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एक ज़िद्दी धुन

इन्द्रेश कुमार आरएसएस के सेक्युलर दोस्त

धीरेश सैनी

[लेखक ने यहाँ एक बहुत महत्वपूर्ण मुद्दा उठाया है जिससे शायद और भी बहुतों (इस संपादक सहित) का वास्ता पड़ा होगा, लेकिन इस पर अभी शायद पर्याप्त रुप से गौर नहीं किया गया है।]

'पार्टनर तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है?' जैसे सवाल अधिकतर लोगों को हमेशा ही असुविधाजनक लगते आये होंगे, पर इन दिनों हमारे 'वामपंथी', 'गांधीवादी' और 'डेमोक्रेटिक' साथियों को ऐसे सवाल पूरी तरह फिजूल नज़र आने लगे हैं. वैसे भी करियरवादी दौर में खुलकर फलने-फूलने के लिये गैर-आलोचनात्मक संबध ही मुफ़ीद साबित होते हैं. कलावाद की आड़ में छुपकर दक्षिणपंथ की मदद करने वाले भी शायद बदले वक़्त पर हैरान होंगे कि कैसे सब कुछ 'खुला खेल फर्रुखाबादी' की तर्ज़ पर होने लगा है. इन्टरनेट की दुनिया ने ऐसी दोस्तियों की दुनिया को अभूतपूर्व विस्तार दिया है. ब्लॉग, फेसबुक और ऐसी दूसरी `सोशल` साइट्स में एक हत्यारा और एक गांधीवादी मजे-मजे में साथ रहते हैं, एक क्रांतिकारी वामपंथी जाने-अनजाने आसानी से एक दक्षिणपंथी आतंकवादी का दोस्त हो सकता है. मतलब इस नई 'सामाजिकता' में सब कुछ संभव है.

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लेखक विषय संवाद साभार अनुवादक

पहले वो आए साम्यवादियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं साम्यवादी नहीं था

 

फिर वो आए मजदूर संघियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं मजदूर संघी नहीं था

 

फिर वो यहूदियों के लिए आए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं यहूदी नहीं था

 

फिर वो आए मेरे लिए

और तब तक बोलने के लिए कोई बचा ही नहीं था

 

मार्टिन नीमोलर (1892-1984)