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गद्यकोश

Gadyakosh

आदरबाज़ी

स्वयं प्रकाश

- हमें तो आप माफ ही करो भैया!

- क्यों अंकल? क्या हो गया? आपको प्रॉपर रिगार्ड नहीं मिला क्या?

- उल्टी बात है भैया। जरा ज्यादा और जल्दी ही प्रॉपर रिगार्ड मिल गया। आदर देने के मामले में अपने देश के लोग बहुत उदारवादी हैं। कितना ही कमीना आदमी हो, खूनी हो, मुजरिम हो, बस विशेष वस्त्र पहन ले, फिर देखो क्या प्रॉपर रिगार्ड मिलता है उसे! और यही क्यों, आदमी कोई भी हो, कनपटी पर दस-बीस सफेद बाल आते ही उसे देखने की दुनिया की नजर बदल जाती है। आप अध्यापक हों या प्रबंधक, चाहे मोची या नाई ही क्यों न हों-एक दिन आप अचानक आदरणीय बन जाते हैं। लोग आपसे आप-आप करके बात करने लगते हैं लडकियाँ आपको देखकर सीने पर अपना दुपट्टा व्यवस्थित करना छोड देती हैं। सप्पू-गप्पू-निक्की-बबली टाइप आपका बचपन का नाम कान में पडे तो आप ऐसे चौंक जाते हैं जैसे भूत देख लिया हो! जब कोई खामखाँ आफ नाम के आगे 'जी' लगाता है-मसलन पडौसन दादी या आफ मामा जी-तो लगता है जैसे आप किसी पारले-जी के भाईबन्द बन गये हैं।

- अंकल, दूसरों की नजर में आदरणीय बनने में क्या बुराई है?

- और खुद की नजर में? देखो, मेरे साथ क्या होने लगा है! मेरे खुद के प्रति मेरा रवैया आत्मविश्वासपूर्ण से सन्देहपूर्ण होता जा रहा है। पहले पत्थरों पर भी पैर फैलाकर लेट जाता तो थोडी देर में खर्राटे लेने लगता था। अब रात भर पडा रहता हूँ और फिर भी नींद पूरी नहीं हो पाती। साला कोई ढंग का सपना भी नहीं आता। नहाता हूँ तो लगता है कि त्वचा गीली हुई ही नहीं-मानो कोई अदृश्य बरसाती पहनकर नहाया होऊँ! हाजत दिन भर महसूस होती है, पेट एक बार भी पूरी तरह साफ नहीं होता। मेकअप किट में मॉइश्चराइजर और परफ्यूम की जगह आइड्रॉप, आयोडेक्स और एण्टासिड आ बिराजे हैं। अखबारों में छपे 'आँवले के गुण' और 'प्राकृतिक चिकित्सा के लाभ' टाइप के लेख ध्यान खींचने लगे हैं। एक दिन तो मैंने खुद को भविष्यफल पढते रंग हाथों पकड लिया! जबकि भविष्य ससुरे में अब बचा क्या है! बताओ! क्या इसी को ग्रेसफुली बूढा होना कहते हैं?

- आप इतना सोचते क्यों हैं? क्यों नहीं टाल देते?

कभी न उखड़ने वाला गवाह

श्रीलाल शुक्ल

(उपन्यास 'राग दरबारी' का एक अंश)

कोऑपरेटिव यूनियन का गबन बड़े ही सीधे-सादे ढंग से हुआ था। सैकड़ों की संख्या में रोज़ होते रहनेवाले ग़बनों की अपेक्षा इसका यही सौन्दर्य था कि यह शुद्ध गबन था, इसमें ज्यादा घुमाव-फिराव न था। न इसमें जाली दस्तखतों की जरुरत पड़ी थी, न फर्जी हिसाब बनाया गया था, न नकली बिल पर रुपया निकाला गया था। ऐसा गबन करने और ऐसे गबन को समझने के लिए किसी टेक्नीकल योग्यता की नहीं, केवल इच्छा-शक्ति की जरुरत थी।

नौजवान का रास्ता : भगत सिंह को क्यों याद करें?

मुकेश मानस

 

गुलामी से आजादी की कहानी

अमृतसर आ गया है

भीष्म साहनी

गाड़ी के डिब्बे में बहुत मुसाफिर नहीं थे। मेरे सामनेवाली सीट पर बैठे सरदार जी देर से मुझे लाम के किस्से सुनाते रहे थे। वह लाम के दिनों में बर्मा की लड़ाई में भाग ले चुके थे और बात-बात पर खी-खी करके हंसते और गोरे फ़ौजियों की खिल्ली उड़ाते रहे थे। डिब्बे में तीन पठान व्यापारी भी थे, उनमें से एक हरे रंग की पोशाक पहने ऊपर वाली बर्थ पर लेटा हुआ था। वह आदमी बड़ा हंसमुख था और बड़ी देर से मेरे साथ वाली सीट पर बैठे एक दुबले-से बाबू के साथ उसका मज़ाक चल रहा था। वह दुबला बाबू पेशावर का रहनेवाला जान पड़ता था क्योंकि किसी-किसी वक्त वे आपस में पश्तो में बातें करने लगते थे। मेरे सामने दायीं ओर कोने में, एक बुढ़िया मुंह-सिर ढाँपे बैठी थी और देर से माला जप रही थी। यही कुछ लोग रहे होंगे। सम्भव है दो-एक और मुसाफिर भी रहे हों, पर वे स्पष्टत: मुझे याद नहीं।

खूबसूरत लड़की

मुकेश मानस

1

सुबह होते ही वहाँ के लोग अपनी-अपनी बगलों में खाने के डिब्बों को दबाये काम पर निकल जाते और देर रात तक ठीक अपने लौट आने के वक्त के आस-पास लौट आते। फिर खाना खाकर घर के भीतरी कमरों में टेलीविज़न पर कुछ भी देखते या नई या पुरानी बीबियों से पाँव दबवाते। फिर नींद का झटका आने पर मुर्दों की तरह निस्तेज होकर सो जाते। कभी-कभार बीबियों की शिकायतों पर दाँती मिसमिसाकर बच्चों को पीटते और उन्हें गला फाड़कर रोने भी नहीं देते।

उन्नीस सौ चौरासी

मुकेश मानस

1

शीशे के सामने खड़े होकर मैंने खुद को जांचा, बाल कंघी किये और अपना झोला उठा लिया -

“अच्छा मौसी, अब मैं चलूं।”

“अभी थोड़ी देर और रुक, तेरे मौसा आते ही होंगे। उनसे मिलकर जाइओ।” मौसी के चहरे पर नाराजगी के चिन्ह उभर आये।

“नहीं मौसी, बहुत देर हो गयी हैं फिर मौसा जी के आने का समय भी तो पक्का नहीं है। उनसे अगली बार मिल लूंगा।” मैंने पुन: हाथ जोड़ दिये।

“ओह हो, बड़ा साहबों की तरह बतियाने लगा है।”

“नहीं, यह बात नहीं, मैं मां को कहकर नहीं आया हूँ। नहीं पहुँचा तो चिन्ता करेगी।“

मैं चलने लगा तो मौसी ने जबरदस्ती दस रुपये कमीज की जेब में रख दिये। दरवाजे तक छोड़ने आयीं। जाने क्या सोचकर मैं झुका और उनके पैर छू लिये।

फासीवाद, साम्प्रदायिकता और दलितजन

मुकेश मानस

हिन्दुस्तान के दलित समुदायों के लिए सांप्रदायिकता और फासीवाद एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। दोनों एक दूसरे से अभिन्न रूप से जुड़े हुए हैं। कहना चाहिए कि दोनों एक दूसरे के पूरक हैं। हिन्दुस्तान का इतिहास इस बात का साक्षात प्रमाण है। मौजूदा हालात में तो इन दोनों को अलग करके देखा ही नहीं जा सकता है।

फिर भी ऐसे लोगों की संख्या कम नहीं है जो जानते-बूझते हुए इन दोनों को अलग-अलग खानों में रखकर देखते हैं। कुछ लोग अपनी सीमाओं के कारण ऐसा कर जाते हैं। विस्तृत अध्ययन, व्यावहारिक अनुभव की कमी, दलितों के संबंध में भारतीय इतिहास की आधी-अधूरी जानकारी और संकुचित नज़रिए के कारण ये लोग ऐसा करते हैं। कई बार इन चीजों पर चलताऊ ढंग से कुछ कहने या लिखने के कारण भी ऐसा हो जाता है। मुझे यह कहने में कोई गुरेज नहीं है कि ऐसे लोगों में दलित राजनीतिज्ञ और विचारक भी बड़ी संख्या में शामिल हैं।

खाए-पिए लोग

हबीब कैफ़ी

देखने में ये लोग खूबसूरत थे। आकर्षक भी। इनके रहने के लिए ख़ास इलाक़ा था। इसे पॉश कॉलोनी कहा जाता है। यह मख़सूस कॉलोनी योजनाबद्ध तरीके से बसी हुई थी। यहाँ भव्य इमारतें थी। अतिरिक्त ऑक्सीजन, सजावट और खूबसूरती के लिए इनके आगे बग़ीचे थे। दूब थी। रिहाइशगाहों के अन्दर की सजावटें आकर्षक और आँखों को भली लगने वाली थीं। ठंडक पहुँचाने वाली भी।

इन ख़ास लोगों की जीवन शैली भी कुछ ख़ास क़िस्म की थी। यह कहने में भी कोई मुजायक़ा नहीं कि पहनने ओढ़ने और खानपान के पैमाने इनकी जीवन शैली से ही निर्धारित किए गए थे। ये लोग उच्च शिक्षा प्राप्त शालीन, सुसभ्य और संस्कारवान थे। धनवान तो ये थे ही। इन्हें जीवन का आनन्द उठाना आता था।

आवरण

उदयप्रकाश

 

[ताकि गलतफ़हमी ना हो, कैंसर कतई संक्रामक नहीं होता - सं.]

 

इसे कहानी कहने का जी नहीं करता। फिर भी कहना पड़ेगा। विवशता है।

जिस दौर में हम जीवित हैं, उसमें हमारा जीवन चारों ओर से असंख्य, तरह-तरह की कहानियों के बीच घिरा हुआ है। जैसे हम किसी बाढ़ में डूबे हों। या व्यस्त हाइवे पर ट्रैफिक के बीचों-बीच खड़े हों। चारों ओर किस्सों का शोर और जीवन पर उतने ही ख़तरे। ऐसा इतिहास में कभी नहीं हुआ था। हर रोज़, कई कई बार, हम अलग-अलग कहानियों के पात्र बन जाते हैं या बना दिये जाते हैं, या फिर किसी अन्य को बनता हुआ देखते हैं। कभी कोई यूनानी त्रासदी, कभी संस्कृत की कादंबरी, कभी कोई विस्मृत जातक कथा, कभी किसी विदूषक की कामुदी। किसी गरीब और मामूली आदमी के दुख से उपजता ऊबे और सुखी लोगों का चुटकुला।

कानून के दरवाज़े पर

फ़्रांज़ काफ़्का

कानून के द्वार पर रखवाला खड़ा है। उस देश का एक आम आदमी उसके पास आकर कानून के समक्ष पेश होने की इजाज़त मांगता है। मगर वह उसे भीतर प्रवेश की इजाज़त नहीं देता।

आदमी सोच में पड़ जाता है। फिर पूछता है -- ‘‘क्या कुछ समय बाद मेरी बात सुनी जाएगी?

‘‘देखा जाएगा” -- कानून का रखवाला कहता है -- ‘‘पर इस समय तो कतई नहीं!”

कानून का दरवाज़ा सदैव की भाँति आज भी खुला हुआ है। आदमी भीतर झाँकता है।

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लेखक विषय संवाद साभार अनुवादक

पहले वो आए साम्यवादियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं साम्यवादी नहीं था

 

फिर वो आए मजदूर संघियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं मजदूर संघी नहीं था

 

फिर वो यहूदियों के लिए आए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं यहूदी नहीं था

 

फिर वो आए मेरे लिए

और तब तक बोलने के लिए कोई बचा ही नहीं था

 

मार्टिन नीमोलर (1892-1984)