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एक ज़िद्दी धुन

पुण्य प्रसून बाजपेयी

दखल की दुनिया

जंतर-मंतर

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छम्मकछल्लो कहिस

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आइए हाथ उठाएं हम भी

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कुछ विचार ऐसे भी -----

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शशिकांत

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संहति

सूचना एक्सप्रेस

हफ्तावार

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लेखक विषय संवाद साभार अनुवादक

पहले वो आए साम्यवादियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं साम्यवादी नहीं था

 

फिर वो आए मजदूर संघियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं मजदूर संघी नहीं था

 

फिर वो यहूदियों के लिए आए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं यहूदी नहीं था

 

फिर वो आए मेरे लिए

और तब तक बोलने के लिए कोई बचा ही नहीं था

 

मार्टिन नीमोलर (1892-1984)