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Updated: 9 hours 49 min ago

१९७५ की इमरजेंसी देश की राजनीति का काला और क्रूर अध्याय है

Sat, 24/06/2017 - 08:32


शेष नारायण सिंह 
४२ साल पहले अपनी सत्ता बचाए  रखने के लिए  तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने देश में इमरजेंसी लगा दिया था.  संविधान में लोकतंत्र के  लिए बनाए गए सभी प्रावधानों को सस्पेंड कर दिया  गया था और देश में तानाशाही निजाम  कायम कर दिया गया  था. राजनीति शास्त्र के विद्यार्थी के लिए इमरजेंसी की घटनाओं को समझना हमेशा से ही बहुत ही दिलचस्प  कार्य रहा है . इमरजेंसी के बारे में पिछले  ४० वर्षों में बहुत कुछ लिखा पढ़ा  गया है लेकिन एक विषय के रूप में इसकी उत्सुकता कभी कम नहीं होती.  १९७५ के जून में इमरजेंसी इसलिए लगाई गयी थी कि इंदिरा गांधी को लग गया था की जनता का गुस्सा उनके खिलाफ फूट पड़ा है और उसको रोका नहीं जा सकता  . इसके बहुत सारे कारक थे लेकिन जब १९७४ में इलाहाबाद हाई कोर्ट के एक फैसले ने  लोकसभा की सदस्य के रूप में उनके चुनाव को ही खारिज कर दिया तो हालात बहुत जल्दी से इंदिरा गांधी के खिलाफ बन गए . इमरजेंसी वास्तव में स्थापित सत्ता के खिलाफ जनता की आवाज़ को दबाने के लिए किया  गया एक असंवैधानिक प्रयास था जिसको जनता के समर्थन से इकठ्ठा हुए राजनीतिक विपक्ष की क्षमता  ने सफल नहीं होने दिया .१९७१ में हुए मध्यावधि चुनाव में  इंदिरा गांधी को पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने का अवसर मिल गया था. लेकिन चार साल के अन्दर ही उनको  इमरजेंसी  लगाकर अपनी सत्ता बचानी  पडी,यह राजनीति का बहुत ही दिलचस्प आख्यान है . आज इमरजेंसी की बरसी पर इसी  गुत्थी को समझने की कोशिश की जायेगी .
१९७१ में भारी बहुमत से जीतने के बाद इंदिरा गांधी ने इस इरादे से काम करना शुरू कर दिया था कि अब उनके राज को कोई हटाने वाला नहीं है. बहुमत की सरकार बन जाने के बाद उन्होने जो सबसे बड़ा काम किया वह था , पाकिस्तान के  पूर्वी भाग को एक अलग देश के रूप  में मान्यता दिलवा देना.बंगलादेश की आज़ादी में भारत का योगदान  बहुत की अधिक है . पकिस्तान के साथ भारत की सेना की जीत का श्रेय इंदिरा गांधी को मिला  जोकि जायज़ भी है क्योंकि उन्होंने उसका कुशल नेतृत्व किया था .  बंगलादेश में पाकिस्तान को ज़बरदस्त शिकस्त देने के बाद इंदिरा गांधी की पार्टी  के सामने  विपक्ष की कोई हैसियत नहीं थी , जनसंघ के नेता अटल बिहारी वाजपेयी  ने तो उनको दुर्गा तक कह दिया था . शास्त्री जी द्वारा शुरू की गयी हरित क्रान्ति को  इंदिरा गांधी ने बुलंदी तक पंहुचाया था , इसलिए ग्रामीण भारत में  भी थोड़ी बहुत सम्पन्नता आ गयी थी.  कुल मिलाकर १९७२-७३ में माहौल इंदिरा गांधी के पक्ष  में था . लेकिन १९७४   आते आते  सब कुछ  गड़बड़ाने लगा .  और इसी गुत्थी को  समझने में इंदिरा गांधी की राजनीतिक विफलता और इमरजेंसी की समस्या  का हल छुपा हुआ है . इसी दौर में इंदिरा गांधी के दोनों बेटे बड़े हो गए थे . बड़े बेटे  राजीव गांधी थे जिनको इन्डियन एयरलाइंस में पाइलट की नौकरी मिल गयी थी और वे अपनी पत्नी और दो बच्चों के साथ  संतुष्टि का जीवन बिता रहे थे . छोटे बेटे संजय गांधी थे जिनकी पढाई लिखाई ठीक से  नहीं  हो पाई थी और वे पूरी तरह से माता पर ही  निर्भर थे . इस बीच उनकी शादी भी हो गयी थी . कोई काम नहीं था . इंदिरा जी के एक दरबारी  बंसी लाल थे जो हरियाणा के  मुख्यमंत्री थे. उन्होंने संजय गांधी को एक छोटी कार कंपनी शुरू करने की प्रेरणा दी. मारुति लिमिटेड नाम की इस कंपनी को उन्होंने दिल्ली से सटे  गुडगाँव में ज़मीन अलाट कर दी .संजय गाँधी की शुरुआती योजना यह थी कि उद्योग जगत में सफलता हासिल करने के बाद राजनीति का रुख किया जायेगा लेकिन ऐसा नहीं हुआ . मारुति के  कारोबार में वे बुरी तरह से असफल रहे. उसी दौर में दिल्ली के उस वक़्त के काकटेल सर्किट में सक्रिय लोगों ने उनसे मित्रता कर ली .संजय  गांधी के नए  मित्रों ने उन्हें कमीशन खोरी के धंधे में लगा दिया .इस सिलसिले में वे इंदिरा गाँधी के कुछ चेला टाइप अफसरों के सम्पर्क में आये और नेता बन गए. भारतीय राजनीति का सबसे काला अध्याय संजय गाँधी के साथ ही शुरू होता है. इसी के साथ ही इमरजेंसी  की भूमिका बनी और संविधान को दरकिनार करके इमरजेंसी लगा दी गयी .
इमरजेंसी के राज में बहुत ज्यादतियां हुईं नतीजा यह  हुआ कि १९७७ का चुनाव कांग्रेस बुरी तरह से हार गयी .  कांग्रेस ने बार बार इमर्जेंसी की ज्यादतियों के लिए माफी माँगी लेकिन इमरजेंसी को सही ठहराने से बाज़ नहीं आये . २०१० में  कांग्रेस के 125 पूरा करने के बाद इमरजेंसी को गलत कहते हुए कांग्रेस ने दावा किया कि  उसके लिए संजय गाँधी ज़िम्मेदार थे , इंदिरा गाँधी नहीं .  ऐसा शायद इसलिए किया जा रहा है कि संजय गांधी के परिवार के  लोग आजकल बीजेपी में हैं .  उनकी पत्नी तो केंद्रीय मंत्री  हैं जबकि बेटा भी सांसद है और पार्टी के  महामंत्री पद भी रह चुका  है .जहां तक इमरजेंसी का सवाल है ,उसके लिए मुख्य रूप से इंदिरा गाँधी ही ज़िम्मेदार हैं और इतिहास यही मानेगा . इमरजेंसी को लगवाने और उस दौर में अत्याचार करने के लिए संजय गाँधी इंदिरा से कम ज़िम्मेदार नहीं है लेकिन यह ज़िम्मेदारी उनकी अकेले की नहीं है . वे गुनाह में इंदिरा गाँधी के पार्टनर हैं .यह इतिहास का तथ्य है . अब इतिहास की फिर से व्याख्या करने की कोशिश न केवल हास्यास्पद है बल्कि अब्सर्ड भी है .
 नरेंद्र मोदी के आने के बाद तो खैर विमर्श की भाषा बदल गेई है और संजय गांधी के पक्ष  या विपक्ष में  कोई ख़ास तर्क वितर्क नहीं दिए जाते लेकिन इसके पहले अडवाणी युग में संजय गांधी को इमर्जेंसी के अपराधों से मुक्त करने की कोशिश बहुत   ही गंभीरता से चल रही थी.  इसको विडंबना ही माना जाएगा क्योंकि  दुनिया जानती है कि इंदिरा गांधी के खिलाफ जयप्रकाश नारायण के आन्दोलन को उन प्रदेशों में ही सबसे ज्यादा ताक़त मिली थी जहां आर एस एस का संगठन मज़बूत था . आज की बीजेपी को उन दिनों जनसंघ के नाम से जाना जाता था. इमरजेंसी की प्रताड़ना के शिकार आज की बीजेपी वाले ही हुए थे. अटल बिहारी वाजपेयी ,लालकृष्ण आडवाणी , अरुण जेटली आदि  बीजेपी नेता  जेल में थे . यह सज़ा उन्हें संजय गाँधी की कृपा से ही मिली थी. यह बात बिलकुल सच है और इसे कोई भी नहीं झुठला सकता . बाद में  लाल कृष्ण आडवानी के नेतृव में बीजेपी वालों ने संजय गाँधी को इमरजेंसी की बदमाशी से बरी करने की कोशिश बड़े पैमाने पर की थी. लाल कृष्ण आडवाणी ने तो यहाँ तक कह दिया था कि इमरजेंसी अपराधों के लिए संजय गाँधी को बलि का बकरा बनाने की कोशिश की जा रही है ..अपने बयान में आडवाणी ने कहा था कि , 'अपने मंत्रिमंडल या यहां तक कि अपने कानून मंत्री और गृहमंत्री से संपर्क किए बगैर उन्होंने [इंदिरा गांधी ने] लोकतंत्र को अनिश्चितकाल तक निलंबन में रखने के लिए राष्ट्रपति फखरूद्दीन अली अहमद से अनुच्छेद 352 लगवाया।' उनका कहना है कि इंदिरा गांधी इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला पचा नहीं पाईं और उन्होंने आपातकाल लगा दिया।
 इमरजेंसी  में सारे नागरिक अधिकारों को ख़त्म कर दिया गया था . जेल में डाले गए लोगों की संख्या एक लाख 10 हजार आठ सौ छह थी। उनमें से 34 हजार 988 आतंरिक सुरक्षा अधिनियम के तहत हिरासत में लिए गए लेकिन कैदी को उसका कोई आधार नहीं बताया जाता था . पिछले ४२ वर्षों में इमरजेंसी , उसकी ज्यादतियों और उसके पक्ष और  विपक्ष में बहुत कुछ लिखा पढ़ा जा चुका है . बीजेपी की योजना है कि कांग्रेस मुक्त भारत के अपने  सपने को पूरा  करने के लिए पार्टी पूरी तरह से  राहुल गांधी की दादी की इतनी कमियाँ  गिनाएगी कि जनता इन्दिरा गांधी को ही इमर्जेंसी  की ज़िम्मेदार माने . जनता और इतिहास उनको ज़िम्मेदार मानता है लेकिन इमरजेंसी की बात जब भी होगी इंदिरा गांधी के साथ संजय गांधी का नाम जरूर लिया जाएगा. अब  संजय गांधी का परिवार बीजेपी में बड़े  पदों पर  है तो उनके खिलाफ  बोलने से बीजेपी वाले कैसे बच सकेंगे
इमरजेंसी का सबक यह है कि चाहे जितना भारी बहुमत हो अगर केवल नारों का सहारा लिया जाएगा तो जनता १९७१ की भारी जीत और बांग्लादेश  की विजय के तमगे को भी नज़रंदाज़ कर देती है. इमरजेंसी के बाद जब जनता पार्टी आई तो वह किसी पार्टी की जीत  नहीं थी. वह जनता की ताक़त थी जिसने आपस में  लड़ रहे विपक्ष को एक साथ खड़े होने को मजबूर कर दिया , उनकी नई पार्टी को   जिता दिया, सरकार बनवा दी  और जनता के  साथ किए गए वायदों को पूरा न करने की सज़ा इंदिरा गांधी और उनकी पार्टी को दे दी. सच्ची बात यह  है कि जब  जनता पार्टी की जीत हुयी थी तब तक पार्टी भी नहीं बनी थी और १९७७ के दौरान जिस चुनाव निशान से  जनता  पार्टी के लोग चुनाव जीत कर आये थे वह चौधरी चरण सिंह   की भारतीय लोकदल का चुनाव निशान, " हलधर किसान " था. इमरजेंसी का सबसे बड़ा सबक यही  है , जनता को गरीबी हटाने के वायदा करके इंदिरा गांधी ने १९७१ में  भारी बहुमत पाया था और जब उन्होंने  वायदा पूरा करने की कोशिश   भी नहीं की और अलग तरह से देश की अवाम को प्राभावित करने की  कोशिश की तो खंडित विपक्ष के बावजूद भी देश ने राजनीति संन्यास ले चुके जयप्रकाश नारायण को सन्यास से बाहर आने को मजबूर किया और  इंदिरा गांधी की स्थापित सत्ता के खिलाफ एक मज़बूत  विपक्ष  तैयार कर दिया 

किसान आन्दोलन और विपक्षी एकता तय करेगी भावी राजनीति की दिशा

Wed, 21/06/2017 - 04:59


शेष नारायण सिंह

देश की राजनीति में ज़बरदस्त गतिविधियाँ चल रही हैं , प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सत्ता के तीन साल पूरे होने पर उनकी पार्टी पूरे  देश में मोदी फेस्ट नाम से त्यौहार मना रही है . मीडिया में प्रधानमंत्री को समर्थन खूब मिल रहा है , सभी सरकारी विभाग भी मोदी फेस्ट में अपना योगदान कर रहे हैं . जिन राज्यों में बीजेपी की सरकारें हैं वहां भी  मोदी जी का त्यौहार  मनाया जा  रहा  है. इसी बीच राष्ट्रपति का कार्यकाल ख़त्म होने वाला है सो नए राष्ट्रपति के चुनाव  के लिए नई दिल्ली में राजनीतिक सरगर्मियां तेज़ हो गयीं हैं .  राष्ट्रपति के चुनाव के लिए जो एलेक्टोरल कालेज है  उसमें सत्ताधारी गठबंधन  का बहुमत है इसलिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जिसको चाहेंगे , वह आराम से राष्ट्रपति पद की कुर्सी पर २५ जुलाई को बैठ जाएगा लेकिन विपक्षी पार्टियों से सहमति बनाने के लिए बीजेपी अध्यक्ष ने  तीन केन्द्रीय मंत्रियों की एक समिति बना दी है जो विपक्षी दलों से बातचीत करके राष्ट्रपति का चुनाव निर्विरोध  कराने की कोशिश में जुट गई है .तीन साल पूरे होने पर नरेंद्र मोदी के पक्ष में ख़ासा माहौल है . बीजेपी का दावा  है कि यह नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता के कारण है , पार्टी के समर्थक और  कुछ मीडिया संस्थान  भी यही मानते हैं . आमतौर पर माना जा रहा  है कि जिन लोगों ने २०१४ में नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बनवाने के लिए वोट दिया था , वे अभी भी उनके समर्थन में हैं . उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में  उनकी पार्टी को जो सफलता मिली  है वह भी इसी तरफ संकेत करती है . थोक महंगाई की दर भी बहुत कम हो गयी है और टेलिविज़न चैनलों पर  बीजेपी प्रवक्ता इसको बहुत ही करीने से देश दुनिया को समझा रहे हैं . लेकिन जानकार बता रहे हैं कि थोक बाज़ार में सब्जियों के दाम  बहुत ही नीचे आ  गए हैं और किसानों को औने पौने दामों पर बेचना पड़ रहा है . इसलिए थोक दाम बहुत ही नीचे आ गए हैं .दर असल बीजेपी के त्योहारी माहौल को किसानों के आन्दोलन वाली की  मुसीबतें  बहुत ही मुश्किल में डाल रही हैं .चुनाव के दौरान किसानों की भलाई के  लिए नरेंद्र मोदी ने बहुत ही आकर्षक वायदे किये थे . यह वायदे २०१३-१४ के लोकसभा चुनाव के प्रचार के दौरान भी किये गए थे और उसके बाद हुए राज्यों के चुनावों में भी किये गये . उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री ने तो क़र्ज़ माफी वाला मोदी जी का वायदा पूरा  करने की दिशा में बहुत ही महत्वपूर्ण क़दम भी उठा लिया है . मंत्रिमंडल की बैठक में  फैसला ले लिया गया है कि किसानों का क़र्ज़ माफ़ कर दिया जाएगा. प्रधानमंत्री के वायदों  का लुब्बो लुबाब यह था कि किसानों की आमदनी डेढ़ गुना कर दी जायेगी और उनके क़र्ज़ माफ़ कर दिए जायेगें . तीन साल तक तो  इस  मुद्दे पर कोई ख़ास चर्चा नहीं हुयी लेकिन जब उत्तर प्रदेश में  किसानों की क़र्ज़ माफी की घोषणा हो गयी तो कई राज्यों में  किसानों का आन्दोलन शुरू हो गया . तमिलनाडु में तो आन्दोलन पत्तर प्रदेश की क़र्ज़ माफी  की घोषणा के पहले  ही से चल रहा था और उस को  पूरी दुनिया का मीडिया कवर भी  कर रहा था. उत्तर प्रदेश के फैसले के बाद तो महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश में ज़बरदस्त आन्दोलन शुरू हो गया . महाराष्ट्र में करीब दो हफ्ते तक चले आन्दोलन के बाद जब राज्य सरकार को समझ में आ गया कि इस बार किसान कुछ लेकर ही जायेगें तो वहां भी आंशिक क़र्ज़ माफी की दिशा में  एक कमेटी बना कर पहला क़दम उठा  लिया  गया . हालांकि कई जानकार मानते हैं कि महाराष्ट्र सरकार ने   मामले को थोडा टालने के  लिए यह क़दम उठाया है . यह ऐसा मुद्दा है जिसपर आने वाले समय  में तय होगा कि सरकार की नीयत क्या थी. जब वक़्त आयेगा तो उसकी भी व्याख्या कर ली जायेगी . बहरहाल अभी समस्या यह  है कि प्रधानमंत्री और उनकी पार्टी को जिस सबसे बड़े वर्ग ने उनके वायदों पर विश्वास करके वोट दिया था वह अभी नाराज़ है और आन्दोलन के   रास्ते पर है .  किसानों  का आन्दोलन समकालीन भारत के राजनीतिक इतिहास की बहुत बड़ी  घटना बन गया  है क्योंकि मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह  चौहान ने मंदसौर के  आन्दोलन को बहुत बिगाड़ दिया . शुरू में उनके गृहमंत्री ने बयान दे दिया कि जिन किसानों की मंदसौर में मौत हुयी है , उनको पुलिस ने गोली नहीं मारी  . बाद में गृहमंत्री  महोदय ने बयान बदला और यह कहा कि पुलिस   ने ही  किसानों की   हत्या की  लेकिन साथ  ही  यह भी प्रचार होने लगा कि जो लोग मरे हैं वे ठीक आदमी नहीं थे . उनकी इस  बात को भी बेमतलब सरकार ने ही साबित कर दिया जब  सरकार ने मरे हुए किसानों के परिवार के लिए एक-एक करोड़ रूपये की सहायता की घोषणा कर दी .  बाद में मुख्यमंत्री जी अनशन पर भी बैठ गए .वहीं  अनशन स्थल पर ही किसानों ने भी धरना दे दिया लेकिन शिवराज सिंह चौहान की वीरता की तारीफ़ करनी होगी  इस माहौल में  ही उसी  उपवास वाले  महंगे और भारी पंडाल में अपनी  पत्नी का जन्मदिन भी मनाया . कुल मिलाकर मध्यप्रदेश में  किसानों के आन्दोलन की समस्या को शिवराज सिंह चौहान ने इतना खराब कर दिया कि केंद्रीय नेतृत्व उनसे खासा   नाराज़ बताया जा रहा है . मध्य प्रदेश के किसान आन्दोलन से होने वाले नुक्सान को शिवराज सिंह ने काबू में करना तो दूर , उसको बढ़ने के लिए बहुत सारे अवसर उपलब्ध कराये .  यह तो उनकी  क़िस्मत अच्छी थी कि जितना नुक्सान होना था वह नहीं हुआ क्योंकि मध्य प्रदेश की मुख्य  विपक्षी पार्टी कांग्रेस ने किसानों के आन्दोलन से मिलने वाली पूंजी को तितर बितर  कर दिया . पार्टी के आला नेता राहुल गांधी के सबसे  करीबी दोस्त और मध्य  प्रदेश में उनके आघोषित  प्रतिनिधि , ज्योतिरादित्य सिंधिया उसी दिन अमरीका चले गए . जब राज्य कांग्रेस की चिंता करने वाले  उनके कुछ करीबी लोगों ने कहा कि आपको इस वक़्त मंदसौर में होना चाहिए क्योंकि वहां जनता मुसीबत में है तो  बताते हैं कि उन्होंने कहा कि उनका अमरीका जाना बहुत ज़रूरी है . उसके बाद राहुल  गांधी  मंदसौर गए लेकिन वहां से जल्दी जल्दी  वापस आ  गए . उनके करीबी सचिन पाइलट ने उनको समझा दिया कि मंदसौर में रुकना ठीक नहीं है  जबकि जे डी ( यू ) के बड़े नेता शरद यादव भी साथ गए थे और वे आन्दोलन में शामिल होने के मूड में थे .वहां से आकर राहुल गांधी विदेश यात्रा पर  चले गए जिसको कुछ मीडिया संगठन बड़ा मुद्दा  बना रहे हैं . जो भी हो राहुल गांधी और ज्योतिरादित्य सिंधिया की निष्क्रियता के कारण बीजेपी की वह दुर्दशा होने से बच गयी जो कि इतने बड़े आन्दोलन के बाद हो सकती थी.किसान आन्दोलन के राजनीतिक परिणाम अभी नहीं आये हैं , अभी समय लगेगा . प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने  किसानों को जो वायदे किये थे उनकी लिस्ट बड़ी  है लेकिन जो मुख्य मुद्दे   हैं वे  खेती करने वालों की आमदनी को डेढ़ गुना  करना और क़र्ज़ माफी मुख्य  हैं . जहां तक क़र्ज़ माफी का सवाल है उसपर तो सरकार के लिए  खासी  मुश्किल आने वाली है .  पूरे देश में किसानों पर बारह लाख  साठ हज़ार करोड़ रूपये का क़र्ज़ है जिसमें से अभी उत्तर प्रदेश  सरकार ने ३६ हज़ार करोड़ की कर्जमाफी की दिशा में पहल   शुरू कर दी है. यह अलग बात है कि उसके लिए केंद्र से कोई सहायता नहीं मिलने वाली है . राज्य के मुख्यमंत्री  योगी आदित्यनाथ दिल्ली आये थे . उनको वित्त मंत्री अरुण जेटली ने  बता दिया कि क़र्ज़ माफी के  लिए उनको केंद्र सरकार से कोई मदद नहीं मिलने वाली है . उत्तर प्रदेश सरकार ने बांड जारी करके धन का इंतज़ाम करने की कोशिश की जिसके लिए रिज़र्व बैंक ने अनुमति ही नहीं  दिया . इसका मतलब यह है कि उत्तर प्रदेश में भी  किसानों की क़र्ज़ माफी  को विपक्षी राजनीतिक मुद्दा बना सकते हैं . यहाँ का विपक्ष मध्यप्रदेश जैसी हालत में नहीं है. यहाँ अखिलेश यादव विपक्ष के  मुख्य नेता हैं और वे मौके की तलाश में बैठे हैं . उन्होंने एक प्रेस वार्ता में भी कहा था कि जब सरकार गलती करेगी तो जनता का पक्ष वे राजनीतिक बहस के  दायरे में लाने में संकोच नहीं करगें . अखिलेश यादव ने अपने परिवार की मुख्य विरोधी , बसपा नेता मायावती की तरफ भी समझौते का हाथ बढ़ा दिया है . उनके चाचा और पार्टी के बड़े नेता  शिवपाल सिंह यादव भी अब समाजवादी पार्टी में हाशिये पर हैं . दर असल मायावती को अपमानित करने के लिए शिवपाल यादव की अगुवाई में ही करीब २२ साल पहले गेस्ट हाउस काण्ड हुआ था . लगता है कि अखिलेश यादव मायावती को गेस्ट हाउस काण्ड की यादों की तकलीफ से बाहर  लाने की कोशिश कर रहे हैं . अगर इन दोनों की एकता हो जाती है और किसानों की क़र्ज़ माफी के मुद्दे पर योगी सरकार की परेशानियां कम  नहीं होतीं तो बीजेपी के लिए उत्तर प्रदेश में राजनीतिक रूप से मुश्किलें पेश आना शुरू हो  जायेंगीं.बीजेपी को मंडल कमीशन से लाभ पाने वाली जातियों की एकता हमेशा परेशान करती रही है. पिछले लोकसभा चुनाव में अपने तब के प्रधानमन्त्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र  मोदी को बीजेपी ने सफलता पूर्वक ओबीसी के रूप में पेश कर दिया था जिसका राजनीतिक लाभ उनको मिला . अगर किसी  राजनीतिक परिस्थिति में ओबीसी जातियों की एकता हो जाती  है तो बीजेपी का मोदी फेस्ट वह राजनीतिक फायदा नहीं ला पायेगा जिसकी उम्मीद में इतना बड़ा आयोजन किया गया है. ओबीसी एकता के राजनीतिक नुक्सान से बीजेपी का आला नेतृव वाकिफ है .  सबको मालूम है कि इस राजनीतिक एकता के सबसे बड़े  शिल्पी लालू प्रसाद यादव ही हैं . हालांकि आजकल उनके परिवार के ऊपर कई तरह की जांच चल रही है  ,  मीडिया में भी उनकी बहुत सारी कमियों को हाईलाईट किया जा रहा है लेकिन जो लालू यादव को जानते हैं , उनको मालूम है कि राजनीतिक पार्टियों की एकता के सबसे बड़े अलमबरदार लालू यादव ही हैं .ऐसे माहौल में जब बहुत सारी राजनीति माहौल में विद्यमान है तो आने वाले दो साल बहुत ही  दिलचस्प होने वाले हैं .ऐसा लगता है  कि  राष्ट्रपति चुनाव के हवाले अगले एक महीने में ही आने वाले दो वर्षों की राजनीति की रूप रेखा तय हो जायेगी . किसान आन्दोलन और  विपक्षी पार्टियों की एकता  देश की दो साल की राजनीति में  अहम भूमिका निभाने वाली है .

विकास के शोषण के रास्ते को नकार कर गांधी के रास्ते चलना होगा.

Sat, 10/06/2017 - 07:45


शेष नारायण सिंह

मध्य प्रदेश में  किसानों के लोकतांत्रिक विरोध प्रदर्शन पर सरकार ने गोलियां चलाकर कम से कम पांच किसानों को मार डाला है , अभी घायल लोग अपनी ज़िंदगी की लड़ाई लड़ रहे हैं .राज्य के  मुख्यमंत्री ने बताया है कि जिन लोगों को मारा गया है वे कांग्रेसी कार्यकर्ता थे. जिन को मारा गया है उनके परिवार वालों  को एक एक कारोड़ रूपये की सरकारी सहायता भी देने की घोषणा की गयी है .  सत्ताधारी पार्टी के नेता लोग दावा कर रहे हैं कि मरने वाले गुंडे थे . सरकार की तरफ से इस दिशाभ्रम पर बहुत सारे सवाल पैदा होते हैं और वे पूछे जाने चाहिए . विपक्ष की कहीं कोई खबर नहीं आ रही है . कांग्रेस के ऊपर तोड़ फोड़ का आरोप बीजेपी वाले ऐलानियाँ लगा रहे हैं लेकिन कांग्रेस की तरफ से कोई राजनीतिक बयान नहीं आया है . आमतौर पर जो कुछ भी कांग्रेसी नेता लोग कह रहे हैं उसको प्रतिक्रिया  की  श्रेणी में  रखा जा सकता है . मध्य प्रदेश की मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के सचिव बादल सरोज का बयान आया है और उन्होंने राज्य में  किसानों समेत अन्य राजनीतिक पार्टियों को लामबंद करना शुरू कर दिया है . सी पी एम के बयान में कहा गया है कि "  पीपल्या मंडी जिला मंदसौर में जैन मंदिर के सामने, बही पार्श्वनाथ फंटा (तिराहा) पर आंदोलनरत किसानों पर भीषण गोलीचालन की खबर विचलित कर देने वाला समाचार  है।  पुलिस द्वारा की गयी इस गोलीबारी  में अपुष्ट समाचारों के अनुसार तीन किसान मारे गए हैं तथा कोई दर्जन भर घायल हुए हैं। सीपीएम बेहद शर्मनाक मानती है कि जिस सरकार के मुख्यमंत्री ने इतने दिनों से शांतिपूर्ण तरीके से अपनी जायज मांगों को लेकर आंदोलनरत किसानों से कोई संवाद तक करना जरूरी नहीं समझा उलटे उन्हें अपमानित और लांछित करने वाली बयानबाजी करते रहे - उसी सरकार के गृह मंत्री द्वारा इस गोलीबारी पर कथित रूप से बयान दिया है कि किसानों ने खुद ही गोली मार ली होगी।  यह संवेदनहीनता और अशिष्टता की पराकाष्ठा है। ऐसे गृहमंत्री को बर्खास्त किया जाना चाहिए। 
किसान का बेटा होने का दावा करने वाले मुख्यमंत्री में  ज़रा भी नैतिकता है तो उन्हें इस्तीफा दे देना चाहिए। " इसके बाद शिवराज सरकार का राजनीतिक विरोध शुरू हो गया  है . खबर है कि कांग्रेस वाले भी कुछ कर रहे  हैं .
मध्यप्रदेश में तो  गोली चल गयी तो बड़ी खबर बन गयी लेकिन देश के कई  राज्यों में सरकारों के खिलाफ किसानों का आन्दोलन चल रहा है . महाराष्ट्र में तो एक दिन खबर आई कि आन्दोलन में समझौता हो गया है और किसानों ने अपना संघर्ष वापस ले लिया है . बाद में पता चला कि वह खबर गलत थी. हुआ यों था कि बीजेपी के सहयोगी एक किसान संगठन के लोग भी आन्दोलन में शामिल हो गए थे और जब  संघर्ष जोर पकड़ने लगा तो उन  लोगों ने सरकार से समझौता कर लिया . जब असली आन्दोलन के नेताओं को पता चला तो समझौता करने वाले नेताओं को अलग करके फिर से संघर्ष  शुरू हुआ.  संघर्ष जारी है .इसके पहले महाराष्ट्र के किसान आन्दोलन में सत्ताधारी पार्टी के प्रिय , अन्ना  हजारे भी शामिल होने के  फ़िराक में थे लेकिन उनको भी भगाया गया क्योंकि  किसानों को मालूम है  अन्ना हजारे  बीजेपी के बहुत करीबी माने जाते हैं .उनको यह भी पता है कि जो भी मिलेगा,  संघर्ष से ही मिलेगा क्योंकि १९९१ के बाद से डॉ मनमोहन सिंह ने अर्थव्यवस्था को पूंजीवादी विकास के पक्ष में खड़ा कर दिया है और उसके बाद से देश की सरकारें कल्याणकारी राज्य की  सीमा से  बाहर हो गयी हैं और बड़ी पूंजी की  पोषक सरकारें बन गयी हैं .  हर   सरकार का घोषित उद्देश्य बड़े औद्योगिक विकास को बढ़ावा देना है क्योंकि उनकी समझ  में औद्योगीकरण को विकास की मुख्य    धारा में रखने से ही देश और अर्थव्यवस्था ढर्रे पर चलेगी. पूंजीवादी विकास में गरीब आदमी या ग्रामीण आदमी की भूमिका केवल उपभोक्ता की होती है .किसान  खेती से जो भी उत्पादन करता है उसपर पूंजी का पूरी तरह नियंत्रण होता है और ग्रामीण इंसान औद्योगिक विकास का कच्चा माल भर होता है .  यहाँ यह देखना दिलचस्प होगा कि कोई भी प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री इस सांचे के बाहर नहीं जा सकता .  हां यह ज़रूर है कि किसान और गरीब का  नाम लोकसभा या  विधानसभा में बहुमत हासिल करने के लिए किया जाता है क्योंकि १२५ करोड़ लोगों  में उनका बहुत है और वे सरकार बनाने लायक बहुमत दे  सकते हैं . इसीलिये  किसानों की मुख्य समस्याएं चुनाव  अभियान के दौरान विमर्श का मुख्य विषय होती हैं और  चुनाव के बाद उनको टाल दिया जाता है . शिवराज सिंह  या नरेंद्र मोदी की  सरकार के लिए वे प्राथमिकता सूची से  बाहर रहती हैं क्योंकि किसानों  के कल्याण की योजनायें केवल  जुमला होती हैं , मनमोहन सिंह के आर्थिक दर्शन की अनुयाई कोई भी पार्टी  किसानों के भले के लिए कोई आर्थिक नीति बना ही नहीं सकती. चुनावी शिकंजे में किसान की बहुसंख्यक  वोट शक्ति को  फंसाने के लिए किसान की भलाई के नारे लगाए जाते हैं .
वास्तव में आज किसान जिस दुर्दशा  को झेल रहा है , महात्मा गांधी को उसका अनुमान शुरू से था. उन्होंने  देखा था कि किस तरह से ब्रिटिश साम्राज्य ग्रामीण क्षेत्रों और वहां रहने वालों का शोषण कर रहा था. सारी सरकारी स्कीमें बड़े और आद्योगिक शहरों या अंग्रेजों की सैरगाहों के लिए होती थीं. ऐसा इसलिए होता था कि औद्योगिक उत्पादन अंग्रेजों की शोषण की बुनियादी अवधारणा थी. इसीलिये गाँधी जी ने बताया था कि स्वतंत्र भारत में विकास की यूनिट गावों को रखा जाएगा. उसके लिए सैकड़ों वर्षों से चला आ रहा परंपरागत ढांचा उपलब्ध था . आज की तरह ही गावों में उन दिनों भी गरीबी थी .गाँधी जी ने अपनी किताब ग्राम स्वराज्य में लिखा है कि   " आर्थिक विकास की ऐसी तरकीबें ईजाद की जाएँ जिस से ग्रामीण इलाकों में रहने वाले लोगों की आर्थिक दशा सुधारी जा सके और उनकी गरीबी को ख़त्म करके उन्हें संपन्न बनाया सके.. अगर ऐसा हो गया तो गाँव आत्मनिर्भर भी हो जायेंगें और राष्ट्र की संपत्ति और उसके विकास में बड़े पैमाने पर योगदान भी करेंगें . " उनका यह दृढ विश्वास था कि जब तक भारत के लाखों गाँव स्वतंत्र ,शक्तिशाली और स्वावलंबी बनकर राष्ट्र के सम्पूर्ण जीवन में पूरा भाग नहीं लेते ,तब तक भारत का भावी उज्जवल हो ही नहीं सकता ....

लेकिन ऐसा हुआ नहीं. महात्मा गाँधी की सोच को राजकाज की शैली बनाने की सबसे ज्यादा योग्यता सरदार पटेल में थी . देश की बदकिस्मती ही कही जायेगी कि आज़ादी के कुछ महीने बाद ही महात्मा गाँधी की मृत्यु हो गयी और करीब २ साल बाद सरदार पटेल चले गए.. उस वक़्त के देश के नेता और प्रधान मंत्री जवाहरलाल नेहरु ने देश के आर्थिक विकास की नीति ऐसी बनायी जिसमें गावों को भी शहर बना देने का सपना था. उन्होंने ब्लाक को विकास की यूनिट बना दी.यहीं से गलती का सिलसिला शुरू हो गया..ब्लाक को विकास की यूनिट बनाने  का सबसे बड़ा नुकसान यह हुआ कि गाँव का विकास गाँव वालों की सोच और मर्जी की सीमा से बाहर चला गया और सरकारी अफसर ग्रामीणों का भाग्यविधाता बन गया. फिर शुरू हुआ रिश्वत का खेल और ग्रामीण विकास के नाम पर खर्च होने वाली सरकारी रक़म ही राज्यों के अफसरों की रिश्वत का सबसे बड़ा साधन बन गयी जो आज तक जारी है . नेहरू के बाद की सरकारें भी उसी रास्ते चलती रहीं लेकिन नेहरू की आर्थिक विकास की सोच में बड़े उद्योगों पर सरकारी नियंत्रण को प्रमुखता दी गयी थी. जिससे मुकामी पूंजीवादी उद्योगपति देश के आर्थिक विकास का लाभ तो ले सकते थे लेकिन देश की अर्थव्यवस्था को कंट्रोल नहीं कर सकते थे.डॉ मनमोहन सिंह ने जिस आर्थिक विकास की बुनियाद रखी उसके बाद बड़ी पूंजी के मालिकों  को अर्थव्यवस्था पर नियंत्रण करने के बहुत   अधिक अवसर मिल गए. आज जब लोग कुछ उद्योगपतियों द्वारा लाखों करोड़ रूपया डकार जाने की बात करते हैं तो उनको पता होना चाहिए कि पूंजीवादी आर्थिक विकास में  धन का मालिक औद्योगिक विकास पर तो नियंत्रण रखता है ,वह यह भी सुनिश्चित करता  है कि जो भी सरकारें जहां भी हों वे केवल और केवल उसके  हित में काम करें. मध्यप्रदेश , तमिलनाडु ,महाराष्ट्र, कर्नाटक,  राजस्थान, छतीसगढ़ आदि के सरकारें पूंजीपति वर्ग के हित में काम  कर रही हैं और वह अपनी तथाकथित विकास की नीतियों को लागू कर रही हैं . और जब उस मार्ग में कोई भी वर्ग बाधा डालने की कोशिश  करेगा तो उसको दण्डित किया जाएगा. मध्य प्रदेश के पीपल्या में सरकारी गोली  से हुयी किसानों की हत्या उसी पूंजीवादी अर्थशास्त्र को लागू करने की कोशिश है . जब तक लोगों की समझ में यह नहीं आयेगा कि सरकारें पूंजीवादी ताक़तों के हित में काम करती हैं तब तक किसी बदलाव की उम्मीद करना बहुत मतलब नहीं रखता.जिस तरह की सरकारों  की स्थापना १९९२ के बाद इस देश में होना शुरू हुयी है ,उनका उद्देश्य ही पूंजी पर आधारित विकास को बढ़ावा देना  है, औद्योगीकरण के विकास के लिए धन  और अवसर उपलब्ध कराना है . और  हर सरकार वही कर रही है . अगर इस   रास्ते से देश को बचाना होगा तो वैकल्पिक आर्थिक विकास  की बात करनी होगी जिसमें किसान और खेती को विकास की बुनियाद माना जाए, विकास का कच्चा माल नहीं . इसके लिए फिर से गांधी के  रास्ते पर लौटना होगा. ज़ाहिर है न्यस्त स्वार्थ ऐसा होने नहीं देगें लेकिन ब्रिटिश साम्राज्यवाद भी तो गांधी को वह नहीं करने देना चाहता था . लेकिन  गांधी  की बात मानी गयी और अंग्रेजों को जाना पड़ा . ऐसा इसलिए संभव हुआ कि महात्मा गांधी के साथ आम आदमी की ताकत थी . गांधी के   रास्ते पर दुबारा आर्थिक विकास को लाने के लिए गांधी का रास्ता ही अपनाना पडेगा .

२०१८ में होने वाले कर्नाटक विधानसभा चुनाव की पेशबंदी शुरू

Wed, 07/06/2017 - 07:07



शेष नारायण सिंह

कर्णाटक विधान सभा का चुनाव मई २०१८  में होने की संभावना है . लेकिन राज्य में  अभी से चुनाव की तैयारी  पूरी शिद्दत से शुरू ही गयी है . बीजेपी ने भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों के बाद  तत्कालीन मुख्यमंत्री येदुरप्पा को हटा दिया था  लेकिन अब उनको फिर वापस लाकर राज्य में पार्टी की कमान थमा दिया है . पार्टी में भारी मतभेद हैं  लेकिन  पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ने उम्मीद का दिया जला दिया है . अमित शाह मूल रूप से आशावादी हैं . उन्होंने आशा की किरण तो  त्रिपुरा और केरल में भी दिखाना शुरू कर दिया है , कर्नाटक में तो खैर उनकी अपनी सरकार थी.अब बीजेपी को राजनीतिक जीवन में शुचिता भी बहुत ज़्यादा नहीं चाहिए क्योंकि हाल के यू पी और उत्तराखंड के  विधानसभा चुनावों में पार्टी ने कांग्रेस सहित विपक्षी पार्टियों के उन नेताओं को टिकट दिया और मंत्री बनाया जिनके खिलाफ बीजेपी के ही प्रवक्ता गण गंभीर भ्रष्टाचार के आरोप लगाते रहे हैं . गोवा और मणिपुर में भी जिस स्टाइल में सरकारें बनायी  गयीं, वह भी बीजेपी की पुरानी वाली शुचिता की राजनीति से बहुत दूर माना जा रहा है . इस पृष्ठभूमि में जब दोबारा येदुरप्पा को कर्नाटक की पार्टी सौंपने का  फैसला आया तो कोई ख़ास चर्चा नहीं हुयी.कर्नाटक की प्रभावशाली जाति लिंगायत से आने वाले  येदुरप्पा का प्रभाव राज्य में है . यह बात और साफ़ हो गयी थी जब उन्होंने बीजेपी से  अलग होने के बाद अपनी पार्टी बनाकर चुनाव को ज़बरदस्त तरीके से प्रभावित किया था . बीजेपी को उम्मीद है कि लिंगायत समूह का साथ तो मिल ही जाएगा और अगर पार्टी के अन्य बड़े नेता ईश्वरप्पा का जातिगत असर चल गया तो अच्छी संख्या में समर्थन मिल जाएगा  . यह देखना दिलचस्प कि कुरुबा जाति के ईश्वरप्पा  की ही बिरादरी के मुख्यमंत्री सिद्दिरामैया भी हैं . उनकी जाति की संख्या खासी है . ज़ाहिर है सिद्दिरमैया को कमज़ोर करने के लिए यह बाज़ी चली गयी है .
जानकार बताते हैं कि कर्णाटक के वर्तमान मुख्यमंत्री को  कमज़ोर करके आंकने  की ज़रुरत नहीं है . कांग्रेसी आलाकमान की संस्कृति में  उनका मुख्यमंत्री के रूप में बचे रहना उनकी राजनीतिक  क्षमता का ही एक संकेत है . जब उनको २०१३ में मुख्यमंत्री बनाया गया तो कांग्रेस की अगुवाई वाली केंद्र में सरकार थी. उस वक़्त कर्णाटक के  इंचार्ज महामंत्री दिग्विजय सिंह थे . ऐसा माहौल बना कि कांग्रेस की सरकार बन गयी और बड़े बड़े कांग्रेसी वफादारों को दरकिनार करके सिद्दिरमैया ने सत्ता हासिल कर ली . उनके साथ बहुत सारे नेगेटिव भी थे . मसलन वे समाजवादी पृष्ठभूमि से आये थे और कांग्रेस की धुर विरोधी जनता पार्टी के सदस्य रह चुके थे लेकिन वफादार कांग्रेसियों के विरोध के बावजूद जमे रहे और आज तक जमे हुए हैं . अब बेंगलूरू में जो चर्चा है उसके अनुसार कांग्रेस के दिल्ली के नेताओं  में अब हिम्मत नहीं  है कि चुनाव के  पहले उनको हटा दिया जाए .२०१८ के मई महीने में संभावित विधान सभा चुनावों की तैयारी सिद्दिरमैया ने बहुत पहले से शुरू कर दी थी  . इस हफ्ते उन्होंने एक ऐसा फैसला किया है जो  निश्चित रूप से चुनाव के नतीजों को प्रभावित करेगा . दलितों के लाभ के लिए मुख्यमंत्री ने बजट में  ही  बहुत सारी योजनायें लागू कर दी थीं . अब उनको और बढ़ा दिया गया है .इन नयी योजनाओं की जानकारी मीडिया को इसी २ जून को दी गयी . मुख्यमंत्री सिद्दिरमैया ने घोषणा की कि  दलितों के लिए बहुत सारी योजनायें तुरंत प्रभाव से लागू की जा रही हैं . सरकारी संस्थाओं में उच्च शिक्षा प्राप्त कर रहे दलित छात्रों को मुफ्त में लैपटाप तो पहले से ही था , अब  निजी स्कूल कालेजों में पढने वाले  दलित छात्रों को भी यह सुविधा दी जायेगी . अभी दलित छात्रों को बस में चौथाई कीमत पर बस पास मिलते हैं . अब  बस पास  बिलकुल मुफ्त में मिलेगा  . दलित जाति के लोगों अभी तक ट्रैक्टर या टैक्सी खरीदने पर  दो लाख रूपये की सब्सिडी  पाते थे अब वह तीन लाख कर दिया गया है . ठेके  पर काम करने वाले गरीब मजदूरों , पौरकार्मिकों, को अब तक रहने लायक घर बनाने के लिए  दो लाख रूपये का अनुदान मिलता था ,अब उसे चार लाख कर दिया गया है .  इसी साल करीब एक हज़ार दलित किसानों को  विदेश यात्रा पर ले जाने के लिए समाज कल्याण और कृषि विभाग के अधिकारियों को निर्देश दे दिए गए हैं .  दलितों के कल्याण के लिए पिछले चार वर्षों में करीब पचपन हज़ार करोड़ रूपये खर्च किये जा  चुके हैं . इस साल के लिए  करीब अट्ठाईस हज़ार करोड़ रूपये की अतिरिक्त  व्यवस्था कर दी गयी है . जो दक्षिण भारत की राजनीति को समझता है उसे मालूम है कि कांग्रेसी मुख्यमंत्री चुनाव को अपने पक्ष में करने के लिए ही सारे क़दम उठा रहे हैं .
यह सारा कार्य योजनाबद्ध तरीके से हो रहा  है . अब तक माना जाता था कि कर्णाटक में वोक्कालिगा और लिंगायत, संख्या के हिसाब से  प्रभावशाली जातियां हैं . . लेकिन चुनाव के नतीजों पर यह नज़र नहीं आता था.  सत्ता में आने के बाद मुख्यमंत्री सिद्दिरमैया  ने जाति के आधार पर जनगणना करवाई . इस जनगणना के नतीजे सार्वजनिक नहीं किये जाने थे लेकिन पिछले साल अप्रैल  में कुछ पत्रकारों ने जानकारी सार्वजनिक कर दी . सिद्दिरामैया की जाति के लोगों की संख्या ४३ लाख यानी करीब ७ प्रतिशत बतायी गयी . इसी वजह से यह चर्चा भी शुरू हो गयी कि मुख्यमंत्री के दफ्तर से ही जानकारी लीक की गयी थी . बहरहाल लीक किसी ने  किया हो लेकिन जानकारी अब पब्लिक डोमेन में आ गयी है जिसको सही माना जा रहा है. इस नई जानकारी के  बाद कर्णाटक की चुनावी राजनीति का हिसाब किताब बिलकुल नए सिरे से शुरू हो गया है .नई जानकारी के बाद लिंगायत ९.८ प्रतिशत और वोक्कालिगा ८.१६ प्रतिशत रह गए हैं .  कुरुबा ७.१ प्रतिशत , मुसलमान १२.५ प्रतिशत ,  दलित २५ प्रतिशत ( अनुसूचित  जाती १८ प्रतिशत और अनुसूचित जन जाति ७ प्रतिशत ) और ब्राह्मण २.१ प्रतिशत की संख्या में राज्य में रहते हैं .अब तक कर्नाटक में माना जाता था कि लिंगायतों की संख्या १७ प्रतिशत है और वोक्कालिगा १२ प्रतिशत हैं . इन आंकड़ों को कहाँ से निकाला गया ,यह किसी को पता नहीं था लेकिन यही आंकड़े चल रहे थे और सारा चुनावी विमर्श इसी पर केन्द्रित हुआ करता था  . नए आंकड़ों के आने के बाद सारे समीकरण बदलेगें, इसमें दो राय नहीं है .  इन आंकड़ों की विश्वसनीयता पर भी सवाल उठाये जा रहे हैं लेकिन यह भी सच है कि दलित  नेता इस बाद को बहुत पहले से कहते  हैं . दावा किया जाता रहा है कि अहिन्दा ( अल्पसंख्यक,हिन्दुलिदा यानी ओबीसी  और दलित )  वर्ग एक ज़बरदस्त समूह है . जानकार मानते हैं  कि  समाजवादी सिद्दिरामैया ने चुनावी फायदे के लिए अहिन्दा का गठन गुप्त रूप से करवाया  है . मुसलमान , दलित और  सिद्दिरामैया की अपनी जाति कुरुबा मिलकर करीब ४४ प्रतिशत की आबादी बनते हैं .  जोकि मुख्यमंत्री के लिए बहुत उत्साह का कारण हो सकता है .दलितों के लिए बहुत बड़ी योजनाओं के पीछे यही नए आंकड़े काम कर रहे बताये जा रहे हैं  .इन आंकड़ों का कर्णाटक की ताक़तवर जातियां विरोध कर रही हैं . बहुत ही प्रभावशाली लिंगायत मठों से भी इन आंकड़ों की विश्वसनीयता पर सवाल उठाये जा रहे हैं  .वे कहते हैं कि इससे समाज में बंटवारा और बढेगा . यह सारी चिंता शायद इसलिए है कि संख्या के बल  पर राजनीतिक सत्ता को खिसकते देख कर शासक वर्गों को परेशानी तो  हो ही रही है
अगले साल जनवरी में चुनाव अभियान शुरू होगा लेकिन कर्णाटक में अभी से किलेबंदी शुरू हो गयी है . इस  चर्चा में पूर्व प्रधानमंत्री एच डी देवेगौडा की पार्टी का ज़िक्र नहीं आया है . उनके बेटे एच डी कुमारस्वामी मज़बूत नेता रहे हैं , मुख्यमंत्री भी रह चुके हैं लेकिन अब लगता है कि अमित शाह के पूरे समर्थन से मैदान में आये येदुरप्पा और कांग्रेस की अकेली उम्मीद सिद्दिरमैया के बीच होने जा रहे चुनाव में वे या तो वोटकटवा साबित होंगें या किसी के साथ मिल जायेगें , क्योंकि देश की राजनीति की तरह ही कर्णाटक का चुनाव स्वार्थ की स्थाई धरा की मुख्य प्रेरणा से लड़ा जायेगा .

सावधान ,गाय के नाम पर उत्तर में हिंसा ,कहीं दक्षिण पर भारी न पड़ जाय

Fri, 02/06/2017 - 08:19


शेष नारायण सिंह  
अखबार में खबर है कि राजस्थान हाई कोर्ट ने सुझाव  दिया है कि गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित कर दिया जाय . माननीय हाई कोर्ट ने यह भी सुझाव दिया है कि गाय को जान से मारने वाले को आजीवन कारावास की सज़ा का प्रावधान कानून में होना चाहिए . एक मुक़दमे की सुनवाई के दौरान कोर्ट का यह सुझाव आया है . यह बताना ज़रूरी है कि यह माननीय हाई कोर्ट का आर्डर नहीं है . अगर आर्डर होता तो सरकार को इस पर विचार करने की बाध्यता होती , क्योंकि कोर्ट का आर्डर  सरकार को लागू करना होता है . इसी बीच मद्रास हाई कोर्ट की मदुरै बेंच ने एक आर्डर  दे दिया है . मंगलवार को हाई कोर्ट ने प्रिवेंशन आफ क्रुएल्टी टू एनिमल्स रूल्स २०१७ के नियम २२ ( बी )  और २२ (इ ) पर स्टे दे दिया है . केंद्र सरकार ने २३ मई को एक  आदेश पास करके नए नियम बना दिए थे जिसके बाद पशु मेलों और बाज़ार में , वध के लिए पशुओं की बिक्री पर रोक लगा दी गयी थी. इस नए नियम को मद्रास हाई कोर्ट ने रोक दिया है , स्टे चार हफ्ते के लिए है . ज़ाहिर है पूरा आर्डर कोर्ट  में विधिवत सुनवाई के बाद ही आयेगा .
मदुरै की एक  वकील एस सेल्वगोमती ने एक जनहित याचिका दायर करके माननीय हाई कोर्ट से प्रार्थना की थी कि केंद्र सरकार का नया नियम  संविधान में दिए गए मौलिक अधिकारों का हनन करता है . उन्होंने यह भी दावा किया था कि केंद्र सरकार को यह नियम नहीं बनाना चाहिए क्योंकि पशुओं  से  सम्बंधित सभी विषय राज्य सरकारों के कार्यक्षेत्र में आते हैं  . संविधान की आत्मा मौलिक अधिकार और संघीय ढांचा हैं  और यह नियम दोनों का ही उन्लंघन करता है .
याचिकाकर्ता का दावा है कि पी  सी ए एक्ट के नए नियम संविधान में गारंटी किये गए मौलिक अधिकारों को अप्रभावी कर देते हैं क्योंकि  संविधान के अनुच्छेद २५ में किसी भी व्यक्ति को अपने धर्म का पालन  करने के अधिकार की गारंटी दी गयी है .इसके अलावा मौलिक अधिकारों के  अनुच्छेद २९ में  अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा करने की गारंटी भी दी गयी है. कई धर्मों में पशु बलि का प्रावधान है और कुछ धर्मों के मतावलंबी पशुओं का वध भी करते हैं और उनके मांस का भोजन  भी करते हैं . संविधान और कानून की बारीकियों के बीच सरकार का नया नियम चर्चा का विषय है . सरकार तो सरकार है , संसद में स्पष्ट बहुमत है, विपक्ष किसी भी मुद्दे पर  चौकन्ना नहीं है, इसलिए जो भी प्रधानमंत्री और सरकार चाहेंगें पास कर लेंगें  और उसी हिसाब से नियम कानून बना लेगें . लेकिन सरकार को यह ध्यान देना ज़रूरी है कि इस एक नियम से कहीं वह उन भावनाओं को हवा तो नहीं दे रही  है जो देश के संघीय ढाँचे को ही नुक्सान पंहुचा दें .
मैं आजकल दक्षिण  भारत में हूँ . दिल्ली में रह कर अंदाज़ नहीं लगता लेकिन यहाँ आकर एक अजीब सी तस्वीर नज़र आ रही है . ट्विटर पर #द्रविड़नाडु ट्रेंड कर रहा है जहां अजीबोगरीब बातें लिखी जा रही हैं . एक ट्वीट में लिखा है कि खाने पीने की रिवाज़ पर हमला और हिंदी थोपने की केंद्र सरकार की कोशिश को बर्दाश्त नहीं किया जा सकता .   एक अन्य ट्वीट के अनुसार लोग मांग कर रहे हैं कि द्रविड़नाडू की राजधानी बैंगलोर, हैदराबाद, त्रिवेंद्रम और चेन्नई में से किसी एक शहर को बना देना चाहिए . इस तरह की मांग दक्षिण में पहले भी उठती रही है लेकिन उसको  हमेशा  करीने से सम्भाला जाता रहा है . करीब पचास साल पहले जब  उत्तर भारत में हिंदी को देश की भाषा बनाने की बात बड़े जोर शोर से चली थी तो दक्षिण भारत में हिंदी के विरोध में ज़बरदस्त आन्दोलन शुरू हो गया था. के करूणानिधि और अन्य कई नेता उसी आन्दोलन के बाद देश की राजनीति में नोटिस होना शुरू हो गए थे.
अभी अलगाववाद की आवाज़ बहुत ही क्षीण है लेकिन इस आवाज़ के जड़ तक जाने की ज़रूरत है . १९२० में महात्मा गांधी के सविनय अवज्ञा आन्दोलन के बाद अंग्रेजों को भारतवासियों की एकता ने डरा दिया था . अँगरेज़ इस मुगालते में थे कि धर्मों और जातियों में बंटा भारत देश कभी एक नहीं हो सकता लेकिन जब १९२० में गांधी जी के नेतृत्व में हिन्दू-मुसलमान , उत्तर-दक्षिण , सब एक हो गए तो अंग्रेजों ने अपने  भारतीय भक्तों को आगे करके कई संगठन बनवाए . मजदूरों में भेद पैदा करने की कोशिश की . हिन्दू और मुसलमान में भेद डालने की कोशिश उत्तर में हुयी तो दक्षिण में अंग्रेजों ने यह बताने की कोशिश की कि ऊंची  जातियों के लोग कांग्रेस की राजनीति में हावी  हैं इसलिए कांग्रेस में गैर ब्राह्मण जातियों की अनदेखी होगी. जिन्ना महात्मा गांधी से नाराज़ चल ही रहे थे, कांग्रेस  से अलग होकर मुसलमानों की राजनीति का विकल्प तलाश रहे थे .उनकी राजनीति को भी अंग्रेजों से समर्थन देना शुरू कर दिया ,  वी डी सावरकर वफादारी का वचन देकर जेल से रिहा हुए थे उनको भी आगे करके  गांधी और कांग्रेस के विरोध की राजनीति को गर्माया गया और कुछ संगठन बनवाये गए .इसी  अभियान में अंग्रेजों ने अपने कुछ वफादार लोगों को आगे करके  द्रविड़ लोगों को आर्यों से अलग देश  बनवाने की बात को हवा दी और उनको  आगे कर दिया .दक्षिण भारत में भी एक संगठन खडा कर दिया गया . दरअसल  ब्राह्मण मान्यताओं के खिलाफ मद्रास में १९१६ में ही जस्टिस पार्टी बन गयी थी . नाममात्र की इस पार्टी को  अंग्रेजों ने अपनी छत्रछाया में ले लिया और १९२१ में अंग्रेजों के कुछ वफादार , सर पी टी चेट्टी , टी एम नायर  जैसे लोगों को आगे करके बाकायदा चुनाव जीतने लायक राजनीतिक पार्टी बना  दिया गया .इस जस्टिस पार्टी ने  मद्रास प्रेसीडेंसी की  सत्ता पर क़ब्ज़ा जमा लिया . और यह सत्ता गवर्नमेंट आफ इण्डिया एक्ट के बाद तक रही. जब १९३७ में चुनाव हुए तब यह पार्टी कामजोर पडी क्योंकि तब तक  तो हर कोने में गांधी का नाम जीत का पर्याय बन चुका था. लेकिन अंग्रेजों की वफादारी से यह लोग बाज़ नहीं आ रहे थे . गौर करने की बात है कि जिन्ना ने अंग्रेजों  के हुकुम से पाकिस्तान बनाये जाने का प्रस्ताव  २३ मार्च १९४० को लाहौर में मुस्लिम लीग की वार्षिक बैठक में पास करवा लिया था . यह वह दौर था जब भारत की आज़ादी की लड़ाई लड़ने वाले सारे नेता महात्मा गांधी के नेतृत्व  में अंग्रेजों का ज़बरदस्त विरोध कर रहे  थे और अंग्रेजों के भक्त लोग दो राष्ट्रों के सिद्धांत का प्रतिपादन कर रहे थे . इसी सिलसिले में १९४० में ही जस्टिस पार्टी ने द्रविड़नाडु की मांग को लेकर प्रस्ताव  पास किया।  जिन्ना ने तो अपने समर्थकों को अंधेरे में रखा था और यह नहीं बताया था कि पाकिस्तान कहाँ बनेगा लेकिन दक्षिण में बात अलग थी . वहां द्रविड़नाडु का नक्शा  ई वी रामास्वामी नायकर यानी पेरियार ने जारी कर दिया था  जिसमें तमिल, तेलुगु, कन्नड़ और मलयालम भाषा बोलने वालों के लिए एक अलग देश यानी  द्रविड़नाडू की मांग की गयी थी.  
 ई वी रामस्वामी नायकर बाद में  इस पार्टी के सर्वेसर्वा हो गए . उन्होंने ही इस पार्टी का नाम बदल कर द्रविड़ कषगम दिया और इस तरह से 'द्रविड़ कड़गम' नाम की संस्था का जन्म हुआ. शुरू में पेरियार ने दावा किया था कि यह गैरराजनीतिक  संगठन है . द्रविड़नाडू का आन्दोलन जोर पकड़ रहा था.  उस वक्त मद्रास प्रेसिडेंसी के अन्दर आने वाले सारे दक्षिण भारत को द्रविडनाडु   बनाने की बात की जा रही थी. आज उसी मांग को नये सिरे से उभारने की कोशिश की जा रही है और यहाँ की गैर ब्राह्मण आबादी को यह बताने की कोशिश चल रही है कि  पशुओं के वध पर जो रोक लगाई जा रही है ,वह वास्तव में ब्राह्मण आधिपत्य को स्थापित करने की कोशिश है .ऐसा इसलिए संभव हो रहा है कि आज दक्षिण में एक भावना घर कर गयी है कि ब्राहमणों की खाने पीने की परंपरा को द्रविड़ों पर लादा जा रहा है और केंद्र की सत्ताधारी पार्टी के  बड़े नेताओं का हिंदी प्रेम भी दक्षिण में चर्चा का विषय है . ऐसी ही हालत आजादी के बाद के दशक में भी पैदा हो गयी थी.
जब आज़ादी के बाद दक्षिण भारत से भाषा और ब्राह्मण आधिपत्य की बोगी चलाने की कोशिश की गयी तो जवाहरलाल नेहरू का नेतृत्व देश को उपलब्ध था .आज उनको सत्ताधारी पार्टी के समर्थक बहुत ही घटिया रोशनी में पेश करने की कोशिश करते हैं लेकिन जवाहरलाल सही अर्थों में राष्ट्र के नेता थे.  उन्होंने दक्षिण से उठ रही विभाजन की आवाज़ को दबा दिया और  दक्षिण से आने वाले अपने नेताओं के ज़रिये  विभाजन की आवाज़ को  देश की एकता के पक्ष में ढाल दिया था.  उन्होंने भाषा के आधार पर राज्यों का पुनर्गठन करके मद्रास प्रेसीडेंसी के इलाके को चार राज्यों में बाँट दिया और हर  राज्य में अलग तरह की राजनीतिक संस्कृति विकसित होने का माहौल  बनाया .  दक्षिण भारत के मज़बूत नेताओं को समर्थन दिया और वे राष्ट्रीय मंच पर पहचाने गए . हिंदी के विरोध को एकदम से शांत कर दिया . अंग्रेज़ी को काम काज की भाषा बना दिया और हर इलाकाई भाषा को उस राज्य की भाषा बना दिया .  चीन से युद्ध के बाद आम तौर पर जवाहरलाल का आत्म विश्वास डिगा हुआ था लेकिन उन्होंने संविधान में सोलहवां संशोधन करके कर सांसद या विधायक को भारत की अखण्डता की शपथ लेने की पाबंदी लगा दी. इस तरह से विभाजनकारी ताक़तों की राजनीति को बहुत कमज़ोर कर दिया . आज भी ज़रूरत इस बात की है  कि मामूली राजनीतिक स्वार्थों के लिए सत्ताधारी पार्टी देश की एकता  को किसी तरह के ख़तरे में न पड़ने दे. हालांकि यह भी सच है कि सत्ताधारी पार्टी हिन्दू धर्म की मान्यताओं को प्राथमिकता देती है , उनकी राजनीति में हिन्दू धर्म का माहात्म्य बहुत है लेकिन देश में एक बड़ी आबादी ऐसे लोगों की भी है जो हिन्दू नहीं हैं . वैष्णव हिन्दू व्यवस्था में मांस खाने पर भी पाबंदी है लेकिन देश में गैर वैष्णव हिन्दुओं की बड़ी संख्या है . सरकार को सब की भावनाओं को ध्यान में रखना होगा क्योकि देश की एकता और अखंडता सर्वोच्च  है और उसकी हर हाल में हिफ़ाज़त होनी चाहिए .

सहारनपुर के हवाले से जाति के विनाश की पहल की जा सकती है .

Tue, 30/05/2017 - 07:41
शेष नारायण सिंहउत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले में आजकल जाति के नाम पर खूनी संघर्ष जारी है .जिले  में जातीय हिंसा एक बार फिर भड़क गई है . दोनों पक्षों की ओर से हिंसा और आगज़नी करने की घटनाएं जारी हैं .सारे विवाद के केंद्र में शब्बीर पुर गाँव है . वहां बड़ी संख्या में पुलिस बल तैनात किए गए हैं और लखनऊ के अफसर वहां पहुंच गए हैं और जो समझ में आ रहा है ,कर रहे हैं .पुलिस ने हिंसक घटनाओं की पुष्टि हर स्तर  पर  की है लेकिन समस्या इतनी विकट है कि कहीं कोई हल नज़र नहीं आ रहा है .ताज़ा हिंसा भड़कने से इलाक़े में ज़बरदस्त तनाव की स्थिति है. मंगलवार की सुबह बीएसपी नेता मायावती ने शब्बीरपुर गांव का दौरा किया. खबर है कि मायावती के शब्बीरपुर पहुंचने से पहले ही कुछ दलितों ने ठाकुरों के घर पर पथराव करने के बाद आगजनी की थी.जबकि  मायावती की बैठक के बाद  ठाकुरों ने दलितों के घरों पर कथित तौर पर हमला बोल दिया.
अब तक की सरकारी कार्यवाही को देख कर साफ़ लग रहा है कि सरकार सहारनपुर की स्थिति की गंभीरता को नहीं समझ रही है . जैसा कि आम तौर पर होता है , सभी सरकारें  बड़ी राजनीतिक और सामाजिक समस्याओं को कानून व्यवस्था की समस्या मानकर काम करना शुरू कर देती हैं . सहारनपुर में भी वही हो रहा है . पिछले करीब तीन दशकों  ने उत्तर प्रदेश में ऐसी सरकारें आती रही हैं जिनके गठन में दलित जातियों की खासी भूमिका रहती रही है . लेकिन इस बार उत्तर प्रदेश में ऐसी सरकार आई है जिसके गठन में सरकारी पार्टी के समर्थकों के अनुसार दलित जातियों का कोई योगदान नहीं है . विधान सभा चुनाव में बीजेपी को भारी बहुमत मिला था जिसके बाद योगी आदित्य नाथ को उत्तर प्रदेश का मुख्य मंत्री बनाया गया . ज़मीनी स्तर पर उनकी पार्टी के कार्यकर्ताओं को मालूम है  कि विधान सभा चुनावों में दलित वर्गों ने बीजेपी की धुर विरोधी मायावती की पार्टी को वोट दिया था. इस बात की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता कि बीजेपी के समर्थन में  रही जातियों के लोगों ने अपनी पार्टी के खिलाफ वोट देने वालों को सबक सिखाने के उद्देश्य से उनको दण्डित करने के  लिए यह कारनामा किया हो . हालांकि यह भी सच है कि दलित जातियां अब उतनी कमज़ोर नहीं हैं जितनी महात्मा गांधी या डॉ आम्बेडकर के समय में हुआ करती थीं. वोट के लालच में ही सही लेकिन उनके वोट की याचक जातियों ने उनका सशक्तीकरण किया है और वह साफ़ नज़र भी आता है . इसलिए सहारनपुर में राजपूतों ने अगर हमला किया  है तो  कुछ मामलों में दलितों ने भी हमला किया है . आजकल उत्तर प्रदेश समेत ज़्यादातर राज्यों में चुनाव का सीज़न जातियों की गिनती का होता है . इ सबार के चुनाव में यह कुछ ज़्यादा ही था. मायावती को मुगालता था कि उनकी अपनी जाति के लोगों  के साथ साथ अगर मुसलमान भी उनको  वोट कर दें तो वे फिर एक बार मुख्यमंत्री बन जायेंगी  ऐसा नहीं हुआ लेकिन चुनाव ने एक बार मोटे तौर पर साबित कर दिया कि दलित जातियों के लोग अभी भी मायावती को समर्थन देते हैं और उनके साथ हैं .उत्तर प्रदेश के ग्रामीण इलाकों की सवर्ण जातियों में अभी भी यह भावना है कि मायावती ने दलितों को बहुत मनबढ़ कर दिया है. इस  भावना की सच्चाई पर चर्चा करने का कोई मतलब नहीं है क्यों जब समाज में एकता लाने वाली राजनीतिक शक्तियों का ह्रास हो जाए तो इस तरह की भावनाएं बहुत जोर मारती हैं . सहारनपुर में वही हो रहा है . सहारनपुर में जिला प्रशासन ने वही गलती की जो २०१३ के मुज़फ्फरनगर दंगों के शुरुआती  दौर में वहां के जिला अधिकारियों ने की थी . उस दंगे की ख़ास बात तो यह थी कि ज़्यादातर राजनीतिक पार्टियाँ यह उम्मीद लगाए बैठी थीं कि पश्चिम उत्तर प्रदेश में धार्मिक ध्रुवीकरण का फायदा उनको ही होगा . जिसको फायदा होना था , हो गया , बाकी लोगों को और राष्ट्र और समाज को भारी नुक्सान हुआ . ऐसा लगता है कि सहारनपुर में जातीय विभेद की जो चिंगारी शोला बन गयी है , अगर उसको राजनीतिक स्तर पर संभाल न लिया गया तो वह समाज का मुज़फ्फरनगर के साम्प्रदायिक दंगों से ज़्यादा नुक्सान करेगी. जाति के हिंसक  स्वरूप का अनुमान आज़ादी की लड़ाई के दौरान ही महात्मा गांधी और डॉ भीमराव आंबेडकर  को था . इसीलिये  दोनों ही दार्शनिकों ने साफ़ तौर पर बता दिया था कि जाति की बुनियाद पर होने वाले सामाजिक बंटवारे को ख़त्म किये जाने की ज़रूरत है और उसे ख़त्म किया जाना चाहिए . महात्मा गांधी ने छुआछूत को खत्म करने की बात की जो उस दौर में जातीय पहचान का सबसे मज़बूत आधार था लेकिन डॉ आंबेडकर ने जाति की संस्था के विनाश की ही बात की और बताया कि वास्तव  में हिन्दू समाज कोई एकीकृत समाज नहीं है , वह वास्तव  में बहुत सारी जातियों का जोड़ है . इन जातियों में कई बार आपस में बहुत विभेद भी देखा जाता है .  शायद इसीलिये उन्होंने जाति संस्था को ही खत्म करने की बात की और अपने राजनीतिक दर्शन को जाति के विनाश के  आधार पर स्थापित किया .
डॉ आंबेडकर के राजनीतिक दर्शनशास्त्र में महात्मा फुले के चिंतन का साफ़ असर देखा जा सकता है .महात्मा गांधी के समकालीन रहे अंबेडकर ने अपने दर्शन की बुनियादी सोच का आधार जाति प्रथा के विनाश को माना था उनको विश्वास था कि तब तक न तो राजनीतिक सुधार लाया जा सकता है और न ही आर्थिक सुधार लाया जा सकता है।  जाति के विनाश के सिद्धांत को प्रतिपादित करने वाली उनकी किताब,"जाति का विनाश " , ने   हर तरह की राजनीतिक सोच  को प्रभावित किया है. पश्चिम और दक्षिण भारत में सामाजिक परिवर्तन के जो भी आन्दोलन चले हैं उसमें इस किताब का बड़ा  योगदान  है. यह  काम महाराष्ट्र में उन्नीसवीं सदी में ज्योतिबा फुले ने शुरू किया था . उनके बाद के क्रांतिकारी सोच के नेताओं ने उनसे बहुत कुछ सीखा .. डॉ अंबेडकर ने महात्मा फुले की शिक्षा संबंधी  सोच को परिवर्तन की राजनीति के केंद्र में रख कर काम किया और आने वाली नस्लों को जाति के विनाश के रूप में एक ऐसा गुरु मन्त्र दिया जो सही मायनों  में परिवर्तन का वाहक बनेगा.  डॉ अंबेडकर ने ब्राह्मणवाद के खिलाफ शुरू किये गए ज्योतिबा फुले के अभियान को एक अंतरराष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य दिया.

अपनी किताब में डा.अंबेडकर ने बहुत ही साफ शब्दों में कह दिया है कि जब तक जाति प्रथा का विनाश नहीं हो जाता तो  समता, न्याय और भाईचारे की शासन व्यवस्था नहीं कायम हो सकती। अंबेडकर के जीवन काल में किसी ने नहीं सोचा होगा कि उनके दर्शन को आधार बनाकर राजनीतिक सत्ता हासिल की जा सकती है। लेकिन ऐसा हुआ और मायावती उत्तर प्रदेश की एक मज़बूत नेता के रूप में  उभरीं .मायावती और उनके राजनीतिक गुरू कांशीराम ने अपनी राजनीति के विकास के लिए अंबेडकर का सहारा लिया और सत्ता भी पायी लेकिन अंबेडकर के नाम पर सत्ता का सुख भोगने वाली  सरकार ने उनके सबसे प्रिय सिद्धांत को आगे बढ़ाने के लिए कोई क़दम नहीं उठाया .इस बात  के भी पुख्ता सबूत हैं कि मायावती जाति प्रथा का विनाश चाहती ही नहीं हैं क्योंकि उनका वोट बैंक एक ख़ास जाति से आता है .इसके उलट वे जातियों के आधार पर पहचान बनाए रखने की पक्षधर है.  जब मुख्यमंत्री थीं तो हर  जाति की भाईचारा कमेटियाँ बना दी थीं और उन कमेटियों को उनकी पार्टी का कोई बड़ा नेता संभालता था .डाक्टर भीम राव आंबेडकर ने साफ कहा था कि जब तक जातियों के बाहर शादी ब्याह की स्थितियां नहीं पैदा होती तब तक जाति का इस्पाती सांचा तोड़ा नहीं जा सकता। चार बार मुख्यमंत्री की कुर्सी पर विराजने वाली मायावती जी ने एक बार भी सरकारी स्तर पर ऐसी कोई पहल नहीं की जिसकी वजह से जाति प्रथा पर कोई मामूली सी भी चोट लग सके। जाहिर है जब तक समाज जाति के बंधन के बाहर नहीं निकलता आर्थिक विकास का लक्ष्य भी नहीं हासिल किया जा सकता।
" जाति का विनाश " नाम की अपनी पुस्तक में अंबेडकर ने अपने आदर्शों का जिक्र किया है। उन्होंने कहा कि जातिवाद के विनाश के बाद जो स्थिति पैदा होगी उसमें स्वतंत्रता, बराबरी और भाईचारा होगा। एक आदर्श समाज के लिए अंबेडकर का यही सपना था। एक आदर्श समाज को गतिशील रहना चाहिए और बेहतरी के लिए होने वाले किसी भी परिवर्तन का हमेशा स्वागत करना चाहिए। एक आदर्श समाज में विचारों का आदान-प्रदान होता रहना चाहिए।अंबेडकर के आदर्श समाज में सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा है, बराबरी . बराबरी के लक्ष्य को हासिल करने के लिए आज से सौ साल पहले डॉ आंबेडकर ने जो दर्शन कोलंबिया विश्वविद्यालय के अपने पर्चे में प्रतिपादित किया था , आज सहारनपुर के जातीय दंगों ने उनको बहुत निर्दय तरीके से नकारने की दिशा में महत्वपूर्ण क़दम उठा लिया है .ग्रामीण समाज में गरीबी स्थाई भाव  है और दलित शोषित वर्ग उसका सबसे बड़ा शिकार है . यह  भी सच  है कि तथाकथित सवर्ण जातियों के लोगों में भी बड़ी संख्या में लोग गरीबी का शिकार हैं . कल्पना कीजिये कि अगर ग्रामीण भारत में लोग अपनी पहचान जाति के रूप में न मानकर आर्थिक आधार पर मानें तो गरीब आदमियों का एक बड़ा हुजूम तैयार हो जाएगा जो राजनीतिक स्तर पर अपनी समस्याओं के समाधान के लिए प्रयास करेगा लेकिन शासक वर्गों ने ऐसा नहीं होने दिया . जाति के सांचों में बांधकर ही उनको अपनी राजनीतिक रोटियाँ सेंकनी थीं और वे लगातार सेंक रहे  हैं .


नरेंद्र मोदी के विकल्प की बात करना मुख्य मुद्दों से भटकाव की राजनीति है .

Mon, 22/05/2017 - 07:53

शेष नारायण सिंह
केंद्र में नरेंद्र मोदी सरकार के तीन साल पूरे होने के साथ ही यह बात बहुत ज़ोरों से चलाई जा रही है कि अब देश की राजनीति में उनका कोई विकल्प  नहीं है .बीजेपी के नेता इस बात को जोर देकर कहते हैं कि नरेंद्र मोदी अब जवाहरलाल नेहरू की तरह आजीवन प्रधानमंत्री बने  रहेंगें . टेलीविज़न चैनलों में भी यह बात कही जा रही है . नरेंद्र मोदी की सफलताओं का ज़िक्र किया जा रहा है . बीजेपी के प्रवक्ता और मंत्री इस बात का दावा बार बार कर रहे  हैं कि पिछले तीन वर्षों में को भ्रष्टाचार नहीं हुआ है . देश की जनता के पास इसका प्रतिवाद करने का कोई मंच नहीं है लिहाजा सभी इस बात को माने बैठे हैं कि जब इतने बड़े नेता कह रहे हैं तो सच ही होगा. विपक्षी पार्टियों का जिम्मा है कि वे मोदी सरकार की अगर कोई नाकामयाबी है तो उसका ज़बरदस्त तरीके से प्रचार करें लेकिन ऐसा नहीं हो रहा है . सबसे बड़ा ज़िम्मा  कांग्रेस पार्टी  का है लेकिन उनके प्रवक्ता रोज़ शाम ४ बजे के आस पास २४ अकबर रोड , नई दिल्ली के अपने मुख्यालय में  विराजते  हैं और अपनी बात को बहुत प्रभावशाली तरीके  से कहते हैं . आमतौर पर यह बात बीजेपी के कुछ नेताओं या  मंत्रियों के बयानों पर उनकी प्रतिक्रिया होती है . अगले दिन सुबह बात चीत में वे ही  बताते हैं कि बीजेपी की ओर से मीडिया मैनेज हो गया है और प्रेस कांग्रेस की बात को प्राथमिकता नहीं दे रहा है . मीडिया पर हमला करना आजकल फैशन हो गया है लेकिन इन नेताओं को अपने गिरेबान में झांकना होगा कि अगर मीडिया उनकी बात नहीं उठा रहा  है तो क्या और कोई तरीका नहीं है जिस से वे अपनी बात जनता तक पंहुचा सकें .  केंद्र सरकार और राज्य सरकारों की ओर से हर हफ्ते कुछ न कुछ ऐसा हो रहा है जो जनविरोधी है लेकिन कहीं भी किसी भी राजनीतिक  पार्टी ने किसी तरह का विरोध किया ही नहीं .मीडिया का स्पेस हर दौर में सत्ताधारी पार्टी को ज्यादा मिलता रहा है क्योंकि उनके काम और आचरण से देश का अवाम सीधे तौर पर प्रभावित होता रहा है . कांग्रेस के दौर में भी मीडिया का स्पेस  सरकारी पार्टी को मिलता था और तब बीजेपी के नेता भी मीडिया के मैनेज होने की शिकायत करते थे. लेकिन बीजेपी वालों ने दिल्ली समेत देश की ज़्यादातर राजधानियों में जुलूस आदि निकाल कर कांग्रेस की सरकारों  को कटघरे में खडा किया था . देश की राजनीति की बदकिस्मती है कि आज ऐसा नहीं हो रहा है और चारों तरफ यह चर्चा है कि नरेंद्र मोदी का कहीं कोई विकल्प नहीं है .ज़ाहिर है बीजेपी इस अभियान की अगुवा है लेकिन इस तरह की बात को कोई मतलब नहीं है क्योंकि अगर विकल्प की ज़रुरत पडी तो लोकतंत्र अपने हित में किसी भी नेता का विकल्प तलाश लेता है .नरेंद्र मोदी की  विकल्पहीनता की बात बीजेपी की रणनीति का हिस्सा हो सकती  है लेकिन विपक्ष को उसके लपेट में आने की क्या ज़रुरत है , यह बात आम आदमी की समझ से परे है.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विकल्प की बात सुझाना इस लेख का मकसद नहीं है . अगर विकल्प की ज़रुरत पडी तो वह वक़्त की  ताक़त से अपने आप तय हो जाएगा. भला कोई सोच सकता था  कि जिस व्यक्ति को बीजेपी के ही कई  तिकड़मबाज़  नेताओं  ने गुजरात से बाहर कर दिया था ,वही बीजेपी का सबसे  बड़ा नेता और प्रधानमंत्री  हो जाएगा. बीजेपी के उस समय के बड़े नेता लाल कृष्ण आडवानी और उनके गुट के नेता लोग तो १३ सितम्बर २०१३ के दिन भी नरेंद्र मोदी को विकल्प मानने को तैयार नही थे. पार्टी के  तत्कालीन अध्यक्ष , राजनाथ सिंह  ने जब गोवा में अपनी पार्टी की बैठक में आडवानी आदि की मर्जी के खिलाफ जाकर नरेंद्र मोदी  को पार्टी का प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर दिया था तो दिल्ली में विराजने वाले कई बड़े नेता राजनाथ सिंह के खिलाफ ही लामबंद होने लगे थे लेकिन  वक़्त ने साबित कर दिया कि राजनाथ सिंह का फैसला उनकी पार्टी के हित में सही था. आज की स्थिति यह है कि सितम्बर २०१३  में जो लोग नरेंद्र मोदी का विरोध कर रहे थे, नरेंद्र मोदी के विकल्प के रूप में उनकी चर्चा  तक नहीं होती. दिलचस्प बात यह है कि उनमें से कई महानुभाव आज उनके कृपापात्र भी बन गए हैं .कई मीडिया संगठन नेताओं के ऊपर जनहित  पर आघात करते  है तो सच्चाई के साथ खड़े मीडिया को ज्यादातर राजनेता अपनी आलोचना का विषय बनाते हैं . मीडिया का न तो यह काम है कि वह किसी का विकल्प सुझाए और नहीं उसके लिए यह न्यायसंगत  होगा .  लेकिन देश की जनता को किसी भी चिंता और ऊहापोह की स्थिति से  बचाने के लिए यह मीडिया का फ़र्ज़ है कि जितना संभव  हो देश की जनता को उसकी चिंता  से मुक्त करे. इसका तरीका यह है कि आज के पहले जब भी देश की राजनीति में किसी भी प्रधानमंत्री का विकल्प न होने की बात चली ही उस वक़्त के हालात हो याद दिला दे.जवाहरलाल नेहरू के जीवन काल में  उनके प्रधानमंत्रित्व के अंतिम दौर में यह चर्चा शुरू हो गयी थी . इस आशय की किताबें आदि भी लिखी जाने लगी थीं . नेहरू के बाद जिस नेता को देश ने चुना ,उनका कार्यकाल बहुत कम समय का रहा लेकिन लाल बहादुर शास्त्री ने यह तय कर दिया कि उन्होंने नेहरू की नीति में जो कमियाँ रह गयी थीं उनको भी दुरुस्त करने की क्षमता उनके अन्दर थी. चीन के  साथ हुए संघर्ष में भारत को अपमान झेलना पड़ा था और उसी से मनबढ़ हुए पाकिस्तानी तानाशाह जनरल अय्यूब ने भारत को युद्ध की तरफ जाने को मजबूर कर दिया . कश्मीर घाटी  में बड़े पैमाने पर घुसपैठ करवाई और युद्ध को भारत पर थोप दिया .शास्त्री जी के राजनीतिक नेतृत्व  में पाकिस्तानी सेना को ऐसा  ज़बरदस्त जवाब दिया कि पाकिस्तानी सेना के हौसले हमेशा के लिए पश्त हो गए . शास्त्री जी ने ही देश में मौजूद अन्न की कमी से सीधे लोहा लिया और ग्रीन रिवोल्युशन की शुरुआत की . यह अलग बात है कि शास्त्री जी की मृत्यु के बाद उसकी सारी वाह वाही इंदिरा जी ने अपने खाते में दर्ज करवा दी.प्रधानमंत्री पद को लेकर विकल्प हीनता की स्थिति तब भी आयी थी जब इमरजेंसी को खत्म करने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा  गांधी  ने चुनाव की घोषणा कर दी. ज़्यादातर विपक्षी नेता जेलों में बंद थे . इंदिरा गांधी के खुफिया तंत्र ने उनको सलाह दी थी कि विपक्ष की एकता संभव नहीं है और चुनाव करवा कर पांच साल  के लिए जनादेश ताज़ा करवा लें . लेकिन जनता के दबाव में जेल से आकर विपक्षी नेता लोग  ,सर्वोदय के कर्णधार जयप्रकाश नारायण के साथ खड़े हो गए और भारतीय लोकदल के चुनाव निशान पर चुनाव लड़ने का फैसला कर लिया गया , पार्टी का नाम जनता पार्टी दिया गया जबकि सच्चाई यह है कि पार्टी का गठन सरकार बन जाने के मई महीने में हुआ. चुनाव की घोषणा होने के बाद  , इंदिरा गांधी सरकार के वरिष्ठ मंत्री और कांग्रेस के बड़े नेता , बाबू जगजीवन राम ने कांग्रेस से इस्तीफ़ा देकर ,कांग्रेस फार डेमोक्रेसी  बना लिया और जनता पार्टी के साथ मिलकर चुनाव लड़ गए. चुनाव के नतीजों ने साबित कर दिया कि इंदिरा  गांधी का विकल्प संभव था और वह एक राजनीतिक सच्चाई था.दूसरा इस तरह का अवसर तह आया जब बहुत भारी बहुमत से देश में राज कर रहे  राजीव गांधी का कोई विकल्प न होने की बात चल पडी  थी. लेकिन बोफर्स का राजनीतिक तूफान आया तो एक साधारण हैसियत का राजा जिसकी अपनी कोई राजनीतिक ज़मीन नहीं थी , राजीव गांधी को बेदखल करने का साधन बन गया . गौर करने की बात यह  है  कि जिस विश्वनाथ प्रताप सिंह ने राजीव  गांधी के विकल्प के रूप में अपने आप को  पेश करने में सफलता पाई थी वे हमेशा से ही  इंदिरा गांधी परिवार के कृपा पात्र रहे थे.१९७१ के बाद इंदिरा गांधी ने उनको छोटा मंत्री बनाया था, १९८० में संजय गांधी की कृपा से मुख्यमंत्री बने थे और १९८४-८५  में राजीव गांधी ने उनको वित्त मंत्री बना दिया था . जब  उनको इंदिरा जी ने राज्य मंत्री बनाया था , उस समय भी कांग्रेस में उनसे बहुत बड़े नेता थे और उनमें से एक , चन्द्रशेखर थे जो १९८९ में प्रधानमंत्री पद के ज़बरदस्त दावेदार थे लेकिन वक़्त ने वी पी सिंह को चुना और राजीव गांधी का विकल्प तैयार हो गया . इसी तरह  से अटल बिहारी वाजपेयी के बाद डॉ मनमोहन सिंह का प्रधानमंत्री बनना भी एक ऐसी सच्चाई  है जिसका अंदाज़ किसी को नहीं था, डॉ मनमोहन सिंह को भी नहीं .इसलिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विकल्प की बात करना राजनीति और लोकतंत्र की ताक़तों को न समझ पाने का लक्षण है.  अगर लोकतंत्र के लिए  ज़रूरी हुआ तो कोई भी  मोदी के विकल्प के रूप में सामने आ जाएगा . आखिर २०१३ तक इसी पार्टी के लाल कृष्ण आडवानी, अरुण जेटली  , सुषमा स्वराज , वेंकैया नायडू, नितिन गडकरी आदि वर्तमान प्रधानमंत्री के अति  आदरणीय  नेता रह चुके हैं . पिछले दिनों उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री  योगी आदित्य नाथ का नाम भी दिल्ली के सत्ता का गलियारों में खुसुर पुसुर स्टाइल में चल चुका है लेकिन सच्चाई यह  है कि आज बीजेपी की  राजनीति को मोदी के विकल्प की  ज़रुरत नहीं है. जब ज़रूरी होगा समय अपना विकल्प तलाश  लेगा अभी  तो विपक्ष को  इस बात पर ध्यान देना चाहिए कि उस जनता की आवाज़ को दमदार तरीके से उठायें जो किसी भी सरकार तक अपनी बात नहीं पंहुचा सकती , विकल्प की बात करना एक तरह से अवाम के मुख्य मुद्दों  से भटकाव है और वह राजनीतिक विकास के हित में नहीं है 

मोदी सरकार पर नज़र रखने में कांग्रेस अब तक असफल रही है

Fri, 19/05/2017 - 09:43


शेष नारायण सिंह
इसी मई में नरेंद्र  मोदी सरकार के तीन साल पूरे हो गए. सरकार और उसके समर्थकों का दावा है कि बी जे पी सरकार ने पिछले तीन वर्षों में हर क्षेत्र में सफलता की बुलंदियां हासिल की हैं ,विदेश नीति से लेकर महंगाई ,बेरोजगारी ,कानून व्यवस्था सभी क्षेत्रों में सफलता के रिकार्ड बनाए गए हैं ,ऐसा बीजेपी वालों का दावा है . यह अलग बात है कि इन सभी क्षेत्रों में  सरकार की सफलता संदिग्ध हैं . महंगाई कहीं कम  नहीं हुयी है , चुनाव अभियान के दौरान बीजेपी ने जिन करोड़ों नौकरियों का वादा किया था  ,वह कहीं भी नज़र नहीं आ रही हैं . ख़ासतौर से ग्रामीण इलाकों में चारों तरफ बेरोजगार नौजवानों के हुजूम देखे जा सकते हैं . किसानों की हालत जो पिछले ४० वर्षों से खराब होना शुरू हुई थी वह बद से बदतर होती जा रही है.  उत्तर प्रदेश और बिहार के अवधी ,भोजपुरी इलाकों से नौजवान बड़ी संख्या में देश के औद्योगिक नगरों की तरफ पलायन करते थे और छोटी मोटी नौकरियाँ हासिल करते थे, वह पूरी तरह ठप्प है . लेकिन बीजेपी के  प्रवक्ता आपको ऐसे ऐसे आंकड़े दिखा देगें कि लगेगा कि आपकी ज़मीन से इकट्ठा की गयी जानकारी गलत है , वास्तव में देश तरक्की कर  रहा है , चारों तरफ खुशहाली है , नौजवान बहुत खुश हैं और अच्छे दिन आ चुके हैं . मोदी सरकार के तीन साल पूरे होने की खुशी में टेलिविज़न चैनलों पर बहसों का मौसम शुरू हो  गया है . बीजेपी के कुशाग्रबुद्धि प्रवक्ता वहां मौजूद रहते हैं और पूरी दुनिया को बताते रहते हैं कि पिछले तीन वर्षों में  सब कुछ बदल गया है  . ऐसे ही एक डिबेट में शामिल होने का मौक़ा मिला . बीजेपी  के प्रवक्ता ने अच्छी तरह अपनी बात रखी जो उनको रखना चाहिए . यह उनका फ़र्ज़ है .
इसी डिबेट में कांग्रेस प्रवक्ता भी थे. तेज़ तर्रार नौजवान नेता. राहुल गांधी की राजनीति के अलमबरदार . लेकिन उनके पास बीजेपी के प्रवक्ता का विरोध करने के लिए कोई तैयारी नहीं थी. लगातार नरेंद्र मोदी पर हमले करते रहे . अपने हस्तक्षेप के दौरान कई बार उन्होंने नरेंद्र मोदी या प्रधान मंत्री शब्द का बार बार उलेख किया और बहस में बीजेपी  सरकार की खामियों को गिनाने के लिए केवल नरेंद्र मोदी  का सहारा लेने की कोशिश करते रहे.जब  डिबेट में मौजूद पत्रकारों ने उनको याद दिलाया कि अगर आपकी बात को सच मान भी लिया जाए  कि पिछले तीन वर्षों में सरकार ने जनहित का कोई काम नहीं किया है  और हर मोर्चे पर फेल रही है तो आप लोगों  ने सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी का कर्त्तव्य क्यों नहीं  निभाया, कांग्रेस ने सरकार की असफलताओं को उजागर करने के लिए कोई जन आन्दोलन क्यों नहीं शुरू किया . क्यों आप लोग टेलिविज़न  कैमरों और  अपनी पार्टी के दफ्तरों के  अलावा कहीं नज़र नहीं आये. तो उनके पास बगलें झांकने के अलावा कोई जवाब नहीं था. बड़ी खींचतान  के पाद उन्होंने रहस्योद्घाटन किया कि पिछले दिनों जन्तर मन्तर पर तमिलनाडु  से  आये   किसानों का जो विरोध देखा गया था , वह कांग्रेस द्वारा आयोजित था. ज़ाहिर है और किसी आन्दोलन का ज़िक्र नहीं किया जा सकता  था क्योंकि कहीं कुछ था ही नहीं . ऐसी हालत में एक ऐसे  आन्दोलन को अपना बनाकर पेश  करने की कोशिश  की गयी  जिसमें कांग्रेस की भूमिका केवल  यह थी  कि उनके आला नेता , राहुल गांधी किसानों के उन आन्दोलन से सहानुभूति जताने जंतर मंतर गए थे , कुछ देर बैठे थे और उस मुद्दे  पर उनकी पार्टी  ने बयान आदि देने की रस्म अदायगी की थी.
सवाल यह उठता है कि क्या मुख्य विपक्षी दल का कर्त्तव्य यहीं ख़त्म हो जाता है . क्या लोकतंत्र में यह ज़रूरी  नहीं कि  सरकार अपनी राजनीतिक समझ  के हिसाब से जनहित और राष्ट्रहित  के कार्यक्रम लागू करती रहे और अगर उसकी सफलता संदिग्ध हो तो जनता के बीच जाकर या किसी भी तरीके से विपक्षी पार्टियां  सरकार की कमियों को बहस के दायरे में लायें . या विपक्ष की  यही भूमिका  है कि वह इस बात का इंतज़ार करे कि २०१९ तक जनता बीजेपी से निराश हो जायेगी और फिर से  कांग्रेस सहित विपक्षी दलों को सत्ता थमा देगी.  फिलहाल यही माहौल है . कहीं कुछ भी विरोध देखा नहीं जा रहा  है.
कांग्रेस का ड्राइंग रूम की पार्टी बन जाना इस देश की भावी राजनीति के लिए अच्छा संकेत नहीं है .  कांग्रेस के राहुल गांधी टीम के मौजूदा नेता  यह दावा करते हैं कि उनकी पार्टी   महात्मा गांधी, सरदार पटेल ,जवाहर लाल नेहरू की पार्टी है . बात बिलकुल सही है क्यों जवाहर लाल नेहरू के वंशज उनकी पार्टी के सर्वोच्च नेता हैं . लेकिन क्या इन लुटियन की दिल्ली में रमण करने वाले नए कांग्रेसी नेताओं को मालूम नहीं है कि कांग्रेस के नेताओं ने आन्दोलन को देश की राजनीति का स्थाई भाव बना दिया था. १९२० से लेकर १९४६ तक कांग्रेस ब्रिटिश साम्राज्य की कमियों को हर मोर्चे पर बेपरदा किया था जहां भी संभव था. १९४७ के पहले कांग्रेस के तीन बड़े  आन्दोलन राजनीतिक आचरण के विश्व इतिहास में  जिस सम्मान से उद्धृत किये जाते हैं उसपर कोई भी देश या समाज गर्व कर सकता है . १९२० का महात्मा गांधी का आन्दोलन इतना ज़बरदस्त  था कि  भारत की जनता की एकजुटता को खंडित करने के लिए उस वक़्त के हुक्मरानों को सारे घोड़े खोलने पड़े थे. १९२० के आन्दोलन के बाद ही ऐसा माहौल बना था कि अंग्रेजों ने  अपने वफादार  भारतीयों को आगे करके  कई ऐसे संगठन बनवाये जिनके कारण भारतीय अवाम की एकता को तोड़ने में उनको सफलता मिली. कांग्रेस के १९३० के आन्दोलन का ही नतीजा था कि महात्मा गांधी ने अंग्रेजों को मजबूर कर दिया कि वह  भारतीयों के साथ मिलकर देश पर शासन करें . १९३५ का गवर्नमेंट आफ इण्डिया एक्ट  कांग्रेस की अगुवाई में  चले आन्दोलन का ही नतीजा था .यह भी सच है कि अँगरेज़ शासकों ने भारत की राजनीतिक एकता को खत्म करने के बहुत सारे प्रयास किये लेकिन कहीं कोई सफलता नहीं मिली. शायद  राजनीतिक आन्दोलन के इसी जज्बे का नतीजा था कि१९४२ में जब महात्मा गांधी के साथ खड़े देश ने नारा दिया कि अंग्रेजो ' भारत छोडो ' तो ब्रिटिश हुकूमत ने इन शोषित पीड़ित लोगों की  आवाज़ को हुक्म माना और उनको साफ़ लग गया कि भारत की एकजुट राजनीतिक ताक़त के सामने टिक पाना नामुमकिन था. राजनीति की इस परम्परा का वारिस होने का दावा करने वाली कांग्रेस के मौजूदा नेताओं का वातानुकूलित माहौल से बाहर न निकलने का आग्रह समझ परे है .मौजूदा  कांग्रेस नेताओं से गांधी-नेहरू परम्परा की उम्मीद भी नहीं है लेकिन राहुल गांधी की दादी और चाचा की राजनीति की उम्मीद तो  की ही जा सकती है . जब १९७७ में भारी जनाक्रोश के बाद इंदिरा गांधी की सरकार बेदखल कर दी गयी थी तो सत्ता को अपनी  हैसियत से  जोड़ चुके संजय गांधी के सामने मुश्किलें बहुत थीं . इमरजेंसी के उनके कारनामों की जांच के लिए शाह आयोग बना दिया गया था, जनता का भारी विरोध था, गली गली में कांग्रेस और इंदिरा -संजय  की टोली की निंदा हो रही थी.   इमरजेंसी में कांग्रेस के बड़े नेता रहे लोग जनता पार्टी की शरण में जा चुके थे . कांग्रेस के लिए चारों तरह अन्धेरा  ही अँधेरा था लेकिन कांग्रेस ने सड़क पर आने का फैसला किया . एक दिन दिल्ली की सडकों पर चलने वालों देखा कि काले पेंट से दिल्ली की दीवारें पेंट कर दी गयी थीं और लिखा था कि ' शाह आयोग नाटक है '. शाह आयोग को इमरजेंसी की ज्यादातियों की जांच  करने के लिए मोरारजी देसाई सरकार ने स्थापित किया था. उसी के विरोध से  तिरस्कृत कांग्रेस ने विरोध की बुनियाद डाल दी. यह सच है कि उन दिनों  सभ्य समाज में कांग्रेस के प्रति बहुत ही तिरस्कार का भाव था लेकिन संजय गांधी और इंदिरा गांधी ने हिम्मत नहीं हारी . बहुत सारे ऐसे नौजवानों  को संजय गांधी ने इकठ्ठा किया जिनको भला आदमी नहीं माना जा सकता था लेकिन उनके सहारे ही आन्दोलन खड़ा कर दिया और जनता पार्टी की सरकार के विरोधाभासों को बहस के दायरे में ला दिया . इंदिरा गांधी और संजय गांधी जेल भी गए और जब जेल से बाहर आये तो उनके साथ और बड़ी संख्या में लोग जुड़ते गए. नतीजा यह हुआ कि १९८० में कांग्रेस की धमाकेदार वापसी हुई . आज के कांग्रेस के अला नेता किसी आन्दोलन के बाद जेल जाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे हैं . हाँ याह संभव है कि उनको नैशनल हेराल्ड के केस में आपराधिक मामले में जेल जाना पड़ जाए.कांग्रेस ने १९९९ से २००४  तक  सोनिया गांधी के नेतृव में भी अटल बिहारी वाजपेयी सरकार को लगातार घेरने की राजनीति की और सारे तामझाम , सारे मीडिया मैनेजमेंट, सारे शाइनिंग इण्डिया के बावजूद जनता ने कांग्रेस को फिर से सत्ता सौंप दी. सत्ता खंडित थी लेकिन बदलाव हुआ और बदलाव राजनीतिक आन्दोलन के रास्ते हुआ. यह ज़रूरी नहीं कि आन्दोलन के बाद सत्ता मिल ही जाए. सोशलिस्ट पार्टी के बड़े नेताओं , आचार्य नरेंद्र देव और डॉ राम मनोहर लोहिया ने विपक्ष में रहते हुए जीवन भर उस वक़्त की कांग्रेस सरकारों की खामियों को  सड़क पर उतर कर जनता  के सामने उजागर करते रहे  . उन महान नेताओं को सत्ता कभी नहीं मिली लेकिन लोकतंत्र में जनता को यह अहसास हमेशा बना रहा कि उस दौर की सत्ताधारी पार्टी जो भी जनविरोधी काम कर रही है उसकी जानकारी नेताओं को है और वे उसके लिए संघर्ष कर रहे हैं . आज की सत्ताधारी पार्टी बीजेपी भी जब विपक्ष में होती थी तो आम जनता को प्रभावित करने आले मुद्दों पर आन्दोलन का  रास्ता अपनाती  रही  है . दिल्ली में रहने वालों को मालूम है कि जब तक मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री रहे हर हफ्ते बीजेपी की अलग अलग इकाइयों  का जंतर मंतर पर कोई न कोई आन्दोलन चलता ही रहता था.
आज के विपक्षी नेताओं की   स्थिति बिलकुल अलग है . वे टेलिविज़न की बाईट देते हैं , प्रेस  कान्फरेंस करते हैं , लाखों  की कारों  में बैठकर संसद आते हैं , गपशप  करते हैं , कभी कभार कुछ बोल देते हैं और उम्मीद करते हैं कि देश भर में  रहने वाली जनता उनके वचनों को तलाश करके निकाले और उनके अनुसार पूरी तरह से नाकाम हो चुकी मोदी सरकार के खिलाफ २०१९ में मतदान करे  और हरे भरे दिल्ली शहर से बाहर गए बिना इन  विपक्षी नेताओं को सत्ता सौंप दे .लेकिन राजनीति में ऐसा  नहीं होता . यहाँ न कोई बिल्ली होती है और न कोई छींका टूटता है इसलिए सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी को अपना कर्त्तव्य सही  तरह से निभाने के लिए जनता के बीच जाना  होगा . उनको यह  हमेशा ध्यान रखना होगा कि लोकतंत्र में सरकारी पक्ष की भूमिका पर निगरानी  रखने और जनता को चौकन्ना रखने के लिए विपक्ष होता  है . आज की स्थिति यह है कि  विपक्ष अपना काम सही  तरीके से  नहीं कर रहा है .
साभार : देशबन्धु ( 19-05-2017}

लेखक विषय संवाद साभार अनुवादक

पहले वो आए साम्यवादियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं साम्यवादी नहीं था

 

फिर वो आए मजदूर संघियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं मजदूर संघी नहीं था

 

फिर वो यहूदियों के लिए आए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं यहूदी नहीं था

 

फिर वो आए मेरे लिए

और तब तक बोलने के लिए कोई बचा ही नहीं था

 

मार्टिन नीमोलर (1892-1984)