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पुण्य प्रसून बाजपेयी

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Updated: 4 hours 54 min ago

राजधर्म के रास्ते पर भटक तो नहीं गये मोदी-योगी ?

Fri, 20/10/2017 - 22:07
धर्म दीर्घकालीन राजनीति है और राजनीति अल्पकालीन धर्म । यूं तो ये कथन लोहिया का है । पर मौजूदा सियासत जिस राजधर्म पर चल पड़ी है, उसमें कह सकते है कि बीते 25 बरस की राजनीति में राम मंदिर का निर्माण ना होना धर्म की दीर्घकालीन राजनीति है । या फिर मंदिर मंदिर सीएम पीएम ही नहीं अब तो राहुल गांधी भी मस्तक पर लाल टिका लगाकर चुनाव प्रचार कर रहे हैं तो राजनीति अल्पकालीन धर्म है । या फिर पहली बार भारतीय राजनीति हिन्दुत्व के चोगे तले सत्ता पाने या बनाये रखने के ऐसे दौर में पहुंच चुकी है, जहां सिर्फ मंदिर है । यानी धर्म को बांटने की नहीं धर्म को सहेजकर साथ खड़ा होकर खुद को धार्मिक बताने की जरुरत ही हिन्दुत्व है । क्योंकि पहली बार राजधर्म गिरजाधर हो या गुरुद्वारा या फिर मस्जिद पर नहीं टिका है । यानी हिन्दु मुस्लिम के बीच लकीर खिंचने की जरुरत अब नहीं है । बल्कि हिन्दू संस्कृति से कौन कितने करीब से जुड़ा है राजनीति का अल्पकालीन धर्म इसे ही परिभाषित करने पर जा टिका है । इसलिये जिस गुजरात में अटल बिहारी वाजपेयी मोदी की सत्ता को राजधर्म का पाठ पढ़ा रहे थे । उसी गुजरात में राहुल गांधी को अब मंदिर मंदिर जाना पड़ रहा है । तो क्या हिन्दुत्व की गुजरात प्रयोगशाला राजनीतिक मिजाज इतना बदल चुका है कि मंदिर ही धर्म है । मंदिर ही सियासत ।

यानी नई राजनीतिक चुनावी लड़ाई हिन्दू वोट बैंक में साफ्ट-हार्ड हिन्दुत्व के आसरे सेंध लगाने की है । या फिर जाति-संप्रदाय की राजनीति पर लगाम लगती धर्म की राजनीति को नये सिरे से परिभाषित करने की कोशिश । क्योकि यूपी ने 1992 में राममंदिर के नाम पर जिस उबाल को देखा । और हिन्दु-मुस्लिम बंट गये । और 25 बरस बाद अयोध्या में ही जब बिना राम मंदिर निर्माण दीपावली मनी तो खटास कहीं थी । बल्कि समूचे पूर्वाचल में हर्षोउल्लास था । तो क्या हिन्दुत्व की राजनीतिक प्रयोगशाला में सियासत का ये नया घोल है जहा हिन्दु मुस्लिम के बीच लकीर खिंचने से आगे हिन्दुत्व की बडी लकीर खिंच कर सियासत को मंदिर की उस चौखट पर ले आया गया है जहा सुप्रीम कोर्ट का हिन्दुत्व को लेकर 1995 की थ्योरी फिट बैठती है पर 2017 की थ्योरी फिट नहीं बैठती। क्योंकि याद कीजिये सुप्रीम कोर्ट में जब हिन्दु धर्म और राजनीति में धर्म के प्रयोग को लेकर मामला पहुंचा तो दिसबर 1995 में जस्टिस वर्मा ने कहा , ' हिंदुत्व शब्द भारत यों की जीवन शैली की ओर इंगित करता है। इसे सिर्फ धर्म तक सीमित नहीं किया जा सकता। " और याद किजिये 22 बरस बाद जब एक बार पिर सुप्रीम कोर्ट में चुनाव प्रचार में धर्म के प्रयोग को लेकर मामला पहुंचा तो सात सदस्यीय संविधान पीठ ने 1995 की परिभाषा से इतर कहा , "धर्म इंसान और भगवान के बीच का निजी रिश्ता है और न सिर्फ सरकार को बल्कि सरकार बनाने की समूची प्रक्रिया को भी इससे अलग रखा जाना चाहिए। " तो सुप्रीम कोर्ट ने राजसत्ता के मद्देनजर धर्म की जो व्याख्या 1995 में की कमोवेश उससे इतर 22 बरस बाद 2017 में परिभाषित किया । पर 1995 के फैसले का असर अयोध्या में बीजेपी दिखा नहीं सकी । और जनवरी 2017 के पैसले के खिलाफ पहले यूपी में तो अब गुजरात के चुनावी प्रचार में हर नजारा उभर रहा है ।

और संयोग ऐसा है कि गुरात हो या अयोध्या । दोनो जगहो पर राजधर्म का मिजाज बीते डेढ से ढाई दशक के
दौर में बदल गया । ये सवाल वाकई बडा है कि 2002 के गुजरात दंगों के बाद सोनिया गांधी ने द्वारका या सोमनाथ में उसी तरह पूजा अर्चना क्यों नहीं की जैसी अब राहुल गांधी कर रहे है । 2002 के बाद पहली बार है कि काग्रेस नेता मंदिर मंदिर जा रहे हैं। और 1992 के बाद से अयोध्या में बीजेपी के किसी नेता ने दीपावली मनाने की क्यो नहीं सोची जैसे अब यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ ने दीपावली मनायी जबकि बीजेपी के कल्याण सिंह , रामप्रकाश गुप्ता और राजनाथ सिंह सीएम रहे । और कल्याण सिंह ने तो 1992 में बतौर सीएम धर्म की राजनीति की नींव रखी । तो तब कल्याण सिंह के मिजाज और अब योगी आदित्यनाथ के राजनीतिक मिजाज । अंतर खासा आ गया है । लेकिन मुश्किल ये नहीं कि राजनीति बदल रही है । मुश्किल ये है कि -कल्याण सिंह हार्ड हिन्दुत्व के प्रतीक रहे । योगी आदित्यनाथ हिन्दुत्व का टोकनइज्म यानी प्रतिकात्मक हिन्दुत्व कर रहे है । और समझना ये भी होगा कि पीएम बनने के साढे तीन बरस बाद भी पीएम मोदी अयोध्या नहीं गये । पर सीएम बनने के छह महीने पुरे होते होते योगी अयोध्या में दीपावली मना आये । यानी एक तरफ राहुल गांधी भी मंदिर मंदिर घूम कर साफ्ट हिन्दुत्व को दिखा रहे हैं। और दूसरी तरफ केदारनाथ जाकर पीएम मोदी तो अयोध्या में योगी हिन्दुत्व का टोकनइज्म कर रहे है । तो कौन सी राजनीति किसके लिये फायदेमंद या घाटे का सौदा समझना ये भी जरुरी है । क्योकि जनता सत्ता से परिणाम चाहती है। और गुजरात से लेकर 2019 तक के आम चुनाव के दौर में अगर कांग्रेस या कहे राहुल गांधी भी टोकनइज्म के हिन्दुत्व को पकड चुके है । तो मुश्किल बीजेपी के सामने कितनी गहरी होगी ये इससे भी समझा जा सकता है कि योगी का हिन्दुत्व और मोदी का विकास ही आपस में टकरायेगा । क्योंकि संयोग से दोनों का रास्ता टोकनइज्म का है । और गुजरात में बीजेपी के सामने उलझन यही है कि गुजरात माडल का टोकनइज्म टूट रहा है । औोर हिन्दुत्व के टोकनइज्म की सत्ता अभी बरकरार है ।

ना मोदी राहुल के विकल्प है ना राहुल मोदी के...दोनों को लड़ना खुद से है

Tue, 17/10/2017 - 21:52
दो चेहरे। एक नरेन्द्र मोदी तो दूसरे राहुल गांधी। एक का कद बीजेपी से बड़ा। तो दूसरे का मतलब ही कांग्रेस। एक को अपनी छवि को तोड़ना है। तो दूसरे को अपनी बनती हुई छवि को बदलना है। 2019 के आम चुनाव से पहले गुजरात से लेकर हिमाचल। और कर्नाटक से लेकर राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ तक के चुनावी रास्ते में टकरायेंगे मोदी और राहुल ही। पर दोनों के संकट अपने अपने दायरे में अलग अलग होते हुये भी एक सरीखे हैं। और 2019 से पहले नई छवि दोनों को गढ़नी है। क्योंकि मोदी के सामने अब मनमोहन सरकार  नहीं अपने किये वादों की चुनौती है। जिसे उन्होंने 2014 मे गढ़ा। मोदी को हिन्दुत्व का चोगा पहनकर विकास का मंत्र फूंकते हुये संघ से लेकर वोट बैंक तक के लिए उम्मीद को बरकरार रखना है। मोदी को गरीबों की आस को भी बरकरार रखना है और युवा भारते के सपनो को भी जगाये रखना है। यानी जिस  उल्लास-उत्साह के साथ 2014 में कांग्रेस को निशाने पर लेकर मोदी मनमोहन सरकार या गांधी परिवार की हवा निकाल रहे थे, उसने मोदी की छवि को ही इतना फूला दिया कि 2019 में खुद को कैसे मोदी पेश करेंगे ये चुनौती मोदी के सामने है। और गुजरात में इस चुनौती के सामने घुटने टेकते मोदी जीएसटी को लेकर नजर आये। जब वह ये कहने से नहीं चूके कि जीएसटी सिर्फ उनका  किया-धरा नहीं है। इसमें पंजाब-कर्नाटक की कांग्रेस सरकार का भी योगदान है। तो एक देश एक कानून की हवा क्या जीएसटी के साथ वैट व दूसरे टैक्स के लिये जाने की वजह से निकल रही है। हो जो भी मोदी को खुद से ही इसलिये  टकराना है क्योंकि सामने कोई ऐसा नेता नहीं जो मोदी का विकल्प हो। सामने राहुल गांधी हैं, जिन्हें खुद अपनी छवि गढ़नी है। राहुल कांग्रेस के अध्यक्ष बन सकते है पर पार्टी कैसे बदलेंगे। राहुल की सामूहिकता का बोध मुस्लिम-दलित-आदिवासी के बिखरे वोट को कैसे एकजुट करेंगे। राहुल की  राजनीतिक समझ क्या बार बार विरासत से नहीं टकरायेगी।

क्योंकि चाहे अनचाहे नेहरु-गांधी परिवार की राजनीतिक समझ के दायरे में राहुल गांधी की आधुनिक कांग्रेस टकरायेगी ही। यानी राहुल की चुनौती मोदी से टकराने की नहीं बल्कि खुद की छवि गढने की है। यानी मोदी और राहुल चाहकर भी ना तो  एक दूसरे का विकल्प हो सकते हैं और ना ही खुद को एक दूसरे के खिलाफ खड़ा कर चुनाव जीत सकते है। दोनों को ही खुद को गढना है। क्योंकि पहली बार जनता 2014 में पार्टी से बडे मोदी के कद को देखने की आदी हो चली है तो वह  जीतायेगी भी किसी चेहरे को और हरायेगी भी किसी चेहरे को ही। चाहे वह चेहरा मोदी हो या राहुल गांधी। राहुल गांधी पहली बार कांग्रेस को लेकर तब  मथ रहे है जब वह अपने इतिहास में सबसे कमजोर है। और मोदी ऐसे वक्त जीत के घोड़े पर सवार हैं, जब आरएसएस भी अपने विस्तार को मोदी की सत्ता तले देख  रही है। दोनों ही हालात जन-मन को भी कैसे प्रभावित कर रहे होंगे ये इससे
भी समझा जा सकता है कि 1991 के आर्थिक सुधार के घोडे पर सवार भारत 2017 में आते आते उन सवालों से जूझने लगा है, जो सवाल इससे पहले या तो इक्नामी के दायरे में आते रहे या फिर करप्शन या वोट बैंक को प्रबावित करते रहे। यानी नेता कौन होगा और भारत का अक्स कैसे शून्यता तले दुनिया के मानचित्र  पर उभर रहा है इस सवाल से हर भारतीय चाहे अनचाहे जूझने लगा है। यानी तकनीकी विस्तार ने सत्ता को हर नागरिक तक पहुंचा भी दिया और हर नागरिक सीधे सत्ता पर टिका टिप्पणी करने से चूक भी नहीं रहा है। तो हिन्दुस्तान  का सच अब छुपता भी नहीं। हालात सार्वजनिक होने लगे हैं कि एक तरफ देश में 36 करोड] लोग गरीबी की रेखा से नीचे है। तो दूसरी तरफ देश के 12 करोड़ कंज्यूमर हैं, जिन पर बाजार की रौनक टिकी है। लेकिन भारत का सच इसी पर टिक जाये तो भी ठिक सच तो ये है कि एक तरफ संयुक्त राष्ट्र के खाद्य व कृर्षि
संगठन की 2015 की रिपोर्ट कहती है कि भारत में 19 करोड से ज्यादा लोग भूखे सोते हैं। तो 2017 की विश्व भुखमरी सूचकांक में भारत सौवे नंबर पर नजर आता है। यानी मोदी या राहुल खुद को मथे कैसे। कैसे वह सरोकार की राजनीति करते हुये नजर आये । ये चुनौती भी दोनो के सामने है क्योंकि सत्ता  की निगाहबानी में दूसरी तरफ एक ऐसा भारत है जो हर तकलीफ से इतना दूर है कि हर दिन साढे सोलह टन अनाज बर्बाद कर दिया जाता है। 2015 से 2017 के  दौर में 11,889 टन अनाज बर्बाद हो गया।

इन हालातों के बीच झारखंड के सिमडेगा से जब ये खबर आती है कि एक बच्ची की मौत इसलिये हो गई क्योंकि राशन दुकान से अनाज नहीं मिला। अनाज इसलिये नहीं मिला क्योकि आधार कार्ड नहीं था तो राशन कार्ड भी नहीं था। तो क्या मौत दो जून की रोटी की तडप  तले जा छुपी है। और अगर भूख से हुई मौत को छुपाने में सियासत लग रही है,देश के इस सच को भी समझना जरुरी है कि एक तरफ भूख खत्म करने के लिये। गरीबी हटाओ के नारे तले. इंदिरा गांधी से लेकर मौजूदा मोदी सरकार भी गरीबो की मसीहा अलग अलग योजनाओ तले खुद को मान रही है। यानी राहुल सिर्फ मोदी पर चोट कर बच नहीं सकते और मोदी 70 बरस के गड्डो का जिक्र कर पीएम  बने भी नहीं रह सकते है । और यही से स्टेटसमैन की खोज भी शुरु होती है और सर्वसम्मति वाले नेता की चाहत भी लोगो में बढती है । क्योकि मोदी हो या राहुल दोनो ही इस सच को जानते समझते है कि गरीब सबसे बडा वोट बैक भी है  और गरीबी सबसे बडी त्रासदी भी । पर सरकारो की नीतियो ने कैसे देश को खोखला किया इससे दोनो ही क्या ज्यादा दिनो तक आंखे मूंद सकते है । क्योकि कहे कोई कुछ भी सच तो यही है कि 254 करोड रुपये का अनाज हर दिन बर्बाद हो  जाता है । 58 हजार करोड का बना हुआ भोजन हर बरस बर्बाद हो जाता है । और इस अंधेरे से दूर दिल्ली के रायसीमा हिल्स पर मौजूद साउथ-नार्थ ब्लाक की  इस जगमगाहट को देखकर कौन कह सकता है कि गरीबो के लिये यहा वाकई कोई नीतियां बनती होगी । क्योकि इनइमारतो से तो सबसे करीब संसद भवन ही है । जहा का सच ये है कि -बीते 10 बरस में 7 राष्ट्रीय दलों की कुल संपत्ति 431 करोड़ रुपए से बढकर 2719 करोड़ रुपए हो गई । जिसमें बीजेपी की संपत्ति 122 करोड़ रुपए से बढ़कर 893 करोड़ तो कांग्रेस की संपत्ति 167 करोड़ से 758 करोड़ पार कर गई । तो सत्ता की दिवाली तो हर दिन मनती ही होगी । पर नीतिया हर दौर में ऐसी रही है कि बीते 10 बरस में 2,06,390  मीट्रिक टन अनाज गोदामों में रखे रखे सड़ गया। इन्हीं10 बरस में 6400 लाख टन खाना बर्बाद हो गया लेकिन भूख से तरसते लोगों तक नहीं पहुंच सका । और इन्ही दस बरसो में जनता के नुमाइन्दो की संपत्ति सबसे तेजी से सबसे  ज्यादा बढी । तो मोदी हो या राहुल । मथना खुद को दोनों को ही है। क्योंकि दिल्ली की चकाचौंध देश का सच है नहीं और देश का सच दिल्ली से दूर होता चला जा रहा है।

एडहॉक सिस्टम पर चल रही है देश की हायर एजुकेशन

Thu, 05/10/2017 - 23:21
दिल्ली यूनिवर्सिटी के 45 कालेजों में 1734 पद खाली पड़े हैं। इसके लिये बकायदा 10 जून से लेकर 15 जुलाई 2017 के बीच विज्ञप्ति निकालकर बताया भी किया कि रिक्त पद भरे जायेंगे। कमोवेश हर विषय या कहें फैकल्टी के साथ रिक्त पदों का जिक्र किया गया  । यानी देश की टॉप  यूनिवर्सिटी में शुमार दिल्ली यूनिवर्सिटी का जब ये आलम है तो देश की बाकी सेन्ट्रल यूनिवर्सिटी में क्या हो सकता है ये सोचकर आपकी रुह कांप जायेगी। क्योंकि हायर एजुकेशन को लेकर  बकायदा हर राज्य में सेन्ट्रल यूनिवर्सिटी बनायी गई । और अव्वल नंबर पर जेएनयू का जिक्र बार बार बार होता है। और देश के आईआईटी, आईबीएम और एनआईटी को बेहतरीन .यूनिवर्सिटी माना जाता है । पर हालात कितने बदतर हैं जरा ये भी देख लिजिये । पहले देश के टॉप दस सेन्ट्रल यूनिवर्सिटी, जहा 70 फीसदी से ज्यादा पद रिक्त हैं। तो सिलसिलेवार समझें। सेन्ट्रल यूनिवर्सिटी ऑफ हरियाणा में 87.1 फिसदी पद रिक्त पड़े हैं तो सेन्ट्रल यूनिवर्सिटी आफ तमिलनाडु में 87.1 फिसदी। और इसी तरह सेन्ट्रल यूनिवर्सिटी आफ ओडिशा में 85 फिसदी । सेन्ट्रल यूनिवर्सिटी आफ बिहार में 84.4 फिसदी । सेन्ट्रल यूनिवर्सिटी आफ पंजाब में 80.7 फिसदी । सेन्ट्रल यूनिवर्सिटी आफ केरल में 78.6 फिसदी । सेन्ट्रल यूनिवर्सिटी आफ कश्मीर में 75.6 फिसदी । इंदिरा गांधी नेशनल  ट्राइबल यूनिवर्सिटी [ मध्यप्रेदश } में 75.4 फिसदी ।सेन्ट्रल यूनिवर्सिटी आफ हिमाचल में 73.4 फिसदी । सेन्ट्रल यूनिवर्सिटी आफ सिक्किम में 72.1 पिसदी पद रिक्त है । यूं यूनिवर्सिटी की फेहरिस्त में जेएनयू और बीएचयू में छात्रो का हंगामा तो हर किसी को याद है । सियासत भी खूब हुई ।

मसलन आप भूले नहीं होंगे जेएनयू में आजादी के नारे । पर इन नारों से इतर किसी ने नहीं पूछा कि जेएनयू में कितने पद रिक्त पडे हैं।  सरकार की रिपोर्ट कहती है 323 पद खाली पड़े हैं । भरे क्यों नहीं गये । तो कोई बोलने को तैयार नहीं । और जो बीएचयू फिल्हाल बिना वीसी के है और छात्राओं पर पुलिस ने डंडे क्यो बरसाये, ये सवाल अब भी बार बार गूंज रहा है और छात्राओं के सवाल अब भी कानो में गूंज रहे होंगे कि बीएचयू कैसे बिगड़ गया । उसे बचाना होगा तो  मदनमोहन मालवीय जी के बीएचयू का हाल ये है कि बीएचयू में 896 रिक्त पद है । यानी  सेन्ट्रल यूनिवर्सिटी के कुल 15862 पदों में से 5958 पद रिक्त पडे हैं । इसीलिये दुनियाभर में टाप यूनिवर्सिटी में अक्सर चर्चा होती है कि नौ छात्रो पर एक शिक्षक होना चाहिये । पर भारत में 23 छात्रों पर एक शिक्षक है । और देश में जिस आईआईटी, आईबीएम और  एनआईटी को बेहतरीन यूनिवर्सिटी का दर्जा दिया जाता है । वहां का हाल ये है कि  6000 से ज्याद पद रिक्त पडे है । और इसके अलावे सिर्फ देशभर के इंजीनियरिंग कालेजों को परख लें तो सरकारी आंकडे ही कहते हैं कि इंजीनिंयरिंग कालेजो के 4 लाख 2 हजार पदो में से एक लाख 22 हजार पद रिक्त पडे है । यानी मुश्किल इतनी भर नहीं है कि सरकार रिक्त पदो पर भर्ती क्यो नहीं करती मुस्किल तो ये भी है कि जिस यूजीसी के मातहत सेन्ट्रल यूनिवर्सिटी आती है । उस यूजीसी के पास कोई परमानेंट चेयरमैन तक नहीं है । एडहाक चैयरमैन है ।  वाइस चैयरमैन का पद भी खाली पडा है । फाइनेनसियल एडवाइजर ही सचिव का काम देख रहा है ।

तो हायर एजूकेशन के लिये यूजीसी से लेकर सेन्ट्रल यूनिवर्सिटी  जब एडहॉक चैयरमैन से लेकर एडहॉक प्रोफेसर पर  निर्भर होगी तो होगा क्या । हो ये रहा है कि बडी तादाद में हायर एजुकेशन के लिये देश के बच्चे दूसरे देशों में जा रहे हैं। और कल्पना कीजिये हायर एजुकेशन को लेकर देश का बजट 33323 करोड रुपये है । जबकि हर बरस दूसरे देसो में पढने जा रहे बच्चो के मां-बाप एक लाख 20 हजार करोड से ज्यादा की रकम खर्च कर रहे है । एसोचैम की रिपोर्ट कहती है 2012 में ही 6 लाख बच्चे हर बरस देओश छोड कर बाहर पढाई के लिये चले जाते थे । तो बीते पांच बरस में इसमें कितना इजाफा हो गया होगा और उनके लिये देश में हायर एजूकेशन की कोई व्यवस्था क्यों नहीं है । ये अपने आप में सवाल है ।

60 बरस पहले कांग्रेस थी..60 बरस बाद बीजेपी है

Wed, 04/10/2017 - 23:49
केरल में बीजेपी की जनरक्षा यात्रा का  नजारा राजनीति जमीन बनाने के लिये है । या फिर राज्य में राजनीतिक हिंसा को रोकने के लिये । ये सवाल अनसुलझा सा है । क्योंकि वामपंथी कैडर और संघ के स्वयंसेवकों का टकराव कितनी हत्या एक दूसरे की कर चुका है, इसे ना तो वामपंथियों के सत्ता पाने के बाद की हिंसा से समझा जा सकता है ना ही सत्ता ना मिल पाने की जद्दोजहद में संघ परिवार के सामाजिक विस्तार से जाना जा सकता है । मसलन एक तरफ बीजेपी और संघ के स्वयंसेवकों के नाम हैं तो दूसरी तरफ सीपीएम के कैडर के लोगो के नाम। सबसे खूनी जिले कुन्नुर में एक तरफ सीपीएम कैडर के तीस लोग हैं, दूसरी तरफ संघ के स्वयंसेवकों के 31 नाम है । सभी मारे जा चुके हैं। राजनीतिक हिंसा तले मारे गये। ये सब बीते 16 बरस की राजनीतिक हिंसा का
सच है। और कुन्नूर की इस हिंसा के परे समूचे केरल का सच यही है । 2001 से 2016 तक कुल 172 राजनीतिक हत्यायें हो चुकी है । जिसमें बीजेपी-संघ के स्वयसेवको की संख्या 65 है तो सीपीएम के कैडर के  85 लोग मारे गये हैं। इसके अलावे कांग्रेस के 11 और आईयूएमएल के भी 11 कार्यकत्ता मारे गये है ।  तो राजनीतिक हिंसा किस राज्य में कितनी है इसके आंकडों के लिये सरकारी एंजेसी एनसीआरबी के आंकडो को भी देखा जा सकता है। जहां देश में पहले नंबर पर यूपी है तो केरल टाप 10 में भी नहीं आता।

लेकिन लड़ाई राजनीतिक है तो राजनीति के अक्स में ही केरल का सच समझना भी जरुरी है । क्योंकि आाजादी के बाद पहली बार लोकतंत्र की घज्जियां उड़ाते हये किसी राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाया तो वह केरल ही था और तब दिल्ली में नेहरु थे। और केरल में नंबूदरीपाद यानी  60 बरस के पहले कांग्रेस ने राजनीति दांव केरल को लेकर चला था । 60 बरस बाद केरल में वामपंथी विजयन की सत्ता है तो दिल्ली में मोदी है । तो दिल्ली की सत्ता तो काग्रेस से खिसक कर बीजेपी के पास आ गई । पर 60 बरस के दौर में बीजेपी केरल की जमीन पर राजनीतिक पैर जमा नहीं पायी । बावजूद इसके की संघ परिवार की सबसे ज्यादा शाखा आजकी तारिख में केरल में ही है । 5000 से ज्यादा शाखा। तो  बीजेपी अब वाम सत्ता को लेकर आंतक-जेहाद और हिंसक सोच से जोड़ रही है । तो अब चाहे खूनी राजनीति को लेकर सियासत हो । लेकिन 60 बरस पहले चर्च के अधिन चलने वाले स्कूल कालेजो  पर नकेल कसने का सवाल था । तब नंबूदरीपाद चाहते थे निजी स्कूलो में वेतन बेहतर हो । काम काज का वातावरण अच्छा हो ।

और इसी पर 1957 में शिक्षा विधेयक लाया गया । कैथोलिक चर्च ने विरोध कर दिया । क्योकि उसके स्कूल-कालेजो की तादाद खासी ज्यादा थी । नायर समुदाय के चैरिटेबल स्कूल-कालेज थे । तो उसने भी विरोध कर दिया । तो उस वक्त काग्रेस नायर समुदाय के लीडर मनन्त पद्ननाभा पिल्लई के पीछे खडी हो गई । और आंदोलन को उसने राजनीतिक हवा दी । हडताल, प्रदर्शन, दंगे से होते हुये  आंदोलन इतना हिसंक हो गया कि  पुलिस ने 248 जगहो पहर लाठीचार्ज किया और तीन जगहो पर गोली चला दी ।डेढ लाख प्रदर्शन कारियो को जेल में ढूसा गया । और जुलाई 1959 में जब एक गर्भवती मधुआरिन पुलिस की गोली से मारी गई तो  उसने आंदोलन की आग में धी का काम किया । और नंबूदरीपाद के मुरीद नेहरु भी तब काग्रेसी सियासत के दवाब में आ गये । वित्त मंत्री मोरारजी देसाई के विरोध और राष्ट्रपति राजेन्द्र प्रसाद के अनिच्छा भरी सहमति के वाबजूद आजाद भारत में पहली बार  चुनी हुई सरकार को बर्खास्त कर राष्ट्रपति शासन लगाने का एलान 31 जुलाई 1959 को कर दिया गया । उसके बाद काग्रेस अपने बूते तो नहीं लेकिन यूडीएफ गठबंधन के आसरे सत्ता में जरुर आई । पर सीपीएम को पूरी तरह डिगा नहीं पायी । पर संघ अपने विस्तार को अब राजनीतिक जुबान देना चाहता है तो पहली बार जनरक्षा यात्रा के दौरान मोदी सरकार के हर  मंत्री को केरल की सडक पर कदमताल करना है । जिससे मैसेज यही जाये कि सवाल सिर्फ केरल का नहीं बल्कि देश का है । तो केरल की वामपंथी सरकार अपना
किला कैसे बचायेगी या फिर किला नहीं ढहा तो जो प्रयोग नेहरु ने राष्ट्रपति शासन लगाकर किया था क्या उसी रास्ते मोदी चल निकलेगें । ये सवाल तो है ।

जन-जिम्मेदारी से पल्ला झाड़कर जन-भागीदारी की मांग करती राजनीति सत्ता

Tue, 03/10/2017 - 23:15
खुली अर्थव्यवस्था की जो लकीर पीवी नरसिंह राव ने जो लकीर 1991 में खींची,  उसी लकीर पर वाजपेयी चले, मनमोहन सिंह चले और अब मोदी भी चल रहे हैं । और खुली इक्नामी की इस लकीर का मतलब यही था कि रोजगार हो या शिक्षा । इलाज हो या घर । या फिर सुरक्षा । जब सब कुछ प्राइवेट सेक्टर के हाथों में इस तरह सौंपा गया कि सरकार या तो हर जिम्मेदारी से मुक्त हो गई। या फिर सरकार खुद ही कमीशन लेकर काम देने की स्थिति में आ गई । क्योंकि प्राईवेट सेक्टर को काम करना है और मुनाफा कमाना है । या कहें मुनाफा कमाना है तो कोई भी काम करना है । इन दोनो हालातों के बीच ही जनता के चुने हुए नुमाइन्दों की राजनीतिक सत्ता कैसे चलती है, अब इस सवाल को समझने की भी जरुरत है। क्योंकि सिलसिलेवार तरीके से जब हालात को परखें तो फिर जनभागेदारी कैसे सरकार के साथ होगी । जिसकी मांग स्वच्छता को लेकर 2 अक्टूबर को प्रधानमंत्री ने की ये भी सवाल होगा । मसलन सरकारी नौकरी की तुलना में कई गुना ज्यादा प्राइवेट सेक्टर में नौकरी है। मसलन 1 करोड़ 72 लाख 71 हजार नौकरी सरकारी क्षेत्र में है । तो प्राइवेट सेक्टर में 1,14,22,000 है तो असंगठित क्षेत्र में 43 करोड 70  लाख नौकरियां हैं। तो फिर जनता रोजगार के लिये सरकार की तरफ क्यों देखेगी । और पांच साल के लिये चुनी हुई किसी भी सत्ता के पांच बरस के दौर में 8 हजार से ज्यादा सरकारी नौकरियों का आवेदन नहीं निकलता। तो सरकारी नौकरी है नहीं।

और सरकारी नीतियों से अगर प्राईवेट सेक्टर की नौकरी कम होगी तो फिर नौकरी का संकट तो गहरायेगा ही जैसे अभी गहरा रहा है । इसी तरह शिक्षा, हेल्थ , घर और सुरक्षा को लेकर भी जनता सरकार की तरफ क्यों देखे । जब शिक्षा को लेकर सरकार का बजट 46,356  करोड हो और निजी क्षेत्र का बजट 7,80,000 करोड का है । जब हेल्थ सर्विस का सरकारी बजट 48,878 करोड का है और प्राईवेट क्षेत्र के हेल्थ सर्विस का बजट साढे छह लाख करोड़ का हो चुका हो । जो 2020 तक 18 लाख करोड का हो जायेगा । तो फिर सरकारी स्वास्थ्य सिस्टम का मतलब बची क्या । इसी तरह घरों को लेकर भी हालात को समझे तो पिछले ढाई बरस में एक लाख तीन हजार सरकारी घर बने तो 4 लाख 71 हजार प्राइवेट घर बनकर  खाली पडे है । प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत 2022 तक 4 करोड 30 लाख घर बनाने का लक्ष्य है । चुनाव 2019 में होने है । पहले ढाई बरस में लक्ष्य का सिर्फ 7 पिसदी घर बना है तो सरकार की तरफ किस नजर से जनता देखेगी । और इस कडी में जब पुलिस का जिक्र होगा तो समझना ये भी होगा निजी सुरक्षाकर्मियों की तादाद पुलिसकर्मियों से ज्यादा हो गई है । हालत ये है कि देश में पुलिस की संख्या 14 लाख है । जबकि निजी सुरक्षाकर्मियों की संख्या 70 लाख है। पूरे देश की पुलिस को लेकर बजट करीब 54 हजार करोड़ का है । पर दूसरी तरफ निजी सुरक्षाकर्मियों को लेकर प्राइवेट सेक्टर का बजट 60 हजार करोड़ पार कर चुका है । जो अगले दो बरस में 80 हजार करोड़ हो जायेगा। लेकिन पुलिस सुधार और सुधार के लिये बजट की रफ्तार बताती है कि अगले दो बरस में पुलिस बजट में 5 हजार करोड़ से ज्यादा की बढोतरी हो नहीं सकती है ।  तो फिर चुनी हुई सरकारो का मतलब सिवाय प्राइवेट सेक्टर अनुशासन में काम करें उसके अलावे ।

प्राइवेट सेक्टर में किसे कितना लाभ मिले ये नये सिस्टम बिल्ट-आपरेट-ट्रासफंर  सिस्टम यानी बीओटी से भी समझा जा सकता है । जिसमें सरकार निजी सेक्टर को लाइसेंस देती है । जिस क्षेत्र का काम  दिया जाता है उससे मुनाफा कमाकर वापस उसे सरकार को सौपा जाता है । मसलन सडक और  पुल कोई प्राईवेट सेक्टर बनाता है  उससे मुनाफा कमाता है । पिर सरकार को दे देता है । तो क्या सरकारे इसीलिये पेल हो रही है या फिर जनता का भरोसा धीरे धीरे सरकार से ही उठने लगा है । ये सवाल हर उस परिस्थिति से जोडा जा सकता है जिन परिस्थितियो में जनभागीदारी का सवाल सरकार उठाती  है । याद किजिये 2006 में मनमोहन सरकार ने पीपीपी मॉडल शुरु किया । जनता ने जमीन दी । सरकार ने मुआवजा दिया । पर देश में रोजगार या कमाई के लिये कोई इन्फ्रास्ट्रक्चर है ही नहीं तो मुआवजा लेकर भी जमता फक्कड हो गई। और  अब जब मोदी स्वच्छता के लिये जनभागीदारी का जिक्र कर गये तो उसके पीछे के इस सच को भी हर किसी ने देखा कि 60 हजार करोड स्वच्छता के प्रचार प्रसार में कैसे खर्च हो गये । धन जनता का । या कहे देश का । स्वच्छता देश की । पर प्रचार प्रसार राजनीतिक लाभ के लिये और काम की सफलता का सरकारी आंकडा ही तीस फिसदी का ।तो जो गलती पीपीपी मॉडल को लेकर मनमोहन कर रहे थे । क्या वही गलती जनभागीदारी के नाम पर मोदी कर रहे हैं । क्योकि राजनीतिक लाभ के लिये राजनीतिक सत्ता का कामकाज पांच बरस चलता है यह आखिरी सच हो चला है। इसलिये सरकारी योजनाये वक्त से पहले दम तोड रही है । आलम ये कि बीते साल 6000 नए स्टार्टअप शुरु हुए थे, जिनकी संख्या इस साल सितंबर के महीने तक घटकर 800 पर आ गई है। और आईबीएम इंस्टीट्यूट फॉर बिजनेस वैल्यू एंड ऑक्सफोर्ड इक्नोमिक्स की रिपोर्ट कहती है कि देश के 90 फीसदी स्टार्टअप शुरु होने के पांच साल में बंद हो जाएंगे क्योंकि उनमें कोई नवीनता और खास बिजनेस मॉडल ही नहीं है । और तो और पांच बरस की सफलता दिखाने का ही तरीका नोटबंदी-जीएसटी तो नहीं । क्योकि कपड़ा मंत्रालय के आंकड़े कह रहे हैं कि तीन साल में 67 टैक्सटाइल यूनिट बंद हो गई, जिनसे 17600 लोगों की नौकरी चली गई । ज्यादातर नौकरी तीसरे साल गई । तो ये आकंड़ा संगठित क्षेत्र का है, और असंगठित क्षेत्र की लघु कपड़ा इकाइयां  कितनी बंद हो गई-इसका किसी को अता पता नहीं है अलबत्ता सीएमआईई का सर्वे कहता है कि नोटबंदी के बाद असंगठित क्षेत्र में 15 लाख लोगों की नौकरी गई । और हालात धीरे धीरे कैसे बिगड़ रहे हैं-इसका अंदाज इस बात से भी लगाया जा सकता है कि कपड़ा, धातु, चमड़े, रत्न एवं आभूषण, आईटी एवं बीपीओ, ट्रांसपोर्ट, ऑटोमोबाइल्स और हतकरघा जैसे संगठित क्षेत्रों में रोज़गार निर्माण में तेज गिरावट आई है । उधर, कॉरपोरेट सेक्टर का हाल भी बिगड़ा हुआ है। एलएंडटी जैसी कंपनी ने 2017 की पहली दो तिमाही में 14000 लोगों की छंटनी की । एचडीएफसी बैंक ने 3230 लोगों को निकाल दिया । इस वित्तीय साल की पहली तिमाही में ही पांच में तीन बड़ी आईटी कंपनियों ने करीब 5000  लोगों को निकाल दिया । तो सरकार अगर जिम्मेदारी से पल्ला झाड कर प्राईवेट सेक्टर पर टिक जाये । और वोट की नीतियो से अगर निजी क्षेत्र में भी नौकरी खत्म होने लगे तो फिर 'एमबिट कैपिटल’ की नयी रिसर्च रिपोर्ट को समझना चाहिये जो कहती है कि , " देश में बढ़ती बेरोजगारी से न केवल असमानता बढ़ेगी बल्कि अपराधों में तेजी और सामाजिक तनाव मे भी बढ़ोतरी हो सकती है"

राहुल का सॉफ्ट हिन्दुत्व तो मोहन भागवत का मुस्लिम प्रेम

Mon, 25/09/2017 - 22:58
शहर इलाहाबाद के रहने वाले कश्मीरी पंडित राहुल गांधी । इन्हीं शब्दों के साथ द्वारका के मंदिर में पंडितों ने राहुल गांधी से पूजा करायी और करीब आधे घंटे तक राहुल गांधी द्वारकाधीश के मंदिर में पूजा कर निकले । और मंदिर में पूजा अर्चना के बाद राजनीतिक सफलता के लिये चुनावी प्रचार में राहुल गांधी निकल पड़े। तो दूसरी तरफ रविवार को नागपुर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के दशहरा कार्यक्रम में पहली बार किसी मुस्लिम को  मुख्य अतिथि बनाया गया । दरअसल रविवार को बाल स्वयंसेवकों की मौजूदगी में आरएसएस के बैनर तले हुये कार्यक्रम में वोहरा  समाज से जुडे होम्योपैथ डाक्टर के रुप में पहचान पाये मुन्नवर युसुफ को मुख्य अतिथि बनाया गया । तो सियासत कैसे कैसे रंग धर्म के आसरे ही सही लेकिन दिखला रही है उसी की ये दो तस्वीर अपने आप में काफी है कि बदलाव आ रहा है । एक तरफ कांग्रेस मुस्लिम तुष्टिकरण के आरोप से पीछा छुड़ाना चाहती है । तो राहुल गांधी द्वारका मंदिर के रंग में है और  संघ परिवार  हिन्दू राष्ट्र की सोच तले मुस्लिम विरोधी होने के दाग को धोना चाहती है। तो पहली बार मुन्नवर युसुफ को मुख्यअतिथि बना रही है । तो सवाल दो है । पहला , सॉफ्ट हिन्दुत्व के आसरे कांग्रेस अपने पुराने दौर में लौटना चाह रही है ।  यानी अब कांग्रेस समझ रही है कि जब इंदिरा की सत्ता थी । तब कांग्रेस ने सॉफ्ट हिन्दुत्व अपना कर जनसंघ और संघ परिवार को कभी राजनीति तौर पर मजबूत होने नहीं दिया ।

और आज जब राहुल गांधी द्वारका मंदिर पहुंचे तो पंडितों ने उन्हें दादी इंदिरा गांधी और पिता राजीव गांधी के साइन किये हुये उन पत्रों को दिखाया जब वह भी मंदिर पहुंचे थे । इंदिरा गांधी 18 मई 1980 को द्वारका  मंदिर पहुंची थी । तो राजीव गांधी 10 फरवरी 1990 तो द्वारका मंदिर पहुंचे थे । तो कह सकते हैं राहुल गांधी ने लंबा लंबा वक्त लगा दिया सॉफ्ट हिन्दुत्व के रास्ते पर चलने में । या फिर 2004 में राजनीति में कदम रखने के बाद राहुल ने सिर्फ सत्ता ही देखी तो विपक्ष में रहते हुये पहली बार राहुल गांधी धर्म की सियासत को भी समझ रहे है । तो राहुल गांधी अतित की काग्रेस को फिर से बनाने के लिये साफ्ट हिन्दुत्व की छूट चुकी लकीर को खिंचने निकल पडे है । लेकिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ तो अतीत की लकीर मिटाकर पहली बार मुस्लिमों के प्रति साफ्ट रुख अपनाते हुये दिल से लगाने को खुलेतौर पर दिखायी देने के लिये मचल रहा है । तो क्या कांग्रेस के साफ्ट
हिन्दुत्व से कही बड़ा सवाल आरएसएस का है । और पहली बार संघ अगर दशहरे के कार्यक्रम में किसी मुस्लिम को मुख्यअतिथि बना रही है तो ये सवाल जायज है कि संघ अपने हिन्दू राष्ट्र में मुसलिमों के लिये भी जगह है ये बताना चाहता है ।

या फिर बीजेपी की राजनीतिक सफलता के लिये संघ ने अपना एजेंडा परिवर्तित किया है। ये दोनों सवाल महत्वपूर्ण इसलिये है क्योकि संघ परिवार इससे बाखूबी वाकिफ है कि संघ के हिन्दुत्व ने कभी मुस्लिमों को
सीधे खारिज नहीं किया । पर सावरकर के हिन्दुत्व ने कभी मुस्लिमो को मान्यता भी नहीं दी । और  संघ ने हिन्दुओ के विभाजन को रोकने के लिये सावरकर के हिन्दुत्व का विरोध नहीं किया । यानी चाहे अनचाहे पहली बार संघ को लगने लगा है कि जब उसके प्रचारको के हाथ में ही सत्ता है तो फिर अब सावरकर के हिन्दुत्व को दरकिनार कर संघ के व्यापक हिन्दुत्व की सोच को रखा जाये। या फिर काग्रेस साफ्ट हिन्दुत्व पर लौटे उससे पहले बीजेपी चाहती है कि  संघ कट्टर हिन्दुत्व वाली सोच को खारिज कर मुस्लिमों के साथ खडे होते हुये दिखायी देंम । जिससे मोदी के विकास का राग असर डाल सके । क्योकि अतीत के पन्नों को पलटे तो कांग्रेस और हिन्दू सभा 1937 तक एक साथ हुआ करते थे । मदनमोहन मालवीय कांग्रेस के साथ साथ हिन्दू सभा के भी
अध्यक्ष रहे । लेकिन 1937 में करणावती में हुये हिन्दुसभा की बैठक में जब सावरकर अध्यक्ष चुन लिये गये तो हिन्दू सभा , हिन्दू महासभा हो गई । और उसी वक्त काग्रेस और हिन्दु महासाभा में दूरी आ गई पर राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ और हिन्दू महसभा यानी हेडगेवार और सावरकर नजदीक आ गये . तो क्या 80 बरस पुराने हिन्दुत्व फिर से मुख्यधारा की राजनीति को परिभाषित कर रही है । क्योकि 80 बरस पहले संघ ये जानते समझते हुये सावरकर यानी हिन्दु महासभा के पीछे खडी हो गई कि  सावरकर के हिन्दुत्व में मुस्लिम-इसाई के लिये कोई जगह नहीं थी । सावरकर ने बकायदा अलग हिन्दु राष्ट्र और अलग मुस्लिम राष्टे्र का भाषण भी दिया और 1923 में हिन्दुत्व की किताब में भी मुस्लिमो को जगह नहीं दी ।

पर संघ इसलिये सावरकर के हिन्दुत्व की आलोचना ना कर सका क्योंकि सावरकर का जहा भाषण होता वहा अगले दिन से संघ की शाखा शुरु हो जाती । क्योंकि हिन्दु महासाभा के पीछे सेघ सकी तरह कोई संगठन या कैडर नहीं था । तो संघ सावरकर के हिन्दुत्व की सोच के साये में अपना विस्तार करता रहा और जब जनसंघ बनाने का वक्त आया तो हिन्दु महासभा से निकले श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने ही जनसंघ की स्थापना की । तो इतिहास अपने को दोहरा रहा है या नये तरीके से परिभाषित कर रहा है । या फिर मौजूदा हालात ने समाज के भीतर ही इतनी मोटी लकीर खींच दी है कि अब सियासत- सत्ता में  लकीर मिटाने के दौर शुरु हो रहे हैं।

भाषण, सेक्स और चैनल

Sun, 24/09/2017 - 13:54
हालात  तो खुला खेल फर्रुखाबादी से आगे के हैं...

दिन शुक्रवार। वक्त दोपहर के चार साढ़े चार का वक्त । प्रधानमंत्री बनारस में मंच पर विराजमान। स्वागत हो रहा है । शाल-दुशाला ऊढ़ाई  जा रही है । भाषणों का दौर शुरु हो चला है। पर हिन्दी के राष्ट्रीय न्यूज चैनल पर हनीप्रीत के अभी तक गायब पूर्व पति विश्वास गुप्ता का कही से पदार्पण हुआ और वह जो भी बोल रहा था, सबकुछ चल रहा था । हनीप्रीत के कपड़ों के भीतर घुसकर। गुरमीत के बेड पर हनीप्रीत । कमरा नहीं हमाम । बाप - बेटी के नाम पर संबंधों के पीछे का काला पन्ना । भक्तों पर कहर और महिला भक्तों की अस्मत से खुला खिलवाड़। सबकुछ लाइव । और एक दो नहीं बल्कि देश के टाप पांच न्यूज चैनलो में बिना ब्रेक । पूरी कमेन्ट्री  किसी बीमार व्यक्ति या ईमानदार व्यक्ति के  बीमार माहौल से निकल कर बीमार समाज का खुला चित्रण । वो तो भला हो कि एएनआई नामक समाचार एजेंसी का, जिसे लगा कि अगर हनीप्रीत की अनंत  कथा  चलती रही तो कोई पीएम को दिखायेगा नहीं । और साढे तीन बजे से शुरु हुई विश्वास गुप्ता की कथा को चार बजकर पैंतीस मिनट पर एएनआई ने काटा तो हर किसी ने देखा अब प्रधानमंत्री मोदी को दिखला दिया जाये। यानी तीन सवालों ने जन्म लिया । पहला , एएनआई की जगह अगर न्यूज चैनलों ने पहले से लाइव की व्यवस्था हनीप्रीत के पूर्व पति की प्रेस कांन्फ्रेस की कर ली होती और पूर्व पति अपनी कथा रात तक कहते रहते तो पीएम मोदी का बनारस दौरा बनारस के भक्त चश्मदीदो के सामने ही शुरु होकर खत्म हो जाता ।

यानी फाइव  कैमरा सेट जो हर एंगल से पीएम मोदी को सडक से मंदिर तक और म्यूजियम से मंच तक लगा था वह सिवाय डीडी के कही दिखायी नहीं देता । दूसरा सवाल एएनआई ने पहले कभी किसी ऐसी लाइव प्रेस कान्फ्रेस को बीच में काटने की नहीं सोची जिसे हर न्यूज चैनल ना सिर्फ चटखारे ले कर दिखा रहा था बल्कि हर चैनल के भीतर पहले से तय सारे कार्यक्रम गिरा अनंतकालीन कथा को ही चलाने  का अनकहा निर्णय भी लिया जा चुका था। और तीसरा सवाल क्या एएनआई ने पीएमओ या पीएम की प्रचार टीम के कहने पर हनीप्रीत के पूर्व पति की उस प्रेस कांन्फ्रेस का लाइव कट कर दिया, जिसमें सेक्स था। थ्रिल था। सस्पेंस था । नाजायज संबंधों से लेकर बीमार होते समाज का वह सबकुछ था, जिसे कोई भी कहता नहीं लेकिन समाज के भीतर के हालात इसी तरह के हो चले हैं। यानी हर दायरे के भीतर का कटघरा इसी तरह सड-गल रहा है । और बेफ्रिक्र समाज किसी अनहोनी से बेहतरी के इंतजार में जिये चला जा रहा है। क्योंकि पीएम बनारस में क्या कहते क्या इसमें किसी की दिलचस्पी नहीं है । या फिर हनीप्रीत के  शरीऱ और गुरमित के रेप की अनकही कथा में समाज की रुचि है । तो संपादकों की पूरी फौज ही हनीप्रीत को दर्शको के सामने परोसने के लिये तैयार है। तो पीएम से किसी को उम्मीद नहीं है या फिर प्रतिस्पर्धा के दौर में जो बिकता  है वही चलता है कि तर्ज पर अब संपादक भी आ चुके है, जिनके कंधों पर टीआरपी ढोने का भार है। हो सकता है। फिर अगला सवाल ये भी है कि अगर ऐसा है तो इस बीमारी को ठीक कौन करेगा। या सभी अपने अपने दायरे में अगर हनीप्रीत हो चुके हैं तो फिर देश संभालने के लिये किसी नेहरु, गांधी , आंबडेकर, लोहिया , सरदार , शयामा प्रसाद मुखर्जी या दीन दयाल उपाध्याय  का जिक्र कर कौन रहा है। या कौन से समाज या कौन सी सत्ता को समाज को संभालने की फिक्र  है। कहीं ऐसा तो नहीं महापुरुषो का जिक्र सियासत सत्ता इसलिये कर रही है कि बीमार समाज की उम्मीदें बनी रहें। या फिर महापुरुषों के आसरे कोई इनकी भी सुन ले। मगर सुधार हो कैसे कोई समझ रहा है या ठीक करना चाह भी रही है । शायद  कोई नहीं ।

तो ऐसे में बहुतेरे सवाल जो चैनलो के स्क्रिन पर रेंगते है या सत्ता के मन की बात में उभरते है उनका मतलब होता क्या है  ?  फिर क्यो फिक्र होती है कि गुरुग्राम में रेयान इंटरनेशनल स्कूल में सात बरस के मासूम की हत्या पर भी स्कूल नहीं रोया । सिर्फ मां-बाप रोये । और जो खौफ में आया वह अपने बच्चो को लेकर संवेदनशील हुआ । फिर क्यों फिक्र हो रही है कि कंगना रनावत के प्यार के एहसासों के साथ रोशन खानदान ने खिलवाड़ किया । क्यों फिक्र होती है कि गाय के नाम पर किसी अखलाख की हत्या हो जाती है। क्यो फिक्र होती है कि लंकेश से लेकर भौमिक की पत्रकारिता सच और विचारधारा की लड़ाई लड़ते हुये मार दिये जाते है । क्यों फिक्र होती है लिचिंग जारी है पर कोई हत्यारा नहीं है । फिक्र क्यों होती है कि पेट्रोल - डिजल की कमाई में सरकार ही लूटती सी दिखायी देती है । फिक्र क्यो होती है बैको में जमा जनता के पैसे पर कारपोरेट रईसी करते है और सरकार अरबो रुपया इनकी रईसी के लिये माफ कर देती है । नियम से  फिक्र होनी नहीं चाहिये जब न्यूज चैनलों पर चलती खबर को लेकर उसके संपादको की मंडली ही खुद को जज माने बैठी हो । और अपने ही चैनल की पट्टी में चलाये  कि किसी को किसी कार्यक्रम से नाराजगी हो या वह गलत लगता हो तो शिकायत करें । तो अपराध करने वाले से शिकायत करेगा कौन और करेगा तो होगा क्या।

और यही हाल हर सत्ता का है । जो ताकतवर है उसका अपराध बताने भी उसी के पास जाना होगा । तो संविधान की शपथ लेकर ईमानदारी या करप्शन ना करने की बात कहने वाले ही अगर बेईमान और अपराधी हो जाये तो फिर शिकायत होगी किससे । सांसद-मंत्री-विधायक -पंचायत सभी जगह तो बेईमानों और अपराधियों की भरमार है । बकायदा कानून के राज में कानूनी तौर पर दागदार है औसत तीस फिसदी जनता के नुमाइंदे। तो फिर सत्ता की अनकही कहानियों को सामने लाने का हक किसे है । और सत्ता की बोली ही अगर जनता ना सुनना चाहे तो सत्ता फिर भी इठलाये कि उसे जनता ने चुना है । और पांच बरस तक वह मनमानी कर सकती है तो फिर अपने अपने दायरे में हर सत्ता मनमानी कर ही रही है । यानी न्याय या कानून का राज तो रहा नहीं । संविधान भी कहा मायने रखेगा । एएनआई की लाउव फुटेज  की तर्ज पर कभी न्यायपालिका किसी को देशद्रोही करार देगी और कभी राष्ट्रीयता का मतलब समझा देगी। और किसी चैनल की तर्ज पर सत्ता - सियासत भी इसे लोकतंत्र का राग बताकर वाह वाह करेगी  । झूठ-फरेब । किस्सागोई । नादानी और अज्ञानता । सबकुछ अपने अपने दायरे में अगर हर सत्ता को टीआरपी दे रही है तो फिर रोकेगा कौन और रुकेगा कौन । और सारे ताकतवर लोगो के नैक्सस का ही तो राज होगा। पीएम उन्हीं संपादको को स्वच्छभारत में शामिल होने को कहेंगे, जिनके लिये हनीप्रीत जरुरी है । संपादक उन्हीं मीडिया  कर्मियो को महत्व देंगे जो हनीप्रीत की गलियों में घूम घूम कर हर दिन नई नई कहानियां गढ़ सकें । और कारपोरेट उन्हीं संपादको और सत्ता को महत्ता देंगे जो बनारस में पीएम के भाषण और हनीप्रीत की अशलीलता तले टीआरपी के खेल को समझता हो। जिससे मुनाफा बनाया जा सके।

यानी देश के सारे नियम ही जब कमाई से जा जुड़े हों। कारपोरेट के सामने हर तिमाही तो सत्ता के सामने हर पांच साल का लक्ष्य हो । तो हर दौर में हर किसी को अपना लाभ ही नजर आयेगा । और अगर सारे हालात मुनाफे से जा जुड़े हैं तो राम-रहीम के डेरे से बेहतर कौन सा फार्मूला किसी भी सत्ता के लिये हो सकता है। और रायसिना हिल्स से लेकर फिल्म सिटी अपने अपने दायरे में किसी डेरे से कम क्यों आंकी जाये ।  और आने वाले वक्त में कोई ये कहने से क्यो कतरायेगा कि जेल से चुनाव तो जार्ज फर्नाडिस ने भी लड़ा तो गुरमित या हरप्रीत क्यो नहीं लड सकते है । या फिर इमरजेन्सी के दौर में जेपी की खबर दिखाने पर रोक थी । लेकिन अभी तो खुलापन है अभिव्यक्ति की आजादी है तो फिर रेपिस्ट गुरमित हो या फरार  हनीप्रीत । या किसी भी अश्लीलता या अपराधी की  खबरे दिखाने पर कोई रोक तो है नहीं । तो खुलेपन के दौर में जिसे जो दिखाना है दिखाये । जिसे जो कहना है कहे । जिसे जितना कहना है कह लें । यानी हर कोई जिम्मेदारी से मुक्त होकर उस मुक्त इकनामी की पीठ पर सवार है जिसमें हर हाल में मुनाफा होना चाहिये । तब तो गुजराती बनियो की  सियासत कह सकती है गुजराती बनिया तो महात्मा गांधी भी थे , ये उनकी समझ थी कि उनके लिये देश की जनता का जमावडा अग्रेजो से लोहा लेने का हथियार था । मौजूदा सच तो पार्टी का कार्यक्त्ता  बनाकर वोट जुगाडना  ही है । तो फिर देश का कोई भी मुद्दा हो उसकी अहमियत किसी ऐसी कहानी के आगे कहां टिकेगी जिसमें किस्सागोई राग दरबारी से आगे का हो । प्रेमचंद के कफन पर मस्तराम की किताब हावी हो । और लोकतंत्र के राग का आदर्श  फिल्मी न्यूटन की ईमानदारी के आगे घुटने टेकते हुये नजर आये। और ऐलान हो जाये कि 2019 में पीएम उम्मीदवार न्यूटन होगा  अगर वह आस्कार जीत जाये तो । या फिर हनीप्रीत होगी जिसे भारत की पुलिस के सुरक्षाकर्मी खोज नहीं पाये । यानी लोकप्रीय होना ही अगर देश संभालने का पैमाना हो तो लोकप्रियता का पैमाना तो कुछ भी हो सकता है ।  जिसकी लोकप्रियता होगी । जिसे सबसे ज्यादा दर्शक देखाना चाहता होंगे वही देश चलायेंगे। क्या हालात वाकई ऐसे हैं ? सोचियेगा जरुर।

बिगड़ी इकनॉमी, ढहता मनरेगा और बेरोजगारी में फंसा देश 2019 का चुनाव देख रहा है

Thu, 21/09/2017 - 23:01
सबसे बडी चुनौती इकनॉमी की है । और बिगडी इकनॉमी को कैसे नये आयाम दिये जाये जिससे राजनीतिक लाभ भी मिले अब नजर इसी बात को लेकर है । तो एक तरफ नीति आयोग देश के 100 पिछडे जिलों को चिन्हित करने में लग गया है तो दूसरी तरफ वित्त मंत्रालय इकनॉमी को पटरी पर लाने के लिये ब्लू प्रिंट तैयार कर रहा है । नीति आयोग के सामने चुनौती है कि 100 पिछड़े जिलों को चिन्हित कर खेती, पीने का पानी , हेल्थ सर्विस और शिक्षा को ठीक-ठाक कर राष्ट्रीय औसम के करीब लेकर आये तो वित्त मंत्रालय के ब्लू प्रिंट में विकास दर कैसे बढे और रोजगार कैसे पैदा हो। नजर इसी पर जा टिकी है। और इन सबके लिये मशक्कत उघोग क्षेत्र, निर्माण क्षेत्र , रियल स्टेट और खनन के क्षेत्र में होनी चाहिये इसे सभी मान रहे हैं। यानी चकाचौंध की लेकर जो भी लकीर साउथ-नार्थ ब्लाक से लेकर हर मंत्रालय में खिंची जा रही हो, उसके अक्स में अब सरकार को लगने लगा है कि प्रथामिकता इकनॉमी की रखनी होगी इसीलिये अर्थव्यवस्था में नई जान फूंकने के लिए एक ब्लूप्रिंट तैयार किया जा रहा है । जिससे जीडीपी में तेजी आये , रोजगार बढ़े। और बंटाधार हो चुके रियल इस्टेट और खनन क्षेत्र को पटरी पर लाया सके । लेकिन सवाल इतना भर नहीं । इक्नामिस्ट मनमोहन सिंह सत्ता में रहते हुये इकनॉमी को लेकर फेल मान लिये गये । और जनता की नब्ज को समझने वाले मोदी सत्ता संभालने के बाद इकनॉमी संबालने से जूझ रहे हैं। और देश का सच  ये है कि नेहरु ने 1960 में सौ पिछडे जिले चिन्हित किया । मोदी 2017 में 100 पिछडे जिलों के चिन्हित कर रहे हैं । 1960 से 1983 तक नौ कमेटियों ने सौ पिछड़े जिलों पर रिपोर्ट सौपी । कितना खर्च हुआ । या रिपोर्ट कितनी अमल में लायी गई ये तो दूर की गोटी है ।

सोचिये कि जो सवाल आजादी के बाद थे, वही सवाल 70 बरस बाद है । क्योकि जिन सौ जिलों को चिन्हित कर काम शुरु करने की तैयारी हो रही है उसमें कहा तो यही जा रहा है कि हर क्षेत्र में राष्ट्रीय औसत के समकक्ष 100 पिछडे जिलो को लाया जाये । लेकिन जरुरत  कितनी न्यूनतम है किसान की आय बढ जाये । पीने का साफ पानी मिलने लगे ।शिक्षा घर घर पहुंच जाये । हेल्थ सर्विस हर किसी को मुहैया हो जाये ।और इसके लिये तमाम मंत्रालयों या केन्द्र राज्य के घोषित बजट के अलावे प्रचार के लिये 1000 करोड़ देने की बात है । यानी हर जिले के हिस्से में 10 करोड । तो हो सकता है पीएम का अगला एलान देश में सौ पिछडे जिलों का शुरु हो जाये । यानी संघर्ष न्यूनतम का है । और सवाल चकाचौंध की उस इकनॉमी तले टटोला जा रहा है जहां देस का एक छोटा सा हिस्सा हर सुविधाओ से लैस हो । बाकि हिस्सों पर आंख कैसे मूंदी जा रही है ये मनरेगा के बिगडते हालात से भी समझा जा सकता है । क्योंकि मानिये या ना मानिये । लेकिन मनरेगा अब दफ्न होकर स्मारक बनने की दिशा में जाने लगा है । क्योकि 16 राज्यो की रिपोर्ट बताती है मनरेगा बजट बढते बढते चाहे 48 हजार करोड पार कर गया लेकिन रोजगार पाने वालो की तादाद में 7 लाख परिवारो की कमी आ गई । क्योंकि केंद्रीय ग्रामीण  विकास मंत्रालय की ही रिपोर्ट कहती है  कि 2013-14 में  पूरे 100 दिनों का रोजगार पाने वाले परिवारों की संख्या 46,59,347 थी,। जो साल 2016-17 में घटकर 39,91,169 रह गई । तो मुश्किल ये नहीं कि सात लाख परिवार जिन्हे काम नहीं मिला वह क्या कर रहे होंगे । मुश्किल दोहरी है , एक तरफ नोटबंदी के बाद मनरेगा मजदूरों में 30 फिसदी की बढोतरी हो गई । करीब 12 लाख परिवारों की तादाद बढ गई । दूसरी तरफ जिन 39 लाख परिवारों को काम मिला उनकी दिहाड़ी नही बढ़ी। आलम ये है कि इस वित्तीय वर्ष यानी अप्रैल 2017 के बाद से यूपी, बिहार,असम और उत्तराखंड में मनरेगा कामगारों की मजदूरी में सिर्फ एक रुपये की वृद्धि हुई । ओडिशा में यह मजदूरी दो रुपये और पश्चिम बंगाल में चार रुपये बढ़ाई गई ।

और दूसरी तरफ -बीते साल नवंबर से इस साल मार्च तक बिहार, छत्तीसगढ़, राजस्थान, झारखंड, पश्चिम बंगाल और ओडिशा में तो काम मांगने वालों की संख्या में 30 फीसदी तक बढ़ोतरी दर्ज हुई । तो मनरेगा का बजट  48000 करोड़ कर सरकार ने अपनी पीढ जरुर ठोकी । लेकिन हालात तो सुप्रीम कोर्ट के निर्देश को लागू ना करा पाने तक के है । एक तरफ 2014 में सुप्रीम कोर्ट ने कहा , मनरेगा की मजदूरी को राज्यों के न्यूनतम वेतन के बराबर लाया जाए ।  लेकिन इस महीने की शुरुआत में केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्रालय द्वारा गठित एक समिति ने मनरेगा के तहत दी जानी वाली मजदूरी को न्यूनतम वेतन के साथ जोड़ने को गैर-जरूरी करार दे दिया जबकि खुद समिति मानती है कि 17 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में मनरेगा की मजदूरी खेत मजदूरों को दी जाने वाली रकम से भी कम है। तो फिर पटरी से उतरते देश को राजनीति संभालेगी कैसे । और इसी लिये जिक्र युवाओ का हो रहा है । बेरोजगारी का हो रहा है । और ध्यान दीजिये राहुल के निशाने पर रोजगार का संकट है। पीएम मोदी के निशाने पर युवा भारत है। और दोनों की ही राजनीति का सच यही है कि देश में मौजूदा वक्त में सबसे ज्यादा युवा है । सबसे ज्यादा युवा बेरोजगार है। और अगर युवा ने तय कर लिया कि सियासत
की डोर किसके हाथ में होगी तो 2019 की राजनीति अभी से पंतग की हवा में उड़ने लगेगी । क्योकि 2014 के चुनाव में जितने वोट बीजेपी और काग्रेस दोनो को मिले थे अगर दोनों को जोड़ भी दिया जाये उससे ज्यादा युवाओ की तादाद मौजूद वक्त में है । मसलन 2011 के सेंसस के मुताबिक 18 से 35 बरस के युवाओ की तादाद 37,87,90,541 थी । जबकि बीजेपी और काग्रेस को कुल मिलाकर भी 28 करोड़ वोट नहीं मिले । मसलन 2014 के चुनाव में बीजेपी को 17,14,36,400 वोट मिले । तो कांग्रेस को 10,17,32,985 वोट मिले और देश का
सच ये है कि 2019 में पहली बार बोटर के तौर पर 18 बरस के युवाओ की तादाद 13,30,00,000 होगी यानी जो सवाल राहुल गांधी विदेश में बैठ कर उठा रहे हैं उसके पीछे का मर्म यही है कि 2014 के चुनाव में युवाओं की एक बडी तादाद कांग्रेस से खिसक गई थी । क्योकि दो करोड रोजगार देने का वादा हवा हवाई हो
गया था और याद किजिये तब बीजेपी ने अपने चुनावी घोषणा पत्र में रोजगार कामुद्दा ये कहकर उठाया था कि "कांग्रेस नेतृत्व वाली यूपीए सरकार बीते दस साल के दौरान कोई रोजगार पैदा नहीं कर सकी, जिससे देश का विकास बुरी तरह प्रभावित हुआ"। तो मोदी ने सत्ता में आने के लिये नंवबर  2013 को आगरा की  चुनावी रैली में पांच बरस में एक करोड रोजगार देने का वादा किया था । पर रोजगार का संकट किस तरह गहरा रहा है और हालात मनमोहन के दौर से भी बुरे हो जायेंगे ये जानते समझते हुये अब ये सवाल राहुल गांधी ,  मोदी  सरकार
को घेरने के लिये उठा रहे हैं । यानी मुश्किल ये नहीं कि बेरोजगारी बढ़ रही है संकट ये है कि रोजगार देने के नाम पर अगर युवाओं को 4 बरस पहले बीजेपी बहका रही थी और अब नजदीक आते 2019 को लेकर कांग्रेस वही सवाल उठा रही तो अगला सवाल यही है कि बिगडी इकनॉमी , मनरेगा का ढहना और  रोजगार संकट
सबसे बडा मुद्दा तो 2019 तक हो जायेगा लेकिन क्या वाकई कोई विजन किसी के पास है की हालात सुधर जाये  ।

चैनल खोये हैं हनीप्रीत में, देश परेशान है मन के मीत से

Tue, 19/09/2017 - 22:56
एक तरफ हनीप्रीत का जादू तो दूसरी तरफ मोदी सरकार की चकाचौंध । एक तरफ बिना जानकारी किस्सागोई । दूसरी तरफ सारे तथ्यो की मौजूदगी में खामोशी । एक तरफ हनीप्रीत को कटघरे तक घेरने के लिये लोकल पुलिस से लेकर गृहमंत्रालय तक सक्रिय । दूसरी तरफ इक्नामी को पटरी पर लाने के लिये पीएमओ सक्रिय । एक तरफ हनीप्रीत से निकले सवालो से जनता के कोई सरोकार नहीं । दूसरी तरफ सरकार के हर सवाल से  जनता के सरोकार । तो क्या पुलिस- प्रशासन, नौकरशाह-मंत्री और मीडिया की जरुरत बदल चुकी है या फिर वह भी डि-रेल है । क्योंकि देश की बेरोजगारी के सवाल पर हनीप्रीत का चरित्रहनन देखा-दिखाया जा रहा है । पेट्रोल की बढ़ती कीमतों पर हनीप्रीत के नेपाल में होने या ना होना भारी है । गिरती जीडीपी पर हनीप्रीत के रेपिस्ट गुरमीत के संबध मायने रखने लगे हैं। 10 लाख करोड पार कर चुके एनपीए की लूट पर डेरा की अरबो की संपत्ति की चकाचौंध भारी हो चली है । नेपाल में हनीप्रीत का होना नेपाल तक चीन का राजमार्ग बनाना मायने नहीं रख रहा है ।

जाहिर है ऐसे बहुतेरे सवाल किसी को भी परेशान कर सकते हैं कि आखिर जनता की जरुरतो से इतर हनीप्रीत सरीखी घटना पर गृमंत्रालय तक सक्रिय हो जाता है और चौबिस घंटे सातों दिन खबरों की दिशा में हनीप्रीत की चकाचौंध . हनीप्रीत की अश्लीलता । हनीप्रीत के चरित्र हनन में ही दुनिया के पायदान पर पिछडता देश क्यों रुचि ले रहा है । या उसकी रुची भी अलग अलग माध्यमो से तय की जा रही है । अगर बीते हफ्ते भर से हनीप्रीत से जुड़ी खबरों का विश्लेषण करें तो शब्दो के आसरे सिर्फ उसका रेप भर नहीं किया गया । बाकि सारे संबंधो से लेकर हनीप्रीत के शरीर के भीतर घुसकर न्यूजचैनलों के डेस्क पर बैठे कामगारों ने अपना हुनर बखूबी दिखाया । यूं एक सच ये भी है कि इस दौर में जो न्यूज चैनल हनीप्रीत की खबरो के माध्यय से जितना अश्लील हुआ उसकी टीआरपी उतनी ज्यादा हुई ।

तो क्या समाज बीमार हो चुका है या समाज को जानबूझकर बीमार किया जा रहा है । यूं ये सवाल कभी भी उठाया जा सकता था । लेकिन मौजूदा वक्त में ये सवाल इसलिये क्योंकि 'वैशाखनंदन '  की खुशी भी किसी से देखी नहीं जा रही है। यानी चैनलों के भीतर के हालात वैशाखनंदन से भी बूरे हो चले है क्योकि उन परिस्थितियों को हाशिये पर धकेल दिया जा रहा है जो 2014 का सच था । और वही सच कही 2019 में मुंह बाये खडा ना हो जाये , तो सच से आंखमिचौली करते हुये मीडियाकर्मी होने का सुरुर हर कोई पालना चाह रहा है । याद किजिये 2014 की इक्नामी का दौर जिसमें बहार लाने का दावा मोदी ने चुनाव से पहले कई-कई बार किया। लेकिन तीन साल बाद महंगाई से लेकर जीडीपी और रोजगार से लेकर एनपीए तक के मुद्दे अगर अर्थव्यवस्था को संकट में खड़ा कर रहे हैं तो चिंता पीएम को होना लाजिमी है। और अब जबकि 2019 के चुनाव में डेढ बरस का वक्त ही बचा है-सुस्त अर्थव्यवस्था मोदी की विकास की तमाम योजनाओं को पटरी से उतार सकती है। क्योकि 2014 में
इक्नामिस्ट मनमोहन सिंह भी फेल नजर आ रहे थे । और अब ये सवाल मायने नही रखते कि , नोटबंदी हुई मगर 99 फीसदी नोट वापस बैंक आ गए । एनपीए 10 लाख करोड से ज्यादा हो गया । खुदरा-थोक मंहगाई दर बढ रही है ।  उत्पादन-निर्माण क्षेत्र की विकास दर तेजी से नीचे जा रही है । आर्थिक विकास दर घट रही है । क्रेडिट ग्रोथ साठ बरस के न्यूनतम स्तर पर है । यानी सवाल तो इक्नामी के उस वटवृक्ष का है-जिसकी हर डाली पर झूलता हर मुद्दा एक चुनौती की तरह सामने है। क्योंकि असमानता का आलम ये है कि दुनिया के सबसे ज्यादा भूखे लोग भारत में ही । यूएन की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में 19 करोड़ से ज्यादा लोग भुखे सोने को मजबूर हैं। सरकार की रिपोर्ट कहती है करोडपतियो की तादाद तेजी से बढ़ रही। दो फ्रांसीसी अर्थशास्त्रियों थोमा पिकेती और लुका सॉसेल का नया रिसर्च पेपर तो कहता है कि भारत में साल 1922 के बाद से असमानता की खाई सबसे ज्यादा गहरी हुई है ।

तो क्या हनीप्रीत सरीखे सवालों के जरिये मीडिया चाहे -अनचाहे या कहे अज्ञानवश उन हालातो को समाज में बना रहा है जहा देश का सच  राम रहिम से लेकर हनीप्रीत सरीखी खबरो में खप जाये । और सक्रिन पर अज्ञानता ही सबसे ज्यादा बौधिक क्षमता में तब्दिल अगर दिखायी देने लगें । तो ये महज खबरो को परोसने वाला थियेटर नहीं है बल्कि एक ऐसे वातावरण को बनाना है जिसमें चुनौतियां छुप जाये । क्योंकि अगर अर्थव्यवस्था पटरी से उतरी तो देश को जवाब देना मुश्किल होगा और उस वक्त सबकी नजरें सिर्फ एक बात टिक जाएंगी
कि क्या मोदी ब्रांड बड़ा है या आर्थिक मुद्दे। यानी चाहे अनचाहे मीडिया की भूमिका भी 2019 के लिये ऐसा वातावरण बना रही है जहां हनीप्रीत भी 2019 में चुनाव लड़ लें तो जीत जाये ।





जहर मिलता रहा..जहर पीते रहे....... बंदिशों में बेखौफ होने का मजा

Sun, 17/09/2017 - 16:35
यादें बेहद धूमिल है...कैसे जिक्र सिर्फ इंदिरा गांधी का होता था। कैसे नेताओं की गिरप्तारी की जानकारी अखबारों से नहीं लोगो की आपसी बातचीत से पता चलती थी । कैसे दफ्तरो के बाबू टाइम पर आने लगे थे । बसें वक्त पर चल रही थी । रेलगाडियां लेट नहीं हो रही थी । स्कूलो में टीचर भी क्लास में वक्त पर पहुंचते। जिन्दगी अपनी रफ्तार से हर किसी की चल रही थी । फिर इमरजेन्सी का मतलब या खौफजदा होने की वजह क्या है. ये सवाल उस दौर में हमेशा मेरे जहन में बना रहा। यादें धूमिल हैं लेकिन याद तो आता है कि गाहे-बगाहे कभी छुट्टी के दिन घर में पिता जी के मित्रों की चर्चा का जमावडा होता तो जिक्र इमरजेन्सी या इंदिरा गांधी के साथ साथ जेपी का भी होता । पांचवी-छठी क्लास में पढने के उस दौर की यादे सहेज कर रखना मेरे लिये इसलिये आसान था क्योंकि पिताजी का तबादला दिल्ली से बिहार होने की वजह इमरजेन्सी का लगना और जेपी के बिहार में होना ही था। और इसका जिक्र इतनी बार घर में हुआ कि मैं शुरु में सिर्फ इतना ही जान पाया कि1975 में दिल्ली छूट रहा है और रांची जा रहे हैं तो वजह इमरजेन्सी है ।
खैर ये अलग यादें हैं कि उस वक्त रेडियो का बुलेटिन ही कितना महत्वपूर्ण होता था ...और कैसे रांची में शाम 6 बजकर बीस मिनट का प्रादेशिक बुलेटिन शुरु करने के बाद पटना में साढ़े सात बजे के बुलेटिन के लिये पिताजी को जाना पड़ा और पूरा परिवार ही इमरजेन्सी में दिल्ली से रांची फिर पटना घूमता रहा । लेकिन आज संदर्भ इसलिये याद आ रहा है क्योंकि बीते कई महीनों से मुझे बार बार लग रहा है कि जो भी पढ़ाई की, या जिस वातावरण को जीते हुये हम स्कूल-कॉलेज से होते हुये पत्रकारिता के दौर को जीते हुये चर्चा करते रहे ...सबकुछ अचानक गायब हो गया है । पटना के बीएन कालेज में राजनीतिशास्त्र पढ़ते-पढ़ते हम कई मित्र छात्र देश के संविधान को ही नये सिरे से लिखने की बात तक करते । बकायदा जीने के अधिकार का जिक्र कर कैसे उसे लागू किया जाना चाहिये चर्चा बाखूबी होती । हिन्दी के शिक्षक गांधी मैदान के किनारे एलीफिस्टन सिनेमा हाल के मुहाने पर चाय की दुकान में नीबू की चाय की चुस्कियों में बता देते कि वसंत का मौसम हम युवाओं को जीने नहीं देता क्योंकि सारी परीक्षा वसंत में ही होती है । पटना साइंस कालेज के फिसड्डी छात्रों में होने के बावजूद जातिय राजनीति का ज्ञान पटना यूनिवर्सिटी में एक के बाद एक कर कई हत्याओं ने 1983 में ही समझा दिया था । और नागपुर में पत्रकारिता करते हुये दलित -संघ - नक्सलवाद को बाखूबी समझने के लिये उस वातावरण को जीया । यानी पत्रकारिता के आयाम या कहे उसका कैनवास इतनी विस्तृत था कि किसी खाके में किसी ने 1989 से 1995 तक बांटने की या कहे रखने की कोशिश नहीं की । जबकि उस वक्त के सरसंघचालक बालासाहेब देवरस के साथ सैकड़ों बार बैठना हुआ । उस वक्त दलित राजनीति के केन्द्र में नागपुर के रिपब्लिकन नेताओं के साथ कई कई दिन गुजारे। म्हारों की बस्ती में जा कर रहा । उनके बीच से दलित रंगभूमि को खड़ा किया । तब के नक्सली संगठन पीपुल्स वार ग्रूप के सर्वेसर्वा सीतारमैया से तेलगांना के जंगलों में जा कर मुलाकात की । और नागपुर में रहते हुये पत्रकारिता का एैसा अंदाज था कि क्या मुंब्ई क्या दिल्ली या क्या लंदन । देश दुनिया से कोई भी पत्रकार या रिसर्च स्कॉलर नागपुर पहुंचा तो या तो वह हमारी चौखट पर जानकारी के लिये या फिर हम जानकारीहासिल करने के लिये उसकी चौखट पर। याद नहीं आता इंदिरा गांधी के इमरजेन्सी के दौर को छोडकर कभी कोई प्रधानमंत्री बहस - चर्चा में आया । जेएनयू में रहते हुये मुनिस रजा तो शैक्सपियर और किट्स के जरीये क्लासिकल अंग्रेजी साहित्य को छात्रों के साथ शाम में घूमते-टहलते हुये बकायदा जीते । छात्र भी जीते । आगवानी साहेब तो जेएनयू की खूबसूरती तले पर्यावरण का जिक्र अक्सर करते । यूं हाल में रहे बीबी भट्टाचार्य भी सिर्फ देश ही नहीं बल्कि इंटरनेशनल इक्नामी पर चर्चा कर सामाजिक-राजनीतिक पहलुओं का जिक्र नई नई किताब या किसी रिसर्च पेपर के बताकर करते । फणीश्वरनाथ रेणु की दिनमान की पत्रकारिता । अज्ञेय का पेड़ पर घर बनाकर रहना । और उनकी मुश्किल हिन्दी । मुक्तीबोध के चांद के मुंह ढेडा । या फिर पाश का सबसे खतरनाक होता है सपनों का मर जाना । या फिर प्रेमचंद की ही दलित पत्रकारिता को लेकर बहस । कह सकते है सवाल और समझ जितने दायरे में घूमते रहे उस दायरे में गुरुदत की प्यासा भी रेंगी और घडकन बढाने वाली "ब्लेम इट आन रियो" भी।
मधुबाला की खूबसूरती से लेकर वहीदा का अंदाज और डिंपल का जादू भी चर्चा में शरीक रहा । रेखा-अमिताभ की जोड़ी के रोमानीपन तले विवाह के बंधन पर चर्चा हुई । मीना-कुमारी के इश्क और शराब में भी गोते लगाये । लेकिन कभी कुछ ठहरा नहीं । स्कूल कालेज या पत्रकारिता करते हुये समाज के हर क्षेत्र में घुमावड़ा। थमा कुछ भी नहीं। अंडरवर्ल्ड को जानने समझते बंबई भी पहंचे। भाई ठाकुर से भी मिले । उसके ज्ञान पर रश्क भी हुआ। और 1989 में शिवसेना की सामना के शुरुआत वाले दिन पत्रकारों की टोली के साथ गोवा से लौटते हुये बंबई में बालासाहेब ठाकरे से मुलाकात के मोह में रुक भी गये । और ठाकरे की ठसक को छत पर बीयर के साथ तौला भी । और लौटते वक्त फैज की नज्म ...जख्म मिलता रहा ..जख्म पीते रहे ...हम भी जीते रहे...को भी बखूबी गुनगुनाया । एसपी सिंह की पत्रकारिता को सलाम करते हुये अपने ही अखबार के मालिक के खिलाफ खडे होकर एसपी को सहयोग करते रहे । प्रभाष जोशी की पत्रकारिता के अंदाज को बखूबी जीते हुये अपने जन्मदिन वाले दिन संपादकीय पन्ने पर उस लेख को छापने की मांग रख दी जो बताता था,,,क्यों नहीं हो पा रहा है व्यवस्था परिवर्तन और 18 मार्च को बकायदा लेख छा पर प्रभाष जी का फोन लोकमत के संपादक को आया....बता देना आज छप गया है....क्यों नहीं हो पा रहा है व्यवस्था परिवर्तन...जन्मदिन की बधाई भी दे देना । और कहना कि जरा बाबरी मस्जिद को ढहाने वालों पर भी लेख लिखे..नागपुर में है तो दिल्ली का कुछ भला करे। यानी चर्चा बहस हर बात को लेकर ।
हालात तो इतने खुले हुये कि...6 दिसबंर 1992 का बाद देश में माहौल जो भी हो..लेकिन कहीं गोली नहीं चली..कोई मरा नहीं...मगर नागपुर के मोमिनपुरा में विरोध रैली सडक पर ना आ जाये तो तबके कमीश्नर ईनामदार ने गोली चलवा दी....12 लोग मारे गये ...मरने वालो में संयोग से वह लड़का भी जो चार दिन बाद दिलीप कुमार को मुशायरे में बुलवाने के लिये आमंत्रण देकर स्वीकृति लेकर नागपुर पहुंचा था । और मुशायरा रद्द हुआ तो ...आग्रह पर दिलीप कुमार ने भी खासकर अखबार में छापने के लिये पत्र लिखा...हालात पर लिखा और शायरी के अंदाज में मुश्यरा दिलों में जगाये रखने की तमन्ना भी जाहिर की । 10 या 11 दिसंबर 1992 को दिलीप कुमार का पत्र छपा भी । नागपुर यूनिर्वसिटी के पालेटिकल साइस के प्रोफेसर राणाडे ने घर बुलाकर चाय पिलाई । चर्चा की । चर्चा तो खूब होती रही । जब राहुल गांधी ने मनमोहन सिंह की इक्नामिक पालेसी पर अंगुली उठाई तब फिल्म दीवार के दृश्य ...मंदिर से निकल कर दो अलग अलग रास्तों पर जाते अमिताभ बच्चन और शशि कपूर की तर्ज पर मनमोहन सिंह और राहुल गांधी का जिक्र किया ...और भास्कर ने लेख छापा तो पीएमओ को अच्छा नहीं लगा । लेकिन पीएमओ का अंदाज भी चर्चा वाला ही रहा । क्या होना चाहिये ...पीएमओ बाहर से देखने में कितना अमानवीय है, इस पर भी खुल कर चर्चा की । मनमोहन सिंह के दौर में घोटाले दर घोटालों का जिक्र भी रिपोर्टो के जरीये खूब किया । कोयला से लेकर टू-जी । राडिया टेप से लेकर कलमाडी । खूब लिखा । सत्ता की एडवाइरी को भी देखा-सुना परखा । सत्ता की हेकडी को भी देखा । वाजपेयी की सादगी में मनमोहन सिंह को खोजना मूर्खता लगा। तो सत्ता की चौखट पर खडे होकर कहने से भी नहीं चूके । नागपुर से ए बी वर्धन की यारी जारी रही तो 2004 में इक्नामिस्ट मनमोहन की इक्नामिक पॉलिसी तले खडे होकर बर्धन ने जब एलान किया.....डिसइन्वेस्टमेंट को बंगाल की खाडी में डूबो देना चाहिये...फिर फोन कर पूछा ..समुद्र इतना गहरा होता कि उसमें से डिसइन्वेस्टमेंट वापस तो नहीं निकलेगा । और ठहाके के अंदाज में सत्ता को भी बिना लाल बत्ती जी लिया। यही खुलापन लगातार खोज रहा हूं..सोच रहा हूं कोई जिक्र किसी गजल का कोई क्यों नहीं कर रहा.....क्या वह आखिरी पाश था जो कलाई में बंधी खडी के कांटे को घूमते हुये ठहरा मान चुका था । आखिर साहित्य--संगीत पर देश में बात क्यों नहीं हो रही है । क्यों घर में जुटे चार दोस्त भी पकौडी-चाय पर ठहाके लगाते सुनाई दिखायी नहीं दे रहे हैं । क्यों खुफिया तरीके से कोई फोन कर बताता है ,,,बंधुवर प्रेमचंद की गोदान अब सिलेबस से बाहर कर दी गई है । क्यों मीडिया संस्धानों में जिन्दगी पर चर्चा नहीं हो पा रही है । क्यों सरकारी दफ्तरों में घुसते ही एक तरह की मुर्दानगी दिखायी दे रही है । ऐसा क्यो लग रहा है कि हर किसी ने लक्ष्य निर्धारित कर लिये है और उसे पाने में जुटा है । जैसे गुरुग्राम में सात बरस के प्रघुम्न की हत्या पर कंडक्टर को गिरफ्तार कर पुलिस सबूत जुटाने में जुटी । तो फिर देश भी चुनाव दर चुनाव जीतने के लिये माहौल बनाने के लिये ही काम करेगा । सत्ता हो या विपक्ष । और इस माहौल में जनता भी तो पहले ही तय कर रही है उसे किससे चाहिये । क्या चाहिये । देने वाले के सामने भी लक्ष्य है । और उसी आसरे वह भी तय कर रहा है किसे कितना देना है । तो फिर याद किजिये पंचतंत्र की कहा यो को । पंचतंत्र जो दुनिया के हर भाषा में अनुवादित है । और उसे दो हजार बरस पहले विष्णु शर्मा ने उस राजा के कहने पर लिखा । जिसके बच्चे बिगडे हुये थे । और वन में रह कर तपस्या कर रहे विष्णु शर्मा की तरफ भी राजा का ध्यान इसलिये गया क्योकि वह भोग-उपभोग से दूर वन में तपस्या कर रहे थे । यानी तब राजा भी जानते थे कि ज्ञान उसी के पास होगा जिसे कुछ चाहिये नहीं । यानी 2019 का लक्ष्य रखकर कौन का काम होगा और कौन सा ज्ञान किसके पास होगा । मुक्त हो कर जीने का मजा देखिये । ..जख्म मिलता रहा / जख्म पीते रहे / जख्म जब भी कोई जहन-ओ-दिल को मिला / जिन्दगी की तरफ एक दरीचा खुला / जिन्दगी हमें रोज आजमाती रही / हम भी उसे रोज आजमाते रहे....


एक करोड़ खाली पड़े सरकारी पदों पर भर्ती क्यों नहीं?

Wed, 13/09/2017 - 21:14
युवा भारत में सबसे बुरे हालात युवाओं के ही हैं....


रोजगार ना होने का संकट या बेरोजगारी की त्रासदी से जुझते देश का असल संकट ये भी है केन्द्र और राज्य सरकारों ने स्वीकृत पदो पर भी नियुक्ति नहीं की हैं। एक जानकारी के मुताबिक करीब एक करोड़ से ज्यादा पद देश में खाली पड़े हैं। जी ये सरकारी पद हैं। जो देश के अलग अलग विभागों से जुड़े हैं । दो महीने पहले ही जब राज्यसभा में सवाल उठा तो कैबिनेट राज्य मंत्री जितेन्द्र प्रसाद ने जवाब दिया। केन्द्र सरकार के कुल 4,20,547 पद खाली पड़े हैं। और महत्वपूर्ण ये भी है केन्द्र के जिन विभागो में पद खाली पड़े हैं, उनमें 55,000 पद सेना से जुड़े हैं। जिसमें करीब 10 हजार पद आफिसर्स कैटेगरी के हैं। इसी तरह सीबीआई में 22 फीसदी पद खाली हैं। तो प्रत्यर्पण विभाग यानी ईडी में 64 फीसदी पद खाली हैं। इतना ही नहीं शिक्षा और स्वास्थ्य सरीखे आम लोगो की जरुरतों से जुडे विभागों में 20 ले 50 फीसदी तक पद खाली हैं। तो क्या सरकार पद खाली इसलिये रखे हुये हैं कि काबिल लोग नहीं मिल रहे। या फिर वेतन देने की दिक्कत है । या फिर नियुक्ति का सिस्टम फेल है । हो जो भी लेकिन जब सवाल रोजगार ना होने का देश में उठ रहा है तो केन्द्र सरकार ही नहीं बल्कि राज्य सरकारों के तहत आने वाले लाखों पद खाली पडे हैं। आलम ये है कि देश भर में 10 लाख प्राइमरी-अपर प्राइमरी स्कूल में टीचर के पद खाली पड़े हैं। 5,49,025 पद पुलिस विभाग में खाली पडे हैं। और जिस राज्य में कानून व्यवस्था सबसे चौपट है यानी यूपी। वहां पर आधे से ज्यादा पुलिस के पद खाली पड़े हैं। यूपी में 3,63,000 पुलिस के स्वीकृत पदो में से 1,82,000 पद खाली पड़े हैं। जाहिर है सरकारों के पास खाली पदो पर नियुक्ति करने का कोई सिस्टम ही नहीं है। इसीलिये मुश्किल इतनी भर नहीं कि देश में एजुकेशन के प्रीमियर इंस्टीट्यूशन तक में पद खाली पड़े हैं। मसलन 1,22,000 पद इंजीनियरिंग कालेजो में खाली पडे है। 6,000 पद आईआईटी, आईआईएम और एनआईटी में खाली पड़े हैं।

6,000 पद देश के 47 सेन्ट्रल यूनिवर्सिटी में खाली पड़े हैं। यानी कितना ध्यान सरकारों को शिक्षा और स्वास्थ्य को लेकर हो सकता है, ये इससे भी समझा जा सकता है कि दुनिया में भारत अपनी तरह का अकेला देश है जहा स्कूल-कालेजों से लेकर अस्पतालो तक में स्वीकृत पद आधे से ज्यादा खाली पड़े है । आलम ये है कि 63,000 पद देश के 363 राज्य विश्वविघालय में खाली पडे हैं। 2 लाख से ज्यादा पद देश के 36 हजार सरकारी अस्पतालों में खाली पडे हैं। बुधवार को ही यूपी के स्वास्थ्य मंत्री सिद्दार्थ नाथ सिंह ने माना कि यूपी के सरकारी अस्पतालों में 7328 खाली पड़े पदो में से 2 हजार पदों पर जल्द भर्ती करेंगे। लेकिन खाली पदो से आगे की गंभीरता तो इस सच के साथ जुडी है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन का मानना है कि कम से कम एक हजार मरीज पर एक डाक्टर होना ही चाहिये । लेकिन भारत में 1560 मरीज पर एक डाक्टर है । इस लिहाज से 5 लाख डाक्टर तो देश में तुरंत चाहिये । लेकिन इस दिशा में सरकारे जाये तब तो बात ही अलग है । पहली प्रथमिकता तो यही है कि जो पद स्वीकृत है । इनको ही भर लिया जाये । अन्यथा समझना ये भी होगा कि स्वास्थय व कल्याण मंत्रालय का ही कहना है कि फिलहाल देश में 3500 मनोचिकित्सक हैं जबकि 11,500 मनोचिकित्सक और चाहिये ।

और जब सेना के लिये जब सरकार देश में ही हथियार बनाने के लिये नीतियां बना रही है और विदेशी निवेश के लिये हथियार सेक्टर भी खोल रही है तो सच ये भी है कि आर्डिनेंस फैक्ट्री में 14 फीसदी टैक्निकल पद तो 44 फिसदी नॉन-टेक्नीकल पद खाली पडे हैं।

यानी सवाल ये नहीं है कि रोजगार पैदा होंगे कैसे । सवाल तो ये है कि जिन जगहो पर पहले से पद स्वीकृत हैं, सरकार उन्हीं पदों को भरने की स्थिति में क्यों नहीं है। ये हालात देश के लिये खतरे की घंटी इसलिये है क्योंकि एक तरफ खाली पदों को भरने की स्थिति में सरकार नहीं है तो दूसरी तरफ बेरोजगारी का आलम ये है कि यूनाइटेड नेशन की रिपोर्ट कहती है कि 2016 में भारत में 1 करोड 77 लाख बेरोजगार थे । जो 2017 में एक करोड 78 लाख हो चुके हैं और अगले बरस 1 करोड 80 पार कर जायेंगे। लेकिन भारत सरकार की सांख्यिकी मंत्रालय की ही रिपोर्ट को परखे तो देश में 15 से 29 बरस के युवाओ करी तादाद 33,33,65,000 है । और ओईसीडी यानी आरगनाइजेशन फार इक्नामिक को-ओपरेशन एंड डेवलेपंमेंट की रिपोरट कहती है कि इन युवा तादाद के तीस पिसदी ने तो किसी नौकरी को कर रहे है ना ही पढाई कर रहे है । यानी करीब देश के 10 करोड युवा मुफलिसी में है । जो हालात किसी भी देश के लिये विस्पोटक है । लेकिन जब शिक्षा के क्षेत्र में भी केन्द्र और राज्य सरकारे खाली पद को भर नहीं रही है तो समझना ये बी होगा कि देश में 18 से 23 बरस के युवाओं की तादाद 14 करोड से ज्यादा है । इसमें 3,42,11,000 छात्र कालेजों में पढ़ाई कर रहे हैं। और ये सभी ये देख समझ रहे है कि दुनिया की बेहतरीन यूनिवर्सिटी की कतार में भारतीय विश्वविधालय पिछड चुके है । रोजगार ना पाने के हालात ये है कि 80 फीसदी इंजीनियर और 90 फिसदी मैनेजमेंट ग्रेजुएट नौकरी लायक नही है । आईटी सेक्टर में रोजगार की मंदी के साथ आटोमेशन के बाद बेरोजगारी की स्थिति से छात्र डरे हुये हैं। यानी कहीं ना कहीं छात्रों के सामने ये संकेट तो है कि युवा भारत के सपने राजनीति की उसी चौखट पर दम तोड रहे है जो राजनीति भारत के युवा होने पर गर्व कर रही है । और एक करोड़ खाली सरकारी पदों को भरने का कोई सिस्टम या राजनीतिक जिम्मेदारी किसी सत्ता ने अपने ऊपर ली नहीं है।

मां-बाप क्या करें ? जब हर जिम्मेदारी से है मुक्त चुनी हुई सरकार

Mon, 11/09/2017 - 20:36
तो सुप्रीम कोर्ट को ही तय करना है कि देश कैसे चले। क्योंकि चुनी हुई सरकारों ने हर जिम्मेदारी से खुद को मुक्त कर लिया है। तो फिर शिक्षा भी बिजनेस है। स्वास्थ्य सेवा भी धंधा है। और घर तो लूट पर जा टिका है। ऐसे में जिम्मेदारी से मुक्त सरकारों को नोटिस थमाने से आगे और संविधान की लक्ष्मण रेखा पार न करने की हिदायत से आगे सुप्रीम कोर्ट जा नहीं सकता। और नोटिस पर सरकारी जवाब सियासी जरुरतो की तिकड़मों से पार पा नहीं सकता। तो होगा क्या। सरकारी शिक्षा फेल होगी। प्राइवेट स्कूल कुकुरमुत्ते की  तरह फले-फुलेंगे। सरकारी हेल्थ सर्विस फेल होगी। निजी अस्पताल मुनाफे पर इलाज करेंगे। घर बिल्डर देगा। तो घर के लिये फ्लैटधारकों की जिन्दगी बिल्डर के दरवाजे पर बंधक होगी। यानी जीने के अधिकार के तहत ही जब न्यूनतम जरुरत शिक्षा, स्वास्थ्य और घर तक से चुनी हुई सरकारें पल्ला झाड़ चुकी हो तब सिवाय लूट के होगा क्या सियासत लूट के कानून को बनाने के अलावा करेंगी क्या। और सुप्रीम कोर्ट सिवाय संवैधानिक व्याख्या के करेगा क्या। हालात ये है कि 18 करोड़ स्कूल जाने वाले बच्चो में 7 करोड़ बच्चों का भविष्य निजी स्कूलों के हाथो में है। सरकार का शिक्षा बजट 46,356 करोड़ है तो निजी स्कूलों का बजट 8 लाख करोड से ज्यादा है। यानी देश की न्यूनतम जरुरत, शिक्षा भी सरकार नहीं बाजार देता है। जिसके पास जितना पैसा। और पैसे के साथ उन्हीं नेताओं की पैरवी, जो जिम्मेदारी मुक्त है। और तो और नेताओ के बडी कतार चाहे सरकारी स्कूल में बेसिक इन्फ्रस्ट्रक्चर ना दे पाती हो लेकिन उनके अपने प्राईवेट स्कूल खूब बेहतरीन हैं। इसीलिये निजी  स्कूलों की कमाई सरकारी स्कूलो के बजट से करीब सौगुना ज्यादा है। तो मां-बाप क्या करें । सुप्रीम कोर्ट के नोटिस पर 21 दिन बाद आने वाले जवाब का इंतजार करें ।

और इस बीच चंद दिनो पहले की खबर की तरह खबर आ जाये कि गोरखपुर में 125 बच्चे । तो फर्रुखाबाद में 38 और सैफई में 98 बच्चे मर  गये। बांसवाडा में भी 90 बच्चे मर गये। ये सच बीते दो महीने का है तो मां-बाप शिक्षा के साथ अब बच्चो के जिन्दा रहने के लिये इलाज की तालाश में भटके। और इलाज का आलम ये है कि 100 करोड जनसंख्या जिस सरकारी इलाज पर टिकी है उसके लिये बजट 41,878 करोड का है। 25 करोड नागरिकों के लिये प्राइवेट इलाज की इंडस्ट्री 6,50,000 करोड पार कर चुकी है। यानी इलाज की जगह सरकारी अस्पतालो में मौत और मौत की एवज में करोड रुपये का मुनाफा।  तो दुनिया में भारत ही एकमात्र एसा देश है जहा शिक्षा और हेल्थ सर्विस का सिर्फ निजीकरण हो चला है बल्कि सबसे मुनाफे वाली इडस्ट्री की तौर पर शिक्षा और हेल्थ ही है। तो मां-बाप क्या करें। जब शिक्षा के नाम पर  कत्ल हो जाये । इलाज की एवज में मौत मिले। और एक अदद घर के लिये खुद को ही बिल्डर के हाथो रखने की स्थिति आ जाये और चुनी हुई सरकार पल्ला झाड ले तो फिर सुप्रीम कोर्ट का ये कहना भर आक्सीजन का काम करता है कि , " बैंक बिल्डर का नहीं फ्लैटधारको को फ्लैट दिलाने पर ध्यान दें। बिल्डर डूबता है तो डूबने दें।" तो जो बात सुप्रीम कोर्ट संविधान की व्यख्या करते हुये कह सकता है उसके चुनी हुई सरकारे सत्ता भोगते हुये लागू नहीं कर  सकती। क्योंकि सवाल बच्चो की मौत के साथ हर पल मां बाप के मर के जीने का भी होता है। इसीलिये गुरुग्राम के श्यामकुंज की गली नं 2 में जब नजर कत्ल किये जा चुके प्रद्यु्म्न 50 गज के घर पर पडती है तो कई सवाल हर जहन  में रेंगते है। क्योंकि पूरी कालोनी जिस त्रासदी को समेटे प्रद्युम्न की मां ज्योति ठाकुर को सांतवना देने की जगह खुद के बच्चे की तस्वीर आंखों  में समेटे है। वह मौजूदा सिस्टम के सामने सवाल तो हैं। क्योंकि बच्चे का कत्ल ही नहीं बल्कि सिर्फ बच्चे को पालने के आसरे पूरा परिवार कैसे जिन्दगी जीता है उसकी तस्वीर ही प्रद्युम्न के घर पर मातम के बीच खामोशी तले पसरी हुई है।

और फैलते महानगरो में हाशिये पर पड़े लोगों के बीच देश के किसी भी हिस्से में चले जाइये इस तरह पचास गज की जमीन पर घर बनाकर बच्चो को बेहतर जिन्दगी देने की एवज में खुद जिन्दगी से दो दो हाथ करते  परिवार आपको दिखायी दे जायेगें । और बच्चो को पढाने के नाम पर इन्हीं परिवारो की जेब में डाका ढाल कर इस देश में सालाना दो लाख करोड़ की फिस-डोनेशन प्राइवेट स्कूलों से ली जाती है।  सबसे ज्यादा जमीन शिक्षा के  नाम पर प्राईवेट-कान्वेंट स्कूल को मिल गई। सिर्फ एक रुपये की लीज पर। तीस बरस के लिये। इसी दौर में प्राइवेट शिक्षा का बजट देश के शिक्षा बजट से 17 गुना ज्यादा का हो गया।  तो जो परिवार रेयान स्कूल में कत्ल के बाद फूट पडे । उन स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चो को मां-बाप के लिये चुनी हुई सरकारें क्या वाकई कुछ सोचती भी हैं। क्योंकि आज का सच यही है कि प्राइवेट स्कूलों की फीस भरने में मां-बाप की कमर दोहरी हो रही है। एसोचैम का सर्वे कहता है कि बीते चार साल में निजी स्कूलों की फीस 100 से 120 फीसदी बढ़ गई है । प्राइवेट स्कूलों की फीस हर साल औसतन 10 से 20 फीसदी बढ़ाई जाती है । बच्चो की पढाई को लेकर मंहगाई मायने नही रखती । स्कूलो की मनमानी पर कोई रोक लगती नहीं । मसलन महानगरो में एक बच्चे को पढाने का सालाना खर्च किस रफ्तार से बढा । उसका आलम ये है कि 2005 में 60 हजार । 2011 में 1 लाख बीस हजार । तो 2016 में 1 लाख 80 हजार सालाना हो चुका है।यानी महानगरो में किसी परिवार से पूछियेगा कि एक ही बच्चा क्यों तो जवाब यही आयेगा कि दूसरे बच्चे को पैदा तो कर लेंगे लेकिन पढायेंगे कैसे । यानी बच्चो की पढाई परिवार की वजह से पहचाने वाले देश में परिवार को ही खत्म कर रही है । लेकिन सिर्फ प्राइवेट स्कूल ही क्यो । पढाई के लिये ट्यूशन एक दूसरी ऐसी इंडस्ट्री है जिसके लिये स्कूल ही जोर डालते है । आलम ये है कि देश का शिक्षा बजट 46,356 करोड का है । और  ट्यूशन इंडस्ट्री तीन लाख करोड़ रुपए पार कर चुकी है । एसोचैम का सर्वे कहता है कि महानगरों में प्राइमरी स्कूल के 87 फीसदी छात्र और हाई स्कूल के 95 फीसदी छात्र निजी ट्यूशन लेते हैं । महानगरों में प्राइवेट ट्यूटर एक क्लास के एक हजार रुपए से चार हजार रुपए वसूलते हैं जबकि ग्रुप ट्यूशन की फीस औसतन 1000 रुपए से छह हजार रुपए के बीच है । यानी दो जून की रोटी में
मरे जा रहे देश में नौनिहालो की पढाई से लेकर इलाज तक की जिम्मेदारी से चुनी हुई सरकारे ही मुक्त है ।  क्योकि देश की त्रासदी उस कत्ल में जा उलझी है जिसका आरोपी दोषी नहीं है और दोषी आरोपी नहीं है क्योकि उसकी ताकत राजनीतिक सत्ता के करीब है । जब काग्रेस सत्ता में तो कांग्रेस के करीब और अब बीजेपी सत्ता में तो बीजेपी के करीब रेयान इंटरनेशनल की एमडी ग्रेस पिंटो । यू देश का सच तो ये भी है कि देश के 40 फीसदी निजी स्कूलों या शैक्षिक संस्थानों के मालिक राजनीतिक दलों से जुड़े हैं । बाकि अपने ताल्लुकात राजनीति सत्ता से रखते है । क्योंकि ध्यान दीजिए तो डीवाई पाटील,शरद पवार, सलमान खुर्शीद, छगन भुजबल, जगदंबिका पाल, जी विश्वानाथन,ज्योतिरादित्य सिंधिया, शिवपाल यादव, मनोहर जोशी,अखिलेश दास गुप्ता,सतीश मिश्रा जैसे नेताओं की लंबी फेहरिस्त है,जिनके स्कूल हैं या जो स्कूल मैनजमेंट में सीधे तौर पर शामिल हैं ।तमिलनाडु में तो 50 फीसदी से ज्यादा शैक्षिक संस्थान राजनेताओं के हैं । महाराष्ट्र में भी 40 से
50 फीसदी स्कूल राजनेताओं के हैं तो उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में भी यही हाल है । दरअसल, शिक्षा अब एक ऐसा धंधा है, जिसमें कभी मंदी नहीं आती। स्कूल की मंजूरी से लेकर स्कूल के लिए तमाम दूसरी सरकारी सुविधाएं लेना राजनेताओं के लिए अपेक्षाकृत आसान होता है और स्कूल चलाने के लिए जिस मसल पावर की जरुरत होती है-वो राजनेताओं के पास होती ही है। तो एक बच्चे की हत्या के बाद मचे बवाल से सिस्टम ठीक होगा यही ना देखियेगा । कुछ वक्त बाद परखियेगा रेयान इंटरनेशनल स्कूल में 7 बरस के बच्चे की हत्या ने किस किस को लाभ पहुंचाया।

हत्यारों को कठघरे में कौन खड़ा करेगा?

Wed, 06/09/2017 - 21:32
तो गौरी लंकेश की हत्या हुई। लेकिन हत्या किसी ने नहीं की। यह ऐसा सिलसिला है, जिसमें या तो जिनकी हत्या हो गई उनसे सवाल पूछा जायेगा, उन्होंने जोखिम की जिन्दगी को ही चुना। या फिर हमें कत्ल की आदत होती जा रही है क्योंकि दाभोलकर, पंसारे, कलबुर्गी के कत्ल का जब हत्यारा कोई नहीं है तो फिर गौरी लंकेश की हत्या के महज 48 घंटो के भीतर क्या हम ये एलान कर सकते हैं कि अगली हत्या के इंतजार में शहर दर शहर विरोध के स्वर सुनाई दे रहे हैं। पत्रकार, समाजसेवी या फिर बुद्दिजीवियों के इस जमावड़े के पास लोकतंत्र का राग तो है लेकिन कानून का राज देश में कैसे चलता है ये हत्याओ के सिलसिले तले उस घने अंधेरे में झांकने की कोशिश तले समझा जा सकता है। चार साल बाद भी नरेन्द्र दामोलकर के हत्यारे फरार हैं। दो बरस पहले गोविंद पंसारे की हत्या के आरोपी समीर गायकवाड को जमानत मिल चुकी है । कलबुर्गी की हत्या के दो बरस हो चुके है लेकिन हत्यारो तक पुलिस पहुंची नहीं है। कानून अपना काम कैसे कर रही है कोई नहीं जानता। तो फिर गौरी लंकेश की हत्या जिस सीसीटीवी कैमरे ने कैद भी की वह कैसे हत्यारों को पहचान पायेगी। क्योकि सीसीटीवी को देखने समझने वाली आंखें-दिमाग तो राजनीतिक सत्ता तले ही रेंगती हैं। और सत्ता को विचारधारा से आंका जाये या कानून व्यवस्था के कठघरे में परखा जाये। क्योंकि दाभोलकर और पंसारे की हत्या को अंजाम देने के मामले में सारंग अकोलकर और विनय पवार आजतक फरार क्यों हैं। और दोनों ही अगर हत्यारे है तो फिर 2013 में दाभोलकर की हत्या के बाद 2015 में पंसारे की हत्या भी यही दोनों करते हैं तो फिर कानून व्यवस्था का मतलब होता क्या है। महाराष्ट्र के पुणे शहर में दाभोलकर की हत्या कांग्रेस की सत्ता तले हुआ। महाराष्ट्र के ही कोल्हापुर में पंसारे की हत्या बीजेपी की सत्ता तले हुई। हत्यारों को कानून व्यवस्था के दायरे में खड़ा किया जाये। तो कांग्रेस-बीजेपी दोनों फेल है। और अगर विचारधारा के दायरे में खड़ा किया जाये तो दोनो की ही राजनीतिक जमीन एक दूसरे के विरोध पर खडी है।

यानी लकीर इतनी मोटी हो चली है कि गौरी लंकेश की हत्या पर राहुल गांधी से लेकर मोदी सरकार तक दुखी हैं। संघ परिवार से लेकर वामपंथी तक भी शोक जता रहे हैं। और कर्नाटक के सीएम भी ट्वीट कर कह रहे हैं, ये लोकतंत्र की हत्या है। यानी लोकतंत्र की हत्या कलबुर्गी की हत्या से लेकर गौरी शंकर तक की हत्या में हुई। दो बरस के इस दौर में दो दो बार लोकतंत्र की हत्या हुई। तो फिर हत्यारों के लोकतंत्र का ये देश हो चुका है। क्योंकि सीएम ही जब लोकतंत्र की हत्या का जिक्र करें तो फिर जिम्मेदारी है किसकी। या फिर हत्याओ का ये सिलसिला चुनावी सियासत के लिये आक्सीजन का काम करने लगा है। और हर कोई इसका अभयस्त इसलिये होते चला जा रहा है क्योंकि विसंगतियों से भरा चुनावी लोकतंत्र हर किसी को घाव दे रहा है। तो जो बचा हुआ है वह उसी लोकंतत्र का राग अलाप रहा हैं, जिसकी जरुरत हत्या है। या फिर हत्यारो को कानूनी मान्यता चाहे अनचाहे राजनीतिक सत्ता ने दे दी है। क्योंकि हत्याओं की तारीखों को समझे। अगस्त 2013 , नरेन्द्र दाभोलकर की हत्या। फरवरी 2015 गोविन्द पंसारे की हत्या। अगस्त 2015 एमएम कलबुर्गी की हत्या। 5 सितंबर 2017 गौरी लंकेश की हत्या। गौरतलब है कि तीनों हत्याओं में मौका ए वारदात से मिले कारतूस के खोलों के फोरेंसिक जांच से कलबुर्गी-पानसारे और दाभोलकर-की हत्‍या में इस्‍तेमाल हथियारों में समानता होने की बात सामने आई थी। बावजूद इसके हत्यारे पकड़े नहीं जा सके हैं। तो सवाल सीधा है कि गौरी लंकेश के हत्यारे पकड़े जाएंगे-इसकी गारंटी कौन लेगा? क्योंकि गौरी लंकेश की  हत्या की जांच तो एसआईटी कर रही है, जबकि दाभोलकर की हत्या की जांच को सीबीआई कर चुकी है, जिससे गौरी लंकेश की हत्या के मामले में जांच की मांग की जा रही है। तो क्या गौरी लंकेश की हत्या का सबक यही है कि हत्यारे बेखौफ रहे क्योकि राजनीतिक सत्ता ही लोकतंत्र है जो देश को बांट रहा है ।

या फिर अब ये कहे कि कत्ल की आदत हमें पड़ चुकी है क्योंकि चुनावी जीत के लिये हत्या भी आक्सीजन है। और सियासत के इसी आक्सीजन की खोज में जब पत्रकार और आरटीआई एक्टीविस्ट निकलते है तो उनकी हत्या हो जाती है। क्योंकि जाति, धर्म या क्षेत्रियता के दायरे से निकलकर जरा इन नामों की फेरहिस्त देखे। मोहम्मद ताहिरुद्दीन,ललित मेहता,सतीश शेट्टी,अरुण  सावंत ,विश्राम लक्ष्मण डोडिया ,शशिधर मिश्रा, सोला रंगा राव,विट्ठल गीते,दत्तात्रेय पाटिल, अमित जेठवा, सोनू, रामदास घाड़ेगांवकर, विजय प्रताप, नियामत अंसारी, अमित कपासिया,प्रेमनाथ झा, वी बालासुब्रमण्यम,वासुदेव अडीगा ,रमेश अग्रवाल ,संजय त्यागी ।

तो ये वो चंद नाम हैं-जिन्होंने सूचना के अधिकार के तहत घपले-घोटाले या गडबड़झालों का पर्दाफाश करने का बीड़ा उठाया तो विरोधियों ने मौत की नींद सुला दिया। जी-ये लिस्ट आरटीआई एक्टविस्ट की है। वैसे आंकड़ों में समझें तो सूचना का अधिकार कानून लागू होने के बाद 66 आरटीआई कार्यकर्ताओं की हत्या हो चुकी है ।159 आरटीआई कार्यकर्ताओं पर हमले हो चुके हैं और 173 ने धमकाने और अत्याचार की शिकायत दर्ज कराई है । यानी इस देश में सच की खोज आसान नहीं है। या कहें कि जिस सच से सत्ता की चूलें हिल जाएं या उस नैक्सस की पोल खुल जाए-जिसमें अपराधी और सत्ता सब भागीदार हों-उस सच को सत्ता के दिए सूचना के अधिकार से हासिल करना भी आसान नहीं है।  दरअसल, सच सुनना आसान नहीं है। और सच को उघाड़ने वाले आरटीआई एक्टविस्ट हों या जर्नलिस्ट-सब जान हथेली पर लेकर ही घूमते हैं। क्योंकि पत्रकारों की बात करें तो अंतरराष्ट्रीय संस्था कमेटी टू प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट की रिपोर्ट कहती है कि भारत में पत्रकारों को काम के दौरान पूरी सुरक्षा नहीं मिल पाती। भ्रष्टाचार और राजनीति तो खतरनाक बीट हैं । 1992 के बाद 27 ऐसे मामले दर्ज हुए,जिनमें पत्रकारों को उनके काम के सिलसिले में कत्ल किया गया लेकिन किसी एक भी मामले में आरोपियों को सजा नहीं हो सकी । तो गौरी लंकेश के हत्यारों को सजा होगी-इसकी बहुत उम्मीद नहीं की जा सकती। लेकिन-एक तरफ सवाल वैचारिक लड़ाई का है तो दूसरी तरफ सवाल कानून व्यवस्था का है। क्योंकि सच यही है कि बेंगलुरु जैसे शहर में अगर एक पत्रकार की घर में घुसकर हत्या हो सकती है तो देश के किसी भी शहर में पत्रकार-आरटीआई एक्टिविस्ट की हत्या हो सकती है-और उन्हें कोई बचा नहीं सकता। यानी अब गेंद सिद्धरमैया के पाले में है कि वो दोषियों को सलाखों के पीछे तक पहुंचवाएं। क्योंकि मुद्दा सिर्फ एक हत्या का नहीं-मीडिया की आजादी का भी है। और सच ये भी है कि मीडिया की आजादी के मामले में भारत की स्थिति बहुत अच्छी नहीं है। रिपोर्टर्स विदआउट बॉर्डर्स की 2107 की वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम रैकिंग कहती है कि भारत का 192 देशों में नंबर 136वां है । और इस रैंकिंग का आधार यह है कि किस देश में पत्रकारों को अपनी बात कहने की कितनी आजादी है। और जब आजादी कटघरे में है तो हत्यारे कटघरे में कैसे आयेंगे।

2014 की कॉरपोरेट फंडिग ने बदल दी है देश की सियासत

Thu, 17/08/2017 - 22:59
चुनाव की चकाचौंध भरी रंगत 2014 के लोकसभा चुनाव की है। और क्या चुनाव के इस हंगामे के पीछे कारपोरेट का ही पैसा रहा। क्योंकि पहली बार एडीआर ने कारपोरेट फंडिग के जो तथ्य जुगाड़े हैं, उसके मुताबिक 2014 के आम चुनाव में राजनीतिक दलो को जितना पैसा कारपोरेट फंडिंग से हुआ उतना पैसा उससे पहले के 10 बरस में नहीं हुआ। एडीआर के मुताबिक 2004 से 2013 तक कारपोरेट ने 460 करोड 83 लाख रुपये राजनीतिक दलों को फंड किया। वहीं 2013 से 2015 तक के बीच में कारपोरेट ने 797 करोड़ 79 लाख रुपये राजनीतिक दलों को फंड किया।

ये आंकडे सिर्फ राष्ट्रीय राजनीतिक दलों के हैं। यानी बीजेपी, कांग्रेस, एनसीपी और वामपंथी दलो को दिये गये फंड । यानी 2014 के चुनाव में कारपोरेट ने दिल खोल कर फंडिंग की। तो चुनाव प्रचार के आधुनिकतम तरीके जब 2014 के चुनाव में बीजेपी ने आजमाये। तो उसके पीछे का क सच एडीआर की इस रिपोर्ट से भी निकलता है कि 80 फिसदी से ज्यादाकारपोरेट फंडिंग बीजेपी को मिल रही थी। क्योंकि याद किजिये मनमोहन सिंह सरकार जब घोटाले दर घोटाले के दायरे में फंस रही थी तब 20 कारपोरेट घरानों में 2011-12 के बीच मनमोहन सरकार की गवर्नेंस, पर सवाल उठाते हुये पत्र लिखे। और उसी के बाद देश में बनते चुनावी माहौल में कारपोरेट फंडिंग में कितनी तेजी आई ये एडीआर की रिपोर्ट से पता चलता है। अप्रैल 2012 से अप्रैल 2016 के बीच 956 करोड 77 लाख रुपये की कारपोरेट फंडिग हुई। इसमें से 705 करोड़ 81 लाख रुपये बीजेपी के पास गये । तो 198 करोड़ 16 लाख रुपये कांग्रेस के पास गये। महत्वपूर्ण ये भी है कि बीजेपी को दिये जाने वाली फंडिग में ही इजाफा नहीं हुआ। बल्कि कारपोरेट फंडिंग के इतिहास में ये पहला मौका आया जब पॉलिटिकल फंड देने वालो की तादाद तीन हजार से ज्यादा हुआ जिसमें 99   दी दाताओ ने फंड बीजेपी को दिया।

यानी 2014 की चुनावी हवा कारपोरेट के लिये बीजेपी के अनुकूल हो चुकी थी। लेकिन फंडिंग के इस खेल में काला धन कौन दे रहा है। या कालाधन ना लें, इस दिशा से राजनीतिक दलो ने आखे भी मूंद ली। और एडीआर की रिपोर्ट के मुताबिक 1933 दाताओं ने बिना पैन नंबर दिये ही 384 करोड रुपये पॉलिटिकल दानपेटी में डाल दिया। वहीं 1546 दाताओं ने पैन तो दिया लेकिन कोई पचा नहीं दिया और 355 करोड दान कर दिये। और खास बात ये है कि 160 करोड रुपये बिना पैन, बिना पते के पॉलिटिकल फंड में आये । इसमें 99 फिसदी दान बीजेपी के खाते में गये । तो 2014 में कांग्रेस हार रही थी। बीजेपी जीत रही थी । तब कारपोरेट पॉलिटिकल फंडिंग अगर 80 फिसदी बीजेपी के खाते में जा रही थी तो फिर 2019 के लिये देश में बनते राजनीतिक माहौल में अगर विपक्ष की राजनीतिक शून्यता अभी से बीजेपी को जीता रही है तो फिर आखरी सवाल यही होगा कि कारपोरेट फंड के भरोसे जो राजनीतिक दल राजनीति करते है उनके दफ्तरों में ताला लग जायेगा । क्योंकि बीजेपी ही सरकार होगी तो बीजेपी की ही दान पेटी हर किसी को दिखायीदेगी। यानी वैकल्पिक राजनीति को साधे बगैर कारपोरेट फंड पर टिकी राजनीति बीजेपी के सामने किसी की चल नहीं पायेगी। ये आखिरी सच है। तो क्या बीजेपी ने सत्ता में आने के बाद राजनीति की उस बिसात को ही नीतियों के आसरे देश में बिछा दिया है, जहां कारपोरेट अब 2014 की तर्ज पर सत्ता बदलने की दिशा में ना आ जाये। या फिर कारपोरेट को इसका एहसास हो कि अगर उसने विपक्ष के झोली भरनी चाही तो उसे सरकारी एजेंसियों के जरीये ही नहीं बल्कि जिस क्षेत्र में कारपोरेट का धंधा है, उसके दायरे में ही उसे लपेटा जा सकता है।

यहां ये सवाल खड़ा हो सकता है कि क्या वाकई लोकतंत्र का मापक आम चुनाव कारपोरेट पूंजी पर टिक गया है। यानी वोट तो आम जनता देती है। फिर कारपोरेट पूंजी से सत्ता कैसे उलटी पलटी जा सकती है। तो इसका जबाव सीधा है सत्ता के खिलाफ जन भावना राजनीतिक तौर पर अपने वोट से सत्ता परिवर्तन तो कर सकती है । लेकिन जन भावना को प्रभावित करने वाले जो भी औजार होते है अगर उसपर सत्ता कब्जा कर लें तो फिर विपक्ष की राजनीति टिकेगी कैसे। मौजूदा वक्त में ये सवाल इसलिये क्योंकि 1975-77 की तर्ज पर कोई आंदोलन तो देश में हो नहीं रहा है। उस वक्त इमरजेन्सी के खिलाफ आंदोलन मीडिया से बड़ा था। इसी तरह बोफोर्स को लेकर करप्शन के मुद्दा आंदोलन की तर्ज पर खड़ा हुआ। अयोध्या कांड भी कारसेवकों के जरीये देश में फैलता चला गया। और 2014 से ठीक पहले अन्ना आंदोलन ने मनमोहन सरकार की कब्र सामाजिक तौर पर बना दी थी। और कारपोरेट पूंजी ने अपना हित साधने के लिये बीजेपी को फंडिग की । लेकिन 2014 के बाद राजनीति के तौर तरीकों जिस तरह पूरी तरह चुनाव पर आ टिके हैं। यानी विपक्ष गठबंधन इसलिये हो रहा है कि चुनाव का हिसाब-किताब बदला जा सके। नीतीश सरीखे 2014 के विपक्ष इसलिये टूट रहे हैं, क्योंकि उन्हे लग रहा है कि 2019 में तो बीजेपी ही जीतेगी। यानी राजनीतिक जोड-तोड जब चुनाव जीतने पर आ टिकी हो और पूंजी की ताकत के बगैर चुनाव जीतने मुश्किल माना जाता रहा है और इसे ना सिर्फ वोटर बल्कि चुनाव आयोग भी महसूस करने लगा हो तो फिर अब कारपोरेट फंडिग कैसी होगी। क्योंकि 2014 ने चुनाव के तौर तरीके बदल दिये ये सच है । क्योंकि आजाद भारत में पहली बार 2014 का चुनाव ना सिर्फ सबसे महंगा हुआ बल्कि
1952 से 1991 तक के चुनाव में जितना खर्च हुआ। उतना ही खर्च 1996 से 2009 तक के चुनाव में हुआ। और अकेले 2014 के चुनाव में इतना ही खर्च हो गया। ये आंकड़ा 3870 करोड़ का है । तो ये कल्पना से परे है कि 2014 के बाद अब 2019 में कितना खर्च होगा। लेकिन आखिरी सच ये भी समझना होगा कि जिन
कारपोरेट ने फंड किया उसमें खनन , रियल इस्टेट , उर्जा और न्यूजपेपर  इंडस्ट्री अव्वल रही। लेकिन मौजूदा वक्त में यही सारे क्षेत्रों को सरकार ने अपने हथेली पर नचाने शुरु किये हैं। यानी ये तबका अब विपक्ष को फंड ना
करें व्यवस्था इसकी भी है और सरकार के इशारे पर कारपोरेट चले तो ही बचेगा निशानदेही इसकी भी है।

बच्चों के रहने लायक भी नहीं छोड़ी दुनिया

Mon, 14/08/2017 - 23:20
14-15 अगस्त 1947 । दुनिया के इतिहास में एक ऐसा वक्त जब सबसे ज्यादा लोगों ने एक साथ सीमा पार की । एक साथ शरणार्थी होने की त्रासदी को झेला । एक साथ मौत देखी । और 1951 के सेंसस में जो उभरा उसके मुताबिक 72,26,660 मुस्लिमों ने हिन्दुस्तान छोड़ा । 72,95,870 हिन्दुओं और सिख ने पाकिस्तान छोड़ा । यानी डेढ करोड शरणार्थी । और दर्द के इस उभार के बीच 22,30,000 लोग मिसिंग कैटेगरी में डाल दिये गये । यकीनन बिना युद्द इतनी मौतो को भी दुनिया ने विभाजन की रेखा तले देखा । और दर्द की इस इंतेहा को तब बिखरे बचपन ने भविष्य के सुनरहरे सपनो तले देखना शुरु किया । याद कीजिये 1953 में फिल्म बूट पालिश का गीत । नन्हे मुन्ने बच्चे तेरी मुठ्ठी में क्या है । मुठ्ठी में है तकदीर हमारी...आनेवाले दुनिया में सब के सर पे ताज होगा... न भूखों की भीड़ होगी न दुखों का राज होगा...बदलेगा ज़मना ये सितारों पे लिखा है । लेकिन बदला क्या । क्योंकि उस गीत को गाते नन्हे मुन्नों की  उम्र आज 75 पार होगी । तो आजादी के 70 बरस बाद क्या वाकई तब के नन्हे- मुन्नो ने जिस दुनिया के सपने पाले वह आज की दुनिया दे पा रही है । ये सब सपना है क्योकि मौत दर मौत ही बच्चों का सच हो चला है। गोरखपुर के अस्पताल में 60 बच्चो का नरसंहार तो एक बानगी भर है । क्योंकि बच्चों के जीने के लिये हमने-आपने छोडी कहा है दुनिया । हालात है कितने बदतर । तस्वीर खौफनाक है। आंकड़े डराने वाले हैं । 7,30,000 शिशु जन्मते ही महीने भर के भीतर मर जाते है । 10,50,000 बच्चे एक साल ही उम्र भी नहीं जी पाते । यानी एक तरफ इलाज की व्यवस्था नहीं तो बच्चों की मौत । और दूसरी तरफ प्रदूषण । प्रदूषण से 5 बरस तक के 2,91,288 बच्चे हर बरस मरते है ।  14 बरस के 4,31,560 बच्चो की मौत हर बरस होती है । यानी रखपुर में आक्सीजन सप्लाइ रुकी तो 60 बच्चो की मौत ने इन्सेफलाइटिस को लेकर जुझते हालात पर हर कसी की ध्यान केन्द्रित कर दिया ।

लेकिन 2016 में ही निमोनिया-डायरिया से 2,96,279 बच्चो की मौत डब्ल्यूएचओ  के आंकडे में सिमट कर रह गई । तो बच्चो पर ध्यान है कहां किसी का । क्योंकि दुनिया में भूखे बच्चो की तादाद  में भारत का नंबर 97 वां है । यानी 118 देशों की कतार में नीचे से 21 वां । तो विकास की कौन सी रेखा खींची जा रही है और किसके लिये अगर वह लकीर बच्चों के लिये लक्ष्मण रेखा समान है। क्योंकि डब्ल्यूएचओ की ही रिपोर्ट कहती है कि  देश में 39 फिसदी कुपोषित बच्चे वैसे है, जिनका विकास रुक गया है। 40 फिसदी बच्चों की उम्र 5 बरस पार कर नहीं पाती । 50 फीसदी बच्चे स्कूल रेगुलर जा नहीं पाते । तो फिर कौन सी दुनिया बच्चों के लिये हम बना रहे है । या उनके लिये छोड़े जा रहे है । क्योकि आजादी के ठीक बाद तो बच्चो ने सपने सुनहरे भविष्य के देखे थे ।
लेकिन किसे पता था जिस दौर में भारत में सबसे ज्यादा बच्चे होगें । फिलहाल 14 बरस तक के कुल बच्चो की जनसंख्या 35,57,96,866  है । और इसी दौर में अपने मरे हुये बच्चों को गोद में उठाये हुये मां -बाप की तस्वीर 70 बरस की आजादी की पूर्व संध्या पर भी हम आप देखेंगे । क्योंकि अस्पताल बदहाल है । तो फिर हेल्थ सर्विस कितनी बदहाली में है ये भी समझ लें । क्योकि बदहाल हेल्थकेयर सिस्टम ने इंसेफेलाइटिस को महामारी बना दिया । और इसी हेल्थकेयर सिस्टम के आइने में ये तस्वीरें अब हमें चौंकाती भी नहीं हैं। कहीं एबुलेंस की कमी से मरते लोग तो कहीं शव को कंधे पर ढोता बाप-ये तस्वीरें रोज का हिस्सा हो गई हैं। दरअसल, सच ये कि हेल्थकेयर कभी किसी सरकार की प्राथमिकता में रहा ही नहीं। आलम ये कि 27 फिसदी मौत के पीछे इलाज ना मिलना है । यानी देश में एक तरफ सरकारी हेल्थ सिस्टम खुद ही आईसीयू में है । और दूसरी तरफ मेडिकल बीमा पर प्राइवेट बीमा पर इलाज करा पाने की स्थिति पैसे वालो की है । जबकि 86 फीसदी ग्रामीण और 82 फीसदी शहरी आबादी के पास मेडिकल बीमा नहीं है । और देश में सरकारी इलाज की सुविधा का आलम है क्या तो , 1700 मरीजो पर एक डाक्टर है । 61,011 लोगो पर एक अस्पताल है । 1833 मरीजो के लिये एक बेड उपलब्ध है । यानी अस्पताल, डाक्टर,दवाई, बेड, आक्सीजन सभी कुछ के हालात अगर त्रासदी दायका है तो फिर सरकार हेल्थ पर खर्च क्यो नही करती । फिलहाल भारत  जीडीपी का सिर्फ 1.4 फीसदी खर्च करता है, जबकि अमेरिका 8.3 फीसदी । और दुनिया के 188 देशो की रैकिंग में भारत का नंबर 143 वां आता है । और देश का आखरी सच है कि 30 करोड लोग सतो चाह कर भी दवाई खरीद नहीं सकते । तोआइए जरा समझ लीजिए कि बच्चों के लिए ये देश क्यों रहने लायक नहीं है या कहें हमने इस लायक छोड़ा नहीं कि बच्चें यहां चैन की सांस ले सकें। क्योंकि सच ये है कि -देश में गंदा पानी पीकर डायरिया होने से हर साल करीब 15 लाख बच्चों की मौत हो जाती है ।

स्वास्थ्य सुविधाओं की खस्ताहालत के चलते छह साल तक के 2 करोड़ तीस लाख बच्चे कुपोषण और कम वजन के शिकार हैं . आलम ये कि हर साल 10 साल से ज्यादा बच्चों की मौतें कुपोषण से हो जाती हैं ।-भारत में हर साल 10 लाख से ज्यादा मौतें वायु प्रदूषण के चलते हो जाती है,जिसमें आधे से ज्यादा बच्चे हैं । शिशु मृत्य दर के मामले में भारत का हाल इतना खराब है कि प्रति हजार बच्चों में 58 पैदा होते ही मौत के मुंह में चले जाते हैं,जबकि विकसित देशों में ये आंकड़ा 5 से भी कम है । और 12 लाख से ज्यादा बच्चे हर साल ऐसी बीमारियों से मारे जाते हैं-जिनका इलाज संभव है। यूं इस देश पर गर्व करने लायक बहुत कुछ है-लेकिन बच्चों की दुनिया जैसी बनाई है-वो झांकी परेशान करती है। क्योंकि 50 के दशक का गीत आओ बच्चो तुम्हे दिखाये झांकी हिन्दुस्तान की....आप सुन कर खुश हो सकते है । लेकिन सच तो ये है ,देश में पांच से 18 साल की उम्र तक के 3 करोड़ 30 लाख बच्चे बाल मजदूरी करते हैं । -देश में 10 करोड़ से ज्यादा बच्चों को अब तक स्कूल जाना नसीब नहीं है । और जिन बच्चों के लिए स्कूल जाना मुमकिन है-वो पढ़ाई का दबाव नहीं सह पा रहे। आलम ये कि हर साल 25 हजार से ज्यादा बच्चे पढ़ाई के दबाव में खुदुकशी कर रहे हैं । देश में हर आठ मिनट पर एक बच्चे का अपहरण हो जाता है। दरअसल, भारत में बचपन खतरे में है, और इस पर ध्यान देने वाला कोई नहीं। तो दावे भले कुछ हो लेकिन सेव द चिल्ड्रेन की रिपोर्ट कहती है कि भारत में बचपन खासा खतरे में है। हेल्थ , शिक्षा , मजदूरी , शादी , जन्म , हिसां सरीखे 8 पैमाने पर  सेव दे चिल्टेरन की लिस्ट में भारत  म्यांमार, भूटान, श्रीलंका और मालदीव से भी पीछे 116वें स्थान पर है।

क्या प्रभाष जोशी होने के लिये रामनाथ गोयनका चाहिए?

Sun, 30/07/2017 - 22:24
मालवा के पठार की काली मिट्टी और लुटियन्स की  दिल्ली के राजपथ की  लाल बजरी के बीच प्रभाष जोशी की पत्रकारिता । ये प्रभाष जोशी का सफर नहीं है । ये पत्रकारिता की वह सुरंग है, जिसमें से निकलकर मौजूदा वक्त की पत्रकारिता को समझने के लिये कई आंखों, कई कान मिल सकते है तो कई सच, कई अनकही सियासत समझ में आ सकती है । और पत्रकारिता की इस सुरंग को वही ताड़ सकता है जो मौजूदा वक्त में पत्रकारिता कर रहा हो । जिसने प्रभाष जोशी को पत्रकारिता करते हुये देखा होऔर जिसके हाथ में रामबहादुर राय और सुरेश सर्मा के संपादन में लेखक रामाशंकर कुशवाहा की किताब "लोक का प्रभाष " हो । यूं " लोक का प्रभाष "  जीवनी है । प्रभाष जोशी की जीवनी । लेकिन ये पुस्तक जीवनी कम पत्रकारीय समझ पैदा करते हुये अभी के हालात को समझने की चाहे अनचाहे एक ऐसी जमीन दे देती है, जिस पर अभी प्रतिबंध है । प्रतिबंध का मतलब इमरजेन्सी नहीं है । लेकिन प्रतिबंध का मतलब प्रभाष जोशी की पत्रकारिता को सत्ता के लिये खतरनाक मानना तो है ही । और उस हालात में ना तो रामनाथ गोयनका है ना इंडियन एक्सप्रेस। और ना ही प्रभाष जोशी हैं। तो फिर बात कहीं से भी शुरु कि जा सकती है । बस शर्त इतनी है कि अतीत के पन्नों को पढ़ते वक्त मौजूदा सियासी धड़कन के साथ ना जोडें । नहीं तो प्रतिबंध लग जायेगा । तो टुकड़ों में समझें। रामनाथ गोयनका ने जब पास बैठे धीरुभाई अंबानी से ये सुना कि उनके एक हाथ में सोने की तो दूसरे हाथ में चांदी की चप्पल होती है । और किस चप्पल से किस अधिकारी को मारा जाये ये अधिकारी को ही तय करना है  तो गोयनका समझ गये कि हर कोई बिकाऊ है, इसे मानकर धीरुभाई चल रहे हैं । और उस मीटिंग के बाद एक्सप्रेस में अरुण शौऱी की रिपोर्ट और जनसत्ता में प्रभाष जोशी का संपादकपन । नजर आयेगा कैसी पत्रकारिता की जरुरत तब हुई । अखबार सत्ता के खिलाफ तो खड़े होते रहे हैं । लेकिन अखबार विपक्ष की भूमिका में आ जाये ऐसा होता नहीं । लेकिन ऐसा हुआ । यूं "लोक का प्रभाष " में कई संदर्भों के आसरे भी हालात नत्थी किये गये है।


मसलन वीपी सिंह से रामबहादुर राय के इंटरव्यू से बनी किताब "मंजिल से ज्यादा सफर" के अंश का जिक्र। किताब का सवाल - जवाब का जिक्र । सवाल-कहा जाता है हर सरकार से रिलायंस ने मनमाफिक काम करवा लिये। वाजपेयी सरकार तक से । जवाब-ऐसा होता रहा होगा । क्योंकि धीरुभाई ने चाणक्य सूत्र को आत्मसात कर लिया । राज करने की कोशिश कभी मत करो, राजा को खरीद लो।

तो क्या राजनीतिक शून्यता में पत्रकारिता राजनीति करती है । या फिर पत्रकारिता राजनीतिक शून्यता को भर देती है । ये दोनो सवाल हर दौर में उठ सकते है । और ऐसा नहीं है कि प्रभाष जोशी ने इसे ना समझा हो । पत्रकारिता कभी एक पत्रकार के आसरे नहीं मथी जा सकती । हां, चक्रव्यूह  को हर कोई तोड़ नहीं पाता। और तोड कर हर कोई निकल भी नहीं पाता । तभी तो प्रभाष जोशी को लिखा रामनाथ गोयनका के उस पत्र से शुरुआत की जाये जो युद्द के लिये ललकारता है। जनसत्ता शुरु करने से पहले रामनाथ अगर गीता के अध्याय दो का 38 वां श्लोक का जिक्र अपने दो पेजी पत्र में करते हैं, जो उन्होंने प्रभाष जोशी को लिखा, " जय पराजय, लाभ-हानी तथा सुख-दुख को समान मानकर युद्द के लिये तत्पर हो जाओ - इस सोच के साथ कि युद्द करने पर पाप के भागी नहीं बनोगे। " और कल्पना कीजिये प्रभाष जोशी ने भी दो पेज के जवाबी पत्र में रामनाथ गोयनका को गीता के श्लोक से पत्र खत्म किया , " समदु:खे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ । ततो युद्दाय युज्यस्व नैंव पापमवायस्यसि ।।" और इसके बाद जनसत्ता की उड़ान जिसके सवा लाख प्रतियां छपने और खरीदे जाने पर लिखना पड़ा- बांच कर पढे । ना ना बांट कर पढ़ें का जिक्र था। लेकिन बांटना तो बांचने के ही समान होता है। यानी लिखा गया दीवारों के कान होते है लेकिन अखबारो को पंख । तो प्रभाष जोशी की पत्रकारीय उड़ान हवा में नहीं थी। कल्पना कीजिये राकेश कोहरवाल को इसलिये निकाला गया क्योंकि वह सीएम देवीलाल के साथ बिना दफ्तर की इजाजत लिये यात्रा पर निकल गये । और देवीलाल की खबरें भेजते रहें। तो देवीलाल ने भी रामनाथ गोयनका को चेताया कि खबर क्यों नहीं छपती । और जब यह सवाल रामनाथ गोयनका ने प्रभाष जोशी से पूछा तो संपादक प्रभाष जोशी का जवाब था । देवीलाल खुद को मालिक संपादक मान रहे हैं। बस रिपोर्टर राकेश कोहरवाल की नौकरी चली गई। लेकिन रामभक्त पत्रकार हेमंत शर्मा की नौकरी नहीं गई। सिर्फ उन्हें रामभक्त का नाम मिला। और हेमंत शर्मा " लोक का प्रभाष " में उस दौर को याद कर कहने से नहीं चूकते कि प्रभाष जी ने रिपोर्टिंग की पूरी स्वतंत्रता दी । रिपोर्टर की रिपोर्ट के साथ खडे होने वाले संपादकों की कतार खासी लंबी हो सकती है । या आप सोचे अब तो कोई बचा नहीं तो रिपोर्टर भी कितने बचे हैं ये भी सोचना चाहिये । लेकिन प्रभाष जोशी असहमति के साथ रिपोर्टर के साथ खड़े होते। तो उस वक्त रामभक्त होना और जब खुद संपादक की भूमिका में हो तब प्रभाष जोशी की जगह रामभक्त संपादक हो जाना। ये कोई संदर्भ नहीं है । लेकिन ध्यान देने वाली बात जरुर है कि चाहे प्रभाष जोशी हो या सुरेन्द्र प्रताप सिंह । कतार वाकई लंबी है इनके साथ काम करते हुये आज भी इनके गुणगान करने वाले संपादको की । लेकिन उनमें कोई भी अंश क्यो अपने गुरु या कहे संपादक का आ नहीं पाया । यो सोचने की बात तो है । मेरे ख्याल से विश्लेषण संपादक रहे प्रभाष जोशी का होना चाहिये । विश्लेषण हर उस संपादक का होना चाहिये जो जनोन्मुखी पत्रकारिता करता रहा। आखिर क्यों उनकी हथेली तले से निकले पत्रकार रेंगते देखायी देते है। क्यों उनमें संघर्ष का माद्दा नहीं होता। क्यों वे आज भी प्रभाष जोशी या एसपी सिंह या राजेन्द्र माथुर को याद कर अपने कद में अपने संपादकों के नाम नत्थी करनाचाहते है। खुद की पहचान से वह खुद ही क्यों बचना चाहते है। रामबहादुरराय में वह क्षमता रही कि उन्होंने किसी को दबाया नहीं। हर लेखन को जगह दी। आज भी देते है।  चाहे उनके खिलाफ भी कलम क्यों न चली। लेकिन राम बहादुर राय का कैनवास उनसे उन संपादकों से कहीं ज्यादा मांगता है जो रेग रहे है। ये इसलिये क्योंकि ये वाकई अपने आप में अविश्वसनिय सा लगता है कि जब प्रभाष जी ने एक्सप्रेस में बदली सत्ता के कामकाज से नाखुश हो कर जनसत्ता से छोड़ने का मन बनाया तो रामबहादुर राय ने ना सिर्फ मुंबई में विवेक गोयनका से बात की बल्कि 17 नवंबर 1975 को पहली बार अखबार के मालिक विवेक गोयनका को पत्र लिखकर कहा गया कि प्रभाष जोशी को रोके। बकायदा बनवारी से लेकर जवाहर लाल कौल । मंगलेश डबराल से लेकर रामबहादुर राय । कुमार आंनद से लेकर प्रताप सिंह। अंबरिश से लेकर राजेश जोशी । ज्योतिर्मय से लेकर राजेन्द्र धोड़पकर तक ने तमाम तर्क रखते हुये साफ लिखा । "हमें लगता है कि आपको प्रभाषजी को रोकने की हर संभव कोशिश करनी चाहिये ।" जिन दो दर्जन पत्रकारों ने तब प्रभाष जोशी के लिये आवाज उठायी । वह सभी आज के तारिख में जिन्दा है । सभी की धारायें बंटी हुई है। आप कह सकते है कि प्रभाष जोशी की खासियत यही थी कि वह हर धारा को अपने साथ लेकर चलते। और यही मिजाज आज संपादकों की कतार से गायब है। क्योंकि संपादकों ने खुद को संपादक भी एक खास धारा के साथ जोड़कर बनाया है।
दरअसल, प्रभाष जोशी के जिन्दगी के सफर में आष्ठा यानी जन्मस्थान । सुनवानी महाकाल यानी जिन्दगी के प्रयोग । इंदौर यानी लेखन की पहचान । चडीगढ़ यानी संपादकत्व का निखार । दिल्ली यानी अखबार के जरीये संवाद । और इस दौर में गरीबी । मुफ्लिसी । सत्ता की दरिद्रगी । जनता का संघर्ष । सबकुछ प्रभाष जोशी ने जिया । और इसीलिये सत्ता से हमेशा सम्मानजनक दूरी बनाये रखते हुये उसी जमीन पर पत्रकारिता करते रहे जिसे कोई भी सत्ता में आने के बाद भूल जाता है । सत्ता का मतलब सिर्फ सियासी पद नहीं होता चुनाव में जीत नहीं होती । संपादक की भी अपनी सत्ता होती है । और रिपोर्टर की भी ।

लेकिन जैसे ही सत्ता का स्वाद कोई भी चखने लगता है वैसे ही पत्रकारिता कैसे पीछे छूटती है इसका एहसास हो सकता है प्रभाष जोशी ने हर किसी को कराया हो । लेकिन खुद सत्ता के आसरे देश के राजनीतिक समाधान की दिशा में कई मौको पर प्रभाष जोशी इतने आगे बढे कि वह भी इस हकीकत को भूले कि राजनीति हर मौके पर मात देगी । अयोध्या आंदोलन उसमें सबसे अग्रणी कह सकते है । क्योंकि 6 दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद ध्वंस हुआ तो प्रभाष जोशी ये लिखने से नहीं चूके , '  राम की जय बोलने वाले धोखेबाज विध्वंसको ने कल मर्यादा पुरुषोत्तम राम के रधुकुल की रिती पर कालिख पोत दी...... "। सवाल इस लेखन का नहीं सवाल है कि उस वक्त संघ के खिलाफ डंडा लेकर कूद पडे प्रभाष जोशी के डंडे को भी रामभक्तों ने अपनी पत्रकारिता से लेकर अपनी राजनीति का हथियार बनाया । कहीं ढाल तो कही तलवार ।  और प्रभाष जी की जीवनी पढ़ते वक्त कई पन्नो में आप ये सोच कर अटक जायेंगे कि क्या वाकई जो लिखा गया वही प्रभाष जोशी है।

लेकिन सोचिये मत । वक्त बदल रहा है । उस वक्त तो पत्रकार-साहित्यकारों की कतार थी । यार दोस्तो में भवानी प्रसाद मिश्र से लेकर कुमार गंधर्व तक का साथ था । लेखन की विधा को जीने वालो में रेणु से लेकर रधुवीर सहाय थे। वक्त को उर्जावान हर किसी ने बनाया हुआ था । कही विनोबा भावे अपनी सरलता से आंदोलन को भूदान की शक्ल दे देते । तो कही जेपी राजनीतिक डुगडुगी बजाकर सोने वालो को सचेत कर देते । अब तो वह बिहार भी सूना है । चार लाइन न्यूज चैनलों की पीटीसी तो छोड़ दें कोई अखबारी रपट भी दिखायी ना दी जिसने बिहार की खदबदाती जमीन को पकड़ा और बताय़ा कि आखिर क्यो कैसे पटना में भी लुटिसन्स का गलियारा बन गया । इस सन्नाटे को भेदने के लिये अब किसी नेता का इंतजार अगर पत्रकारिता कर रही है तो फिर ये विरासत को ढोते पत्रकारो का मर्सिया है । क्योकि बदलते हालात में  प्रभाष जोशी की तरह सोचना भी ठीक नहीं कि गैलिलियो को फिर पढे और सोचे " वह सबसे दूर जायेगा जिसे मालूम नहीं कि कहा जा रहा है " । हा नौकरी की जगह पत्रकारिता कर लें चाहे घर के टूटे सोफे पर किसी गोयनका को बैठाने की हैसियत ना बन पाये । लेकिन पत्रकार होगा तो गोयनका भी पैदा हो जायेगा, ये मान कर चलें।

लेखक विषय संवाद साभार अनुवादक

पहले वो आए साम्यवादियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं साम्यवादी नहीं था

 

फिर वो आए मजदूर संघियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं मजदूर संघी नहीं था

 

फिर वो यहूदियों के लिए आए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं यहूदी नहीं था

 

फिर वो आए मेरे लिए

और तब तक बोलने के लिए कोई बचा ही नहीं था

 

मार्टिन नीमोलर (1892-1984)