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समकालीन जनमत

Samkaleen Janmat

मैं नास्तिक क्यों हूँ

भगत सिंह

[इस लेख को यहाँ प्रकाशित करने का उद्देश्य धर्म या आस्तिकता पर बहस शुरू करने का नहीं है, बल्कि भगत सिंह, जिनके नाम पर भारत की जनता को न जाने कब से बहकाया जा रहा है (कथित रूप से धर्मनिरपेक्ष तथा संप्रदायवादियों दोनों द्वारा), के अपने शब्दों में उनके विचारों की एक झलक प्रस्तुत करना है। इसे पढ़कर क्या निष्कर्ष निकालना चाहिए, यह तो आप पर ही निर्भर है। यह लेख भगत सिंह ने जेल में मृत्यु दंड का सामना करते हुए 23 साल की उम्र में लिखा था। हम बस इतना कहना चाहेंगे कि जो भी लोग अपनी देशभक्ति का दावा करते हैं, उन्हें यह लेख अवश्य पढ़ना चाहिए।]

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लेखक विषय संवाद साभार अनुवादक

पहले वो आए साम्यवादियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं साम्यवादी नहीं था

 

फिर वो आए मजदूर संघियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं मजदूर संघी नहीं था

 

फिर वो यहूदियों के लिए आए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं यहूदी नहीं था

 

फिर वो आए मेरे लिए

और तब तक बोलने के लिए कोई बचा ही नहीं था

 

मार्टिन नीमोलर (1892-1984)