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सह-संचारी

कबाड़खाना

रविवार

पुण्य प्रसून बाजपेयी

लेखक मंच

कारवाँ

यही वह जगह है

जंतर-मंतर

आइए हाथ उठाएं हम भी

छम्मकछल्लो कहिस

बेहतर दुनिया की तलाश

शशिकांत

इयत्ता

अनिल एकलव्य ⇔ Anil Eklavya

जनपक्ष

हाशिया

समाजवादी जनपरिषद

हस्तक्षेप

CounterCurrents

अज़दक

अनहद

अनुवाद

उदय प्रकाश

एक ज़िद्दी धुन

एक हिन्दुस्तानी की डायरी

कठफोड़वा

कलामे-फ़ैज़

कवियाना

कुछ विचार ऐसे भी -----

ख्वाब का दर

गंगा ढाबा

चाय की दुकान

छाया

जनज्वार

तीसरा रास्ता

दखल की दुनिया

दख़ल, विचार, मंच

दोस्त

निर्मल-आनंद

परिसर

पहलू

पुनर्विचार

मसिजीवी

मोहल्ला लाइव

मोहल्ला लाइव टिप्पणियाँ

राग दरबारी

रिजेक्ट माल

लाल बुझक्कड़

शब्दों का सफर

शैशव

संहति

सूचना एक्सप्रेस

हफ्तावार

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लेखक विषय संवाद साभार अनुवादक

पहले वो आए साम्यवादियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं साम्यवादी नहीं था

 

फिर वो आए मजदूर संघियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं मजदूर संघी नहीं था

 

फिर वो यहूदियों के लिए आए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं यहूदी नहीं था

 

फिर वो आए मेरे लिए

और तब तक बोलने के लिए कोई बचा ही नहीं था

 

मार्टिन नीमोलर (1892-1984)