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उदय प्रकाश का चिट्ठा

दो साल पहले की एक पोस्ट, जिसे मैने 'डैशबोर्ड' के आर्काइव से निकाला

उदय प्रकाश

(उदय प्रकाश जी के ही शब्द : यह पोस्ट मैने दो साल पहले लिखी थी। आज अचानक ही अपने ब्लाग के 'डैशबोर्ड'  की सफाई के लिए गया तो यह वहां मिला । ..अक्सर ऐसे पोस्ट को लगाया नहीं जाना चाहिये। किसी खास मूड और हताशा के पलों  में  वे पैदा होते हैं। ..लेकिन फिर भी इसे मैं लगा रहा हूं । इसे स्वस्थ ढंग से लिया जाय और जो हमेशा सत्ता, संपर्क, जोड-तोड, गुट्बाजी आदि में मुब्तिला रहते हैं, वे एक बार ज़रूर सोचें कि उनकी इन गतिविधियों से अकेला उदय प्रकाश ही नहीं, हज़ारों-लाखों लेखक प्रभावित-प्रताडित होते रहते हैं। कई तो गुमनामी और वंचना के अंधेरे में हमेशा के लिए खो जाते हैं।....

यह पोस्ट मैं इसलिए भी लगा रहा हूं कि अब हालात और बिगड चुके हैं...! हांलाकि दूसरी ओर एक ऐसी विराट जागृति भी क्षितिज में उभरती दिखाई दे रही है, जो भ्रष्टाचार, निरंकुशता, झूठ, जाति-नस्लवाद आदि को समूल उखाड फेंकने के लिए मिस्र, लीबिया से लेकर सारी दुनिया में अपनी मौज़ूदगी दर्ज करा रही है।

बस इसे पढिये और इसे लेकर अगर जातिवादी-सत्तापरस्त-राजनीतिक गुटों ने तूल बनाना शुरू किया तो अपने इस लेखक के साथ रहिए। अपनी भाषा, अपने समाज, अपने देश को स्वतंत्र, समतामूलक, बिरादराना और आधुनिक बनाने के लिए लंबी लडाई लडें।

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लेखक विषय संवाद साभार अनुवादक

पहले वो आए साम्यवादियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं साम्यवादी नहीं था

 

फिर वो आए मजदूर संघियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं मजदूर संघी नहीं था

 

फिर वो यहूदियों के लिए आए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं यहूदी नहीं था

 

फिर वो आए मेरे लिए

और तब तक बोलने के लिए कोई बचा ही नहीं था

 

मार्टिन नीमोलर (1892-1984)