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मोहल्ला लाइव

एक राबिया के विरोध में पुलिस और पूरी व्यवस्था

रजनीश प्रसाद

[राबिया के विरोध में, राडिया के नहीं। वैसे वो व्यस्त भी तो होंगे देशद्रोहियों के खिलाफ़ लड़ाइयाँ लड़ने में। हिंसा को रोकने का सवाल है, जनतंत्र को बचाने का सवाल है। और बहुत से सवाल हैं इसी तरह के। फुर्सत कहाँ है।]

दिल्ली उच्च न्यायालय ने पुलिस, वकीलों और व्यापारियों के गठजोड़ से लगभग पांच वर्ष से लगातार बलात्कार की शिकार राबिया के मामले में पुलिस आयुक्त को कार्रवाई करने का निर्देश दिया है। राबिया के मामले में महिला आयोग, पुलिस के उच्चाधिकारियों, गृह मंत्रालय से सुनवाई नहीं किये जाने की स्थिति में राबिया ने उच्च न्यायालय को एक पत्र लिखा था और उसी पत्र के आधार पर पुलिस आयुक्त को कार्रवाई करने का निर्देश दिया गया है। यह जानकारी जागृति महिला समिति की अध्यक्ष निर्मला शर्मा ने संवाददाता सम्मेलन में दी। इस मौके पर पीड़िता भी मौजूद थी।

संवाददाताओं के सामने अपनी दर्दनाक दास्तां बताते हुए राबिया ने कहा कि वह उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर जिले के निम्न मध्यवर्ग के परिवार की है। 12वीं कक्षा पास करने के बाद सन 2002 से 2004 तक कंप्यूटर ट्रैनिंग, सिलाई कढ़ाई, ब्यूटी पार्लर आदि की ट्रेनिंग लेती रही। जनवरी 2005 में राबिया फैशन डिजायनिंग का कोर्स करने का सपना लिये दिल्ली आयी और संस्थान में दाखिले के लिए गयी। लेकिन फैशन डिजायनिंग का सेशन जून/जुलाई से शुरू होना था। इसी बीच राबिया की नजर एक हिंदी अखबार के टेली कालर के जॉब के विज्ञापन पर पड़ी। इस जॉब के सिलसिले में उसे प्रीतमपुरा के टूईन टॉवर में साजन इंटर प्राइजेज में मिलना था। उसे प्रोपराइटर सुरेंद्र बिज उर्फ साहिल खत्री ने कोई भी नियुक्ति पत्र या करारनामा नहीं दिया। वहीं से 18-19 साल की राबिया के जीवन की बर्बादी शुरू हो गयी। दो माह काम करने पर प्रोपराइटर उर्फ मालिक ने उसे मात्र तीन हजार रूपये वेतन दिये। राबिया ने इतने कम वेतन की स्थिति में नौकरी छोड़ने को कहा तो प्रोपराइटर ने राबिया को रहने के लिए जगह का ऑफर दिया। राबिया 20 अप्रैल 2005 प्रोपराइटर द्वारा दिये गये फ्लोर सी-27, ओम अपार्टमेंट 33/77 पंजाबी बाग में अपने सामान के साथ शिफ्ट हो गयी। उस फ्लोर पर पहले से ही एक लड़की रह रही थी।

शर्म करो कि तुम्‍हारी मां ऐसी कहानियां लिखती हैं...

अविनाश

मार्च की तीसरी तारीख की शाम, जब मौसम बेहद खुश्‍क था और रह रह कर बूंदा बांदी हो रही थी, 72, लोदी स्‍टेट के सभागार में लोग भरे हुए थे। अंग्रेजी, फ्रेंच और हिंदुस्‍तानी रंगों वाले मिले जुले लोगों की तादाद नमिता गोखले और जय अर्जुन सिंह की बातचीत सुनने आयी थी। नमिता गोखले अंग्रेजी की मशहूर लिक्‍खाड़ हैं और सन 84 में उनका जलवा पारो : ड्रीम्‍स ऑफ पैशन. के साथ शुरू हुआ था। जबकि जय अर्जुन सिंह पत्रकार हैं और जाने भी दो यारों पर लिखी उनकी एक किताब को लोग इधर बड़े चाव से पढ़ रहे हैं।

जय ने नमिता से ढेर सारी बातें की और बातों के तमाम सिलसिले में लेखक की अपनी यात्रा थी, रचना प्रक्रिया थी, अध्‍यात्‍म और सेक्‍स था, साथ ही मिथकों के साथ एक लेखक की मुठभेड़ के ढेर सारे किस्‍से थे। नमिता ने अपनी अलग अलग किताबों से उठा कर कुछ टुकड़े भी सुनाये, जिनमें सुपर डेज़. के कुछ शानदार अंश थे, तो शकुंतला. के हिंदी अनुवाद की थोड़ी बानगी भी थी…

बनारस की वह पहली छवि मैं कभी भूल नहीं पायी : घाटों पर लपलपाती चिताओं की अग्नि, लहरों पर टूटती उनकी परछाइयां। उनके प्रकाश से धूमिल पड़ गया चंद्रमा। जिह्वा पर लपलपाती आकाश की ओर लपकती ज्‍वाला। चिताओं के प्रकाश और चरमराहट के पीछे अंधेरे में डूबा नगर। शकुंतला ने यहीं प्राण त्‍यागे थे, इस पवित्र नदी के तट पर। उस जन्‍म का स्‍मृति जाल मुझे मुक्‍त नहीं होने देता…

सुपर डेज़ में उनके मायानगरी वाले दिन थे, जिनमें ऋषि कपूर, नीतू सिंह और राजेश खन्‍ना का दिलचस्‍प जिक्र था।

जय अर्जुन सिंह ने अस्‍सी के दशक में पारो जैसी बिंदास किताब लिखने के बारे में जब नमिता गोखले से सवाल किया, तो उन्‍होंने कहा कि इस किताब के प्रकाशन के बाद का समय उनके और उनके परिवार के लिए बहुत मुश्किलों भरा था। किताब लिखते हुए उन्‍हें इस बात का ठीक ठीक अंदाजा नहीं था कि हिंदुस्‍तान इस तरह की किताब लिखने की क्‍या प्रतिक्रिया होगी। इसलिए बेबाकी में जो कहानी कह दी गयी, वो कह दी गयी।

राडिया कांड : कौए कभी कौए का मांस नहीं खाते?

दिलीप मंडल

मीडिया के बारे में अक्सर कहा जाता है कि हर किसी की बंद मुट्ठी खोलने को तत्पर मीडिया कभी अपनी मुट्ठी नहीं खोलता। ब्रिटिश पत्रकार निक डेविस ने मीडिया और लॉबीइंग के रिश्तों के बारे में अपनी चर्चित किताब “फ्लैट अर्थ न्यूज” की भूमिका की शुरुआत में मीडिया के बारे में लिखा है कि कुत्ता कुत्ते को नहीं खाता और भूमिका के अंत में लिखा है कि इस नियम को तोड़ने की जरूरत है। मीडिया में यह अघोषित विधान रहा है कि देश-दुनिया में जो कुछ हो रहा है, सब कुछ बताओ, लेकिन अपने बारे में और अपने कारोबार से जुड़े अन्य संस्थानों और लोगों के बारे में न बताओ। इसके उदाहरण आसपास देख सकते हैं।

मिसाल के तौर पर 2009 में जब आर्थिक मंदी के दौर में भारत में छंटनियां हो रही थीं, तो कारोबार के अलग-अलग क्षेत्रों में नौकरियां खत्म होने की खबरें देने वाले अखबारों या चैनलों ने यह नहीं बताया कि मीडिया में भी बड़े पैमाने पर छंटनी हुई है और वेतन घटाये गये हैं। मीडिया के मालिक और संपादक राजनेताओं ओर पार्टियों के करीब हैं, यह बात हम तभी जान पाते हैं, जब कोई मालिक या संपादक राज्यसभा का सदस्य बन जाता है या पद्मश्री या पद्मविभूषण से सम्मानित किया जाता है। मीडिया कभी नहीं बताता कि उसके कौन से और कारोबार और कारोबारी हित हैं और इस बात का उसकी संपादकीय नीति पर किस तरह असर पड़ता है। मिसाल के तौर पर भारत में प्रमुख मीडिया हाउस, मीडिया से इतर लगभग ढाई सौ और कारोबार में हैं। यह कारोबार कुछ भी हो सकता है, मसलन – चीनी मिल, तेल मिल, रियल एस्टेट, माइनिंग, स्टील, शिक्षा, फिल्म निर्माण, अचार, रसायन उद्योग, रिटेलिंग आदि। लेकिन यह बात पाठकों और दर्शकों को पता नहीं चलती।

हम बराबरी और संस्‍कृति का ‘विकास’ चाहते हैं: बिनायक

बिनायक सेन

10  जनवरी, 2011

[मानवाधिकार कार्यकर्ता विनायक सेन को उम्रकैद की सजा सुनाये जाने की घटना ने अपने देश के साथ-साथ दुनिया के लोगों का ध्यान खींचा है। देश के हर हिस्से से विनायक सेन की सजा के खिलाफ आवाज उठ रही है। लगभग हर दिन किसी न किसी हिस्से में प्रतिरोध सभा, प्रतिवाद मार्च आदि का आयोजन किया जा रहा है। एमनेस्टी इंटरनेशनल ने इस सजा की कड़े शब्‍दों में निंदा की है। छत्तीसगढ़ की स्थानीय अदालत के इस फैसले को लोग लोकतंत्र पर हमले के रूप में देख रहे हैं। ये साक्षात्कार विनायक सेन से कुछ महीनों पहले अनीश अंकुर ने लिया था, जब वे ‘चंद्रशेखर स्मृति व्याख्यान’ के सिलसिले में पटना गये थे। अनीश ने इस साक्षात्‍कार को भेजने के साथ ही ये सूचना दी है कि ये द संडे पोस्‍ट में छपा है : मॉडरेटर - मोहल्ला लाइव]

अब कौन है आम आदमी का पत्रकार? कोई नहीं!

भूपेन सिंह

प्रणय रॉय, राजदीप सरदेसाई, बरखा दत्त, अरुण पुरी, रजत शर्मा, राघव बहल, चंदन मित्रा, एमजे अकबर, अवीक सरकार, एन राम, जहांगीर पोचा और राजीव शुक्ला का परिचय क्या है? ये पत्रकार हैं या व्यवसायी? बहुत सारे लोगों को ये सवाल बेमानी लग सकता है। लेकिन भारतीय मीडिया में नैतिकता का संकट जहां पहुंचा है, उसकी पड़ताल के लिए इन सवालों का जवाब तलाशना बहुत जरूरी हो गया है। इस लिहाज से पत्रकारीय मूल्यों और धंधे के बीच के अंतर्विरोधों का जिक्र करना भी जरूरी है।

जो लोग न्यूज मीडिया को वॉच डॉग, समाज का प्रहरी या लोकतंत्र का चौथा स्तंभ जैसा कुछ मानते हैं, वे अपेक्षा करते हैं कि मीडिया सामाजिक सरोकारों से जुड़ा काम करेगा। वे नहीं मानते कि खबर सिर्फ एक उत्पाद है, जिसका धंधा किया जाना है। टाइम्स ऑफ इंडिया ग्रुप उन्नीस सौ नब्बे के दशक में समीर जैन के प्रभाव में आने के बाद से ही इस बात को सामाजिक स्वीकृति दिलाने के प्रोपेगैंडा में जुटा है कि खबरें बिक्री की वस्तु के अलावा और कुछ नही हैं। इसलिए इस अखबार में संपादक की बजाय ब्रैंड मैनेजर हावी होते जा रहे हैं, जो तय करते हैं कि अखबार में वहीं खबर छपेगी, जो उनकी नजर में बिकाऊ हो।

एक पत्रकार से हम लोकतांत्रिक मूल्यों के पक्ष में खड़ा होने की अपेक्षा करते हैं। पत्रकार का धंधेबाज बन जाना इस पेशे की नैतिकता पर सवाल खड़ा करता है। व्यवसायी हमेशा पूंजी और मुनाफे की दौड़ में शामिल होता है। पत्रकार अगर व्यवसायी बनेगा तो निश्चित तौर पर व्यवसायी और पत्रकार के हित आपस में टकराएंगे। पत्रकारीय हितों को मुनाफे के हित बाधित करेंगे। यहां पर पत्रकारिता का इस्तेमाल मुनाफा कमाने के लिए होने लगेगा, इस बात में कोई शक नहीं।

अब फिल्‍मों के जरिये देंगे झांसा, जनता का भरोसा बटोरेंगे

विनीत कुमार

कनाट प्लेस के ओडियन में जब हम नो वन किल्ड जेसिका देखने घुसे तो जेसिका लाल को न्याय दिलाने में मीडिया की क्या भूमिका रही थी, उस याद से कहीं ज्यादा नीरा राडिया टेप प्रकरण में किन-किन मीडियाकर्मियों के नाम सामने आये, ये बातें ज्यादा याद आ रही थीं। हमें लग रहा था कि NDTV 24X7 पर 30 नवंबर के बरखा दत्त कॉनफेशन के बाद, उसका दूसरा हिस्सा देखने आ गये हैं। मामला ताजा है, इसलिए मीडिया शब्द के साथ राडिया अपने आप से ही याद हो आता है। पी चिदंबरम ने प्रेस कानफ्रेंस में पत्रकारों से मजाक क्या कर दिया कि ऑर यू फ्रॉम मीडिया ऑर राडिया कि अब मीडिया के भीतर ये न केवल मुहावरा बल्कि मीडिया के बारे में सोचने का प्रस्थान बिन्दु बन गया है। बहरहाल, राडिया-मीडिया प्रकरण के बाद मैं पहली फिल्म देख रहा था जिसका कि बड़ा हिस्सा मीडिया से जुड़ता है। मीडिया क्रिटिक सेवंती निनन ने राडिया टेप को मीडिया स्टूडेंट और पीआर प्रैक्टिशनरों के लिए टेक्सट मटीरियल करार दिया है। मैं नो वन किल्ड जेसिका फिल्म को हाउ टू अंडर्स्टैंड इंगलिश चैनल लाइक एनडीटीवी के लिए जरूरी पाठ मानता हूं। हालांकि इस फिल्म को एनडीटीवी के लोगों ने नहीं बनाया है, लेकिन जिस तरह से एनडीटीवी के कुछ ऑरिजिनल मीडियाकर्मी और कुछ चरित्र के तौर पर दिखाये गये हैं, पूरा सेटअप एनडीटीवी का है, ऐसे में फिल्म का बड़ा हिस्सा एनडीमय हो गया है जो कि कई बार सिनेमा के भीतर गैरजरूरी जान पड़ता है।

फैज पर मनमोहन का आलेख : गुरूरे इश्‍क का बांकपन

मनमोहन

[ये फैज अहमद फैज का जन्‍मशताब्‍दी वर्ष है। इस मौके पर हिंदी की जिस पहली पत्रिका ने उन पर विशेषांक निकाला है, वह है नया पथ। इसके संपादक हैं वरिष्‍ठ आलोचक मुरली मनोहर प्रसाद सिंह। एक जनवरी को सफदर की याद में हर साल लगने वाले मेले में नया पथ के इस अंक का लोकार्पण हुआ। उस दिन हर तीसरे हाथ में ये पत्रिका नजर आ रही थी। शेष नारायण जी ने बाद में फोन पर बताया कि इस पत्रिका को तो पढ़ो ही, इसमें मनमोहन का लेख जरूर पढ़ना। फिर उन्‍होंने बताया कि मनमोहन कितने बड़े कवि हैं और कैसे राजेश जोशी कहते रहे हैं कि मुझे मनमोहन की कविताओं से डर लगता है। उन्‍होंने नया पथ के इस अंक की इमेज फाइल मुहैया भी करायी, लेकिन हम उसे टेक्‍स्‍ट में कनवर्ट नहीं कर पाये। भला हो श्री सत्‍यानंद निरुपम का कि उन्‍होंने वाया मुरली बाबू पूरा का पूरा टेक्‍स्‍ट हमें मेल कर दिया। हमारी आदतों के मद्देनजर उन्‍होंने धमकी भी दी कि शीर्षक से छेड़छाड़ मत कीजिएगा और नया पथ का पूरा पता जरूर दीजिएगा। तो नया पथ का पूरा पता है : 42, अशोक रोड, नयी दिल्‍ली 110001, फोन : 23738015, 27552954, 22750117, ईमेल : jlscentre@yahoo.com - मॉडरेटर (मोहल्ला लाइव)]

फैज अहमद फैज और उनकी शायरी की जगह और उसका मूल्य ठीक-ठीक वही बता सकते हैं, जो उर्दू जुबान और अदब के अच्छे जानकार और अधिकारी विद्वान हैं। मेरी समाई तो सिर्फ इतनी है कि अपने कुछ ‘इंप्रेशंस’ (या इस कवि के साथ अपने लगाव की कुछ तफसीलें) रख दूं, सो यहां मैं इन्हीं को रखने की कोशिश करता हूं।

उस्‍ताद सरकार की जमूरी अदालतों को बंद करो! बंद करो!

विनीत कुमार

वो दास्तानगोई विनायक सेन के लिए उठी एक आवाज थी

आज से करीब ढाई साल पहले 16 मई 2008 को महमूद फारूकी ने विनायक सेन की गिरफ्तारी के खिलाफ होनेवाले कार्यक्रम में दास्तानगोई की थी। साथ में दानिश भी थे। उस दिन इन दोनों का मिजाज बिल्कुल अलग था। माहौल के मुताबिक एक ही साथ कई मिले-जुले भाव। रवींद्र भवन, साहित्य अकादमी परिसर में खचाखच लोग भरे थे। खुले में देर शाम तक लोग टस से मस नहीं हुए। आज उस शाम और दास्तानगोई का जिक्र फिर से करना चाहता हूं। वहां से लौटकर मैंने जो पोस्ट लिखी, एक बार फिर से साझा करना चाहता हूं। नये सिरे से इसे आज फिर पढ़ना आपको जरूरी लगे, ऐसी उम्मीद है। इस नीयत और भरोसे के साथ कि अब किसी एक शख्स और मुद्दे के साथ छिटपुट तरीके से प्रतिरोध जाहिर करने से कहीं ज्यादा जरूरी है, अभिव्यक्ति की आजादी सुनिश्चित न किये जाने तक लड़ते रहना, चीजों को अपनी कोशिशों से दरकाते रहना : विनीत कुमार

महमूद फारूकी साहब ने कल रात जब दास्तानगोई में अय्यारी और जादूगरी का किस्सा सुनाया, जिसमें चारों तरफ से सुरक्षा के नाम पर प्रहरी के घेर लेने पर जुडूम-जुडूम की आवाज आती थी तो मुझे बस एक ही बात समझ में आयी कि -

यदि देश की सुरक्षा यही होती है कि बिना जमीर होना जिंदगी के लिए शर्त बन जाए
आंख की पुतली में ‘हां’ के सिवाय कोई भी शब्द अश्लील हो
और मन बदकार पलों के सामने दंडवत झुका रहे
तो हमें देश की सुरक्षा से खतरा है
- पाश


दास्‍तानगोई पेश करते हुए महमूद फारूकी

फारूकी साहब की दास्तानगोई में भी कुछ ऐसा ही हो रहा था, जहां जादूगर अय्यारों को कुछ इस तरह की सुरक्षा दे रहे थे कि अय्यार तबाह-तबाह हो गये। लेकिन ये जादूगर एक सुरक्षित मुल्क बनाने पर आमादा थे। फारूकी साहब के हिसाब से वो मुल्क-ए-कोहिस्तान बनाना चाह रहे थे। जहां के लिए सबसे खतरनाक शब्द था – आजादी।

विनायक सेन के लिए धरना, प्रदर्शन और चंद कविताएं

अनेक

परसों से आज तक बिनायक सेन के लिए लिखी गयी तीन कविताएं मोहल्‍ला लाइव के पास आयी हैं। बिनायक गांधी के अंतिम आदमी के लिए लड़ रहे थे और उन्‍हें इसके लिए आजाद भारत में उम्रकैद मिली। 125 साल पूरे होने पर जो कांग्रेस इतिहास को नये सिरे से खंगाल रही है, हिरावल जनता ही एहसास दिला सकती है कि सन 47 और 2010 में कोई फर्क नहीं है। मुक्ति की लड़ाई अब भी जारी है। हम इस लड़ाई में सरकार और अदालत के खिलाफ हैं : मॉडरेटर - मोहल्ला लाइव

 

तितलियों का खून

अंशु मालवीय ने यह कविता विनायक सेन की अन्यायपूर्ण सजा के खिलाफ 27 दिसंबर 2010 को इलाहाबाद के सिविल लाइन्स, सुभाष चौराहे पर तमाम सामाजिक संगठनों द्वारा आयोजित ‘असहमति दिवस’ पर सुनायी। अंशु भाई ने यह कविता 27 दिसंबर की सुबह लिखी। इस कविता के माध्यम से उन्होंने पूरे राज्य के चरित्र को बेनकाब किया है : राजीव यादव

वे हमें सबक सिखाना चाहते हैं साथी !
उन्हें पता नहीं कि वो तुलबा हैं हम
जो मक़तब में आये हैं सबक सीखकर,

फ़र्क़ बस ये है
कि अलिफ़ के बजाय बे से शुरू किया था हमने
और सबसे पहले लिखा था बग़ावत।

जब हथियार उठाते हैं हम
उन्हें हमसे डर लगता है
जब हथियार नहीं उठाते हम
उन्हें और डर लगता है हमसे
ख़ालिस आदमी उन्हें नंगे खड़े साल के दरख़्त की तरह डराता है
वे फौरन काटना चाहता है उसे।

हमने मान लिया है कि
असीरे इन्सां बहरसूरत
ज़मीं पर बहने के लिए है
उन्हें ख़ौफ़ इससे है… कि हम
जंगलों में बिखरी सूखी पत्तियों पर पड़े
तितलियों के खून का हिसाब मांगने आये हैं।

 

हमीं तो देश हैं, बाकी जो हैं सब देशद्रोही हैं

मानवाधिकार कार्यकर्ता और बाल चिकित्सक डॉ बिनायक सेन की रिहाई के लिए 27 दिसंबर 2010 को दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुए धरने-प्रदर्शन से लौटकर यह कविता लिखी : मुकुल सरल

हमारे राज में फूलों में खुशबू !
कुफ्र है ये तो !

हमारे राज में शम्मां है रौशन !
कुफ्र है ये तो !

हमारे राज में कोयल भला ये
कैसे गाती है?
कोई जासूस लगती है, किसे ये भेद बताती है ?

क्‍या होंगे शक्तिशाली राष्‍ट्रों को लगे इस घाव के नतीजे?

उंबर्तो इको

इस लेख में बताया गया है कि विकिलीक्‍स ने अमेरिका जैसे सर्वशक्तिमान मुल्‍क की डिप्‍लोमेसी को किस तरह नंगा किया है और कोई मुल्‍क जिस गुमान में रहता है, उस गुमान को एक नागरिक की हैसियत से किस तरह तोड़ा जा सकता है। हालांकि नवभारत टाइम्‍स ने जो शीर्षक लगाया है, कैसा रहस्य है जिसके लीक पर इतनी मारामारी उससे एक भ्रम की स्थिति बनती है – लेकिन पूरे लेख का मर्म ये है कि इस लीक से राष्‍ट्राध्‍यक्षों के भविष्‍य का स्‍केच पुराने जासूसी वक्‍तों की तरह खींचा जा सकता है : मॉडरेटर - मोहल्ला लाइव

विकीलीक्स मामले की दोहरी अहमियत है। एक तरफ यह एक बोगस स्कैंडल है। ऐसा स्कैंडल, जिसे स्कैंडल तभी माना जा सकता है, जब इसे सरकार, जनता और प्रेस के रिश्तों में व्याप्त पाखंड की पृष्ठभूमि में देखा जाए। दूसरी तरफ इसमें अंतरराष्ट्रीय संचार व्यवस्था का पश्चगामी भविष्य नजर आ रहा है। ऐसा भविष्य, जिसमें हर नयी टेक्नॉलजी केकड़ों की तरह संचार को पीछे ही पीछे घसीटती जाएगी। इनमें पहले बिंदु को लें तो विकीलीक्स ने इसकी पुष्टि कर दी है कि किसी भी देश की गुप्तचर सेवा जो फाइलें जोड़ती रहती है, उनमें सिर्फ अखबारी कतरनें भरी होती हैं। बर्लुस्कोनी की सेक्स आदतों के बारे में अमेरिकी खुफिया एजेंसियों ने जो असाधारण खुलासे अपनी सरकार के पास भेजे हैं, वे महीनों से सबकी जानकारी में थे, और गद्दाफी का जो गंदा कैरिकेचर इन खुफिया फाइलों में नजर आता है, उससे ज्यादा ब्यौरे कैबरे डांसरों की परफॉर्मेंस में मिल जाते हैं।

जासूसी के अड्डे

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लेखक विषय संवाद साभार अनुवादक

पहले वो आए साम्यवादियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं साम्यवादी नहीं था

 

फिर वो आए मजदूर संघियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं मजदूर संघी नहीं था

 

फिर वो यहूदियों के लिए आए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं यहूदी नहीं था

 

फिर वो आए मेरे लिए

और तब तक बोलने के लिए कोई बचा ही नहीं था

 

मार्टिन नीमोलर (1892-1984)