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रविवार

Ravivar

थैंक यू, सुप्रीम कोर्ट

कनक तिवारी

इधर कुछ महीनों से सुप्रीम कोर्ट ने देश की चिंता करने में ज़्यादा सक्रियता बरतने का परिचय दिया है. वैसे वे सब काम कार्यपालिका अर्थात केन्द्र सरकार को ही करने थे. देश की यह हालत है कि मुद्दई सुस्त गवाह चुस्त की तरह आचरण हो रहा है.

न्यायिक सक्रियता का लेकिन बढ़ जाना लोकतंत्र के लिए अच्छा लक्षण नहीं है. इससे धीरे-धीरे न्यायपालिका में भी एक तरह का अधिनायकवाद उभरता रहा है. लेकिन मौज़ूदा हालत यह है कि यदि न्यायतन्त्र ने तन्त्र के अन्याय के खिलाफ लोकतांत्रिक मूल्यों का बचाव नहीं किया तो जनता में भयानक पराजय की भावना पनपने लगेगी. मौजूदा समय में वही एक पुराना कारण राजनेताओं और नौकरशाहों को जुल्मखोर बनाता नज़र आ रहा है क्योंकि भारतीय जनता में इक्कीसवीं सदी में भी अन्याय के खिलाफ उठ खड़े होने का मुनासिब जज्बा दीख ही नहीं रहा है.p-j-thomas

 

केन्द्रीय सतर्कता आयुक्त पी जे थॉमस के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने देश के प्रधानमंत्री और गृहमंत्री के प्रशासनिक-न्यायिक विवेक पर सीधा तमाचा मारा है. शुरू में यह भ्रम फैलाया गया कि तीन सदस्यीय चयन समिति के सामने थॉमस की वह पुरानी फाइल रखी ही नहीं गई जब उनके खिलाफ केरल राज्य के सचिव के रूप में पामोलिन घोटाले में उनका भी नाम अभियुक्तों में संलग्न किया गया था.

 

आजकल न्याय भी बिकता है

प्रशांत भूषण से प्रशांत दुबे की बातचीत

देश में औसतन हर रोज एक नये घोटाले के इस दौर में अधिकांश भारतीय भ्रष्टाचार पर बात करते हैं लेकिन उच्चतम न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता और मानवाधिकार कार्यकर्ता प्रशांत भूषण ऐसे लोगों से अलग हैं. वे केवल बात करने में यकीन नहीं करते. यही कारण है कि वे पिछले दो दशक से भ्रष्टाचार के खिलाफ हरसंभव लड़ाई लड़ रहे हैं. उन्होंने न्यायपालिका के अंदर की गंदगी को सार्वजनिक करने का काम किया, आम जनता की वाहवाही बटोरी और न्यायपालिका की आंख की किरकिरी भी बने. भ्रष्टाचार में डूबी न्यायपालिका के एक वर्ग ने आंखें तरेरी और प्रशांत भूषण पर मुकदमे भी दर्ज कराये गये. ये और बात है कि प्रशांत भूषण इन मुकदमों के बाद और उत्साह से अपने काम में जुट गये. यहां पेश है हाल ही में उनसे की गई बातचीत के अंश.

 

क्या आज के दौर में आम आदमी को न्याय मिलने की उम्मीद आप करते हैं ?

देखिये, यह एक विचित्र दौर है जबकि विकास दर तो 9 प्रतिशत पर पहुंच गई है लेकिन 10 वर्षों में 2 लाख से ज्यादा किसानों ने आत्महत्या की है. विश्व के 10 सबसे अमीर लोगों में 4 हिन्दुस्तानी हैं लेकिन अर्जुन सेनगुप्ता कमेटी की रिपोर्ट के मुताबिक देश की 77 फीसदी जनता 20 रूपये प्रतिदिन से कम पर जीवन यापन कर रही है. विकास दर और गरीबी में सीधा-सीधा जुड़ाव है. यदि गरीबी इतनी है तो विकास दर बढ़ कैसे रही है? इसका सीधा जवाब यह है कि यह विकास दर इस देश के प्राकृतिक संसाधनों को बेच-बेचकर लाई जा रही है. देश का 1 ट्रिलियन डॉलर पैसा स्विस बैंकों में रखा है. prashant-bhushan

यह कहना मुश्किल है कि आज के इस दौर में आम आदमी को न्याय मिल ही जाये. आजकल न्याय भी बिकता है, जिसकी जेब में पैसा है, वह न्याय का हकदार है बाकी सभी तो न्याय की आस लगाये रहते हैं. यह अंकल जज का जमाना है. न्यायपालिका भी भ्रष्ट हो रही है, दीमक तो उसमें भी लग चुकी है. पूरी व्यवस्था पर, पूरा कब्जा इन कारपोरेट घरानों का है.

भारत में भी मिस्र

प्रीतीश नंदी

क्या आपको कभी यह महसूस नहीं हुआ कि भारत दुनिया के सर्वाधिक अनदेखे लोगों का देश है? ये अनदेखे-अदृश्य लोग लाखों-करोड़ों की तादाद में हैं, इसके बावजूद उन पर कोई गौर नहीं करता. हम सभी उन्हें नजरअंदाज कर देते हैं, जैसे कि उनका कोई अस्तित्व ही न हो. हां, उनके पास मतदाता परिचय पत्र हैं. उनमें से कुछ के पास पैन कार्ड भी हो सकते हैं. नंदन नीलेकणी जल्द ही उन्हें उनका विशिष्ट पहचान क्रमांक भी दे देंगे, ठीक उसी तरह जैसे टेलीकॉम कंपनियों ने उन्हें सेलफोन मुहैया करा दिए हैं. उनके नाम पर बैंकों में खाते हैं और उन्हें एटीएम कार्ड भी दिए गए हैं. इसके बावजूद वे हमारे गणतंत्र के गुमशुदा लोगों में से हैं.

इनमें से अधिकांश युवा और बेरोजगार हैं. कुछ बुढ़े हैं, जो किसी रोजगार के योग्य नहीं. वे सभी उस भारत के हिस्से हैं, जिसकी उपेक्षा कर दी गई है. नहीं, उन्होंने अपनी इस स्थिति का चुनाव स्वयं नहीं किया है. यह स्थिति एक धूर्त राजनीतिक तंत्र द्वारा निर्मित की गई है, जो एक ऐसा वोट बैंक पाना चाहता है, जिसका वह दोहन कर सके. इसीलिए आजादी के छह दशक बाद भी वे नामहीन और शक्लहीन हैं. वे भारत की उस मुख्यधारा के अंग नहीं हैं, जो तालियों की गड़गड़ाहट में डूबा हुआ है. वे तकनीकी क्रांति का भी हिस्सा नहीं हैं. मोबाइल फोन कभी भी बिजली या पानी का विकल्प नहीं हो सकते. इन लोगों ने कभी आर्थिक सुधारों के बारे में सुना भी न हो, क्योंकि उससे उन्हें कोई लाभ नहीं हुआ है. उन्हें तो यह भी नहीं मालूम कि वे जिस भारत देश में रह रहे हैं, वह दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में से है.

मिस्र में प्रदर्शन

नर्मदा का शोकगीत

प्रशांत दुबे/रोली शिवहरे

“साहब! हम कभी किसी को काली चाय नहीं पिलाते थे, पर क्या करें ? आज शर्म भी लग रही है आपको यह चाय पिलाते हुये. मजबूर हैं.”रामदीन

दरअसल काली चाय जो आज बड़े लोगों के लिये स्वास्थ्य का सबब है, किसी के लिये यह शर्म की बात भी है. आईये जाने क्या है इस काली चाय का गणित.

“बहुत खेती थी. बहुत मवेशी थे. दूध दही था हमारे यहां. सुख-सुविधा थी. सुख से रहते थे. मेरी खुद की बीस एकड़ जमीन थी. धान, गेहूँ, ज्वार, बाजरा, तिल, मक्का सब उगाते थे साहब ! और अब ... ?” फिर वह मन ही मन कुछ बुदबुदाते हैं जैसे किस्मत को दोष दे रहे हो या फिर किसी को अपशब्द कह रहे हो.

वह कहते हैं –“मेरा बुढ़ापा ऐसे ही नहीं आ गया है. तीन-तीन बार अपने गाँव से, अपने-अपनों से बिछड़ने का नतीजा है ये. सरकार क्या करेगी या सरकार ने क्या किया ? जमीन का मुआवजा दे दिया, उसके अलावा हमारी अपने जड़ों का क्या ?”

यह कहानी है बरगी बाँध से डूबे गांवों में से एक मगरधा गांव के रामदीन की . रामदीन आज 62 वर्ष के है. यह कहानी अकेले रामदीन की नहीं बल्कि रामदीन जैसे ऐसे हजारों लोग है, जो अपने आज और कल का गणित लगाते है और जीवन की इस धूप-छांव को बड़ी ही शिद्दत महसूस कर रहे है.

उजड़े हुये लोग

मगरधा गांव भी रानी अवंतीबाई लोधी परियोजना के कारण उजड़े अन्य 192 गांवों की तरह वर्ष 1987 में उजडा. रामदीन कहते है- “बाँध बनने की बात पर पहले विश्वास नहीं होता था पर बांध बंध गया और हम कुछ नहीं कर सके. लेकिन नर्मदा माई को कोई बांध कैसे बांध सकता है, वह तो अभी भी रिसती ही हैं.

“हम तो इतने भोले थे साहब कि कुछ समझ ही नहीं पाये और बाँध में काम करने जाते रहे. अगर हम तब समझ जाते तो आवाज बुलंद करते. और जब आवाज बुलंद की तो बहुत देर हो चुकी थी.”

हमारी बात नहीं मानेंगे तो पछताना पड़ेगा

मेधा पाटकर से आलोक प्रकाश पुतुल की बातचीत

 

नर्मदा बचाओ आंदोलन की नेत्री और सुप्रसिद्ध सामाजिक कार्यकर्ता मेधा पाटकर का मानना है कि विकास की अवधारणा को ठीक से समझा नहीं जा रहा है, जिससे सामाजिक संघर्ष लगातार बढ़ता जा रहा है. मेधा पाटकर की राय में सशस्त्र माओवादी आंदोलन के मुद्दे तो सही हैं लेकिन उनका रास्ता सही नहीं है. हालांकि मेधा पाटकर यह मानती हैं कि देश में अहिंसक संघर्ष और संगठन भी अपना काम कर रहे हैं, लेकिन सरकार उनके मुद्दों को नजरअंदाज कर रही है, जिससे इस तरह के आंदोलनों की जगह लगातार कम हो रही है. यहां पेश है, उनसे की गई एक बातचीत.

देश भर में जब कभी भी विकास की कोई प्रक्रिया शुरू होती है तो चाहे-अनचाहे, जाने-अनजाने उसका विरोध शुरू हो जाता है. गरीब भले गरीब रह जाए, आदिवासी भले आदि वास करने को मजबूर रहे लेकिन एक खास तरह के दबाव में विकास का विरोध क्या बहुत रोमांटिक ख्याल नहीं है?

विकास की परिभाषा किसी भी भाषा, किसी भी माध्यम में आप ढूढें तो यही होती है कि संसाधनों का उपयोग करके जो जीने के, जो जीविका के बुनियादी अधिकार हैं, या जरूरते हैं, उसकी पूर्ती करना. तो विकास की संकल्पनाएं तो अलग-अलग हो सकती हैं. कोई भी विकास का विरोधी नहीं है, न हम है, न सरकार भी हो सकती है. लेकिन सरकार एक प्रकार का विकास का नजरिया, ये कहते हुए जब सामने लाती है कि उन संसाधनों के आधार पर वो लाभ ही लाभ पाएंगे, वो आर्थिक या भौतिक लाभ. लेकिन उसमें जिन लोगों के हाथ में पीढ़ियों से संसाधन हैं, उनका न कोई योगदान होगा नियोजन में, न ही उनको लाभों में भागीदारी या हिस्सा मिलेगा. तब जा कर हमको अपने विकास की संकल्पना भी रखने का अधिकार है.

यह हमारी सरकार नहीं है

लोदो सिकोका से पुरुषोत्तम ठाकुर की बातचीत

कुनी, उसकी सहेली और माँ, गाँव के पास ही पहाड़ी के नीचे वाली ज़मीन में सरसों के खेत में सरसों के फुल और पत्ती तोड़ रहे थे और तोड़ते-तोड़ते अचानक कुनी चिल्ला उठी- “लोदो दादा आ गये, लोदो दादा आ गये…”

नियमगिरि के इस लाखपदर गाँव में रहकर पिछले चार दिनों से हम इसी खबर का इंतजार कर रहे थे. चार दिन पहले जब हम इस गांव में पहुंचे थे तो पता चला कि लोदो यानी लोदो सिकोका कुछ ही देर पहले भुवनेश्वर के लिये रवाना हो गये थे. वहां किसी बैठक में उन्हें भाग लेना था.

नियमगिरि के डोंगरिया आदिवासी नियमगिरि में बाक्साइट माइनिंग के लिए कोशिश कर रही ब्रिटिश कंपनी वेदांता के खिलाफ संघर्ष कर रहे हैं और लोदो सिकोका, नियमगिरि सुरक्षा परिषद के एक प्रमुख नेता हैं. लोदो सिकोका

लोदो पिछले साल अगस्त में पहली बार तब चर्चा में आये, जब वेदांता कंपनी के इशारे पर लोदो को पुलिस उस समय उठा ले गई, जब वह अपने साथियों के साथ एक बैठक में हिस्सा लेने दिल्ली जा रहे थे. उन्हें रायगढ़ा पुलिस ने थाना ले जाकर मरते दम तक पिटा, माओवादी होने का ठप्पा दिया और तब जाकर छोड़ा जब मीडिया से लेकर स्थानीय सांसद और कार्यकर्ताओं ने दबाव बनाया.

सरसों के खेत से गाँव पहुँच कर जब हमने लोदो के बारे में पूछा तो एक ने कहा कि वह भूखे और प्यासे थे और अपनी डोंगर (डोंगर में स्थित अपने खेत) की ओर चले गए हैं. हम भी पीछे चल पड़े. वैसे भी पिछले चार दिनों में हम कई लोगों का डोंगर चढ़ चुके थे, जिनमें लोदो का डोंगर भी शामिल था.

असल में फसल कटाई के इस समय गांव के सभी लोग अपने परिवार समेत अपने-अपने डोंगर में छोटी -छोटी कुटिया और मचान लगाकर रहते हैं. डोंगर में ही वे धान, मड़िया, गुर्जी, कांदुल,अंडी जैसे कई तरह की फसलों को काटकर लाते हैं.

नियमगिरि पहाड़ में रहने वाले ये डोंगरिया आदिवासी डोंगर में ही खेती करते हैं. यहां खेती करना काफी मेहनत का काम है, जिसमें पूरे परिवार को जुटना पड़ता है. डोंगर में क्योंकि जुताई नहीं हो पाती, इसलिए वहां हाथ से कोड़ाई करनी पड़ती है. इसलिए इस खेती में घर के छोटे बच्चे से लेकर बुढ़ों तक का योगदान महत्वपूर्ण होता है.

शाहिद आज़मी के बिना एक साल

महताब आलम

बीते साल 11 फ़रवरी को रात के क़रीब नौ का वक़्त रहा होगा. दिल्ली की कुख्यात सर्दी के बीच मुंबई से मेरे एक दोस्त का फोन आया- अज्ञात बंदूकधारियों ने शाहिद आज़मी को उनके दफ्तर में मार डाला. यह अवाक कर देने वाली खबर थी, जिस पर यकीन करना मुश्किल हो रहा था. लेकिन खबर सच थी.

शाहिद


शाहिद जब मारे गये तब वे महज 32 साल के थे. यूँ तो शाहिद की पारिवारिक जड़े आज़मगढ़ में थीं लेकिन वे मुंबई के, देवनार इलाक़े में जन्मे और पले-बढ़े. ये इलाका टाटा इस्टीट्यूट ऑफ़ सोशल साइंस के लिए जाना जाता है.

उनकी हत्या के सिर्फ़ एक हफ़्ते पहले ही मैं आज़मगढ़ गया था. वहां मैंने हर उमर के लोगों को उनके बारे में बहुत ऊंची भावनाओं के साथ बोलते हुए पाया था और महसूस किया कि लोग उन्हें काफ़ी सम्मान के साथ देखते हैं.

शाहिद को 1994 में भारत के चोटी के नेताओं की हत्या की ‘साज़िश’ के आरोप में पुलिस ने उनके घर से गिरफ़्तार कर लिया था. इसका एक मात्र साक्ष्य उनका क़बूलनामा था, जिसे उन्होंने कभी किया ही नहीं था. फिर भी उन्हें छह साल की क़ैद हुई. दिल्ली के तिहाड़ जेल में रहते हुए शाहिद ने स्नातक के लिए दाख़िला कराया और अन्य क़ैदियों के कानूनी मामलों को निबटाने में मदद करना शुरु किया.

2001 में जब वे रिहा हुए तो घर आए और पत्रकारिता और क़ानून के स्कूल में साथ-साथ दाखिला लिया. तीन साल बाद, उन्होंने वक़ील मजीद मेनन के साथ काम करने के लिए वेतन वाले उप-संपादक पद को छोड़ दिया. यहां उन्होंने बतौर जूनियर 2,000 रुपये महीने पर काम शुरू किया. बाद में, उन्होंने अपनी ख़ुद की प्रैक्टिस शुरू कर दी जिसने एक निर्णायक फ़र्क़ पैदा किया. बतौर वक़ील महज 7 साल के अल्प समय में उन्हें न्याय की अपनी प्रतिबद्धता के लिए शोहरत और बदनामी दोनों मिली. यह कहना अनुचित नहीं होगा कि वे एक ऐसे इंसान थे, जो इस व्यवस्था द्वारा उत्पादित किए गए, इस्तेमाल किए गए और बाद में 'ठिकाने’ लगा दिए गए.

गांधी, तुम तो रोज मरते हो

कनक तिवारी

इतिहास में अब तक यह तय नहीं हो पाया है कि गांधी लोगों की मुसीबत हैं या लोग गांधी की. ताज़ा इतिहास का यह सबसे बड़ा दुनियावी शख्स लगभग सर्वसम्मति से सहस्त्राब्दी का नायक मान लिया गया है. यह मुख्यतः उस अमरीका की पहल पर हुआ है, जहां गांधी कभी नहीं गए थे. उन्होंने अमरीकी राष्ट्रपति की यह सलाह भी अनसुनी कर दी थी कि यदि गांधी चाहें तो अमरीका भारत की आज़ादी को लेकर ब्रिटिश प्रधानमंत्री से मध्यस्थता करने को तैयार है.

अमरीका में ही मार्टिन लूथर किंग जूनियर हुए जिन्होंने अश्वेतों के पक्ष में प्रसिद्ध मांटगोमरी मार्च निकाला. उन्हें अमरीकियों ने मार डाला और वे दुनिया में अश्वेत गांधी के रूप में मशहूर हो गए. अमरीका का प्रजातांत्रिक ढांचा ऊपरी तौर पर मानव अधिकारों का रक्षक है. वहां न्यायपालिका की श्रेष्ठता असंदिग्ध है. इसके बावजूद अमरीका पूरी दुनिया में पूंजीवाद का सरगना शोषक बना हुआ है. उसके नाम से किसी देश की घिग्गी बंध जाती है. किसी दूसरे को मितली आने लगती है. कोई उससे छुटकारा पाने को मोक्ष के बराबर समझता है. दुनिया में लेकिन भारत वह महान देश है, जिसके प्रधानमंत्री मोहनदास करमचंद गांधी के रास्ते पर चलने की नीयत रखने के बदले अमरीका के मनमोहन बने हुए हैं.

इस वर्ष गांधी के निधन दिवस पर उसी नई दिल्ली में एक कथित जनयुद्ध की शुरुआत की गई, जहां 5 बजकर 17 मिनट पर गांधी को गोडसे की गोलियों ने भून दिया था. गांधी की शहादत का दिन भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए बौद्धिकों, नागरिकों और स्वयंसेवी संस्थाओं की ओर से प्रतीक के तौर पर चुना गया. उसी नई दिल्ली में आज़ादी के कोई पांच वर्ष पहले से गांधी के योग्यतम शिष्यों नेहरू और पटेल वगैरह ने उनके कर्म को दाखिलदफ्तर कर दिया था.

देश का विभाजन गांधी के विरोध के बावज़ूद हुआ. गांधी के सपनों का भारत कांग्रेस के कर्णधारों ने अपने पैरों तले कुचला लेकिन तोतारटंत की तरह उनके नाम का जाप करना जारी रखा. गांधी का नाम फिर भी भारत के लोकजीवन की झाड़ियों में छिपा रहा. इस वर्ष देश के करीब साठ शहरों में उसकी याद में केंद्र सरकार की भ्रष्टाचार-कथा के विरुद्ध एक जनचुनौती जूलूस, रैली और आमसभा बनकर सड़कें नापती रही.

भगत सिंह के बारे में कुछ अनदेखे तथ्य

कनक तिवारी

मैं भगतसिंह के बारे में कुछ भी कहने के लिए अधिकृत व्यक्ति नहीं हूं. लेकिन एक साधारण आदमी होने के नाते मैं ही अधिकृत व्यक्ति हूं, क्योंकि भगतसिंह के बारे में अगर हम साधारण लोग गम्भीरतापूर्वक बात नहीं करेंगे तो और कौन करेगा. मैं किसी भावुकता या तार्किक जंजाल की वजह से भगतसिंह के व्यक्तित्व को समझने की कोशिश कभी नहीं करता. इतिहास और भूगोल, सामाजिक परिस्थितियों और तमाम बड़ी उन ताकतों की, जिनकी वजह से भगतसिंह का हम मूल्यांकन करते हैं, अनदेखी करके भगतसिंह को देखना मुनासिब नहीं होगा.

भगत सिंह

 
पहली बात यह कि कि दुनिया के इतिहास में 24 वर्ष की उम्र भी जिसको नसीब नहीं हो, भगतसिंह से बड़ा बुद्धिजीवी कोई हुआ है? भगतसिंह का यह चेहरा जिसमें उनके हाथ में एक किताब हो-चाहे कार्ल मार्क्स की दास कैपिटल, तुर्गनेव या गोर्की या चार्ल्स डिकेन्स का कोई उपन्यास, अप्टान सिन्क्लेयर या टैगोर की कोई किताब-ऐसा उनका चित्र नौजवान पीढ़ी के सामने प्रचारित करने का कोई भी कर्म हिन्दुस्तान में सरकारी और गैर सरकारी संस्थानों सहित भगतसिंह के प्रशंसक-परिवार ने भी लेकिन नहीं किया. भगतसिंह की यही असली पहचान है.

भगतसिंह की उम्र का कोई पढ़ा लिखा व्यक्ति क्या भारतीय राजनीति का धूमकेतु बन पाया? महात्मा गांधी भी नहीं, विवेकानन्द भी नहीं. औरों की तो बात ही छोड़ दें. पूरी दुनिया में भगतसिंह से कम उम्र में किताबें पढ़कर अपने मौलिक विचारों का प्रवर्तन करने की कोशिश किसी ने नहीं की. लेकिन भगतसिंह का यही चेहरा सबसे अप्रचारित है. इस उज्जवल चेहरे की तरफ वे लोग भी ध्यान नहीं देते जो सरस्वती के गोत्र के हैं. वे तक भगतसिंह को सबसे बड़ा बुद्धिजीवी कहने में हिचकते हैं.

विकास के विनाश का टापू

प्रशांत कुमार दुबे और रोली शिवहरे

साहब ! इंदिरा गांधी के कहने पर बसे थे जहां पर. अब आप ही बताओ कि देश का प्रधानमंत्री आपसे कहे कि ऊंची जगह पर बस जाओ, तो बताओ कि आप मानते कि नहीं ! हमने हां में जवाब दिया. जो उन्होंने कहा कि हमने भी तो यही किया. उनकी बात मान ली तो आज यहां पड़े हैं. इंदिरा जी बरगीनगर आईं थीं और उन्होंने खुद आमसभा में कहा था. श्रीमती गांधी ने यह भी कहा था कि सभी परिवारों को पांच-पांच एकड़ जमीन और एक-एक जन को नौकरी भी देंगें. अब वे तो गईं ऊपरे और उनकी फोटो लटकी है, अब समझ में नहीं आये कि कौन से सवाल करें? का उनसे, का उनकी फोटो से, का जा सरकार से ? सरकार भी सरकार है, वोट लेवे की दान (बारी) तो भैया, दादा करती है और बाद में सब भूल जाते हैं. फिर थोड़ा रुक-कर कहते हैं पंजा और फूल, सबई तो गये भूल.

यह व्यथा है जबलपुर जिले की मगरधा पंचायत के बढ़ैयाखेड़ा गांव के दशरु, मिठ्ठू आदिवासी की.

बढ़ैयाखेड़ा को नाव वाला गांव कहना शायद ठीक होगा. किसी ज़माने में यह गांव भी देश के दूसरे गांवों की तरह था लेकिन देखते ही देखते यह गांव दूसरे गांवों से अलग हो गया. आज की तारीख में यह गांव तीन ओर से बरगी बांध के पानी से घिरा है और बचा हुआ एक मात्र रास्ता जंगल की ओर जाता है. मतलब ये कि अगर इस गांव से किसी को कहीं जाना है तो उसे पानी वाले रास्ते से ही नाव में बैठकर जाना होता है और वह भी कम से कम 10 किलोमीटर तक.

अगर किसी को दिल को दौरा भी पड़ जाये और यदि उसे जीना है तो उसे अपने दिल को कम से कम तीन घंटे तो धड़काना ही होगा, तब कहीं जाकर उसे बरगीनगर में न्यूनतम स्वास्थ्य सुविधा नसीब हो पायेंगी. और वो भी तत्काल किश्ती मिल जाये तभी यह संभव है. सुसाईटी यानी राशन दुकान से राशन लाना है तो भी किश्ती और हाट-बाजार करना है तो भी किश्ती. यानी किश्ती के सहारे चल रहा है जीवन इनका. कहीं भी जाओ, एक तरफ का 10 रुपया.

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लेखक विषय संवाद साभार अनुवादक

पहले वो आए साम्यवादियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं साम्यवादी नहीं था

 

फिर वो आए मजदूर संघियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं मजदूर संघी नहीं था

 

फिर वो यहूदियों के लिए आए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं यहूदी नहीं था

 

फिर वो आए मेरे लिए

और तब तक बोलने के लिए कोई बचा ही नहीं था

 

मार्टिन नीमोलर (1892-1984)