगे अक सिस्टम मानते थे । और 1930 में उनका बहुत साफ मानना था कि ब्राह्मण सिस्टम में अगर जाटव भी किसी ब्राह्मण की जगह ले लेगा तो वह भी उसी अनुरुप काम करने लगेगा, जिस अनुरुप कोई ब्राह्मण करता । अपनी किताब मार्क्स और बुद्द में आंबेडकर ने बारत की सामाजिक व्यवस्था की उन कुरितियों को उभारा भी और समाधान की उस लकीर को खींचने की कोशिश भी की जिस लकीर को गाहे बगाने नेहरु से लेकर मोदी तक कभी सोशल इंजिनियरिंग तो कभी अमीर-गरीब के खांचे में उठाते हैं। 1942 में आल इंडिया रेडियो पर एक कार्यक्रम में अंबेडकर कहते है , भारत में इस समय केवल मजदूर वर्ग की सही नेतृत्व दे सकता है । मजदूर वर्ग में अनेक जातियों के लोग है जो छूत-अछूत का भेद मिटाती है । संगठन के लिये जाति प्रथा को आधार नहीं बनाते । उसी दौर में अंबेडकर अपनी किताब , ' स्टेट्स एंड माइनरटिज " में राज्यो के विकास का खाक भी खिचते नजर आते है । जिस यूपी को लेकर ाज बहस हो रही है कि इतने बडे सूबे को चार राज्यों में बांटा जाना चाहिये । वही यूपी को स्पेटाइल स्टेट कहते हुये अंबेडकर यूपी को तीन हिस्से में करने की वकालत आजादी से पहले ही करते है ।

फिर अपनी किताब ' स्माल होल्डिग्स इन इंडिया " में किसानो के उन सवालों को 75 बरस पहले उठाते हैं, जिन सवालों का जबाब आज भी कोई सत्ता दे पाने में सक्षम हो नहीं पा रही है । अंबेडकर किसानों की कर्ज माफी से आगे किसानो की क्षमता बढाने के तरीके उस वक्त बताते है । जबकि आज जब यूपी में किसानो के कर्ज माफी के बाद भी किसान परेशान है । और कर्ज की वजह से सबसे ज्यादा किसानों की खुदकुशी वाले राज्य महाराष्ट्र में सत्ता किसानों की कर्ज माफी से इतर क्षमता बढाने का जिक्र तो करती है लेकिन ये होगा कैसे इसका रास्ता बता नहीं पाती । जबकि अंबेडकर 'स्माल होल्डिग्स " में तभी उपाय बताते हैं। और माना भी जाता है कि आंबेडकर ने नेहरु के मंत्रिमंडल में शामिल होने के िबदले योजना आयोग देने को कहा था। क्योंकि आंबेडकर लगातार भारत के सामाजिक - आर्थिक हालातों पर जिस तरह अध्ययन कर रहे थे , वैसे में उन्हें लगता रहा कि आजादी के बाद जिस इक्नामी को या जिस सिस्टम की जरुरत देश को है, वह उसे बाखूबी जानते समझते हैं। और नेहरु ने उन्हीं सामाजिक हालातों की वजह से ही नेहरु मंत्रिमंडल से त्यागपत्र भी दिया, जिन परिस्थितियों को वह तब ठीक करना चाहते थे। हिन्दू कोड बिल को लेकर जब संघ परिवार से लेकर , हिन्दुमहासभा और कई दूसरे संगठनों ने सड़क पर विरोध प्रदर्शन शुरु किया । तो संसद में लंबी चर्चा के बाद भी देश की पहली राष्ट्रीय सरकार को भी जब आंबेडकर हिन्दू कोड बिल पर सहमत नहीं कर पाये तो 27 सितंबर 1951 को अंबेडकर ने नेहरु को इस्तीफा देते हुये लिखा , " बहुत दिनों से इस्तीफा देने की सोच रहा था। एक चीज मुझे रोके हुये था, वह ये कि इस संसद के जीवनकाल में हिन्दूकोड बिल पास हो जाये । मैं बिल को तोड़कर विवाह और तलाक तक उसे सीमित करने पर सीमित हो गया थ। इस आशा से कि कम से कम इन्हीं को लेकर हमारा श्रम सार्थक हो जाये । पर बिल के इस भाग को भी मार दिया गया है । आपके मंत्रिमंडल में बने रहने का कोई कारण नहीं दिखता है । " दरअसल इतिहास के पन्नों को पलटिये तो गांधी, अंबेडकर और लोहिया कभी राजनीति करते हुये नजर नहीं आयेंगे बल्कि तीनों ही अपने अपने तरह से देश को गढना चाहते थे । और आजादी के बाद संसदीय राजनीति के दायरे में तीनों को अपना बनाने की होड़ तो शुरु हुई लेकिन उनके विचार को ही खारिज उनके जीवित रहते हुये उन्हीं लोगों ने किया जो उन्हे अपना बनाते या मानते नजर आये । इसलिये नेहरु या सरदार पटेल का जिक्र प्रशासनिक काबिलियत के तौर पर तो हो सकता है , लेकिन आजादी के ठीक बाद के हालात को अगर परखे तो उस वक्त देश को कैसे गढना हा यही सवाल सबसे बडा था । लेकिन पहले दिन से ही जो सवाल सांप्रदायिकता के दायरे से होते हुये कश्मीर और रोजगार से होते हुये जाति-व्यवस्था और उससे आगे समाज के हर तबके की भागेदारी को लेकर सत्ता ने उठाये या उनसे दो चार होते वक्त जिन रास्तो को चुना। ध्यान दें तो बीते 70 बरस में देश उन्ही मुद्दो में आज भी उलझा हुआ है । और राजनीतिक सत्ता ही कैसे जाति-व्यवस्था के दायरे से इतर सोच पाने में सक्षम नहीं है ।

तो इस सवाल को तो अंबेडकर ने नेहरु के पहले मंत्रिमडल की बैठक में ही उठा दिया था । इसलिये आंबेडकर पंचायत स्तर के चुनाव का भी विरोध कर रहे थे । क्योकि उनका साफ मानना था कि चुनाव जाति में सिमटेंगे । जाति राजनीति को चलायेगी । और असमानता भी एक वक्त देश की पहचान बना दी जायेगी । जिसके आधार पर बजट से लेकर योजना आयोग की नीतियां बनेंगी . और ध्यान दें तो हुआ यही । अंतर सिर्फ यही आया है कि आंबेडकर आजादी के वक्त जब देश को गढने के लिये तमाम सवालो को मथ रहे थे तब देश की आबादी 31 करोड थी । और आज दलितो की तादा ही करीब 21 करोड हो चली है । और शिक्षित चाहे 66 फिसदी हो लेकिन ग्रेजुएट महज 4 फिसदी है । इतना ही नहीं 70 फिसदी दलित के पास अपनी कोई जमीन नहीं है । और 85 फिसदी दलित की आय 5 हजार रुपये महीने से भी कम है । आबादी 16 फिसदी है लेकिन सरकारी नौकरियों में दलितों की तादाद महज 3.96 फिसदी है । और दलितो के सरकार के तमाम मंत्रालयों का कुल बजट यानी उनकी आबादी की तुलना में आधे से भी कम है । 2016-17 में शिड्यूल कास्ट सब-प्लान आफ आल मिनिस्ट्रिज का मजह 38,833 करोड दिया गया . जबकि आजादी के लिहाज से उन्हे मिलना चाहिये 77,236 करोड रुपये । पिछले बरस यानी 2015-16 में तो ये रकम और भी कम 30,850 करोड थी । यानी जिस नजरिये का सवाल आंबेडकर आजादी से पहले और आजादी के ठीक बाद उटाते रहे । उन सवालो के आईने में अगर बाबा साहेब आंबेडकर को देश सिर्फ संविधान निर्माता मानता है या दलितों की मसीहा के तौर पर देखता है तो समझना जरुरी है कि आखिर आजतक किसी भी राजनीतिक दल या किसी भी पीएम ने ये क्यों नहीं कहा कि अंबेडकर को तो प्रधानमंत्री होना चाहिये था। क्योंकि ये बेहद महीन लकीर है कि महात्मा गांधी जन सरोकार को संघर्ष के लिये तैयार करते रहे और अंबेडकर नीतियों के आसरे जनसरोकार के संघर्ष को पैदा करना चाहते रहे । यानी देश की पॉलिसी ही अगर नीचे से उपर देखना शुरु कर देती तो अंग्रेजों का बना ब या सिस्टम बहुत जल्द खत्म होता । यानी जिस नेहरु मॉडल को कांग्रेस ने महात्मा गांधी से जोडने की कोशिश की । और जिस नेहरु मॉडल को लोहिया ने खारिज कर समाजवाद के बीज बोने चाहे। इन दोनों को आत्मसात करने वाली राजनीतिक सत्ताओं ने आंबेडकर मॉडल पर चर्चा करना तो दूर आंबेडकर को दलितों की रहनुमाई तले संविधान निर्माता का तमगा देकर ही खत्म करने की कोशिश की । जो अब भी जारी है ।

हिन्दू राष्ट्र की दुहाई कौन दे रहा है ?

Fri, 07/04/2017 - 23:44
दुनिया के सबसे पुराने लोकतांत्रिक देश अमेरिका में 16 फीसदी लोग किसी धर्म को नहीं मानते । लेकिन दुनिया के सबसे बडे लोकतांत्रिक देश भारत में सत्ता ही खुद को हिन्दू राष्ट्र बनाने मानने की कुलबुलाहट पाल रही है । ब्रिटेन में करीब 26 फीसदी लोग किसी धर्म को नहीं मानते । लेकिन भारत में सत्ताधारी पार्टी खुले तौर पर ये कहने से नहीं हिचक रही है कि भारत को हिन्दू राष्ट्र हो जाना चाहिये। यूरोप-अमेरिका के तमाम देशों में हर धर्म के लोगो की रिहाइश है। नागरिक हैं। लेकिन कहीं धर्म के नाम पर देश की पहचान हो ये अवाज उठी नहीं । दुनिया के एक मात्र हिन्दू राष्ट्र नेपाल की पहचान भी दशक भर पहले सेक्यूलर राष्ट्र हो गई। यानी जैसे ही राजशाही खत्म हुये। चुनाव हुये । संविधान बना । उसके बाद नेपाल के 80 फीसदी से ज्यादा नेपाल में रहने वाले हिन्दुओ ने ये अवाज दुबारा नहीं उठायी कि वह नेपाल को हिन्दु राष्ट्र बनाना चाहते हैं। और भारत में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ हो या हिन्दू महासभा, उसने भी नेपाल के हिन्दू राष्ट्र के तमगे को खूब जीया । इस हद तक की हिन्दुत्व का सवाल आने पर बार बार नेपाल का जिक्र हुआ । लेकिन नेपाल में भी जब राजशाही खत्म हुई और हिन्दू राष्ट्र का तमगा वहां की चुनी हुई सरकार ने खत्म किया तो फिर हिन्दुत्व के झंडाबरदरार संगठनों ने कोई आवाज उठाने की हिम्मत नहीं की । लेकिन भारत में सवाल तो इस लिहाज से उलझ पड़ा है । एक तरफ योदी आदित्यनाथ को हिन्दुत्व का झंडाबरदार दिखाया जा रहा है दूसरी तरफ मोदी इस पर खामोशी बरत रहे हैं। एक तरफ योगी के जरीये हिन्दू महासभा के उग्र हिन्दुत्व की थ्योरी की परीक्षा हो रही है। दूसरी तरफ आरएसएस गोलवरकर से लेकर शेषाद्री तक के दौर में भारत और भारतीय के सवाल से आगे बढ़ना नहीं चाह रहे हैं । एक तरफ योगी के सीएम बनने से पहले मोदी के लिये योगी भी फ्रिंज एलीमेंट ही थे । और मोदी ने पीएम उम्मीदवार बनने से लेकर अभी तक के दौर में बीजेपी के बाहर अपना समर्थन का दायरा इतना बड़ा किया कि वह पार्टी से बड़े दिखायी देने लगे ।

लेकिन मोदी के समर्थन के दायरे में ज्यादातर वही फ्रिंज एलीमेंट आये जो बीजेपी के सत्ता प्रेम में बीजेपी के कांग्रेसीकरण का होना देख मान रहे थे । और मोदी ने दरअसल दिल्ली कूच की तैयारी में बीजेपी के उस प्रोफेशनल पॉलिटिक्स को ही दरकिनार किया, जिसके आसरे सिर्फ चुनाव की जीत हार राजनीतिक मुद्दों पर टिकती । तो इन हालातो में सवाल तीन है । पहला क्या गोरक्षा के नाम पर अलवर में जो हुआ उस तरह की घटना के पीछे कहीं फ्रिंज एलीमेंट को कानूनी जामा तो नहीं पहनाया जा रहा है। दूसरा अगर कानून व्यवस्था के दायरे में फ्रिंज एलीमेंट पर नकेल कसी जायेगी, जैसी हिन्दू वाहिनी के रोमियो स्कावयड पर नकेल कसी जा सकती है तब योगी के महंत का औरा सीएम के संवैधानिक पद से कैसे टकरायेगा और उसके बाद हालात बनेंगे कैसे। और तीसरा योगी के हिन्दुत्व राग से उत्साही समाज से मोदी पल्ला कैसे झाडेंगे ।

ये ऐसे सवाल है जो मोदी और योगी को एक दौर के वाजपेयी और आडवाणी की जोडी के तौर पर बताये जा सकते हैं । लेकिन समझना ये भी होगा वाजपेयी-आडवाणी की जोड़ी चुनावी हिसाब-किताब को सीटो के लिहाज से नहीं बल्कि परसैप्शन के लिहाज से देश को प्रभावित करती थी । यानी वाजपेयी नरम हैं आडवाणी कट्टर है, ये परसेप्शन था । लेकिन मोदी नरम है और योगी कट्टर हैं ये परसैप्शन के आधार पर चल नहीं सकता क्योंकि योगी के हाथ में देश के सबसे बडे सूबे की कमान है। और वहां उन्हें गवर्नैंस से साबित करना है कि उनका रास्ता जाता किधर है। लेकिन समझना ये भी होगा कि एक वक्त जनसंघ के अधिवेशन में ही जब हिन्दू राष्ट्र की प्रस्तावना रखी गयी तो तब के सरसंघचालक गुरु गोलवरकर ने ये कहकर खारिज किया कि जनसंघ को संविधान के आधार पर काम करना चाहिये। और सच यही है कि उसके बाद ही दीन दयाल उपाध्याय ने एकात्म-मानवतावाद की थ्योरी को आत्मसात किया। और जनसंघ ने भी एकात्म-मानवतावाद को ही अपनाया। और तो और दत्तोपंत ठेंगडी ने भी इसी बात की वकालत की थी कि संघ को भी हिन्दुत्व से इतर उस रास्ते को पकड़ना होगा जिसपर हिन्दुत्व धर्म नहीं बल्कि जीवन पद्दति के तौर पर उभरे। यूं आरएसएस के पन्नों को पलटने पर ये भी साफ होता है कि पचास के दशक में हिन्दु राजाओं को भी सेकुलर के तौर पर ही गुरुगोलवरकर ने मान्यता दी । मसलन सम्राट अशोक को हिन्दू राजा नहीं बल्कि सेकुलर राजा के तौर पर ही माना जाता है। तो नया सवाल ये भी निकल सकता है कि फिर एक वक्त के फ्रिंज एलीमेंट माने जाने वाले योगी आदित्यनाथ को संवैधानिक पद, वह भी सीएम की कुर्सी पर क्यों बैठाया गया । क्या ये पहल गौरवशाली हिन्दू राष्ट्र की परिकल्पना तले पनपी । हो जो भी लेकिन 21 वीं सदी में जब भारत की पहचान एक बडे बाजार से लेकर उपभोक्ता समाज के तौर पर कहीं ज्यादा है । दुनिया के तमाम देशों में भारत के प्रफोशनल्स की चर्चा है । और उसके साथ ही शिक्षा से लेकर हेल्थ सर्विस और पीने के पानी से लेकर भूखे भारत का सच संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट तक में दिखायी दे रहा है और ऐसे मोड़ पर भारत में सत्ता के लिये चुनावी जीत उस सोशल इंजीनियरिग पर जा अटकी है, जो जाति-प्रथा को बनाये रखने पर जोर देती है। और वोटो का ध्रुवीकरण धर्म की उस सियासत पर जा टिका है, जहां 20 करोड़ मुसलमानों की कोई जरुरत सत्ता में रहने के लिये सत्ताधारी पार्टी को है ही नहीं । तो फिर आगे का रास्ता जाता किधर है । क्योंकि हिन्दुस्तान का वैभवशाली अतीत भी भारत को हिन्दू राष्ट्र के तौर पर कभी ना तो पहचान दे पाया और ना ही उसका प्रयास किया गया । और मुगलिया सल्तनत से लेकर अंग्रेंजों के दौर में भी हिन्दुओ की तादाद 80 फीसदी रही । लेकिन हिन्दू राष्ट्र की परिकल्पना को बदलने के बदले हर सत्ता ने यहां की जीवन पद्दति को अपनाया और संसाधनों की लूट के जरीये अय्याशी की । और राजनीति की इसी अय्याशी को लेकर आजादी के बाद महात्मा गांधी ने आजादी के बाद कांग्रेस की सत्ता को लेकर सवाल भी उठाये । लेकिन आजादी के बाद के 70 बरस के दौर में देश के हर राजनीतिक दल ने सत्ता भोगी। और गरीब हिन्दुस्तान पर लोकतंत्र की दुहाई देकर राज करने वाले नेताओ के सरोकार कभी आम जनता से जुडे नहीं। तो आखिरी सवाल यही है कि क्या हिन्दू राष्ट्र की दुहाई भारत की अंधेरे गलियों में अतीत की रोशनी भर देती है । या फिर सत्ता के सारे मोहरे चुक चुके हैं तो नारा हिन्दू राष्ट्र का है।

कर्जमाफी किसानों के लिये राहत है या राजनीति के लिये सुकून

Tue, 04/04/2017 - 23:09
तो देश की इकनॉमी का सच है क्या । क्योंकि एक तरफ 12 लाख 60 हजार करोड़ का कर्ज देशभर के किसानों पर है । जिसे माफ करने के लिये तमाम राज्य सरकारों के पास पैसा है नहीं । तो दूसरी तरफ 17 लाख 15 हजार करोड की टैक्स में माफी उद्योग सेक्टर को सिर्फ बीते तीन वित्तीय वर्ष में दे दी गई । यानी उघोगों को डायरेक्ट या इनटायरेक्ट टैक्स में अगर कोई माफी सिर्फ 2013 से 2016 के दौरान ना दी गई होती तो उसी पैसे से देशभर के किसानो के कर्ज की माफी हो सकती थी । तो क्या वाकई किसान और कारोबारियों के बीच मोटी लकीर खिंची हुई है । या फिर किसान सरकार की प्रथामिकता में कभी रहा ही नहीं । ये सवाल इसलिये क्योकि एक तरफ एनपीए या उगोगो को टैक्स में रियायत देने पर सरकार से लेकर बैंक तक खामोश रहते हैं। लेकिन दूसरी तरफ किसानों की कर्ज माफी का सवाल आते ही महाराष्ट्र से लेकर पंजाब तक के सीएम तक केन्द्रीय सरकार से मुलाकात कर पैसों की मांग करते हैं। और केन्द्र सरकार किसानों का मुद्दा राज्य का बताकर पल्ला झाड़ती है तो एसबीआई चैयरमैन किसानों की कर्ज माफी की मुश्किलें बताती है । तो किसान देश की प्राथमिकता में कहां खड़ा है । ये सवाल इसलिये जिस तरह खेती राज्य का मसला है, उसी तरह उद्योग भी राज्य का मसला होता है । और इन दो आधारों के बीच एक तरफ केन्द्रीय मंत्री संतोष गंगवार ने राज्यसभा में 16 जून 2016 को कहा , उघोगो को तीन बरस [ 2013-2016] में 17 लाख 15 हजार करोड रुपये की टैक्स माफी दी गई । तो दूसरी तरफ कृषि राज्य मंत्री पुरुषोत्तम रुपाला ने नंवबर 2016 में जानकारी दी किसानों पर 12 लाख 60 हजार रुपये का कर्ज है । जिसमें 9 लाख 57 हजार करोड रुपये कमर्शियल बैक से लिये गये है ।

और इसी दौर में ब्रिक्स बैंक के प्रजीडेंट के वी कामत ने कहा कि 7 लाख करोड का एनपीए कमर्शियल बैंक पर है ।  यानी एक तरफ उघोगो को राहत । दूसरी तरफ उघोगों और कारपोरेट को कर्ज देने में किसी बैक को कोई परेशानी नहीं है। लेकिन किसानों के कर्ज माफी को लेकर बैंक से लेकर हर सरकार को परेशानी। जबकि देश का सच ये भी है कि जितना लाभ उठाकर उघोग जितना रोजगार देश को दे नही पाते, उससे 10 गुना ज्यादा लोग खेती से देश में सीधे जुड़े हैं। आंकड़ों के लिहाज से समझें तो संगठित क्षेत्र में महज तीन करोड रोजगार हैं। चूंकि खेती से सीधे जुड़े लोगों की तादाद 26 करोड है। यानी देश की इक्नामी में जो राहत उघोगों को, कारपोरेट को या फिर सर्विस सेक्टर में भी सरकारी गैर सरकारी जितना भी रोजगार है, उनकी तादाद 3 करोड़ है । जबकि 2011 के सेंसस के मुताबिक 11 करोड 80 लाख अपनी जमीन पर खेती करते है । और 14 करोड 40 लाख लोग खेत मजदूर है । यानी सवा करोड की जनसंख्या वाले देश की हकीकत यही है कि हर एक रोजगार के पीछ अगर पांच लोगों का परिवार माने तो संगठित क्षेत्र से होने वाली कमाई पर 15 करोड़ लोगों का बसर होता है। वहीं खेती से होने वाली कमाई पर एक सौ दस करोड़ लोगों का बसर होता है । और इन हालातों में अगर देश की इक्नामी का नजरिया मार्केट इक्नामी पर टिका होगा या कहे पश्चिमी अर्थवयवस्था को भी भारत अपनाये हुये है तो फिर जिन आधारों पर टैक्स में राहत उद्योगों को दी जाती है । या बैंक उद्योग या कारपोरेट को कर्ज देने से नहीं कतराते तो उसके पीछे का संकट यही है कि अर्थशास्त्री ये मान कर चलते है कि खेती से कमाई देश को नहीं होगी । उद्योगों या कारपोरेट के लाभ से राजस्व में बढोतरी होगी ।

यानी किसानों की कर्ज माफी जीडीपी के उस हिस्से पर टिकी है जो सर्विस सेक्टर से कमाई होती है । और देश का सच भी यही है खेती पर चाहे देश के सौ करोड़ लोग टिके है लेकिन जीडीपी में खेती का योगदान महज 14 फिसदी है । तो इन हालातो में जब यूपी में किसानों की कर्ज माफी का एलान हो चुका है तो बीजेपी शासित तीन राज्यों में हो क्या रहा है जरा इसे भी देख लें। मसलन हरियाणा जहा किसान का डिफॉल्टर होना नया सच है
। आलम ये कि हरियाणा के 16.5 लाख किसानों में से 15.36 लाख किसान कर्जदार हैं । इन किसानों पर करीब 56,336 करोड़ रुपए का कर्ज है, जो 2014-15 में 40,438 करोड़ रुपए था । 8.75 लाख किसाने ऐसे हैं, जिन्होंने कमर्शियल बैंक, भूमि विकास बैंक, कॉपरेटिव बैंक और आणतियों से कर्ज लिया हुआ है । और कर्ज के कुचक्र में ऐसे फंस गए हैं कि अब कर्ज न निगलते बनता है न उगलते।

किसानों की परेशानी ये है कि वो फसल के लिए बैंक से कर्ज लेते हैं। ट्रैक्टर, ट्यूबवैल जैसी जरुरतों के लिए जमीन के आधार पर भूमि विकास बैंक या कॉपरेटिव सोसाइटी से लोन लेता है। मौसम खराब होने या फसल बर्बादी पर कर्ज का भुगतान नहीं कर पाता तो अगली फसल के लिए आढ़तियों के पास जाते हैं। और फिर फसल बर्बादी या कोई भी समस्या न होने पर डिफॉल्टर होने के अलावा कोई चारा नहीं रहता। लेकिन-अब यूपी में जिस तरह किसानों का कर्ज माफ हुआ है, हरियाणा के किसान भी यही मांगने लगे हैं। और दूसरा राज्य है राजस्धान । जहा किसानो को कर्ज देने की स्थिति में सरकार नहीं है । लेकिन राजस्धान का संकट ये है कि एक तरफ कर्ज मांगने वाले किसानो की तादाद साढे बारह हजार है तो दूसरी तरफ वर्ल्ड बैंक से किसानो के लिये जो 545 करोड रुपये मिले लेकिन उसे भी सरकार खर्च करना भूल गई और इसी एवज में जनता का गाढ़ी कमाई के 48 करोड़ रुपए अब ब्याज के रुप में वसुधंरा सरकार वर्ल्ड बैंक को भरेगी । दरअसल वर्ल्ड बैंक के प्रोजेक्ट की शुरुआत 2008 में हुई थी,जब वसुंधरा सरकार ने राजस्थान एग्रीकल्चर कांपटिटवेसन प्रोजेक्ट बनाया था और
फंडिंग के लिए वर्ल्ड बैंक को भेजा गया था । वर्ल्ड बैंक के इस प्रोजेक्ट के तहत कृषि, बागवानी, पशुपालन, सिंचाई और भूजल जैसे कई विभागों को मिलकर किसानों को कर्ज बांटने की योजना थी । वसुंधरा सरकार गई तो कांग्रेस की गहलोत सरकार आई और उसने 2012 में फंडिंग के लिए 832 करोड़ रुपए का प्रोजेक्ट वर्ल्ड बैंक को दिया । वर्ल्ड बैंक ने 545 करोड़ रुपए 1.25 फीसदी की ब्याज दर पर राजस्थान सरकार को दे दिए. लेकिन 2016 तक इसमें से महज 42 करोड़ ही सरकार किसानों को बांट पाई ।यानी एक तरफ किसानों को कर्ज नहीं मिल रहा। और दूसरी तरफ वर्ल्ड बैंक के प्रोजेक्ट के तहत जो 545 करोड़ रुपए में से जो 42 करोड बांटे भी गये वह किस रुप में ये भी देख लिजिये । 17 जिलों में यंत्र, बीज और खाद के लिए सिर्फ 14 लाख 39 हजार रुपए बांटे गए । फल, सब्जी, सोलर पंप के लिए 3 लाख 13 हजार रुपए। जल संग्रहण के लिए 7 लाख दो हजार रुपए बांटे गए । पशुपालन के लिए 2 लाख 19 हजार रुपए दिए ।नहरी सिंचाई निर्माण के लिए 2 लाख 36 हजार रुपए दिए गए । और भू-जल गतिविधियों के लिए 11 लाख 50 हजार रुपए बांटे गए । यानी सवाल सरकार का नहीं सरोकार का है । क्योकि अगर सरकार खजाने में पैसा होने के  बावजूद जनकल्याण का काम सरकार नहीं कर सकती तो फिर सरकार का मतलब क्या है। और तीसरा राज्य महाराष्ट्र जहां बीते दस बरस से किसानो का औसत खुदकुशी का आलम यही है कि हर तीन घंटे में एक किसान खुदकुशी करता है । खुदकुशी करने वाले हर तीन में से एक किसान पर 10 हजार से कम का कर्ज होता है । हालात है कितने बदतर ये 2015 के एनसीआरबी के आंकडों से समझा जा सकता है । 2015 में 4291 किसानों ने खुदकुशी की । जिसमें 1293 किसानो की खुदकुशी की वजह बैक से कर्ज लेना था । जबकि 795 किसानो ने खेती की वजह से खुदकुशी की । यानी खुदकुशी और कर्ज महाराष्ट्र के किसानों की बड़ी समस्या है, जिसका कोई हल कोई सरकार निकाल नहीं पाई।

और अब यूपी में किसानों की कर्ज वापसी के बीच महाराष्ट्र के देवेन्द्र फडणवीस सरकार पर ये दबाव पड़ना तय है कि वो भी महाराष्ट्र के किसानों के लिए कर्जवापसी की घोषणा करें। क्योंकि विपक्ष और सरकार की सहयोगी शिवसेना लगातार ये मांग कर रहे हैं और महाराष्ट्र में कई जगह धरना-प्रदर्शन हो रहे हैं। यानी यूपी की कर्जमाफी किसानो के लिये राहत है या राजनीतिक के लिये सुकून । इसका फैसला भी अब हर चुनाव में होगा। .

मोदी नहीं योगी मॉडल चाहिये ?

Tue, 21/03/2017 - 23:23
तो क्या इतिहास बीजेपी सत्ता को दोहरा रहा है या फिर एक नया इतिहास गढ़ा जा रहा है। दरअसल वाजपेयी आडवाणी की जोडी और मौजूदा वक्त में मोदी योगी की जोड़ी एक समान लकीर भी खींचती है, जिसमें एक सॉफ्ट तो दूसरा हार्ड । लेकिन वाजपेयी आडवाणी के दायरे को मोदी योगी की जोड़ी एक विस्तार भी देतीहै क्योंकि यूपी सरीखे राज्य का कोई प्रयोग केन्द्र सरकार को वैसे ही डिगा सकती है जैसे एक वक्त कल्याण सिंह ने पीवी नरसिंह राव को तो मोदी ने गुजरात सीएम रहते हुये वाजपेयी को डिगाया। और मोदी जब 2002 से आगे निकलते हुये दिल्ली पहुंच गये तो क्या पहली बार योगी के सामने भी ऐसा मौका आ खड़ा हुआ है, जहां गोरखपुर से लखनऊ और लकनऊ से दिल्ली का रास्ता भी तय हो सकता है। फिलहाल ये सवाल है । लेकिन इस सवाल के गर्त में तीन सवाल छुपे ही हुये हैं। मसलन पहला सवाल क्या मोदी की छवि योगी की छवि तलेबदल जायेगी। दूसरा, क्या मोदी की तर्ज पर योगी अपनी छवि बदलने के बदले विस्तार देंगे। तीसरा , यूपी 2019 के लिये दिल्ली का रास्ता बनायेगा या रोकेगा । ये सारे सवाल इसलिये क्योकि योगी के सीएम बनते ही राम मंदिर ,यूनिफॉर्म सिविल कोड और तीन तलाक़ के मुद्दे भी छोटे हो गये । यानी भारतीय राजनीति में जिन सवालो को लेकर सत्ता लुकाछिपी का खेल खेलती रही वह सवाल योगी की पारदर्शी राजनीति और छवि के आगे सिमट भी गयी । यानी चाहे अनचाहे हर वह प्रयोग जिससे मोदी सरकार पल्ला झाड़ सकती है और योगी सवालों को मुकाम तक पहुंचाकर खुद को ही बड़ा सवाल बनते चले जाते है । तो कौन सी छवि चुनावी लाभ पहुंचाती है जब एसिड टेस्ट इसी का होने लगेगा तब विपक्ष की राजनीति कहा मायने रखेगी। और 2019 में मोदी हो या 2022 तक योगी ही मोदी बन चुके हो इससे किसे फर्क पड़ेगा । क्योंकि कट्टर हिन्दुत्व की छवि मोदी तोड चुके है । कट्टर हिन्दुत्व की छवि योगी की बरकरार है । और संयोग से राम मंदिर निर्माण पर अदालत से बाहर सहमति का सुझाव देकर सुप्रीम कोर्ट ने मोदी-योगी की तरफ देश को देखने के लिये मजबूर तो कर ही दिया है ।
तो क्या इतिहास फिर खुद को दोहरायेगा । कभी मोदी के आसरे गुजरात को हिन्दुत्व के मॉडल के तौर पर एक वक्त देश ने देखा । और अब योगी के आसरे यूपी का हिन्दुत्व के नये मॉडल के तौर पर देखने का इंतजार देश कर रहा है । मोदी ने विकास की चादर ओढ ली है तो योगी अभी भी भगवा ओढ़े हुये हैं। और मोदी की तमाम सफलताओ का मॉडल विकास पर जा टिका है और इंतजार अब योगी मॉडल का हो रहा है। इसीलिये मोदी के ढाई बरस के दौर में जिस योगी को फ्रिंज एलीमेंट माना गया । संघ ने उसी फ्रिंज एलीमेंट पर सीएम का ठप्पा लगाकर साफ संकेत दे दिये कि हिन्दू एजेंडा दरकिनार हो वह उसे मंजूर नहीं । यानी संघ ने मोदी-योगी की जोडी से सपने तो यही संजोये है कि , " आर्थिक समृद्धि और दोहरे अंकों के विकास दर के साथ हिंदू युग का स्वर्णिम काल दिखायी दे । " और मोदी हिन्दू युग के स्वर्मिम काल के प्रतीक बनना नहीं चाहेंगे। लेकिन योगी इस प्रतीक को अपने तरीके से जिन्दा कर सकते है । क्योंकि चाहे अनचाहे राम मंदिर पर राजनीतिक निर्णय का वक्त आ गया है । और मोदी सरकार की खामोश पहल और फ्रिंज एलीमेंट से सीएम बने योगी क खुली पहल के बीच संघ परिवार महसूस कर रहा है कि मोदी मॉडल सत्ता के लिये चाहिये । लेकिन योगी मॉडल हिन्दु युग के स्वर्णिम काल के लिये चाहिये । क्योंकि याद कीजिये पिछले बरस 2 मार्च तो गोरखपुर के मंदिर में जब संतो की बैठक हुई । और इससे संघ के वरिष्ठ पदाधिकारी भी शामिल हुये तो कहा गया, "1992 में 'ढांचा' तोड़ दिया गया। अब केंद्र में अपनी सरकार है। सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला हमारे पक्ष में आ जाए, तो भी प्रदेश में मुलायम या मायावती की सरकार रहते रामजन्मभूमि मंदिर नहीं बन पाएगा। इसके लिए हमें योगी आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री बनाना होगा" यानी ठीक एक बरस संघ ने राम मंदिर के लिये योगी आदित्यनाथ को सीएम बनाने पर सहमति दे दी थी । जबकि संघ बाखूबी जानता समझता है कि योगी आदित्यनाथ संघ के स्वयंसेवक कभी नहीं रहे । तो क्या योगी मॉडल आने वाले वक्त में हिन्दुत्व को लेकर हिन्दू महासभा का वही मॉडल है, जिसपर एक वक्त राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की भी सहमति नहीं थी । या फिर सत्ता और मंदिर के बीच अभी भी जब मोदी फंसे हुये है तो योगी को आगे कर संघ परिवार ने तुरुप का पत्ता फेंका है। ये सवाल इसलिये क्योकि राम मंदिर का सवाल हिन्दू महासभा ने पहले उठाया । रक्षपीठ के पूर्व मंहत दिग्विजय नाथ ने 1949 में ही राम जन्मभूमि का सवाल उठाया । आरएसएस ने 1964 में वीएचपी के जरीये हिन्दुत्व के सवाल उठाने शुरु किये । और सच यही है कि जिस दौर में हिन्दू महासभा के सदस्य बकायदा भारतीय रामायण महासभा के बैनर तले राम मंदिर का सवाल उठा रहे थे तब संघ परिवार की सक्रियता उतनी तीखी नहीं थी जितनी हिन्दु महासभा की थी । और दिग्विजय नाथ के निधन के बाद उनके शिष्य और आदित्यनाथ के गुरु अवैद्यनाथ ने आंदोलन को आगे बढ़ाया। विश्व हिन्दू परिषद की 1989 धर्म संसद में अवैद्यनाथ के भाषण ने ही इस आंदोलन का आधार तैयार किया था। जिसके बाद महंत अवैद्यनाथ बीजेपी में शामिल हुये । और राम मंदिर आंदोलन में अवैद्यनाथ की भूमिका का अंदाजा लिब्राहन आयोग की रिपोर्ट से लगाया जा सकता है। आयोग की रिपोर्ट कहती है , ‘पर्याप्त मात्रा में पुख्ता सबूत दर्ज किए गए हैं... कि उमा भारती, साध्वी ऋतंभरा, परमहंस रामचंद्र दास, आचार्य धर्मेंद्र देव, बीएल शर्मा, ... महंत अवैद्यनाथ आदि ने भड़काऊ भाषण दिए.’ । तो इन्हीं अवैधनाथ के शिष्य आदित्यनाथ की तरफ संत समाज राम मंदिर बनाने के लिए टकटकी लगाए देख रहा है।
यानी राम मंदिर को लेकर इतिहास के पन्नो में एक परीक्षा प्रधानमंत्री मोदी की भी है । क्योंकि इससे पहले अयोध्या में राम मंदिर को लेकर जो भी पहल हिन्दू महासभा से लेकर विहिप या संघ परिवार ने की । हर दौर में केन्द्र में सत्ता कांग्रेस की थी । यानी हिन्दू संगठनों के आंदोलन ने बीजेपी को राजनीतिक लाभ पहुंचाया । हिन्दू वोट बैक बीजेपी के लिये ध्रुवीकरण कर गया । लेकिन अब बीजेपी की सरकार के वक्त हिन्दू संगठनों को निर्णय लेना है । संघ को निर्णय लेना है । और बीजेपी को भी राजनीतिक नफे नुकसान को तौलना है । क्योंकि दोनों तरफ बीजेपी भी खड़ी है । और संघ को मोदी नहीं राम मंदिर के लिये योगी भा रहे हैं। और सवाल यही है कि मोदी मॉडल का वक्त पूरा हुआ। अब योगी मॉडल का इंतजार है ।

धर्म से बड़ी कोई राजनीति नहीं...राजनीति से बड़ा कोई धर्म नहीं

Mon, 20/03/2017 - 23:36
"धर्म से बड़ी कोई राजनीति नहीं .....और राजनीति से बड़ा कोई धर्म नहीं" यूं ये बात तो लोहिया ने कही थी। और लोहिया का नाम जपकर समाजवाद के नाम पर सत्ता चलाने वालो को जब यूपी के जनादेश ने मटियामेट कर दिया। और पहली बार किसी धार्मिक स्थल का प्रमुख किसी राज्य का सीएम बना है तो ये सवाल उठना जायजा है कि क्या वाकई धर्म से बड़ी कोई राजनीति नहीं और राजनीति से बड़ा कोई धर्म नहीं। क्योंकि जो शख्स देश के सबसे बड़े सूबे यूपी का मुखिया बना है वह गोरक्ष पीठ से निकला है। शिव के अवतार महायोगी गुरु गोरक्षनाथ के नाम पर स्थापित मंदिर से निकला है। नाथ संप्रदाय का विश्वप्रसिद्द गोरक्षनाथ मंदिर से निकला है। जो हिंदू धर्म,दर्शन,अध्यात्म और साधना के लिये विभिन्न संप्रदायों और मत-मतांतरों में नाथ संप्रदाय का प्रमुख स्थान है । और हिन्दुओं के आस्था के इस प्रमुख केन्द्र यानी गोरक्ष पीठ के पीठाधीश्वर महतं आदित्यनाथ जब देश के सबसे
बडे सूबे यूपी के सीएम हो चुके हैं, तब इस पीठ की पीठाधीश्वर मंहत योगीनाथ को लेकर यही आवाज है, "संतो में राजनीतिज्ञ और राजनीतिज्ञो में संत आदित्यनाथ"।

तो क्या आस्था का ये केन्द्र अब राजनीति का भी केन्द्र बन चुका है। क्योकि अतीत के पन्नो को पलटे तो गोरक्षनाथ मंदिर हिन्दू महासभा का भी केन्द्र रहा और हिन्दु महासभा ने कांग्रेस से लेकर जनसंघ की राजनीति को भी एक वक्त हिन्दू राष्ट्रवाद के दायरे में दिशा दी । तो क्या योगी आदित्नाथ के जरीये हिन्दू राष्ट्रवाद की उस अधूरी लकीर को ही मौजूदा वक्त में पूरा करने का ख्वाब भी संजोया जा रहा है। या फिर अतीत की राजनीति के दायरे में योगी आदित्यनाथ को पऱखना भूल होगी। ये सवाल इसलिये क्योंकि 1921 में कांग्रेस के साथ हिन्दू महासभा राजनीति तौर पर जुड़ी। जो 16 बरस तक जारी रहा। आलम ये भी रहा कि मदन मोहन मालवीय एक ही वक्त कांग्रेस की अध्यक्षता करते हुये हिन्दू महासभा को भी संभालते नजर आये। फिर हिन्दू महासभा से निकले श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने 1951 में जनसंघ की  स्थापना की। तो क्या अतीत के इन पन्नों के आसरे योगी आदित्यनाथ को आने वाले वक्त में हिन्दू राष्ट्रवाद के दायरे में यूपी की सत्ता चलाते हुये देखा जायेगा । या फिर पहली बार सावरकर की हिन्दुसभा और हेडगेवार की  आरएसएस की दूरियां खत्म होगी । पहली बार संघ परिवार और बीजेपी की राजनीति की लकीर मिटेगी। पहली बार अयोध्या से आगे गोरखपुर की गोरक्ष पीठ हिन्दुत्व की प्रयोगशाला बनेगी। क्योकि कल तक गोरखनाथ मठ के महंत के तौर पर जाने जाने वाले सांसद योगी आदित्यनाथ अब मंदिर छोड बतौर सीएम लखनउ में मुख्यमंत्री निवास में रहेंगे। और 96 बरस से सक्रिय राजनीतिक तौर पर गोरखनाथ मठ की सियासी सत्ता की नींव सीएम हाउस में पड़ेगी। तो क्या यूपी महज जनादेश के आसरे एक नये सीएम आदित्यनाथ को देखेगा और बतौर सीएम आदित्यनाथ भी महज पारंपरिक गवर्नेस को संभालेंगे। जहां किसानों की कर्ज माफी से लेकर 24 घंटे बिजली का जिक्र होगा। जहां कानून व्यवस्था से लेकर रोजगार का जिक्र होगा य़ा फिर जहां गो हत्या पर पाबंदी से लेकर मंदिर निर्माण का जिक्र होगा। यकीनन जनादेश का आधार कुछ ऐसा हो सकता है लेकिन योगी आदित्यनाथ जिस छवि के आसरे राजनीति को साधते आये है और पहली बार संघ परिवार से लेकर प्रधानमंत्री मोदी ने योगी आदित्यनाथ की राजनीति को मान्यता दी है। तो आने वाले वक्त में तीन राजनीति के तीन तरीके उभरेंगे ही।

पहला, विकास शब्द को हिन्दू सांस्कृतिक लेप के साथ परोसा जायेगा। दूसरा, किसानी या गरीबी को मिटाने के लिये हिन्दुत्व जीवन पद्धति से जोड़ा जायेगा। त सरा, कानून व्यवस्था का दायरा पुरानी तुष्टिकरण की नीति को पलट देगा। कह सकते हैं यूपी को चलाने के लिये हर समुदाय के लिये जो राजनीतिक कटघरा मायावती या मुलायम ने यूपी में खड़ा किया, वह कटघरा योगी आदित्यनाथ के वक्त 180 डिग्री में उलटा दिखायी देगा। लेकिन योगी को सिर्फ महंत से सीएम बनते हुये देखने से पहले यह योगी की उस राजनीतिक ट्रेनिंग को समझना होगा जो गोरखनाथ मठ की पहचान रही। महज दिग्विजय ने 1949 में संघ के स्वयंसेवकों को गोरखनाथ मंदिर से बाहर भी किया। 1967 में हिन्दू महासभा के टिकट से महंत दिग्विजय ने चुनाव भी लड़ा। 1989 में महंत अवैधनाथ ने हिन्दू महासभा की टिकट पर चुनाव लड बीजेपी को भी हराया । यानी हिन्दुत्व या राम मंदिर के नाम पर जो लकीर संघ खींचता आया है उसे हिन्दू महासभा ने हमेशा बेहद कमजोर माना । और जब बीजेपी को इसका अहसास हुआ कि हिन्दू महासभा के मंहत अवैधनाथ को साथ लाये बगैर हिन्दुत्व के ठोल पीटे नहीं जा सकते । या राम मंदिर का सवाल आंदोलन में बदला नहीं जा सकता तो 1991 में मंहज अवैधनाथ को मान मनौवल कर बीजेपी के टिकट से गोरखपुर में लड़ाया गया । यानी हिन्दुत्व के सवाल पर संघ और हिन्दू महासभा के बीचे दूरियो का रुख ठीक उसी तरह रहा जैसे एक वक्त हिन्दू रक्षा के सवाल पर गुरुगोलवरकर और सावरकर से लेकर मंहत दिग्विजय तक में भिन्नता थी। विभाजन के दौर में जब देश दंगो में झुलस रहा था तब हिन्दु महासभा का संघ पर आरोप था कि वह कबड्डी खेलने में व्यस्त है । यानी हिन्दु रक्षा की जगह सेवा भाव में ही संघ रहा । इसी लिये जिस वक्त अयोध्या आंदोलन उग्र हुआ तब महंत अवैधनाथ बीजेपी के साथ आये। और आज भी योगी आदित्यनाथ ये मानते है कि राम मंदिर निर्माण को सत्ता ने टाला। लेकिन हिन्दुत्व की योगी आदित्यनाथ की शैली क्या प्रधानमंत्री मोदी के लिये राहत है । ये सवाल इसलिये बड़ा हो चला है क्योकि गोरखपुर में योगी आदित्यनाथ का राजनीतिक मॉडल उस दबंग राजनीति पर टिका है, जिस अंदाज को हिन्दू रक्षा के लिये एक वक्त सावरकर ने माना और यूपी में मंहज दिग्विजय ने अपनाया भी। यानी योगी के दौर में यूपी में कानून व्यवस्था की परिभाषा भी बदल जायेगी। क्योंकि जिस राजनीतिक मॉडल को योगी आदित्यनाथ ने गोरखपुर में अपनाया। उसका सच ये भी है कि हिन्दू संघर्ष वाहिनी का अपने इलाके में अलग खौफ है। गोरखपुर में सांस्कृतिक सवालों के जरीये वाहिनी की दंबगई के आगे कानून व्यवस्था मायने नही रखती। खुद योगी आदित्यनाथ ने गोऱखपुर के कई ऐतिहासिक मुहल्लों के नाम मुस्लिम विरोध के बीच बदलवा दिए। उर्दू बाजार हिन्दी बाजार बन गया। अलीनगर आर्यनगर हो गया। मियां बाजार मायाबाजार हो गया। यानी योगी का अपना एजेंडा रहा-और उस एजेंडे में कानून अभी बाधा नहीं बना।

और योगी की दबंगई ही उनका यूएसपी है,जो गोरखपुर में लोगों को उनका मुरीद भी बनाता रहा।यानी योगी की गोरखपुर की पहचान का अगर विस्तार बतौर सीएम यूपी में होगा तो दंबग जातियों को दब कर चलना होगा। हिन्दू रक्षा के लिये कानून व्यवस्था अब काम करती दिखेगी। दबंग राजनेताओ की राबिन हुड छवि खत्म होगी । और मुस्लिम दबंगई पर तो बहस बेमानी है। यानी योगी की राजनीतिक धारा की दबंगई खुद ब खुद कानूनी मान्यता पायेगी और सड़क पर दंबग राजनीति में नयापन दिखायी देगा। ये तय है । ऐसे में जो हिन्दुत्व या राम मंदिर के अक्स तले योगी को समझना चाहते है तो फिर याद किजिये साल भर पहले यानी 2 मार्च 2016 को गोरखनाथ मंदिर में भारतीय संत सभा की चिंतन बैठक हुई थी, जिसमें आरएसएस के बड़े नेताओं की मौजूदगी में संतों ने कहा था---"1992 में 'ढांचा' तोड़ दिया। अब केंद्र में अपनी सरकार है. सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला हमारे पक्ष में आ जाए, तो भी प्रदेश में मुलायम या मायावती की सरकार रहते रामजन्मभूमि मंदिर नहीं बन पाएगा। इसके लिए हमें योगी आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री बनाना होगा"

शाह को शह देकर योगी के आसरे संघ का राजनीतिक प्रयोग

Sat, 18/03/2017 - 22:53

ये बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह को संघ की शह-मात है । ये नरेन्द्र मोदी की कट्टर हिन्दुत्व को शह-मात है । ये मुस्लिम तुष्टीकरण राजनीति में फंसी सेक्यूलर राजनीति को संघ की सियासी समझ की शह-मात है । ये मोदी का हिन्दुत्व राजनीति के एसिड टेस्ट का एलान है । ये संघ का भगवा के आसरे विकास करने के एसिट टेस्ट का एलान है । ये हिन्दुत्व सोच तले कांग्रेस को शह मात का खेल है, जिसमें जिसमें योगी आदित्यनाथ के जरीये विकास और करप्शन फ्री हालात पैदा कर चुनौती देने का एलान है कि विपक्ष खुद को हिन्दू विरोधी माने या फिर संघ के हिन्दुत्व को मान्यता दे। तो यूपी के नये सीएम के एलान के साथ कई थ्योरियों ने जन्म तो ले ही लिया है। और हर थ्योरी पहली बार उस पारंपरिक राजनीति से टकरा रही है, जिसे अभी तक प्रोफेशनल माना गया । लेकिन योगी आदित्यनाथ के जरीये राजनीतिक बदलाव की सोच पहली बार उसी राजनीति को शह मात दे गई जिसके दायरे में लगातार बीजेपी के कांग्रेसीकरण होने से संघ परेशान था । और संघ के भीतर सावरकर थ्योरी से हेडगेवार थ्योरी टकराने की आहट से बीजेपी परेशान रहती थी । तो जरा योगी आदित्यनाथ के जरीये इस सिलसिले को समझें कि आखिर बीजेपी अध्यक्ष ने ही सबसे पहले गवर्नेंस के नाम पर केन्द्रीय मंत्री मनोज सिन्हा के नाम पर मुहर लगायी। और संघ के पास सहमति के लिये मनोज सिन्हा का नाम भेजा। और ये मान कर भेजा कि संघ मनोज सिन्हा के नाम पर अपना मूक ठप्पा लगा देगा ।

क्योंकि संघ राजनीतिक फैसलों में दखल नहीं देता । लेकिन इस हकीकत को अमित शाह भी समझ नहीं पाये कि जिस तरह की सोशल इंजीनियरिंग का चुनावी प्रयोग यूपी में बीते तीन बरस के दौर में शामिल हुये बाहरी यानी दूसरे दलों से आये करीब सौ से ज्यादा नेताओं को बीजेपी का टिकट दिया गया । और यूपी के आठ प्रांत प्रचारकों से लेकर दो क्षेत्रवार प्रचारको की भी नहीं सुनी गई उसके बावजूद स्वयंसेवक यूपी में बीजेपी की जीत के लिये जुटा रहा तो उसके पीछे कही ना कही संघ और सरकार के बीच पुल का काम कर रहे संघ के कृष्ण गोपाल की ही सक्रियता रही, जिससे उन्होंने राजनीतिक तौर पर स्वयंसेवकों को मथा और चुनावी जीत के लिये जमीनी स्तर पर विहिप से लेकर साधु-संतों और स्वयंसेवकों को जीत के लिये गाव गांव में तैयार किया। ऐसे में मनोज सिन्हा के जरीये दिल्ली से यूपी को चलाने की जो सोच प्रोफनल्स राजनेताओं के तौर पर बीजेपी में जागी उस शह-मात के जरीये संघ ने योगी आदित्यनाथ का नाम सीधे रखकर साफ संकेत दे दिये सफलता संघ की सोच की है। और जनादेश जब संघ से निकले नेताओं की सोच में ढल रहा है तो फिर संकेत की राजनीति के आसरे आगे नहीं बढा जा सकता है ।

और यूपी के जो तीन सवाल कानून व्यवस्था, करप्शन और मुस्लिम तुष्टिकरण के आसरे चल रहे है, उसे हिन्दुत्व के बैनर तले ही साधना होगा । और अमित शाह के प्रस्ताव को संघ ने खारिज किया तो मोदी संघ के साथ इसलिये खड़े हो गये क्योंकि मंदिर से लेकर गौ हत्या और मुस्लिम तुष्टीकरण से लेकर असमान विकास की सोच को लेकर जो सवाल कभी विहिप तो कभी संघ के दूसरे संगठन या फिर सांसद के तौर पर साक्षी महाराज या मनोरंजन ज्योति उठाते रहे उनपर खुद ब खुद रोक आदित्यनाथ के आते ही लग जायेगी या फिर झटके में हिन्दुत्व के कटघरे से बाहर मोदी हर किसी को दिखायी देने लगेगें । और इसी के सामानांतर जब ये सवाल उठेगें कि मुस्लिम तो हिन्दु हो नही सकता लेकिन दलित या अन्य पिछड़ा तबका तो हिन्दु है तो फिर उसके पिछडेपन का इलाज कैसे होगा । तो विकास के दायरे में केशव प्रसाद मोर्य को डिप्टी सीएम बनाकर उसी राजनीति को हिन्दुत्व के आसरे साधा जायेगा जैसा राम मंदिऱ का शीला पूजन एक दलित से कराया गया था । यानी हिन्दुत्व के उग्र तेवर उंची नहीं पिछडी जातियों के जरीये उभारा जायेगा। और जो सवाल आरएसएस के भीतर सवारकर बनाम हेडगेवार के हिन्दुत्व को लेकर उग्र और मुलायम सोच तले बहस के तौर पर लगातार चलती रही उसपर भी विराम लगा जायेगा ।

क्योंकि योगी आदित्यनाथ की पहचान तो हिन्दु महासभा से जुडी रही है । और एक वक्त कट्टर हिन्दुत्व के आसरे ही योगी आदित्यनाथ ने बीजेपी की राजनीति को चुनौती अलग पार्टी बनाकर दी थी । और 50 के दशक में तो गोरखपुर  मंदिर तक नानाजी देशमुख को इसलिये छोड़ना पडा था क्योकि तब गोरखपुर मंदिर में हिन्दू महासभा के स्वामी दिग्विजय से वैचारिक टकराव हो गया था । और तभी से ये माना जाता रहा कि हिन्दुत्व को लेकर जो सोच सावरकर की रही उससे बचते बचाते हुये ही संघ ने खुद का विस्तार किया । लेकिन राम मंदिर का सवाल जब जब संघ के भीतर उठा तब तब उसके रास्ते को लेकर सावरकर गुट के निशाने पर बीजेपी भी आई । यानी मोदी की योगी आदित्यनाथ के नाम पर सहमति कही ना कही सरसंघचालक मोहन भागवत को भी शह मात है। और इन तमाम राजनीतिक धाराओं का सच ये भी है कि जिस तरह मोदी-संघ ने यूपी की राजनीति को जनादेश से लेकर विचार के तौर पर झटके में हजल दिया है । उसमें अगर कोई सामान्य तौर पर ये मान रहा है कि पिछड़ी जातियों की राजनीति या मुस्लिम तुष्टीकरण की राजनीति में उभार आ जायेगा । तो फिलहाल कहा जा सकता है कि ये भूल होगी । लेकिन इतिहास के गर्त में क्या छुपा है और आने वाला वक्त कैसे यूपी को सियासी प्रयोगशाला बनाकर मथेगा । इसका इंतजार हर किसी को करना ही होगा । क्योंकि यूपी सिर्फ सबसे बड़ा सूबा भर नहीं है । बल्कि ये संघ की ऐसी प्रयोगशाला है जिसमें तपकर या तो देश की राजनीति बदलेगी या फिर हिन्दुत्व की राजनीति को मान्यता मिलेगी ।

मुस्लिम-दलित-किसान कैसे फिट होगा "सबका साथ सबका विकास" तले ?

Fri, 17/03/2017 - 21:44
18 करोड़ मुस्लिम। 20 करोड़ दलित। खेती पर टिके 70 करोड़ लोग। और ऐसे में नारा सबका साथ सबका विकास। तो क्या प्रधानमंत्री मोदी के सामने सबसे बड़ी चुनौती मुस्लिम-दलित-गरीब-किसान-मजदूर को नई राजनीति से साधना है। या फिर मुख्यधारा में सभी को लाना है। जरा सिलसिलेवार तरीके से इस सिलसिले को परखें तो आजादी के साथ विभाजन की लकीर तले मुस्लिमों की ये तादाद हिन्दुस्तान का ऐसा सच है जिसके आसरे राजनीति इस हद तक पली बढ़ी कि सियासत के लिये मुस्लमान वजीर माना गया और सामाजिक-आर्थिक विपन्नता ने इसे प्या  बना दिया। लेकिन जो सवाल बीते 70 बरस में मुस्लिमों को लेकर सियासी तौर पर नहीं वह सवाल आज की तारीख में सबसे ज्वलंत है कि क्या मोदी राज में मुस्लिम खुद को बदलेंगे। या फिर मुस्लिम सियासी प्यादा बनना छोड़ अपनी पहचान को भी बदल लेंगे। ये सवाल इसलिये क्योंकि जब 1952 के पहले चुनाव से लेकर 2014 के लोकसभा चुनाव और 2017 के यूपी चुनाव तक में मुस्लिम को वोट बैक मान कर राजनीति अलग अलग धारा में बंटी। और जीत हार के बाद भी सवाल सिर्फ मुस्लिमों को लेकर ही खड़े किये जा रहे हैं। ऐसी आवाजें कई स्तर पर कई मुस्लिम नेताओं के जरीये यूपी चुनाव परिणाम के बाद सुनी जा सकती है। तो सवाल तीन हैं। पहला क्या मुस्लिम नेता के सरोकार आम मुस्लिम नागरिक से जुडे हुये नहीं है। दूसरा क्या नुमाइन्दी के नाम पर हमेशा मुस्लिम ठगे गये। तीसरा, क्या मुस्लिम समाज के भीतर की कसमसाहट अब मुस्लिम नेताओं से अलग रास्ता तलाश रही हैं। क्योंकि यूपी चुनाव का सच तो यही है कि बीजेपी बहुमत के साथ जीती। करीब 40 फीसदी वोट उसे मिले। लेकिन कोई मुस्लिम उसका उम्मीदवार नहीं था। और पहली बार यूपी विधानसभा में सबसे कम सिर्फ 24 विधायक मुस्लिम हैं। पिछली बार 69 मुस्लिम विधायक थे। यानी जो समाजवादी और मायावती मुस्लिमों को टिकट देकर खुद को मुस्लिमों की नुमाइन्दी का घेरा बना रही थी, मुस्लिमो ने उसी समाजवादी और मायावती के बढते दायरे को कटघरा करार दे दिया। असर इसी का हुआ कि सपा के 16 तो बीएसपी के 5 और कांग्रेस के 2 मुस्लिम उम्मीदवार विधायक बन पाये। तो इसके आगे के हालात ये भी है कि क्या चुनावी जीत हार के दायरे में ही मुस्लिम समाज को मुख्यधारा में लाने या ना ला पाने की सोच देश में विकसित हो चली है। क्योंकि ट्रिपल तलाक पर बीजेपी के विरोध के साथ मुस्लिम महिलायें वोट देने के लिये खडी हुई लेकिन ट्रिपल तलाक बरकरार है। वाजपेयी के दौर में मदरसों के आधुनिकीकरण के साथ मुस्लिम खड़े हुये लेकिन मदरसों के हालात जस के तस है। कांग्रेस के दौर में बुनकर से लेकर हज करने तक में बड़ी राहत दी गई। लेकिन दोनों सवाल आज भी जस के तस हैं। 
मुलायम-मायावती के दौर में मुस्लिमों को वजीफे से लेकर तमाम राहत दी गई। लेकिन रहमान कमेटी से लेकर कुंडु कमेटी और सच्चर कमेटी तक में मुस्लिम समाज के भीतर के सवालों ने एक आम मुस्लिम की जर्जर माली हालत को ही उभार दिया। तो फिर मौजूदा वक्त में प्रधानमंत्री मोदी के सामने भी ये सवाल है और मुस्लिम समाज के भीतर भी ये सवाल है कि अखिर मुख्यधारा से सरकार की नीतिया मुस्लिम समाज को जोड़ेगी या फिर मुस्लिम अपनी पहचान छोड जब एक आम नागरिक हो जायेगा तो वह मुख्यधारा से जुड़ेगा क्योंकि अगला सवाल दलितो का है। 20 करोड़ दलित का। और राजनीति ने दलित को एक ऐसे वोट बैक में तब्दील कर दिया,जहां ये सवाल गौण हो गया कि दलित मुख्यधारा में शामिल कब और कैसे होगा। यानी आंबेडकर से लेकर कांशीराम और मायावती तक के दौर में दलितो का ताकत देने के सवाल कांग्रेस की राजनीति से टकराता रहा। और कांग्रेस नेहरु से लेकर राहुल गांधी तक के दौर में दलितों के हक का सवाल दलितों के दलित पहचान के साथ जोड़े रही। तो क्या यूपी चुनाव के जनादेश ने पहली बार संकेत दिये कि दलित नेताओं की नुमाइन्दगी तले दलित खुद को ठगा हुआ मान रहा है। यानी दलित नेताओ के सरोकार दलितों के सामाजिक-आर्थिक उत्थान से जुडे नहीं तो दलितों ने रास्ता अलग पकडा यानी जो सवाल मुस्लिमो की पहचान को लेकर उठा कि मोदी को लेकर मुस्लिम बदलेगें उसी तर्ज पर दलित भी अब अपनी स्वतंत्र राजनीतिक पहचान छोड कर मोदी सरकार के साथ खडे होगें । 
लेकिन संकट वहीं है कि क्या चुनावी जीत -हार तले दलितों की मुशिकल हालात सुधरेंगे । या फिर दलितो के लिये नीतिया मुख्यधारा में शामिल करने के अनुकूल बनेगी यानी मोदी के सामने दोहरी चुनौती है। एक तरफ मुस्लिम अपनी राजनीतिक पहचान छोड़े दूसरी तरफ दलितों को सत्ता मुख्यधारा की पहचान दें। यानी सारे हालात बार बार सरकार की उन आर्थिक सामाजिक नीतियों की तरफ ले जाती है जो असमानता पर टिका है। और प्रधानमंत्री मोदी के सामने सबसे बडी चुनौती यही है कि वह कैसे असमान समाज के भीतर सबका साथ सबके विकास की अलघ जगाये। क्योंकि बीजेपी के अपने अंतर्विरोध हिन्दुत्व और हिन्दू राष्ट्र की परिकल्पना को भी जीते हैं। यानी जाति और धर्म से टकराती हुये संघ से लेकर बीजेपी भी नजर आती है। ऐसे में अगला सवाल तो देश की असमानता के बीच सबका साथ सबका विकास तले गरीब किसान मजदूर का है। क्योंकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भाषणों में अब बीजेपी के वो पारंपरिक मुद्दे नज़र नहीं आते, जिनके आसरे कभी बीजेपी ने अपनी पहचान गढ़ी थी। अलबत्ता गरीब-किसान-मजदूर-दलित-शोषित-वंचित की बात करते हुए मोदी खुद को लीक से अलग ऐसे राजनेता के रुप में पेश करने की कोशिश में हैं,जिसके लिए हाशिए पर पड़े शख्स की जिंदगी को संवारना ही पहला और आखिरी उद्देश्य है।लेकिन देश की विपन्नता सबका साथ सबका विकास की समानता पर सवाल खड़ा करती है । क्योंकि देश का सच यही है कि सिर्फ एक फीसदी रईसों के पास देश की 58 फीसदी संपत्ति है । और दलित-मुस्लिम-किसान जो 80 फिसदी है उसके पास 10 फिसदी संसाधन भी नहीं है। यानी अर्थव्यवस्था के उस खाके को देश ने कभी अपनाया ही नहीं जहा मानव संसाधन को महत्व दिया जाये । यानी जो मानव संसाधन चुनाव जीतने के लिये सबसे बडा हथियार है। वहीं मानव संसाधन विकास की लकीर खींचे जाते वक्त पगडंडी पर चलने को मजबूर हैं। और उसके लिये किसी सरकार के पास कोई नीति है ही नहीं। यानी देश के हाशिए पर पड़ा समाज आज भी मूलभूत की लड़़ाई लड़ रहा है, और सबका साथ सबका विकास आकर्षक नारा तो बन जाता है लेकिन जमीन पर इसे अमलीजामा कैसे पहनाया जाए-इसका रोड़मैप किसी सरकार के पास कभी नहीं दिखा।

राजनीति राष्ट्रीय पर्व है, चुनावी जीत देश का सबसे बड़ा लक्ष्य

Thu, 16/03/2017 - 22:55
52 करोड़ युवा वोटर। 18 से 35 बरस का युवा । 18 बरस यानी जो बारहवीं पास कर चुका होगा। और जिसके सपने खुले आसमान में बेफिक्र उड़ान भर रहे होंगे । 25 बरस का युवा जिसकी आंखों में देश को नये तरीके से गढने के सपने होंगे । 30 बरस का युवा जो एक बेहतरीन देश चाहता होगा। और अपनी शिक्षा से देश को नये तरीके से गढने की सोच रहा होगा। 35 बरस का यानी जो नौकरी के लिये दर दर की ठोकरें खाते हुये हताश होगा। लेकिन सपने मरे नहीं होंगे। तो क्या 2019 का चुनाव सिर्फ आम चुनाव नहीं बल्कि बदलते हिन्दुस्तान की ऐसी तस्वीर होगी जिसके बाद देश नई करवट लेगा। हर हाथ में मोबाइल । हर दिमाग में सोशल मीडिया। सूचनाओं की तेजी। रियेक्ट करने में कहीं ज्यादा तेजी। कोई रोक टोक नहीं। और अपने सपनों के भारत को गढते हुये हालात बदलने की सोच। तो क्या 2019 के चुनाव को पकडने के लिये नेताओ को पारंपरिक राजनीति छोड़नी पड़ेगी। या फिर जिसतरह का जनादेश पहले दिल्ली और उसके बाद यूपी ने दिया है उसने पारंपरिक राजनीति करने वाली पार्टियो ही नही नेताओं को भी आईना दिखा दिया है कि वह बदल जाये । अन्यथा देश बदल रहा है ।

लेकिन युवा भारत के सपने पाले हिन्दुस्तान का ही एक दूसरा सच डराने वाला भी है। क्योंकि जो पढ़ रहे है । जो आगे बढने के सपने पाल रहे है । जो प्रोफशनल्स हैं। उनसे इतर युवा देश का एक सच ये भी है कि कि 52 करोड युवा वोटरों के बीच बड़ी लंबी लाइन युवा मजदूरों की होगी। युवा बेरोजगारों की होगी । युवा अशिक्षितों की होगी। 24 करोड़ युवा मनरेगा से कस्ट्रक्शन मजदूर और शारीरिक श्रम से जुड़ा होगा। 6 करोड रजिस्टर्ड बेरोजगार। तो 9 करोड रोजगार के लिये सडक पर होंगे। 11 करोड़ से ज्यादा युवा 5वीं पास भी नहीं होगा। तो क्या युवा भारत के सपने संजोये भारत को युवा चुनावी वोट से गढ़ता हुआ सिर्फ दिखायी देगा। और जिस बूढ़े हिन्दुस्तान को पीछे छोड युवा भारत आगे बढने के लिये बेताब होगा उसकी जमीन तले लाखों किसानों की खुदकुशी होगी। 30 करोड से ज्यादा बीपीएल होंगे। प्रदूषण से और इलाज बगैर मरते लाखों दूधमुंहें बच्चों के युवा पिता होंगे। ये सारे सवाल इसलिए क्योंकि राजनीतिक सत्ता पाने की होड देश में इस तरह मच चुकी है कि बाकि सारे संस्धान क्या करेंगे या क्या कर रहे है इसपर किसी की नजर है ही नहीं । और सत्ता के इशारे पर ही देश चले तो उसका एक सच ये भी ही कि 1977 में यूपी की 352 सीट पर जनता पार्टी ने 47.76 फिसदी वोट के साथ कब्जा किया था । लेकिन यूपी की तस्वीर और यूपी का युवा तब भी उसी राजनीति के रास्ते निकल पडा छा जहा देश को नये सीरे से गढने का सपना था । और 2017 में यूपी की 312 सीट पर बीजेपी ने 39.71 फिसदी वोट के साथ कब्जा किया है । और फिर युवाओ के सपनो को राजनीति के रंग में रंगने को सियासत तैयार है । तो आईये जरा इतिहास के इस चक्र को भी परख लें क्योंकि 43 बरस पहले का युवा आज सत्ता की डोर थामे हुये है। और बात युवाओं की ही हो रही है।

18 मार्च 1974 को छात्रों ने पटना में विधानसभा घेरकर संकेत दे दिये थे कि इंदिरा गांधी की सत्ता को डिगाने की ताकत युवा ही रखते है और उसके बाद जेपी ने संपूर्ण क्रांति का बिगुल फूंका था। और 43 बरस बाद 18 मार्च 2017 यानी परसो जब बीजेपी समूचे यूपी में जीत का दिन बूथ स्तर तक पर मनायेगी। तो संकेत यही निकलेंगे कि सत्ता में भागेदारी या परिवारत्न के लिये युवा को आंदोलन नही बूथ लेबल की राजनीति सीखनी होगी। तो क्या 43 बरस में छात्र या युवा की परिभाषा भी बदल गई है। क्योंकि याद कीजिये 18 मार्च 1974 । जब 50 हजार छात्रों ने ही पटना में विधानसभा घेर लिया तो राज्यपाल तक विधानसभा पहुंच नहीं पाये । यानी तब छात्र आंदोलन ने सडक से राजनीति गढी । और उसी आंदोलन से निकले चेहरे आज कहा कहा खडे है । नीतिश कुमार , रविशंकर प्रसाद , राजनाथ सिंह , रामविलास पासवान, लालू यादव सरीखे चेहरे 43 बरस पहले जेपी आंदलन से जुडे और ये चंद चेहरे मौजूदा वक्त में सत्ता के प्रतीक बन चुके हैं। ध्यान दीजिये ये चेहरे बिहार यूपी के ही है। यानी यूपी बिहार की राजनीति से निकले इन चेहरों के जरीये क्या युवा राजनीति को मौजूदा वक्त में हवा दी जा सकती है। और प्रधानमंत्री मोदी आज जब 2019 के चुनाव के लिये बारहवीं पास युवाओं को जोड़ने का जिक्र कर रहे है और दो दिन बाद 18 मार्च को यूपी में जीत का जश्न बीजेपी मनायेगी तो नया सवाल ये भी निकलेगा कि यूपी का युवा बूथ लेबल पर चुनावी राजनीति की निगरानी करेगा या फिर आंदोलन की राह पकडेगा । यानी सिर्फ चुनावी राजनीति को ही अगर देश का सच मान लें तो ये सवाल खडा हो सकता है कि युवाओ को राजनीति साथ लेकर आये । लेकिन जब सवाल युवाओ के हालातों से जुडेंगे तो फिर अगले दो बरस की बीजेपी की चुनौती को भी समझना होगा। क्योंकि शिक्षा संस्धानो को पढाई लायक बनाना होगा । यूनिवर्सिटी के स्तर को पटरी पर लाना होगा ।

करीब सवा करोड डिग्रीधारियो के लिये रोजगार पैदा करना होगा। सरकारी स्कूल को पढ़ाई लायक बनाना होगा , जहा तीन करोड बच्चे पढ़ते हैं । तो क्या वाकई युवाओ को साधने का राजनीतिक रास्ता इतना आसान है कि नेता छात्र से संपर्क साधे और जमीनी तौर पर यूपी की बदहाली बरकरार रहे । या फिर राजनीति ने जब सारे हालात चुनाव के जरीये सत्ता पाने और सत्ता बोगने पर टिका दिये है तो कही नये हालात एक नये छात्र आदोलन को तो देश में खडा नहीं कर देगें । क्योंकि याद किजिये जेएनयू , डीयू , हैदराबाद , पुणे फिल्म इस्टीयूट , जाधवपुर यूनिवर्सिटी , अलीगढ यूनिवर्सिटी में छात्र संघर्ष बीते दौ हरस के दौर में ही हुआ । और कमोवेश हर कैंपस म वही मुद्दे उठे जो राष्ट्रीय राजनीति को प्रभावित करते । यानी सवाल दलित का हो या सवाल साप्रदायिकाता बनाम सेक्यूलरिज्म का । सवाल राष्ट्रवाद बनाम देशद्रोह का हो या फिर शिक्षा का ही हो । संघर्ष करते ये छात्र राजनीतिक दलों की विचारधारा तले बंटते हुये नजर आये । लेकिन छात्र इस सवाल को कभी राजनीतिक तौर उठा नहीं पाये कि सत्ता के लिये नेता राजनीतिक विचारधारा को छोड़ क्यों देते हैं। यानी उत्तराखंड हो या गोवा या मणिपुर । या फिर यूपी-पंजाब में भी ऐसे नेताओ की पेरहिस्त खासी लंबी है जो कल तक जिस राजनीतिक धारा के खिलाफ थे । चुनाव के वक्त या चुनाव के बाद सत्ता के लिये उसी दल के साथ आ खडे हुये । तो क्या छात्र इस सच को समझ नहीं पा रहे है । क्योंकि प्रधानमंत्री मोदी जब अपने नेताओं को छात्रों से जोडने के लिये कह रहे हैं तो दो सवाल है । पहला छात्र भी राजनीति लाभ के लिये है । और दूसरा-कालेज में कदम रखते ही अब छात्रो को अपनी राजनीतिक पंसद साफ करनी होगी । यानी देश में हालात ऐसे है कि राजनीति ही सबकुछ है । क्योकि हर सरोकार को राजनीतिक लाभ में बदलने का जो पाठ संसदीय दल की बैठक में प्रादनमंत्री ने 16 मार्च को पढाया उसके संकेत साफ है अब राजनीति राष्ट्रीय पर्व है और चुनावी जीत देश का सबसे बडा लक्ष्य ।

जनादेश गढ़ रहा है सियासी लोकतंत्र को

Wed, 15/03/2017 - 21:34
10 करोड़ से ज्यादा बीजेपी सदस्य। 55 लाख 20 हजार स्वयंसेवक, देश भर में 56 हजार 859 शाखायें। 28 हजार 500 विद्यामंदिर। 2 लाख 20 हजार आचार्य। 48 लाख 59 हजार छात्र । 83 लाख 18 हजार 348 मजदूर बीएमएस के सदस्य। 589 प्रकाशन सदस्य । 4 हजार पूर्ण कालिक सदस्य । एक लाख पूर्वसैनिक परिषद । 6 लाख 85 हजार वीएचपी-बंजरंग दल के सदस्य । यानी देश में सामाजिक-सांगठनिक तौर पर आरएसएस के तमामा संगठन और बीजेपी का राजनीतिक विस्तार किस रुप में हो चुका है, उसका ये सिर्फ एक नजारा भर है। क्योंकि जब देश में राजनीतिक सत्ता के लिये सामाजिक सांगठनिक हुनर मायने रखता हो, तब कोई दूसरा राजनीतिक दल कैसे इस संघ -बीजेपी के इस विस्तार के आगे टिकेगा, ये अपने आप में सवाल है। क्योंकि राजनीतिक तौर पर इतने बडे विस्तार का ही असर है कि देश के 13 राज्यों में बीजेपी की अपने बूते सरकार है। 4 राज्यों में गठबंधन की सरकार है। और मौजूदा वक्त में सिर्फ बीजेपी के 1489 विधायक है तो संसद में 283 सांसद हैं। और ये सवाल हर जहन में घुमड़ सकता है कि संघ-बीजेपी का ये विस्तार देश के 17 राज्यो में जब अपनी पैठ जमा चुका है तो फिर आने वाले वक्त में कर्नाटक-तमिलनाडु और केरल यानी दक्षिण का दरवाजा कितने दिनों तक बीजेपी के लिये बंद रह सकता है।

तो सवाल चार हैं। पहला, क्षेत्रीय दलों की मौजूदगी अर्थहीन हो चली है। दूसरा, हाशिये पर पडे बहुसंख्यक तबके में जातिगत राजनीति खत्म हो चली है। तीसरा,बहुसंख्यक गरीब तबका मुख्यधारा से जुड़ने की आकांक्षा पाल चुका है। चौथा, राज्यों को केन्द्र की सरकार के साथ खड़ा होना ही होगा। यानी जो राजनीति मंडल से निकली, जिस राजनीति को आंबेडकर ने जन्म दिया, जो आर्थिक सुधार 1991 में निकले। सभी की उम्र पूरी हो चुकी है और नये सीरे से देश को मथने के लिये मोदी-भागवत की जोड़ी  तैयार है। क्योंकि इनके सामने विजन सिर्फ अगले चुनाव यानी 2019 का नहीं बल्कि 2025 का है। जब आरएसएस के सौ बरस पूरे होंगे। और सौ बरस की उम्र होते होते संघ को लगने लगा है कि बीजेपी अब देश को केसरिया रंग में रंग  सकती है। क्योंकि पहली बार उस यूपी ने जनादेश से देश के उस सच को ही हाशिये पर ठकेल दिया जहां जाति समाज का सच देश की हकीकत मानी गई। और इसीलिये 18-19 मार्च को कोयबंटूर में संघ की प्रतिनिधि सभा में सिर्फ 5 राज्यों के चुनाव परिणाम के असर से ज्यादा 2025 को लेकर भी चर् होने वाली है। और इस खांचे में मुस्लिमों कैसे खुद ब खुद आयेंगे, इसकी रणनीति पर चर्चा होगी।

तो क्या वाकई संघ-बीजेपी के इस विस्तार के आगे हर तरह की राजनीति नतमस्तक है। या फिर 2017 ने कोई सीख विपक्ष की राजनीति को भी दे दी है। क्योंकि 2014 में मोदी लहर में बीजेपी को 31 फीसदी वोट मिले। और यूपी की सियासत को ही उलटने वाले जनादेश में बीजेपी को 39.7 फिसदी वोट मिले। यानी 2014 में 68 फिसदी वोट विपक्ष में बंटा हुआ था। और यूपी में अगर मायावती भी अखिलेश राहुल के साथ होती तो कहानी क्या कुछ और ही हो सकती थी। क्योंकि मायावती को मिले 22.2 फिसदी वोट सिवाय बीजेपी को जिताने के अलावे कोई काम कर नहीं पाये। लेकिन विपक्ष के वोट मिला दे तो करीब 50 फिसदी वोट हो जाते। तो क्या वाकई अब भी ये तर्क दिया जा सकता है कि जिस तरह कभी गैर इंदिरावाद का नारा लगाते हुये विपक्ष एकजुट हुआ और इंडिया इज
इंदिरा या इंडिया इज इंदिरा का शिगुफा धूल में मिला दिया। उसी तरह 2019 में मोदी इज इंडिया का लगता नारा भी धूल में मिल सकता है। या फिर जिस राजनीति को मोदी सियासी तौर पर गढ रहे है उसमें विपक्ष के सामने सिवाय राजनीतिक तौर तरीके बदलने के अलावे कोई दूसरा रास्ता बचता नहीं है । क्योंकि कांग्रेस ने मुस्लिम तुष्टीकरण का रास्ता पकड़ा। मंडलवाद-आंबेडरकरवाद ने जाति को बांटकर मुस्लिम को साथ जोडा । लेकिन दलित-पिछडे-मुस्लिमों की सामाजिक-आर्थिक हालात और बिगड़ी। तो क्या नये हालात में ये मान लिया जाये कि जैसे ही चुनावी राजनीति के केन्द्र में मोदी होंगे, वैसे ही वोट का ध्रुवीकरण मोदी के पक्ष में होगा। क्योंकि मोदी ने देश की उस नब्ज को पकड़ा, जिस नब्ज को राजनीतिक दलो ने सत्ता पाने के लिये वोट बैंक बनाया। तो ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि विपक्ष की वापसी तभी होगी जब मोदी से पैदा हुई उम्मीद टूट जाये। ध्यान दें तो कांग्रेस की राजनीति सियासी इंतजार पर ही टिकी है। और मायावती से लेकर अखिलेश तक उन चार सवालो का राजनीतिक रास्ता कोई नहीं पाये जिसे मोदी ने चुनावी भाषणों में हर जहन में पैदा दिया। पहला परिवारवाद, दूसरा जातिवाद, तीसरा भ्रष्टाचारवाद, चौथा तुष्टीकरण। विपक्ष कह सकता है बीजेपी भी इससे कहा मुक्त है लेकिन पहली बार समझना ये भी होगा कि मोदी ने अपने कद को बीजेपी से बड़ा किया है और सियासी राजनीति के केन्द्र में बीजेपी या संघ की राजनीतिक फिलास्फी नहीं बल्कि मोदी की राजनीतिक समझ है।

लेकिन दिल्ली और यूपी की सत्ता पर काबिज होने के बाद नया सवाल यही है कि क्या जनादेश की उम्मीदपर बीजेपी खरी उतरेगी या उतरने की चुनौती तले मोदी की राजनीति बीजेपी में भी घमासान को जन्म दे देगी । क्योंकि यूपी का सच यही है कि उसपर बीमारु राज्य का तमगा । और कमोवेश हर क्षेत्र में यूपी सबसे
पिछडा हुआ है । तो क्या मौजूदा वक्त में 22 करोड़ लोगों का राज्य सबसे बडी चुनौती के साथ मोदी के सामने है। और चुनौती पर पार मोदी पा सकते है इसीलिये उम्मीद कही बडी है या फिर इससे पहले के हालातों को मोदी जिस तरह सतह पर ले आये उसमें हर पुरानी सत्ता सिवाय स्तात पा कर रईसी करती दिखी इसीलिये जनता ने सत्ता पाने के पूरे खेल को ही बदल दिया। क्योंकि राज्य की विकास दर को ही देख लें तो अखिलेश के दौर में 4.9 फिसदी। तो मायावती के दौर में 5.4 फिसदी । और मुलायम के दौर में 3.6 पिसदी । यानी जिस दौर में तमाम बीमारु राज्यो की विकास दर 8 से 11 फिसदी के बीच रही तब यूपी सबसे पिछडा रहा । और खेती या उघोग के क्षेत्र में भी अगर बीते 15 बरस के दौर को परखे तो खेती की विकास दर मुलायम के वक्त 0.8 फिसदी, तो मायावती के वक्त 2.8 फिसदी और अखिलेश के वक्त 1.8 फिसदी । और उघोग के क्षेत्र में मुलायम के वक्त 9.7 फिसदी , मायावती के वक्त 3.1 फिसदी , अखिलेश के वक्त 1.3 फिसदी है। यानी चुनौती इतनी भर नहीं है कि यूपी के हालात को पटरी पर कैसे लाया जाये । इसके उलट यूपी को उम्मीद है कि करीब 8 करोड गरीबों की जिन्दगी कैसे सुधरेगी । जाहिर है हर नजर दिल्ली की तरफ टकटकी लगाये हुये है । क्योंकि एक तरफ देश में प्रति व्यक्ति आय 93231 रुपए है,जबकि यूपी में यह आंकड़ा महज 44197 रुपए है । देश की 16 फीसदी से ज्यादा आबादी होने के बावजूद यूपी का जीडीपी में योगदान महज 8 फीसदी है । दरअसल, सच यह है कि बीते 20 साल में यूपी का आर्थिक विकास किसी सरकार की प्राथमिकता में रहा ही नहीं। लेकिन मुद्दा सिर्फ आर्थिक विकास का नहीं है। ह्यूमन डवलपमेंट के हर पैमाने पर यूपी फिसड्ड़ी है। यानी गरीबों-दलितों-वंचितों की बात करने वाली हर सरकार ने अपनी सोशल इँजीनियरिंग में उन्हीं के आसरे सत्ता हासिल की-लेकिन गरीबों को मिला कुछ नहीं। आलम ये कि विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट कहती है कि यूपी के 44 फीसदी बच्चे कुपोषण के शिकार हैं । स्वास्थ्य पर प्रति व्यक्ति सार्वजनिक खर्च गोवा और मणिपुर जैसे राज्यों से भी कम है। शिशु मृत्यु दर देश के औसत से कहीं ज्यादा है । यानी किसी भी पैमाने पर यूपी की छवि विकासवादी सूबे की नहीं रही और इन हालातों में जब यूपी के जनादेश ने सियासत करने के तौर तरीके ही बदलने के संकेत दे दिये है तो भी जिन्हे जनता ने अपनी नुमाइन्दगी के लिये चुना है उनके चुनावी हफलनामे का सच यही है कि 402 में से 143 विधायकों का आपराधिक रिकॉर्ड है और इनमें 107 विधायकों पर तो गंभीर आपराधिक मामले दर्ज हैं । और यूपी अब इंतजार कर रहा है कि उसका मुखिया कौन होगा यानी सीएम होगा कौन । और सीएम के लिये फार्मूले तीन है । पहला कोई कद्दावर जो यूपी का सीएम हो जाये । दूसरा यूपी का दायित्व कई लोगो में बांटा जाये। तीसरा, यूपी पूरी तरह पीएमओ के रिमोट से चले। इन तीन फार्मूलो के अपने अंतर्विरोध इतने है कि अभी नाम के एलान का इंतजार करना पडेगा ।

क्योंकि कोई कद्दावर नेता दायित्वो को बांटना नहीं चाहेगा । दायित्वों को बांटने का मतलब दो डिप्टी सीएम और रिमोट का मतलब पीएमओ में नीति आयोग की अगुवाई में तीन से पांच सचिव लगातार काम करें । यानी संघ और बीजेपी का सामाजिक राजनीतिक विस्तार चाहे देश को केसरिया रंग में रंगता दिखे लेकिन सच यही है कि लोकतंत्र का राग चुनावी जीत तले अकसर दब जाता है। और यूपी सरीखा जनादेश लोकतंत्र को नये तरीके से गढने के हालात भी पैदा कर देता है।

लेखक विषय संवाद साभार अनुवादक

पहले वो आए साम्यवादियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं साम्यवादी नहीं था

 

फिर वो आए मजदूर संघियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं मजदूर संघी नहीं था

 

फिर वो यहूदियों के लिए आए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं यहूदी नहीं था

 

फिर वो आए मेरे लिए

और तब तक बोलने के लिए कोई बचा ही नहीं था

 

मार्टिन नीमोलर (1892-1984)