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दखल की दुनिया

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Updated: 1 hour 9 min ago

प्रो. विवेक कुमार ने सफ़ेद झूठ बोला है, वे संघ के कार्यक्रम में युवाओं में देशप्रेम जगाने गए थे!

Thu, 12/10/2017 - 23:49
दिलीप ख़ान
पहले एक तस्वीर आई। इसके बाद प्रो. विवेक कुमार ने फेसबुक पर लिखा, “मेरी फोटो शेअर करने वाले ने यह क्यों नही बताया की प्र. विवेक कुमार किस विषय पर भाषण दे रहे थे और इस कार्यक्रम का शीर्षक क्या था. ना ही सामने बैठे श्रोताओं को दिखाया ? ना ही यह बताया इसी संगठन के एक विंग ने ग्वालियर में मेरे उपर हमला करवाया था. केवल फोटो शेयर करके लोगो को गुमराह न करे…आज मुझे अहसास हो रहा है की मै बहुत बड़ी परसोनालिटी बन गया हूँ…क्योंकि बहुत बड़े बड़े लोग इस फोटो को शेयर कर रहे है. मुझे आशा है की मेरा समाज मेरी आंदोलन के प्रति प्रतिबद्धता एवं सत्य-निष्ठा को अवश्य समझेगा..प्रो. विवेक कुमार.”


फिर दूसरी फोटो आई, जिसमें श्रोता दिख रहे थे। फिर तीसरी आई जिसमें विवेक कुमार चंद लोगों के साथ मंच पर बैठे गप लड़ाते दिख रहे हैं।


विवेक कुमार ने पहले पहली तस्वीर को झूठा कहा, फिर सारी तस्वीरों को। इस प्रकरण पर मैंने फ़ेसबुक पर जब लिखा तो कई लोगों ने कहा कि विवेक कुमार फोटो को नकली बता रहे हैं और दावा कर रहे हैं कि वे उस कार्यक्रम में गए ही नहीं। बीते कुछ साल से दक्षिणवर्ती दुनिया द्वारा स्थापित फोटोशॉप के भयंकर दौर में पहली नज़र में मुझे कुछ भी मुमकिन नज़र आता है। मैंने पोस्ट डिलीट कर दी। लेकिन इसी दौर ने हमें यह भी सिखाया है कि हम अपने सीमित ज्ञान के बूते असली फोटो और फोटोशॉप्ड फोटो में अंतर पहचान जाएं! मुझे एक भी तस्वीर फोटोशॉप्ड नहीं लगी। अलबत्ता, विवेक कुमार के दावे को गंभीरता से लेते हुए यह ज़रूर लगा कि प्रामाणिक जानकारी के साथ इस पर लिखा जाना चाहिए क्योंकि जिस व्यक्ति पर सवाल उठाया जा रहा है वह ऐसे किसी कार्यक्रम के होने की दावेदारी को ही नकार रहा था/है।


तस्वीर में मौजूद जिस एक व्यक्ति को मैं निजी-सार्वजनिक तौर पर जानता हूं वह व्यक्ति अगर समूचे कार्यक्रम और वहां अपनी भागीदारी को झुठला रहा हो तो कोई वजह नहीं बनती थी कि विवेक कुमार की बातों को न माना जाए। लेकिन बातों को मानने के दौरान आंखों में पानी का छींटा मारकर थोड़ा चौकन्ना हुआ तो विवेक कुमार की तरफ़ से परस्पर विरोधी दावों का मैंने पता लगाना शुरू किया। शुरुआत में कार्यक्रम के बारे में जो जानकारियां हाथ लगीं वो हैं-
स्थान- संजय वन, भारतीय जनसंचार संस्थान के बगल में 
तारीख़-  8 अक्टूबर 2017
टाइम-  सुबह के 8-9 बजे
आयोजक- RSS का आरके पुरम खंड
ये सब आसानी से पता चल गया लेकिन विवेक कुमार और उनके तरफ़दार ‘कार्यक्रम का विषय’ पूछते रहे। संघ के कई लोगों से मैंने पता किया। कार्यक्रम में मौजूद कुछ लोगों से भी मैंने जानना चाहा कि विवेक कुमार ने क्या बोला? आम तौर पर चकल्लस में रहने वाले 12वीं से ऊपर के संघपरस्त छात्रों का ध्यान बहुत ज़्यादा भाषणों पर नहीं टिकता और तब तो और भी नहीं जब भाषण पार्क में हो। सो, एक ने बताया कि विवेक सर ने अपने जीवन संघर्षों और उपलब्धियों पर भाषण दिया।
यह संतुष्ट करने वाला जवाब नहीं था। 12वीं से ऊपर के छात्रों के लिए आयोजित इस विशेष कार्यक्रम में विवेक कुमार के सिर्फ़ जीवन संघर्षों और उपलब्धियों को सुनने के लिए संघ क्यों उन्हें न्यौता देगा? फिर संघ के कुछ और लोगों से बात हुई और अंत में संघ के राजीव तुली से। राजीव तुली से पता चला कि राष्ट्रनिर्माण में युवा की भादीदारी और उनके भीतर देशप्रेम जगाने जैसे किसी मुद्दे पर विवेक कुमार ने भाषण दिया, जिसमें प्रसंगवश उन्होंने अपने जीवन के भी कुछ किस्से भी सुनाए।


मंच पर हरे रंग के कुर्ते में जो सज्जन बैठे हैं उनका नाम जतिन है, जिन्हें संघ के लोग पारंपरिक तरीके से जतिन जी कहते हैं। वे दिल्ली RSS के सह प्रांत प्रचारक हैं। जिस फोटो में विवेक कुमार कुछ लोगों के साथ बैठकर गप मार रहे हैं उनमें बैठा एक व्यक्ति जेएनयू में ही कंप्यूटर साइंस जैसा कुछ पढ़ाते हैं।
संघ के लोगों से जब मैंने इस बाबत जानकारी चाही तो उनमें से एक ने इस बात पर हैरानी जताई कि विवेक कुमार इस बात से कैसे मुकर सकते हैं कि वे कार्यक्रम में शरीक हुए। राजीव तुली ने कहा विवेक जी को ऐसा नहीं करना चाहिए। वे गए थे और उन्हें सार्वजनिक तौर पर ऐसा स्वीकार करना चाहिए। हालांकि राजीव तुली ने इस मामले को तूल देने की कोशिश करने वाले हम जैसे लोगों की सहिष्णुता पर भी सवाल उठाए कि विवेक कुमार अगर संघ के कार्यक्रम में चले गए तो बाक़ी लोग इसमें क्यों इतना उतावलापन भरी रुचि दिखा रहे हैं।
संघ का मानना है कि वह हर विचारधारा के लोगों को बुलाने के लिए मंच मुहैया कराने की कोशिश में जुटा है। ज़ाहिर है कि संघ का मंच इस मायने में विलग विचारधारा के लोगों के लिए बेहद सुरक्षित और मुफ़ीद है क्योंकि दूसरे मंच से अगर यही लोग बोलने जाते हैं तो संघ के लोग उन पर हमला तक कर बैठते हैं। विवेक कुमार जब ग्वालियर गए थे तो ABVP के लोगों ने उन पर हमला किया था। TISS प्रशासन ने आख़िरी मौक़े पर कार्यक्रम रद्द कर दिया था या फिर विवेक कुमार को आने से मना कर दिया था।
RSS रह-रह कर इन दिनों आंबेडकर को को-ऑप्ट करने की कोशिश में जुटा है। बहुत मुश्किल काम ले लिया है RSS ने। उससे न तो आंबेडकर पकड़ा जा रहा है और न छोड़ा। इसलिए हो सकता है वो आंबेडकर पर बिल्कुल अपनी लाइन से उलट वालों को भी बुलाकर लोगों को लामबंद कर रहे हों। मज़दूरों-किसानों-दलितों का विंग तो पहले से ही मौजूद है। इनमें वो कई बार जेनुइन मुद्दे उठाकर फिर उसकी भोंडी व्याख्या कर नकली और अश्लील चेतना का विकास करते हैं, जो लोगों के वर्गीय-जातीय हितों के उलट होता है।
संघ और विवेक कुमार दोनों का पक्ष सुनने के बाद मुझे अब सच में यक़ीन हो गया है कि दुनिया बेहद लोकतांत्रिक हो गई है और भारतीय समाज लोकतंत्र की पराकाष्ठा को छू चुका है। जाहिर तौर पर संघ की पताका लोकतंत्र के टीले पर उदार विचारधारा के सबसे बड़े नुमाइंदे के तौर पर अपना नाम दर्ज़ करा रही है। विवेक कुमार भी बेहद लोकतांत्रिक हो चुके हैं कि उन्हें बाएं-दाएं-ऊपर-नीचे हर मंच पर ‘अपनी बात’ रखने में कोई परेशानी नहीं होती। कथ्य और विषयवस्तु ही अहम है, मंच गौण। कथ्य नाम के आदर्शवादी शब्द ने मंच नाम के भौतिकवादी शब्द पर जीत हासिल कर ली है। विवेक कुमार इतने लोकतांत्रिक हो गए हैं कि हमलावर (पूरे दलित समुदाय पर हमलावर) के मंच पर जाने में भी उन्हें कोई परेशानी नहीं हुई। हो सकता है कि वे सच में इतने ही लोकतांत्रिक हों, लेकिन उनके इस ‘जाने’ को RSS ख़ुद के लोकतांत्रिक होने की दावेदारी और चिह्न को मज़बूती से पेश करने की कोशिश कर रहा है। किसका फ़ायदा हुआ?
दिलचस्प यह है कि विवेक कुमार की फोटो इंटरनेट पर सबसे पहले संघ के लोगों ने शेयर की क्योंकि कार्यक्रम में शरीक श्रोतागण उसी खित्ते के थे। या तो हम इस शेयर करने को सामान्य तौर पर फेसबुकिया परिघटना के दायरे में अनिवार्यत: ‘एटैंडिंग ए प्रोग्राम विद मुन्ना एंड 48 अदर्स’ नामक ललक का नतीजा मान लें, या फिर इसे ‘लीक’ मान लें। लीक करने से संघ का कोई नुकसान नहीं है। नुकसान विवेक कुमार और संघविरोधी खित्ते में हैं, जिसमें लोग विवेक कुमार से सवाल पूछेंगे, उनकी राजनीति पर सवाल पूछेंगे, इसी बहाने दलित आंदोलन और आंबेडकरवाद पर सवाल उठेगा, लेफ़्ट के लोग चपेट में आएंगे कि संघ के मंच पर किसी के पहुंच भर जाने से वामपंथियों के पेट में मरोड़ क्यों उठता है? संघ का तो सब कुछ बम-बम है। आप देखिए न कि विवेक कुमार ने अपने फेसबुक पोस्ट में भी फोटो शेयर करने वाले ग़ैर-संघी लोगों को ही निशाना बनाया है।
अगर विवेक कुमार गए, तो उन्हें मान लेना चाहिए था। झूठ बोलना अच्छी बात नहीं है। ख़ासकर तब, जब आप शिक्षक हों। झूठ क्यों बोले? इसका मतलब आप मानते हैं कि वहां जाना ‘ठीक’ नहीं था। यानी आप ख़ुद संघ के मंच पर जाने को ‘ग़लत’ मानते हैं और जब ख़ुद वहां चले गए और लगा कि एक वैचारिक ज़मीन पर रहने वाले लोग आपसे पूछेंगे तो आपने झूठ बोलना शुरू कर दिया। कम्यूनिकेशन और साइकोलॉजी में इसे ‘कॉग्निटिव डिजोनेंस’ कहते हैं, जिसमें लोग वो करते हैं जिसे वो करना ठीक नहीं समझते। और जब वो कर लेते हैं तो उसे ढंकने के लिए ऐसा तर्क गढ़ने की कोशिश करते हैं जिससे उनका कृत्य छुप जाए। लेकिन इस मामले में विवेक कुमार ने ढंकने के लिए तर्क के बजाय झूठ का सहारा लिया। इससे फौरी तौर पर उनका वहां जाना कई लोगों को काल्पनिक लगा, लेकिन जब सच्चाई सामने आ ही गई है तो उनके चरित्र में झूठ नाम की अतिरिक्‍त चीज़ भी जुड़ गई। उन्हें ऐसा नहीं करना चाहिए था। हमें दुख हुआ है और दुखी होने के चलते ही यह सब लिखा। उम्मीदों का क्या है, पता नहीं किस गली में टूट जाए। जो लोग उम्मीद बचा लेते हैं, उन्हें बचा लेनी चाहिए। 
बाक़ी संघ का क्या है। कई आंदोलनों और आंदोलनकारियों को अपने कार्यक्रम में बुला-बुलाकर सम्मानित कर-कर के पूरी लीगेसी को शून्य कर देने की उसकी पुरानी ट्रेनिंग है। लोग बताते हैं कि उत्तराखंड राज्य आंदोलन में उत्‍तराखण्‍ड क्रांति दल के ज़्यादातर लोगों को संघ गांव-कस्बों में किसी भी कार्यक्रम में बुलाकर फूल-माला पहना देता था। उन्हें अच्छा लगता था कि कोई तो पूछ रहा है। फिर, धीरे-धीरे और अच्छा लगने लगा। जब उससे भी और अच्छा लगा तो फूल-माला की उन्हें आदत पड़ गई और फिर संघ ने बाहें फैलाकर कहा कि आओ, समाहित हो जाओ। फिर आधे समाहित हो गए और जो बचे, उनमें से ज़्यादातर कब दाएं मुड़ेंगे और कब बाएं और कब बीच में खड़े रहेंगे, कोई नहीं जानता।

हमारा अपना महिषासुर

Sun, 01/10/2017 - 11:17

गौरी लंकेश
एक दैत्य अथवा महान उदार द्रविड़ शासक, जिसने अपने लोगों की लुटेरे-हत्यारे आर्यो से रक्षा की।
महिषासुर ऐसे व्यक्तित्व का नाम है, जो सहज ही अपनी ओर लोगों को खींच लेता है। उन्हीं के नाम पर मैसूर नाम पड़ा है। यद्यपि कि हिंदू मिथक उन्हें दैत्य के रूप में चित्रित करते हैं, चामुंड़ी द्वारा उनकी हत्या को जायज ठहराते हैं, लेकिन लोकगाथाएं इसके बिल्कुल भिन्न कहानी कहती हैं। यहां तक कि बी. आर. आंबेडकर और जोती राव फूले जैसे क्रांतिकारी चिन्तक भी महिषासुर को एक महान उदार द्रविडियन शासक के रूप में देखते हैं, जिसने लुटेरे-हत्यारे आर्यों (सुरों) से अपने लोगों की रक्षा की।
इतिहासकार विजय महेश कहते हैं कि ‘माही’ शब्द का अर्थ एक ऐसा व्यक्ति होता है, जो दुनिया में ‘शांति कायम करे। अधिकांश देशज राजाओं की तरह महिषासुर न केवल विद्वान और शक्तिशाली राजा थे, बल्कि उनके पास 177 बुद्धिमान सलाहकार थे। उनका राज्य प्राकृतिक संसाधनों से भरभूर था। उनके राज्य में होम या यज्ञ जैसे विध्वंसक धार्मिक अनुष्ठानों के लिए कोई जगह नहीं थी। कोई भी अपने भोजन, आनंद या धार्मिक अनुष्ठान के लिए मनमाने तरीके से अंधाधुंध जानवरों को मार नहीं सकता था। सबसे बड़ी बात यह थी कि उनके राज्य में किसी को भी निकम्मे तरीके से जीवन काटने की इजाजत नहीं थी। उनके राज्य में मनमाने तरीके से कोई पेड़ नहीं काट सकता था। पेडों को काटने से रोकने के लिए उन्होंने बहुत सारे लोगों को नियुक्त कर रखा था।
विजय दावा करते हैं कि महिषासुर के लोग धातु की ढलाई की तकनीक के विशेषज्ञ थे। इसी तरह की राय एक अन्य इतिहासकार एम.एल. शेंदज प्रकट करती हैं, उनका कहना है कि “इतिहासकार विंसेन्ट ए स्मिथ अपने इतिहास ग्रंथ में कहते हैं कि भारत में ताम्र-युग और प्राग ऐतिहासिक कांस्य युग में औजारों का प्रयोग होता था। महिषासुर के समय में पूरे देश से लोग, उनके राज्य में हथियार खरीदने आते थे। ये हथियार बहुत उच्च गुणवत्ता की धातुओं से बने होते थे। लोककथाओं के अनुसार महिषासुर विभिन्न वनस्पतियों और पेड़ों के औषधि गुणों को जानते थे और वे व्यक्तिगत तौर पर इसका इस्तेमाल अपने लोगों की स्वास्थ्य के लिए करते थे।
क्यों और कैसे इतने अच्छे और शानदार राजा को खलनायक बना दिया गया? इस संदर्भ में सबल्टर्न संस्कृति के लेखक और शोधकर्ता योगेश मास्टर कहते हैं कि “इस बात को समझने के लिए सुरों और असुरों की संस्कृतियों के बीच के संघर्ष को समझना पडेगा”। वे कहते हैं कि “ जैसा कि हर कोई जानता है कि असुरों के महिषा राज्य में बहुत भारी संख्या में भैंसे थीं। आर्यों की चामुंडी का संबंध उस संस्कृति से था, जिसका मूल धन गाएं थीं। जब इन दो संस्कृतियों में संघर्ष हुआ, तो महिषासुर की पराजय हुई और उनके लोगों को इस क्षेत्र से भगा दिया गया”।
कर्नाटक में न केवल महिषासुर का शासन था, बल्कि इस राज्य में अन्य अनेक असुर शासक भी थे। इसकी व्याख्या करते हुए विजय कहते हैं कि “1926 में मैसूर विश्वविद्यालय ने इंडियन इकोनामिक कांफ्रेंस के लिए एक पुस्तिका प्रकाशित की थी, जिसमें कहा गया था कि कर्नाटक राज्य में असुर मुखिया लोगों के बहुत सारे गढ़ थे। उदाहरण के लिए गुहासुर अपनी राजधानी हरिहर पर राज्य करते थे। हिडिम्बासुर चित्रदुर्ग और उसके आसपास के क्षेत्रों पर शासन करते थे। बकासुर रामानगर के राजा थे। यह तो सबको पता है कि महिषासुर मैसूर के राजा थे। यह सारे तथ्य यह बताते हैं कि आर्यों के आगमन से पहले इस परे क्षेत्र पर देशज असुरों का राज था। आर्यों ने उनके राज्य पर कब्जा कर लिया”।
मैसूर में महिषासुर दिवस पर सेमिनार, जिसमें लेखकों ने उन्हें बौद्ध राजा बताया ओर उनके अपमान का विरोध किया
आंबेडकर ने भी ब्राह्मणवादी मिथकों के इस चित्रण का पुरजोर खण्डन किया है कि असुर दैत्य थे। आंबेडकर ने अपने एक निबंध में इस बात पर जोर देते हैं कि “महाभारत और रामायण में असुरों को इस प्रकार चित्रित करना पूरी तरह गलत है कि वे मानव-समाज के सदस्य नहीं थे। असुर मानव समाज के ही सदस्य थे”। आंबेडकर ब्राह्मणों का इस बात के लिए उपहास उड़ाते हैं कि उन्होंने अपने देवताओं को दयनीय कायरों के एक समूह के रूप में प्रस्तुत किया है। वे कहते हैं कि हिंदुओं के सारे मिथक यही बताते हैं कि असुरों की हत्या विष्णु या शिव द्वारा नहीं की गई है, बल्कि देवियों ने किया है। यदि दुर्गा (या कर्नाटक के संदर्भ में चामुंडी) ने महिषासुर की हत्या की, तो काली ने नरकासुर को मारा। जबकि शुंब और निशुंब असुर भाईयों की हत्या दुर्गा के हाथों हुई। वाणासुर को कन्याकुमारी ने मारा। एक अन्य असुर रक्तबीज की हत्या देवी शक्ति ने की। आंबेडकर तिरस्कार के साथ कहते हैं कि “ऐसा लगता है कि भगवान लोग असुरों के हाथों से अपनी रक्षा खुद नहीं कर सकते थे, तो उन्होंने अपनी पत्नियों को, अपने आप को बचाने के लिए भेज दिया”।
आखिर क्या कारण था कि सुरों (देवताओं) ने हमेशा अपनी महिलाओं को असुरों राजाओं की हत्या करने के लिए भेजा। इसके कारणों की व्याख्या करते हुए विजय बताते हैं कि “देवता यह अच्छी तरह जानते थे कि असुर राजा कभी भी महिलाओं के खिलाफ अपने हथियार नहीं उठायेंगे। इनमें से अधिकांश महिलाओं ने असुर राजाओं की हत्या कपटपूर्ण तरीके से की है। अपने शर्म को छिपाने के लिए भगवानों की इन हत्यारी बीवियों के दस हाथों, अदभुत हथियारों इत्यादि की कहानी गढ़ी गई। नाटक-नौटंकी के लिए अच्छी, लेकिन अंसभव सी लगने वाली इन कहानियों, से हट कर हम इस सच्चाई को देख सकते हैं कि कैसे ब्राह्मणवादी वर्ग ने देशज लोगों के इतिहास को तोड़ा मरोड़ा। इतिहास को इस प्रकार तोड़ने मरोड़ने का उनका उद्देश्य अपने स्वार्थों की पूर्ति करना था।
महिष-दशहरा पर अयोजित मोटरसाइकिल रैली केवल बंगाल या झारखण्ड में ही नहीं, बल्कि मैसूर के आस-पास भी कुछ ऐसे समुदाय रहते हैं, जो चामुंडी को उनके महान उदार राजा की हत्या के लिए दोषी ठहराते हैं। उनमें से कुछ दशहरे के दौरान महिषासुर की आत्मा के लिए प्रार्थना करते हैं। जैसा कि चामुंडेश्वरी मंदिर के मुख्य पुजारी श्रीनिवास ने मुझसे कहा कि “तमिलनाडु से कुछ लोग साल में दो बार आते हैं और महिषासुर की मूर्ति की अाराधना करते हैं”।
पिछले दो वर्षों से असुर पूरे देश में आक्रोश का मुद्दा बन रहे हैं। यदि पश्चिम बंगाल के आदिवासी लोग असुर संस्कृति पर विचार-विमर्श के लिए विशाल बैठकें कर रहे हैं, तो देश के विभिन्न विश्विद्यालयों के कैम्पसों में असुर विषय-वस्तु के इर्द-गिर्द उत्सव आयोजित किए जा रहे हैं। बीते साल उस्मानिया विश्विद्यालय और काकाटिया विश्वविद्यालय के छात्रों ने ‘नरकासुर दिवस’ मनाया था। चूंकि जेएनयू के छात्रों के महिषासुर उत्सव को मानव संसाधन मंत्री (तत्कालीन) ने इतनी देशव्यापी लोकप्रियता प्रदान कर दी थी कि, मैं उसके विस्तार में नहीं जा रही हूं।
महिषासुर और अन्य असुरों के प्रति लोगों के बढ़ते आकर्षण की क्या व्याख्या की जाए? क्या केवल इतना कह करके पिंड छुडा लिया जाए कि, मिथक इतिहास नहीं होता, लोकगाथाएं भी हमारे अतीत का दस्तावेज नहीं हो सकती हैं। विजय इसकी सटीक व्याख्या करते हुए कहते हैं कि “मनुवादियों ने बहुजनों के समृद्ध सांस्कृतिक इतिहास को अपने हिसाब से तोड़ा मरोड़ा। हमें इस इतिहास पर पड़े धूल-धक्कड़ को झाडंना पडेगा, पौराणिक झूठों का पर्दाफाश करना पड़ेगा और अपने लोगों तथा अपने बच्चों को सच्चाई बतानी पडेगी। यही एकमात्र रास्ता है, जिस पर चल कर हम अपने सच्चे इतिहास के दावेदार बन सकते हैं। महिषासुर और अन्य असुरों के प्रति लोगों का बढता आकर्षण बताता है कि वास्तव में यही काम हो रहा है।


(गौरी लंकेश ने यह रिपोर्ट मूल रूप से अंग्रेजी में लिखी थी, जो वेब पोर्टल बैंगलोर मिरर में 29 फरवरी, 2016 को प्रकाशित हुई थी) साभार- हिमांशु कुमार की फेसबुक पोस्ट से.

बीएचयू को जेएनयू बनने दीजिए, बीएचयू को जनेऊ मत बनाइए वीसी साहेब!

Mon, 25/09/2017 - 16:43
चन्द्रिका(मूलरूप से द वायरहिंदी में प्रकाशित)मैं बीएचयू और जेएनयू दोनों विश्वविद्यालयों का छात्र रहा. इसलिए कह रहाहूं कि बीएचयू को जेएनयू बनने दीजिए वीसी साहेब. बीएचयू को जनेऊसे मत बांधिए. जनेऊ को उसब्राम्हणवादी वर्चस्व के प्रतीक के रूप में लीजिएगा. 
जिसमे एक ठसकहोती है. जिस ठसक की वजहसे आप कुर्सी छोड़कर गेट तक नहीं आए. अपनी सुरक्षा की गुहारलगा रही लड़कियों से यह कहने नहीं आए कि उनका उत्पीड़न गलत है. उनकी सुरक्षा की मांगसही है. ग़लत पर हमकार्यवाही करेंगे. सही के साथखड़े रहेंगे. 
यह कहनेके बजाय उन्हें धमकाया. उनके घर सेभी उन्हें असुरक्षित करने की कोशिश की. उन परलाठियां चलवाई. उन्हें हास्टल से बाहरजाने पर विवश कर दिया. वे सुरक्षामांग रही थी, उन्हें और असुरक्षितकिया. उन्हें घायल किया. 
आपका बयान आया है किबीएचयू को बदनाम किया जा रहा है. बीएचयू एक पुरानी संस्था है. 100 साल से भी ज़्यादा पुरानी. अपने वक्त का वहशायद भारत का सबसे बड़ा आवासीय परिसर भी रहा है. वहां लोगों ने पढ़ाईकी अपने क्षेत्रों में नाम कमाए. उन कामऔर नाम के जरिए बीएचयू ने भी नाम कमाए. 
आपका यह कहनाकि बीएचयू को बदनाम किया जा रहा है. गलत हैं. बीएचयू का नाम और ज़्यादा रोशन हो उसके लिए यह काम किया जा रहा है. लड़कियों को भीआज़ादी मिले उसके लिए वे अपना हक़ मांग रही हैं. वे सुरक्षितरहें उनकी इतनी ही मांग है. 
किसी भी तारीख़के चौबीस घंटे उनके लिए आधे न किए जाएं. आधी आबादी का दिनभी पूरे चौबीस घंटे का हो. यह आज़ादीऔर यह वक्त उनकी प्रतिभा को और निखारेगा. वे निखरेंगीतो बीएचयू भी निखरेगा. बीएचयू का नामहोगा. बदनाम नहीं होगा बीएचयू. 
बुरी घटनाएं और छिनीहुई आज़ादी बदनामी होती है. आज़ादी के ख़्वाबको बदनामी कहना किन्हीं और समाजों का चलन है. जिसे मैने जनेऊ कहा है यहवहां का प्रचलन है. वहां खड़े होकर आप मतबोलिए. देर से ज़ुबान खोला है तो लोकतंत्र और सामंतशाही को एक ही गिलास में मत घोलिए. 
यह कहनाआसान है कि बाहर के लोग उकसा रहे हैं. जेएनयू और इलाहाबादके लोग बहका रहे हैं. आज़ादी बहकाने और उकसानेसे नहीं मिलती. आप 1857 के अंग्रेजों जैसा कुछ बता रहे हैं. आज़ादी का अहसासदिलाना बहकाना नहीं है. झूठ मत बोलिए. फिलवक्त यह काम मुल्क के शीर्ष पदों पर बैठे लोगों के लिए छोड़िए. जो झूठबोल रहे हैं और बोलवा रहे हैं. जो ज़हरघोल रहे हैं और घोलवा रहे हैं.बीएचयू को जेएनयू बनने दीजिए. बीएचयू की दीवारेंभी विचारों और नारों से रंगने दीजिए. कविताएं लगने दीजिए. पर्चेपोस्टर बंटने दीजिए. धारा 144 हटालीजिए. उन्हें राजनीति भी करने दीजिए. राजनीति करेंगे तो देशकी नीति और नियति दोनों बदलेगी. अगर यह शिक्षाके संस्थानों में नहीं होगा. अगर यह विश्वविद्यालयों मेंनही होगा तो फिर कहां होगा. 
बहस, विचार और विमर्श अगर विश्वविद्यालयों में नहीं पैदा होंगे तो फिर कहां होंगे. उन्हें स्क्रू और नटबोल्टमत बनाइए. कमोबेस जेएनयू में यह बचाहुआ है. अलग-अलग विचारों का होना और पर्चे, पोस्टरों का कोनाअभी बचा हुआ है. कमोबेस जेएनयू में जनेऊ का धागाभी कमजोर है. थोड़ा ही सहीबहस विमर्श भी अभी वहां बचा हुआ है. जो सत्ताओंको चुनौती देता है. 
जो उनताकतों को चुनौती देता है जो मानवीय अधिकारों को ताक पर रख रही हैं. वह सरकारोंको चुनौती देता है जो लोगों के अधिकारों को खा रही हैं. मुझे यकीन है आपऔर आपके पक्षकार किसी के अधिकार को खाए जाने के पक्ष में नहीं खड़े होंगे. वे इसकेख़िलाफ खड़े होंगे. इसलिए जेएनयू के साथखड़े होंगे. उस जगहके साथ खड़े होंगे जहां शंख और डफली एक साथ बजते हैं और लोग अपनी समझ बनाकर किसी एक को चुनते हैं. बेशक राष्ट्रवाद को कमजोर मत होने दीजिए. पर अंग्रेजोंके जमाने के राष्ट्रवाद को मत ढोइए. वंदेमातरम और झंडेके राष्ट्रवाद से राष्ट्र को ऊपर उठाइए. मुल्क के लोगकिसी भी झंडे और गीत से बड़े हैं. उन्हीं की बाजूओंपर सारे झंडे खड़े हैं. उनके बाजुओं को ताकतदीजिए. राष्ट्रवाद और राष्ट्रवादियों को नई आदत दीजिए. लोकतंत्र की नईतस्वीर खीचिए पुरानी को सहेज कर रख दीजिए. कल कीकिताबों के लिए, कल केबच्चों के लिए. ताकि जब वेआएं तो समझ पाएं अपने पुराने देश को, बदले हुए परिवेश को. जेएनयू ने जितनी पढ़ाई की है. जेएनयू ने उतनीलड़ाई की है. एक शिक्षाका संस्थान अगर शोध और विमर्श करता है. समाज के किसानों, मजदूरों और आदिवासियों को जाकर पढ़ता है. उसे समझता है और डिग्रियां लेता है. उसका फर्ज बनता है किवह उन स्थितियों को बदले. वह उसेबदले जिसे बदले जाने की जरूरत है. 
जो उसनेपढ़ा और समझा है उसके सहारे उनके अधिकारों के लिए सवाल करे. इन्हीं सवालों और समझदारियोंने हमे वहां से निकाला है जहां एक राजा हुआ करता था. जहां राजा ईश्वर का दूतहुआ करता था. सवाल करके और वहांसे निकल करके ही हम लोकतंत्र में आए हैं. सबकी बराबरी का वहदस्तावेज बनाए हैं. उसे और बेहतरकरना और पुराना जो बचा हुआ अवशेष है उससे बाहर करना हम ही करेंगे. हमने ही औरतोंके साथ उनके घरों से बाहर आने की लड़ाई लड़ी है. बाहर आने पर हमही उनके साथ उनकी सुरक्षा के लिए भी लड़ेंगे. ताकि रात का चांदवे भी चौराहों से देखें. ताकि वे भीकिसी गुमटी से चाय पिएं उधार लेके. 
अभी उन्हें अपने लिए यह जगहबनानी है. क्योंकि किताब, औरकम्प्यूटरों से मिला ज्ञान बहुत कम होता है. अगर ज्ञान यहीं से मिलतातो पढ़ाई के सारे संस्थान बंद हो जाते. जेएनयू भी बंदहो जाता. बीएचयू भी बंदहो जाता. ज्ञान किताबों के अक्षरोंसे नहीं पूरा होता. सौ सालबाद ही सही महामना के महान संस्थान को यह अवसर उन्हें देना चाहिए कि रात को सड़क के अहसास को वे जान सकें. किसी पुलिया पर बैठके कविता लिखने का ठान सकें.  वे असुरक्षित हैं. वे किसबात से असुरक्षित हैं. वे असुरक्षितहैं कि उन्हें छेड़ा जा रहा है. उनका उत्पीड़न किया जा रहाहै. समाज और संस्थान दोनों जगह यही स्थिति है. इन स्थितियोंको बदलने के लिए इस संस्कृति को बदलने के लिए बहुत बदलाव की जरूरत है. वह धीरे-धीरे आएगा. जैसे धीरे-धीरेजनतंत्र आया. जैसे धीरे-धीरेउनकी आबादी आई स्कूलों तक. स्कूलों से विश्वविद्यालयों तक. 
जब वे एक साथ पढ़ेंगे एक साथ रहेंगे. एक दूसरेको तभी समझ पाएंगे. एक दूसरेको तभी समझा पाएंगे. बीएचयू ने इसेरोक रखा है. उनकी पढ़ाई, उनकीकक्षाएं तक अलग कर रखी हैं. उन्हें एक क्लासमें बैठकर पढ़ने के साथ-साथ अवसर मिलने देना. इसअसुरक्षा को कम करेगा. वे विचारऔर कमजोर होंगे जो यह कह रहे हैं कि 6 बजे बाहर जाने की क्याजरूरत थी. लड़कियों के बाहरजाने की जरूरतों पर सवाल कम हो जाएंगे. सच केलोकतंत्र के लिए लड़कियों को लड़ने दीजिए. राष्ट्रवाद और राष्ट्रहितके लिए उन्हें लड़ने दीजिए. जो आज़ादीऔर हक़ के लिए उकसा रहे हैं उन्हें बधाई दीजिए. बदनाम होने की जड़ोंको कमजोर करिए. लड़कियां जहां कमजोर पड़ें राष्ट्रहित के लिएआप खुद लड़िए.

प्रधानमंत्री जी तब गंगा मां ने बुलाया था, अब बेटियां बुला रही हैं

Sat, 23/09/2017 - 14:56
चन्द्रिका
(मूलरूप से द वायरहिंदी में प्रकाशित)

तब वे प्रधानमंत्री नहीं थे. तबहर-हरमोदी थे. घर-घर मोदी बन रहे थे. जबउन्हें गंगा मां ने बुलाया था. वैसेनदी किसी को नहीं बुलाती. कभी-कभी बाढ़ को बुलाती है नदी. ऐसाकहते हैं कवि.
बाढ़ अपने आसपास को उपजाऊ करती है. परवह बहुत कुछ तबाही भी भरती है. जहांतक पहुंच होती है बाढ़ की तबाही वहां तक पहुंचती है.जैसा उन्हें नदी ने बुलाया, गंगाने बुलाया, वेदेश में बाढ़ की तरह आए. पूरेदेश में तबाही की तरह छाए. अब जब फिर से पहुंचे हैं उसी शहर. प्रधानमंत्रीबनकर. उन्हेंकिस बात का है डर. मांनहीं इस बार बेटियां बुला रही हैं. गुजरनाथा उन्हें उसी रास्ते से. जहांसे उन्हें गुजरना था. जहांहजारों उन्ही बेटियों का प्रदर्शन और धरना था. जिन्हें पढ़ाने और बचाने के नारे उन्होंने गढ़े हैं. वेनारे जिससे उनके विज्ञापन भरे हैं. उन्हींबेटियों के रास्ते से गुजरना था. यूंरास्ता तो नहीं बदलना था. परउनका रास्ता बदल दिया गया. ताकि यह कायम रहे कि सब कुछ ठीक चल रहा है और देश बदल रहा है. यहबात उन तक पहुंचे. रास्ताबदल रहा है यह बात उन तक न पहुंचे. क्यों बदल रहा है रास्ता इसकी वजह भी न पहुंचे. बनारस हिंदू युनिवर्सिटी में वर्षों से चले आ रहेलड़कियों के उत्पीड़न पर यह छात्राओं द्वारा शायद पहला इतना बड़ा प्रतिरोध है. जबवे इतनी भारी तादात में बाहर निकल कर आई हैं. जहांउन्हें हर रोज 7 बजेहॉस्टल के भीतर बंद कर दिया जाता था. वे हास्टल और हास्टल के बाहर की चहरदीवारी को लांघ कर सड़क पर आ गईहैं. वेकुलपति को हटाने के नारे लगा रही हैं. वेअपने विश्वविद्यालय में अपनी असुरक्षा को जता रही हैं. एक छात्रा के साथ हुई छेड़खानी से उठा यह मामला सरकार के जुमले पर एक बैनर लगा रहा है. बेटीबचाओ, बेटीपढ़ाओ के आदेश को उन्होंने सवाल में बदल दिया है. बचेगीबेटी, तभीतो पढ़ेगी बेटी. उसकेआगे बैनर में जगह नहीं है नहीं तो वे यह भी लिख देती. बचेगीतो पढ़ेगी बेटी, नहींतो लड़ेगी बेटी! महानता और महामना दोनों को वर्षों से ढोने वाले विश्वविद्यालय पर ये लड़कियां थोड़ा स्याही लगा रही हैं. उसबड़े से बुर्ज नुमा गेट पर उन्होंने जो बैनर टांग दिया है, उसनेउसकी महानता और भव्यता को ढंक दिया है. आंड़े-तिरछे अक्षरों से लिखा हुआ यह पहला बैनर होगा जिसने उस सिंहद्वार पर लटक कर पूरे द्वार को ही लटका दिया है. ऐसा नहीं कि इस विश्वविद्यालय के इतिहास में विद्यार्थियों के आंदोलन नहीं रहे. बिद्यार्थियोंके आंदोलन रहे, छात्रोंके आंदोलन रहे. छात्राओंके आंदोलन नही रहे शायद. मैं वहां का छात्र रहा. जबतक रहा यह सुनता रहा कि पूरे कैम्पस में धारा 144 लागूहै. एकपढ़ाई की जगह जैसे एक दंगा और लड़ाई की जगह हो. जहां 144 लगा दिया गया हो हर वक्त के लिए. जहां अपने हॉस्टल के कमरे में कविताओं के पोस्टर पर प्रतिबंध हो. जहांकिसी भी तरह की विचार गोष्ठी करने पर आप डरते हों. वहींप्रशासन की मदद से कुछ लोग आर.एस.एस. कीशाखा करते हों. ऐसे विश्वविद्यालय में आवाज़ उठाना उनका निशाना बनना है. उनकानिशाना बनना जो इस विश्वविद्यालय को हिन्दुओं का विश्वविद्यालय मानते हैं. उनकीसंख्या यहां बहुतायत है. वे परंपरा की दुहाई देते हैं और सामंती घरों की तरह लड़कियों को शाम 7 बजेतक हॉस्टल की छतों के नीचे ढंक देते हैं. वेहास्टल से बाहर नहीं जा सकती. सिर्फदिन में उन्हें पढ़ने जाने की छूट है. दिन में भी उनके चलने के रास्ते तय हैं. वेउधर से नहीं जाती जिधर से छात्रों के हास्टल हैं. उनपर तंज कसे जाते रहे हैं. उनकेसाथ बदसुलूकी होती रही है. इसलिएउन्होंने रास्ते बदल लिए हैं. उन्होंने अपने रास्ते बना लिए हैं. चुपहोकर चलने के रास्ते. येब्वायज हास्टलों के किनारे से होकर नहीं गुजरते. यहहिन्दू विश्वविद्यालय होने की पहचान है. यहइसकी नीव है जिसने इस परंपरा को विकसित किया है. शिक्षा में यह एक अछूत बर्ताव है जो हिन्दू विश्वविद्यालय में इस तरह था. जहांग्रेजुएट स्तर पर भी लड़कों और लड़कियों की अलग-अलगकक्षाएं बनाई गई हैं. लड़कियोंके लिए अलग हास्टल हैं पर लड़कियों के कालेज भी अलग हैं. उनके बीच कोई इंट्रैक्शन नहीं है. नही उनके बीच कोई संवाद है. इसीबीच की खाली जगह ने वह संस्कृति पैदा की है जो अश्लील व छेड़खानीके संवाद से भरती है. विश्वविद्यालय के लिए ये दोनों अलग-अलगजीव हैं जिन्हें अलग-अलगरखना है. सीखऔर समझ की उम्र में जब किसी को एक पूरी आबादी के सारे अनुभवों से दूर कर दिया जाता है तो पुरुष वर्चस्व अपने तरह से काम करता है. वह एक महिला के डर, उसकेपढ़ने के हक़ के बजाए उस वस्तु के रूप में ही देखता है जो वह देर रात देखी जाने वाली फिल्म से अनुभव करता है. वहउसके लिए एक साथी नही बन पाती. प्रशासनउसे उसका साथी नहीं बनने देता. इसपूरे स्वरूप को समझने की जरूरत है.       जो लड़कियां आंदोलन कर रही हैं. उनकीजो मांगे हैं वे बहुत कच्ची हैं. परउनके सड़क पर आने का इरादा जरूर पक्का है. वेसीसीटीवी कैमरे मांग रही हैं. वेएक तकनीकी देखरेख की मांग कर रही हैं. वे और ज्यादा सुरक्षा गार्ड बढ़ाए जाने की मांग कर रही हैं. जबकिकोई कैमरा कोई गार्ड महिलाओं के उत्पीड़न को नहीं रोक सकता. उन्हेंहर वक्त घूरे जाने वाली आंखें, उन्हेंहर वक्त बोले जाने वाले शब्द जिसे कोई कैमरा नहीं कैद कर सकता. जिसे कोई गार्ड नहीं सुन सकता. वहीसुन सकती हैं. वेसुनती भी हैं. यहउस संस्कृति की आवाज है जो उन्हें देवी बताता है. जोबेटी बचाता है. जोबेटी पढ़ाता है. जोभेद को बरकरार रखता है. महिला होने और पुरुष होने के हक़ को अलग-अलगतरह से देखता है. उन्हेंएक-दूसरेसे दूर रखता है. एकदूसरे से अनभिज्ञ बनाता है. सवालउठाने पर वह लांछन लगाता है. सवालउठाने पर वह उनके साथ खड़ा हो जाता है जिनके वर्चस्व बने हुए हैं.
इसलिए जो लड़कियां आज निकल आई हैं. जोआज रात सड़क पर सोई हैं. जिनमेंसड़क पर सोने और हांथ में मुट्ठी होने का पहला एहसास आया है. वेबहुत कुछ भले न करदें पर कुछ न कुछतो कर ही गुजरेंगी. अपनेवक्त को ऐसे नहीं गुजर जाने देंगी. 

अगर अपशब्दों के स्कूल में वे पास हो जाएंगे तो हमारा समाज फेल हो जाएगा

Fri, 22/09/2017 - 11:43
चन्द्रिकामूलरूप से द वायर में प्रकाशितसोसल मीडिया: आपराध को बढ़ावा देने वाले भी अपराधी हैं प्रधानमंत्री को अपशब्द कहना बुरा है. किसीको भी अपशब्द कहना बुरा है. तुलनाएंवैसे भी उतनी सटीक नहीं होती. चाहेगधे की इंसान से की जाए या इंसान की गधे से. गांलियांतो और भी ठीक नहीं होती. चाहेछोटी हों या बड़ी. समाजकी बुरी चीजें इनसे ठीक नहीं होती. बुराइंसान भी इससे ठीक नहीं होता. कोईमंत्री और प्रधान भी इससे ठीक नहीं होता. ऐसाकरने से उसकी विचारधाराएं भी ठीक नहीं होती. उन्हेंठीक करने की उलझन में हम ही बेठीक होने लगते हैं. वहीरास्ता अपना लेते हैं जिससे हमारा कोई वास्ता नहीं होना चाहिए था. ये प्रवृत्तियां लगातार बढ़ रही हैं और बढ़ाई जा रही हैं. क्योंकिशासन में आने से पहले जिस समझ को बीजेपी ने बनाया था. जिससमझ को बीजेपी ने बढ़ाया. समाजबहुत कम लौटा रहा है अभी उन्हें और बाकियों को भी. अभी बहुत कुछ बकाया है. अभीकितना कम तो लोगों ने चुकाया है. उन्मादजो भरा जा रहा है. हत्याओंतक के बाद जैसा-जैसाकहा जा रहा है. वहहमारी संवेदना और नैतिकता दोनों को कमजोर कर रहा है. वहहमारे समाज को आदमख़ोर कर रहा है.   भाजपा ने शासन में आने से पहले जो शुरू किया था कांग्रेस उसे अब आगे बढ़ा रही है. जैसेशासन में आने का रास्ता बना रही है. अबउनकी नकल कर रही है कांग्रेस. अकलकम लगा रही है. किधीरे-धीरेबीजेपी होने जा रही है, कांग्रेस. जब बीजेपी हो जाएगी कांग्रेस. बीजेपीकुछ और हो जाएगी. थोड़ा उससे बढ़कर जो वह थी अब तक. फिरलोगों को दो बीजेपी में से किसी एक को चुनना पड़ेगा. यहीविकल्प बचेगा. दोबुराईयों में से किसी एक को चुनना होगा. ज़्यादा नफ़रत और बड़ी गाली नहीं सुन सकते तो छोटी सुनना होगा. यहसब हमे अभ्यस्त बना देगा. हमइसके आदी हो जाएंगे. कुछभी सुनकर चौंकने की आदत आधी हो जाएगी. उन्माद की राजनीति समाज की आदत बदल देगी. हमेपता भी न चलेगाकि हम बदल गए. हमविकास कर गए या फिसल गए. बुलेटट्रेन से पहले बुलेट थ्योरी वे ला चुके हैं. बगैरकिसी घोषणा के वे दुष्प्रचार को प्रचार में बदल दे रहे हैं. बेबातको समाचार में बदल दे रहे हैं. इसबहाने वे अपने वादों से कहीं और निकल ले रहे हैं. सवाअरब से अधिक की आबादी वाला जो मुल्क है हमारा. जिसकासमाज एक बरस में दो-दोबार हप्ते भर गधे पर बहस कर रहा है. उसकाकितना कुछ तो मर रहा है. महंगाईसे वह खुद भी मर रहा है. परवह गधे पर बहस कर रहा है. उसनेगाय पर बहस की. उसनेमुर्गों पर बहस की. उसनेट्रोल और गुर्गों पर बहस की. उसकीबहस में वह गायब है जिन कारणों से वह खुद गायब हो रहा है. येबहसें कहां से आ रहीहैं? क्योंआ रहीहैं? कौनइन्हें बना रहा है? कौनकिसे सुना रहा है. इसेसमझने की जरूरत है.   सत्ता में आने से पहले यह बीजेपी का सफल आयोजन था. दुस्प्रचारका प्रचार करना. मनमोहनसिंह और सोनिया गांधी की तरह-तरहकी तस्वीरें बनाना. नैतिकताकी किसी भी लकीर को मिटाना. कांग्रेसीनेताओं को किसी और फ्रेम में लगाना. लोगोंका इन तस्वीरों पर हंसना-हंसाना. लोगों का इन तस्वीरों पर चिढ़ना-चिढ़ाना. जैसे को तैसा करना. ऐसेको वैसा करना. वेसफल हुए थे. दूसरेहार गए थे. जोसफल हुए हार वे भी गए हैं. किदुस्प्रचारों और अनैतिकताओं की जो गंदगी उन्होंने फैलाई है. वहउन्हीं की ज़िंदगी के आसपास बिखरी पड़ी है. उसकीठोकरें उन्हें भी लगनी हैं और लग रही हैं. जबकिउनकी सफलता के कारण सिर्फ दुष्प्रचार नहीं थे. पुरानीसरकार के अपने किए धरे भी थे. परदुष्प्रचार के प्रचार में वे सफल माने गए. सफल हो जाने के इस फार्मूले का कांग्रेस अब नकल कर रही है. इसनकल में और बेहतर प्रदर्शन के लिए और ज़्यादा गिरना होगा उसे. नैतिकतामें गिरने के लिए अगर बीजेपी ने थोड़ी भी जमीन नहीं छोड़ी है तो कांग्रेस को गड्ढे बनाकर गिरना होगा. ख़ामियोंको ठीक ढंग से न लापाने की नाकामी में चीजों को और विद्रूप करके दिखाना होगा. परेशानियोंऔर बदहालियों को किसी नफ़रत से ढंक देना होगा. बीजेपीकी नकल में बीजेपी हो जाना होगा या बीजेपी से कुछ और ज़्यादा. ऐसेमें अगर वे हार भी गए तो भी वे सफल होंगे जो नफरत के लिए मेहनत कर रहे थे. जोअभी भी नफरत के लिए मेहनत कर रहे हैं. जोविद्रूप ढंग से सारी नैतिकताओं को ताख़ पर धर रहे हैं.  नफ़रत का जो रजिस्टर है. वहांबहुत कम जगह बची है. उन्होंनेबहुत कम जगह बचने दी है. वहीउनके आंकड़ों का स्रोत है. वहीउनका वोट है. इसीमें वे लगातार आंकड़े भर रहे हैं. लोगगाय के नाम पर मर रहे हैं. लोगतेल के दाम पर चूं भी नहीं कर रहे हैं. एकअच्छे समाज के लिए जिस रजिस्टर को खाली होना चाहिए था. वहांमुसलमानों का ख़ून बिखरा पड़ा है. वहांउन सबका ख़ून बिखरा पड़ा है जो नफ़रत नहीं चाहते. जोअसहमति जताने का हक़ चाहते हैं. जोबोलने की आज़ादी चाहते हैं. जोसबके लिए मुल्क को उतना ही मानते हैं. जितनासरकारें जुल्म को मानती हैं.सबकी गरिमा मिट रही है. कुछ चिंतित हैं, कुछ मिटाने की चिंता में हैं. प्रधानमंत्री की गरिमा, मंत्रीकी गरिमा और संत्री की गरिमा के ख़याल उसी समाज से आएंगे. जिसे आप बनाएंगे. आने वाले प्रधानमंत्री की भी गरिमा बचेगी जब पुराने प्रधानमंत्री की गरिमा बचाएंगे. पदों की गरिमा चुनिंदा नहीं हो सकती. भक्ति चुनिंदा हो सकती है. सरकारें बदलने के साथ भक्त बदल जाएंगे और अपने-अपने प्रधानमंत्री की गरिमा बचाने के लिए चिल्लाएंगे. अपने नेताओं की गरिमा बचाने के लिए वे और नीचे गिर जाएंगे.   समाज की नैतिकताएं कमजोर हुई हैं. उन्हेंकमजोर किया गया है. क्योंकिइन्हीं कमजोरियों ने जाने कितनों को मजबूत किया हुआ है. वेमजबूत होने के लिए इन्हीं कमजोरियों को अपना रहे हैं. जबहम इसे और कमजोर करेंगे वे और गिरेंगे. वहींसमाज भी गिरेगा अपनी आदतों और समझदारियों के साथ. समाजके गिरने की जमीन को हमे बचाना चाहिए. अंधेरेमें घेरे जाने की मुहिम से हमे बचना चाहिए. बचनाउन्हें भी चाहिए जो फिलवक्त इसे बेंचने में लगे हैं.संघ के स्कूलों में एक नैतिक शिक्षा की किताब होती थी. शायदअब भी होती है. बीजेपीको उसे और छपवानी चाहिए और अपने भक्तों के बीच बंटवानी चाहिए. कांग्रेसको भी अपनी एक नैतिक शिक्षा की किताब बनानी चाहिए. अगरअपशब्दों और विद्रूपताओं और अनैतिकता के स्कूल में ये पास हो गए तो हमारा समाज फेल हो जाएगा. जय-हिन्द जो बोलते हैं उनके लिए भी यह मुल्क जेल हो जाएगा. 

ये जो भक्त हैं ये उनका ही वक्त है

Fri, 08/09/2017 - 19:19
चन्द्रिका
(द वायर हिंदी में प्रकाशित)
गौरी लंकेश की हत्या को वे जायज ठहरा रहे हैं. वे उनकी हत्या का जश्न मना रहे हैं. हत्यारों को बधाई तक दे रहे हैं. उन्हें यह ठीक लग रहा है कि उनसे असहमत एक आवाज़ को किसी ने चुप करा दिया. उन्हें यह जायज लग रहा कि किसी ने उस आवाज़ की हत्या कर दी जो उनकी जुबान नहीं बोल रही थी. उनकी बातों में हत्या करने वालों को हौसला देना शामिल है. हत्या और नफरत को उकसाना शामिल है. यह सब देखकर ऐसा लगता है कि वे बहुतायत में हैं जो ऐसी हत्या किए जाने की मंशा रखते हैं. पिछले कुछ बरसों में जैसे बहुत से हत्यारे तैयार हुए हैं. सब अपनी-अपनी भूमिका निभा रहे हैं. ऊपर बैठकर चुप रहकर वह अपनी भूमिका निभा रहा है. कुछ हत्या को जायज ठहराने की भूमिका में हैं. कुछ हत्या कर रहे हैं और कुछ हत्यारों को बधाईयां दे रहे हैं. उन्होंने एक पूरी संरचना बना ली है. अलग-अलग तरह की भक्ति और उन्माद ने अब उन्हें यहां ला खड़ा किया है कि वे अपराधी से बन गए हैं. ऐसे अपराधी जिनके हाथों में हथियार भले ही न हो. उनके ज़ेहन अपराध से भरे हुए हैं. यहां किसी भी तरह की नैतिकता भुरभुरी सी हो गई है. यह ख़तरनाक है और दुख़द भी. यह उनकी राजनीति के लिए भी ख़तरनाक है जिन्होंने उन्हें उभारा है और जो लगातार उन्हें उभार रहे हैं. वे जो समाज बना रहे हैं उसके भीतर से वह चीज ख़त्म की जा रही है जो इंसान के भीतर बची रहनी चाहिए थी. इंसान और इंसानियत के बाद ही हम किसी भी राजनीति की कल्पना कर सकते हैं. 
जिनके विचार अपराध से भर गए हैं उन्हें भी हत्या के बाद चुप हो जाना चाहिए था. उन्हें कुछ नही बोलना चाहिए था. किसी की हत्या पर उन्हें दुख न भी हो तो भी. शायद उन्हें उस चीज को बचा लेना चाहिए था जिसकी जरूरत हमे और उन्हें भी है. और वह जरूरत हमेशा बनी रहेगी. वे उस इंसानियत को बचा लेते. उस मानवता को बचा लेते जो किसी भी पार्टी से पुरानी है. जो किसी भी संगठन की भक्ति से पुरानी है. जो किसी राजनीति से भी पुरानी है. जो उनकी देशभक्ति से बहुत ही पुरानी है. उन्हें उसे बचाने के लिए चुप होना चाहिए था. पर वे चुप नहीं हुए. वे हत्या के पक्ष में दलीलें देने लगे. वे हत्यारों को बधाईयां देने लगे. उन्होंने गौरी लंकेश की हत्या को सिर्फ जायज नहीं ठहराया. वे हत्या के बाद ठंडी पड़ चुकी उस लाश को गालियां देने लगे. जैसे वे उस पर और गोलियां चलाना चाहते हों. वे कितनी हद तक नफरत करने वाले लोग हैं. यह हत्या के बाद फैलाई जा रही उनकी बातों में देखा जा सकता है. जैसे वे एक हत्या के बाद और हत्याओं के लिए खुद को तैयार कर रहे हों. अपने भीतर और उन्माद भर रहे हों. और असहमति की सारी हत्याओं को जायज ठहराने का रास्ता बना रहे हों. जैसे उनकी गोलियां और चलना चाहती हों. वे और बींधना चाहते हों उस लाश को और उस लाश के आसपास को. वे उन सबको ख़त्म करना चाहते हों जो इस तरह की हत्याओं के खिलाफ हैं. जो उनसे असहमत हैं. उनके भीतर की नफरत उन तीन गोलियों से ख़त्म नहीं हुई हो जैसे. उनके हाथ और भी आतुर से लग रहे. ऐसा उनकी जुबान कह रही है. जो हत्या के पक्ष में अलग-अलग तरह से लिख रहे हैं. वे गौरी लंकेश को इसाई बता रहे हैं. उन्हें दफनाए जाने को लेकर तरह-तरह का झूठ फैला रहे हैं. वे दशहरे के पहले लंकेश की हत्या बता कर इसका जश्न मना रहे हैं. वे और भी बहुत कुछ कह रहे हैं. वे सब इस हत्या के साझीदार से बनने को तैयार हैं. उसे जायज ठहराने की बिनाह पर. वे उस विचार की पैरोकारी निबाह रहे हैं. जहां उनसे कोई असहमत न हो.  उन्हें यह साहस कहां से मिल रहा है. वह कौन सी राजनैतिक भक्ति है जो उन्हें यह ताकत दे रही है. शायद पुरानी हत्याओं पर न होने वाले इंसाफ उन्हें उत्साह दे रहे हैं. कलबुर्गी, दाभोलकर और पंसारे का हत्यारा अभी तक कोई नही है. क्योंकि किसी को अभी तक कोई सज़ा नहीं मिली है. किसी को पकड़ा नहीं गया है. उन्हें अभी तक खोजा भी नहीं गया है. वर्तमान सत्ता की नाकामी या नाचाही ने ही उन्हें यह साहस दिया हुआ है. सत्ता के संस्थानों ने हत्यारों को न खोज पाने की नाकामी से उन्हें मोहलत दी हुई है. यह मोहलत ही उन्हें और हत्याओं का साहस दे रही है.जरूरी नहीं कि वह कोई एक इंसान हो जिसने इन सारी हत्याओं को अंज़ाम दिया. यह भी जरूरी नहीं कि ये सारे लोग किसी एक संगठन के हों. पर ये ऐसे सभी विचारों के हत्यारे हैं जो उनके विचारों से मेल नहीं खाते. इस लिहाज से ये एक विचार के लोग हैं. सब के सब हत्याएं नहीं कर सकते. हत्या का जश्न मना सकते हैं. ये हत्यारों के लिए ताकत की तरह हैं. उन्हें हत्या करने के विचार यहीं से मिल रहे हैं. जहां एक देश में एक विचार ही सर्वश्रेष्ठ विचार बनाया जा रहा. यह लोकतंत्र का विचार नहीं है. लोकतंत्र का विचार और ज़्यादा विचारों को जगह देने और फलने-फूलने का विचार है. उन्हें सुन लेने का विचार है जो आपसे असहमत हैं. वह कहने का विचार है जिसे आप मानते हैं. इसलिए इन हत्याओं को शह देने वाले लोकतंत्र के खिलाफ के लोग हैं. वे यह सबकुछ कहते हुए, इतने सारे झूठ को फैलाते हुए सिर्फ हत्या को सही बताना चाहते हैं.वह एक अलग विचार है जो इन सारी हत्याओं से दुखी है. वह ऐसी हर हत्या के फिलाफ आवाज़ उठा रहा है. जबकि हत्यारा पकड़ा जाए इससे पहले एक और हत्या कर दी जा रही है. किसी की गिरफ्तारी संभव नहीं हो पा रही. क्योंकि इसे पकड़ने और सज़ा देने वाले संस्थानों को इसी विचार के मुखियाओं ने जकड़ रखा है. इसलिए हत्या पर जश्न मनाने वाले ही नहीं बल्कि हमारी सत्ता इन हत्याओं को उकसा रही है. वह हर रोज नए तरह की हत्याएं करवा रही है.    गौरी लंकेश पर गोलियां किसी एक ने चलाई होंगी. गालियां देने वालों की पूरी फौज सी आ गई है. यह वंदेमातरम और तिरंगे की फौज़ है. यह उन भक्तों की फौज है. जो असहमति की एक आवाज़ के चुप करने का जश्न मना रही है. वह देश और लोकतंत्र दोनों को एक संकरी गली में ले जा रही है. वह इससे पहले गौरी लंकेश को नही जानती थी. वे जो गालियां दे रहे हैं, जो हत्या को जायज ठहरा रहे हैं उनके कोई व्यक्तिगत मतभेद नहीं हैं. मतभेद विचारों का ही था कि गौरी भक्त पत्रकार नहीं थी. गौरी किसी और विचार को मानती थी. यह वक्त ऐसा बना दिया गया है. जहां गैर विचार रखना ही अपराध बनता जा रहा है. यही वह ख़तरा है जो लोकतंत्र को कमजोर कर रहा है. यही वह चीज है जो उससे भी हमारा भरोसा उठा रहा है जो लोकतंत्र और किसी भी तंत्र के पहले की चीज है. इंसानियत के बाद कोई भी तंत्र पैदा हुआ है. फिलवक्त वे सारी चीजें मिटाई जा रही हैं. जिसे हमे बचाना था, जिसे हमे समाज में और बढ़ाना था. उनकी राजनैतिक भक्ति इंसानियत तक पर भारी पड़ रही है. ये जो भक्त हैं ये उनका ही वक्त है. हमारा वक्त हमे लाना है. हमे उसे बचाना है जो इस भक्ति के पहले की चीज है. जो किसी भी राजनैतिक शक्ति के पहले की चीज है.

आज़ादी, अगस्त में पैदा हुई थी इसलिए मर गई

Mon, 14/08/2017 - 15:06
चन्द्रिका(मूलरूप से द वायर हिंदी में प्रकाशित)
वे छात्र हैं. वे जब आज़ादी के नारे लगाते हैं तो उन्हें जेल होती है. वे देशद्रोही कह दिए जाते हैं. वे आतंकी बता दिए जाते हैं. आज़ादी मांगती महिलाओं पर डंडे बरसते हैं. कश्मीर के लिए आज़ादी और आतंकवादी शब्द ही एक सा हो गया है. सत्तर सालों में आज़ादी जैसे कोई बुरी चीज बन गई है. शायद आज़ादी जो अगस्त महीने के बीचोबीच पैदा हुई थी, मर गई. जो बचा रह गया वह रस्म है, रिवाज है. सरकारें उसे मनाती हैं. सरकारों के संस्थान उसे मनाते हैं. वह एक राष्ट्र का पर्व है. अब सरकारें उसे एक समुदाय को मनाने के आदेश दे रही हैं. उनसे मनाने के सुबूत भी मांग रही हैं. आज़ादी के एक राष्ट्रीय पर्व पर मुस्लिम उन्हें सुबूत दें. राष्ट्रगान गाने का सुबूत. तिरंगा फहराने का सुबूत. आज़ादी तीन रंग के इसी झंडे में समेट दी गई है.राष्ट्र के पास एक झंडा है, एक गान है, एक गीत है. सत्ता हस्तांतरण की एक तारीख़ है. 15 अगस्त की तारीख़. यही आज़ादी की तारीख़ है. हमने आज़ादी को ऐसे ही देखा है. बचपन से शिक्षा संस्थानों ने हमें यही आज़ादी सिखाई. टीवी में लाल किले पर प्रधानमंत्री का बोलना और स्कूल में मिठाई का डब्बा खोलना. याद किए हुए कुछ रटे-रटाए भाषण और देश के लिए कुछ कर गुजरने के आश्वासन. हर बार अंग्रेजों से लड़ाई के किस्से. उन्हें यहां से जाने को मजबूर करने के किस्से. क्या आज़ादी वही थी जो आज के दिन 1947 के इतिहास में गुजर गई. जिसे हम हर साल मनाते हैं. गुजरी हुई आज़ादी ही हमारी आज़ादी बना दी गयी. जिसे सरकारें और सरकारों के संस्थान हमसे मनवाते हैं. अंग्रेजों के जाने का जश्न जरूर रहा होगा. आज़ादी पाने का उत्सव भी रहा होगा. लोग उसे मानते रहे, मनाते रहे. पर अब तक आज़ादी दिवस मनाने के ऐसे आदेश नहीं रहे. अब उनके आदेश हैं कि आज़ादी का दिन मनाओ और मनाने का सुबूत उन तक पहुंचाओ. उत्तर-प्रदेश और मध्य-प्रदेश की सरकारों ने मदरसों को ये आदेश दिए हैं. मदरसों में मुसलमान पढ़ते हैं. मुसलमानों से उन्हें सुबूत चाहिए. राष्ट्रगान गाने का सुबूत. आज़ादी दिवस मनाने का सुबूत. पूरा का पूरा देशभक्त होने के सुबूत. इस सरकार को मुसलमानों से सुबूत क्यों चाहिए? वे जो आज़ादी के आंदोलन में साथ-साथ लड़े. वे जिन्होंने इस्लामिक राष्ट्र पाकिस्तान जाने के बजाय हिन्दुस्तान को चुना. वे चुन सकते थे पाकिस्तान जाना. वे नहीं गए पाकिस्तान. उनका चुनाव था हिन्दुस्तान. इस्लाम और धर्मनिर्पेक्षता के विकल्प के इस चुनाव में उन्होंने धर्मनिरपेक्षता को चुना. शायद उन्होंने बेहतरी की उम्मीद को चुना. उनका उनसे ज़्यादा हक़ है. जो धर्मनिरपेक्षता के ख़िलाफ थे. जो इस्लामिक पाकिस्तान की तरह हिन्दुस्तान को हिन्दू राष्ट्र बनाना चाहते थे. ये उन्हीं की आवाज़ें हैं. वही इस देश के मुसलमान से देशभक्ति का सुबूत मांगते रहे हैं. वे आज भी मांग रहे हैं. वही आज़ादी दिवस मनाने के आदेश दे रहे हैं. राजशाहियों के आदेश की तरह. शक़ के बिनाह पर जैसे वे ग़ुलामों को आदेश दे रहे हैं. उस आबादी की आज़ादी थोड़ा कम हुई है. वैसे हम सबकी आज़ादी थोड़ा कम हुई है. पुरानी आज़ादी की तारीख़ो के जश्न मनाने के मायने पुराने ही रह गए. हर बरस आज़ादी के जश्न मनाने के साथ आज़ादी बढ़नी थी. पर आज़ादी दिवस की संख्या बढ़ी. प्रधानमंत्रियों के भाषण बढ़े. आज़ादी पाने के मूल्य नहीं बढ़े. दिल्ली के उस पुराने किले से हर बार उनके दावे बढ़े, उनके वादे बढ़े.किला और किलेबंदी डर का वह प्रतीक है जहां से वे हर बरस आज़ादी का भाषण देते हैं. नए डर को पुरानी किलेबंदी ही अभी तक महफूज कर रही है. किला, झंडा, वह तारीख और उनका हर बरस बोलना सबकुछ प्रतीकात्मक है. यह एक रस्म अदायगी है. प्रतीक सच नहीं होते न ही स्थाई. वे अभिव्यक्त करने और अपनी अभिव्यक्ति में लोगों को शामिल कर लेने का एक तरीका भर हैं. इसलिए इन तारीख़ी प्रतीकों के जरिए प्रगति और विकास के गुणगान करना वर्तमान चलन बन गया है. इस रस्म अदायगी को उन्हें पूरा करना होता है. सभी देशों के सभी राष्ट्राध्यक्ष ऐसा ही करते आए हैं. वे हर बार देश की प्रगति को गिनाते हैं. इससे पहले और उससे भी पहले के प्रधानमंत्रियों को इसके लिए सुना जा सकता है, विकास और प्रगति के बारे में बताते हुए वे सब एक जैसे हैं. लगता है वह एक ही प्रधानमंत्री है जो अपने चोले और शक्ल बदल कर हर बरस घंटे भर कुछ बोलता है. उसे इस बार भी बोलना है. जब मैं यह लिख रहा हूं उसके बोले जाने वाले शब्द लिखे जा चुके होंगे. उनके बोलने में लोकतंत्र हर बार मजबूत होता है. उन्हें सुनकर इंसान हर बार मजबूर होता है. तकरीबन सत्तर बरस के बोले जाने में हर बार उनके बोलने से राष्ट्र प्रगति के रास्ते पर और बढ़ा हुआ होता है. प्रगति का यह रास्ता शायद बहुत लम्बा है, शायद कभी न खत्म होने वाला, शायद एक गहरी लंबी खांई जैसा. दुनिया के सारे राष्ट्राध्यक्षों के पास ऐसी ही तारीखें हैं. उस दिन के लिए उनके पास ऐसे ही वाक्य हैं जो उनके राष्ट्र को प्रगति के रास्ते पर आगे बढ़ा रहे हैं. उनकी बातें हमे इशारा करती हैं कि शायद वे सब एक ही रास्ते पर हैं.हम सब इसमे शिरकत करते हैं. क्योंकि इतिहास हमारी आदतों में शामिल होता जाता है और हम ताकत की गुलामी से उबर नहीं पाते. आज़ादी के दिवस मनाते हुए भी हम उसके साथ खड़े होते हैं जो ताकतवर है. जो हर रोज हमारे हक़-हुकूक छीन रहा है. जो हमारी पहचान को एक संख्या में बदलने पर आमादा है. जो हम पर शक़ करता है और हमे कैमरे की निगरानी में ग़ुलाम बनाए रखना चाहता है. जो हमे हर रोज गुलाम बना रहा है. शासकों के आदेश पर हम उन उत्सवों में शामिल हो जाते हैं. जब राजशाहियां थी तो राजशाहियों के उत्सव भी हमारे उत्सव हो जाया करते थे. हम अपनी पुरानी पीढ़ियों से उस उत्सव में शामिल होने के आदी हो चुके हैं जो हम पर शासन करने वालों के द्वारा मनाया जाता है.सत्ता के संस्थान बदल गए और हम राष्ट्र के बनने के साथ राष्ट्रीय पर्व में शामिल हो गए. एक व्यक्ति के तौर पर, एक समुदाय के तौर पर किसी भी राष्ट्रीय झंडे का हमारे लिए क्या मायने है. किसी राष्ट्रीय गीत का या किसी राष्ट्रीय गान के क्या मायने हैं. चाहे यह कोई भी दिन हो या कोई भी बरस. क्या ये प्रतीक राष्ट्र से प्रेम का इज़हार करा सकते हैं. क्या प्रेम पैदा करने के लिए आप किसी को डरा सकते हैं. डर से कोई प्रेम नहीं पैदा किया जा सकता है. कोई भी राष्ट्रीय उत्सव मनाते हुए हम ‘अपने राष्ट्र’ जो एक बड़ी ताकत होता है उसका हिस्सा बनने की कोशिश करते हैं. उसकी ताकत के प्रदर्शनों में खुद को खुश रखते हुए. उस ताकत के साथ अपने जुड़ाव को जाहिर करने की कोशिश करते हुए. वह हमको किसी बड़ी ताकत के साथ जुड़ने का बोध देता है. जबकि लोकतंत्र इसी बोध के खिलाफ खड़ा एक मूल्य है. अपनी मान्यताओं को मानने का मूल्य देता है. समता और समानता के बोध को विकसित करने का मूल्य देता है. राष्ट्रीय उत्सवों में शामिल होने की हमारी मनसिकता और इन मूल्यों के बीच एक टकराव है. कई असमानताओं से भरे हुए एक समाज में ताकतवर के साथ खड़े होने का एहसास ताकतहीनों के खिलाफ चले जाने जैसा होता है. हमारी आदतें हैं कि सत्ताएं हमे लुभाती हैं. जो दलितों और दमितों (जिसमें आदिवासी और अल्पसंख्यक भी शामिल हैं) के साथ खड़े होंगे वे किसी भी ताकत के खिलाफ खड़े रखने की मानसिकता के लोग ही होंगे. वे किसी भी शासन के खिलाफ होंगे. वे शोषितों के साथ होंगे. सबकी आज़ादी ही हर रोज की आज़ादी होगी.  इतिहास का कलेंडर पलटते हुए किसी दिन पर उंगली रख कर यह कहना मुश्किल है कि यह दिन आज़ादी का है. क्योंकि आज़ादी के मायने तारीखों में नहीं बंधे होते. यह एक ऐसी महसूसियत है जिसकी जरूरत समाज में हर वक्त बढ़ती रही है और इसी जरूरत ने पुरानी सभ्यताओं को जीवाश्म के रूप में बदल दिया और उस पर नयी व्यवस्थाएं खड़ी हुई. इस एहसास को पाने की तलब ने कई बार आज़ादी के दायरे को बढ़ाया और समेटा है. इसे पाने और व्यापक बनाने की इच्छा की निरंतरता को ही किसी समाज के विकासशील होने के प्रमाण के रूप में देखा जा सकता है. यकीनन अगस्त 1947 की कोई तारीख आज़ादी के उस एहसास को नहीं भर सकती. वह जो मूल्यों और विचारों में है. बहते पानी और हवा जैसी आज़ादी जहां तिनके की रुकावट तक न हो. इसे जीवन जीने के सर्वोत्तम मूल्य के तौर पर बचाना और हासिल करना होता है और मांगने से ज्यादा इसे छीनना पड़ता है. शायद यह एक आदर्श देश की संकल्पना होती. जब संविधान में निहित आज़ादी वहां के लोगों की जिंदगियों में उतर जाए, जब संविधान में लिखे हुए शब्द किसी देश की नशों में पिधल कर बहने लगें, जब देश का प्रथम नागरिक और अंतिम नागरिक आज़ादी को वैसे महसूस करे जैसे एक फल की मिठास को दोनों की जीभ. अलबत्ता 14 अगस्त 1947 की सुबह और 16 अगस्त की सुबह में एक फर्क जरूर रहा होगा. उनके लिए भी जो देश की तत्कालीन राजनीति व संघर्ष में भागीदारी निभा रहे थे और उनके लिए भी जो देश में जीवन जीने के भागीदार बने हुए थे. एक मुल्क के बंटवारे की त्रासदी और एक उपनिवेश से मुक्ति का मिला जुला एहसास. जब कोई देश किसी दूसरे देश की गुलामी से मुक्त हो जाए और पड़ोसियों, रिश्तेदारों का देश निकाला सा हो जाए यह कुछ वैसा ही रहा होगा. यह गुलामी को साथ-साथ और आज़ादी को बिछुड़कर जीने का अनुभव रहा होगा.

जो विशाल है वही विकास है

Sat, 12/08/2017 - 02:40
(मूलरूप से दैनिक जागरण में प्रकाशित)चन्द्रिकावहां दुनियाका दूसरा सबसेऊंचा बांध बनायाजा रहा है. दुनिया के सबसेऊंचे पहाड़ केबीच. नेपालऔर भारत कीअंतर्राष्ट्रीय सीमा परबनने वाला यहपहला बांध है. इसे पंचेश्वर बांध के नाम से जाना जाएगा. इसे एशिया कासबसे बड़ा बांधबताया जा रहाहै. पश्चिमी नेपालऔर उत्तराखंड केपिथौरागढ़ जिले मेंइसके जल भरावका विस्तार होगा. नेपाल और भारतकी सीमा कोविभाजित करती महाकाली नदीको जल स्रोतके तौर परलिया जाएगा. इसकेजल संग्रहण कीक्षमता टिहरी बांधसे भी तीनगुना ज़्यादा होगी. 315 मीटर ऊंचाई वालेइस बांध मेंतकरीबन 122 गांव डूब क्षेत्र सेप्रभावित होंगे. जिसमेतकरीबन 30 हजारपरिवार बसे हुएहैं. यहनेपाल और भारतका एक संयुक्त कार्यक्रम है. तकरीबन 50 हजारकरोड़ रूपए कीलागत से बननेवाले इस बांधसे 5000 मेगावॉट बिजलीके उत्पादन कीउम्मीद की जारही है. यह सबकुछ विशालहै. प्रचलनमें यही विकासहै. सबसेबड़े और सबसेपहले का तमगागौरवान्वित सा करताहै. हमारीमानसिकता बना दीगई है किविशाल ही विकासहै. इसगौरवान्वित होने मेंहम बड़े खतरेकी आशंकाओं कोभुला देते हैं. फिलहाल इस विशालयोजना को मंजूरीमिल गई है. इस महीने मेंडूबने वाले गांवोंके जन सुनवाईकी प्रक्रिया शुरूहोनी है. ऐसे बड़े विकासके लिए बड़ेविस्थापन और बड़ेबलिदान की जरूरतें होतीहैं. 

इन बड़ीपरियोजनाओं के खतरेभी बड़े हैं. हिमालय के बीचबसा यह इलाकाजहां परियोजना प्रस्तावित है. चौथे जोन वालेभूकम्प का क्षेत्र है. जबकि उत्तराखंड काअधिकांश इलाका संभावित आपदाओंसे ग्रसित है. यहां के लगभगपहाड़ अलग-अलगभूकंप जोन मेंबटें हैं. ऐसेमें इतनी ऊंचाईपर इतने बड़ेबांध को बनानाऔर भी ख़तरनाकहै. हिमालयअभी अपने बननेकी प्रक्रिया सेगुजर रहा हैऔर जब भीइसका लैंड सेटलमेंट होगाएक बड़ा भूकम्पआना तय है. लिहाजा हमे ऐसेकिसी भी तरहका इतना बड़ानिर्माण नहीं करनाचाहिए जो न सिर्फ आसपास कोप्रभावित करे बल्किअन्य राज्यों मेंभी तबाही काकारण बने. पिछलेदिनों उत्तराखंड मेंहुई केदारनाथ आपदासे भी यहसीख लेनी चाहिए. जिसमे कई हजारलोगों की जानेगई. भलेही इसे एकप्राकृतिक आपदा कहदिया गया. भले ही प्राकृतिक आपदा कह के लोगों को गुमराह किया गया. परन्तु ये मानव जनित आपदाएं ही रही हैं. उत्तराखंड कीगहरी नदियों मेंजलभराव की स्थितिकभी न बनतीअगर कम्पनियों केद्वारा जगह-जगहनदियों को रोकान जाता. इसरुकावट से पेड़और पत्थर केमलबे जलभराव काकारण बनते हैं और भारी बारिश से नदियां उफान पर आ जाती हैं. निश्चय ही जबपंचेश्वर झील जोकि सैकड़ों किमीमें पानी काभराव करेगी उसकाअसर आसपास केपहाड़ों पर पड़ेगा. जिसका आंकलन पहलेसे लगाया जानामुश्किल है. इसलिए बड़ी परियोजना केसाथ इसे एकबड़ी आपदा कीपूर्व पीठिका केरूप में भीदेखा जाना चाहिए. साथ ही यहपश्चिमी नेपाल औरपिथौरागढ़ की साझासंस्कृति का इलाकाहै. जहांलोग आपस मेंरिश्ते-नातेरखते हैं. इतनीबड़ी झील दोदेशों के बीचके इस रिश्तेको भी खत्मकर देगी. लोगोंको इस झीलके लिए अपनेगांव छोड़ने होंगेऔर विस्थापित होकरदूर बसना होगा. जब भी विस्थापन सेप्रभावित लोगों औरगांवों का आंकलनकिया जाता हैउसे बहुत हीसीमित दायरे मेंदेखा जाता है. जो विस्थापित किएजाते हैं उन्हेंही प्रभावित भीमाना जाता है. जबकि आसपास केजो लोग विस्थापित नहींहोते प्रभावित वेभी होते हैं. उनके रिश्ते प्रभावित होतेहैं. उनकीसदियों से चलीआ रही रोजमर्रा कीज़िंदगी से वेलोग और उनकेपड़ोसी गांव अचानकग़ायब हो जातेहैं. इसतरह के सांस्कृतिक, आर्थिक और सामाजिक प्रभावका कोई भीआंकड़ा किसी दस्तावेज मेंशामिल नहीं कियाजाता. 
दैनिक जागरण 
इसबांध का प्रस्ताव 1981 में ही होगया था. बाद में इससेडूबने वाले गांवोंको चिन्हित करलिया गया औरअब उनके विस्थापन कीप्रक्रिया शुरू होनेवाली है. 11 अगस्त को गांवों कीपहली जन सुनवाईहोनी है. जन सुनवाई कोजिला मुख्यालय परआयोजित किया गयाहै. डूबवाले गांवों सेजिला मुख्यालय पचाससे सौ किमीकी दूरी परहैं और मौसमबारिश का है. पहाड़ के इनदूर गांवों मेंआवागमन की सुविधाएं बहुतकम हैं. साथही गांव केलोगों को ठीक-ठीक इसके बारेमें कुछ भीपता भी नहींहै. सरकारें अपनीमंसा से अपनेअनुसार काम करतीहैं. सबकुछतय हो जानेके बाद वेलोगों की रायलेना चाहती हैं. ऐसे में लोगोंको पता हीनहीं चल पाताकि उन्हें करनाक्या है औरजन सुनवाईयां पूरीकर दी जातीहैं. अबउनके पास सिर्फआदेश होते हैंकि उन्हें अपनेगांव कब तकछोड़ देने हैं औरउन्हें कहां बसनाहै. इसकाज़िक्र नहीं होताकि उन्हें किनसेबिछड़ना है औरउनका क्या-क्याउजड़ना है.
पिथौरागढ़ एक पिछड़ाइलाका है. जहां लोगों कोविस्थापन के नियमकानून नहीं पता. पिछड़े इलाके होनेके फायदे सरकारों कोइसी आधार परमिलते हैं किये इलाके प्राकृतिक संपदाओं सेभरपूर होते हैं. पिछड़े इलाकों कापिछड़ापन सरकारी होताहै. वर्षोंसे लोगों कोराज्य मूलभूत सुविधाओं सेइतना वंचित करदेता है किवे पीड़ित महसूसकरने लगते हैं. उनके पास अपारसंपदाएं होती हैंपर वे सबसेगरीब होते हैं. ऐसे में वेकुछ भी करनेको तैयार होतेहैं. विकासके नाम परबांध का आनाकई बार उनकेलिए खुशी कीख़बर जैसा होताहै. उन्हेंविस्थापन के दंसका आंकलन नहींहोता. वेसरकारी वंचना सेइतने पीड़ित होतेहैं कि कहींभी चले जानाचाहते हैं. ऐसीस्थिति में सरकारों केलिए जन सुनवाईऔर विस्थापन एकआसान प्रक्रिया बनजाती है. सरकारें उन्हें नौकरीका लालच देतीहैं और जोजमीनों के स्वामीहोते हैं उनकेपूरे परिवार में सेकोई एक परियोजना मेंनौकर बन जाताहै. जाहिरहै कि उनपिछड़े इलाकों मेंशिक्षा का वहस्तर नहीं होताकि उन्हें कोईबेहतर ओहदा मिलसके. वेफोर्थ ग्रेड केकर्मचारी बन जातेहैं. जहांभी इस तरहकी परियोजनाएं बनीहैं विस्थापितों कायही हश्र रहाहै. यदिपंचेश्वर बांध बनायाजाएगा तो वहां के लोगोंका भी यहीहोना है. जबकि जो उन्हेंखोना है उसगणित का जोड़-घटाव किसी किताबमें कभी नहींहोना है.

विकास यही है, कुछ को उजाड़ देना और कुछ को उजाला देना

Fri, 11/08/2017 - 01:30
(महाकाली नदी पर बनने वाले एशिया के सबसे बड़े पंचेश्वर बांध पर एक रिपोर्ट)
(द वायर हिन्दी में प्रकाशित
)चन्द्रिका
नदियों के बहनेके किस्से कईसदियों के हैं. जब से नदियांहैं तब से. जब नदी नहींहोगी तब भीनदी को बहनेसे ही नदी को यादकिया जाएगा. उनकाबहना ही उनकानदी होना है. उन्हें बांध देनेके किस्से बसकुछ ही बरसपुराने हैं. नेहरूने इसी बंधीहुई नदी कोआधुनिक मंदिर कहाथा. क्योंकि प्रधानमंत्री नेकहा था इसलिएअब बांध हमारेमंदिर हैं. अबजबकि प्रधानमंत्री के कहेहुए को न मानना देशद्रोह होनेलगा है. पहले प्रधानमंत्री के कहेहुए को न मानना और भीपुराना देशद्रोह होनाचाहिए. हमजो आधुनिक सुविधाओं केसाथ जीते हैंउनके उजाले यहीं, इन्हीं आधुनिक मंदिरों सेआते हैं. हमारेसुख सुविधाओं केसाथ जीने केलिए कई गांवोंको जाना पड़ताहै. अपनीवर्षों की जमीनको छोड़कर उन्हेंकहीं और बसनापड़ता है. अपने घरों सेउन्हें उजड़ना पड़ताहै. फिलवक्त हमजिस बल्ब कीरोशनी में पढ़रहे होते हैं. किसी रास्ते परआगे बढ़ रहेहोते हैं. एकनदी वहीं रुकरही होती है. कई गांव उसमेडूब रहे होतेहैं. यहीं, कई लोग अपनेगांव और घरडूबने की फिक्रमें डूब रहेहोते हैं. उन्हेंविस्थापित कर दियाजाता है. उन्हें कहीं औरस्थापित कर दियाजाता है. उन्हें नई स्मृतियां बनानीहोती हैं. विस्थापित हुएघर के नएपते के साथउन्हें पता चलताहै कि घरऔर जमीन केसाथ उनका औरभी बहुत कुछडूब गया. कोईसरकार उसका कोईमुआवजा नहीं देती. पड़ोसी गांव जोनहीं डूबे उनकेसाथ रोजमर्रा केरिश्ते डूब गए. सरकार के पासरिश्ते डूबने काकोई मुआवजा नहींहोता. सरकारके पास बहुतकुछ डूबने काकोई मुआवजा नहींहोता. सरकारें किन्हीं औरचीजों में डूबीहोती हैं. जबसरकारें बदलती हैंतो पिछली सरकारकिन-किनचीजों में डूबीथी उसका कुछ-कुछ पता चलपाता है यानहीं भी पताचल पता.  बांध आधुनिकमंदिर हैं. विशालबांध और बड़ेमंदिर हैं. उत्तराखंड देवोंकी भूमि है. आधुनिक मंदिरों कीभूमि भी वहीबन रही है. प्राचीनता से आधुनिकता काऔर आधुनिकता सेआपदा का यहफैलाव है. अब तक कासबसे बड़ा आधुनिकमंदिर टिहरी बांधथा. अबउससे भी बड़ापंचेश्वर बनाया जानेवाला है. यह एशिया कासबसे बड़ा औरदुनिया का दूसरासबसे ऊचाई वालाबांध होगा. यहसच में विशालहै. आधुनिकता मेंयही विकास है. कुछ को उजाड़देना और कुछको उजाला देना. यह बांध दोमुल्क की सरहदोंपर बनेगा. भारतनेपाल के बीचजो महाकाली नदीसरहद बनाती है. वहां बांध बनेगा. वहीं झील बनेगी. वहां से बिजलीपैदा होगी. इसकीक्षमता तकरीबन 5 हजारमेगावाट की होगी. परियोजना से जोबिजली पैदा होगीवह दोनों मुल्कों मेंबंटेगी. तकरीबनपचास हजार करोड़की लागत सेबनने वाले इसपंचेश्वर बांध कीऊंचाई 315 मीटरहोगी. इतनीमीटर की ऊचाईमें जल भरावसे 122 गांवडूब जाएंगे. 30 हजारसे ज़्यादा लोगसरकारी आदेशों कापालन करते हुएकहीं और चलेजाएंगे. जहांसरकार उन्हें बसानाचाहेगी. उन्हेंसरकारों की चाहतसे ही उजड़ना है औरसरकारों के कहेपर ही बस जाना है. बांधोंके बनने औरलोगों के उजड़नेमें महाकाली कायह एक औरइलाका शामिल होजाएगा. जबभी बांध बनताहै. लोगोंके गांव डूबतेहैं और उन्हेंउनके गांवों सेहटाया जाता हैतो लोग ख़िलाफतकरते हैं. परउन्हें हटा दियाजाता है. कई बार उन्हेंकहीं और बसादिया जाता है. कई बार उनमेसे कुछ कोनौकरियां भी देदी जाती हैं. विस्थापन के बादउन्हें पता चलताहै कि जिसेवे अपनी जमीनसमझते थे. जो उनका अपनागांव था. जो उनके अपनेनदी नौले थे. वे सब उनकेनहीं थे. दुनिया की समूचीआबादी के पासजो उनका हैवह उनका नहींहोता. सरकारें सबसेज़्यादा ताकतवर हैं. सरकारें जिनके लिएकाम करती हैंवे और भीज़्यादा ताकतवर हैं. वे बहुत कमहैं पर बहुतअमीर हैं. उन्हेंहर रोज बहुतसारी बिजली चाहिए. वे सरकार सेबिजली मांगते हैं. सरकार नदियों कोरोकती है. गांवों को उजाड़तीहै और बांधबना कर उन्हें बिजलीदेती है. वे बिजली सेकम्पनियां चलाते हैं. कम्पनियों में सामानबनाते हैं. सामानों सेमुनाफा कमाते हैंऔर एक औरकम्पनी लगाते हैं. फिर उन्हें औरबिजली चाहिए होतीहै. उनकीचाहते अभी बहुतबची हुई हैं. अभी बहुत बांधबनने बचे हुएहैं. अभीबहुत गांव उजड़नेभी बचे हुएहैं. जबकिछः करोड़ सेज़्यादा आबादी अभीतक बांधों केबनने से विस्थापित होचुकी है. बिजली जरूरी है. बिजली की जरूरतबहुत कम है. जितनी बिजली देशमें बनती हैघरों में उसका 25% से भी कमप्रयोग होता है. बहुत बड़ा हिस्सादेश की कम्पनियों कोजाता है. ऐसे में महाकाली परबनने वाला पंचेश्वर बांधविस्थापितों की संख्यामें कुछ औरसंख्या जोड़ देगा. पश्चिमी नेपाल औरभारत के पिथौरागढ़ इलाकेसे 30 हजारसे ज़्यादा परिवारों कोअपने गांवों सेजाना पड़ेगा.    महाकालीके दोनों किनारों परबसे लोगों कोये सब आंकड़ेनहीं पता. उन्हेंनही पता किबिजली किसके लिएबनाई जा रहीहै. उन्हेंनहीं पता किउन्हें कहां बसायाजाएगा. यहबात उन तकपहुंच गई हैकि यहां गांवमें झील बननाहै और उन्हेंहटाया जाएगा. इसीमहीने 9 अगस्त से जनसुनवाई शुरू होनीहै. जनसुनवाई के बारेमें भी उन्हेंख़बर नहीं हैजिनके घर डूबनेहैं. अपनीबात कहने केलिए गांव केलोगों को जिला/ब्लाक मुख्यालय तकआना होगा. तकरीबन50-100 किमी. की पहाड़ी रास्तेकी दूरी औरबारिश के मौसममें उन्हें आनाहै. गांवके लोग अपनीबात कह सकतेहैं पर सरकारअपनी बात कहचुकी है. विस्थापित होने वालोंके लिए मुआवजाही एक मात्रसहारा है. पिथौरागढ़ उत्तराखण्ड काएक पिछड़ा इलाकाहै. कहायह भी जासकता है किसरकार ने बीतेकई सालों मेंसुविधाएं न देकरइसे पिछाड़ दियाहै. वेसभी इलाके पिछड़ेहुए होते हैंजो दूर जंगलोंमें होते हैं, जो दूर पहाड़ोंपर होते हैं. उनके पास अकूतप्राकृतिक संपदाएं होतीहैं. उनकेजंगल फलों औरखेतों से हरे-भरे होते हैं. अक्सर प्राकृतिक संपदाओं सेअगड़े हुए इलाकेही पिछड़े हुएइलाके कहे जातेहैं. हमारीसरकारों के पासविविधता भरे देशके लिए विविधता भरामॉडल नहीं है. उसके पास एकही मॉडल हैकि चौड़ी सड़कऔर विशाल घरोंसे शहर खड़ाकर देना. गांवोंको शहर कीतरफ ढकेल देना. बीते सत्तर वर्षोंमें सभी सरकारों कीउपलब्धि यही रहीहै कि वेलोगों से गांवोंको खाली करवारही हैं. लोगोंको भगा रहीहैं. लोगभाग रहे हैंऔर किसी शहरमें रुक जारहे हैं याकहीं नहीं रुकरहे हैं. खननकम्पनियों, बांधों, कोल माइंस केजरिए लोगों काअलग से विस्थापन होरहा है. सत्तर सालों कायह देश एकभगदढ़ भरा देशहै. लोगोंकी ज़िंदगी, जमीनऔर ज़ेहन सेस्थिरता को मिटायाजा रहा है. उत्तराखंड में टिहरीका विस्थापन एकनमूना है. पंचेश्वर एक नमूनाबनेगा. कमआबादी वाले पहाड़ोंमें बहुत कमआबादी वाले दलितोंकी यहां बहुतज़्यादा आबादी है. उनके पास जमीनेकम होती हैं. विस्थापन इन्हीं जमीनोंके आधार परकिया जाना है. मुआवजे इन्हीं जमीनोंके आधार परमिलने हैं. जिसकेपास जितनी जमीनेहोंगी उसे उतनाज़्यादा मुआवजा मिलेगा. इन दलित समुदायके लोगों कोमुआवजे के नामपर बहुत कममिलेगा. जोभूमिहीन हैं उनकेलिए परियोजना मेंकोई मुआवजा नहींहै. जिनकेपास घर हैउन्हें घर बनानेके लिए बसढेड़ लाख कामुआवजा तय हुआहै. ढेड़लाख में कोईघर कैस बनसकता है. जिनके पास कुछभी नहीं हैवे भी महाकाली केसहारे अपना जीवनजी लेते थे. नदी से हररोज मछली पकड़के बेंचने केबदले का कोईमुआवजा नहीं होता. जंगल से पत्तलबनाने. लकड़ीसे बर्तन बनानेके हक छीनलिए जाएंगे. उसकाकोई मुआवजा नहींमिलना है. अल्बत्ता उनके परिवारमें से किसीएक को नौकरीमिलेगी. कमपढ़े लिखे कोकम पढ़ी-लिखीवाली नौकरी.
नीले पानी वाली महाकाली नदीउनके लिए रोजगारगारंटी से पहलेवाली रोजगार गारंटीहै. बहुतवर्षों से औरकई पीढ़ियों सेवह उनका रोजगारहै. महाकाली केकिनारे बसने वालेवनराजियों के लिएभी नदी औरजंगल ही रोजगारहै. वेइसी के पत्थरसे कुछ बनालेते थे. वे इसी कीपानी से मछलियां निकाललेते थे. यहीं जंगलों सेलकड़ी निकाल वेबर्तन बनाते हैं. वे रह लेतेहैं बगैर नौकरीके. उन्हेंरहना पड़ेगा नौकरीकरते हुए. वहांके लोगों कोकिसी को भीपूरे परिवार कोनौकरी नहीं मिलनीहै. कोईएक नौकरी करेगा, पूरे परिवार कोउस पर आश्रितरहना पड़ेगा. यहांके लोग भारतसे ज़्यादा नेपालके साथ पुस्तैनी संबंधों सेजुड़े हैं. पश्चिमी नेपालके साथ उनकेरिश्ते इस तरहके हैं किबाकी का पूराभारत उन्हें नेपालीही समझता है. वे नेपाल कोनेपाल नहीं कहते. नेपाल उनके लिएकभी दूसरा मुल्कनहीं रहा. वहकाली पार काइलाका है बस. उनके त्योहार भीसाथ-साथहोते. उनकेदेवता भी आसपासहोते. अपनेदेवताओं को पूजनेवे कालीपार चलेजाते. यहकिसी गैर मुल्कजाने की तरहनही होता. महाकाली उनकेगीतों में है. महाकाली नेपाली गीतोंमें है. वे कहते हैंकि नेपाली हीउनके अपने हैं. राष्ट्र से ज़्यादामजबूत रोजमर्रा कीवह ज़िंदगी होतीहै जिनके साझासहारे से कोईसमाज जीता है. नेपाल के लोगजब मजदूर बनकरकालीपार से आतेहैं तो वेअपने पैसे उनकेघरों में सहेजदेते. लौटतेवक्त वे पैसेवापस ले जाते. उनके बीच कायह भरोसा है. बांध से बनीसौकड़ों किलोमीटर चौड़ीझील उनके इसरिश्ते में दूरीपैदा करेगी. गांवके लोगों नेजनसुनवाइ के बहिस्कार कीबात की है. वे अपना गांवनहीं छोड़ना चाहते. उनका कहना हैकि महाकाली नदीनहीं उनकी मांहै. जबकिसरकार ने एकही नदी औरएक ही जानवरको मां कीमान्यता दी है. मनुष्य का दर्जादिया है. शायद गाय औरगंगा के अलावाकिसी और नदीको मां कहनाउनका देशद्रोह न हो जाए.  

लेखक विषय संवाद साभार अनुवादक

पहले वो आए साम्यवादियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं साम्यवादी नहीं था

 

फिर वो आए मजदूर संघियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं मजदूर संघी नहीं था

 

फिर वो यहूदियों के लिए आए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं यहूदी नहीं था

 

फिर वो आए मेरे लिए

और तब तक बोलने के लिए कोई बचा ही नहीं था

 

मार्टिन नीमोलर (1892-1984)