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आइए हाथ उठाएं हम भी

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Updated: 13 hours 18 min ago

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Wed, 23/08/2017 - 20:52
संग्रह की दुंदुभी -  उम्मीद कि जल्दी ही प्रकट होगा।


कौन मेरे अंदर लगातार अट्टहास करता है

Sun, 30/07/2017 - 10:44
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चुपचाप अट्टहास -37

लोग मुझे देखते हैं
और पास से गुजर जाते हैं
छूना तक नहीं चाहते
मुझे देर तक देखना नहीं चाहते

आँखें दूर कर लेते हैं



मुझे देखते ही उनके अंदर
आग-सी धधकने लगती है
वे खुद से ही घबराने लगते हैं
उन्हें मेरी कोई जरूरत नहीं है


मुझे मेरी अपनी जरूरत है क्या
यह जो आग उनमें धधकती दिखती है
मेरे अंदर तो नहीं धधक रही


लोग ऐसे ही आएँगे गुजरते जाएंगे
जाने कितने आस्मां खुलते हैं
मैं उनमें से किसी एक को भी छू नहीं सकता


कौन मेरे अंदर लगातार अट्टहास करता रहता है
कौन मेरे अंदर जाने कितने प्रलयंकर अंधड़ बन आता है
कौन मेरे अंदर धूमकेतु-सा हो उड़ता है
कौन मेरे अंदर अनबुझ ज्वालामुखी बन फैलता है।

People look at me
And they walk by
They do not want to look at me for a long while
They take their eyes away


They look at me
And they feel a fire within
They get scared of themselves
They do not need me


Do I need myself
This fire that appears within them
Could it be burning within me


People will come and go
And there are skies that open out
I cannot touch even one of then


Who within me laughs aloud all the time
Who within me comes as a tornado again and again
Who within me flies like a comet
Who within me explodes like a volcano.

चुपचाप अट्टहास - 36: देश मेरे दिमाग में कुलबुलाता है

Sun, 02/07/2017 - 18:56
अब क्या सीखूँ
दिमाग भर चुका है
एक आदर्श की अनंत प्रतियों से
कि मैंने इस धरती को अँधेरे धुँए में बदल देना है

दिमाग में लाशें भरी हैं
मन में जो संगीत गूँजता है
वह भूखे सताए लोगों की चीखें हैं
नंगे-अधनंगे गश्त करते हैं मेरे दिमाग की धमनियों में
चीखते हुए राष्ट्रगीत।

उनके जिस्मों पर से कीड़े-मकौड़े, साँप-बिच्छू गुजरते हैं
मेरा दिमाग कीटों की बिष्ठाओं से भर गया है
गर्भपात से गिरे भ्रूण ज़हन में किलबिलाते हैं
पूरा देश मेरे दिमाग में कुलबुलाता है

सीने के आरपार जाती किरणें
मेरी अपनी छवि दिखलाती हैं अंतर्मन में
हड्डियों पर हमलावर लिंग लटकाए दिखता हूँ
चेहरा सूखे बालों से भरा होता है
अब क्या सीखूँ
इंसानियत के कत्ल की इंतहा दिखती मुझे
अपनी तस्वीर में।

What can I possibly learn now
My mind is filled
With innumerable replicas of an ideal
That I must transform this planet into a dark smoke pit.

My mind is filled with the dead
I hear music
Of the starving downtrodden
They march naked in the veins in my brains
Howling the National anthem.

Insects, snakes and scorpions, crawl on their bodies
My brain is filled with the excreta of these insects
Aborted fetuses swing around in my brain
The entire Nation wriggles in my brains

Rays piercing through and through the chest
Display  my own image in my inner mind
I appear with a violent phallus hanging on my bones
My face is filled with uncouth hair
What can I possibly learn now
I see the limits of trampled humanity
in my own image.

चुपचाप अट्टहास - 35: हर सुंदर के असुंदर को अपनाया

Thu, 29/06/2017 - 11:23
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मूँछ होती थी
काली कच्ची उम्र की
सिर पर उन दिनों के बालों के साथ जमती भली थी
आईना देखता उससे बातें करता था
कहता था कि वह कभी न गिरेगी
वह गिरी भी कटी भी
जब यह वारदात हुई
मैं दिनों तक दाँतों से नाखून काट चबाता रहा
लू में बदन तपाया
बारिश के दिन सड़कों में भीगा
हर सुंदर के असुंदर को अपनाया
इस तरह बना जघन्य
मूँछ फिर कभी खड़ी नहीं हुई
हर सुबह एक नए उस्तरे से उसे मुँड़वाता हूँ
फिर बाँट देता उस्तरा
गोरक्षकों को।


I had a moustache
dark one like a young adult
It used to match well with the hair on my head
I talked with it when looking at the mirror
I told it that it will never droop
And then it drooped and and I lost my dignity


For days I bit my nails
After it happened
I tanned my skin in blazing sun
Got drenched in pouring rain
I went for the ugly in all that is beautiful
This is how I turned ugly
The moustache never twisted upwards
Every morning I use a new razor to shave it off
And then I hand over the razor
to the cow-vigilantes.

लेखक विषय संवाद साभार अनुवादक

पहले वो आए साम्यवादियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं साम्यवादी नहीं था

 

फिर वो आए मजदूर संघियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं मजदूर संघी नहीं था

 

फिर वो यहूदियों के लिए आए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं यहूदी नहीं था

 

फिर वो आए मेरे लिए

और तब तक बोलने के लिए कोई बचा ही नहीं था

 

मार्टिन नीमोलर (1892-1984)