Increase |  Decrease |  Normal

Current Size: 100%

Share this
Syndicate content

हाशिया

Hashiya: http://hashiya.blogspot.com

क्या हमारा लोकतंत्र आदिवासियों को न्याय देगा?

ग्लैडसन डुंगडुंग

ऑपरेशन ग्रीन हंट की आंच भले दिल्ली-मुंबई में बैठे लोगों तक नहीं पहुंच रही हो, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि यह आग किसी को झुलसा नहीं रही. देश के संसाधनों और जमीन को छीन कर देशी-विदेशी कंपनियों के हवाले करने के लिए और इसका विरोध करनेवाली जनता का प्रतिरोध तोड़ने के लिए चलाए जा रहे इस ऑपरेशन ने किसी तरह देश के सबसे गरीब लोगों के जीवन को नारकीय बना दिया है और किस तरह यह लोकतंत्र की चमकदार लेकिन भ्रामक बातों की कलई खोल रहा है, ग्लैडसन डुंगडुंग की यह खोजपरक रिपोर्ट. मूलतः अंगरेजी में प्रकाशित.

13 जून 2010 को झारखंड के 12 मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की यात्रा सूर्योदय से पहले ही शुरू हो गयी थी। हमने सुना था कि लातेहार के बरवाडीह प्रखंड के लादी गांव की एक खरवार आदिवासी महिला, पुलिस और माओवादियों के बीच हुई मुठभेड़ की शिकार हो गयी। उस महिला का नाम जसिंता था। वह सिर्फ 25 साल की थी। गांव में अपने पति और तीन छोटे-छोटे बच्चों के साथ खुशहाल जिंदगी बिता रही थी इसलिए हम घटना की हकीकत जानना चाहते थे। हम जानना चाहते थे कि क्या वह माओवादी थी?

सबसे महत्वपूर्ण बात जो हम जानना चाहते थे, वह यह था कि किस परिस्थिति में सरकारी बंदूक ने उससे जीने का हक छीन लिया और सूर्योदय से पहले ही उसके तीन छोटे-छोटे बच्चों के जीवन को अंधेरे में डाल दिया गया? हम यह भी जानना चाहते थे कि इस अपराध के बाद राज्य की क्या भूमिका है? और निश्चित तौर पर हम यह भी जानना चाहते थे कि क्या जसिंता के तीन बच्चे हमारे बहादुर जवानों के बच्चों के तरह ही मासूम हैं?

सूर्योदय होते ही हमारे फैक्‍ट फाइडिंग मिशन का चारपहिया घूमना शुरू हो गया। जेठ की दोपहरी में हमलोग चिदंबरम के ‘रेड कॉरिडोर’ में घूमते रहे। शायद यहां के आदिवासियों ने ‘रेड कॉरिडोर’ का नाम भी नहीं सुना होगा और निश्चित तौर पर वे इस क्षेत्र को ‘रेड कॉरिडोर’ की जगह ‘आदिवासी कॉरिडोर’ कहना पसंद करेंगे। जो भी हो, इतना घूमने के बाद भी हम लोगों ने माओवादियों को नहीं देखा। लेकिन हमने जला हुआ जंगल, पेड़ और पतियां देखी। माओवादियों के खिलाफ ऑपरेशन चलाते समय अर्द्धसैनिक बलों ने हजारों एकड़ जंगल को जला दिया है। शायद वे माओवादियों का शिकार तो नहीं कर पाये होंगे, लेकिन उन्होंन खुबसूरत पौधे, जड़ी-बूटी, जंगली जानवर, पक्षी और निरीह कीट-फतंगों को जलाकर राख कर दिया है। उन्होंने जंगली जानवर, पक्षी और हजारों कीट-फतंगों का घर जला डाला है। अगर यही काम यहां के आदिवासी करते तो निश्चित तौर पर वन विभाग उनके खिलाफ वन संरक्षण अधिनियम 1980 और वन्यजीवन संरक्षण अधिनियम 1972 के तहत कार्रवाई करता।

इराकः एक देश के बारे में दो कविताएं

रियाज़-उल-हक़

 

[अमेरिकी सेना ने इराक को छोड़ दिया है. जैसा कि भारत के बारे में कहा जाता है, बहुत से लोग अब इराक के बारे में भी कहेंगे कि वह  विदेशी कब्जे से आजाद हो गया है. लेकिन हम जानते हैं और इराकी भी जानते हैं कि आजादी उनके लिए अब भी एक सपने और संघर्ष का नाम है. अमेरिकी या किसी भी विदेशी सेना के निकल जाने से कुछ नहीं होता, इस दौरान वहां जिस तरह की सत्ता संरचना को स्थापित किया गया है, जिस तरह का शासक वर्ग वहां सत्ता पर काबिज है, वह अब इस सेना द्वारा छोड़ी गई जिम्मेदारियों को पूरा करेगा. इराकी संसाधनों की लूट जारी रहेगी, वह साम्राज्यवादी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के मुनाफे की चरागाह बना रहेगा. इराक की जनता की दुर्दशा और बदतर हालत में कोई कमी नहीं आएगी. लेकिन जाहिर है कि इसी के साथ इराकी जनता का शानदार और अपराजेय प्रतिरोध भी जारी रहेगा और पूरी दुनिया उसके साथ अपनी उम्मीदों को जोड़े रखने में अपनी सार्थकता तलाशेगी. पेश हैं फिलिस्तीनी कवि महमूद दरवेश और छात्र राजनीति में साक्रिय अंजनी कुमार की कविताएं. रविवार और कारवां से साभार. दरवेश की कविता का अनुवाद अनिल जनविजय ने किया है.]
 

नदिया बिक गई पानी के मोल

आलोक प्रकाश पुतुल

 
[कहते हैं सूरज की रोशनी, नदियों का पानी और हवा पर सबका हक़ है। लेकिन छत्तीसगढ़ में ऐसा नहीं है। छत्तीसगढ़ की कई नदियों पर निजी कंपनियों का कब्जा है। दुनिया में सबसे पहले नदियों के निजीकरण का जो सिलसिला छत्तीसगढ़ में शुरु हुआ, वह थमने का नाम नहीं ले रहा। छत्तीसगढ़ की इन नदियों में आम जनता नहा नहीं सकती, पीने का पानी नहीं ले सकती, मछली नहीं मार सकती। सेंटर फॉर साइंस एंड इनवारनमेंट की मीडिया फेलोशीप के तहत पत्रकार आलोक प्रकाश पुतुल द्वारा किए गए अध्ययन का यह हिस्सा आंख खोल देने वाला है। आइये पढ़ते हैं, क्रमवार रूप से यह पूरी रिपोर्ट। ]
 

पानी का मोल कितना होता है ?

इस सवाल का जवाब शायद छत्तीसगढ़ में रायगढ़ के बोंदा टिकरा गांव में रहने वाले गोपीनाथ सौंरा और कृष्ण कुमार से बेहतर कोई नहीं समझ सकता.

26 जनवरी, 1998 से पहले गोपीनाथ सौंरा और कृष्ण कुमार को भी यह बात कहां मालूम थी.

तब छत्तीसगढ़ नहीं बना था और रायगढ़ मध्यप्रदेश का हिस्सा था. मध्यप्रदेश के इसी रायगढ़ में जब जिंदल स्टील्स ने अपनी फैक्टरी के पानी के लिए इस जिले में बहने वाली केलो नदी से पानी लेना शुरु किया तो गाँव के गाँव सूखने लगे. तालाबों का पानी कम होने लगा. जलस्तर तेजी से गिरने लगा. नदी का पानी जिंदल की फैक्ट्रीयों में जाकर खत्म होने लगा. लोगों के हलक सूखने लगे.

फिर शुरु हुई पानी को लेकर गाँव और फैक्ट्री की अंतहीन लड़ाई. गाँव के आदिवासी हवा, पानी के नैसर्गिक आपूर्ति को निजी मिल्कियत बनाने और उस पर कब्जा जमाने वाली जिंदल स्टील्स के खिलाफ उठ खड़े हुए. गाँववालों ने पानी पर गाँव का हक बताते हुए धरना शुरु किया. रायगढ़ से लेकर भोपाल तक सरकार से गुहार लगाई, चिठ्ठियाँ लिखीं, प्रर्दशन किए. लेकिन ये सब कुछ बेकार गया. अंततः आदिवासियों ने अपने पानी पर अपना हक के लिए आमरण अनशन शुरु किया.

बोंदा टिकरा के गोपीनाथ सौंरा कहते हैं – “मेरी पत्नी सत्यभामा ने जब भूख हड़ताल शुरु की तो मुझे उम्मीद थी कि शासन मामले की गंभीरता समझेगा और केलो नदी से जिंदल को पानी देने का निर्णय वापस लिया जाएगा. लेकिन ऐसा नहीं हुआ “

सिनेमा का गल्‍प..

प्रमोद सिंह

 

क्‍यों जाने भी दें यारो?..

नहर का पानी खा गया खेती

रियाज़-उल-हक़

अपनी फूस की झोंपड़ी में गरमी से परेशान छोटेलाल बात की शुरुआत आसान हो गई खेती के जिक्र से करते हैं. वे कहते हैं, ‘पानी की अब कोई कमी नहीं रही. नहर से पानी मिल जाता है तो धान के लिए पानी की दिक्कत नहीं रहती.’

पास बैठे रामसरूप यादव मानो एक जरूरी बात जोड़ते हैं, ‘अब बाढ़ का खतरा कम हो गया है.’
राजरानी इलाके में खर-पतवार के खत्म होने का श्रेय नहर को देती हैं.

शारदा में सिंचाई
 

राष्ट्रवाद और हिंदी समुदाय - 3

प्रसन्न कुमार चौधरी

हिंदी समुदाय, नवजागरण और राष्ट्रवाद के विभिन्न पहलुओं पर ध्यान खींचनेवाले इस लंबे लेख की तीसरी  और आखिरी किस्त पोस्ट करते हुए हाशिया अभी राष्ट्रीय और औपनिवेशिक संस्कृति पर जारी बहस में भी शामिल हो रहा है. आगे हम इस बहस से जुड़ी कुछ और सामग्री भी पोस्ट करेंगे और इसी के साथ अपना नजरिया भी पेश करेंगे. फिलहाल यह लेख, हंस से साभार.

राष्ट्रवाद और हिंदी समुदाय - 2

प्रसन्न कुमार चौधरी

हाशिया पर राष्ट्र, आधुनिकता, समुदाय और इतिहास पर प्रसन्न कुमार चौधरी के लम्बे लेख कि पहली किस्त पोस्ट की गयी थी. अब इसकी दूसरी किस्त पेश कि जा रही है. तीन किस्तों में इस लेख का प्रकाशन हंस में हुआ है, जिसे हम भाई रणेंद्र के सौजन्य से यहाँ साभार पेश कर रहे हैं. 
 

राष्ट्रवाद और हिंदी समुदाय - 1

प्रसन्न कुमार चौधरी

राष्ट्र, आधुनिकता, समुदाय और इतिहास लंबे समय से विवादग्रस्त विषय रहे हैं. प्रस्तुत लेख हिंदी समुदाय और उससे संबंधित इतिहास की पृष्ठभूमि की टोह में इन अवधारणाओं से पुनः दो-चार होते हुए इस संबंध में नई सोच को प्रस्तावित करता है। इस लेख की कई स्थापनाओं से बहस व असहमतियां हो सकती हैं. हम उन बहसों और असहमतियों को सार्थक चर्चा के लिए आमंत्रित करते हैं। -संपादक, हंस

राष्ट्र, राष्ट्र-राज्य और राष्ट्रवाद

जनता होशियार : हमारे संसदीय राजा आखेट पर निकले हैं

सुष्मिता

सामंती युग में राजा-महाराजा जंगलों में शिकार खेलने जाते थे। वे जंगली जानवरों का शिकार करते थे. अब समय बदल गया है. इसलिए अब राजा का शौक भी बदल गया है. अब तो जंगली जानवर बचाए रखने की चीज बन गए हैं. इसलिए अब जंगलों में रहने वाले आदिवासियों का शिकार होगा. राजा अपने शागिर्दों के साथ नए शिकार पर जाने की तैयारी कर रहा है. टीवी चैनलों पर युद्ध के धुन बजने लगे हैं. यहां तक कि चैनलों ने ‘लाइन ऑफ़ कंट्रोल’ की घोषणा भी कर दी है। इसका नाम दिया गया है ‘आपरेशन ग्रीन हंट’। गृह मंत्रालय ने देश की सबसे गरीब जनता पर युद्ध की घोषणा कर दी है। यह हमला नक्सलवाद को खत्म करने के नाम पर किया जानेवाला है. हालांकि नक्सलवाद के बारे में पूर्व गृह मंत्री शिवराज पाटिल के विचार थोड़े अलग थे. उनका मानना था कि नक्सलवाद देश के लिए उतना बड़ा खतरा नही है जितना बढ़ा-चढ़ाकर इसे दिखाया जाता है. महज एक साल में इतना बड़ा क्या बदलाव हो गया?

Syndicate content

लेखक विषय संवाद साभार अनुवादक

पहले वो आए साम्यवादियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं साम्यवादी नहीं था

 

फिर वो आए मजदूर संघियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं मजदूर संघी नहीं था

 

फिर वो यहूदियों के लिए आए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं यहूदी नहीं था

 

फिर वो आए मेरे लिए

और तब तक बोलने के लिए कोई बचा ही नहीं था

 

मार्टिन नीमोलर (1892-1984)