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सोनिया गांधी ने कांग्रेस को दलदल से निकाला था , देखें राहुल क्या करते हैं .

जंतर-मंतर - Sun, 17/12/2017 - 07:14


शेष नारायण सिंह
राहुल गांधी को कांग्रेस अध्यक्ष पद की कुर्सी औपचारिक रूप से सम्भलवाकर सोनिया गांधी ने राजनीति से वानप्रस्थ की घोषणा की . वे कांग्रेस की राजनीति के शीर्ष तक पंहुची . इसके पीछे कारण यह था कि वे इंदिरा गांधी के बड़े बेटे की पत्नी थीं . सोनिया गांधी जब कांग्रेस की अध्यक्ष बनीं और जिस तरह से बनीं ,वह कांग्रेस पार्टी के चापलूसी की परम्परा का एक प्रतिनिधि नमूना  है . संसद भवन के दो-तीन किलोमीटर के दायरे में देश के सर्वोच्च चापलूस हमेशा से ही विराजते रहे हैं . सत्ता चाहे जिसकी हो ये लोग उसके करीबी आटोमेटिक रूट से हो जाते हैं . सोनिया गांधी को भी इन्हीं चापलूसों ने ही कांग्रेस अध्यक्ष पद पर आसीन किया था . लेकिन जिस तरह से उन्होंने खंड खंड होती कांग्रेस को फिर से केंद्रीय सत्ता के केंद्र में स्थापित करने का माहौल बनाया उससे लग गया कि वे संगठन के फन की माहिर हैं . सत्ता से पैदल कांग्रेस को अटल बिहारी वाजपेयी को हराने वाली पार्टी बना कर उन्होंने साबित कर दिया कि वे एक सक्षम नेता हैं . उन्होंने देश के गवर्नेंस माडल में बहुत सारे बदलाव किये . सूचना का अधिकार एक ऐसा हथियार है जो देश की ज़िम्मेदार राजनीति में हमेशा सम्मान से याद किया जाएगा . गड़बड़ तब शुरू हुई जब राहुल गांधी ने अपनी तरह के लोगों को कांग्रेस के केंद्र में घुसाना शुरू कर दिया .नतीजा यह हुआ कि तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह की अथारिटी धूमिल होना शुरू हो गयी . और कांग्रेस फिर पतन के रास्ते पर चल पड़ी . राहुल गांधी उस दौर में सी पी जोशी और मधुसूदन मिस्त्री नाम के लोगों पर बहुत ज़्यादा भरोसा करने लगे . सी पी  जोशी की एक उपलब्धि यह है कि वे विधान सभा का चुनाव एक  वोट से हारे थे और मधुसूदन मिस्त्री की सबसे बड़ी उपलब्धी यह है कि वे वडोदरा से कांग्रेस उम्मीदवार के रूप में अपने विरोधी उम्मीदवार नरेंद्र मोदी का पोस्टर फाड़ने बिजली के खम्बे पर चढ़े थे . राहुल की अगुवाई में यह उत्तर प्रदेश की राजनीति के इंतज़ाम के कर्ता  धर्ता बनाये गए थे . राहुल गांधी ने कांग्रेस को .ऐसे लोगों के हवाले कर दिया जिनकी राजनीति में समझ न के बराबर थी . नतीजा सामने है. कांग्रेस उत्तर प्रदेश में शून्य के आस पास पंहुच चुकी है .
अब राहुल गांधी कांग्रेस अध्यक्ष हैं .नई दिल्ली की राजनीति के बारे में रिपोर्ट करने वालों को मालूम है कि किस तरह से राहुल गांधी २०११ के बाद सोनिया गांधी के ज़्यादातर फैसलों को पलट दिया करते थे. नई दिल्ली के प्रेस क्लब में एक अध्यादेश के कागजों को फाड़ते हुए राहुल गांधी को जिन लोगों ने देखा है उनको मालूम है कि यू पी ए -२ के समय राहुल गांधी मनमानी पर आमादा रहते थे . प्रियंका गांधी को २०१४ में प्रचार करने से रोकने के पीछे भी यही उनकी अपनी असुरक्षा काम कर रही थी . उनको यह मुगालता भी रहता था की सभी कांग्रेसी उनके  दास हैं .लेकिन अब तस्वीर बदल चुकी है . गुजरात चुनाव के दौरान  उन्होंने सभ्य आचरण  किया था और अब दुनिया जानती है कि राहुल  गांधी बदल गए हैं .
उन लोगों की बात से  भी सहमत नहीं हुआ जा सकता  जो कहते रहते हैं कि कांग्रेस की राजनीति में वंशवाद की शुरुआत जवाहरलाल  नेहरू ने की थी . उन्होंने तो इंदिरा गांधी को कभी चुनाव तक नहीं लड़ने दिया था . नई दिल्ली में विराजने वाले चापलूसों ने ही उनको शास्त्रीजी के मंत्रिमंडल में शामिल करवा दिया था . इंदिरा गाधी को  संसद की राज्यसभा का सदस्य बनने का मौक़ा भी शास्त्री जी   ने दिया , नेहरू ने नहीं . हाँ इंदिरा गांधी ने बाकायदा वंशवाद की  स्थापना की . कांग्रेस की मूल मान्यताओं को इंदिरा गांधी ने ही धीरे धीरे दफ़न किया .इमरजेंसी में तानाशाही निजाम कायम करके इंदिरा गाँधी ने अपने एक बेरोजगार बेटे को सत्ता थमाने की कोशिश की थी . वह लड़का भी क्या था. दिल्ली में कुछ लफंगा टाइप लोगों से उसने दोस्ती कर रखी थी और इंदिरा गाँधी के शासन काल के में वह पूरी तरह से मनमानी कर रहा था . इमरजेंसी लागू होने के बाद तो वह और भी बेकाबू हो गया . कुछ चापलूस टाइप नेताओं और अफसरों को काबू में करके उसने पूरे देश में मनमानी का राज कायम कर रखा था. इमरजेंसी लगने के पहले तक आमतौर पर माना जाता था कि कांग्रेस पार्टी मुसलमानों और दलितों की भलाई के लिए काम करती थी .हालांकि यह सच्चाई नहीं थी क्योंकि इन वर्गों को बेवक़ूफ़ बनाकर सत्ता में बने रहने का यह एक बहाना मात्र था . इमरजेंसी में दलितों और मुसलमानों के प्रति कांग्रेस का असली रुख सामने आ गया . दोनों ही वर्गों पर खूब अत्याचार हुए . देहरादून के दून स्कूल में कुछ साल बिता चुके इंदिरा गाँधी के उसी बिगडैल बेटे ने पुराने राजा महराजाओं के बेटों को कांग्रेस की मुख्य धारा में ला दिया था जिसकी वजह से कांग्रेस का पुराना स्वरुप पूरी तरह से बदल दिया गया था . अब कांग्रेस ऐलानियाँ सामंतों और उच्च वर्गों की पार्टी बन चुकी थी. ऐसी हालत में दलितों और मुसलमानों ने उत्तर भारत में कांग्रेस से किनारा कर लिया . नतीजा दुनिया जानती है . कांग्रेस उत्तर भारत में पूरी तरह से हार गयी और केंद्र में पहली बार गैरकांग्रेसी सरकार स्थापित हुई संजय गांधी की मृत्यु के बाद भी इंदिरा गांधी ने अपने बड़े बेटे को राजनीति में  स्थापित करना शुरू किया .वह भी वंशवाद था . उनकी अकाल मृत्य के बाद फिर कुछ ऐसे लोगों  ने जो सत्ता   का आनंद लेना चाहते  थे उन्होंने राजीव गांधी को प्रधानमंत्री बनवा दिया . उनके भी  दून स्कूल टाइप  लोग ही दोस्त थे . मणिशंकर अय्यर उसी   वर्ग के नेता हैं . राजीव गांधी भी अपने संभ्रांत साथियों के भारी प्रभाव में रहते थे. मुख्यमंत्रियों को इस तरह से हटाते थे जैसे  बड़े लोग कोई अस्थाई नौकर को हटाते हैं .. उनके काल में भी दिल्ली की  संभ्रांत बस्तियों  में विराजने वाले लोगों  ने खूब माल काटा . लेकिन १९८९ में सत्ता से बेदखल होने के बाद वे काफी परिपक्व हो गए थे  लेकिन अकाल मृत्यु ने उनको भी काम नहीं करने दिया .सोनिया गांधी ने विपरीत परिस्थितियों में कांग्रेस का नेतृत्व सम्भाला और सत्ता दिलवाई . इसलिए सोनिया गांधी की  इज्ज़त एक राजनेता के रूप में की जा सकती है . अब राहुल गांधी को चार्ज दिया गया है . देखना दिलचस्प होगा कि वे कैसे अपनी दादी द्वारा स्थापित की गयी कांग्रेस को आगे बढाते हैं . इस कांग्रेस को महात्मा गांधी या जवाहरलाल नेहरू या सरदार पटेल या  की कांग्रेस मानना ठीक नहीं होगा क्योंकि उस कांग्रेस को तो इंदिरा गांधी ने १९६९ में ख़त्म करके इंदिरा   कांग्रेस की स्थापना कर दी थी.  मौजूदा कांग्रेस उसी इंदिरा  कांग्रेस की वारिस है . और राहुल गांधी उसी कांग्रेस के अध्यक्ष हैं .

गुजरात के नतीजे राहुल और मोदी की भावी राजनीति की दिशा तय करेंगे .

जंतर-मंतर - Sun, 17/12/2017 - 07:14


शेष नारायण सिंह . 
गुजरात का विधान सभा चुनाव बहुत ही महत्वपूर्ण राजनीतिक घटना हो गया है . १८ दिसंबर को जब नतीजे आयेंगे तो दोनों बड़ी पार्टियों के बड़े नेताओं के लिए बहुत ही अहम राजनीतिक भविष्य की भूमिका लिखेंगे . अगर प्रधानमंत्री  नरेंद्र मोदी की पार्टी चुनाव जीत  गयी तो आने वाले  लोकसभा चुनाव में २०१९ में वे  देश की राजनीति के निर्विवाद नेता बन जायेंगे . और अगर राहुल गांधी की पार्टी सरकार बनाने लायक बहुमत लाती  है तो भारत के राजनीतिक क्षितिज में राहुल गांधी एक गंभीर नेता के रूप में स्थापित हो जायेंगे.  उनके लिए यह बहुत ही महत्वपूर्ण मौक़ा है जब वे राजनीतिक रूप से अपने आपको स्थापित करने की बात सोच सकते हैं . अगर उनकी पार्टी गुजरात में सरकार  बनाने लायक  संख्या में सीटें जीत सकती है तो अगले साल होने वाले मध्य प्रदेश, छतीसगढ़ और राजस्थान के चुनावों में कांग्रेस की  जीत की संभावना बढ़ जायेगी  लेकिन अगर हार गए तो राहुल गांधी की उसी छवि की वापसी होगी जो उन्होंने २०१४ के चुनाव में  कांग्रेस  की पराजय के बाद  अर्जित की थी. राहुल गांधी की दादी, इंदिरा गांधी की राजनीति में भी यह मुकाम आया था  .  कांग्रेस की खासी दुर्दशा १९६७ के आम चुनावों में हो चुकी थी. उत्तर भारत के  ज्यादातर राज्यों में गैर कांग्रेसी सरकारें बन  गयी थीं. जिस तरह से आजकल बीजेपी के नेता राहुल गांधी को एक अगंभीर किस्म के नेता के रूप में स्थापित करने का प्रयास करते रहते हैं , उसी तरह  १९६७ के चुनावों में पंजाब से लेकर बंगाल तक कांग्रेस की हार के बाद कांग्रेस के अन्दर ही मौजूद   सिंडिकेट के नेता इंदिरा गांधी को  मामूली नेता साबित करने का प्रयास कर रहे थे. शास्त्री जी की मृत्यु के बाद १९६६ में इंदिरा गांधी को सिंडिकेट के प्रधान मंत्री तो बनवा दिया था लेकिन उनको अपने  प्रभाव के अन्दर ही काम करने को मजबूर करते रहते थे. विपक्ष ने भी  गैरकांग्रेसवाद की राजनीति के ज़रिये  कांग्रेस की स्थापित सत्ता को चुनौती देने का पूरा इंतज़ाम कर लिया था. १९६७ के चुनावों में  गैर कांग्रेसवाद को आंशिक सफलता मिल गयी थी . कई राज्यों में कांग्रेस की  सरकारें नहीं बनी थीं और कांग्रेस  विपक्षी पार्टी हो गयी थी. हालांकि केंद्र में कांग्रेस की सरकार थी लेकिन वह भी नेहरू युग की बहुमत वाली नहीं , काम चलाऊ बहुमत वाली सरकार थी . गैरकांग्रेसवाद की सफलता इंदिरा गांधी के  राजनीतिक अस्तित्व को चुनौती दे रही थी.गैरकांग्रेसवाद को समझने के लिए इतिहास की शरण में जाना पड़ेगा क्योंकि ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को समझे बिना भारत की राजनीति के इस महत्वपूर्ण अध्याय को समझना असंभव है .  कांग्रेस पार्टी कैसे  एक ऐसी राजनीतिक शक्ति बनी जो भारतीय जनता की अधिकतम भावनाओं की प्रतिनिधि और वाहक बनी और वही कांग्रेस १९६७ आते आते देश की बड़ी आबादी की नज़र में गिर गयी और कैसे इंदिरा गांधी  महात्मा गांधी और जवाहरलाल नेहरू की कांग्रेस को ख़त्म करके एक नई कांग्रेस को शक्ल  देने में कामयाब हुईं,यह इतिहास के पन्नों में साफ़ साफ़ अंकित है .
महात्मा के कांग्रेस की राजनीति में १९१६ में सक्रिय होने और अग्रणी भूमिका के पहले  कांग्रेस की पहचान एक ऐसे  संगठन के रूप में  होती थी  जो बंबई और कलकत्ता के कुछ वकीलों की अगुवाई में  अंग्रेजों के अधीन रहते हुए डोमिनियन स्टेटस टाइप कुछ  अधिकारों की बात करता था . लेकिन महात्मा गांधी के नेतृत्व में आधुनिक भारत की स्थापना और अंग्रेजों से राजनीतिक स्वतंत्रता की जो लड़ाई लड़ी गयी उसने कांग्रेस को एक जनसंगठन बना दिया .१९१६ में चंपारण में जो  प्रयोग हुआ वह १९२०  में एक बहुत बड़े आन्दोलन के रूप में बदल गया.  १९२० में आज़ादी की इच्छा रखने वाला हर भारतवासी महात्मा गांधी के साथ था, केवल अंग्रेजों के कुछ खास लोग उनके खिलाफ थे .आज़ादी  की लड़ाई में एक ऐतिहासिक मुकाम तब आया जब चौरीचौरा की हिंसक घटना के बाद महात्मा गांधी ने आंदोलन वापस ले लिया . उस वक़्त के ज्यादातर  बड़े नेताओं  ने महात्मा गांधी से आन्दोलन जारी रखने का आग्रह किया लेकिन महात्माजी ने साफ़ कह दिया कि भारतीयों की सबसे बड़ी ताक़त अहिंसा थी .  सच भी है कि अगर हिंसक  रास्ते अपनाए जाते तो अंग्रेजों ने तो़प खोल दिया होता और जनता की  महत्वाकांक्षाओं की वही दुर्दशा होती जो १८५७ में हुई थी. १९२९ और १९३० में जब जवाहरलाल नेहरू को कांग्रेस अध्यक्ष बनाया गया तो लाहौर की कांग्रेस में पूर्ण स्वराज का नारा दिया गया . ११९३० के दशक में भारत में जो राजनीतिक परिवर्तन हुए वे किसी भी देश के लिए पूरा इतिहास हो सकते हैं . गवर्नमेंट आफ इन्डिया एक्ट १९३५ के  बाद की अंग्रेज़ी साजिशों का सारा पर्दाफाश   हुआ. १९३७ में लखनऊ में  हुए मुस्लिम  लीग के सम्मेलन में मुहम्मद अली जिन्ना ने अंग्रेजों की शह पर द्विराष्ट्र सिद्धांत का प्रतिपादन किया .बाकी देश में  तुरंत से ही उसका विरोध शुरू हो गया . उस वक़्त के मज़बूत संगठन ,हिंदू महासभा के  राष्ट्रीय अध्यक्ष विनायक दामोदर सावरकार ने भी अहमदाबाद में हुए अपने वार्षिक अधिवेशन में द्विराष्ट्र सिद्धांत का नारा दे दिया  लेकिन  उसी साल हुए चुनावों में इस सिद्धांत की धज्जियां उड़ गयीं  क्योंकि  जनता ने सन्देश दे दिया था कि भारत एक है और वहाँ दो राष्ट्र वाले  सिद्धांत के लिए कोई जगह  नहीं है . मुस्लिम लीग और हिंदू महासभा को चुनावों में  जनता ने नकार दिया  . कांग्रेस के अंदर जो समाजवादी रुझान शुरू हुई और कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के ज़रिये आतंरिक लोकतंत्र को और मजबूती देने की जो कोशिश की गयी उसको  समाजवादी नेताओं ने भी ताकत  दी.  आचार्य नरेंद्र देव और डॉ राम मनोहर लोहिया भी कांग्रेस के सदस्य के रूप में इस अभियान में योगदान किया ...बाद में इन्हीं समाजवादियों ने कांग्रेस के विरोध में सबसे मुखर स्वर का नेतृत्व भी किया जब साफ़ हो गया कि आज़ादी के बाद गांधी का  रास्ता भूल कर कांग्रेस  की राजनीति फेबियन सोशलिज्म की तरफ बढ़  रही है .  भारतीय राजनीति में  कांग्रेस के विकल्प को तलाशने की गंभीर  कोशिश तब शुरू हुई . जब डॉ  राम मनोहर लोहिया ने गैर कांग्रेसवाद की अपनी राजनीतिक सोच को अमली जामा पहनाया .विपक्ष के तीन बड़े नेताओं ने उत्तर प्रदेश के फर्रुखाबाद,अमरोहा  और जौनपुर में १९६३ में हुए लोकसभा के उपचुनावों में हिस्सा लिया . संसोपा के डॉ लोहिया  फर्रुखाबाद ,प्रसोपा के आचार्य जे बी कृपलानी अमरोहा और जनसंघ के दीनदयाल उपाध्याय जौनपुर से गैर कांग्रेसवाद के उम्मीदवार बने . इसी प्रयोग के बाद  गैरकांग्रेसवाद ने एक शकल हासिल की और १९६७ में हुए आम चुनावों में अमृतसर से कोलकता तक के  इलाके में वह कांग्रेस चुनाव हार गयी जिसे जवाहर लाल  नेहरू के जीवनकाल में अजेय माना जाता रहा था . १९६७ में संविद सरकारों का जो प्रयोग हुआ उसे शासन  पद्धति का को बहुत बड़ा उदाहरण तो नहीं माना जा सकता लेकिन यह पक्का है कि उसके बाद से ही यह बात आम  जहनियत का हिस्सा बन गयी कि कांग्रेस को सत्ता से बेदखल किया जा सकता है .इस समय देश की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी थीं.  
गैर कांग्रेसवाद की आंशिक सफलता के बाद इंदिरा गांधी की अथारिटी को चुनौती  मिलना शुरू ही गयी थी .  कांग्रेस के बाहर से  तो हमला हो ही रहा था अंदर से भी उनको ज़बरदस्त विरोध का सामना करना पड़ रहा था.   इंदिरा गांधी ने हालात की चुनौती को स्वीकार किया और  १९६९ में कांग्रेस को तोड़ दिया . कांग्रेस के पुराने नेता मूल कांग्रेस में बचे रहे , पार्टी  का चुनाव निशान , दो बैलों की जोड़ी ज़ब्त हो गया , इंदिरा कांग्रेस का जन्म हुआ जिसकी एकछत्र  नेता के  रूप में इंदिरा गांधी ने अपनी नई राजनीति की फिर से स्शुरुआत की . प्रधानमंत्री के रूप में उन्होंने लोकसभा को भंग करने की सिफारिश की , समय से पहले चुनाव करवाया ., बैंकों का राष्ट्रीयकरण , प्रिवी पर्स की समाप्ति  और गरीबी हटाओं के वामपंथी रुझान के नारों के साथ १९७१ के चुनाव में भारी बहुमत हासिल किया . उनके विरोधी राजनीतिक रूप से  बहुत कमज़ोर हो   गए. कांग्रेस के अंदर  और बाहर वे एक मज़बूत नेता के  रूप में सामने आईं. १९७१ का चुनाव उनके राजनीतिक भविष्य की भूमिका बन  गया . दोबारा  भी इंदिरा  गांधी पर राजनीतिक संकट तब आया जब १९७७ में उनकी पार्टी  बुरी तरह से चुनाव  हार गयी . उसके बाद उन्होंने उत्तर प्रदेश के आज़मगढ़  में हुए उपचुनाव में मोहसिना किदवई को उमीदवार बनाया और उत्तर प्रदेश में  , जहां उनकी पार्टी शून्य पर पंहुच गयी थी ,लोकसभा में एक सीट पर कांग्रेस का क़ब्ज़ा हुआ . उसके बाद से कांग्रेस की नेता के रूप में दोबारा उन्होंने अपना मुकाम सुनिश्चित किया . एक चुनाव के नतीजों से  किसी नेता का भविष्य बन बिगड़ सकता है . गुजरात विधान सभा का चुनाव राहुल गांधी के लिए ऐसा ही चुनाव है यदि इस चुनाव में वे सफल होते हैं तो कांग्रेस के उन नेताओं से वे पिंड छुड़ा सकेंगें जो राजीव गांधी और सोनिया गांधी के कृपा पात्र रहे थे और अब पार्टी की केंद्रीय सत्ता पर कुण्डली मार कर बैठे हुए हैं. दस साल की डॉ मनमोहंन  सिंह के सत्ता के दौरान इन लोगों ने अपने चेला उद्योगपतियों और भ्रष्ट नेताओं के लिए जो चाहा करवाया और आज अपनी पार्टी को ऐसे  मुकाम पर ला चुके हैं जहां वह  मजाक का विषय बन चुकी है . इस चुनाव में जीत का मतलब यह होगा कि वे अपने साथ ऐसे लोगों को ले सकेंगें जिनके सहारे जनता को साथ लिया जा सकता है. गुजरात चुनाव में कांग्रेस के परंपरागत नेताओं में अशोक गहलौत और भरत सिंह सोलंकी के  अलावा  किसी की ख़ास  भूमिका  नहीं रही है . ज़ाहिर है गुजरात के अपने नए साथियों, हार्दिक पटेल,अल्पेश ठाकोर और जिग्नेश मेवानी की भूमिका को भी ध्यान में रखकर ही कोई काम करना होगा  .अब उनके पास अपनी पार्टी को नए हिसाब से चलाने का वैसा ही मौक़ा होगा जो  जो इंदिरा गांधी को १९६९ में मिला था जब नेहरू युग के पुराने नेताओं ने अपना कांग्रेस संगठन बना लिया था और कांग्रेस से इंदिरा गांधी को निकाल दिया था . लेकिन उनके पास  सरकार थी और वे खुद प्रधानमंत्री थीं. उनके साथ लोग जुड़ते चले गए और इंदिरा  कांग्रेस का जन्म हो गया . अगर गुजरात में राहुल गांधी सरकार बनवाने में कामयाब हो जाते हैं तो उनके  पास यह अवसर होगा .यह तो जीत की स्थिति का आकलन है . लेकिन अगर उनकी सरकार  नहीं बनी तो उनकी भावी राजीति पर बहुत ही भारी भरकम सवाल पैदा हो जायेगें . उनका राजनीतिक भविष्य क्या होगा उसका आकलन करना संभव नहीं है क्योंकि  उस तरह की कोई नजीर नहीं है .यही बात प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बारे में भी सच है . अगर वे गुजरात चुनाव जीत गए तो देश की राजनीति में बहुत ही भारी राजनीतिक हैसियत के मालिक हो जायेगें . पहले से ही भारी उनकी मौजूदा ताकत में  वृद्धि होगी  लेकिन अगर गुजरात में उनकी इतनी मेहनत के बाद  भी सत्ता बीजेपी के हाथ से छिटक गयी तो नरेंद्र मोदी की आगे की  राह मुश्किल हो जायेगी  . दिल्ली में जो लोग उनके गुणगान करते नहीं आघाते वे उनके व्यक्तित्व का विश्लेषण करते नज़र आयेगें .जाहिर है इस काम के बाद उनकी सत्ता कमज़ोर होगी . जो भीहो लेकिन एक बात  तय है कि गुजरात चुनाव देश की दोनों ही  बड़ी पार्टियों के वर्तमान शीर्ष नेताओं की राजनीति की भावी दिशा में बहुत ही अहम भूमिका निभाने जा रहा है .

शशि कपूर का सबसे बड़ा शाहकार -मुंबई का पृथ्वी थिएटर

जंतर-मंतर - Sun, 17/12/2017 - 07:12


शेष नारायण सिंह
पृथ्वी थियेटर ,मुंबई महानगर के उपनगर , जुहू में एक ऐसा मुकाम है जहां बहुत सारे लोगों ने अपने सपनों को रंग दिया है .यह थियेटर अपने पिता स्व पृथ्वीराज कपूर की याद में शशि कपूर और उनकी पत्नी जेनिफर कपूर से बनवाया था. शशि कपूर अपने परिवार में एक अलग तरह के इंसान थे .उनकी मृत्यु की खबर सुनकर उनके गैरफिल्मी काम की याद आ गयी जो दुनिया भर में नाटक की राजधानी के रूप में जाना जाता है .हमारी और हमारी पहले की पीढ़ी के ज़्यादातर लोग अकबर का वही तसव्वुर करते हैं जो के. आसिफ की फिल्म ‘मुगले-आज़म ‘ में दिखाया गया है . बहुत ही भारी भरकम आवाज़ में भारत के शहंशाह मुहम्मद जलालुद्दीन अकबर के डायलाग हमने सुने हैं . अकबर का नाम आते ही उन लोगों के सामने तस्वीर घूम जाती है जिसमें मुगले आज़म की भूमिका में पृथ्वीराज कपूर को देखा गया है .
पृथ्वीराज कपूर अपने ज़माने के बहुत बड़े अभिनेता थे. उन्हीं की याद में उनके बच्चों ने पृथ्वी थियेटर की इमारत की स्थापना की . पृथ्वीराज कपूर का 'पृथ्वी थियेटर शहर शहर घूमा कारता था. उसी सिलसिले में उनके सबसे छोटे पुत्र ,शशि कपूर की मुलाक़ात ,जेनिफर केंडल से कलकत्ता में हुई थी .पृथ्वीराज कपूर की इच्छा थी कि पृथ्वी थियेटर को एक स्थायी पता दिया जा सके. इस उद्देश्य से उन्होंने १९६२ में ही ज़मीन का इंतज़ाम कर लिया था लेकिन बिल्डिंग बनवा नहीं पाए. १९७२ में उनकी मृत्यु हो गयी .ज़मीन की लीज़ खत्म हो गयी .उनके बेटे शशि कपूर और जेनिफर केंडल लीज क नवीकरण करवाया और आज पृथ्वी थियेटर पृथ्वीराज कपूर के सम्मान के हिसाब से ही जाना जाता है . श्री पृथ्वीराज कपूर मेमोरियल ट्रस्ट एंड रिसर्च फाउन्डेशन नाम की संस्था इसका संचालन करती है . इसके मुख्य ट्रस्ट्री शशि कपूर थे और उनके बच्चे इसका संचालन करते हैं. आज मुंबई के सांस्कृतिक कैलेण्डर में पृथ्वी थियेटर का स्थान बहुत बड़ा है .जब १९७८ में जेनिफर केंडल और उनके पति , हिंदी फिल्मों के नामी अभिनेता शशि कपूर ने इस जगह पर पृथ्वी का काम शुरू किया तो इसका घोषित उद्देश्य हिंदी नाटकों को एक मुकाम देना था .लेकिन अब अंग्रेज़ी नाटक भी यहाँ होते हैं .जेनिफर केंडल खुद एक बहुत बड़ी अदाकारा थीं और अपने पिता की नाटक कंपनी शेक्स्पीयाराना में काम करती थीं. पृथ्वीराज कपूर ने पृथ्वी थियेटर की स्थापना १९४४ में कर ली थी. सिनेमा की अपनी कमाई को वे पृथ्वी थियेटर के नाटकों में लगाते थे . अपने ज़माने में उन्होंने बहुत ही नामी नाटकों की प्रस्तुति की .शकुंतला ,गद्दार, आहुति, किसान, कलाकार कुछ ऐसे नाटक हैं जिनका हिंदी/उर्दू नाटकों के विकास में इतिहास में अहम योगदान है और इन सबको पृथ्वीराज कपूर ने ही प्रस्तुत किया था .थियेटर के प्रति उनके प्रेम को ध्यान में रख कर ही उनके बेटे और पुत्रवधू ने इस संस्थान को स्थापित किया था . मौजूदा पृथ्वी थियेटर का उदघाटन १९७८ में किया गया . पृथ्वी के मंच पर पहला नाटक “ उध्वस्त धर्मशाला “ खेला गया जिसको महान नाटककार ,शिक्षक और बुद्दिजीवी जी पी देशपांडे ने लिखा था . नाटक की दुनिया के बहुत बड़े अभिनेताओं , नसीरुद्दीन शाह और ओम पूरी ने इसमें अभिनय किया था . इन दोनों को मैं महान कलाकार मानता हूँ .पृथ्वी से मेरे निजी लगाव का भी यही कारण है .अब तो खैर जब भी मुंबई आता हूँ यहाँ चला ही जाता हूँ क्योंकि यह मेरे बच्चों के घर के बहुत पास है .पृथ्वी की इस इस इमारत का दूसरा नाटक था बकरी , सर्वेश्वर दयाल सक्सेना के इस नाटक को इप्टा की ओर से एम एस सथ्यू ने निर्देशित किया था .यह वह समय है जबकि मुंबई की नाटक की दुनिया में हिंदी नाटकों की कोई औकात नहीं थी लेकिन पृथ्वी ने एक मुकाम दे दिया और आज अपने सपनों को एक शक्ल देने के लिए मुंबई आने वाले बहुत सारे संघर्षशील कलाकार यहाँ दिख जाते हैं .पृथ्वी के पहले मुंबई में अंग्रेज़ी, मराठी और गुजराती नाटकों का बोलबाला हुआ करता था लेकिन पृथ्वी थियेटर की स्थापना के करीब वर्षों में बहुत कुछ बदल गया है . अब हिंदी के नाटकों की अपनी एक पहचान है और मुंबई के हर इलाके में आयोजित होते है .इस सब में स्व शशि कपूर, उनकी पत्नी जेनिफर केंडल और उनकी बेटी संजना कपूर का बड़ा योगदान है 

जाति एक शिकंजा है ,तरक्की के लिए इसका विनाश ज़रूरी है.

जंतर-मंतर - Sun, 17/12/2017 - 07:11


शेष नारायण सिंह

डा.अंबेडकर के  निर्वाण को साठ साल से ऊपर हो गए .इस मौके पर उनको  हर साल याद किया जाता  है , इस साल भी किया जाएगा. इस अवसर पर ज़रूरी है कि उनकी सोच और दर्शन के सबसे अहम पहलू पर गौर किया जाए. सब को मालूम है कि डा. अंबेडकर के दर्शन ने २० वीं सदी के भारत के राजनीतिक आचरण को बहुत ज्यादा प्रभावित किया है . लेकिन उनके दर्शन की सबसे ख़ास बात पर जानकारी की भारी कमी है. शायद ऐसा इसलिए है कि उनके नाम पर राजनीति करने वाले उन्हीं बातों को प्रचारित करते है जो उनको  अपने  स्वार्थ के हिसाब से उपयोगी लगती  हैं . आम अवधारणा यह है कि बाबा साहेब जाति व्यवस्था के खिलाफ थे . यह सच है लेकिन इतना ही सच नहीं है . और  भी बहुत कुछ है . मसलन  डॉ साहब मानते थे कि  जाति की व्यवस्था शताब्दियों की साज़िश का नतीजा है और उसका खात्मा सामाजिक विकास की एक ज़रूरी शर्त है . अंबेडकर ने कहा था कि जब तक अंतरजातीय शादी-ब्याह नहीं होंगें , तब तक बात नहीं बनने वाली नहीं है, जाति प्रथा को तोड़ना नामुमकिन होगा . सहविवाह और सहभोजन  बहुत  ज़रूरी है .डॉ आंबेडकर के  दर्शन में इसके अलावा और भी बहुत कुछ है जो देश के हर नागरिक को जानना चाहिए .उनके दर्शन शास्त्र की  कई बातों के बारे में ज़्यादातर लोग अन्धकार में हैं. उन्हीं कुछ बातों का ज़िक्र करना आज के दिन सही रहेगा. डा. अंबेडकर को इतिहास एक ऐसे राजनीतिक चिन्तक के रूप में याद रखेगा जिन्होंने जाति के विनाश को सामाजिक,आर्थिक और राजनीतिक परिवर्तन की बुनियाद माना था. यह बात किसी से छुपी नहीं है कि उनकी राजनीतिक विरासत का सबसे ज्यादा फायदा उठाने वाली पार्टी की नेता, आज जाति की संस्था को संभाल कर रखना चाहती हैं ,उसके विनाश में उनकी कोई रूचि नहीं है . वोट बैंक राजनीति के चक्कर में पड़ गयी अंबेडकरवादी पार्टियों को अब वास्तव में इस बात की चिंता सताने लगी है कि अगर जाति का विनाश हो जाएगा तो उनकी वोट बैंक की राजनीति का क्या होगा. डा अंबेडकर की राजनीतिक सोच को लेकर कुछ और भ्रांतियां भी हैं . कांशीराम और मायावती ने इस क़दर प्रचार कर रखा है कि जाति की पूरी व्यवस्था का ज़हर मनु ने ही फैलाया था, वही इसके संस्थापक थे और मनु की सोच को ख़त्म कर देने मात्र से सब ठीक हो जाएगा. लेकिन बाबा साहेब ऐसा नहीं मानते थे . उनके एक बहुचर्चित, और अकादमिक भाषण के हवाले से कहा जा सकता है कि जाति व्यवस्था की सारी बुराइयों को लिए मनु को ही ज़िम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता .मनु के बारे में उन्होंने कहा कि अगर कभी मनु रहे भी होंगें तो बहुत ही हिम्मती रहे होंगें . डा. अंबेडकर का कहना है कि ऐसा कभी नहीं होता कि जाति जैसा शिकंजा कोई एक व्यक्ति बना दे और बाकी पूरा समाज उसको स्वीकार कर ले. उनके अनुसार इस बात की कल्पना करना भी बेमतलब है कि कोई एक आदमी कानून बना देगा और पीढियां दर पीढियां उसको मानती रहेंगीं. . हाँ इस बात की कल्पना की जा सकती है कि मनु नाम के कोई तानाशाह रहे होंगें जिनकी ताक़त के नीचे पूरी आबादी दबी रही होगी और वे जो कह देंगे ,उसे सब मान लेंगें और उन लोगों की आने वाली नस्लें भी उसे मानती रहेंगी.उन्होंने कहा कि , मैं इस बात को जोर दे कर कहना चाहता हूँ कि मनु ने जाति की व्यवस्था की स्थापना नहीं की क्योंकि यह उनके बस की बात नहीं थी  . मनु के जन्म के पहले भी जाति की व्यवस्था कायम थी. . मनु का योगदान बस इतना है कि उन्होंने इसे एक दार्शनिक आधार दिया. . जहां तक हिन्दू समाज के स्वरूप  और उसमें जाति के मह्त्व की बात है, वह मनु की हैसियत के बाहर था और उन्होंने वर्तमान हिन्दू समाज की दिशा तय करने में कोई भूमिका नहीं निभाई. उनका योगदान बस इतना ही है उन्होंने जाति को एक धर्म के रूप में स्थापित करने की कोशिश की . जाति का दायरा इतना बड़ा है कि उसे एक आदमी, चाहे वह जितना ही बड़ा ज्ञाता या शातिर हो, संभाल ही नहीं सकता. . इसी तरह से यह कहना भी ठीक नहीं होगा कि ब्राह्मणों ने जाति की संस्था की स्थापना की. मेरा मानना है कि ब्राह्मणों ने बहुत सारे गलत काम किये हैं लेकिन उनकी औक़ात यह कभी नहीं थी कि वे पूरे समाज पर जाति व्यवस्था को थोप सकते.  बाबा साहेब ने अपने इसी भाषण में एक चेतावनी और दी थी कि उपदेश देने से जाति की स्थापना नहीं हुई थी और इसको ख़त्म भी उपदेश के ज़रिये नहीं किया जा सकता. इस बात में दो राय नहीं है कि  डा अंबेडकर पर अपने पहले के महान समाज सुधारक ,ज्योतिबा फुले का बड़ा प्रभाव था . उन्हें यह पूरा विश्वास था कि जाति प्रथा को किसी व्यक्ति से जोड़ कर उसकी तार्किक परिणति तक नहीं ले जाया जा सकता. कहीं ऐसा न हो कि केवल मनु को लक्ष्य करने के चक्कर में  मनु के विचार तो ख़त्म हो जाएँ लेकिन  जाति प्रथा ज्यों की त्यों बनी रह जाये . जाति प्रथा का खात्मा ज़रूरी  है लेकिन अगर केवल मनु को टारगेट किया जाता रहा तो बात बनेगी नहीं . पूरे सिस्टम पर हमला करना पडेगा .

डा अंबेडकर के अनुसार हर समाज का वर्गीकरण और उप वर्गीकरण होता है लेकिन परेशानी की बात यह है कि इस वर्गीकरण के चलते वह ऐसे सांचों में फिट हो जाता है कि एक दूसरे वर्ग के लोग इसमें न अन्दर जा सकते हैं और न बाहर आ सकते हैं . यही जाति का शिकंजा है और इसे ख़त्म किये बिना कोई तरक्की नहीं हो सकती. सच्ची बात यह है कि शुरू में अन्य समाजों की तरह हिन्दू समाज भी चार वर्गों में बंटा हुआ था . ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र . यह वर्गीकरण मूल रूप से जन्म के आधार पर नहीं था, यह कर्म के आधार पर था .एक वर्ग से दूसरे वर्ग में आवाजाही थी लेकिन हज़ारों वर्षों की निहित स्वार्थों कोशिश के बाद इसे जन्म के आधार पर कर दिया गया और एक दूसरे वर्ग में आने जाने की रीति ख़त्म हो गयी. और यही जाति की संस्था के रूप में बाद के युगों में पहचाना जाने लगा. . अगर आर्थिक विकास की गति को तेज़ किया जाय और उसमें सार्थक हस्तक्षेप करके कामकाज के बेहतर अवसर उपलब्ध कराये जाएँ तो जाति व्यवस्था को जिंदा रख पाना बहुत ही मुश्किल होगा. और जाति के सिद्धांत पर आधारित व्यवस्था का बच पाना बहुत ही मुश्किल होगा.. अगर ऐसा हुआ तो जाति के विनाश के ज्योतिबा फुले, डा. राम मनोहर लोहिया और डा. अम्बेडकर की राजनीतिक और सामाजिक सोच और दर्शन का मकसद हासिल किया जा सकेगा..

समाज और राजनीति का फ़र्ज़ है लड़कियों को आत्मनिर्णय का अधिकार देना

जंतर-मंतर - Sun, 17/12/2017 - 07:09


शेष नारायण सिंह
केरल की हादिया के प्रेम और विवाह करने एक अधिकार के मामले में सुप्रीम कोर्ट में केस चल रहा है . हाई कोर्ट में उसके अपनी पसंद के पुरुष से शादी करने के  अधिकार को अनुपयुक्त पाया गया था जिसके खिलाफ  देश के सर्वोच्च न्यायलय में अपील की गयी है . फैसला अभी नहीं आया है इसलिए उस मामले में कोई टिप्पणी करना उचित नहीं   है. हादिया पहले अखिला थी , इस्लाम  क़ुबूल कर लिया और अपनी पसंद के मुस्लिम लड़के से शादी कर ली . उसके विवाह करने के अधिकार पर जब सुप्रीम कोर्ट का आदेश आ जाएगा तब उस पर चर्चा की जायेगी . सुनवाई के दौरान माननीय सुप्रीम कोर्ट ने उचित  समझा कि उसकी शिक्षा को जारी रखा जाना  चाहिए तो उसके लिए ज़रूरी निर्देश दे दिए गए हैं और वह तमिलनाडु के अपने मेडिकल कालेज में अपनी पढ़ाई से सम्बंधित कार्य कर रही है . लेकिन लव जिहाद के बारे में बात की जा सकती  है ,उसपर समाजशास्त्रीय  विमर्श और टिप्पणी की जा सकती है .वास्तव में एक लडकी और एक लड़के के बीच होने वाले प्रेम को लव जिहाद का नाम देना और इसको मुद्दा बनाना समाज में पुरुष आधिपत्य की मानसिकता का एक  नमूना है . लव  जिहाद वाले ज़्यादातर मामलों में यह देखा गया है कि जो गरीब या मध्य वर्ग के लोग हैं , उनको ही अपमानित करने के लिए लक्षित किया जाता है . यह नया भी नहीं है . हिन्दू लडकी और मुस्लिम लड़के के बीच प्रेम को हमेशा ही आर एस एस और उसके अधीन  संगठनों की राजनीति में हिकारत की नज़र से देखा जाता रहा   है .  बीजेपी के पूर्व उपाध्यक्ष सिकंदर बख्त को भी आर एस एस के इस क्रोध  को झेलना पड़ा था. बाद में तो वे बीजेपी की कृपा से केंद्रीय मंत्री  और राज्यपाल भी हुए लेकिन आर एस एस के अखबार आर्गनाइज़र के २ जून १९५२ के  अंक में उनके बारे में जो लिखा है उससे साफ़ हो जाता है कि आर एस एस ने  उनको शक की नज़र से देखा . सिकंदर बख्त एंड कंपनी शीर्षक के लेख में उनके बारे में जो बातें लिखीं थीं ,वे किसी को भी आपत्तिजनक लग सकती हैं. अखबार को शक था कि तब के कांग्रेसी नेता  सिकंदर बख्त किसी बड़ी कांग्रेसी महिला नेता के प्रेम में हैं और उसके साथ रह रहे हैं . इसी को केंद्र में रख कर काफी कुछ लिखा गया था . बाद में जब उन्होंने एक हिन्दू लडकी से शादी कर लिया तो दिल्ली शहर में भारी हल्ला  गुल्ला किया गया था . इसलिए यह कहना ठीक नहीं है कि हिन्दू-मुस्लिम प्रेम और विवाह पर आर एस एस के संगठन अब ज्यादा आक्रामक हो गए हैं . यह हमेशा से ही ऐसे ही थे. इनकी राजनीतिक  ताक़त बढ़ गयी  है और अब उनके  इस तरह के कारनामों को सरकारी संरक्षण मिलता है इसलिए वे  ज़्यादा मुखर  हो गए हैं .एक और दिलचस्प बात गौर करने लायक है . लव जिहाद और  उससे जुडी हिंसा का शिकार आम तौर पर गरीब या  सम्पन्नता के निचले पायदान पर  मौजूद लोग ही होते हैं .  सम्पन्न या राजनीतिक रूप से  ताक़तवर लोगों पर लव जिहाद के हमलावर कुछ नहीं बोलते .  देश  भर में ऐसे  लाखों जोड़े हैं जो हिन्दू  मुस्लिम विवाह के उदाहरण हैं लेकिन उनपर कभी किसी लव जिहादी ने जिहाद नहीं छेड़ा .शाहरुख ख़ान, आमिर ख़ान, सैफ़ अली ख़ान, इरफान ख़ान, सलीम ख़ानन नसीरूद्दीन शाह, साजिद नाडियावाला, , इमरान हाशमी, मुज़फ़्फ़र अली, इम्तियाज़ अली, अज़ीज़ मिर्ज़ा, फ़रहान अख़्तर, आदि बाहुत सारे  फ़िल्मी लोगों की पत्नियां हिन्दू हैं . यह ताक़तवर लोग हैं . शायद  इसीलिये इनके खिलाफ कभी कोई बयान भी नहीं आया है . बीजेपी के नेता  मुख्तार अब्बास नक़वी, शहनवाज़ हुसैन और एम  जे अकबर की पत्नियां भी हिन्दू लडकियां   हैं .  इनकी भी कभी चर्चा नहीं होती ,शायद  इसलिए कि यह तो अपने लोग हैं .असल मुद्दा सामाजिक और आर्थिक है . जो लोग समाज के सबसे गरीब तबके से हैं उनको सभी ब्रांड के राजनीतिक और धार्मिक शमशीर  चमकाने वाले निशाना  बनाते हैं . और यह समस्या केवल हिन्दू मुस्लिम जोड़ों  तक की सीमित नहीं है.  पिछले कई वर्षों से लगभग रोज़ ही अखबार में ऐसी कोई खबर नज़र आ जाती है   जिसमें पता  चलता है कि किसी लडकी की इसलिए हत्या कर दी गयी कि उसने अपने परिवार वालों की मर्जी के खिलाफ जाकर शादी  कर ली थी . इसी हफ्ते एक हैरतअंगेज़ खबर पढने को मिली जिसमे लिखा था  कि एक लडकी अपने  किसी पुरुष सजातीय दोस्त के साथ  सिनेमा देखने चली गयी . लडकी के पिता और भाई को वह लड़का पसंद नहीं था . बाप और भाइयों ने अपनी ही लडकी और बहन का गैंग रेप किया और उसको सबक सिखाने की कोशिश की . यह हैवानियत क्यों है ? यह  सवाल सरकार के दायरे में जाएगा ,तो वह इसको कानून व्यवस्था की नज़र से देखेगी . इस खबर  में भी पुलिस का पक्ष ही अखबार में छपा था लेकिन इसका असली हल पुलिस नहीं निकाल  सकती  है . इस समस्या के हल के लिए समाज को आगे आना पडेगा . इसका गहराई से  अध्ययन करना पड़ेगा और कोई सूरत सुझानी पड़ेगी . अब  तक तो जो भी तरीके बताये गए है वे ठीक नहीं हैं . शायद समाज और राष्ट्र ने इस समस्या की गहराई को समझा ही नहीं है .बहुत पहले सब इस  तरह  की खबरें   सार्वजनिक चर्चा में  आने लगी थीं तो कुछ हलकों से सुझाव आये थे कि शिक्षा के स्तर में तरक्की होने पर यह सब बदल जाएगा लेकिन अब देखा जा रहा  है कि आम तौर पर ऊंची औपचारिक शिक्षा प्राप्त लोग  इस तरह के असमाजिक और अमानवीय कार्यों में लगे हुए हैं . ज़ाहिर है केवल शिक्षा से  समस्या का हल   नहीं निकलने वाला है . इसके लिए    सम्पन्नता भी चाहिए और उससे भी  ज्यादा राजनीतिक स्तर पर सुरक्षा की व्यवस्था भी चाहिए .  न्यायपालिका की सुरक्षा तभी प्रभावी होगी जब  राजनीतिक स्तर पर उसको लागू करने की इच्छा शक्ति मौजूद हो . राजनीतिक इच्छा  शक्ति का तभी विकास होगा जब एक समाज के रूप में राजनीति कर्मियों को सामाजिक ज़िम्मेदारी और दायित्व से  बांधा जा सके .देश की राजधानी  के एक सौ किलोमीटर के दायरे में लगभग प्रति  दिन ' हानर किलिंग ' के नाम पर  लड़कियों को हलाल किया जा रहा है . अजीब बात यह है कि  इलाके के सभी मुकामी नेता इन हत्यारों का ही साथ देते हैं. इसका  कारण यह है कि नेताओं को वोट से मतलब है और  ग्रामीण समाजों में  परिवार का वोट देने का फैसला पुरुष ही करते  हैं . वोटबाज़ी की तिकड़म की राजनीति में लड़कियों की कोई भूमिका नहीं होती . ऐसा इलसिए होता है कि वे  लडकियां राजनीतिक शक्ति से संपन्न नहीं होती हैं .उनको शक्ति सम्पन्न बनाये बिना  समाज का भला नहीं होने वाला है .सरकार ने  लड़कियों को सक्षम बनाने के लिए कई योजनायें चला रखी हैं . बेटी बचाओ, बेटी पढाओ  , उज्जवला, स्वाधार ,महिलाओं के प्रशिक्षण और उनको जिम्मेवारी देने संबंधी योजनाएं कागजों में उपलब्ध हैं लेकिन उनको सही अर्थों में लागू करने के लिए राजनीतिक इच्छा शक्ति चाहिए . जिसकी भारी कमी है .संविधान के ७३ वें और ७४ वें   संसोधन के बाद पंचायतों के चुनावों में कुछ सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित कर दी गयी थीं लेकिन नतीजा क्या हुआ ? महिलाओं का पर्चा भरवाकर उनके पति गाँव पंचायत के प्रधान  बन बैठे . प्रधानपति नाम के एक अलग  किस्म के जीव  ग्रामीण भारत में विचरण करने लगे . ऐसा इसलिए हुआ कि लड़कियों की  शिक्षा पर ज़रूरी ध्यान नहीं दिया गया था. लेकिन अब  बहुत बड़े पैमाने पर बदलाव हो रहे हैं . ग्रामीण इलाकों की लडकियां उच्च और प्रोफेशनल शिक्षा के ज़रिये सफलता हासिल करने की कोशिश में लगे हुए हैं . अभी २५ साल पहले तक जिन गावों की लड़कियों को उनके माता पिता , दसवीं की पढ़ाई करने के लिए २ मील दूर नहीं जाने देते थे , उन इलाकों की लडकियां दिल्ली, पुणे, बंगलोर नोयडा ,ग्रेटर नोयडा में स्वतन्त्र रूप से रह रही हैं और शिक्षा हासिल कर रही हैं . उनके माता पिता को भी मालूम है कि बच्चे पढ़ लिख कर जीवन में कुछ हासिल करने लायक बन जायेंगें . लेकिन अभी भारत के मध्यवर्गीय समाज में यह जागरूकता नहीं है कि शिक्षा के विकास के बाद जब पश्चिमी देशों की तरह बच्चे आत्म निर्भर होंगें तो उनको अपनी निजी ज़िंदगी में भी स्पेस चाहिए . उनको अपनी ज़िंदगी के अहम फैसले खुद लेने की आज़ादी उन्हें देनी पड़ेगी लेकिन ऐसा हो नहीं रहा है .छः साल पहले की बात है . झारखण्ड की पत्रकार निरुपमा पाठक के मामले ने मुझको विचलित कर दिया था .  उसके माता पिता ने उसे पत्रकारिता की शिक्षा के लिए दिल्ली भेजा, लड़की कुशाग्रबुद्धि की थी, उसने अपनी कोशिश से नौकरी हासिल की और अपनी भावी ज़िंदगी की तैयारियां करने लगी. अपने साथ पढने वाले एक लडके को पसंद किया और उसके साथ घर बसाने का सपना देखने लगी. जब वह घर से चली थी तो उसके माता पिता अपने दोस्तों के बीच हांकते थे कि उनकी बेटी बड़ी सफल है और वे उसकी इच्छा का हमेशा सम्मान करते हैं . लेकिन  वे तभी तक अपनी बच्ची की इज्ज़त करते थे जब तक वह उनकी हर बात मानती थी लेकिन जैसे ही उसने उनका हुक्म मानने से इनकार किया , उन्होंने उसे मार डाला . यह तो बस एक मामला है . ऐसे बहुत सारे मामले हैं .. इसके लिए बच्चों के माँ बाप को कसाई मान लेने से काम नहीं चलने वाला है . वास्तव में यह एक सामाजिक समस्या है . अभी लोग अपने पुराने सामाजिक मूल्यों के साथ जीवित रहना चाहते हैं . इसका यह मतलब कतई नहीं है कि वे नए मूल्यों को अपनाना नहीं चाहते . शायद वे चाहते हों लेकिन अभी पूंजीवादी रास्ते पर तो विकास आर्थिक क्षेत्र में पींगें मार रहा है लेकिन परिवार और समाज के स्तर पर किसी तरह का मानदंड विकसित नहीं हो रहा है . नतीजा यह हो रहा है कि पूंजीवादी आर्थिक और राजनीतिक व्यवस्था में भारत के ग्रामीण समाज के लोग सामन्ती मूल्यों के साथ जीवन बिताने के लिए मजबूर हैं . खाप पंचायतों के मामले को भी इसी सांचे में फिट करके समझा जा सकता है . सूचना क्रान्ति के चलते गाँव गाँव में लडके लड़कियां वह सब कुछ देख रहे हैं जो पश्चिम के पूंजीवादी समाजों में हो रहा है . वह यहाँ भी हो सकता है . दो नौजवान एक दूसरे को पसंद करने लगते हैं लेकिन फिर उन्हें उसके आगे बढ़ने की अनुमति सामंती इंतज़ाम में नहीं मिल पाती .समाज और राजनीति को ऐसी ही परिस्थितियों में हस्तक्षेप करना पडेगा . समाज में  लड़के लड़कियों को सम्मान की ज़िंदगी देने के लिए उनको खुदमुख्तारी के अधिकार देने पड़ेगें . और यह  कम सरकार और राजनीतिक  बिरादरी ही कर सकती है 

जो उठना है, वह किस गटर में गिरना है

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सतह से उठते सवाल : 'सतह से उठता आदमी' में से निकलते कुछ सवाल-('नया पथ' के ताज़ा अंक में प्रकाशित लेख)
कहा जा सकता है कि 'सतह से उठता आदमी' मूलत: एक अस्तित्ववादी रचना है। गौरतलब बात यह है कि जब यह कहानी लिखी गई तब विश्व साहित्य में अस्तित्ववादी चिंतन अपने शिखर पर था। पर अस्तित्ववाद आखिर है क्या? अस्तित्ववाद पर आलोचकों की कई तरह की राय रही है। अक्सर अस्तित्ववाद का उल्लेख आलोचना की गंभीरता मात्र जताने के लिए होता है; सचमुच आलोचक क्या कहना चाहता है या साफ नहीं होता। अस्तित्ववाद जीवन में किसी बृहत्तर मकसद को ढूँढने से हमें रोकता है। पर 'सतह से उठता आदमी' कहानी हमें अपने अस्तित्व का एक बड़ा मकसद ढूँढने को कहती है, बशर्ते हमारी संवेदनाएं बिल्कुल कुंद न हो गई हों, जिसका खतरा आज व्यापक है। हमारी कोशिश यहाँ गंभीर आलोचना की नहीं, महज एक खुले दिमाग से पुनर्पाठ की है।
'सतह से उठता आदमी' में तीन मुख्य चरित्र हैं - कन्हैया लेखक का प्रतिरूप है या कथावाचक की भूमिका में है, कृष्णस्वरूप उसका मित्र है, जो कभी ग़रीब होता था और अब अच्छी नौकरी मिल जाने से आर्थिक रूप से बेहतर स्थिति में है, और रामनारायण, जिसे कृष्णस्वरूप जीनियस मानता है, जो कभी धनी घर का बिगड़ा लड़का था और अब बौद्धिक उलझनों में खोया हुआ शख्स है। चरित्रों को भरपूर उभारा गया है, जैसा अमूमन उपन्यास लेखन में होता है, पर यह एक कहानी है, उपन्यास नहीं। पर चरित्रों के उभार पर ध्यान देना ज़रूरी है, नहीं तो सतह से उठने की सतही समझ भर रह जा सकती है।
कौन है जो सतह से उठता है? क्या वह कन्हैया है, या कृष्णस्वरूप या रामनारायण? किस सतह से कोई उठता है? कहाँ पर, कहाँ तक उठता है? कहानी के आखिर में कन्हैया अकेले में गटर में थूकता है। क्या यह सतह से उठने की स्थिति है? हम किसी एक समझ को प्रतिष्ठित न कर अलग-अलग संभावनाओं को सामने आने दें तो बेहतर होगा।
कन्हैया और कृष्णस्वरूप पुराने दोस्त हैं। दोनों के बचपन और किशोर उम्र मुफलिसी में ग़रीबी में बीते हैं। सालों बाद कन्हैया कृष्णस्वरूप से मिलता है तो उस पता चलता है कि कृष्णस्वरूप संपन्न हो चुका है, पर संस्कारों से वह अभी भी आम ग़रीबों जैसा ही है। कृष्णस्वरूप के घर पर ही रामनारायण कन्हैया से इस तरह मिलता है, जैसे कि उनमें पुरानी पहचान हो, पर सचमुच वे पहले कभी मिले नहीं हैं। रामनारायण धनी माँ-बाप का लड़का है, जिनमें आपसी मेल नहीं है। रामनारायण बहुत पढ़ा-लिखा है और अपने पिता की तरह ही आड़ंबरों से बचता है, पर वह कुछ हद तक विक्षिप्त भी है। कृष्णस्वरूप की माली हालत में बदलाव में रामनारायण की माँ का हाथ है और लगता है इस वजह से रामनारायण कृष्णस्वरूप के साथ अपमानजनक ढंग से बातचीत करता है।
राजकमल से प्रकाशित नेमिचंद्र जैन द्वारा संपादित रचनावली के तीसरे खंड में यह कहानी संकलित है। इस संस्करण में अक्सर कुछ लफ्ज़ों को भारी टाइप शैली (bold) में रखा गया है। मसलन इस कहानी में 'भई वाह! उन दिनों कृष्णस्वरूप रोज गीतापढ़ता था' वाक्य में 'गीता' पर जोर है। क्या यह मुक्तिबोध का खुद का किया हुआ है, या संपादकीय निर्णय है - यह सवाल शोध का विषय है। 'उन दिनों' यानी वे जो मुफलिसी के दिन थे। जाहिर है कि 'उन दिनों' कहते हुए इसके बाइनरी विलोम 'इन दिनों' की ओर भी संकेत रहता है - इन दिनों क्या वह गीता पढ़ता है? इस पर कहानी में कोई तथ्य उजागर नहीं होता, पर हो सकता है कि इन दिनों वह गीता नहीं पढ़ता। गीता का पढ़ा जाना या न पढ़ा जाना क्या बतलाता है? भारतीय मानस में खास कर जिन्हें अब हिन्दू कहा जाता है, गीता को सर्वश्रेष्ठ ग्रंथ मानना आम बात है, वैसे ही जैेसे और समुदायों में बाइबिल, कुरान, गुरु ग्रंथ साहब आदि को सर्वश्रेष्ठ ग्रंथ मान लिया जाता है। गीता में सांख्य और योग के महत्वपूर्ण तत्व हैं और इनका इस्तेमाल कृष्ण द्वारा अर्जुन को जंग लड़ने के लिए तैयार करने के लिए किया गया है। एक स्वच्छंदतावादी (ऐनार्किस्ट) नास्तिक गीता को कैसे देखेगा? इसके मद्देनज़र और यह ध्यान में रखते हुए कि अक्सर मुक्तिबोध को मार्क्सवाद के दायरे में रखकर देखा गया है, यह बात गौरतलब है कि गीता लफ्ज़ बोल्ड फोंट में है। इससे मुक्तिबोध का कैसा पाठ बनता है? अगर यह संपादकीय हस्तक्षेप है, तो क्या किसी विशेष पाठ को सामने लाने की, उभारने की कोशिश है?
कहानी पढ़ कर यह भी लगता है मुक्तिबोध हमें नैतिकता बोध की ओर ले जा रहे हैं, पर क्या सचमुच ऐसा है? क्या कृष्णस्वरूप में नैतिकता बोध खत्म हो गया है कि वह अपने आदर्शों को छोड़कर अचानक मिल रही सुविधाओं को एक के बाद एक ग्रहण करता गया है? वह कृष्णस्वरूप जो 'कहा करता था, “चाहिए, चाहिए, चाहिए" ने सभ्यता को विकृत कर डाला है, मनुष्य-संबंध विकृत कर दिए हैं। तृष्णा बुरी चीज़ है। हमारा जीवन कुरुक्षेत्र है। वह धर्मक्षेत्र है। हर एक को योद्धा होना चाहिए। आसक्ति बुरी चीज़ है', वही आज 'खुशहाल तो है ही, खुशहाली से कुछ ज्यादा है। उसकी चाल-ढाल बदल गई है। वह मोटा हो गया है। पेट निकल आया है। ढाई सौ रुपए का सूट पहनता है।' इस नैतिकता बोध में नया कुछ नहीं है। आज के घोर पूँजीवादी, नवउदारवादी युग में तो इसे ओल्ड-फैशन्ड ही कहा जाएगा। जो खुशहाल है या खुशहाली से कुछ ज्यादा है, उसे लेकर परेशानी क्यों। दुनिया जाए भाड़ में, समाज में दलित, पिछड़े, ग़रीब हों तो हों, पैसे कमाओ, जै सिरीराम बोलो, ऐश करो, दारु-शारु पिओ और खर्राटे मारते हुए सोओ। कृष्णस्वरूप ही तो आज का नॉर्मल है, समाज के लिए परेशानी का सबब तो रामनारायण है, भले ही जिसकी 'बात में मजा आता है,’ जिसका 'भाषा पर प्रचंड अधिकार है।‘ फिर भी अगर ऐसा है कि कहानी के केंद्र में नैतिकता का सवाल है तो यह महज अस्तित्ववादी रचना नहीं है।
कृष्णस्वरूप के किरदार का एक मजेदार पक्ष यह है कि 'उन दिनों' उसके सपने में शंकराचार्य, महात्मा गाँधी और जवाहरलाल भी आते थे। ऐसा वह कहता था। कहानी में हमें पता चलता है कि कृष्णस्वरूप सचमुच कन्हैया को प्रभावित करता था। लेकिन किस ढंग से?
इसके बाद का कथन है कि 'उसको' फ़िलॉसफ़ी की ज़रूरत थी, इसलिए कि 'उसका जीवन दुर्दशाग्रस्त था।' किसको? कृष्णस्वरूप को ही शायद, क्योंकि जीवन तो उसका दुर्दशाग्रस्त था। कन्हैया के बारे में भी हम बाद में जान पाते हैं कि उसका जीवन भी कृष्णस्वरूप जैसा ही रहा होगा। तो फ़िलॉसफ़ी की ज़रूरत कन्हैया को भी थी। कन्हैया कथावाचक की भूमिका में है, या कथावाचक हमें कहानी की दुनिया को कन्हैया की नज़रों से दिखलाना चाहता है। तो क्या मुक्तिबोध अपनी उलझनों को ही हमारे सामने रख रहे हैं? मुक्तिबोध उलझे हुए तो थे ही, यह एक बात उनके बारे में साफ कही जा सकती है कि अपने वक्त के और दीगर रचनाकारों की तुलना में मुक्तिबोध में बौद्धिक सवालों को लेकर जद्दोजहद कहीं ज्यादा सघन थी।
मुक्तिबोध जिस वक्त और जिन परिस्थितियों में रहकर साहित्य-लेखन कर रहे थे, उनको जीते हुए वे उन्नीसवीं सदी के अंत या बीसवीं सदी के शुरुआत तक की यूरोपी आधुनिकता के प्रभाव से अछूते नहीं रह सकते थे। उनके पास 'फ़िलॉसफ़ी ऑफ द ऐबसर्ड' की जगह नहीं थी। या जगह बहुत थी तो वह शंकराचार्य, महात्मा गाँधी और जवाहरलाल से अलग मार्क्स को जगह दे सकती होगी, पर आधुनिक भारत का जो अति-यथार्थ उनके सामने खुलता जा रहा था, उसके लिए सही फ़िलॉसफ़ी क्या हो सकती है, यह सवाल उन्हें तड़पाता होगा। मसलन कहानी में हम देखते हैं कि रामनारायण देखने में भयानक है। उसमें से 'अज्ञात, अप्राकृतिक विचित्रता' का भय जन्म लेता है। जाहिर है कि इस किरदार को भयानक शक्ल देते हुए कथाकार हमसे मुखातिब है। हम अपनी उस भयानक या विक्षिप्त शक्ल को देखने को मजबूर हो जाते हैं, जो न्याय पर अन्याय की जीत सह नहीं पाता, जो तड़पता रहता है।
‘कन्हैया ग़रीबी को, उसकी विद्रूपता को, और उसकी पशु-तुल्य नग्नता को जानता है। साथ ही उसके धर्म और दर्शन को भी जानता है। गाँधीवादी दर्शन ग़रीबों के लिए बड़े काम का है। वैराग्य भाव, अनासक्ति और कर्मयोग सचमुच एक लौह-कवच है, जिसको धारण करके मनुष्य आधा नंगापन और आधा भूखापन सह सकता है। ... उसके आधार पर आत्मगौरव, आत्मनियंत्रण और आत्मदृढ़ता का वरदान पा सकता है।' - यह कौन चीख रहा है? आगे और है - ‘ग़रीबी एक अनुभावत्मक जीवन है। कठोर से कठोर यथार्थ चारों तरफ़ से घेरे हुए है, एक विराट नकार, एक विराट शून्य-सा छाया हुआ है। लेकिन, इस शून्य के जबड़ों में मांसाशी दाँत और रक्तपायी जीभ हैं।' तो क्या गीता, गाँधीवादी दर्शन, शंकराचार्य और जवाहरलाल उन्हें उसी कठोर यथार्थ में दिखते हैं? अव्वल तो कहानी में कहानी होना पहली शर्त है, दर्शन हो तो बढ़िया, न हो तो भी ठीक। अगर बौद्धिकता में जाना ही है तो हजार साल पहले के पुनरुत्थानवादी वेदांती और अपने समय में पश्चिम के शांतिवादियों से प्रभावित घोषित राष्ट्रपिता और इतिहास में रुचि रखते एक राष्ट्रनेता का नाम एक साथ क्यों? क्या यह महज उलझन है, या बयान है? इस रचना के दो ही दशकों बाद कुछ मार्क्सवादी चिंतकों ने गीता में मुक्तिकामी सोच प्रतिष्ठित करने की कोशिश की थी। भारतीय वाम चिंतन में ऐसी उलझनों की भरमार है।
क्या मुक्तिबोध के लिए जीवन का कोई तार्किक आधार था? क्या जीवन का कोई मकसद है - क्या वह मकसद अपने वक्त के दक्षिण एशिया में महानायक रह चुके शंकर, गाँधी और नेहरू जैसे नामों में है, या वह उस 'अनुभवात्मक जीवन' में ही कहीं है, जो ग़रीबी है? एक साहित्य-रचना के रूप में 'सतह से उठता आदमी' में सबसे बड़ी खूबी यह है कि इन सवालों को मुक्तिबोध खुला छोड़ देते हैं, जो कि उनके समकालीन ही नहीं, बाद के रचनाकारों में भी विरल है। कन्हैया को जीवन की सचाइयों का पता है, पर उसके साथ हम कृष्णस्वरूप और जीनियस रामनारायण के खेल को निर्लिप्त भाव से देखते हैं। खेल कहें या कि पुराने ढंग से भव-लीला कहें। यह जो नए पुराने के बीच का आवागमन है, इसमें मुक्तिबोध अद्वितीय हैं। कहानी में दुर्योधन की प्रसिद्ध उक्ति 'जानामि धर्मं न च मे प्रवृत्ति/ जानाम्यधर्मं न च मे निवृत्तिः/ केनापि देवेन हृदिस्थितेन/यथा नियुक्तोऽस्मि तथा करोमि' का इस्तेमाल किया गया है। कृष्णस्वरूप का दुर्योधन धर्म-अधर्म के सामान्य द्वंद्वों में से आराम से गुजरता है। जो भी सही-ग़लत है, वह सब विधि का विधान है, इस को मानने वाला हीनता से ग्रस्त ग़रीब कृष्णस्वरूप बाद में स्वेच्छा से खुद को बदलता है। हो सकता है कि तब भी वह 'यथा नियुक्तोऽस्मि तथा करोमि' मानता हो, या कि उसके लिए इसे मानते रहना मजबूरी है, क्योंकि ऐसा न हो तो वह भयानक दिखता रामनारायण जो उसके अंदर भी कहीं बैठा है, उसे जीने न देगा।
नैतिकता बोध के सवाल रुकते नहीं हैं। जो शानदार खूबसूरत है, क्या वह सचमुच शानदार और खूबसूरत है? रामनारायण के पिता जात-पात नहीं मानते, हरि का नाम लेते हैं तो उनकी शानदार खूबसूरत पत्नी उन्हें ताना देकर कहती है कि 'जाओ, उस रंडी के पास जाकर बैठो।' एक उदार पुरुष अपनी खूबसूरत, पर रुढ़िवादी पत्नी के साथ कैसे निभाए, अहंकारी माँ रामनारायण को उशृंखल बनने से कैसे रोके, ये अस्तित्व के सामान्य संकट है। पर इन सबके साथ कृष्णस्वरूप में आ रहे बदलाव, उसके अंदर का लोलुप, महत्वाकांक्षी इंसान जो सतह से ऊपर उठने को बेताब है, उसके संकट विकट हैं। अपने विपन्न अतीत से निकलकर सुविधाओं से लदते रह कर भी वह लाचार है कि वह भयानक दिखता रामनारायण उसे हेय नज़रों से देखे, उसे दुत्कारे और वह कुछ न कर पाए, सिर्फ इसके कि वह कहता रहे कि 'सचमुच जीनियस' है। 'उन दिनों' का उसका गीता पाठ, उसके सपने में आते महानायक, सभी इन दिनों बेअसर हैं।
हम इन सवालों का जवाब नहीं ढूँढेंगे, क्योंकि जवाब तो हमें मालूम हैं। कृष्णस्वरूप के अंदर कोई रोता, चिंघाड़ता होगा, यह हम जानते हैं क्योंकि हम सब अपनी-अपनी सतह से उठने की प्रक्रियाओं में फँसे हुए हैं। ये प्रक्रियाएँ हमारे निजी दायरों में चल रही हैं और ये हमारे बड़े सामाजिक दायरों में भी चल रही हैं। इस लिए यह कहानी सिर्फ आत्म-अन्वेषण नहीं है। हम चीख चिल्ला कर झूठ को सच कहने वालों के साथ खड़े हो जाते हैं, हत्यारों को जन-गण-मन अधिनायक बना देते हैं। हमारे अंदर कोई हमें रोकने की, सचेत करने की कोशिश करता है, तो हम उसे जीनियस कह कर अपने से दूर कर लेते हैं, उसकी झिड़कों को झेल लेते हैं। हम जानते रहे, देखते रहे कि देश की आधी जनता को और विपन्नता की ओर धकेला जा रहा है, और हममें इतना भी विवेक नहीं बचा रहा कि हम भयानक दिखते जीनियसों को पहचान कर वापस अपने अंदर कभी देख सकें।
अच्छी अस्तित्ववादी रचना में उदासीनता लाजिम है, हालाँकि अक्सर ऐसी रचनाएँ पढ़ने के बाद मुख्य बोध अवसाद का होता है। पर मुक्तिबोध का उदासीन कथावाचन दरअसल उदासीन है नहीं, और समझौतों के किस स्तर तक हम गिर सकते हैं, जो उठना है, वह किस गटर में गिरना है, कन्हैया इसे थूकता हुआ हमें दिखलाता है। मुक्तिबोध हमें कहानी में सीधे नहीं कहते कि हम नैतिक सवालों पर गौर करें, पर पूरी कहानी इसी संकट पर केंद्रित है। कन्हैया की कहानी हमारी कहानी है। यह बस दुनिया को देखना भर नहीं है, उसे और उस-में जीना है। हम कितना उठ रहे हैं और कितना गटर में गिर रहे हैं, यह केंद्रीय सवाल बन कर सामने आता है। इसलिए अस्तित्ववादी होते हुए भी यह कहानी बहुत कुछ और है।

बोले तो आस्मां में सूराख बनते चले हैं

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हर सुबह

सुबह-सुबह शोर। आस्मां नींद में डूबा होता है, उसे झकझोर कर, धकेल कर,  खड़ा किया जाता है। आस्मां उठ कर धरती को ढक लेता है और हम दिनभर सच देखने से बच जाते हैं।

पहले यह जिम्मेदारी मुर्गों की होती थी कि आस्मां को जगाने की कवायद में 
लोगों को तैयार करें। आजकल मोर आगे आने लगे हैं। वक्त ने सचमुच जमाना 
बदल दिया कि हमें सच से बचाने नए जानवर सामने आ गए।

मसलन एक और खुदकुशी। जो मरता है वह खबर बन जाता है। मीडिया चाहे 
न चाहे, लोग हवाओं के लिए कान चौड़े कर लेते हैं। खबर किधर से किधर 
बहती है, लोग सूँघकर जान लेते हैं। कोई आस्मां को देख मुतमइन हो जाता है 
कि वह हमें सच से बचा लेगा। कोई सच सच सच सच रटने लगता है। थक 
जाता है कोई और कोई सो जाता है।

क्या है कि दुष्यंत ने उछाल दिया था तबियत से पत्थर।

बोले तो आस्मां में सूराख बनते चले हैं। (बनास जन  : जुलाई-सितंबर 2017)

प्रीतीश नंदी

रविवार - Tue, 12/12/2017 - 22:30
महिलाओं से घबराने वाला समाज

रघु ठाकुर

रविवार - Tue, 12/12/2017 - 22:30
रोहिंग्या मामले के मानवीय व राष्ट्रीय पहलू

संदीप पांडे

रविवार - Tue, 12/12/2017 - 22:30
भारत में महिलाओं की स्थिति
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लेखक विषय संवाद साभार अनुवादक

पहले वो आए साम्यवादियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं साम्यवादी नहीं था

 

फिर वो आए मजदूर संघियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं मजदूर संघी नहीं था

 

फिर वो यहूदियों के लिए आए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं यहूदी नहीं था

 

फिर वो आए मेरे लिए

और तब तक बोलने के लिए कोई बचा ही नहीं था

 

मार्टिन नीमोलर (1892-1984)