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हाशिया

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बीच सफ़हे की लड़ाई
Updated: 5 hours 57 min ago

वोट डालें, या राजनीति को फिर से गढ़ें?: आलें बादिऊ

Fri, 09/06/2017 - 12:32

दुनिया के जाने माने दार्शनिक, राजनीति और गणित के जानकार, उपन्यासकार और नाटककार आलें बादिऊ ने हाल में हुए फ्रांसीसी चुनावों के दौरान कुछ महत्वपूर्ण लेख लिखे हैं, जिनमें उन्होंने फ्रांस के खास राजनीतिक संदर्भ में राष्ट्रपति पद के उम्मीदवारों, पार्टियों और धाराओं पर बहस करते हुए मौजूदा दौर में पूरी दुनिया में दक्षिणपंथी रुझानों पर गौर किया है और ऐसे माहौल से आगे जाने और इंसानियत की मुक्ति के सवाल पर आगे की राह तलाशने की जरूरत पर जोर दिया है. इन लेखों में से हम दो लेखों को यहां पेश कर रहे हैं, जिनमें से मुख्यत: फ्रांस के स्थानीय चुनावी संदर्भ वाले अंशों को हटा दिया गया है. यहां पर दो भागों में पेश किए जा रहे इन लेखों के मूल फ्रांसीसी से अंग्रेजी अनुवाद क्रमश: “वोट, ऑर री-इन्वेंट पॉलिटिक्स” और “लेट्स लूज़ इंटरेस्ट इन इलेक्शंस, वंस एंड फॉर ऑल!” शीर्षक से वर्सो बुक्स के ब्लॉग पर पढ़ा जा सकता है. ये लेख भारत सहित दुनिया भर में मौजूदा राजनीतिक हालात की एक बेहतर समझ बनाने की दिशा में उपयोगी हैं, इस यकीन के साथ इन्हें यहां पेश किया जा रहा है. अनुवाद एवं प्रस्तुति: रेयाज उल हक

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पुरानी और जानी-मानी भूमिकाओं के इस रंगमंच में, राजनीतिक प्रतिबद्धता का बहुत थोड़ा सा ही मोल है, या फिर यह सियासी करतब के लिए एक बहाना भर है. इसलिए बेहतर होगा कि हम इस सवाल से शुरू करें: राजनीति क्या है? और एक पहचानी जा सकने वाली, घोषित राजनीति क्या है?

चार बुनियादी राजनीतिक नजरिए

कोई राजनीति हमेशा तीन तत्वों के आधार पर खुद को परिभाषित कर सकती है. इनमें से पहला तत्व है सामान्य जनता का समूह और साथ ही उसके काम और उसकी सोच. आइए, हम इसे “जनता” कहें. इसके बाद विभिन्न सामूहिक संगठन आते हैं: असोसिएशन, यूनियन, पार्टियां – कुल मिला कर वे सभी समूह जो सामूहिक कार्रवाई करने के काबिल होते हैं. आखिर में राजसत्ता के अंग – सांसद, सरकार, सेना, पुलिस – आते हैं लेकिन साथ ही आर्थिक और/या मीडिया सत्ता के हिस्से भी इसके भीतर आते हैं (यह एक ऐसा फर्क है जो अब करीब करीब ऊपर से दिखाई नहीं देता), या फिर हर वो चीज जिसे आज हम एक खूबसूरत लगने वाले और लोगों के दिलो-दिमाग पर छा जाने तरीके से “फैसला लेने वाले लोग” कहा करते हैं.

राजनीति, हमेशा ही इन तीन तत्वों के जरिए मकसद को हासिल करने से बनती है. इस तरह हम देख सकते हैं कि आधुनिक दुनिया में मोटे तौर पर चार बुनियादी राजनीतिक नजरिए पाए जाते हैं: फासीवादी, रूढ़िवादी, सुधारवादी और कम्युनिज्म (साम्यवादी).

रूढ़िवादी और सुधारवादी नजरिए विकसित पूंजीवादी समाजों का मध्यमार्गी संसदीय धड़ा (ब्लॉक) बनाते हैं: फ्रांस में वामपंथ और दक्षिणपंथ, संयुक्त राज्य अमेरिका में रिपब्लिकन और डेमोक्रेट वगैरह. इन दोनों नजरियों में बुनियादी तौर पर जो बात आपस में मिलती है वह ये है कि ये दोनों ही दावा करते हैं कि उनके बीच एक टकराव मौजूद है – खास तौर से इन तीनों तत्वों की अभिव्यक्ति के अर्थ में – इसके बावजूद इनमें से दोनों ही नजरिए संवैधानिक सीमाओं के भीतर रह सकते हैं और निश्चित रूप से रहते हैं.

इनसे अलग बचे दूसरे दोनों नजरियों, फासीवाद और कम्युनिज्म में, मकसद को लेकर अपने बीच के हिंसक विरोध के बावजूद जो बात एक जैसी है वो यह है कि दोनों ही मानते हैं कि राजसत्ता के सवाल पर विभिन्न पार्टियों के बीच के टकराव में, सुलह-समझौता नामुमकिन है: इसको किसी संवैधानिक सर्वसहमति का पाबंद नहीं बनाया जा सकता है. ये नजरिए अपने से विरोधी या यहां तक कि अपने से अलग किसी भी मकसद को समाज और राज्य की अपनी अवधारणाओं में शामिल करने से इन्कार करते हैं.

चहेता फासीवाद-परस्त नजरिया

हम राजसत्ता के उस संगठन के लिए “संसदीयतावाद” के नाम का इस्तेमाल कर सकते हैं जो चुनावी मशीनरी, अपने दलों और उनके अनुयायियों के जरिए रूढ़िवादियों और सुधारवादियों के साझे वर्चस्व को सुनिश्चित करता है. यह वर्चस्व हर जगह राज सत्ता पर फासीवादियों या कम्युनिस्टों के दखल की किसी भी गंभीर संभावना को खत्म करता है. हम जिसे “पश्चिम” कहते हैं, वहां पर यही राज्य का प्रभुत्वशाली रूप है. खुद इसके लिए एक तीसरे नाम की जरूरत है, जो इन दोनों मुख्य नजरियों के बीच आपस में तालमेल का एक साझा और ताकतवर आधार हो और जो इन दोनों का अटूट अंग हो और इनके अलावा भी जिसका वजूद हो. यह साफ है कि हमारे समाजों में नवउदारवादी पूंजीवाद यही आधार है. कारोबार और निजी दौलत को बढ़ाते जाने की बेपनाह आजादी, निजी संपत्ति के लिए पूरा सम्मान (अदालती व्यवस्था और भारी पुलिस बंदोबस्त जिसकी गारंटी करती है), बैंकों में भरोसा, युवाओं की शिक्षा, “लोकतंत्र” की ओट में होड़ (प्रतिस्पर्धा), “कामयाबी” की भूख,  बराबरी के नुकसानदेह और काल्पनिक चरित्र का बार-बार दावा करना: यह आम राय से कबूल की गई “आजादियों” का एक सांचा (मैट्रिक्स) है. ये वो आजादियां हैं जिनकी हमेशा गारंटी करने के लिए दोनों तथाकथित “शासनकारी” पार्टियां कमोबेश प्रतिबद्ध हैं.

पूंजीवाद का होना, संसदीय सर्वसहमति के मूल्य में कुछ अनिश्चितताएं लेकर आता है, और इस तरह चुनावी रस्मों के दौरान “बड़े” रूढ़िवादी या सुधारवादी पार्टियों में भरोसे को जाहिर किया जाता है. यह खास तौर से निम्न बुर्जुआ के लिए सही है, जिसकी सामाजिक हैसियत खतरे में होती है, या फिर मेहनतकश वर्ग के लिए, जो उद्योगों के धीरे-धीरे बंद होने से तबाह हो गए हैं. पश्चिम में हम यही देख रहे हैं, जहां एशियाई देशों की उभरती हुई ताकत के मुकाबले, हम एक तरह का पतन देख सकते हैं. आज का यह खास संकट साफ तौर पर फासीवादी, राष्ट्रवादी, धार्मिक, इस्लामविरोधी और युद्ध को पसंद करने वाले नजरिए का समर्थन करता है, क्योंकि खौफ एक बहुत बुरा सलाहकार है और संकट में डूबे ये खास समाज पहचान पर आधारित मिथकों की गिरफ्त में जाने को बेकरार हैं. सबसे बढ़कर इसलिए कि कम्युनिस्ट परिकल्पना मुख्यत: सोवियत संघ और चीन के जनवादी गणतंत्र के अपने पहले और राज्य आधारित संस्करणों की ऐतिहासिक नाकामियों की वजह बहुत बुरी तरह कमजोर होकर सामने आई है.

इस नाकामी के नतीजे खुद ब खुद जाहिर हैं: नौजवानों, वंचितों और बदहाल लोगों, रोजगार से बेदखल मजदूरों और हमारे उपनगरों के घुमंतू सर्वहारा इस बात पर यकीन करने लगे हैं कि कड़वाहट भरी पहचानों (अस्मिताओं), नस्लवाद और राष्ट्रवाद की फासीवादी राजनीति ही हमारी संसदीय सर्वसहमति का अकेला विकल्प है.

कम्युनिज्म, इंसानियत की मुक्ति

हालात ने जो रुख लिया है, अगर हम उसके खिलाफ हैं तो हमारे सामने सिर्फ एक ही रास्ता है: हमें कम्युनिज्म को फिर से गढ़ना होगा, उसमें जरूरी बदलाव करके उसे फिर से पेश करना होगा. अब यह जरूरी हो गया है कि बहुत अपमानित हो चुके इस शब्द को हम फिर से उठाएं, इसे साफ करें और फिर से इसकी रचना करें. यह इंसानियत की मुक्ति का हरकारा है, करीब दो सदियों से इसकी यही भूमिका रही है और ऐसा करते हुए इस महान नजरिए को हकीकत का समर्थन हासिल होता रहा है. अभूतपूर्व कोशिशों के कुछ दशक (जो इसलिए हिंसक थे कि इस दौरान बेरहमी से इसकी घेरेबंदी करके इस पर हमला किया गया जिसकी वजह से यह हार जाने के लिए अभिशप्त था) मजबूत इरादों वाले लोगों को इस बात का कायल नहीं बना सकते कि इस संभावना को हमेशा के लिए दफ्न कर दिया जाना चाहिए. वे हमें इसके लिए मजबूर भी नहीं कर सकते कि हम इसको जमीन पर उतार लाने की जिम्मेदारियों को हमेशा के लिए छोड़ दें.

इसलिए, क्या तब हमें वोट डालना चाहिए? बुनियादी तौर पर राज्य और इसके संगठनों की ओर से आने वाली इस मांग से हमें कोई फर्क नहीं पड़ना चाहिए. अब तक हमें यह मालूम हो जाना चाहिए कि वोट डालने का मतलब और कुछ नहीं बल्कि मौजूदा व्यवस्था के रूढ़िवादी नजरियों में से किसी एक को मजबूत करना है.

अगर हम इसके असली मतलब तक जाएं तो वोट जनता को राजनीति से दूर करने यानी उनको अराजनीतिक बनाने का एक उत्सव है. हमें जरूरी तौर पर शुरुआत यह करनी है कि हम हर जगह पर भविष्य के लिए कम्युनिस्ट नजरिए को फिर से बाकायदा स्थापित करें. इस पर पक्के तौर पर यकीन रखने वाले जुझारू लोगों को जरूरी तौर पर दुनिया भर के लोकप्रिय संदर्भों यानी हालात में, जगह-जगह पर जाकर इसके उसूलों की चर्चा करनी होगी. जैसा कि माओ ने कहा था, हमें जरूरी तौर पर “उलझन और भ्रम के बीच से जो कुछ भी हासिल है, उसे उसकी खासियत के साथ, जनता को समझाना होगा.” और राजनीति को फिर से गढ़ने का मतलब यही तो है.

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मैं खास कर मेलेनकोनिज्म से नाउम्मीद हो चुके लोगों की कड़वाहट को समझता हूं, जो चुनावों के पहले दौर के बाद अपने गुस्से और नाराजगी को जाहिर कर रहे हैं. इसके बावजूद, वे चाहे जो भी करें या कहें, इस चुनाव में कोई खास गैरमामूली बात या धांधली नहीं हुई थी.

हालांकि असल में पार्टियों में दो अंतर्विरोध रहे हैं, जिन्होंने अफसोसनाक रूप से (वास्तव में मौजूद शक्तियों के लिए) केंद्रीय संसदीय धड़े को बिखेर दिया. यह धड़ा परंपरागत वाम और दक्षिण से मिल कर बना था. चालीस बरसों से – बल्कि दो सदियों से – यह धड़ा स्थानीय पूंजीवाद के फलने-फूलने की हिमायत करता आ रहा है. इसके बावजूद तथाकथित वामपंथ के स्थानीय प्रतिनिधि ओलां फिर से खड़े नहीं हुए, और इससे उनकी पार्टी की कमर टूट गई. दूसरी तरफ परंपरागत दक्षिणपंथ है. चुनावों की अपनी बदनसीब प्रक्रिया (प्राइमरी) की बदौलत यह अपने बेहतरीन बूढ़े घोड़े आलें युप्पे को उम्मीदवार नहीं बना पाया, बल्कि इसकी मनहूस चेहरे वाली, मुफस्सिल की एक बुर्जुआ उम्मीदवार के बतौर चुनी गई, जो आधुनिक पूंजीवाद की “सामाजिक” पसंद से कोसों दूर है.

“सामान्य” दूसरा दौर (राउंड) ओलां बनाम युप्पे का रहा होता, या फिर सबसे खराब हालात में भी मुकाबला ले पां बनाम युप्पे का रहा होता, और इन दोनों ही हालात में युप्पे आसानी से जीत जाते. सरकार की दो जर्जर पार्टियों की गैरमौजूदगी में, दो सदियों से हमारे असली मालिक यानी पूंजी के मालिक और उसके प्रबंधकों को थोड़ी परेशानी उठानी पड़ी. किस्मत से (यानी अपनी किस्मत से), अपने हमेशा के राजनीतिक किरदारों के साथ मिलकर, प्रतिक्रियावाद के पुराने दिग्गजों और सामाजिक लोकतंत्र के बचे-खुचे तत्वों (वॉल, ले द्रिएं, सेगोलें रॉयल एंड कंपनी) की मदद से, उन्होंने दम तोड़ रहे लावारिस केंद्रीय संसदीय धड़े की जगह लेने के लिए एक लायक चेहरा जुटा लिया. और वह चेहरा थे: इमानुएल मैक्रों. बहुत उपयोगी तरीके से और भविष्य को देखते हुए बहुत अहम तरीके से उन्होंने अपने मकसद के लिए फ्रांसुआ बेरो को भी इसमें लगा दिया, जो एक पुराने अनुभवी मध्यमार्गी संत हैं और सभी चुनावी जंगों और सबसे मुश्किल जंगों को भी देख चुके हैं. यह सारा कुछ बड़ी ठाठ-बाट के साथ अंजाम दिया गया और इतनी फुर्ती से किया गया कि यह एक रेकॉर्ड ही है. इसके नतीजे में अंतिम कामयाबी की तो खास गारंटी थी.

इन हालात में, जिनको समझाना पूरी तरह से मुमकिन है, वोट ने पहले की तुलना में कहीं अधिक साफ तौर पर इसकी तस्दीक कर दी है कि एक पूंजीवाद परस्त और दक्षिणपंथी नजरिया (जिसमें फासीवादी रूप भी शामिल है) इस मुल्क में चरम बहुमत में है.

बुद्धिजीवियों और नौजवानों का एक हिस्सा इसे देखने से इन्कार कर रहा है या फिर इस पर कड़वाहट भरे तरीके से अफसोस जाहिर कर रहा है. लेकिन यह क्या है? क्या लोकतांत्रिक चुनावों के ये आशिक लोग ये चाहते हैं कि कोई आए और इसे बदल दे कि लोग किसको वोट करें, जैसे कि आप अपनी गंदी कमीज बदलते हैं? जो लोग वोट डालते हैं, उन्हें हर हालत में बहुमत की मर्जी को कबूल करना होता है. सचमुच, नौजवानों और बुद्धिजीवियों के ये दो उक्त समूह दुनिया को अपने हालात और अपने सपनों के पैमाने से ही मापते हैं, और किसी नतीजे पर नहीं पहुंचते जहां पहुंचना जरूरी है: वह नतीजा यह है कि “लोकतांत्रिक” शब्द से उम्मीद करने लायक कुछ भी नहीं है.

1850 में नेपोलियन तृतीय ने यह देख लिया था कि वोट डालने का आम अधिकार (सार्वभौम मताधिकार) कोई खौफनाक चीज नहीं थी, जैसा कि रूढ़िवादी बुर्जुआ ने इसके बारे में कल्पना की थी, बल्कि यह एक सचमुच का वरदान था जो प्रतिक्रियावादी ताकतों के लिए एक अभूतपूर्व और अनमोल वैधता मुहैया कराता था. यह बात आज भी पूरी दुनिया में हर जगह सही है. नेपोलियन के वारिसों ने यह समझ लिया है कि कमोबेश सामान्य और स्थिर ऐतिहासिक हालात में, आबादी की बहुसंख्या हमेशा बुनियादी तौर पर रूढ़िवादी होती है.

इसलिए आइए, शांत दिमाग से एक नतीजे पर पहुंचने की कोशिश करते हैं. उन्माद में भर कर चुनावी नतीजों का मतलब लगाना और कुछ नहीं बल्कि एक बेकार की हताशा है. आइए, इसकी आदत डाल लें: अगर चार कारकों को ऐतिहासिक रूप से एक साथ नहीं लाया गया तो हमारी मौजूदा गुलामी की हालत पर कभी भी जानलेवा चोट नहीं पहुंचाई जा सकती है. और ये बातें चुनावी रस्मों से उतनी ही दूर हैं, जितनी दूर उनसे कोई चीज हो सकती है.

    1. ऐतिहासिक अस्थिरता की स्थिति, जो रूढ़िवादी जनमत पर हावी होकर उसे काबू में कर लेती है. अफसोस की बात ये है कि यह स्थिति संभावित रूप से ठीक ठीक एक युद्ध भी हो सकती है, जैसा कि 1870 में पेरिस कम्यून, 1917 में रूसी क्रांति या फिर 1937 और 1947 के बीच चीनी क्रांति के समय था.

    2. एक मजबूती से कायम किया गया विचारधारात्मक बंटवारा – विचारधारा के स्तर पर हमें यह बंटवारा करना है कि रास्ता सिर्फ एक नहीं है, बल्कि हमारे सामने दो रास्ते हैं. स्वाभाविक रूप से इसे सबसे पहले बुद्धिजीवियों के बीच अंजाम देना होगा लेकिन अंतिम तौर पर इसे खुद व्यापक जनता में स्थापित करना होगा. हमें राजनीतिक सोच के पूरे मुकाम को इस तरह खड़ा करने की जरूरत है कि हर चीज पूंजीवाद और कम्युनिज्म के बीच दुश्मनी भरे विरोध के इर्द-गिर्द स्थापित हो. इसमें इस विरोध के दूसरे आयामों की मदद भी ली जा सकती है. सरसरी तौर पर अपने पाठकों को मैं इस दूसरे रास्ते यानी कम्युनिज्म के उसूलों की याद दिलाना चाहता हूं: उत्पादन के साधनों, कर्ज और लेन-देन और निजी संपत्ति के खिलाफ प्रबंधन के सामूहिक स्वरूपों की स्थापना, श्रम को एक ही साथ अनेक रूपों में जाहिर होने को मुमकिन बनाना जिसे खास तौर से शारीरिक और बौद्धिक श्रम के रूपों के बीच फर्क ने अभी कुचल रखा है, हमेशा अंतरराष्ट्रीयतावाद पर अमल करना, और लोकप्रिय शासन के स्वरूपों पर काम करना, जो अलग-थलग राज्यों की किसी भी व्यवस्था के खात्मे के लिए काम करें.

    3. एक लोकप्रिय उभार – हमेशा की तरह यह पक्के तौर पर आबादी के एक छोटे से हिस्से का उभार होगा, लेकिन जो कम से कम राजसत्ता को स्थगित कर देगा. ऐसा एक उभार ऊपर दिए गए पहले बिंदु से जुड़ा हुआ है.

    4. एक मजबूत संगठन जो पहले तीनों बिंदुओं के बीच एक सक्रिय तालमेल को पेश करे, अपने दुश्मनों के बिखराव की दिशा में काम करे, जितनी जल्दी संभव हो उतनी जल्दी दूसरे बिंदु यानी कम्युनिस्ट रास्ते के ऊपर दिए गए उसूलों को अमल में लाने के लिए काम करे.

    इन चार बिंदुओं में से दो – पहले और तीसरे – एक खास हालात के बनने पर निर्भर हैं. लेकिन दूसरे बिंदु पर तो हम अभी से ही सक्रिय रूप से काम शुरू कर सकते हैं. और यही सबसे नाजुक पहल है. हम खास कर दूसरे बिंदु की रोशनी में बुद्धिजीवियों और सर्वहारा के तीनों रूपों की साझी बैठकों और कार्रवाइयों का समर्थन करते हुए चौथे बिंदु पर भी काम कर सकते हैं. बुद्धिजीवियों और सर्वहारा के जिन तीन रूपों के बीच काम किया जाना जरूरी है, वो हैं: सक्रिय मजदूर और निचले दर्जे के सरकारी कर्मचारी; पिछले तीन दशकों में उद्योगों की अंधाधुंध कमी का सबसे बुरा असर झेल रहे और नैतिक रूप से टूट चुके मजदूर परिवार; और अफ्रीका, मध्य-पूर्वी और एशियाई मूल के घुमंतू सर्वहारा.

    चुनावी नतीजों के बारे में जज्बाती होते हुए अवसाद में डूब जाना या शोर मचाना न सिर्फ बेकार है बल्कि नुकसानदेह भी है. यह एक दुश्मन इलाके में जाकर मोर्चा लेने जैसी बात है, जिसका कोई फायदा नहीं है और न ही जिससे कोई हल निकलने वाला है. हमें जरूरी तौर पर चुनावों से बेपरवाह होना होगा, जो अधिक से अधिक, शुद्ध रूप से एक रणनीतिक चुनाव होते हैं कि इस “लोकतांत्रिक” किस्से में हिस्सा लेने से बचा जाए, या फिर अपने माफिक एक खास हालात पैदा करने के नजरिए से इस या उस उम्मीदवाद का समर्थन किया जाए. ये खास हालात भी हम कम्युनिस्ट राजनीति के ढांचे के भीतर सटीक रूप से परिभाषित करते हैं, जिसका इस राजसत्ता की रस्मों से कोई रिश्ता नहीं होता. हमें अपना कीमती समय अपनी सच्ची राजनीतिक मेहनत में लगाना चाहिए. और यह काम ऊपर दिए गए चार बिंदुओं के दायरे में ही होना चाहिए.

    समयांतर, जून 2017 में प्रकाशित

    निर्भया फैसला: इंसाफ या प्रतिशोध

    Tue, 06/06/2017 - 12:08

    आनंद तेलतुंबड़े का नियमित स्तंभ इस बार निर्भया बलात्कार मामले में आए अंतिम फैसले के बारे में है, जिसके तहत कसूरवार ठहराए गए युवकों को फांसी की सजा की पुष्टि की गई है. अनुवाद: रेयाज उल हक

    पिछले महीने सर्वोच्च न्यायालय ने निर्भया मामले के नाम से जाने जाने वाले, 16 दिसंबर 2012 के सामूहिक बलात्कार मामले में चार कसूरवारों की फांसी की सजा की पुष्टि की तो अदालत में मौजूद लोग खुशी से झूम उठे. यह खुशी उस अभूतपूर्व गुस्से और आक्रोश के माफिक ही है, जो 23 साल की फिजियोथेरेपी इंटर्न ज्योति सिंह के बलात्कार और उस पर हुए क्रूर हमले से देश भर में पैदा हुआ था. सुप्रीम कोर्ट के लिए यह एक गैरमामूली मौका रहा होगा जब उसके किसी फैसले को लोगों का इतना व्यापक समर्थन हासिल हुआ, जिसकी गूंज देश के कोने-कोने में सुनने को मिली. लोगों की राय सुनकर ऐसा जाहिर होता है कि उन्हें इस बात की तसल्ली मिली है कि आखिरकार इस मामले में इंसाफ हो गया. लेकिन सवाल है कि क्या वाकई ऐसा हुआ है? बलात्कार और हत्या के अपराध के लिए मध्यकालीन और बर्बर मौत की सजा दिया जाना इंसाफ नहीं है, बल्कि यह एक ऐसी चीज है, जिसकी जड़ें मध्यकालीन संस्कृति में ही हैं और जिसे प्रतिशोध या बदला कहा जाएगा. अदालत ने मामले की सुनवाई करते हुए ऐसा नहीं किया कि वो इसको पूरी गंभीरता में देखे और अपराधियों की सजा में कमी लाने वाले कारकों पर सावधानी से गौर करते हुए इसे एक दुर्लभतम (दुर्लभ में भी दुर्लभ) मामले के रूप में स्थापित करे, बल्कि उसने “सामूहिक विवेक” की बात का हवाला दिया है, जिसका सीधा सीधा मतलब यह है कि फैसले को सही ठहराने के लिए भीड़ की मानसिकता का उपयोग किया गया. इस फैसले में उम्र, सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि, सुधार की संभावना या किसी भी ऐसी बात पर गौर नहीं किया गया है, जो कसूरवारों से जुड़ी है और उनकी सजा में कमी करने की वजह बनती. न ही उसने पुलिस की नाकामी की तरफ रत्ती भर भी इशारा किया, जो ऐसे अपराधों में काफी हद तक जिम्मेदार होते हैं. न ही अदालत ने भविष्य में ऐसे अपराधों को होने से रोकने के बारे में उठाए जाने वाले कदमों के बारे में कोई सवाल किया. जबकि ये सारे मुद्दे इंसाफ के सरोकार के दायरे में आते हैं.

    दुर्लभ में भी दुर्लभ मामला

    इसमें कोई शक नहीं है कि यह उस लड़की के खिलाफ एक घिनौना अपराध था. छहों अपराधियों ने न सिर्फ उसका यौन शोषण किया, बल्कि जैसा कि मीडिया में बताया गया था, उसके यौनांगों में धातु का सरिया डाल कर उसकी आंतें तक खींच ली थीं. कोई भी सभ्य समाज ऐसी घटना पर उसी तरह की प्रतिक्रिया देगा, जैसी प्रतिक्रिया भारत में हुई. लेकिन अगर इस समाज ने इससे पहले बलात्कार और हत्याओं के लाखों मामलों में से कुछ पर भी ऐसी ही संवेदना दिखाई होती, तो यह एक पूरी तरह से सराहनीय बात होती. क्योंकि आखिरकार ऐसा अपराध पहली बार नहीं हुआ था. लेकिन अपनी टीआरपी के उन्माद में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने इसे अपने पर्दे पर एक ऐसी क्रूरता का मामला बना दिया जो पहले कभी देखी-सुनी नहीं गई. निर्भया नाम भी मीडिया का ही दिया हुआ है और इसी तरह धातु के सरिए वाली बात भी इसकी अपनी खोज थी, जिसे निचली से लेकर सर्वोच्च अदालत तक ने बिना किसी आलोचना के स्वीकार कर लिया और इसे दुर्लभतम मामला बना दिया. 400 पन्नों के फैसले में ‘लोहे का सरिया (आयरन रॉड)’ शब्द 104 बार आया है, जो दिखाता है कि किस तरह इस बात ने अदालत द्वारा अपराधियों को मौत की सजा को कायम रखने में निर्णायक भूमिका निभाई है. सच्चाई यह है कि सिंगापुर के हॉस्पीटल द्वारा (जहां पीड़िता का इलाज किया गया था) तैयार पोस्ट-मॉर्टम रिपोर्ट ने इसकी पुष्टि की थी कि उसका गर्भाशय और अंडाशय सही-सलामत थे. यह सीधे-सीधे सरिए वाले सिद्धांत को गलत साबित करता है, क्योंकि गर्भाशय को नुकसान पहुंचाए बिना सरिया आंतों तक नहीं पहुंच सकता. तब, मीडिया इस घटना पर सामूहिक उन्माद खड़ा करने में कैसे कामयाब रहा था? इसका जबाव शायद मीडिया द्वारा फैलाई गई इस खबर में है कि इस मध्यवर्गीय लड़की का कम से कम एक बलात्कारी दलित समुदाय से आता है. हालांकि यह बात चुपके-चुपके ही फैलाई गई, लेकिन इसने मध्यवर्ग के गुस्से को भड़काने में अहम भूमिका अदा की, जो देश भर में व्यापक रैलियों और कैंडल मार्च की शक्ल में सामने आई. दूसरे वर्ग इसमें जुड़ते गए और इसने विरोध आंदोलनों की एक सुनामी की शक्ल ले ली.

    निर्भया के पहले और बाद में भी ऐसी अनेक घटनाएं हुई हैं, जिनकी तुलना इस मामले से की जा सकती है, लेकिन उन पर ऐसी किसी प्रतिक्रिया की बात तो छोड़ दी दीजिए, उस वर्ग के कानों पर जूं तक न रेंगी, जो निर्भया के लिए सड़कों पर उतरा था. 2006 में खैरलांजी में दिल को दहला देने वाली एक घटना में एक दलित मां और उसकी 19 साल की बेटी का गांव की एक भीड़ द्वारा क्रूर बलात्कार किया गया था और यातना दे-दे कर उन्हें मार दिया गया था. इसके बाद उसके दो बेटों को भी पीट-पीट कर मार डाला गया. बाद में उनकी निर्वस्त्र लाशें बरामद की गईं, जिनके यौनांगों में छड़ियां पाई गईं. लेकिन गैरदलितों में इस पर कोई सुगबुगाहट नहीं हुई. जब दलितों ने स्वत:स्फूर्त तरीके से इस मामले पर अपने गुस्से को जाहिर किया, तो पुलिस ने बहुत बुरी तरह उनकी पिटाई की और उन्हें नक्सली कहा, जिसकी शुरुआत महाराष्ट्र के तत्कालीन गृह मंत्री ने की थी. लेकिन यह भी इस वर्ग की संवेदना को जगा पाने में नाकाम रहा. इसके उलट इस वर्ग ने इस पूरे मामले की गंभीरता को कम करते हुए इसे एक ऐसी दुर्भाग्यशाली घटना का रंग दिया, जिसकी वजह एक औरत की गुस्ताखी थी, जिसने मासूम गांववालों के नैतिक गुस्से को भड़का दिया था. ऐसा नहीं है कि खैरलांजी दलित महिलाओं के खिलाफ ऐसे अपराधों की पहली और आखिरी घटना थी. दलित उत्पीड़न के ऐसे हजारों मामले खैरलांजी से पहले हो चुके हैं और उसके बाद उनमें तेजी ही आई है.  आज, हर रोज छह दलित औरतों का बलात्कार होता है, जिनमें से ज्यादातर में अमानवीय निर्ममता से हमला किया जाता है. लेकिन न तो उन घटनाओं पर व्यापक समाज में ही कोई प्रतिक्रिया हुई और न ही उन्होंने जजों की चेतना को झकझोरा कि वे उन बलात्कारों को दुर्लभतम मानें. शायद उनके लिए दलितों के साथ होने वाले बलात्कार एक मामूली बात, यानी सामान्यता है!

    एक असामान्य सामान्यता

    असल में भारतीय समाज में बलात्कार खुद एक असामान्य सामान्यता है. भारत में औरत की देह को सांस्कृतिक रूप से सामाजिक-राजनीतिक हिसाब बराबर करने की एक निशानी के रूप में लिया जाता है. समाज का टुकड़ों-टुकड़ों में अपार बिखराव और ऊंच-नीच की व्यवस्था इस स्थिति को संभावित रूप से व्यापक बना देती है और इसलिए यह औरतों की देह पर हमलों की संभावनाओं को भी बढ़ा देती है. किसी भी सांप्रदायिक या राष्ट्रीय संघर्ष में औरत की देह मुख्य निशाना बनती है. भारत के बंटवारे के दौरान सरहद के दोनों तरफ 100,000 से ज्यादा औरतों का अपहरण और बलात्कार किया गया था. उन पर सिर्फ यौन हमले ही नहीं हुए बल्कि हमलावरों की जीत की निशानी के तौर पर उनको निर्मम यातनाएं भी दी गई. अनेक औरतों के स्तन काट दिए गए, दूसरी अनेक औरतों के यौनांगों के साथ दुर्व्यवहार किया गया और यातना दी गई – जिनमें से ज्यादातर मामलों में अंजाम मौत के रूप में सामने आया.  यहां तक कि 1984 के सिख कत्लेआम में भी औरतों का व्यापक अपहरण और बलात्कार किया गया. गुजरात में 2002 में मुसलमान औरतों और बच्चियों के साथ बेरहमी से सरेआम बलात्कार किया गया और उन्हें मार कर उनकी लाशें जला दी गईं. अनेक औरतों ने यौन हिंसा का सबसे वहशी रूप देखा – जिसमें बलात्कार, सामूहिक बलात्कार, सार्वजनिक बलात्कार, निर्वस्त्र किया जाना, उनकी देह में वस्तुएं घुसाना और छेड़खानी आदि शामिल हैं.  औरतों की देह एक राजनीतिक अखाड़ा बना दी गई है, जो राष्ट्रवाद और ताकत के प्रदर्शन के काम में लाई जाती है. विरोधी द्वारा बलात्कार की गई हरेक औरत जीत की एक वस्तु, एक तमगा, बन जाती है. इसी सोच के मुताबिक तरह राष्ट्र राज्य “भारत माता” बन जाता है, जो एक ऐसी महिला है जिसे बाहरी दुश्मनों से बचाने की जरूरत है.

    असल में बलात्कार को रोजमर्रा की मामूली बात बनाने की जड़ें जातीय संस्कृति में धंसी हुई हैं, जिनमें एक प्रभुत्वशाली जाति के पास निचली जातियों की औरतों की देहों पर नियंत्रण हासिल होता है. ऐसे रिवाज थे कि निचली जातियों की नई दुल्हनों को अपनी शादी को मुकम्मल बनाने के लिए अपनी पहली रात में उन्हें ब्राह्मणों के पास भेजा जाता था. केरल में पिछली सदी की शुरुआत तक तो यह चलन में था ही, सामंती भारत के दूसरे हिस्सों में भी यह अलग-अलग रूपों में मौजूद था. संयोग से, संघ परिवार के विचारक इस रिवाज को गर्व से सही ठहराते हुए इसे गैर ब्राह्मणों की नस्लों को सुधारने का एक वैज्ञानिक तरीका बताते हैं.  इस रिवाज को पूंजीवादी आधुनिकता ने पीछे धकेल दिया है, लेकिन दलितों और आदिवासियों का बलात्कार कम नहीं हुआ है. वो लाखों की संख्या में अब भी होते हैं और इस तरह वे भारतीयों के रोजमर्रा के अनुभव और उनके आसपास की दुनिया को रचते हैं.

    भारतीयों की सांस्कृतिक मानसिकता औरतों को मर्दों की जायदाद के रूप में देखती है, जिनको दूसरों से बचाना जरूरी होता है, जाहिर सी बात है कि बलात्कार ऐसा यौन प्रसंग बन जाता है जो इस पूरे नजरिए के साथ अटूट रूप से जुड़ा हुआ है. औरतों के शुद्ध, पवित्र और विनम्र होने का विचार बलात्कार संस्कृति की गंभीरता को हल्के-फुल्के तरीके से पेश करने और उसे आम बनाने का लक्षण है. यह प्रभुत्वशाली विचार कि औरतों की भूमिका मर्दों की सेवा करने की होती है, यौन इच्छाएं मर्दों का विशेषाधिकार हैं, बलात्कार जायदाद पर एक हमला है, लेकिन मर्दों को उकसाने का दोष औरतों पर आता है, बलात्कार की पीड़िता और उसके परिवार को सामाजिक रूप से अपमानित और अलग-थलग कर देना, इन सबने बलात्कार के प्रति संस्थागत (यानी पुलिस और न्यायपालिका के) रवैयों को भी अपने मुताबिक ढाल दिया है. बदकिस्मती से, औरतों ने भी इन्हें अपने भीतर उतार लिया है. वे सामाजिक दायरों में अपनी अलग जगहों (मसलन आरक्षित डिब्बे, सार्वजनिक परिवहन सेवाओं में सीटें आदि) की जो मांगें खुशी खुशी करती हैं, वो इस संस्कृति के आपराधिक चरित्र को हल्का करने और बलात्कार संस्कृति को सामान्य बनाने में योगदान देती है.

    क्या मौत इसका इलाज है?

    मौत की सजा को लेकर लोगों में पाई जाने वाली सनक भी दुश्मन से बदला लेने की भारतीय संस्कृति में रची-बसी है, क्योंकि यहां इंसाफ का विचार जाति-सापेक्ष होता है. आंकड़े दिखाते हैं कि मौत की सजा के पीड़ितों/कसूरवारों की एक व्यापक बहुसंख्या दलित, आदिवासी और अल्पसंख्यक समुदाय से आती है. मौत की सजा का रिश्ता, उस विषय की सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि से होता है.  1992 में निचली जातियों द्वारा ऊंची जाति के भूमिहारों के जनसंहार, बारा जनसंहार, के जवाब में भूमिहार जमींदारों की निजी सेना सवर्ण लिबरेशन फ्रंट ने 23 दिसंबर 1991 को पड़ोस के माने और बरसिम्हा गांवों के 10 दलितों की हत्या की. इस मामले में बड़ी तेजी से चार लोगों को मौत की सजा सुनाई गई, जिनमें से तीन दलित हैं (राष्ट्रपति ने हाल ही में इन सजाओं को आजीवन कारावास में बदल दिया है), लेकिन बिहार में कई दर्जन जनसंहार करने वाले ऊंची जातियों के हत्यारों को पटना उच्च न्यायालय एक जैसे मिलते जुलते फैसलों के जरिए जल्दी-जल्दी बरी कर रहा है.  नागरिक अधिकार संगठनों में काम करने वाले हम लोग मौत की सजा के खात्मे की मांग करते रहे हैं, क्योंकि यह सजा देने के किसी मकसद को पूरा नहीं करती, और यह किसी अपराधी को अपराध करने से तो और भी कम रोकती है. बल्कि अंतरराष्ट्रीय आंकड़े इसकी ओर इशारा करते हैं कि मौत की सजा को खत्म कर चुके देशों में, मौत की सजा को कायम रखने वाले देशों के मुकाबले अपराध की दरें कहीं कम हैं.

    इस पर गौर करना आंखें खोल देने वाला होगा कि निर्भया के बाद के चार बरसों में खुद दिल्ली में ही बलात्कार के मामले तीन गुना बढ़ गए हैं.  एनसीआरबी आंकड़े बलात्कार के मामलों में अबाध इजाफे के रुझान को भी उजागर करते हैं. 2011 में कुल बलात्कारों की संख्या 24,206 से 2.97 फीसदी बढ़ कर 2012 में 24,923 हुई थी. लेकिन इसके बाद के साल में 35.24 फीसदी की भारी वृद्धि देखने को मिली जब यह 2013 में 33,707 हो गया और 2014 में यह 8.98 फीसदी के इजाफे के साथ 36,735 हो गया. सर्वोच्च अदालत द्वारा फांसी की सजा की तस्दीक करने के बाद चार दिनों के भीतर मीडिया में बलात्कार की तीन घटनाओं की खबरें आईं, जिनमें से एक रोहतक की घटना थी, जिसे निर्भया से भी कहीं अधिक क्रूर तरीके से अंजाम दिया गया था. मुक्त बाजार के कायदों ने जिस तरह के बहुआयामी संकट को जन्म दिया है, जिसके तहत युवाओं में जिंदगी को लेकर एक अनिश्चितता जुड़ी हुई है, यह उनके बीच अलगाव और हताशा को जन्म देती है जो बलात्कारों के रूप में सामने आता हुआ दिखाई देता है.

    इसका इलाज कानून के शासन को समान रूप से लागू करने में है. निर्भया का मामला इस बात की बेहतरीन मिसाल है कि मीडिया अपने कारोबारी हितों की भरपाई के लिए कैसे लोगों के बीच की घटिया प्रवृत्तियों को हवा देता है और उसके पीछे-पीछे सरकार (और न्यायपालिका) आखिरकार देश को मध्ययुगीन अंधेरी खाई में खींच कर ले जा रहे हैं.

    समयांतर जून 2017 में प्रकाशित

    भीम आर्मी को भाजपा ने नहीं, बसपा की करतूतों ने जन्म दिया है

    Wed, 31/05/2017 - 17:10

    आनंद तेलतुंबड़े उत्तर प्रदेश के सहारनपुर में भीम आर्मी के उभार के बारे में बता रहे हैं. अनुवाद: रेयाज उल हक

    मायावती ने सहारनपुर का दौरा करते हुए भीम आर्मी का नाम नहीं लिया, लेकिन 25 मई को उन्होंने लखनऊ में इसका जिक्र किया. उन्होंने अपने भाई आनंद कुमार का रिश्ता भीम आर्मी से जोड़ने वाली खुफिया रिपोर्ट को खारिज करते हुए इसे भाजपा द्वारा पैदा किया गया एक संगठन कहा, जिसका मकसद मायावती के असर को नाकाम करना है. उनकी दलील यह थी कि भीम आर्मी के नेता हिंसा में शामिल हैं, फिर भी उन्हें पुलिस गिरफ्तार नहीं कर रही है, जो भाजपा के साथ इस समूह के भीतरी समर्थन की ओर इशारा करता है.

    यह बदकिस्मती ही है कि बेहद संभावनाओं वाले इस संगठन को समर्थन देने के बजाए वे इसे दुश्मन के हाथ का एक औजार बता कर इसकी आलोचना कर रही हैं. इस संगठन के नौजवान उन जातिवादी गुंडों से सीधी टक्कर ले रहे हैं, जिनका मनोबल अपने सरपरस्त के राज्य का मुख्यमंत्री बन जाने से बढ़ा हुआ है. मायावती के पास अपने जन्म के उत्सवों के लिए दलितों की भारी गोलबंदी रहती रही है और वे आसानी से सहारनपुर में हुए अत्याचारों के खिलाफ लखनऊ में एक बड़ा प्रदर्शन आयोजित कर सकती थीं. लेकिन वे ऐसा नहीं करेंगी. चुनावों में शर्मनाक हार के बावजूद उन्हें यह बात समझ में नहीं आई है कि दलितों की जमीनी समस्याओं से उनका कभी भी कोई रिश्ता नहीं रहा है और उल्टे उन्होंने खोखले भावनात्मक मुद्दों के साथ दलितों को बेवकूफ ही बनाया है. ‘दलित की बेटी’ जैसी लफ्फाजियों से भ्रमित दलित यह कल्पना करने लगे थे कि बसपा की ताकत दलितों की ताकत है और खुशफहमी का यह जुनून दो दशकों तक जारी रहा. अब मुखर ब्राह्मणवादी ताकतों के उभार के साथ उनका सामना कठोर हकीकत से हुआ है और उनकी आंखें खुली हैं और उन्होंने अपनी सियासत को नए तरह से एक नई शक्ल देने की शुरुआत की है. भीम आर्मी इसी प्रक्रिया की अभिव्यक्ति है, यह सीधे-सीधे बसपा की अपनी करतूतों के नतीजे में पैदा हुई है.

    इससे इन्कार नहीं किया जा सकता कि बसपा ने जिस तरह मुख्यधारा की पार्टियों को उनके अपने ही खेल में मात दी वह एक ऐतिहासिक उपलब्धि थी और यह कांशीराम की रणनीतिक महारत से ऐसा कर पाई. हालांकि एक बार सत्ता में पहुंच कर यह सियासत के एक दूसरे रास्ते पर चलने की कोशिश कर सकती थी, जिससे इसकी पहचान गरीब और सताई हुई जनता के लिए काम करने वाली, उन्हीं की एक पार्टी के रूप में बनती. राजनीतिक सत्ता पाने के लिए जातीय गुना-भाग का खेल खेलना एक बात थी, और सत्ता से चिपके रहना एक बिल्कुल ही दूसरी बात. जैसा कि कांशीराम ने दावा किया था, राजनीतिक सत्ता हर समस्या का हल थी और मायावती को उसका इस्तेमाल कम से कम दलितों के सामने खड़ी सबसे बड़ी समस्याओं से निबटने में करना चाहिए था. हालांकि मायावती ने जान-बूझ कर इस मौके को गंवाया और इसके बजाए उन्होंने हर वह काम करने के लिए इसका इस्तेमाल किया, जो शासक पार्टियां कहीं अधिक धड़ल्ले से करती रही हैं. मिसाल के लिए वो बेजमीन परिवारों के लिए जमीन का वितरण करने का रेडिकल कदम उठा सकती थीं (उस दिखावटी कार्रवाई से आगे जाकर, जैसा करने का उन्होंने दावा किया था), दलितों के लिए शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं में बुनियादी बेहतरी ला सकती थीं (जिसको भीम सेना ने अपने मुख्य अभियान के रूप में उठाया है), और बेशक दलितों पर की जा रही जातीय अत्याचारों पर लगाम लगा सकती थीं. अगर उन्होंने इतना भी किया होता, तो लोगों के दिमाग में उनकी और बसपा की एक खास छवि बन गई होती कि यह गरीब-सताए गए लोगों की और उन्हीं लोगों के लिए काम करने वाली पार्टी है. यह कहा जा सकता है कि भारतीय राजनीतिक ऐसी नीतियों का आदी नहीं है. सिर्फ लोगों का भला करना इसकी गारंटी नहीं है कि वे आपको वोट भी करेंगे. अगर यह सही है, तब बसपा अपने जनाधार के बीच इस राजनीतिक व्यवस्था की नुकसानदेह संरचना को उजागर कर सकती थी और अपने समर्थकों को इसके खिलाफ गोलबंद कर सकती थी. लेकिन बसपा इनमें से किसी भी रास्ते पर नहीं चली और न आगे चलने वाली है. यह इतनी सारी पार्टियों में एक और पार्टी है, जो उसी व्यवस्था को वैधता दिलाती है, जो दलितों के उत्पीड़न का साकार रूप है.

    मायावती ने जाटव-चमारों के अपने मुख्य जनाधार पर भी गौर नहीं किया और उन्हें महज अपने बंधुआ के रूप में लेती रहीं. दलितों पर अत्याचारों के मामले में उत्तर प्रदेश की अपनी खास जगह बनी हुई है. इस पर चर्चा करते हुए मुख्यमंत्री के रूप में उनके पहले दोनों कार्यकालों को हम छोड़ सकते हैं, क्योंकि वे जून 1995 से अक्तूबर 1995 और मार्च 1997 से सितंबर 1997 तक बहुत थोड़े समय के लिए सत्ता में रही थीं. लेकिन मई 2002 से अगस्त 2003 तक और मई 2007 से मार्च 2012 तक के उनके बाद के दोनों कार्यकालों ने उन्हें एक दलित पार्टी के रूप में खुद को पेश करने का भरपूर मौका मुहैया कराया था, खास कर अपने अंतिम कार्यकाल में जब उनके पास विधानसभा में पूरा बहुमत था. एनसीआरबी के आंकड़ों को देखें तो राज्य में 2002 और 2003 में कुल अत्याचारों की संख्या क्रमश: 7927 और 2821 थी, जो बढ़ कर 2004 में 3785, 2005 में 4397 और 2006 में 4960 हो गई. यह वो वक्त था जब वे सत्ता से बाहर थीं और यह बसपा की राजनीति की वजह से दलितों पर होने वाली बदले की कार्रवाइयों और उनकी राजनीतिक असुरक्षा को दिखाता है. उनके आखिरी कार्यकाल के दौरान छह वर्षों (2007 से 2012 तक) के अत्याचारों के आंकड़े क्रमश: ये हैं: 6144, 8009, 7522, 6222, 7702 और 6202. इनमें हमें इनके पहले के तीन सालों के मुकाबले न सिर्फ अहम इजाफा देखने को मिलता है (औसतन 4381 से 6967), बल्कि हम यह भी देखते हैं कि अत्याचार एक ऊंची दर पर आ गए और उनकी दर ऊंची ही बनी रही. बेशक, जब सत्ता मायावती के हाथ से चली गई तो ये आंकड़े और भी बढ़ कर 2013, 2014 और 2015 में क्रमश: 7078, 8075 और 8358 हो गए. यह उनके मुख्य जनाधार दलितों की बदतर होती हालत की निशानी है. अत्याचारों के आंकड़ों में इजाफा सीधे सीधे उनकी ‘सर्वजन’ रणनीति से निकली राजनीतिक करतब का नतीजा है. आखिरकार 2007 में उनकी शानदार कामयाबी की वजह यही थी, जिसका प्रतिनिधित्व उनके इस भड़कीले नारे में दिखता है: ‘हाथी नहीं, गणेश हैं, ब्रह्मा विष्णु महेश हैं’.

    बसपा की ब्राह्मणवाद-विरोधी लफ्फाजियों पर चलने वाले दलित इस कलाबाजी से बेचैन तो हुए लेकिन वे जिस सत्ता को हासिल करने के लिए बेकरार थे, उसे मिलने की संभावना में उन्होंने बसपा को वोट दिया. लेकिन जब बसपा ने संतुलन साधने के लिए दलितों की अनदेखी करनी शुरू की, तब वे इसकी कठोर हकीकत से रू ब रू हुए. अब 2012 से, जब बसपा ने अपनी सत्ता गंवाई, ऊंची जातियों के पलटवार के साथ, और खास कर मार्च 2017 से, जब एक युद्धोन्मादी हिंदुत्व कट्टरपंथी राज्य का मुख्यमंत्री बना, दलितों की प्रतिक्रिया स्वाभाविक ही थी. भीम आर्मी बस इसी की अभिव्यक्ति है और इसे बसपा की राजनीति का एक स्वाभाविक सह-उत्पाद माना जाना चाहिए.

    भीम आर्मी के उभार की तुलना 1972 में महाराष्ट्र में दलित पैंथर्स से की जा सकती है, जो तब की रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया (आरपीआई) की दिवालिया राजनीति के नतीजे में पैदा हुई थी. हालांकि दोनों के बीच में कुछ फर्क है. दलित पैंथर्स के उलट, भीम आर्मी महज जुझारू और आक्रामक शोरशराबे और नारेबाजी तक सीमित नहीं है. बल्कि खबरों के मुताबिक इसके नेताओं चंद्रशेखर आजाद और विनय रत्न सिंह ने 2015 में भीम आर्मी एकता मिशन की स्थापना की थी, जिसका रचनात्मक मकसद दलित बच्चों को मुफ्त शिक्षा मुहैया कराना है. भीम आर्मी सहारनपुर और इसके आसपास 300 से ज्यादा स्कूल चला रहा है. निश्चित रूप से भीम आर्मी के नेताओं ने मायावती की शैली की राजनीति के साथ अपने मोहभंग की बात की है, लेकिन साथ ही उन्होंने सार्वजनिक रूप से कांशीराम के नाम से शपथ भी ली है. चंद्रशेखर आजाद ने अपने लिए रावण की उपाधि रखी है, जिसमें भाजपा के राम के सांस्कृतिक जवाब की झलक मिलती है.

    मौजूदा तौर पर जो दिखाई दे रहा है उसके मुताबिक भीम आर्मी की जड़ें असल में बसपा के अंदाज वाली पहचान की राजनीति की रूढ़ छवियों में ही धंसी नजर आती हैं. लेकिन जिस तरह सहारनपुर में उन्होंने जातिवादी गुंडों के साथ टक्कर ली है, अपने आप में यही तथ्य इस बात की पूरी संभावना को जाहिर कर देता है कि वे इससे आगे जाएंगे और दलितों की मुक्ति की एक नई राजनीति पेश करेंगे. रावण और उनके साथियों को इस चुनौती के लिए तैयार रहना होगा.

    लेखक विषय संवाद साभार अनुवादक

    पहले वो आए साम्यवादियों के लिए

    और मैं चुप रहा क्योंकि मैं साम्यवादी नहीं था

     

    फिर वो आए मजदूर संघियों के लिए

    और मैं चुप रहा क्योंकि मैं मजदूर संघी नहीं था

     

    फिर वो यहूदियों के लिए आए

    और मैं चुप रहा क्योंकि मैं यहूदी नहीं था

     

    फिर वो आए मेरे लिए

    और तब तक बोलने के लिए कोई बचा ही नहीं था

     

    मार्टिन नीमोलर (1892-1984)