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लेखक मंच

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Vicharo ka manthan
Updated: 4 hours 57 min ago

रंगीली के होटल की खिचड़ी : कमल जोशी

Mon, 26/06/2017 - 11:32

कर्मठ रंगीली।

हालत कुछ-कुछ डिप्रेशन जैसे थे। भारी उदासी घेरे थी। कुछ दिन पहले ही तबियत खराब हुई थी और उससे जल्दी उबर नहीं पा रहा था। पहले भी तबियत खराब होती थी, परन्तु हफ्ते भर में ही खुद को फिट समझने लगता था। इस बार डेढ़ महीना हो गया था। शरीर दुरुस्त नहीं लग रहा था। एक डर सा मन में बैठ गया था कि क्या अब बुढ़ापा आ ही गया। सफेद दाढ़ी और कुल जमा बासठ साल तो शीशा देखते ही चिल्लाने लगते कि‍ भाई तुम बुढ़ापे में कदम रख चुके,  लेकि‍न वह गाना है ना- ‘दिल है के मानता नहीं..,’ की तर्ज पर दिमाग भी अभी तक स्वीकार नहीं कर पा रहा था कि‍ असलियत तो असलियत है…कब तक सींग कटा कर बछड़ों में शामिल हुआ जा सकता है?

पर आवारागर्दी अजीब लत होती है। इसीलिए डिप्रेशन की सी अनुभूति हो रही थी की- सुख भरे दिन गए रे भैया !

पर जैसा मैंने ऊपर लिखा ही है- ‘दिल है के मानता नही’- मैंने जिंक्स तोड़ने का मन बनाया और तय कर लिया कि चमोली जिले की ओर निकला जाए, जहां इस चाचा का भतीजा मधु है, जो जरूरत पड़ने पर देखभाल कर सकता है- बिना मुंह बनाए।

महीना अक्‍टूबर का था। सुबह हवा में खुनक थी। बादलों के दो बच्चे आसमान में धमा चौकड़ी करने की तर्ज में डराने लगे, पर मैं डरा नहीं और लगभग 6:30 पर फटफटिया स्टार्ट कर चल पड़ा। मूड अभी भारी ही था और मन अन्यमयस्क।

दस बजे के आसपास बुवाखाल पहुंचा, हिमालय भी दिखा, पर मन खिला नहीं। एक होटल में थोड़ा नाश्ता किया और पौड़ी होते हुए श्रीनगर की उतार पार की। श्रीनगर पार करते हुए कई परिचित चेहरे भी दिखे, पर मैंने बाइक रोकी नहीं। और मेरे हेलमेट की वजह से वे मुझे पहचान भी नहीं पाए। सर्र से श्रीनगर भी पार हो गया।

मुझे खाना खाने के लिए घोलतीर पहुँचना था, जहां मधु से मुझे मिलना था। वह दो बजे तक पहुँचने वाला था। इसलिए मेरे पास काफी समय था। मैं अब आराम से धीरे-धीरे फटफटिया चलाने लगा। थोड़ा आगे बढ़ा था कि‍ मुझे दो बच्चे सड़क के किनारे दिखे। दोनों भाई की तरह लग रहे थे। एक की उम्र दस ग्यारह साल और दूसरे की छह-सात साल। मैं आराम से बाइक चला रहा था। बच्चे मुझे देखते रहे। बाइक के बहुत करीब पहुँचने पर अचानक छोटे वाले ने मुझे रुकने के लि‍ए हाथ दिया। मुझे एकदम ब्रेक लगाने पड़े। तब भी थोड़ा आगे निकल गया। मैंने पीछे मुड़ कर उनकी ओर देखा। बच्चों को शायद आशा नहीं थी कि‍ मैं फटफटिया रोक दूंगा। वे सकपका से गए। मैंने पूछा, ‘‘क्या है?’’  बड़े बच्चे ने छोटे की तरफ इशारा करते हुए कहा, ‘‘इसने हाथ दिया।’’

अब मैंने छोटे बच्चे की तरफ प्रश्‍नवाचक दृष्टि से देखा। वह चुप ही रहा। मैंने अपने चहरे के भाव दुरुस्त किए और हंसते हुए पूछा, ‘‘क्यों हाथ दिया बताओ!’’ अब शायद बच्चों को लगा कि‍ बताने में कोई खतरा नहीं है, तो बड़े वाला बोला, ‘‘हमें आगे जाना है। रुद्रप्रयाग तक।’’ वे लिफ्ट मांग रहे थे। मेरे बैठो बोलने की देर थी कि‍ छोटा बच्चा इस गति से पिछली सीट पर चढ़ गया कि‍ एक बारगी तो मैं डिसबैलेंस ही हो गया था। दोनों बच्चे पिछली सीट पर जम गए। छोटे वाले बच्चे ने मुझे बन्दर के बच्चे की तरह कस कर पकड़ लिया। फटफटिया चलने से पहले मैंने उनसे पूछा, ‘‘ठीक से बैठे हो ना..गिरना मत।’’ तो उन्होंने ‘हाँ’ कहा और छोटे ने तो मेरी जैकेट इतनी कस कर पकड़ ली कि‍ उसकी अंगुलि‍यां मुझे चुभने लगीं।

मैं उनसे बात करते हुए बाइक चलना चाहता था, पर हेलमेट की वजह से उनके जवाब मुझे सुनाई नहीं दे रहे थे। मैंने बाइक रोकी,  हेलमेट उतारा कर हैंडल में लटका दिया। ऐसा करना नहीं चाहिए था, पर मैंने तय किया कि‍ हेलमेट उतार कर बाइक बहुत धीरे चलाऊंगा। तभी छोटे वाले ने मेरा हेलमेट माँगा और पहन लिया। हमारी गपशप शुरू हुई। पता चला कि‍ उनके नाम दीवान सिंह और हयात सिंह हैं। जहां वे खड़े थे, वहीं ऊपर उनका गाँव है। वे रुद्रप्रयाग अपने चाचा की लड़की के नामकरण पर जा रहे हैं और गाडी़ का इंतजार कर रहे थे।

‘‘तुम्हें अकेले कैसे भेज दिया माँ-बाप ने।’’ मैंने पूछा, तो दीवान,  जो बड़ा था,  ने मुझे बताया कि‍ माँ तो कई दिन से चाची के साथ ही है। पिता शाम को आएंगे। बच्चों ने पहले जाकर भूली को देखने की जिद की तो उन्हें किराया देकर सड़क पर भेज दिया। वे पहले भी इस तरह अकेले चाचा के घर जा चुके हैं। बच्चों को पारिवारिक ज्ञान भी था। बताया कि‍ उनकी बड़ी बहन अब काफी ‘बड़ी’  हो गई है। अब उसके लिए लड़का ढूंढ़ा जा रहा है। मेरी समझ में नहीं आया कि‍ इन बच्चों की शादी लायक बड़ी बहन कैसे हो सकती है। मैंने पूछा कि‍ बहन काफी बड़ी है, क्या?  तो छोटा बोला, ‘‘भोत बड़ी है। हमको मारती भी है।’’ उसके चेहरे पर पिटने का बहुत रोष रहा होगा, जो मैं देख नहीं पाया। बात आगे बढ़ाने के लिए मैंने पूछा कि‍ कहीं कोई लड़का देखा है। बड़ा बड़े ही प्रौढ़ अंदाज में बोला, ‘‘हाँ, देख रहे हैं। बात चल रही है!’’ उसकी बात पूरी ही हुई थी कि‍ छोटा वाला बोला, ‘‘बस दारू पीने वाला नहीं होना चाहिए!’’  इतने छोटे बच्चे के मु्ंह से यह बात सुनकर मैं अचम्भित रह गया। मैंने उससे ही पूछा, ‘‘क्यों दारू पीने से क्या होता है।’’ तो वह बोला, ‘‘दारूडी लोग ठीक नहीं होते। हमारे स्कूल में मास्टर दारूडी है। पढाता नहीं….मारता है!’’ फिर कुछ देर रुककर बोला, ‘‘नाक में दम कर रखा है, माचेत ने।’’  मैंने बाइक रोक कर गर्दन घुमाकर उसकी नाक देखने की कोशिश की। हेलमेट के भीतर से नाक ही नहीं दिखाई दे रही थी, दम कहाँ से दिखता। मैंने उससे कहा, ‘‘तुम्हारी नाक में तो दम दिखाई नहीं दे रहा।’’ वह पहले चौंका। फिर मेरे व्यंग्‍य को समझकर दोनों भाई हंसने लगे। मैंने उनसे पूछा कि‍ क्या सभी मास्टर ऐसे होते हैं, तो बड़े वाला बोला कि‍ नहीं ज्यादातर मास्टर तो अच्छे हैं। बस वह ही खराब हैं- ‘‘कभी स्कूल आते हैं कभी नहीं, पढा़ते भी नहीं। कुछ पूछो तो चिढ़ जाते हैं, पीटता भौत है।’’ अब मैं समझा कि‍ छोटे ने क्यों तय किया कि वह जीजा के रूप में किसी दारू पीने वाले को स्वीकार नहीं कर सकता।

रुद्रप्रयाग से पहले कुछ दुकानों के पास दीवान बोला, ‘‘बस…बस… हमें यहीं उतार दो!’’ मैंने बाइक में ब्रेक लगाए। फटफटिया रुकते ही दोनों बच्चे उतर गए। मैं कुछ कहता उससे पहले ही छोटा वाला बोला, ‘‘हमसे किराये के पैसे लोगे तुम!’’  मैंने उसके भोलेपन पर फिदा होते हुए कहा, ‘‘वैसे तो लेता, पर तुम दोनों अब दोस्त हो गए हो इसलिए नहीं लूंगा।’’ फिर दोस्ती को मजबूत करने के लिए मैं भी बाइक से उतरा और पास की दुकान से तीन बिस्कुट लिए। दो उन दोनों को दिए और एक खुद खाने के लिए सड़क के किनारे के पैरापिट पर बैठ गया। वे दोनों बच्चे भी वहीं बैठकर बिस्कुट खाने लगे। बड़े वाले ने मेरा नाम पूछा तो मैंने अपना नाम बताया। दीवान बोला कि हमारे साथ चलो, आज घर में पूरी-पकौड़ी बनी होंगी, खाकर जाना। मैने मना किया तो छोटा बोला, ‘‘चलो, चाचा जी कुछ नहीं कहेंगे।’’ उन्‍हें लगा कि शायद मैं हिचकिचा रहा हूं। उसने फिर पूछा कि‍ कहाँ जा रहे हो। मैंने बताया कि‍ आवारागर्दी करने। छोटे को शायद अवारागर्दी का मतलब समझ नहीं आया, पर बड़ा बोला, ‘‘झूठ।’’  मैंने कहा, ‘‘हां, सच में।’’ तो वह बोला, ‘‘बुड्ढे़ भी कभी आवारागर्दी करते हैं।’’ मैं उन्हें क्या बताता कि‍ मैं तो बिगड़ा हुआ बुड्ढा़ हूँ!

बिस्कुट हम लोगों ने निपटा लिए थे। विदा होने की बारी थी। मैंने कहा कि‍ मैं चलता हूँ और अपनी मोटरसाइकिल पर बैठ गया। एक झिझक के बाद छोटा वाला हयात सिंह आया और मेरी ओर हाथ बढ़ा कर हाथ मिलाने लगा। मैंने भी गर्मजोशी से उससे हाथ मिलाया। तभी बड़ा वाला भी दौड़कर आया और मुझसे हाथ मिलाने लगा। उनकी इस अदा से मुझे भरोसा हो गया कि‍ उन्होंने मुझे अपना पक्का दोस्त मान लिया है। जोर की ‘बाय’ के साथ मैं आगे बढ़ गया। अब मैं मोटरसाइकिल चलाते हुए मुस्करा रहा था और बेसुरे राग में गुनगुना भी रहा था। मुझे महसूस हुआ कि मैं बहुत खुश हूँ। डिप्रेशन गायब हो चुका था।

दो बजे के आसपास मैं घोलतीर पहुंचा। वहां भतीजा मधु और बहू इंतजार कर रहे थे। मेरी पसंद का पहाड़ी खाना और चटनी बनी थी। खाना खाकर, तृप्त होकर मैंने इजाजत ली और उखीमठ के लिए रवाना हो गया। रात उखीमठ से आगे उनियाना में गुजारी। दो सौ रुपये में खाने के साथ साफ-सुथरा कमरा मिल गया था। आज मैं मद्महेश्वर पहुँचना चाहता था। बाहर साफ धूप थी। बाइक से ही रांसी पहुंचा और एक होटल में नाश्ता किया। होटल क्या था दुकांन थी,  जहां सामान के साथ-साथ दुकानदार नाश्ता भी बना रहा था। नाश्ता करने के बाद मैंने उससे कहा की मैं मद्महेश्वर जा रहा हूँ। दो दिन तक मोटरसाइकिल खड़ी करनी है। कहाँ करूं? वह बोला कि‍ दुकान की साइड में चिपका कर खड़ी कर दो। कोई नहीं छेड़ेगा। उसके आश्वासन पर शत-प्रतिशत यकीन कर लिया, क्योंकि‍ वह किसी भी एंगल से नेता मार्का नहीं लग रहा था। मैंने मोटरसाइकिल उसके निदेशित स्थान पर खड़ी की, कवर लगाया और रांसी से गोंडार की ओर पैदल चल पडा़। कुछ दूर तक तो निर्माणाधीन मोटर रोड कटी हुई थी। उसके बाद खच्चर रास्ता था। जंगल धीरे-धीरे मदगंगा नदी की घाटी में उतरने लगा। पेड़ों से घिरा कैंचीदार रास्ता गोंडार की और जा रहा था। मैंने सोचा था कि‍ गोंडार तक का सात किलोमीटर का रास्ता मैं खाने के समय तक तय कर लूंगा। उसके बाद बचे हुए नौ किलोमीटर में से चौथे-पांचवे किलोमीटर पर किसी चट्टी पर रात काटूंगा और अगले दि‍न मद्महेश्वर चला जाऊंगा। गोंडार पहुंचने तक थक गया था। पहले ही ढाबे में पिट्ठू उतारा, अन्दर कोई नहीं था। मैं निराश बाहर निकल ही रहा था, तो देखा कि‍ एक औरत पीठ में लकड़ी लिए अन्दर आ रही है। उसने मुझे देखते हुए कहा, ‘‘टूरिस्ट?’’ मैंने मुंडी हिला कर ‘हाँ’ कहा तो वह बोली, ‘‘चाय पीनी है क्या?’’ मैंने सहमति में सर हिलाया। उसने तुरंत कमर पर धोती लपेटी और चूल्हे पर फूंक मार कर दबी आग को सुलगाया। उस पर पानी की केतली, जिस में पहले से ही पानी गुनगुना था, चढ़ा दी। मैंने पूछा कि‍ खाने के लि‍ए है कुछ तो वह बोली, ‘‘मैगी बना दूं क्या?’’ मैंने मना किया और बिस्कुट के बारे में पूछा। उसने ‘हाँ हैं’ कहा और एक बक्से से बिस्कुट निकाले। बिस्कुट लोकल बने थे और शायद कुछ पुराने ही थे। मैंने ध्यान से बिस्कुट देखे। कहीं भी फंगस नहीं लगी थी। मैंने उनको खाने का रिस्क ले ही लिया। महिला कुछ जल्दी में थी। मुझे चाय और दो अतिरिक्त बिस्कुट थमाते हुए बोली, ‘‘मुझे डंगरों के पास जाना है। चाय पीकर गिलास बाहर रख देना और पंद्रा रुपये चूल्हे के पास रख देना।’’ मैंने मजाक में कहा, ‘‘अगर बिना रखे चला गया तो?’’ वह हंसते हुए बोली, ‘‘किस्मत थ्वोड़ी लिजाला तुम!’’(किस्मत थोडे़ ही ले जाओगे तुम)। वह जाने को हुई तो मैंने उसे रोका और पन्द्रह रुपये दे दिए। उसने पैसे कमर में खोंसे और तेजी से चली गई। आगे के दो-तीन ढाबों में देखा कि‍ महिलाएं अपने पतियों के साथ होटल चलाने में हाथ बंटा रही थीं।

मैं आगे बढ़ गया, पैदल रास्ते में। मेरे आगे दो तीर्थयात्री जो पहाड़ के ही थे, चल रहे थे। पति-पत्‍नी प्रेम से बात शुरू करते, वह बहस में बदल जाती,  फिर लड़ते और गुस्से से चुप हो जाते। थोड़ी देर में फिर बात शुरू करते, फिर-फिर लड़ते और फिर से चुप हो जाते। उनकी बातों में मेरा रास्ता कटने लगा। अचानक मुझे भूख महसूस हुई, तो याद आया कि‍ गोंडार में खाना तो खाया ही नहीं। बिस्कुटों ने मेरी भूख मार दी थी। अब चढा़ई में भूख लगने लगी थी।

कुछ लोग मद्महेश्वर से वापस आ रहे थे। उन लोगों से पूछा तो बताया कि आगे तीन किलोमीटर खाना मिल सकता है। इसी आस में आगे बढ़ा।

अचानक जाने कहाँ से बादल आ गए। मौसम एक दम घिर गया। बादल गरजने लगे थे। मैं तेजी से आगे बढ़ने लगा। तीर्थयात्री अनुभवी महिला बोली, ‘‘बरिस आती है अब!’’ बादलों को मानो उसके कहने का ही इंतजार था! तेज बारिश पड़ने लगी। भाग्य से हमें 50 मीटर की दूरी पर टिन का बना शेल्टर दिखाई दिया। मैं और वह दम्पति दौड़ कर उसमें शरण लेने चले गए। वहां और लोग भी शरण लिए थे। अचानक ओले भी पड़ने लगे। बड़े-बड़े ओले! इतने बड़े ओले मैंने कभी देखे नहीं थे। मैं यह सोच ही रहा था कि‍ अगर हमें यह शेल्टर ना मिला होता तो सर फूटना तय था, तभी दो लोग पहुंचे। वे दौड़ कर आए। एक ने सि‍र पकड़ा हुआ था। शेल्टर में पहुँच कर जैसे ही उसने सि‍र से हाथ हटाया, पानी के साथ सि‍र से खून चहरे पर पहुँच गया। उसे यह चोट ओले से ही लगी थी। मेरे पास बेंड-ऐड थी। मैंने उसे लगाने के लि‍ए बेंड-ऐड दी, पर वह ठीक से चिपकी नहीं। तब तौलिये से उसका से सि‍र बांधा गया।

चारों तरफ ओलों से सफेद हो गया था। बारिश-ओले जिस तेजी से आए, उसी तेजी से बंद भी हो गए। आसमान साफ होने लगा। हम आगे बढे़। थोड़ा चलने के बाद हम उस जगह पहुंचे चट्टी में, जहां खाना मिल सकता था। वहां ताला लगा था। वहां एक लड़का था। उसने बताया कि‍ चट्टीवाला एक घंटे में आएगा। अभी वह बकरी चराने गया है। दम्पति वहीं सुस्ताने लगे। उनके पास कुछ चना चबेना था। उसे निकाल कर खाने लगे।

मेरी समझ में नहीं आया कि‍ मैं क्या करूं। मैंने लड़के से और जानकारी चाही, तो उसने बताया कि‍ आधा किलोमीटर आगे मोखम्बा जगह है। वहाँ खाने को मिल सकता है। अब घंटे भर यहां रुकना बेकार था। मैं मोखम्बा की ओर बढ़ चला।

मेरा लोअर कीचड से लथपथ हो गया था। जूते भी गीले हो गए थे। चलना दुश्‍वार हो रहा था। आधा घंटा चलने के बाद एक पत्थरों का बना छाना जैसा दिखा। मैं समझ गया कि‍ यह ही मोखम्बा है। खाना मिलने की संभावना ने चाल बढ़ा दी और मैं दस मिनट में ही उस छाने के दरवाजे पर था। दरवाजे से झांक कर देखा कि‍ एक लगभग तीस-पैंतीस साल की औरत बैठी कुछ काम कर रही थी। मैंने उससे पूछा, ‘‘खाना मिलेगा?’’ उसने आश्‍चर्य से कहा,  ‘‘इस वक्त?’’  मैंने कहा, ‘‘हाँ,  भूख लगी है।’’ उसने कहा कि‍ खिचड़ी बना सकती हूँ। मैंने जवाब दिया, ‘‘चलेगी, बनाओ।’’ फिर मैं बाहर बैठ गया। लगभग बीस- पच्चीस मिनट बाद उसने कहा, ‘‘अन्दर आ जाओ। खिचड़ी बन गयी है।’’

मैं अन्दर गया। थाली में गरम-गरम खिचड़ी थी। उसमें खूब सारा घी भी था। घी की खुशबू ने भूख और बढ़ा दी। मैं खिचड़ी पर टूट पड़ा। जब कुछ खिचड़ी पेट में पहुँच गई, तो उस महिला से बात करने का ख्याल आया। उसका नाम रंगीली था। पहाड़ के हिसाब से यह कुछ अटपटा,  कम प्रचलित नाम था।

रंगीली मोखम्‍बा चट्टी पर होटल चलाती है। गोंडार की रहने वाली है, जहां उसकी थोड़ी खेती है। पति का देहावसान चार-पांच साल पहले हो गया। रंगीली ने जमाने के हालत देखते हुए साथ रहने के लिए अपनी माँ को बुला लिया। माँ आज गोंडार वापस गई हुई थी। रंगीली की एक बेटी है। रंगीली तो अनपढ़ है और उसके वैधव्य ने उसे शिक्षा के महत्व को जता दिया है। इसलिए रंगीली को बेटी के भविष्य की चिंता है। 12वीं पढ़ने के बाद बेटी आगे पढ़ना चाहती थी। इसलिए उसे गुप्तकाशी कॉलेज में भेज दिया। बेटी के भविष्य की खतिर उसने बेटी को पढ़ने भेज तो दिया, पर अब साल का चालीस-पचास हजार का खर्चा भारी पड़ रहा है। इसीलिए उसने इस सुनसान जगह, जहां उसका पहले सिर्फ गाय पालने का ग्रीष्मकालीन छाना था, वहां यात्रियों के लिए खाने की व्यवस्था शुरू की। जब एकाध बार थके यात्रियों ने रात रुकने की व्यवस्था के बारे में पूछा तो उसने तथाकथित ढाबे में अपनी मेहनत से एक और कमरा चिन दिया, दो बिस्तर भी रख दिए। अब अगर कोई रहना चाहे तो किराया देकर रात भी काट सकता है। जंगल में वह अकेली अपनी माँ के साथ रहती है इस छाने में, जो अब होटल भी कहलाता है।

रंगीली ने पांच-छह गाय और कुछ बकरियां पाली हैं। उसने जंगल में क्यारियां बनायी हैं, जिनमें वह आलू और अन्य उपज बोती है। दूध सिर्फ एक गाय देती है, बाकि जानवर उसकी क्यारियों के लिए खाद पैदा करते हैं। सर्दियों में अपने गाँव में रहती है, गोंडार के खेतों को जोतती है। बेटी की पढ़ाई के खर्चे को पूरा करने के लिए बकरियों को बेचती है। होटल अतिरिक्त आय है।

पेट भर चुका था। कपड़े गीले थे। इसलिए तय किया कि रात रंगीली के होटल में ही गुजारी जाए। रंगीली को रात के खाने के लिया कहा और यह भी बताया कि रात को उसके होटल में ही रहूंगा। मुझे रंगीली की हिम्मत और कर्मठता ने बहुत प्रेरणा दी थी।

गीले कपडे़ बदल कर मैं बाहर आया। ठण्ड बढ़ गई थी। सि‍र में मैंने गमछा बांध लिया। कल सुबह कोटद्वार से बहुत डिप्रेश चला था। मैं इस वक्‍त अन्दर से बहुत खुश था। कल दो दोस्त दीवान और हयात मिले थे और आज अब ये कर्मठ भुली रंगीली।

परीक्षा : प्रेमपाल शर्मा

Wed, 14/06/2017 - 02:29

मम्मी बंटी को संस्कृत पढ़ा रही हैं- ‘जगद्गुरु शंकराचार्य।’

‘जगद्गुरु कैसे हो सकते हैं? सातवीं सदी में क्या हम अमेरिका जा सकते थे? इंग्लैंड जा सकते थे? तब तो अमेरिका की खोज भी नहीं हुई थी।’ बंटी पढ़ाई शुरू होते ही अड़ जाते हैं।

मम्मी चुप। क्या जवाब दें?

‘अच्छा, तू इधर ध्यान दे। पांच बजने वाले हैं और अभी कुछ भी नहीं हुआ।’ वे अर्थ समझाने लगीं, ‘बत्तीस की उम्र में शंकराचार्य भगवान में लीन हो गए।’

‘लीन हो गए? मतलब?’

‘यानी विलीन हो गए? मर गए।’

‘मम्मी लीन में और विलीन में क्या अंतर है ?’

‘एक ही बात है । यानी ईश्वर में समा गए।’

‘मम्मी आप भी क्या कहती हो ? समा कैसे सकता है कोई ?’

‘तपस्या करते-करते ।’

‘लो, अच्छी तपस्या की । खाना नहीं खाया होगा। फैट्स खत्म हो गई होगी । मर गए बेचारे । पागल हैं ये लोग भी । बेकार मर गए । वरना सत्तर साल जीते ।’

‘मजाल कि आगे बढ़ने दे । गाल बजवा लो, बस । ये क्यों ? वो क्यों ? चुप भी तो नहीं रह सकता । कर इसे खुद । सब बच्चे खुद करते हैं । खुद करेगा तब पता चलेगा ।’ वह चली गईं ।

वार्षिक परीक्षा शुरू होने वाली है बंटी की । वैसे बंटी की कम, मम्मी की ज्यादा ।

‘पापा, ये एग्जाम होली के दिनों में ही क्यों होते हैं ? पिछले साल भी इन्हीं दिनों थे ?’ बंटी परीक्षा से ज्यादा होली की तैयारियों में डूबे हैं । ‘इस बार जिंसी को नहीं छोड़ूगा । कह रही थी कि‍ मैं बहुत सारा रंग लेकर आऊंगी । मम्मी, मैं डालता हूं तो भों-भों करके रोने लगती है ।’

बंटी आहिस्ता-आहिस्ता पैर रखते हुए आया । ‘पापा, एक मिनट आओ।’

‘क्यों ? बोलो ।’

उसने होंठ पर अंगुली रखकर चुप रहने का इशारा किया । पापा पीछे-पीछे चल दिए । कोई रास्ता ही नहीं था । उसने खिड़की की तरफ अंगुली से इशारा किया, फुसफुसाते हुए, ‘उधर देखो ।’

पापा को कुछ दिखाई नहीं दिया । उसने खुद पापा की गर्दन ऊपर-नीचे उठाई-गिराई- ‘वो, वो !’

‘उधर है क्या ?’

‘धीरे । खिड़की के किनारों पर देखो न !’

‘क्या है, बताओ तो ?’

‘गिलहरी के बच्चे । तीन-तीन । देखों कैसे सो रहे हैं ? दिखे ?’

खिड़की के बीच अमरूद का पेड़ था । कई बार झांकने के बाद दिखाई दिए तो पापा की भी आंखें खिल गईं । ‘कैसे मजे से सो रहे हैं ! मैंने तो पहली बार देखे हैं ।’

‘गिलहरी के बच्चे ! हैं ना कितने मजेदार, पापा ! देखो उसकी पूंछ पीछे वाले के मुंह पर आ रही है ।’

तभी पापा को जोर की छींक आई ।

‘धीरे-धीरे, पापा ! लो एक तो जग भी गया । च्च-च्च ! अब ये तीनों भाग जाएंगे । आपको भी अभी आनी थी छींक, पापा !’

पापा चाहते हैं कि कहें कि कहां तक याद किया पाठ, लेकिन उसकी तन्मयता देखकर उनकी हिम्‍मत नहीं हुई ।

मम्मी इधर-उधर तलाश कर रही है बंटी को । देखो, अभी यहीं छोड़कर गई थी रसोई तक । यह लड़का तो जाने क्या चाहता है । इसका जरा भी दीदा लगता हो ? ‘बंटी ….ई….ई….’

उनकी आवाज को मील नहीं तो किलोमीटर तक तो सुना ही जा सकता है । लौट-फिरकर झल्‍लाहट फिर पापा पर, ‘अपनी किताबों में घुसे रहोगे। बताओ न कहां गया ? मुझे संस्कृत खत्म करानी है आज । इसे कुछ भी नहीं आता । तुमसे पूछकर गया था ?’

‘मुझसे पूछकर तो कोई भी नहीं जाता । तुम पूछती हो ?’

‘हां, अब पूछ रही हूं ? बताओ ? हाय राम, मैं क्या करूं ? कल क्या लिखेगा यह टेस्ट में ? इसे कुछ भी तो नहीं आता ।’

‘आ जाएगा । सुबह से तो पढ़ रहा है । दस मिनट तसल्ली नहीं रख सकतीं । बच्चा है । थोड़ी मोहलत भी दिया करो ।’

‘इसे आता होता तो मैं क्यों पीछे पड़ती । संस्कृत को भी कह रहा था कि इसे क्यों पढ़ाते हैं ? क्या होगा इससे ? बीजगणित भी क्यों ? भूगोल भी क्यों ? तो इसे घर में क्यों नहीं बिठा लेते ?’ वह रसोई में लौट गईं ।

‘मम्मी ।’ बंटी की आवाज सुनाई दी ।

‘आ गया न ।’ मम्मी रसोई से बाहर थीं । ‘आओ बेटा !’

लेकिन बंटी कहीं नजर नहीं आया । ‘आ जा, आ जा तू ! तेरी धुनाई न की तो मेरा नाम नहीं है ।’ वह फिर वापस लौट गईं ।

बंटी दीवान के नीचे जमीन पर चिपके थे । इतनी पतली जगह में जहां कोई कल्पना भी नहीं कर सकता था । ‘हमें कोई नहीं ढूंढ सकता और हमने आपकी सारी बातें सुन लीं । पापा से कैसी लड़ाई की आपने ।’

उसकी आंखें पुस्तक पर गड़ी हैं । कुछ लिख रहा है कॉपी में, एक विश्वास के साथ । ‘पापा, वो छोटा-सा कुत्ता था न, वह मर गया ।’ एक पल उसने सिर उठाया और अपने काम में लग गया ? ‘बेचारा गाय की मौत मरा ।’

अब पापा के चौंकने की बारी थी । कुत्ते की मौत तो सुना है, गाय की मौत क्या होती है ? ‘कैसे ?’

‘वैसे ही मरा जैसे गाय मरती है ।’ लंबी-लंबी सांसें ले लेकर । बंटी सांस खींच-खींचकर बताने लगा ।

‘तुमने कहां देखी गाय मरती ?’

‘बहुत सारी । हमारे स्कूल के पीछे जो मैदान है, उसमें उनके मुंह से बड़े झाग निकलते थे । मैं और नारायण रोज देखते थे । पता नहीं वहां कौन-सी चीजें खाकर वे मर जाती थीं । वैटरनरी डॉक्टर भी आते थे। तब भी । वहां तितली भी मरी मिलती थी । अच्‍छा यह बताओ, यह किस चीज का निशान है ?’ उसने कॉपी के अंतिम पन्ने पर छोटा-सा पंजा बना दिया ।

पापा समझे नहीं । पढ़ाई करते-करते अचानक यह कुत्ता, गाय, तितली, निशान कहां से आ गए ?

‘मोर का ! बारिश में मोर के निशान ऐसे ही होते हैं । बहुत मोर भी होते थे स्कूल के पीछे की तरफ ।’

‘बंटी, क्यों गप्पे हांक रहे हो ? कितना काम हुआ है ? मैं आज तुझे खेलने नहीं जाने दूंगी चाहे कुछ भी हो जाए । पापा भी गप्पा मारने को पहुंच गए ।’

पापा-बंटी दोनों धम्म से सीधे होकर बैठ गए ।

‘पापा, मुझे सब फोन पर बहनजी कहते हैं ।’ वह मुस्करा भी रहा था और खुदबदा भी रहा था । ‘बताओ न क्यों ?’

पापा समझे नहीं, ‘बताओ न, क्या हुआ ?’

‘मैंने अभी फोन उठाया तो उधर से आवाज आई- बहनजी नमस्कार । मिश्राजी हैं ? सब ऐसा ही कहते हैं।’

‘तो बहनजी बनने में क्या परेशानी है ?’

बिट्टू ने भी उसका प्रश्न सुन लिया था । ‘पहले मुझसे भी बहनजी कहते थे, फिर मैंने अपनी आवाज मोटी की । अब कोई नहीं कहता ।’

‘हूं ।’ बंटी ने अपनी चिरपरिचित बोली में आवाज निकाली, ‘कैसे ?’

बिट्टू ऐसे किसी उत्तर के लिए तैयार नहीं था । भाग लिया । ‘मैं भी अगले साल टीनेज हो जाऊंगा । तब मुझे कोई बहनजी नहीं कहेगा ।’

‘अब पढ़ेगा भी ! टीनेज हो जाएगा, पर पढ़ना-लिखना आए या न आए ।’ मम्मी की डांट थी ।

‘आपको और कुछ आता है डांटने के सिवाय । जब देखो तब हर समय डांटती रहती हैं ।’

अगली सुबह इतिहास-भूगोल की परीक्षा थी । मां इतिहास में कमजोर है, इसलिए मेरे पास छोड़ गई । हम दोनों को गरियाते हुए- ‘लो, लो इसका टेस्ट । बहुत बड़े इतिहासकार बनते हो ।’ गुस्से, खिसियाहट का लावा जब बहता है तो न तो वह हमारे उत्तर का इंतजार करता है और न हम उत्तर देने की हिम्‍मत करते हैं। बंटी को यह बात पता है । उसके चेहरे से साफ है कि उस पर इसका कोई असर नहीं है । उसे यकीन है कि पापा पर भी नहीं है ।

वह मेरे पास बैठा इतिहास के प्रश्नों के जवाब लिख रहा है । मेरी कई चेतावनियों के बावजूद वह पहले प्रश्न की दूसरी लाइन पर ही खड़ा है ।

‘पापा, टीकू ताऊजी हमारे घर क्यों नहीं आते ?’ उसकी आंखें मेरी आंखों में घुस रही हैं । ‘मैंने तो उन्हें कभी बोलते भी नहीं देखा । बताओ न  ? क्यों नहीं आते ? ’

प्रथम स्वतंत्रता संग्राम उर्फ गदर की विफलता के कारणों में से उसे यह प्रश्न उठा है उत्तर लिखते-लिखते ।

‘फिर बताऊंगा ।’

‘पहले बताओ । आप कभी भी नहीं बताते । ऐसे ही कहते रहते हो, फिर बताऊंगा ! फिर बताऊंगा !’

‘नहीं । इतिहास के पेपर के बाद पक्का ।’ पापा के पास आते ही उसे सबसे पहले मानो यह रटंत पढ़ाई भूलती है । बंटी की भूगोल की किताबें नहीं मिल रही हैं । ऐसा पहली बार नहीं हो रहा । मासिक टेस्ट हो या छमाही, किसी न किसी विषय की किताब तो गायब हो ही जाती है तब तक ।

काफी देर से कोई आवाज नहीं सुनी तो मम्मी भी बेचैन होने लगती हैं। बंटी और इतनी एकाग्रता से पढ़ रहे हों ?

बंटी का चेहरा उतरा हुआ है ।  ‘मम्मी किताब नहीं मिल रही ।’

‘अच्छा, तो तू उसी की खुसर-पुसर में लगा हुआ था ! मैं कहूं कि आज तो बड़े ध्यान से पढ़ रहा है । बंटी, हर बार तुम ऐसा ही करते हो । भइया की किताब तो कभी नहीं खोती । किताब नहीं मिली तो आज तेरी हत्या कर दूंगी ! ढूंढ़ ।’ मम्मी की आवाज में तैरते चाकू की समझ है बंटी में । तुरंत दौड़कर ढूंढ़ने लग गया। डबल बेड के नीचे, सोफे की गद्दियों के नीचे, पुरानी पत्रिकाओं के पीछे । यह सभी उसकी किताबों की जगहें हैं । चप्पे-चप्पे पर । जानकर भी रखता है, अनजाने में भी । उसे जब पता चलेगा कि पापा ने इतिहास के टेस्ट के लिए कहा था तो उस दिन इतिहास की किताब रहेगी, लेकिन अगले दिन नहीं । इतिहास के टेस्ट का मुहूर्त ढलते ही इतिहास की किताब मिल जाएगी, लेकिन भूगोल की गायब । नहीं खोता तो माचिस के ढक्कन, पुराने सेल, चाक, स्टिकर, डब्‍ल्‍यूडब्‍ल्‍यूओ के कार्ड, चॉकलेट के रैपर्स, सचिन तेंदुलकर का चित्र, पिल्लों के गले में बांधी जाने वाली घंटियां ।

‘बंटी, तुम पानी की टंकी की तरफ से मत जाया करो । उधर एक कुत्ता रहता है कटखना । उसने रामचंद्रन की बेटी को काट लिया है ।’

‘कैसे रंग का है, मम्‍मी ?’ बंटी तुरंत दौड़कर आ गया ।

‘काले मुंह का । लाल-सा ।’

‘वो तो मेरा सिताबी है । एक ही आवाज में मेरे पास आ जाता है । उसे तो मैं और एडवर्ड सबसे ज्यादा ब्रेड खिलाते हैं ।’ मां-बेटे दोनों भूल चुके हैं किताब, टेस्ट, चेतावनी ।

‘मैं कहता हूं, तुम नहीं जाओगे उधर । काट लिया तो चौदह इंजेक्शन लगेंगे इतने बड़े-बड़े, पेट में, समझे!’

बंटी पर कोई असर नहीं । उसे अपने दोस्त पर यकीन है ।  ‘मम्मी, वो तो अभी ज्यादा बड़ा नहीं हुआ । कल ऐनी और उसकी फ्रेंड खेल रही थीं, मम्मी ! बड़ा मजा आया । मैंने बुलाया । टीलू टीलू टीलू ! और ऐनी की ओर इशारा कर दिया । बस ऐनी के पीछे पड़ गया । ऐनी भागते-भागते अपने घर में घुस गई ।’ बंटी का चेहरा सुबह के सूर्य-सा खिल उठता है ऐसी हरकतों के विवरण बताते वक्त ।

मम्मी को शादी में जाना है । मम्मी के तनाव मम्मी के किसिम के ही हैं । पहले इस पक्ष में सोचती रहीं कि साथ ही ले जाती हूं बंटी को । कुछ खा-पी भी लेगा । मस्‍ती कर लेगा तो कल पढ़ाई भी करा लूंगी ।  ‘लेकिन, लेकर तभी जाऊंगी, जब तुम ये, ये काम कर लोगे ।

बंटी चुप रहा । जैसे कोई वास्ता ही न हो इस बात से ।

‘सुना कि नहीं ? जब तक टेस्ट नहीं होंगे तब तक नहीं ले जाऊंगी । और लिखित में लूंगी ।’

उसने ऐन वक्‍त पर मना कर दिया ।  ‘मैं नहीं जाता । कौन जाए बोर होने के लिए ।’ पापा ने भी समझाया पर नहीं माना ।  ‘मैं पढ़ता रहूंगा ।’ यह और जोड़ दिया ।

अब आप क्या करेंगे ? मम्मी की सारी योजनाएं धरी की धरी रह गईं । वह जाने की तैयारी कर रही हैं । बालों को धो रही हैं, पोंछ रही हैं और बीच-बीच में बंटी को आकर देख जाती हैं– पढ़ रहा है या नहीं ? ऐसे छोड़ते वक्त उनकी चिंता और चार गुना ज्यादा हो जाती है । बंटी को जन्म-भर को काफी उपदेश, हिदायतें देंगी । बंटी पूरी तन्‍मयता से मेज पर बैठे हैं । उस्‍ताद की तरह । उसे पता है, इधर मम्मी बाहर, उधर वह । छह बज गए और मम्मी अभी तक नहीं गईं । बंटी उठे और मम्‍मी के सामने थे । ‘मम्मी, क्या कर रही हो ? कैसी बदबू आ रही है ?’

मम्‍मी क्‍या जवाब दें बच्‍चे की प्रतिक्रिया का ।

‘मम्मी, हमारी अंग्रेजी वाली मैम के पास आप चले जाओ तो बदबू के मारे नाक फट जाए । जाने कितने तरह का इत्र लगाकर आती हैं । एक दिन उन्‍होंने मुझे कहा कि मेरी मेज की ड्रार से किताब ले आओ । मम्मी, सुनो तो । उसमें इतनी चीजें थीं – फेयर एंड लवली, पाउडर, लिपस्टिक, जाने क्या-क्या । मम्मी, ये स्कूल में क्यों रखती हैं ये सारी चीजें ?’

गाल रगड़ती मम्मी का मानो दम सूखता जा रहा है ।  ‘अब तू मुझे तैयार भी होने देगा ? तूने काम कर लिया ?’

‘अभी करता हूं न । मैंने आपको बता दिया न । मम्मी ! क्यों लगाती हैं वे इतनी चीजें ?’

‘तुझे अच्‍छी नहीं लगतीं ?’

बंटी चुप । क्या जवाब दे ?

‘तेरी बहू लगाया करेगी, तो….’

‘मुझे सबसे अच्छी सविता सिंह मैडम लगती हैं । उनसे बिलकुल बास नहीं आती ।’

पढ़ने को छोड़कर उसे सारी बातें अच्छी लगती हैं ।

‘मम्‍मी, हमारी क्‍लास में एक लड़की है । वह भी 15 मार्च को पैदा हुई थी । मैं भी ।’

अगले दिन पूछ रहा था । ‘मैं 12 बजे पैदा हुआ था न ? वो साढ़े बारह बजे हुई  थी ।’

‘तू सवा बारह बजे हुआ था ।’

‘हूं ! तब भी मैं 15 मिनट बड़ा तो हुआ ही न ।’

इस हिसाब में उससे कोई गड़बड़ नहीं होती । गड़बड़ होती है तो स्कूल की किताबों के गणित से । ‘पापा, ये बीजगणित क्यों पढ़ते हैं ? क्या होता है इससे ?’ बंटी प्रसन्नचित्‍त मूड में था । शायद पापा भी ।

‘बेटा, हर चीज काम की होती है । कुछ आज, कुछ आगे कभी ।’

‘कैसे ?’

‘जैसे जो आप लाभ-हानि परसेंट के सवाल करते हो, उससे आपको बाजार में तुरंत समझ में आ जाता है कि कितना कमीशन मिलेगा ? कौन-सी चीज सस्ती है, महंगी है । बैंक में ब्याज-दर आदि । तुरंत फायदा हुआ न ? बीजगणित तब काम आएगा, जब बड़ी-बड़ी गणनाएं करोगे, जैसे पृथ्वी से चांद की दूरी, ध्वनि का वेग, आइंस्टाइन का फार्मूला…..’

बंटी की समझ में सिर्फ पहली बात ही आई है, दूसरी नहीं । चुपचाप काम में लग गया । इसलिए भी कि इससे ज्यादा प्रश्‍नों पर पापा-मम्मी चीखकर, डांटकर चुप करा देते हैं । थोड़ी देर बाद उसने फिर चुप्पी तोड़ी, ‘और पापा, किसी को यह सब नहीं पता करना हो तो उसके क्या काम आएगा यह सब ?’

पापा के पास कोई जवाब नहीं है । ‘अब तुम पहले अपना होमवर्क पूरा करो ।’

बीजगणित में फेक्‍टर्स की एक्‍सरसाइज थी । पहले प्रश्‍न पर ही अटका पड़ा है ।

‘जब तुम्हें आता नहीं तो पूछते क्यों नहीं ? बोलो, हमारी परीक्षा है या तुम्‍हारी ?’ तड़ातड़ कई चांटे पड़ गए पापा के ।

बाल पकड़कर बंटी को झिंझोड़ डाला ।  ‘खबरदार ! जो यहां से हिला भी, जब तक ये सवाल पूरे नहीं हो जाते । चकर-चकर प्रश्न करने के लिए अक्‍ल कहां से आ जाती है ? जो सांस भी निकाली तो हड्डी तोड़ दूंगा ।’

पापा छत पर टहल रहे हैं- अपराधबोध में डूबे । क्यों मारा ? क्या मारने से पढ़ाई बेहतर होगी ? और इतनी दुष्टता से !  कहीं आंख पर चोट लग जाती तो ? वह जल्दी रोता नहीं है । लेकिन आज कितना बिलख-बिलखकर रोया था ।

‘मैथ्स, मैथ्स, मैथ्स ! क्या मैं मर जाऊं ? शाम को पांच बजे से आठ बजे तक मैं पढ़ता हूं कि नहीं ? बैडमिंटन नहीं जाना, नहीं गया । कंप्यूटर मत जाओ, वहां नहीं जाता । क्या दुनिया के सारे बच्चे एक जैसे होते हैं? आपको भी तो कुछ नहीं आता होगा ? मारो ! मारो ! मेरी गरदन क्यों नहीं काट लेते !’

बार-बार उसका चेहरा आंखों में उतर रहा है- आंसुओं से लथपथ । डरा हुआ-सा । जल्दी उठकर पढ़ने में लगा है । अलार्म लगाकर सोया था । सुबह के भुकभुके में बरामदे से बंटी की आवाज आई, ‘पापा ! देखो चांद।’

पापा अभी भी उसकी परीक्षा के बारे में सोच रहे थे उठकर उसके पास पहुंचे ।

‘इधर देखो, इधर पापा ! कितना बड़ा है । पेड़ों के बीच । सीनरी ऐसी ही होती है । मैं भी बनाऊंगा ऐसी । एग्जाम के बाद ।’

कोई नहीं कह सकता कि रात को बंटी की पिटाई हुई है और आज उसकी परीक्षा है ।

आनंद कुरेशी के कहानी संग्रह ‘औरतखोर’ का लोकार्पण

Tue, 06/06/2017 - 02:21

डूंगरपुर: बहुत सा श्रेष्ठ साहित्य भी विभिन्न कारणों से पाठकों तक पहुँच नहीं पाता। आनंद कुरेशी जैसे कथाकार को भी व्यापक हिन्दी पाठक वर्ग तक पहुंचाने के लिए हम सबको प्रयास करने होंगे। हिन्दी के प्रसिद्ध लेखक असग़र वजाहत ने डूंगरपुर के दिवंगत लेखक आनंद कुरेशी के ताजा प्रकाशित कहानी संग्रह ‘औरतखोर’ के लोकार्पण समारोह में कहा कि डूंगरपुर आकर उन्हें साहित्य की ऐसी गोष्ठियों की अर्थवत्ता का फिर से गहरा अहसास हुआ है। श्रोताओं के सवालों का जवाब देते हुए उन्होंने कहा कि साहित्य के भी अनेक स्तर होते हैं। आवश्यक नहीं कि लोकप्रिय समझे जाने वाले साहित्य का पाठक आगे जाकर गंभीर साहित्य का पाठक नहीं हो सकता। उन्होंने एक अन्य सवाल का जवाब देते हुए कहा कि श्रेष्ठ साहित्य मुद्दों की पहचान से ही नहीं बनता। इसके लिए अनेक कारक जिम्मेदार होते हैं। जिला पुस्तकालय के सभागार में हुए इस समारोह में राजस्थान विश्वविद्यालय की सहायक आचार्य  डॉ रेणु व्यास ने आनंद कुरेशी जी के संस्मरण सुनाए तथा पूना विश्वविद्यालय की डॉ शशिकला राय के कुरेशी की कहानी कला पर लिखे आलेख का वाचन किया। कुरेशी के अभिन्न मित्र और शायर इस्माइल निसार ने भावुक होकर कहा कि कुरेशी जी के साथ व्यतीत आत्मीय पलों को शब्दों में बयान कर पाना उनके लिए संभव नहीं है। वागड़ विभा के सचिव सत्यदेव पांचाल ने कहा कि आनंद कुरेशी जी आज भी अपनी कहानियों के माध्यम से जीवित हैं, जो बताता है कि साहित्यकार कभी नहीं मरता। पांचाल ने कहा कि कुरेशी जैसे लेखक हमारे लिए सदैव प्रेरणा स्रोत रहेंगे। चित्तौडगढ़ से आए कुरेशी जी के मित्र और ‘औरतखोर’ के सम्पादक डॉ. सत्यनारायण व्यास ने कहा कि अपने अभिन्न मित्र के बारे में बात करना जैसे अपने ही बारे में बात करना है। उन्होंने कुरेशी को याद करते हुए कहा कि उनका स्वाभिमान राजहंस की तरह गर्दन उठाए रहता है। स्थानीय महावि‍द्यालय में हिन्दी प्राध्यापक डॉ. हिमांशु पंडया ने सत्तर के दशक के एक हिन्दी कहानीकार की व्यापक जागरूकता को रेखांकित करते हुए कहा कि ऐसी दोस्तियाँ और साहित्यिक अड्डेबाजी बची रहनी चाहिए ताकि आनंद कुरेशी जैसे कई लेखक इस शहर को पहचान दिलाएं।

इससे पहले प्रो. असग़र वजाहत, उदयपुर विश्वविद्यालय के पूर्व आचार्य नवल किशोर, कवि-समालोचक डॉ. सत्यनारायण व्यास, वागड़ विभा के सचिव और स्थानीय कवि सत्यदेव पांचाल तथा दिल्ली से प्रकाशित साहित्यिक पत्रिका ‘बनास जन’ के सम्पादक डॉ. पल्लव ने आनंद कुरेशी के ताजा प्रकाशित कहानी संग्रह ‘औरतखोर’ का  लोकार्पण किया। डॉ. पल्लव ने मंच पर मौजूद सभी साहित्यकारों का सारगर्भित परिचय देते हुए कहा कि आनंद कुरेशी जैसे लेखक एक शहर, अंचल या राज्य की नहीं अपितु समूचे साहित्य की धरोहर होते हैं। कुरेशी जी के सुपुत्रों  हरदिल अजीज और इसरार ने आयोजन में अपने परिवार की तरफ से आभार दर्शाया।

अध्यक्षता कर रहे प्रो. नवल किशोर ने कहा कि हार एक सापेक्ष शब्द है। आनंद कुरेशी जिन्दगी की लड़ाई हार गए, पर लेखकीय जीवन में नहीं। आनंद कुरेशी को उन्होंने अभावग्रस्त समाज के लिए संघर्ष करने वाला लेखक बताते हुए कहा कि उनके जैसे लेखकों को आगे लाना चाहिए, जो अन्याय व अत्याचार का विरोध करने का साहस दर्शाते हैं। उन्होंने कहा कि आज संचार माध्यमों में शुद्ध मनोरंजन परोसा जा रहा है, जो मनुष्य को सोचने को विवश नहीं करता। प्रो. नवल किशोर ने कुरेशी की कुछ चर्चित कहानियों का भी उल्लेख किया। संयोजन प्रसिद्ध कहानीकार दिनेश पांचाल ने किया और अंत में कवि जनार्दन जलज ने धन्यवाद ज्ञापन किया। आयोजन में राजकुमार कंसारा, चंद्रकांत वसीटा, मधुलिका, हर्षिल पाटीदार, हीरालाल यादव, डॉ कपिल व्यास, प्रज्ञा जोशी, चन्द्रकान्ता व्यास तथा हेमंत सहित शहर अनेक साहित्य प्रेमी उपस्थित थे।

प्रस्तुति‍ : डॉ कपिल व्यास

सरकारी शिक्षा का भस्मासुर :  महेश पुनेठा

Sat, 03/06/2017 - 23:33

महेश पुनेठा

शिक्षा अधिकार अधिनियम 2009 आने के बाद देश भर से लगातार सरकारी स्कूलों के बंद होने की खबर आ रही हैं। महाराष्ट्र, गुजरात, राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, उत्तराखंड सहित देश के विभिन्न राज्यों में अब तक हजारों सरकारी स्कूल बंद किए जा चुके हैं। सरकारी स्कूलों में प्रवेश लेने वाले बच्चों की संख्या साल दर साल घटती जा रही है। सरकारी स्कूलों के प्रति विश्‍वास लगातार कम होता जा रहा है। यही सिलसिला जारी रहा तो आने वाले पांच-सात सालों के भीतर सरकारी प्राथमिक स्कूलों की संख्या अँगुलियों में गिने जाने लायक रह जाएगी।

इसके पीछे सबसे बड़ा और तात्कालिक कारण है- शिक्षा अधिकार अधिनियम-09 के अंतर्गत 25 प्रतिशत वंचित वर्ग के बच्चों को निजी विद्यालयों में प्रवेश देने सम्बन्धी प्रावधान है। इसने सरकारी प्राथमिक विद्यालयों में जनता के रहे-सहे विश्वास को भी ख़त्म करने का काम किया है। यह प्रावधान सरकारी शिक्षा के लिए भस्मासुर बन चुका है। उल्लेखनीय है कि इस क़ानून के अंतर्गत व्यवस्था है कि प्रत्येक निजी विद्यालय अपनी कुल छात्र संख्या के 25 प्रतिशत वंचित वर्ग के बच्चों को प्रवेश देगा, जिनका शुल्क राज्य सरकार द्वारा उस विद्यालय के खाते में जमा कर दिया जाएगा। ऐसा नहीं है कि इससे पहले अभिभावकों में निजी स्कूलों के प्रति आकर्षण नहीं था। पिछले लम्बे समय से निजी स्कूलों में बच्चों को पढ़ाना स्टेटस सिम्बल बन चुका है। लेकिन उक्‍त प्रावधान का सबसे बड़ा सन्देश यह जा रहा है कि सरकारी स्कूलों से अच्छी शिक्षा निजी स्कूलों में दी जा रही है इसलिए सरकार भी बच्चों को वहां भेजने को प्रोत्साहित कर रही है। इस प्रकार पहले से कमतर शिक्षा का आरोप झेल रहे सरकारी स्कूलों में स्वयं सरकार ने कमतरी की मुहर लगा दी है। जब सरकार स्वयं यह स्वीकार कर रही हो तो भला कोई क्यों अपने बच्चों को कमतर स्कूलों में डालना चाहेगा और जब सरकार निजी स्कूल में पढ़ाने का खर्चा देने को तैयार हो तो फिर भला कोई क्यों अपने बच्चों को सरकारी स्कूल में डालेगा। सरकार ने बहुत चालाकी से शिक्षा के निजीकरण का रास्ता प्रशस्त कर दिया है। बहुत जल्दी ही सरकार गरीब बच्चों को वाउचर थमाकर सार्वजनिक शिक्षा की जिम्मेदारी से मुक्त हो जाएगी। वह दिन दूर नहीं जब दूर-दराज के गांवों में ऐसे निजी स्कूल खुल जाएंगे, जहाँ 75 प्रतिशत बच्चों से भारी-भरकम शुल्क वसूल किया जाएगा और 25 प्रतिशत बच्चों का सरकार से वाउचर प्राप्त किया जाएगा। निजी स्कूलों की पाँचों अंगुलियाँ घी में होंगी। इसका सबसे अधिक बुरा प्रभाव वंचित/दलित वर्ग के बच्चों पर पड़ना है, क्योंकि वर्तमान में सरकारी स्कूलों में सबसे अधिक बच्चे इसी वर्ग के पढ़ रहे हैं। आज जहाँ इसके शत-प्रतिशत बच्चे निशुल्क शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं, वहां सरकारी स्कूल बंद होने के बाद केवल 25 प्रतिशत ही निशुल्क शिक्षा प्राप्त कर पाएंगे। उनके साथ भी भेदभाव होने की आशंका अलग से रहेगी। जैसा कि जो बच्चे अभी सरकारी खर्चे से निजी स्कूलों में जा रहे हैं, उनके बारे में समय-समय पर भेदभाव की ख़बरें सुनने को मिलती रहती हैं। बताया जाता है कि बहुत सारे निजी स्कूलों ने उनकी एक अलग कैटेगरी बना दी है। एक आशंका और है- वंचित/दलित वर्ग के बच्चों का शिक्षण शुल्क तो सरकार देगी, लेकिन निजी स्कूलों द्वारा शिक्षण शुल्क के अलावा आए दिन लिए जाने वाले शुल्कों का क्या होगा? ये ऐसे शुल्क हैं, जिन्होंने मध्यवर्ग के नाक पर ही दम किया है, गरीब वर्ग इनको कैसे वहन करेगा? जहाँ तक शिक्षा का सवाल है, सच कहा जाए तो निजी स्कूलों में भी भाषा-गणित और विज्ञान जैसे विषयों को मात्र रटाया जा रहा है। सच्चे अर्थों में जिसे शिक्षा कहा जाता है, जो एक संवेदनशील, विवेकवान और जिम्मेदार नागरिक बनाती है, उससे निजी स्कूल कोसों दूर हैं। बावजूद इसके उन्हें ही मानक माना जा रहा है।

कैसी विडंबना है कि एक ओर वाउचर देकर बच्चों को निजी स्‍कूलों में भेजने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है तथा दूसरी ओर सरकारी स्कूल के शिक्षकों से पूछा जा रहा है कि उनके स्कूलों में छात्र संख्या कम क्यों हो रही है ? प्रकारांतर से उन्हें  इस बात के लिए जिम्मेदार ठहराया जा रहा है। जबकि हकीकत यह है कि शिक्षक से सारे काम खूब करवा जा रहे हैं और उसके मूल काम से उसको दूर किया जा रहा है। गलत सरकारी नीतियों ने सरकारी स्कूलों और शिक्षकों के प्रति इतना अधिक अविश्‍वास पैदा कर दिया है कि जिन सरकारी स्कूलों में बहुत अच्छी पढा़ई भी हो रही है, वहां भी आज अभिभावक अपने बच्चों को भेजने के लिए तैयार नहीं हैं। उक्त प्रावधान के आने से पहले तक गरीब परिवार के बच्चे तो सरकारी स्कूलों में आते थे, लेकिन अब उन्हें भी निंजी स्कूलों में बच्चे पढ़ाने के झूठे गौरव में डुबाया जा रहा है। होना यह चाहिए था कि सरकार निजी स्‍कूलों में पढ़ने वाले बच्चों को भी सरकारी स्कूलों में आने के लिए प्रोत्साहित करती। उन कमियों को दूर किया जाता, जिनके चलते सरकारी स्कूलों की गुणवत्ता में कमी आ रही है, लेकिन हो उसका उल्टा रहा है।

वरिष्ठ शिक्षाविद योगेश बहुगुणा का यह कहना सही है कि  सरकारी स्कूलों की जो दुर्दशा है, उन्हें देखकर तो गरीब से गरीब आदमी भी वहां अपने बच्चों को भर्ती नहीं करना चाहेगा। अपवादस्वरूप कुछ अच्छे स्कूल हो सकते हैं। लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि इस दुर्दशा के मूल कारणों को दूर करने के ईमानदार प्रयास अभी तक नहीं किए गए। सुधार के नाम पर जड़ का इलाज करने के बजाय उसके तनों को काटने-छांटने और सींचने की नौटंकी ही अधिक की जाती रही है। शिक्षा अधिनियम-2009 में कुछ अच्छे प्रावधान भी हैं। जैसे- हर स्कूल में पूर्ण प्रशिक्षित शिक्षक, पुस्तकालय, प्रयोगशाला, खेल का मैदान, पर्याप्त कक्षा-कक्ष आदि, लेकिन आठ साल गुजरने को हैं इनकी ओर कोई विशेष ध्यान नहीं दिया गया। आज भी कमोबेश वही स्थित है जो इस अधिनियम के आने से पहले थी। छात्र-शिक्षक मानक के आधार और शिक्षकों को गैर शिक्षण कार्यों से मुक्त करने की मांग हमेशा से की जाती रही है, पर इस ओर कोई ध्यान नहीं दिया जाता है।

आश्चर्य होता है कि‍ सरकारी शिक्षा को ख़त्म करने की इतनी गहरी चाल चली गयी है, लेकिन कहीं से कोई विरोध की आवाज नहीं सुनाई दे रही है। औरों की तो छोडिये शिक्षक संगठन भी इस पर चुप्पी साधे हुए हैं। उनके अधिवेशनों में भी इस पर कोई खास चर्चा नहीं होती है। और यदि कोई शिक्षक इस पर बात करता है, तो उसे अजीब सी नज़रों से देखा जाता है। कह दिया जाता है कि‍ यह हमेशा ऐसी ही नकारात्मक बात करता है। वरिष्ठ शिक्षाविद अनिल सदगोपाल के नेतृत्व में ‘अखिल भारतीय शिक्षा अधिकार मंच’ इस मुद्दे पर लगातार मुखर विरोध करता रहा है। इस बारे में अनिल सदगोपाल ने खूब लिखा भी है लेकिन बहुसंख्यक लोग उसे अनसुना करते रहे हैं। यह स्थिति बहुत चिंताजनक है। इसे देखकर तो लगता है कि आज अगर सरकार एक झटके में सार्वजनिक शिक्षा के निजीकरण की घोषणा भी कर दे तो कहीं कोई ख़ास हलचल नहीं होने वाली है। इस स्थिति के लिए देशी-विदेशी बाजारवादी शक्तियां पिछले पच्चीस वर्षों से वातावरण बनाने में लगी हुई हैं क्योंकि शिक्षा आज मुनाफे का सबसे बड़ा क्षेत्र है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि सार्वजनिक शिक्षा के निजीकरण से न केवल गरीब वर्ग के बच्चों की शिक्षा पर संकट आएगा, बल्कि स्थायी रोजगार का एक बड़ा क्षेत्र भी समाप्त हो जाएगा।

फिर क्या हुआ: अनवर सुहैल

Thu, 01/06/2017 - 02:15

अनवर सुहैल

लोग मुझसे अक्सर पूछते हैं कि फिर सनूबर का क्या हुआ…

आपने उपन्यास लिखा और उसमें यूनुस को तो भरपूर जीवन दिया। यूनुस के अलावा सारे पात्रों के साथ भी कमोबेश न्याय किया। उनके जीवन संघर्ष को बखूबी दिखाया, लेकिन उस खूबसूरत प्यारी सी किशोरी सनूबर के किस्से को अधबीच ही छोड़ दिया।

क्या समाज में स्त्री पात्रों का बस इतना ही योगदान है कि कहानी को ट्विस्ट देने के लिए उन्हें प्रकाश में लाया गया और फिर जब नायक को आधार मिल गया तो भाग गए नायक के किस्से के साथ। जैसा कि अक्सर फिल्मों में होता है कि अभिनेत्रियों को सजावटी रोल दिया जाता है।

अन्य लोगों की जिज्ञासा का तो जवाब मैं दे ही देता, लेकिन मेरे एक पचहत्तर वर्षीय प्रशंसक पाठक का जब मुझे एक पोस्ट कार्ड मिला कि बरखुरदार, उपन्यास में आपने जो परोसना चाहा बखूबी जतन से परोसा…लेकिन नायक की उस खिलंदड़ी सी किशोरी प्रेमिका ‘सनूबर’ को आपने आधे उपन्यास के बाद बिसरा ही दिया। क्या सनूबर फिर नायक के जीवन में नहीं आई  और यदि नहीं आई तो फिर इस भरे-पूरे संसार में कहाँ गुम हो गई सनूबर….
मेरी कालेज की मित्र सुरेखा ने भी एक दिन फोन पर याद किया और बताया कि कालेज की लाइब्रेरी में तुम्हारा उपन्यास भी है। मैंने उसे पढ़ा है और क्या खूब लिखा है तुमने। लेकिन यार, उस लड़की ‘सनूबर’ के बारे में और जानने की जिज्ञासा है।
वह मासूम सी लड़की ‘सनूबर’…तुम तो कथाकार हो, उसके बारे में भी क्यों नहीं लिखते। तुम्हारे अल्पसंख्यक-विमर्श वाले कथानक तो खूब नाम कमाते हैं,  लेकिन क्या तुम उस लड़की के जीवन को सजावटी बनाकर रखे हुए थे या उसका इस ब्रह्माण्ड में और भी कोई रोल था…क्या नायिकाएं नायकों की सहायक भूमिका ही निभाती रहेंगी..?
मैं इन तमाम सवालों से तंग आ गया हूँ और अब प्रण करता हूँ कि सनूबर की कथा को ज़रूर लिखूंगा…वाकई कथानक में सनूबर की इसके अतिरिक्त कोई भूमिका मैंने क्यों नहीं सोची थी कि वो हाड-मांस की संरचना है…मैंने उसे एक डमी पात्र ही तो बना छोड़ा था। क्या मैं भी हिंदी मसाला फिल्मों वाली पुरुष मानसिकता से ग्रसित नहीं हूँ, जिसने बड़ी खूबसूरती से एक अल्हड पात्र को आकार दिया और फिर अचानक उसे छोड़ कर पुरुष पात्र को गढने, संवारने के श्रम लगा दिया।
मुझे उस सनूबर को खोजना होगा…वो अब कहाँ है, किस हाल में है…क्या अब भी वो एक पूरक इकाई ही है या उसने कोई स्वतंत्र इमेज बनाई है ?

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तब पंद्रह वर्षीय सनूबर कहाँ जानती थी कि उसके माँ-बाप उसे जमाल साहब के सामने एक उत्पाद की तरह प्रस्तुत कर रहे हैं। हाँ, उत्पाद ही तो थी सनूबर…विवाह-बाज़ार की एक आवश्यक उत्पाद…एक ऐसा उत्पाद जिसका मूल्य कमसिनी में ही अधिकतम रहता है…जैसे-जैसे लडकी की उम्र बढ़ती जाती है, उसकी कीमत घटती जाती है। सनूबर की अम्मी के सामने अपने कई बच्चों की ज़िन्दगी का सवाल था। सनूबर उनकी बड़ी संतान है…गरीबी में पढा़ई-लिखाई कराना भी एक जोखिम का काम है। कौन रिस्क लेगा। जमाना ख़राब है कितना..ज्यादा पढ़ लेने के बाद बिरादरी में वैसे पढ़े-लिखे लड़के भी तो नहीं मिलेंगे?

चील-गिद्धों के संसार में नन्ही सी मासूम सनूबर को कहीं कुछ हो-हुआ गया तो कहीं मुंह दिखाने लायक नहीं रहेंगे। फिर उसके बाद और भी तो बच्चे हैं। एक-एक करके पीछा छुडा़ना चाह रही थीं सनूबर की अम्मी।

सनूबर की अम्मी अक्सर कहा करतीं–“ जैसे भिन्डी-तुरई..चरेर होने के बाद किसी काम की नहीं होती, दुकानदार के लिए या किसी ग्राहक के लिए..कोई मुफ्त में भी न ले..ऐसे ही लड़कियों को चरेर होने से पहले बियाह देना चाहिए…कम उमिर में ही नमक रहता है उसके बाद कितना स्नो-पाउडर लगाओ, हकीकत नहीं छुपती…!”

सनूबर की अम्मी जमाल साहब के सामने सनूबर को अकारण डांटती और जमाल साहब का चेहरा निहारती। इस डांटने-डपटने से जमाल साहब का चेहरा मुरझा जाता। जैसे- यह डांट सनूबर को न पड़ी हो, बल्कि जमाल साहब को पड़ी हो। यानी जमाल साहब उसे मन ही मन चाहने लगे हैं।
जमाल साहब का चेहरा पढ़ अम्मी खुश होतीं और सनूबर से चाय बनाने को कहती या शरबत लाने का हुक्म देतीं।
कुल मिलाकर जमाल साहब अम्मी की गिरफ्त में आ गये थे।
बस एक ही अड़चन थी कि उन दोनों की उम्र में आठ-दस बरस का अंतर था।
सनूबर की अम्मी तो आसपास के कई घरों का उदाहरण देतीं, जहां पति-पत्नी की उम्र में काफी अंतर है। फिर भी जो राजी-ख़ुशी जीवन गुज़ार रहे हैं।
ऐसा नहीं है कि सनूबर यूनुस की दीवानी है….या उसे शादी-बियाह नहीं करवाना है।
यूनुस जब तक था, तब तक था….वो गया और फिर लौट के न आया…
सुनने में आता कि कोरबा की खुली खदानों में वह काम करता है। बहुत पैसे कमाने लगा है और अपने घरवालों की मदद भी करने लगा है।
यूनुस ने अपने खाला-खालू को जैसे भुला ही दिया था। यह तो ठीक था, लेकिन सनूबर को भूल जाना उसे कैसे गवारा हुआ होगा। वही जाने…
सनूबर तो एक लड़की है…लडकी यानी पानी…जिस बर्तन में ढालो वैसा आकार ग्रहण कर लेगी।
सनूबर तो एक लड़की है। लड़की यानी पराया धन, जिसे अमानत के तौर पर मायके में रखा जाता है और एक दिन असली मालिक ढोल-बाजे-आतिशबाजी के साथ आकर उस अमानत को अपने साथ ले जाते हैं।
सनूबर इसीलिए ज्यादा मूंड नही खपाती- जो हो रहा है ठीक हो रहा है, जो होगा ठीक ही होगा।
आखिर अपनी माँ की तरह उसका भी कोई घर होगा, कोई पति होगा, कोई नया जीवन होगा।

हर लडकी के जीवन में दोराहे आते हैं। ऐसे ही किसी दोराहे पर ज्यादा दिन टिकना उसे भी पसंद नहीं था। क्या मतलब पढा़ई-लिखाई का, घर में माहौल नहीं है। स्कूल भी कोई ऐसा प्रतिस्पर्धा वाला नहीं कि जो बच्चों को बाहरी दुनिया से जोड़े और आगे की राह दिखलाए। सरकारी स्कूल से ज्यादा उम्मीद क्या रखना। अम्मी-अब्बू वैसे भी लड़की जात को ज्यादा पढा़ने के पक्षधर नहीं हैं। लोक-लाज का डर और पुराने खयालात- लड़कियों को गुलाबी उम्र में सलटाने वाली नीति पर अमल करते हैं।बस जैसे ही कोई ठीक-ठाक रिश्ता जमा नहीं कि लड़की को विदा कर दो। काहे घर में टेंशन बना रहे। हाँ, लड़कों को अच्छे स्कूल में पढा़ओ और उन पर शिक्षा में जो भी खर्च करना हो करो।
अब वो जमाल साहब के रूप में हो तो क्या कहने। साहब-सुह्बा ठहरे।अफसर कालोनी में मकान है उनका। कितने सारे कमरे हैं ।दो लेट्रिन-बाथरूम हैं। बड़ा सा हाल और किचन कितना सुविधाजनक है।
सनूबर का क्वार्टर तो दो कमरे का दडबा है। उसी में सात-आठ लोग ठुंसे पड़े रहते हैं। आँगन में बाथरूम के नाम पर एक चार बाई तीन का डब्बा, जिसमे कायदे से हाथ-पैर भी डुलाना मुश्किल।
यदि ये शादी हो जाती है तो कम से कम उसे एक बड़ा सा घर मिल जाएगा।
घूमने-फिरने के लिए कार और इत्मीनान की ज़िन्दगी।
इसलिए सनूबर भी अपनी अम्मी के इस षड्यंत्र में शामिल हो गई कि उसकी शादी जमाल साहब से हो ही जाये।

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ये अलग बात है कि उसे यूनुस पसंद है।
सनूबर का कजिन यूनुस…
सनूबर अपनी अम्मी की इसीलिए कद्र नही करती कि उनकी सोच का हर कोण सनूबर की शादी की दिशा में जाता है। अम्मी हमेशा बच्चियों की शादी के लिए अब्बू को कोसती रहती हैं कि वे काहे नहीं इतना कमाते कि बच्चियों के लिए गहने-जेवर ख़रीदे जाएँ, जोड़े जाएँ…फिक्स्ड डिपोजिट में रकम जमा की जाए और नाते-रिश्तेदारों में उठे-बैठें ताकि बच्चियों के लिए अच्छे रिश्ते आनन-फानन मिल जाएँ।
लड़कियों के बदन का नमक ख़त्म हो जाए तो रिश्ता खोजना कितना मुश्किल होता है, ये वाक्य सनूबर अम्मी के मुख से इतना सुन चुकी है कि उसने अपने बदन को चखा भी एक बार और स्वाद में बदन नमकीन ही मिला।
इसका मतलब कि‍ उम्र बढ़ने के साथ लड़कियों के बदन में नमक कम हो जाता होगा।
इस बात की तस्दीक के लिए उसने खाला की लड़की के बदन को चाट कर देखा था। उसके तो तीन बच्चे भी है और उम्र यही कोई पच्चीस होगी, लेकिन उसका बदन का स्वाद नमकीन था।
एक बार सनूबर ने अम्मी के बदन को चाट कर देखा। वह भी नमकीन था। फिर अम्मी ऐसा क्यों कहती हैं कि उम्र बढ़ने के साथ बदन में नमक कम हो जाता है।
ये सब देहाती बातें हैं और तेरी अम्मी निरी देहातन है।
ऐसा अब्बू ने हंसते हुए कहा था, जब सनूबर ने बताया कि सबके बदन में नमक होता है, क्योंकि इंसान का पसीना नमकीन होता है और इस नमक का उम्र के साथ कोई ताल्लुक नहीं होता है।
अम्मी को सोचना चाहिए कि स्कूल में पढ़़ने वाली लड़की ये तो कतई नहीं सोचती होगी कि उसकी शादी हो जाए और वो लड़की अपने आस-पास के लड़कों या मर्दों में पति तलाशती नहीं फिरती है।
फिर लड़कियों की बढ़ती उम्र या बदन की रानाइयां माँ-बाप और समाज को क्यों परेशान किये रहते हैं। उठते-बैठते, सोते-जागते, घुमते-फिरते बस यही बात कि मेरी सनूबर की शादी होगी या नहीं।
सनूबर कभी खिसिया जाती तो कहती, “मूरख अम्मी…शादी तो भिखारन की, कामवाली की, चाट-वाले की बिटिया की भी हो जाती है। और तो और तुम्हारी पड़ोसन पगली तिवारिन आंटी की क्या शादी नहीं हुई, जो बात-बेबात तिवारी अंकल से लड़ती रहती है और दिन में पांच बार नहाती है कि कहीं किसी कारण अशुद्ध तो नहीं हो गई हो।दुनिया में काली-गोरी, टेढ़ी-मेढ़ी, लम्बी-ठिगनी सब प्रकार की लडकियाँ तो ब्याही जाती हैं अम्मी। और तुम्हारी सनूबर तो कित्ती खूबसूरत है।जानती हो मैथ के सर मुझे नेचुरल ब्यूटी कहते हैं।तो क्या मेरी शादी वक्त आने पर नहीं होगी?”
सनूबर के तर्क अपनी जगह और अम्मी का लड़का खोज अभियान अपनी जगह।
उन्हें तो जमाल साहब के रूप में एक दामाद दिखलाई दे रहा था।

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निकिता स्कूल में आज संजीदा दिखी।
सनूबर ने कारण जानने की कोशिश नही की। यह सनूबर की स्टाइल है। वह ज़बरदस्ती किसी के राज उगलवाने में यकीन नहीं करती। उसे मालूम है कि जिसे सुख या दुःख की बात शेयर करनी होगी, वो खुद करेगी। यदि बात एकदम व्यक्तिगत होगी तो फिर काहे किसी के फटे में टांग अड़ाना।
टिफिन ब्रेक में जब दोनों ने नाश्ते की मिक्सिंग की तो निकिता आहिस्ता से फूट पड़ी- “जानती है सनूबर, कल गज़ब हो गया रे !”
सनूबर के कान खड़े हुए लेकिन उसने रुचि का प्रदर्शन नहीं किया।
निकिता फुसफुसाई- “कल शाम मुझे देखने लड़के वाले आने वाले हैं!”
जैसे कोई बम फटा हो, निकिता का मुंह उतरा हुआ था। सनूबर भी जैसे सकते में आ गई। यह क्या हुआ, अभी तो मिडिल स्कूल में नवमी ही तो पहुँची हैं सखियाँ। उम्र पंद्रह या कि सोलह साल ही तो हुई है। इतनी जल्दी शादी!
-“तेरी मम्मी ने ऐतराज़ नहीं किया पगली।”
-“काहे, मम्मी की ही तो कारस्तानी है यह। उन्होंने मेरी दीदी की शादी भी तो जब वह सत्रह साल की थीं, तभी करा दी थी। कहती हैं कि उम्र बढ़ जाने के बाद लड़के वाले रिजेक्ट करने लगते हैं और हमें पढ़ा-लिखा कर नौकरी तो करानी नहीं बेटियों से।चार बहनों के बाद एक भाई है। एक-एक कर लड़कियाँ निपटती जाएँ, तभी सुकून मिलेगा उन्हें !”
सनूबर क्या कहती..कितने बेबस हैं सखियाँ इस मामले में।
उन्हें घर का सदस्य कब समझा जाता है।हमेशा पराई अमानत ही तो कहते हैं लोग।उनका जन्म लेना ही दोख और असगुन की निशानी है।
लड़कियों के सतीत्व की रक्षा और दहेज़ ऐसे मसले हैं, जिनसे उनके परिवार जूझते रहते हैं।

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निकिता की चिंता, “मुझे आगे पढा़ई करना है रे।अभी शादी नहीं करनी।क्या मेरी कोई सुनेगा?”
सनूबर क्या जवाब देती।
लड़कियों की कहाँ सुनी जाती है। उन्हें तो हुकुम सुनने और तामील करने की ट्रेनिंग मिली होती है।
अजब समाज है, जहां लड़कियों को एक बीमारी की तरह ट्रीट किया जाता है। बीमारी हुई नहीं कि जो भी कीमत लगे लोग, उस बीमारी से निजात पाना चाहते हैं।
और जब बिटिया बियाह कर फुर्सत पाते हैं लोग तब दोस्त-अहबाबों में यही कहते फिरते हैं- “गंगा नहा आये भाई…अच्छे से अच्छा इंतज़ाम किया। लेन-देन में कोई कसर नहीं रक्खी।”
सनूबर की भी तो अपने घर में यही समस्या थी।
आये दिन अम्मी अब्बू को ताने देती हैं- “कान में रुई डाले रहते हैं और बिटिया है कि ताड़ की तरह बढ़ी जा रही है। सोना दिनों-दिन महंगा होता जा रहा है। न जेवर बनाने की चिंता न कहीं रिश्तेदारी में उठाना-बैठना। क्या घर-बैठे रिश्ता आएगा? जूते घिस जाते हैं, तब कहीं जाकर ढंग का रिश्ता मिलता है ?”
अब्बू मजाक करते, “तुम्हारे माँ-बाप के कितने जूते घिसे थे।कुछ याद है, जो मैं मिला।ऐसे ही अल्लाह हमारी बिटिया सनूबर का कोई अच्छा सा रिश्ता करा ही देगा।”
अम्मी गुस्सा जातीं, “अल्लाह भी उसी की मदद करता है, जो खुद कोई कोशिश करे। हाथ पे हाथ रखकर बैठे आदमी के मुंह में अल्लाह निवाला नहीं डालता।आप मज़ाक में बात न टालिए और दुनियादार बनिए। अभी से जोड़ेंगे, तभी आगे जाकर बोझा नहीं लगेगा।”
सनूबर ने अपनी व्यथा निकिता को सुनाई।
दोनों सहेलियाँ उदास हो गईं.।
तभी टिफिन खत्म होने की घंटी बजी और वे क्लास-रूम की तरफ भागीं।

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सनूबर को स्कूल जाना बहुत पसंद है। इस बहाने उसे घर-परिवार की बेढंगी वयस्तता से मुक्ति मिलती है। अम्मी चिल्लाती रहती है कि इतनी जल्दी क्यों स्कूल भागने की फिराक में रहती है सनूबर। टाइम होने से पांच मिनट पहले घर छोड़ना चाहिए। कितना नजदीक है स्कूल।
-“का करती है माटीमिली इत्ता पहले जाकर, झाडू लगाती है का वहां?”
सनूबर का स्कूल में बहुत मन लगता है। वहाँ तमाम सहेलियाँ मिल जाती हैं। उनके सुख-दुःख सुनना, बेहिसाब गप्पें मारना। एक-दूसरे की ज़िन्दगी में समानता-असमानता की विवेचना करना। टीवी पर देखी फिल्म या सीरियल पर बहस करना।
और भी इधर-उधर की लटर-पटर…लंतरानियाँ….
घर में क्या हो सकता है। बस अम्मी के आदेश सुनते रहो। काम हैं कि ख़तम ही नहीं होते हैं। जब कुछ काम न हो तो कपड़ों का ढेर लेकर प्रेस करने बैठो। ये भी कोई ज़िन्दगी है।
सनूबर के घर में तो और भी मुसीबतें हैं।कोई न कोई मेहमान आता रहता है। उनकी खातिरदारी करना कितना बोरिंग होता है। उस पर अम्मी-अब्बू के नए दोस्त जमाल साहेब। वह आये नहीं कि जुट जाओ खिदमत में। प्याज काटो, बेसन के पकौड़े बनाओ। बार-बार चाय पेश करो। अम्मी भी उनके सामने जमीन्दारिन बन कर हुकुम चलाती हैं-“कहाँ मर गई रे सनूबर, देखती नहीं..कित्ती देर हो गई साहब को आये। तेरी चाय न हुई मुई बीरबल की खिचड़ी हो गई।जल्दी ला!”
सनूबर न हुई नौकरानी हो गई।
-“कहाँ मर गई रे।देख, तेरे अब्बू का मोजा नहीं मिल रहा है।जल्दी खोज कर ला!”
-“मेरा पेटीकोट कहाँ रख दि‍या तूने।पेटी के ऊपर रखा था, नहीं मिल रहा है…जल्दी खोज कर ला!”
-“जा जल्दी से चावल चुन दे।फिर स्कूल भागना। बस सबेरे से स्कूल की तैयारी करती रहती है, पढ़-लिख कर नौकरी करेगी क्या। तेरी उम्र में मेरी शादी हो गई थी और तू जाने कब तक छोकरी बनी रहेगी।”
ऐसे ही जाने-कितने आदेश उठते-बैठते, सोते-जागते सनूबर का जीना हराम करते रहते।
सनूबर स्कूल के होमवर्क हर दिन निपटा लेती थी।
उसके टीचर इस बात के लिए उसकी मिसाल देते।
उससे गणित न बनती थी इसलिए उसने गणित की कुंजी अब्बू से खरीदवा ली थी।
बाकी विषय को किसी तरह वह समझ लेती।
वैसे भी बहुत आगे पढ़ने-पढ़ाने के कोई आसार उसे नज़र नहीं आते थे, यही लगता कि दसवीं के बाद अगर किस्मत ने साथ दिया तो बारहवीं तक ही पढ़ पाएगी वर्ना उसके पहले ही बैंड बज सकता है। अम्मी बिटिया को घर में बिठा कर नहीं रखेंगी- “जमाना खराब है।जवान लड़की घर में रखना बड़ा जोखिम भरा काम है। कुछ ऊंच-नीच हो गई तो फिर माथा पीटने के अलावा क्या बचेगा। इसलिए समय रहते लड़कियों को ससुराल पहुंचा दो। एक बार विदा कर दो। बाद में सब ठीक हो जाता है। घर-परिवार के बंधन और जिम्मेदारियां उलटी-सीधी उड़ान को ज़मीन पर ला पटकती हैं।”
अम्मी कहती भी हैं- “अपने घर जाकर जो करना हो करियो।यह घर तुम्हारा नहीं सनूबर!”
तो क्या लड़की अपने माँ-बाप के घर में किरायेदार की हैसियत से रहती है?
यही तो निकिता ने भी थक-हार कर कहा- “मुझे उन लोगों ने पसंद कर लिया है सनूबर। इस साल गर्मियों में मेरी शादी हो जायेगी रे!”
सनूबर का दिल धड़क उठा।
-“गज़ब हो गया। पिछले साल यास्मीन ने इस चक्कर में पढाई छोड़ दी और ससुराल चली गई। कितनी बढ़िया तिकड़ी थी अपनी। जानती है- मार्केट में यास्मीन की अम्मी मिलीं थीं। उन्होंने बताया कि यास्मीन बड़ी बीमार रहती है। उसका ससुराल गाँव में है, जहां आसपास कोई अस्पताल नहीं है। उसकी पहली डिलवरी होने वाली थी और कमजोरी के कारण बच्चा पेट ही में मर गया। बड़ी मुश्किल से यास्मीन की जान बची। ईद में यास्मीन आएगी, तो उससे मिलने चलेंगे न। पता नहीं तुम्हारा साथ कब तक का है!”
निकिता की आँखों में आंसू थे।
उसने स्कूल के मैदान में बिंदास क्रिकेट खेलते लडकों को देखा।
सनूबर की निगाह भी उधर गई।
लडकों की ज़िन्दगी में किसी तरह की आह-कराह क्यों नहीं होती।
सारे दुःख, सारी दुश्वारियां लड़कियों के हिस्से क्यों दी मेरे मौला…मेरे भगवान।
और तभी निकिता ने घोषणा की- “हम लड़कियों का कोई भगवान या अल्लाह नहीं सनूबर!”
सनूबर ने भी कुछ ऐसा ही सोचा था, कहा नहीं कि कहीं ईमान न चला जाए।अल्लाह की पाक ज़ात पर ईमान और यकीन तो इस्लाम की पहली शर्त है।
लेकिन निकिता ठीक ही तो कह रही है।
कितनी तनहा, कितनी पराश्रित, कितनी समझौता-परस्त होती हैं लड़कियाँ।

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लड़कियाँ ज़िन्दगी के तल्ख़ हकीकतों से कितनी जल्दी वाकिफ होती जाती हैं।
लड़के जो लड़कियों को सिर्फ एक ‘माल’ या ‘कमोडिटी’ के रूप में देखते हैं, वे कहाँ जान पाते हैं कभी कि इन शोख चुलबुली लड़कियों को प्रतिदिन ज़िन्दगी की कई नई सच्चाइयों से दो-चार होना पड़ता है।
ऐसे ही एक दिन सनूबर और निकिता यास्मीन से मिलने उसके घर गई।
मस्जिद-पारा में घर है यास्मीन का।
बड़ी मस्जिद के पीछे वाली गली में रहती है वह।
निकिता ने जींस-टॉप पहना था, जबकि सनूबर सलवार-सूट में थी। सनूबर मस्जिद-पारा आती है, तो बाकायदा सर पर दुपट्टा डाले रहती है।
यास्मीन ने घर का दरवाज़ा खोला था।
आह, कितना बेरौनक चेहरा हो गया है…गाल पिचके हुए और आँखों के इर्द-गिर्द काले घेरे। जैसे लम्बी बीमारी से उठी हो। तभी पीछे से यास्मीन की अम्मी भी आ गईं और उन्हें अन्दर आकर बैठने को कहा।
निकिता और सनूबर चुपचाप यास्मीन का चेहरा निहारे जा रही थीं। कितनी खूबसूरत हुआ करती थी यास्मीन, शादी ने उससे ख़्वाब और हंसी छीन ली थी।
यास्मीन स्कूल भर के तमाम बच्चों और टीचरों की मिमिक्री किया करती और खुद न हंसती, जब सब उसके मजाक को समझ कर हंसते तब ठहाका मार कर हंसती थ। उसकी हंसी को ग्रहण लग गया था।
निकिता और सनूबर उसकी दशा देख खौफज़दा हो चुकी थीं। क्या ऐसा ही कोई भविष्य उनकी बाट जोह रहा है। कम उम्र में शादी का यही हश्र होता है।फिर उनकी मांए ये क्यों कहती हैं कि उनकी शादियाँ तब हुई थीं, जब वे तेरह या चौदह साल की थीं। लेकिन वे लोग तो मस्त हैं, अपनी ज़िन्दगी में। फिर ये स्कूल पढ़ने वाली लड़कियाँ क्यों कम उम्र में ब्याहे जाने पर खल्लास हो जाती हैं?
ऐसे ही कई सवालात उनके ज़ेहन में उमड़-घुमड़ रहे थे।
यास्मीन शादी का एल्बम लेकर आ गई और उन लोगों ने देखा कि यास्मीन का शौहर नाटे कद का एक मजबूत सा युवक है। दिखने में तो ठीक-ठाक है, फिर उन लोगों ने क्यों कम उम्र में बच्चों की ज़िम्मेदारी का निर्णय लिया। मान लिया शादी हो ही गई है, फिर इतनी हड़बडी़ क्यों की? बच्चे दो-चार साल बाद भी हो जाते तो क्या संसार का काम रुका रह जाता?
यास्मीन बताने लगी- “उनका मोटर-साइकिल रिपेयर की गैरेज है। सुबह दस बजे जाते हैं तो रात नौ-दस के बाद ही लौटते हैं। गैरेज अच्छी चलती है, लेकिन काम तो मेहनत वाला है। मेरी जिठानी मेरी ही उम्र की है और उसके दो बच्चे हैं। इस हिसाब से तो उस परिवार में मैं बच्चे जनने के काबिल तो थी ही। मुझे वैसे भी कहानियों की किताब पढ़ने का शौक है। वहां पढाई-लिखाई से किसी का कोई नाता नहीं। बस कमाओ और डेली बिस्सर खाना खाओ- मटन न हो तो मछली और नहीं तो अंडा।इसके बिना उनका निवाला मुंह के अन्दर नहीं जाता। ये लोग औरत को चारदीवारी में बंद नौकरानी और बच्चा जनने की मशीन मानते हैं!”
तो ये सब होता है शादी के बाद और अपनी निकिता भी इस घनचक्कर में फंसने वाली है।
सनूबर ने गौर किया कि निकिता के चेहरे पर डर के भाव हैं।आशंकाओं के बादल तैर रहे हैं, उसके चेहरे पर।
लड़के वालों ने उसे पसंद कर लिया है।
निकिता को जो मालूम हुआ है, उसके मुताबिक बीस एकड़ की खेती है उनकी, एक खाद-रसायन की दूकान है। दो लड़के और दो लड़कियाँ हैं वहां। निकिता का होने वाला पति बड़ा भाई है, बीए करने के बाद खेती संभालता है और छोटा भाई इंजीनियरिंग कर रहा है। दोनों लड़कियों की शादी हो चुकी है। इसका मतलब निकिता घर की बड़ी बहू होने जा रही है।
ससुराल झारखण्ड के गढ़वा में है।नगर से सटा गाँव है उनका। वैसे तो कोई दिक्कत नहीं है, लेकिन निकिता की इच्छा किसी ने जाननी चाही। क्या निकिता अभी विवाह की जिम्मेदारियों में बंधने के लिए मानसिक और शारीरिक रूप से तैयार है? कहाँ बच्चियों की इच्छा पूछी जाती है। माँ-बाप पर एक अघोषित बोझ जो होती हैं लड़कियाँ।
यास्मीन का इलाज चल रहा है, डॉक्टर खान मेडम उसका इलाज कर रही हैं। उसे रक्ताल्पता है और ससुराली दिक्कतों ने मानसिक रूप से उसे कन्फ्यूज़ का कर दिया है।
-“अल्ला जाने कब उसका आत्म-विश्वास लौटेगा।कितनी बिंदास हुआ करती थी अपनी यास्मीन !” घर लौटते हुए सनूबर ने गहरी सांस लेकर यही तो कहा था, और निकिता भी भर रास्ता खामोश बनी रही।

(उपन्यास अंश)

 लोक जीवन और बाजारीकरण : गिरीश चंद्र पांडेय प्रतीक 

Mon, 29/05/2017 - 02:04

कर्म की भाषा / त्रिलोचन

रात ढली, ढुलका बिछौने पर,
प्रश्‍न किसी ने किया,
तू ने काम क्या किया
नींद पास आ गई थी
देखा कोई और है
लौट गई
मैंने कहा, भाई, तुम कौन हो.
आओ। बैठो। सुनो।
विजन में जैसे व्यर्थ किसी को पुकारा हो,
ध्वनि उठी, गगन में डूब गई
मैंने व्यर्थ आशा की,
व्यर्थ ही प्रतीक्षा की।
सोचा, यह कौन था,
प्रश्‍न किया,
उत्तर के लिए नहीं ठहरा
मन को किसी ने झकझोर दिया
तू ने पहचाना नहीं ?
यही महाकाल था
तुझ को जगा के गया
उत्तर जो देना हो
अब इस पृथिवी को दे
कर्मों की भाषा में।

बहुत कुछ बदल रहा है भौगोलिक, सांस्कृतिक, सामाजिक सरोकारों के रूप में, प्रकृति से लेकर पुरुष तक सब में परिवर्तन देखा जा सकता है। हमारे गाँव शहर बन जाने को आतुर है। और गाँव और शहर में बंटा लोक जीवन के संघर्ष भी कहीं न कहीं बदले हैं। और यह परिवर्तन न पूरी तरह नकारात्मक है न सकारात्मक, इसे हम इस रूप में समझने का प्रयास करेंगे तो पाएंगे परिवर्तन के मायने आखिर हैं क्या।
लोक जीवन और उसके संघर्षों से उपजे पर्व शहरीकरण के साथ बदलाव की ओर या दूसरे शब्दों में कहा जाए तो ह्रास की ओर अग्रसर हैं। क्या कारण है कि लाखों-करोडों लोग मुँह से यही बोलते भी हैं कि लोक पर्वों का स्वरूप बदल गया है। आखिर इसके लिए जिम्मेदार है कौन। क्या केवल समाज जिम्मेदार है । इस मामले में केवल समाज को दोष देना उचित नहीं लगता। जिन संघर्षों और परिस्तिथियों में इन पर्वों को लोगों ने अपने मनोरंजन और सामजिक चेतना को जागृत करने के लिए शुरू किया होगा, उस समय पर्वों का स्वरूप कुछ और रहा होगा। साल दर साल भौतिक विकास के साथ मानवीय चेतना और रहने खाने-पीने के तारीकों में  बदलाव के फलस्वरूप पर्वों के भी रूप और रंग बदलते गए। उनको मनाने के तरीके बदलते गए। पहले ग्रामीण जीवन की सामूहिकता और सरलता में रचे पगे तीज त्यौहार समूह में ही पूर्ण किये जाते थे। किसी भी लोक में नृत्य, गीत, सामूहिकता के द्योतक ही नहीं, उसका जीवन थे। जैसे- पहाड़ विशेषकर उत्तराखण्ड के आलोक में होली, बग्वाल, हिलजात्रा, पांडव नृत्य आदि विधाओं को देखें तो पूर्णतः सामूहिकता से पोषित लोक विधाएं हैं। और इनके पीछे श्रम की महत्ता रही है। यह केवल कोरा मनोरंजन नहीं था। इसकी पहली शर्त और आवश्यकता सामूहिकता और संवेदनशीलता थी, जो समय और विद्रूप विकास के साथ सामूहिकता से एकात्मकता की ओर अग्रसर है । जिसने तीज त्योहारों के स्वरूप को ही नहीं बदला वरन हमारे जीने के, सोचने के, खाने-पीने और रहने के तरीकों को बदला है। हम हर स्तर पर समाजोन्मुखी से आत्मोन्मुखी हुए हैं। श्रम के प्रति धारणा बदली है। उसके प्रति जो नकारत्मकता बाजार ने बड़ी ही चालाकी से परोसी है, उसके परिणामों का ही असर है। हम हर पर्व को बाजार से रेडीमेड खरीद लाना चाहते हैं। उसे अपना सामाजिक स्टेटस भी मान बैठे हैं। हम थोड़ा गहराई से लोक पर्वों की प्रकृति को देखेंगे तो उनका सौंदर्य सामूहिकता, साहस, श्रमशील जीवन, ऐंचे-पेंचे, में था, जिस ढांचे को समाज और उसके द्वारा पोषित बाजार ने लगभग ढहा दिया है।

अगर उत्तराखण्ड के परिपेक्ष में बात करें तो पलायन ने यहाँ की लोक संस्कृति को कमजोर किया है। संस्कृति मंचों पर दो-तीन दिन के ढोल पीटने और नाचने-गाने से नहीं बचने वाली। कोई भी त्यौहार केवल मनोरंजन नहीं होता। वह उस समाज की सभ्यता का द्योतक  भी होता है। और इसके लिए उस क्षेत्र की आबो हवा, पानी, गाड़- गधेरे, जंगल, पेड़-पौधे, पशु-पक्षी या कहा जाए- पारिस्तिथिकी  जिम्मेदार ही नहीं पोषक, और तोषक भी होती है। हमें पहले गांवों को बचाना होगा। नहीं तो समाज जहाँ जाएगा वहां की पारिस्तिथिकी के अनुसार लोक को तोड़ेगा मरोड़ेगा, गमले में केले के पेड़ लगायेगा, पैकेट में बंद घुघुते, रेडिमेड ऐपण, और पिछौड़े ही संस्कृति होंगे। और वही लोक भी लोक की पहिचान भी और बाजारीकरण से प्रभावित लोक भाषा भी। ऐसा नहीं की लोक अब है ही नहीं, लोक अभी भी है । पर लोक जीवन अपनी पहिचान बदल रहा है। लोक जीवन को अगर हम संकुचित दृष्टि से देखेंगे तो वो लोक के साथ अन्याय होगा। लोक किसी एक जगह या परिवेश में बंध नहीं सकता। उसकी सीमाएं असीमित हैं। वो शहर की गलियों में भी उतना ही है, जितना गाँव के चौपालों में। बस उसे पहिचानने की और सहेजने की आवश्यकता है।

लोक की धूल से सने लोग बड़े सरल और सहज होते हैं। उनके लिए लोक की हवा और पानी प्राकृतिक और परिष्कृत चीजें हैं। वो धारे, नौले से डबका कर भर लाते हैं फौले, गगरी और पी लेते हैं गट-गट। उन्हें उबालने और परिष्कृत करने की जरूरत महसूस नहीं होती । पर अब बाजार के उपकरणों डिब्बे बंद खाने, ने लोक को लोक न रहने देने की कसम खा ली है। इस बाजारीकरण के दुष्प्रभावों से बचना तो बहुत मुश्किल है, लेकिन कुछ जागरूकता लायी जाए तो इसके प्रभावों को कुछ कम तो किया ही जा सकता है। लोक भी गतिशील होता है और होना भी चाहिए। लोक जीवन और उसके संघर्षों को रेखांकित किया जाना चाहिए। उसका सबसे बड़ा अस्त्र श्रम है, जिसे आज की पीढ़ी को जानना और समझना होगा।

(बाखली, जनवरी-जून का संपादकीय)

अनंत भटनागर की कवि‍ताएं

Thu, 25/05/2017 - 19:58

अनंत भटनागर

वह लड़की जो मोटरसाइकिल चलाती है

संकरी सड़कों पर
दाएं-बाएं
आजू-बाजू से काट
वाहनों की भीड़ में
अक्सर
सबसे आगे
निकल जाती है
वह लड़की
जो
मोटरसाइकिल
चलाती है

सोचता हूँ
जब लड़कियों के लिए
दुनिया में
वाहन चलाने के
अनेकानेक
सुन्दर व कोमल
विकल्प मौजूद हैं
तब भी आखिर
वह लड़की
मोटरसाइकिल ही
क्यों चलाती है ?

कभी लगता है कि
यह उसके भाई ने
खरीदी होगी
और वह
छोड़ गया होगा
घर परिवार
या फिर
हो सकता है
यह उसके पिता की
अन्तिम निशानी हो
और,
बेचना उसे
नहीं हो
स्वीकार

हो सकता है
वह लड़की
एक्टिविस्ट हो
और मर्दों की दुनिया
के अभेद्य दुर्ग को
सुनाना चाहती ह
अपनी ललकार

कभी-कभी
सोचने लगता हूँ
क्या करती होगी
वह लड़की
जब कभी जाती होगी
अपने बॉयफ्रेंड के साथ
मोटरसाइकिल पर
पीछे बैठकर

क्या
बलखाती / मुस्काती
लतिका सी पुलकित
सिमट जाती होगी
अपने हर अंग में
हर वांछित/अवांछित
ब्रेक पर
या झुंझलाती/झल्लाती
रहती होगी
उसकी
धीमी रफ्तार पर

अवसरों की वर्षा में
दिनोंदिन
घुलती दुनिया में
जल, थल, वायु
के भेद भुलाकर
जब लड़कियां
चलाने लगी है
रेल, जहाज,
हवाई जहाज
एक लड़की
के मोटर साईकिल
चलाने पर इतना
सोच-विचार
आपको बेमानी लग
सकता है

मगर,
इन दकियानूसी सवालों
की गर्द
आप हटाएं
इससे पहले ही
पूछ लेना चाहता हूँ
एक सवाल

क्या
आप नहीं चौंके थे
उस दिन
जब आपने
पहली बार किसी
एक लड़की को
मोटरसाइकिल चलाते
हुए देखा था ?

विरासत में मिले
हजारों साल पुराने
खजाने को
मस्तिष्क में समेटते हुए
क्या आपको नहीं लगता
कि
आकाश-पाताल को
पाटने से
कठिन होता है
सोच की खाइयों को
भर पाना
जल थल
भेदने से
कठिन होता है
जड़ तन्तुओं को
सिल पाना
हाथ पैर
काटने से
कठिन होता ह
सड़े घावों
को चीर पाना

इसलिए
उस लड़की के
सामने से गुजरते हुए
सोचता हूँ अक्सर
क्या शादी के बाद भी
चला पाएगी वह
मोटरसाइकिल
क्या बदल पाएगी
वह
वक्त के पहिये की
रफ्तार
क्या
वह आगे बैठी होगी
और पति
होगा
पीछे सवार ?

मोबाइल फोन

अब नहीं रहा
वह समय/कि
लड़कियां भेजे
सन्देश
कबूतरों के हाथ
और/करती रहें
जवाब की
अनवरत प्रतीक्षा

अब नहीं रहा
वह समय/कि
लड़कियां जागें
रात-रात
और छिपकर
रेशमी कपड़ों पर
सिल दें
कोई एक नाम

अब नहीं रहा
वह समय/कि
लड़कियां लिखें
कविताएं
और/गुनगुनाती
इठलाती
गुजार दें
सुबह-शाम

प्रेम जैसी
सरल चीज के लि
इतनी कठिनाई
सहने का
समय नहीं है यह

प्रेम के लिए
अब उपलब्ध है
एक मोबाइल दुनिया
मोबाइल दुनिया
जहाँ
हर वक्त/हर जगह
किया जा सकता है
प्रेम
जहाँ हर क्षण
पलटी जा सकती है
प्रेमियों से
मनुहार
जहाँ हर रोज
बदले जा सकते है
प्रेमी

मोबाइल दुनिया में
प्रेम के लिए
शब्द ही नहीं
सम्पूर्ण शब्दावली है
प्रेम के लिए
क्षणिक चित्र नहीं
गति‍क दृश्‍यावली है
कविता ही नह
गीत है, स्वर है
ध्वनि गत्यावली है

इस गतिशील दुनिया में
प्रेम के लिए
लम्बी तपस्या/गहन
साधना करते रहन
का समय नहीं है
अब किसी के पास
इतने अन्तराल में तो
किए जा सकते हैं
अनेकानेक प्रेम
एक के बाद एक
या फिर
एक साथ

मोबाइल फोन
ने कर दिया हैं
प्रेम करना
बहुत आसान

सचमुच !
प्रेम की अनुपस्थिति में ही
होता है
प्रेम करन
बहुत आसान।

महात्माजी

महात्माजी
खाते नहीं हैं
अन्न
वस्त्र धारण नहीं करत
खुला ही रखते हैं
तन-बदन
वर्षों पहले त्याग चुके हैं
गृहस्थ जीवन

तुम्हारे जैसे नहीं हैं वह
पदार्थ-अपदार्थ के लिए
ललचाता नहीं है
उनका मन

पेट भरने के लिए
खा लेते हैं
सूखी मेवा
शि‍ष्यों ने करवा दिया है
आश्रम
वातानुकूलन
शि‍ष्यायें चंचल हैं
करती हैं
अविचल सम्पूर्ण सेवा

महात्माजी
परम त्यागी हैं।

शुक्र है

बाल खुशनसीब है
अब तक साथ निभा रही है
हिना

अपनी उम्र को
उम्र में मिलाते हुए
उसने भी गुजार दी है
एक लम्बी उम्र

डर है कि कुछ
भूरे-भूरे विभीषण
असलिय
बताने लगे हैं.

शुक्र है
पतझड़
अभी बहुत दूर है

अनामिका, अंकल!

हँसी की
हजारों वॉट
बरसाकर
धीरे से
उसने रख लिय
अपनी जींस की
पिछली पॉकेट में
सेलफोन

फिर लेपटॉप के
दोनो पंखों को फैलाकर
उड़ने लगी असीम
आकाश में

एयरपोर्ट के
वेटिंग लाऊंज में
मित्रता के तमाम
पर्यायवाचियों को
दुहराते हुए
मैंने उससे पूछा था
उसका नाम

मित्रता की तमा
संभावनाओं को खारिज
करते हुए
उसने कहा-
अनामिका, अंकल !

काँप रहा है मन

देहरी पर
रखते हुए
बाहर
काँपता है
जैसे दिया
काँप रहा हैं मन
मीत तुम्हें
स्कूल को सौंपते हुए.

फूल/तुम
घबरा ना जाना
अजनबी पंखुरियों के साथ
डरना मत
स्कूल की अनजानी
हवाओं से
न होना बेचैन
क्लासरूम की
अपरिचित गंध से

डर रहा हूँ मैं
कहीं टीचर के
रंगबिरंगी सूट में तुम्हें
दिखने न लगे गुब्बारे
बच्चों की खिलखिलाहट से
याद न आ जाएं
तुम्हें अपने
खासमखास खिलौने

कुछ कहना चाहो
तुम
और न कह पाने की
जुम्बिश में
फूट न पड़े
रूलाई

रोशन
जिन्दगी की आस में
दीप तुम्हें
सौंप रहा हूँ
दुनिया को

काँप रहा है मन

औरत एक सवाल है

धरती पर उसके
जमते कदम
बढ़ती गति
और
पंखिल परवान
जिनके लिए सवाल है
उन सबके लिए
औरत एक सवाल है

उसकी खिलखिलाहट
चहकती हँसी
महकती मुस्‍कान
उसकी खिलती आँख
खुलती हुई वाक्
दिन पर दिन
ऊँची उठती नाक
उसके कपड़ों की नाप
कर्मों की छाप
कदमों की थाप

उसकी आस
उसके अहसास
खुद पर बढ़ता
विश्‍वास
जिनि‍क लिए सवाल है
उन सबके लिए
औरत एक सवाल है

युग-युग से
मानस की कुन्द कारा में
द्रोपदी के केश
सीता का पुनर्प्रवेश
अहिल्या निर्निमेष
गार्गी के प्रश्‍न
मांडवी का मन
और
मीरा का नर्तन.
माधवी का मोल
गांधारी कर कौल
और
उर्मिला का अनबोल
जिनके लिए सवाल है
उन सबके लिए
औरत एक  सवाल है

आदिम इच्छाओं के तल
कुचलते आए हैं जो सपनों को
वे ही कि‍या करते है
सवाल
औरत को लेकर
वे ही दिया करते हैं
जवाब
अपने चेहरे बदलकर.

सिर्फ इन चेहरों से
पर्दा उठने तक
सिर्फ इन चेहरों के
गूंगा होने तक
सिर्फ इन चेहरों के
गुमनां बनने तक
औरत एक सवाल है

(कवि‍ता संग्रह ‘वह लड़की जो मोटरसाइकिल चलाती है’ से साभार)

आदर्शवाद का ओवरडोज : संजीव ठाकुर

Wed, 24/05/2017 - 01:35

साहित्य अकादमी द्वारा प्रकाशित परशुराम शुक्ल की यह किताब एक शिक्षक दीनदयाल के आदर्श जीवन और उसके कर्म को दिखलाने का काम करती है। अपनी मेहनत और लगन से आई.ए.एस. बनने वाले दीनदयाल अपने सहयोगियों, अधिकारियों और नेताओें के भ्रष्टाचार से तंग आकर नौकरी छोड़ देते हैं और गाँव में जाकर मास्टरी करने लगते हैं। मास्टरी करते हुए ही वह जाति-पाति के खिलाफ काम करते हैं, गाँव को नशा-मुक्त करवाते हैं, बिगड़े हुए बच्चों को सुधारते है, किसी साहूकार को ईमानदार बनाते है, प्रौढ़-शिक्षा कार्यक्रम चलाते है। आगे चलकर वह आदिवासियों के बीच काम करते हैं और उनकी संगीत-मंडली को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाते हैं। अपने कामों के कारण वह राष्ट्रपति से सम्मान पाते हैं तो आदिवासियों की संस्कृति पर किताब लिखकर ‘बुकर पुरस्कार’ पाते हैं यानी हर तरह की सफलता वह पाते हैं। सवाल उठता है कि एक साथ इतने-इतने काम करने वाले मास्टर दीनदयाल क्या असली पात्र हो सकते हैं? बच्चों को पाठ पढ़ाने के उद्देश्य से लिखी गई इस किताब को नकलीपन बच्चों से भले ही छुपा रह जाए, लेकिन क्या वे इससे जुड़ाव महसूस कर पाएँगे? इससे प्रेरणा ग्रहण कर पाएँगे? क्या आदर्शवाद के इस ओवरडोज को वे पचा पाएँगे? सच्चाई तो यह है कि बच्चे वैसे ही पात्रों से तादात्म्य स्थापित कर पाते हैं, जो उनके आस-पास के हों? उनके जैसे हों!

इस किताब के जरिए परशुराम शुक्ल ने ‘बाल धारावाहिक’नाम की एक ‘नई’ विधा को स्थापित करने का प्रयास किया है, लेकिन दुर्भाग्यवश ऐसा हो नहीं पाया है। ‘बाल धारावाहिक’ को परिभाषित करते हुए भूमिका में उन्होंने लिखा है- ‘बाल धारावाहिक को एक विशिष्ट संरचना वाली ऐसी कहानी शृंखला के रूप में परिभाषित किया जा सकता है, जिसकी प्रत्येक कहानी अपने पीछे की कहानियों और आगे की कहानियों से स्वतंत्र होती है और संबद्ध भी!’ उनकी इसी परिभाषा के आधार पर इस किताब की परीक्षा करें तो हम पाएँगे कि इस ‘धारावाहिक’के कुछ अध्याय अन्य अध्यायों से सर्वथा स्वतंत्र हो गए हैं। ‘झूठे का बोलबाला’ और ‘पश्चाताप के आँसू’ ऐसे ही दो अध्याय हैं। ‘झूठे का बोलबाला’ तो एक लोककथा को परिवर्तित कर इस धारावाहिक में घुसा दिया गया है। इसको पढ़कर पाठक अचरज में पड़ सकते है कि किसी ठाकुर के सेवकों के द्वारा धकेलकर बाहर कर दिए गए दीनदयाल क्या वही दीनदयाल हैं, जो इतने बड़े-बड़े काम करते हैं? इसी तरह ‘पश्चाताप के आँसू’में बेचारे मास्टर दीनदयाल को जिस तरह आध्यात्मिक विषयों का प्रवचनकर्ता बना दिया गया है और किसी दूसरे कथावाचक की दुष्टता का शिकार दिखा दिया गया है, वह हास्यास्पद ही नहीं अनर्गल भी लगता है। और कोई गलत नहीं कि ऐसी अनर्गल बातें इस किताब में एक नहीं अनेक हैं।

इस किताब को पढ़कर जो सवाल सबसे अधिक मुखरता से सिर उठाता है वह यह कि क्या साहित्य अकादेमी जैसी संस्था के पास अच्छी और बुरी चीज को परखने को कोई पैमाना नहीं है? इस स्तरहीन किताब को छपवाकर साहित्य अकादेमी हिन्दी के व्यापक पाठक-वर्ग को आखिर क्या संदेश देना चाहती है?

पुस्तक: मास्टर दीनदयाल, परशुराम शुक्ल

प्रकाशक : साहित्य अकादमी, नई दिल्ली, 60  रुपये

मनुष्यता के पक्ष में है वजाहत का लेखन : प्रो बेनिवाल

Sun, 21/05/2017 - 12:28

अपने लेखन से जुड़े विविध प्रसंग सुनाते असग़र वजाहत।

नई दिल्ली : लेखक का सम्मान करना अकादमिकी का प्राथमिक कर्तव्य है। बड़े लेखक भाषाओं के दायरे में नहीं देखे जाते। असग़र वजाहत का लेखन उन्हें भारत के संदर्भ में सचमुच बड़ा लेखक बनाता है।  गुरु गोबिंद सिंह इंद्रप्रस्थ वि‍श्‍वविद्यालय द्वारा आयोजित ‘बनास जन’ के लोकार्पण समारोह में मीडिया संकाय के अधिष्ठाता प्रोफेसर अनूप बेनिवाल ने कहा कि बहुत कम लेखक होते हैं जिन्हें पढ़कर सचमुच जीवन भर प्रेरणा मिलती हो। असग़र वजाहत ऐसे बड़े लेखक हैं जिन्होंने भारत विभाजन पर ‘जिस लाहौर नइ देख्या ओ जम्याइ नइ’ को मार्मिक कृति लिखकर मनुष्यता के पक्ष में एक महान कृति की रचना की है। आयोजन में मानविकी संकाय के अधिष्ठाता प्रोफेसर आशुतोष मोहन ने असग़र वजाहत के साथ अपने रंगमंच के अनुभव सुनाए और कहा कि उनके साथ रहकर ही जाना जा सकता है कि बड़ा लेखक जीवन में कितना सहज और सरल होता है। प्रोफेसर मोहन ने असग़र वजाहत के आख्यान ‘बाक़र गंज के सैयद’ को इधर लिखी गई सबसे महत्त्वपूर्ण कृति बताया। विश्वविद्यालय में रंगमंच के सलाहाकार अनूप त्रिवेदी ने ‘जिस लाहौर नइ देख्या ओ जम्याइ नइ’ के मंचन में प्रयुक्‍त दो गीत सुनाए तथा हबीब तनवीर के प्रसिद्ध तराने ‘अब रहिये बैठ इस जंगल में’ की प्रस्तुति से सबको मंत्रमुग्ध कर दिया।

‘बनास जन’ के सम्पादक पल्लव ने असग़र वजाहत पर विशेषांक निकालने के कारण रखते हुए कहा कि वे हमारी भाषा ही नहीं, हमारी संस्कृति के भी बड़े लेखक हैं, जिन्होंने चार विधाओं में प्रथम श्रेणी की रचनाएं लिखी हैं। उन्होंने कहा कि एक सच्‍चा लेखक असल में अपने समय और समाज से अभिन्न होता है और यह अभिन्नता उसे बेचैन बनाती है। असग़र वजाहत की बेचैनी हमारे भारतीय समाज की बेचैन आवाज़ ही तो है। अंगरेजी विभाग के प्रोफेसर विवेक सचदेव ने असग़र वजाहत के लेखन के महत्त्व पर कहा कि उनका लेखन पढ़ना भारत को सही अर्थों में जानना है।

इससे पहले उदयपुर से आए प्रोफेसर प्रदीप त्रिखा, रोहतक से आए प्रोफेसर जयवीर हुड्डा, प्रोफेसर अनूप बेनिवाल, शिक्षा अधिष्ठाता प्रोफेसर संगीता चौहान, अरबिंदो कालेज के प्रो राजकुमार वर्मा सहित अतिथियों ने अंक का विधिवत लोकार्पण किया। लेखकीय वक्तव्य देते हुए असग़र वजाहत ने अपने लेखन से जुड़े विविध प्रसंग सुनाए। अंगरेजी विभाग के डॉ समी अहमद खान ने असग़र वजाहत पर इंद्रप्रस्थ विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों द्वारा बनाया गया एक स्लाइड शो दिखाया। आयोजन में डॉ नरेश वत्स, डॉ राजीव रंजन, डॉ शुभांकु कोचर सहित बड़ी संख्या में विद्यार्थी, शोधार्थी तथा अध्यापक उपस्थित थे।

फोटो एवं रिपोर्ट – रोहित कुमार

मन की आँखें : शशि‍ कांडपाल 

Sat, 20/05/2017 - 02:07

बच्चों के साथ शशि‍ कांडपाल।

जिंदगी अनुभवों से भरी रंगीन किताब ही तो है- कुछ खट्टे, कुछ मीठे, कुछ सबक की तरह और कुछ जीवन को नया मोड़ देने वाले अनुभव। उनमें से एक बच्चा है- बाताश! जैसे- हिंदी में पवन होता है न!

पति की नौकरी के तबादले कहीं टिकने ही नहीं देते थे और नए माहौल में ढलने के साथ-साथ आसपास के स्कूल में नौकरी भी ढूंढ़नी पड़ती, क्योंकि स्कूल जाये बिना मेरा मन नहीं लगता था- चाहे छुटपन में पढ़ने जाना हो, चाहे अब पढ़ाने। जहाँ जाती शिक्षिका की आवश्यकता मेरा इन्तजार कर रही होती।

पति‍ को नागालैंड, दीमापुर ट्रांसफर मिलते ही लगा, शायद अब मैं नहीं पढ़ा सकूंगी क्योंकि वह जगह हमारे लिए न सिर्फ नई थी, बल्कि कई भ्रांतियां भी सुनने को मिल रही थीं। असम बहुत बुरे दौर से गुजर रहा रहा था। बोडो आन्दोलन का असर दीमापुर में भी था। भारत के अन्य प्रांतों से आए लोगों को जिन्हें नागा लोग ‘प्लेन मानु’ कहते, उनके बारे में कोई अच्छी राय नहीं रखते और स्कूल में सिर्फ दक्षिण भारतीय इसाइयों को पढ़ाने के लिए चुना जाता है आदि आदि। स्टाफ़ ने हमारे लिए तीसरी मंजिल पर मकान भी ढूंढ़ रखा था, लेकिन रात-बिरात आते भूकम्पों से परेशान हो गए। ऐसे में एक पड़ोसन ने सुन्दर सा मकान दिखाकर सूचना दी कि यह डीएफओ साहब के बंगले का आउट हाउस है। वह सिर्फ एक टीचर को ही किराये पर देंगे। अगर आप नौकरी ढूंढ़ लें तो काम बन सकता है।

दो-चार स्कूलों के पते के साथ नौकरी ढूंढ़नी  शुरू की और एक मिशनरी स्कूल में हिंदी टीचर की  जगह खाली  मिल गई। मिशनरी स्कूल सुबह से दोपहर तक सामान्य बच्चों के लिए चलता और दोपहर बाद ग़रीब बच्चों को पढा़या जाता था। उन बच्‍चों को पढ़ाने लोग स्वेच्छा से आते थे। आवश्यक सामग्री भी मिशनरी और लोगों की चैरिटी से जुटाई जाती।  सिस्टर्स के ग्रुप्स न सिर्फ पढ़ाते, बल्कि गरीब, कमजोर तबकों से आये बच्चों का एक हॉस्टल भी चलाते, जिनमें उन बच्चों को आत्मनिर्भर बनाने के लि‍ए कई काम-धंधे भी सिखाये जाते। देखा-देखी मैं भी चल रहे प्रयासों में हाथ बंटाती या कहूं मुझे ऐसी सेवा देने में अजीब-सा सुकून मिलने लगा था।

हम छुट्टियों में अन्य संस्थाओं द्वारा किये जा रहे कामों को देखते, कहीं लूम पर बुनाई होती तो कहीं कपड़े सिले जाते और उससे हुए लाभ से संस्थाओं के बच्चों का भरण पोषण होता। उनमें कई बच्चे मंदबुद्धि, हाथ-पैरों से लाचार, लेकिन अपनी दिनचर्या कर सकने लायक होते। फिर भी सामान्य से कमजोर ही रह जाते, ज्यादा दिक्कत अंधे बच्चों के साथ होती। उनका दीमापुर में कोई अलग से विद्यालय न होने की वजह से ख़ास ट्रेनिंग नहीं दी जा पा रही थी और वे सिर्फ गिरिजाघरों में गाये जाने वाले कोरस सीखते या कोई वाद्ययंत्र सीखते।

मैं प्रभु के बनाये संसार के हर अणु की प्रशंसक हूं। माँ कहती- कभी किसी की कमजोरियों पर मत हँसों क्योंकि यह उस व्यक्‍ति‍ का नहीं, बल्कि उस महाप्रभु की कृति का अपमान होगा जिसने उसे बनाया।
कभी सोचती- अगर मेरी एक टांग न रही तो?
लंगडा के चलती…
कभी चीजें टटोलती, गिर-गिर पड़ती और घरवाले समझ जाते कि‍ आज मेरे नयन छुट्टी पर हैं।
कभी बहरी और कभी गूंगी…
मुझे गूंगा होना सबसे ज्यादा भाया और आज तक इस्तेमाल में लाती हूं- न जाने कितनी खरीददारी में होने वाली झक-झक, झगडे़ टालना, समय को उसका हिसाब करने देना जैसे बड़े प्रोजेक्ट, गूंगे रह कर पूरे किये। दीमापुर सब्जी मंडी में सब्जीवाले मुझे कई महीने तक गूंगा समझ कर इशारों से मोलभाव समझा देते और मैं शांति से काम चला लेती, क्योंकि भाषा आती नहीं थी और कहीं सुना था कि‍ नहीं बोलने से एनर्जी भी बचती है।

जाड़े के दिनों में स्कूल सबसे ज्यादा कार्यशालाएं आयोजित करता। बच्चों में स्फूर्ति भी रहती और बड़े-बड़े मैदानों का उपयोग होकर शारीरिक वर्जिश भी होती। एक दिन कोहिमा की एक संस्था जो अंधे और बहरे बच्चों के लिए काम करती थी, से आग्रह आया कि‍ वह एक पखवाडे़ के लिए इच्छुक टीचर्स को आमंत्रित करते हैं ताकि वे इस संस्था  में आकर अपनी सेवाएं दें-  क्राफ्ट, डांस, मार्शल आर्ट या सिलाई-कढ़ाई ताकि बच्चों को कुछ नया सिखाया जा सके। सच कहूं तो ये मौके टीचर्स को बहुत कुछ सिखा जाते हैं और कोहिमा घूमने का आकर्षण भी था।

मदर ने हम पांच लोगों को भेजने का निर्णय लिया और काम भी निर्धारित किए। किसी भी तरह के शारीरिक कमजोर बच्चों की संस्थाओं में सामान्य बच्चों से कुछ अलग कई काम होते हैं। इसलि‍ए क्राफ्ट या कुछ भी सिखाने के लिए भी अलग तरीके अपनाने पड़ते हैं और ये हम सब के लिए एक चुनौती भी था। लेकिन बच्चों का मनोरंजन एक ऐसा काम था, जिसके लिए एक बचकाने व्यक्तित्व का होना जरूरी था, जो उन बच्चों में घुल मिल सके। नई-नई कहानियां बना सके और पूरे फील या आवाजों से उसे और मनोरंजक बना सके क्योंकि वहाँ उपलब्ध हर किताब की कहानियां, कवितायें बच्चे सुन-सुन कर ऊब चुके थे। जैसे ही कोई रटी रटाई कहानी या कवि‍ता शुरू करता वे शोर मचा देते…ये नहीं..ये नहीं…।

मुझे अपनी बेटी को बहलाने के लिए दिन में दो-चार कहानियां तो गढ़नी ही पड़ती थीं और इस काम से मानो मेरी कल्पनाशीलता को एक दिशा और उद्देश्य मिल गया था। चलते-फिरते बस कहानियां याद करने की कोशिश करती, कुछ अंग्रेजी में, कुछ हिंदी में, लेकिन आश्चर्य की बात यह रही कि कहानियां समझने में भाषा कभी बाधा नहीं बनी। मैं  बड़ों की कहानियों को छुटका बनाती…उसमें बचकाने भाव भरती और अपनी आवाज में बदलाव और मुरकियों के साथ उन्हें सुनाती, तो वहां उपस्थित करीब पचास बच्चे सांस भी बिना आवाज के ले रहे होते कि‍ कहीं कुछ छूट न जाए…कोई मुझे देख नहीं पाता था तो मैं भी शर्म से परे आराम से उन्हें प्रसन्न होता देखती।

एक दिन कक्षा में घुसते ही एक किलकारी सी आवाज आई…
शशि दीदी!
मैंने सोचा- शायद कोई नार्मल बच्चा भी इनके बीच है, जो मुझे देखता और पहचानता है और बात आई गई हो गई।
मैंने कुछ खेल भी विकसित कर लिए थे। इसलि‍ए उन्हें खेलने के दौरान पाया कि‍ इनमें से किसी को कुछ भी दिखाई नहीं देता, तो आखिर मुझे पहचाना किसने? और कैसे ?
अगले दिन क्लास के दरवाजे पर पहुंचते ही फिर वही आवाज आई, लेकिन आज मैं चैतन्य थी। पाया कि‍ एक किशोर, दुबला और अति आकर्षक बच्चा ऊपर की तरफ देखते हुए मेरा नाम ले रहा है।
मैं उसके पास पहुंची और पूछा कि‍ उसने मुझे कैसे पहचाना?
‘आपकी खुशबू से।’ बच्‍चा मुस्‍कराया।
मैं निरुत्तर..हालाँकि ऐसा कुछ ख़ास नहीं था, लेकिन हां, चन्दन की खुशबू लगाई थी।
दूसरे दिन फिर पहचान गया, जबकि आज चन्दन नहीं था।
कैसे पहचाना?
आपकी खुशबू से।
तीसरे दिन पावडर त्यागा, चौथे दिन क्रीम और पांचवें दिन सादे पानी से नहाई, लेकिन पहुंचते ही उसकी कुहुक ने मुझे फेल कर दिया।

वि‍ज्ञान के पास हजारों तर्क होंगे, विशेषज्ञ भी अपने मत रखेंगे, लेकिन मैंने अपने जीवन में पहली बार यह जाना कि दरवाजे पर कदम रखते ही मुझे पहचानने वाला यह बच्चा अति विशिष्ट है। मैदान में मैं उससे दूर घेरे में बैठती और वह पता नहीं कब आकर मेरी बगल में बैठ जाता और पल्लू को अपनी उंगलियों में लपेट रहा होता। उसने उन तमाम तरह के बच्चों की गंध के बीच मुझे कैसे पहचाना? मैं उठने की सिर्फ सोचती और वह पूछ बैठता- दीदी जा रही हो क्या?
मुझे उससे डर लगने लगा- और भी न जाने मेरे बारे में क्या-क्या जान जाता हो!

पंद्रह दिन बीतने तक यूं लगा कि‍ हम तो हमेशा से साथ हैं- दिन-रात, मेस में, ऑडिटोरियम में, बाग़ में हर समय साथ रहते। साथ ही यह और लगा कि‍ अब तो कार्यशाला  खत्‍म होने वाली है। इन मासूमों को छोड़ कर कैसे जायेंगे?

मैं बच्चों से खुलकर बात करना चाहती थी, लेकिन उससे पहले ही सिस्टर्स ने राय दी कि‍ तुम अचानक अपने घर चली गई हो और कुछ दिन बाद आओगी, कहकर बच्चों को बहला लेंगे। इन्हें जाने की सूचना मत देना, क्योंकि इनका जुड़ाव तुमसे बहुत ज्यादा हो गया है। रोना-धोना करेंगे और तुम्हे भी असुविधा होगी। इसलि‍ए मुझे चुप रहना पडा।
लेकिन वह लाठी टेकता स्टाफ रूम तक आ गया और बिना किसी की सहायता से सीधे मेरी जगह पर आकर बोला, ‘‘आप, कल से नहीं आएँगी ना?’’
मैंने सर पकड़ लिया क्योंकि अगर हंगामा हुआ तो सिस्टर्स मुझे दोष दे सकती थीं।
मुझे चुप पाकर बोला, ‘‘दीदी, आज आपकी आवाज में वह बात नहीं थी। आपने बहुत गलतियाँ भी कीं।’’ बात सच थी क्योंकि मैं अन्दर ही अन्दर उन बच्चों के लिए भावुक थी कि कल से इन्हें कौन कहानी सुनाएगा।

कुछ पल हम दोनों चुप रहे और बहुत साहसी होकर वह बोला, ‘‘अच्छा जब मैं बुलाऊं, तब आओगी क्या एक बार?’’ मैं बोल न सकी और उसका हाथ पकड़ कर थपथपा दिया।

छह महीने बाद मुझे संस्था की तरफ से एक समारोह में बुलाया गया। समारोह बोर्ड पर नजर पड़ी तो कुछ नवीन कहानियों को ब्रेल में परिवर्तित करने का सन्देश लिखा था।
और मेरे आश्‍चर्य का कोई ठिकाना न रहा, जब मैंने कहानी पढ़ने वाले की स्टाइल और कहानियां सुनीं। वे मेरी कहानियां थीं, जो किचेन में खाना बनाते, बर्तन धोते या अपनी बच्ची को बहलाते यूं ही बनाई थीं और उनको इस तरह से सराहे जाते देख कर निशब्द थी।
उस बच्चे ने उन कहानियों को ब्रेल में बदल कर अपने जैसे और बच्चों के लिए भी संरक्षित कर दिया।

इस बात को बीस साल से ज्यादा हो गए हैं। मुझे नहीं पता कि‍ अब वह बच्चा कहाँ होगा, लेकिन जहाँ भी होगा कुछ आश्चर्यजनक ही कर रहा होगा, ऐसा मुझे विश्वास है।

विवेक भटनागर की चार ग़ज़लें

Tue, 16/05/2017 - 02:03

विवेक भटनागर

एक

उसके दिल में इस क़दर तनहाइयां रक्खी मिलीं
उसकी आंखों में वही परछाइयां रक्खी मिलीं

कुछ जगह रक्खी मिली दीवार अपने दरमियां
कुछ जगह पर गहरी-चौड़ी खाइयां रक्खी मिलीं

टूटता दम दफ़्तरों में मां की ममता का मिला
परवरिश करने को घर में बाइयां रक्खी मिलीं

कुछ किताबों में दबी थीं बेतरह दिलचस्पियां
टेक्स्ट बुक में तो फ़क़त जम्हाइयां रक्खी मिलीं

नाज़ था हमको जवानी पर मगर कुछ दिन हुए
रुख़ पे अपने झुर्रियां और झाइयां रक्खी मिलीं

ज़र्दियां मजदूर-मेहनतकश के थीं चेहरों पे जो
मेरी ग़ज़लों में वही रानाइयां रक्खी मिलीं

दो

शबे ग़म इस क़दर ठहरी हुई है
क़रीब आकर सहर ठहरी हुई है

जहां से हम चले मंज़िल की जानिब
वहीं पर रहगुज़र ठहरी हुई है

छलक कर आंख से पाकीज़गी की
चमक रुख़सार पर ठहरी हुई है

बताती है सही दो बार टाइम
घड़ी चारों पहर ठहरी हुई है

टहल कर रेत में लौटा समंदर
किनारे पर लहर ठहरी हुई है

करे किससे शिकायत पत्थरों की
ये डाली बेसमर ठहरी हुई है

किसी दिन भी बदल सकता है मंज़र
बहुत दिन से नज़र ठहरी हुई है

तीन

हां, तो मैं कह रहा था कि आते रहा करो
रिश्ता वही है, जिसको निभाते रहा करो

अपनी मुहब्बतों को लुटाते रहा करो
बदले में दुगना प्यार कमाते रहा करो

उठता है कोई, उसको गिराने को हैं बहुत
गिरते हुओं को यार उठाते रहा करो

या तो बढ़ाओ ज्ञान सुनो सबकी गुफ़्तगू
या कितना ज्ञान है ये बताते रहा करो

होकर बड़े वो नींद की गोली न खाएंगे
बच्चों को लोरी गा के सुलाते रहा करो

नन्हे दियो! तुम्हीं से उजालों की रौनकें
जल-जल के तीरगी को बुझाते रहा करो

तुमको तो मोक्ष चाहिए, दुनिया की क्या पड़ी
गंगा में सारे पाप बहाते रहा करो

हैं ये क़लम उठाने की शर्तें विवेक जी
जागे रहो, सभी को जगाते रहा करो

चार

कुछ लोग दिखावे की फ़क़त शान रखे हैं
तलवार रखें या न रखें, म्यान रखे हैं

गीता ये रखे हैं, तो वो कुरआन रखे हैं
हम घर में मगर मीर का दीवान रखे हैं

बाज़ार है ये, नींद के मारे हैं खरीदार
व्यापारी यहां ख़्वाब की दूकान रखे हैं

जब ज़िंदगी नुकसानो नफ़े पे नहीं चलती
सुख-दुख के लिए लोग क्यों मीज़ान रखे हैं

ग़ुरबत को धरम मान के कुछ लोग तो अक्सर
नवरात्र के व्रत, रोज़ए रमज़ान रखे हैं

जो हक़ हैं ग़रीबों के उन्हें भीख समझकर
देते हैं अगर, उनपे वो एहसान रखे हैं

पत्थर वो चलाते हुए टुक सोच तो लेता
पुरखों ने इन्हीं संग में भगवान रखे हैं

शि‍क्षा और मनोविज्ञान की भी गहरी समझ रखते थे मुक्तिबोध : महेश चंद्र पुनेठा

Sun, 14/05/2017 - 01:05

मुक्तिबोध

ज्ञान को लेकर बहुत भ्रम हैं। सामान्यतः सूचना, जानकारी या तथ्यों को ही ज्ञान मान लिया जाता है। इनको याद कर लेना ज्ञानी हो जाना माना जाता है। इस अवधारणा के अनुसार एक ज्ञान प्रदानकर्ता है तो दूसरा प्राप्‍तकर्ता, जिसे पाओले फ्रेरे ‘बैंकिंग प्रणाली’कहते हैं। इसमें शि‍क्षक जमाकर्ता और विद्यार्थी का मस्तिष्‍क बैंक की भूमिका में होता है। शि‍क्षक बच्चे के मस्तिष्‍क रूपी बैंक में सूचना-जानकारी या तथ्य रूपी धन को लगातार जमा करता जाता है। वह इस बात की परवाह नहीं करता है कि उसे लेने के लिए बच्चा तैयार है या नहीं। शि‍क्षक द्वारा कही बात ही अंतिम मानी जाती है। दरअसल, यह ज्ञान की बहुत पुरानी अवधारणा है। यह तब की है, जब शि‍क्षा की मौखिक परंपरा हुआ करती थी। सूचना, जानकारी या तथ्यों को रखने का रटने के अलावा और कोई विकल्प नहीं होता था। एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक इनके हस्तांतरण का यही एकमात्र उपाय हुआ करता था। जो जितनी अधिक सूचना, जानकारी या तथ्यों को याद रख पाता था, वह उतना ही अधिक ज्ञानी माना जाता था। ज्ञान का यह सीमित और आधा अधूरा अर्थ है। वस्तुतः जो लिया या दिया जाता है, वह ज्ञान न होकर केवल सूचना या जानकारी है।

ज्ञान कभी दिया नहीं जा सकता है। ज्ञान का तो निर्माण या सृजन होता है। इसलिए आप दूसरों को सूचना या जानकारी तो दे सकते हैं, ज्ञान नहीं। ज्ञान के साथ बोध का गहरा संबंध है। ज्ञान निर्माण की एक पूरी प्रक्रिया है, जो अवलोकन, प्रयोग-परीक्षण, विश्‍लेषण से होती हुई निष्‍कर्ष तक पहुंचती है। ज्ञान द्वंद्व और संश्‍लेषण से उत्पन्न होता है। अनुभवों और तर्कों की उसमें विशेष भूमिका रहती है। यह माना जाता है कि मनुष्‍य की सारी अवधारणाएं उसके अपने अनुभवों के आधार पर बनती हैं। शि‍क्षा में ज्ञान की यह अवधारणा ‘रचनात्मकतावाद’के नाम से जानी जाती है, जो अपेक्षाकृत नई मानी जाती है। भारतीय शि‍क्षा में इस अवधारणा की गूंज बीसवीं सदी के अंतिम दशक से सुनाई देना प्रारम्भ होती है। लेकिन मुक्तिबोध ज्ञान को लेकर इस तरह की बातें पांचवें दशक में लिखे अपने निबंधों में कहने लगे थे। ज्ञान, बोध, सृजनशीलता, सीखने जैसी अवधारणाओं को लेकर उनके निबंधों में बहुत सारी बातें मिलती हैं। मुक्तिबोध ज्ञान और जानकारी के बीच के इस अंतर को स्पष्‍ट करते हैं। भले ही उनकी यह बात सीखने की प्रक्रिया के संदर्भ में नहीं, बल्कि रचना-प्रक्रिया के संदर्भ में आती है। लेकिन सीखने की प्रक्रिया के संदर्भ में भी वह सटीक बैठती है। मुक्तिबोध ज्ञान के विकास के बारे में कहते हैं- ‘‘बुद्धि स्वयं अनुभूत विशि‍ष्‍टों का सामान्यीकरण करती हुई हमें जो ज्ञान प्रस्तुत करती है, उस ज्ञान में निबद्ध ‘स्व’से ऊपर उठने, अपने से तटस्थ रहने, जो है उसे अनुमान के आधार पर और भी विस्तृत करने की होती है।…ज्ञान व्यवस्था…जीवनानुभवों और तर्कसंगत निष्‍कर्षों और परिणामों के आधार पर होती है।…तर्कसंगत (और अनुभव सिद्ध) निष्‍कर्षों तथा परिणामों के आधार पर, हम अपनी ज्ञान-व्यवस्था तथा उस ज्ञान-व्यवस्था के आधार पर अपनी भाव-व्यवस्था विकसित करते।…बोध और ज्ञान द्वारा ही ये अनुभव परिमार्जित होते हैं यानी पूर्व-प्राप्त ज्ञान द्वारा मूल्यांकित और विश्‍लेषि‍त होकर, प्रांजल होकर, अंतःकरण में व्याख्यात होकर, व्यवस्था-बद्ध होते जाते हैं।’’  वह पुराने ज्ञान में नवीन ज्ञान को जोड़कर सिंद्धांत व्यवस्था का विकास करने की बात करते हैं। यहीं पर द्वंद्व और संश्‍लेषण की प्रक्रिया चलती है। उनके लिए ज्ञान का अर्थ केवल वैज्ञानिक उपलब्धियों का बोध नहीं, वरन् उत्थानशील और ह्रासशील शक्तियों का बोध भी है।…ज्ञान भी एक तरह का अनुभव है, या तो वह हमारा अनुभव है या दूसरों का। इसलिए वे ज्ञान को काल सापेक्ष और स्थिति सापेक्ष मानते हैं। उसे जीवन में उतारने की बात कहते हैं- ‘‘ज्ञान-रूपी दांत जिंदगी-रूपी नाशपाती में गड़ना चाहिए, जिससे कि संपूर्ण आत्मा जीवन का रसास्वादन कर सके।’’

आज सबसे बड़ी दिक्कत शि‍क्षा की यही है कि वह न संवेदना को ज्ञान में बदल पा रही है और न ज्ञान से संवेदना पैदा कर पा रही है। फलस्वरूप आज की शि‍क्षा एक सफल व्यक्ति तो तैयार कर ले रही है, लेकिन सार्थक व्यक्ति नहीं अर्थात ऐसा व्यक्ति जो अपने समाज के प्रति जिम्मेदार और हाशि‍ए पर पड़े लोगों के प्रति संवेदनशील हो, जिसके लिए शि‍क्षित होना धनोपार्जन करने में सक्षम होना न होकर समाज की बेहतरी के लिए सोचना हो। ऐसे में यह महत्वपूर्ण बात है कि मुक्तिबोध ज्ञान को संवेदना के साथ जोड़कर देखते हैं। ‘चांद का मुंह टेड़ा है’कविता की ये पंक्तियां इस संदर्भ में उल्लेखनीय हैं- ‘ज्वलंत अनुभव ऐसे/ऐसे कि विद्युत धाराएं झकझोर/ज्ञान को वेदन-रूप में लहराएं/ज्ञान की पीड़ा/रुधिर प्रवाहों की गतियों में परिणित होकर/अंतःकरण को व्याकुल कर दे।’इसलिए वह यह आवश्‍यकता महसूस करते हैं कि संवेदनात्मक उद्देश्‍य, अपनी पूर्ति की दिशा में सक्रिय रहते हुए, मनुष्‍य के बाल्यकाल से ही उस जीवन-ज्ञान का विकास करे, जो संवेदनात्मक उद्देश्‍यों की पूर्ति करे। संवेदनात्मक उद्देश्‍यों से उनका आशय स्व से ऊपर उठना, खुद की घेरेबंदी तोड़कर कल्पना-सज्जित सहानुभूति के द्वारा अन्य के मर्म में प्रवेश करना है। दूसरे के मर्म में प्रवेश कर पाना तभी संभव है, जब शि‍क्षा दिमाग के साथ-साथ दिल से भी जुड़ी हो, वह बच्चे की संवेदना का विस्तार करे। इसी कारण ज्ञानात्मक-संवेदना और संवेदनात्मक-ज्ञान की अवधारणा उनकी रचना-प्रक्रिया और आलोचना की आधार रही।

मुक्तिबोध अनुभव को, सीखने और रचना के लिए बहुत जरूरी मानते हैं। कोई भी रचना ‘अनुभव-रक्त ताल’में डूबकर ही ज्ञान में बदलती है। देखिए ‘भूरी-भूरी खाक धूल’कविता की ये पंक्तियां- नीला पौधा/यह आत्मज/रक्त-सिंचिता हृदय धरित्री का/आत्मा के कोमल आलबाल में/यह जवान हो रहा/कि अनुभव-रक्त ताल में डूबे उसके पदतल/जड़ें ज्ञान-संविधा की पीतीं।’वह अनुभव को पकाने की बात करते हैं । देखा जाए तो शि‍क्षा एक तरह से अनुभवों को पकाने का ही काम तो करती है। मुक्तिबोध लिखते हैं ,‘‘वास्तविक जीवन जीते समय, संवेदनात्मक अनुभव करना और साथ ही ठीक उसी अनुभव के कल्पना चित्र प्रेक्षित करना- ये दोनों कार्य एक साथ नहीं हो सकते। उसके लिए मुझे घर जाकर अपने में विलीन होना पड़ेगा।’’ वह सिद्धांत की नजर से दुनिया को देखने की अपेक्षा अनुभव की कसौटी पर सिद्धांत को कसने तथा विचारों को आचारों में परिणित करने के हिमायती रहे। यही है ज्ञान निर्माण या सृजन की प्रक्रिया। ‘ज्ञान अनुभव से ही शुरू होता है। ज्ञान के सिद्धांत का भौतिक रूप यही है।  जब व्यक्ति अनुभवों से सीखना छोड़ देता है, उसमें जड़वाद आ जाता है। कितनी महत्वपूर्ण बात कही है उन्होंने, आज तमाम शि‍क्षाविद् इसी बात को तो कह रहे हैं, ‘‘यह सही है कि प्रयोगों में गलती हो सकती है। भूलें हो सकती हैं। किंतु उसके बिना चारा नहीं है। यह भी सही है कि कुछ लोग अपने प्रयोगों से इतने मोहबद्ध होते हैं कि उसमें हुई भूलों से इंकार करके उन्हीं भूलों को जारी रखना चाहते हैं। वे अपनी भूलों से सीखना नहीं चाहते हैं। अतः वह जड़वादी हो जाते हैं।’’ पर इसका अर्थ यह नहीं समझा जाना चाहिए कि मुक्तिबोध प्रयोग और अनुसंधान के नाम पर अब तक मानव जाति को प्राप्त ज्ञान का अर्थात सिद्धांतों से इंकार करते हों। उनका स्पष्‍ट मानना था, ‘‘इसका अर्थ यह कि बदली हुई परिस्थिति में परिवर्तित यथार्थ के नए रूपों का, उनके पूरे अंतःसंबंधों के साथ अनुशीलन किया जाए, उनको हृदयगंम किया जाए।’’  आज इसे ही सीखने का सही तरीका माना जा रहा है। वास्तविक अर्थों में सीखना इसी तरह होता है। यही सीखना स्थाई होता है। सीखने का मतलब कुछ जानकारियों को रट लेना नहीं है। सीखना तो व्यवहार में परिवर्तन का नाम है। ऐसा परिवर्तन जो चेतना को अधिकाधिक यथार्थ संगत बना दे,  जिसके के लिए मुक्तिबोध अतिशय संवेदनशील, जिज्ञासु तथा आत्म-निरपेक्ष मन की आवश्‍यकता पर बल देते हैं। वह अनुभवों से सीखने की ही नहीं, बल्कि अनुभव-सत्य को जन तक पहुंचाने की बात भी कहते हैं- ‘तब हम भी अपने अनुभव/सारांशों को उन तक पहुंचाते हैं जिसमें/जिस पहुंचाने के द्वारा हम, सब साथी मिल/दंडक वन में से लंका का पथ खोज निकाल सकें।’(‘भूरी-भूरी खाक धूल’)। देखा जाय तो यही शि‍क्षा का असली उद्देश्‍य भी है। यदि शि‍क्षित होने पर हम जनहित में कुछ कर नहीं पाए तो उसकी क्या सार्थकता है?

आज शि‍क्षण में पीयर लर्निंग पर बहुत बल दिया जा रहा है। एन.सी.एफ.2005 में कहा गया है कि सहभागितापूर्ण सीखना और अध्यापन, पढ़ाई, भावनाएं एवं अनुभव को कक्षा में एक निश्‍चि‍त और महत्वपूर्ण जगह मिलनी चाहिए। सहभागिता एक सशक्त रणनीति है। यह माना गया है कि समूह में या अपने साथियों से सीखना अधिक अच्छी तरह से होता है। उक्त दस्तावेज इसके पीछे यह तर्क देता है कि जब बच्चे और शि‍क्षक अपने व्यक्तिगत या सामूहिक अनुभव बांटते हैं, उन पर चर्चा करते हैं और उनमें परखे जाने का भय नहीं होता है, तो इससे उन्हें उन लोगों के बारे में भी जानने का अवसर मिलता जो उनके सामजिक यथार्थ का हिस्सा नहीं होते। इससे वे विभिन्नताओं से डरने के बजाय उन्हें समझ पाते हैं। कुछ इसी तरह की बात मुक्तिबोध अपने एक निबंध ‘समीक्षा की समस्याएं’ में लिखते हैं- ‘‘जहां तक वास्तविक ज्ञान का प्रश्‍न है- वह ज्ञान स्पर्धात्मक प्रयासों से नहीं, सहकार्यात्मक प्रयासों से प्राप्त और विकसित हो सकता है।’’  यह अच्छी बात है कि मुक्तिबोध प्रतियोगिता या प्रतिस्पर्धा को नकारते हैं। हो भी क्यों न! यह एक पूंजीवादी मूल्य है और मुक्तिबोध समाजवादी समाज के समर्थक रहे। प्रतिस्पर्धा से कभी भी एक समतामूलक या सहकारी समाज नहीं बन सकता है। सबको साथ लेकर आगे बढ़ने की प्रवृत्ति ही एक सुंदर समाज का निर्माण कर सकती है।

सीखने के लिए स्वतंत्रता और भयमुक्त वातावरण का होना बहुत जरूरी है। दबाव या भय में कुछ भी सीखना संभव नहीं है। स्वतंत्रता बच्चे को चिंतन और उसे सृजन के लिए प्रेरित करती है। बच्चे में सृजनशीलता के विकास के लिए स्वतंत्रता का होना पहली शर्त है। कुछ इसी तरह की बात मुक्तिबोध भी कहते हैं- ‘‘व्यक्ति-स्वातंत्र्य कला के लिए, दर्शन के लिए, विज्ञान के लिए अत्यधिक आवश्‍यक और मूलभूत है। कोई भी सृजनशील प्रक्रिया उसके बिना गतिमान नहीं हो सकती।’’ मुक्तिबोध व्यक्तिगत स्वतंत्रता के प्रबल समर्थक हैं। उनका मानना है कि भले ही यह एक आदर्श है फिर भी मानव की गरिमा और मानवोचित जीवन प्रदान करने के लिए बहुत जरूरी है। यह जनता के जीवन और उसकी मानवोचित आकाक्षांओं से सीधे-सीधे जुड़ा़ है। कोई भी सृजनशील प्रक्रिया उसके बिना आगे नहीं बढ़ सकती है। यह सच भी है। हम अपने चारों ओर अतीत से लेकर वर्तमान तक दृष्‍टि‍पात करें तो पाते हैं कि दुनिया में जितने भी बड़े सृजन हुए हैं, वे सभी किसी न किसी स्वातंत्र-व्यक्तित्व की देन हैं। इन व्यक्तित्वों को यदि सृजन की आजादी नहीं मिली होती तो इतनी बड़ी उपलब्धि उनके खातों में नहीं होती। हर सृजन के मूल में स्वतंत्रता ही है। मुक्तिबोध इस बात को बहुत गहराई से समझते हैं।

इस प्रकार ज्ञान की बदली अवधारणा और बाल मनोविज्ञान की दृष्‍टि‍ से विश्‍लेषण करें तो हम पाते हैं कि मुक्तिबोध का चिंतन बहुत तर्कसंगत और प्रगतिशील है। इसमें शि‍क्षा और मनोविज्ञान को लेकर उनकी गहरी समझ परिलक्षित होती है। एक लोकतांत्रिक और वैज्ञानिक सोच से लैस समाज बनाने की दिशा में उनका यह चिंतन बहुत उपयोगी सिद्ध हो सकता है। आज जब ज्ञान को एक खास तरह के खांचे में फिट करने और तैयार माल की तरह हस्तांतरित करने की कोशि‍श हो रही है, तो मुक्तिबोध के ये विचार अधिक प्रासंगिक हो उठते हैं।

अच्छी कविता समय की जटिलता को समेटती है : वि‍ष्णु नागर

Sat, 13/05/2017 - 15:30

काव्य-संग्रह ‘वह लड़की जो मोटरसाइकिल चलाती है‘ का लोकार्पण करते पल्ल्व, प्रेमचंद गांधी, वि‍ष्णु नागर और अनन्त भटनागर।

अजमेर : ‘‘हमारी दुनिया में इतने रंग और जटिलताएं हैं कि उन्हें समेटना हो तो कविता करने से सरल कोई तरीका नहीं हो सकता। यह आवश्यक नहीं कि जो आसानी से समझ आ जाए, वह अच्छी और जो समझना जटिल हो, वह खराब कविता है या इसके विपरीत भी। जो कविता समय की जटिलता को समेटती है, वो अच्‍छी कविता है। सामाजिक परिवर्तनों को रेखांकित करना ही कविकर्म है।’’ ये विचार सुविख्यात कवि व व्यंग्यकार विष्णु नागर ने कवि व शिक्षाविद् डॉ. अनन्त भटनागर के नये काव्य-संग्रह ‘वह लड़की जो मोटरसाइकिल चलाती है’ के लोकार्पण समारोह में बतौर मुख्य अतिथि व्यक्त किये। रविवार 7 मई, 2017 को सूचना केन्द्र में आयोजित कार्यक्रम में उन्होंने कहा कि संग्रह की कविताएं सामाजिक चेतना से संबद्ध हैं और समझने में भी सरल हैं। सरल अभिव्यक्ति कौशल अत्यन्त कठिन कार्य है।

समारोह में विशिष्ट अतिथि युवा आलोचक डॉ. पल्लव ने कविता के सामाजिक सरोकारों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि अनन्त भटनागर की काव्यचेतना पर जन आन्दोलनों का प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है। अध्यक्षीय उद्बोधन देते हुए प्रतिष्ठित कवि-स्तंभकार प्रेमचन्द गांधी ने कहा कि इस संग्रह की कविताएं नये तेवर और प्रभावी शब्दावली को लिये हुए हैं।

चित्तौड़गढ़ से आये डॉ. राजेश चौधरी और वरिष्ठ काव्य आलोचक डॉ. बीना शर्मा ने पुस्तक पर विस्तृत आलेख पढ़ते हुए कहा कि वर्तमान की स्थितियों पर केन्द्रित होना इस संग्रह की विशेषता है। मोबाइल फोन, बाजार, नया साल और सेज में नयी सभ्यता के उपादानों को समझने की कोशिश की गई है। संग्रह का दूसरे खण्ड उम्र का चालीसवाँ में नितांत निजी अनुभूतियों के साथ रिश्तों में आते बदलाव को अभिव्यक्त करती कविताएं हैं। शीर्षक कविता कथ्य में अनूठी और सच्चे स्त्री विमर्श की कविता है। डॉ. रजनीश चारण, कालिंदनंदिनी शर्मा और दिव्या सिंहल ने अतिथियों का परिचय दिया। नगर निगम उपायुक्त ज्योति ककवानी, शचि सिंह और वर्षा शर्मा ने संग्रह की चुनिंदा कविताओं का पाठ किया।

स्वागत उद्बोधन में नाटककार उमेश कुमार चैरसिया ने कृति को मानवीय संवेदनाओं की अभिव्यक्ति बताया। समारोह का संचालन गीतकार कवयित्री पूनम पाण्डे ने किया। डॉ. बृजेश माथुर ने आभार अभिव्यक्त किया। इस अवसर पर नगर के अनेक गणमान्य व्यक्ति उपस्थित थे।

प्रस्तुति‍ : उमेश कुमार चैरसिया

मेरा जैसा मैं : गौरव सक्सेना

Thu, 11/05/2017 - 02:14

वैसे तो दुनि‍या का हर बच्चा बहुत खास है, लेकि‍न जि‍न बच्चों के  साथ मैं काम करता हूं, शायद वे इन सबमें भी सबसे कोमल-नि‍र्दोष-प्यारे हैं। हां, वि‍शेष अध्यापक होना सचमुच बहुत वि‍शेष है, कम से कम मेरे लि‍ए तो। ये बच्चे जि‍नके पास सीमि‍त शब्द हैं, कि‍तना कुछ बोलते हैं, जब वे मुस्कराते हैं, अचानक गले लग जाते हैं, रो देते हैं या जी खोल के हंसते हैं।

स्वलीनता (ऑटिज्म)  से ग्रसि‍त बच्चे ज्‍यादातर अपने परि‍वेश से सचेत संबंध स्‍थापि‍त नहीं कर पाते। अपनी बनाई दुनि‍या में वे जीते हैं और उस दुनि‍या में होने वाली गति‍वि‍धि‍यों में यदि‍ बदलाव हो या उनके क्रम को बदला जाए तो यह उनके लि‍ए एक भयावह समस्‍या हो जाती है।

मैं एक बात स्‍पष्‍ट कर दूं कि‍ स्‍वलीनता का संबंध बच्‍चे की बौद्धि‍क शक्‍ति‍ के साथ या उसके रचनात्‍मक कौशल से नहीं होता। ये बच्‍चे बडे़ ही हुनरमंद गायक, चि‍त्रकार, खि‍लाड़ी हो सकते है, यदि‍ इनकी संभावनाओं को सही तरह से आंका जाए।

बच्‍चों का व्‍यवहार कई अर्थों में अन्‍य बच्‍चों से अलग होता है। सबसे पहली समस्‍या होती है संवाद की- सब कुछ महसूस करने के बाद भी बच्‍चे खुद को ठीक से प्रस्‍तुत नहीं कर पाते। जो चीजें इनको अलग बनाती हैं वे हैं, समाज के नि‍यमों, परम्‍पराओं, संबंधों की जानकारी ने होना। इसके चलते कई बार ऐसा व्‍यवहार देखने को भी मि‍लता है, जो सामाजि‍क रूप से स्‍वीकार्य नहीं।

इन तमाम सारी सीमाओं के बावजूद ये बच्‍चे अपरि‍मि‍त कौशल के धनी होते हैं। आवश्‍यक नहीं है कि‍ प्रत्‍येक कौशल में ये अपनी उम्र के बच्‍चों जैसा प्रदर्शन करें, लेकि‍न जि‍स कौशल में रुझान होगा शायद उसमें बेहतर कोई दूसरा नहीं कर सकता।

जो एक बड़ी समस्‍या जिसका सामना ये बच्‍चे करते हैं, वह है- हमारे अंदर धैर्य और जानकारी का अभाव। यदि‍ बच्‍चों की आवश्‍यकताओं और वि‍शेषताओं को समझ, उसके आसपास की चीजों को परि‍वर्तित कर दि‍या जाए, तो ये बच्‍चे समाज के लि‍ए उतने की उपयोगी होंगे, जि‍तने अन्‍य बच्‍चे। इन बच्‍चों पर मैंने एक कवि‍ता लि‍खी है, जो आपके साथ साझा कर रहा हूं–

जैसा मैंने देखा तुमको कभी कभी
कुछ उल्झा-सुलझा
कभी कभी कुछ कहते सुनते
कभी कभी चुप रहते सहते
कभी कभी कुछ सपने बुनते

जैसा मैंने देखा तुमको
कभी कभी पानी सा बहते
कभी कभी कुछ जड़ भी होते
कभी कभी मुस्काते हँसते
कभी कभी दुनिया से डरते
जैसा मैंने देखा तुमको
कभी कभी तुम कह न पाये
कभी कभी तुम सुन न पाये
कभी कभी क्या, ज़्यादातर ही
हम सब धीरज धर न पाये

कभी कभी तुम खुद बोले हो
कभी कभी ख़ामोशी बोली

जैसा मैंने तुमको देखा
कभी कभी रिश्ते जीते हो
कभी कभी खुद में जीते हो
कभी कभी जो आ जाती है
चेहरे पर मुस्कान तुम्हारे
कभी कभी जब बाँहों में भर
दिल आंखें सब भर देते हो

जैसा मैंने तुमको देखा

कभी कभी तुम काग़ज़ के कुछ

पंख लगा के उड़ जाते हो

कभी कभी तुम रंग सा घुल कर

सबके मन में बस जाते हो
कभी कभी जब दिल की बातें
टुकड़ों टुकड़ों बतलाते हो
कभी कभी तुम मीठी सरगम बनकर
उर में छिप जाते हो
जैसा मैंने तुमको देखा

बाबा साहब अम्बेडकर: साझी विरासत : प्रेमपाल शर्मा

Sat, 29/04/2017 - 21:05

डा. भीमराव अम्बेडकर

मुझे अफसोस है कि मैंने बाबा साहेब डा. भीमराव अम्बेडकर को बहुत देर से जाना। देर से तो मैंने महात्मा गांधी को भी पढ़ा, लेकिन बाबा साहेब को उसके भी बाद। क्यों ? कारण उस स्कूली व्यवस्था, शिक्षा में ज्यादा है। मेरी कॉलेज की नियमित पढ़ाई वर्ष 1975 में खुर्जा, उत्तर प्रदेश के एक कॉलेज में बी.एस.सी तक हुई। स्कूली पाठ्यक्रम में एक किताब थी- ‘हमारे पूर्वज’ । इसमें दधीचि‍ से लेकर विनोबा, सुभाष सभी थे। मुझे याद नहीं कि इसमें बाबा अम्बेडकर भी थे। न उन दिनों इनका जन्म दिवस होता था न निर्वाण या कोई और चर्चा। मात्र इतना बताया गया था कि हमारे संविधान बनाने में बाबा साहेब को बड़ा योगदान था। किस की सत्ता थी? कौन थे परिदृश्य पर? नेहरू जी, उनकी कांग्रेस और उनका मिला जुला वंश। किताबों में क्यों नहीं थे अम्बेडकर? मौलान आज़ाद लंबे समय तक शिक्षा मंत्री रहे। फिर उनके एक और शार्गिद नुरूल हसन। शुरू की नूराकुश्‍ती के बाद कम्यूनिस्ट विचारक राजनेता, बुद्धिजीवी भी सन साठ तक कांग्रेसी सांठ-गांठ में शामिल होना शुरू हो गए थे। नेहरू जी की मृत्यु के बाद वे इन्दिरा गांधी की किचन कैबिनेट का हिस्सा थे। पाठ्यक्रम नये बने, बदले गये लेकिन कांशीराम के उदय तक अम्बेडकर लगभग आजादी के सैकड़ों महापुरुषों की भीड़ में एक से ज्यादा नहीं थे। गांधी की तो छोड़ो नेहरू जी के साथ भी आकलन के योग्य नहीं माना जाता था। सार-संक्षेप यह कि जितना नुकसान अम्बेडकर को नेहरू और उनके दरबारियों ने पहुंचाया, उतना किसी दूसरी राजनीतिक सत्ता या व्यक्ति ने नहीं। मुसलमानों के मसीहा हैं तो नेहरू, दलित-गरीबों के तो नेहरू और पंडितों के तो वे हैं ही– पंडित वंश में जन्म लेने के कारण। राजनीति इसी का नाम है। इस विनिर्माण के लिए हर दावपेंच अपनाये गये और इसीलिए कांग्रेस सत्‍ता पहली बार वर्ष 2014 में कुछ हिली है।

उन दिनों के बुद्धिजीवियों की भूमिका भी यहां संदेह के घेरे में है कि क्यों उन्हें अम्बेडकर का संघर्ष, योग्यता, योगदान नहीं दिखाई दिया। क्यों वे नेहरू को खुश करने और बदले में कुछ विश्वविद्यालयों के पद, प्रतिष्ठा लेने के लिए अम्बेडकर को जाति विशेष का नेता ही मानते रहे। बिकी हुई जमात अपने नेता की मंशा सबसे पहले पहचान लेती है और उसी के अनुसार नाचती है। यही कारण है कि उन दिनों हमारी सभी पीढियों को बाबा साहेब अम्बेडकर जैसे महान व्यक्तित्व से सभी अध्ययन, पाठ्यक्रम, विमर्श में दूर रखा गया। सरदार पटेल जैसे और भी इतिहास निर्माताओं के साथ नेहरू वंश ने यही सलूक किया। लेकिन इतिहास की निर्ममता देखिए कि भारतीय समाज को आमूल-चूल बदलने वाले अम्बेडकर आज नेहरू से ज्यादा प्रासंगिक हैं- हर क्षेत्र में। सामाजिक, राजनीतिक आर्थिक सभी में।

एक कहावत है जितना बड़ा संघर्ष होगा, उतना ही बड़ा व्यक्तित्‍व। मनुष्य मनुष्य के बीच जैसा भेदभाव भारतीय समाज में है, वैसा अन्यत्र नहीं। दोहराने की जरूरत नहीं कि बचपन के क्रूर नृशंस आघातों ने ही अम्बेडकर को इतना मजबूत बनाया कि‍ वे भारतीय समाज को गठने वाले सबसे बड़े भारतीय महापुरुष हैं। नेहरू की जकड़न, कांग्रेसी आत्म प्रशंसा-प्रचार से जैसे-जैसे सन 1990 के आसपास देश को मुक्ति मिलती गयी, बाबा साहेब उभर कर आते रहे।

डॉ. भीमराव जैसी शख्सि‍यतें शताब्दियों बाद पैदा होती हैं। क्या उनके विचारों के बिना इक्कीसवी सदी या कहे आधुनिक भारत की कल्पना की जा सकती है? नि:संदेह हर महापुरुष अपने युग की उपज होता है, लेकिन बिरले ही ऐसे होते हैं जो आमूलचूल परिवर्तन के मसीहा बनते हैं। भारत जि‍तनी सामाजिक गैरबराबरी, भेदभाव, ऊंच-नीच शायद ही दुनिया में कहीं है। आश्चर्य की बात यह कि ऐसा हजारों साल तक चलता रहा। या कहें कि यह असमानता लगातार क्रूर और बढ़ती गयी। यहां उस मुस्लिम शासन को भी माफ नहीं किया जा सकता जो धर्म की तलवार तो भांजता रहा, समानता के लिए कोई कदम नहीं उठाया। लेकिन समय चक्र आगे बढ़ता रहा। यूरोप में पंद्रहवी सदी से शुरू हुए पुनर्जागरण ने दुनिया भर को गतिशील बनाया। तर्क, समानता, विज्ञान, स्त्री-पुरुष की बराबरी और धर्म की जकड़न से मुक्ति इस गतिशीलता के प्रस्थान बिंदू बने। औद्यौगिक क्रांति, उपनिवेशवाद के रथ पर सवार ये विचार फ्रांसीसी क्रांति, रूसी क्रांति से गुजरते हुए दुनियाभर में फैले। अम्बेडकर, गांधी, गोखले भी कैसे इनसे अछूते रह सकते थे, बल्कि कहें कि‍ इससे पहले राजा राममोहन राय, महात्मा फुले, सावित्रीबाई फुले भी आधुनि‍क समय की इसी समानता तर्क के दर्शन से अनुप्राणित हुए। बाबा साहेब अम्बेडकर नि:संदेह इनमें सबसे चमकते सितारे हैं।

सब से पहले अम्बेडकर सामाजिक बराबरी के लिए लड़े, फिर आर्थिक फिर मजदूरों के हितों के लिए। कौन सा क्षेत्र अछूता है? व्यक्तिगत स्वतंत्रता हो, स्त्री की बराबरी (हिन्दू कोड बिल), संवैधानिक सुधार से लेकर शिक्षा, पंचायती राज। सही मायनों में ऐसे स्टेसमैन जिनके विचार देश और देश के बाहर लगातार प्रासंगिक हैं। उनकी प्रतिभा का लोहा हर मंच ने माना और आज भी मान रहे हैं।

इस सबके बाद भी हमें भारतीय समाज को परिवर्तन की इस परिधि तक लाने वाली विरासत को एक निष्‍पक्ष दृष्टि, तर्क से समझने की जरूरत है, न कि भावना या राजनीतिक राग-द्वेष में कुतर्क वाली दृष्टि की। मौजूदा सभ्‍यताओं का बड़ा श्रेय इस तर्क पद्धति को है जो यूरोप के पुनर्जागरण से शुरू होती है। पूरा विज्ञान, सोचने का ढंग, धर्म को धकियाता हुआ आगे आता है और यूरोप के कायाकल्‍प के बाद पूरी दुनिया को बदलता है। फ्रांसीसी क्रांति हो या रूसी या अमेरिकी क्रांति और दास प्रथा का अंत- समानता की बुनियाद इन्‍हीं सड़कों से गुजरती है। इसलिए ब्रिटिश काल भारत के लिए एक वरदान भी है, जब हमारे इन सब दिग्‍गजों ने मनुष्‍य-मनुष्‍य की समानता, न्‍याय, भाईचारा, तर्क के अर्थ पहली बार जाने। क्‍या फुले महाराज की शुरू की शिक्षा उस ईसाई मिशनरी स्‍कूल में नहीं हुई होती तो समानता का दर्शन जान पाते ? अम्‍बेडकर का कायाकल्‍प भी एक तरफ भारतीय समाज में भेदभाव जातिगत घृणा के अनुभव और दूसरी और इंग्‍लैंड, जर्मनी, अमेरिकी समाज, विश्‍वविद्यालयों में बराबरी के अहसास से होता है। प्रतिभाशाली तो वे थे ही, कानून अर्थशास्‍त्र, लोकतंत्र, शिक्षा हर क्षेत्र में मौलिकता के स्‍तम्‍भ। सर सैयद अहमद खां भी इंग्लैंड से शि‍क्षा लेकर एक प्रगतिशील समाज की स्‍थापना के लिए मुसलमानों को ललकारते हैं और अलीगढ़ मुस्लिम विश्‍वविद्यालय की स्‍थापना के लिए आगे बढ़ते हैं। स्वयं महात्मा गांधी यदि सत्‍य अहिंसा के हथियारों से आगे बढ़े तो इसलिए कि उन्‍हें ब्रिटिश न्याय व्यवस्था, समाज पर यकीन था।

इसलिए इस पूरी विरासत को न भक्तिभाव से देखने की जरूरत है न नकारवादी भावना से। देश की आजादी भी जरूरी थी और समाज की जकड़न क्रूर जाति व्‍यवस्‍था से भी। गांधी पर वर्ण व्‍यवस्‍था के प्रति नरमी का आरोप सही है तो अम्‍बेडकर पर अंग्रेजों के प्रति नरमी का। दोनों के अपने कारण हैं और सबसे अच्‍छी बात है कि दोनों में एक निडरता, स्‍पष्‍टता और अपने लक्ष्‍य के प्रति पूरी निष्‍ठा है। क्‍या पूना पैक्‍ट सफल नहीं होता तो आजादी की लड़ाई की एकजुटता बनी रह सकती थी? हरगिज नहीं। और यदि अम्‍बेडकर ने सामाजिक बराबरी के लिए ऐसा हट, दृढ़ता न दिखाई होती तो क्‍या संविधान में बराबरी गरीबों के लिए विशेष सुविधाओं की बातें शामिल होंती? दोनों ही लोकतंत्र के खरे प्रहरी हैं। एक पूरे समाज की चिंता में देश भर को जगा रहा है तो दूसरा आजादी की खातिर। यह बात दीगर है कि आजादी के सामाजिक परिवर्तन जितना तेजी से होना चाहिए था, वैसा नहीं हुआ। लेकिन इसके लिए सामाजिक-राजनीतिक कारणों के साथ नेहरू वंश ज्‍यादा जिम्‍मेदार है। नेहरू की अटूट निरंकुश सत्‍ता 1946 से लेकर 1964 तक रही। क्‍या बीस वर्ष कम होते हैं, किसी बुनियादी परिवर्तन के लिए? और उसके बाद भी कुछ अंतराल को छोड़कर कांग्रेस का वंश ही सत्‍ता में रहा है। शायद गांधी न होते और उनका नेहरू को इशारा न होता तो न नेहरू की कांग्रेस अम्‍बेडकर को संविधान पीठ का अध्‍यक्ष बनाती और न वे कैबि‍नेट में आते। आये भी तो नेहरू की नीतियों से निराश होकर तुरंत इस्‍तीफा देकर बाहर हो गये। यहां तक कि हिन्‍दू धर्म को छोड़कर बौद्ध धर्म अपना लिया।

बाबा साहेब को सिर्फ दलित या जाति विशेष तक सीमित रखना उनके साथ ऐतिहासिक ज्‍यादती है। सवर्णों को समझने की जरूरत है कि इक्‍सवीं सदी का भारत धर्म ग्रंथों, उपनिषदों, पुराणों की व्‍याख्‍या से नहीं चलाया जा सकता। समानता नये समाज की बुनियाद है और इसे हासिल करना ही होगा। वहीं दलितों को भी इस विषमता से बचने की जरूरत है कि अम्‍बेडकरवाद होने की शर्त ब्राह्मण-विरोधी होना है। अम्‍बेडकर ब्राह्मणवाद की कट्टरता, ढोंग, नकली रीतिरिवाज के खिलाफ थे, व्‍यक्ति विरोधी नहीं। ऐसा न होता तो उनकी शादी एक ब्राह्मणी से नहीं हुई होती। हिन्‍दू धर्म की हजार बुराइयों के खिलाफ अम्‍बेडकर मृत्‍यु पर्यन्‍त लड़ते रहे, लेकिन मुस्लिम धर्म को वे इससे भी क्रूर मानते थे। उनका कहना था कि हिन्‍दू धर्म में अपनी बुराइयों के खिलाफ बोलने, उन्‍हें सुधारने की आजादी तो है, मुस्लिम धर्म की कट्टरता तो ऐसे प्रश्‍न उठाने की भी स्‍वतंत्रता नहीं देती। यही कारण है कि वर्षों सोचने-विचारने और कई बार कुछ मुस्लिम मित्रों के उकसावे के बावजूद न उन्होंने मुस्लिम धर्म अपनाया न ईसाई। वे बौद्ध धर्म की ओर गये। क्या यह अकारण है कि जितना बाबा साहेब अम्बेडकर का जादू है, उतना उनके अपनाये बौद्ध धर्म का नहीं। यह संतोष की भी बात है क्‍योंकि नयी सदी में और आने वाली सदियों में दुनिया भर से धर्म का मिटना ज्‍यादा स्‍थाई शांति का बंदोबस्त करेगा।

महात्मा गांधी पर एक किताब है- बहुरूप गांधी, अनु गांधी की लिखी हुई। मुझे लगता है कि बाबा साहेब अम्बेडकर के ज्ञान, अनुभव संघर्ष को देखते हुए यह शीर्षक उनके ऊपर और ज्‍यादा स्‍टीक बैठता है। शिक्षा, पंचायती राज, मजदूर बिल, अर्थशास्‍त्र, कानून से लेकर हिन्दू कोड बिल तक का ज्ञान। तीन तलाक मुद्दे पर जो बहस चल रही है, बाबा साहेब के विचार यहां सबसे महत्‍वपूर्ण हैं। 2 दिसंबर 1948 को संविधान सभा में बहस के विस्‍तार का जबाव देते हुए उन्‍होंने कहा था कि धर्म का दखल इतना क्यों होना चाहिए कि वह पूरे सामाजिक जीवन को ही समेट ले और विधानमंडल को उस क्षेत्र में घुसने ही न दे। कानून में बदलाव इसलिए चाहते हैं कि इतने अन्याय, असमानता, भेदभाव से भरी हमारी सामाजिक व्यवस्था हमारे मूलभूत मानवीय अधिकारों के रास्ते में न आये। हम ऐसी कल्पना भी कैसे कर सकते हैं कि कोई पर्सनल लॉ ऐसा भी हो सकता है जो राज्‍य के अधिकार क्षेत्र से एकदम बाहर हो। मौजूदा भारत के लिए सबसे ज्यादा प्रांसगिक महापुरुष।

हम सब का दायित्व है कि हम आत्म सजगता से अम्बेडकर जैसे व्‍यक्तित्व को देवता या मूर्तियों में कैद न होने दें। उन्होंने तो इन मूर्तियों को तोड़कर ही पूरे भारतीय समाज को रास्ता दिखाया था। वे हम सब की साझी विरासत हैं।

शिक्षा: कितना सर्जन, कितना विसर्जन : अनुपम मिश्र

Thu, 20/04/2017 - 02:07

अनुपम मि‍श्र

सेंट्रल इंस्‍टीट्यूट ऑफ एजूकेशन के 67वें स्थापन दि‍वस के अवसर पर 19 दि‍संबर 2014 को दि‍या गया अनुपम मि‍श्र का भाषण-

कोई एक सौ पचासी बरस पहले की बात है। सन् 1829 की। कोलकाता के शोभाबाजार नाम की एक जगह में एक पाठशाला की, स्कूल की स्थापना हुई थी। यह स्कूल बहुत विशिष्ट था। इसकी विशिष्टता आज एक विशेष व्यक्ति से ही सुनें हम। विनोबा इस स्कूल में 21 जून सन् 1963 में गए थे। उन्होंने यहां शिक्षा को लेकर एक सुन्दर बात-चीत की थी। उसके कुछ हिस्से हम आज यहाँ दुहरा लें और फिर आगे की बात-चीत इसी किस्से से बढ़ सकेगी।

विनोबा कहते हैं कि इस स्कूल से कई महान विद्यार्थी निकले हैं। इनमें पहला स्थान शायद रवीन्द्रनाथ का है। उनकी स्मृति में इस स्कूल में एक शिलापट्ट भी लगाया गया है। स्कूल इस पट्ट में बहुत गौरव से बताता है कि यहाँ रवीन्द्रनाथ पढ़ते थे। यह बात अलग है कि उस समय रवीन्द्रनाथ को भी मालूम नहीं था कि वे ही ‘रवीन्द्रनाथ’ हैं। और न स्कूल वालों को, उनके संचालकों को मालूम था कि वे आगे चल कर ‘रवीन्द्रनाथ’ होंगे।

यह स्कूल गुरुदेव का आदरपूर्वक स्मरण करता है। लेकिन गुरुदेव भी उस स्कूल का वैसे ही आदर के साथ स्मरण करते हों- इसका कोई ठीक प्रमाण मिलता नहीं। हाँ, एक जगह उन्होंने यह जरूर लिखा है कि, मैं पाठशाला के कारावास से मुक्त हुआ, स्कूल छोड़कर चला गया। यानी इस स्कूल में उनका मन लगा नहीं। चित्त नहीं लगा। पर स्कूल वालों ने तो अपना चित्त उन पर लगा ही दिया था।

विनोबा फिर इस प्रसंग को स्कूल से बिलकुल अलग एक और संस्था से जोड़ते हैं। स्कूल संस्था है गुणों के सर्जन की तो यह दूसरी संस्था है दुर्गुणों के विसर्जन की। जीवन में कुछ भयानक गलतियाँ, भूले हो जाएँ तो ऐसा माना जाता है कि उन भूलों को, गलतियों को मिटाने का काम इस संस्था में होता है। यह संस्था है कारावास, जेल। इसमें सामान्य अपराधियों के अलावा सरकारें, सत्ताएँ, तानाशाह आदि कई बार ऐसे लोगों को भी जेल के भीतर रखते हैं, जो उस दौर की सत्ता के हिसाब से कुछ गलत काम करते माने जाते हैं। पर बाद में तो समाज उन्हें अपने मन में एक बड़ा दर्जा दे देता है।

विनोबा कहते हैं कि जिस किसी कारावास में बड़े-बड़े लोग बन्दी बनाकर रखे जाते हैं, बाद में उन लोगों के नाम भी वहाँ एक पत्थर पर, एक बोर्ड पर लिख दिए जाते हैं। वे यहाँ थे- इस पर कारावास को बड़ा गौरव का अनुभव होता है और वह उसे अब सार्वजनिक भी कर देना चाहता है।

नैनी जेल में नेहरूजी, यरवदा जेल में गाँधीजी और मंडाले में लोकमान्य तिलक और साउथ अफ्रीका की ऐसी ही किसी जेल में नेल्सन मंडेला का नाम पत्थर पर उत्कीर्ण मिल जाएगा।

स्कूल और कारागार तो एक-दूसरे से नितान्त भिन्न, एकदम अलग-अलग संस्थाएँ होनी चाहिए- एकदम अलग-अलग स्वभाव की व्यवस्थाएँ होनी चाहिए। इन्हें चलाने वाली बातें अलग भी होनी चाहिए। कारागार की समस्याएँ भी पूरी दुनिया में लगभग एक-सी हैं और स्कूल की समस्याएँ भी लगभग एक-सी। कारागार में सुधार होना चाहिए- इसे कहते सब हैं, मानते सब हैं, पर कभी एकाध किरण चमक जाए, दो-चार योगासन सिखा दिए जाएँ, हॉलीवुड और उसी की तर्ज पर बॉलीवुड भी एकाध फिल्म बना दे- इससे ज्यादा कुछ हो नहीं पाता। कारागार सुधर नहीं पाते और कभी तो लगता है कि हमारे स्कूल तक वैसे बनने लगते हैं। किसी भी महीने के अखबार पलट लें, स्कूलों में क्या-क्या नहीं हो रहा।

रवीन्द्रनाथ ने विनोबा के शब्दों में कहें तो सदोष और तंग तालीम के कारण अपने स्कूल को कारावास कहा था। लेकिन विनोबा पूछते हैं कि इन स्कूलों में यदि आज भी ऐसी ही तालीम दी जाती है तो सोचने की बात है आखिर इनका सुधार कब होगा। स्कूल ऐसा होना चाहिए जहाँ बच्चे मुक्त मन से सीखें।

तो इसी कठिन काम में, स्कूलों को कारागार न बनने देने में आप सब लोग जुटे हैं। न जाने कब से लगे हैं। यह संस्था, सीआईई शिक्षण के विराट संसार में अभिनव प्रयोगों को प्रोत्साहन देने के लिए ही बनी थी। इसके उद्घाटन के अवसर पर मौलाना आजाद का दिया गया भाषण अभी भी हमारी धरोहर की तरह है। पढ़ना, पढ़ाना और पढ़ाने वालों को पढ़ाना- ऐसी तीन स्तर की स्कूल व्यवस्था में क्या अच्छा है, क्या बुरा है, क्या कमी है, क्या अच्छाई है- यह तो आप सब मुझसे बेहतर ही जानते हैं। मैं उस काम के लिए यों भी अयोग्य ही साबित होऊंगा। खुद पढ़ने में, पढ़ाने में मेरी कोई खास गति नहीं थी। पुराने किस्से-कहानियों में नचिकेता का किस्सा मुझे बचपन में बहुत भा गया था। नचिकेता की मृत्यु विषयक जिज्ञासा, यम से उस बालक का संवाद आदि बातों से मेरा कोई लेना-देना नहीं था। उस कहानी में एक जगह नचिकेता, जिसे स्वागत भाषण कहते हैं- वैसे कुछ बुदबुदाता है। उसी बुदबुदाहट में यह पता चलता है कि नचिकेता कोई बहुत होशियार छात्र नहीं रहा है। न वह अगली पंक्ति का छात्र था और न कोई पिछली पंक्ति का। जरा औसत किस्म का छात्र था वह। मैं भी ऐसा ही औसत दर्जे का छात्र रहा, पढ़ाई के अपने पूरे दौर में।

इस औसत दर्जे पर मैंने और आगे सोचा। कोई अध्ययन जैसा, निष्कर्ष जैसा काम तो नहीं किया पर इसे दूसरी पीढ़ी को भी सौंपने का काम सहज ही कर लिया था मैंने।

प्राथमिक शिक्षा के दौर में अपने जीवन की जब पहली परीक्षा देकर मेरा बेटा कुछ चिन्तित-सा घर लौटा तो मैंने पूछ ही लिया था कि क्या बात है ऐसी। उत्तर था पर्चा अच्छा नहीं हुआ। वह और आगे कुछ बताता, उससे पहले ही मैंने पूछा कि तुम्हारी कक्षा में और कितने साथी हैं। उत्तर था- चालीस।

तब तो किसी-न-किसी को चालीसवाँ नम्बर भी आना पड़ेगा। वह तुम भी हो सकते हो। मुझे इससे कोई परेशानी नहीं होगी और तुम्हें भी नहीं होनी चाहिए।

यह जो नम्बर गेम चल पड़ा है, इसका कोई अन्त नहीं है। कृष्ण कुमारजी ने बहुत पहले एक सुन्दर लेख लिखा था, शायद आज से कोई छह बरस पहले- जीरो सम गेम। इस खेल में किसी को कोई लाभ नहीं हो रहा, लेकिन हमारी एक-दो पीढ़ियों को तो इसमें झोंक ही दिया गया है।

घर का कचरा तो कभी-कभी दरी के नीचे भी डाल कर छिपा दिया जाता है पर समाज में यदि यह भावना बढ़ती गई कि 90 प्रतिशत से नीचे का कोई अर्थ नहीं तो हर वर्ष हमारी शिक्षण संस्थाओं से निकले इतने सारे, असफल बता दिए गए छात्र कहाँ जाएँगे। कितनी बड़ी दरी चाहिए नब्बे प्रतिशत से कम वाले इस नए कचरे को छिपाने के लिये? मीटरों नहीं किलोमीटरों लंबी-चौड़ी दरी। लगभग पूरा देश ढँक जाए इतनी बड़ी दरी बनानी पड़ेगी। फिर दरी के नीचे छिपे नब्बे के नीचे वाले भला कब तक शान्त बैठेंगे- दरी में वे जगह-जगह छेद करेंगे, उसे फाड़ कर ऊपर झांकेंगे।

मैंने तय किया था कि आज आप सबके बीच में दो ऐसे स्कूलों का किस्सा रखूँगा जो इस 90-99 के फेर से बचे रहे। इनमें से एक तो ऐसा बचा कि उसने 90-99 के फेर को अपने आस-पास के लोगों तक को ठीक से समझाया और एक ऐसा काम कर दिखाया जो हम खुद भी नहीं कर पाते- उसने समाज में अच्छी शिक्षा के दरवाजे खोले, मगर अपने दरवाजे बन्द कर दिए।

99 का फेर हमारे बच्चों में अपूर्णता की ग्लानि भरता है। वह उन्हें जताता रहता है कि इससे कम नम्बर आने पर तुम न अपने काम के हो, न अपने घर के काम के और न समाज के काम के। फिर वे खुद ऐसा मानने लगते हैं, उनके माता-पिता भी उन्हें इसी तरह देखने लगते हैं। फिर ये तीनों विभाजन एक ही रूप में समा जाते हैं। वह रूप है रोज-रोज बढ़ता बाजार। तुम बाजार के काम के नहीं। तुम पूरे नहीं हो, पूर्ण नहीं। अपूर्ण हो। निहायत बेवकूफ हो। खुद पर भी बोझा हो, हम पर भी बोझा। हर साल ऐसे उदाहरणों की कमी नहीं जो बताते हैं कि 99 न आ पाने का, अपूर्णता का बोझा कितना भारी हो जाता है कि उस बोझ को उठाकर जीवन जीने के बदले इन कोमल बच्चों को, किशोर छात्रों को अपनी जान दे देना, आत्महत्या करना ज्यादा ठीक लगता है।

उन स्कूलों पर आने से पहले एक बार फिर विनोबा का सहारा ले लें। वे रवीन्द्रनाथ के स्कूल वाले प्रसंग में ही एक बहुत ऊँची बात कहते हैं। वे बच्चों को भी उतना ही पूर्ण मानते हैं, जितने पूर्ण उनके माता-पिता हैं। वे ईशउपनिषद के पूर्णमदः पूर्णमिदम का उल्लेख करते हैं। यह भी पूर्ण, वह भी पूर्ण। माँ-बाप भी पूर्ण, बच्चे भी पूर्ण और उनके शिक्षक भी पूर्ण। यदि माँ-बाप की अपूर्णता देखकर बच्चे को शिक्षा दोगे तो पहले तो छात्र अपूर्ण दिखेगा और फिर माँ-बाप शिक्षक में भी अपूर्णता देखने लगेंगे।

यह जरा कठिन-सी बात लगती है- पूर्णता और अपूर्णता की। लेकिन बच्चे को पूर्ण समझ कर तालीम देने लगें तो कल शिक्षण का ढँग ही बदल जाएगा। विनोबा कहते हैं कि‍ इसके लिए बच्चे के आस-पास की सारी सृष्टि आनन्दमय होनी चाहिए। स्कूल भी आनन्दमय होना चाहिए। तब स्कूल में छुट्टी का सवाल ही नहीं उठता, क्योंकि वह कोई सजा तो नहीं है। वह तो आनन्द का विषय है।

ऐसी बातें ‘दूर की कौड़ी’ लगेंगी। पर समय-समय पर अनेक शिक्षाविदों ने, शिक्षा शास्त्रियों ने, क्रान्तिकारियों तक ने, उन सबने जिनने समाज की शिक्षा पर कुछ सोचा-समझा था- उनने आकाश कुसुम जैसी कल्पनाएँ की तो हैं। उनके नाम देशी भी हैं, विदेशी भी। पढ़ाने का पूरा शास्त्र जानने वाले आप सब उन नामों से मुझसे कहीं ज्यादा परिचित हैं। और इसमें भी शक नहीं कि निराशा के एक लम्बे दौर में साँस लेते हममें से ज्यादातर को लगेगा कि ऐसा होता नहीं है।

लेकिन दून या ऋषि जैसे परिचित नामों से अलग हट कर पहले हम एक गुमनाम स्कूल की यात्रा करेंगे आज।

स्कूल का नाम नहीं पर वहाँ पहुंचने के लिए कुछ तो छोर पकड़ना पड़ेगा न। इसलिए गाँव के नाम से शुरू करते हैं यह यात्रा। गाँव है- लापोड़िया। जयपुर जिले में अजमेर के रास्ते मुख्य सड़क छोड़कर कोई 20-22 किलोमीटर बाएँ हाथ पर।

यहाँ नवयुवकों की एक छोटी-सी टोली कुछ सामाजिक कामों में, खेलकूद में, भजन गाने में लगी थी। गाँव में एक सरकारी स्कूल था। पर सब बच्चे उसमें जाते नहीं थे। शायद तब सरकार को भी ‘सर्व शिक्षा अभियान’ सूझा नहीं था। गाँव में पुरखों के बने तीन बड़े तालाब थे, पर वे न जाने कब से टूटे पड़े थे। बरसात होती थी पर इन तालाबों में पानी नहीं टिकता था। अगल-बगल से बह जाता था। इन्हें सुधारे कौन। पंचायत तो ग्राम विकास की योजनाएँ बनाती थी! और उन योजनाओं में यह सब तो आता नहीं था।

गाँव में पशु- बकरी, गाय, बैल काफी थे। और चराने के लिए ग्वाले थे। ग्वाले ज्यादातर बच्चे ही थे, किशोर, जिन्हें आप सब शायद ‘दूसरा दशक’ के नाम से भी जानते हैं। गोचर था जरूर पर हर गाँव की तरह इस पर कई तरह के कब्जे थे। घास-चारा था नहीं वहाँ। इसलिए ये ग्वाले पशुओं को दूर-दूर चराने ले जाते थे।

नवयुवकों की छोटी-सी टोली इन्हीं बच्चों में घूमती थी। किसी पेड़ के नीचे बैठ उन्हें भजन सिखाती, गीत गवाती। इस टोली के नायक लक्ष्मण सिंह जी से आप पूछेंगे तो वे बड़े ही सहज ढंग से बताते हैं कि कोई बड़ा ऊँचा विचार नहीं था हमारे पास। न हम नई तालीम जानते थे, न पुरानी तालीम और न किसी तरह की सरकारी तालीम। शिक्षा का कहने लायक कोई विचार हमें पता नहीं था।

यह किस्सा है सन् 1977 का। दिन भर ऐसे ही गाते-बजाते पशु चराते। एक साथी थे गोपाल टेलर। इतनी अंग्रेजी आ गई थी कि दर्जी के बदले टेलर शब्द ज्यादा वजन रखता है बस। तो गोपाल टेलर को लगा कि दिन में तो ये सब काम होते ही हैं, रात को एक लालटेन जला कर कुछ लिखना-पढ़ना भी तो सीखना चाहिए।

सरकारी स्कूल था पर उसमें तो भरती होना पड़ता था, रोज दिन को जाना पड़ता था। रात को कोई क्यों पढ़ाएगा? सरकारी शाला के समानान्तर कोई रात्रि शाला खोलने जैसी भी कोई कल्पना नहीं थी। सरकार के टक्कर पर कोई प्राइवेट स्कूल भी खोलने की न तो इच्छा थी, न हैसियत। लक्ष्मण सिंह जी बताते हैं कि अच्छे विचारों को उतारने में समय लगता है, मेहनत लगती है, साधन लगते हैं- यह सब भी हमें कुछ पता नहीं था। नहीं तो हम तो इस सबसे घबरा जाते और फिर कुछ हो नहीं पाता। हमारे पास तो बस दो चीजें थीं- धीरज और आनन्द।

गाँव को पता भी नहीं चला और गाँव में सरकारी स्कूल के रहते हुए एक ‘और’ स्कूल खुल गया। हमें भी नहीं पता चला कि यह कब खुल गया। स्कूल खुल ही गया तो हमें पता चले उसके गुण। कौन से गुण और क्या ये सचमुच गुण ही थे। यह सूची बहुत लम्बी है। आप जैसे शिक्षाविद इन पर काम करेंगे तो हमें इन गुणों को और भी समझने का मौका मिलेगा।

किससे करवाते उद्घाटन, क्यों करवाते उद्घाटन जब पता ही नहीं कि यह स्कूल कब खुल गया? स्कूल का नाम भी नहीं रखा था, नाम तो तब रखते जब होश रहता कि कोई स्कूल खुलने जा रहा है। जब बिना नाम का स्कूल खुल ही गया तो फिर तो यही सोचने लगे कि स्कूल का नाम क्यों रखना। क्या यह भी कोई जरूरी चीज है?

नेताओं के नाम पर बने स्कूलों की कमी नहीं, क्रान्तिकारियों, शहीदों, सन्तों, मुनियों, ऋतुओं, ऋषियों और तो और जात-बिरादरी के ऊँचे और छुटभैये नेताओं के नाम पर भी सब तरफ स्कूल हैं ही। पर सचमुच अगर पूरे देश में हर गाँव में स्कूल खोलने हों तो कोई पाँच-सात लाख नामों की जरूरत पड़ेगी। नया क्या हो पाएगा तो कुछ मत करो। गुमनाम स्कूल चल पड़ा। बच्चों से कहाँ जा रहे हो जैसे प्रश्न पूछने वाले लोग थे नहीं। न पोशाक थी न वर्दी थी, बस्ता बोझ वाला भी नहीं था, बिना बोझ वाला बस्ता भी नहीं था। स्कूल जैसा कुछ था नहीं तो नाम किसका रखते!

भवन नहीं था, न अच्छा, न गिरता-पड़ता। चलता-फिरता स्कूल था। आज यहाँ, कल वहाँ। गर्मी के मौसम में बड़े बरगद के नीचे, ठण्ड के दिनों में खुले में धूप के साथ। प्रश्न पूछने वालों की क्या कमी। कोई पूछ ही बैठे कि और बरसात के दिनों में कहाँ लगाओगे स्कूल? तो उत्तर मिलता कि सब बच्चे तो किसान-परिवार से हैं। बरसात में वे सब अपने खेतों में काम करते हैं। यानी तब छुट्टी रखी जाएगी क्या? उत्तर मिलता कि नहीं। उन दिनों हमारे बच्चे गुणा-भाग सीखते हैं। गुणा-भाग कैसा? भगवान का गुणा-भाग। एक मुट्ठी गेहूँ बोने से जो पौधे उगेंगे, उनकी बाली गिन कर तो देखो। प्रकृति का विराट गुणा-भाग समझने का इतना सुन्दर मौका कब मिलेगा। सारे सरल और कठिन गुणा-भाग, दो दूनी चार जैसे सारे पहाड़ों का पहाड़, गणित का पहाड़ भी खेती के गुणा-भाग से छोटा ही, बौना ही होगा। यह नया बीज-गणित, बीजों का गणित जीवन के शिक्षण का भाग है।

कक्षाओं का शुरू में विभाजन नहीं था पर धीरे-धीरे पहली टोली के बच्चे आगे बढ़े तो, वे अपने आप दूसरी कक्षा में आ गए। वे अपने पीछे जो खाली जगह कर आए थे, उसमें अब उत्साह से एक नई जमात आ गई। पर पहली कक्षा में पढ़ा क्या? कौन-सा पाठ्यक्रम? कोई बना बनाया ढाँचा नहीं रखा गया था। जो अक्षर ज्ञान सरकारी स्कूल में पढ़ाया जाता था, या कहें नहीं पढ़ाया जाता था, उसे यहाँ बिना डाँटे-फटकारे पढ़ा दिया था। और साथ में अनगिनत नई बातें, जानकारियाँ पाठ्यक्रम के अलावा भी। कुछ पचास पेड़-पौधों के नाम तो उन्हें आते ही थे, लेकिन अब उन नामों को लिखना भी आ गया था।

पहली से दूसरी कक्षा के बीच यों कोई दीवार तो नहीं थी, भवन ही नहीं था फिर भी बच्चों को लगा कि स्कूलों में परीक्षा होती है तो हमारी परीक्षा कब होगी? नवयुवकों की टोली खुद कोई बड़ी पढ़ी-लिखी तो थी नहीं। आपस में बैठ दो-चार तरह के प्रश्न- भाषा, अक्षर ज्ञान, गिनती आदि के बना लिए। एकाध वर्ष इस तरह से पर्चे बने, पर्चे जाँचे भी गए और पास-फेल बताने के बदले बच्चों को बुलाकर उनकी गलतियाँ वगैरह जो थीं, वो सब समझा दीं और उन्हें अगली कक्षा में भेज दिया।

फिर इस टोली को लगा कि जीवन में प्रश्न पूछना भी तो आना चाहिए बच्चों को। क्यों न हम उन्हें अभी से प्रश्न पूछना सिखाने लगें। इससे हम भी कुछ नया सीखेंगे और वे भी। तय हुआ कि हरेक छात्र एक प्रश्न पत्र खुद बनाएगा। बीस छात्रों की कक्षा में एक ही विषय पर बीस प्रश्न पत्र तैयार हो गए। यह भी निर्णय किया गया कि उन्हें आपस में पत्तों की तरह फीट कर एक दूसरे में बाँट दिया जाए। देखा गया कि सभी प्रश्न पत्र ठीक-ठाक बने थे, न बड़े सरल न बहुत कठिन। उत्तरों की जाँच टोली के सदस्यों ने ही की।

एकाध वर्ष इसी तरह चला। फिर यह बात भी ध्यान में आई कि प्रश्न जब बच्चे बना ही रहे हैं तो उत्तर पुस्तिका की जाँच हम क्यों करें! यह काम भी बच्चों पर डाल कर देखना चाहिए। आखिर जीवन में अपना खुद का मूल्यांकन सन्तुलित ढँग से करना भी आना चाहिए। न अपने को कोई तीसमारखाँ समझे और न दूसरों से गया गुजरा। सहज आत्मविश्वास से बच्चों का मन खुलना और खिलना चाहिए। प्रश्न भी तुम्हीं पूछो, उत्तरों की जाँच-पड़ताल भी तुम्हीं करो, अब। टोली की जरूरत पड़े तो मदद ली जा सकती है। निष्पक्षता दूसरों के प्रति और अपने प्रति भी सीखनी चाहिए। अपना हाथ जगन्नाथ जैसे मुहावरे पढ़ तो लो पर उन्हें अपने से दूर ही रखो।

इस गुमनाम स्कूल का कोई संचालक मण्डल नहीं था। अध्यक्ष, सदस्य, मन्त्री, प्रधानाचार्य, कोषाध्यक्ष जैसा कोई पद नहीं था। महीने में कुल जितना खर्च होता, उतना चन्दा माता-पिता से मिल जाए तो फीस क्यों लेना। कई बार कोई कहता कि फसल कटने पर हम कुछ दे पाएँगे, अभी तो है नहीं। स्कूल में कोई रजिस्टर नहीं था, इसलिए फीस, हाजरी, किसने दिया पैसा, किसने नहीं- ऐसा कुछ भी रिकॉर्ड नहीं रखा गया।

बच्चे पढ़ रहे थे, खेल रहे थे, आनन्द कर रहे थे। गाँव में इन नवयुवकों की टोली की एक संस्था भी थी- ग्राम विकास नवयुवक मण्डल। उसमें कई तरह के मेहमान आते थे। कभी आस-पास से तो कभी दूर-दूर से भी। टोली उन मेहमानों से भी कहती कि थोड़ा समय निकालें और हमारे बच्चों से भी बातें करें।

क्या बातें? कुछ भी बताएँ जो आपको ठीक लगे। एक वर्ष में 25-30 विजिटिंग फैकल्टी। तरह-तरह की जानकारियाँ। स्कूल चल पड़ा मजे-मजे में।

इधर, इन बच्चों के चेहरों पर सचमुच ज्ञान की एक चमक-सी दिखने लगी थी। जो परिवार अपने बच्चों को सरकारी स्कूल भेज रहे थे, वे भी अब कभी-कभी इस विचित्र स्कूल में आने लगे थे। उन्हें भी यहाँ का वातावरण खुला-खुला-सा दिखा। डाँट-फटकार, मारा-पीटी कुछ नहीं। बच्चे महकते-से, चहकते-से दिखते थे। कुछ परिवारों ने अपने बच्चों को सरकारी स्कूल से निकाल कर इस स्कूल में डाल दिया।

नवयुवकों की टोली को लगा कि एक ही गाँव में कम-से-कम शिक्षा को लेकर होड़ नहीं मचनी चाहिए। लक्ष्मण सिंह जी एक दिन सरकारी स्कूल चले गए। प्रधान मास्टरजी से मिले। बड़ी विनम्रता से उन्हें भी अपने स्कूल आने का निमन्त्रण दिया। कहा ये भी आपके ही बच्चे हैं, आपका ही स्कूल है। यहाँ थोड़ी भीड़ ज्यादा हो गई थी तो वहाँ कुछ कर लिया है।

धीरे-धीरे वहाँ के एकाध मास्टर इधर भी आने लगे। वे यहाँ के बच्चों में ज्यादा रमने लगे। एक बड़ा अन्तर तो समझदारी का था। उधम यहाँ बिलकुल नहीं था। बचपन था, बचपना नहीं था। उमर में सयाने हुए बिना बच्चे व्यवहार में कितने सयाने हो सकते हैं- इसका कुछ चित्र उभरने लगा था।

इस बीच गाँव के तीनों टूटे तालाब भी नव-युवकों की टोली और उनकी संस्था को बाहर से मिली कुछ मदद से बन गए थे। यहाँ पानी कम ही बरसता है। कोई 24 इंच। पर अब जितना भी बरसता उसे रोकने का पूरा प्रबन्ध हो गया था। तब आई बारी गाँव के गोचर को ठीक करने की, कब्जे हटाने की। फिर इस आन्दोलन में इस स्कूल के सभी बच्चों ने भाग लिया। कभी-कभी तो ठण्ड की रातें गोचर में रजाई ओढ़ कर पहरा देते हुए भी कटीं- अपने माता-पिता के साथ।

गाँव में सभी जातियों के परिवार हैं। चोरी-छिपे कई परिवार आस-पास के हिरण, खरगोश का शिकार करते थे। गोचर उजड़ जाने से इनकी संख्या भी कम हो गई थी। पर गोचर सुधरने लगा तो वन के ये छोटे पशु भी आने लगे।

तब गाँव लापोड़िया ने सबकी बैठक कर शिकार न खेलने का संकल्प लिया। इसका स्कूल से यों कोई खास सम्बन्ध नहीं दिखेगा पर शहर के अपने बच्चे स्कूलों की तरफ से कभी-कभी चिड़ियाघर जाते हैं न। लापोड़िया गाँव ने अपने पूरे क्षेत्र को खुला चिड़ियाघर घोषित किया। सब की निगरानी से। इसमें स्कूल ने भी साथ दिया। जगह-जगह वन्य प्राणियों के संरक्षण, संवर्धन के बोर्ड बना कर लगा दिए गए और उस इबारत को लोगों के मन में भी उतारने की कोशिश की गई।

इस खुले चिड़ियाघर में शहरों के चिड़ियाघरों की तरह भले ही शेर, हाथी या जिराफ न हों लेकिन जो भी जानवर और पक्षी थे वे इस स्कूल की तरह ही खुले में घूमते थे और उनके बीच घूमते थे ये बच्चे।

स्कूल की कक्षाएँ आगे बढ़ती गईं। पहली दूसरी हो गई, दूसरी तीसरी। इस तरह जब पहली बार सातवीं कक्षा आठवीं बनी तो आठवीं की बोर्ड की ऊँची दीवार बच्चों के सामने खड़ी थी। सन् 1985 की बात होगी। अब तक तो वे खुद अपनी परीक्षा लेते थे, खुद ही प्रश्न बनाते थे, खुद ही अपने उत्तरों को सावधानी से जाँचते थे। अब उन्हें दूसरों के बनाए प्रश्न-पत्र मिलने वाले थे। उनके उत्तर भी कोई और जाँचने वाले थे। लेकिन बच्चों को, इस टोली को और उनके माता-पिता को भी इसकी कोई खास चिन्ता नहीं थी। बोर्ड की परीक्षा के अदृश्य डर से यह स्कूल मुक्त था।

पूरी तैयारी थी पहली बार आठवीं की इस अपरिचित बाधा से मिलने की। सब बच्चों के फॉर्म राज्य शिक्षा बोर्ड में प्राइवेट छात्र की तरह जमा कराए गए। वहीं के सरकारी स्कूल में उन्हें परीक्षा में बैठने की अनुमति मिली। अपने स्कूल में परीक्षा भी अपनी ही थी। तुरन्त परिणाम आ जाता था। यहाँ शिक्षा मण्डल का विशाल संगठन था। पूरे राज्य में फैला हुआ। इसलिए परिणाम आने में लम्बा इन्तजार करना पड़ा। पर जो बच्चे परीक्षा दे चुके थे, उन्होंने इस बीच में स्कूल आना बन्द नहीं किया। वे हमेशा की तरह आते रहे। नई-नई चीजें करते रहे, अपने से छोटे बच्चों को पढ़ाते भी रहे।

परिणाम आया। इस गुमनाम स्कूल की पूरी कक्षा इस दीवार को मजे में फांद गई थी। परिणाम शत-प्रतिशत था।

बच्चों की संख्या भी बढ़ चली थी, इसलिए शिक्षकों की जरूरत भी पड़ी। पर यह संख्या दो या तीन से ज्यादा कभी नहीं हो पाई। बाकी पढ़ाई बच्चे मिलकर करते। बड़ी कक्षा के बच्चे छोटी कक्षा को पढ़ाते। अंग्रेजी, विज्ञान और गणित में थोड़ा अभ्यास रखने वाले रामनारायण बुनकर किसी और शहर से विवाह कर गाँव में आई राजेश कंवर ने मदद दी। पर ये भी बच्चों को पढ़ाने की कोई डिग्री नहीं रखते थे। पढ़ाते-पढ़ाते सीखते गए, सिखाते गए।

बच्चे सन् 1985 के बाद हर साल आठवीं की एक दीवार कूदते-फाँदते रहे। हाँ, स्कूल की इमारत तो कभी-भी नहीं बनी, पर कुछ वर्ष बाद पाठ्यक्रम की किताबें बढ़ने लगीं। तो कुछ नई खरीद करनी पड़ी। इन किताबों-कॉपियों को रोज-रोज घर से भारी बस्ते में लाना और फिर स्कूल से वापस घर ले जाने के नियम भी बड़े लचीले रखे गए। चाहो तो ले आओ, चाहो तो ले जाओ। एक घर में किसी कोने में बनी आलमारियों में सबके बस्ते रखने का इन्तजाम भी हो गया था। जिसे होमवर्क कहा जाता है वह यहाँ नहीं था। यों भी घर में कोई कम काम होते हैं क्या? घर के ऐसे कामों में माता-पिता का हाथ बटाना भी तो एक शिक्षण ही है।

स्कूल में जब ठीक मानी गई संख्या में शिक्षक ही नहीं थे तो चपरासी जैसा पद भी कहाँ होता। देश भर के, शायद दुनिया भर के स्कूलों में बजने वाली घण्टी यहाँ नहीं बजती थी। इसलिए दिन का समय अलग-अलग विषयों के घण्टों में बाँटा नहीं जाता था।

आज भाषा पढ़ रहे हैं तो दो-चार दिन भाषा, व्याकरण, उच्चारण, विभक्तियाँ- सब कुछ अच्छे-से पढ़ समझ लो। फिर बारी गणित की आ गई तो दो-चार दिन गुणा-भाग का मजा लो। कभी-कभी तो एक ही विषय पूरे हफ्ते चल जाता। पचास मिनट की तलवार किसी के सिर पर नहीं लटकती थी। न शिक्षक पर न छात्र पर।

फि‍र स्कूल में किसी घर से एक अखबार भी आने लगा। बड़े बच्चों को किताबों के अलावा अखबार पढ़ने की भी इच्छा हो तो वह पूरी की जानी चाहिए। सभी घरों में यों भी अखबार नहीं आता था। फिर बच्चों ने अखबार की खबरों पर टिप्पणी भी देना, अपनी पसन्द, नापसन्द भी बताना शुरू किया। फिर वे थोड़ा आगे बढ़े। खुद हाथ का लिखा दो-चार पन्ने का एक अखबार भी निकालने लगे। स्कूल का नाम नहीं था, अखबार भी बिना नाम का। हफ्ते में एक बार। हाथ से गाँव की, स्कूल की, खेती-बाड़ी की, आस-पास की खबरें, टिप्पणियाँ लिखी जातीं। गाँव से 20 किलोमीटर दूर जयपुर-अजमेर सड़क पर दूदू कस्बे में फोटो कॉपी मशीन थी। शहर आते-जाते किसी के हाथ से हस्त लिखित सामग्री भेज दी जाती। कोई सौ प्रतियाँ वापस आ जातीं। इसे बच्चों के अलावा गाँव के बड़े लोग भी खरीदते और चाय तक की दुकानों पर इसे पढ़ा जाने लगा था। आठ आना या एक रुपया दाम भी रखा गया ताकि फोटो कॉपी का खर्च निकल आए। कोशिश की जाती कि अधिक-से-अधिक बच्चे इसमें अपनी राय रखें, कुछ-न-कुछ सब लिखें। ऐसा स्कूल चला सकने वाली टोली, उसका गाँव अभी एक और विचित्र प्रयोग करने जा रहा था।

गाँव ने शिकार बन्द कर दिया था। वन्य प्राणियों का संरक्षण गाँव खुद कर रहा था। खुले चिड़ियाघर का जिक्र पहले आ ही चुका है।

गाँव के तीनों तालाब ठीक होकर अब लबालब भरने लगे थे। एक तालाब पर चुग्गा भी रखा जाने लगा था। हर घर अपनी फसल से कुछ अनाज निकाल कर इस चुग्गा-घर में बनी एक कोठरी में जमा करने लगा था। यहाँ से इसका एक अंश रोज निकाल कर एक विशेष बने चबूतरे पर डाल दिया जाता था। इस चबूतरे पर बिल्ली-कुत्ते झपट नहीं सकते थे। आस-पास की कई तरह की चिड़ियों के झुण्ड यहाँ बेफिक्र आते और दाना चुगते थे। सुबह से शाम तक चहचहाहट बनी रहती थी।

चूहे कहाँ नहीं हैं। लापोड़िया में खूब थे। किसानों के घरों में कहीं-न-कहीं तो अनाज की बोरियाँ होंगी ही। एक दिन लक्ष्मण सिंह जी को लगा कि हम सब घरों में चूहों को पकड़ने के लिए पिंजरे रखते हैं। पकड़ते तो खुद हैं पर फिर बच्चों को पिंजरा पकड़ा कर कहते हैं, बाहर छोड़ कर आओ या मार दो। पेड़ बचा रहे हैं, वन्य प्राणी बचा रहे हैं, लेकिन घर के प्राणी को मार रहे हैं।

इस चूहे ने हमारा भला ऐसा क्या बिगाड़ा है? बम्बई के सिद्धि विनायक मन्दिर में पूजा करने बड़े-बड़े प्रसिद्ध लोगों के जाने की खबरें छपती हैं, कैलेण्डरों में तरह-तरह के गणेशजी मिलते हैं और उन्हीं के पास बैठा रहता है यह चूहा। पर हम उसे न जाने कब से मारे चले आ रहे हैं। न सन्त उसे बचाते हैं, न मुनि लोग, न सरकारें। अरे वो तो चूहा मारने के लिए इनाम भी देती हैं। अनाज का दुश्मन नम्बर एक मानती है सरकार चूहों को।

गाँव के कुछ लोग मिलकर बैठे। बातचीत चली कि इस पर क्या किया जा सकता है। सबने माना कि अनाज भी बचे और चूहा भी। प्रयोग के तौर पर गाँव की आबादी से दो-चार कदम की दूरी पर एक चूहा घर बनाने का निर्णय हुआ। न जीव दया का नारा। न अहिंसा को परमधर्म बताने का कोई ऊँचा झण्डा। बस प्रकृति को समझकर अपना कर्तव्य निभाने की एक कोशिश भर करने की बात थी।

कोई दस बीघा जमीन इस काम के लिए निकाली गई इस चूहा घर के लिए। एक तरह की झाड़ी से बाड़ लगाई ताकि एकदम बिल्ली कुत्ते न घुस पाएँ। सबको बता दिया गया कि घरों में चूहों को पकड़ें तो मारे नहीं, इस चूहा घर में लाकर उन्हें छोड़ दें।

घर के कोनों में दुबके चूहे जब यहाँ दस बीघा में छूटने लगे तो उन्हें कैसा लगा- ये तो टीवी वाले उनसे कभी पूछ ही लेंगे। पर जो यहाँ आया उसने अपने शानदार बिल बनाने शुरू कर दिए। कुछ ही समय में चूहा घर आबाद हो गया, बस्ती बस गई। गाँव में चील, उल्लू भी हैं, साँप भी, बिल्ली भी हैं, चूहे भी। प्रकृति में सब कुछ सबके सहारे मिल-जुलकर चलता है।

गाँव में चूहा घर बना गया। वहाँ के पेड़ों पर जो चिड़ियाँ बैठतीं उनकी बीट से तरह-तरह की घास के बीज नीचे गिरते। चूहा घर में बिल बन गए, आस-पास घास उग आई। उन्हें जितना भोजन चाहिए उतना मिल गया, जितनी सुरक्षा मिलनी चाहिए, घास के कारण उतनी सुरक्षा मिल गई और जितने चूहे इन चील, उल्लुओं को चाहिए, उतने उन्हें मिल ही जाते होंगे।

चूहा घर बने अब दस वर्ष पूरे हो रहे हैं। गाँव में चूहों की आबादी नहीं बढ़ी है। प्रकृति सन्तुलन खुद रखती है। खुद चूहे आजादी का महत्व जानते हैं। शायद वे खुद अपनी आबादी पर नियन्त्रण रखे हैं।

तो क्या घरों में चूहे एकदम खत्म हो गए हैं अब वे घरों में नहीं आते? लक्ष्मण सिंह जी बड़े ही सहज ढँग से उत्तर देते हैं कि देखिए, आप भी कभी-कभी घर का खाना खाते-खाते अघा जाते हैं तो किसी दिन होटल में, ढाबे में चले ही जाते हैं। इसी तरह एकाध बार ये चूहे भी अपना घर छोड़ कर हमारे घरों में आकर हलवा-पूरी या कुछ तो भी खा जाते हैं पर अब प्रायः वे घरों के भीतर वैसे नहीं रहते जैसे पहले रहते थे। अब उनके अपने घर हैं, आरामदेह बिल हैं- यह जीवन उनके लिए ज्यादा स्वाभाविक है, सहज है। शायद ज्यादा आनन्द का है। घर के कारागार से उनकी मुक्ति हुई है।

कारागार से फिर स्कूल को याद कर लें। लापोड़िया ने स्कूल को आनन्दधाम बनाया। फिर देखा कि गाँव का सरकारी स्कूल भी थोड़ा-थोड़ा सुधर चला है। नवयुवकों की इस टोली ने फिर सन् 2006 में तय किया कि हमें किसी की होड़ में तो स्कूल चलाना नहीं था। तो क्यों न इसे अब बन्द कर दें।

सृजन किया था जैसे चुप-चाप, उसी तरह एक दिन उस स्कूल का विसर्जन कर दिया। न नाम था, न भवन, न बैंक में कोई खाता था, न कोई संचालक मण्डल, न ऐसे शिक्षक थे, जिन्हें स्कूल बन्द करने के बाद किसी तरह की बेरोजगारी का सामना करना पड़ता। या कि वे धरना देते दरवाजे पर। सबने मिलकर शुरू किया था। सबने मिल कर उसे सिरा दिया, उसका विसर्जन कर दिया।

विसर्जित होकर यह विचार पूरे गाँव में फैल गया है। लोग अच्छी बातें सीखने की कोशिश करते हैं, बुरी बातों को विसर्जित करने का प्रयास करते हैं। सब अच्छा सीख गए, सब बुरा मिटा दिया- ऐसा तो नहीं कह सकते पर इसी लम्बे दौर में इस क्षेत्र में 9 वर्ष का भयानक अकाल पड़ा था। आधे से कम बरसात गिरी थी, पर गाँव में एक बूँद पानी की कमी नहीं थी। गाँव के तीनों तालाब ऊपर से सूख गए थे पर इनने गाँव के भूजल को इतना सम्पन्न बना दिया था कि कोई सौ कुँओं में से एक भी कुँआ सूखा नहीं था, नौ साल के अकाल में। पूरे दौर में ठीक-ठीक फसल होती रही हर खेत में। गाँव के बच्चों को दूध तक मिलता रहा, वहाँ के गोचर के कारण। जयपुर की सरस डेयरी को भी इस अकालग्रस्त गाँव से सबसे पौष्टिक दूध मिला। सरकार ने उसका प्रमाणपत्र भी दिया था तब।

फिर कोई चार साल पहले इस इलाके में इतना अधिक पानी गिरा कि जयपुर शहर में भी बाढ़ आ गई, आस-पास के कई गाँव डूबे थे तब। पर लापोड़िया बाढ़ में डूबा नहीं। उसके तालाबों ने फिर सारा अतिरिक्त पानी आने वाले दौर के लिए समेट लिया था।

लापोड़िया गाँव ने न तो सरकारी स्कूल की निन्दा की, न कोई निजी प्राइवेट स्कूल उसकी टक्कर पर खोला, न किसी कारपोरेट को, कम्पनी को उसकी सामाजिक जिम्मेदारी जता कर शिक्षा में सुधार की योजना बनाई। उसने ममत्व, यह तो मेरा है, मान कर एक गुमनाम स्कूल खोला, शिक्षण को कक्षा की दीवारों से उठा कर पूरे गाँव में फैलने का विनम्र प्रयास किया और फिर उसे चुपचाप समेट भी लिया। एक भी पुस्तिका या कोई लेख इस प्रयोग को अमर बनाने के लिए उसने छापा नहीं।

शुरू में हमने दो स्कूलों की चर्चा करने की बात रखी थी। दूसरा स्कूल लापोड़िया गांव से थोड़ा अलग स्वभाव का है। यह पंजाब के गुरुदासपुर जिले के तुगलवाला गाँव में चल रहा है। पर यह लापोड़िया की तरह गुमनाम नहीं है। शिक्षा के कड़वे दौर में इस मीठे स्कूल का नाम है- बाबा आया सिंह रियाड़की स्कूल। सन् 1925 में यहाँ के एक परोपकारी बाबा आया सिंह ने इसकी स्थापना पुत्री पाठशाला के रूप में की थी। गुरुमुख परोपकार उमाहा उनका घोष वाक्य था- यानी गुरु का सच्चा सेवक परोपकार भी बहुत चाव से, आनन्द से करे।

यह विद्यालय यों कोई 15 एकड़ में फैला हुआ है पर बहुत चाव से, आनन्द से काम करने के कारण आस-पास के अनेक गाँवों के मनों में, उनके हृदय में इस स्कूल ने जो जगह बनाई है, उसका तो कोई हिसाब नहीं लगाया जा सकता। यहाँ प्राथमिक शाला- यानी पहली कक्षा से एम.ए. तक की शिक्षा दी जाती है। छात्राओं की संख्या है लगभग 3000। इसमें से कोई 1000 छात्राएँ अपने पास के घरों से आती हैं। दूर के गाँवों की कोई 2000 छात्राएँ यहाँ छात्रावास में रहती हैं। पढ़ाई का खर्च महीने के हिसाब से नहीं, वर्ष के हिसाब से है। रोज आने-जाने वालों की फीस लगभग एक हजार रुपए सालाना है। जो यहीं रहती हैं, उन्हें पढ़ाई, आवास और भोजन का खर्च लगभग 6,600 रुपया देना होता है। पूरे वर्ष का। जिन परिवारों को यह मामूली-सी फीस भी ज्यादा लगे- उनसे एक रुपया भी नहीं लिया जाता। भरती होने के लिए आने वाली किसी भी छात्रा को यहाँ वापस नहीं किया जाता। सचमुच, विद्यामन्दिर के दरवाजे हरेक के लिए खुले हैं।

3000 छात्राओं वाले इस शिक्षण संस्थान में बहुत गिनती करें तो शायद दस-पांच शिक्षक मिल जाएँगे। पढ़ाई का, पढ़ाने का सारा काम छात्राएँ ही करती हैं। बड़ी कक्षाओं की छात्राएँ अपने से छोटी कक्षाओं को पूरे उत्साह से पढ़ाती हैं। सैल्फ टीचिंग डे हमारे स्कूलों में होता है पर यहाँ तो सेल्फ टीचिंग इयर है पूरा।

सिर्फ पढ़ाना ही नहीं, इतने बड़े शिक्षण संस्थान का पूरा प्रबन्ध छात्राओं के हाथ में ही है। यह काम दरवाजे पर होने वाली चौकीदारी से लेकर प्रधानाध्यापक के कमरे तक जाता है। साफ-सफाई, बिजली-पानी, इतनी बड़ी संख्या में छात्राओं का नाश्ता, दो समय का भोजन, तीन-चार मंजिल की इमारतों की टूट-फूट, नया निर्माण- सारे काम छात्राओं की टोलियाँ मिल बाँट कर करती हैं। संस्थान के रोजमर्रा के सब काम निपटाने के बाद इन्हीं छात्राओं की टोलियाँ जरूरत पड़ने पर आस-पास के गाँवों में सामाजिक विषयों पर, कुरीतियों पर, भ्रूण हत्या, नशाखोरी जैसे विषयों पर जन-जागरण के लिए पद यात्राओं पर भी निकल पड़ती हैं।

यह एक ऐसा संस्थान माना जाता है जहाँ पंजाब के प्रायः सभी मुख्यमंत्री, राज्यपाल वर्ष में एकाध बार माथा टेकने आ ही जाते हैं। पर इस संस्थान ने आज तक पंजाब सरकार से मान्यता नहीं माँगी है। सरकार ने मान्यता देने का प्रस्ताव अपनी तरफ से रखा तो भी स्कूल ने विनम्रता से मना किया है।

इसके संचालक श्री सरदार स्वरन सिंह विर्क का कहना है कि बच्चों की फीस से, खेती-बाड़ी, फल-सब्जी के बगीचों से इतना कुछ मिल जाता है कि विद्यालय को सरकार से मदद लेने की जरूरत नहीं पड़ती। फिर शासन की मान्यता का मतलब है शासन के तरह-तरह के नियमों का पालन। ज्यादातर नियम व्यवहार में उतारना कठिन होता है तो लोग उन्हें चुपचाप तोड़ देते हैं। फिर झूठ बोलना पड़ता है। ना, यह सब यहाँ होता नहीं। इस स्कूल को इस इलाके में सच की पाठशाला के नाम से भी जाना जाता है। यहाँ छात्राएँ बोर्ड और विश्वविद्यालय की परीक्षाएँप्राइवेट छात्र की तरह देती हैं।

पूरे देश में परीक्षाओं में नकल करने के तरह-तरह के नए तरीके, नई तकनीकें खोजी जा रही हैं। पंजाब के परीक्षा में नकल एक बड़ी समस्या है। नकल रोकने के फ्लाइंग दस्ते तक हैं। लेकिन गाँव तुगलवाला की यह संस्था नकल के बदले छात्राओं की अकल और उनके संस्कारों पर जोर देती है। यह बताते हुए थोड़ा अटपटा भी लगता है कि यहाँ नकल पकड़ने वाले को एक बड़ा इनाम दिए जाने का बोर्ड तक लगा है !

शुरू में कहीं विनोबा की एक बात कही थी- छात्र भी पूर्ण, उसके माता-पिता भी पूर्ण और शिक्षक भी पूर्ण। यहाँ शिक्षण का काम तीन चरणों में होता है। पहले में एक शिक्षिका पचास छात्राओं को पढ़ाती है। फिर दस-दस के समूहों को पढ़ाया जाता है। इन समूहों में कोई छात्रा किसी कारण से कुछ कमजोर दिखे तो उसे अपूर्ण, मूर्ख नहीं माना जाता- तब उसे एक अलग शिक्षिका समय देती है और उसे कुछ ही दिनों में सबसे साथ मिला दिया जाता है।

शिक्षा के स्वावलम्बन की ऐसी मिसाल कम ही जगह होंगी- केवल गेहूँ, धान ही पैदा नहीं होता। इतनी बड़ी रसोई शाला का पूरा आटा यहीं पिसता है, धान की भूसी यहीं निकाली जाती है। गन्ना पैदा होता है तो गुड़ भी यहीं पकता है, सौर ऊर्जा है, गोबर गैस है। काम दे चुकी छोटी-सी-छोटी चीज़ भी कचरे में नहीं फेंकी जाती- सब कुछ एक जगह इकट्ठा करने वाली टोली है और फिर इस कबाड़ से क्या-क्या जुगाड़ बन सकता है- उसे भी देखा जाता है। बची चीजें बाकायदा कबाड़ी को बेची जाती हैं और उसकी भी पूरी आमदनी का हिसाब रखा जाता है।

सर्व धर्म समभाव पर विशेष जोर देने की बात ही नहीं है। वह तो है ही यहाँ के वातावरण में। दिन की शुरुआत सुबह गुरुवाणी के पाठ से होती है। परिसर की सफाई रोज नहीं होती। सप्ताह में एक बार। क्योंकि 3000 की छात्र संख्या होने पर भी कोई कहीं कचरा नहीं फेंकता। स्वच्छता अभियान यहाँ बिना किसी नारे के बरसों से चल रहा है।

आप सभी शिक्षा के संसार में बाकी संसार की तरह आ रही गिरावट की चिन्ता कर रहे हैं, उसे अपने-अपने ढँग से सम्भाल भी रहे हैं। आज सब चीजें, सुरीले से सुरीले विचार अन्त में जाकर बाजार का बाजा बजाने लग जा रहे हैं। शिक्षा की दुनिया में शिक्षण अपने आप में एक बड़ा बाजार बन गया है। पर जैसे बाजार में मुद्रास्फीति आई है ऐसे ही शिक्षा के बाजार में भी यह मुद्रास्फीति आ गई है। पहले सन्तरामजी बी.ए. से काम चला लेते थे। आज तो पीएचडी का दाम भी घट गया है।
हम में से कई लोगों को इसी परिस्थिति में आगे काम करना है। जो पढ़ाई आज आप कर रहे हैं, वह आगे-पीछे आपको एक ठीक नौकरी देगी- पर शायद इसी बाजार में। प्रायः साधारण परिवारों से आए हम सबके लिए यह एक जरूरी काम बन जाता है। इसलिए आप सबको एक छोटी-सी सलाह- नौकरी करें जीविका के लिए। लेकिन चाकरी करें बच्चों की। हम अपनी नौकरी में जितना अंश चाकरी का मिलाते जाएँगे, उतना अधिक आनन्द आने लगेगा।

विनोबा से हमने आज की बात प्रारम्भ की थी। उन्हीं की बात से हम विराम देंगे। यह प्रसंग बहुत सुन्दर है। इसे बार-बार दुहराने में भी पुनर्रुक्ति दोष नहीं दिखता। उनके शब्द ठीक याद नहीं। भाव कुछ ऐसे हैं:

पानी जब बहता है तो वह अपने सामने कोई बड़ा लक्ष्य, बड़ा नारा नहीं रखता कि मुझे तो बस महासागर से ही मिलना है। वह बहता चलता है। सामने छोटा-सा गड्ढा आ जाए तो पहले उसे भरता है। बच गया तो उसे भर कर आगे बढ़ चलता है। छोटे-छोटे ऐसे अनेक गड्ढों को भरते-भरते वह महासागर तक पहुँच जाए तो ठीक। नहीं तो कुछ छोटे गड्ढों को भर कर ही सन्तोष पा लेता है।

ऐसी विनम्रता हम में आ जाए तो शायद हमें महासागर तक पहुँचने की शिक्षा भी मिल जाएगी।

हौसले की उड़ान : शशि‍ काण्डपाल

Mon, 17/04/2017 - 11:01

खुद को पैदायशी शिक्षिका मानने वाली शशि‍ काण्डपाल दि‍व्यांग

शशि‍ काण्डपाल

बच्चों के लि‍ए वि‍शेष रूप से संवेदनशील हैं। वर्तमान में वह दिव्यांग बच्चों के लिए संस्था ‘शाश्वत जिज्ञासा’ से जुड़ी हैं। लखनऊ के नामी स्कूल में पढ़ाने के दौरान उनके संपर्क में आए दि‍व्यांग बच्चे का संस्मरण-

कुछ समय पहले मॉल में बहुत जरूरी सामान ढूंढ़ने की दौड़ में अचानक लगा मानो कोई अजीब सी आवाज़ में मेम, मेम पुकार रहा है। आम इंसान शायद उस मेम शब्द को न समझ पाए, लेकिन मैं जान जाती हूं कि‍ कोई वि‍शेष बच्चा मुझे पुकार रहा है। नज़र घुमाई तो व्हील चेयर से आधा लटका बच्चा मुझे यूं लपकने को तैयार था, मानो जरा सी ताक़त आ जाये तो वो मुझे पकड़ ले।

मैं याद करने की कोशिश में उस तक पहुंची तो हैरान रह गई। वह रुद्रांश था।

मेरा वह वि‍शेष बच्चा, जिसके लिए मुझे कई चट्टानों से टकराना पड़ा था और सबसे बड़ी चट्टान खुद उसका अपना परिवार था, समाज था और स्कूल था। अब वह शरीर से कमजोर नहीं था। अच्छा खासा अठारह साल का नौजवान। आवाज़ भले ही भारी हो गई थी, हँसी वही दूधिया थी।
रुद्रांश एक संभ्रांत परिवार के अत्यंत कामयाब पिता की नाकामयाबी का प्रतीक बन चुका था। वह मुझे तब मि‍ला, जब उसके छोटे भाई के स्टडी टूर के सि‍लसि‍ले में उसके घर गई।

मैं ड्राइंग रूम में बैठी चिंघाड़ने सी आवाज़ें सुन रही थी, जिसे घरवाले कभी बिस्कुट, कभी मिठाई या कभी फालतू के ठहाकों से बहका रहे थे। मुझे वह आवाज़ बार-बार परेशान कर रही थी और लगता था मानो किसी को यातना दी जा रही हो। ऐसे में मेरा बेचैन होना स्वाभाविक था। मैं पूछ बैठी कि‍ आखिर यह क्या हो रहा है? यह आवाज़ किसकी है और क्यों है? क्योंकि आपके जिस बच्चे की रिपोर्ट मुझे स्कूल में जमा करनी है, उसे तब तक पूरा कैसे कर सकूंगी जब तक उसका वातावरण नहीं जानूंगी या आप लोग मुझे सब कुछ सच-सच नहीं बताएँगे। वे सभी अचानक चुप हो गए और एक-दूसरे का मुंह देखने लगे। मैं मन ही मन डरने लगी कि‍ पता नहीं अब किस सच्चाई से मेरा सामना होगा।

वे लोग मुझे बड़ा सा बरामदा पार कराकर एक कमरे में ले गए। इसकी बड़ी-बड़ी खिडकियों में जालियाँ लगी थीं और जानवर बंद करने के बाड़े सा अहसास दिला रही थीं। उसी के भीतर एक नन्ही सी जान अपनी व्हीलचेयर पर चमड़े की बेल्ट से बंधा  चीख रहा था। शायद वह दिनभर चिल्लाता होगा इसलि‍ए उसका गला बैठ गया था और आवाज घो-घो में बदल गयी थी | वह एडमिशन चाहने वाले अक्षत का बड़ा भाई था, लेकिन दिखता उससे भी छोटा था। उम्र दस साल, लेकिन कद, काठी पांच साल सी। बोलने, चलने, हाथ-पैरों की हरकतों से लाचार, दिमाग से कमजोर लेकिन सुन सकता है। मुझे देखते ही शांत हो गया। मैं स्पेशल एजुकेटर नहीं हूं। लेकिन मानव हूं और उसका इतना परेशान होना मुझे बर्दाश्त नहीं था। उसके पिता और दादा की परिवार के हर सदस्य और नौकरों को सख्त हिदायत थी कि उसे कमरे तक सीमित रखा जाये ताकि उनका सो कॉल्ड सम्मान बचा रहे। लेकिन वह जैसे-जैसे बड़ा हो रहा था, उसकी रुचियाँ बदल रही थीं और उसे संभालना मुश्किल होता जा रहा था।

माँ का दिल भर-भर आता कि‍ उसके बच्चे का क्या होगा? कैसे जियेगा? मेरे पूछने पर कि‍ उसे आज तक स्कूल क्यों नहीं भेजा गया या कोशिश क्यों नहीं की गई, का जवाब मिला कि हालत तो आप देख ही रही हैं। दो-चार स्कूलों में बात की थी तो उन्होंने ये बवाल लेने से साफ़ मना कर दिया और बड़ा होने पर किसी स्पेशल स्कूल भेजने का मशविरा दे दिया।

मैंने रिसर्च में पढ़ा था कि‍ यदि ऐसे बच्चों को सामान्य बच्चों के साथ रखा जाये तो इनमें ना सिर्फ सुधार आता है, बल्कि कई चीजें सीख भी जाते हैं। सामान्य बच्चे भी इनके साथ रह कर अपनी जिम्मेदारी समझ पाते हैं और आपसी समझ का वातावरण पैदा होता है। आखिर, समाज के इतने बड़े हिस्से को समाज से काटने का अपराध हम कैसे कर सकते हैं?

उसकी माँ ने मेरी भावुकता का फायदा उठाते हुए कहा कि‍ क्या मैं इसे अपनी क्लास में दाखिला दिलवा सकती हूं? मैंने उन्हें स्कूल आने का न्योता और सहायता का आश्वासन दिया। हालाँकि, मैं खुद नहीं जानती थी कि स्‍कूल प्रशासन मेरी इस सिफारिश को कैसे लेगा?

दूसरे दिन मेरी रिपोर्ट और रुद्रांश का केस प्रिंसिपल ने मीटिंग बुलाकर सबके सामने रखा। मेरी सोच से परे वहां हर इंसान के मुह पर सिर्फ ना थी। हर टीचर इस पचड़े से दूर रहने की राय दे रहा था। यह स्कूल का माहौल बिगाड़ने की कोशिश थी। जो बच्चे यहाँ ऊँची फीस देकर पढ़ रहे हैं, उनकी पढा़ई में खलल डालने का हक़ मुझे किसने दिया, यह पूछा जा रहा था। जब वह चिलाएगा, तब आप क्या कर पाएंगी? कितनी कक्षाएं डिस्टर्ब होंगी, आपने सोचा है? क्या हमारे यहां बच्चों की कमी है, जो हम ऐसे बच्चों को दाखिला देने लगें? आखिर आपके सि‍र पर यह समाज सेवा का भूत क्यों सवार है? मेरी कम जानकारी और भावुकता पर ताने थे और व्‍यावाहरि‍क बनने की सलाह थी।

उसके बाद मेरी साम दाम दंड भेद की लड़ाई खुद और स्कूल से हुई। मैंने ना सिर्फ क़ानून के कुछ अंश और विकलांगों से सम्बंधित कुछ तथ्य उनके सामने रखे, बल्कि खुद के इस्तीफे की पेशकश भी कर डाली। उसमें लिखा कि‍ मैं असंवेदनशील लोगों के साथ काम नहीं कर सकती। उसके बाद रुद्रांश मिड सेसन में मेरा शिष्य बना, छोटी सी कुर्सी में चमड़े की बेल्ट से बंधा।

एडमिशन के बाद मुझे दूसरी जंग लड़नी थी। रुद्रांश दिनभर चिल्लाता, तो क्लास के बाकी बच्चे डिस्टर्ब होते और तमाम शिकायतें करते। उनके घरों से भी फोन आते- क्या आपने किसी पागल को एडमिशन दिया है? और यह सब सुनकर मैं आहात होती। प्रिंसिपल धमकाने का कोई मौका नहीं छोड़ती, लेकिन मुझे लगता हमारे इसी असंवेदनशील रवैये ने इन वि‍शेष बच्चों को समाज की मुख्यधारा में जोड़ने का काम नहीं किया। न उनकी जरूरतों का ध्यान रखा और न सहारा देने की कोशिश की।

स्कूल ऑफिस में रुद्रांश के साथ रोज मेरी भी पेशी होती, लेकिन मेरे प्रयोग जारी थे। कुछ टीचर अब मेरी मंशा और कोशिश से सहमत थे और यदा कदा उसकी व्हीलचेयर को क्लास तक पंहुचा देते। उससे हंस कर बात कर लेते, हालाँकि वह सिर्फ टुकुर-टुकुर ताकता। लेकिन आश्चर्य था कि उसे स्कूल का वातावरण पसंद आ गया था और लोगों को देखना उसे अच्छा लगता था। वह प्रार्थना के दौरान चिल्लाता, सो उसे स्कूल लगने के आधा घंटे बाद लाने की हिदायत दी गई। इसे मैंने मान लिया क्योंकि क्लास के और बच्चे भी बहुत छोटे थे और उनका ख्याल रखना जरूरी था। रुद्रांश गाड़ी से किलकता हुआ आता तो आया भी उसे भुनभुनाते हुए लेने जाती।

एक दिन जब रुद्रांश बहुत अशांत था, मैंने वह बेल्ट खोल दी जो उसे कुर्सी से बांधे रखती थी। वह आजादी की ख़ुशी में गिर पड़ा, लेकिन शांत भी हुआ। उसे मैंने चीजें छूने को दी- पुराने अखबार, ब्लॉक्स, फ़ुटबाल, रबर के जानवर और फल। वह बहुत खुश होता। अक्सर अपने दोनों हाथों से मेरा चेहरा छूता मानो कुछ तसल्ली चाहता हो। वह मेरा सब्जेक्ट बन चुका था और मैं अनगढ़ हाथों से उसको संवारने में लगी थी।

उसे खाना-पीना, बाथरूम जाना, कुछ नहीं आता था। लेकिन बच्चों को देखकर अब उसके कांपते हाथ हरकत करते- खाने को मुंह चलता और शैतानियाँ भी सीख गया था, क्योंकि खाली जो रहता था।

पिता यूं फोन करता मानो अपनी कीमती थाती मुझे सौंप चुका हो और मैं उसको नुकसान न पंहुचा दूं। बच्चे क्लास में जोर-जोर से पढ़ते और वह सुन सकता था। रुद्रांश घरघराती आवाज़ में दिनभर घर में रट्टा लगता और माँ को निहाल करता।

धीरे-धीरे क्लास के बच्चे रुद्रांश का साथ देने लगे। वे उसको एक सामान्य बच्चे की तरह समझाते और वह कुछ न समझ के भी हँसता और खुश रहता। उसकी देखभाल होती। ढेर सारे दोस्त जो थे, उसके पास अब।

आज रुद्रांश ने अपने साथियों का हाथ पकड़ खड़े होने की कोशिश की, आज वह गिर पडा़ और उसके अति कोमल घुटने छिल गए, यह सब चलता। लेकिन मैंने अब डरना बंद कर दिया था क्योंकि हम दोनों एक-दूसरे का साथ जो देने लगे थे।

पोयम्स के दौरान रुद्रांश हंसता, तरह-तरह से मुंह बनाता, हाथों को नचाता और पैर भी चलाता। टुकड़े करके देने पर रोटी खाने लगा। कलाई से चम्मच बाँध देती और वह चावल, मैगी खा लेता। आश्चर्यजनक परिवर्तन थे।

कानून भी कहता है कि‍ यदि कोई वि‍शेष बच्चा, नार्मल बच्चों के साथ पढ़ना चाहे तो स्कूल को उसे जगह देनी पड़ेगी और यही कानून मेरा सहारा था। हालाँकि, मैं जानती थी कि इन बच्चों के लिए वही स्कूल ज्यादा उपयुक्त हैं, जहां उनके लिए बाथरूम, टूल्स, पठन सामग्री, सहायता और टेकनीक्स उपलब्ध हैं, लेकिन मैं तो बस उसे पहले उस अँधेरे कमरे से बाहर लाना चाहती थी और खुद की क्षमता भी देखना चाहती थी।

एक और जंग…एक साल के बाद रुद्रांश को उसके जैसे अच्छे वि‍शेष स्कूल में दाखिला दिलाने के लिए उसके दादा और पिता को राजी करना और दबाव डालना। उन्हें कतई  गवारा न था कि विशेष स्कूल की बस रोज उनके दरवाजे पर आये और एक दिव्यांग यहाँ रहता है, यह सब जाने।…हाय रे झूठी शान!

लेकिन अब हम तीन थे- मैं, रुद्रांश और उसकी माँ। परिवर्तनों से उसकी माँ का आत्मविश्वास भी बढ़ चुका था। काफी हुज्जत के बाद स्पेशल स्कूल चुना तो गया, लेकिन दिल्ली शहर में।

रुद्रांश चला गया।

तीस बच्चों के बावजूद क्लास में सन्नाटा था। अब मुझे हर समय मुस्कुरा कर देखने वाला कोई नहीं था। इस बीच सभी को रुद्रांश से लगाव हो गया था। प्रिंसिपल अक्सर उस भोले बच्चे की मुस्कान याद करतीं। इंटरवल में टीचर्स उसे देखने आती थीं। वह हेल्लो कहना और हाथ मिलाना भी सीख गया  था। अक्सर टीचर्स के दुपट्टे  या साडी़ का छोर पकड़ कर हँसता और सबको अपने मोह में बाँध लेता। अब सब उसे मिस करते थे।

रुद्रांश तो चला गया, लेकिन उसके जाने के बाद कई वि‍शेष बच्चों को लेकर उनके माँ-बाप आगे आये। उनकी आशा और हिम्मत के लिए रुद्रांश एक रास्ता खोल कर चला गया था।

जब लोग अपने बच्चों के 90 प्रति‍शत मार्क्स पर हताश होते हैं, तो मुझे रुद्रांश जैसे बच्चे बहुत याद आते हैं, जिनके माँ-बाप उनके मुंह से सिर्फ एक संबोधन सुनने को तरसते हैं। वो अपना नाम बता दें तो क्या कहने! वो खुद कुछ आराम से खा ले तो माँ निहाल।
सच्चाई तो यह है कि‍ ज्यादातर लोग इन बच्चों को अपनी अज्ञानता से घरों में बंद करके उन्हें और भी अक्षम बना देते हैं और दोष बच्चों पर मढ़ देते हैं या ऊपर वाले पर।

जानकर बहुत अच्छा लगा कि‍ रुद्रांश जिसे मैंने पेन्सिल पकड़वाने में अपना पूरा जोर लगा दिया था, उसने कला में रुचि दिखाई और स्पेशल स्कूल ने उसे खूब प्रेरित किया। उनकी और अपनी माँ की सहायता और जिद की वजह से रुद्रांश  अपने पिता की परवाह किये बिना दिल्ली के एक नामी फ़ास्ट फ़ूड सेण्टर में लोगों की आवभगत का काम करता है। स्कूल इन बच्चों को ना सिर्फ शिक्षित करता है, बल्कि अपने पेरों पर खड़े होने में भी सहायता करता है। रुद्रांश  आज भी बोल नहीं पाता, लेकिन प्रभावशाली मुस्कान से सबको अपना बना लेता है। वहां आये बच्चो के स्केच बना कर उन्हें खुश और फिर से आने को प्रेरित करता है। हॉस्टल में रहता है। घर नहीं आना चाहता। शायद वो काली यादें उसे डराती हैं।

इस बातचीत के दौरान वह लगातार मेरा हाथ अपनी हथेलियों में पकडे रहा मानो अब कभी नहीं छोड़ेगा। लेकिन माँ के समझाते ही अपना मोबाइल निकाल कर हिलते हाथो से मेरा फोटो लिया। मेरे पूछने पर कि‍ इसे मैं कैसे याद रही तो पता चला उन्होंने क्लास ग्रुप की इनलार्ज फोटो बनवा कर उसे दी है, जिसे वह अपने साथ रखता है।

मुझे लगा कि‍ मेरे संघर्ष का फल अगर ये वाला रुद्रांश है, तो मैं जीवन भर संघर्ष करने को तैयार हूं।

रुद्रांश…मेरी आँखें खोलने और मुझे गौरान्वित करने का शुक्रिया बच्चे!!
शुभकामनायें!!

शशि‍ काण्डपाल

शशि‍ काण्डपाल

संजीव ठाकुर की बाल कवि‍ताएं

Sun, 26/03/2017 - 02:21

संजीव ठाकुर

ताल

पंखा चलता हन-हन–हन
हवा निकलती सन-सन–सन।

टिक-टिक–टिक–टिक चले घड़ी
ठक-ठक–ठक–ठक करे छड़ी।

बूंदें गिरतीं टिप–टिप–टिप
आँधी आती हिप–हिप –हिप।

फू–फू–फू फुफकारे नाग
धू–धू–धू जल जाए आग।

कोयल बोले कुहू-कुहू
पपीहा बोले पिऊ-पिऊ।

धिनक-धिनक–धिन बाजे ताल
लहर–लहर लहराए बाल ।san

मुश्किल हो गई

पापा जी की टांग टूट गई
अब तो भाई मुश्किल हो गई!
कौन मुझे नहलाएगा ?
विद्यालय पहुंचाएगा ?
सुबह की सैर कराएगा ?
रातों को टहलाएगा ?
चिप्स –कुरकुरे लाएगा ?
कोल्ड –ड्रिंक पिलवाएगा ?
आइसक्रीम खिलाएगा ?
मार्केट ले जाएगा ?

सुबू ने खाई ढेर पकौड़ी

सुबू ने खाई ढेर पकौड़ी
एक छीन ली पापा से
एक झटक ली मामा से
मम्मी ने अपने हिस्से की
दे दी उसको एक पकौड़ी !

फिर आई उसकी थाली
जिसमें थी दस–बीस पकौड़ी
प्याज और आलू वाली
उसने न दी एक किसी को
खुद ही खा ली बीस पकौड़ी !

कौआ काका

कौआ काका क्या कहते हो
आएँगी मेरी नानी ?
सोच मिठाई की बातें
मुँह में भर आया पानी ।

न जाने क्या–क्या लेकर
आएँगी मेरी नानी
मैं तो तुमको एक न दूँगा
मुझे नहीं बनना दानी !

लेकिन काले कौए काका
अगर नहीं आईं नानी
कौन मुझे दिलवाएगा
प्यारी सी गुड़िया रानी

इस जाड़े को …

इस जाड़े को दूर भगाओ
सूरज भैया जल्दी आओ !

जाड़े में देखो तो कोयल
भूल गई गाना
चिड़ियों के बच्चों ने मुँह में
न डाला दाना !सूरज भैया आओ
थोड़ी गर्मी ले आओ
और हमारे साथ बैठकर
पिज्जा–बर्गर खाओ !साथ रहोगे तो जाड़े की
दाल रहेगी कच्ची
दादी का तो हाल बुरा है
हो जाएगी अच्छी !

गर्मी आ जाए तो चाहे
आसमान में जाना
जाड़े के मौसम में लेकिन
वापस आ जाना

आपकी आत्मा में किसी कला के लिए स्थान नहीं है, तो आप अपाहिज हैं : जीवन सिंह

Wed, 22/03/2017 - 00:04

डॉ. जीवन सिंह

डॉ. जीवन सिंह हिंदी के प्रतिष्ठित, प्रतिबद्ध और ईमानदार आलोचक हैं। अलवर राजस्थान में रहते हैं। अब तक आलोचना की तीन किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं। लोकधर्मी कविता के लिए जाने-जानी वाली पत्रिका ‘कृति ओर’ में वह निरंतर लिखते रहे। अलीबख्शी ख्याल और मेवाती लोक संस्कृति पर गहरी पैठ रखते हैं। अपने गांव जुरहरा (भरतपुर) की रामलीला में पिछले पैंतालीस वर्षों से जुड़ाव और रावण का अभिनय करते रहे हैं। 1968 से 2004 तक राजस्थान के विभिन्न राजकीय कॉलेजों में अध्यापन करते रहे। प्रस्तुत है उनसे फेसबुक के माध्यम से महेश चंद्र पुनेठा  की हुई लंबी बातचीत के कुछ अंश-

हमारे समाज में पढने की संस्कृति का जबरदस्त अभाव है। पढ़ना केवल परीक्षा पास करने के लिए जरूरी माना जाता है। पाठ्यपुस्तकों से इतर पढ़ना एक फालतू काम माना जाता है। इसके लिए बच्चों को हमेशा रोका जाता है। नयी पीढ़ी में पढ़ने की आदत विकसित करना किसी चुनौती से कम नहीं है। आपको पढ़ने की संस्कृति के अभाव के पीछे कौन से कारण नजर आते हैं? आप विदेशों में भी रहे हैं क्या वहां भी पढ़ने की संस्कृति की स्थिति भारतीय समाजों की तरह ही है?

मैंने न पढ़ने और अपने घरों में किताब न रखने की बात इसलिए कही है कि हम पहले उस समाज को जान सकें जिसमें हम छंद-रचित कविता के लोकप्रिय होने की बात अक्सर करते रहते हैं। जहां कविता को पढ़ाने वाले अध्यापक तक अपने घरों में पुस्तक रखने से परहेज करते हों, वहां कौन है जो कविताओं से प्रेम कर रहा है, कुछ पता तो चले। दरअसल, हम मिथकों में जीने के अभ्यासी हो चुके हैं, वास्तविकता में कम। जो वास्तविकता को कुछ बदले हुए रूप में लाने का प्रयास करता है, उस पर धावा बोल देते हैं। जब मिथक टूटता है तभी वास्तविकता प्रकट होती है।

हमारा हिन्दी समाज इकसार समाज नहीं है, दूसरे भी नहीं हैं। एक बहुत बड़ा निम्न मेहनतकश वर्ग तो रोजी-रोटी के संकट से ही मुक्त नहीं हो पाता। वह अपने जीवन के भावात्मक पहलुओं को अपने लोकसाहित्य (मौखिक साहित्य) में ही पाकर संतुष्ट हो लेता है। अब रहा मध्यवर्ग, इस वर्ग में ही पढ़ने-लिखने वाला वर्ग निकलता है, वह भी उंगलियों पर गिना जा सकता है। हमारे यहां एक कविता संग्रह की ज्यादा से ज्यादा पांच सौ प्रतियां रोते-धोते छपती हैं। इसी से पता चल जाता है कि हमारा समाज कितना साहित्य प्रेमी है?  लगभग पचास करोड़ हिन्दी भाषी होंगे, उसमें कितने लाख या करोड़ साहित्य प्रेमी हैं। जरा हिसाब लगाकर देखें तो सब कुछ पता चल जायगा। एक-दो लाख ज्यादा से ज्यादा होंगे। किताबों की खरीद से अन्दाज लगाएं तो यह संख्या हजारों में सिमट जाएगी। मध्यवर्ग में कोई आसपास आपको नजंर आता है, जो अपने बच्चों को इंजीनियर या डॉक्टर के अलावा कुछ बनाना चाहता है। कितने लोग हैं जो अपने बच्चों को मन से अध्यापक बनाना चाहते हैं और उसमें भी साहित्य का और वह भी हिन्दी का। हिन्दी आज कहीं प्राथमिकता में ही नहीं है। हमारा मन पूरी तरह से धन का गुलाम बन रहा है, जो साहित्य-संस्कृति सिर्फ धनार्जन को मानता है। सब कुछ को मैनेज करता है। तकनीक और प्रबंधन ने हमारे दिमागों को आक्रांत सा कर लिया है और यह पिछले पच्चीस वर्षों में बहुत तेजी से हुआ है। जब पूंजी ही जीवन का ध्येय बन जाती है तो अन्य सब कुछ उसके सामने गौण हो जाता है। पूंजी अपने लिए अलग एक नई सभ्यता और संस्कृति विकसित करती जाती है और अपने प्रभाव में दूसरे वर्गों को भी लेती जाती है।

जहां तक विदेशों की बात है, पढ़ने-लिखने की संस्कृति में वे पहले से हमसे आगे हैं। वहां उन्होंने अपने लिए सारे प्रबंध एक तार्किक प्रक्रिया के तहत लगातार किए हैं। वहां पढ़ना-लिखना न होता तो आज ज्ञान-विज्ञान और नई से नई तकनीक का विकास कैसे होता? विश्व संचार क्रांति कौन करता? उन्होंने अपने शिक्षा-प्रबंधन पर सबसे ज्यादा ध्यान दिया है। हमारे यहां शिक्षा नहीं,  मानव-संसाधन का प्रबंधन चलता है। ऐसे में पढ़ने की सहज संस्कृति का विकास कैसे संभव है। हमारे राजनेता जो सारी बातों के नियंता हैं, वे क्या इन सवालों पर गंभीर हैं। जिन्दगी जीने का एक सामान्य नैतिक बोध और मानवीय आकांक्षाएं जब तक हमारी प्राथमिकताओं में नहीं आएंगी, तब तक जो चल रहा है वही चलता रहेगा। इसके लिए हर स्तर पर, खासकर प्राथमिक, माध्यमिक स्कूली स्तर पर बहुत बड़े अभियान और नवजागरण की आवश्यकता है, जो शिक्षा को पारम्परिक तौर पर नहीं वरन आधुनिक सेक्युलर पद्धति पर आगे ले जाए। हमको अपनी शिक्षा को महंगे तरीकों से नहीं, बहुत सस्ते और सादगी से पूर्ण तरीकों से आगे बढ़ाने की जरूरत है। हमारा गरीब समाज तभी शिक्षित हो सकेगा।

आप के पोते आस्ट्रेलिया में पढ़ते हैं। आपने उनके साथ समय भी व्यतीत किया है। क्या आप बता सकते हैं कि वहां पाठ्यपुस्तक के अलावा बच्चे अन्य पुस्तकें भी पढ़ते हैं? स्कूल या शिक्षक उन्हें इस बात के लिए कितना प्रोत्साहित करते हैं? वहां पर स्कूलों में पुस्तकालयों की स्थिति कैसी है?

पहली बात तो यह है कि वहां के बच्चों के मन पर शिक्षा का वैसा प्रतियोगी दबाव नहीं होता,  जैसा हमारे यहां बच्चों के दिमाग पर रहता है। वहां बच्चों के पढ़ना शुरू करने की आयु 6 साल है। इससे पहले खेलने के सिवाय और कुछ नहीं करता। हमारे यहां शिक्षा लेते हुए बच्चे शायद ही सहज रह पाते हों। दूसरी बात यह है कि स्कूल भी बच्चों के प्रति सहज सहानुभूति पूर्ण व्यवहार रखते हैं। मैं जब वहां था, तब अपने पौत्र को एक प्ले स्कूल में ले जाता था क्योंकि वह 6 साल का नहीं हुआ था। हम दोनों रेल से 15 किलोमीटर दूर एक प्ले स्कूल में जाते थे, जहां मैं चार घण्टे तक पास में स्थित एक पब्लिक लाइब्रेरी में बैठकर पढ़ता था। उस लाइब्रेरी में सप्ताह में दो बार छोटे बच्चों को उनकी अध्यापिकाएं अपने साथ लेकर आती थीं। उनसे सामूहिक तौर पर छोटी-छोटी कविताएं भी बुलवाती रहती थीं। उनकी विशेषता इस बात में है कि वे.बच्चों को हमेशा हास्य-विनोद के वातावरण में रखते हैं। जगह-जगह बच्चों के खेलने-कूदने के पार्क हैं। उन पार्कों में पुस्तकालय भी हैं। स्कूल भी अपने बच्चों को उनमें सभी तरह के खेल खिलाने ले जाते हैं। कहने का मतलब यह है कि शिक्षा मन के ऊपर न बोझ है न ही उसका प्रतियोगी आतंक है और न ही वहां डॉक्टर,  इंजीनियर बनाने की होड है। वहां सुनियोजित और बेहद तार्किक ढंग से सभी तरह के जरूरी प्रबंधन किए जाने की परम्परा है। बच्चे बड़ों से और अपने परिवार से भी बहुत कुछ सीखते हैं, इसलिए बूढ़े-बूढे़ लोग भी वहां पुस्तकालय में जाकर कुछ न कुछ पढ़ते रहते हैं। हमने पढ़ने की जगह केवल स्कूल को ही बना रखा है, जबकि बच्चे का पहला विद्यालय उसका अपना घर होता है। घर से ही वह पढ़ना सीखता है। मुक्तिबोध का एक निबंध है- मुझे मेरी मां ने प्रेमचंद का भक्त बनाया। हमारे यहां कुछ समय पहले तक स्त्री शिक्षा पर कितना बल था, हम अच्छी तरह से जानते हैं।

मैं फिर कहूंगा कि हमारे यहां कितने लोग अपने घरों में निजी पुस्तकालय बनाते हैं और किताबें खरीद कर पढ़ते हैं। घर में किताबें होंगी और मां-बाप भी कुछ न कुछ पढ़ते दिखेंगे तो बच्चा भी पढ़े बिना नहीं रह सकेगा। केवल स्कूल के भरोसे पुस्तकें पढ़ने का संस्कार डालना मुश्किल है। गनीमत है कि वहां पर वह अपना कोर्स ही पूरा और अच्छी तरह से पढ़ ले। स्कूलों में तो पुस्तकालय वहां हैं ही, खेलना भी है। इसके अलावा सार्वजनिक पुस्तकालय भी जरूरत के अनुसार खूब हैं।

वहां घरों में किताबों का क्या स्थान है? क्या वहां निजी पुस्तकालय दिखाई दिए? आप अमरीका भी कुछ समय रहे वहां पर क्या स्थिति है?

वहां के वासियों के घर देखने का कोई बड़ा अवसर तो मुझे नहीं मिला, किन्तु लाइब्रेरी से पुस्तकें इश्यू कराते और लौटाते देखा। जगह-जगह पुस्तकालय देखे, जिनका रखरखाव और अद्यतन सुविधाएं देखकर एक तरह की तसल्ली मिलती है और इच्छा भी होती है कि काश, हमारे यहाँ भी ऐसा हो। वैसे हमारे यहां ही अक्सर सुनने में आता है कि हमारी तुलना में बंगाली समाज अधिक पुस्तक प्रेमी व कला प्रेमी समाज है। अमरीका में पुस्तक स्टोर(माल) होते हैं जहां से यदि आपको पुस्तक पसंद न आए तो उसे पढ़कर निर्धारित अवधि में लौटा सकते हैं। मैं यहां सोवियत संघ का उदाहरण रखना चाहता हूं जिस व्यवस्था ने अपने देश में ही नहीं वरन हमारे जैसे देशों में भी एक पुस्तक प्रेमी समाज बना दिया था। सस्ती और सुन्दर पुस्तकों की एक नई संस्कृति विकसित करने की उन्होंने लगातार कोशिश की थी। इसलिए यह व्यवस्था का सवाल भी है कि आप कैसा समाज बनाना चाहते हैं। अभी तो हमारी व्यवस्था का लक्ष्य है कि एक बड़े पूंजी प्रेमी समाज का निर्माण करना, जो बहुत तेजी से किया जा रहा है। यह समाज की जिम्मेदारी भी है कि वह विभिन्न स्तरों पर स्वयं भी प्रयत्न करे कि उसे कैसा समाज बनना है और किस दिशा में जाना है। सब कुछ सरकारों के भरोसे नहीं छोड़ देना चाहिए। सरकारें तो वही करेंगी, जो उनको करना है।

जिन देशों के आपने उदहारण दिए हैं, क्या वहां यह सरकारी प्रयासों से हुआ है या व्यक्तिगत प्रयासों से? आपने सस्ती और सुन्दर पुस्तकों की एक नई संस्कृति विकसित करने के सन्दर्भ में सोवियत संघ का उदाहरण दिया , इस बारे में कुछ और विस्तार से बताइए।

दरअसल, जितने भी सामाजिक कार्य हैं, उनको केवल सरकार पर नहीं छोड़ा जा सकता। समाज और सरकार दोनों की पारस्परिक सहयोग से ही इनमें सफलता हासिल की जा सकती है। यदि कोई पुस्तक पढ़ना चाहता है तो कौन सी ऐसी सरकार है, जो उसे पढ़ने से रोकने आती है। स्कूलों,  शिक्षकों को पुस्तक संस्कृति की शुरुआत करने में सबसे बड़ी और प्राथमिक भूमिका अदा करनी होगी,  क्योंकि सबसे ज्यादा पुस्तकों से वास्ता उन्हीं का पड़ता है। जिस समाज में शिक्षक स्वयं कोर्स के अलावा और कुछ पढ़ने और जानने की इच्छा शायद ही रखते हों, उस समाज में पुस्तक संस्कृति का विकास कर पाना बहुत मुश्किल है। एक ही तरह के प्रयास करने से सामाजिक और सामूहिक स्तर पर कुछ नहीं होता। व्यक्ति और समाज दोनों स्तरों पर काम करने से ही बदलाव आते हैं। इस मामले में विकसित देशों का वातावरण हमारे यहां के वातावरण से बहुत अलग है। ब्रिटेन के औपनिवेशिक शासन से मुक्ति पा लेने के बावजूद हमारे समाज की प्रकृति, परिस्थिति और जरूरतों के अनुसार बड़े और बुनियादी बदलाव करने के बजाय उन्हीं के द्वारा स्थापित व्यवस्था को अपना लिया। उसमें इतना सा बुनियादी बदलाव भी न कर पाए कि यहां पठन-पाठन की संस्कृति अपनी भाषाओं में विकसित हो। बच्चा भाषाओं को अपने परिवेश और वातावरण से सीखता है और उसी में बिना किसी दबाव के सहजता तथा आनंद भाव से अपनी विभिन्न प्रवृत्तियों का विकास करता है। अंग्रेजी दो सौ साल बाद भी हमारे अपने घर-परिवारों के वातावरण की भाषा कहां बन पाई है। उसे अर्जित करने के लिए अतिरिक्त अस्वाभाविक प्रयास करना पड़ता है। जबकि हम अपनी भाषाओं को मां के दूध के साथ सीख लेते हैं। इस वजह से भी बच्चे पढ़ने के प्रति अनमना और उदासीनता का भाव रखते हैं।

अपनी भाषा में लिखी किताब को पढ़ने की स्वप्रेरणा विकसित होने की संभावनाएं ज्यादा रहती हैं। सोवियत संघ का ध्येय था कि पूरी दुनिया में पूंजी बाजार की गलाकाटू प्रतिस्पर्धा खत्म हो और यह दुनिया सभी के रहने लायक एक सुखद शान्तिपूर्ण दुनिया हो। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए शिक्षा से बेहतर कोई दूसरा माध्यम नहीं है। इसलिए अपने देश के अलावा मित्र देशों की भाषाओं में भी उन्होंने एक सस्ती, उन्नत और सुन्दर पुस्तक संस्कृति को सर्वत्र विकसित किया। उनके द्वारा मुद्रित पुस्तकें सस्ती ही नहीं,  दिखने में भी बहुत आकर्षक होती थीं। उनको देखते ही खरीदने का मन हो जाता था। बाल साहित्य भी बहुत सस्ता और आकर्षक होता था। वे जगह-जगह पुस्तक प्रदर्शनी भी लगाते थे। इससे सामाजिक स्तर पर वातावरण बनता था। हर साल प्रदर्शनी का इंतजार रहता था। पूंजीवादी व्यवस्था में पढ़ना ही इतना मंहगा और प्रतियोगिता से बोझिल बना दिया जाता है कि इस वातावरण में सिर्फ धन कमाने वाली पढ़ाई करने के अलावा कोई कुछ सोच ही नहीं पाता।

सस्ता और अच्छा साहित्य पहुंचाने के लिए हमारे यहां सरकारी या व्यक्तिगत स्तर पर अब तक किस तरह के प्रयास आपको दिखाई दिए?

देश को आजादी मिलने के बाद पुस्तकें पढ़ने और जीवन को ज्ञान सम्पन्न करने का एक जज्बा लोगों में मौजूद रहा। मैं अपने एक छोटे से गांव का उदाहरण आपको बतलाता हूं। आजादी मिलने के दिनों में दो-तीन हजार की आबादी से ज्यादा गांव की आबादी नहीं होगी, लेकिन तब भी गांव का अपना एक पुस्तकालय और वाचनालय- सुधारिणी समिति के नाम से चलता था। इसमें हंस, माधुरी जैसी उस समय की पत्रिकाएं तक मंगाई जाती थीं। उस पुस्तकालय में अधिकांश किताबें स्वाधीनता के भाव को जगाने वाली थीं। हमारा गांव तत्कालीन भरतपुर रियासत का आखिरी गांव था, जो इस समय के हरियाणा और उस समय के पंजाब की सीमा से लगता था। उस समय की स्वाधीनता आंदोलन के सेनानी स्वाधीनता पाने के लिए पठन-पाठन को जरूरी मानते थे कि ज्ञान के बिना मुक्ति संभव नहीं है। इसी उद्देश्य से छोटे-छोटे गांवों में भी पुस्तकालय खोले गए थे। आजादी का भाव पैदा करने में इन पुस्तकालयों की बहुत बड़ी भूमिका रही है। उस समय लालटेन की रोशनी में लोग इनमें रात्रि को भी पढ़ने जाते थे। तब यह सब एक बड़े आंदोलन के तहत हुआ है। ऐसे ही हमारे पास के कस्बों कामां, डीग, कुम्हेर आदि में पुस्तकालय और वाचनालय खुले हुए थे। डीग में हिंदी साहित्य समिति और उसका एक बड़ा पुस्तकालय था, जो आज भी मौजूद है किन्तु पहले जैसा जज्बा अब नहीं है। भरतपुर में एक जमाने में वहां की हिंदी साहित्य समिति एकमात्र ज्ञान चर्चा और पठन-पाठन का सबसे बड़ा केन्द्र थी। इसके एक सम्मेलन में शायद 1930 में रवींद्रनाथ टैगोर आए थे। वह वातावरण व माहौल ही अलग होता है, जो लोगों में बड़े स्तर पर ज्ञान की भूख जगाता है। आज का युवा पहले से कम पढा़कू नहीं है। वह खूब पढ़ता है। पढ़ने में रात-दिन एक कर अपनी जी-जान लगा रहा है, किन्तु अब उसके अध्ययन का उद्देश्य अच्छे से अच्छा व्यवसाय हासिल कर थोड़े समय में अधिकतम पूंजी हासिल करना हो गया है। अब वह समाज परिवर्तन की जगह बाजार में अपनी जगह बनाने के लिए खूब पढ़ता है। प्रयोजन बदल जाने से पुस्तकों की दिशा और उपयोगिता दोनों बदल जाती हैं।

यदि सर्वेक्षण किया जाए तो आज पहले से बहुत ज्यादा बड़ा पुस्तकों का बाजार है और शिक्षा पाने के प्रति भी लोगों में जागरूकता आई है। लोग अपने बच्चों को पढ़ाने के लिए बहुत तेजी से गांवों को छोडकर शहरों में आकर बस रहे हैं। गांव बहुत तेजी से वीरान जैसे हो रहे हैं। जो किसी वजह से गांव में ही रहने को मजबूर हैं, वे ही अब गांवों में रह रहे हैं। गांव छोड़ने के पीछे उनका उद्देश्य बच्चों को अच्छी और ऊंचे स्तर की शिक्षा, खासकर अंग्रेजी माध्यम स्कूलों में दिलवाने का है। यह अलग बात है कि उस शिक्षा का गहरा रिश्ता सिर्फ बाजार से है।

सस्ता और सुरुचिपूर्ण साहित्य आज के माहौल के अनुकूल ही नहीं है। हर कोई अपने बच्चों को डॉक्टर,  इंजीनियर बनाने की होड में लगा हुआ है। पुस्तकें खूब हैं और उनको पढ़ने वाले भी। प्राइवेट स्कूलों में बहुत ऊंची फीस होने पर भी उनमें जगह खाली नहीं हैं। सरकारी संस्थानों पर से विश्वास स्वयं सरकारों ने ही उठा दिया है। वे सब कुछ को प्राइवेट हाथों में सौंप देने के लिए व्यग्र हो उठी हैं। अब तो केवल निजी प्रयास ही रह गए हैं।

आजादी मिलने के शुरूआती दिनों में पुस्तकें पढ़ने और जीवन को ज्ञान सम्पन्न करने का जो जज्बा था, उसके कम होने के पीछे आप मुख्य रूप से क्या कारण देखते हैं? एन.बी.टी. जैसे सरकारी प्रकाशन आज भी चल रहे हैं जो सस्ता और सुरुचिपूर्ण साहित्य प्रकाशित करने, उसको लोगों तक पहुंचाने और पढ़ने के लिए कुछ-कुछ कार्यक्रम करते रहते है। इसको आप किस रूप में देखते हैं?

मुख्य कारण है आजादी के बाद बदला हुआ माहौल और स्वाधीनता मिल जाने के बाद यह मान लिया जाना कि स्वाधीनता मिल जाने से अब सब कुछ अपने आप हो जाएगा। जबकि स्वाधीनता कभी एक दिन में नहीं आती, यह एक सतत प्रक्रिया है। आज जब आजादी मिले सत्तर साल होने को जा रहे हैं, तब भी हमारा समाज कितने ही तरह के सामाजिक-आर्थिक बंधनों से मुक्त नहीं हुआ है। इसलिए जहां-जहां भी दलित, स्त्री, आदिवासी और गरीबी,  गैरबराबरी जैसे अनेक मुद्दे हैं, उनका समाधान लगातार आंदोलन से ही संभव हो सकता है। जिस समाज में अनेक तरह के वर्ग होते हैं, उसमें आजादी का उपभोग व्यावहारिक तौर पर केवल उच्च वर्ग ही करता है। आजादी मिल जाने के बाद इन मुद्दों को लेकर संघर्ष तो अवश्य हुए, किंतु आजादी के समय का आन्दोलन जैसा जज्बा खत्म होता चला गया। इससे यहां के लोग सत्ता की हिस्सेदारी करने जैसी नयी प्रवृत्तियों में ज्यादा उलझ गये। मध्य वर्ग ऊंची नौकरी पाने, नए नौकरशाह आदि बनने की हिस्सेदारी करने में लग गया। यही वजह रही कि पुराने पुस्तकालयों की आवश्यकता की बात पुरानी पड़ने लगी। एनबीटी जैसा संस्थान इतने बड़े देश की जरूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त नहीं है। दूसरे आम जन में रोजगारी साहित्य पढ़ने-पढ़ाने का भाव पहले से काफी बढ़ा है। पढ़ना-लिखना पहले से बढ़ा है, लेकिन नीचे का एक बहुत बड़ा वर्ग आज भी अपनी रोजी-रोटी के मसले से उबर नहीं पाया है। मध्यवर्ग व्यावसायिकता और सिर्फ बाजार की शिक्षा लेने तक सीमित होकर रहने की स्थिति में सिमट गया है। पुस्तक छापने और बेचने के कुछ-कुछ कार्यक्रम केवल नौकरी पूरी करना और एक तरह की रस्म अदायगी जैसे बनकर रह गए हैं। वे कुछ पढ़ने वाले लोगों की पूर्ति कर देते हैं। गीताप्रेस द्वारा जैसे धार्मिक साहित्य के बेहद सस्ते साहित्य प्रकाशन का अभियान चलाया गया। कुछ इसी तर्ज पर अन्य विषयों पर पुस्तक प्रकाशन के अभियान चलें और एक माहौल बने तो इन स्थितियों में बदलाव संभव है।

मध्यप्रदेश की शैक्षिक संस्था एकलव्य द्वारा इस दिशा में किए जा रहे प्रयासों को आप किस रूप में देखते हैं? क्या इस तरह के प्रयास राजस्थान में भी कोई संस्था कर रही है?

एकलव्य ने इस दिशा में बहुत बड़ा और प्रशंसनीय काम किया है जिसका सर्वत्र स्वागत हुआ है, किन्तु लगभग पचास करोड़ हिन्दी आबादी के लिए इस तरह के सौ कार्य भी पर्याप्त नहीं हैं। वास्तविकता यह है कि आज भी बहुत बड़ी आबादी शिक्षा से महरूम है। सच तो यह है कि समाज को बदलना है तो शिक्षा के सम्पूर्ण ढांचे में बुनियादी बदलाव जरूरी है जिससे वह अभावग्रस्त वर्ग के अनुकूल बन सके। कुल मिलाकर बात यह है कि हमारे यहां महौल अभी सच्ची शिक्षा के अनुकूल नहीं है। शिक्षा सरकार की प्राथमिकताओं में ही नहीं है। जबकि हिन्दुस्तान में हर बात सरकार के भरोसे छोड़ दिए जाने का रिवाज सा बन चुका है। सरकारें ऐसी शिक्षा क्यों देना चाहेंगी, जो समाज में उनका प्रतिरोध खड़ाकर एक और बड़ा एवं उदार जनतांत्रिक विकल्प खड़ा करने में मददगार हो। मुझे मालूम नहीं कि छुटपुट प्रयासों को छोड़कर राजस्थान में इस दिशा में कोई उल्लेखनीय कार्य हो रहा है। मेरी जानकारी में नहीं है। संभव है कोई गैर सरकारी संगठन इस क्षेत्र में काम कर रहा हो।

हमारे कवि मित्र राजेश उत्साही जो लम्बे समय तक बाल पत्रिका चकमकके संपादक और एकलव्य संस्था से जुड़े रहे, पिछले दिनों एक बातचीत में कहा कि बाजार ने एक भ्रम बनाया है कि हिंदी की किताबें बिकती नहीं हैं। जहां प्रयास हुए हैं, वहां यह भ्रम टूटा भी है। होशंगाबाद के एक मित्र हैं अशोक जमनानी। वे अब तक सात-आठ उपन्यास लिख चुके हैं। उन्होंने पहले किसी व्यावसायिक प्रकाशक को दिए थे। बाद में खुद जोखिम उठाकर छपवाए और खुद ही गांव-गांव जाकर बेचे। उनके उपन्यासों के छह से अधिक संस्करण निकल चुके हैं। यह एक उदाहरण भर है। एकलव्य द्वारा प्रकाशित किताबों में से कुछ की अब तक पचास हजार से ज्यादा प्रतियां प्रकाशित हो चुकी हैं। हां, यह बात अलग है कि उनमें से अधिकांश सरकारी या थोक खरीद में जाती हैं। यह भी एक उदाहरण है। महाराष्ट्र  में बालसाहित्य में काम करने वाले लोग गांव-गांव जाकर अपनी किताबें बेचते रहे हैं। मुझे लगता है वर्तमान समय पढ़ने की आदत को टीवी जैसे माध्यम से बहुत कड़ी टक्कर मिल रही है। चाहे वह समाचार हो, या विचार। सब कुछ तो टीवी से आ रहा है। फिर भी यह कहना ठीक नहीं है कि पढ़ने की संस्कृति नहीं है। आप इस पर क्या टिप्पणी करेंगे? क्या बाजारू उपन्यासों या पत्रिकाओं का बड़ी संख्या में पढ़ा जाना इस बात का प्रमाण नहीं है कि अभाव पढ़ने की संस्कृति का नहीं, बल्कि किसी और बात का है?

जिस देश की आबादी एक अरब तीस करोड़ के आसपास हो उसमें इतना तो अवश्य होगा ही कि दो चार या दस पांच करोड़ लोग ठीक-ठाक ढंग से पढ़-लिख रहे हों। सवाल जब सौ-पचास करोड़ का आता है तो हिन्दी में आज किसी भी अच्छी किताब का एक-दो करोड़ का संस्करण होना चाहिए, लेकिन अभी तो यह लाखों तक भी नहीं पहुंची हैं। पढ़ना तो पहले से ज्यादा हुआ ही है। पुस्तकें भी पहले से ज्यादा प्रकाशित हो रही हैं और मुनाफा बटोरने वालों के पक्ष में जा रही हैं। पुस्तकों के व्यवसायी करोडों तभी कमा सकते हैं, जब पुस्तकें प्रकाशित करें इसलिए पुस्तकें तो छप रही हैं, किन्तु उनके अनुसार पाठक नहीं हैं। निसंदेह मुनाफाखोर प्रकाशक इस विभ्रम को फैलाता है किन्तु इसमें कुछ सचाई भी है। मैं तो इस धारणा की जांच अपने मोहल्ले के लोगों के बीच से करता हूं, जिसमें मेरे साथी पढ़े-लिखे समझे जाने वाले लोग अक्सर यह सवाल करते हैं कि आजकल आप क्या काम कर रहे हैं? मैं जब जवाब में कहता हूं कि मैं तो पढ़ता-लिखता हूं तो वे फिर पूछते हैं कि आप यह बतलाइए कि सेवानिवृत होने के बाद क्या काम करते हैं? पढ़ना-लिखना हमारे यहां काम करने की कोटि में नहीं आता। काम की परिभाषा में सिर्फ उसे ही काम कहा जाता है जिससे आपको धन की प्राप्ति होती है। यह है हमारे समाज का सामूहिक शैक्षिक मनोविज्ञान। हमारे आसपास अडोस-पडोस में रहने वाले सभी पढ़े-लिखे और खाते-पीते लोग हैं किन्तु लगभग सभी का दृष्टिकोण यही है कि सिर्फ और हमेशा धन कमाना ही काम करना होता है। वैसे तो आजादी मिलने के बाद से ही समाज का सामूहिक दृष्टिकोण कुछ इसी तरह का बना, किंतु जब से नवउदारवादी अर्थव्यवस्था का तेजी से प्रचलन हुआ है और एक नव धनाढ्य वर्ग पैदा हुआ है, तब से तो धन ही जीवन का एकमात्र प्रतिमान बना दिया गया है कि धन में ही विकास है और धन में ही गति है। अन्यत्र सभी जगह दुर्गति है। ऐसे माहौल में अपवाद स्वरूप ही एक समुदाय विशेष पुस्तक संस्कृति की लड़ाई लड़ता है। वह हमारे देश में भी चल रही है, उसको व्यापक जीवन स्तरों और जरूरत के अनुसार फैलाने की आवश्यकता है। हिन्दी जाति की तुलना में बंगाली और मराठी जातियां हमसे पहले से आगे रही हैं,  उनमें जातीय एकता का भाव सदा से ज्यादा रहा है। इस मामले में हिन्दी का कभी कोइ एक केन्द्र नहीं रहा। वह प्रशासनिक और राजनीतिक तौर पर बहुत बड़े और गहरे विभाजन का शिकार रही है। संस्कृति सभी तरह की होती है। पचास करोड़ आबादी में यदि पचास लाख लोग भी पढ़ने-दिखने लग जाएं तो यह संख्या बहुत बड़ी लगती है, किन्तु जब पचास करोड़ के सामने पचास लाख को रखते हैं, तब वास्तविकता मालूम पड़ती है।

बाजारू बातें हर युग में रही हैं। बाजारू साहित्य भी और उस सामान्य अभिरुचि का साहित्य और उसी तरह की पत्र-पत्रिकाएं भी। कई बार इसी में से रास्ता निकलता है। लेकिन इसके लिए समाज में लगाव की भावना होनी चाहिए, जबकि पूंजीवादी व्यवस्था का पहला ही पड़ाव होता है अलगाव और अजनबीपन। पूंजी जोड़ने के साथ-साथ तेजी से बांटने का काम भी करती है, जिससे सामूहिक भावना का क्षरण होता जाता है। जबकि कोई भी संस्कृति सामूहिकता के बिना संभव नहीं है।

बच्चों में पढ़ने की आदत विकसित करने में परिवार की क्या भूमिका है? कैसे यह आदत विकसित की जा सकती है?

जीवन में किसी भी बेहतर प्रवृति के विकास के लिए एक सामाजिक-सांस्कृतिक और नैतिक वातावरण होता है,   कोई भी अच्छी प्रवृति तभी सामूहिक तौर पर विकसित हो पाती है। निजी और व्यक्तिगत तौर पर या छोटे-मोटे आंचलिक स्तरों पर भी अपवाद स्वरूप कुछ प्रवृत्तियां विकसित होने की संभावनाएं खूब रहती हैं और इस तरह के काम करने वाले भिन्न रुचियों वाले लोग सभी क्षेत्रों में होते हैं और अपना काम भी करते हैं । उन क्षेत्रों में वातावरण भी बनता है किन्तु वह बड़े समर्थन के अभाव में दीर्घजीवी नहीं हो पाता। बनता है और एक बिन्दु तक पँहुचकर खत्म हो जाता है। जैसे- निजी स्तर पर कुछ खिलाड़ी ओलम्पिक में पदक ले आते हैं । इसका मतलब यह नहीं कि हमारे देश में खेलों का कोई वातावरण बना हुआ है। यहाँ निजी स्तर पर तो बहुत कुछ है । प्रतिभाएं हैं, अपार धन दौलत है। आज के अखबार में ही आया है कि दौलत के मामले में हमारा देश दुनिया के सबसे अमीर देशों में सातवें पायदान पर है, लेकिन इससे यह प्रमाणित नहीं होता कि हम गरीब देशों की श्रेणी में नहीं हैं। ऐसे ही अन्य बातों में भी हैं। पुस्तकें पढ़ने वाले खूब पढ़ रहे हैं किन्तु पढ़ने-लिखने का वातावरण नहीं है। इसकी प्रमुख वजह है कि गैरबराबरी से या अन्य किसी भी तरह की विषमता से मुक्ति पाने का कोई बड़ा आन्दोलन नहीं है। जितने बड़े आकार का आन्दोलन है, उतने ही आकार का पठन-पाठन भी है।  जब से देश में दलित आन्दोलन में तेजी आई, तब से उसका अलग साहित्य भी प्रकाशित हुआ और नए पाठक भी पैदा हुए। स्त्री साहित्य के बारे में भी यह बात कही जा सकती है। दरअसल, मुक्ति आन्दोलन के बिना व्यापक स्तर पर पुस्तक आन्दोलन भी नहीं चल सकता। मुक्ति आन्दोलन से एक स्पष्ट जीवनोद्देश्य सामने आ जाता है जिसकी पूर्ति के लिए लोगों में उससे सम्बंधित साहित्य, इतिहास आदि पढ़ने की जरूरत होती है। नई सोच विकसित होती है तो नई राष्ट्रीय चेतना का निर्माण करती है।

बच्चा हमेशा अनुकरण से सीखता है। वह वही भाषा बोलता है और वैसे ही सोचता और आचरण करता है जैसे उसके परिवार के दूसरे लोग करते हैं। बच्चे को कहाँ मालूम होता है कि वह किस जाति और धर्म का है । यह उसका वातावरण ही होता है जो उसे बड़ा होने पर जाति और धर्म दोनों सिखा देता है। फिर वह स्कूल जाता है तो वहाँ भी उसके ये परिवार से प्राप्त बंधन टूटने के बजाय और ज्यादा मजबूत होते हैं। यही बात पुस्तकों के बारे में भी है। सबसे पहले हमारे देश का सामान्य युवक बेरोजगारी से जूझता है और उसके लिए जी जान एक कर देता है। माता-पिता, अभिभावक आदि भी यही चाहते हैं कि वह सिर्फ वही पढ़े, जिससे रोजगार मिले।  रोजगार मिल जाने के बाद पढ़ने-लिखने का सारा काम खत्म हो जाता है। हमारे यहाँ रोजगार पा लेना जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि माना जाता है, जो उसे अलौकिक स्तर की संतुष्टि से भर देती है। एक कहावत भी इस बारे में है- पढ़ोगे लिखोगे बनोगे नबाव। जो समाज नबाव बनने के लिए पढे़गा, वह नबाव बन जाने के बाद किसलिए पढ़े। जहाँ तक इस आदत को विकसित करने का सवाल है कि यदि घर, परिवार से लेकर स्कूल स्तर तक यदि पढ़ने पढ़ाने का वातावरण मिले तो इसको विकसित किया जा सकता है। जब परिवार वाले और शिक्षक पढ़ते हुए दिखाई देंगे तो बच्चे पर इसका प्रभाव पड़े बिना नहीं रहेगा।

इसके अलावा सार्वजनिक पुस्तकालय-वाचनालय श्रृंखला का विकास किया जाए और स्कूल स्तर पर पुस्तकें पढ़ने वालों के लिए हर साल ऐसे आयोजन हों जिनमें पाठ्येतर पुस्तकें पढ़ने वालों से उनके विचार व्यक्त कराये जाएं और उनको सार्वजनिक तौर पर सम्मानित किया जाए।

दीवार पत्रिकाओं में ऐसे पाठकों के लिए अलग से कालम हो कि वे आजकल क्या नया पढ़ रहे हैं। सुगम, सुबोध और रोचक साहित्य की आसान सुलभता निश्चित की जाए।

आपकी यह बात बिलकुल सही है कि हमारे परिवारों की भी यही धारणा बनी हुई है कि पढ़ना-लिखना सिर्फ रोजगार पाने के लिए होता है। इसके चलते केवल वही किताबें पढ़ी जाती हैं जो प्रतियोगिता परीक्षा की दृष्टि से उपयोगी होती हैं। इसी तरह स्कूली शिक्षा के दौरान भी वही किताबें और पाठ पढ़े जाते हैं जो परीक्षा में अधिक अंक दिला सकें। सार रूप में कहा जाए तो हमारा पढ़ना परीक्षा केन्द्रित होता है। इस धारणा के चलते साहित्यिक किताबें बहुत कम पढ़ी जाती हैं। कहानी-कविता-उपन्यास तो मनोरंजन और समय व्यतीत करने के लिए ही पढ़े जाते हैं। स्कूली बच्चों के लिए तो ये समय बर्बाद करने वाली मानी जाती हैं। प्रतियोगी परीक्षाओं या अच्छे अंक प्राप्त करने की दृष्टि से क्या साहित्यिक किताबों की कोई उपयोगिता है? आखिर विज्ञान-गणित के विद्यार्थियों के लिए साहित्यिक पुस्तकों की क्या जरूरत है?

दरअसल, हमारी मौजूदा शिक्षा प्रणाली उन अंग्रेजी शासक वर्ग की बनाई हुई है, जो हमारे ऊपर लम्बे समय तक राज करते हुए यहाँ के मानवीय श्रम और प्राकृतिक सम्पदा का दोहन एवं शोषण करके अपने देश को सम्पन्न करने के उद्देश्य से यह सब कुछ करना चाहते थे। जो उन्होंने किया भी। उनके जमाने की शिक्षा पद्धति आज भी चली आ रही है, जो अंग्रेजी शासक वर्ग ने अपने लिए एक नौकरशाही निजाम तैयार करने के लिए बनाई थी, जिसके माध्यम से वे हिन्दुस्तान पर शासन कर सकें। उनका उद्देश्य यहाँ की जनता को ज्ञान-वि‍ज्ञान सम्पन्न और वास्तविक तौर पर शिक्षित करना था ही नहीं, कि यहाँ के निवासी अपनी रूढ़ियों से लड़ते हुए एक आधुनिक समाज का निर्माण कर सकें। अफसोस की बात यह है कि आजादी मिल जाने के बाद भी हमारी सरकारों का जितना ध्यान पूँजी के प्रभुत्व वाले विकास पर रहा, उतना श्रम शक्तियों की एकजुटता और जनजागरण पर नहीं। इस काम के लिए अँग्रेजी शिक्षा पद्धति को बुनियादी तौर पर बदलने की जरूरत लोकतांत्रिक शासक वर्ग ने समझी ही नहीं। इसी का परिणाम है कि आज का युवा वर्ग एक समग्र शिक्षा प्रणाली से महरूम है। वि‍ज्ञान पढ़ने वाले युवा को साहित्य, इतिहास, दर्शन का ज्ञान नहीं और साहित्य, इतिहास आदि पढ़ने वाले को विज्ञान से दूर रखा जाता है जबकि हमारा जीवन इस तरह से ज्ञान-वि‍ज्ञान के मामले में विभाजित नहीं होता। व्यक्ति का जीवन समग्र होता है। उसे सुविधा के लिए विभाजित जब से किया गया है, तब से वैसे ही चला आ रहा है। जबकि आज वि‍ज्ञान तकनीक को जाने बिना कोई एक कदम आगे नहीं बढ़ सकता। इसी तरह से हरेक व्यक्ति का काम मानवीय भावनाओं से पड़ता है। उस इतिहास,  दर्शन से पड़ता है, जिससे हर व्यक्ति अपनी जिन्दगी में गुजरता है। यह हमारे जीवन की समग्रता ही है कि व्यक्ति को जीवन के हर क्षेत्र के ज्ञान की जरूरत है। ज्ञान का ऐसा संकायपरक विभाजन मनुष्य और उसकी मनुष्यता को विभाजित करने जैसा काम है। यह विभाजन किसी भी समय के शासक वर्ग के लिए फायदेमंद रहता है। वि‍ज्ञान वाला साहित्य से अलग और साहित्य वाला वि‍ज्ञान से कोसों दूर। यह बहुत कृत्रिम है।

जब इस पृथ्वी पर सोवियत संघ का अस्तित्व था, तब के शिक्षा के अनेक तरह के अनुभव निकल कर आए थे, जिनका ज्ञान और जागरण की दृष्टि से आज भी महत्व जरा सा भी कम नहीं हुआ है। उस समय शिक्षा के पहले जन-कमिसार लेनिन ने लुनाचार्स्की को बनाया था। उन्होंने शिक्षा क्षेत्र में विशेषज्ञता के साथ सामान्यता के रिश्तों पर विचार करते हुए बतलाया था कि शिक्षित आदमी वह है ,जिसे सबका सामान्य और संक्षिप्त ज्ञान होता है, लेकिन जिसके पास अपनी विशेषज्ञता भी होती है, जो अपने कार्य को भली भाँति जानता है और जो शेष चीजों के बारे में भी कह सकता है कि कोई भी मानवीय चीज मेरे लिए पराई नहीं है। वह आदमी, जिसे टेक्नोलॉजी, औषधि विज्ञान, कानून,  इतिहास के मूल तत्वों और निष्कर्षों का ज्ञान होता है, वास्तव में शिक्षित आदमी है। लुनाचार्स्की ने यह भी माना है कि किसी को भी अज्ञानी नहीं रहना चाहिए। सबको सभी विज्ञानों और कलाओं के मूल तत्वों का ज्ञान होना चाहिए। चाहे आप मोची हों या रसायन शास्त्र के प्रोफेसर। यदि आपकी आत्मा में किसी कला के लिए स्थान नहीं है, तो इसका मतलब है कि आप काने और बहरे की भाँति अपाहिज हैं। क्योंकि आदमी की शिक्षा वस्तुतः इसमें है कि वह सब कुछ, जिसमें मानव जाति अपने इतिहास और संस्कृति का निर्माण करती है, जो मनुष्य के लिए उपयोगी या सांत्वनाप्रद अथवा जीवन में आनंद प्रदान करने वाली कृतियों में प्रतिबिंबित होता है– यह सब कुछ प्रत्येक आदमी की पँहुच के भीतर हो, पर साथ ही उसके पास विशेषज्ञता भी हो। इस आधार पर कहा जा सकता है कि ज्ञान की दुनिया में सबको सबकी जरूरत होती है किसी एक विषय में विशेषज्ञता के साथ। ज्ञान और शिक्षा की दुनिया में कोई विभाजन नहीं होता।

प्रतियोगी परीक्षाओं की दृष्टि से साहित्य किस तरह से मददगार है?

दुनिया में प्राप्त किसी भी क्षेत्र का ज्ञान सभी तरह की परीक्षाओं में कहीं न कहीं मददगार होता है। सामान्य ज्ञान के प्रश्न पत्र में भी साहित्य के बारे में कुछ न कुछ पूछा जाता है । इससे ज्यादा कुछ परीक्षाओं में यह विषय इन्टरव्यू में मदद करता है। दूसरे साहित्य पठन का असर भाषा के माध्यम से परीक्षार्थी के अभिव्यक्ति कौशल पर होता है। निबंध जैसे प्रश्न पत्र में निबंध लेखन की कला साहित्य के माध्यम से सीखी जा सकती है। साहित्य से जीवन के प्रति समग्र दृष्टिकोण का विकास होता है जो पाठक को इतिहास,  दर्शन, समाजशास्त्र आदि विषयों की जानकारी भी देता है। कुल मिलाकर बात यह है कि साहित्य पढ़ने वाला कभी नुकसान में नहीं रहता,  उसका जीवन के प्रति आत्मविश्वास बढ़ता है और वह विभिन्न चरित्रों के बीच स्वयं की स्थिति का आकलन आसानी से कर सकता है। लेकिन. आज ज्ञान क्षेत्रों में विशेषीकरण इस हद तक बढ़ गया है कि उसने व्यक्ति को समाज से अलग करके एकांगी और आत्मकेन्द्रित बना दिया है। ज्ञान के क्षेत्रों में बढ़ते विशेषीकरण ने मानव जीवन का रूप ही बिगाड़ दिया है। यह विशेषीकरण एक अच्छे भले इंसान को अपाहिज बना रहा है। इससे व्यक्ति की रचनात्मक भूमिका कमजोर होती जा रही है और वह ज्यादा से ज्यादा एय्याश तथा सामन्ती स्वभाव जैसा बनता जा रहा है। यही कारण है कि आज आसपास हमें सच्चे और सम्पूर्ण ढंग से शिक्षित लोग नहीं मिलते। शिक्षा के नाम पर आधे-अधूरे और अपाहिज लोग ज्यादा नजर आते हैं।

इसी वजह से हमारे यहाँ शिक्षा और प्रतियोगी परीक्षाओं की सारी प्रणाली एकांगी एवं विशेषीकृत होने को अभिशप्त है।

प्रसिद्ध कथाकार मोपांसा ने अपने समय के अनुभव के आधार पर कभी कहा था कि आदमी हमेशा अकेला होता है और उसका सर्वोत्तम मित्र भी उसके लिए एक पहेली होता है। दरअसल, यह पहेली बनती है उस निजी पूँजी की व्यवस्था से, जो आदमी के ज्ञान को विशेषीकृत करते हुए उसे उसके सच्चे और वास्तविक जीवन से अलग करती जाती है।

प्रतियोगी परीक्षाओं में पूछे जाने वाले प्रश्न भी आज विशेषीकृत ज्ञान से ज्यादा जोड़ दिए गये हैं। इससे समाज के भीतर ज्ञानात्मक विभाजन और विशेषीकरण की प्रक्रिया तेज हुई है। इस वजह से भी आज के लोग अपने आज के साहित्य से दूर होते जा रहे हैं।

साहित्य की इस महत्वपूर्ण भूमिका को आज बिलकुल नजरंदाज किया जा रहा है। पब्लिक स्कूलों में तो हाईस्कूल के बाद साहित्य और मानविकी विषय पढा़ए ही नहीं जा रहे हैं। उच्च शिक्षा में भी केवल वही विद्यार्थी इन्हें पढ़ रहे हैं, जो विज्ञान और गणित जैसे विषयों को पढ़ने में अक्षम पाते हैं। मेरा तो मानना है कि विज्ञान वर्ग के हर विद्यार्थी के लिए साहित्य पढ़ना अनिवार्य होना चाहिए। आप क्या कहेंगे?

आपका मानना सही है। साथ ही साहित्य पढ़ने वालों को भी विज्ञान का सामान्य ज्ञान उतना ही आवश्यक है, जितना विज्ञान पढ़ने वालों को साहित्य का। ज्ञान की यात्रा कभी इकतरफा नहीं होती। सामान्य ज्ञान सभी को सबका और विशेष ज्ञान किसी एक क्षेत्र का। जीवन समग्र है और विशेष भी। मानव भावनाओं की जानकारी विज्ञान से नहीं हो पाती इसलिए साहित्य की जरूरत होती है। और दुनिया गतिशील कैसे रहती है, इसकी वस्तुस्थिति का पता विज्ञान से चलता है और ऐसी अनेक तरह का अदृश्य सचाइयों का भी, जो विज्ञान के बिना संभव ही नहीं थी। ज्ञान कभी इकहरा और सपाट नहीं होता। आदमी ने अपनी हजारों सालों की जीवन यात्रा में बहुत कुछ अपने अनुभवों से जाना है और उसे ही ज्ञान में परिवर्तित किया गया है। इसका उपयोग हर कोई अपने जीवन में करता है। पब्लिक स्कूल नामधारी प्राइवेट स्कूल अपना धंधा करने के लिए हैं, समाज को शिक्षित करने के लिए नहीं। उनके यहां वही माल तैयार किया जाता है, जो बाजार में बिकता है। साहित्य और मानविकी जिस रोज बाजार में बिकने लग जाएंगी, ये स्कूल उनको पढ़ाने लगेंगे। जनशिक्षा का असली काम कभी बाजार नहीं कर सकता। यह काम तो उन स्कूलों को करना होगा, जो जनशिक्षण की भूमिका में हैं। दरअसल, हमारे देश में युवकों और अभिभावकों पर एक ही दबाव है, रोजगार हासिल करने का। साहित्य और मानविकी बाजार और रोजगार के मामले में छोटी सी भूमिका में हैं। इस वजह से ऐसा हुआ है। दूसरी बात यह भी है कि पिछले बीस-पच्चीस सालों में विज्ञान और तकनीक की भूमिका बहुत अग्रणी और जरूरी हो गई है। हमारी सारी शिक्षा व्यवस्था सीधे रोजगार पाने का जरिया है इसलिए ऐसा हुआ है। सरकारें तो वही काम करने लगती हैं जो जनता की जरूरत बन जाता है। उनको वास्तविक जन-शिक्षण से ज्यादा लेना-देना नहीं होता। वास्तविक शिक्षा बहुत अलग बात है। वह पूँजी की शिक्षा से बहुत भिन्न होती है।

यह काम समाज के जागरूक और संवेदनशील लोगों को स्वयं आगे आकर और अपना सब कुछ दाव पर लगाकर करना पडे़गा। ऐसे स्कूल चलाने पडे़गे जो समाज को सम्पूर्ण मुक्ति की ओर ले जाएं। जो रोजगार देने के साथ समाज का शिक्षण मानवता के विश्व मानदंडों के आधार पर करें। तब ही इस समस्या का कोई हल निकल सकता है। सरकारी स्कूलों से यह काम तभी किया जा सकता है, जब शिक्षकों का दृष्टिकोण समग्रता वाला हो और जीवन के प्रति उनकी दृष्टि आधुनिक एवं वैज्ञानिक हो। शिक्षा में एक अलग तरह के राष्ट्रीय अभियान से ऐसा संभव किया जा सकता है। एक अलग तरह की स्कूली शिक्षा व्यवस्था चलाकर।

चित्रकार जे.पी. सिंघलः कुछ यादें : ओमा शर्मा

Fri, 17/03/2017 - 01:27

प्रसि‍द्ध चित्रकार और छायाकर जे.पी. सिंघल पर ओमा शर्मा का संस्मरण-

कुछ यादें आपके जेहन में हमेशा के लिए तारी हो जाती हैं और बारहा अनजाने ही। जे.पी. सिंघल साहब के साथ पहली मुलाकात की मुझे खूब याद है, जो वरिष्ठ लेखिका सुधा अरोड़ा के घर एक दोपहर को हुई थी। जब मैं वहां पहुंचा तो लेखक-कलाकार मित्र प्रभु जोशी अपने सुपरिचित अंदाज में वहां उपस्थित मेहमानों को कला और साहित्य की अपनी समझ के किसी पहलू पर संबोधित कर रहे थे। वहां घुसने के बाद मैं चुपचाप एक सोफे पर बैठ गया। थोड़ी देर बाद उन्होंने मुझे वहां उपस्थित मेहमानों से मिलवाया। पहली मुलाकात के समय जैसा होता है सभी ने एक नागरीय मुस्कुराहट के साथ परिचय की अदला-बदली की, सिवाय सिंघल साहब को छोड़कर जो पहली मुलाकात पर ही ऐसे गले मिले जैसे कि मैं उनका कोई भूला-बिछड़ा दोस्त रहा हूँ। मैं तब तक उनको नहीं जानता था। उसी दौरान उन्होंने हाजी अली स्थित घर पर आने का निमंत्रण भी दे डाला जो उन दिनों मेरे घर से चंद मिनटों की ही दूरी पर था।

अगले रोज जब मैं उनके घर पहुंचा तो मुझे बड़े विरल कलात्मक अनुभव का एहसास हुआ। लिफ्ट के पास ही उनकी कई पेंटिंग लगी थीं। प्रवेश द्वार के पास उनके खास कलात्मक हस्ताक्षर की लिपि पीतल में जड़ी थी हालांकि मैं तब तक उससे वाकिफ नहीं था। उसके ठीक ऊपर कोई पुराना भित्तीचित्र था। थोड़ी देर इंतजार के बाद किसी ने दरवाजा खोला और मुझे अंदर बुला लिया। उस चौकोर कमरे में मेरा बाद में भी कई मर्तबा जाना हुआ लेकिन उसमें ऐसी अद्भुत चित्रकारियां, शिल्पकृतियाँ, म्यूरल और तरह-तरह की इतनी सारी आकृतियां सजी रखी थीं कि मैं वहां बैठकर सिर्फ हैरान और सुकून महसूस कर सकता था क्योंकि वैसा कमरा न मैंने पहले कभी देखा था न बाद में। शायद इसका कारण यह भी रहा हो कि उस कमरे में सिर्फ अंतिम आकार लेती हुई चित्रकारियां ही नहीं, बल्कि कुछ ऐसी अधबनी भी थीं जो किसी मधुबनी से कम नहीं थीं। थोड़ी देर बाद वे अपने उसी खास अंदाज यानी गोल गर्दनवाले कुर्ते और पायजामे में मुस्कुराते हुए आये और फिर से लिपटकर गले मिले। मैंने उनका एक मेजबान का अपनापन महसूस किया। मुझे थोड़ा ताज्जुब हुआ क्योंकि वो इतने बड़े-बुजुर्ग कलाकार थे और ऐसे खुलकर स्नेह बरसा रहे थे जिसकी कोई वाजिब वजह मुझे समझ नहीं आ रही थी। हां, मुझे एक सच्चे कलाकार की इंसानियत का एहसास जरूर हो रहा था। उसके बाद भी कई मर्तबा मिलना हुआ इसलिए उस पहली मुलाकात की बहुत सारी चीजें मैं भूल गया हूँ। बस मुझे याद है तो ये कि वो डेढ़ घण्टे का वक्फा मानो पलक झपकते ही निकल गया था। उस समय वे 76 साल के जवान थे। जिंदगी और आवेग से भरे हुए और दुनियादारी से तो एकदम ही बेपरवाह। और तो और उनमें कोई कलाकार होने तक का भरम नहीं था। उस समय वे सिर्फ शरीफ इंसान थे जो अपनी जिंदगी पूरी आजादी से जी रहा हो। अलबत्ता ये आजादी पाने के लिए उन्होंने आधी सदी से ऊपर मशक्कत की थी। उनके दिमाग में उस समय अगर कुछ था तो बस यही कि अपने मेहमान को कैसे तवज्जो दी जाए। वे बातें करते और जैसे बेलगाम अतीत रास्तों में घुमक्कड़ी करने लगते। थोड़ी देर बाद ही मुझे लगा कि मैंने तयशुदा वक्त से कहीं ज्यादा उनका वक्त ले लिया है। जब मैं चलने लगा तो वो मेरे साथ लिफ्ट तक आ गये। लेकिन जब लिफ्ट आई, उसके बाद भी मेरे साथ उतर आये। मेरे लाख माना करने पर भी जब तक मैं अपने कार में नहीं बैठ गया उन्होंने मुझे नहीं छोड़ा (और यह क्रम हर बार दोहराया गया)। जब मैं घर लौटा तो उनसे हुई मुलाकात मुझे रह रहकर याद आने लगी। मुम्बई में कौन किसी से इस तरह मिलता है? इतने खुले मन से कौन गले लगता है? कौन इतने गरमजोशी के साथ बातें करता है? कौन ऐसे ही मिलने-मिलाने के लिए आमंत्रित करता है।

थोड़े दिन बाद उनका मेरे पास फोन आया कि भाई अरसा हो गया मिला जाए। मुझे पिछली मुलाकात अभी तक गुदगुदा रही थी। मैंने अपनी पत्नी को भी उनके घर जाने को राजी कर लिया ताकि वो भी महसूस कर सके कि एक सच्चे कलाकार से मिलना कितना ऊर्जा भरा होता है। सिंघल साहब और उनकी पत्नी श्रीमती माया सिंघल हमेशा बेहतरीन मेजबान थे। हम हमेशा उसी कमरे में बैठते जहां मैं पहली बार बैठा था। मैं किसी भित्तीचित्र के बारे में उनसे पूछता तो वह उसे हासिल करने तक की दास्तान छेड़ देते जिनकी तादात अच्छी खासी थी। पता नहीं उन्होंने ये बात छेड़ी या मैंने जिक्र किया, थोड़ी देर बाद हम उनके पेंटिंग रूम में चले गये जहां उनकी कई पेंटिंग्स अधबनी रखी थीं। एक तो ईजल पर ही रखी थी। एक बार तो मुझे लगा कि वह ईजल पर क्यों रखी है क्योंकि वह तो सम्पूर्ण हो चुकी है लेकिन उन्होंने थोड़ा सहमते करते हुए बताया कि अभी… इसका निचला हिस्सा थोड़ा खुरदुरा है…चेहरे के हाव-भाव में भी… ऊपर का आसमान बाकी चित्र से मेल नहीं खा रहा है। मुझे वाकई लगा कि मेरे देखने का नजरिया अभी कितना संकुचित है हालांकि मैं पॉल वालरी के इस कथन से वाकिफ था कि कोई भी कलाकृति कभी पूरी नहीं होती है; एक अवस्था के बाद वह दुनिया में समर्पित करनी होती है। शायद इसी को प्रभु जोशी ‘नष्ट होने का कगार’ कहते हैं। उसके बाद उन्होंने मुझे एक और पेंटिंग दिखाई जो एक स्त्री की थी। फकत काले रंग का इस्तेमाल। सांझ ढले के वक्त वह स्त्री किसी पहाड़ी पर आँखें मुंदे कुदरत और अपने आप से मगन थी। एक पारदर्शी हिजाब उसके ऊपर जरूर था लेकिन उसके रोम-रोम से मादकता रिस रही थी। अपनी कोहनी मोड़े वह औरत कमर के बल लेटी अपने ही खयालों में ऐसे खोयी थी जैसे- उसे अपनी दुनिया की या किसी और की कुछ पड़ी ही नहीं हो। या एक अबूझ आनन्द में डूबी हो। उस कमसिन की नाभी पूरी चित्रकारी को एक अतीव मादकता में घोले दे रही थी। इस तरह की चित्रकारी को देखना करिश्माई अनुभव था। यह एक बड़े आकार की पेंटिंग थी जिसमें सिर्फ एक ही रंग यानी काला और और उसमें अलग-अलग शेड्स इस्तेमाल किये गये थे। देखने में बहुत सहज लेकिन उतनी ही आकर्षक लग रही थी। मैं सोचने लगा फकत एक रंग और वह भी काले के सहारे कोई किसी के हावभावों को इतनी बारीकी से कैसे चित्रित कर सकता है? लेकिन हाथ कंगन को आरसी क्या? वह पेंटिंग तो मेरे सामने थी। तब तक मुझे पेंटिंग की बारीकियों के बारे में बहुत ज्यादा जानकारी नहीं थी (अभी भी नहीं है) लेकिन उस पेंटिंग का असर सम्मोहित करने वाला था।

लेकिन ये तो उस शाम इस तरह के अनुभव से गुजरने की शुरुआत भर थी। मैंने कला दीर्घायें देखीं हैं लेकिन इस तरह का कला अनुभव, और वह भी किसी के घर के छोटे से कमरे के भीतर, कहीं नहीं हुआ था। उसके बाद उन्होंने वहीं पर आधा दर्जन रखी पेंटिंगों में से एक उठाई और मुझे दिखाने लगे। अपनी पेंटिंग को दिखाने का उनका लहजा और जज्बा क्या खूब था। मैं पेंटिंग को उठाने में उनकी मदद करता तो वे मुझे रोक देते और इसरार करते कि मैं कहां किस कोण पर खड़ा होकर उस पेंटिंग को देखूं ताकि उनके सृजन को महसूस कर सकूं। मुझे एक पेंटिंग की अभी भी याद है। वह एक आदिवासी महिला की थी जो अपने अधनंगे बच्चे को गोदी में उठाये आसमान की तरफ देख मुस्कुराए जा रही थी। चित्रकार की बारीक निगाह से कुछ छूटा हुआ लग ही नहीं रहा था… उनके फटैले कपड़े, अलग-अलग रंगों के मोती, तरह-तरह के रंग-बिरंगे कंगन, आँखों की चमक… बाजू में एक पेड़ भी था जिसके पत्तों के बीच से उतरी हुई धूप अलग-अलग आकारों में पसरी थी। वह महिला अपने बच्चे के साथ जहां खड़ी थी, उसका आस-पास भी चित्रकार ने पूरी बारीकी से दर्ज कर रखा था। प्रकृति की बारीकियों को इस तरह ‘चित्रित’ करना मेरे लिए बड़ा हैरत भरा था और वह आज भी है। कितनी देर तक काम किया गया होगा ताकि कुछ अखरे भी न और छूटे भी न… आखिर यही तो यथार्थवादी चित्रकारी की कसौटी होती है। बाद में मेरे मित्र भाई प्रभु जोशी ने बतलाया कि सिंघल साहब के यहां सूखे ब्रश का जिस अद्भुत और उस्ताद-परक ढंग से इस्तेमाल होता है, उसकी कहीं कोई मिशाल नहीं है। उनमें कहीं भी कोई ‘स्ट्रोक’ जैसी चीज गोचर नहीं हो सकती। इसलिए वे मानते हैं कि उनकी यथार्थवादी चित्रकारी समूचे बंगाल स्कूल की यथार्थवादी चित्रकारी पर भारी पड़ती है। उनको याद करते हुए जब मैं यह सब लिख रहा हूँ तो उस शाम देखी और दिखाई गयी दूसरी चित्रकारियां भी जेहन में आ रही हैं। लेकिन जो खास चीज याद आ रही है वह है सिंघल साहब का अपनी कला में यकीन। वो अपने रचे को ऐसी मार्मिक विनम्रता से दिखाते थे कि पता लगता कि उनके भीतर बैठा कलाकार कितना सच्चा और ईमानदार है। मेरे लिए तो यह जैसे कुबेर का खजाना था।
* *

धीरे-धीरे हम लोगों की खूब छनने लगी। किसी बड़े बुजुर्ग कलाकार जिसने पूरी जिन्दगी ही कला के सृजन में बिताई हो, उससे उसकी या दूसरों की कला या फिर जिंदगी के दूसरे पहलुओं पर बात करना बड़ा आस्वाद भरा था। सिंघल साहब क्योंकि उम्र और अऩुभव के किसी अऩ्तर को नहीं मानते थे इसलिए हम बड़े याराने ढंग से गुफ्तगू करते। उसी दौरान मुझे पता लगा कि वे अपने श्वेत-श्याम वाले छाया-चित्रों को एक जगह इकट्ठा कर कॉफी टेबल बुक तैयार करना चाह रहे थे। पिछले चालीस साल के परिदृश्य में एक भी तो अभिनेत्री ऐसी नहीं…सायरा बानो से लेकर रेखा-हेमा-जीनत और श्रीदेवी से लेकर माधुरी-ऐश्वर्य और कैटरीना तक… जो अपने कमसिन दौर में उनके कैमरे की गिरफ्त में न आयी हो। इनमें ज़्यादातर छाया चित्र उनके मशहूर होने से ठीक पहले के दिनों के रहे होंगे। उन्होंने मुझे बैलगाड़ी के पीछे बैठी एक तस्वीर दिखायी और पहचानने का इसरार किया। तस्वीर में मुझे बहुत कुछ पहचाना सा लग रहा था लेकिन मैं सुनिश्चित नहीं हो रहा था कि वह कौन हो सकती है। बारह-तेरह साल की उम्र में सभी उसी मासूमियत और भोलेपन से भरे होते है। मेरे असमंजस को ताड़ते हुए उन्होंने बताया कि ये नीतू सिंह है जो यकीनन कमसिन होते हुए संभावनाओं से भरी-भरी लग रही थी। कनखियों से देखती हुई उसकी अदा किसी को भी अपनी तरफ लुभा सकती थी। मैंने और दूसरे चित्र भी पलटे, हर चित्र अपने उस श्वेत-श्याम रूप में उस अभिनेत्री के बाहरी ही नहीं भीतरी सौंदर्य तक को छलका दे रहा था। एक चित्र को देखकर मैं रुक गया। उसमें वह युवती पत्तों से भरी जमीन पर दोनों हाथों को सिर की तरफ फैलाए ऐसे लेटी थी जैसे कुदरत ने इसे अभी-अभी किसी सुकून से नवाजा हो… शान्त, तृप्त और अपने में मगन। सिंघल साहब की यह भी एक खूबी थी कि वे सिर्फ प्राकृतिक रौशनी ही इस्तेमाल करते थे, कैमरे का फ्लैश नहीं। उस छायाचित्र को देखकर मैंने वाजिब सवाल किया कि उस चित्र के ऐंगल को देखकर उन्होंने कैमरे को कैसे सेट किया होगा। उन्होंने बताया कि इसके लिए उन्होंने कैमरे को लेकर पेड़ की टहनी के ऊपर बमुश्किल संतुलन बनाते हुए लेटना पड़ा था।
“लेकिन आप पेड़ पर चढ़े कैसे?”
उस दृश्य की कल्पना से मेरे भीतर जिज्ञासा हुई।
“अरे उस हिरोइन ने ही मुझे सहारा देकर ऊपर चढ़ाया था।”
उन्होंने चुश्की ली।

बातों के बीच में ये मजाहिया तेवर उनकी आदत थी। लेकिन जब बात उनकी कला या किसी की भी कला की बात हो तो वो एकदम गैर-समझौतावादी हो जाते। प्रभु जोशी के जल रंगों के वो ऐसे मुरीद थे कि कोई भी उनकी बातों से लहालोट हो जाए। उनके जलरंगों की इतनी तारीफ करते, उनकी बारीकियों को ऐसे मार्मिक ढंग से बताते कि कैसे धूसर रंगों का इस्तेमाल किया जा सकता है। कैनवस के एक-एक गोशे को किस अनुपात में पिरोया गया है कि प्रभु जोशी जैसा जलरंगी चित्रकार कोई दूसरा नहीं हो सकता। और यह सब कहते हुए किसी को ये लग ही नहीं सकता था कि वे खुद एक चित्रकार हैं। लेकिन एक बार जब उन्होंने प्रभु जोशी के गणेश श्रृंखला के चित्रों को देखा (जो बेशक मुम्बई के बाजार के लिए तैयार किये गये थे) तो वे उन्हीं प्रभु जोशी को लगभग लताड़ने में रत्ती भर नहीं हिचके!
“क्यों? तुम ये सब क्यों करते हो, क्या जरूरत है? इससे तुम्हें कुछ नहीं मिलेगा…. और तो और वो पैसे भी नहीं जिसके लिए तुमने इन्हें बनाया है…”
मेरे सामने ही वे प्रभु जोशी पर दहाड़ने लगे।

इसी तरह एक बार जब वे मेरे घर आये और हुसेन साहब की बनी पेंटिंग को देखकर मन्द-मन्द मुस्कुराते हुए बोले “… ये हुसेन साहब का बहुत चालू वाला काम है… हुसेन साहब ने इसे ज्यादा से ज्यादा एक घण्टे में बना दिया होगा… ये उनकी आदत थी, दोस्तों को खुश रखने की।”
मुझे उनकी बात और बारीकी पसन्द आयी।

जेपी सिंघल के साथ ओमा शर्मा।

उन्हीं दिनों भारतीय ज्ञानपीठ से मेरा कहानी संग्रह आने वाला था। मेरे मन में ऐसे ही बात उठी कि क्या किताब के कवर पर उनकी किसी पेंटिंग का इस्तेमाल हो सकता है? या वे कोई मेरी फोटो खींच सकते हैं? मैंने उनसे इस बात का जिक्र भर क्या कर दिया कि उनका दिल तो मदद के लिए उमड़ पड़ा। वे मुझे अपने दूसरे कमरे में ले गये जहां उनकी न जाने कितनी अमूर्त चित्रकारियां बनी रखी थी। एक यथार्थवादी चित्रकार की कूची ने जो अमूर्तन का संसार रचा हुआ था वह कम स्तब्धकारी न था। एक तरह से यथार्थवादी और अमूर्तन, पेंटिंग की दुनिया के दो छोर हैं। कला में अमूर्तन की जरूरत और महत्तव एक दिलचस्प विषय रहा है। अमूर्तन उत्तरोत्तर विकास का पैमाना माना जाता रहा है हालांकि बाज़ हल्कों में जो कलाकृति समझ में न आये या कुछ भी समझाती सी न लगे उसे सहजता से अमूर्त कह दिया जाता है। खैर, मैंने उनके भण्डारगृह से एक का चयन किया जो अंततः बहुत खुबसूरत ढंग से मेरे कहानी संग्रह “कारोबार” का कवर बनी। भारतीय ज्ञानपीठ में कार्यरत मेरे एक मित्र ने बताया कि उसको देखकर तत्कालीन संपादक गदगद हो गये थे क्योंकि इस तरह की चित्रकारी उनकी नजर में इसके पहले कभी नहीं आयी थी और न शायद इसके बाद। जहां तक फोटो लेने की बात थी वह भी उन्होंने उसी वक्त कह दिया कि शनिवार को खींचेंगे। अभी तक मेरी किताबों में गये मेरे चित्र किसी नुक्कड़ के फोटो स्टूडियो में पासपोर्ट साइज के बनवाये हुए थे। मैं यह तो नहीं कहूँगा कि मेरे भीतर किसी नामी या अच्छे फोटोग्राफर द्वारा चित्र खिंचवाने की इच्छा न थी क्योंकि मैं किसी ऐसे-वैसे से वाकिफ ही नहीं था। कोई फोटो खींचने में कितनी देर लगती है? लेकिन पहली बार पता चला कि फोटो खींचने का भी एक ‘सत्र’ होता है। और वो उस पूरे ‘सत्र ‘की तैयारी से ही उस शनिवार मेरे घर आये थे…हैट और सस्पेंडर चढ़ाए…तरह-तरह के लेंसों का जत्था उठाए। कभी वे मुझे खिड़की के पास खड़ा कर देते, कभी सोफे पर बिठाते, कभी खुद सोफे पर चढ़ जाते और कभी नीचे बैठकर, यहां तक की लेटकर अपने कैमरे का ऐंगल सेट करते। कई बार ये भी हुआ कि वे उस मुद्रा में यूँ ही पड़े रहे क्योंकि उनके मुताबिक मैं ‘रिलैक्स’ नहीं था।
“मैंने तुम्हारी कहानियां नहीं पढ़ी हैं, मगर पढ़ लूंगा… लेकिन तुम्हारे चेहरे में एक दार्शनिकपना(इदन्नमं) है … मैं उसे पकड़ना चाहता हूँ… इसलिए… कुछ जान-बूझकर सोचने या पोज बनाने की जरूरत नहीं है… जैसे हो वैसे ही रहो… क्योंकि मैं जानता हूँ तुम क्या हो।” वे कैमरा छोड़ बड़े मनुहार और संयम से मुझे समझाने लगते। कौन फोटोग्राफर, जिसके पास हिन्दी सिनेमा की एक से एक अभिनेत्री अपना फोलियो बनवाने को ललायित रहती रही हों, इस तरह कर सकता था? लेकिन सिंघल साहब तो सिंघल साहब थे। उन्हें कुछ करना होता था तो पूरे सलीके और स्नेह से करते थे। सृजन का अभिप्राय ही उनके लिये पूरे जी जान से अपने को समर्पित कर देना था। मैंने यह भी देखा कि उन्होंने जान लिया था की किस तरह तकनीकी के सहारे से( मैकेनटॉश कंप्यूटर) अपने सृजन में चार चांद लगाये जा सकते हैं। मेरी किताब को आये अब कई वर्ष हो चुके हैं। उसका दूसरा संस्करण भी आ गया जिसमें वही पेंटिंग और उनका खींचा गया मेरा चित्र है। इतना ही नहीं उस चित्र को मैंने उसके बाद आई दूसरी किताबों में भी इस्तेमाल किया। मुझे ही नहीं मेरे करीबी कई मित्रों को लगता है कि कोई दूसरा चित्र मुझे इससे बेहतर नहीं दिखा सकता है।
जो भी हो इस बहाने सिंघल साहब के साथ मेरी संगत बनी रहती है।

लेकिन उनके साथ बातें करना, उनके बताये अनुभव का गवाह बनना, उनके खयालात से वाकिफ होना या कभी-कभी उनकी तुनक मिजाजियों से गुजरना बहुत रोमांचक था। वे अपने यकीनों में पूरे जोश-खरोश से जीते थे जैसा बहुत सारे कलाकारों की फितरत होती है। एक बार जब मैं उनसे मिलने गया तो वो कुछ फोटोग्राफ्स का पुलिंदा लिये बैठे थे। बड़े अजीबो-गरीब ढंग के फोटोग्राफ्स थे। बम्बई और उसकी तमाम भीतरी-बाहरी पहचान को दर्ज करते हुए। कई वर्षों का काम रहा होगा। और फोटोग्राफ्स क्या थे? बम्बई की दीवारों पर लिखी गयी इबारतें और पोस्टर्स… कोई चारकोल से लिखा हुआ… कोई आधा मिटा हुआ… कोई एक दूसरे के ऊपर चढ़ा हुआ… कोई भीड़-भड़क्के के बीच दबा हुआ तो कोई सुनसान में पड़ा हुआ। क्या ऐसे वाहियात संदेशों–जिन्हें उस शहर को पढ़ने की फुर्सत नहीं– से कोई कला बरामद की जा सकती है? या कहें, कि क्या इस तरह की मामूलियत कला में ढाली जा सकती है? मैं सोचने लगा। लेकिन सिंघल साहब एक सोचते-विचारते कलाकार थे। जीवन के आंवे से अपना माल-पानी उठाते थे। उनके भीतर हरदम कुछ न कुछ चलता रहता था। पिछली सदी के सातवें और आठवें दशक में बंबई आकर अपनी कैलेंडर आर्ट के सहारे उन्होंने आर्थिक रूप से अपने को ठीक-ठाक सुरक्षित कर लिया था जिसे बाद में उनके फिल्मों से जुड़ने के कारण और पुख्तगी मिल गयी थी। वे मुख्य धारा की लगभग सौ फिल्मों से उनके पब्लिसिटी डिजाइनर के तौर पर जुड़े रहे। फिल्मी दुनिया का जिक्र करते वक्त उनका जायका कुछ कसैला सा हो जाता “… बड़ी कारोबारी दुनिया है भाई…एक से एक कमजर्फ वहां बैठा होता है…फिल्मों की दुनिया कलाकार की दुनिया नहीं हो सकती है… लेकिन मेरे को क्या मेरा तो इसने भला ही किया।” वे जैसे सब कुछ भूलते-भालते एक फलसफे के सहारे बाहर निकल चुस्की लेने लग जाते। लेकिन उनको अपने संघर्ष के दिन याद रहते थे। यानी लड़कपन में मेरठ के दिन और बम्बई में आने के शुरुआती दिन भी। आडवानी एण्ड ऑरलीकॉन में काम करते हुए उन्होंने अच्छा-खासा मकाम बना लिया था, लेकिन वे खुलेआम स्वीकारते कि वे अभी भी कई तरह की असुरक्षाओं के शिकार हैं। हर कलाकार को अपने को चलायमान रखने के लिए अपने तईं कुछ न कुछ करना पड़ता है, चाहे वह कोई मुगालता हो या कोई टोटका। अगर कोई लेखक बीस-तीस साल से लगातार लिख रहा है तो उसे कुछ नहीं तो उस नैरंतर्य के लिए ही सराहा जाना चाहिए। सिंघल साहब तो फोटोग्राफी और चित्रकारी की दुनिया से पचास साल से ऊपर से जुड़े हुए थे और फिर भी वे ‘प्रवाह’ में थे। उन्होंने अभी अपने हथियार नहीं फेंके थे… जैसे कलाकार होना उनका स्वभाव हो। जहांगीर आर्ट गैलरी में हुई उनकी कला प्रदर्शनी का मैं गवाह था। वह सचमुच एक विराट उपलब्धि थी। जहांगीर के नीचे के तीनों हॉल ही नहीं, पहली मंजिल पर बने दोनों कमरों को भी उन्होंने शामिल कर लिया था। मुम्बई का कला-जगत जैसे सकते में आ गया था। एक तरफ उनकी आदिवासियों की श्रृंखला थी तो दूसरी तरफ उनकी अजंता-एलोरा की। एक तरफ उनकी अमूर्त चित्रकारियां थी तो दूसरी तरफ कैलेंडरों के लिए बनायी गई चित्रकारियां। एक कमरे में तो उनके पिछले चालीस सालों की मुम्बई की तमाम खूबसूरत अभिनेत्रियों के ही श्वेत-श्याम छायाचित्र थे। उन दिनों बात करते हुए वे एक अजीब मस्ती के आलम में झूमते दिखते! कभी वे अपनी पेंटिंगों के बारे में ही बताते तो कभी उनके सृजन के रहस्य के बारे में और कभी अपनी खुद की ग्रन्थियों के बारे में। वे उम्र और कला के ऐसे मकाम पर थे जहां सराहना और आलोचना बेमानी हो जाते हैं। उन्हें कहीं दिली तसल्ली थी कि अपनी आदिवासी श्रृंखला में वे एक ठेठ भारतीयता को दर्ज कर पाये हैं और अपनी अजन्ता एलोरा श्रृंखला में उन्होंने उन तमाम बेनाम कलाकारों को श्रद्धांजली दी है जिन्होंने सदियों पहले ऐसा करिश्माई काम कर छोड़ा था। प्रदर्शनी का विमोचन अभिनेत्री श्रीदेवी ने किया जो मुझे बड़ा वाहियात लगा क्योंकि सारा मामला कम से कम कुछ समय के लिए कला की दुनिया से बेमेल हो चला था। लोगों के बीच अपनी बात रखते हुए उन्होंने कतर में बैठे मकबूल फिदा हुसेन से भी मोबाइल के जरिये आशीर्वचन लिये। मुझे वह गैरजरूरी लगा। मगर सिंघल साहब शायद हर सूरत उस प्रदर्शनी की सफलता देखना चाह रहे थे। जो भी हो प्रदर्शनी हर लिहाज से कामयाब थी। उन्हें भीतर कहीं ये भी सुकून था कि मुम्बई की कला की दुनिया में आखिर उन्होंने अपना झण्डा गाड़ दिया।
तो क्या वाकई उनका सपना पूरा हो गया?
क्या वाकई अब कुछ करने को नहीं बचा?
* *

पीछे मुड़कर देखता हूँ तो मुझे याद आता है कि अपने आखिरी दिनों में वे मुझसे कुछ कहना और बांटना चाहते थे… उनकी देखी-भाली कुछ कहानियां या वे अनुभव जिनसे वे गुजरे… जो उनके भीतर एक तड़प मचाये हुए थीं कि वे बाहर आयें। लेकिन सिंघल साहब के हाथ में कूची थी, कलम नहीं। एक बार मुझे देखकर लढ़ीयाते से बोले “… हम दोनों की जोड़ी लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल जैसी होगी… एक सोचता है, दूसरा उसे अंजाम देता है।” वे बतायेंगे और मैं लिखूंगा। उन्होंने दक्षिण की अभिनेत्री का कई बार जिक्र किया जिसका बचपन में ही उसके पिता ने बलात्कार किया था। आज वह न सिर्फ एक जानी-मानी अभिनेत्री और सांसद रह चुकी हैं बल्कि उसके नाम का एक मंदिर तक है। मुझे यह संक्रमण दिलचस्प लगा। मगर किसी न किसी वजह से हम लोगों की वह देर तक चलने वाली मुलाकातें नहीं हो सकीं। मैं कभी उनसे इसका जिक्र करता तो वे कुछ टालमटोली सी कर जाते। मुझे कुछ नहीं सूझता क्योंकि यदि कुछ होने वाला था तो उसमें पहल उन्हीं की थी। अस्सी वर्ष के एक कलाकार व्यक्ति के साथ बर्ताव करते समय आपको खयाल ज्यादा रखना होता है (हुसेन के साथ मेरा तजुर्बा गवाह था!)। वे अब भी कला की दुनिया में विचरण करते थे लेकिन निजी चैनलों पर आने वाले कुछ अनाप-सनाप धारावाहिकों में रमने लगे थे। उन धारावाहिकों के कुटिल चरित्रों के साथ वे निजी दुश्मनी सी मानने लगते। भाभी जी यानी श्रीमती माया सिंघल ने मुझे हौले से सूचित भी किया कि वे उन धारावाहिकों के रिपीट शोज को भी उसी तन्मयता और आवेग से देखते हैं। उसके चरित्रों के साथ ऊपर-नीचे होते हैं।

“लेकिन सिंघल साहब ये टी.आर.पी.के लिए बनाये गये, खड़े किये चरित्र हैं, असली नहीं हैं…” मैंने हौले से उन्हें समझाने की कोशिश की।
“क्या ऐसे चरित्र हमारे आस-पास नहीं भटक रहे हैं, क्या तुम अखबार नहीं पढ़ते हो। कितना कुछ गलत हो रहा है दुनिया में।”  वे लगभग मुझ पर गरज से पड़े।
मैं सहम गया।
मुझे लगा जैसे उन पर कोई बाधा आ गयी है क्योंकि यह सब इतना अप्रत्याशित था। पता नहीं अपने दिल के भीतर वे किस रहस्यमयी झंझट में उलझे थे।
जिन्हें हम चाहते हैं कई हमें उनके गुस्से और अप्रत्याशित को स्वीकारना ही होता है।
* *

आठ मई, 2014 को मैं नाशिक में था जब फोटोग्राफर मित्र प्रदीप चन्द्रा का मेरे पास संदेश आया कि‍ प्रिय कला के हमारे एक दिग्गज सिंघल साहब नहीं रहे। मैं अवसन्न रह गया। पिछले चार वर्षों की मेल-मुलाकातों के बहुत सारे पल यकायक उमड़ने-घुमड़ने लगे। मेरे आस-पास एक बेचारगी तैर गई। उनके अप्रत्याशित रवैये का भी जैसे खुलासा सा हाथ लगने लगा। लेकिन मेरी चाहना थी कि उनके अन्तिम दर्शन अवश्य करूं। क्या यह मुमकिन होगा? संयोग से कनाडा में रहने वाले उनके छोटे पुत्र के आने से यह सम्भव हो सका।
जब मैंने उनको आखिरी बार देखा तो उनकी देह सिकुड़कर बहुत छोटी रह गयी थी। उन्होंने अपने संघर्षपूर्ण जीवन से कला की दुनिया को जो दिया था, उसकी अनूगूँज बनी हुई थी। लेकिन उनके दाह-संस्कार में शामिल होने वालों की तादाद बहुत कम थी। सिर्फ अंगुलियों पर गिनने लायक। कला की वह दुनिया जिसे उन्होंने जतन से इतना संवारा, उसे भी उनसे कुछ पड़ी नहीं रह गयी। क्या कहेंगे इसे? एक कलाकार का नसीब या मुम्बई की भागमभाग।
अलबत्ता, उनके चेहरे पर एक बच्चे की मासूमियत अभी भी तारी थी और मैं देख पा रहा था कि कैसे अपनी अंतिम सांस तक वे एक कलाकार की गरिमा बनाये रहे।

( ‘अकार’ से साभार)

जेपी (जयंती प्रसाद) सिंघल  का परि‍चय

चित्रकार जे.पी. सिंघल।

जन्म 24 अक्तूबर 1934, मेरठ, उत्तर प्रदेश। दस बरस की उम्र से चित्रकारी। आत्म दीक्षित। अठारह बरस की उम्र में मेरठ छोड़ बम्बई प्रस्थान। शेष जीवन मुम्बई में। बीस बरस की उम्र में ‘धर्मयुग’ में चित्र प्रकाशित। भारतीय देवी-देवताओं, लोक-कथाओं, मंदिरों, आदिवासियों और अजन्ता-एलोरा को लेकर कई कंपनियों के लिए कलैंडर बनाए जिनकी बिक्री की तादाद अस्सी करोड़ के ज्यादा। लगभग 2700 से अधिक मूल पेंटिंग्स। जितने अच्छे चित्रकार, उतने ही  अच्छे छायाकर। पिछले चालीस- पचास बरसों में देश की शीर्ष अभिनेत्रियों और मॉडल्स के छायाकर। राज कपूर की ‘सत्यम शिवम सुंदरम’ के लिए ज़ीनत अमान के किरदार को रूप देने में अहम योगदान। तभी से फिल्मों से जुड़ाव। ‘शान’, मिस्टर इंडिया’, ’हिना’ त्रिदेव’, ‘रॉकी’, ‘बॉर्डर’, ‘गदर’, और ‘बेताब समेत हिन्दी सिनेमा की सौ से अधिक फिल्मों की पब्लिसिटी डिजाइन। मकबूल फिदा हुसेन की फिल्म ‘मीनाक्षी’ में विशेष सहयोग। जे जे स्कूल और जहांगीर कला दीर्घा में प्रदर्शनियाँ। श्री राम(75-76), कृष्ण लीला(1977) के कलेंडरों पर भारत सरकार द्वारा राष्ट्रीय पुरस्कार। कलेंडर आर्ट्स के लिए दूसरे राष्ट्रीय पुरस्कार भी। सात मई 2014 को हृदय गति रुकने से मुंबई में निधन।


लेखक विषय संवाद साभार अनुवादक

पहले वो आए साम्यवादियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं साम्यवादी नहीं था

 

फिर वो आए मजदूर संघियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं मजदूर संघी नहीं था

 

फिर वो यहूदियों के लिए आए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं यहूदी नहीं था

 

फिर वो आए मेरे लिए

और तब तक बोलने के लिए कोई बचा ही नहीं था

 

मार्टिन नीमोलर (1892-1984)