Increase |  Decrease |  Normal

Current Size: 100%

Share this
Syndicate content

Feed aggregator

चुपचाप अट्टहास - 34: तुम्हारे अंदर मेरा एक हिस्सा कैसे

p { margin-bottom: 0.25cm; line-height: 120%; }a:link { }
तुमने क्या सोचा था
सुंदर सा चेहरा
जिस पर औरतें फिदा होती हैं
किसी ख़ून पीते आदमी का नहीं हो सकता


खुद को देखो
तुम्हारी आँखें हैं जैसे हर किसी की
बाल तुम्हारे काले सफेद
औसत हिंदुस्तानी का भार है तुम्हारा
औसत ही ऊँचाई है
वैसी जीभ, नाक कान
नहीं तुम पागल नहीं हो


तुम्हारे अंदर मेरा एक हिस्सा कैसे आ गया?


And you thought that
A handsome face
That attracts women
Cannot belong to a bloodthirsty man


Look at yourself
Your eyes are just like anyone else’s
Your hair salt and pepper
You weigh about an average Indian’s weight
And your height is average
Your tongue, nose and ears are the same
No, you are not crazy

How is it that a part of me is there within you?

Human Beings

We are all human beings. … Are we? Are you sure of that?

ट्रंप-मोदी का गले मिलना गले की फांस ना बन जाये !

अमेरिका में ट्रंप -मोदी का गले मिलना चीन से लेकर पाकिस्तान और ईरान तक के गले नहीं उतर रहा है । तो चीन सिक्किम और अरुणाचल में सक्रिय हो चला है। तो पाकिस्तान कश्मीर और अफगानिस्तान के लिये नई रणनीति बना रहा है और पहली बार अमेरिका के इस्लामिक टैररइज्म के जिक्र के बीच ईरान ने बहरीन, यमन के साथ साथ कश्मीर को लेकर इस्लामिक एकजुटता का जिक्र कहना शुरु कर दिया है। और इन नये हालातो के बीच चीन ने एक तरफ मानसरोवर यात्रा पर अपने दरवाजे से निकलता रास्ता बंद कर दिया है । तो दूसरी तरफ कल जम्मू से शुरु हो रही अमरनाथ यात्रा में अब तक सबसे कम रजिस्ट्रेशन  हुआ है। जबकि परसों से भक्त बाबा बर्फानी के दर्शन कर सकेंगे। तो क्या आतंकवाद के खिलाफ भारत के साथ खडे हुये अमेरिका को लेकर साउथ-इस्ट एशिया नये तरीके से केन्द्र में आ गया है।

तो पहली बार अमेरिका ने आतंकवाद को इस्लाम से जोड़ा और भारत ने इस्लामिक आंतकवाद का शब्द इस्तेमाल ना कर आतंकवाद को कट्टरता से जोड़ा है। बावजूद इसके तीन हालातो पर अब गौर करने की जरुरत है। पहला, ट्रंप ने नार्थ कोरिया का नाम लिया लेकिन पाकिस्तान का नाम नहीं लिया। दूसरा, ईरान को इस्लामिक टैररइज्म से ट्रंप जोड़ चुके हैं। लेकिन भारत ईरान पर खामोश है। तीसरा,ईरान कश्मीर के आतंक को इस्लाम से जोड़ इस्लामिक देशों के सहयोग की बात कर रही है। तो सवाल कई हैं  मसलन आतंक को इस्लामिक टैररइज्म माना जाये। आतंक को दहशतगर्दों का आतंक माना जाये। आतंक को पाकिसातन की स्टेट पॉलेसी माना जाये। और अगर तीनों हालात एकसरीखे ही हैं सिर्फ शब्दो के हेर फेर का खेल है तो नया सवाल  अमेरिका के अंतराष्ट्रीय आतंकवादियों की सूची सैयद सलाउद्दीन के डालने का है। क्योंकि अमेरिकी सूची में लश्कर का हाफिज सईद है। आईएसएस का बगदादी है। हक्कानी गुट का सिराजुद्दीन हक्कानी है । अलकायदा का जवाहरी है।

लेकिन इन तमाम आतंकवादियो की हिंसक आतंकी कार्रवाई लगातार जारी है । और अमेरिकी आंतकी सूची पर यूनाइटेड नेशन ने भी कोई पहल नही की । और खास बात ये है कि अमेरिका के ग्लोबल आतंकवादियों की सूची में 274 नाम है । इसी बरस 25 आतंकवादियों को इस सूची में डाला गया है । यानी नया नाम सैययद सलाउद्दीन का है तो नया सवाल कश्मीर का है। क्योंकि 1989 में सलाउद्दीन  घाटी के इसी आतंकी माहौल के बीच सीमापार गया था और तभी से पाकिस्तान ने अभी तक सैय्यद सलाउ्द्दीन को अपने आतंक के लिये सलाउद्दीन को ढाल बनाया  हुआ था। लेकिन सवाल है कि क्या वाकई अमेरिकी ग्लौबल टैरर लिस्ट में सैयद सलाउद्दीन का नाम आने से हिजबुल के आंतक पर नकेल कस जायेगी। तो जरा आतंक को लेकर अमेरिकी की समझ को भी पहले समझ लें । दरअसल 16 बरस पहले अमेरिकी  वर्लड ट्रेड टावर पर अलकायदा के हमले ने अमेरिका को पहली बार आतंकवादियों की लिस्ट बनाने के लिये मजबूर किया ।

और बीते 16 बरस में अलकायदा के 34 आतंकवादियों को अमेरिका ने ग्लोबल टैरर लिस्ट में रख दिया । लेकिन आतंक का विस्तार जिस तेजी से दुनिया में होता चला गया उसका सच ये भी रहा कि बीते सोलह बरस में एक लाख से ज्यादा लोग आतंकी हिंसा में मारे गये । और अमेरिकी टेरर लिस्ट में अलकायदा के बाद इस्लामिक स्टेट यानी आईएस के 33  आतंकवादियों के नाम शामिल हुये। लेबनान में सक्रिय हिजबुल्ला के 13 आतंकवादी तो हमास के सात आंतकवादियो को ग्लोबल टैटरर लिस्ट में अमेरिका  ने डाल दिया । अमेरिकी लिस्ट में लश्कर और हक्कानी गुट के चार चार आतंकवादियों को भी डाला गया । यानी कुल 274 आंतकवादी अमेरिकी लिस्ट में  शामिल है । और अब कल ही सैयद सलाउद्दीन का नाम भी अमेरिकी ग्लोबल टैरर लिस्ट में आ गया । तो याद कर लीजिये जब पहली बार सलाउद्दीन ने बंदूक ठायी थी । 1987 के चुनाव में कश्मीर के अमिरकदल विधानसभा सीट से सैयद सलाउद्दीन जो तब मोहम्मद युसुफ शाह के नाम से जाना जाता था। मुस्लिम यूनाइटेड फ्रांट के टिकट पर चुनाव लड़ा। हार गया। या कहें हरा दिया गया। तब युसुफ शाह का पोलिंग एंजेट यासिन मलिक था। जो अभी जेकेएलएफ का मुखिया  है। और पिछले दिनो पीडीपी सांसद मुज्जफर बेग ने कश्मीर के हालात का बखान करते करते जब 1987 का जिक्र ये कहकर किया कि सलाउद्दीन हो या यासिन मलिक  उनके हाथ में बंदूक हमने थमायी। यानी उस चुनावी व्यवस्था ने दिल्ली के इशारे पर हमेशा लूट लिया गया। तो समझना होगा कि अभी कश्मीर में सत्ता पीडीपी की ही है। और पहली बार कश्मीर की सत्ता में पीडीपी की साथी  बीजेपी है जिसे घाटी में एक सीट पर भी जीत नहीं मिली।

इसी दौर में पहली बार किसी कश्मीरी आतंकवादी का नाम अमेरिका के अपनी ग्लोबल टैरर लिस्ट में डाला है। यानी उपरी तौर पर कह सकते हैं कि पाकिस्तान को पहली बार इस मायने में सीधा झटका लगा है कि कश्मीर की हिंसा को वह अभी तक फ्रीडम स्ट्रगल कहता रहा। कभी मुशर्रफ ने कहा तो पिछले दिनो नवाज शरीफ ने यूनाइटेड नेशन में कहा। और इसकी वजह यही रही कि भारत ने कश्मीरियों की हिसा को आतंकवाद से सीधे नहीं जोडा लेकिन अब जब सैयद सलाउद्दीन का नाम  ग्लौबल टैरर लिस्ट में डाला जा चुका है तो अब कशमीरियो की हिसा भी आंतकवाद के कानूनी दायरे में ही आयेगी । लेकिन भारत के लिये आंतक से  निपटने का रास्ता अमेरिकी सूची पर नहीं टिका है । क्योंकि सच तो ये भी है कि अमेरिकी ग्लोबल लिस्ट में जिस भी संगठन या जिस भी आतंकवादी का नाम है  उसकी आंतकवादी घटनाओ में कोई कमी आई नहीं है । यानी सिर्फ ग्लोबल टैरर लिस्ट का कोई असर पड़ता नहीं । और तो और यूएन की लिस्ट में लश्कर के हाफिज  सईद का नाम है । लेकिन हाफिज की आतंकी कार्रवाई थमी नहीं है । कश्मीर में आये दिन लश्कर की आंतकी सक्रियता आंतक के नये नये चेहरो के जरीये जारी है । यानी अमेरिकी पहल जब तक पाकिसातन को आंतकी देश घोषित नहीं करती तब तक पाकिस्तान पर कोई आर्थिक प्रतिबंध लग नहीं सकता । और प्रतिबंध ना लगने का मतलब अरबो रुपयो की मदद का सिलसिला जारी रहेगा । यानी अमेरिका अपनी सुविधा के लिये भारत के साथ खडा होकर उत्तर कोरिया का नाम लेकर चीन पर निशाना साध सकता है । लेकिन पाकिसातनी आंतकी संगठन जैश ए मोहम्मद के मुखिया अजहर मसूद को यूएन में चीन के क्लीन चीट पर भारत के साथ भी खडा नहीं होता। पाकिस्तान को आंतकी राज्य नहीं मानता क्योंकि अफगानिस्तान में उसे पाकिसातन की जरुरत है । तो फिर गले लगकर आतंक से कैसे लड़ा जा सकता है जब गले लगना गले की फांस बनती हो ।

‘मिट्टी’ से ‘मिट्टी’ तक ज़िंदगी का सफ़र

शब्दों का सफर - Tue, 27/06/2017 - 21:27
मौ त जैसी अनिवार्य सचाई के लिए विश्व की अनेक भाषाओं में एक जैसे शब्द हैं। इनका विकासक्रम भी एक जैसा है और अर्थछायाओं में भी ग़ज़ब की समानता है। मिटने-मिटाने की बात दुनियाभर की अनेक भाषाओं में ‘मिट्टी’ का रिश्ता जीवन से जोड़ा जाता है मसलन- “किस मिट्टी से बने हो” जैसे वाक्यांश से यह जानकारी मिलती है कि इनसान का शरीर मिट्टी से बनता है। स्पष्ट है कि मिट्टी में जननिभाव है। मिट्टी की पूजा होती है। मिट्टी को माँ कहा जाता है। धरतीपुत्र दरअसल मिट्टी का बेटा है। दूसरी ओर मृत्यु का रिश्ता भी मिट्टी से ही है। ज़िंदा जिस्म को मिट्टी कहा जाता है तो मृत देह को भी मिट्टी कहा जाता है। “मिट्टी में मिलाना” मुहावरे में नष्ट करने, अस्तित्व समाप्त कर देने का भाव है। ‘मिट्टी उठाना’ का भाव अर्थी निकालना है। मिटना, मिटाना, मटियामेट जैसे शब्दों के मूल में मिट्टी ही है। मर्दन से अमृत तक प्राकृत के मिट्टिआ से मिट्टी रूप विकसित हुआ है। मिट्टिआ का संस्कृत रूप ‘मृत्तिका’ है। मृत्तिका और मातृका की समरूपता, जो वर्ण और स्वर दोनों में नज़र आती है, पर ज़रा विचार करें। इस पर विस्तार से आगे बात होगी। संस्कृत में मृद् क्रिया है। इससे ही बनता है मर्दन जैसे मानमर्दन करना। मृद् में दबाना, दलना, रगड़ना, खँरोचना, मिटाना, पीसना, चूरना, तोड़ना, रौंदना जैसे भाव हैं। ध्यान रहे, मिट्टी मूलतः चूरा है, कण है जो उक्त क्रियाओं का नतीजा है। इसके अलावा मृद् का अर्थ भूमि, क्षेत्र, काया अथवा शव भी है। मृद् से मृदु, मृदुता, मृदुल आदि भी बनते हैं जिनमें नर्म, ढीला, हल्का, मंद, नाज़ुक, कोमल या कमज़ोर जैसा भाव है। पीसना, रोंदना दरअसल मृदु या नर्म बनाने की क्रियाएँ ही हैं। मृद् का ही एक अन्य रूप मृत है जिसका अर्थ है शव। अमृत का अर्थ हुआ अनश्वर, अविनाशी। सेमिटिक से भारोपीय तक सामी (सेमिटिक) भाषाओं में भी यह शृंखला पहुँचती दिख रही है। संसार की प्राचीनतम और अप्रचलित अक्कादी भाषा जो अब सिर्फ़ कीलाक्षर शिलालेखों में जीवित है, में मिद्रु मिदिर्तु जैसे शब्द हैं जो मूलतः भूमि से जुड़ते हैं। मिद्रु का अर्थ है ज़मीन, इलाक़ा, धरा, क्षेत्र या पृथ्वी। इसी तरह मिदिर्तु में बाग़ीचा अथवा उद्यान-भूमि का आशय है। हिब्रू के मेदेर में कीचड़, पृथ्वी, सीरियक के मेद्रा में मिट्टी, शव, लोंदा जैसे अर्थ हैं। अरबी में एक शब्द है मदार (वृत्त वाला नहीं जिससे मदरसा बना है) जिसका अर्थ है धरती। गीज़ के मीद्र में मैदान, पृथ्वी, क्षेत्र, देश जैसे आशय प्रकट होते हैं। मृत्तिका से मातृका तक स्वाभाविक है कि पृथ्वी का जो आदिम रूप हमारे सामने है, पृथ्वी का जो पहला अनुवभव हमें है वह उसका मिट्टी रूप ही है इसीलिए पृथ्वी की तमाम संरचनाएँ भी मिट्टी से निर्मित हैं। पृथ्वी का समूचा विस्तार जिसे हम देश या क्षेत्र कहते हैं, मिट्टी निर्मित ही है। मृद् से बनता है मृदा जिसका अर्थ है मिट्टी, धरती, पृथ्वी, देश, भूभाग, काया, मृदा, शव, बालू आदि। टीला, पहाड़, सपाट सब कुछ माटी निर्मित है। मिट्टी के सम्पर्क में आकर सब कुछ मिट्टी हो जाता है। मिट्टी ही देश है, मिट्टी ही जन्मदात्री है, मिट्टी मृत्तिका से है, मिट्टिका और मृत्तिका समरूप हैं। मृत्तिका का एक रूप मातृका भी हो सकता है। मातृ में भी पृथ्वी का भाव है और ‘माँ’ तो ज़ाहिर है। मातृका भी मिट्टी यानी माँ है। मूल ध्वनि या पद में अनेक सर्गों-प्रत्ययों और स्वर जोड़ कर अर्थ-विस्तार होता है। मृत्- मृद्- मृन्- मृण्- गाँव दरअसल एक क्षेत्र है। देहात में गाँव के बाहर छोटी छोटी पिण्डियों में मातृकाएँ स्थापित की जाती हैं जो ग्रामदेवी का रुतबा रखती हैं। अर्थात वे गाँव की जन्मदात्री, रक्षक और पालनहार हैं। मृत्तिका में जो मृत्त है उसका रूपान्तर मृद् है जिसका अर्थ ऊपर स्पष्ट किया है। मृद् का ही एक अन्य रूप है मृण जिसमें रगड़ने, तोड़ने, दलने का भाव है और प्रकारान्तर से कण या मिट्टी का बोध होता है। मृण्मय का अर्थ होता है माटी निर्मित्त। इसका मृन्मय रूप भी है। मृत् में भी वही सारी अर्थछायाएँ हैं जो मृद् में हैं। इस तरह मृत्- मृद्- मृन्- मृण्- जैसे शब्दशृंखला प्राप्त होती है जिसमें रूपान्तर के साथ अर्थान्तर नहीं के बराबर है। मृण का अर्थ तन्तु भी है। मूल भाव सूक्ष्म, तनु, छोटा, बारीक आदि सुरक्षित है। भाषाशास्त्र के विद्वान क्या सोचते हैं, ये अलग बात है। हमने अपना मत रखा है। मर्द और मुरदा फ़ारसी मुर्दा दरअसल मुर्दह् है। इसका संस्कृत समरूप मृत भी है और मुर्त भी। मुर्दा’/ मुरदा दरअसल मुर्दह् में जुड़े अनुस्वार की वजह से होता है। ‘ह’ वर्ण का लोप होकर ‘आ’ स्वर शेष रहता है। इस तरह देखें तो संस्कृत ‘मुर्त’ और फ़ारसी ‘मुर्द’ समरूप हैं। मृदा अगर मिट्टी यानी लाश है तो मुर्दा भी। अर्थ दोनों का ही शव है। मुर्द का ही एक अन्य रूप मर्द है। प्लैट्स इसका रिश्ता मर्त्य से जोड़ते हैं। पर संस्कृत में मर्त अलग से है। मर्द का अर्थ है आदमी, पुरुष, पति, भर्तार, बहादुर अथवा दुष्ट, नायक अथवा खलनायक, एक सभ्य व्यक्ति। दरअसल यहाँ भी बात मिट्टी से जुड़ रही है। मर्त्य यानी नाशवान। जिसे नष्ट हो जाना है। ये अलग बात है कि इसका पुरुषवाची अर्थ रूढ़ हुआ पर आशय मनुष्य (मरणशील) से ही रहा होगा, इसमें शक नहीं। मर्द से बना मर्दानगी शब्द पुरुषत्व का प्रतीक है। नामर्द का अर्थ कापुरुष होता है। मर्दुमशुमारी भी हिन्दी में जनसंख्या के अर्थ में प्रचलित है। ‘मर्दों वाली बात’ मुहावरा भी खूब प्रचलित है। आशय पुरुषोचित लक्षणों से है। मौत के रूप मौत जैसी अनिवार्य सचाई के लिए विश्व की अनेक भाषाओं में एक जैसे शब्द हैं। इनका विकासक्रम भी एक जैसा है और अर्थछायाओं में भी ग़ज़ब की समानता है। मृद का मृत रूप ‘मृत्यु को प्राप्त’ का अर्थ प्रकट करता है। मृत्यु का अर्थ है मरण। मृतक का अर्थ शव है। फ़ारसी में मृतक को मुर्दा कहते हैं। जिस तरह मिट्टी यानी धूल, गर्द, मुरम है उसी तरह मिट्टी यानी जीवित या मृत काया भी है। मृण्मय के मृण् का अर्थ यद्यपि पीसना, दबाना, चूरा करना है साथ ही इसका एक अर्थ नाश अथवा मार डालना भी है। मृण से मरण को सहजता से जोड़ सकते हैं जिसमें मृत्यु का भाव है। हम व्याकरण की ओर नहीं देख रहे हैं। शह, मात और मातम शतरंज का मशहूर शब्द है शह और मात। इसमें जो शह है वह दरअसल फ़ारसी शब्द है और बरास्ता पहलवी उसका मूल वैदिकयुगीन क्षय् अथवा क्षत्र है जिसमें उपनिवेश, स्वामित्व, आधिपत्य, राज्य, इलाक़ा जैसे भाव हैं। बाद में राजा के अर्थ में शाह शब्द इससे ही स्थापित हुआ। शतरंज के शह में मूलतः बढ़ने का भाव है। मगर हमारा अभीष्ठ ‘मात’ से जुड़ा है। यह जो मात है, दरअसल मौत से आ रहा है। सेमिटिक मूल क्रिया م و ت अर्थात मीम-वाओ-ता से अनेक सामी भाषाओं में बने रूपान्तरों में ‘मात’ मौजूद है जिसका अर्थ है मरण। मसलन हिब्रू, उगेरिटिक और फोनेशियन में यह मोत है। हिब्रू में ही इसका एक रूप मवेत भी है। असीरियाई में यह मुतु (मृत्यु से तुलनीय) है तो अक्कादी में मित्तुतु है। सीरियक में यह माव्ता है तो इजिप्शियन में mwt है। मृत्यु का शोक होता है सो मौत से ही अरबी में बना मातम जो हिन्दी में भी प्रचलित है। इस विवेचना के बाद अंग्रेजी के मॉर्टल, मर्डर, मोर्ट, इम्मॉर्टल (अमर्त्य), पोस्टमार्टम अथवा मॉर्च्युअरी जैसे शब्दों को इस शृंखला से बड़ी आसानी से जोड़ कर देख सकते हैं।

ये सफर आपको कैसा लगा ? पसंद आया हो तो यहां क्लिक करें

Pictures have been used for educational and non profit activies. If any copyright is violated, kindly inform and we will promptly remove the picture.

धर्मांधता के विरोध का एक अलग रास्ता है कांदीद

पहलू - Tue, 27/06/2017 - 15:04

अब से कोई 250 साल पहले दक्षिणी फ्रांस में धर्मांध ईसाइयों ने एक तर्कवादी नौजवान को पकड़ कर धार्मिक अदालत में उस पर धर्मद्रोह का मुकदमा चलाया, और फिर एक ठूंठ से बांधकर उसे जिंदा जला दिया। बात चिंतक, दार्शनिक और लेखक वॉल्तेर तक पहुंची तो इसी आघात में उन्होंने अपना कमरा भीतर से बंद कर लिया और 72 घंटे तक बाहर ही नहीं निकले। आखिरकार वे निकले तो उनके हाथ में स्याही की दावात में पंख डुबो-डुबो कर लिखे हुए कागजों का एक पुलिंदा था, और भीतर इतनी सारी थकान कि बाहर निकलते ही बेहोश हो गए। सन 1759 में आई उनकी इस रचना को हम कांदीद के नाम से जानते हैं, जिसे ब्रिटिश आलोचक मार्टिन सेमूर स्मिथ ने अब से कोई बीस साल पहले जारी दुनिया की 100 सबसे असरदार किताबों की सूची में शामिल किया।हर पंक्ति में चौंकाने और हंसाने वाले इस पतले से उपन्यास का बहुत पुरानी छपाई वाला एक फटा-चिटा संस्करण इलाहाबाद में संभवत: 1985 में मेरे हाथ लगा था। उसका अनुवादक और प्रकाशक कौन था, इसका कोई जिक्र किताब में मिलने का सवाल ही नहीं था। लेकिन आज भी यह सोचकर हैरानी होती है कि ऐसे मौलिक किस्म के अनुवाद कभी हिंदी में आया करते थे। बाद में इसी किताब का चटख-चमकीला सजिल्द संस्करण 1997 में मुझे दिल्ली में मिला, लेकिन इसमें वह बात नहीं थी। न भाषा की रवानी, न कथ्य की समझ। और कीमत ऐसी कि खरीदने से पहले कोई चार बार इधर-उधर देखे। साफ था कि जो प्रेरणा कांदीद को कभी फ्रेंच से हिंदी में लाई होगी, वह भारतीय समाज की बहुत सारी अच्छी चीजों की तरह बीच के सालों में कहीं गुम हो चुकी थी।बहरहाल, कांदीद की कहानी पर बात करते हैं। एक खानदानी नौजवान कांदीद किसी लड़की से प्रेम करता था। लड़की के बाप की नामंजूरी के बावजूद दोनों की शादी भी होने वाली थी, लेकिन एक तूफानी घटना प्रवाह में लड़की बिना कोई संदेश छोड़े कहीं गुम हो गई और कांदीद का दिल बुरी तरह टूट गया। अथाह हताशा से घिरे हुए इस युवक की मुलाकात दार्शनिक पांग्लोस से हुई, जो गणितज्ञ दार्शनिक लाइबनिज के विचारों से प्रभावित थे। लाइबनिज की ख्याति न्यूटन के समानांतर ‘डिफरेंशियल कैलकुलस’ की खोज करने वाले जीनियस के अलावा एक आशावादी दार्शनिक के रूप में भी है, यह बात मुझे अभी हाल में पता चली। उनके दर्शन का सूत्रवाक्य यह है कि ‘सभी संभव दुनियाओं में यह दुनिया सबसे अच्छी है।’ और यह भी कि ‘जो भी होता है, वह अच्छे के ही लिए होता है।’ इन सूत्रवाक्यों की पांग्लोसियन व्याख्याएं भग्नहृदय कांदीद को अपने दिल पर मरहम सरीखी लगीं। वॉल्तेर का उपन्यास गुरु और शिष्य के कुछ ऐसे ही निर्दोष संवादों से होता है।पांग्लोस बताते हैं कि इंसान के पैर इस तरह वक्राकार इसलिए बनाए गए, ताकि वे जूतों में अच्छी तरह अंट सकें, और कांदीद को अपनी प्रेमिका का बिछोह इसलिए झेलना पड़ा, ताकि वह स्वयं पांग्लोस जैसे महा आचार्य का शिष्य बन सके। कांदीद अपने गुरु की बातें श्रद्धापूर्वक सुनता है, लेकिन बीच-बीच में ऐसी टिप्पणियां भी करता है, जिससे उसके दिल के दाह का अंदाजा लगाया जा सके। स्वयं आचार्य भी बीच-बीच में उसके इन जले-बुझे सवालों से छनछना जाते हैं, लेकिन उनके भोजन-पानी की व्यवस्था शिष्य कांदीद के ही जिम्मे है, लिहाजा उसे लतिया कर भगा देना भी उनके बूते से बाहर है। किताब बहुत पहले पढ़ी हुई है, लिहाजा कहानी में कुछ टेढ़ भी हो सकती है, लेकिन जहां तक याद पड़ता है, यह गुरु-शिष्य युगल सुनी-सुनाई बातों के आधार पर कांदीद की प्रेमिका को ढूंढने और खुद के लिए सुख-चैन की जिंदगी तलाशने के लिए दर-दर भटकता है। यहां तक कि एक बार उसे एक बेहद कष्टसाध्य समुद्री यात्रा पर भी निकलना पड़ता है।इस दौरान आचार्य पांग्लोस हर अच्छी-बुरी चीज का आशावादी औचित्य बताते हैं, जबकि कांदीद उनके फूले हुए दार्शनिक गुब्बारे को अपनी तीखी यथार्थवादी टिप्पणियों से पंचर कर देने का एक भी मौका हाथ से जाने नहीं देता। इस पूरे किस्से का समय क्या है, इसका अंदाजा किताब से लगाना मुश्किल है। लेकिन इसमें 1755 में पुर्तगाल की राजधानी लिस्बन में आए एक भीषण भूकंप का भी जिक्र है, जिससे लगता है कि यह एक रीयल-टाइम नॉवल है। बिना किसी घोषित दार्शनिक विमर्श के इस उपन्यास में हर पवित्र चीज की धज्जियां उड़ाई गई हैं। ईसाइयत की, इस्लाम की, अठारहवीं सदी की तमाम यूरोपीय सरकारों की- जिनमें ब्रिटेन को छोड़कर सब की सब विशुद्ध सामंती सत्ताएं ही थीं। हालांकि ब्रिटेन की संसदीय राजतांत्रिक व्यवस्था को लेकर भी इसमें कोई अच्छी राय नहीं है। और तो और, परिवार और प्रेम जैसी पवित्रतम संस्थाओं को भी ‘कांदीद’ में बख्शा नहीं गया है।हर तरफ से लात-जूते खाकर कांदीद अपनी कटखनी प्रेमिका और घोंचू दार्शनिक गुरु के साथ जब महानगरों से दूर एक छोटे से गांव में बसने का फैसला करता है तो मौका देखकर गुरुवर पांग्लोस उसे अपने अंतिम दार्शनिक निष्कर्ष से अवगत कराते हैं- ‘यह ठीक है कि इस कठिन जीवन अनुभव में तुम्हारी प्रेमिका का एक नितंब काट लिया गया, तुम्हारी एक आंख तिरछी देखने लगी और मुझे अपनी एक टांग गंवानी पड़ी, हम सब अपने मुल्क से दर-ब-दर होकर, अपनी जड़ों से कट कर इस अनजानी जगह बसने को मजबूर हैं, लेकिन अंतत: सब कुछ अच्छे के ही लिए होता है, क्योंकि यह सब न होता तो हमें इतने मीठे अंजीर कैसे खाने को मिलते?’ उनके इस दार्शनिक उत्साह को कांदीद उपन्यास के इस अंतिम वाक्य से ठंडा कर देता है कि- ‘वह सब तो ठीक है गुरुजी, लेकिन खुरपी आप जरा अच्छे से चलाइए। मैं देख रहा हूं कि खेतों से घास निकालने के काम में पिछले कई दिनों से आप पर्याप्त चुस्ती नहीं दिखा रहे।’अन्याय-अत्याचार का तुर्की-ब-तुर्की जवाब देने या इसके विरोध में हथियार उठाने की बात तो बहुत लोग करते हैं, लेकिन इसका एक तरीका वॉल्तेर का भी था, जिस पर किसी का ध्यान नहीं है। धर्मांध ईसाइयों के हाथों मारे गए उस निर्दोष तर्कवादी नौजवान की मृत्यु का बदला वॉल्तेर ने अपनी इस किताब के रूप में इतने मार्मिक ढंग से लिया कि यथार्थ पर धारणाओं को तरजीह देने वाली सोच के खिलाफ ‘कांदीद’ को आज भी सबसे मजबूत औजार समझा जाता है। कवि त्रिलोचन कहा करते थे, अन्याय-अत्याचार से लड़ने का एकमात्र साहित्यिक तरीका व्यंग्य का है। इसीलिए वे दलित और अल्पसंख्यक साहित्यकारों को धीरज के साथ व्यंग्य की साधना करने की सलाह देते थे। लेकिन इस रास्ते पर कामयाबी के साथ आगे बढ़ता हुआ अभी तक तो कोई नहीं दिख रहा।

रंगीली के होटल की खिचड़ी : कमल जोशी

लेखक मंच - Mon, 26/06/2017 - 11:32

कर्मठ रंगीली।

हालत कुछ-कुछ डिप्रेशन जैसे थे। भारी उदासी घेरे थी। कुछ दिन पहले ही तबियत खराब हुई थी और उससे जल्दी उबर नहीं पा रहा था। पहले भी तबियत खराब होती थी, परन्तु हफ्ते भर में ही खुद को फिट समझने लगता था। इस बार डेढ़ महीना हो गया था। शरीर दुरुस्त नहीं लग रहा था। एक डर सा मन में बैठ गया था कि क्या अब बुढ़ापा आ ही गया। सफेद दाढ़ी और कुल जमा बासठ साल तो शीशा देखते ही चिल्लाने लगते कि‍ भाई तुम बुढ़ापे में कदम रख चुके,  लेकि‍न वह गाना है ना- ‘दिल है के मानता नहीं..,’ की तर्ज पर दिमाग भी अभी तक स्वीकार नहीं कर पा रहा था कि‍ असलियत तो असलियत है…कब तक सींग कटा कर बछड़ों में शामिल हुआ जा सकता है?

पर आवारागर्दी अजीब लत होती है। इसीलिए डिप्रेशन की सी अनुभूति हो रही थी की- सुख भरे दिन गए रे भैया !

पर जैसा मैंने ऊपर लिखा ही है- ‘दिल है के मानता नही’- मैंने जिंक्स तोड़ने का मन बनाया और तय कर लिया कि चमोली जिले की ओर निकला जाए, जहां इस चाचा का भतीजा मधु है, जो जरूरत पड़ने पर देखभाल कर सकता है- बिना मुंह बनाए।

महीना अक्‍टूबर का था। सुबह हवा में खुनक थी। बादलों के दो बच्चे आसमान में धमा चौकड़ी करने की तर्ज में डराने लगे, पर मैं डरा नहीं और लगभग 6:30 पर फटफटिया स्टार्ट कर चल पड़ा। मूड अभी भारी ही था और मन अन्यमयस्क।

दस बजे के आसपास बुवाखाल पहुंचा, हिमालय भी दिखा, पर मन खिला नहीं। एक होटल में थोड़ा नाश्ता किया और पौड़ी होते हुए श्रीनगर की उतार पार की। श्रीनगर पार करते हुए कई परिचित चेहरे भी दिखे, पर मैंने बाइक रोकी नहीं। और मेरे हेलमेट की वजह से वे मुझे पहचान भी नहीं पाए। सर्र से श्रीनगर भी पार हो गया।

मुझे खाना खाने के लिए घोलतीर पहुँचना था, जहां मधु से मुझे मिलना था। वह दो बजे तक पहुँचने वाला था। इसलिए मेरे पास काफी समय था। मैं अब आराम से धीरे-धीरे फटफटिया चलाने लगा। थोड़ा आगे बढ़ा था कि‍ मुझे दो बच्चे सड़क के किनारे दिखे। दोनों भाई की तरह लग रहे थे। एक की उम्र दस ग्यारह साल और दूसरे की छह-सात साल। मैं आराम से बाइक चला रहा था। बच्चे मुझे देखते रहे। बाइक के बहुत करीब पहुँचने पर अचानक छोटे वाले ने मुझे रुकने के लि‍ए हाथ दिया। मुझे एकदम ब्रेक लगाने पड़े। तब भी थोड़ा आगे निकल गया। मैंने पीछे मुड़ कर उनकी ओर देखा। बच्चों को शायद आशा नहीं थी कि‍ मैं फटफटिया रोक दूंगा। वे सकपका से गए। मैंने पूछा, ‘‘क्या है?’’  बड़े बच्चे ने छोटे की तरफ इशारा करते हुए कहा, ‘‘इसने हाथ दिया।’’

अब मैंने छोटे बच्चे की तरफ प्रश्‍नवाचक दृष्टि से देखा। वह चुप ही रहा। मैंने अपने चहरे के भाव दुरुस्त किए और हंसते हुए पूछा, ‘‘क्यों हाथ दिया बताओ!’’ अब शायद बच्चों को लगा कि‍ बताने में कोई खतरा नहीं है, तो बड़े वाला बोला, ‘‘हमें आगे जाना है। रुद्रप्रयाग तक।’’ वे लिफ्ट मांग रहे थे। मेरे बैठो बोलने की देर थी कि‍ छोटा बच्चा इस गति से पिछली सीट पर चढ़ गया कि‍ एक बारगी तो मैं डिसबैलेंस ही हो गया था। दोनों बच्चे पिछली सीट पर जम गए। छोटे वाले बच्चे ने मुझे बन्दर के बच्चे की तरह कस कर पकड़ लिया। फटफटिया चलने से पहले मैंने उनसे पूछा, ‘‘ठीक से बैठे हो ना..गिरना मत।’’ तो उन्होंने ‘हाँ’ कहा और छोटे ने तो मेरी जैकेट इतनी कस कर पकड़ ली कि‍ उसकी अंगुलि‍यां मुझे चुभने लगीं।

मैं उनसे बात करते हुए बाइक चलना चाहता था, पर हेलमेट की वजह से उनके जवाब मुझे सुनाई नहीं दे रहे थे। मैंने बाइक रोकी,  हेलमेट उतारा कर हैंडल में लटका दिया। ऐसा करना नहीं चाहिए था, पर मैंने तय किया कि‍ हेलमेट उतार कर बाइक बहुत धीरे चलाऊंगा। तभी छोटे वाले ने मेरा हेलमेट माँगा और पहन लिया। हमारी गपशप शुरू हुई। पता चला कि‍ उनके नाम दीवान सिंह और हयात सिंह हैं। जहां वे खड़े थे, वहीं ऊपर उनका गाँव है। वे रुद्रप्रयाग अपने चाचा की लड़की के नामकरण पर जा रहे हैं और गाडी़ का इंतजार कर रहे थे।

‘‘तुम्हें अकेले कैसे भेज दिया माँ-बाप ने।’’ मैंने पूछा, तो दीवान,  जो बड़ा था,  ने मुझे बताया कि‍ माँ तो कई दिन से चाची के साथ ही है। पिता शाम को आएंगे। बच्चों ने पहले जाकर भूली को देखने की जिद की तो उन्हें किराया देकर सड़क पर भेज दिया। वे पहले भी इस तरह अकेले चाचा के घर जा चुके हैं। बच्चों को पारिवारिक ज्ञान भी था। बताया कि‍ उनकी बड़ी बहन अब काफी ‘बड़ी’  हो गई है। अब उसके लिए लड़का ढूंढ़ा जा रहा है। मेरी समझ में नहीं आया कि‍ इन बच्चों की शादी लायक बड़ी बहन कैसे हो सकती है। मैंने पूछा कि‍ बहन काफी बड़ी है, क्या?  तो छोटा बोला, ‘‘भोत बड़ी है। हमको मारती भी है।’’ उसके चेहरे पर पिटने का बहुत रोष रहा होगा, जो मैं देख नहीं पाया। बात आगे बढ़ाने के लिए मैंने पूछा कि‍ कहीं कोई लड़का देखा है। बड़ा बड़े ही प्रौढ़ अंदाज में बोला, ‘‘हाँ, देख रहे हैं। बात चल रही है!’’ उसकी बात पूरी ही हुई थी कि‍ छोटा वाला बोला, ‘‘बस दारू पीने वाला नहीं होना चाहिए!’’  इतने छोटे बच्चे के मु्ंह से यह बात सुनकर मैं अचम्भित रह गया। मैंने उससे ही पूछा, ‘‘क्यों दारू पीने से क्या होता है।’’ तो वह बोला, ‘‘दारूडी लोग ठीक नहीं होते। हमारे स्कूल में मास्टर दारूडी है। पढाता नहीं….मारता है!’’ फिर कुछ देर रुककर बोला, ‘‘नाक में दम कर रखा है, माचेत ने।’’  मैंने बाइक रोक कर गर्दन घुमाकर उसकी नाक देखने की कोशिश की। हेलमेट के भीतर से नाक ही नहीं दिखाई दे रही थी, दम कहाँ से दिखता। मैंने उससे कहा, ‘‘तुम्हारी नाक में तो दम दिखाई नहीं दे रहा।’’ वह पहले चौंका। फिर मेरे व्यंग्‍य को समझकर दोनों भाई हंसने लगे। मैंने उनसे पूछा कि‍ क्या सभी मास्टर ऐसे होते हैं, तो बड़े वाला बोला कि‍ नहीं ज्यादातर मास्टर तो अच्छे हैं। बस वह ही खराब हैं- ‘‘कभी स्कूल आते हैं कभी नहीं, पढा़ते भी नहीं। कुछ पूछो तो चिढ़ जाते हैं, पीटता भौत है।’’ अब मैं समझा कि‍ छोटे ने क्यों तय किया कि वह जीजा के रूप में किसी दारू पीने वाले को स्वीकार नहीं कर सकता।

रुद्रप्रयाग से पहले कुछ दुकानों के पास दीवान बोला, ‘‘बस…बस… हमें यहीं उतार दो!’’ मैंने बाइक में ब्रेक लगाए। फटफटिया रुकते ही दोनों बच्चे उतर गए। मैं कुछ कहता उससे पहले ही छोटा वाला बोला, ‘‘हमसे किराये के पैसे लोगे तुम!’’  मैंने उसके भोलेपन पर फिदा होते हुए कहा, ‘‘वैसे तो लेता, पर तुम दोनों अब दोस्त हो गए हो इसलिए नहीं लूंगा।’’ फिर दोस्ती को मजबूत करने के लिए मैं भी बाइक से उतरा और पास की दुकान से तीन बिस्कुट लिए। दो उन दोनों को दिए और एक खुद खाने के लिए सड़क के किनारे के पैरापिट पर बैठ गया। वे दोनों बच्चे भी वहीं बैठकर बिस्कुट खाने लगे। बड़े वाले ने मेरा नाम पूछा तो मैंने अपना नाम बताया। दीवान बोला कि हमारे साथ चलो, आज घर में पूरी-पकौड़ी बनी होंगी, खाकर जाना। मैने मना किया तो छोटा बोला, ‘‘चलो, चाचा जी कुछ नहीं कहेंगे।’’ उन्‍हें लगा कि शायद मैं हिचकिचा रहा हूं। उसने फिर पूछा कि‍ कहाँ जा रहे हो। मैंने बताया कि‍ आवारागर्दी करने। छोटे को शायद अवारागर्दी का मतलब समझ नहीं आया, पर बड़ा बोला, ‘‘झूठ।’’  मैंने कहा, ‘‘हां, सच में।’’ तो वह बोला, ‘‘बुड्ढे़ भी कभी आवारागर्दी करते हैं।’’ मैं उन्हें क्या बताता कि‍ मैं तो बिगड़ा हुआ बुड्ढा़ हूँ!

बिस्कुट हम लोगों ने निपटा लिए थे। विदा होने की बारी थी। मैंने कहा कि‍ मैं चलता हूँ और अपनी मोटरसाइकिल पर बैठ गया। एक झिझक के बाद छोटा वाला हयात सिंह आया और मेरी ओर हाथ बढ़ा कर हाथ मिलाने लगा। मैंने भी गर्मजोशी से उससे हाथ मिलाया। तभी बड़ा वाला भी दौड़कर आया और मुझसे हाथ मिलाने लगा। उनकी इस अदा से मुझे भरोसा हो गया कि‍ उन्होंने मुझे अपना पक्का दोस्त मान लिया है। जोर की ‘बाय’ के साथ मैं आगे बढ़ गया। अब मैं मोटरसाइकिल चलाते हुए मुस्करा रहा था और बेसुरे राग में गुनगुना भी रहा था। मुझे महसूस हुआ कि मैं बहुत खुश हूँ। डिप्रेशन गायब हो चुका था।

दो बजे के आसपास मैं घोलतीर पहुंचा। वहां भतीजा मधु और बहू इंतजार कर रहे थे। मेरी पसंद का पहाड़ी खाना और चटनी बनी थी। खाना खाकर, तृप्त होकर मैंने इजाजत ली और उखीमठ के लिए रवाना हो गया। रात उखीमठ से आगे उनियाना में गुजारी। दो सौ रुपये में खाने के साथ साफ-सुथरा कमरा मिल गया था। आज मैं मद्महेश्वर पहुँचना चाहता था। बाहर साफ धूप थी। बाइक से ही रांसी पहुंचा और एक होटल में नाश्ता किया। होटल क्या था दुकांन थी,  जहां सामान के साथ-साथ दुकानदार नाश्ता भी बना रहा था। नाश्ता करने के बाद मैंने उससे कहा की मैं मद्महेश्वर जा रहा हूँ। दो दिन तक मोटरसाइकिल खड़ी करनी है। कहाँ करूं? वह बोला कि‍ दुकान की साइड में चिपका कर खड़ी कर दो। कोई नहीं छेड़ेगा। उसके आश्वासन पर शत-प्रतिशत यकीन कर लिया, क्योंकि‍ वह किसी भी एंगल से नेता मार्का नहीं लग रहा था। मैंने मोटरसाइकिल उसके निदेशित स्थान पर खड़ी की, कवर लगाया और रांसी से गोंडार की ओर पैदल चल पडा़। कुछ दूर तक तो निर्माणाधीन मोटर रोड कटी हुई थी। उसके बाद खच्चर रास्ता था। जंगल धीरे-धीरे मदगंगा नदी की घाटी में उतरने लगा। पेड़ों से घिरा कैंचीदार रास्ता गोंडार की और जा रहा था। मैंने सोचा था कि‍ गोंडार तक का सात किलोमीटर का रास्ता मैं खाने के समय तक तय कर लूंगा। उसके बाद बचे हुए नौ किलोमीटर में से चौथे-पांचवे किलोमीटर पर किसी चट्टी पर रात काटूंगा और अगले दि‍न मद्महेश्वर चला जाऊंगा। गोंडार पहुंचने तक थक गया था। पहले ही ढाबे में पिट्ठू उतारा, अन्दर कोई नहीं था। मैं निराश बाहर निकल ही रहा था, तो देखा कि‍ एक औरत पीठ में लकड़ी लिए अन्दर आ रही है। उसने मुझे देखते हुए कहा, ‘‘टूरिस्ट?’’ मैंने मुंडी हिला कर ‘हाँ’ कहा तो वह बोली, ‘‘चाय पीनी है क्या?’’ मैंने सहमति में सर हिलाया। उसने तुरंत कमर पर धोती लपेटी और चूल्हे पर फूंक मार कर दबी आग को सुलगाया। उस पर पानी की केतली, जिस में पहले से ही पानी गुनगुना था, चढ़ा दी। मैंने पूछा कि‍ खाने के लि‍ए है कुछ तो वह बोली, ‘‘मैगी बना दूं क्या?’’ मैंने मना किया और बिस्कुट के बारे में पूछा। उसने ‘हाँ हैं’ कहा और एक बक्से से बिस्कुट निकाले। बिस्कुट लोकल बने थे और शायद कुछ पुराने ही थे। मैंने ध्यान से बिस्कुट देखे। कहीं भी फंगस नहीं लगी थी। मैंने उनको खाने का रिस्क ले ही लिया। महिला कुछ जल्दी में थी। मुझे चाय और दो अतिरिक्त बिस्कुट थमाते हुए बोली, ‘‘मुझे डंगरों के पास जाना है। चाय पीकर गिलास बाहर रख देना और पंद्रा रुपये चूल्हे के पास रख देना।’’ मैंने मजाक में कहा, ‘‘अगर बिना रखे चला गया तो?’’ वह हंसते हुए बोली, ‘‘किस्मत थ्वोड़ी लिजाला तुम!’’(किस्मत थोडे़ ही ले जाओगे तुम)। वह जाने को हुई तो मैंने उसे रोका और पन्द्रह रुपये दे दिए। उसने पैसे कमर में खोंसे और तेजी से चली गई। आगे के दो-तीन ढाबों में देखा कि‍ महिलाएं अपने पतियों के साथ होटल चलाने में हाथ बंटा रही थीं।

मैं आगे बढ़ गया, पैदल रास्ते में। मेरे आगे दो तीर्थयात्री जो पहाड़ के ही थे, चल रहे थे। पति-पत्‍नी प्रेम से बात शुरू करते, वह बहस में बदल जाती,  फिर लड़ते और गुस्से से चुप हो जाते। थोड़ी देर में फिर बात शुरू करते, फिर-फिर लड़ते और फिर से चुप हो जाते। उनकी बातों में मेरा रास्ता कटने लगा। अचानक मुझे भूख महसूस हुई, तो याद आया कि‍ गोंडार में खाना तो खाया ही नहीं। बिस्कुटों ने मेरी भूख मार दी थी। अब चढा़ई में भूख लगने लगी थी।

कुछ लोग मद्महेश्वर से वापस आ रहे थे। उन लोगों से पूछा तो बताया कि आगे तीन किलोमीटर खाना मिल सकता है। इसी आस में आगे बढ़ा।

अचानक जाने कहाँ से बादल आ गए। मौसम एक दम घिर गया। बादल गरजने लगे थे। मैं तेजी से आगे बढ़ने लगा। तीर्थयात्री अनुभवी महिला बोली, ‘‘बरिस आती है अब!’’ बादलों को मानो उसके कहने का ही इंतजार था! तेज बारिश पड़ने लगी। भाग्य से हमें 50 मीटर की दूरी पर टिन का बना शेल्टर दिखाई दिया। मैं और वह दम्पति दौड़ कर उसमें शरण लेने चले गए। वहां और लोग भी शरण लिए थे। अचानक ओले भी पड़ने लगे। बड़े-बड़े ओले! इतने बड़े ओले मैंने कभी देखे नहीं थे। मैं यह सोच ही रहा था कि‍ अगर हमें यह शेल्टर ना मिला होता तो सर फूटना तय था, तभी दो लोग पहुंचे। वे दौड़ कर आए। एक ने सि‍र पकड़ा हुआ था। शेल्टर में पहुँच कर जैसे ही उसने सि‍र से हाथ हटाया, पानी के साथ सि‍र से खून चहरे पर पहुँच गया। उसे यह चोट ओले से ही लगी थी। मेरे पास बेंड-ऐड थी। मैंने उसे लगाने के लि‍ए बेंड-ऐड दी, पर वह ठीक से चिपकी नहीं। तब तौलिये से उसका से सि‍र बांधा गया।

चारों तरफ ओलों से सफेद हो गया था। बारिश-ओले जिस तेजी से आए, उसी तेजी से बंद भी हो गए। आसमान साफ होने लगा। हम आगे बढे़। थोड़ा चलने के बाद हम उस जगह पहुंचे चट्टी में, जहां खाना मिल सकता था। वहां ताला लगा था। वहां एक लड़का था। उसने बताया कि‍ चट्टीवाला एक घंटे में आएगा। अभी वह बकरी चराने गया है। दम्पति वहीं सुस्ताने लगे। उनके पास कुछ चना चबेना था। उसे निकाल कर खाने लगे।

मेरी समझ में नहीं आया कि‍ मैं क्या करूं। मैंने लड़के से और जानकारी चाही, तो उसने बताया कि‍ आधा किलोमीटर आगे मोखम्बा जगह है। वहाँ खाने को मिल सकता है। अब घंटे भर यहां रुकना बेकार था। मैं मोखम्बा की ओर बढ़ चला।

मेरा लोअर कीचड से लथपथ हो गया था। जूते भी गीले हो गए थे। चलना दुश्‍वार हो रहा था। आधा घंटा चलने के बाद एक पत्थरों का बना छाना जैसा दिखा। मैं समझ गया कि‍ यह ही मोखम्बा है। खाना मिलने की संभावना ने चाल बढ़ा दी और मैं दस मिनट में ही उस छाने के दरवाजे पर था। दरवाजे से झांक कर देखा कि‍ एक लगभग तीस-पैंतीस साल की औरत बैठी कुछ काम कर रही थी। मैंने उससे पूछा, ‘‘खाना मिलेगा?’’ उसने आश्‍चर्य से कहा,  ‘‘इस वक्त?’’  मैंने कहा, ‘‘हाँ,  भूख लगी है।’’ उसने कहा कि‍ खिचड़ी बना सकती हूँ। मैंने जवाब दिया, ‘‘चलेगी, बनाओ।’’ फिर मैं बाहर बैठ गया। लगभग बीस- पच्चीस मिनट बाद उसने कहा, ‘‘अन्दर आ जाओ। खिचड़ी बन गयी है।’’

मैं अन्दर गया। थाली में गरम-गरम खिचड़ी थी। उसमें खूब सारा घी भी था। घी की खुशबू ने भूख और बढ़ा दी। मैं खिचड़ी पर टूट पड़ा। जब कुछ खिचड़ी पेट में पहुँच गई, तो उस महिला से बात करने का ख्याल आया। उसका नाम रंगीली था। पहाड़ के हिसाब से यह कुछ अटपटा,  कम प्रचलित नाम था।

रंगीली मोखम्‍बा चट्टी पर होटल चलाती है। गोंडार की रहने वाली है, जहां उसकी थोड़ी खेती है। पति का देहावसान चार-पांच साल पहले हो गया। रंगीली ने जमाने के हालत देखते हुए साथ रहने के लिए अपनी माँ को बुला लिया। माँ आज गोंडार वापस गई हुई थी। रंगीली की एक बेटी है। रंगीली तो अनपढ़ है और उसके वैधव्य ने उसे शिक्षा के महत्व को जता दिया है। इसलिए रंगीली को बेटी के भविष्य की चिंता है। 12वीं पढ़ने के बाद बेटी आगे पढ़ना चाहती थी। इसलिए उसे गुप्तकाशी कॉलेज में भेज दिया। बेटी के भविष्य की खतिर उसने बेटी को पढ़ने भेज तो दिया, पर अब साल का चालीस-पचास हजार का खर्चा भारी पड़ रहा है। इसीलिए उसने इस सुनसान जगह, जहां उसका पहले सिर्फ गाय पालने का ग्रीष्मकालीन छाना था, वहां यात्रियों के लिए खाने की व्यवस्था शुरू की। जब एकाध बार थके यात्रियों ने रात रुकने की व्यवस्था के बारे में पूछा तो उसने तथाकथित ढाबे में अपनी मेहनत से एक और कमरा चिन दिया, दो बिस्तर भी रख दिए। अब अगर कोई रहना चाहे तो किराया देकर रात भी काट सकता है। जंगल में वह अकेली अपनी माँ के साथ रहती है इस छाने में, जो अब होटल भी कहलाता है।

रंगीली ने पांच-छह गाय और कुछ बकरियां पाली हैं। उसने जंगल में क्यारियां बनायी हैं, जिनमें वह आलू और अन्य उपज बोती है। दूध सिर्फ एक गाय देती है, बाकि जानवर उसकी क्यारियों के लिए खाद पैदा करते हैं। सर्दियों में अपने गाँव में रहती है, गोंडार के खेतों को जोतती है। बेटी की पढ़ाई के खर्चे को पूरा करने के लिए बकरियों को बेचती है। होटल अतिरिक्त आय है।

पेट भर चुका था। कपड़े गीले थे। इसलिए तय किया कि रात रंगीली के होटल में ही गुजारी जाए। रंगीली को रात के खाने के लिया कहा और यह भी बताया कि रात को उसके होटल में ही रहूंगा। मुझे रंगीली की हिम्मत और कर्मठता ने बहुत प्रेरणा दी थी।

गीले कपडे़ बदल कर मैं बाहर आया। ठण्ड बढ़ गई थी। सि‍र में मैंने गमछा बांध लिया। कल सुबह कोटद्वार से बहुत डिप्रेश चला था। मैं इस वक्‍त अन्दर से बहुत खुश था। कल दो दोस्त दीवान और हयात मिले थे और आज अब ये कर्मठ भुली रंगीली।

१९७५ की इमरजेंसी देश की राजनीति का काला और क्रूर अध्याय है

जंतर-मंतर - Sat, 24/06/2017 - 08:32


शेष नारायण सिंह 
४२ साल पहले अपनी सत्ता बचाए  रखने के लिए  तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने देश में इमरजेंसी लगा दिया था.  संविधान में लोकतंत्र के  लिए बनाए गए सभी प्रावधानों को सस्पेंड कर दिया  गया था और देश में तानाशाही निजाम  कायम कर दिया गया  था. राजनीति शास्त्र के विद्यार्थी के लिए इमरजेंसी की घटनाओं को समझना हमेशा से ही बहुत ही दिलचस्प  कार्य रहा है . इमरजेंसी के बारे में पिछले  ४० वर्षों में बहुत कुछ लिखा पढ़ा  गया है लेकिन एक विषय के रूप में इसकी उत्सुकता कभी कम नहीं होती.  १९७५ के जून में इमरजेंसी इसलिए लगाई गयी थी कि इंदिरा गांधी को लग गया था की जनता का गुस्सा उनके खिलाफ फूट पड़ा है और उसको रोका नहीं जा सकता  . इसके बहुत सारे कारक थे लेकिन जब १९७४ में इलाहाबाद हाई कोर्ट के एक फैसले ने  लोकसभा की सदस्य के रूप में उनके चुनाव को ही खारिज कर दिया तो हालात बहुत जल्दी से इंदिरा गांधी के खिलाफ बन गए . इमरजेंसी वास्तव में स्थापित सत्ता के खिलाफ जनता की आवाज़ को दबाने के लिए किया  गया एक असंवैधानिक प्रयास था जिसको जनता के समर्थन से इकठ्ठा हुए राजनीतिक विपक्ष की क्षमता  ने सफल नहीं होने दिया .१९७१ में हुए मध्यावधि चुनाव में  इंदिरा गांधी को पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने का अवसर मिल गया था. लेकिन चार साल के अन्दर ही उनको  इमरजेंसी  लगाकर अपनी सत्ता बचानी  पडी,यह राजनीति का बहुत ही दिलचस्प आख्यान है . आज इमरजेंसी की बरसी पर इसी  गुत्थी को समझने की कोशिश की जायेगी .
१९७१ में भारी बहुमत से जीतने के बाद इंदिरा गांधी ने इस इरादे से काम करना शुरू कर दिया था कि अब उनके राज को कोई हटाने वाला नहीं है. बहुमत की सरकार बन जाने के बाद उन्होने जो सबसे बड़ा काम किया वह था , पाकिस्तान के  पूर्वी भाग को एक अलग देश के रूप  में मान्यता दिलवा देना.बंगलादेश की आज़ादी में भारत का योगदान  बहुत की अधिक है . पकिस्तान के साथ भारत की सेना की जीत का श्रेय इंदिरा गांधी को मिला  जोकि जायज़ भी है क्योंकि उन्होंने उसका कुशल नेतृत्व किया था .  बंगलादेश में पाकिस्तान को ज़बरदस्त शिकस्त देने के बाद इंदिरा गांधी की पार्टी  के सामने  विपक्ष की कोई हैसियत नहीं थी , जनसंघ के नेता अटल बिहारी वाजपेयी  ने तो उनको दुर्गा तक कह दिया था . शास्त्री जी द्वारा शुरू की गयी हरित क्रान्ति को  इंदिरा गांधी ने बुलंदी तक पंहुचाया था , इसलिए ग्रामीण भारत में  भी थोड़ी बहुत सम्पन्नता आ गयी थी.  कुल मिलाकर १९७२-७३ में माहौल इंदिरा गांधी के पक्ष  में था . लेकिन १९७४   आते आते  सब कुछ  गड़बड़ाने लगा .  और इसी गुत्थी को  समझने में इंदिरा गांधी की राजनीतिक विफलता और इमरजेंसी की समस्या  का हल छुपा हुआ है . इसी दौर में इंदिरा गांधी के दोनों बेटे बड़े हो गए थे . बड़े बेटे  राजीव गांधी थे जिनको इन्डियन एयरलाइंस में पाइलट की नौकरी मिल गयी थी और वे अपनी पत्नी और दो बच्चों के साथ  संतुष्टि का जीवन बिता रहे थे . छोटे बेटे संजय गांधी थे जिनकी पढाई लिखाई ठीक से  नहीं  हो पाई थी और वे पूरी तरह से माता पर ही  निर्भर थे . इस बीच उनकी शादी भी हो गयी थी . कोई काम नहीं था . इंदिरा जी के एक दरबारी  बंसी लाल थे जो हरियाणा के  मुख्यमंत्री थे. उन्होंने संजय गांधी को एक छोटी कार कंपनी शुरू करने की प्रेरणा दी. मारुति लिमिटेड नाम की इस कंपनी को उन्होंने दिल्ली से सटे  गुडगाँव में ज़मीन अलाट कर दी .संजय गाँधी की शुरुआती योजना यह थी कि उद्योग जगत में सफलता हासिल करने के बाद राजनीति का रुख किया जायेगा लेकिन ऐसा नहीं हुआ . मारुति के  कारोबार में वे बुरी तरह से असफल रहे. उसी दौर में दिल्ली के उस वक़्त के काकटेल सर्किट में सक्रिय लोगों ने उनसे मित्रता कर ली .संजय  गांधी के नए  मित्रों ने उन्हें कमीशन खोरी के धंधे में लगा दिया .इस सिलसिले में वे इंदिरा गाँधी के कुछ चेला टाइप अफसरों के सम्पर्क में आये और नेता बन गए. भारतीय राजनीति का सबसे काला अध्याय संजय गाँधी के साथ ही शुरू होता है. इसी के साथ ही इमरजेंसी  की भूमिका बनी और संविधान को दरकिनार करके इमरजेंसी लगा दी गयी .
इमरजेंसी के राज में बहुत ज्यादतियां हुईं नतीजा यह  हुआ कि १९७७ का चुनाव कांग्रेस बुरी तरह से हार गयी .  कांग्रेस ने बार बार इमर्जेंसी की ज्यादतियों के लिए माफी माँगी लेकिन इमरजेंसी को सही ठहराने से बाज़ नहीं आये . २०१० में  कांग्रेस के 125 पूरा करने के बाद इमरजेंसी को गलत कहते हुए कांग्रेस ने दावा किया कि  उसके लिए संजय गाँधी ज़िम्मेदार थे , इंदिरा गाँधी नहीं .  ऐसा शायद इसलिए किया जा रहा है कि संजय गांधी के परिवार के  लोग आजकल बीजेपी में हैं .  उनकी पत्नी तो केंद्रीय मंत्री  हैं जबकि बेटा भी सांसद है और पार्टी के  महामंत्री पद भी रह चुका  है .जहां तक इमरजेंसी का सवाल है ,उसके लिए मुख्य रूप से इंदिरा गाँधी ही ज़िम्मेदार हैं और इतिहास यही मानेगा . इमरजेंसी को लगवाने और उस दौर में अत्याचार करने के लिए संजय गाँधी इंदिरा से कम ज़िम्मेदार नहीं है लेकिन यह ज़िम्मेदारी उनकी अकेले की नहीं है . वे गुनाह में इंदिरा गाँधी के पार्टनर हैं .यह इतिहास का तथ्य है . अब इतिहास की फिर से व्याख्या करने की कोशिश न केवल हास्यास्पद है बल्कि अब्सर्ड भी है .
 नरेंद्र मोदी के आने के बाद तो खैर विमर्श की भाषा बदल गेई है और संजय गांधी के पक्ष  या विपक्ष में  कोई ख़ास तर्क वितर्क नहीं दिए जाते लेकिन इसके पहले अडवाणी युग में संजय गांधी को इमर्जेंसी के अपराधों से मुक्त करने की कोशिश बहुत   ही गंभीरता से चल रही थी.  इसको विडंबना ही माना जाएगा क्योंकि  दुनिया जानती है कि इंदिरा गांधी के खिलाफ जयप्रकाश नारायण के आन्दोलन को उन प्रदेशों में ही सबसे ज्यादा ताक़त मिली थी जहां आर एस एस का संगठन मज़बूत था . आज की बीजेपी को उन दिनों जनसंघ के नाम से जाना जाता था. इमरजेंसी की प्रताड़ना के शिकार आज की बीजेपी वाले ही हुए थे. अटल बिहारी वाजपेयी ,लालकृष्ण आडवाणी , अरुण जेटली आदि  बीजेपी नेता  जेल में थे . यह सज़ा उन्हें संजय गाँधी की कृपा से ही मिली थी. यह बात बिलकुल सच है और इसे कोई भी नहीं झुठला सकता . बाद में  लाल कृष्ण आडवानी के नेतृव में बीजेपी वालों ने संजय गाँधी को इमरजेंसी की बदमाशी से बरी करने की कोशिश बड़े पैमाने पर की थी. लाल कृष्ण आडवाणी ने तो यहाँ तक कह दिया था कि इमरजेंसी अपराधों के लिए संजय गाँधी को बलि का बकरा बनाने की कोशिश की जा रही है ..अपने बयान में आडवाणी ने कहा था कि , 'अपने मंत्रिमंडल या यहां तक कि अपने कानून मंत्री और गृहमंत्री से संपर्क किए बगैर उन्होंने [इंदिरा गांधी ने] लोकतंत्र को अनिश्चितकाल तक निलंबन में रखने के लिए राष्ट्रपति फखरूद्दीन अली अहमद से अनुच्छेद 352 लगवाया।' उनका कहना है कि इंदिरा गांधी इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला पचा नहीं पाईं और उन्होंने आपातकाल लगा दिया।
 इमरजेंसी  में सारे नागरिक अधिकारों को ख़त्म कर दिया गया था . जेल में डाले गए लोगों की संख्या एक लाख 10 हजार आठ सौ छह थी। उनमें से 34 हजार 988 आतंरिक सुरक्षा अधिनियम के तहत हिरासत में लिए गए लेकिन कैदी को उसका कोई आधार नहीं बताया जाता था . पिछले ४२ वर्षों में इमरजेंसी , उसकी ज्यादतियों और उसके पक्ष और  विपक्ष में बहुत कुछ लिखा पढ़ा जा चुका है . बीजेपी की योजना है कि कांग्रेस मुक्त भारत के अपने  सपने को पूरा  करने के लिए पार्टी पूरी तरह से  राहुल गांधी की दादी की इतनी कमियाँ  गिनाएगी कि जनता इन्दिरा गांधी को ही इमर्जेंसी  की ज़िम्मेदार माने . जनता और इतिहास उनको ज़िम्मेदार मानता है लेकिन इमरजेंसी की बात जब भी होगी इंदिरा गांधी के साथ संजय गांधी का नाम जरूर लिया जाएगा. अब  संजय गांधी का परिवार बीजेपी में बड़े  पदों पर  है तो उनके खिलाफ  बोलने से बीजेपी वाले कैसे बच सकेंगे
इमरजेंसी का सबक यह है कि चाहे जितना भारी बहुमत हो अगर केवल नारों का सहारा लिया जाएगा तो जनता १९७१ की भारी जीत और बांग्लादेश  की विजय के तमगे को भी नज़रंदाज़ कर देती है. इमरजेंसी के बाद जब जनता पार्टी आई तो वह किसी पार्टी की जीत  नहीं थी. वह जनता की ताक़त थी जिसने आपस में  लड़ रहे विपक्ष को एक साथ खड़े होने को मजबूर कर दिया , उनकी नई पार्टी को   जिता दिया, सरकार बनवा दी  और जनता के  साथ किए गए वायदों को पूरा न करने की सज़ा इंदिरा गांधी और उनकी पार्टी को दे दी. सच्ची बात यह  है कि जब  जनता पार्टी की जीत हुयी थी तब तक पार्टी भी नहीं बनी थी और १९७७ के दौरान जिस चुनाव निशान से  जनता  पार्टी के लोग चुनाव जीत कर आये थे वह चौधरी चरण सिंह   की भारतीय लोकदल का चुनाव निशान, " हलधर किसान " था. इमरजेंसी का सबसे बड़ा सबक यही  है , जनता को गरीबी हटाने के वायदा करके इंदिरा गांधी ने १९७१ में  भारी बहुमत पाया था और जब उन्होंने  वायदा पूरा करने की कोशिश   भी नहीं की और अलग तरह से देश की अवाम को प्राभावित करने की  कोशिश की तो खंडित विपक्ष के बावजूद भी देश ने राजनीति संन्यास ले चुके जयप्रकाश नारायण को सन्यास से बाहर आने को मजबूर किया और  इंदिरा गांधी की स्थापित सत्ता के खिलाफ एक मज़बूत  विपक्ष  तैयार कर दिया 

पार्टी व शॉपिंग- पति पत्नी के जोक्स का उल्टा-पुल्टा रूप -33

शाॅपिंग में मशगूल बीवी का सब्र से साथ देना भी मुहब्बत है गालिब...!.ज़रूरी नहीं हर कोई "ताज-महल" बनवाता फिरे...!
पार्टी में मशगूल मियां का सब्र से साथ देना भी मुहब्बत है गालिब...!.ज़रूरी नहीं हर कोई "सावित्री" बनी फिरे...!
Syndicate content

लेखक विषय संवाद साभार अनुवादक

पहले वो आए साम्यवादियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं साम्यवादी नहीं था

 

फिर वो आए मजदूर संघियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं मजदूर संघी नहीं था

 

फिर वो यहूदियों के लिए आए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं यहूदी नहीं था

 

फिर वो आए मेरे लिए

और तब तक बोलने के लिए कोई बचा ही नहीं था

 

मार्टिन नीमोलर (1892-1984)