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आइए हाथ उठाएं हम भी

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Updated: 5 hours 55 min ago

कौन मेरे अंदर लगातार अट्टहास करता है

Sun, 30/07/2017 - 10:44
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चुपचाप अट्टहास -37

लोग मुझे देखते हैं
और पास से गुजर जाते हैं
छूना तक नहीं चाहते
मुझे देर तक देखना नहीं चाहते

आँखें दूर कर लेते हैं



मुझे देखते ही उनके अंदर
आग-सी धधकने लगती है
वे खुद से ही घबराने लगते हैं
उन्हें मेरी कोई जरूरत नहीं है


मुझे मेरी अपनी जरूरत है क्या
यह जो आग उनमें धधकती दिखती है
मेरे अंदर तो नहीं धधक रही


लोग ऐसे ही आएँगे गुजरते जाएंगे
जाने कितने आस्मां खुलते हैं
मैं उनमें से किसी एक को भी छू नहीं सकता


कौन मेरे अंदर लगातार अट्टहास करता रहता है
कौन मेरे अंदर जाने कितने प्रलयंकर अंधड़ बन आता है
कौन मेरे अंदर धूमकेतु-सा हो उड़ता है
कौन मेरे अंदर अनबुझ ज्वालामुखी बन फैलता है।

People look at me
And they walk by
They do not want to look at me for a long while
They take their eyes away


They look at me
And they feel a fire within
They get scared of themselves
They do not need me


Do I need myself
This fire that appears within them
Could it be burning within me


People will come and go
And there are skies that open out
I cannot touch even one of then


Who within me laughs aloud all the time
Who within me comes as a tornado again and again
Who within me flies like a comet
Who within me explodes like a volcano.

चुपचाप अट्टहास - 36: देश मेरे दिमाग में कुलबुलाता है

Sun, 02/07/2017 - 18:56
अब क्या सीखूँ
दिमाग भर चुका है
एक आदर्श की अनंत प्रतियों से
कि मैंने इस धरती को अँधेरे धुँए में बदल देना है

दिमाग में लाशें भरी हैं
मन में जो संगीत गूँजता है
वह भूखे सताए लोगों की चीखें हैं
नंगे-अधनंगे गश्त करते हैं मेरे दिमाग की धमनियों में
चीखते हुए राष्ट्रगीत।

उनके जिस्मों पर से कीड़े-मकौड़े, साँप-बिच्छू गुजरते हैं
मेरा दिमाग कीटों की बिष्ठाओं से भर गया है
गर्भपात से गिरे भ्रूण ज़हन में किलबिलाते हैं
पूरा देश मेरे दिमाग में कुलबुलाता है

सीने के आरपार जाती किरणें
मेरी अपनी छवि दिखलाती हैं अंतर्मन में
हड्डियों पर हमलावर लिंग लटकाए दिखता हूँ
चेहरा सूखे बालों से भरा होता है
अब क्या सीखूँ
इंसानियत के कत्ल की इंतहा दिखती मुझे
अपनी तस्वीर में।

What can I possibly learn now
My mind is filled
With innumerable replicas of an ideal
That I must transform this planet into a dark smoke pit.

My mind is filled with the dead
I hear music
Of the starving downtrodden
They march naked in the veins in my brains
Howling the National anthem.

Insects, snakes and scorpions, crawl on their bodies
My brain is filled with the excreta of these insects
Aborted fetuses swing around in my brain
The entire Nation wriggles in my brains

Rays piercing through and through the chest
Display  my own image in my inner mind
I appear with a violent phallus hanging on my bones
My face is filled with uncouth hair
What can I possibly learn now
I see the limits of trampled humanity
in my own image.

चुपचाप अट्टहास - 35: हर सुंदर के असुंदर को अपनाया

Thu, 29/06/2017 - 11:23
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मूँछ होती थी
काली कच्ची उम्र की
सिर पर उन दिनों के बालों के साथ जमती भली थी
आईना देखता उससे बातें करता था
कहता था कि वह कभी न गिरेगी
वह गिरी भी कटी भी
जब यह वारदात हुई
मैं दिनों तक दाँतों से नाखून काट चबाता रहा
लू में बदन तपाया
बारिश के दिन सड़कों में भीगा
हर सुंदर के असुंदर को अपनाया
इस तरह बना जघन्य
मूँछ फिर कभी खड़ी नहीं हुई
हर सुबह एक नए उस्तरे से उसे मुँड़वाता हूँ
फिर बाँट देता उस्तरा
गोरक्षकों को।


I had a moustache
dark one like a young adult
It used to match well with the hair on my head
I talked with it when looking at the mirror
I told it that it will never droop
And then it drooped and and I lost my dignity


For days I bit my nails
After it happened
I tanned my skin in blazing sun
Got drenched in pouring rain
I went for the ugly in all that is beautiful
This is how I turned ugly
The moustache never twisted upwards
Every morning I use a new razor to shave it off
And then I hand over the razor
to the cow-vigilantes.

चुपचाप अट्टहास - 34: तुम्हारे अंदर मेरा एक हिस्सा कैसे

Tue, 27/06/2017 - 22:50
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तुमने क्या सोचा था
सुंदर सा चेहरा
जिस पर औरतें फिदा होती हैं
किसी ख़ून पीते आदमी का नहीं हो सकता


खुद को देखो
तुम्हारी आँखें हैं जैसे हर किसी की
बाल तुम्हारे काले सफेद
औसत हिंदुस्तानी का भार है तुम्हारा
औसत ही ऊँचाई है
वैसी जीभ, नाक कान
नहीं तुम पागल नहीं हो


तुम्हारे अंदर मेरा एक हिस्सा कैसे आ गया?


And you thought that
A handsome face
That attracts women
Cannot belong to a bloodthirsty man


Look at yourself
Your eyes are just like anyone else’s
Your hair salt and pepper
You weigh about an average Indian’s weight
And your height is average
Your tongue, nose and ears are the same
No, you are not crazy

How is it that a part of me is there within you?

एक पैर रखता हूँ कि सौ राहें फूटतीं

Wed, 21/06/2017 - 23:10
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'अनहद' के ताज़ा अंक में प्रकाशित आलेख p { margin-bottom: 0.25cm; line-height: 120%; }
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मुक्तिबोध के लेखन में वैज्ञानिक सोच
हमें बचपन से बतलाया जाता है कि हमारा युग विज्ञान का युग है। विज्ञान, वैज्ञानिक सोच या चेतना या दृष्टि, तकनोलोजी, ये सारी बातें अलग-अलग अर्थ रखती हैं, पर यह माना जाता है कि इनमें गहरा संबंध है। युग विज्ञान का है तो हर इंसानी हरकत में विज्ञान या वैज्ञानिक सोच को ढूँढना लाजिम हो जाता है। सच यह है कि साहित्य पर चर्चा करते हुए विज्ञान ढूँढना कोई मायने नहीं रखता है। ज्ञान प्राप्त करने के कई तरीकों में से विज्ञान एक है, जिसकी कुछ खास विशेषताएँ हैं। वैज्ञानिक पद्धति की कुछ खासियत हैं जो हमें सत्य के आस-पास तक पहुँचने में मदद करती हैं। पर अंतिम सत्य क्या है. यह सवाल खुला रह जाता है। किसी कृति में वैज्ञानिकता या वैज्ञानिक सोच है या नहीं, इस बात का मतलब अक्सर यह होता है कि रचना में तर्कशीलता पर जोर दिया गया है या कि इसके विपरीत रचना की संरचना और इसके कथ्य में भावनात्मकता या आस्था का असर अधिक है। यह बात शुरु में ही समझ लेनी चाहिए कि वैज्ञानिक तर्कशीलता एक खास किस्म की तर्कशीलता है। इससे अलग भी तर्क की संरचनाएँ होती हैं। धर्म, परंपरा आदि के अपने तर्क होते हैं, जिनका विज्ञान से कोई लेना-देना नहीं है। इसलिए यह पूछना कि किसी साहित्यिक कृति में वैज्ञानिक तर्कशीलता है या नहीं दरअसल साहित्य के रूप का नहीं बल्कि सरोकारों का सवाल है। रूप के नियम होते हैं, जैसे रसशास्त्र के नियम हैं, इन नियमों का विज्ञान से कोई संबंध नहीं है। सरोकारों में भी महज तार्किकता का होना ही विज्ञान की पहचान नहीं है। जहाँ विज्ञान पहली शर्त हो वह कथा, कविता, नाटक आदि विधाओं का साहित्य नहीं होता। यहाँ तक कि विज्ञान-कथा भी विज्ञान नहीं होती, हालाँकि उसमें वैज्ञानिक जानकारियाँ - सच या काल्पनिक – हो सकती हैं। इसलिए बुनियादी या तात्विक अर्थ में साहित्य में विज्ञान ढूँढना निरर्थक है।
इसलिए मुक्तिबोध की रचनाओं में विज्ञान कहाँ है, इस बात का कोई खास अर्थ नहीं है। एक सचेत रचनाकार होने के नाते अपने समय की वैज्ञानिक जानकारियों का ज्ञान उन्हें निश्चित ही रहा होगा। पर हम अधिक से अधिक यही पूछ सकते हैं कि उन्होंने लिखते हुए वैज्ञानिक सोच का इस्तेमाल किया या नहीं। आज विज्ञान से हमारा मतलब आधुनिक विज्ञान से है, जिसका हाल की सदियों में यूरोप और अमेरिका में तेजी से विकास हुआ है। दार्शनिकों ने इस बात पर खूब बहस की है कि विज्ञान क्या है, इसकी विशेषताएँ क्या हैं; काफी हद तक इस पर समझ बन चुकी है, पर कोई आखिरी समझ तक हम आ पहुँचे हैं, ऐसा नहीं कहा जा सकता। विज्ञान से अलग वैज्ञानिक सोच के बारे में समझ में स्पष्टता और भी कम है। विज्ञान क्या नहीं है, यह हम जानते हैं, यहाँ तक कि जो विज्ञान नहीं है और जिसे ज़बरन विज्ञान कहने की कोशिश की जाती है, उस सूडो या छद्म विज्ञान के स्वरूप पर भी अच्छी समझ है। पर इस अर्थ में विज्ञान का संबंध वैज्ञानिक पद्धति से है। सोच पद्धति नहीं होता।
तो फिर साहित्य में वैज्ञानिक सोच से हम क्या अर्थ निकाल सकते हैं? साहित्य को विज्ञान के बरक्स खड़ा करने के लिए हमें इसे ज्ञान प्राप्त करने के तरीके या साधन या एपिस्टीम के रूप में देखना पड़ेगा। ज्ञान का मकसद सत्य की खोज है। निश्चित सत्य की खोज हो सकती है, होती है, पर निश्चित सत्य क्या होता है, कुछ होता भी या नहीं, यह बुनियादी सवाल है। दो और दो मिलकर चार होते हैं, कुछ अर्थों में यह एक निश्चित सत्य है, पर हमेशा नहीं। प्रत्यक्ष ज्ञान में किस पैमाने की अनिश्चितता होती है, इस बारे में एक निश्चित समझ हमें विज्ञान से मिलती है। साहित्य और कला इस अनिश्चितता को मापे बगैर हमें जीवन, प्रकृति के रहस्यों और समाज की सच्चाइयों के रुबरु करते हैं। हर तरह की ज्ञान-मीमांसा अंतत: किसी जीवन-दृष्टि से जुड़ी होती है। इस अर्थ में विज्ञान भी हमें एक जीवन-दृष्टि देता है। इसलिए हम साहित्य पढ़ते हुए यह पूछ सकते हैं कि हमें स्थूल जानकारियों से लेकर सूक्ष्म एहसास तक जो कुछ भी मिल रहा है, क्या वह वैज्ञानिक जीवन-दृष्टि से संगति रखता है। इसका कोई मतलब है भी या नहीं, यह सवाल फिर भी रह जाता है, पर इस पर सोचने-परखने में कोई हर्ज़ नहीं है। साथ ही यह बात ध्यान में रखनी चाहिए कि किसी साहित्यिक कृति का कद उसमें वैज्ञानिक जीवन-दृष्टि होने या न होने से नहीं मापा जाता।
बदकिस्मती से अधिकतर लोग वैज्ञानिक जीवन-दृष्टि को सतही तार्किकता और आधुनिक तकनोेलोजी से संपन्न जीवन-शैली मान लेते हैं। यह विज्ञान का सरलीकरण और न्यूनीकरण (reduction) है। अगर यह सही है कि हाल की सदियों में विज्ञान में अभूतपूर्व तरक्की हुई है तो उसका असर हमारी जीवन-दृष्टि में आए बदलावों में दिखना चाहिए। कौन सी बड़ी वैज्ञानिक बातें हाल की सदियों में सामने आई हैं? आम समझ में अक्सर लोग वैज्ञानिक खोज का श्रेय किसी एक व्यक्ति के साथ जोड़ देते हैं। दरअसल किसी भी वैज्ञानिक खोज के पीछे कई सालों तक काम कर रहे कई सारे लोगों का श्रम होता है। सौ साल पहले जो तीन नाम वैज्ञानिक जीवन-दृष्टि के संदर्भ में लिए जाते थे, वे मार्क्स, डार्विन और फ्रॉएड के हैं । इनमें से फ्रॉएड का संदर्भ काफी हद तक भुलाया जा चुका है, पर जिस खास तरह के मनोवैज्ञानिक विशलेषण को फ्रॉएड ने लोकप्रिय बनाया, उसका व्यापक प्रभाव साहित्य और कलाओं पर पड़ा। धीरे-धीरे फ्रॉएड की जगह फूको, लाकान आदि समाज वैज्ञानिकों ने ले ली और मनोवैज्ञानिक विश्लेषण के नए आयाम सामने आए, जो व्यक्ति और समाज के रिश्तों की पड़ताल करते हैं। फ्रॉएड के काम की वैज्ञानिकता पर शंकाएँ सामने आईं और अब दिमाग के साइंस की समझ बढ़ने के साथ उनकी कुछ खोजों पर दुबारा चर्चा हो रही है। पिछली सदी के अंत तक इन तीन नामों के अलावा जिन दूसरे नामों को वैज्ञानिक जीवन-दृष्टि बनाने या बढ़ाने में लिया जाने लगा, उनमें आइन्स्टाइन, श्रोडिंगर, हाइजेनबर्ग, फाइनमैन और हॉकिंग प्रमुख हैं।
मार्क्स और डार्विन के नाम जल्दी मिटने वाले नहीं हैं। डार्विन ने गालापागोस द्वीप में देखे जंतुओं के आकार और स्वभाव के अभूतपूर्व विश्लेषण के साथ जैविक विकास के सिद्धांत को प्रतिष्ठित करते हुए कायनात में इंसान के अस्तित्व पर पहले से मौजूद समझ को झकझोर डाला। यह सचमुच की वैज्ञानिक क्रांति थी और इसका जो असर हमारी जीवन-दृष्टि पर पड़ा है, उस झटके को शांत होने में कई सदियाँ लगेंगी। मार्क्स ने द्वंद्वात्मक भौतिकवाद और इसकी ऐतिहासिक भूमिका को प्रतिष्ठित करते हुए मानव-मूल्यों और सामाजिक-आर्थिक ढाँचों के बीच संबंधों को उजागर किया। डार्विन के सिद्धांतों को वैज्ञानिक क्रांति मानने पर कोई सवाल नहीं उठता, पर फ्रॉएड के निष्कर्षों को आज वैज्ञानिक नहीं माना जाता और मार्क्स का विश्लेषण वैज्ञानिक है या नहीं, इस पर विवाद है। इससे इनका दर्जा कम नहीं हो जाता, और साथ ही यह बात भी मिट नहीं जाती कि इन दोनों धाराओं ने वैज्ञानिक जीवन-दृष्टि को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। वैज्ञानिक पद्धति की कुछ खासियत है जो हमें सत्य के आस-पास तक पहुँचने में मदद करती हैं। पर अंतिम सत्य क्या है, यह सवाल खुला रह जाता है। या यूँ कहें कि सीढ़ियाँ चढ़ते हुए हम मंज़िल के और करीब पहुँचते रहते हैं, पर मंज़िल ही जैसे स्थिर नहीं रहती। मुक्तिबोध को अक्सर उस अर्थ में वैज्ञानिक सोच से लैस माना जाता है जैसे मार्क्सवाद को वैज्ञानिक विचारधारा कहा जाता है। मार्क्सवाद से अपेक्षा यह है कि एक आखिरी सामाजिक संरचना तक जाने की राह हम जान सकें। हालाँकि मार्क्स ने सामाजिक बराबरी पर व्यापक तौर पर जो बातें कही हैं, उससे अलग किसी स्पष्ट संरचना को या आखिरी मंज़िल तक पहुँचने के किसी एक रास्ते को परिभाषित किया हो, यह कहना मुश्किल है। जिन संरचनाओं को उन्होंने नकारा है, उनको समझना आसान है।
वैज्ञानिक जीवन-दृष्टि के लिहाज से मुक्तिबोध की 'जन-जन का चेहरा एक' कविता का ध्यान सबसे पहले आता है। इस कविता पर चर्चा कम ही हुई है। इसकी पहली पंक्तियों से ही बार-बार हुए तज़ुर्बों पर आधारित (inductive) निष्कर्ष झलकता है - 'चाहे जिस प्रांत पुर का हो, जन-जन का चेहरा एक।' आज जब राष्ट्रवाद और आतंकवाद के नाम पर भिन्न धर्मों या संस्कृतियों के लोगों को अपने से अलग देखने की प्रवृत्ति को बढ़ाया जा रहा है, यह सरल कविता प्रासंगिक है। इसमें वैज्ञानिक दृष्टि कहाँ है? जाहिर है कि 'जन-जन का चेहरा एक' से मतलब यह नहीं है कि धरती पर हर इंसान दूसरे का 'क्लोन' है। हम जानते हैं कि हर इंसान विशिष्ट होता है। उसकी बाक़ी और सब प्राणियों से अलग अपनी खास पहचान होती है। न केवल अपने जीवन-काल में, बल्कि अतीत में जन्मे और भविष्य में जन्म लेने वाले हर इंसान से वह अलग है। फिर 'चेहरा एक' का मतलब क्या है? 'चेहरा' से मतलब शक्ल से नहीं है, जिसका स्वरुप हमारे जीन (genes) में तय है, जो हमारे माता-पिता से हमें मिले हैं। इसका मतलब कविता में आगे समझाया गया है - दुनिया के हर देश में जो धूप इंसान के शरीर पर पड़ती है, वह एक है। दु:खों कष्टों का बोझ एक है, जिनसे जूझने में इंसान की शिद्दत एक है। हर जगह इंसान का एक 'पक्ष' है। यहाँ कइयों को यह शिकायत होगी कि यहाँ विज्ञान की वह सरलीकरण की पद्धति ( reductionist) दिखती है, जो विज्ञान की सीमा है। दरअसल विज्ञान को संपूर्ण मीमांसा की तरह न जानकर उसे महज न्यूनीकरण के यांत्रिक औजारों तक सीमित करना (reduction) कई समाज-वैज्ञानिकों की अधकचरी समझ रही है। जटिल को समझने के लिए reduction एक औजार ज़रूर है, पर यह मीमांसा का एक पक्ष मात्र है, कहानी यहाँ खत्म नहीं होती है। मुक्तिबोध के इंसान की जीवन-धारा धरती पर बहती नदियों की धारा सी एक-सी है। जाहिर है कि गंगा-यमुना और मेकॉंग का बहाव एक जैसा हो, ज़रूरी नहीं है, पर जो बात एक है, वह यह कि वे बहती हैं। कवि ने अपने जीवन के सीमित दायरे में जिन इंसानों को देखा, अपने उन बार-बार किये (inductive‌) अवलोकनों की शृंखला के जरिए वह इस निष्कर्ष पर पहुँचता है कि 'जन-जन का चेहरा एक'। इसके बाद यह और निष्कर्षों की निष्पत्ति (deduction) की बुनियाद बन जाता है। अगर कोई चाहे तो यहाँ कह सकता है कि वर्ग-जाति-लिंग आदि प्रताड़नाएँ एक ही हैं? क्या यह वाम की बड़ी ग़लती नहीं रही है कि इनको एक ही मान लिया गया है? कवि ने सिर्फ यह कहने की कोशिश की है कि हर ओर संपन्न-ताकतवरों और विपन्न-उत्पीड़ितों के बीच जंग चल रही है। बराबरी के लिए इंसान हर कहीं लड़ रहा है। जब हम सूक्ष्मतर द्वंद्वों की ओर बढ़ते हैं तो हमारे मॉडल में हमें और बातें जोड़नी पड़ती हैं - यह वैज्ञानिक पद्धति का हिस्सा है। इंसान की सामान्य सोच भी कुदरती तौर पर ऐसी ही होती है। इसलिए जिन्हें लगता है कि जटिल को सहज संरचना में देखना ही विज्ञान है, वे वैज्ञानिक पद्धति को बिना जाने ही अनुमान लगा रहे होते हैं। सवाल उठता है कि क्या वैज्ञानिक सोच या दृष्टि हमें अनुमान, अवलोकन, कुदरत के नियम से सिद्धांतों तक की यात्रा पर नहीं ले चलती? सही है कि वैज्ञानिक पद्धति में इन बातों का होना ज़रूरी है, इनमें शामिल होते हुए हम वैज्ञानिक सोच का इस्तेमाल कर रहे होते हैं। या यूँ कहें कि वैज्ञानिक सोच के बिना हम इस यात्रा में आगे नहीं बढ़ सकते, पर सोच ही पद्धति नहीं है। वैज्ञानिक खोज की प्रवृत्ति बुनियादी इंसानी फितरत है, पर कोई सिद्धांत तभी वैज्ञानिक कहलाता है, जब वह उन विशेषताओं पर खरा उतरे, जो वैज्ञानिक पद्धति के साथ जुड़ी हैं। साहित्य का काम वैज्ञानिक सिद्धांत गढ़ना नहीं है, इसलिए साहित्य में वैज्ञानिक पद्धति के सभी पहलू नहीं ढूँढना चाहिए।
वैज्ञानिक जीवन-दृष्टि में एक खास बात है कि हर सोच आगे नई सोच को जन्म देता है। मुक्तिबोध की कविता में हम पढ़ते हैं - 'मुझे क़दम-क़दम पर/ चौराहे मिलते हैं/ बाहें फैलाए!!' डी एन ए के युग्म-हीलिक्स संरचना की खोज से जो नई राहें निकलीं, वे आज भी आगे और नई राहों में बढ़ती जा रही हैं। बुनियादी इंसानी फितरत – नए रास्तों को ढूँढने और उन पर चलने की बेचैनी - 'एक पैर रखता हूँ कि सौ राहें फूटतीं, / व मैं उन सब पर से गुजरना चाहता हूँ;/ बहुत अच्छे लगते हैं/ उनके तज़ुर्बे और अपने सपने .../ सब सच्चे लगते हैं;/ अजीब सी अकुलाहट दिल में उभरती है / मैं कुछ गहरे में उतरना चाहता हूँ ;/ जाने क्या मिल जाए?' - यह बेचैन उत्सुकता या कौतूहल वैज्ञानिक सोच का अंग है।
'अँधेरे में' पर चर्चा न हो तो पाठकों को लगेगा कि मुक्तिबोध पर बात ही कहाँ हुई। इस कविता पर कई दिग्गज आलोचकों द्वारा विषद चर्चा की गई है। पिछली आधी सदी के हिन्दी साहित्य में यह कविता एक मील का पत्थर है। इसकी संरचना या कथ्य में अनोखापन है। समकालीन राजनैतिक समस्याओं के साथ मध्यवर्गीय बुद्धिजीवी की तड़प का सामंजस्य है। जो दिखता है, उसके परे जा कर प्रत्यक्ष अवलोकन में निहित अंत:कारणों की पड़ताल वैज्ञानिक जीवन-दृष्टि का हिस्सा है। अगर यह पड़ताल आध्यात्मिक परिप्रेक्ष्य तक सीमित रह जाती, तो वह एक अलग दृष्टि होती, वह सही होती या ग़लत, सवाल यह नहीं है - वह अलग है। इस बात को समझना ज़रूरी है, वैज्ञानिक दृष्टि के पीछे गहन अध्यात्म काम कर रहा हो सकता है, पर वह हमें भौतिक जगत में हो रही घटनाओं में भौतिक कारणों को ढूँढने को कहती है। यही नहीं, जहाँ तक हो सके, वह हमें प्रत्यक्ष अवलोकनों में कारण-कारक संबंध ढूँढने को और इस तरह मिले निष्कर्षों को सैद्धांतिक समझ तक ले चलने को विवश करती है। मूर्त से अमूर्त की यह यात्रा यहीं खत्म नहीं होती है। वैज्ञानिक दृष्टि में अमूर्त सिद्धांतों का औचित्य तभी है, जब वह हमें मूर्त सच में होने वाली परिघटनाओं की कल्पना करने और उनके सचमुच घटित होने की संभावनाओं का ऐसा विवरण सामने रखती हैं, जिन्हें हम न केवल गुणात्मक रूप से समझ सकें, बल्कि जिनमें जो कुछ भी माप-तौल लायक हो, उसे माप सकें, यानी परिमाणात्मक रूप से समझ सकें। साहित्य में इतनी लंबी भौतिक यात्रा नहीं होती, होना ज़रूरी भी नहीं है। कोई भी रचनाकार सचेत रूप से ऐसी कोशिश नहीं करता है, पर हम चाहें तो इसके होने या न होने को ढूँढ सकते हैं।
'अँधेरे में' चालीस के दशक के आखिरी सालों के बाद के डेढ़ दशक की उन सच्चाइयों का दस्तावेज है, जो आगामी काल में लगातार बढ़ते राज्य के आतंक का संकेत थीं। एक ओर आज़ाद मुल्क के नए संविधान के मुताबिक व्यापक लोकतंत्रीकरण के संघर्ष थे, दूसरी ओर इनको कुचलने के लिए राज्य की मशीनरी का खुलेआम दुरुपयोग होने लगा था (जो बाद के सालों में औसत रफ्तार से बढ़ता ही चला और आज हम तक़रीबन फासीवादी तानाशाही तक पहुँच चुके हैं)। अपनी सोच को ठोस द्वंद्वात्मकता तक ले जाने के लिए कवि ऐसे औजारों का इस्तेमाल करता है, जैसे अक्सर वैज्ञानिक भी खोज के पूर्वाभास में जाने-अंजाने करते हैं। इसे 'context of discovery (खोज का प्रसंग)' मान कर, 'context of justification (औचित्य का प्रसंग)' की तार्किकता से अलग किया जा सकता है। 'अँधेरे में' की इन पंक्तियों में हम यह ढूँढ सकते हैं - 'वह कौन, सुनाई जो देता, पर नहीं देता दिखाई!/ इतने में अकस्मात गिरते हैं भीत से/ फूले हुए पलस्तर/ खिरती है चूनेभरी रेत / खिसकती हैं पपड़ियाँ इस तरह - / खुद-ब-खुद कोई बड़ा चेहरा बन जाता है / स्वयमपि मुख बन जाता है दिवाल पर' या 'सलिल के तम-श्याम शीशे में कोई श्वेत-आकृति / कुहरीला कोई बड़ा चेहरा फैल जाता है .../'
मुक्तिबोध मुख्यतः राजनैतिक कवि के रूप में जाने जाते हैं और बेशक उनकी रचनाओं में सियासी खयाल खूब आते हैं। मसलन 'पूँजीवादी समाज के प्रति' कविता में पूँजीवाद के ध्वंस की घोषणा पढ़कर ('तू है मरण, तू है रिक्त, तू है व्यर्थ/ तेरा ध्वंस केवल, एक तेरा अर्थ') कट्टर मार्क्सवादियों को लग सकता है कि यही है - विशुद्ध मार्क्सवादी वैज्ञानिक सच। पर न तो मार्क्स ने ही पूँजीवाद की ऐसी सरलीकृत व्याख्या की है और न ही ऐसी सोच वैज्ञानिक है। कवि जब कविता में बयान देना चाहता है तो उसके पास सीमित विकल्प होते हैं। यही सीमा हमें ऐसी कविताओं में दिखती है। मुक्तिबोध की प्रारंभिक कविताओं में ऐसा उच्छवास प्रचुर है। जब आग्रह से मुक्त होकर उन्होंने लिखा तो प्रारंभिक काल में भी गहरे एहसासों वाली कविताएँ लिखीं - जैसे 'प्रथम छंद' कविता में देखिए – 'युगारम्भ के प्रथम छंद ये / पीले राह-दग्ध मैदानों से युग-जीवन के मटमैले / तप्त क्षितिज पर/ धुँधले, छितरे, गहरे, कोले मेघ अन्ध ये/ तूफानी उच्छवास गन्ध ले / भावी के विकराल दूत हैं, काल-चिह्न ये / दुनिया के आराम नींद के मधु-स्वप्नों में / क्षुब्ध, निपीड़ित, दमित भावनाओं के गहरे श्याम विघ्न ये ।' यहाँ उनकी द्वंद्वात्मक सोच साफ दिखती है, जब वे 'आराम-नींद' या 'राह-दग्ध' जैसे युग्मों को 'प्रथम छंद' के साथ रखते हैं। ऐसे ही 'जीवन की लौ' कविता में 'घूरने लगते हैं बरगद पथराई आँखों से, फैले रीतेपन की विराट लहरों को/ त्यों मन के अंदर प्राण खो चले' जैसी पंक्तियों में वह महाकवि मुक्तिबोध दिखता है, जो बदलते हुए समकालीन भारतीय समाज में युवामन की गहरी पीड़ाओं को अप्रतिम रूप से अभिव्यक्त कर पाता है। स्वयं मुक्तिबोध का कहना है - 'मनुष्य का मन जगत के संवेदना-विम्बों को संगृहीत और संपादित करता रहता है। यदि वह ग़लत ढंग से सम्पादित करता रहा, तो रचनाकार की दृष्टि में विक्षेप होगा और उसकी कला घटिया किस्म की होगी।' यानी सपाट राजनैतिक बयानों को वे अच्छा लेखन नहीं मानते थे। समकालीन विश्व-साहित्य और बौद्धिक उथल-पुथल पर उनकी अद्भुत पकड़ थी। अपने समय में उपलब्ध विज्ञान की जानकारियों को और सचेत रचनाकारों की तरह मुहावरों की तरह मुक्तिबोध ने भी इस्तेमाल किया है। जैसे 'दिमाग़ी गुहाअँधकार का ओरांगउटांग' या और दीगर उदाहरण हैं। उनकी एक अधूरी कहानी में पति और पत्नी के बीच संवाद में शनि ग्रह के चारों ओर मौजूद वलयों का जिक्र आता है।
वैज्ञानिक सोच का एक पहलू यह है कि वह हमें अपने और दूसरों की, समाज और परिवेश की बेहतरी के लिए उकसाता है (इसके बावजूद कि विज्ञान या तकनोलोजी से पर्यावरण का विनाश हुआ है, यह बात सच है)। इसी बेचैनी को हम मुक्तिबोध में देखते हैं, 'ओ मेरे आदर्शवादी मन/ ओ मेरे सिद्धांतवादी मन/ अब तक क्या किया?जीवन क्या जिया?' एक और पहलू ऐसे वर्गीकरण का है, जिसमें पहले से उपलब्ध वर्गीकरणों से अधिक स्पष्टता हो। 'संवेदनात्मक ज्ञान' और 'ज्ञानात्मक संवेदना' जैसे मुहावरों के इस्तेमाल में यही पद्धति दिखती है। पर वैज्ञानिक पद्धति में भावनात्मकता की जगह नहीं होती, यह विज्ञान की ताकत है और यही उसकी सीमा भी है। यह सही है कि संवेदना हमेशा सही निष्कर्ष तक ले जाए, ऐसा कहना मुश्किल है। पर संवेदना के न होने पर सही निष्कर्ष के पास तक पहुँचना भी असंभव ही है। इन मुहावरों के कहते ही मुक्तिबोध उस मार्क्सवाद से अलग हो जाते हैं, जो महज आर्थिक- राजनैतिक है। इन मुहावरों के जरिए वे मार्क्स के अराजक पक्ष से जुड़ जाते हैं। अराजक विश्व-दृष्टि के बिना कोई रचनाकार क्रीएटिव नहीं हो सकता। फेयराबेंड के अनुसार वैज्ञानिक भी अपनी सोच में मूलत: अराजक होते हैं। एक मार्क्सवादी व्यक्ति भी जब साहित्यिक होता है तो अपने लेखन में वह अराजक होता है।मार्क्सवादी सोच राजनैतिक धरातल पर एक खास तर्क को खड़ा करती है, पर वह मार्क्स का अराजक मानवतावादी पक्ष है जो मुक्तिबोध और उनकी परंपरा के बाद के रचनाकारों में तीखी संवेदना की अभिव्यक्ति पैदा करती है।
वैज्ञानिक सोच में सबसे बड़ी बात यह है कि वह प्रतिष्ठित मान्यताओं (paradigm) को तोड़कर नई मान्यताओं को निर्मित करता है। मान्यताओं के टूटने-बनने की इस प्रक्रिया की बुनियाद सवाल उठाने का साहस (अक्सर दुःसाहस) है। इसलिए जब मुक्तिबोध कहते हैं - 'अब अभिव्यक्ति के सारे ख़तरे उठाने ही होंगे।/ तोड़ने होंगे ही मठ और गढ़ सब', हम कह सकते हैं कि वैज्ञानिक दृष्टि की सबसे सशक्त पहचान सामने आती है। यही पहचान है जो हमें ब्रह्मांड की देश-काल विशालता के सामने निडर होकर खड़े होने की ताकत देती है। यही पहचान हममें यह एहसास लाती है कि मानव होना, प्राणी होना, ब्रह्मांड में होना और इस होने को जान पाना कितना सुंदर है। इसीलिए तो मुक्तिबोध कहते हैं - 'जिस व्यक्ति से मेरी जितनी अधिक घनिष्टता है, मैं उस व्यक्ति का उतना ही बड़ा आलोचक हूँ।' ऊपर उद्धृत पंक्तियाँ 'अब तक क्या किया, ...!' और 'अब अभिव्यक्ति के सारे ख़तरे ...' किसी भी पाठक के लिए ललकार बन कर आती हैं। यह ललकार सिर्फ समाज से नहीं खुद से लड़ने की ललकार भी है। इसे हम अँधेरे से उजाले तक जाने का संघर्ष कह सकते हैं। यह संघर्ष वैज्ञानिक नहीं, नैतिक है।
मुक्तिबोध परंपरा से कटे नहीं थे। अक्सर यह कहा जाता है कि जो वैज्ञानिक है, वह निजी जीवन में भी धार्मिक और कर्मकांडी नहीं हो सकता। जाहिर है कि ऐसी दुनिया में जहाँ धर्मों का बोलबाला हो, यह संभव नहीं है। मुक्तिबोध की रचनाओं में धर्म-चर्चा नहीं है, उनकी कहानियों को पढ़कर लगता है कि वे आधुनिक नास्तिक विचारों से प्रभावित थे, पर ऐसे मुहावरों का भरपूर प्रयोग हमें उनकी रचनाओं में दिखता है जो धर्म और धर्म-परंपरा से आए हैं। खासतौर से उन परंपराओं को जिन्हें सामूहिक रूप से हिंदू धर्म कहा जाता है, उनका संबंध गहरा था। यह बात उनकी संस्कृतनिष्ठ भाषा से लेकर 'ब्रह्मराक्षस' जैसे मुहावरों तक के प्रयोग में दिखती है। इसकी वजह यह है कि जहाँ साहित्य नैतिक सवालों को उठाता है या हमें फंतासी की दुनिया में लो जाता है, वहाँ हम विज्ञान से परे चले जाते हैं। नैतिक सवाल दार्शनिक सवाल हैं, वैज्ञानिक सोच पर दर्शन हावी हो सकता है, पर ये दोनों एक बात नहीं हैं। नैतिक निर्णयों को वैज्ञानिक सोच की कसौटी पर परखा जा सकता है, पर दोनों को गड्ड-मड्ड नहीं किया जाना चाहिए। इसी तरह जहाँ साहित्य में फंतासी का प्रयोग है, वहाँ ऐसी बेमेल बातें दिखेंगी, जो वैज्ञानिक नहीं हैं, पर वे ज़रूरी हैं। फंतासी तर्कशीलता से परे हो, ऐसा नहीं है, पर किसी निश्चित और नियमों में बँधी संरचना में सिमटी हो, ऐसा नहीं हो सकता। मुक्तिबोध की कहानियाँ पढ़कर लगता है कि वे अपने समकालीन अस्तित्ववादी विचारों से प्रभावित थे। इसका मतलब यह है कि उनके जीवन में निजी संघर्षों की उलझनें रही होंगीं। उनकी कहानियों में 'सतह से उठता आदमी' में यह संघर्ष सबसे तीखा बन कर सामने आता है। 'अँधेरे में' और 'ब्रह्मराक्षस' जैसी कविताओं में भी यह दिखता है, पर कविता की अपनी शर्तें हैं और इसलिए वहाँ सीधे-सीधे कुछ भी कहना मुश्किल हो जाता है।
अंत में यह कहना ज़रूरी है कि वैज्ञानिक पद्धति की सार्वभौमिकता पर भले ही शंकाएँ कम हों, वैज्ञानिक सोच को सांस्कृतिक ज़मीन से पूरी तरह अलग करना मुश्किल है। इसलिए अक्सर उत्पीड़त तबकों से यह माँग आती है कि वे स्थानीय मुख्यधारा की संस्कृति का सब कुछ छोड़ना चाहते हैं। इस सब कुछ में भाषा और साहित्य भी है। इसलिए वैज्ञानिक सोच हो या साहित्य को परखने का कोई और दीगर तरीका हो, हमें यह मानकर चलना चाहिए कि कोई अदीब अपनी ज़मीन से कटा नहीं होता और परिवेश में मौजूद पूर्वग्रहों से वह कभी पूरी तरह मुक्त नहीं होता है। अधिक से अधिक वह इस बारे में सचेत हो सकता है और इसे ध्यान में रख कर अदब में घुसपैठ कर सकता है। -(अनहद – मार्च 2017; आलेख में कुछ पंक्तियाँ 'सापेक्ष' के मुक्तिबोध विशेषांक में प्रकाशित मेेरे नोट्स में से ली गई हैं)

चुपचाप अट्टहास - 33

Mon, 12/06/2017 - 09:22
मुर्दा शांति तुम्हारे अंदर
जो कुछ भी टूट रहा जुड़ रहा चारों ओर
ये लक्कड़ लोहे की चीखें
तुम्हारे अंदर से आती मुर्दा शांति की आवाज़ है

मैंने निर्णय लिया बहुत पहले कभी
कि अपने अंदर अशांति भर लूँगा
भस्म होती रहे धरती  

मैंने देखीं इंसान की औलादें सूअर के पिल्लों जैसी
और तय किया कि
भस्मासुर बन जाऊँगा
हो जाए भस्म हर कुछ
लपटें आग की उठें धू-धू
भर जाए आस्मान धुँए से
इसी धुँए से बनेगी मेरी प्राणवायु
मैं मुक्त हुआ प्रेम से
खालीपन जम गया मेरे अंदर।

You have a dead quiet within you
All that disintegrates and reforms all around
The metals and non-metals screeching
It is the dead quiet within you

I figured a while back
That I will fill myself with disquiet
Let the Earth be demolished

I saw human offspring no different form baby pigs
And decided
To become Bhasmasura, the destroyer
Let all be destroyed
Flames of fire rising high up
The sky filled with smoke
That smoke is what gives me life
I am liberated from love
Emptiness settled within me.

विज्ञान जन-जन के लिए

Sun, 04/06/2017 - 10:49
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सामयिक वार्ता के ताज़ा अंक में प्रकाशित आलेख  हमें भी सड़कों पर उतरना होगा - मार्च फॉर साइंस
कोलकाता में हिंदुत्ववादी लोग 'गर्भ संस्कार' का कार्यक्रम कर रहे हैं। कहा जा रहा है कि वेदों और शास्त्रों में ऐसे उपाय बतलाए गए हैं जो जन्म से पहले ही यह तय कर सकते हैं कि बच्चा आगे जाकर क्या कुछ बनेगा। वैज्ञानिकों और चिंतकों ने चिंता जताई है कि आम लोगों को इस तरह बेवकूफ बनाकर उनमें अंधविश्वास फैलाए जा रहे हैं। पर यह कोई नई बात नहीं है, हमें अचंभा भी नहीं होना चाहिए कि ऐसा हो रहा है। आखिर जब मुल्क का प्रधान मंत्री ही अतीत के तथाकथित विज्ञान पर ऊल-जलूल बयान दे चुका है तो बाक़ी पर क्या उँगली उठाई जाए। पर अमेरिका में वैज्ञानिक सड़क पर उतर आए – दसों हजारों की तादाद में लोगों ने विज्ञान को बचाने के लिए जुलूस निकाला, जिसमें इस वक्त के बड़े से बड़े वैज्ञानिकों ने हिस्सा लिया, यह खबर चौंकाती है। 22 अप्रैल को अर्थ डे यानी धरती दिवस वाले दिन अमेरिका की राजधानी वाशिंगटन डी सी समेत दुनिया भर में 600 से अधिक शहरों में रैली और जुलूस आयोजित हुए। आयोजकों ने इसे विज्ञान के पक्ष में गैर-राजनैतिक आंदोलन कहा।
आधुनिक विज्ञान ने कुछ मुद्दों पर हमारी बुनियादी सोच में ऐसे बदलाव लाए हैं कि पश्चिमी मुल्कों में भी इससे कई हलकों में बेचैनी फैली है। पहले वैज्ञानिकों में अधिकतर आस्तिक होते थे, पर अब यह माना जाता है कि विज्ञान हमें नास्तिक बनाता है। जाहिर है धार्मिक संस्थाओं को यह बात पसंद नहीं है। खास तौर पर अमेरिका में पिछली सदी में यह बहस चलती रही है कि कायनात खुदा ने बनाई या जैसा कि आधुनिक विज्ञान में माना जाता है, वह एक बड़े धमाके से शुरु हुई। तरक्की पसंद तबकों के पुरजोर विरोध के बावजूद सरमाएदारों ने डार्विन के विकासवाद और जीवों के विकास में कुदरती चयन के सिद्धांत का भरपूर फायदा खुले बाज़ार के पक्ष में तर्क बढ़ाने के लिए किया। पर आज जब आधुनिक विज्ञान से धरती की आबोहवा में आ रहे खतरनाक बदलावों और तापमान बढ़ने का पता चलता है और सरमाएदारों को इसमें उनकी मुनाफाखोरी पर रोक का खतरा दिखता है, तो विज्ञान का विरोध करना उनके लिए लाजिम हो जाता है। गौरतलब बात यह है कि अमेरिका में विज्ञान को बचाने के लिए जुलूस तब निकला जब वहाँ डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व में हाल की सबसे ज्यादा दक्षिणपंथी और सरमाएदारों की कट्टर पक्षधर माने जाने वाली सरकार सत्ता में आई। ट्रंप के आने के बाद अनुदानों में भारी कटौती हुई है। इससे संस्थानों के सामने संकट है कि वे शोध-कार्य कैसे चलाएँ। वैज्ञानिक जानकारियों पर आधारित पर्यावरण रक्षा या ऐसे दूसरे कानूनों को हटाया जा रहा है। सरकारी वेबसाइट्स पर से आँकड़े हटाए जाने का खतरा है, कई सरकारी वैज्ञानिकों को या तो उनके काम से रोका गया है या रोके जाने का अंदेशा है। ट्रंप के राष्ट्रपति चुने जाने से पहले से ही उसने वैज्ञानिकों के खिलाफ मुहिम छेड़ रखी थी। आबोहवा में हो रहे बदलाव पर वैज्ञानिक जानकारी को उसने ढकोसला कहा था। इससे परेशान होकर वैज्ञानिकों ने कई हफ्तों तक सोशल मीडिया आदि में कैंपेन किया और मार्च के लिए पैसे इकट्ठे किए।
हमारे देश में विज्ञान के लिए जनांदोलनों का पुराना इतिहास है। आज़ादी के पहले जहाँ अंग्रेज़ी तालीम जड़ पकड़ चुकी थी और साथ ही अंग्रेज़ी राज का तीखा विरोध भी था, उन इलाकों में, जैसे बंगाल में, सैंकड़ों विज्ञान सभा या क्लब थे। आज़ादी के बाद भी ये क्लब सक्रिय रहे और कहीं-कहीं रेशनलिस्ट यानी तर्कशील आंदोलन की रीढ़ बने। पर गंभीर विज्ञान चर्चा हर जगह आम बातचीत का हिस्सा नहीं बन पाई। खास तौर पर हिन्दीभाषी इलाकों में विज्ञान पिछड़ा रहा और कभी भी मुख्यधारा का हिस्सा नहीं बन पाया। नतीजतन जहाँ आज भी बांग्ला में दर्जनों विज्ञान आधारित पत्रिकाएँ हैं, हिन्दी प्रदेशों में सरकारी पत्रिकाओं को छोड़ कर एक भी ऐसी पत्रिका नहीं है, जिसमें विज्ञान के सामान्य सवालों या खोजों पर केंद्रित चर्चाएँ हों। अंग्रेज़ी में 'द हिन्दू' जैसे अखबार में हफ्ते में एक दिन एक पूरा पन्ना विज्ञान पर निकलता है, पर हिन्दी में ऐसा सोचना भी मुश्किल है।
सत्तर और अस्सी के दशकों में मादरी ज़ुबान में साइंस की तालीम पर बहुत सारा ज़मीनी काम हुआ। मध्य प्रदेश के होशंगाबाद जिले से शुरु हुआ 'होशंगाबाद विज्ञान शिक्षा कार्यक्रम' कई जिलाओं में फैला। पहले किशोर भारती और बाद में एकलव्य संस्थाओं ने इस कार्यक्रम को चलाया। अस्सी के दशक के आखिरी सालों में देश भर में विज्ञान के जनांदोलन हुए। अखिल भारतीय जनविज्ञान नेटवर्क नामक संगठन बना, जिसके झंडे तले देश भर में विज्ञान-आंदोलन हुए और 1987 में हजारों की तादाद में विभिन्न वर्गों से आए लोग गाँधी के जन्मदिन 2 अक्तूबर से यात्रा शुरु करते हुए रमन के जन्मदिन 7 नवंबर को भोपाल में इकट्ठे हुए। इन आंदोलनों में विशुद्ध विज्ञान-कर्मियों के अलावा समाजवादियों से लेकर साम्यवादियों तक हर तरह के वामपंथी सक्रिय थे। इन आंदोलनों का मुख्य नारा था कि विज्ञान जन-जन के लिए है और हर किसी तक पहुँचे।
विज्ञान को आगे बढ़ाने में तरक्कीपसंद सोच के लोगों की भागीदारी को देखते हुए यह मानना पड़ेगा कि आधुनिक विज्ञान का एक स्पष्ट राजनैतिक पक्ष है। अपनी तमाम सीमाओं के बावजूद यह बराबरी के समाज के लिए हमारी राजनैतिक सोच को आगे बढ़ाता है।
एक क़ॉलेज की छात्र ऐलिसन वोंग ने http://synapse.ucsf.edu/articles/2017/05/01/march-science-politicalवेबसाइट पर लिखा कि वह मानती है कि विज्ञान के लिए आंदोलन राजनैतिक है। अमेरिका में इस तरह की बहस जारी है और कई लोग इस विचार के पक्ष-विपक्ष में तर्क दे रहे हैं।
क्या ऐसा जुलूस हमारे यहाँ निकल सकता है? हमारा मुल्क कहने को तो विविधताओं से भरा है, पर ऊँची तालीम और खास तौर पर विज्ञान में सुविधा-संपन्न अगड़ी जातियों के पुरुषों का वर्चस्व है। यह सही है कि उन्हीं में से एक छोटा हिस्सा उन साहसी दोस्तों का है जिन्होंने अपना बहुत सारा वक्त समाज में वैज्ञानिक चेतना फैलाने में लगाया है और हर तरह के तरक्कीपसंद कदम को बढ़ावा दिया है। पिछले साल ऐसे ही एक समूह ने वर्तमान हाकिमों और उनके सांगोपांग द्वारा अंधविश्वासों को विज्ञान कहने पर विरोध जताया था। इनसे अलग कूढ़मगज पुरातनपंथी हमारे विज्ञान-संस्थानों में भरे हुए हैं, प्रधान मंत्री बकवास ऐसे ही नहीं करते। ये लोग अति-राष्ट्रवादी किस्म के लोग हैं, जो थोड़ा बहुत संस्कृत सीख कर उसे तोड़-मरोड़ कर पुनरुत्थानवादी वक्तव्य देते रहते हैं। कहने को यह ज्ञान-विज्ञान की दुनिया में पश्चिम के वर्चस्व के खिलाफ लड़ाई है, पर सचमुच यह ज्यादातर पोंगापंथी ही है - वाकई संस्कृत का अच्छा ज्ञान रखने वाले और गंभीर अध्येता इनमें से कम ही लोग होते हैं। इसलिए इन वैज्ञानिकों से यह अपेक्षा नहीं की जा सकती कि वे सबके लिए विज्ञान की माँग का समर्थन करें। संयोग की बात है कि डोनाल्ड ट्रंप के पास बकवास करने के लिए वेदों या शास्त्रों का सहारा नहीं है। इसलिए इस मामले में हमारे पोंगापंथी अमेरिकियों से ज्यादा ताकतवर हैं। एक नासमझ पत्रकार ने यह सुझाया है कि सरकारी संस्थानों में होने की वजह से ही भारतीय वैज्ञानिक जुलूस नहीं निकाल सकते, जबकि सच यह है कि निजी संस्थानों में वैज्ञानिक कहीं ज्यादा असुरक्षा की भावना से ग्रस्त होते हैं।
हमारे यहाँ की फासिस्ट संघी सरकार ने भी बुनियादी तालीम और शोध-कार्य पर हमला बोला हुआ है। हर यूनिवर्सिटी में बजट में कटौती हुई है। पंजाब यूनिवर्सिटी में एकमुश्त बेहिस बढ़ाई गई फीस के खिलाफ आंदोलन करने वाले 63 छात्रों पर एक दिन के लिए राजद्रोह का इल्ज़ाम भी लगा दिया गया था, पुलिस की मार जो पड़ी वह अलग। जाहिर है कि वक्त और माहौल हमारे लिए भी न केवल विज्ञान विरोधी है, बल्कि बुनियादी तालीम के खिलाफ है। इसलिए हमें भी सड़कों पर तो उतरना होगा। संघर्ष का कोई विकल्प नहीं बचा है।

एक पगला है सैफू

Sat, 03/06/2017 - 11:13
असगर वजाहत पर 'बनास जन' के विशेषांक में प्रकाशित:

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'मैं हिंदू हूँ' पढ़ते हुए
- लाल्टू
एक पागल है टोबा टेक सिंह और एक पगला है सैफू।
टोबा टेक सिंह जाने कब से यह जानने की कोशिश में है कि उसका गाँव टोबा टेक सिंह हिंदुस्तान में है या पाकिस्तान में। उसे पता चल जाए कि गाँव वाकई कहीं स्यालकोट के पास है तो कितना अच्छा हो। सैफू जान जाए कि पाकिस्तान में भी मिट्टी होती है तो कितना बढ़िया।
असगर वजाहत हमारे वक्त के उन रचनाकारों में से हैं जो अपने देश-काल की संकीर्णताओं से परे मानवीय विड़ंबनाओं से हमें रूबरू करवाते हैं। ऐसा करने के लिए वे सरल-सहज देसी भाषा में बेबाक किस्सागोई करते हैं और इस तरह समकालीन हिंदी कथा-साहित्य में अपनी अप्रतिम जगह बनाते हैं।
एक कहानी 'डंडा' में असगर की पंक्ति है - 'डंडा होने पर हाथी वैसी ही हँसी हँसने लगा जैसी हँसी हम सब रोज हँसते हैं।' हम कैसी हँसी रोज हँसते हैं? हमारी रोजाना की हँसी हमारी अपनी हँसी है या कि उस सधे हुए हाथी की है जिसे समाज, परंपरा, धर्म, जाति, लिंग आदि की संस्थाओं ने निरंतर डंडा किया हुआ है! सामूहिक अश्लीलता के प्रति असहाय समर्पण हमारी नियति है। हालाँकि असगर को यह तकलीफ ज़रूर है कि 'तब दंगे ऐसे नहीं हुआ करते थे जैसे आजकल होते हैं।' सच यह है कि तब भी दंगे ऐसे होते थे, नफ़रत की सौदागरी कमोबेश एक जैसी ही रही है; फ़र्क यह है कि आज हममें से कई यह जानकर शामिल होते हैं कि सब कुछ ग़लत है। सामंती काल में गैरबराबरी को ही सही माना जाता था। या यूँ कहें कि आज भी कुछ लोग उन्हीं कारणों से दंगों में शामिल होते हैं, जैसे पिछले जमानों में होते थे। पर अधिकतर जानते हैं कि हत्याएँ और कत्लेआम हमारे अंदर के शैतानों का खेल है, पर यह हमारी नियति है कि हम इसमें शामिल हैं। अक्सर लोग यह भ्रम फैलाते हैं कि आम लोगों के दिलों में शैतान बिल्कुल नहीं होता। अगर सचमुच ऐसा होता तो राष्ट्रवाद और इसके नाम पर भुनाई जाने वाली राजनीति कैसे पनपती! असगर व्यावहारिक सीमाओं की ओर संकेत करते हैं - 'जबानी जमा-खर्च तक तो सब ठीक था लेकिन उसके आगे. . . संकट (पी ए सी को बूटों की मार) एकता सिखा देता है।’ पर सचमुच इंसान के आज़ाद खयाल कितने आज़ाद होते हैं, यह संशय हमें कम या ज्यादा हो, पर हुक्मरानों को नहीं होता। वे जानते हैं कि बकौल फूको आज़ाद खयाल ज्ञान के संस्थानों की निर्मिति हैं। ये संस्थान संगठित या असंगठित ढंग से हमारे इर्द-गिर्द फैले हुए हैं। ये संस्थान हमें अपनी जकड़ में लिए हुए हैं। ये वही डंडा करने वाले संस्थान हैं, जिसका फायदा हुक्मरान उठाते हैं।
तो क्या हम स्वस्थ मानसिकता से सामूहिक विक्षिप्तता को कभी समझ नहीं पाएँगे? क्या यह मानव 'सभ्यता' के लिए चिरंतन शाप है? असगर और मंटो की कहानियों में हम खुद से पूछते रहेंगे कि हम रोज वाली हँसी कब तक हँसते रहेंगे। सैफू पागल है या कि उसे समझने, उससे जूझने में असफल हम लोग पागल हैं। फूको ने कहा है कि पागलपन या अ-युक्ति (अन-रीज़न) अक्सर एक दूसरे का हिस्सा होते हैं। इनका आपस में संबंध बदलता रहता है। हम व्यक्ति के स्तर पर इस संबंध को तभी देखते हैं, जब हम पर सामूहिक विक्षिप्तता हावी रहती है। इसीलिए तो, राष्ट्र नामक विक्षिप्तता को हमने शाश्वत सत्य मान लिया है; यही नहीं इस पागलपन में अ-युक्ति को ज़बरन युक्तिसंगत मानने के लिए हमने मनगढ़ंत इतिहास, भूगोल, विज्ञान तक बना लिए हैं।
राष्ट्र की जो अवधारणा पश्चिम से हमें मिली है, वह आम तौर पर अल्पसंख्यकों के लिए अभिशाप है, क्योंकि यह राष्ट्र की संरचना में निहित है कि अपने ही अंदर दुश्मन ढूँढा जाए। कुछ सदी पहले तक उत्तरी यूरोप के मुल्कों में, जहाँ प्रोटेस्टेंट ईसाई बहुसंख्यक थे, कैथोलिक समुदाय को गद्दार समझा जाता था और इसी तरह दक्षिणी यूरोप के मुल्कों में, जहाँ कैथोलिक बहुसंख्यक थे, प्रोटेस्टेंट ईसाइयों को दुश्मन माना जाता था। यहूदी हर जगह इस भेदभाव का शिकार रहे। अल्पसंख्यकों को ज़ुल्म सहने पड़ते हैं, वे दंगों और कत्लेआम के शिकार होते हैं। इससे भी बढ़कर तकलीफ की बात यह है कि परिस्थितियों के मारे वे उस गतिकी को समझने लगते हैं जिसे बहुसंख्यक नहीं समझ पाते कि आज़ाद खयाल डंडा करने वाले ज्ञान के संस्थानों की निर्मिति हैं। भौतिक यातनाओं से भरे अपने अस्तित्व के साथ बहुसंख्यकों के दृष्टिहीनता वाले शापग्रस्त जीवन को देखते रहना और भी अधिक पीड़ादायक है। अल्पसंख्यक होना अपने चारों ओर ऐसे बहुसंख्यक लोगों से घिरे होना है जो सच नहीं देख पाने को अभिशप्त हैं। इसलिए सैफू रोता रहेगा, खुद को बहुसंख्यकों में से एक साबित करता रहेगा, पर वह बेहोश होकर ही बच पाएगा। होश में रहकर उसे मुक्ति नहीं मिलेगी। इसी तकलीफ में बेचैन होकर हम अतीत में सहारा ढूँढते हैं - 'तब दंगे ऐसे नहीं हुआ करते थे जैसे आजकल होते हैं।' पर इतिहास वर्तमान से कम निष्ठुर नहीं है। स्टीवेन पिंकर की मानें तो मानव सभ्यता लगातार पहले से कम हिंसा की ओर बढ़ती रही है। हिंसा के भयंकर साधन हमारे पास हैं, जो पल भर में पूरी धरती और इस जैसी दस हजार धरतियों को तबाह कर सकते हैं, पर हिंसा की आलोचना का दायरा बढ़ा है। हमने अपने अंदर शैतान को देखना शुरु किया है। घनी हताशा के बीच इसी थोड़ी सी उम्मीद को सँजोए हम जीते चले हैं।
ऊपर मंटो की कहानी के चरित्र का जिक्र हमने इसलिए नहीं किया है कि हमें असगर वजाहत को मंटो की परंपरा में खड़ा करना है, बल्कि यह महज यह दिखलाने के लिए है कि यातना कैसी विकट हो चली है कि निश्छल होना सपनों में चीखने के लिए, खड़े-खड़े सोने के लिए मजबूर होना है। कहने को 'मैं हिंदू हूँ' कहानी हमें इस सच का सामना करने को तैयार करती है कि हमने अपने इर्द-गिर्द ऐसा समाज बनाया है, जहाँ हर वक्त जंग जिड़ी हुई है। कथाकार तो कहानी ही लिख सकता है। पर कितनी कहानियाँ पढ़ कर हम उन सच्चाइयों को देखने के काबिल हो पाएँगे, जो हमारी आँखों के सामने होकर भी नहीं हैं। घर-वापसी का नारा देने वाले कब जानेंगे कि हममें से हर किसी पर यह डर हावी है कि हमें मुख्यधारा से अलग मान लिया जा सकता है, हमारे अंदर कोई तड़पता हुआ मुख्यधारा में शामिल होने की जद्दोजहद में शामिल है।
'मैं हिंदू हूँ' कहानी और भी बहुत कुछ कहती है, यह हमें दिमागी कमजोरी के प्रति अपनी संवेदना की कमी को भी दिखलाती है। वही मुसलमान लड़के जो खुद को कहीं और बहुसंख्यकों में शामिल होने के कायर ख्वाब देख कर अपनी मौजूदा यातनाओं से जूझते हैं, वे अपने साथ एक अधपागल को डरा कर मजा लेते हैं। असगर सर्जनात्मक लेखन से अलग सोशल मीडिया जैसे मंचों पर अपनी दीगर टिप्पणियों में कट्टर धर्म-निरपेक्ष दिखते हैं। नाम से मुसलमानी पहचान से मजबूर, उन्होंने बार-बार हुक्मरानों को कोसा है कि उन्होंने राजनैतिक फायदों के लिए मुस्लिम तुष्टीकरण के तरीके अपनाए हैं। क्रीएटिव लेखन में उनके सरोकार सामाजिक बराबरी के लिए संघर्ष के हैं और इसमें भी उनकी धर्म-निरपेक्षता प्रखर होकर सामने आती है। "… शहर में दंगा करने वाले हिंदू और मुसलमान बदमाशों को मिला भी दिया जाए तो कितने होंगे. . . ज्यादा से ज्यादा एक ... दो हज़ार मान लो ... लाखों लोगों की जिंद़गी को जहन्नुम बनाए हुए हैं… ये तो वही हुआ कि दस हज़ार अंग्रेज़ करोड़ों हिंदुस्तानियों पर हुकूमत किया करते थे … इन दंगों से फ़ायदा किसका है … हाजी अब्दुल करीम को फ़ायदा है जो चुंगी का इलेक्शन लड़ेगा और उसे मुसलमान वोट मिलेंगे। पंडित जोगेश्वर को है जिन्हें हिंदुओं के वोट मिलेंगे… क्या हम लोगों को पढ़ा नहीं सकते? समझा नहीं सकते? … मान लो इस देश के सारे मुसलमान हिंदू हो जाएं?… मान लो इस देश के सारे हिंदू मुसलमान हो जाएं? … तो क्या दंगे रुक जाएंगे? … तो क्या … इंसान साला है ही ऐसा कि जो लड़ते ही रहना चाहता है? वैसे देखो तो जुम्मन और मैकू में बड़ी दोस्ती है। तो … हम मैकू और जुम्मन बन जाएं. . .”। सारों का हिंदू हो जाना या कि मुसलमान हो जाना इंसानियत और हैवानियत के फ़र्क को नहीं मिटा सकता। मैकू और जुम्मन हिंदू नहीं, मुसलमान भी नहीं हैं, वे महज इंसान हैं, इसलिए उनमें दोस्ती है।
असगर वजाहत का कैनवस बड़ा है। उनके उपन्यासों के अलावा छोटी-छोटी कहानियों, नाटकों में बहुत बड़ी बातें कहने की कोशिश दिखती है। उनका लेखन हमें अपनी असभ्यताओं के प्रति सचेत करता है। अक्सर उनकी कोशिश निरपेक्षता के मानदंड स्थापित करने की दिखती है, पर सचमुच उन्हें पढ़ते हुए हम यह सोचने को मजबूर होते हैं कि क्या बहुसंख्यक अस्मिता को बनाए रखते हुए किसी तरह की मुक्ति संभव भी है या नहीं! जो सच हमें शाश्वत दिखते हैं, उन पर सवाल खड़ा करते हुए ही हम मुक्ति के सही विकल्प खड़े कर पाएँगे। हमारी रोज की हँसी की अश्लीलता से मुक्त हो पाएँगे। एकता की सीख पी ए सी की बूटों की मार से नहीं, साहित्य और कला की मदद से, अपने नैतिकता के बोध से ही मिलेगी। 'हज़ारों लोगों के मारे जाने के बाद भी मुख्यमंत्री मूछों पर ताव देकर घूमता और कहता कि जो कुछ हुआ सही हुआ' का सच एक ओर है तो व्यापक जनविरोध भी है। दंगों की राजनीति होती रहेगी और हम प्रतिरोध की संस्कृति बनाते चलेंगे। इसी उम्मीद के साथ असगर वजाहत की कलम पर सवार होकर 'शाह आलम कैम्प की रूहें' हमें खुद के रूबरू कराती हैं। 'मैं हिंदू हूँ' को पढ़ते हुए यही खयाल ताकत पाते हैं।





चुपचाप अट्टहास - 32 : सुनो मेरी फुफकार

Mon, 08/05/2017 - 12:29
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 हर मुँह से हिस्स हिस्स

कितने मुँह मेरे
दो कि चार कि अनगिनत
पथरीली राहें मुझे घेरतीं
मुझे उछालतीं गगनचुंबी लहरें समंदरों की
बँधा मैं अँधेरी रातों से
हर मुँह से हिस्स हिस्स
ज़हर फेंकता।


बरछे भाले तोप कमान
कोई मेरे लगातार बढ़ते
ज़हरीले मुखों को छेद नहीं सकता
मैं काल का काला बादल
सुनो मेरी फुफकार


अँधेरे में मेरी लपलपाती जीभ
तुम्हें दिखती होगी
जैसे मोहिनी नायिका जाती अभिसार को।


Many mouths I have
Is it two or four or countless
Rocky roads are all around me
High tidal waves from the seas throw me upwards
I am bound to darkness
Hissing venom spits
From each of my mouths.


No spears or cannon balls
Can pierce my ever spreading venomous mouths
I am the dark cloud of Kala, the terror eternal,
Hear me erupt.


You can see my tongue
Brandishing in darkness
Like a courtesan going to union with her lover.

चुपचाप अट्टहास - 31

Sun, 07/05/2017 - 08:09
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'हँसो, हँसो, जल्दी हँसो।'

क्या अन्न रह सकता है अनछुआ

फल अनपका

दौड़ रहा धमनियों में जो रक्त

उसकी भी चाहत

मज्जाएं जो खाई जातीं और जो मज्जाओं के पाचन पर बनतीं

कायनात भर में चाहत के समीकरण हैं

जिस्म के रहस्यों से परे उफ़्क के कोनों तक

दौड़ रही हैं चाहतें




मैंने समेट ली धरती के हर दरिया की चाहत

गंगा के बहाव में

गंगा की मैल कैसे साफ होगी


एक बार याद करें कवि को -

'हँसो, हँसो, जल्दी हँसो।'




Can a grain be left untouched?

And a fruit unripened?

Even the blood running in the veins

Desires

Marrow that is eaten and that is made with marrow digested

Desires prevail in equations of all the universe

From the mysteries of the body to the ends of the horizons

Desires racing




I gathered within me the desires of all rivers on the Earth

With Ganga flowing

How will Ganga ever be cleansed




Remember the poet for once

“Laugh, laugh and laugh right now!”
(The quote is from a poem by Raghuveer Sahay)

कैसे न हो यह सब

Sun, 30/04/2017 - 22:56
चुपचाप अट्टहास -30

कण-कण में चाहत
हर कण चाहत
दाने की चाहत कि उसे चबाया जाए
पानी की कि पीया जाए
चाहतें पूरी करने के लिए कौन क्या नहीं करता
बीज से दाना या समंदर से बारिश तक की यात्राएं चाहत हैं
मेरी चाहत कि हुकूमत करूँ
यात्रा मेरी छोटी कैसे हो सकती
बिकना-बिकाना, कत्ल और ख़ूँ के खेल
कैसे न हो यह सब

कण-कण में  चाहत
हर कण चाहत।

Desire defines every atom
Every atom is a desire
A grain desires to be devoured
Water to be drunk
We all go far to fulfill our desires
A seed becoming a grain and the ocean transforming to rains are desires
It is my desire that I must rule
Naturally it is a long journey
To buy and to sell, to kill and to play with blood
How could I not do it all

Desire defines every atom
Every atom is a desire.

लेखक विषय संवाद साभार अनुवादक

पहले वो आए साम्यवादियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं साम्यवादी नहीं था

 

फिर वो आए मजदूर संघियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं मजदूर संघी नहीं था

 

फिर वो यहूदियों के लिए आए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं यहूदी नहीं था

 

फिर वो आए मेरे लिए

और तब तक बोलने के लिए कोई बचा ही नहीं था

 

मार्टिन नीमोलर (1892-1984)