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मसिजीवी

Masijivi

बिनायक के बहाने असहमति के पक्ष में

मसिजीवी

डा. बिनायक सेन अब एक अपरिचित नाम नहीं है। ब्लॉगजगत में ही उनपर कुछ मित्रों ने लिखा है मसलन परवेज साहब ने लिखा, रियाज ने लिखा संजीव तिवारी ने भी लिखा पर जाहिर है हम अपनी चिंताओं व सरोकारों की वरीयताएं स्‍वयं तय करते हैं- इन चिट्ठाकार मित्रों ने इस विषय पर अपनी अलग अलग राय ही रखी है जिसमें जाहिर है असहमतियॉं हैं और गनीमत है कि वे हैं। हाल में नेपकिन विवाद में जब हम चिट्ठाकार असहमतियों को सम्‍मानजनक जगह देने की मांग पर बहस कर रहे थे तभी देश में डा. बिनायक के अधिकारों को लेकर एक बहस जारी थी- ऐसी ही एक साहसी पोस्‍ट डा. सुनील दीपक ने समलैंगिकों के अधिकारों को लेकर पेश की है- चिट्ठाकारी ने अपने दायित्‍व संभालने शुरू कर दिए हैं। इसका श्रेय हमें पसंद हो या न हो हमें सुनीलजी व अविनाश जैसे चिट्ठाकारों को देना होगा जो अपने अपने तरीके से असहमत व विविध की अभिव्‍यक्ति के प्रति कटिबद्ध दिखते हैं।

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लेखक विषय संवाद साभार अनुवादक

पहले वो आए साम्यवादियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं साम्यवादी नहीं था

 

फिर वो आए मजदूर संघियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं मजदूर संघी नहीं था

 

फिर वो यहूदियों के लिए आए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं यहूदी नहीं था

 

फिर वो आए मेरे लिए

और तब तक बोलने के लिए कोई बचा ही नहीं था

 

मार्टिन नीमोलर (1892-1984)