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जनतंत्र

Janatantra

दलित नेता सुधीर ढवले को बिनायक सेन बनाने की तैयारी

शेष नारायण सिंह

यह एक खतरनाक दौर है। सत्ता ने नशे में चूर आले दर्जे के मूर्ख हुक्मरान हर वो आदेश दे रहे हैं जो देश की मूल भावना के खिलाफ जाता है। वो एक तरफ को लूट-खसोट में लिप्त हैं और हजारों-लाखों करोड़ रुपये के घोटाले कर रहे हैं और दूसरी तरफ उन लोगों को उठा कर जबरन जेल में ठूंस रहे हैं जो गरीबों-दलितों के हितों की बात करते हैं। बिनायक सेन के साथ जो कुछ हुआ उसके गवाह हम सब हैं और अब महाराष्ट्र में दलित नेता सुधीर ढवले को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है। यही नहीं रविवार को उनके घर पर बिना सर्च वारंट के छापा मारा और घरवालों के विरोध को नजरअंदाज करते हुए तलाशी ली। पुलिस की इस गैरकानूनी कार्रवाई का हम विरोध करते हैं और सरकार से मांग करते हैं कि सुधीर ढवले को तुरंत रिहा किया जाए। – मॉडरेटर  (जनतंत्र)

महाराष्ट्र पुलिस ने भी छत्तीसगढ़ पुलिस की तरह गरीबों के अधिकार की लड़ाई लड़ने वालों की धरपकड़ शुरू कर दी है। इस सिलसिले में दलित अधिकारों के चैम्पियन और मराठी पत्रिका, ‘विद्रोही ‘ के संपादक सुधीर ढवले को गोंदिया पुलिस ने देशद्रोह और अनलॉफुल एक्टिविटीज़ प्रेवेंशन एक्ट की धारा 17, 20 और 30 लगाकर गिरफ्तार कर लिया। उन पर आरोप है कि वे आतंकवादी काम के लिए धन जमा कर रहे थे और किसी आतंकवादी संगठन के सदस्य थे। पुलिस ने उनको नक्सलवादी बताकर अपने काम को आसान करने की कोशिश भी कर ली है।

जनतंत्र के विरुद्ध है अरुंधती पर कार्रवाई की मांग

समरेंद्र

26 अक्तूबर, 2010

 

अरुंधती रॉय के ख़िलाफ़ कानूनी कार्रवाई की बातें की जा रही हैं। कश्मीर की आज़ादी की मांग के समर्थन पर उनके ताज़ा बयान को आधार बना कर देशद्रोह का मुकदना चलाने की मांग की जा रही है। जनतंत्र डॉट कॉम ऐसी किसी भी कार्रवाई का विरोध करता है। एक आज़ाद मुल्क के आज़ाद नागरिकों को अपने विचार रखने का हक़ होना चाहिए। यह हक़ हमारी देश की सरकारों ने बाल ठाकरे जैसी विकृत मानसिकता वाले लोगों को भी दिया है और संघ परिवार जैसे लोगों को भी जिनके दामन पर अल्पसंख्यकों का लहू बिखरा पड़ा है।

बाल ठाकरे की पूरी सियासत देश की लोकतांत्रिक विचारधारा के ख़िलाफ़ खड़ी हुई, लेकिन उनके ख़िलाफ़ कानूनी कार्रवाई कितनी बार हुई? बाबरी मस्जिद का विध्वंस करने वालों के ख़िलाफ़ अब तक क्या और कैसी कार्रवाई हुई है? सिख दंगों के आरोपी आज भी खुली हवा में सांस ले रहे हैं या नहीं? क्या यही तथाकथित धर्मनिरपेक्ष सरकार उन्हें संरक्षण दे रही है या नहीं? जब वो तमाम वहशी और क्रूर हत्यारे हमारे बीच मौजूद रह सकते हैं तो फिर लोकतंत्र की प्रबल समर्थक अरुंधती क्यों नहीं?

अरुंधती के विचार से आप और हम इत्तेफाक रखें या नहीं, हमारी सरकार इत्तेफाक रखे या नहीं, देश की जनता सहमत हो या नहीं, उनके ख़िलाफ़ किसी भी तरह की कार्रवाई नहीं होनी चाहिए। अगर ऐसा हुआ तो भारत और किसी तालिबानी राष्ट्र में कोई अंतर नहीं होगा। हमें लोकतंत्रिक अवधारणा के महान विचारक वोल्टेयर को समर्पित की गई उन पंक्तियों को हमेशा ध्यान रखना चाहिए कि “मैं आपकी बात खारिज कर दूंगा, मगर अंतिम सांस तक आपके बोलने के हक़ की रक्षा करूंगा”।

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लेखक विषय संवाद साभार अनुवादक

पहले वो आए साम्यवादियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं साम्यवादी नहीं था

 

फिर वो आए मजदूर संघियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं मजदूर संघी नहीं था

 

फिर वो यहूदियों के लिए आए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं यहूदी नहीं था

 

फिर वो आए मेरे लिए

और तब तक बोलने के लिए कोई बचा ही नहीं था

 

मार्टिन नीमोलर (1892-1984)