Increase |  Decrease |  Normal

Current Size: 100%

Share this
Syndicate content

दखल की दुनिया

Syndicate content
Updated: 5 hours 36 min ago

आज़ादी, अगस्त में पैदा हुई थी इसलिए मर गई

Mon, 14/08/2017 - 15:06
चन्द्रिका(मूलरूप से द वायर हिंदी में प्रकाशित)
वे छात्र हैं. वे जब आज़ादी के नारे लगाते हैं तो उन्हें जेल होती है. वे देशद्रोही कह दिए जाते हैं. वे आतंकी बता दिए जाते हैं. आज़ादी मांगती महिलाओं पर डंडे बरसते हैं. कश्मीर के लिए आज़ादी और आतंकवादी शब्द ही एक सा हो गया है. सत्तर सालों में आज़ादी जैसे कोई बुरी चीज बन गई है. शायद आज़ादी जो अगस्त महीने के बीचोबीच पैदा हुई थी, मर गई. जो बचा रह गया वह रस्म है, रिवाज है. सरकारें उसे मनाती हैं. सरकारों के संस्थान उसे मनाते हैं. वह एक राष्ट्र का पर्व है. अब सरकारें उसे एक समुदाय को मनाने के आदेश दे रही हैं. उनसे मनाने के सुबूत भी मांग रही हैं. आज़ादी के एक राष्ट्रीय पर्व पर मुस्लिम उन्हें सुबूत दें. राष्ट्रगान गाने का सुबूत. तिरंगा फहराने का सुबूत. आज़ादी तीन रंग के इसी झंडे में समेट दी गई है.राष्ट्र के पास एक झंडा है, एक गान है, एक गीत है. सत्ता हस्तांतरण की एक तारीख़ है. 15 अगस्त की तारीख़. यही आज़ादी की तारीख़ है. हमने आज़ादी को ऐसे ही देखा है. बचपन से शिक्षा संस्थानों ने हमें यही आज़ादी सिखाई. टीवी में लाल किले पर प्रधानमंत्री का बोलना और स्कूल में मिठाई का डब्बा खोलना. याद किए हुए कुछ रटे-रटाए भाषण और देश के लिए कुछ कर गुजरने के आश्वासन. हर बार अंग्रेजों से लड़ाई के किस्से. उन्हें यहां से जाने को मजबूर करने के किस्से. क्या आज़ादी वही थी जो आज के दिन 1947 के इतिहास में गुजर गई. जिसे हम हर साल मनाते हैं. गुजरी हुई आज़ादी ही हमारी आज़ादी बना दी गयी. जिसे सरकारें और सरकारों के संस्थान हमसे मनवाते हैं. अंग्रेजों के जाने का जश्न जरूर रहा होगा. आज़ादी पाने का उत्सव भी रहा होगा. लोग उसे मानते रहे, मनाते रहे. पर अब तक आज़ादी दिवस मनाने के ऐसे आदेश नहीं रहे. अब उनके आदेश हैं कि आज़ादी का दिन मनाओ और मनाने का सुबूत उन तक पहुंचाओ. उत्तर-प्रदेश और मध्य-प्रदेश की सरकारों ने मदरसों को ये आदेश दिए हैं. मदरसों में मुसलमान पढ़ते हैं. मुसलमानों से उन्हें सुबूत चाहिए. राष्ट्रगान गाने का सुबूत. आज़ादी दिवस मनाने का सुबूत. पूरा का पूरा देशभक्त होने के सुबूत. इस सरकार को मुसलमानों से सुबूत क्यों चाहिए? वे जो आज़ादी के आंदोलन में साथ-साथ लड़े. वे जिन्होंने इस्लामिक राष्ट्र पाकिस्तान जाने के बजाय हिन्दुस्तान को चुना. वे चुन सकते थे पाकिस्तान जाना. वे नहीं गए पाकिस्तान. उनका चुनाव था हिन्दुस्तान. इस्लाम और धर्मनिर्पेक्षता के विकल्प के इस चुनाव में उन्होंने धर्मनिरपेक्षता को चुना. शायद उन्होंने बेहतरी की उम्मीद को चुना. उनका उनसे ज़्यादा हक़ है. जो धर्मनिरपेक्षता के ख़िलाफ थे. जो इस्लामिक पाकिस्तान की तरह हिन्दुस्तान को हिन्दू राष्ट्र बनाना चाहते थे. ये उन्हीं की आवाज़ें हैं. वही इस देश के मुसलमान से देशभक्ति का सुबूत मांगते रहे हैं. वे आज भी मांग रहे हैं. वही आज़ादी दिवस मनाने के आदेश दे रहे हैं. राजशाहियों के आदेश की तरह. शक़ के बिनाह पर जैसे वे ग़ुलामों को आदेश दे रहे हैं. उस आबादी की आज़ादी थोड़ा कम हुई है. वैसे हम सबकी आज़ादी थोड़ा कम हुई है. पुरानी आज़ादी की तारीख़ो के जश्न मनाने के मायने पुराने ही रह गए. हर बरस आज़ादी के जश्न मनाने के साथ आज़ादी बढ़नी थी. पर आज़ादी दिवस की संख्या बढ़ी. प्रधानमंत्रियों के भाषण बढ़े. आज़ादी पाने के मूल्य नहीं बढ़े. दिल्ली के उस पुराने किले से हर बार उनके दावे बढ़े, उनके वादे बढ़े.किला और किलेबंदी डर का वह प्रतीक है जहां से वे हर बरस आज़ादी का भाषण देते हैं. नए डर को पुरानी किलेबंदी ही अभी तक महफूज कर रही है. किला, झंडा, वह तारीख और उनका हर बरस बोलना सबकुछ प्रतीकात्मक है. यह एक रस्म अदायगी है. प्रतीक सच नहीं होते न ही स्थाई. वे अभिव्यक्त करने और अपनी अभिव्यक्ति में लोगों को शामिल कर लेने का एक तरीका भर हैं. इसलिए इन तारीख़ी प्रतीकों के जरिए प्रगति और विकास के गुणगान करना वर्तमान चलन बन गया है. इस रस्म अदायगी को उन्हें पूरा करना होता है. सभी देशों के सभी राष्ट्राध्यक्ष ऐसा ही करते आए हैं. वे हर बार देश की प्रगति को गिनाते हैं. इससे पहले और उससे भी पहले के प्रधानमंत्रियों को इसके लिए सुना जा सकता है, विकास और प्रगति के बारे में बताते हुए वे सब एक जैसे हैं. लगता है वह एक ही प्रधानमंत्री है जो अपने चोले और शक्ल बदल कर हर बरस घंटे भर कुछ बोलता है. उसे इस बार भी बोलना है. जब मैं यह लिख रहा हूं उसके बोले जाने वाले शब्द लिखे जा चुके होंगे. उनके बोलने में लोकतंत्र हर बार मजबूत होता है. उन्हें सुनकर इंसान हर बार मजबूर होता है. तकरीबन सत्तर बरस के बोले जाने में हर बार उनके बोलने से राष्ट्र प्रगति के रास्ते पर और बढ़ा हुआ होता है. प्रगति का यह रास्ता शायद बहुत लम्बा है, शायद कभी न खत्म होने वाला, शायद एक गहरी लंबी खांई जैसा. दुनिया के सारे राष्ट्राध्यक्षों के पास ऐसी ही तारीखें हैं. उस दिन के लिए उनके पास ऐसे ही वाक्य हैं जो उनके राष्ट्र को प्रगति के रास्ते पर आगे बढ़ा रहे हैं. उनकी बातें हमे इशारा करती हैं कि शायद वे सब एक ही रास्ते पर हैं.हम सब इसमे शिरकत करते हैं. क्योंकि इतिहास हमारी आदतों में शामिल होता जाता है और हम ताकत की गुलामी से उबर नहीं पाते. आज़ादी के दिवस मनाते हुए भी हम उसके साथ खड़े होते हैं जो ताकतवर है. जो हर रोज हमारे हक़-हुकूक छीन रहा है. जो हमारी पहचान को एक संख्या में बदलने पर आमादा है. जो हम पर शक़ करता है और हमे कैमरे की निगरानी में ग़ुलाम बनाए रखना चाहता है. जो हमे हर रोज गुलाम बना रहा है. शासकों के आदेश पर हम उन उत्सवों में शामिल हो जाते हैं. जब राजशाहियां थी तो राजशाहियों के उत्सव भी हमारे उत्सव हो जाया करते थे. हम अपनी पुरानी पीढ़ियों से उस उत्सव में शामिल होने के आदी हो चुके हैं जो हम पर शासन करने वालों के द्वारा मनाया जाता है.सत्ता के संस्थान बदल गए और हम राष्ट्र के बनने के साथ राष्ट्रीय पर्व में शामिल हो गए. एक व्यक्ति के तौर पर, एक समुदाय के तौर पर किसी भी राष्ट्रीय झंडे का हमारे लिए क्या मायने है. किसी राष्ट्रीय गीत का या किसी राष्ट्रीय गान के क्या मायने हैं. चाहे यह कोई भी दिन हो या कोई भी बरस. क्या ये प्रतीक राष्ट्र से प्रेम का इज़हार करा सकते हैं. क्या प्रेम पैदा करने के लिए आप किसी को डरा सकते हैं. डर से कोई प्रेम नहीं पैदा किया जा सकता है. कोई भी राष्ट्रीय उत्सव मनाते हुए हम ‘अपने राष्ट्र’ जो एक बड़ी ताकत होता है उसका हिस्सा बनने की कोशिश करते हैं. उसकी ताकत के प्रदर्शनों में खुद को खुश रखते हुए. उस ताकत के साथ अपने जुड़ाव को जाहिर करने की कोशिश करते हुए. वह हमको किसी बड़ी ताकत के साथ जुड़ने का बोध देता है. जबकि लोकतंत्र इसी बोध के खिलाफ खड़ा एक मूल्य है. अपनी मान्यताओं को मानने का मूल्य देता है. समता और समानता के बोध को विकसित करने का मूल्य देता है. राष्ट्रीय उत्सवों में शामिल होने की हमारी मनसिकता और इन मूल्यों के बीच एक टकराव है. कई असमानताओं से भरे हुए एक समाज में ताकतवर के साथ खड़े होने का एहसास ताकतहीनों के खिलाफ चले जाने जैसा होता है. हमारी आदतें हैं कि सत्ताएं हमे लुभाती हैं. जो दलितों और दमितों (जिसमें आदिवासी और अल्पसंख्यक भी शामिल हैं) के साथ खड़े होंगे वे किसी भी ताकत के खिलाफ खड़े रखने की मानसिकता के लोग ही होंगे. वे किसी भी शासन के खिलाफ होंगे. वे शोषितों के साथ होंगे. सबकी आज़ादी ही हर रोज की आज़ादी होगी.  इतिहास का कलेंडर पलटते हुए किसी दिन पर उंगली रख कर यह कहना मुश्किल है कि यह दिन आज़ादी का है. क्योंकि आज़ादी के मायने तारीखों में नहीं बंधे होते. यह एक ऐसी महसूसियत है जिसकी जरूरत समाज में हर वक्त बढ़ती रही है और इसी जरूरत ने पुरानी सभ्यताओं को जीवाश्म के रूप में बदल दिया और उस पर नयी व्यवस्थाएं खड़ी हुई. इस एहसास को पाने की तलब ने कई बार आज़ादी के दायरे को बढ़ाया और समेटा है. इसे पाने और व्यापक बनाने की इच्छा की निरंतरता को ही किसी समाज के विकासशील होने के प्रमाण के रूप में देखा जा सकता है. यकीनन अगस्त 1947 की कोई तारीख आज़ादी के उस एहसास को नहीं भर सकती. वह जो मूल्यों और विचारों में है. बहते पानी और हवा जैसी आज़ादी जहां तिनके की रुकावट तक न हो. इसे जीवन जीने के सर्वोत्तम मूल्य के तौर पर बचाना और हासिल करना होता है और मांगने से ज्यादा इसे छीनना पड़ता है. शायद यह एक आदर्श देश की संकल्पना होती. जब संविधान में निहित आज़ादी वहां के लोगों की जिंदगियों में उतर जाए, जब संविधान में लिखे हुए शब्द किसी देश की नशों में पिधल कर बहने लगें, जब देश का प्रथम नागरिक और अंतिम नागरिक आज़ादी को वैसे महसूस करे जैसे एक फल की मिठास को दोनों की जीभ. अलबत्ता 14 अगस्त 1947 की सुबह और 16 अगस्त की सुबह में एक फर्क जरूर रहा होगा. उनके लिए भी जो देश की तत्कालीन राजनीति व संघर्ष में भागीदारी निभा रहे थे और उनके लिए भी जो देश में जीवन जीने के भागीदार बने हुए थे. एक मुल्क के बंटवारे की त्रासदी और एक उपनिवेश से मुक्ति का मिला जुला एहसास. जब कोई देश किसी दूसरे देश की गुलामी से मुक्त हो जाए और पड़ोसियों, रिश्तेदारों का देश निकाला सा हो जाए यह कुछ वैसा ही रहा होगा. यह गुलामी को साथ-साथ और आज़ादी को बिछुड़कर जीने का अनुभव रहा होगा.

जो विशाल है वही विकास है

Sat, 12/08/2017 - 02:40
(मूलरूप से दैनिक जागरण में प्रकाशित)चन्द्रिकावहां दुनियाका दूसरा सबसेऊंचा बांध बनायाजा रहा है. दुनिया के सबसेऊंचे पहाड़ केबीच. नेपालऔर भारत कीअंतर्राष्ट्रीय सीमा परबनने वाला यहपहला बांध है. इसे पंचेश्वर बांध के नाम से जाना जाएगा. इसे एशिया कासबसे बड़ा बांधबताया जा रहाहै. पश्चिमी नेपालऔर उत्तराखंड केपिथौरागढ़ जिले मेंइसके जल भरावका विस्तार होगा. नेपाल और भारतकी सीमा कोविभाजित करती महाकाली नदीको जल स्रोतके तौर परलिया जाएगा. इसकेजल संग्रहण कीक्षमता टिहरी बांधसे भी तीनगुना ज़्यादा होगी. 315 मीटर ऊंचाई वालेइस बांध मेंतकरीबन 122 गांव डूब क्षेत्र सेप्रभावित होंगे. जिसमेतकरीबन 30 हजारपरिवार बसे हुएहैं. यहनेपाल और भारतका एक संयुक्त कार्यक्रम है. तकरीबन 50 हजारकरोड़ रूपए कीलागत से बननेवाले इस बांधसे 5000 मेगावॉट बिजलीके उत्पादन कीउम्मीद की जारही है. यह सबकुछ विशालहै. प्रचलनमें यही विकासहै. सबसेबड़े और सबसेपहले का तमगागौरवान्वित सा करताहै. हमारीमानसिकता बना दीगई है किविशाल ही विकासहै. इसगौरवान्वित होने मेंहम बड़े खतरेकी आशंकाओं कोभुला देते हैं. फिलहाल इस विशालयोजना को मंजूरीमिल गई है. इस महीने मेंडूबने वाले गांवोंके जन सुनवाईकी प्रक्रिया शुरूहोनी है. ऐसे बड़े विकासके लिए बड़ेविस्थापन और बड़ेबलिदान की जरूरतें होतीहैं. 

इन बड़ीपरियोजनाओं के खतरेभी बड़े हैं. हिमालय के बीचबसा यह इलाकाजहां परियोजना प्रस्तावित है. चौथे जोन वालेभूकम्प का क्षेत्र है. जबकि उत्तराखंड काअधिकांश इलाका संभावित आपदाओंसे ग्रसित है. यहां के लगभगपहाड़ अलग-अलगभूकंप जोन मेंबटें हैं. ऐसेमें इतनी ऊंचाईपर इतने बड़ेबांध को बनानाऔर भी ख़तरनाकहै. हिमालयअभी अपने बननेकी प्रक्रिया सेगुजर रहा हैऔर जब भीइसका लैंड सेटलमेंट होगाएक बड़ा भूकम्पआना तय है. लिहाजा हमे ऐसेकिसी भी तरहका इतना बड़ानिर्माण नहीं करनाचाहिए जो न सिर्फ आसपास कोप्रभावित करे बल्किअन्य राज्यों मेंभी तबाही काकारण बने. पिछलेदिनों उत्तराखंड मेंहुई केदारनाथ आपदासे भी यहसीख लेनी चाहिए. जिसमे कई हजारलोगों की जानेगई. भलेही इसे एकप्राकृतिक आपदा कहदिया गया. भले ही प्राकृतिक आपदा कह के लोगों को गुमराह किया गया. परन्तु ये मानव जनित आपदाएं ही रही हैं. उत्तराखंड कीगहरी नदियों मेंजलभराव की स्थितिकभी न बनतीअगर कम्पनियों केद्वारा जगह-जगहनदियों को रोकान जाता. इसरुकावट से पेड़और पत्थर केमलबे जलभराव काकारण बनते हैं और भारी बारिश से नदियां उफान पर आ जाती हैं. निश्चय ही जबपंचेश्वर झील जोकि सैकड़ों किमीमें पानी काभराव करेगी उसकाअसर आसपास केपहाड़ों पर पड़ेगा. जिसका आंकलन पहलेसे लगाया जानामुश्किल है. इसलिए बड़ी परियोजना केसाथ इसे एकबड़ी आपदा कीपूर्व पीठिका केरूप में भीदेखा जाना चाहिए. साथ ही यहपश्चिमी नेपाल औरपिथौरागढ़ की साझासंस्कृति का इलाकाहै. जहांलोग आपस मेंरिश्ते-नातेरखते हैं. इतनीबड़ी झील दोदेशों के बीचके इस रिश्तेको भी खत्मकर देगी. लोगोंको इस झीलके लिए अपनेगांव छोड़ने होंगेऔर विस्थापित होकरदूर बसना होगा. जब भी विस्थापन सेप्रभावित लोगों औरगांवों का आंकलनकिया जाता हैउसे बहुत हीसीमित दायरे मेंदेखा जाता है. जो विस्थापित किएजाते हैं उन्हेंही प्रभावित भीमाना जाता है. जबकि आसपास केजो लोग विस्थापित नहींहोते प्रभावित वेभी होते हैं. उनके रिश्ते प्रभावित होतेहैं. उनकीसदियों से चलीआ रही रोजमर्रा कीज़िंदगी से वेलोग और उनकेपड़ोसी गांव अचानकग़ायब हो जातेहैं. इसतरह के सांस्कृतिक, आर्थिक और सामाजिक प्रभावका कोई भीआंकड़ा किसी दस्तावेज मेंशामिल नहीं कियाजाता. 
दैनिक जागरण 
इसबांध का प्रस्ताव 1981 में ही होगया था. बाद में इससेडूबने वाले गांवोंको चिन्हित करलिया गया औरअब उनके विस्थापन कीप्रक्रिया शुरू होनेवाली है. 11 अगस्त को गांवों कीपहली जन सुनवाईहोनी है. जन सुनवाई कोजिला मुख्यालय परआयोजित किया गयाहै. डूबवाले गांवों सेजिला मुख्यालय पचाससे सौ किमीकी दूरी परहैं और मौसमबारिश का है. पहाड़ के इनदूर गांवों मेंआवागमन की सुविधाएं बहुतकम हैं. साथही गांव केलोगों को ठीक-ठीक इसके बारेमें कुछ भीपता भी नहींहै. सरकारें अपनीमंसा से अपनेअनुसार काम करतीहैं. सबकुछतय हो जानेके बाद वेलोगों की रायलेना चाहती हैं. ऐसे में लोगोंको पता हीनहीं चल पाताकि उन्हें करनाक्या है औरजन सुनवाईयां पूरीकर दी जातीहैं. अबउनके पास सिर्फआदेश होते हैंकि उन्हें अपनेगांव कब तकछोड़ देने हैं औरउन्हें कहां बसनाहै. इसकाज़िक्र नहीं होताकि उन्हें किनसेबिछड़ना है औरउनका क्या-क्याउजड़ना है.
पिथौरागढ़ एक पिछड़ाइलाका है. जहां लोगों कोविस्थापन के नियमकानून नहीं पता. पिछड़े इलाके होनेके फायदे सरकारों कोइसी आधार परमिलते हैं किये इलाके प्राकृतिक संपदाओं सेभरपूर होते हैं. पिछड़े इलाकों कापिछड़ापन सरकारी होताहै. वर्षोंसे लोगों कोराज्य मूलभूत सुविधाओं सेइतना वंचित करदेता है किवे पीड़ित महसूसकरने लगते हैं. उनके पास अपारसंपदाएं होती हैंपर वे सबसेगरीब होते हैं. ऐसे में वेकुछ भी करनेको तैयार होतेहैं. विकासके नाम परबांध का आनाकई बार उनकेलिए खुशी कीख़बर जैसा होताहै. उन्हेंविस्थापन के दंसका आंकलन नहींहोता. वेसरकारी वंचना सेइतने पीड़ित होतेहैं कि कहींभी चले जानाचाहते हैं. ऐसीस्थिति में सरकारों केलिए जन सुनवाईऔर विस्थापन एकआसान प्रक्रिया बनजाती है. सरकारें उन्हें नौकरीका लालच देतीहैं और जोजमीनों के स्वामीहोते हैं उनकेपूरे परिवार में सेकोई एक परियोजना मेंनौकर बन जाताहै. जाहिरहै कि उनपिछड़े इलाकों मेंशिक्षा का वहस्तर नहीं होताकि उन्हें कोईबेहतर ओहदा मिलसके. वेफोर्थ ग्रेड केकर्मचारी बन जातेहैं. जहांभी इस तरहकी परियोजनाएं बनीहैं विस्थापितों कायही हश्र रहाहै. यदिपंचेश्वर बांध बनायाजाएगा तो वहां के लोगोंका भी यहीहोना है. जबकि जो उन्हेंखोना है उसगणित का जोड़-घटाव किसी किताबमें कभी नहींहोना है.

विकास यही है, कुछ को उजाड़ देना और कुछ को उजाला देना

Fri, 11/08/2017 - 01:30
(महाकाली नदी पर बनने वाले एशिया के सबसे बड़े पंचेश्वर बांध पर एक रिपोर्ट)
(द वायर हिन्दी में प्रकाशित
)चन्द्रिका
नदियों के बहनेके किस्से कईसदियों के हैं. जब से नदियांहैं तब से. जब नदी नहींहोगी तब भीनदी को बहनेसे ही नदी को यादकिया जाएगा. उनकाबहना ही उनकानदी होना है. उन्हें बांध देनेके किस्से बसकुछ ही बरसपुराने हैं. नेहरूने इसी बंधीहुई नदी कोआधुनिक मंदिर कहाथा. क्योंकि प्रधानमंत्री नेकहा था इसलिएअब बांध हमारेमंदिर हैं. अबजबकि प्रधानमंत्री के कहेहुए को न मानना देशद्रोह होनेलगा है. पहले प्रधानमंत्री के कहेहुए को न मानना और भीपुराना देशद्रोह होनाचाहिए. हमजो आधुनिक सुविधाओं केसाथ जीते हैंउनके उजाले यहीं, इन्हीं आधुनिक मंदिरों सेआते हैं. हमारेसुख सुविधाओं केसाथ जीने केलिए कई गांवोंको जाना पड़ताहै. अपनीवर्षों की जमीनको छोड़कर उन्हेंकहीं और बसनापड़ता है. अपने घरों सेउन्हें उजड़ना पड़ताहै. फिलवक्त हमजिस बल्ब कीरोशनी में पढ़रहे होते हैं. किसी रास्ते परआगे बढ़ रहेहोते हैं. एकनदी वहीं रुकरही होती है. कई गांव उसमेडूब रहे होतेहैं. यहीं, कई लोग अपनेगांव और घरडूबने की फिक्रमें डूब रहेहोते हैं. उन्हेंविस्थापित कर दियाजाता है. उन्हें कहीं औरस्थापित कर दियाजाता है. उन्हें नई स्मृतियां बनानीहोती हैं. विस्थापित हुएघर के नएपते के साथउन्हें पता चलताहै कि घरऔर जमीन केसाथ उनका औरभी बहुत कुछडूब गया. कोईसरकार उसका कोईमुआवजा नहीं देती. पड़ोसी गांव जोनहीं डूबे उनकेसाथ रोजमर्रा केरिश्ते डूब गए. सरकार के पासरिश्ते डूबने काकोई मुआवजा नहींहोता. सरकारके पास बहुतकुछ डूबने काकोई मुआवजा नहींहोता. सरकारें किन्हीं औरचीजों में डूबीहोती हैं. जबसरकारें बदलती हैंतो पिछली सरकारकिन-किनचीजों में डूबीथी उसका कुछ-कुछ पता चलपाता है यानहीं भी पताचल पता.  बांध आधुनिकमंदिर हैं. विशालबांध और बड़ेमंदिर हैं. उत्तराखंड देवोंकी भूमि है. आधुनिक मंदिरों कीभूमि भी वहीबन रही है. प्राचीनता से आधुनिकता काऔर आधुनिकता सेआपदा का यहफैलाव है. अब तक कासबसे बड़ा आधुनिकमंदिर टिहरी बांधथा. अबउससे भी बड़ापंचेश्वर बनाया जानेवाला है. यह एशिया कासबसे बड़ा औरदुनिया का दूसरासबसे ऊचाई वालाबांध होगा. यहसच में विशालहै. आधुनिकता मेंयही विकास है. कुछ को उजाड़देना और कुछको उजाला देना. यह बांध दोमुल्क की सरहदोंपर बनेगा. भारतनेपाल के बीचजो महाकाली नदीसरहद बनाती है. वहां बांध बनेगा. वहीं झील बनेगी. वहां से बिजलीपैदा होगी. इसकीक्षमता तकरीबन 5 हजारमेगावाट की होगी. परियोजना से जोबिजली पैदा होगीवह दोनों मुल्कों मेंबंटेगी. तकरीबनपचास हजार करोड़की लागत सेबनने वाले इसपंचेश्वर बांध कीऊंचाई 315 मीटरहोगी. इतनीमीटर की ऊचाईमें जल भरावसे 122 गांवडूब जाएंगे. 30 हजारसे ज़्यादा लोगसरकारी आदेशों कापालन करते हुएकहीं और चलेजाएंगे. जहांसरकार उन्हें बसानाचाहेगी. उन्हेंसरकारों की चाहतसे ही उजड़ना है औरसरकारों के कहेपर ही बस जाना है. बांधोंके बनने औरलोगों के उजड़नेमें महाकाली कायह एक औरइलाका शामिल होजाएगा. जबभी बांध बनताहै. लोगोंके गांव डूबतेहैं और उन्हेंउनके गांवों सेहटाया जाता हैतो लोग ख़िलाफतकरते हैं. परउन्हें हटा दियाजाता है. कई बार उन्हेंकहीं और बसादिया जाता है. कई बार उनमेसे कुछ कोनौकरियां भी देदी जाती हैं. विस्थापन के बादउन्हें पता चलताहै कि जिसेवे अपनी जमीनसमझते थे. जो उनका अपनागांव था. जो उनके अपनेनदी नौले थे. वे सब उनकेनहीं थे. दुनिया की समूचीआबादी के पासजो उनका हैवह उनका नहींहोता. सरकारें सबसेज़्यादा ताकतवर हैं. सरकारें जिनके लिएकाम करती हैंवे और भीज़्यादा ताकतवर हैं. वे बहुत कमहैं पर बहुतअमीर हैं. उन्हेंहर रोज बहुतसारी बिजली चाहिए. वे सरकार सेबिजली मांगते हैं. सरकार नदियों कोरोकती है. गांवों को उजाड़तीहै और बांधबना कर उन्हें बिजलीदेती है. वे बिजली सेकम्पनियां चलाते हैं. कम्पनियों में सामानबनाते हैं. सामानों सेमुनाफा कमाते हैंऔर एक औरकम्पनी लगाते हैं. फिर उन्हें औरबिजली चाहिए होतीहै. उनकीचाहते अभी बहुतबची हुई हैं. अभी बहुत बांधबनने बचे हुएहैं. अभीबहुत गांव उजड़नेभी बचे हुएहैं. जबकिछः करोड़ सेज़्यादा आबादी अभीतक बांधों केबनने से विस्थापित होचुकी है. बिजली जरूरी है. बिजली की जरूरतबहुत कम है. जितनी बिजली देशमें बनती हैघरों में उसका 25% से भी कमप्रयोग होता है. बहुत बड़ा हिस्सादेश की कम्पनियों कोजाता है. ऐसे में महाकाली परबनने वाला पंचेश्वर बांधविस्थापितों की संख्यामें कुछ औरसंख्या जोड़ देगा. पश्चिमी नेपाल औरभारत के पिथौरागढ़ इलाकेसे 30 हजारसे ज़्यादा परिवारों कोअपने गांवों सेजाना पड़ेगा.    महाकालीके दोनों किनारों परबसे लोगों कोये सब आंकड़ेनहीं पता. उन्हेंनही पता किबिजली किसके लिएबनाई जा रहीहै. उन्हेंनहीं पता किउन्हें कहां बसायाजाएगा. यहबात उन तकपहुंच गई हैकि यहां गांवमें झील बननाहै और उन्हेंहटाया जाएगा. इसीमहीने 9 अगस्त से जनसुनवाई शुरू होनीहै. जनसुनवाई के बारेमें भी उन्हेंख़बर नहीं हैजिनके घर डूबनेहैं. अपनीबात कहने केलिए गांव केलोगों को जिला/ब्लाक मुख्यालय तकआना होगा. तकरीबन50-100 किमी. की पहाड़ी रास्तेकी दूरी औरबारिश के मौसममें उन्हें आनाहै. गांवके लोग अपनीबात कह सकतेहैं पर सरकारअपनी बात कहचुकी है. विस्थापित होने वालोंके लिए मुआवजाही एक मात्रसहारा है. पिथौरागढ़ उत्तराखण्ड काएक पिछड़ा इलाकाहै. कहायह भी जासकता है किसरकार ने बीतेकई सालों मेंसुविधाएं न देकरइसे पिछाड़ दियाहै. वेसभी इलाके पिछड़ेहुए होते हैंजो दूर जंगलोंमें होते हैं, जो दूर पहाड़ोंपर होते हैं. उनके पास अकूतप्राकृतिक संपदाएं होतीहैं. उनकेजंगल फलों औरखेतों से हरे-भरे होते हैं. अक्सर प्राकृतिक संपदाओं सेअगड़े हुए इलाकेही पिछड़े हुएइलाके कहे जातेहैं. हमारीसरकारों के पासविविधता भरे देशके लिए विविधता भरामॉडल नहीं है. उसके पास एकही मॉडल हैकि चौड़ी सड़कऔर विशाल घरोंसे शहर खड़ाकर देना. गांवोंको शहर कीतरफ ढकेल देना. बीते सत्तर वर्षोंमें सभी सरकारों कीउपलब्धि यही रहीहै कि वेलोगों से गांवोंको खाली करवारही हैं. लोगोंको भगा रहीहैं. लोगभाग रहे हैंऔर किसी शहरमें रुक जारहे हैं याकहीं नहीं रुकरहे हैं. खननकम्पनियों, बांधों, कोल माइंस केजरिए लोगों काअलग से विस्थापन होरहा है. सत्तर सालों कायह देश एकभगदढ़ भरा देशहै. लोगोंकी ज़िंदगी, जमीनऔर ज़ेहन सेस्थिरता को मिटायाजा रहा है. उत्तराखंड में टिहरीका विस्थापन एकनमूना है. पंचेश्वर एक नमूनाबनेगा. कमआबादी वाले पहाड़ोंमें बहुत कमआबादी वाले दलितोंकी यहां बहुतज़्यादा आबादी है. उनके पास जमीनेकम होती हैं. विस्थापन इन्हीं जमीनोंके आधार परकिया जाना है. मुआवजे इन्हीं जमीनोंके आधार परमिलने हैं. जिसकेपास जितनी जमीनेहोंगी उसे उतनाज़्यादा मुआवजा मिलेगा. इन दलित समुदायके लोगों कोमुआवजे के नामपर बहुत कममिलेगा. जोभूमिहीन हैं उनकेलिए परियोजना मेंकोई मुआवजा नहींहै. जिनकेपास घर हैउन्हें घर बनानेके लिए बसढेड़ लाख कामुआवजा तय हुआहै. ढेड़लाख में कोईघर कैस बनसकता है. जिनके पास कुछभी नहीं हैवे भी महाकाली केसहारे अपना जीवनजी लेते थे. नदी से हररोज मछली पकड़के बेंचने केबदले का कोईमुआवजा नहीं होता. जंगल से पत्तलबनाने. लकड़ीसे बर्तन बनानेके हक छीनलिए जाएंगे. उसकाकोई मुआवजा नहींमिलना है. अल्बत्ता उनके परिवारमें से किसीएक को नौकरीमिलेगी. कमपढ़े लिखे कोकम पढ़ी-लिखीवाली नौकरी.
नीले पानी वाली महाकाली नदीउनके लिए रोजगारगारंटी से पहलेवाली रोजगार गारंटीहै. बहुतवर्षों से औरकई पीढ़ियों सेवह उनका रोजगारहै. महाकाली केकिनारे बसने वालेवनराजियों के लिएभी नदी औरजंगल ही रोजगारहै. वेइसी के पत्थरसे कुछ बनालेते थे. वे इसी कीपानी से मछलियां निकाललेते थे. यहीं जंगलों सेलकड़ी निकाल वेबर्तन बनाते हैं. वे रह लेतेहैं बगैर नौकरीके. उन्हेंरहना पड़ेगा नौकरीकरते हुए. वहांके लोगों कोकिसी को भीपूरे परिवार कोनौकरी नहीं मिलनीहै. कोईएक नौकरी करेगा, पूरे परिवार कोउस पर आश्रितरहना पड़ेगा. यहांके लोग भारतसे ज़्यादा नेपालके साथ पुस्तैनी संबंधों सेजुड़े हैं. पश्चिमी नेपालके साथ उनकेरिश्ते इस तरहके हैं किबाकी का पूराभारत उन्हें नेपालीही समझता है. वे नेपाल कोनेपाल नहीं कहते. नेपाल उनके लिएकभी दूसरा मुल्कनहीं रहा. वहकाली पार काइलाका है बस. उनके त्योहार भीसाथ-साथहोते. उनकेदेवता भी आसपासहोते. अपनेदेवताओं को पूजनेवे कालीपार चलेजाते. यहकिसी गैर मुल्कजाने की तरहनही होता. महाकाली उनकेगीतों में है. महाकाली नेपाली गीतोंमें है. वे कहते हैंकि नेपाली हीउनके अपने हैं. राष्ट्र से ज़्यादामजबूत रोजमर्रा कीवह ज़िंदगी होतीहै जिनके साझासहारे से कोईसमाज जीता है. नेपाल के लोगजब मजदूर बनकरकालीपार से आतेहैं तो वेअपने पैसे उनकेघरों में सहेजदेते. लौटतेवक्त वे पैसेवापस ले जाते. उनके बीच कायह भरोसा है. बांध से बनीसौकड़ों किलोमीटर चौड़ीझील उनके इसरिश्ते में दूरीपैदा करेगी. गांवके लोगों नेजनसुनवाइ के बहिस्कार कीबात की है. वे अपना गांवनहीं छोड़ना चाहते. उनका कहना हैकि महाकाली नदीनहीं उनकी मांहै. जबकिसरकार ने एकही नदी औरएक ही जानवरको मां कीमान्यता दी है. मनुष्य का दर्जादिया है. शायद गाय औरगंगा के अलावाकिसी और नदीको मां कहनाउनका देशद्रोह न हो जाए.  

वैकल्पिक मीडिया की भ्रामक अवधारणा

Thu, 18/05/2017 - 16:52
-    दिलीप ख़ान
सोशल मीडिया का प्रचलन बढ़ने के बाद इसे वैकल्पिक मीडिया करार देने की बहस भी तेज़ी से बढ़ी है। जब भी वैकल्पिक मीडिया की बात होती है तो समान्य तौर पर लोग इसे सोशल मीडिया से जोड़ देते हैं। कुछ वर्ष पहले तक वैकल्पिक मीडिया का पर्याय लघु पत्रिकाओं या फिर छोटे-मझोले अख़बारों को माना जाता था। वक़्त बदला, तकनीक बदली तो फेसबुक, ब्लॉग्स और वेबसाइट्स ने इस अवधारणा को बदल डाला, लेकिन इससे बुनियादी नहीं बदल जाते। वो सवाल आज भी यही है कि असल में वैकल्पिक मीडिया कहा किसे जाए?
 18 मई 2017 के दैनिक जागरण के राष्ट्रीय संस्करण में प्रकाशितवैकल्पिक शब्द आते ही ये साफ़ हो जाता है कि किसी संरचना/विचार या फिर किसी ईकाई के बरअक्स कोई ऐसा ढांचा, जो उससे अलग और कई अर्थों में उलट तौर पर हमारे बीच पेश आएं। जब वैक्लपिक मीडिया नाम का शब्द सामने आता है तो इसे कथित मुख्यधारा मीडिया के समानांतर पेश किया जाता है। लेकिन क्या कोई मीडिया अपने-आप में वैकल्पिक या समानांतर होता है? मीडिया अपने-आप में कोई ऐसी चीज़ नहीं है जो हमारी ‘वैकल्पिकता’ की मंशा के मुताबिक़ व्यवहार करे। 
मीडिया किसी विचार/ख़बर या मुद्दे को पेश करने का ज़रिया भर है। यह एक माध्यम है। विचार और ख़बर किसी भी मीडिया के ज़रिए हम तक पहुंच सकते हैं। मिसाल के लिए जिसे लोग मुख्यधारा का मीडिया कहते हैं उसमें प्रिंट भी शामिल है और टीवी भी। यानी प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक के दो अलग-अलग खांचों में बंटे होने के बावजूद वो “मुख्यधारा” बना रहता है। लेकिन, उसी के बरअक्स लघु पत्रिकाओं और छोटे अख़बारों को जब वैकल्पिक मीडिया के तौर पर हम चिह्नित करते हैं तो हम किस बिंदु पर उसे अलग कह रहे होते हैं? क्या माध्यम के बिंदु पर? माध्यम के लिहाज से देखें तो लघु पत्रिका और छोटे अख़बार प्रिंट की श्रेणी में गिने जाएंगे। ज़ाहिर है फर्क मीडियम का नहीं है, फर्क है विषयवस्तु का।
विषय-वस्तु से ही लोग तय करते हैं कि समानांतर या फिर वैकल्पिक किसे कहा जाए। यानी नैरेटिव ही वैकल्पिक होने का मूल है, मीडिया नहीं। इसलिए वैकल्पिक मीडिया की अवधारणा बुनियादी तौर पर भ्रामक है। बढ़ते ऑनलाइन यूजर्स के बाद ऐसा ज़रूर हुआ है कि कई ख़बरों और मुद्दों को सोशल मीडिया में उछलने के बाद ही बड़े मीडिया घरानों में जगह मिल पाई। इसे सोशल मीडिया की सफ़लता के तौर पर भी पेश किया गया। लेकिन, ‘बड़े मीडिया घरानों’ में जगह दिलाने को उपलब्धि के तौर पर क्यों पेश किया जाए? 

क्या सोशल मीडिया सच में वैकल्पिक मीडिया है?ऐसी कई घटनाओँ की दर्जन भर से ज़्यादा लोकप्रिय मिसालें पिछले दो-तीन वर्षों के दरम्यान ही गिनाईं जा सकती हैं। यही नहीं, सोशल मीडिया मोबलाइज़ेशन इतना कारगर रहा कि कई मुल्कों में सियासत की तस्वीर तक बदल गई। कई जगहों पर सोशल मीडिया के ज़रिए ही लोग साझे मुद्दे और साझे संघर्ष में एकजुट हुए। इसे सोशल मीडिया की बड़ी ताक़त के तौर पर पेश किया जाता रहा है। लेकिन ये विमर्श का दूसरा मुद्दा है। सोशल मीडिया मोबलाइजेशन का बड़ा टूल बनकर उभरा है, इसमें कोई शक नहीं। लेकिन क्या जिन मुद्दों को एक पक्ष अपनी ताक़त के तौर पर पेश करता है वो संपूर्णता में ताक़तवर है? क्या सोशल मीडिया की ये ताक़त सच में उन्हीं विचारों को हासिल है, जिन्हें ‘मुख्यधारा के मीडिया’ में जगह नहीं मिल पाती?

अगर बड़े मीडिया घरानों में ‘जगह दिलाने में क़ामयाब होने’ को हम ताक़त मान लें, तो इसकी एकमात्र वजह उस ख़ास मुद्दे को ज़्यादा लोगों तक पहुंचाए जाने के भाव से जुड़ा है। अब अगर किसी स्थापित मीडिया से ज़्यादा पहुंच किसी निजी वेबसाइट या फिर निजी सोशल मीडिया एकाउंट की हो तो क्या उसे ‘मुख्यधारा’ कहा जाएगा? ये कुछ ऐसे बुनियादी सवाल हैं, जिनपर वैक्लपिक बनाम ‘मुख्यधारा’ की बहस के दरम्यांन फिर से सोचा-देखा जाना चाहिए।
मीडियम से ज़्यादा महत्वपूर्ण है मीडियम पर पकड़ और स्वामित्व। यही नैरेटिव को भी तय करता है और कंटेंट को भी। फ़ेसबुक अगर किसी सामाजिक बदलाव का मंच साबित हो रहा है तो इसी फेसबुक पर भड़काऊ, झूठे और आधारहीन ख़बरें भी चलाई जा रही हैं। बंगलुरू में पूर्वोत्तर राज्यों के लोगों के ख़िलाफ़ जिस तरह ऑनलाइन अभियान चला, वो ज़मीन पर उतरकर और भी ज़्यादा हिंसक हो गया था। फेसबुक और व्हाट्सऐप जैसे मंचों ने तथ्य को कई चेहरों में बांट दिया है। जिसके हाथ में जो ‘तथ्य’ है, वो उसी को ‘असली’ तथ्य मान रहा है। अफ़वाह/झूठ की भी फ़सल यहां लहलहा रही है। पूरा मामला इस पर निर्भर करता है कि फ़ेसबुक या किसी भी सोशल मीडिया का इस्तेमाल किस लिहाज से कौन कर रहा है। अगर वो वर्चस्वशाली विचारधारा के समानांतर कोई नैरेटिव खड़ा कर रहा है तो वो वैकल्पिक पत्रकारिता का मंच हो सकता है, लेकिन वो महज मंच ही है, वैकल्पिक मीडिया नहीं।
फ़ेसबुक एक कंपनी है, जिसपर सारा नियंत्रण मार्क ज़करबर्ग है। यूजर के पास सिर्फ़ अपना कंटेंट तय करने का अधिकार है। मीडियम के गणित और सॉफ्टवेयर को अपने मुताबिक़ ढालने का नहीं। पिछले कुछ वर्षों में इसमें भी कई बदलाव देखने को मिले हैं। फ़ेसबुक के एल्गोरिद्म को इस तरह बदल दिया गया है कि एक यूजर जिन यूजर्स के साथ जितना परस्पर संवाद करेगा, उनकी न्यूज़ फीड में उतनी ही ज़्यादा उन व्यक्तियों का लिखा हुआ कंटेंट दिखेगा। अगर परस्पर संवाद कम हुआ, तो दिखना भी कम। ऐसे में ‘वैकल्पिक मीडिया’ के तौर पर इसे अगर पेश किया जाए और फॉलो करने वाले यूजर्स की संख्या को एक मानक मान लें, तो भी इस एल्गोरिद्म के चलते एक ख़ास विचारधारा वालों के बीच ही वो बातें अटककर रह जाती हैं, या फिर उस विचारधारा से इतर उन लोगों के बीच, जो सच में उस कंटेंट में रुचि रखते हों।
वैक्लपिक नैरेटिव के बिना वैक्लपिक मीडिया कुछ नहीं हैफ़ेसबुक अपने-आप में कंपनी के बतौर किसी भी कंटेंट का उत्पादन नहीं करता। ये यूजर्स जेनेरेटेड कंटेंट का एक मंच है। लेकिन, वो मुनाफ़ा कमाने में दुनिया के बड़े अख़बारों को बहुत पीछे छोड़ चुका है। 2016 के आख़िरी चौथाई में फ़ेसबुक ने 3600 करोड़ रुपए का मुनाफ़ा कमाया, तो वहीं न्यूयॉर्क टाइम्स ने इसी दौरान पिछली चौथाई के मुक़ाबले तीन करोड़ का नुकसान सहा। अब अगर न्यूयॉर्क टाइम्स को ‘मुख्यधारा का मीडिया’ मान लें और फ़ेसबुक को ‘वैकल्पिक मीडिया’ तो किसी भी पैमाने पर ये मुफ़ीद नहीं बैठता। 
जिस तरह कोई आम यूजर अपनी बात दूसरे तक पहुंचाने के लिए फ़ेसबुक का इस्तेमाल करते हैं, उसी तरह न्यूयॉर्क टाइम्स भी फ़ेसबुक के ज़रिए अपनी बात और ज़्यादा लोगों तक पहुंचाने की कोशिश में जुटा है। यानी ये सबके लिए खुला मंच है। वैकल्पिक मीडिया के बदले इसलिए वैकल्पिक पत्रकारिता की अवधारणा पर ज़ोर दिया जाना चाहिए क्योंकि ‘मीडिया और तकनीक’ पर नियंत्रण किसी भी आम व्यक्ति से ज़्यादा आसानी से कोई स्थापित ‘मुख्यधारा मीडिया घराना’ कर सकता है। वैकल्पिक मीडिया की अवधारणा तकनीकी तौर पर भ्रामक है, वैकल्पिक अगर कुछ है तो सिर्फ़ नैरेटिव, राजनीति और विचारधारा।

लेखक विषय संवाद साभार अनुवादक

पहले वो आए साम्यवादियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं साम्यवादी नहीं था

 

फिर वो आए मजदूर संघियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं मजदूर संघी नहीं था

 

फिर वो यहूदियों के लिए आए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं यहूदी नहीं था

 

फिर वो आए मेरे लिए

और तब तक बोलने के लिए कोई बचा ही नहीं था

 

मार्टिन नीमोलर (1892-1984)