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पुनर्विचार

मार्क्सवादी आलोचना के प्रतिसंधों पर

आशुतोष कुमार

(संतोष चतुर्वेदी संपादित ' अनहद ' के पहले अंक में प्रकाशित. समीक्षा के बहाने हिंदी की मार्क्सवादी आलोचना की नयी बहसों का एक जायजा.)


''प्रतिबद्धता के बावजूद '' आठवें नवें दशक में मार्क्सवादी आलोचना के भीतरी तनावों, अंतर्विरोधों और संघर्ष रेखाओं का एक महत्वपूर्ण दस्तावेज है. यह पुस्तक राजेन्द्र कुमार के सन अस्सी से लेकर अब तक लिखे गए आलोचनात्मक निबंधों का संग्रह है. दो खंडो वाले इस संकलन के पहले खंड में ' अभिप्राय' पत्रिका के लिए लिखे गए सम्पादकीय संकलित हैं , जब कि दूसरे खंड में कुछ अन्य निबंध हैं. 'अभिप्राय ' का पूरा दौर हिंदी की मार्क्सवादी आलोचना के लिए गहरे आतंरिक तनावों और दूरगामी बहसों का दौर है. इस उथल पुथल से निकल कर मार्क्सवादी आलोचना कहाँ पहुँची , और आज वह कहाँ और क्यों खड़ी है, इन सवालों में जिन की दिलचस्पी हो उन के लिए यह एक जरूरी किताब है.

आठवां दशक हिंदी साहित्य में कुछ बुनियादी बदलावों के लिए जाना जाता है. 'नयी कविता' - 'नयी कहानी' की व्यक्तिवाचक अंतरंगता और 'अकविता'- 'वाम कविता' की उद्धत बहिरंगता को छोड़ कर हिंदी ने समकालीनता के नए सामाजिक अन्तःकरण का आविष्कार किया. आलोचना के लिए यह एक चुनौतीपूर्ण समय था , क्योंकि नयी रचनाशीलता उस के बने बनाए चौखटों से बाहर निकल रही थी.ऐसे में मार्क्सवादी आलोचना की परम्परागत पद्धतियाँ और कसौटियां भी बहस के घेरे में आ रहीं थीं. मुक्तिबोध नयी कविता के दौर में ही आलोचना की जड़ीभूत सौन्दर्याभिरुची पर कशाघात कर चुके थे.उन्होंने अपने निबंधों में नयी मार्क्सवादी सौन्दर्य दृष्टि की मजबूत बुनियाद रखी थी , लेकिन व्यवहार में एक सुसंगत सैद्धांतिकी के रूप में उस का संगठित होना बाकी था , और शायद अब तक बाकी है.

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लेखक विषय संवाद साभार अनुवादक

पहले वो आए साम्यवादियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं साम्यवादी नहीं था

 

फिर वो आए मजदूर संघियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं मजदूर संघी नहीं था

 

फिर वो यहूदियों के लिए आए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं यहूदी नहीं था

 

फिर वो आए मेरे लिए

और तब तक बोलने के लिए कोई बचा ही नहीं था

 

मार्टिन नीमोलर (1892-1984)