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कविताकोश

Kavitakosh

न्यायदंड

कुमार मुकुल

हम हमेशा शहरों में रहे
और गांवों की बावत सोचा किया
कभी मौका निकाल
गांव गए छुट्टियों में
तो हमारी सोच को विस्तार मिला
पर मजबूरियां बराबर
हमें शहरों से बांधे रहीं
 

ये शहर थे
जो गांवों से बेजार थे
गांव बाजार
जिसके सीवानों पर
आ-आकर दम तोड़ देता था
जहां नदियां थीं
जो नदी घाटी परियोजनाओं में
बंधने से
बराबर इंकार करती थीं
वहां पहाड़ थे
जो नक्सलवादियों के पनाहगाह थे
 

गांव
जहां देश (देशज) शब्द का
जन्म हुआ था
जहां के लोग
यूं तो भोले थे
पर बाज-बखत
भालों में तब्दील हो जाते थे
गांव, जहां केन्द्रीय राजनीति की
गर्भनाल जुड़ी थी
जो थोड़ा लिखकर
ज्यादा समझने की मांग-करते थे
 

पर शहर था
कि इस तरह सोचने पर
हमेशा उसे एतराज रहा
कि ऐसे उसका तिलस्म टूटता था
वहां ऊचाइयां थीं
चकाचौंध थी
भागम-भाग थी
पर टिकना नहीं था कहीं
टिककर सोचना नहीं था
स्वावलंबन नहीं था वहां
हां, स्वतन्त्रता थी
पर सोचने की नहीं
 

बाधाएं
बहुत थीं वहां
इसीलिए स्वतन्त्रता थी
एक मूल्य की तरह
जिसे बराबर
आपको प्राप्त करना होता था
ईमान कम था
पर ईमानदारी थी
जिस पर ऑफिसरों का कब्जा था
जिधर झांकते भी
कांपते थे
दो टके के चपरासी
 

वहां न्यायालय थे
और थे जानकार बीहड़-बीहड़
न्याय प्रक्रिया के
शहर से झगड़ा सुलझाने
सब वहीं आते थे
और अपनी जर-जमीन गंवा
पाते थे न्याय
 

न्याय
जो बहुतों को
मजबूर कर देता
कि वे अपना गांव छोड़
शहर के सीमांतों पर बस जाएं
और सेवा करें
न्यायविदों के इस शहर की
पर ऐसा करते
वे नहीं जान रहे होते थे
कि जहां वे बस रहे हैं
वह जमीन न्याय की है
और प्रकारांतर से अन्याय था यह
और उन्हें कभी भी बेदखल कर
दंडित किया जा सकता था
और तब
जबकि उनके पास
कोई जमापूंजी नहीं होती थी
उनके लिए न्याय भी नहीं होता था
 

मैं हिन्‍दू हूँ

कुमार मुकुल

मैं
हिन्‍दू हूँ
इसलिए
वे
मुसलमान और ईसाई हैं
जैसे
मैं चर्मकार हूँ
इसलिए वे
बिरहमन या दुसाध हैं
 

आज हमारा होना
देश-दिशा के अलगावों का सूचक नहीं
हम इतने एक से हैं
कि आपसी घृणा ही
हमारी पहचान बना पाती है
मोटा-मोटी हम
जनता या प्रजा हैं
हम
सिपाही पुजारी मौलवी ग्रंथी भंगी
चर्मकार कुम्‍हार ललबेगिया और बहुत कुछ हैं
क्‍योंकि हम
डॉक्‍टर इंजीनियर नेता वकील कलक्‍टर
ठेकेदार कमिश्‍नर कुछ भी नहीं हैं
 

उनके लिए क्‍लब हैं
पांच सितारा होटल हैं
एअर इंडिया की सेवाएं हैं
 

हमारे लिए
मंदिर - मस्जिद - गिरजा
पार्क और मैदान हैं
मार नेताओं के नाम पर
और उनमें ना अंट पाने के झगडे हैं

हम आरक्षित हैं
इसलिए हमें आरक्षण मिलता है
मंदिरों - मस्जिदों - नौकरियों में
जहां हम भक्ति और योग्‍यता के आधार पर नहीं
अक्षमताओं के आधार पर
प्रवेश पाते हैं
और
बादशाहों और गुलामों के
प्‍यादे बन जाते हैं।


(कविताकोश से साभार)

निष्ठा

रैनेर मरिया रिल्के

मेरी आँखें निकाल दो

फिर भी मैं तुम्हें देख लूँगा
मेरे कानों में सीसा उड़ेल दो
पर तुम्हारी आवाज़ मुझ तक पहुँचेगी

पगहीन मैं तुम तक पहुँचकर रहूँगा
वाणीहीन मैं तुम तक अपनी पुकार पहुँचा दूँगा
तोड़ दो मेरे हाथ,
पर तुम्हें मैं फिर भी घेर लूँगा और
अपने हृदय से इस प्रकार पकड़ लूँगा
जैसे उँगलियों से
हृदय की गति रोक दो और मस्तिष्क धड़कने लगेगा
और अगर मेरे मस्तिष्क को जलाकर खाक कर दो
तब अपनी नसों में प्रवाहित रक्त की
बूँदों पर मैं तुम्हें वहन करूँगा।

अंग्रेज़ी से अनुवाद : धर्मवीर भारती


(कविताकोश से साभार)

लोर्का की रक्तगाथा

उदय प्रकाश

जब भी रचना और कर्म के बीच की खाई को पाटने का सवाल उठाया जाएगा, फेदेरिको गार्सिया लोर्का का नाम ख़ुद-ब-ख़ुद सामने आएगा । बतलाना नहीं होगा कि रचना और कर्म की खाई को नष्ट करते हुए लोर्का ने समूचे अर्थों में अपनी कविता को जिया । यह आकस्मिक नहीं है कि पाब्लो नेरूदा और लोर्का की रचनाशक्ति फ़ासिस्ट शक्तियों के लिए इतना बड़ा ख़तरा बन गईं कि दोनों को अपनी अपनी नियति में हत्याएँ झेलनी पड़ीं । फ़ासिज़्म ने मानवता का जो विनाश किया है, उसी बर्बरता की कड़ी में उसका यह कुकर्म और अपराध भी आता है जिसके तहत उसने इन दोनों कवियों की हत्या की । लोर्का को गोली मार दी गई और नेरूदा को... नेरूदा और लोर्का गहरे मित्र थे।

नारंगी के सूखे पेड़ का गीत

फ़ेदेरिको गार्सिया लोर्का

लकड़हारे
मेरी छाया काट
मुझे ख़ुद को फलहीन देखने की यंत्रणा से
मुक्त कर !

मैं दर्पणों से घिरा हुआ क्यों पैदा हुआ ?
दिन मेरी परिक्रमा करता है
और रात अपने हर सितारे में
मेरा अक्स फिर बनाती है

मैं ख़ुद को देखे बग़ैर ज़िन्दा रहना चाहता हूँ

और सपना देखूंगा
कि चींटियाँ और गिद्ध मेरी पत्तियाँ और चिड़ियाँ हैं

लकड़हारे
मेरी छाया काट
मुझे ख़ुद को फलहीन देखने की यंत्रणा से
मुक्त कर !


अंग्रेज़ी से अनुवाद : विष्णु खरे


(कविताकोश से साभार)

धूमिल की अन्तिम कविता

धूमिल

शब्द किस तरह
कविता बनते हैं
इसे देखो
अक्षरों के बीच गिरे हुए
आदमी को पढ़ो
क्या तुमने सुना कि यह
लोहे की आवाज़ है या
मिट्टी में गिरे हुए ख़ून
का रंग।

लोहे का स्वाद
लोहार से मत पूछो
घोड़े से पूछो
जिसके मुंह में लगाम है।


(कविताकोश से साभार)

कुछ सूचनाएँ

धूमिल

सबसे अधिक हत्याएँ
समन्वयवादियों ने की।
दार्शनिकों ने
सबसे अधिक ज़ेवर खरीदा।
भीड़ ने कल बहुत पीटा
उस आदमी को
जिस का मुख ईसा से मिलता था।

वह कोई और महीना था।
जब प्रत्येक टहनी पर फूल खिलता था,
किंतु इस बार तो
मौसम बिना बरसे ही चला गया
न कहीं घटा घिरी
न बूँद गिरी
फिर भी लोगों में टी.बी. के कीटाणु
कई प्रतिशत बढ़ गए

कई बौखलाए हुए मेंढक
कुएँ की काई लगी दीवाल पर
चढ़ गए,
और सूरज को धिक्कारने लगे
--व्यर्थ ही प्रकाश की बड़ाई में बकता है
सूरज कितना मजबूर है
कि हर चीज़ पर एक सा चमकता है।

हवा बुदबुदाती है
बात कई पर्तों से आती है—
एक बहुत बारीक पीला कीड़ा
आकाश छू रहा था,
और युवक मीठे जुलाब की गोलियाँ खा कर
शौचालयों के सामने
पँक्तिबद्ध खड़े हैं।

आँखों में ज्योति के बच्चे मर गए हैं
लोग खोई हुई आवाज़ों में
एक दूसरे की सेहत पूछते हैं
और बेहद डर गए हैं।

सब के सब
रोशनी की आँच से
कुछ ऐसे बचते हैं
कि सूरज को पानी से
रचते हैं।

बुद्ध की आँख से खून चू रहा था
नगर के मुख्य चौरस्ते पर
शोकप्रस्ताव पारित हुए,
हिजड़ो ने भाषण दिए
लिंग-बोध पर,
वेश्याओं ने कविताएँ पढ़ीं
आत्म-शोध पर
प्रेम में असफल छात्राएँ
अध्यापिकाएँ बन गई हैं
और रिटायर्ड बूढ़े
सर्वोदयी-
आदमी की सबसे अच्छी नस्ल
युद्धों में नष्ट हो गई,
देश का सबसे अच्छा स्वास्थ्य
विद्यालयों में
संक्रामक रोगों से ग्रस्त है

(मैंने राष्ट्र के कर्णधारों को
सड़को पर
किश्तियों की खोज में
भटकते हुए देखा है)

संघर्ष की मुद्रा में घायल पुरुषार्थ
भीतर ही भीतर
एक निःशब्द विस्फोट से त्रस्त है

पिकनिक से लौटी हुई लड़कियाँ
प्रेम-गीतों से गरारे करती हैं
सबसे अच्छे मस्तिष्क,
आरामकुर्सी पर
चित्त पड़े हैं।

मेरी भाषा के लोग

केदारनाथ सिंह

 

मेरी भाषा के लोग

मेरी सड़क के लोग हैं

 

सड़क के लोग सारी दुनिया के लोग

 

पिछली रात मैंने एक सपना देखा

कि दुनिया के सारे लोग

एक बस में बैठे हैं

और हिंदी बोल रहे हैं

फिर वह पीली-सी बस

हवा में गायब हो गई

और मेरे पास बच गई सिर्फ़ मेरी हिंदी

जो अंतिम सिक्के की तरह

हमेशा बच जाती है मेरे पास

हर मुश्किल में

 

कहती वह कुछ नहीं

पर बिना कहे भी जानती है मेरी जीभ

कि उसकी खाल पर चोटों के

कितने निशान हैं

कि आती नहीं नींद उसकी कई संज्ञाओं को

दुखते हैं अक्सर कई विशेषण

 

पर इन सबके बीच

असंख्य होठों पर

एक छोटी-सी खुशी से थरथराती रहती है यह !

 

तुम झांक आओ सारे सरकारी कार्यालय

पूछ लो मेज से

दीवारों से पूछ लो

छान डालो फ़ाइलों के ऊंचे-ऊंचे

मनहूस पहाड़

कहीं मिलेगा ही नहीं

इसका एक भी अक्षर

और यह नहीं जानती इसके लिए

अगर ईश्वर को नहीं

तो फिर किसे धन्यवाद दे !

 

मेरा अनुरोध है —

भरे चौराहे पर करबद्ध अनुरोध —

कि राज नहीं — भाषा

भाषा — भाषा — सिर्फ़ भाषा रहने दो

मेरी भाषा को ।

 

इसमें भरा है

पास-पड़ोस और दूर-दराज़ की

इतनी आवाजों का बूंद-बूंद अर्क

कि मैं जब भी इसे बोलता हूं

तो कहीं गहरे

अरबी तुर्की बांग्ला तेलुगु

यहां तक कि एक पत्ती के

हिलने की आवाज भी

सब बोलता हूं जरा-जरा

जब बोलता हूं हिंदी

 

पर जब भी बोलता हूं

यह लगता है —

पूरे व्याकरण में

एक कारक की बेचैनी हूं

एक तद्भव का दुख

तत्सम के पड़ोस में ।

अहिंसा

नागार्जुन

105 साल की उम्र होगी उसकी
जाने किस दुर्घटना में
आधी-आधी कटी थीं बाँहें
झुर्रियों भरा गन्दुमी सूरत का चेहरा
धँसी-धँसी आँखें...
राजघाट पर गाँधी समाधि के बाहर
वह सबेरे-सबेरे नज़र आती है
जाने कब किसने उसे एक मृगछाला दिया था
मृगछाला के रोएँ लगभग उड़ चुके हैं
मुलायम-चिकनी मृगछाला के उसी अद्धे पर
वो पीठ के सहारे लेटी
सामने अलमुनियम का भिक्षा पात्र है
नए सिक्कों और इकटकही-दुटकही नए नोटों से
करीब-करीब आधा भर चुका है वो पात्र
अभी-अभी एक तरूण शान्ति-सैनिक आएगा
अपनी सर्वोदयी थैली में भिक्षापात्र की रकम डालेगा
झुक के बुढ़िया के कान में कुछ कहेगा
आहिस्ते-आहिस्ते वापस लौट जाएगा
थोड़ी देर बाद
शान्ति सेना की एक छोकरी आएगी
शीशे के लम्बे गिलास में मौसम्बी का जूस लिए
बुढ़िया धीरे-धीरे गिलास खाली कर डालेगी
पीठ और गर्दन में
हरियाणवी तरुणी के सुस्पष्ट हाथ का सहारा पाकर
बुदबुदाएगी फुसफुसी आवाज में - जियो बेटा
बुढ़िया का जीर्ण-शीर्ण कलेवर
हासिल करेगा ताज़गी

यह अहिंसा है
इमर्जेन्सी में भी
मौसम्बी के तीन गिलास जूस मिलते हैं
नित्य-नियमित, ठीक वक्त पर
दुपहर की धूप में वह छाँह के तले पहुँचा दी जाएगी
बारिश में तम्बू तान जाएँगे मिलिटरी वाले
हिंसा की छत्र-छाया में
सुरक्षित है अहिंसा...
गीता और धम्मपद और संतवाणी के पद
इस बुढ़िया के लिए भर लिए गए हैं रिकार्ड में
यह निष्ठापूर्वक रोज सुबह-शाम
सुनती है रामधुन, सुनती है पद
'आपातकालीन संकट' को
इस बुढ़िया की आशीष प्राप्त है

(1975 में रचित)


(कविताकोश से साभार)

मंत्र कविता

नागार्जुन

ॐ श‌ब्द ही ब्रह्म है..
ॐ श‌ब्द्, और श‌ब्द, और श‌ब्द, और श‌ब्द
ॐ प्रण‌व‌, ॐ नाद, ॐ मुद्रायें
ॐ व‌क्तव्य‌, ॐ उद‌गार्, ॐ घोष‌णाएं
ॐ भाष‌ण‌...
ॐ प्रव‌च‌न‌...
ॐ हुंकार, ॐ फ‌टकार्, ॐ शीत्कार
ॐ फुस‌फुस‌, ॐ फुत्कार, ॐ चीत्कार
ॐ आस्फाल‌न‌, ॐ इंगित, ॐ इशारे
ॐ नारे, और नारे, और नारे, और नारे

ॐ स‌ब कुछ, स‌ब कुछ, स‌ब कुछ
ॐ कुछ न‌हीं, कुछ न‌हीं, कुछ न‌हीं
ॐ प‌त्थ‌र प‌र की दूब, ख‌रगोश के सींग
ॐ न‌म‌क-तेल-ह‌ल्दी-जीरा-हींग
ॐ मूस की लेड़ी, क‌नेर के पात
ॐ डाय‌न की चीख‌, औघ‌ड़ की अट‌प‌ट बात
ॐ कोय‌ला-इस्पात-पेट्रोल‌
ॐ ह‌मी ह‌म ठोस‌, बाकी स‌ब फूटे ढोल‌

ॐ इद‌मान्नं, इमा आपः इद‌म‌ज्यं, इदं ह‌विः
ॐ य‌ज‌मान‌, ॐ पुरोहित, ॐ राजा, ॐ क‌विः
ॐ क्रांतिः क्रांतिः स‌र्व‌ग्वंक्रांतिः
ॐ शांतिः शांतिः शांतिः स‌र्व‌ग्यं शांतिः
ॐ भ्रांतिः भ्रांतिः भ्रांतिः स‌र्व‌ग्वं भ्रांतिः
ॐ ब‌चाओ ब‌चाओ ब‌चाओ ब‌चाओ
ॐ ह‌टाओ ह‌टाओ ह‌टाओ ह‌टाओ
ॐ घेराओ घेराओ घेराओ घेराओ
ॐ निभाओ निभाओ निभाओ निभाओ

ॐ द‌लों में एक द‌ल अप‌ना द‌ल, ॐ
ॐ अंगीक‌रण, शुद्धीक‌रण, राष्ट्रीक‌रण
ॐ मुष्टीक‌रण, तुष्टिक‌रण‌, पुष्टीक‌रण
ॐ ऎत‌राज़‌, आक्षेप, अनुशास‌न
ॐ ग‌द्दी प‌र आज‌न्म व‌ज्रास‌न
ॐ ट्रिब्यून‌ल‌, ॐ आश्वास‌न
ॐ गुट‌निरपेक्ष, स‌त्तासापेक्ष जोड़‌-तोड़‌
ॐ छ‌ल‌-छंद‌, ॐ मिथ्या, ॐ होड़‌म‌होड़
ॐ ब‌क‌वास‌, ॐ उद‌घाट‌न‌
ॐ मारण मोह‌न उच्चाट‌न‌

ॐ काली काली काली म‌हाकाली म‌हकाली
ॐ मार मार मार वार न जाय खाली
ॐ अप‌नी खुश‌हाली
ॐ दुश्म‌नों की पामाली
ॐ मार, मार, मार, मार, मार, मार, मार
ॐ अपोजीश‌न के मुंड ब‌ने तेरे ग‌ले का हार
ॐ ऎं ह्रीं क्लीं हूं आङ
ॐ ह‌म च‌बायेंगे तिल‌क और गाँधी की टाँग
ॐ बूढे की आँख, छोक‌री का काज‌ल
ॐ तुल‌सीद‌ल, बिल्व‌प‌त्र, च‌न्द‌न, रोली, अक्ष‌त, गंगाज‌ल
ॐ शेर के दांत, भालू के नाखून‌, म‌र्क‌ट का फोता
ॐ ह‌मेशा ह‌मेशा राज क‌रेगा मेरा पोता
ॐ छूः छूः फूः फूः फ‌ट फिट फुट
ॐ श‌त्रुओं की छाती अर लोहा कुट
ॐ भैरों, भैरों, भैरों, ॐ ब‌ज‌रंग‌ब‌ली
ॐ बंदूक का टोटा, पिस्तौल की न‌ली

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लेखक विषय संवाद साभार अनुवादक

पहले वो आए साम्यवादियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं साम्यवादी नहीं था

 

फिर वो आए मजदूर संघियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं मजदूर संघी नहीं था

 

फिर वो यहूदियों के लिए आए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं यहूदी नहीं था

 

फिर वो आए मेरे लिए

और तब तक बोलने के लिए कोई बचा ही नहीं था

 

मार्टिन नीमोलर (1892-1984)