Increase |  Decrease |  Normal

Current Size: 100%

Share this
Syndicate content

जनतापक्ष

Jantapaksh

अरब परिघटना – सवाल सिर्फ़ तानाशाही का नहीं है

अशोक कुमार पाण्डेय

पहले ‘उत्तरी अफ़्रीका के हांगकांग’ कहे जाने वाले ट्यूनीशिया और अब अरब क्षेत्र में अमरीकी साम्राज्यवाद के सबसे विश्वस्त सहयोगी मिस्र में पिछले दिनों हुई घटनाओं ने पूरी दुनिया को हिला कर रख दिया है। जहाँ ट्यूनीशिया के तानाशाह बेन अली को देश छोड़ कर भागना पड़ा, वहीं मिस्र में होस्नी मुबारक़ द्वारा मंत्रिमण्डल में व्यापक फेरबदल के बावज़ूद लाखों की जनता सड़कों पर है और वह मुबारक़ के सत्ता छोड़े जाने से पहले वापस लौटने के मूड में नहीं लग रही। इन लड़ाईयों ने अब निर्णायक रूप ले लिया है और स्थिति लगातार विस्फोटक बनी हुई है।  दशकों से सत्ता में बने हुए इन शासकों के प्रति जनता का जबर्दस्त गुस्सा सिर्फ़ तानाशाही के प्रति नहीं है। पश्चिमी और पूंजीवादी मीडिया इस पूरी परिघटना को केवल ‘चुनाव आधारित लोकतंत्र के समर्थन में तानाशाही के ख़िलाफ़ जनाक्रोश’ के रूप में दिखाने का प्रयास कर रहा है। इसके पीछे उन जगहों पर पुराने शासकों की जगह अपने समर्थन वाले नये चेहरों को स्थापित करने की मंशा भी है कि जिससे वहाँ अमेरीकी नेतृत्व वाले साम्राज्यवाद के हित सुरक्षित रह सकें। लेकिन हक़ीक़त यह है कि इस आक्रोश की जड़ें गहरी हैं और सीधे-सीधे नव उदारवादी नीतियों के उन घातक तथा विभाजनकारी परिणामों से जुड़ी हुई हैं जिनके स्पष्ट धब्बे हम अपने देश की आर्थिक-सामाजिक व्यवस्था में भी देख सकते हैं।

मिस्र में सफल रही जनता की क्रांति,राष्ट्रपति होस्नी मुबारक ने दिया इस्‍तीफा

(जनपक्ष से साभार)

मिस्र में करीब 15 दिन से चल रही जनता की ‘क्रांति’ रंग ला चुकी है। मिस्र में 30 साल से सत्ता में काबिज रहे राष्ट्रपति ने आखिरकार आंदोलनकारियों के सामने घुटते टेक दिए। उन्होंने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है।राष्‍ट्रपति हुस्‍नी मुबारक को लेकर खबर आ रही है कि वह देश छोड़ चुके हैं और सत्‍ता उप राष्‍ट्रपति के हवाले कर गए हैं।

उपराष्‍ट्रपति ने आज मुबारक के इस्‍तीफे की घोषणा कर दी। इससे पहले जनता ने राष्‍ट्रपति महल की ओर मार्च किया। इसी बीच सेना ने कहा है कि वे देश से आपातकाल हटाने को राजी हैं और जैसे ही स्थितियां सामान्य होंगीं, आपातकाल हटा लिया जाएगा।

मुबारक के पद छोड़ते ही पूरे देश में जश्न का माहौल है। इससे पूर्व मुबारक पर पद छोड़ने को लेकर चारों तरफ से दबाव बढ़ रहा था।

ईरान के प्रेस टीवी ने खबर दी कि हुस्नी मुबारक मिस्र छोड़कर भाग गए हैं। अपुष्ट खबरों के मुताबिक मुबारक के साथ सेना प्रमुख भी शर्म-एल-शेख के रेड-सी रिसॉर्ट में हैं।

उधर अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा भी मिस्र के हालात पर नजर रखे हुए थे। वहां की आम जनता को देश की सेना का भी समर्थन मिला हुआ था। इसकी वजह से ना चाहते हुए भी मुबारक को अपने पद से इस्तीफा देने के लिए बाध्य होना पड़ा।

इससे पूर्व शुक्रवार को ही हुस्नी मुबारक राजधानी काहिरा छोड़कर अज्ञात स्थान के लिए रवाना हो गए थे। समाचार एजेंसी डीपीए के मुताबिक राष्ट्रपति महल से मुबारक हेलीकॉप्टर से अज्ञात स्थान के लिए रवाना हुए। ऐसा माना जा रहा है कि वे शर्म-अल-शेख के रेड सी रिसोर्ट गए होंगे।

उल्लेखनीय है कि वर्ष 1981 से सत्ता पर काबिज मुबारक पर पद छोड़ने का चौतरफा दबाव बढ़ गया था।मिस्र में 82 वर्षीय मुबारक के 30 साल पुराने शासन को खत्म करने के लिए लाखों प्रदर्शनकारी 25 जनवरी से आंदोलन कर रहे हैं।

उनके इस्तीफे की मांग को लेकर पिछले दो सप्ताह से देशव्यापी आंदोलन जारी है। राजधानी काहिरा का तहरीर चौक पिछले 25 जनवरी से आंदोलन का केंद्र बना हुआ था।

संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक 25 जनवरी के बाद से विरोध प्रदर्शनों में देश में अब तक 300 लोगों की मौत हो चुकी है।

अविकसित देशों की सांस्कृतिक समस्याएँ

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

[शीमा माजीद द्वारा संपादित फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ के चुनिन्दा अंग्रेजी लेखों का संग्रह 'कल्चर एंड आइडेंटिटी: सिलेक्टेड इंग्लिश राइटिंग्स ऑफ़ फैज़' (ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस,2005) अपनी तरह का पहला संकलन है. इस संकलन में फ़ैज़ के संस्कृति,कला, साहित्य,सामाजिक और राजनीतिक विषयों पर लेख इसी शीर्षक के पांच खण्डों में विभाजित है. इसके अलावा एक और 'आत्म-कथ्यात्मक' खंड है, जिसमें प्रमुख है फ़ैज़ द्वारा 7 मार्च 1984 (अपने इंतकाल से महज़ आठ महीने पहले) को इस्लामाबाद में एशिया स्टडी ग्रुप के सामने कही गई बातों की संपादित ट्रांसक्रिप्ट. पुस्तक की भूमिका पाकिस्तान में उर्दू साहित्य के मशहूर आलोचक मुहम्मद रज़ा काज़िमी ने लिखी है. शायरी के अलावा फ़ैज़ साहब ने उर्दू और अंग्रेजी दोनों भाषाओँ में साहित्यिक आलोचना और संस्कृति के बारे में विपुल लेखन किया है. साहित्य की प्रगतिशील धारा के प्रति उनका जगजाहिर झुकाव इस संकलन के कई लेखों में झलकता है. इस संकलन में शामिल अमीर ख़ुसरो, ग़ालिब, तोल्स्तोय, इक़बाल और सादिकैन जैसी हस्तियों पर केन्द्रित उनके लेख उनकी 'व्यावहारिक आलोचना' (एप्लाइड क्रिटिसिज्म) की मिसाल हैं. यह संकलन केवल फ़ैज़ साहब के साहित्यिक रुझानों पर ही रौशनी नहीं डालता बल्कि यह पाकिस्तान और समूचे दक्षिण एशिया की संस्कृति और विचार की बेहद साफदिल और मौलिक व्याख्या के तौर पर भी महत्त्वपूर्ण है. इसी पुस्तक के एक लेख 'कल्चरल प्रौब्लम्स इन अंडरडेवलप्ड कंट्रीज' का हिन्दी अनुवाद नया पथ के फ़ैज़ विशेषांक से साभार प्रस्तुत है - भारत भूषण तिवारी]

कला के लिए कला और प्रतिरोध

ऑड्री लॉर्ड

प्रतिरोध को मैं हमारी ज़िंदगियों की विभीषिकाओं, विसंगतियों को महसूस करने हेतु किसी को उत्साहित करने वाले जेनुइन साधन के तौर पर देखती हूँ. सामाजिक प्रतिरोध कहता है कि जिस तरह हम जी रहे हैं, हमेशा उस तरह जीना ज़रूरी नहीं है. अगर हम खुद शिद्दत से महसूस करते हैं, और शिद्दत से महसूस करने के लिए खुद को और औरों को उत्साहित करते हैं, तो बदलाव लाने के हमारे उत्तरों का बीज हमें मिल जाएगा. क्योंकि जब आप जान जाते हैं कि जिसे आप महसूस कर रहे हैं
वह क्या है, जब आप जान जाते हैं तो आप शिद्दत से महसूस कर सकते हैं, शिद्दत से प्यार कर सकते हैं, ख़ुशी महसूस कर सकते हैं, और फिर हम मांग करेंगे कि हमारी ज़िंदगियों के सभी हिस्से वैसी ख़ुशी पैदा करें. और अगर ऐसा नहीं होगा तो हम पूछेंगे,"ऐसा क्यों नहीं हो रहा है?" और यह पूछना ही अनिवार्यतः हमें बदलाव की तरफ ले जाएगा.
 
इसलिए सामाजिक प्रतिरोध और कला मेरे लिए अभिन्न हैं. मेरे लिए कला के लिए कला का वास्तव में कोई अस्तित्व नहीं है. 'ईदर' कला 'ऑर' प्रतिरोध जैसी कोई बात नहीं है. मैंने जिस बात को गलत पाया, मुझे उसके खिलाफ बोलना ही था. मैं कविता से प्यार करती थी, मैं शब्दों से प्यार करती थी. पर जो सुन्दर था उसे मेरी ज़िन्दगी को बदलने का मकसद पूरा करना था, वरना मैं मर जाती. इस पीड़ा को अगर मैं व्यक्त नहीं कर सकती और उसे बदल नहीं सकती, तो मैं ज़रूर उस पीड़ा से मर जाउंगी. और यही सामाजिक प्रतिरोध का आग़ाज़ है.
 
("ऑड्री लॉर्ड", ब्लैक वूमन राइटर्स एट वर्क . संपा: क्लॉडिया टेट.  न्यू योंर्क: कॉन्टिनम, 1983,पृ. 100-106.)

(जनपक्ष से साभार)

दि लेजेंड ऑफ़ जो हिल

भारत भूषण तिवारी

19 नवंबर, 2010

 
Workers of the world, awaken!

 

कितना मुक्त है मुक्त बाज़ार

नोम चॉम्स्की

[नोम चॉम्स्की का यह लेख लंदन में दिये गये उनके भाषण का संक्षिप्त अंश है और मुक्त बाज़ार को समझने के लिये बेहद ज़रूरी सूत्र उपलब्ध कराता है।]

Syndicate content

लेखक विषय संवाद साभार अनुवादक

पहले वो आए साम्यवादियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं साम्यवादी नहीं था

 

फिर वो आए मजदूर संघियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं मजदूर संघी नहीं था

 

फिर वो यहूदियों के लिए आए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं यहूदी नहीं था

 

फिर वो आए मेरे लिए

और तब तक बोलने के लिए कोई बचा ही नहीं था

 

मार्टिन नीमोलर (1892-1984)