Increase |  Decrease |  Normal

Current Size: 100%

Share this
Syndicate content

जंतर-मंतर

Syndicate content
Updated: 13 hours 14 min ago

किसान को बेचारा मानकर शासक वर्ग विकास में बाधा डालते हैं .

Mon, 16/10/2017 - 05:58


शेष नारायण सिंह
करीब चालीस साल बाद कुवार के महीने में  गाँव गया. मेरे गाँव में पांडे बाबा वाला महीना बहुत ही खूबसूरत होता है. न गर्मी न ठंडी,   तरह तरह की फसलों की खुशबू हवा में तैरती रहती है. अन्य इलाकों  में जिस त्यौहार को  विजयादशमी या दशहरा कहा जाता है उसको मेरे क्षेत्र में पांडे बाबा ही कहा जाता था. पांडे बाबा हमारे यहाँ के लोकदेवता हैं . उनको धान चढ़ाया जाता था. उनका  इतिहास  मुझे नहीं पता है लेकिन माना जाता था कि पांडे बाबा की पूजा करने से बैलों का स्वास्थ्य बिलकुल सही रहता है . गोमती नदी के किनारे दक्षिण में धोपाप है और  नदी के उस पार पांडे बाबा का स्थान है . जहां उनका ठिकाना है उस गाँव का नाम बढ़ौना डीह है लेकिन अब उसको  पांडे बाबा के नाम से ही जाना जाता है . आज के चालीस साल पहले हर  घर से कोई पुरुष सदस्य पांडे बाबा के मेले में दशमी के दिन ज़रूर जाता था.. हर गाँव से हर घर से लोग जाते थे. बैलों की खैरियत तो सबको चाहिए होती थी. मैं पहली बार आज से पचास साल पहले आपने गाँव के कुछ वरिष्ठ लोगों के  साथ गया था,मेरे बाबू नहीं जा सके थे . उन  दिनों दशमी तक धान की फसल तैयार  हो चुकी होती थी ,अब नहीं होती . इस बार मैंने देखा कि धान के पौधों में अभी फूल ही लग रहे थे ,यानी अभी महीने भर की कसर है.अब कोई पांडे बाबा नहीं जाता. क्योंकि अब किसी को बैलों के अच्छे स्वास्थ्य की ज़रूरत ही नहीं है. अब खेती में बैलों की कोई भूमिका नहीं है . पहले बैलों से हल चलते थे , सिंचाई के लिए भी कुएं से पानी निकालने में बैलों की अहम भूमिका होती थी, बैलगाड़ी या लढा से सामान  ढोया जाता था.  यानी ग्रामीण अर्थव्यवस्था में बैलों की बहुत बड़ी भूमिका होती थी. अब नहीं होती. अब ट्रैक्टर से खेत जोते जाते हैं , ट्यूबवेल से सिंचाई होती है , ट्राली से माल ढोया जाता है .अब ग्रामीण  व्यवस्था में बैलों की कोई भूमिका नहीं होती. इसलिए अगर घर में पल रही गाय बछड़े को जन्म दे देती है तो लोग दुखी हो जाते हैं . अभी तक तो बछड़े को औने पौने दाम पर बेच दिया जाता था लेकिन अब ऐसा नहीं होता. गाय या बछड़े को एक जगह से दूसरी जगह ले जाना अब असंभव है. स्वयम्भू गौरक्षक ऐसा होने नहीं देते . नतीजा यह हो रहा है कि एक ऐसे जानवर को बाँध कर खिलाना पड़ रहा है  जो गाय और भैंस का चारा खाता है और किसान की आर्थिक स्थिति को कमज़ोर करता  है. पिछले करीब चार  महीने से एक नयी परम्परा शुरू हो गयी है . अब लोग  अपने गाँव से थोड़ी दूर ले जाकर बछड़ों को रात बिरात छोड़ आते हैं. वे खुले घूमते हैं और जहां भी हरी फसल दिखती हसी,चरते खाते हैं .  कुछ साल पहले हमारे गाँवों में पता नहीं कहाँ से नील गाय बहुत बड़ी संख्या में आ गए थे. अब संकट का रूप धारण कर चुके हैं . बताते हैं कि नील गायों को डराने के  लिए १०-१५ साल पहले सरकारी तौर पर जंगली सूअर छोड़ दिए गए थे . सूअरों ने नील गाय को तो भगाया नहीं ,खुद  ही जम  गए . अब तक हरियाली वाली फसलें नील गाय खाते थे . आलू, शकरकंद , प्याज ,लहसुन, गाजर ,मूली, आदि ज़मीन के नीचे होने वाली फसलों को सुअर नुक्सान पंहुचा रहे थे और अब इसी जमात में वे बछड़े भी शामिल हो गए हैं.जिनको किसानों ने ही  छुट्टा छोड़  दिया है . खेती की हालत बहुत ही ख़राब है .कई लोगों को प्रधानमंत्री पद के दावेदार नरेंद्र मोदी का वह भाषण बहुत अच्छी तरह से याद है जिसमें उन्होंने २०१४ के लोकसभा चुनाव के पहले कहा था कि किसान की आमदनी दुगुनी कर दी जायेगी . नीतियाँ ऐसी बनाई जायेंगी जिस से किसान को सम्पन्नता की राह पर डाल दिया जाएगा . उनकी बातों पर भरोसा करके किसानों ने उनको वोट दिया ,लोकसभा में तो जिताया ही,  विधान सभा में भी उनकी पार्टी को  वोट दिया और सरकार बनवा दी . लेकिन उत्तर प्रदेश में  उनकी सरकार बनते ही पशुओं की बिक्री एकदम बंद हो गयी . हर गाँव  में दो चार ऐसे नौजवान प्रकट हो गए , जिनके जीवन का उद्देश्य ही गौवंश की रक्षा है. लोग परेशान हैं कि जाएँ तो जाएँ कहाँ .जानवरों को बेचकर किसान को अतिरिक्त आमदनी हो जाती थी. आमदनी दुगुना करने के वायदे वाली सरकार के संरक्षण में काम कर रहे गौरक्षकों ने आमदनी का एक जरिया भी खत्म कर दिया और सरकार कोई भी कार्रवाई नहीं कर रही है .
आज ग्रामीण इलाकों में  जो लोग परिवार के मुखिया  हैं , उनकी उम्र साठ साल के पार है. उन लोगों ने अपने बचपन में १९६४ की वह  भुखमरी भी देखी है जो लगातार सूखे की  वजह से आई थी. किसान लगभग पूरी तरह से बरसात के पानी पर ही निर्भर था.  उन यादों से भी लोग कांप जाते हैं . नरेंद्र मोदी के वायदों के बाद लोगों को उम्मीद थी कि गरीब का बेटा जब प्रधानमंत्री बनेगा तो शायद कुछ ऐसा कर दे जो तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने कियाथा. हरित क्रान्ति की शुरुआत कर दी थी. हालांकि उसका श्रेय इंदिरा गांधी ने बटोरा.दिल्ली आकर जब खेती किसानी के इंचार्ज कुछ महाप्रभुओं से बात की तो उन्होंने लाखों करोड़ों मीट्रिक टन और लाखों हेक्टेयर में  अच्छी फसलों के आंकड़े देकर मुझे संतुष्ट करने की कोशिश की . इन आंकड़ाबाज अफसरों नेताओं को यह बताने की जरूरत है कि आम आदमी की मुसीबतों को आंकड़ों में घेर कर उनके जले पर नमक छिड़कने की संस्कृति से बाज आएं। अकाल या सूखे की हालत में ही खेती का ख्याल न करें, इसे एक सतत प्रक्रिया के रूप में अपनाएं। इस देश का दुर्भाग्य है कि जब फसल खराब होने की वजह से शहरी मध्यवर्ग प्रभावित होने लगता है, तभी इस देश का नेता और पत्रकार जगता है। गांव का किसान, जिसकी हर जरूरत खेती से पूरी होती है, वह इन लोगों की प्राथमिकता की सूची में कहीं नहीं आता।
कोई इनसे पूछे कि फसल चौपट हो जाने की वजह से उस गरीब किसान का क्या होगा जिसका सब कुछ तबाह हो चुका है। वह सरकारी मदद भी लेने में संकोच करेगा क्योंकि गांव का गरीब और किसान मांग कर नहीं खाता। यह कहने में कोई संकोच नहीं कि गांव का गरीब, सरकारी लापरवाही के चलते मानसून खराब होने पर भूखों मरता है। आजादी के बाद जो जर्जर कृषिव्यवस्था नए शासकों को मिली थी, वह लगभग आदिम काल की थी। 
जवाहरलाल नेहरू ने कृषि को प्राथमिकता नहीं दी . उनको उम्मीद थी कि औद्योगिक विकास के साथ-साथ खेती का विकास भी चलता रहेगा। लेकिन 1962 में जब चीन का हमला हुआ तो उनको एक जबरदस्त झटका लगा। उस साल उत्तर भारत में मौसम अजीब हो गया था। रबी और खरीफ दोनों ही फसलें तबाह हो गईं थी। जवाहर लाल नेहरू को एहसास हो गया था कि कहीं बड़ी गलती हुई है। ताबड़तोड़ मुसीबतों से घिरे मुल्क पर 1965 में पाकिस्तानी जनरल, अयूब ने भी हमला कर दिया। युद्ध का समय और खाने की कमी। बहरहाल प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने जय जवान, जय किसान का नारा दिया और अनाज की बचत के लिए देश की जनता से आवाहन किया कि सभी लोग एक दिन का उपवास रखें। यानी मुसीबत से लडऩे के लिए हौसलों की ज़रूरत पर बल दिया। लेकिन भूख की लड़ाई हौसलों से नहीं लड़ी जाती। जो लोग 60 के दशक में समझने लायक थे उनसे कोई भी बता सकता है कि विदेशों से सहायता में मिले बादामी रंग के बाजरे को निगल पाना कितना मुश्किल होता है। लेकिन भूख सब कुछ करवाती है। अमरीका से पी एल 480 योजना के तहत मंगाये गए गेहूं की रोटियां किस रबड़ की तरह होती थीं .
केंद्र सरकार में ऊंचे पदों पर बैठे लोगों को क्या मालूम है कि गांव का गरीब किसान जब अपनी बुनियादी ज़रूरतों के लिए क़र्ज़ लेता है  तो कितनी बार मरता है, अपमान के कितने कड़वे घूंट पीता है। इन्हें कुछ नहीं मालूम और न ही आज के तोता रटंत पत्रकारों को जरूरी लगता है कि गांव के किसानों की इस सच्चाई का आईना इन कोल्हू के बैल नेताओं और नौकरशाहों को दिखाएं। गांव के गरीब की इस निराशा और हताशा का ही जवाब था १९६६ में शुरू हुआ खेती को  आधुनिक बनाने का वह ऐतिहासिक कार्य. २०१४ के चुनाव के पहले जब नरेंद्र मोदी ने किसान की आमदनी डबल करने की बात की तो लोगों को लगा कि शायद वैसा ही कुछ हो जाए . लेकिन आज की ज़मीनी सच्चाई यह है कि किसान के लिए सरकारी नीतियों में ऐसा कुछ नज़र नहीं आ रहा है.
किसानों की समस्या को समझने वालों ने इस देश में कभी भी सत्ता नहीं संभाली . जब से ईस्ट इण्डिया कंपनी ने भारत पर क़ब्ज़ा किया तब से ही खेती की अनदेखी होती रही है . सत्ताधीशों की सुविधा के अनुसार खेती करने के अवसर हमेशा से ही उपलब्ध कराये जाते रहे हैं . ऐसा नहीं है कि अपने देश में अधिक नक़दी देने वाली फसलों की कमी रही हो. लेकिन उनको भी शासक अपने हित साधन के लिए इस्तेमाल करते रहे हैं नील, अफीम,रबड़,चाय,पिपरमिंट,गन्ना ,काफी, मसाले आदि ऐसी फसलें हैं जो किसान को सम्पन्न बना सकती थीं लेकिन सरकारों ने ऐसा होने नहीं दिया . नील और अफीम को तो शुद्ध रूप से सरकारी नियंत्रण में ही रखा गया और वहां जमकर शोषण हुआ.महात्मा गांधी का चंपारण आन्दोलन ही नील के किसानों की समस्याओं को दृष्टि में रखकर किया गया . इस तरह के बहुत सारे उदहारण देश भर में हुए हैं जहाँ किसानों की समस्याओं की बुनियाद पर आन्दोलन शुरू हुए लेकिन अंत उनका भी सत्ताधीशों की शक्ति को पुख्ता करने में ही हुआ .आधुनिक युग में भी भारतीय किसान को अन्नदाता ही माना जा रहा है .किसी भी नेता का भाषण सुन लीजिये उसमें किसान को भगवान् बताने की कोशिश की जायेगी . लेकिन उसकी सम्पन्नता के बारे में कोई भी योजना कहीं नहीं नज़र आयेगी. किसान की दुर्दशा का बुनियादी कारण इसी सोच में है. उसकी पैदावार की कीमत सरकार तय करती है . और जब सरकार की तरफ से  न्यूनतम खरीद मूल्य तय करने की घोषणा की जाती है तो लगता है कि मंत्री जी बहुत बड़ी कृपा कर रहे हैं और किसान को कुछ खैरात में दे रहे हैं . इसके अलावा भी सरकारी नीतियों में भारी कमियाँ हैं . खाद के नाम पर  जो सब्सिडी आती थी वह  सीधे खाद का उत्पादन करने वाली कंपनी के खाते  में जमा हो जाता था और उस से उम्मीद की  जाती थी कि वह किसान को उसका लाभ देगा .लेकिन ऐसा होता नहीं था. वर्तमान सरकार में एक मंत्री जी हैं जो कभी  रासायनिक खाद विभाग के  मंत्री हुआ करते थे . उनके ऊपर आरोप लगा था कि  रासायनिक खाद पर सरकार ने जो भी सब्सिडी बढ़ाई थी उसका पचास प्रतिशत मंत्री ने  नक़द वापस ले  लिया था. जांच की मांग भी हुयी लेकिन मामला रफा दफा हो गया . ऐसे  बहुत सारे मामले हैं जहां सत्ताधीशों ने किसान के नाम पर हेराफेरी की है और किसान को घडियाली आंसू की बोतलें भेजते रहे हैं .समस्या का हल किसान को अन्नदाता और देश की खाद्य आवश्यकताओं के पूर्तिकर्ता के खांचे से बाहर निकालकर नीतियाँ बनाने की सोच में है .उस पर दया करने की कोई ज़रूरत नहीं है . दुनिया के कई देशों में अन्न की कमी है . वहां विश्व खाद्य संगठन आदि की मदद से अन्न भेजा जाता है. इस काम में अमरीका और  विकसित देशों का पूरी तरह  से कब्ज़ा है . हमें मालूम  है कि दुनिया की सबसे बड़ी खाद्य कंपनी कारगिल भारत में दूर दराज़ के गावों में जाकर सस्ते दाम पर गेहूं आदि खरीद रही है उस गेहूं को वह उन देशों में भेजती है जहाँ खाने की कमी होती है . कारगिल अमरीकी कंपनी है. सरकार को चाहिए कि किसानों की पैदावार को सीधे विश्व  भर में फैले उपभोक्ता तक पंहुचाने का उपाय करे. ऐसी नीतियाँ बनाई जाएँ जिससे किसान को बेचारा माने जाने वालों को समझ में आये कि किसान बेचारा नहीं होता, अगर जागरूकता हो तो वह अमरीकी किसानों की तरह बहुत सम्पन्नता का जीवन बिता सकता है लेकिन उसके लिए उसकी आत्मसम्मान की भावना को  सही मुकाम पर पंहुचाना होगा, उसको केवल मतदाता ही नहीं देश के विकास का हरावल दस्ता मानना होगा . 

न्याय और सुरक्षा मांगती बेटियों को लाठी से क्यों मारा ?

Wed, 04/10/2017 - 08:54

( 28 सितम्बर को लिखा गया लेख. अब वाइस चांसलर ,जी सी त्रिपाठी, "निजी कारण" से छुट्टी पर जाने को  मजबूर हो चुके हैं उर्फ़ औकात में आ गए हैं ) शेष नारायण सिंह   
काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से जो सन्देश आया है वह बहुत ही डरावना है . वहां की घटनाओं  से पुरुष आधिपत्य की  मानसिकता के जो संकेत आये हैं उनकी परतों की व्याख्या करने से जो तस्वीर उभरती है वह बहुत ही खतरनाक है . काशी का सन्देश यह है कि अगर आपने देश के सबसे बड़े विश्वविद्यालय में  अपनी  बेटी को पढने के लिए भेजा है तो आपको हमेशा चिंतित रहना चाहिए . यह भी संदेश आया है कि अपनी कमियाँ छुपाने के लिए बीएचयू का कुलपति किसी अन्य बहुत ही आदरणीय विश्वविद्यालय को अपमानित करने की कोशिश  कर सकता है . जब कुल्पति , जी सी त्रिपाठी ने  कहा कि जेएनयू कल्चर की एक मजिस्ट्रेट ने उनको बदनाम करने की कोशिश की तो वे अपनी हीनभावना पर परदा डालने की कोशिश कर रहे थे. उनको मालूम है कि जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में पढने लडकियों के माता पिता बेटी को वहां दाखिल  करवा कर जब लौटते हैं तो वह जानते हैं कि वे अपनी बेटी को देश की एक बेहतरीन शिक्षा  संस्था में  दाखिल करवा कर आये हैं . जेएनयू  का कैम्पस माँ की गोद की तरह सुरक्षित माना जाता है .  इसलिए बीएचयू के कुलपति जी ने यह  देश को यह सन्देश भी साफ़ साफ़ दे दिया कि वे अपने दिमाग की  गंदगी को ढकने के लिये किसी के पर दरवाज़े कीचड फेंकने में संकोच नहीं करेंगे .
आखिर काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की घटना क्या थी . हुआ यह था कि  छात्रावासों में रहने वाली लडकियां विश्वविद्यालय के कुलपति से मांग कर रही थीं, कि कैम्पस के पुरुष छात्रों और बाहरी तत्वों से लगातार होने वाली छेडछाड की घटनाओं से उनको बचाएं.  मौजूदा संकट की शुरुआत एक घटना से हुयी . किसी मोटरसाइकिल सवार लफंगे ने एक लडकी के साथ अभद्र आचरण किया . वह  लडकी अपनी शिकायत लेकर विश्वविद्यालय के चीफ प्राक्टर के पास गयी  . चीफ प्राक्टर और छात्रा के बीच बातचीत का जो विवरण सामने आया है वह हैरतंगेज़ है, सभ्य समाज को परेशान कर देने वाला है . छात्रा ने मीडिया को बताया है कि उस  दुष्टात्मा ने शिकायत सुनने के बाद उस लडकी  से कहा कि अब आप अपने हास्टल जायेंगी कि  रेप होने तक यहीं इंतजार करेंगीं. शूकर पुरुष मानसिकता के हिसाब से भी, यह कार्य निन्दनीय है . इसके बाद वह लडकी वापस आयी ,अपनी सहेलियों से ज़िक्र किया और कोई रास्ता न  देख कर अपने को अनाकर्षक बनाने के काम में जुट गयी . लडकी ने अपना सर मुंडवा लिया . मीडिया को उसने बताया कि उसने ऐसा  इसलिए किया जिससे कि वह बदसूरत लग सके जिससे लफंगों का ध्यान उसकी तरफ न  पड़े. बाद में लड़कियों ने चीफ प्राक्टर के नाम एक अर्जी लिखी और उनके पास कई लडकियां गईं . इस बार भी अपनी दम्भी मानसिकता  का परिचय देते हुए उन अधिकारी ने लड़कियों को अपमानित किया और भगा दिया . यहाँ यह समझ लेना ज़रूरी है कि  प्राक्टर कोई सुरक्षा बलों से अवकाशप्राप्त अधिकारी नहीं होता ,वह वास्तव में एक सीनियर शिक्षक होता है जो सुरक्षातंत्र के लोगों से संपर्क में रहता है और अपने बच्चों के कल्याण के लिए लगातार प्रयास करता रहता  है. यह लडकी जिसको उसने रेप की  धमकी दी थी वह भी उसकी बच्ची ही मानी जाती है. लड़कियों ने जो चिट्ठी लिखी वह बहुत ही साधारण मांग वाली थी. लड़कियों की चिट्ठी में केवल यह गुहार लगाई गयी  थी कि उनको  कैम्पस में आने वाले पुरुषों की छेड़छाड़ से  बचाएं . कोई भी सभ्य पुरुष इसके लिए उन लड़कियों को आश्वस्त कर देता लेकिन काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के चीफ प्राक्टर साहब ने उनकी चिट्ठी को नज़रंदाज़ कर दिया .  लडकियां काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के कुलपति महोदय से मिलने  गयीं लेकिन उन्होने मिलने से इनकार कर दिया. लडकियां धरने पर बैठ गईं फिर भी वीसी साहब मिलने से इनकार करते रहे. उसके बाद जो हुआ उसको पूरी दुनिया जानती है. इस सारे प्रकरण में मुख्य धारा के मीडिया के एक वर्ग की प्रवृत्ति बहुत ही अजीब रही . काशी हिन्दू विश्वविद्यालय वाराणसी में है . वहां  कई राष्ट्रीय अखबारों के संस्करण निकलते हैं अधिकतर ने सही रिपोर्टिंग नहीं की. वैकल्पिक  मीडिया के ज़रिये ख़बरें बाहर आईं और तब  बीएचयू के अधिकारियों को लगा कि मीडिया को मैनेज करने के बावजूद भी अत्याचार की  खबर को दबाया नहीं जा सका .एक सच्चाई और भी है. . काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में लडकियों को वह सम्मान कभी नहीं मिला को देश के अन्य विश्वविद्यालयों में लड़कियों को मिलता  है लेकिन एक बात देखी गयी थी कि अपनी  उग्र  पुरुषसत्तावादी मानसिकता के बावजूद  बीएचयू में पुरुष छात्र लड़कियों की रक्षा में खड़े होते रहे हैं . पुराने छात्र नेता ,चंचल ने यूनियन के अध्यक्ष पद का चुनाव लड़कियों की मर्यादा और खुदमुख्तारी को मुद्दा बनाकर लड़ा था और जीते थे. इस बार ऐसा नहीं  हुआ . बहुत बाद में आम छात्र नेताओं ने मामले  में दखल देना शुरू किया .जब पता लग गया कि केंद्र सरकार की सत्ताधारी पार्टी के सहयोगी कुलपति को कटघरे में खड़ा किया जा सकता है तब कुलपति की पार्टी से सम्बद्ध छात्र उसके बचाव में आ गए और अन्य छात्र उसके विरोध में मोर्चा सम्भालने में जुट गए. उसके बाद जो हुआ उसको अब सारी दुनिया जानती है. हालांकि मुख्यधारा के अखबार  बहुत बाद तक अपनी मुसीबतों के लिए लड़ रही छात्राओं को उपद्रवी ही बताते रहे लेकिन उनकी बात को कोई भी मान नहीं  रहा था. बीएचयू के महिला महाविद्यालय में पुलिस के हमले के बाद उत्तर प्रदेश सरकार भी हरकत में आयी और वाराणसी के कमिश्नर को जांच करने को कहा . कमिश्नर नितिन गोकर्ण ने जांच के बाद चीफ सेक्रेटरी को रिपोर्ट दे दी है  जिसमें उन्होंने बवाल के लिए बीएचयू प्रशासन को दोषी ठहराया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि बीएचयू प्रशासन ने छेड़छाड़ के मुद्दे पर गंभीरता नहीं दिखाई, न ही समय पर उचित कार्रवाई की। प्राथमिक जांच रिपोर्ट में गंभीर आरोप बीएचयू प्रशासन पर लगे . रिपोर्ट में कहा गया है कि पीड़ित छात्राओं की शिकायत  कुलपति त्रिपाठी ने नहीं सुनी. प्राक्टर पहले ही छात्राओं को  टरका चुका था. उसके बाद छेड़खानी से तंग आ चुकी छत्राओं ने धरने का रास्ता अपनाने का फैसला किया . इस जांच के  सामने आने के बाद बीएचयू प्रशासन सक्रिय हुआ. लेकिन उसके पहले तक जो हो चुका था , वह किसी भी विश्वविद्यालय के लिए कलंक की बात है . पुलिस की पाशविकता की जो  तस्वीर सामने आयी है वह बहुत ही हृदय विदारक है . अपनी  पुरुषसत्तावादी मानसिकता के लिए कुख्यात उत्तर प्रदेश पुलिस ने बीएचयू  कैम्पस  में बहुत ही गैरजिम्मेदार काम किया. एक तो महिला महाविद्यालय में देर रात को हमला करने जा रही फ़ोर्स में महिला सिपाहियों को शामिल नहीं किया . पुरुष सिपाहियों की फ़ोर्स ने लगभग आधी रात को  लड़कियों के छात्रालय पर हमला किया और महिला प्रोफेसरों को भी नहीं छोड़ा . बीएचयू की एक सहायक प्रोफ़ेसर ने बताया कि ," जब पुलिस लाठियां चला  रही थी तो एक छात्रा ज़मीन पर गिर गयी. मैं उस लडकी को बचाने गयी तो मैं भी पुलिस के हमले का शिकार हो गयी . मैंने उनसे  विनती की कि मैं विश्वविद्यालय की  टीचर हूँ लेकिन वे लोग  लाठियां चलाते ही रहे . उस समय रात के साढे ग्यारह बजे थे " पूरे मामले में  बीएचयू के कुलपति का रुख सबसे गैज़िम्मेदार था . घटना के बाद वे दिल्ली आये और एक  टेलिविज़न ने उनका इंटरव्यू किया . उस मीडिया संपर्क के बाद उनका जो स्वरुप देखा उससे साफ़ समझ में आ गया कि कैम्पस में उन्होंने जो कुछ किया वह तो बहुत कम था . वे अगर अपनी पर उतर आते तो वे और भी  बहुत कुछ कर सकते थे . टेलिविज़न चैनल में कुलपति गिरीश चन्द्र त्रिपाठी  को देखकर लगा ही नहीं कि यह व्यक्ति उसी विश्वविद्यलय का कुलपति है जहाँ कभी कुलपति के रूप में बहुत बड़े विद्वान विराजते थे .पंडित मदन मोहन मालवीय स्वयं काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के कुलपति  रहे. उनके पहले सर सुन्दर लाल और सर पी एस शिवस्वामी अय्यर जैसे महान लोग भी बीएचयू के कुलपति रह चुके थे . मालवीय जी के अट्ठारह साल के कार्यकाल के बाद डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन भी कुलपति रहे .अमरनाथ झा, आचार्य नरेंद्र देव और त्रिगुण सेन जैसी महान लोग काशी हिन्दू  विश्वविद्यालय के कुलपति पद पर रह चुके हैं . जब टेलिविज़न पर मौजूदा कुलपति प्रोफ़ेसर गिरीश चन्द्र त्रिपाठी का दर्शन हुआ तो समझ में आया कि इतनी ऊंची परम्परा वाले विश्वविद्यालय का क्या हाल हो चुका है . कुलपति ने अपनी ही लड़कियों को पिटवाने के लिए कैम्पस में पुलिस बुला लिया जबकि  भारत छोडो आन्दोलन के दौरान इसी विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ एस राधाकृष्णन ने बीएचयू के  कैम्पस में अंग्रेजों की पुलिस को दाखिल होने की अनुमति नहीं दी थी. बीएचयू की परम्पराओं का पतन १९६७ में शुरू हुआ जब इंदिरा गांधी की सरकार थी . केंद्रीय विश्वविद्यालय था . इंदिरा गांधी में सस्थाओं के प्रति सम्मान की वह  भावना नहीं थी जो पंडित जवाहरलाल नेहरू में थी. नतीजा यह हुआ कि केन्द्रीय विश्वविद्यालयों में कुलपति भी सिफारशी होने लगे . उसी क्रम में उन्होंने ए सी जोशी को कुलपति बनाया और फिर जो ढलान शुरू हुआ वह आजतक जारी है . ए सी जोशी के कार्यकाल में ही बीएचयू का  कुलपति अफसर माना जाने लगा ,वरना उसके पहले वह परिवार का सही अर्थों में मुखिया होता था. जोशी जी के  कार्यकाल  में ही बीएचयू कैम्पस में पुलिस ने छात्रावासों के अन्दर घुसकर लड़कों की खूब पिटाई की थी. उसी के बाद  छात्र आन्दोलन से निपटने के लिए विश्वविद्यालय को अनिश्चित काल के लिए बंद करने की परम्परा शुरू हुई. और वहां से चलकर आज की हालात तक बात पंहुची है .    बताते हैं कि इसी नवम्बर में  मौजूदा कुलपति जी सी त्रिपाठी का कार्यकाल पूरा हो रहा है . वे एक टर्म और चाहते हैं . दिल्ली दरबार में फेरी भी लगा रहे हैं . आर एस एस का समर्थन उनको पहले से ही है .लेकिन लगता  है कि इस काण्ड के बाद उनकी पकड़ आर एस एस पर कमज़ोर  पड़ेगी. एक जानकार ने बताया कि जब वे अपनी मंशा लेकर शिक्षा मंत्री प्रकाश जावडेकर के सामने पेश हुए थे तो उन्होंने साफ बता दिया था कि आप अपना कार्यकाल सम्मान पूर्वक बिताकर चले जाइए अब वहां किसी विद्वान व्यक्ति को कुलपति बनाया जाएगा . हालांकि अब यह लगने लगा है कि कुलपति जी सी  त्रिपाठी को अपना कार्यकाल पूरा करना भी भारी पड़ेगा
काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की घटना के बाद  हवा में बहुत सारे सवाल उठ खड़े हुए हैं . एक सवाल यह है कि अगर उच्च शिक्षा के केन्द्रों में महिलाओं की इज्ज़त की सुरक्षा की गारंटी नहीं दी जा सकती तो हम बेटी बचाओ , बेटी पढाओ का नारा क्यों लगाते हैं . . बीएचयू के आन्दोलन में लड़कियों का नारा था, " न्याय, सुरक्षा आज़ादी, मांगे आधी आबादी ." इसमें ऐसी कौन सी बात थी जिससे देश की शान्ति को ख़तरा था. या जैसा कि बाद में टेलिविज़न पर कुलपति त्रिपाठी ने कहा  कि प्रधानमंत्री की सभा में अडंगा लगाने के लिए यह आन्दोलन किया गया था. सच्ची बात यह है कि अगर गिरीश चन्द्र त्रिपाठी ने सही समय पर इस समस्या का हल निकाल दिया होता तो उनके फैसले से प्रधानमंत्री की वाहवाही ही होती . उन्होंने यह भी  कहा कि कैम्पस में पेट्रोल बम चल रहे थे .  उनकी इस बात को न तो उत्तर प्रदेश  सरकार ने गंभीरता से लिया और न ही केंद्र  सरकार ने .काशी हिन्दू विश्वविद्यालय का सबक यह है कि केंद्र सरकार को चाहिए कि चेलों को पदासीन करने के काम से बाज आये और विश्वविद्यालयों को विद्वत्ता और  शोध का केंद्र बनाने का प्रयास करे

बूथ पर तैनात सरकारी कर्मचारी भी चुनाव जितवा सकते हैं

Sat, 30/09/2017 - 13:31


शेष नारायण सिंह

नई दिल्ली, २९ सितम्बर .भारत में चुनाव परिणामों को प्रभावित करने वाले कारणों में एक नया आयाम जुड़ गया है . एक शोधपत्र में यह नतीजा निकला है कि बूथों पर चुनाव संपन्न करने वाले पोलिंग अधिकारी और पीठासीन अधिकारी भी चुनाव नतीजों को प्रभावित करते हैं. ज़मीनी आंकड़ों को इकठ्ठा करके  गंभीर मंथन के बाद यह बात सामने आयी है कि  मतदान करवाने  वाले अधिकारी कई बार चुनावे नतीजों को इस हद तक प्रभावित करते हैं कि नतीजे पलट भी सकते हैं . कुछ मामलों में तो बूथ अधिकारी की पक्षधरता मत प्रतिशत में सात प्रतिशत तक का बदलाव का कारण बनी है .
ब्राउन विश्वविद्यालय के डॉ युसफ नेगर्स ने अपनी नई खोज में यह  सिद्ध करने का प्रयास किया है कि हरेक बूथ पर काम करने वाले सरकारी अधिकारी भी चुनाव को प्रभावित करते सकते हैं. “ Enfranchising your own ? Experimental Evidence on Bureaucrat Diversity and Election Bias in India “  नाम का उनका शोधपत्र उपलब्ध है . युसूफ नेगर्स आजकल ब्राउन विश्वविद्यालय में हैं . उन्होंने हार्वर्ड विश्वविद्यालय  से पाब्लिक पालिसी में पी एच डी किया है.लन्दन स्कूल आफ इकनामिक्स के छात्र रहे डॉ नेगर्स को राजनीतिक अर्थशास्त्र के क्षेत्र में अधिकारी विद्वान् माना जाता है . उनके यह नतीजे आने वाले समय में भारत में चुनाव करवाने वाली संस्थाओं का ध्यान निश्चित रूप से आकर्षित करने वाले हैं .शोध का नतीजा  है कि अपनी बिरादरी या  धर्म के   लोगों के पक्ष में बूथ स्तर के अधिकारी मतदान के पैटर्न को प्रभावित कर सकते हैं.इससे चुनाव की  निष्पक्षता प्रभावित  होती है. इस बात को इस पर्चे में सिद्ध कर दिया गया है.  अगर पोलिंग पार्टी में एक जाति विशेष के ही अधिकारी हैं तो उस जाति के उम्मीदवार या पार्टी को ज्यादा वोट मिलने की संभावना बढ़ जाती है .अगर चुनाव धार्मिक ध्रुवीकरण के माहौल में संपन्न हो  रहा है तो जो पार्टी अधिसंख्य आबादी वालों की प्रतिनिधि के रूप में प्रचारित हुयी रहती  है , उसका फायदा होता है . ऐसे माहौल में आम तौर पर अल्पसंख्यक मतदाताओं की पहचान  आदि में काफी सख्ती बरती जाती है . कई बार उनको लौटा भी दिया जाता है लेकिन अगर पोलिंग पार्टी में कोई भी अधिकारी या कर्मचारी अल्पसंख्यक समुदाय का होता है तो यह धांधली  नहीं हो पाती . कुल मिलाकर इस तरह के आचरण से चुनावी नतीजे प्रभावित होते हैं . भारत में चुनाव प्रक्रिया, उसके नतीजों आदि के राजनीति शास्त्र पर दुनिया भर में बहुत शोध हुए  हैं लेकिन इस विषय पर यह पहला काम है . पर्चे में इस बात को भी  रेखांकित किया गया है कि भारत में चुनाव अधिकारियों की निष्पक्षता पर अब ऐलानियाँ सवाल उठाये जा रहे हैं . पूरी दुनिया के देशों के चुनावी आचरण पर सर्वे करने वाली  संस्था, वर्ल्ड वैल्यूज़ सर्वे के ताज़ा आंकड़ों के अनुसार सर्वे किये गए कुल देशों के तीन चौथाई देशों में  करीब २५ प्रतिशत लोग मानते हैं कि  चुनाव अधिकारी आम  तौर पर बेईमानी करते हैं . और यह भी कि आधी दुनिया में बूथ पर होने वाली हिंसा राजनीतिक चिंता का विषय है. विकासशील देशों में यह वारदातें ज्यादा होती हैं . लेकिन यह बीमारी अमरीका  जैसे विकसित देशों में भी है . २०१४ के एक सर्वे के अनुसार अमरीका में भी भरोसेमंद , प्रशिक्षित और  निष्पक्ष चुनाव कार्मचारियों की भारी कमी है .शोधपत्र में भारतीय चुनाव प्रक्रिया को तकनीकी रूप से उच्च  श्रेणी की बताया गया है .लेकिन फिर भी अधिकारियों के पूर्वाग्रह जनता के मत को प्रभावित कर सकते हैं और करते हैं  .इस गड़बड़ी को दूर करने का तरीका यह हो सकता है कि हर बूथ पर जाने वाली पोलिंग पार्टी में एक ही जाति या  धर्म के लोगों को न रख कर बूथों पर ऐसे कर्मचारी तैनात किये जाएँ जिनकी जाति और धर्म में वैभिन्य हो.

भूखे बेघर दुधमुंहे बच्चे आतंकवादी नहीं होते , सरकार

Sat, 30/09/2017 - 07:42

शेष नारायण सिंह
म्यांमार में अपना घरबार छोड़कर भाग रहे रोहिंग्या मुसलमानों की दर्दभरी कहानी पूरी  दुनिया में चर्चा  का विषय है .  अरकान में बसे इन लोगों की नागरिकता छीन ली गयी है . यह देशविहीन लोग हैं . अमनेस्टी इंटरनैशनल की रिपोर्ट है कि भागते हुए   रोहिंग्या मुसलमानों के  घरों में  अभी भी ( २४ सितम्बर,१७  )आग लगी  हुई है . जो बुझ गयी है उनमें से धुंआ निकल रहा है . आसमान से ली गई तस्वीरों में यह तबाही का मंज़र साफ़   देखा जा सकता  है . अमनेस्टी इंटरनैशनल की निदेशक तिराना हसन का कहना है कि जो सबूत मिले हैं वे म्यांमार  की शासक आंग सां सू ची की झूठ को बेनकाब कर  देते हैं . ऐसा लगता है कि म्यांमार के अधिकारी  यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि जो लोग भाग कर देश छोड़कर जाने को मजबूर किये जा रहे  हैं अगर वे कभी अंतर्राष्ट्रीय दबाव  के चलते वापस भी आयें तो उनको अपने घर की जगह पर  कुछ न मिले .. उनको उनके घरों की राख हे  नज़र आये .म्यांमार में तबाह हो रहे लोग पड़ोस के देशों में शरण लेने को मजबूर हैं . दिनरात चल कर बंगलादेश , भारत , मलयेशिया आदि देशों में पंहुच रहे लोगों को पता ही नहीं है कि कहाँ जा रहे हैं . उनके साथ बीमार लोग हैं , भूख से तड़प रहे बच्चे हैं , चल फिर सकने  से  मजबूर बूढ़े हैं , गर्भवती महिलायें हैं और दुधमुंहे   नवजात शिशु हैं . बड़ी संख्या में  भारत में भी म्यांमार के रोहिंग्या शरणार्थी पंहुच रहे  हैं. मौत से भाग कर नदी, नाले, पहाड़ , जंगल के  रास्ते अनिश्चय की दिशा में  भाग रहे लोगों को कहीं जाने का ठिकाना  नहीं है .बड़ी संख्या में लोग भारत भी आ रहे  हैं.  हमारी सरकार ने साफ़ कर दिया है कि इन लोगों को अपने देश में ठिकाना  नहीं दिया जाएगा.  भारत के गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने आधिकारिक बयान दे दिया है और कहा  है कि म्यांमार के अराकान  प्रांत से आ रहे लोग शरणार्थी  नहीं  हैं , वे गैरकानूनी तरीके से आ रहे लोग हैं .  उनको देश की सीमा के  अन्दर नहीं आने दिया जाएगा . म्यांमार से लगे राज्यों की सीमा चौकसी बढ़ा दी गयी  है .भारत सरकार के रुख से एकदम साफ़  है कि रोहिंग्या शरणार्थी भारत में नहीं आ सकते  और जो पहले से आ चुके हैं ,उनको देश से निकाल दिया जाएगा . जो  हालात अराकान में है उसमें वे अपने घर तो नहीं जा सकते , समझ में नहीं आता कि उनको भेजा कहाँ जाएगा .अपनी जान की हिफाज़त की मांग करते हुए कुछ  रोहिंग्या शरणार्थियों ने सुप्रीम कोर्ट में गुहार लगाई  है.  अपने हलफनामे में  दो रोहिंग्या लोगों ने कहा है कि अगर  उनके बीच से कोई बदमाशी कर रहा हो तो उसको तो देश से निकाल  दिया जाए या सज़ा दी जाए लेकिन  जो लोग मौत से भाग कर यहाँ शरण लेकर अपनी जान बचा रहे हैं उनको वापस न भेजा  जाए क्योंकि  वहां तो निश्चित मौत उन लोगों का इंतज़ार कर रही है.  जिन दो लोगों ने सुप्रीम कोर्ट में अर्जी दी है वे करीब पांच-छः साल से भारत में शरण लिए हुए  हैं.  उन्होंने  बाहलफ बयान दिया है कि उन दोनों के खिलाफ कोई भी मामला कहीं भी दर्ज नहीं है , यहाँ तक  उनकी जानकारी में किसी भी  रोहिंग्या के खिलाफ कोई मामला नहीं है. उनकी वजह से  राष्ट्रीय सुरक्षा को कोई ख़तरा नहीं है . फरियादियों ने कहा है कि पता लगा है कि सरकार ऐसे चालीस हज़ार रोहिंग्या शरणार्थियों का पता लगाएगी और उनको  देश से निकाल देगी . उन्होंने प्रार्थना की है कि हालांकि भारत ने शरणार्थियों के अंतर राष्ट्रीय कन्वेंशन पर दस्तखत नहीं किया है लेकिन मुसीबतज़दा लोगों की  हमेशा  ही मदद करता रहा है . प्रार्थना की गयी है कि वे भारत में रहने या स्वतंत्र रूप से कहीं  भी आने जाने के अधिकार की मांग नहीं कर रहे हैं .  उनको अपनी हिफाज़त में केवल  तब तक रहने दिया जाय जब तक कि उनके देश में  उनकी जान  पर मौत का साया मंडरा रहा है . उन्होंने कहा कि भारत में  उनको किसी तरह का  अधिकार नहीं चाहिए .  रोहिंग्या फरियादियों ने अपील की है कि जिस तरह  से भारत में तिब्बत और श्रीलंका से आये शरणार्थियों की जान की हिफाज़त की व्यवस्था है , वही उनको भी उपलब्ध करा दी जाए.  दया की अपील को संविधान की सीमा में रखने की बात भी की गयी है .    याचिका में कहा गया है कि रोहिंग्या अपना वतन  छोड़कर भाग रहे हैं क्योंकि म्यांमार में उनको सिलसिलेवार तरीके से परेशान किया जा रहा है . उनकी मुसीबत का कारण उनका धर्म और उनकी  जातीय पहचान है . इसलिए अंतर्राष्ट्रीय कानून के तहत वे शरणार्थी हैं और  वे अपने देश वापस नहीं जा सकते क्योंकि वहां उनको फिर वही यातना सहनी पडेगी.  सुप्रीम कोर्ट ने मामले को सुनवाई के लिए स्वीकार कर लिया है और अब अगली सुनवाई ३ अक्टूबर   को होगी. केंद्र सरकार के सख्त   रुख के कारण रोहिंग्या लोगों का अब भारत में रह पाना मुश्किल है, सुप्रीम कोर्ट से उनको कुछ उम्मीद है. लेकिन देश में उनको लेकर  बड़े पैमाने पर सियासत शुरू हो गयी है . किसी कोने में  पड़े हुए कुछ मौलाना मैदान में आ गए हैं जो अपनी राजनीतिक रोटियाँ सेंकने में लग गए हैं . एक मौलाना ने कोलकता की एक मीटिंग में कह  दिया  कर्बला में हम बहत्तर थे लेकिन हमने लाखों का जनाज़ा निकाल दिया . अब कोई इस मौलाना से कहे कि भाई जिस अराकान में इन मुसलमानों   के ऊपर हर तरह की मुसीबत टूट पडी है आप  वहां क्यों नहीं जाते , वहां जाइए और वहां का जो भी यजीद हो उसको खत्म कर के इन गरीब लोगों की जान  बचाइये ., तो बगलें झाँकने लगेंगे . लेकिन यहाँ भारत में जहां हर  तरह से  तबाह रोहिंग्या ने शरण ले  रखी है उनके खिलाफ माहौल बनाकर आपको क्या  मिलेगा . लेकिन वे अपनी हरकत से  बाज़ नहीं  आयेंगें . इन्हीं गैरजिम्मेदार मौलाना साहिबान के मेहरबानी से  देश में चारों तरह सक्रिय हिंदुत्व  के अलमबरदारों को हर मुसलमान के खिलाफ लाठी भांजने का  बहाना मिल जाता  है.   रोहिंग्या के भारत में  रहने के मुद्दे पर टेलिविज़न पर हो रही एक बहस में मैने मन बनाया था कि रोहिंग्या मुसलमानों की मुसीबतों को सही संदर्भ में देश के सामने रखने की कोशिश की जायेगी लेकिन गैरजिम्मेदार के किस्म के लोगों के बयानात शुरू हो गए और सारी बहस रास्ते से भटक गयी . भारत की मौजूदा  सत्ताधारी  पार्टी की तो हमेशा   ही  कोशिश रहती है कि जहाँ भी संभव हो और जहां तक बस चले माले को हिन्दू-मुस्लिम कर देना उनके वोटों के लिहाज़ से सही रहेगा ,इसलिए उनके प्रवक्ता इस तरह की बात हर हाल में करना चाहते  हैं. जाने अनजाने पढ़े लिखे  मुसलमान भी उसी पिच पर बात करने लगते हैं . समझ में नहीं आता  कि एक मुसीबतज़दा समुदाय के प्रति समाज का एक बड़ा हिस्सा इतना निर्दयी क्यों  हो रहा है . रोहिंग्या दुनिया के सबसे ज्यादा खस्ताहाल  लोग हैं .म्यांमार में रोहिंग्या मुसलमान   सदियों से बर्मा के अरकान प्रदेश में रह रहे हैं लेकिन १९८२ में बर्मा की फौजी हुकूमत ने उनकी नागरिकता छीन ली और ऐलान कर दिया कि वे  बर्मा के नागरिक नहीं हैं .  बर्मा में करीब १३५ जातीय समूहों को सरकारी मान्यता मिली हुयी  है लेकिन रोहिंग्या को उस  श्रेणी में नहीं रखा गया है . इसके पहले जब बर्मा में  लोकतंत्र शासन था तो उनकी इतनी दुर्दशा नहीं थी . बर्मा में करीब सवा सौ साल  ( १८२४ - १९४८ ) अंग्रेज़ी राज रहा था , उस दौर में  वहां बड़ी संख्या में भारत से मजदूर गए थे .  अंग्रेजों ने बर्मा को भारत के  एक राज्य के रूप में रखा था इसलिए इन लोगों को उस समय विदेशी नहीं माना गया  था, उनका आना  जाना  अपने  ही देश में  आने जाने जैसा था .  लेकिन इन लोगों के वहां जाकर काम करने और बसने को वहां के स्थानीय लोगों ने स्वीकार नहीं किया था .आज म्यांमार के शासक उसी  मुकामी सोच के तहत  इन लोगों को अपने देश का नागरिक नहीं मानते .म्यांमार की हुकूमत  इन लोगों  को अभी भी  रोहिंग्या नहीं मानती , वे इनको बंगाली घुसपैठिया  ही बताते हैं .१९४८ में म्यांमार ( बर्मा ) की आज़ादी के बाद रोहिंग्या को कुछ दिन सम्मान मिला .  इस समुदाय के कुछ लोग संसद  के सदस्य  भी हुए , सरकार में भी शामिल हुए लेकिन १९६२ में  फौजी हुकूमत की स्थापना के बाद सब कुछ बदल गया .  कई पीढ़ियों से यहाँ रह रहे लोगों को भी विदेशी घोषित कर दिया गया . नतीजा यह हुआ कि उनको नौकरी आदि मिलना बंद हो गया . रोहिंग्या म्यांमार के चुनावों में वोट नहीं दे सकते .मौजूदा मुसीबत की शुरुआत अक्टूबर २०१६ में शुरू  हुयी जब रोहिंग्या मुसलमानों की  नुमाइंदगी  का दावा करने वाले  और अपने को अरकान रोहिंग्या साल्वेशन आर्मी का सदस्य बताने वाले कुछ लोगों ने अगस्त के महीने में म्यांमार की बार्डर पुलिस के ९ कर्माचारियों को मार डाला . उसके बाद म्यांमार की सेना की टुकड़ियां अरकान के गाँवों में घुसने लगीं और लोगों को प्रताड़ित करने लगीं . सैनिकों ने लोगों को क़त्ल किया, रेप किया और घर जलाए . हालांकि यह सब काम म्यांमार की सेना २०१३ से ही शुरू कर चुकी थी लेकिन अक्टूबर २०१६ में उनको  बड़ा बहाना मिल गया . यह भी सच है कि रोहिंग्या समुदाय में कुछ लोगों ने हथियार उठा लिया है लेकिन सेना उनको तो पकड़ नहीं पाई  , अलबत्ता गांवों में रह रहे निहत्थे मुसलमान मर्दों को  मार डालने का सिलसिला लगातार चलता  रहा.रोहिंग्या की मुसीबत में जो इंसान  सबसे घटिया नज़र आ रहा है उसका नाम  है म्यांमार की स्टेट चांसलर आंग  सां सू ची. वे  रोहिंग्या की समस्याओं पर कोई बात करने को तैयार नहीं हैं . वे इन लोगों को आतंकवादी कहती  हैं .यह  बेशर्मी की हद है  कि दुनिया भर में  पनाह मांग रहे गरीब, भूखे ,  बूढ़े बच्चे , औरतें उनकी नज़र में आतंकवादी हैं . उनको याद रखना चाहिए कि एक समय था जब जब आंग सां सू ची भी अपने वतन के  बाहर ठोकर खा रही थीं और भारत समेत पूरी दुनिया उनकी और उनके लोगों की भलाई की बात करती थी . तब म्यांमार की फौजी हुकूमत उनको आतंकवादियों का नेता कहती थी .  अगर उस वक़्त  दुनिया ने  उनको भी वैसे ही ठुकराया होता जैसे वे अनाथ रोहिंग्या  म्यांमार के निवासियों को ठुकरा रही हैं तो वे आज कहाँ होतीं.  इस सारी  मुसीबत में बंगलादेश की  प्रधानमंत्री शेख  हसीना एक  महान नेता के रूप में पहचानी जा रही हैं और शरणार्थियों को  संभाल रही हैं. भारत के प्रधानमंत्री के पास भी  मौक़ा है कि वे दुनिया के बड़े  नेता के रूप में अपने को स्थापित कर लें लेकिन अभी तक भारत सरकार का रुख मानवता के बहुत बड़े पक्षधर के रूप में नहीं आया है .आगे शायद हालात कुछ  बदलें.

डॉ एस के सरीन मेरे लिए किसी फ़रिश्ते से कम नहीं .

Wed, 27/09/2017 - 22:45


शेष नारायण सिंह


२७ सितम्बर २०१६  के दिन मेरे  डाक्टर  ने एक बहुत बड़ा फैसला लिया था . मेरे लिए डॉ सरीन फ़रिश्ता  हैं . २८ दिन से मेरा बुखार उतरा नहीं था. मैं ११ सितम्बर को वसंत कुञ्ज,नई दिल्ली के आई एल बी एस ( ILBS) अस्पताल में दाखिल हुआ था . जब मैं उस अस्पताल  में गया था तो मेरी हालत बहुत ही खराब  थी . बाकी तो सब ठीक हो गया लेकिन बुखार नहीं उतर रहा  था. कैंसर , टीबी, आदि भयानक बीमारियों के टेस्ट हो गए थे , सब कुछ  रूल आउट हो गया था लेकिन बुखार? डॉ एस के सरीन  इलाज में नई नई खोज के लिए दुनिया  भर में विख्यात हैं  .गैस्ट्रो इंटाइटिस का सबसे सही इलाज उनके नाम पर रजिस्टर्ड है.  दुनिया के कई  अस्पतालों में ' सरीन प्रोटोकल ' से ही इस बीमारी का इलाज किया जाता  है .   मेरे सैकड़ों टेस्ट हो चुके थे लेकिन बुखार का कारण पता नहीं लग रहा था. डॉ सरीन ने इम्पिरिकल आधार पर नई दवा तजवीजी और इलाज शुरू कर दिया  . तीन दिन के अन्दर बुखार खत्म . इसलिए २७  सितम्बर २०१६ को मैं अपने पुनर्जीवन की शुरुआत मानता हूँ . पांच अक्टूबर २०१६ के दिन जब मुझे अस्पताल से  छुट्टी मिली तो मेरे  डाक्टर ने कहा था कि " अब आप जाइए फिजियोथिरैपी होगी और आप चलना फिरना शुरू कर देंगें . बस एक बात का ध्यान रखना --- "अगर बुखार हो या उल्टी आये तो बिना किसी से  पूछे सीधे अस्पताल आ जाइएगा, मुझे या किसी और से संपर्क करने की कोशिश भी मत करना . सिस्टम अपना काम करेगा . मुझे  तुरंत पता लग जाएगा ."  ऐसी नौबत नहीं आयी , फ़रिश्ते का हाथ जो मेरे ऊपर था . आज एक साल बाद जब मेरे दोस्त कहते हैं कि अब आप पहले से भी ज्यादा स्वस्थ लग रहे हैं तो डॉ एस के सरीन एक सम्मान में सर झुक जाता  है.  डॉ सरीन मेडिकल एथिक्स बड़े साधक हैं .अपने देश में अगर इसी तरह के मेडिकल एथिक्स के बहुत सारे साधक हर अस्पताल में हों तो अपने देश की  स्वास्थ्य व्यवस्था में क्रान्ति आ सकती  है. सितम्बर २०१६ के बाद की अपनी ज़िंदगी को मैं डॉ सरीन की तपस्या का प्रसाद मानता हूँ और इसको सबके कल्याण के लिए समर्पित कर चुका हूँ . 

हिंदी के विकास के लिए उसको बच्चों की भाषा बनाना बहुत ही ज़रूरी है

Sat, 23/09/2017 - 10:09
.
शेष नारायण सिंह
इस साल का हिंदी दिवस और सरकारी दफ्तरों का हिन्दी पखवाड़ा बीत गया .  नई दिल्ली के सरकारी दफ्तरों में खूब आना जाना हुआ. हर जगह हिंदी पखवाडा का बैनर लगा था. लेकिन वहां काम करने वालों से बात करने पर वही हिंदी सुनने को मिली जिसको दिल्ली के एक प्रतिष्ठित हिंदी अखबार ने असली हिंदी बताने का बीड़ा उठा रखा है . हिंदी पखवाड़े के दौरान नज़र आई एक भाषाई बानगी ," यू नो, आई वेरी मच लाइक हिंदी लैंग्वेज। मैं हिंदी बोलने वालों को एप्रिसिएट करता हूँ।"  इस हिंदी को हिंदी भाषा के विकास का संकेत मानने  वाले वास्तव में भाषा की हत्या कर रहे हैं . सच्ची बात यह है कि इस  तरह की भाषा का  इस्तेमाल करके वे लोग अपनी धरोहर और भावी  पीढ़ियों के विकास पर ज़बरदस्त हमला कर रहे हैं . ऐसे लोगों की चलते ही बहुत बड़े पैमाने पर भाषा का भ्रम फैला हुआ  है.  आम धारणा फैला  दी गयी है कि भाषा सम्प्रेषण और संवाद का ही माध्यम है . इसका अर्थ यह हुआ कि यदि भाषा दो व्यक्तियों या समूहों के बीच संवाद स्थापित कर सकती है और जो कहा जा  रहा है उसको समूह समझ रहा है जिसको संबोधित किया जा रहा है तो भाषा का काम हो गया . लोग कहते  हैं कि भाषा का यही काम है  लेकिन यह बात सच्चाई से बिलकुल परे है . यदि भाषा केवल बोलने और समझने की  सीमा तक सीमित कर दी गयी तो पढने और लिखने का काम कौन करेगा . भाषा को यदि  लिखने के काम से मुक्त कर दिया गया तो   ज्ञान को आगे कैसे बढ़ाया जाएगा . भाषा को जीवित रखने के लिए पढ़ना भी बहुत ज़रूरी है क्योंकि श्रुति और स्मृति का युग अब नहीं है . भाषा  सम्प्रेषण का माध्यम है लेकिन वह धरोहर और मेधा की वाहक भी  है .  इसलिए भाषा को बोलने ,समझने, लिखने और पढने की मर्यादा में ही रखना ठीक रहेगा . यह  भाषा की प्रगति और   सम्मान के लिए सबसे आवश्यक शर्त है . भाषा के लिए समझना और बोलना सबसे छोटी भूमिका है .  जब तक उसको पढ़ा  और लिखा नहीं जाएगा तब तक वह  भाषा  कहलाने की अधिकारी ही नहीं होगी. वह केवल बोली होकर रह जायेगी .  यह बातें सभी भाषाओं के लिए सही है  लेकिन हिंदी भाषा  के लिए ज्यादा सही  है. आज जिस तरह का विमर्श हिन्दी के बारे में देखा जा रहा है वह हिंदी के संकट की शुरुआत का संकेत माना जा सकता है. हिंदी  में अंग्रेज़ी शब्दों को डालकर उसको  भाषा के विकास की बात करना  अपनी हीनता को स्वीकार करना  है . हिंदी को एक वैज्ञानिक सोच की भाषा और सांस्कृतिक थाती  की वाहक बनाने के लिए अथक प्रयास कर रहे  भाषाविद, राहुल देव   का कहना  है  कि, "हिंदी  समाज वास्तव में एक आत्मलज्जित समाज है . उसको अपने आपको हिंदी वाला कहने में शर्म आती है  . वास्तव में अपने को दीन मानकर ,अपने दैन्य को छुपाने के लिए वह अपनी हिंदी में अंग्रेज़ी  शब्दों को ठूंसता है " इसी तर्क के आधार पर हिंदी की वर्तमान स्थिति को समझने का प्रयास किया  जाएगा.
 हिंदी के बारे में एक और भाषाभ्रम भी बहुत बड़े स्तर पर प्रचलित है .  कहा जाता है कि भारत में टेलिविज़न और सिनेमा  पूरे देश में हिंदी का विकास कर रहा है . इतना ही नहीं इन  माध्यमों के  कारण विदेशों में भी  हिंदी का विस्तार हो रहा है. लेकिन इस तर्क में दो  समस्याएं हैं. एक तो यह कि सिनेमा टेलिविज़न की हिंदी भी वही वाली है जिसका उदाहरण ऊपर दिया गया है  और दूसरी  समस्या  यह है कि बोलने या समझने से किसी भाषा का  विकास नहीं हो सकता . उसको  लिखना और बोलना बहुत ज़रूरी है , उसके बिना फौरी तौर पर संवाद तो  हो जाता है लेकिन उसका कोई  स्वरुप तय नहीं होता.  टेलिविज़न और सिनेमा में पटकथा या संवाद लिखने वाले बहुत से ऐसे  लोग हैं  जो हिंदी की सही समझ रखते हैं लेकिन शायद उनकी कोई मजबूरी होती है  जो उल्टी सीधी भाषा लिख देते हैं . हो   सकता है कि उनके अभिनेता या निर्माता उनसे वही मांग करते हैं .  इन लेखकों को प्रयास करना चाहिए कि निर्माता निदेशकों को यह समझाएं कि यदि सही भाषा लिखी गयी तो भी बात और अच्छी हो जायेगी . यहाँ डॉ चन्द्र प्रकाश द्विवेदी  की फिल्मों का उदाहरण  दिया जा सकता  है जो भाषा के बारे में बहुत ही सजग रहते हैं. अमिताभ बच्चन की भाषा भी एक अच्छा उदाहरण है .  सिनेमा के संवादों में उनकी हिंदी को सुनकर भाषा की क्षमता का अनुमान लगता  है .सही हिंदी बोलना असंभव नहीं है ,बहुत आसान  है. अधिकतर सिनेमा कलाकार निजी बातचीत में अंग्रेज़ी बोलते पाए जाते हैं जबकि उनके रोजी रोटी का साधन  हिंदी सिनेमा ही है. पिछले दिनों एक टेलिविज़न कार्यक्रम में फिल्म अभिनेत्री कंगना रनौट की भाषा सुनने का अवसर मिला , जिस तरह से उन्होंने हिंदी शब्दों और मुहावरों का प्रयोग किया ,उसको टेलिविज़न और  सिनेमा वालों को  उदाहरण के रूप में प्रयोग करना चाहिए .  एक अन्य अभिनेत्री स्वरा भास्कर भी बहुत अच्छी भाषा बोलते देखी और सुनी गयी हैं . . डॉ  राही मासूम  रज़ा ने टेलिविज़न और सिनेमा के माध्यम से सही हिंदी को पूरी दुनिया में  पंहुचाने  का जो काम किया है ,उस पर किसी भी भारतीय को गर्व हो सकता  है. कुछ दशक पहले  टेलिविज़न पर दिखाए गए उनके धारावाहिक , ' महाभारत ' के संवाद  हमारी भाषाई धरोहार का हिस्सा बन चुके हैं.  टेलिविज़न बहुत बड़ा माध्यम है , बहुत बड़ा उद्योग है . उसका समाज की भाषा चेतना पर बड़ा असर पड़ता है . लेकिन सही भाषा बोलने वालों की गिनती उँगलियों पर की जा सकती है .दुर्भाग्य की बात यह है कि  आज इस माध्यम के कारण  ही बच्चों के  भाषा संस्कार बिगड़ रहे  हैं. छतीसगढ़ हिंदी साहित्य सम्मलेन के  अध्यक्ष ललित सुरजन का कहना है  कि " टेलिविज़न वालों से उम्मीद की जाती है कि वह भाषा को परिमार्जित करे और  भाषा का संस्कार देंगे लेकिन वे तो भाषा  को बिगाड़ रहे  हैं . हिंदी के अधिकतर टेलिविज़न चैनल  हिंदी और अन्य भाषाओं में विग्रह पैदा कर  रहे  हैं. हिंदी के अखबार भी हिंदी को बर्बाद कर रहे हैं  . यह  आवश्यक है कि औपचारिक मंचों से सही हिंदी बोली जाए अन्यथा हिंदी को बोली के स्तर तक सीमित कर दिया जाएगा ".आज टेलिविज़न की कृपा से छोटे बच्चों की भाषा का  प्रदूषण हो रहा है .बच्चे  सोचते  हैं कि जो भाषा टीवी पर सुनायी पड़  रही है ,वही हिंदी है .माता पिता भी अंग्रेज़ी ही बोलने के लिए प्रोत्साहित करते हैं क्योंकि स्कूलों का दबाव रहता है . देखा गया है कि बच्चों की पहली भाषा तो अंग्रेज़ी हो ही चुकी है .बहुत भारी फीस लेने वाले स्कूलों में  अंग्रेज़ी बोलना अनिवार्य है . अपनी भाषा में बोलने वाले बच्चों को दण्डित किया जाता है. एक महंगे स्कूल  के हिंदी समर्थक मालिकों की बातचीत के एक अंश पर ध्यान देना ज़रूरी  है ." हम अपनी ही कंट्री में हिंदी को सपोर्ट नहीं करेंगे, तो और कौन करेगा ? मैंने अपने स्कूल में हिंदी बोलने वालों पर सिर्फ हंड्रेड रुपीज़ फाइन का प्रोविजन रखा है, अदरवाइज दूसरे स्कूल टू हंड्रेड रुपीज़ फाइन करते हैं। "   यह दिल्ली के किसी स्कूल की बातचीत   है . देश के  अन्य क्षेत्रों में भी यही दुर्दशा होगी.  बच्चों की मुख्य भाषा अंग्रेज़ी हो जाने के संकट बहुत ही भयावह  हैं. साहित्य ,संगीत आदि की बात तो बाद में आयेगी ,अभी तो बड़ा संकट दादा-दादी, नाना-नानी से संवादहीनता की स्थिति   है. आपस में बच्चे अंग्रेज़ी में बात  करते हैं ,  स्कूल की भाषा अंग्रेज़ी हो ही चुकी है , उनके  माता पिता  भी आपस में और बच्चों से अंग्रेज़ी में बात करते हैं नतीजा यह होता है कि बच्चों को अपने  दादा-दादी से बात  करने के लिए हिंदी के शब्द तलाशने पड़ते हैं .  जिसके कारण संवाद में निश्चित रूप से कमी आती है  .यह स्पष्ट तरीके से नहीं दिखता लेकिन  बूढ़े लोगों को तकलीफ बहुत होती है. यह मेरा भोगा हुआ यथार्थ है . मेरे पौत्र  ने अपने स्कूल और अपने पड़ोस में रहने वाले अपने मित्रों से बहुत गर्व से  बताया था कि " माई  बाबा नोज़ इंगलिश ". यानी बच्चा अपने बाबा को अंग्रेज़ी का ज्ञाता बताकर वह अपने को या तो औरों से श्रेष्ठ बता रहा था या यह कि अपने दोस्तों को बता रहा था कि मेरे बाबा भी आप लोगों के बाबा की तरह ही जानकार  व्यक्ति हैं .शायद  उसके दोस्तों के बाबा दादी अंग्रेज़ी जानते होंगें .एक समाज के रूप में हमें  इस स्थिति को संभालना पडेगा . बंगला, तमिल, कन्नड़ , तेलुगु . मराठी आदि भाषाओं के इलाके में रहने वालों को  अपनी भाषा की श्रेष्ठता पर गर्व होता है. वे अपनी भाषा में कहीं भी बात करने में लज्जित  नहीं  महसूस करते लेकिन हिंदी में यह संकट  है .  इससे हमें  अपने  भाषाई संस्कारों को मुक्त करना  पडेगा.  अपनी भाषा को बोलकर श्रेष्ठता का अनुभव करना भाषा के  विकास  की बहुत ही ज़रूरी शर्त  है.  इसके लिए  पूरे प्रयास से हिंदी को रोज़मर्रा की भाषा , बच्चों की भाषा  और बाज़ार की भाषा बनाना बहुत ही ज़रूरी है . आज देश में  बड़े व्यापार की भाषा अंग्रेज़ी है , वहां उसका प्रयोग किया जाना चाहिए . हालांकि वहां भी अपनी मातृभाषा का प्रयोग किया जा सकता  था . चीन और जापान ने अपनी भाषाओं को ही बड़े  व्यापार का माध्यम बनाया और आज हमसे बेहतर आर्थिक विकास के उदाहरण बन चुके हैं . अंग्रेज़ी सीखना ज़रूरी है  तो वह  सीखी जानी चाहिए , उसका साहित्य पढ़ा जाना  चाहिए, अगर ज़रूरी है तो उसके माध्यम से वैज्ञानिक और जानकारी जुटाई जानी चाहिए लेकिन भाषा की श्रेष्ठता के लिए सतत प्रयत्नशील रहना चाहिए . भारतेंदु हरिश्चंद्र की बात   सनातन सत्य है कि ' निज भाषा उन्नति अहै सब उन्नति को मूल '. भाषा की चेतना से ही पारिवारिक जीवन को और सुखमय बनाया जा सकता  है . हमारी परम्परा की वाहक भाषा ही होती है . संस्कृति, साहित्य , संगीत सब कुछ भाषा के ज़रिये ही अभिव्यक्ति  पाता है ,इसलिए हिंदी भाषा को उसका गौरवशाली स्थान दिलाने के लिए हर स्तर से हर संभव प्रयास किया जाना चाहिए .

राहुल गांधी ने खुद को अहंकारी बताकर बीजेपी को चिंतित कर दिया .

Tue, 19/09/2017 - 11:22


शेष नारायण सिंह
अमरीका के बर्कले स्थित कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय में दिया गया राहुल गांधी का भाषण अमरीका  में तो बहुत  चर्चा में नहीं आया  होगा  लेकिन अपने देश में सत्ताधारी पार्टी का ध्यान खींचने में सफल रहा है .  भारतीय समय के अनुसार सुबह सात बजे राहुल गांधी ने बोलना शुरू किया . ज़ाहिर है एकाध घंटे तो सवाल जवाब आदि में बीत ही गया होगा . और भारत की सत्ताधारी पार्टी ने उसको नोटिस किया और १२ बजे बीजेपी की बहुत ही  सशक्त प्रवक्ता रह चुकी , स्मृति इरानी राहुल गांधी के भाषण पर बीजेपी मुख्यालय में टिप्पणी कर रही थीं. उसके बाद भी बीजेपी वालों ने राहुल गांधी को हलके में नहीं लिया .अगले दिन भी कई मंत्रियों ने राहुल गांधी के बर्कले संवाद की खिल्लियाँ उड़ाईं . बीजेपी में आम तौर पर राहुल गांधी  गंभीरता से नहीं लिया जाता है . वैसे आडवानी युग में भी ऐसा हुआ था .  बीजेपी के बड़े नेता सोनिया  गांधी को भी गंभीरता से नहीं लेते थे. अटल बिहारी वाजपेयी और लाल कृष्ण आडवानी सोनिया गांधी की  किसी बात पर टिप्पणी नहीं करते थे. सुषमा स्वराज और उमा भारती को ही सोनिया  गांधी को जवाब देने का ज़िम्मा दिया जाता था .  जब २००४ में सोनिया  गांधी के प्रधानमंत्री   बनने की सम्भावना साफ़  नज़र आने लगी तो उनको रोकने के लिए सुषमा स्वराज ने सिर मुंडवाने की योजना बना  ली थी . १९९८ में कांग्रेस की कमान संभालने के बाद जब सोनिया गांधी कर्णाटक के बेल्लारी से लोकसभा का चुनाव लड़ने गयीं तो  उनके खिलाफ बीजेपी ने सुषमा स्वराज को ही उतारा था, २००४  तक सोनिया  को औकात बताने का काम सुषमा स्वराज ही करती थीं.लेकिन २००४ में जब उन्होंने अटल बिहारी वाजपेयी को बेदखल कर दिया तो बीजेपी को लगा  कि खेल बदल गया है . राहुल गांधी को भी इसी तरह से हलके में लिया जा रहा था ,लेकिन बर्कले वाले भाषण के बाद नई दिल्ली के सत्ता के गलियारों में  उनको गंभीरता से लेने की हवा साफ़  महसूस की जा सकती है .
राहुल गांधी के भाषण में मौजूदा सरकार और  प्रधानमंत्री मोदी के बारे में बहुत सी पाजिटिव बातें भी कही गयीं . राहुल गांधी ने कहा कि हमारे देश के आई   आई टी से पढ़कर निकले लोग दुनिया भर में टेक्नालोजी के लीडर हैं .. कैलिफोर्निया में ही  सिलिकान वैली है  . राहुल गांधी ने कहा कि वहां भी आई आई टी वालों का बहुत ही सम्मानजनक स्थान है . उन्होंने कहा की हमें गर्व  है कि हमने करोड़ों लोगों को गरीबी की मुसीबत से बाहर निकाला है . दुनिया के इतिहास में ऐसा कोई भी लोकतांत्रिक  देश नहीं है जिसने इतने कम समय में इतने ज्यादा लोगों  को गरीबी से बाहर निकाला हो. इतिहास में पहली बार ऐसा नज़र आ रहा है कि भारत गरीबी को हमेशा के लिए ख़त्म कर देगा और अगर हम  ऐसा कर सके तो मानवता को भारत पर गर्व होगा . उन्होंने कहा कि भारत में स्वास्थ्य सेवाओं को क्रांतिकारी बदलाव ,की दिशा में डाल दिया   गया  है. हमारे यहाँ जितने मोतियाबिंद और हृदय के आपरेशन होते हैं , उतने दुनिया भर में कहीं नहीं होते . हमारे पास जानकारी का जो ज़खीरा है उससे पूरी दुनिया को लाभ मिलेगा . हमारी आबादी में जो विविधता है उसके ज़रिये हम हर तरह के डी एन ए की विविधता का अध्ययन कर रहे हैं .जो इक्कीसवीं सदी की बीमारियों को खत्म करने में बहुत काम आयेगा .भारत एक ऐसे  रस्ते पर चल पड़ा है जहां असफल होने का विकल्प नहीं है , उसको हर हाल में सफल होना  है. भारत , अपने एक सौ तीस करोड़ लोगों को दुनिया की अर्थव्यवस्था से जोड़ने की कोशिश कर रहा  है. यह काम  बहुत ही शान्ति प्रिय तरीके से किया जा रहा  है  क्योंकि अगर यह प्रक्रिया टूट गयी तो बहुत बुरा होगा. भाषण का यह अंश सुनकर लग रहा  था कि राहुल गांधी भारत, उसकी सरकार और उसके प्रधानमंत्री की तारीफ़ के पुल   बांधे जा रहे हैं  .लेकिन भाषण शुरू होने के करीब दस मिनट  बाद उन्होंने ऐलान किया कि अब तक वे पाजिटिव बातें कर रहे थे ,अब नेगेटिव शुरू करेंगे . और वहीं से बीजेपी वालों  को गुस्सा लगना शुरू हो गया . उन्होंने  कहा कि हमारी विकास की रफ़्तार  को नकारात्मक उर्जा बर्बाद कर सकती है . नफ़रत,क्रोध, हिंसा  और ध्रुवीकरण की राजनीति भारत में आज नज़र आने लगे  हैं . हिंसा और नफरत  लोगों को सही दिशा में काम नहीं करने दे रहे  हैं.  उदार पत्रकार मारे जा रहे हैं , दलित और मुसलमान मारे जा रहे हैं , अगर किसी के बारे में यह शक हो गया कि उसने बीफ खा लिया है तो उसकी भी खैर   नहीं है .  राहुल ने जोर देकर कहा कि यह सब भारत का बहुत नुक्सान कर रहा है . सरकार की नोटबंदी की नीति ने अर्थव्यवस्था का  भारी नुक्सान किया है .जीडीपी में दो प्रतिशत का नुक्सान हो गया है . इसी तरह की बातें बीजेपी को नागवार  गुज़री हैं .राहुल गांधी  का भाषण पहले से तैयार किया गया रहा  होगा , लेकिन सवालों के जवाब में जो बातें उन्होंने कहीं वह उनकी राजनीति और भारत की स्थिति के बारे में उनके दृष्टिकोण को प्रमुखता से रेखांकित करती हैं  . बातचीत में राहुल गांधी ने जो बातें कहीं वे बीजेपी के नेतृत्व के लिए अनुचित जान पडीं. भारत की विदेशनीति के बारे में उन्होंने कहा कि यू पी  ए की डिजाइन ऐसी थी जिसमें  रूस, इरान, चीन आदि पड़ोसी देशों से अच्छे  सम्बन्ध बनाने की बात थी लेकिन मौजूदा  बैलेंस भारत को कमज़ोर कर सकता है .शायद उनका इशारा अमरीका और इजरायल से बढ़ रही दोस्ती की तरफ था  . प्रधानमंत्री  मोदी की   भाषण  देने की योग्यता की राहुल गांधी ने तारीफ़ की लेकिन साथ ही उन पर हमला भी कर  दिया . उन्होंने कहा कि " नरेंद्र मोदी मेरे प्रधानमंत्री हैं , वे भाषण अच्छा देते हैं लेकिन लोगों से बात नहीं करते . मैंने संसद सदस्यों से सुना है कि वे अपने लोगों से भी संवाद नहीं स्थापित करते ."  राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि कश्मीर में सरकार बनाने के लिए पीडीपी से  समझौता करके देश ने बहुत बड़ी रणनीतिक कीमत चुकाई और और वह राष्ट्र का नुक्सान है . उन्होंने दावा किया कि २०१३ तक उनकी सरकार ने जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद की कमर तोड़ दी थी , यह काम पंचायती राज चुनाव, माहिलाओं के आत्म सहायता संगठनों और राज्य के नौजवानों को रोज़गार देकर  किया गया था . २००४ में जब हमारी सरकार आई तो कश्मीर में आतंकवाद का बोलबाला था और जब हमारी पार्टी ने सत्ता छोडी तो वहां शान्ति थी .  राहुल गांधी की इस बात ने दिल्ली के सत्ता के केन्द्रों में ज़बरदस्त असर डाला है और  शायद इसलिए जम्मू-कश्मीर के नेता और प्रधानमंत्री कार्यालय में राज्यमंत्री  जितेन्द्र सिंह ने नाराजगी जताई है .पीडीपी से समझौते के मुख्य सूत्रधार बीजेपी महासचिव राम माधव ने भी राहुल गांधी के कश्मीर वाले बयान की कठोर आलोचना की है . एक सवाल के जवाब में राहुल गांधी ने कहा कि हमारी पार्टी में २०१२ में बहुत ही अहंकार आ गया और हमने लोगों से बातचीत  करना बंद कर दिया . पार्टी का संगठन बहुत ही महत्वपूर्ण है और हमने दंभ के कारण उसको नज़रंदाज़ किया . राहुल गांधी की यह बात उनके कैलीफ़ोर्निया  संवाद को बहुत ही अहम बना देती है . दिल्ली के  हर राजनीतिक विश्लेषक को मालूम था कि कांग्रेस  का नेतृत्व , खासकर राहुल गांधी और उनके आसपास मौजूद लोग बहुत ही दम्भी हो  गए थे और पार्टी के आम कार्यकर्ता  से तो संवाद की  स्थिति बहुत पहले ही ख़त्म हो गयी  थी, २०१२ के बाद पार्टी के बड़े नेता भी याचक की तरह पेश किये जाने लगे थे. . उनकी बात को सुनकर बिना कोई जवाब दिए आगे बढ़ जाना राहुल गांधी की शख्सियत का हिस्सा बन गया था  . इसी  का एक प्रमुख उदाहरण दिल्ली के प्रेस क्लब में मनमोहन सरकार के एक बिल को फाड़कर फेंक देना  भी शामिल है. बिल फाड़ने के वक़्त उनके साथ दिल्ली के कांग्रेस नेता अजय माकन मौजूद थे . अजय माकन उस वक़्त मीडिया के इंचार्ज थे. श्री माकन को मीडिया का इंचार्ज बनाना भी  राहुल गांधी के अहंकार का एक नमूना था .  जयपुर चिंतन शिविर  के पहले कांग्रेस  ने तय किया था कि कांग्रेस पार्टी   मीडिया के ज़रिये  जनता  से संवाद का एक वैज्ञानिक तरीका अपनायेगी . जयपुर चिंतन शिविर में मूल रूप से पांच विषयों पर चर्चा की योजना थी . यह विषय बहुत पहले तय कर दिए गए थे।  इन विषयों पर पार्टी के  शीर्ष नेताओं और कुछ नौजवान नेताओं के बीच में गहन चर्चा  भी हो चुकी थी   जो पांच विषय चुने  गए हैं उनमें सामाजिक आर्थिक चुनौतियां, संगठन को ठीक करना, राजनीतिक प्रस्ताव , विदेश नीति से संबंधित ग्रुप और महिला सशक्तीकरण जैसे मुद्दे थे.  जयपुर की चर्चा के आधार पर आगामी  कार्यक्रम बनाया जाना था . २०१४ के  लोकसभा चुनाव  का मैनिफेस्टो भी जयपुर चिंतन के आधार पर ही बनाने की बात थी .. हर विषय की कमेटी थी और सोनिया गांधी की  सलाह से  सब कार्य हो रहा था. उम्मीद की जा रही थी कि मीडिया से अच्छे सम्बन्धों के लिए चर्चित  एक बड़े नेता को मीडिया का इंचार्ज बनाया जायेगा क्योंकि उन्होंने कई महीने तक सभी सभी पक्षों से बात करके एक योजना बनाई थी . जयपुर से रिपोर्ट कर रहे हम जैसे पत्रकारों को सब मालूम था लेकिन जब मीडिया इंचार्ज की घोषणा हुई तो अजय माकन का नाम घोषित कर दिया गया .  श्री माकन का राजनीतिक कैरियर दिल्ली विश्वविद्यालय के आसपास परवान चढ़ा है. यूनिवर्सिटी बीट के रिपोर्टरों से उनके बहुत अच्छे  सम्बन्ध हैं लेकिन  राष्ट्रीय स्तर के पत्रकार उनको अच्छी तरह नहीं जानते . नतीजा यह हुआ कि कांग्रेस और मीडिया के बीच भारी  डिस्कनेक्ट हो गया और कांग्रेस ने जो अच्छे काम भी किये वह जनता  तक नहीं पंहुच सके . जयपुर चिंतन की चर्चा चल ही रही थी कि बीजेपी के गोवा  अधिवेशन में बीजेपी के तत्कालीन  अध्यक्ष राजनाथ सिंह  ने नरेंद्र मोदी को बीजेपी की ओर से प्रधानमंत्री पद का दावेदार घोषित कर दिया . उसके बाद तो बीजेपी ने मीडिया में हर स्तर पर अभियान शुरू कर दिया . उसके जवाब में कांग्रेस पार्टी की एक ब्रीफिंग  होती थी जिसमें अजय माकन से भी जूनियर कोई नेता  होता था जबकि बीजेपी की तरफ से  रविशंकर प्रसाद के नेतृत्व में  पार्टी के  बड़े  नेता मीडिया से मुखातिब   होते  थे, और   सूचना  पंहुचा सकने के मामले  में बीजेपी बहुत आगे निकल गयी.यह केवल एक उदाहरण है . ऐसे अनेक उदाहरण हैं जिसमें राहुल गान्धी का दंभ आड़े आया  और उनकी पार्टी पिछड़ती गयी. तात्पर्य यह है कि कैलिफोर्निया में राहुल गांधी ने अपनी भी कमजोरियों को जिस बेबाकी से स्वीकार किया  वह उनकी पार्टी के लिए खुशखबरी हो सकती है . जो बातें  उन्होंने स्वीकार कीं वह उनकी पार्टी के हर नेता को मालूम है लेकिन किसी की बोलने  की हिम्मत नहीं थी. अब जब उन्होंने खुद ही स्वीकार कर लिया है तो इसका मतलब यह है कि वे उसको ठीक करने की कोशिश करेंगे. लगता है कि बीजेपी की  चिंता का कारण यह भी  है कि अगर कांग्रेस ने अपने आपको ठीक कर लिया और नोटबंदी, बेरोजगारी, जी एस टी  आदि के मोर्चों पैर मौजूदा सरकार की कमियों को जनता तक पंहुचा दिया तो  कहीं मौजूदा सरकार का भी वही हश्र न हो जो शाइनिंग इण्डिया वाली अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार का  हुआ था .

भयानक बीमारी के एक साल बाद, बिलकुल निजी बात

Mon, 11/09/2017 - 16:45
शेष नारायण सिंह 


आज सुबह से मन बेचैन है . ठीक एक साल पहले ११ सितम्बर २०१६ के दिन ही मेरे बच्चे मुझे ग्रेटर नोयडा के एक कसाई अस्पताल से निकाल कर वंसत कुञ्ज, नई दिल्ली  के Institute of Lever and Biliary Sciences  लेकर गए थे . ३१ अगस्त को मुझे बुखार हो गया था . पड़ोस के एक नामी अस्पताल में दाखिल हो गया . दो दिन बाद ही वहां से छुट्टी मिल गयी . बाद में पता चला कि मुहे चिकनगुनिया था लेकिन उस अस्पताल  के डाक्टर ने वाइरल बुखार  बताकर , अच्छा पैसा लेकर मुझे विदा कर दिया . घर आया तो हालत फिर बिगड़ गयी . एक दूसरे अस्पताल में भर्ती हो गया . चिकनगुनिया की पहचान हो गयी लेकिन इलाज में भारी  लापरवाही शुरू हो गयी. हालत बिगडती गयी . उसके बाद तो पूरे परिवार पर मुसीबतों की बयार बहने लगी. मेरी बड़ी बेटी दिल्ली के अपने घर से अपने सास ससुर और पति के साथ मुझे देखने आ रही थी. कार का एक्सीडेंट हो गया . उसके ससुर जी के हाथ में बड़ा फ्रैक्चर हो गया . वह भी उसी अस्पताल में  भर्ती  हो गए.   जो भी मुझे देखने आता था उसका चेहरा देख कर मुझे शक होने लगा कि मेरी हालत  ठीक  नहीं है .मेरी बेटी  ने अपने भाई को मुंबई में बता दिया कि पापा बहुत बीमार हैं. बेटा अपनी बहू के साथ आ गया . बहू का बहनोई भी मुझे देखने आया था  . उसने भी उन लोगों को फोन पर बिगड़ते हालात की जानकारी दे दी थी. मेरी बहू ने मुझे  देखते ही इस अस्पताल से हटाने की जिद पकड़ ली. लेकिन मैं किसी अपोलो टाइप अस्पताल में जाने को  तैयार नहीं था . इस कसाई अस्पताल वाले इतने गैरज़िम्मेदार थे कि मेरे विजिटर्स को बताना शुरू कर चुके थे कि इनको सेप्टोसेमिया का शक है लेकिन मेरे बच्चों को  नहीं बता रहे थे . मेरी  दूर की एक बहन के पति ने मेरी सेवा के लिए  दो कर्मचारी तैनात कर दिया था . जब उनको पता चला कि मेरी हालत बिगडती जा रही  है तो उन्होंने मुझसे धीरे से कहा कि 'भाई साहब बच्चों की बात मान लीजिये '. इसी बीच मेरे एक बहुत बड़े नेता मित्र का फोन आया . उनको मैं बता नहीं पा रहा था  . फिर मेरे बेटे से उनकी बात हुयी और उन्होने फ़ौरन इंतज़ाम कर दिया. वसंत कुञ्ज वाले अस्पताल के निदेशक डाक्टर एस के सरीन उनके मित्र थे . रविवार का दिन था लेकिन जाते  ही भर्ती हो गयी .  फिर इलाज़ शुरू   हो गया . तीन दिन बाद डॉ सरीन ने कहा  कि अब आप खतरे से बाहर हैं . तब मुझे अंदाज़ लगा कि  मैं खतरे  में था, मेरी हालत बहुत खराब थी .  मेरी छोटी बेटी अपनी नौकरी की परवाह किये बिना  बंगलोर से आ गयी . मेरे भाई  और बहन गाँव से आ गए. मुझसे  छः साल छोटा मेरा भाई  बस जम गया . मेरे और अपनी भाभी के साथ हमेशा खड़ा  रहा. मेरी बहन ने सारा ज़िम्मा उठा लिया . मेरी छोटी बेटी ने अपने छोटे बेटे को अपनी बड़ी बहन के यहाँ दिन में छोड़कर लगभग पूरा समय अस्पताल में बिताया . बड़ी   बेटी के परिवार ने पूरा साथ दिया . मेरी बहू ने इलाज़ और बीमारी का हर स्तर पर मूल्यांकन किया  . ग्रेटर नोयडा के अस्पताल में डाक्टरों की लापरवाही के चलते   बीमारी बहुत बिगड़ गयी थी . सोडियम, किडनी, लिवर , यू टी  आई आदि   भांति भांति की बीमारियाँ हो गयी थीं.  पाँव और कमर की मांशपेशियाँ शिथिल हो गयी थीं, उठकर बैठ पाना असंभव हो गया था. सैकड़ों टेस्ट हुए. डॉ सरीन सब कुछ रूल आउट कर देना चाहते थे . मेरी छोटी बेटी इस बीमारी में मेरी मां बन गयी, बड़ी बेटी सब की गार्जियन बन गयी. हर शुक्रवार को मेरा बेटा मुंबई से दिल्ली आता  रहा  और मेरी बहू इसी बीमारी  में  तीसरी  बेटी बन गयी. सब कुछ रूल आउट करने के चक्कर में डॉ सरीन और डॉ  सुमन लता मेरी रीढ़ की  बायोप्सी  कराना चाहते थे. मेरे बच्चों के बीच  मतभेद हो गया और काफी विवाद  हो गया . शुरू में  मैने भी मना कर दिया था लेकिन डॉ सरीन के आग्रह के बाद वह  भी हो गया . उन्होंने कैंसर और टीबी के भी सारे टेस्ट करवा लिए  और रूल आउट किया . मैं ठीक होकर आ गया .  तीन महीने घर पर रहकर फिजियोथिरेपी करवाई तब चलना फिरना  शुरू हुआ. इस बीच चिंता  रहती थी  कि  जहां काम कर रहा था , वहां कोई  नुक्सान न हो जाए लेकिन देशबंधु और टीवी 18 के अधिकारियों ने  लगातार भरोसा दिलाया कि आप स्वास्थ्य ठीक करिए , सब ठीक हो जाएगा . मेरे खाते में नियमित रूप से  मेरा वेतन आता रहा .आज एक साल बाद उन घटनाओं को याद करता हूँ तो डर लग जाता है. इस बीमारी के  दौरान  मैंने  सब के चेहरे देखे और मुझे साफ़ लगता था कि  वे लोग  घबडाए हुए थे लेकिन मेरी पत्नी  चौबीसों घंटे अस्पताल में मेरे साथ रहते हुए  कहती रहीं कि सब ठीक  हो जाएगा . आज जो यह ज़िंदगी है यह इन्हीं लोगों की है जिन्होंने इसको बचाया . इंदु , पप्पू, गुड्डी,  टीनीचा, बुलबुल, लालन ,सूबेदार, मुन्नी आज एक साल बाद मन कह रहा है कि तुम सबको एक साथ बैठाकर देखूं . तुम लोगों  ने मुझे बचाया .  वरना आज मैं न होता 

गौरी लंकेश की शहादत ने पत्रकारिता के लिए बहुत सारे सवाल छोड़े हैं .

Mon, 11/09/2017 - 10:09


शेष नारायण सिंह
कर्नाटक की राजधानी बंगलूरू में पत्रकार गौरी लंकेश की हत्या कर दी गयी . ज़ाहिर है उनके  दुश्मनों ने उनको मार डाला.  कौन   हो सकते हैं यह दुश्मन ? कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने तुरंत आरोप लगा दिया कि आर एस एस और बीजेपी वालों का हाथ हो सकता  है . इस बात में दो राय नहीं  है कि गौरी लंकेश  बीजेपी और  दक्षिणपंथी राजनीति के खिलाफ खूब लिखती थीं . प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ भी खूब लिखती थीं लेकिन इसका मतलब यह कत्तई नहीं है कि प्रधानमंत्री की पार्टी के  लोग किसी पत्रकार की हत्या कर देंगें . राहुल गांधी के बयान के बाद केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने  टिप्पणी की है कि जब राहुल गांधी ने ऐलानियाँ बीजेपी और आर एस एस पर आरोप लगा दिया  है तो उनकी पार्टी की सरकार के लिए निष्पक्ष जांच कर पाना बहुत मुश्किल है . लिहाजा जांच किसी  निष्पक्ष एजेंसी से करवाई जानी चाहिए . एक बात साफ़ हो गयी है कि गौरी लंकेश की हत्या के बाद उस पर राजनीति शुरू हो गयी है . राजनीतिक रोटी सेंकने से लोगों को बाज आना चाहिए क्योंकि  अगर  जांच के बाद यह पाया गया कि  गौरी लंकेश की  हत्या उनके लेखन के कारण हुयी  है तो यह बहुत ही गंभीर  मामला है और इसका मतलब सीधे प्रेस और अभिव्यक्ति  की आज़ादी के सवाल से जुड़ जाता है . इसके अलावा उनकी हत्या के बाद  बहुत सारे सवाल एक बार फिर बहस के दायरे में आ  गए हैं .  गौरी लंकेश आर एस एस और बीजेपी के विचारों की धुर विरोधी थीं , उसके खिलाफ खूब जमकर लिखती थीं. उनकी हत्या के बाद सोशल मीडिया पर चर्चा शुरू हो गयी है कि आर एस एस के लोगों ने ही उनकी हत्या की है , एक दूसरा वर्ग भी है जो उनकी हत्या के लिए वामपंथी विचारों के टकराव को ज़िम्मेदार ठहरा रहा है . इस वर्ग में लोग उनके भाई को भी शामिल कर रहे  हैं. इसी वर्ग से यह बात भी कही जा रही है कि कर्नाटक के पड़ोसी राज्य केरल में  आर एस एस के कार्यकर्ताओं की बड़े पैमाने पर राजनीतिक हत्या  हो रही है और उस पर भी रोक लगाई जानी चाहिए. आरोप लगाए जा रहे हैं कि यह हत्याएं बाएं बाजू की राजनीति  के लोग ही कर रहे हैं . गौरी लंकेश को न्याय मिले इसके लिए ज़रूरी है कि अभी किसी को ज़िम्मेदार ठहराने की जल्दी  नहीं की जानी चाहिए  क्योंकि उस से जांच के काम में बाधा पड़ सकती  है.
अपने देश में प्रेस की आज़ादी की  व्यवस्था  संविधान में ही निहित ही . संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) में अभिव्यक्ति की स्वत्रंत्रता की व्यवस्था दी गयी है, प्रेस की आज़ादी उसी से निकलती  है . इस आज़ादी को सुप्रीम कोर्ट ने अपने बहुत से फैसलों में सही ठहराया है . १९५० के  बृज भूषण बनाम दिल्ली राज्य  और १९६२ के सकाळ पेपर्स  प्राइवेट लिमिटेड बनाम यूनियन आफ इण्डिया के फैसलों में  प्रेस की अभिव्यक्ति की आज़ादी को मौलिक अधिकार के  श्रेणी में रख दिया  गया है . प्रेस की यह आज़ादी निर्बाध ( अब्सोल्युट ) नहीं है . संविधान के मौलिक अधिकारों वाले अनुच्छेद 19(2) में ही उसकी सीमाएं तय कर दी गई हैं.  संविधान में लिखा है  कि  अभिव्यक्ति की आज़ादी के "अधिकार के प्रयोग पर भारत की प्रभुता और अखंडता, राज्य की सुरक्षा, विदेशी राज्यों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंधों, लोक व्यवस्था, शिष्टाचार या सदाचार के हितों में अथवा न्यायालय-अवमान, मानहानि या अपराध-उद्दीपन के संबंध में युक्तियुक्त निर्बंधन जहां तक कोई विद्यमान विधि अधिरोपित करती है वहां तक उसके प्रवर्तन पर प्रभाव नहीं डालेगी या वैसे निर्बंधन अधिरोपित करने वाली कोई विधि बनाने से राज्य को निवारित नहीं करेगी. "  यानी प्रेस की आज़ादी तो मौलिक अधिकारों के तहत कुछ भी लिखने की आज़ादी  नहीं है . शायद  संविधान के अनुच्छेद १९ (२)  के उन्लंघन के आरोप में ही  गौरी  लंकेश को मानहानि के एक मुक़दमे में सजा भी हो चुकी है और मामला  ऊंची अदालत में अपील में लंबित है.
लेकिन इसके साथ ही  और भी सवाल  उठ रहे  हैं  कि यदि किसी के लेखन से किसी को एतराज़ है और वह मानता है पत्रकार ने 19(2) का उन्लंघन किया  है तो क्या उसको मार डालना  सही है ? . इस तर्क की परिणति बहुत ही खतरनाक है और इसी तर्क से लोकशाही को ख़तरा  है . गौरी लंकेश की हत्या के बाद उनके पुराने लेखों का ज़िक्र किया जा  रहा है जिसमें उन्होंने ऐसी बातें लिखी थीं जो एक वर्ग को स्वीकार नहीं हैं. सोशल मीडिया पर सक्रिय यह वर्ग उनके चरित्र हनन का प्रयास भी कर रहा है और जो कुछ भी उस वर्ग से आ रहा है उसका सन्देश यह है कि गौरी की  हत्या ज़रूरी था और जो हुआ वह ठीक ही हुआ.  आज ज़रूरत इस बात की है कि इस तरह की प्रवृत्तियों की निंदा की जाये .निंदा हो भी  रही है.  गौरी लंकेश की हत्या के अगले ही दिन देश भर में पत्रकारों ने सभाएं कीं , जूलूस निकाले  , सरकारों से हत्या  जांच की मांग की और तय किया कि मीडिया को निडर रहना है . दिल्ली के  प्रेस क्लब में एक सभा का आयोजन हुआ जिसमें लगभग सभी बड़े पत्रकार शामिल हुए और गौरी लंकेश की ह्त्या करने वालों को फासिस्ट ताक़तों का प्रतिनिधि बताया. कोलकाता प्रेस क्लब के तत्वावधान में प्रेस क्लब से गांधी जी की मूर्ति तक एक जुलूस निकाला . मुंबई में सामाजिक कार्यकर्ता ,पत्रकार, फिल्मकार ,अभिनेत्ता इकठ्ठा हुए और असहमत होने के अधिकार को लोकशाही का सबसे महत्वपूर्ण अधिकार बताया और  गौरी लंकेश की  हत्या को प्रेस की आज़ादी की हत्या बताया .असुविधाजनक लेख लिखने के लिए अगर लोगों की हत्या को सही  ठहराया जाएगा तो बहुत ही मुश्किल होगी . लोकतंत्र के अस्तित्व पर ही  सवालिया निशान  लग जाएगा.  इस लोकतंत्र को बहुत ही मुश्किल से हासिल किया  गया है और उतनी ही मुश्किल इसको संवारा गया है . अगर मीडिया जनता को सही बातें और वैकल्पिक दृष्टिकोण नहीं पंहुचाएगा तो सत्ता पक्ष के  लिए भी मुश्किल होगी. इंदिरा  गांधी ने यह गलती १९७५ में की थी. इमरजेंसी में सेंसरशिप लगा दिया था . सरकार के खिलाफ कोई भी खबर नहीं छप सकती थी. टीवी और रेडियो पूरी तरह से सरकारी नियंत्रण में थे , उन के पास  तक  जा सकने वालों में सभी चापलूस होते थे, उनकी जयजयकार करते रहते थे इसलिए उनको  सही ख़बरों का पता  ही नहीं लगता था . उनको  बता दिया गया कि देश में उनके पक्ष में बहुत भारी माहौल है और वे दुबारा भी बहुत ही आराम से चुनाव जीत जायेंगीं .  चुनाव करवा दिया और उनकी राजनीति में १९७७ जुड़ गया  .
प्रेस की आज़ादी सत्ता पक्ष के लिए बहुत ज़रूरी है . सत्ताधारी जमातों को अगर वैकल्पिक दृष्टिकोण नहीं  मिलेंगे तो चापलूस नौकरशाह  और  स्वार्थी नेता  सच को ढांक कर राजा से उलटे सीधे  काम करवाते रहेंगें . भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को यह बात बहुत ही   अच्छी तरह  मालूम थी इसीलिए उन्होंने कहा था ," मैं पीत पत्रकारिता से नफरत करता हूँ , लेकिन आपके पीत पत्रकारिता करने के अधिकार की रक्षा के लिए हर संभव कोशिश करूंगा ".लोकतंत्र को अगर जनता के लिए उपयोगी बनाना है  तो सत्ताधारी जमातों  को निष्पक्ष और निर्भीक पत्रकारिता  को व्यावहारिकता के साथ लागू करने के उपाय करने होंगे .प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी पार्टी से  यह उम्मीद तो की ही जानी चाहिए  कि वे वह गलतियाँ न करें जो इंदिरा गांधी  ने की थी. इंदिरा गांधी के भक्त और तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष देवकांत बरुआ ने प्रेस सेंसरशिप के दौरान नारा दिया था कि  ' इंदिरा इज इण्डिया ,इण्डिया इज  इंदिरा ,' इसी .तरह से जर्मनी के तानाशाह हिटलर के तानाशाह बनने के पहले उसके एक चापलूस रूडोल्फ हेस ने नारा दिया था कि  ,' जर्मनी इस हिटलर , हिटलर इज जर्मनी '.   रूडोल्फ हेस नाजी पार्टी में बड़े पद पर था .मौजूदा शासकों को इस तरह की प्रवृत्तियों से बच कर रहना चाहिए  क्योंकि मीडिया का चरित्र बहुत ही अजीब होता  है . जब इंदिरा गांधी बहुत सारे लोगों को जेलों में बंद कर रही थीं , जिसमें पत्रकार भी शामिल थे तो चापलूसों और पत्रकारों का एक वर्ग किसी को भी आर एस एस या कम्युनिस्ट  पार्टी का सदस्य  बताकर गिरफ्तार करवाने की फ़िराक में रहता था . उस दौर में भी बहुत सारे पत्रकारों ने आर्थिक लाभ के लिए सत्ता की चापलूसी में चारण शैली में पत्रकारिता की . वह ख़तरा आज भी ख़तरा बना हुआ है . चारण पत्रकारिता  सत्ताधारी पार्टियों  की सबसे  बड़ी दुश्मन है क्योंकि वह सत्य पर पर्दा डालती है और सरकारें गलत फैसला लेती हैं . ऐसे माहौल में सरकार की ज़िम्मेदारी बनती है कि वह मीडिया को निष्पक्ष और निडर बनाए रखने में योगदान करे  . चापलूस पत्रकारों से पिंड छुडाये . इसके संकेत दिखने लगे हैं . एक आफ द रिकार्ड बातचीत में बीजेपी के मीडिया से जुड़े एक नेता ने बताया कि जो पत्रकार टीवी पर हमारे पक्ष में नारे लगाते रहते है , वे उनकी पार्टी का बहुत नुक्सान करते हैं . भारतीय जनता पार्टी के बड़े नेताओं में इस तरह की सोच एक  अच्छा संकेत है . गौरी लंकेश की हत्या की जांच पर अगर सच को  ढंकने की कोशिश करने वालों से बचा लिया गया तो यह देश की  पत्रकारिता  के लिए बहुत  ही अच्छा होगा  .  सरकार को चाहिए कि पत्रकारों के सवाल पूछने के  अधिकार और आज़ादी को सुनिश्चित करे . साथ ही संविधान के अनुच्छेद १९(२) की सीमा में  रहते हुए कुछ भी लिखने की  आज़ादी और अधिकार को सरकारी तौर पर गारंटी की श्रेणी में ला दे . इससे निष्पक्ष पत्रकारिता का बहुत लाभ होगा.  ऐसी कोई व्यवस्था कर दी जाए जो सरकार की चापलूसी करने को  पत्रकारीय  कर्तव्य पर कलंक माने और इस तरह का काम करें वालों को हतोत्साहित करे.

हरियाणा के जन्म की कहानी, आला हाकिम की ज़ुबानी

Sun, 03/09/2017 - 12:39


शेष नारायण सिंह
हरियाणा के विकास में तीन लालों का बहुत अहम योगदान है . देवी लाल, बंसी लाल और  भजन लाल  ने हरियाण को जो स्वरुप दिया , उसी से  हरियाणा की पहचान बनी है .१९६६ के पहले  हरियाणा पंजाब  का हिस्सा था  और  हरियाणा में रहने वाले लोग नहीं चाहते थे कि वे पंजाब से  अलग हों. हरियाणा की स्थापना के लिए किसी ने कोशिश नहीं की थी , बल्कि हरियाणा बन जाने के बाद इस राज्य के लोगों को नया राज्य मिलने से कोई खुशी नहीं हुयी थी, बस लोगों ने नियति मानकर इसको स्वीकार कर लिया था .पंजाबी सूबे की मांग को लेकर मास्टर तारा सिंह और संत फ़तेह सिंह ने जो आन्दोलन चलाया उसी के नतीजे में उनको पंजाब का पंजाबी भाषा के बहुमत वाला इलाका  मिल गया , जो  बच गया उसी में हरियाणा और हिमाचल प्रदेश बन गया .  नये राज्य की राजनीति में शुरू से ही देवी लाल का दबदबा रहा  है . शुरू  से ही हरियाणा की नई विधान सभा के हर सत्र के पहले वहां दल बदल का मौसम आ जाता था, दल बदल की स्वार्थी राजनीति के आदि पुरुष गया लाल की कथा भी बहुत दिलचस्प है. देवी लाल ने राव बीरेंद्र सिंह की सरकार को  गिराने के लिए  १९६७ में दल बदल की ललित कला का सफल प्रयोग किया था .उसी दौर में विधायक हीरा नन्द आर्य ने पांच बार दल बदला, उन दिनों के केंद्रीय गृहमंत्री यशवंत राव बलवंत राव चह्वाण ने संसद में बताया कि राज्यपाल की रिपोर्ट के अनुसार दल बदल बहुत ही घटिया रूप में प्रकट हुआ था. एक विधायक की कीमत बीस हज़ार से चालीस हज़ार रूपये के बीच कुछ भी हो सकती थी. गौर करने की बात यह है कि उन दिनों के चालीस हज़ार रूपये की कीमत आज से बहुत ज्यादा होगी . १९६७ में सोना १०२ रूपये प्रति दस ग्राम था यानी चालीस हज़ार रूपये में उन दिनों करीब ३९२० ग्राम सोना खरीदा जा   सकता था . आज  इतने सोने की कीमत अगर तीस हज़ार प्रति दस ग्राम मानें तो यह रक़म एक करोड़ बीस लाख रूपये के आस पास बैठती है . हालांकि आजकल विधायकों के रेट बहुत ज्यादा हैं  लेकिन चालीस हज़ार  रूपये  १९६७ में के बहुत बड़ी रक़म मानी जाती थी . इस दौर में गया लाल ऐतिहासिक पुरुष बने थे . गया लाल ने मुख्य मंत्री राव बीरेंद्र सिंह का साथ ३० अक्टूबर, १९६७ को छोड़ा था . कुछ ही घंटों में राव बीरेंद्र  सिंह ने उनको चंडीगढ़  प्रेस के सामने पेश किया और कहा कि ," गया लाल अब आया राम हो गए हैं " लेकिन जब तक गृहमंत्री वाई बी चाहवाण संसद में  भाषण देते तब  तक  गया लाल फिर दल बदल चुके थे . गृहमंत्री ने संसद में  कहा कि " अब तो गया लाल भी गया " इसी  भाषण में उन्होंने कालजयी अभिव्यक्ति, ' आया राम ,गया  राम ' की रचना की थी . उस दौर में  दल बदल  का स्कोर भी रिकार्ड किया गया . हीरा नन्द आर्य का स्कोर सबसे अच्छा था. उन्होंने पांच बार दल बदला, दो  विधायकों ने चार बार, तीन विधायकों ने तीन बार और ३४ विधायकों ने एक बार दल बदल का कार्य किया . इन्हीं लोगों की कृपा से हरियाणा को 'आया राम , गया राम ' राजनीति का केंद्र बताया गया .यह सारी बातें एक नई किताब में दर्ज है .इस किताब में  हरियाणा के जन्म के दौर की कहानी भी है और यह भी कि किस तरह  देश के सबसे पिछड़े राज्य को बंसी लाल के कठिन परिश्रम के कारण देश के शीर्ष राज्य का  दर्जा मिला . देवी लाल और भजन लाल के राजनीतिक उत्थान पतन की कहानी भी है .वास्तव में यह एक आई ए एस अधिकारी की अपनी कहानी है जिनको हरियाणा के अब तक के तीन सबसे महत्वपूर्ण नेताओं के साथ काम करने  का अवसर मिला है . राम वर्मा की किताब  ," Life in  the IAS  , My Encounters With the Three Lals of Haryana " इन तीनों ही नेताओं की अच्छाई बुराई को कबीरपंथी  इमानदारी से बताने की कोशिश इस किताब का निश्चित रूप से स्थाई  भाव  है. बंसीलाल के बारे में बहुत दिलचस्प जानकारी है. इमरजेंसी में संजय गांधी के अनुयायी के रूप में चर्चित हो चुके बंसीलाल की छवि अधिकतर लोगों की नज़र में अलग तरह की है .लेकिन जब उन्होंने सत्ता पाई थी तो एक अलग इंसान थे. तीनों लालों में केवल उन्होंने ही औपचारिक शिक्षा पाई थी. कानून की पढाई की थी , देवीलाल और भजनलाल को तो ज़िंदगी की हालात ने ही जो पढ़ा दिया ,वही शिक्षा थी उन दोनों के पास . जो भी हो हरियाणा के उतार  चढ़ाव में इन लोगों का अहम योगदान है .
तीनों  ही लालों में सबसे पहले बंसीलाल मुख्यमंत्री बने. देवीलाल अविभाजित पंजाब के नेता थे, देश के बंटवारे के  बाद जब प्रताप सिंह कैरों मुख्यमंत्री बने तो देवीलाल उनके बहुत ही करीबी थे . हरियाणा की  स्थापना के बाद वे नए राज्य के ताक़तवर नेता बन गए .  जब बी डी शर्मा और  राव बीरेंद्र सिंह के बीच मुख्यमंत्री के पद को लेकर उठापटक शुरू हुयी तो देवीलाल की अहम भूमिका थी. कभी इस  पार और कभी उस पार सक्रिय रहे . मुराद यह कि उनको मुख्यमंत्री की गद्दी तो नहीं मिली लेकिन मुख्यमंत्री बनाने  बिगाड़ने में वे बहुत सक्रिय भूमिका निभाते रहे. बंसीलाल को मुख्यमंत्री बी डी शर्मा गुट ने बनवाया था क्योंकि उनको उम्मीद थी कि  बंसीलाल एक कठपुतली के रूप में रहेंगें लेकिन वक़्त ने ऐसा नहीं होने दिया . बंसीलाल ने किस तरह से  नए राज्य को सिंचाई के मामले में आत्मनिर्भर बनाया  , यह  कहानी  अच्छी तरीके से किताब में  दर्ज है . हुआ  यह कि  बंसी लाल एक बार हिमाचल प्रदेश के सुन्दर नगर में बन रहे बाँध को देखने गए थे . वहां तैनात उनको एक इंजीनियर ,के एस पाठक मिले जिन्होंने कभी अमरीका के टेनेसी वैली अथारिटी में काम किया था. बंसीलाल ने उनसे कहा कि मैं यमुना के पानी को हिसार के रेगिस्तानी और ऊंचे इलाके में ले जाना चाहता हूँ. पाठक ने कहा कि बिलकुल हो जायेगा  और साहेब काम शुरू हो गया . लिफ्ट सिंचाई की योजनायें बाद में और राज्यों में भी शुरू हुईं लेकिन बंसीलाल ने इसको अच्छी तरह से राज्य के हित में चलाया . इन्हीं लिफ्ट  सिंचाई योजनाओं के कारण ही हरियाणा के सूखे इलाकों में पानी आया .हरियाणा में हर गाँव को सड़कों से  जोड़ने  का श्रेय भी बंसीलाल को जाता है .  हरियाणा में चिड़ियों के नाम पर हर सड़क पर बने पर्यटक स्थलों का काम भी बंसीलाल के प्रमुख सचिव एस के मिश्र ने किया . एक बार मुख्यमंत्री को शिकायत मिली कि  हरित क्रान्ति का फायदा गाँवों तक नहीं पंहुच रहा है क्योंकि नियम ऐसे हैं कि  गाँव तक तार खींचने का पैसा  किसान को देना पड़ता था.  बंसीलाल ने  नियम बदल दिया और हर गाँव में बिजली पंहुचाने वाला हरियाणा देश का पहला राज्य बना  गया .किताब में राम वर्मा की दिल को छू जाने वाली वह कहानी भी  है  कि किस तरह से वे मेडिकल कारणों से आई ए एस में चुने जाने के बावजूद रिजेक्ट होने से बाल बाल बचे . आई ए अकेडमी ,मसूरी में अपने साथियों को भी बहुत ही अपनेपन से याद किया गया है . अपने पहले बॉस एस के मिश्र के बारे में भी उनकी यादें बहुत ही मधुर हैं . अपनी शादी की कहानी भी बहुत ही दिलचस्प तरीके से बताया है लेखक ने . आजकल तो आई ए एस  के रिज़ल्ट  आते ही लोग करोडपति हो जाते हैं लेकिन अपना वाला आई ए एस सचिवालय में   डिप्टी सेक्रेटरी तैनात होने के बाद  सिटी बस से दफ्तर जाता था. उन्होंने बस में जाने के इरादे  को इसलिए बदला क्योंकि उसी बस में उनके दफ्तर के अधीनस्थ कर्मचारी भी होते थे  जो उनको देखकर असहज हो जाते थे . उन्होंने आफिस से लोन लेकर वेस्पा स्कूटर खरीदा और उस पर सवार होने पर जो अलौकिक आनंद मिला उसका भी बहुत  अच्छे गद्य में वर्णन  है . चार साल की सर्विस के बाद मुख्य सचिव की  मर्जी के खिलाफ उनको सूचना निदेशक बना दिया गया . और  फिर तो वे जीवन भर मीडिया से संपर्क में बने रहे.  बाद में मुख्य सचिव भी हुए .अपनी बच्चियों के जन्म को जिस मुहब्बत से याद किया है वह  मार्मिक है . पहली बच्ची जब पैदा हुयी तो वे एस डी एम थे ,सब कुछ सरकारी तौर पर हो गया .  लेकिन दूसरी बच्ची के जन्म के समय की जो दर्द भरी कहानी है , वह भी  मर्म  पर चोट करती  है. उनको उम्मीद थी कि अभी कुछ समय है . वे संपादकों से मिलने जालंधर जा रहे थे, लंच पर सबको बुलाया  था . पत्नी ने रोका लेकिन रुके नहीं . और जब  लौट कर आये तो पता लगा कि पी जी आई चंडीगढ़ में तुरंत भर्ती होना पड़ा और  बेटी पैदा हो गयी  है . पुस्तक  उनकी पत्नी सावित्री को समर्पित है , जिन्होंने घोंसला बनाया और बच्चियों को पाला पोसा और जब चहचहाती चिड़ियों ने घोसला छोड़कर अपना  घर बनाया तो छोड़कर चली गयीं .हरियाणा के शुरुआती विकास की बारीकी को समझने की इच्छा रखने वाले विद्यार्थी के लिए यह एक उपयोगी किताब है .    

देश में खस्ता स्वास्थ्य सेवाओं को दुरुस्त करना बहुत ज़रूरी है

Sat, 02/09/2017 - 05:09


शेष नारायण सिंह
देश में स्वास्थ्य सेवाओं की हालत बहुत खराब है . गोरखपुर में बच्चे मर  रहे हैं और राजनीति करने वाले अपना काम कर रहे  हैं. पता चला है कि वहां के मेडिकल कालेज के अफसरों ने घूस की मात्रा कम होने पर नाराज़ होकर आक्सीजन सप्लाई करने वाले ठेकेदार का भुगतान रोक दिया था . उसने इन लोगों  को बार बार चिट्ठी लिखी लेकिन पैसा नहीं मिला इसलिए सप्लाई को नियमित नहीं किया गया . सरकार की भूमिका भी संदेह के  घेरे में है , उस पर चर्चा बाद में की जायेगी अभी तो डाक्टरी के पेश इसे जुडी  नैतिकता पर चर्चा करना ही ठीक रहेगा . मेडिकल नैतिकता की धज्जियां  उड़ाता एक वाकया और अखबारों में छपा है . जोधपुर में डाक्टरों ने जो कुछ किया उसके लिए उनको कड़ी से कड़ी सज़ा  दी जानी चाहिए . एक महिला उनके सामने आपरेशन की मेज़ पर पडी कराह रही थी  और डाकटर लोग आपस में लड़ रहे थे. उनकी लापरवाही से महिला की नवजात बच्ची की मृत्यु हो गयी . बाद में सरकार ने वहां भी कार्रवाई की लेकिन उससे बहुत फर्क नहीं पड़ता . मरीज़ की तो जान ही चली गयी. इन दोनों  ही मामलों में डाक्टरों ने अपना काम सही तरीके से नहीं  किया वरना यह हालत नहीं होती.सवाल यह उठता है कि इतने  अच्छे काम के लिए शिक्षा लेने के बाद यह लोग ऐसा करते क्यों हैं . इस पवित्र पेशे में प्रवेश के समय प्रत्येक डाक्टर को एक  घोषणा करनी होती  है जिसमें साफ़ साफ़ लिखा है कि मैं अपने आप को मानवता की सेवा के लिए समर्पित करता हूँ. हर खतरे का सामना करूंगी/करूंगा लेकिन मानवता के कानून के खिलाफ अपने मेडिकल ज्ञान का उपयोग कभी नहीं करूंगी/करूँगा . मैं मानव जीवन का सदैव सर्वोच्च सम्मान करूंगी /करूँगा . मेरे मरीज़ और मेरे कर्त्तव्य के बीच कभी भी धर्म, राष्ट्रीयता,जाति , राजनीति, या सामाजिक  हैसियत को नहीं आने दिया जाएगा . मैं अपना काम गरिमा के साथ निभाउंगी/निभाऊंगा. मेरे मरीज़ का  स्वास्थ्य मेरे लिए  सर्वोच्च प्राथमिकता होगा. अपने काम के दौरान मरीज़ के बारे में जो भी जानकारी या  रहस्य मुझे पता लगेंगें उनको मैं पूर्ण सम्मान दूंगी/दूंगा. मेरे शिक्षकों को मेरी तरफ से पूरा सम्मान मिलेगा . मेरी पूरी शक्ति से मेडिकल पेशे की पवित्र परम्परा और गरिमा के साथ सम्मान किया जाएगा . मैं अपने साथ काम करने वाले डाक्टरों का सम्मान करुँगी/करूँगा और उनकी गरिमा को अक्षुण रखूंगी/रखूँगा .
इस शपथ के साथ डाकटर अपना काम शुरू करते हैं और जब हम  गोरखपुर और जोधपुर के काण्ड को देखते हैं तो सर शर्म से झुक जाता है .अपने व्यक्तिगत अनुभव से  भी हर व्यक्ति कुछ न कुछ ज़रूर जानता  होगा जहां इस  मेडिकल प्रोफेशन की बुलंदियां भी होंगी तो कहीं न कहीं डाक्टरों का कमीनापन भी होगा . मेरा अपना अनुभव भी है . ठीक एक साल पहले मैं चिकनगुनिया का शिकार हुआ था. ग्रेटर नोयडा के एक नामी प्राइवेट अस्पताल में दिखाने गया तो भर्ती कर लिया गया .दो दिन के अन्दर मुझसे ज़रूरी पैसे लेकर डिस्चार्ज कर दिया गया . हालत और बिगड़ गयी तो एक  दूसरे अस्पताल में दाखिल हो गया .  सोचा था मामूली  बुखार है , तब तक चिकनगुनिया का पता   नहीं चला था . एक  हफ्ते वहाँ रहा , तो यह तो पता लग गया कि चिकनगुनिया है . उसका  इलाज शुरू हो गया लेकिन अस्पताल के डाक्टरों का रवैया अजीब था. तरह तरह के टेस्ट कर रहे थे  लेकिन उनको पता नहीं लगा कि चिकनगुनिया के चलते सोडियम, किडनी और लीवर की बीमारियाँ भी शुरू हो  रही हैं. तीन चार दिन बाद वहां के बड़े  डाक्टर ने मेरे एक दोस्त को बताया कि लगता  है  कि इनको सेप्टोसेमिया हो रहा है . यानी मेरे  शरीर की हालत बिगड़ रही थी और वे लोग लाइफ सपोर्ट सिस्टम लगा कर  बिल बढाने के काम में लग गए थे . बहरहाल जब मेरे बच्चों को पता चला तो एक राजनेता मित्र की कृपा से  मुझे वसंत कुञ्ज के लीवर संस्थान में भर्ती करा दिया गया . करीब  दो हफ्ते वहां रहा और मैंने अपनी आँखों से मेडिकल एथिक्स को देखा . जब मैं भर्ती हुआ तो मैं   वहां के  किसी डाक्टर से परिचित नहीं था , लेकिन जिस तरह से मेरी देखभाल शुरू हुयी उसके बाद मुझे पता लगा कि मेडिकल एथिक्स का पालन करने वाले डाक्टर कैसे  होते हैं . संस्थान के निदेशक डॉ एस के सरीन दुनिया के बहुत बड़े डाक्टर हैं .उनके नाम से गैस्ट्रो इंटाइटिस के इलाज का ' सरीन प्रोटोकल'  है जिसका पूरी दुनिया में प्रचलन है .  उनको दिखाने के लिए तीन महीने का इंतजार करना पड़ता है लेकिन मुझे  रोज़ दो बार देखने आते थे . डॉ सरीन के बारे में अब तो दन्त कथाएं प्रचलित हो गयी हैं . वरिष्ठ पत्रकार मनोज मिश्र की पत्नी की बहन की हालत बहुत खराब थी . लोग उम्मीद छोड़ चुके थे . लीवर ख़त्म होने के कगार पर था , पेट में बहुत पानी भर गया था . उन्होंने डॉ सरीन से बात की तब वे जी बी पन्त अस्पताल में थे . उन्होंने स्टेशन से सीधे अस्पताल आने को कहा . जगह नहीं थी तो वहां बरामदे में ही इलाज शुरू कर दिया और वे बिलकुल स्वस्थ हो कर अपने घर गयीं. इसी तरह का मामला वरिष्ठ पत्रकार रवीश कुमार  के भाई  का है . उनका लीवर बिल्कुल खराब था , ट्रांसप्लांट के लिए भर्ती किए गए  लेकिन डॉ सरीन ने  सरीन प्रोटोकल से इलाज किया . लीवर सही  हो गया , कोई सर्जरी नहीं हुयी . और  मरीज़ बिल्लुल स्वस्थ होकर अमरीका चला गया . बी एच यू मेडिकल कालेज के डॉ ए के सिंह की कहानी भी ऐसी ही है . वे तब तक ओ पी डी में बैठे  रहते थे जब तक सारे मरीजों को देख न लें .
मेडिकल एथिक्स में लिखा है कि अपने मरीज़ को फालतू टेस्ट या अन्य  डाक्टरों से सलाह लेने के लिए रेफर न किया लेकिन हमने लखनऊ में देखा है कि डॉ लोग हर तरह के टेस्ट की सलाह दे देते हैं क्योंकि उनके पर्चे  पर उनको कट मिलता  है .  मेरी डॉ सुमन लता ने हमेशा फालतू के टेस्ट का विरोध किया . एक बार किसी जूनियर डॉ ने एहतियातन सी टी स्कैन के लिए लिख दिया , डॉ सुमन ने साफ़ कह दिया कि कोई ज़रुरत नहीं है. मुराद यह है कि जोधपुर और गोरखपुर के बेईमान डाक्टरों की दुनिया से अलग भले डाक्टर भी हैं और बड़ी संख्या में हैं . सच्ची बात यह है कि जब आदमी बीमार होता है तो वह डाक्टर को ईश्वर के समकक्ष मान कर चलता है लेकिन रास्ते में  बैठे लुटेरे उसको कहीं का नहीं छोड़ते .अभी एक लड़के का मुंबई  से फोन आया कि उसको डाक्टर ने टीबी   बताया है और सर्जरी की सलाह दी है . उसने कहा कि बस पंद्रह हज़ार  रूपये का खर्च होगा. यानी कम खर्च बताकर मरीज़ को सर्जरी की मेज़ पर लिटा देगा और उसके बाद उससे  बाकी खर्च माँगना  शुरू करेगा . यह भी आजकल बहुत हो रहा है . इस माहौल में ज़रूरी है कि देश की जनता भी मेडिकल एथिक्स के बारे में पूरी तरह से अवगत रहे .मेडिकल एथिक्स की कुछ बुनियादी  बातें आम आदमी को भी पता होनी चाहिए. डाक्टर के लिए हर मरीज़ को देख पाना संभव नहीं है और न ही वह लाजिम है लेकिन  हर मरीज़ या घायल इंसान की काल पर कार्रवाई  करनी चाहिए, और अपने पवित्र काम की गरिमा को बनाए रखना चाहिए . इलाज के दौरान यह बिलकुल नहीं भूलना चाहिए कि मरीज़ के जीवन की रक्षा सबसे बड़ी प्राथमिकता है और मरीज़ अपने डाक्टर पर पूरा भरोसा करके वहां आया है .मेडिकल एथिक्स में साफ़ लिखा है कि अगर इमरजेंसी हो तो किसी को रेफर न करके शुरुआती इलाज अवश्य करना चाहिए . हाँ यदि किसी बीमारी के बारे में डाक्टर का अनुभव और शिक्षा उपयुक्त नहीं  है तो मरीज़ को सही सलाह देकर  उपयुक्त सन्दर्भ देकर भेजना चाहिए .ऐसी हालत में डाक्टर को मरीज़  का इलाज नहीं करना चाहिए और सही जगह रेफर करना चाहिए .  डाक्टर के व्यक्तित्व में धैर्य और शालीन आचरण पूरी तरह से समाहित होना चाहिए . अगर मरीज़ ने अपनी कुछ  कमजोरियों के बारे में डाक्टर से बताया  है तो उसको किसी भी हालात में किसी और को नहीं बताना चाहिए.  ऐसी बीमारियों के बारे में ज़रूर बताना चाहिए जो कि संभावित हों और उनके इलाज का उपाय किया जाना चाहिए . मरीज़ की बीमारी को कभी घटा या बढ़ा कर नहीं बताना चाहिए . जो भी बीमारी हो मरीज़ के दोस्तों और   रिश्तेदारों को उसकी पूरी जानकारी होनी चाहिए .हालांकि डाक्टर को इस बात की आजादी है कि वह अपना मरीज़ खुद चुने या किसका इलाज करे लेकिन  इमरजेंसी में उसको हर हाल में मदद करने के लिए आगे  आना चाहिए .अपने मरीज़ के स्वास्थ्य और उसके हित के लिए डाक्टर को तत्पर रहना चाहिए.
जहां तक  डाक्टरों के कर्तव्य की बात है उसके बारे में तो मेडिकल काउन्सिल ने सारे नियमबना रखे  हैं  लेकिन देश की  जनता का  स्वास्थ्य   निश्चित रूप से सरकारों की ज़िम्मेदारी कीश्रेणी में आता है . प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने के साथ ही नरेंद्र मोदी ने जनता के स्वास्थ्य के बारे में अपनी  प्राथमिकता स्पष्ट कर दिया था. अक्टूबर २०१४ में मुंबई में अपने एक भाषण में उन्होंने कहा था कि " यह शर्म की बात है  जब हम अपने देश की स्वास्थ्य सेवाओं की तुलना विकसित देशों  से करते हैं.  नवजात शिशुओं और मां के स्वस्थ्य के बारे में हमारी प्रगति बहुत ही चिंता की बात है." जब बच्चों की प्राथमिकता के बारे में हम  प्रधानमंत्री की बात के बरक्स गोरखपुर में आक्सीजन की कमी और डाक्टरों के व्यवहार को देखते हैं तो साफ़ लग जाता है कि उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के जिले में प्रधानमंत्री की बात को उनके सन्देश के तीन साल बाद भी गंभीरता से नहीं लिया गया है .उसी भाषण में प्रधानमंत्री ने कहा था कि " कई बार जच्चा-बच्चा दोनों  ही  बुनियादी स्वास्थ्य सेवा की कमी के कारण मर जाते हैं ." और गोरखपुर में सरकारी डाक्टरों और अस्पताल की कुव्यवस्था के कारण मरने वाले बच्चों के बारे में उत्तर प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री यह कहकर सरकार को दोष मुक्त करने की कोशिश करते हैं कि अगस्त के महीने में तो बच्चे  मरते ही रहते हैं. एक तरफ देश के प्रधानमंत्री कह रहे होते हैं कि हमको सबके  जीवन का सम्मान करना चाहिए और सफाई को अपने जीवन का लक्ष्य बनाना चाहिए दूसरी तरफ उनकी पार्टी के ही सदस्य मुख्यमंत्री और स्वास्थ्य मंत्री घोषणा करते हैं कि गोरखपुर के बच्चों की मृत्यु में अस्पताल में सफाई की कमी  भी एक कारण थी . सवाल यह  है कि जब प्रधानमंत्री से स्वच्छता को देश के मिशन के रूप में आगे बढाने की बात की है तो उनकी बात को उत्तर प्रदेश या अन्य राज्यों के मंत्री क्यों नहीं मानते .इसलिए स्वास्थ्य सेवा  को उसी तरह से प्राथमिकता देना होगा जैसा कि  पश्चिमी देशों  में है या क्यूबा जैसे देश  में है . प्रधानमंत्री की इच्छा का आदर करते हुए सबको इस मिशन में जुटना पड़ेगा .Click here to Reply, Reply to all, or Forward

धर्म आधारित राजनीति देश की एकता के लिए ख़तरा है.

Thu, 31/08/2017 - 04:47


शेष नारायण सिंह  
 सिरसा के गुरमीत राम रहीम को पंचकुला की विशेष सी बी आई अदालत ने बलात्कार का दोषी माना है. अदालत के फैसले के आने  के तुरंत बाद उसके चेलों ने  पंचकुला में  तबाही मचाने  का काम शुरू कर दिया .लूट ,हत्या, आगजनी की वारदात को बेख़ौफ़ होकर अंजाम दिया .  शुरू में समझ में नहीं आया कि जब सरकार को पहले से मालूम था और हज़ारों की संख्या में बाबा के समर्थक पंचकुला में इकठ्ठा हो रहे थे ,सरकार ने बड़े पैमाने पर सुरक्षाबल की तैनाती कर रखी थी, सेना की टुकड़ियां भी मौजूद थीं तो इतनी बड़ी वारदात कैसे हो गयी . लेकिन अब समझ में आ गया है कि सरकार की मिलीभगत थी. पंजाब-हरियाणा हाई कोर्ट ने पंजाब सरकार और मुख्यमंत्री को इस हालत के लिए जिम्मेवार ठहराया है. हाई कोर्ट ने हरियाणा सरकार के वकील बलदेवराज महाजन  को फटकार लगाई और कहा कि आप सच्चाई को तोड़मरोड़ कर पेश कर रहे थे और कोर्ट को गुमराह कर रहे थे. कोर्ट ने कहा कि जिस हिंसा में बड़े पैमाने पर आगजनी हुयी , तोड़फोड़ हुयी ,उसके लिए मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ज़िम्मेदार हैं . कोर्ट ने सरकारी वकील से बताया कि मुख्यमंत्री खट्टर खुद डेरा सच्चा सौदा को बचाने के लिए ज़िम्मेदार हैं. . अदालत ने कहा कि प्रशासनिक और राजनीतिक फैसलों में बहुत बड़ा अंतर है .राजनीतिक फैसलों के कारण प्रशासन अपने कर्तव्य का निर्वहन नहीं कर सका और सरकारी व्यवस्था कोलकवा मार गया . इस सारी घटना के लिए सरकार ने पुलिस के एक डिप्टी सुपरिंटेंडेंट को मुअत्तल किया है . कोर्ट ने पूछा कि  सवाल है कि क्या वही अफसर अकेले ज़िम्मेदार था.?कोर्ट ने कहा  मुख्यमंत्री स्वयं ही गृहमंत्री भी हैं. सात दिन से पंचकुला में लोग इकट्ठा हो रहे थे और मुख्यमंत्री उनको  सुरक्षा दे रहे थे . . पंजाब-हरियाणा हाई कोर्ट की टिप्पणी हरियाणा सरकार की नाकामी को बहुत ही सही परिप्रेक्ष्य में रख देती  है . सवाल यह है कि स्पष्ट बहुमत वाली सरकार का मुख्यमंत्री एक अपराधी और उसके गिरोह से इतना डरता क्यों है /? प्रधानमंत्री ने भी अपने रेडियो कार्यक्रम , ' मन की बात  ' में डेरा सच्चा सौदा का नाम लिए बिना साफ़ कहा कि कि धर्म के नाम पर हिंसा बर्दाश्त नहीं की जा सकती है . ज़ाहिर है बीजेपी में भी और सरकार में भी धर्म के नाम पर होने वाली हिंसा से चिंता के संकेत नज़र आने लगे हैं . प्रधानमंत्री ने कहा कि यह महात्मा बुद्ध और महात्मा गांधी का देश है जिन्होंने अहिंसा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी . प्रधानमंत्री ने रेडियो कार्यक्रम में सरदार पटेल को याद किया और कहा कि सरदार ने देश की एकता के लिए पूरा जीवन ही लगा दिया .
धार्मिक सहिष्णुता और देश की एकता के हवाले से सरदार पटेल को याद करना एक महत्वपूर्ण  संकेत है . इसका सीधा मतलब यह है कि अब सरकार के सर्वोच्च स्तर पर यह बात मान ली गयी है कि धार्मिक झगडे देश की एकता के लिए चुनौती हैं . हालांकि प्रधानमंत्री ने धर्म के नाम  पर हिंसा न करने की बात कई बार कही है , लाल किले की प्राचीर से भी कही थी लेकिन  अभी तक निचले स्तर पर बीजेपी के नेता और मंत्री उनकी बातों को गंभीरता से नहीं ले रहे थे . उनके बार बार कहने के बाद भी हिंसा की वारदातें , मुसलमानों को  गौरक्षा के बहाने मार डालने की बातें बदस्तूर चल रही थीं . लेकिन ' मन की बात ' में प्रधानमंत्री ने देश की एकता से धार्मिक आधार पर हो रही असहिष्णुता को जोड़कर एक बड़ी बात कही है . उम्मीद की जानी  चाहिए कि बीजेपी के छुटभैया नेता, राज्यों के मुख्यमंत्री , सरकारी तंत्र और अफसर प्रधानमंत्री की बातों को गंभीरता से लेंगें और देश की एकता और सरदार पटेल के मिशन को ध्यान में रखते  हुए  धार्मिक हिंसा पर फ़ौरन से पेशतर लगाम लगायेंगें .प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश की एकता के लिए ज़रूरी धार्मिक  सहिष्णुता की जो बात कही है वास्तव में वही संविधान की धर्मनिरपेक्षता की  अवधारणा है . यह अलग बात है कि उनकी पार्टी और उसके कार्यकर्ता धर्मनिरपेक्षता की निंदा करते रहे हैं . उनके दिमाग में कहीं से यह बात भरी रहती  थी कि धर्मनिरपेक्षता कांग्रेस की विरासत है . लेकिन वह गलत हैं . धर्मनिरपेक्षता किसी  पार्टी की विरासत नहीं है . वह देश की विरासत है .इसी विचार धारा की बुनियाद पर इस देश की आज़ादी की लड़ाई लड़ी गयी थी. अंग्रेजों की सोच थी कि इस देश के हिन्दू और मुसलमान कभी एक साथ नहीं खड़े होंगें लेकिन जब १९२० का महात्मा गांधी का आन्दोलन शुरू हुआ तो हिन्दू और मुसलमान न केवल साथ साथ थे बल्कि मुसलमानों के सभी फिरके महात्मा गांधी के साथ हो गए थे . उसके बाद ही अंग्रेजों ने  दोनों धर्मो  में  गांधी विरोधी तबका तैयार किया और उसी हिसाब से राजनीतिक संगठन खड़े किये . लेकिन महात्मा गांधी के आन्दोलन का  स्थाई भाव सभी  धर्मों का साथ ही बना रहा और आजादी की लड़ाई उसी बुनियाद पर जीती गयी. जाते जाते अंग्रेजों ने अपने वफादार जिन्ना को पाकिस्तान तो बख्श दिया लेकिन भारत की एकता को तोड़ने में नाकाम रहे . धर्मनिरपेक्षता की विरोधी ताक़तों ने महात्मा गांधी की  ह्त्या भी कर दी लेकिन देश की एकता बनी रही .
राष्ट्र की एकता के लिए ज़रूरी  सर्व धर्म   समभाव  की बात को प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने तो आगे बढाया  ही, इस मिशन में  सरदार पटेल का योगदान  किसी से कम नहीं है .यह सच है कि जब तक कांग्रेस ने धर्मनिरपेक्षता की  राजनीति को अपनी  बुनियादी सोच का हिस्सा बना कर  रखा , तब तक कांग्रेस अजेय रही लेकिन जब साफ्ट हिंदुत्व की राजनीति को अपनाने की कोशिश की , इमरजेंसी के दौरान  दिल्ली और अन्य इलाकों में मुसलमानों को चुन चुन कर मारा तो देश की जनता कांग्रेस के खिलाफ  खड़ी हो गयी और पार्टी  १९७७ का चुनाव हार गयी .  जो काम वहां से शुरू हुआ था ,उसका नतीजा कांग्रेस के सामने है .  
कांग्रेस के इंदिरा गांधी युग में धर्मनिरपेक्षता के विकल्प की तलाश शुरू हो गई थी। उनके बेटे और उस वक्त के उत्तराधिकारी संजय गांधी ने 1975 के बाद से सरकारी मशीनरी का इस्तेमाल मुसलमानों के खिलाफ करना शुरू कर दिया था। खासतौर पर मुस्लिम बहुल इलाकों में इमारतें ढहाना और नसबंदी अभियान में उनको घेरना ऐसे उदाहरण हैं जो सॉफ्ट हिंदुत्व की तरफ इशारा करते हैं। 1977 के चुनाव में कांग्रेस की हार के बाद से ही कांग्रेस की सांप्रदायिक राजनीति की शुरुआत होने लगी। १९७७ की हार के बाद ही इंदिरा गांधी ने असम में छात्र असंतोष को हवा दी और पंजाब में अपने ख़ास भक्त ज्ञानी जैल सिंह की मदद से जनरैल सिंह भिंडरावाला को दी गयी कांग्रेसी शह इसी राजनीति का नतीजा है।हमारे अपने देश में सेकुलर राजनीति का विरोध करने वाले और हिन्दुराष्ट्र की स्थापना का सपना देखें वालों को पाकिस्तान की धार्मिक राजनीति से हुई तबाही पर भी नज़र डाल लेनी चाहिए .पकिस्तान की आज़ादी के वक़्त उसके संस्थापक मुहम्मद अली जिन्नाह ने  साफ़ ऐलान कर दिया था कि पाकिस्तान एक सेकुलर देश होगा .ऐसा शायद इसलिए था कि १९२० तक जिन्नाह मूल रूप से एक सेकुलर राजनीति का पैरोकार थे . उन्होंने १९२० के आंदोलन में खिलाफत के धार्मिक नारे के आधार पर मुसलमानों को साथ लेने का विरोध भी किया था लेकिन बाद में अंग्रेजों  की चाल में फंस गए और लियाकत अली ने उनको मुसलमानों का नेता बना दिया .नतीजा यह हुआ कि १९३६ से १९४७ तक हम मुहम्मद अली जिन्नाह को मुस्लिम लीग के नेता के रूप में देखते हैं जो कांग्रेस को हिंदुओं की पार्टी साबित करने के चक्कर में रहते थे . लेकिन  कांग्रेस का नेतृत्व महात्मा गांधी और जवाहरलाल नेहरू के पास था और उन्होंने कांग्रेस को किसी एक धर्म की पार्टी नहीं बनने दिया . लेकिन जब पाकिस्तान की स्थापना हो गयी तब जिन्नाह ने ऐलान किया कि हालांकि पाकिस्तान की स्थापना इस्लाम के अनुयायियों के नाम पर हुई है लेकिन वह एक सेकुलर देश बनेगा .अपने बहुचर्चित ११ अगस्त १९४७ के भाषण में पाकिस्तानी संविधान सभा के अध्यक्षता करते हुए जिन्नाह ने सभी पाकिस्तानियों से कहा कि ,” आप अब आज़ाद हैं . आप अपने मंदिरों में जाइए या अपनी मस्जिदों में जाइए . आप का धर्म या जाति कुछ भी हो उसका  पाकिस्तान के  राष्ट्र से कोई लेना देना नहीं है .अब हम सभी एक ही देश के स्वतन्त्र नागरिक हैं . ऐसे नागरिक , जो सभी एक दूसरे के बराबर हैं . इसी बात को उन्होंने फरवरी १९४८ में भी जोर देकर दोहराया . उन्होंने कहा कि कि, “ किसी भी हालत में पाकिस्तान  धार्मिक राज्य नहीं बनेगा . हमारे यहाँ बहुत सारे गैर मुस्लिम हैं –हिंदू, ईसाई और पारसी हैं लेकिन वे सभी पाकिस्तानी हैं . उनको भी वही अधिकार मिलेगें जो अन्य पाकिस्तानियों को और वे सब पाकिस्तान में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभायेगें .” लेकिन पाकिस्तान के  संस्थापक का यह सपना धरा का धरा रह गया और पाकिस्तान का पूरी तरह से इस्लामीकरण हो गया . पहले चुनाव के बाद ही  वहाँ बहुमतवादी राजनीति कायम हो चुकी थी और उसी में एक असफल राज्य के रूप में पाकिस्तान की बुनियाद पड़ चुकी थी. १९७१ आते आते तो  नमूने के लिए पाकिस्तानी संसद में एकाध हिंदू मिल जाता था  वर्ना पाकिस्तान पूरी तरह से इस्लामी राज्य बन चुका था. अलोकतांत्रिक  धार्मिक नेता राजकाज के हर क्षेत्र में हावी हो चुके थे.

आजकल भारत में भी धार्मिक बहुमतवाद की राजनीति को स्थापित करने की कोशिश की जा रही है .लेकिन उनको ध्यान रखना पडेगा कि धार्मिक कट्टरता किसी भी राष्ट्र का धर्म नहीं बन सकती . अपने पड़ोसी के उदाहरण से अगर सीखा न गया तो किसी को भी अंदाज़ नहीं है कि हम अपनी आने वाली पीढ़ियों को किस तरह का भारत देने जा रहे हैं .  लेकिन साथ ही यह भी ध्यान रखना पडेगा कि  धार्मिक समूहों को वोट की लालच में आगे भी न बढ़ाया जाये. जवाहरलाल नेहरू के युग तक तो किसी की हिम्मत नहीं पडी कि  धार्मिक समूहों का विरोध करे या पक्षपात करे लेकिन उनके जाने के बाद धार्मिक पहचान की राजनीति ने अपने देश में तेज़ी से रफ़्तार पकड़ी और आज राजनीतिक प्रचार में वोट हासिल करने के लिए धार्मिक पक्षधरता की बात करना राजनीति की प्रमुख धारा बन चुकी है।  कहीं मुसलमानों को  अपनी तरफ मिलाने की कोशिश की जाती है तो दूसरी तरफ हिन्दुओं का नेता बनने की होड़ लगी हुयी है।  इससे बचना पडेगा।  अगर न बच सके तो राष्ट्र और देश के सामने मुश्किल पेश आ सकती है। 

आरक्षण में आरक्षण की राजनीति और भविष्य की राजनीतिक संभावनाएं

Thu, 31/08/2017 - 04:45


शेष नारायण सिंह
केंद्रीय मंत्रिमंडल ने एक ऐसे प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है जिसके बाद एक ऐसे आयोग का गठन किया जायेगा जो केंद्र सरकार की  नौकरियों में  पिछड़ी जाति के कोटे से मिलने वाले आरक्षण की समीक्षा करेगा . कोशिश यह होगी कि ओबीसी आरक्षण का फायदा उन् सभी पिछड़ी जातियों तक पंहुचे जो अभी तक भी हाशिये पर हैं. सरकार ने दावा किया है कि यह आयोग ओबीसी लिस्ट में शामिल जातियों को आरक्षण से मिलने वाले लाभ का न्यायपूर्ण वितरण उन जातियों को नहीं मिल पा रहा है जिनकी संख्या कम है .इस आयोग  से यह भी अपेक्षा की जायेगी कि वह अब तक नज़रंदाज़ की गयी पिछड़ी जातियों को न्याय दिलाने के तरीके भी सुझाए . केंद्रीय सूची में मौजूद सभी ओबीसी जातियों की नए सिरे से समीक्षा करने के लिए बनाए जा रहे इस आयोग के दूरगामी राजनीतिक पारिणाम  होंगें . मंत्रिमंडल के फैसले की जानकारी देते हुए केंद्रीय वित्तमंत्री अरुण जेटली ने बताया कि अभी तक  होता यह रहा  है कि संख्या में अधिक और राजनीतिक रूप से सक्षम जातियां अति पिछड़ों को नज़रंदाज़ करती रही हैं लेकिन उसको दुरुस्त करना ज़रूरी हो गया था इसलिए सरकार को यह फैसला करना पड़ा .२०१५ में हुए बिहार विधान सभा के चुनाव के दौरान आर एस एस के प्रमुख ,मोहन भागवत ने कहा था कि आरक्षण नीति की समीक्षा की जानी चाहिए . लालू प्रसाद यादव और उनके तब के चुनाव के सहयोगी  नीतीश कुमार ने मोहन भागवत के इस बयान को इतना बड़ा मुद्दा बना दिया था कि पिछड़ी जातियों की भारी संख्या वाले बिहार में बीजेपी बुरी तरह से चुनाव हार गयी  . मंत्रिमंडल की बैठक के बाद फैसलों की जानकारी देने आये अरुण जेटली से जब पूछा गया की क्या केंद्र सरकार मोहन भागवत की बात को ही अमली जामा पंहुचाने की दिशा में चल रही है तो उन्होंने साफ़ कहा कि ' सरकार के पास इस तरह का कोई प्रस्ताव नहीं है और न ही भविष्य में ऐसा प्रस्ताव होगा यानी उन्होंने मोहन भागवत की बात को लागू करने की किसी संभावना से साफ़ इनकार कार दिया . प्रस्तावित आयोग का सीमित उद्देश्य केवल मंडल कमीशन की जातियों की योग्यता की  श्रेणी का पुनार्विभाजन ही है और कुछ नहीं . केंद्रीय मंत्री की बात अपनी जगह है लेकिन यह तय है कि ओबीसी लिस्ट में संशोधन की बात पर ताक़तवर जातियों के नेता राजनीतिक स्तर पर हल्ला गुल्ला ज़रूर करेंगे . लगता  है कि लालू प्रसाद यादव की  २७ अगस्त की प्रस्तावित  रैली के लिए केंद्र सरकार और बीजेपी ने  बड़ा मुद्दा दे दिया है . यह भी संभव  है कि केंद्र सरकार लालू यादव और उनके साथ आने वाली पार्टियों की ताकत को भी इसी फैसले की कसौटी पर कसना चाह रही हो . ओबीसी की राजनीति के बड़े पैरोकार नीतीश कुमार शरणागत होने के बाद केंद्र सरकार को लालू यादव को चिढाने का भी एक अवसर हाथ आया है जिसका राजनीतिक लाभ होगा और केंद्र सरकार उसको लेने की कोशिश अवश्य करेगी .
मीडिया से मुखातिब अरुण जेटली ने बताया कि ग्यारह राज्यों में इस तरह की सूची पहले से  ही है जिसमे आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, झारखण्ड ,पश्चिम बंगाल, जम्मू, आदि शामिल हैं . ओबीसी   वर्ग में आरक्षण लेने के लिए क्रीमी लेयर की बात भी हुयी . अब तक सालाना आमदनी छः लाख रूपये वाले लोगों के बच्चे आरक्षण के लिए योग्य होते थे. अब वह सीमा बढाकर आठ लाख कर दी गयी है .बिहार और उत्तर प्रदेश दलित और ओबीसी राजनीति का एक प्रमुख केंद्र है . दक्षिण भारत में तो यह राजनीति स्थिर हो चुकी है बिहार और उत्तर प्रदेश में  ओबीसी की सबसे ताक़तवर जातियों यादव और कुर्मी का दबदबा  है . बीजेपी प्रमुख अमित शाह लोकसभा २०१४ चुनाव के दौरान उत्तर प्रद्देश के प्रभारी थे और विधानसभा २०१७ के दौरान तो वे पार्टी के  अध्यक्ष ही थे . इन दोनों चुनावों में उन्होंने गौर यादव ओबीसी और गैर जाटव दलितों को अपने साथ लेने का बड़ा राजनीतिक प्रयास किया . केशव प्रसाद मौर्य को राज्य की राजनीति में महत्व देना इसी रणनीति का हिस्सा था . यादव जाति को अलग थलग  करके समाजवादी पार्टी को  पराजित करने की  योजना की सफलता के बाद से ही ओबीसी जातियों को फिर से समायोजित करने की बात चल रही थी. ऐसा लगता है कि केंद्र सरकार को पिछड़ी जातियों के बारे में प्रस्तावित आयोग इसी राजनीति का हिस्सा है .
आरक्षण की राजनीति को  डॉ राम मनोहर लोहिया ने अफर्मेटिव एक्शन यानी सकारात्मक हस्तक्षेप नाम दिया था  . उनका दावा था कि  अमरीका में भी  इस तरह की राजनीतिक योजना पर काम किया गया था . अपने देश में सकारात्मक हस्तक्षेप के पुरोधा डॉ भीमराव आंबेडकर और डॉ राम मनोहर लोहिया माने जाते हैं . इन नेताओं की सोच को कांग्रेस ने भी अपनाया और संविधान में ऐसी व्यवस्था की गयी कि दलितों को सरकारी नौकरियों में आरक्षण दिया गया. संविधान के लागू होने के इतने  साल बाद सकारात्मक हस्तक्षेप के राजनीतिक दर्शन में अब कुछ सुधार की ज़रुरत महसूस की जा रही है . हालांकि आज के नेताओं में किसी की वह ताक़त नहीं है कि वह आज़ादी की लड़ाई में शामिल नेताओं की तरह वे तरीके भी अपना सकें जो चुनाव के गणित के हिसाब से अलोकप्रिय हों . लेकिन इतना तय है कि चुनावी लाभ हानि को ध्यान में रख कर ही सही सामाजिक बराबरी के बारे में चर्चा हो रही है . उस समय  दलितों को आरक्षण दिया  गया था. पिछड़ी जातियों को तो आरक्षण विश्वनाथ प्रताप सिंह के प्रधानमंत्री रहते दिया गया .उत्तर प्रदेश में  ओबीसी की राजनीति में सही तरीके से आरक्षण की बात हमेशा उठती रही है . ताक़तवर यादव और कुर्मी जाति के लोग बड़ी संख्या में  सरकारी नौकरियों पर मंडल कमीशन लागू होने के बाद से ही काबिज़ हो रहे थे और अति पिछड़ी जातियों में बड़ा असंतोष था .बीजेपी की ओर से जब राजनाथ सिंह मुख्यमंत्री बनाए गए तो उन्होंने राज्य की भावी राजनीति की इस दस्तक को पहचान लिया था .पिछड़ों की राजनीति के मामले में उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव की ताक़त बहुत ज्यादा थी. पिछड़े और दलित वोट बैंक को छिन्न भिन्न करके अपनी पार्टी की स्थिति को मज़बूत बनाने के लिए राजनाथ सिंह ने वही करने की कोशिश की जिसे बाद में बिहार की राजनीति में नीतीश कुमार ने अपनाया . नीतीश अपनी पार्टी के सबसे बड़े नेता हैं इसलिए वे अपनी योजना को लागू करने में सफल हुए लेकिन राजनाथ सिंह की किस्मत वैसी नहीं थी. उनकी टांग खींचने के लिए तो उत्तर प्रदेश में ही बहुत लोग मौजूद थे और उन लोगों को दिल्ली के नेताओं का आशीर्वाद भी मिलता रहता था .उत्तर प्रदेश के मुख्य मंत्री के रूप में राजनाथ सिंह ने सामाजिक न्याय समिति बनायी थी जिसने अति पिछड़ों के लिए आरक्षण के अन्दर आरक्षण की सिफारिश की थी . राजनाथ सिंह ने कहा था कि पिछड़ों के लिए तय आरक्षण में कुछ जातियां ही आरक्षण का पूरा लाभ ले लेती हैं जबकि अन्य पिछड़ी जातियां वंचित रह जाती हैं। समिति की सिफारिशें के आधार पर काम शुरू भी हो गया था . बहुत ही शुरुआती दौर था . यह योजना परवान चढ़ पाती कि आम चुनाव हो गए और भाजपा सत्ता में लौटी ही नहीं। मायावती ने बाद में इस श्रेणी को ख़त्म कर दिया . इसके बाद भाजपा ने भी समिति की रिपोर्ट को भुला दिया। बाद में तो बीजेपी में भी सामाजिक न्याय और आरक्षण के मामले पर गंभीर आन्तरिक चिंतन हुआ और अमित शाह ने २०१४ में उस चिंतन का  लाभ उठाया . चल रहा है . ज़ाहिर है आरक्षण से जुड़े मुद्दों की राजनीति करवट ले रही है .
संविधान निर्माताओं ने आरक्षण को सामाजिक  बराबरी के एक हथियार के रूप में लागू किया था लेकिन आरक्षण से उम्मीद के मुताबिक़ नतीजे नहीं मिले इसलिए उसे और संशोधित भी किया गया लेकिन आजकल एक अजीब बात देखने में आ रही है . वे जातियां जिनकी वजह से देश और समाज में दलितों को शोषित पीड़ित रखा गया था , वही आरक्षण की बात करने लगी हैं . पिछड़ी जातियों को सरकारी नौकरियों में आरक्षण देने के लिए बनी काका कालेलकर और मंडल कमीशन की सिफारिशों में क्रीमी लेयर की बात की गयी थी . इसका मतलब यह था कि जो लोग आरक्षण के लाभ को लेकर आर्थिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े नहीं रह गए हैं, उनके घर के बच्चों को आरक्षण के लाभ से अलग कर दिया जाना चाहिए लेकिन बहुत दिनों तक ऐसा नहीं हुआ. 
सामाजिक बराबरी के दर्शन शास्त्र के आदिपुरुष महात्मा फुले ने इसे एक बहुत ही गंभीर राजनीतिक परिवर्तन का हथियार माना है . उनका मानना था कि दबे कुचले वर्गों को अगर बेहतर अवसर दिए जाएँ तो सब कुछ बदल सकता है ... महात्मा फुले के चिंतन के केंद्र में मुख्य रूप से धर्म और जाति की अवधारणा है। वे कभी भी हिंदू धर्म शब्द का प्रयोग नहीं करते। वे उसे ब्राह्मणवाद के नाम से ही संबोधित करते हैं। महात्मा फुले ने समझाया कि जाति की संस्था समाज के प्रभुता संपन्न वर्गों के आधिपत्य को स्थापित करने का एक हथियार है.उनके हिसाब से जाति भारतीय समाज की बुनियाद का काम भी करती थी और उसके ऊपर बने ढांचे का भी। उन्होंने शूद्रातिशूद्र राजा,बालिराज और विष्णु के वामनावतार के संघर्ष का बार-बार ज़िक्र किया है। स्थापित व्यवस्था के खिलाफ महात्मा फुले के हमले बहुत ही ज़बरदस्त थे। वे एक मिशन को ध्यान में रखकर काम कर रहे थे। उन्होंने इस बात के भी सूत्र दिये,जिसके आधार पर शूद्रातिशूद्रों का अपना धर्म चल सके। वे एक क्रांतिकारी सामाजिक परिवर्तन की बात कर रहे थे। ब्राह्मणवाद के चातुर्वर्ण्‍य व्यवस्था को उन्होंने ख़ारिज़ किया,ऋग्वेद के पुरुष सूक्त का, जिसके आधार पर वर्णव्यवस्था की स्थापना हुई थी, को फर्ज़ी बताया और द्वैवर्णिक व्यवस्था की बात की।महात्मा फुले एक समतामूलक और न्याय पर आधारित समाज की बात कर रहे थे इसलिए उन्होंने अपनी रचनाओं में किसानों और खेतिहर मजदूरों के लिए विस्तृत योजना का उल्लेख किया है। स्त्रियों के बारे में महात्मा फुले के विचार क्रांतिकारी थे। मनु की व्यवस्था में सभी वर्णों की औरतें शूद्र वाली श्रेणी में गिनी गयी थीं। लेकिन फुले ने स्त्री पुरुष को बराबर समझा। उन्होंने औरतों की आर्य भट्ट यानी ब्राह्मणवादी व्याख्या को ग़लत बताया।
एक लम्बा इतिहास है सकारात्मक हस्तक्षेप का और इसे हमेशा ही ऐसा राजनीतिक विमर्श माना जाता रहा है जो मुल्क और कौम के मुस्तकबिल को प्रभावित करता है .केंद्रीय मंत्रिमडल की ओबीसी जातियों के फिर से वर्गीकरण की नीति का महत्व है और यह निश्चित रूप से उन  वर्गों को कष्ट देगी जो जन्म से तो ओबीसी हैं लेकिन कर्म से महात्मा फुले के प्रभुता संपन्न वर्ग में शामिल हो चुके हैं . हो सकता है कि बीजेपी ने राजनीतिक लाभ लेने और विरोधी को कमज़ोर करने के लिए ही यह कदम उठाया हो लेकिन इसके नतीजे महत्वपूर्ण होंगें .

<div dir="ltr" style="text-align: left;

Mon, 21/08/2017 - 10:56
चर्चिल और जिन्ना की साज़िश का नतीजा था देश का बंटवारा
शेष नारायण सिंह
भारत का बँटवारा एक  बहुत बड़ा धोखा था  जो कई स्तरों पर खेला गया था. अँगरेज़ भारत को आज़ाद किसी कीमत पर नहीं करना चाहते थे लेकिन उनके प्रधानमंत्री विन्स्टन चर्चिल को सन बयालीस के बाद जब अंदाज़ लग गया कि अब महात्मा  गांधी की आंधी के सामने टिक पाना नामुमकिन है तो उसने देश के टुकड़े करने की योजना पर काम करना शुरू कर दिया .जिन्नाह अंग्रेजों के वफादार थे ही , चर्चिल ने देसी राजाओं को भी हवा देना शुरू कर दिया था . उसको उम्मीद थी कि राजा लोग कांग्रेस के अधीन भारत में शामिल नहीं होंगें . पाकिस्तान तो उसने बनवा लिया लेकिन राजाओं को सरदार पटेल ने भारत में शामिल होने के लिए राजी कर लिया. जो नहीं राजी हो रहे थे उनको नई हुकूमत की ताकत दिखा दी . हैदराबाद का  निजाम और जूनागढ़ का नवाब कुछ पाकिस्तानी मुहब्बत में नज़र आये तो उनको सरदार पटेल की राजनीतिक अधिकारिता के दायरे  में ले लिया  गया और कश्मीर का राजा  शरारत की बात सोच रहा था तो उसको भारत की मदद की ज़रुरत तब पड़ी जब पाकिस्तान की तरफ से कबायली हमला हुआ . हमले के बाद राजा डर गया और सरदार ने  उसकी मदद करने से इनकार कर दिया . जब राजा ने भारत के साथ विलय के दस्तावेज़ पर दस्तखत कर  दिया तो  पाकिस्तानी फौज और कबायली हमले को भारत की सेना ने वापस भगा दिया .लेकिन यह सब देश के बंटवारे के बाद हुआ . १९४५ में  तो चर्चिल ने इसे एक ऐसी योजना के रूप में सोचा रहा होगा जिसके बाद भारत  के टुकड़े होने से कोई रोक नहीं सकता था .  चर्चिल का सपना था कि दूसरे विश्वयुद्ध के बाद  जिस तरह से यूरोप के देशों का विजयी देशों ने यूरोप के देशों में प्रभाव क्षेत्र का बंदरबाँट किया था , उसी तरह से भारत में भी कर लिया जाएगा .अंग्रेजों ने भारत को कभी भी अपने से अलग करने की बात सोची ही  नहीं थी. उन्होंने तो दिल्ली में एक खूबसूरत राजधानी बना ली थी .  प्रोजेक्ट नई दिल्ली १९११ में शुरू हुआ था और महात्मा गांधी के असहयोग आन्दोलन और  सिविल नाफ़रमानी आन्दोलन की सफलता के बावजूद भी नयी इंपीरियल कैपिटल में ब्रिटिश हुक्मरान  पूरे  ताम झाम से आकर बस गए थे . 10 फरवरी 1931 के दिन नयी दिल्ली को औपचारिक रूप से ब्रिटिश भारत की राजधानी बनाया गया. उस वक़्त के वाइसराय लार्ड इरविन ने नयी दिल्ली शहर का विधिवत उदघाटन किया . १९११ में जार्ज पंचम के राज के दौरान दिल्ली में दरबार हुआ और तय हुआ कि राजधानी दिल्ली में बनायी जायेगी. उसी फैसले को कार्यरूप देने के लिए रायसीना की पहाड़ियों पर नए शहर को बसाने का फैसला हुआ और नयी दिल्ली एक शहर के रूप में विकसित हुआ . इस शहर की डिजाइन में एडविन लुटियन क बहुत योगदान है . १९१२ में एडविन लुटियन की दिल्ली यात्रा के बाद शहर के निर्माण का काम शुरू हो जाना था लेकिन विश्वयुद्ध शुरू हो गया और ब्रिटेन उसमें बुरी तरह उलझ गया इसलिए नयी दिल्ली प्रोजेक्ट पर काम पहले विश्वयुद्ध के बाद शुरू हुआ. यह अजीब इत्तिफाक है कि भारत की आज़ादी की लडाई जब अपने उरूज़ पर थी तो अँगरेज़ भारत की राजधानी के लिए नया शहर बनाने में लगे हुए थे. पहले विश्वयुद्ध के बाद ही महात्मा गाँधी ने कांग्रेस और आज़ादी की लड़ाई का नेतृत्व संभाला और उसी के साथ साथ अंग्रेजों ने राजधानी के शहर का निर्माण शुरू कर दिया . १९३१ में जब नयी दिल्ली का उदघाटन हुआ तो महात्मा गाँधी देश के सर्वोच्च नेता थे और पूरी दुनिया के राजनीतिक चिन्तक बहुत ही उत्सुकता से देख रहे थे कि अहिंसा का इस्तेमाल राजनीतिक संघर्ष के हथियार के रूप में किस तरह से किया जा रहा है . १९२० के महात्मा गाँधी के आन्दोलन की सफलता और उसे मिले हिन्दू-मुसलमानों के एकजुट समर्थन के बाद ब्रिटिश साम्राज्य के लोग घबडा गए थे . उन्होंने हिन्दू मुस्लिम एकता को तोड़ने के लिए सारे इंतज़ाम करना शुरू कर दिया था . हिन्दू महासभा के नेता वी डी सावरकर को माफी देकर उन्हें किसी ऐसे संगठन की स्थापना का ज़िम्मा दे दिया था जो हिन्दुओं और मुसलमानों में फ़र्क़ डाल सके . उन्होंने अपना काम बखूबी निभाया .उनकी  नयी किताब ‘ हिंदुत्व’ इस मिशन में बहुत काम आई . १९२० के आन्दोलन में दरकिनार होने के बाद कांग्रेस की राजनीति में निष्क्रिय हो चुके मुहम्मद अली जिन्ना को अंग्रेजों ने सक्रिय किया और उनसे मुसलमानों के लिए अलग देश माँगने की राजनीति पर काम करने को कहा . देश का राजनीतिक माहौल इतना गर्म हो गया कि १९३१ में नयी दिल्ली के उदघाटन के बाद ही अंग्रेजों की समझ में आ गया था कि उनके चैन से बैठने के दिन लद चुके हैं .
लेकिन अँगरेज़ हार मानने  वाले नहीं थे . उन्होंने जिस डामिनियन स्टेटस की बात को अब तक लगातार नकारा था , उसको लागू करने की बात करने लगे .१९३५ का गवर्नमेंट आफ इण्डिया एक्ट इसी दिशा में एक कदम था लेकिन कांग्रेस ने  लाहौर में १९३० में ही तय कर लिया था कि अब पूर्ण स्वराज चाहिए ,उस से कम कुछ नहीं . १९३५ के बाद यह तय हो गया था कि अँगरेज़ को जाना ही पड़ेगा . लेकिन वह तरह तरह के तरीकों से उसे टालने की कोशिश कर रहा था . अपने सबसे बड़े खैरख्वाह जिन्ना को भी नई दिल्ली के क्वीन्स्वे ( अब जनपथ ) पर  अंग्रेजों ने एक घर  दिलवा दिया था . जिन्ना उनके मित्र थे इसलिए उन्हें एडवांस में मालूम पड़ गया था कि बंटवारा होगा और फाइनल होगा . शायद इसीलिये जिन्ना की हर चाल में चालाकी नजर आती थी . बंटवारे के लिए अंग्रेजों ने अपने वफादार मुहम्मद अली जिन्ना से द्विराष्ट्र सिद्धांत का प्रतिपादन करवा दिया. वी डी सावरकार ने भी इस  सिद्धांत को हिन्दू महासभा के अध्यक्ष के रूप में १९३७ में अहमदाबाद के  अधिवेशन में अपने भाषण में कहा लेकिन अँगरेज़ जानता था कि सावरकर के पास कोई राजनीतिक समर्थन नहीं है इसलिए  वे जिन्ना को उकसाकर महात्मा गांधी और कांग्रेस को हिन्दू पार्टी के रूप में ही पेश करने की कोशिश करते रहे.आज़ादी की लड़ाई सन बयालीस के बाद बहुत तेज़ हो गयी .  ब्रिटेन के युद्ध कालीन प्रधानमंत्री  विन्स्टन चर्चिल को साफ़ अंदाज़ लग गया कि अब भारत से ब्रिटिश  साम्राज्य का दाना पानी उठ चुका है . इसलिए उसने बंटवारे का नक्शा बनाना शुरू कर दिया था . चर्चिल को उम्मीद थी कि वह युद्ध के बाद होने वाले चुनाव में फिर चुने जायेगें और प्रधानमंत्री  वही  रहेंगे इसलिए उन्होंने भारत के तत्कालीन वायसराय लार्ड वाबेल को पंजाब और बंगाल के विभाजन का नक्शा भी दे दिया था. उनको शक था कि आज़ाद भारत सोवियत रूस  की तरफ  जा सकता है और उसको कराची का बेहतरीन बंदरगाह मिल सकता है . उसक एबाद पश्चिम एशिया के तेल पर उसका अधिकार ज्यादा हो जाएगा .शायद इसीलिये चर्चिल ने जिन्ना को इस्तेमाल करके कराची को भारत से अलग करने की साज़िश रची थी .वाबेल तो चले गए लेकिन वह नक्शा कहीं नहीं गया . जब लार्ड माउंटबेटन भारत के वायसराय तैनात हुए तो  लार्ड हैस्टिंग्ज  इसमे ने जुगाड़ करके अपने आपको वायसराय  की चीफ आफ स्टाफ नियुक्त करवा लिया . उन्होंने युद्ध काल में चर्चिल के साथ काम किया था  इसलिये लार्ड इसमे बहुत भरोसे के आदमी थे और  चर्चिल ने  अपनी योजना को लागू  करने के लिए इनको सही समझा . प्रधानमंत्री एटली को भरोसे में लेकर  लार्ड हैस्टिंगज लायनेल इसमे , नए वायसराय के साथ ही आ गए . चर्चिल की बंटवारे की योजना के वे ही भारत में सूत्रधार बने . वे युद्ध काल में चर्चिल के चीफ मिलिटरी असिस्टेंट रह चुके थे .बाद में वे ही नैटो के गठन के बाद उसके पहले सेक्रेटरी जनरल भी बने. जब लार्ड माउंटबेटन  मार्च १९४७ में भारत आये तो उनका काम भारत में एक नई सरकार को अंग्रेजों की सत्ता  को सौंप देने का एजेंडा था . उनको क्या पता था कि चर्चिल ने पहले से ही तय कर रखा था कि देश का बंटवारा करना है .इसी विषय पर ब्रितानी फ़िल्मकार गुरिंदर चड्ढा की नई फिल्म आई है .फिल्म मूल रूप से अंग्रेज़ी में बनी है लेकिन हिंदी वालों के लिए डब कर के पेश की गयी है . अंग्रेज़ी फिल्म का नाम‘वायसरायज हाउस’ है जबकि हिंदी में इसका नाम ‘पार्टीशन:१९४७’ दिया गया है . हालांकि माउंटबेटन १९४७ में भारत आए  थे लेकिन उनको क्या करना है यह पहले से ही तय हो चुका था . यह अलग बात है उनको पूरी जानकारी नहीं थी .वे अपने हिसाब से ट्रांसफर आफ पावर के कार्य में  लगे हुए थे . फिल्म में लार्ड माउंटबेटन की शख्सियत को शुरू में इरादे के एक पक्के इंसान  के रूप में पेश किया गया है लेकिन बाद में वे एक निहायत ही लाचार और बेचारे व्यक्ति के रूप में नज़र आते हैं . फिल्म की अंतिम रीलों में उनको पता लगता है कि  उनको चर्चिल ने इस्तेमाल कर लिया है लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी  . गुरिंदर चड्ढा ने भारत के अंतिम वायसराय की  दुविधा को बहुत ही सलीके से फिल्माया है . दावा किया गया है कि यह फिल्म लैरी कालिंस और डामिनिक लैपियर की किताब ‘फ्रीडम ईट मिडनाईट ‘ और  नरेंद्र सिंह सरीला की किताब ‘ शैडो आफ द ग्रेट गेम : द अनटोल्ड स्टोरी आफ इंडियाज़ पार्टीशन ‘ से प्रेरणा ले कर बनाई गयी है .भारत के बंटवारे में अंग्रेजों की साज़िश की जानकारी तो शुरू से थी लेकिन नरेंद्र सिंह सरीला की किताब के हवाले से पता चला है कि उनको ब्रिटिश लायब्रेरी में एक ऐसा दस्तावेज़ मिला है जो यह बताता है कि चर्चिल ने १९४५ में ही पंजाब और बंगाल को बांटकर नक़्शे की शक्ल दे दी थी .  सरीला ने दावा किया है कि जब माउंटबेटन को पता चला कि वे  इस्तेमाल हो गए हैं तो उन्होंने बहुत गुस्सा किया और  अपने चीफ आफ स्टाफ हैस्टिंग्ज इसमे से कहा  कि आप लोगों के हाथ खून से  रंगे हैं तो जवाब मिला कि लेकिन तलवार तो आपके हाथ में थी.  उनको याद  दिलाया  गया कि  भारत के बंटवारे की योजना का नाम ‘ माउंटबेटन प्लान ‘ भी उनके ही नाम पर है . फिल्म में इस दृश्य को  बहुत ही अच्छी तरह से फिल्माया गया   है . एक दृश्य और भी यादगार है . जब पाकिस्तान के उद्घाटन के अवसर पर माउंटबेटन कराची गए तो जिन्नाह ने उनको  धन्यवाद किया . वायसराय ने जवाब दिया कि आप धन्यवाद तो चर्चिल को दीजिये क्योंकि आप के साथ मिलकर उन्होंने ही यह साज़िश रची थी . मैं तो इस्तेमाल हो गया . जिन्नाह ने जवाब दिया कि हम दोनों ही इस्तेमाल हुए हैं, हम दोनों ही  शतरंज की चाल में मोहरे बने हैं . नरेंद्र सिंह सरीला कुछ समय ताज लार्ड माउंटबेटन के ए डी सी रहे थे इसलिए उनकी बात पर विश्वास करने के अवसर उपलब्ध हैं . जानकार बताते हैं कि चर्चिल ने जिन्नाह को ऐसा पाकिस्तान देने का सब्ज़बाग़ दिखाया था  जिसमें बंगाल और पंजाब तो होगा ही , बीच का पूरा इलाका होगा जहां से होकर जी टी रोड गुजरती है ,वहा भी पाकिस्तान में ही रहेगा . शायद इसीलिये जब दो दूर  दराज़ के दो हिस्सों में फैला पाकिस्तान बना तो जिनाह  की पहली प्रतिक्रिया थी कि उनको ‘ माथ ईटेन पाकिस्तान ‘ मिला  है.बंटवारे के विषय पर एक और अच्छी फिल्म आई है और इतिहास के उस दौर में जाने का एक और मौक़ा मिलता है जिसके बारे में जानकारी अभी पता नहीं कब तक ताज़ा होती रहेगी 

मेरी बेटी का जन्मदिन यादों सिलसिला लेकर आता है

Mon, 21/08/2017 - 10:43


.
शेष नारायण सिंह
आज से चालीस साल पहले इक्कीस अगस्त के दिन मेरी गुड्डी पैदा हुयी थी , इमरजेंसी हट चुकी थी, जनता पार्टी  की सरकार बन  चुकी थी. मोरारजी देसाई को प्रधानमंत्री बनाकर यथास्थितिवादियों ने यह सुनिश्चित कर लिया था कि इमरजेंसी  जैसे राजनीतिक काले अध्याय के बाद भी केवल इंदिरा गांधी की सरकार बदले ,बाकी कुछ न बदले . जो लोग इमरजेंसी के खिलाफ हुए जन आन्दोलन को राजनीतिक परिवर्तन की शुरुआत मान रहे थे , उनका मोहभंग हो चुका था . मैं दिल्ली में रहता था. आया तो  रोज़गार की तलाश में था लेकिन इमरजेंसी में कहीं कोई नौकरी नहीं मिल रही थी. मजबूरी में कुछ पढाई लिखाई भी कर रहा था , इसी दौर में कोई मामूली नौकरी मिली थी . जिन दिन नौकरी की खबर  मिली उसी दिन गाँव से कोई आया था ,उसने बताया कि घर पर बेटी का जन्म हुआ है. मैं दो साल से ठोकर खा रहा था , नौकरी की खबर के साथ ही बेटी के जन्म की खबर भी आई तो लगा कि बिटिया भाग्यशाली है, बाप को कहीं पाँव जमाने की जगह लेकर आयी है .  उससे  दो साल बड़ा उनक एक भाई है और उनसे छः साल छोटी एक बहन भी है . गुड्डी मंझली औलाद हैं.इमरजेंसी के दौरान  इंदिरा-संजय की टोली ने देश में तरह तरह के अत्याचार किये थे .इमरजेंसी लगने के पहले मैं अच्छा भला लेक्चरर था, मान्यताप्राप्त ,सहायता प्राप्त डिग्री कालेज का लेकिन अगस्त १९७५ में नौकरी छोड़नी पड़ी थी. उत्तर प्रदेश में कालेजों के प्रबंधन अब तो माफियातंत्र में बदल चुके हैं लेकिन उन  दिनों भी किसी से कम नहीं होते थे . बहरहाल इमरजेंसी लगने के बाद मेरी जो नौकरी छूटी तो उसके हटने के बाद ही लगी.  इमरजेंसी के दौर में मैंने बहुत सी बुरी ख़बरें सुनीं और देखीं लेकिन गुड्डी के जन्म के बाद लगता   था कि शायद चीज़े बदल रही थीं. लेकिन ऐसा नहीं था. मेरे जिले का ग्रामीण समाज अभी पुरानी सोच के दायरे में ही था . दहेज़ अपने विकराल रूप में नज़र आना शुरू हो गया था. हमारे इलाके के बिकुल अनपढ़ या दसवीं फेल लड़कों की शादियाँ ऐसी लड़कियों से हो रही थीं जो बी ए  या एम ए तक पढ़ कर आती थीं . ज़ाहिर है मेरी बेटी के जन्म के बाद भी इसी तरह की सोच  समाज में थी . लेकिन मैंने ठान लिया था कि अपनी बेटी को बदलते समाज के आईने के रूप में ही देखूँगा.  गुड्डी सांवली थी, बेटी थी, और एक गोरे रंग के अपने दो साल बड़े भाई की छोटी बहन थी. मेरे परिवार के शुभचिंतक अक्सर चिंता जताया करते थे . लेकिन गुड्डी की मां और दादी का फैसला था कि बच्ची को दिल्ली में उच्च शिक्षा दी जायेगी और समाज की रूढ़ियों को चुनौती दी जायेगी . गुड्डी दिल्ली आयीं , यहाँ के बहुत अच्छे स्कूल से दसवीं पास किया लेकिन इतने नम्बर नहीं आये कि उस स्कूल में उनको अगली क्लास में साइंस मिल सके .  आर्ट्स मिला और गुड्डी की समझ में आ  गया कि मेहनत से पढ़ाई किए बिना बात बनेगी नहीं.  बस फिर क्या था .गुड्डी ने कठिन परिश्रम किया और  दिल्ली विश्वविद्यालय के बहुत अच्छे कालेज, वेंकटेश्वर कालेज में दाखिला पहली लिस्ट में ही ले लिया .
गुड्डी जो भी तय कर लेती हैं उसको हासिल करती हैं . आज वे चालीस साल की हो गयी हैं , जीवन में अच्छी तरह से व्यवस्थित हैं, खुद भी बहुत अच्छे स्कूल में टीचर हैं और उनका बेटा दिल्ली के सबसे अच्छे स्कूल में छात्र है .अपनी पसंद के लड़के से अन्तर्जातीय शादी की और सामंती शादी ब्याह के बंधन को तोड़कर मुझे गौरवान्वित किया .  दिल्ली के एक पुराने परिवार में ब्याही गयी हैं . परिवार के सबसे आदरणीय व्यक्ति उनके अजिया ससुर समाज और क्षेत्र के बहुत ही मानिंद व्यक्ति हैं , रेलवे से अवकाश प्राप्त अधिकारी हैं , गुड्डी को बहुत स्नेह  करते हैं . नई दिल्ली स्टेशन के पास घर है , व्यापारिक परिवार है.दिल्ली में गुड्डी हमारी गार्जियन भी हैं .अपनी अम्मा की हर ज़रूरत का ख्याल रखती  हैं . थोड़ी जिद्दी हैं. उसी जिद को अन्य माँ बाप अपने बच्चों की दृढ़ निश्चय की प्रवृत्ति बताते हैं .अपनी शर्तों पर ज़िंदगी जीने वाली मेरी बेटी को आज उसका जन्मदिन बहुत बहुत मुबारक होगा , ऐसा मेरा विश्वास है. 

कांग्रेस की बैठक में भारत छोड़ो आन्दोलन का प्रस्ताव नेहरू ने प्रस्तुत किया था

Sat, 12/08/2017 - 18:51


शेष नारायण सिंहमहात्मा गांधी की अगुवाई में देश ने १९४२ में अंग्रेजों भारत छोड़ा का नारा दिया था . उसके पहले क्रिप्प्स मिशन भारत आया था जो भारत को ब्रितानी साम्राज्य के अधीन किसी तरह का डामिनियन स्टेटस देने की पैरवी कर रहा था. देश की अगुवाई की लड़ाई लड़ रही कांग्रेस ने स्टफोर्ड क्रिप्स को साफ़ मना कर दिया था. कांग्रेस ने १९२९ की लाहौर कांग्रेस में ही फैसला कर लिया था कि देश को पूर्ण स्वराज चाहिए . लाहौर में रावी नदी के किनारे हुए कांग्रेस के अधिवेशन में तय किया गया था कि पार्टी का लक्ष्य अब पूर्ण स्वराज हासिल करना है .१९३० से ही देश में २६ जनवरी के दिन स्वराज दिवस का जश्न मनाया जा  रहा  था. इसके पहले कांग्रेस का उद्देश्य होम रूल था लेकिन अब पूर्ण स्वराज चाहिए था . कांग्रेस के इसी अधिवेशन की परिणति थी की देश में १९३० का महान आन्दोलन , सविनय अवज्ञा आन्दोलन शुरू हुआ. नमक सत्याग्रह या गांधी जी का दांडी मार्च इसी कांग्रेस के इसी फैसले को लागू करने के लिए किए  गए थे .वास्तव में १९४२ का भारत छोड़ो आन्दोलन एक सतत प्रक्रिया थी क्योंकि जब १९३० के आन्दोलन के बाद अँगरेज़ सरकार ने भारतीयों को ज्यादा गंभीरता से लेना शुरू किया लेकिन वादा खिलाफी से बाज़ नहीं आये तो आन्दोलन लगातार चलता रहा . इतिहास के विद्यार्थी के लिए यह जानना ज़रूरी है कि जिस कांग्रेस अध्यक्ष जवाहरलाल नेहरू थे उसी अधिवेशन में देश ने पूर्ण स्वराज की तरफ पहला क़दम उठाया था .
नौ अगस्त को भारत छोड़ा आन्दोलन  की शुरुआत के ७५ साल पूरे हुए . इस अवसर पर लोकसभा में ‘भारत छोडो ‘ आन्दोलन को याद किया गया .लेकिन एक अजीब बात देखने को मिली कि लोकसभा में अपने भाषणों में न तो प्रधानमंत्री और न ही लोकसभा की स्पीकर ने जवाहरल लाल नेहरू का नाम लिया . प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने सन बयालीस के महात्मा गांधी के  नारे  ‘करेंगें या मरेंगें ‘ के नारे की तर्ज़ पर ‘ करेंगें और करके रहेंगें’  का नया नारा दिया . उन्होंने गरीबी, कुपोषण और निरक्षरता को देश के सामने मौजूद चुनौती बताया और सभी राजनीतिक दलों से अपील किया कि इस  चुनौती से मुकाबला करने के लिए सब को एकजुट होना पडेगा. उन्होंने इस बात पर दुःख जताया कि महात्मा गांधी का ग्राम स्वराज्य का सपना भी अधूरा है .प्रधानमंत्री ने  सभी बहादुर नेताओं के बलिदान को याद किया. उन्होंने आज़ादी की लड़ाई में महात्मा गांधी के नेतृत्व में देश के सभी लोगों के एकजुट होने की बात की और कहा कि जब आज़ादी के नेता जेल चले गए थे तो कुछ नौजवान नेताओं ने आन्दोलन का काम संभाल लिया . इस सन्दर्भ में प्रधानमंत्री मोदी ने लाल बहादुर शास्त्री, राम मनोहर लोहिया और जयप्रकाश नारायण का नाम लिया . यह तीनों नेता सन बयालीस में नौजवान थे और सक्रिय थे . उन्होंने  लोकमान्य तिलक, नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ,भगत सिंह , सुखदेव, चंद्रशेखर आज़ाद को भी याद किया जब कि इनमें  से कोई भी भारत छोडो आन्दोलन में शामिल  नहीं हुआ था का .उन्होंने यह ज़िक्र नहीं किया कि नौ अगस्त के दिन पूरी की पूरी कांग्रेस वर्किंग कमेटी के सदस्यों को गिरफ्तार  कर लिया गया था . महात्मा गांधी और महादेव  देसाई को पुणे के आगा खान पैलेस में गिरफ्तार करके रखा गया था जबकि कांग्रेस वर्किंग कमेटी के बाकी सदस्यों को अहमदनगर जेल भेज दिया गया था . प्रधानमंत्री ने इन नेताओं में से किसी का नाम नहीं लिया .अहमदनगर किले की जेल  में जो नेता बंद थे उनमें जवाहरलाल नेहरू , सरदार पटेल, मौलाना अबुल कलाम आज़ाद ,आचार्य कृपलानी ,नरेंद्र देव, आसिफ अली, गोविन्द वल्लभ पन्त आदि थे. प्रधानमंत्री ने इनमें से किसी का नाम नहीं लिया .इस आन्दोलन को प्रधानमंत्री ने  आज़ादी के आन्दोलन में अंतिम जनसंघर्ष बताया और कहा कि उसके पांच साल बाद ही अँगरेज़ भारत छोड़ कर चले गए.
लोकसभा में आयोजित  कार्यक्रम की शुरुआत करते हुए स्पीकर सुमित्रा महाजन ने महात्मा गांधी की अगुवाई में शुरू हुए भारत छोडो आन्दोलन पर अपना वक्तव्य दिया . उन्होंने लोकमान्य तिलक ,वी डी सावरकर और दीन दयाल उपाध्याय का नाम लिया . हालांकि लोकमान्य तिलक की तब तक मृत्यु हो चुकी थी और दीन दयाल उपाध्याय सन ४२ के भारत छोड़ो आन्दोलन में शामिल नहीं हुए थे .
देखने में आया है कि जब से केंद्र में नरेंद्र मोदी की सरकार बनी है तब से देश के निर्माण और आज़ादी की लड़ाई में जवाहरलाल नेहरू के योगदान को नज़रंदाज़ करने का फैशन हो गया है . इसके पहले विदेशमंत्री सुषमा स्वराज बांडुंग कान्फरेंस की याद में एक सम्मलेन में गयी थीं , वहां भी उन्होंने नेहरू  का नाम नहीं लिया जबकि चेकोस्लोवाकिया के टीटो और मिस्र के नासिर ने जवाहरलाल नेहरू के साथ मिलकर  बांडुंग सम्मेलन के बाद निर्गुट सम्मलेन को ताक़त दिया था . बाद में तो अमरीका और रूस के  सहयोगी देशों के अलावा लगभग पूरी  दुनिया ही उसमें शामिल हो गयी थी.
सवाल यह उठता है कि जवाहरलाल नेहरू के योगदान का उल्लेख किये बिना भारत के १९३० से १९६४ तक के इतिहास की बात कैसे की जा सकती है. जिस व्यक्ति को महात्मा गांधी ने अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया था , जिस व्यक्ति की अगुवाई में देश की पहली सरकार बनी थी, जिस व्यक्ति ने मौजूदा संसदीय लोकतंत्र  की बुनियाद रखी, जिस व्यक्ति ने देश को संसाधनों के अभाव में भी अर्थव्यवस्था को आत्मनिर्भरता की डगर पर डाल कर दुनिया में गौरव का मुकाम हासिल किया उसको अगर आज़ाद  भारत के राजनेता भुलाने का अभियान चलाते हैं तो यह उनके ही व्यक्तित्व पर  प्रकाश डालता है . आजकल कुछ  तथाकथित इतिहासकारों के सहारे  भारत के इतिहास के पुनर्लेखन का कार्य चल रहा है जिसमें बच्चों के दिमाग से नेहरू सहित बहुत सारे लोगों के नाम गायब कर दिए जायेंगें जो बड़े होकर नेहरू के बारे में कुछ जानेंगें ही नहीं . लेकिन ऐसा संभव नहीं है क्योंकि गांधी और नेहरू विश्व इतिहास के विषय हैं और अगर हमें अपनी आने वाले पीढ़ियों को नेहरू के बारे में अज्ञानी रखा तो हमारा भी हाल उतर कोरिया जैसा होगा जहां के स्कूलों में मौजूदा  शासक के दादा किम इल सुंग को आदि पुरुष बताया जाता है . अब कोई उनसे पूछे कि क्या किम इल सुंग के पहले उत्तरी कोरिया में शून्य था .महात्मा गांधी की अगुवाई में आज़ादी की  जो लड़ाई लड़ी गयी उसमें नेहरू रिपार्ट का अतुल्य योगदान है . यह रिपोर्ट २८-३० अगस्त  १९२८ के दिन हुयी आल पार्टी कान्फरेंस में तैयार की गयी थी . यही रिपोर्ट महात्मा गांधी की होम रुल की मांग को ताक़त देती थी. इसी के आधार पर डामिनियन स्टेटस की मांग की जानी थी  इस रिपोर्ट को एक कमेटी ने बनाया था जिसके अध्यक्ष मोतीलाल नेहरू थे . इस कमेटी के सेक्रेटरी जवाहरलाल नेहरू थे .अन्य सदस्यों में अली इमाम , तेज बहादुर सप्रू, माधव श्रीहरि अणे ,मंगल सिंह ,सुहैब कुरेशी सुभाष चन्द्र बोस और जी आर प्रधान थे .सुहैब कुरेशी ने रिपोर्ट की सिफारिशों से असहमति जताई थी . इसके बारे में लिखने का मतलब केवल इतना है कि राहुल गांधी, राजीव गांधी और  संजय गांधी जैसे नाकाबिल लोगों को देश की राजनीति पर थोपने का अपराध तो जवाहरलाल की बेटी इंदिरा गांधी ने ज़रूर किया है  लेकिन इंदिरा गांधी की गलतियों के लिए क्या हम अपनी आज़ादी के लड़ाई के शिल्पी महात्मा गांधी और  उनके सबसे भरोसे के  साथी जवाहरलाल नेहरू को नज़रंदाज़ करने की गलती कर सकते हैं .एक बात और हमेशा ध्यान रखना होगा कि महात्मा गांधी के सन बयालीस के आन्दोलन के लिए  बम्बई में कांग्रेस कमेटी ने जो प्रस्ताव पास किया था अ, उसका डाफ्ट भी जवाहलाल नेहरू ने बनाया था और उसको विचार के लिए प्रस्तुत भी नेहरू ने ही किया था .
जवाहरलाल नेहरू को नकारने की कोशिश करने वालों को यह भी जान लेना चाहिए कि उनकी पार्टी के पूर्वजों ने जिन जेलों में जाने के डर से जंगे-आज़ादी में हिस्सा नहीं लिया था ,  उन्हीं जेलों में जवाहरलाल नेहरू अक्सर जाते रहते थे . जिस  भारत छोडो आन्दोलन के ७५ साल पूरे होने के बाद लोकसभा में विशेष कार्यक्रम किया गया उसी के दौरान जवाहरलाल १०४० दिन रहे जेलों में रहे थे .भारत छोडो आन्दोलन के दिन ९ अगस्त १९४२ को उनको मुंबई  से गिरफ्तार किया गया था और १५ जून १८४५ को रिहा किया गया था . यानी इस बार ३४ महीने से ज्यादा वे जेल में रहे थे. इसके पहले भी कभार जाते रहते थे .जो लोग उनको खलनायक बनाने की कोशिश कर रहे हैं ,ज़रा कोई उनसे पूछे कि उनके राजनीतिक पूर्वज  सावरकर , जिन्नाह आदि उन दिनों ब्रिटिश हुकूमत की वफादारी के इनाम के रूप में वे कितने अच्छे दिन बिता रहे थे . सावरकर तो माफी मांग कर जेल से रिहा  हुए थे .अंडमान की जेल में वी. डी .सावरकर सजायाफ्ता कैदी नम्बर ३२७७८ के रूप में जाने जाते थे . उन्होंने अपने माफीनामे में साफ़ लिखा था कि अगर उन्हें रिहा कर दिया गया तो वे आगे से अंग्रेजों के हुक्म को मानकर ही काम करेंगें .और इम्पायर के हित में ही काम करेंगे. इतिहास का कोई भी विद्यार्थी बता देगा कि वी डी सावरकर ने जेल से छूटने के बाद ऐसा कोई काम नहीं किया जिससे  महात्मा गांधी के आन्दोलन को ताक़त मिलती हो .भारत छोड़ो आन्दोलन की एक और  उपलब्धि है . अहमदनगर फोर्ट जेल में जब जवाहरलाल  बंद थे उसी दौर में उनकी किताब डिस्कवरी आफ इण्डिया लिखी गयी थी .जब अंगेजों को पता लगा कि कांग्रेस वर्किंग कमेटी के बारह सदस्य एक ही जगह रहते हैं और वहां राजनीतिक मीटिंग करते हैं तो सभी नेताओं को अपने राज्यों की जेलों में भेजा जाने लगा. मार्च १९४५ में गोविंद वल्लभ पन्त, आचार्य नरेंद्र देव और जवाहरलाल नेहरू को अहमदनगर से हटा दिया गया .बाकी  गिरफ्तारी का समय इन लोगों ने यू पी की जेलों ,बरेली , नैनी  अल्मोड़ा में काटीं . जब इन लोगों को गिरफ्तार किया गया  था तो किसी तरह की चिट्ठी  पत्री लिखने की अनुमति नहीं थी और न ही कोई चिट्ठी आ सकती थी .बाद में नियम थोडा बदला . हर  हफ्ते  इन कैदियों को अपने परिवार के लोगों के लिए दो पत्र लिखने की अनुमति मिल गयी . परिवार के सदस्यों के चार पत्र अका सकते थे . लेकिन जवाहर लाल नेहरू को यह सुविधा नहीं मिल सकी क्योंकि उनके परिवार में उनकी बहन विजयलक्ष्मी पंडित और बेटी इंदिरा गांधी ही थे . वे लोग भी  यू पी की जेलों में बंद थे और वहां की जेलों में बंदियों को कोई भी चिट्ठी न मिल सकती थी और न ही वे लिख सकते थे.इसलिए भारत  छोडो आन्दोलन का ज़िक्र होगा तो महात्मा  गांधी के साथ इन बारह कांग्रेसियों का ज़िक्र ज़रूर होगा . हां यह अलग बात  है कि जब भारत में इतिहास को पूरी तरह से दफना दिया जाएगा और शुर्तुर्मुगी सोच हावी हो जायेगी तो जवाहरलाल नेहरू को भुला देना संभव होगा और अहमदनगर के बाकी कैदियों को भी भुलाया जा सकेगा .लेकिन अभी तो यह संभव नहीं नज़र आता

धर्मनिरपेक्षता की राजनीति किसी पर एहसान नहीं है

Sat, 12/08/2017 - 18:48
  

शेष नारायण सिंह
आजकल देश के कुछ हिस्सों में गाय की रक्षा की राजनीति चल रही है. गौरक्षक सक्रिय हैं और गायों का आना जाना मुश्किल है . अगर को भी आदमी गाय को एक जगह से दूसरी जगह ले जा रहा है तो वह जान जोखिम में डाल रहा होता है . ऐसी  कई घटनाएं हुयी हैं जिसमें गाय की रक्षा के हवाले से  एक ख़ास  तरह के लोगों ने आम आदमियों  का कत्ल किया है . कभी किसी के घर में गाय का  गोश्त होने के शक  में तो  कभी किसी को गाय को मार डालने के शक में मार डाला गया है . इस मसले पर संसद में  भी  बहस हुयी है लेकिन उस बहस के बाद धर्म निरपेक्षता के खिलाफ  हुंकार भर रही जमातों  को देखकर  डर लगने लगता है कि एक मुल्क के रूप में  हम जा  कहाँ रहे हैं . हमारी आज़ादी की  लड़ाई की बुनियादी  मान्यता सभी धर्मों के  लोगों के शांतिपूर्ण सह अस्तित्व की रही है . जब बंटवारे  के बाद हमारे बुजुर्गों  ने  संविधान की रचना की तो उसमें भी राष्ट्र की   एकता की सबसे बड़ी  ज़रुरत  धर्म निरपेक्षता को बताया . लेकिन आजकल इसी धर्म निरपेक्षता के खिलाफ शक्ति संपन्न वर्गों  की  तरफ से बयान  आ रहे हैं  जो चिंता का विषय हैं .
धर्मनिरपेक्षता की राजनीति किसी भी समुदाय पर एहसान नहीं होता।  किसी भी देश के नेता जब राजनीतिक आचरण में धर्मनिरपेक्षता को महत्वपूर्ण मुक़ाम देते हैं तो वे अपने राष्ट्र और समाज की भलाई के लिए काम कर रहे होते हैं।  धर्मनिरपेक्षता का साधारण अर्थ यह  है कि  धर्म के आधार पर किसी को लाभ या हानि न पंहुचाया जाए।  जब भी धर्म के आधार पर हानि या लाभ पंहुचाने की कोशिश शासक वर्ग करता है तो समाज को और राष्ट्र को भारी नुकसान  होता है।  भारत और पाकिस्तान को अंग्रेजों से आज़ादी एक ही साथ मिली थी  . लेकिन भारत दुनिया में आज एक बड़ी ताक़त के रूप में उभर चुका है और अमरीका समेत सभी देश भारत को सम्मान की नज़र से देखते हैं लेकिन पाकिस्तान की हालत बिलकुल अलग है . वहाँ अगर चीन ,अमरीका और पश्चिम एशिया के देशों से आर्थिक मदद न मिले तो  बुनियादी ज़रूरतों के लिए भी परेशानी पड़ सकती है.  ऐसा इसलिए है कि  आज़ादी के बाद भारत ने धर्मनिरपेक्षता का रास्ता अपनाया और पाकिस्तान में मुहम्मद अली जिनाह की एक न  चली और पाकिस्तान धर्म पर आधारित राज्य बन  गया।  पाकिस्तान दुनिया के बाक़ी संपन्न देशों पर निर्भर हो गया।  अमरीकी और चीनी मदद का नतीजा यह हुआ है कि पाकिस्तान की निर्भरता इन दोनों देशों पर बढ़ गयी है . पूरे पाकिस्तान में चीन ने सडकों , बंदरगाहों और बिजली के उत्पादन केन्द्रों का ऐसा जाल बिछा दिया है कि पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था में बुनियादी ढांचों का क्षेत्र लगभग पूरी तरह से चीन की कृपा का मोहताज है . अब तो पूरी दुनिया में यह कहा जाता है कि पाकिस्तान वास्तव में आतंकवाद की नर्सरी है . जब अमरीका के शासकों को पाकिस्तानी आतंकवाद का इस्तेमाल पुराने सोवियत संघ और मौजूदा रूस के खिलाफ करना होता था तो वह आतंकवादियों को हर तरह की सहायता देता था . अमरीका को मुगालता था कि पाकिस्तान में वह जिस आतंकवाद को  बढ़ावा दे रहा था वह केवल एशिया में ही अमरीकी लाभ के लिए इस्तेमाल होगा लेकिन जब अमरीकी ज़मीन पर अल कायदा ने आतंकी हमला कर दिया तब अमरीका की समझ में आया कि आतंकवाद का कोई क्षेत्र नहीं होता और आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता .. आज पाकिस्तान धार्मिक आधार पर आतंकवाद के मोबिलाइजेशन का सबसे बड़ा केन्द्र है . इसका कारण यह है कि  पाकिस्तान ने एक राष्ट्र के रूप में शुरुआत तो सेकुलर तरीके से की थी लेकिन उसके संस्थापक मुहम्मद अली जिन्नाह की राजनीति को बाद के शासकों ने पूरी तरह से तबाह कर दिया और इस्लाम पर आधारित राजनीति की शुरुआत कर दी .धर्मनिरपेक्षता को भुला कर इस्लामिक राज्य की स्थापना करने के बाद पाकिस्तान को किन किन मुसीबतों का सामना करना पड़ा है उसको जानने के लिए पाकिस्तान के पिछले पैंतीस वर्षों के इतिहास पर नज़र डालना ही काफी है . हमारे अपने देश में सेकुलर राजनीति का विरोध करने वाले और हिन्दुराष्ट्र की स्थापना का सपना देखें वालों को पाकिस्तान की धार्मिक राजनीति से हुई तबाही पर भी नज़र डाल लेनी चाहिए .पकिस्तान की आज़ादी के वक़्त उसके संस्थापक मुहम्मद अली जिन्नाह ने  साफ़ ऐलान कर दिया था कि पाकिस्तान एक सेकुलर देश होगा .ऐसा शायद इसलिए था कि १९२० तक जिन्नाह मूल रूप से एक सेकुलर राजनीति के पैरोकार थे . उन्होंने १९२० के आंदोलन में खिलाफत के धार्मिक नारे के आधार पर मुसलमानों को साथ लेने का विरोध भी किया था लेकिन बाद में अंग्रेजों  की चाल में फंस गए और लियाकत अली ने उनको मुसलमानों का नेता बना दिया .नतीजा यह हुआ कि १९३६ से १९४७ तक हम मुहम्मद अली जिन्नाह को मुस्लिम लीग के नेता के रूप में देखते हैं जो कांग्रेस को हिंदुओं की पार्टी साबित करने के चक्कर में रहते थे . लेकिन  कांग्रेस का नेतृत्व महात्मा गांधी और जवाहरलाल नेहरू के पास था और उन्होंने कांग्रेस को किसी एक धर्म की पार्टी नहीं बनने दिया . लेकिन जब पाकिस्तान की स्थापना हो गयी तब जिन्नाह ने ऐलान किया कि हालांकि पाकिस्तान की स्थापना इस्लाम के अनुयायियों के नाम पर हुई है लेकिन वह एक सेकुलर देश बनेगा .अपने बहुचर्चित ११ अगस्त १९४७ के भाषण में पाकिस्तानी संविधान सभा के अध्यक्षता करते हुए जिन्नाह ने सभी पाकिस्तानियों से कहा कि ,” आप अब आज़ाद हैं . आप अपने मंदिरों में जाइए या अपनी मस्जिदों में जाइए . आप का धर्म या जाति कुछ भी हो उसका  पाकिस्तान के  राष्ट्र से कोई लेना देना नहीं है .अब हम सभी एक ही देश के स्वतन्त्र नागरिक हैं . ऐसे नागरिक , जो सभी एक दूसरे के बराबर हैं . इसी बात को उन्होंने फरवरी १९४८ में भी जोर देकर दोहराया . उन्होंने कहा कि कि, “ किसी भी हालत में पाकिस्तान  धार्मिक राज्य नहीं बनेगा . हमारे यहाँ बहुत सारे गैर मुस्लिम हैं –हिंदू, ईसाई और पारसी हैं लेकिन वे सभी पाकिस्तानी हैं . उनको भी वही अधिकार मिलेगें जो अन्य पाकिस्तानियों को और वे सब पाकिस्तान में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभायेगें .” लेकिन पाकिस्तान के संस्थापक का यह सपना धरा का धरा रह गया और पाकिस्तान का पूरी तरह से इस्लामीकरण हो गया . पहले चुनाव के बाद ही  वहाँ बहुमतवादी राजनीति कायम हो चुकी थी और उसी में एक असफल राज्य के रूप में पाकिस्तान की बुनियाद पड़ चुकी थी. १९७१ आते आते तो नमूने के लिए पाकिस्तानी संसद में एकाध हिंदू मिल जाता था  वर्ना पाकिस्तान पूरी तरह से इस्लामी राज्य बन चुका था. अलोकतांत्रिक  धार्मिक नेता राजकाज के हर क्षेत्र में हावी हो चुके थे.
लेकिन असली धार्मिक कट्टरवाद की बुनियाद जनरल जियाउल हक़ ने डाली . उनको अपने पूर्ववर्ती शासक जुल्फिकार अली भुट्टो की हर बात को गलत साबित करना था लिहाजा उन्होंने पाकिस्तान की सभी संस्थाओं का इस्लामीकरण कर दिया . उन्होंने जुल्फिकार अली भुट्टो की रोटी ,कपड़ा और मकान की राजनीति को साफ़ नकार दिया . उन्होंने कहा कि पाकिस्तान की स्थापना ही इस्लाम के कारण हुई थी ,यह मुसलमानों के लिए बनाया गया था . जनरल जिया ने २ दिसंबर १९७८ को इस्लामी नववर्ष के मौके पर पाकिस्तान में इस्लामी सिस्टम को लागू कर दिया. उन्होंने तब तक के सभी पाकिस्तानी सेकुलर कानूनों को खत्म कर दिया और ऐलान किया कि वे निजामे-मुस्तफा लागू कर रहे थे . उन्होंने शरिया अदालतें स्थापित करने का ऐलान कर दिया . लेकिन सभी कानून तो फ़ौरन बदले नहीं जा सकते थे लिहाजा जनरल जिया ने आर्डिनेंस लागू करके अपनी गद्दी की सुरक्षा का बंदोबस्त कर लिया. इस दिशा में पहला कानून था हुदूद आर्डिनेंस . इसके ज़रिये ताजिराते पाकिस्तान में बताए गए  संपत्ति कानूनों को बदलने की कोशिश की गयी . पूरी तरह बदल तो नहीं सके क्योंकि इस्लामी सबूत के नियमों  के आधार पर सज़ा दे पाना  असंभव था  . दूसरा बदलाव बलात्कार और व्यभिचार के कानून में किया गया इसके ज़रिए तो पूरे पाकिस्तान में औरतों को गुलाम से भी बदतर बना दिया गया .अपनी इसी इस्लामीकरण की योजना के तहत ही धार्मिक शिक्षण के केन्द्रों का बड़े पैमाने पर विकास किया गया. पाकिस्तानी समाज में  मदरसों के मालिकों का अधिकार और प्रभाव बहुत बढ़ गया . संगीत में भी  भारी बदलाव किया गया . पाकिस्तानी रेडियो और टेलीविज़न पर केवल देशभक्ति के गाने ही बजाये जाते थे.कुल मिलकर ऐसा पाकिस्तान बना दिया गया जिसमें धार्मिक कट्टरता और बहुमतवाद  का ही राज था . आज पाकिस्तान की जो दुर्दशा है उसमें जनरल जिया के उसी धर्मिक राज कायम करने के उत्साह को ज़िम्मेदार माना जा सकता है.
आजकल भारत में भी धार्मिक बहुमत वाद की राजनीति को स्थापित करने की कोशिश की जा रही है . भारत की सत्ताधारी पार्टी के बड़े नेता भारत को हिंदू राष्ट्र बनाने की बात करते पाए जा रहे हैं . उनको भी ध्यान रखना पडेगा कि धार्मिक कट्टरता किसी भी राष्ट्र का धर्म नहीं बन सकती . अपने पड़ोसी के उदाहरण से अगर सीखा न गया तो किसी को भी अंदाज़ नहीं है कि हम अपनी आने वाली पीढ़ियों को किस तरह का भारत देने जा रहे हैं .  लेकिन साथ ही यह भी ध्यान रखना पडेगा कि  धार्मिक समूहों को वोट की लालच में आगे भी न बढ़ाया जाये. जवाहरलाल नेहरू के युग तक तो किसी की हिम्मत नहीं पडी कि  धार्मिक समूहों का विरोध करे या पक्षपात करे लेकिन उनके जाने के बाद धार्मिक पहचान की राजनीति ने अपने देश में तेज़ी से रफ़्तार पकड़ी और आज राजनीतिक प्रचार में वोट हासिल करने के लिए धार्मिक पक्षधरता की बात करना राजनीति की प्रमुख धारा बन चुकी है।  कहीं मुसलमानों को  अपनी तरफ मिलाने की कोशिश की जाती है तो दूसरी तरफ हिन्दुओं का नेता बनने की होड़ लगी हुयी है।  इससे बचना पडेगा।  अगर न बच सके तो राष्ट्र और देश के सामने मुश्किल पेश आ सकती है।पाकिस्तान में जिस तरह से धर्म को  आधार बनाकर जनरल  जिया ने कट्टरता फैलाई उसी का नतीजा आज पकिस्तान भोग रहा है . अगर हम भी धार्मिक गोलबंदी के शिकार हुए तो  हमारे सामने भी  खतरा वही है . शासक वर्गों को अपनी ज़िम्मेदारी समझनी चाहिएय और देश की एकता को सुरक्षित रखना चाहिए . 

हेपेटाइटिस एक जानलेवा बीमारी है लेकिन बचाव संभव है

Sat, 29/07/2017 - 22:44


शेष नारायण सिंह 
28 जुलाई विश्व हेपेटाइटिस दिवस है . लीवर की यह बीमारी पूरी दुनिया में बहुत ही खतरनाक रूप ले चुकी है . दुनिया में ऐसे ११ देश हैं जहां हेपेटाइटिस के मरीज़ सबसे ज़्यादा हैं . हेपेटाइटिस के मरीजों का ५० प्रतिशत ब्राजील,चीन, मिस्र, भारत , इंडोनेशिया , मंगोलिया,म्यांमार, नाइजीरिया, पाकिस्तान, उगांडा और वियतनाम में रहते हैं . ज़ाहिर है इन मुल्कों पर इस बीमारी से दुनिया  को मुक्त करने की बड़ी जिम्मेवारी है. २०१५ के आंकडे मौजूद हैं. करीब ३३ करोड़ लोग हेपेटाइटिस की बीमारी से पीड़ित थे. हेपेटाइटिस बी सबसे ज़्यादा खतरनाक है और इससे पीड़ित लोगों की संख्या भी २५ करोड़ के पार थी. ज़ाहिर है अब यह संख्या  और अधिक हो गयी होगी. २०१५ में हेपेटाइटिस से मरने वालों की संख्या १४ लाख  से  अधिक थी .चुपचाप आने वाली यह बीमारी टी बी और एड्स से ज्यादा लोगों की जान ले रही है . ज़ाहिर है कि इस बीमारी से युद्ध स्तर पर मुकाबला  करने की ज़रूरत  है और इस अभियान में जानकारी ही  सबसे बड़ा हथियार है . विज्ञान  को अभी तक पांच तरह के पीलिया हेपेटाइटिस के बारे में जानकारी है .  अभी  के बारे जानकारी हेपेटाइटिस ए, बी ,सी ,डी और ई . सभी खतरनाक हैं लेकिन बी से  खतरा बहुत ही ज्यादा   बताया जाता है .  विश्व स्वास्थ्य संगठन , हेपेटाइटिस को २०३० तक ख़त्म करने की योजना पर  काम भी कर रहा  है . भारत भी उन देशों में शुमार है जो इस  भयानक बीमारी के अधिक मरीजों वाली लिस्ट में  हैं इसलिए भारत की स्वास्थय प्रबंध व्यवस्था की ज़िम्मेदारी बहुत बढ़ जाती है .
इस वर्ग की बीमारियों में हेपेटाइटिस  बी का प्रकोप सबसे ज्यादा है और इसको ख़त्म करना सबसे अहम चुनौती है .इस बारे में जो सबसे अधिक चिंता की बात है वह यह है एक्यूट हेपेटाइटिस बी का कोई इलाज़ नहीं है .सावधानी ही सबसे बड़ा इलाज़ है .  विश्व बैंक का सुझाव है कि संक्रमण हो जाने के बाद आराम, खाने की ठीक व्यवस्था और  शरीर में ज़रूरी तरल पदार्थों का स्तर बनाये रखना ही बीमारी से बचने  का सही तरीका है .क्रानिक हेपेटाइटिस बी   का इलाज़ दवाइयों से संभव  है . ध्यान देने की बात यह है कि हेपेटाइटिस बी की बीमारी पूरी तरह से ख़त्म नहीं की जा सकती इसे केवल   दबाया जा सकता है .इसलिए जिसको एक बार संक्रामण हो गया उसको जीवन भर दवा लेनी चहिये . हेपेटाइटिस बी  से बचने का सबसे  सही तरीका टीकाकरण है .  विश्व स्वास्थ्य  संगठन का सुझाव है कि सभी बच्चों को जन्म के साथ ही हेपेटाइटिस बी का टीका दे दिया जाना  चाहिए .अगर सही तरीके से टीकाकरण  कर दिया जाय तो बच्चों में  ९५ प्रतिशत बीमारी की   संभावना ख़त्म हो जाती है  . बड़ों को भी  टीकाकरण से फायदा होता है .पूरी दुनिया में हेपेटाइटिस को खत्म करने का अभियान चल रहा है .मई २०१६ में वर्ल्ड हेल्थ असेम्बली ने ग्लोबल हेल्थ सेक्टर स्ट्रेटेजी आन वाइरल हेपेटाइटिस २०१६-२०२०  का प्रस्ताव  पास किया  था. संयुक्त  राष्ट्र ने २५ सितम्बर को अपने प्रस्ताव संख्या  A/RES/70/1  में  इस प्रस्ताव को सस्टेनेबल डेवलपमेंट गोल्स को शामिल किया था . वर्ल्ड हेल्थ असेम्बली का यह प्रस्ताव उन उद्देश्यों को शामिल करता है .इस प्रस्ताव का संकल्प यह  है कि हेपेटाइटिस को ख़त्म करना है . अब चूंकि भारत इन ग्यारह देशो में हैं जहां हेपेटाइटिस के आधे मरीज़ रहते हैं इसलिए भारत की ज़िम्मेदारी सबसे  ज़्यादा  है . जिन देशों का नाम है उनमें भारत और चीन अपेक्षाकृत संपन्न  देश माने जाते हैं इसलिए यह ज़िम्मेदारी और बढ़ जाती   है . सरकार को चाहिए कि जो भी संसाधन उपलब्ध हैं उनका सही तरीके से इस्तेमाल करने की संस्कृति विकसित करें. बीमारी को बढ़ने से रोकें.रोक के बारे में इतनी  जानकारी फैलाएं कि लोग खुद ही  जांच आदि  के कार्य को प्राथमिकता दें और हेपेटाइटिस  को समाप्त करने को एक मिशन के रूप में अपनाएँ .अपने देश में इस दिशा में  अहम कार्य हो रहा है . देश के लगभग सभी बड़े  मेडिकल शिक्षा  के संस्थानों, मेडिकल  कालेजों और बड़े अस्पतालों में लीवर की बीमारियों के इलाज और नियंत्रण के साथ साथ रिसर्च  का काम भी हो रहा   है . सरकार का रुख  इस सम्बन्ध में बहुत ही प्रो एक्टिव है . नई दिल्ली में लीवर और पित्त रोग के  बारे में रिसर्च के लिए एक संस्था की स्थापना ही कर दी गयी है. २००३ में शुरू हुयी इंस्टीटयूट आफ लीवर एंड  बिलियरी साइंसेस नाम की यह संस्था विश्व स्तर की है.  जब संस्था शुरू की गयी तो इसका मिशन लीवर की एक विश्व संस्था बनाना था  और वह लगभग पूरा कर लिया गया है .
इस संस्थान की प्रगती के पीछे इसके संस्थापक निदेशक डॉ शिव कुमार सरीन की शख्सियत को माना जाता  है . शान्ति स्वरुप भटनागर और पद्मम भूषण से   सम्मानित डॉ सरीन को विश्व में लीवर की बीमारियों के इलाज़ का सरताज माना जाता है . बताते हैं कि दिल्ली के जी बी पन्त अस्पताल में कार्यरत डॉ शिव  कुमार सरीन ने  जब उच्च शोध के लिए विदेश जाने का मन बनाया  तो तत्कालीन मुख्यमंत्री ने उनसे पूछा  कि क्यों  विदेश जाना चाहते हैं , उनका जवाब था कि  लीवर से   सम्बंधित बीमारियाँ देश में बहुत बढ़ रही हैं  और उनको कंट्रोल करने के लिए बहुत ज़रूरी है कि आधुनिक संस्थान में  रिसर्च किया जाए. तत्कालीन मुख्यमंत्री ने प्रस्ताव दिया  कि विश्वस्तर का शोध संस्थान  दिल्ली में ही स्थापित कर लिया जाए. वे तुरंत तैयार हो गए और आज उसी   फैसले के कारण  दिल्ली में लीवर की बीमारियों के लिए  दुनिया भर में  सम्मानित एक संस्थान मौजूद है  . इस संस्थान को  विश्वस्तर का बनाने में इसके संस्थापक  डॉ एस के सरीन का बहुत योगदान है . वे स्वयं भी बहुत ही उच्चकोटि के वैज्ञानिक हैं .  लीवर से सम्बंधित बीमारियों के इलाज के लिए १७ ऐसे प्रोटोकल  हैं जो दुनिया भर में उनके नाम से जाने जाते हैं . सरीन्स क्लासिफिकेशन आफ गैस्ट्रिक वैराइसेस को सारे विश्व के मेडिकल कालेजों और अस्पतालों में इस्तेमाल किया जाता  है . उनके प्रयास से ही सरकारी स्तर पर दिल्ली में जो इलाज उपलब्ध है वह निजी क्षेत्र के  बड़े  से बड़े अस्पतालों में नहीं है . अच्छी बात यह है कि सरकारी संस्था होने के कारण  आई एल बी एस अस्पताल में गैर ज़रूरी खर्च बिलकुल नहीं होता .
इस साल भी   वर्ल्ड हेपेटाइटिस दिवस  के लिए पूरी  दुनिया के साथ साथ भारत में भी  पूरी तैयारी  है . खबर आई है कि पटना समेत देश के  सभी बड़े शहरों में सम्मलेन आदि आयोजित करके जानकारी बढ़ाई जा रही  है
विश्व स्वास्थ्य  संगठन की तरफ से हर साल २८ जुलाई को वर्ल्ड हेपेटाइटिस दिवस  मनाये जाने का एक मकसद है . इस जानलेवा बीमारी के बारे में पूरी दुनिया में जानकारी बढाने और उन सभी लोगों को एक मंच देने के उद्देश्य से यह आयोजनं  किया जाता है जो किसी न किसी तरह से इससे प्रभावित होते हैं . हर साल करेब १३ लाख लोग इस बीमारी से मरते हैं . इस लिहास से यह टीबी ,मलेरिया और एड्स से कम खतरनाक नहीं  है. हेपेटाइटिस के ९० प्रतिशत लोगों को पता भी नहीं होता कि उनके शरीर में यह जानलेवा विषाणु पल रहा  है . नतीजा  यह होता है कि वे किसी को बीमारी दे सकते हैं या लीवर की भयानक बीमारियों से खुद ही ग्रस्त हो सकते हैं , अगर लोगों को जानकारी हो तो इन बीमारियों से समय रहते मुक्ति पाई जा सकती है .

भ्रष्टाचार किसी भी नेता का अधिकार नहीं है

Sat, 29/07/2017 - 22:41

शेष नारायण सिंह
बंगलूरू की एक जेल में भ्रष्टाचार के आरोप  में सज़ा काट रही अन्नाद्रमुक  नेता वीके शशिकला को जेल में बहुत ही संपन्न जीवन जीने का अवसर मिल रहा है . जेल विभाग की एक बड़ी अफसर ने आरोप लगाया है कि जेल में शशिकला को  जेल मैनुअल के खिलाफ जाकर सुविधाएं दी जा रही हैं . अफसर का  आरोप है कि सुविधा पाने के लिए जेल विभाग के महानिदेशक को शशिकला ने एक करोड़ रूपया दिया है और बाकी कर्मचारियों ने भी एक करोड़ रूपये में बाँट लिया है . आरोप बहुत ही गंभीर  है लेकिन महानिदेशक महोदय  का कहना  है कि कि वो जांच के लिए तैयार हैं. हालांकि उन्होंने भ्रष्टाचार के आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया है. उनको मालूम है कि जब जांच होगी तो कोई भी आरोप सिद्ध नहीं होगा क्योंकि जिस तरह से भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप में जेल में बंद अन्नाद्रमुक नेता  शशिकला भ्रष्टाचार के रास्ते ही सज़ा को आरामदेह बनाने में सफल रही हैं , उसी तरह से जेल महकमे के महानिदेशक साहेब भी अपने खिलाफ जांच करने वाले अधिकारियों को संतुष्ट करने में सफल हो  जायेगें . 
देश की जेलों सज़ा काट रहे लोगों को आरामदेह ज़िंदगी बिताने के लिए जेल के अन्दर बहुत  खर्च करना  पड़ता है और वह सारा खर्च रिश्वत के रास्ते ही अफसरों  की जेब तक पंहुचता  है . वी के शशिकला के बहाने भ्रष्टाचार के मुद्दे पर पूरे देश में चर्चा फिर शुरू हो गयी है लेकिन यह चर्चा ही रहेगी  क्योंकि भ्रष्टाचार के नियंताओं के हाथ बहुत बड़े हैं . बिहार के सबसे बड़े राजनीतिक परिवार के खिलाफ आजकल भ्रष्टाचार के कारनामे मीडिया के फोकस में हैं . उनके बेटे बेटियों की  अरबों की संपत्ति , राजनीतिक चर्चा की मुख्य धारा में आ गयी है .  सवाल उठ रहे हैं कि  इनके पास यह संपत्ति आयी किस तरीके से लेकिन लालू प्रसाद यादव विपक्ष की राजनीतिक एकता के नाम  पर मुद्दे को भटकाने की कोशिश  में लगे हुए हैं.  उत्तर प्रदेश में भी आजकल भ्रष्टाचार के खिलाफ  मुहिम चल रही है लेकिन भ्रष्टाचार के मामलों में कहीं कोई ढील नहीं है . आजकल नोयडा में एक कालोनी में आस पास की झुग्गियों में रहने वाले लोगों की तरफ से पत्थरबाजी की घटना ख़बरों में  है . नोयडा जैसे महंगी ज़मीन  वाले इलाकों में भूमाफिया वाले  , इलाके के प्रशासन और पुलिस वालों की मदद से सरकारी ज़मीन पर क़ब्ज़ा  करते हैं . सरकारी ज़मीन पर बहुत ही गरीब लोगों को गैरकानूनी तरीके  से बसाते हैं. ज़ाहिर है इन लोगों के वोट बहुत ज्यादा होते हैं और राजनीतिक नेता वोट की लालच में अपने मुकामी लोगों के ज़रिये इन झुग्गियों को संरक्षण देते हैं . सरकारी जुगाड़ से इन झुग्गियों को  मंजूरी दिला दी जाती है जिसमें नेता, अफसर और अपराधी शामिल होते हैं . इसके बाद जो भूमाफिया इस ज़मीन का करता धरता होता है वह इस मान्यता प्राप्त ज़मीन को बहुत ही महंगे  दामों में बेचता है और वहां रहने वाले झुग्गी वालों को कुछ दे लेकर किसी और सरकारी ज़मीन पर बसा देता  है . नोयडा की मौजूदा घटना इसी बड़े   साजिशतंत्र का हिस्सा है . दिलचस्प बात यह है कि उत्तर प्रदेश सरकार का सरकारी ज़मीन से गैरकानूनी क़ब्ज़ा हटाने  का  बड़ा अभियान चल रहा  है और उस सबके बीच में इतना बड़ा घोटाला सामने आ  गया है . बताते है कि जब कानून व्यवस्था की हालत  को सामान्य बनाने  की कोशिश कर रहे नोयडा और जिले के आला अधिकारियों का ध्यान सरकारी ज़मीन पर अनधिकृत कब्जे की ओर दिलाया गया तो बड़े हाकिम लोग नाराज़ हो गए और कहा कि एक अलग मुद्दा उठाने की ज़रुरत नहीं  है . जब उनको ध्यान दिलाया गया कि मुख्य मंत्री जी के आदेश से राज्य में सरकारी ज़मीन को मुक्त कराने  का अभियान चल रहा है तो अफसरों ने कहा कानून-व्यवस्था प्राथमिकता है और अन्य किसी भी विषय पर बात नहीं की जायेगी .नोयडा की घटना तो केवल एक घटना है . पूरे देश में इसी पैटर्न पर भ्रष्टाचार चल रहा  है , कई राज्यों में मुख्यमंत्री निजी तौर पर बहुत ईमानदार  हैं लेकिन भ्रष्टाचार का तंत्र चलाने वाले अधिकारियों का अपना एक सिस्टम है और उसको कोई भी नेता आम तौर पर तोड़ नहीं सकता . उत्तर प्रदेश के  मुख्यमंत्री के बारे में भी यही कहा जाता है . व्यक्तिगत रूप से उनकी इमानदारी  को सभी स्वीकार करते हैं और उनका उदाहरण दिया जाता है . लेकिन राज्य के भ्रष्टाचार को रोकने में वे नाकामयाब रहे हैं. सरकार के हर विभाग में भ्रष्टाचार   कम करने के दावे के साथ सरकार बनी थी लेकिन आजकल भ्रष्टाचार बढ़ा है .यही हाल केंद्र में भी है .प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने २००१ में गुजरात के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी . उनके खिलाफ किसी तरह के आर्थिक भ्रष्टाचार की शिकायत उनके विरोधी भी नहीं करते लेकिन क्या गुजरात में या अब  केंद्र में आर्थिक भ्रष्टाचार ख़त्म हो गया है .  भ्रष्टाचार है और वह प्रधानमंत्री को मालूम है इसीलिये उन्होंने भ्रष्टाचार की जांच करने वाले सरकारी विभागों को हिदायत दी है कि ऊंचे पदों पर बैठे भ्रष्ट अधिकारियों और जिम्मेदार लोगों के भ्रष्टाचार के मामलों की जांच करें और समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार को खत्म करने में मदद करें। प्रधानमंत्री ने सरकारी अधिकारियों को बता दिया  कि छोटे पदों पर बैठे लोगों के भ्रष्टाचार के कारनामों को पकड़कर कोई वाहवाही नहीं लूटी जा सकती, हालांकि उस भ्रष्टाचार को रोकना भी ज़रूरी है लेकिन उससे समाज और राष्ट्र का कोई भला नहीं होगा। प्रधानमंत्री ने जो बात कही है वह बावन तोले पाव रत्ती सही है और ऐसा ही होना चाहिए।लेकिन भ्रष्टाचार के इस राज में यह कर पाना संभव नहीं है। अगर यह मान भी लिया जाय कि इस देश में भ्रष्टाचार की जांच करने वाले सभी अधिकारी ईमानदार हैं तो क्या बेईमान अफसरों की जांच करने के मामले में उन्हें पूरी छूट दी जायेगी लेकिन सरकारी अफसर ,नेता, अपराधी और भूमाफिया के बीच जो सांठ गाँठ है क्या उसको तोडा जा सकता है .

अक्सर देखा  गया है कि राजनीति में आने के पहले जो लोग मांग जांच कर अपना खर्च चलाते थे, एक बार विधायक या सांसद बन जाने के बाद जब वे अपनी नंबर एक की  संपत्ति का ब्यौरा देते हैं तो वह करोड़ों में होती है। उनके द्वारा घोषित संपत्ति , उनकी सारी अधिकारिक कमाई के कुल जोड़ से बहुत ज्यादा होती है . इसके लिए जरूरी है बड़े पदों के स्तर पर ईमानदारी की बात की जाय . आज अपने  देश में भ्रष्टाचार और घूस की कमाई को आमदनी मानने की परंपरा शुरू हो चुकी है, वहां भ्रष्टाचार के खिलाफ क्या कोई अभियान चलाया जा सकेगा? और यह बंगलूरू में भी सच है और नोयडा में भी. 
इसको  दुरुस्त करना पड़ेगा और इसके  लिए आन्दोलन की ज़रुरत है . इस बात में कोई शक नहीं है कि किसी भी पूंजीवादी अर्थव्यवस्था पर आधारित लोकतांत्रिक देश में अगर भ्रष्टाचार पर पूरी तरह से नकेल न लगाई जाये तो देश तबाह हो जाते हैं। पूंजीवादी व्यवस्था में आर्थिक खुशहाली की पहली शर्त है कि देश में एक मजबूत उपभोक्ता आंदोलन हो और भ्रष्टाचार पर पूरी तरह से नियंत्रण हो। मीडिया की विश्वसनीयता पर कोई सवालिया निशान न लगा हो। अमरीकी और विकसित यूरोपीय देशों के समाज इसके प्रमुख उदाहरण हैं। यह मान लेना कि अमरीकी पूंजीपति वर्ग बहुत ईमानदार होते हैं,बिलकुल गलत होगा।लेकिन भ्रष्टाचार के खिलाफ वहां मौजूद तंत्र ऐसा है कि बड़े-बड़े सूरमा कानून के इकबाल के सामने बौने हो जाते हैं। और इसलिए पूंजीवादी निजाम चलता है।इसलिए राष्ट्रहित ,जनहित और  और  अर्थव्यवस्था के हित में यह ज़रूरी है कि भ्रष्टाचार को समूल नष्ट किया जाए .लेकिन यह इतना आसान नहीं है .सही बात यह है कि जब तक केवल बातों बातों में भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई लड़ी जायेगी तब तक कुछ नहीं होगा . इस आन्दोलन को अगर तेज़ करना है कि तो घूस के पैसे को तिरस्कार की नज़र से देखना पड़ेगा . क्योंकि सारी मुसीबत की जड़ यही है कि चोर, बे-ईमान और घूसखोर अफसर और नेता रिश्वत के बल पर समाज में सम्मान पाते रहते हैं . 
अपने देश में पिछले कुछ  दशकों में घूसखोरी को सम्मान का दर्जा मिल गया है . वरना यहाँ पर दस हज़ार रूपये का घूस लेने के अपराध में जवाहर लाल नेहरू ने , अपने एक मंत्री को बर्खास्त कर दिया था . लेकिन इस तरह के उदाहरण बहुत कम हैं . इसी देश में जैन हवाला काण्ड हुआ था जिसमें मुख्य  धरा की सभी पार्टियों के नेता शामिल थे .आर्थिक उदारीकरण के बाद सरकारी कंपनियों में विनिवेश के नाम पर जो घूसखोरी इस देश में हुई है उसे पूरा देश जानता है . इस तरह के हज़ारों मामले हैं जिन पर लगाम लगाए बिना भ्रष्टाचार को खत्म कर सकना असंभव है . लेकिन भ्रष्टाचार के खिलाफ र्राष्ट्रीय स्तर पर  जनांदोलन की ज़रुरत है और मीडिया समेत सभी ऐसे लोगों को सामने आना चाहिए जो पब्लिक ओपीनियन को दिशा देते हैं ताकि अपने देश और अपने लोक तंत्र को बचाया जा सके. हालांकि बहुत देर हो चुकी  है और शशिकला और  लालू यादव जैसे लोग राजनीति के नाम पर कुछ भी करके सफल हो रहे हैं . इसको रोका जाना चाहिए .

मेरी पहली मुहब्बत : मेरी नीम का पेड़

Sat, 29/07/2017 - 22:39


शेष नारायण सिंह
नीम की चर्चा होते ही पता नहीं क्या होता  है कि  मैं अपने  गांव पंहुंच जाता हूँ.  बचपन  की पहली यादें ही नीम से जुडी हुयी हैं . मेरे  गाँव में नीम  एक देवी  के रूप में स्थापित हैं, गाँव के पूरब में अमिलिया तर वाले बाबू साहेब की ज़मीन में जो नीम  का पेड़ है ,वही काली माई का स्थान है . गाँव के बाकी नीम के पेड़ बस पेड़ हैं .   लेकिन उन पेड़ों में भी मेरे बचपन की बहुत सारी मीठी यादें हैं . मेरे दरवाज़े पर जो नीम का  पेड़ था , वह गाँव  की बहुत सारी गतिविधियों का केंद्र था . सन २००० के सावन में जब  बहुत तेज़ बारिश हो रही थी, तो चिर्री पड़ी ,  लोग बताते हैं कि पूरे गाँव में अजोर हो गया था  , बहुत तेज़ आवाज़ आई थी और सुबह  जब लोगों ने देखा तो मेरे दरवाज़े की नीम का एक  ठासा टूट कर नीचे गिर गया था. मेरे बाबू वहीं पास में बने मड़हे में रात में सो  रहे थे. उस आवाज़ को सबसे क़रीब से  उन्होंने ही सुना था. कान फाड़ देने वाली आवाज़ थी वह . चिर्री वाले हादसे के बाद नीम का  पेड़ सूखने लगा था. अजीब इत्तिफाक है कि उसके बाद ही मेरे बाबू  की जिजीविषा  भी कम होने लगी थी. फरवरी आते आते नीम के पेड सूख  गया . और उसी  २००१ की फरवरी में बाबू भी चले गए थे . जहां वह नीम का पेड़ था , उसी जगह के आस पास मेरे भाई ने नीम के तीन पेड़ लगा दिए है , यह नीम भी तेज़ी से बड़े हो  रहे हैं . इस नीम के पेड़ की मेरे गाँव के सामाजिक जीवन में बहुत महत्व है .इसी पेड़ के नीचे मैंने और मेरे अज़ीज़ दोस्त बाबू बद्दू सिंह ने शरारतें  सीखीं और उनका अभ्यास भी किया . जाड़ों में धूप सबसे पहले इसी पेड़ के नीचे बैठ कर सेंकी जाती थी. पड़ोस के कई बुज़ुर्ग वहां मिल जाते थे . टिबिल साहेब और पौदरिहा बाबा तो  धूप निकलते  ही आ जाते थे. बाकी लोग भी आते जाते रहते थे. मेरे बाबू के काका थे यह दोनों लोग . बहुत आदरणीय इंसान थे. हुक्का भर भर के नीम के पेड़ के नीचे पंहुचाया जाता रहता था. घर के तपता में आग जलती रहती थी.    इन दोनों ही बुजुर्गों का असली नाम कुछ और था लेकिन  सभी इनको इसी नाम से जानते थे. टिबिल साहेब कभी उत्तर प्रदेश पुलिस में कांस्टेबिल रहे थे , १९४४ में रिटायर हो गए थे , और मेरे पहले की पीढी भी उनको इसी नाम से जानती थी.  पौदरिहा का नाम इस लिए पड़ा था कि वे  गाँव से किसी की बरात में गए थे तो इनारे की पौदर के पास ही खटिया  डाल कर वहीं सो गए थे . किसी घराती ने उनको पौदरिहा कह दिया और जब बरात लौटी तो भाइयों ने उनका यही नाम कर दिया . इन्हीं  मानिंद  बुजुर्गों की छाया में हमने शिष्टाचार  की बुनियादी  बातें सीखीं थीं.मेरी नीम की मज़बूत डाल पर ही सावन में झूला पड़ता था. रात में गाँव की लडकियां और बहुएं उस  पर झूलती थीं और कजरी गाती थीं.  मानसून के  समय चारों तरफ झींगुर की आवाज़ के बीच में ऊपर नीचे जाते झूले पर बैठी  हुयी कजरी गाती मेरे गाँव की लडकियां  हम लोगों को किसी भी महान संगीतकार से कम नहीं लगती थीं.  जब १९६२ में मेरे गाँव  में स्कूल खुला तो सरकारी बिल्डिंग बनने के पहले इसी नीम के पेड़ के नीचे ही  शुरुआती कक्षाएं चली थीं.   धोपाप जाने वाले नहवनिया लोग जेठ की दशमी को थक कर इसी नीम  के नीचे आराम करते  थे. उन दिनों सड़क कच्ची थी और ज़्यादातर लोग धोपाप पैदल ही जाते थे .
 मेरे गाँव में सबके घर के आस पास नीम के पेड़ हैं और किसी भी बीमारी में उसकी  पत्तियां , बीज, तेल , खली आदि का इस्तेमाल बड़े पैमाने पर  होता था लेकिन आब नहीं होता. निमकौड़ी बीनने और बटोर कर रखने का रिवाज ही खत्म हो गया है . लेकिन नीम के पेड़ के प्रति श्रद्धा कम नहीं  हो रही है . एक दिलचस्प वाकया है  . मेरे बचपन में   मुझसे छः साल बड़ी मेरी   बहिन  ने घर के ठीक  सामने  नीम का एक पौधा  लगा दिया   था. उसका विचार था कि जब भाइयों की दुलहिन आयेगी  तब तक नीम  का पौधा पेड़ बन जाएगा  और उसी  पर उसकी  भौजाइयां झूला डालकर झूलेंगी.  अब वह पेड़ बड़ा हो गया  है , बहुत ही घना और शानदार .  बहिन के भाइयों की दुलहिनें  जब आई थीं तो पेड़ बहुत छोटा था . झूला नहीं पड़ सका . अब उनकी भौजाइयों के  बेटों की दुलहिनें आ गयी हैं लेकिन अब गाँव  में लड़कियों का झूला झूलने की परम्परा  ही ख़त्म हो गयी है .इस साल  मेरे छोटे भाई ने ऐलान कर दिया कि बहिन   वाले  नीम के पेड़ से घर को ख़तरा है ,लिहाज़ा उसको कटवा दिया जाएगा . हम लोगों ने कुछ बताया  नहीं लेकिन बहुत तकलीफ हुयी  . हम  चार भाई  बहनों के   बच्चों को हमारी तकलीफ  का अंदाज़ लग गया और उन लोगों ने ऐसी  रणनीति बनाई   कि नीम का  पेड़ बच गया .जब नीम के उस पेड़ पर हमले का खतरा मंडरा रहा   था तब मुझे अंदाज़ लगा कि मैं नीम से कितना मुहब्बत करता हूँ . 

लेखक विषय संवाद साभार अनुवादक

पहले वो आए साम्यवादियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं साम्यवादी नहीं था

 

फिर वो आए मजदूर संघियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं मजदूर संघी नहीं था

 

फिर वो यहूदियों के लिए आए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं यहूदी नहीं था

 

फिर वो आए मेरे लिए

और तब तक बोलने के लिए कोई बचा ही नहीं था

 

मार्टिन नीमोलर (1892-1984)