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राष्ट्रवाद

Nationalism

इक्कीसवीं सदी में भारत का भविष्य

सुनील

[भारतीय ज्ञानपीठ, उज्जैन द्वारा आयोजीत पद्यमभूषण डॉ. शिवमंगल सिंह सुमन स्मृति अखिल भारतीय सद्भावना व्याख्यानमाला 2010 में 29 नवंबर 2010 को दिया गया व्याख्यान]

करीब पच्चीस साल पहले हमारे तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने हमें याद दिलाना शुरु किया था कि भारत बहुत जल्दी इक्कीसवी में पहुंचने वाला है। हमें इक्कीसवीं सदी में जाना है। यह बात करते करते हम इक्कीसवीं सदी मे पहुंच गए और इस नई सदी के दस साल भी बीत गए। इक्कीसवीं सदी का भारत कहां है, कैसा है, कैसा बनने वाला है, कहां पहुँचने वाला है- यह एक विशद विषय है। यहां उसके कुछ पहलुओं पर विचार करेंगें।

निश्चित ही नई सदी में बहुत सारी चीज़ें काफी चमकदार दिख रहीं है। बीस साल या पचास साल पहले के मुकाबले भारत काफी आगे दिखाई दे रहा है। कई तरह की क्रांतियां हो रही है। कम्प्यूटर क्रांति चल रही है। मोबाईल क्रांति भी हो गई है - अब गरीब आदमी की जेब में भी एक मोबाइल मिलता है। ऑटोमोबाईल क्रांति चल रही है। एक ज़माना था जब स्कूटर के लिए नंबर लगाना पड़ता था, वह ब्लैक में मिलता था। कारों के बस दो ही मॉडल थे – एम्बेसेडर और फिएट। अब किसी भी शोरुम में जाइए, मनपसंद मॉडल की मोटरसाइकिल या कार उठा लाइए। नित नए मॉडल बाज़ार में आ रहे है। सड़कों पर कारें ही कारें दिखाई देती हैं।  सड़कें फोरलेन-सिक्सलेन बन रही है। हाईवे, एक्सप्रेसवे की चिकनी सड़कों पर गाड़ियां हवा से बात करती हैं। ‘फोरलेन‘ शब्द तो बच्चे-बच्चे की जुबान पर चढ़ गया है। इसी तरह शिक्षा में भी क्रांति आ गई है। पहले इंजीनियरिंग, मेडिकल, बी.एड. कॉलेज गिनती के हुआ करते थे। आज एक-एक शहर में दस-दस कॉलेज है और उनमें सीटें खाली रहती है। पहलें चुनिंदा कॉन्वेंट स्कूल हुआ करते थे,  अब इंग्लिश मिडियम स्कूल गली-गली, मोहल्ले में खुल गए है। 

यह हमारी सरकार नहीं है

लोदो सिकोका से पुरुषोत्तम ठाकुर की बातचीत

कुनी, उसकी सहेली और माँ, गाँव के पास ही पहाड़ी के नीचे वाली ज़मीन में सरसों के खेत में सरसों के फुल और पत्ती तोड़ रहे थे और तोड़ते-तोड़ते अचानक कुनी चिल्ला उठी- “लोदो दादा आ गये, लोदो दादा आ गये…”

नियमगिरि के इस लाखपदर गाँव में रहकर पिछले चार दिनों से हम इसी खबर का इंतजार कर रहे थे. चार दिन पहले जब हम इस गांव में पहुंचे थे तो पता चला कि लोदो यानी लोदो सिकोका कुछ ही देर पहले भुवनेश्वर के लिये रवाना हो गये थे. वहां किसी बैठक में उन्हें भाग लेना था.

नियमगिरि के डोंगरिया आदिवासी नियमगिरि में बाक्साइट माइनिंग के लिए कोशिश कर रही ब्रिटिश कंपनी वेदांता के खिलाफ संघर्ष कर रहे हैं और लोदो सिकोका, नियमगिरि सुरक्षा परिषद के एक प्रमुख नेता हैं. लोदो सिकोका

लोदो पिछले साल अगस्त में पहली बार तब चर्चा में आये, जब वेदांता कंपनी के इशारे पर लोदो को पुलिस उस समय उठा ले गई, जब वह अपने साथियों के साथ एक बैठक में हिस्सा लेने दिल्ली जा रहे थे. उन्हें रायगढ़ा पुलिस ने थाना ले जाकर मरते दम तक पिटा, माओवादी होने का ठप्पा दिया और तब जाकर छोड़ा जब मीडिया से लेकर स्थानीय सांसद और कार्यकर्ताओं ने दबाव बनाया.

सरसों के खेत से गाँव पहुँच कर जब हमने लोदो के बारे में पूछा तो एक ने कहा कि वह भूखे और प्यासे थे और अपनी डोंगर (डोंगर में स्थित अपने खेत) की ओर चले गए हैं. हम भी पीछे चल पड़े. वैसे भी पिछले चार दिनों में हम कई लोगों का डोंगर चढ़ चुके थे, जिनमें लोदो का डोंगर भी शामिल था.

असल में फसल कटाई के इस समय गांव के सभी लोग अपने परिवार समेत अपने-अपने डोंगर में छोटी -छोटी कुटिया और मचान लगाकर रहते हैं. डोंगर में ही वे धान, मड़िया, गुर्जी, कांदुल,अंडी जैसे कई तरह की फसलों को काटकर लाते हैं.

नियमगिरि पहाड़ में रहने वाले ये डोंगरिया आदिवासी डोंगर में ही खेती करते हैं. यहां खेती करना काफी मेहनत का काम है, जिसमें पूरे परिवार को जुटना पड़ता है. डोंगर में क्योंकि जुताई नहीं हो पाती, इसलिए वहां हाथ से कोड़ाई करनी पड़ती है. इसलिए इस खेती में घर के छोटे बच्चे से लेकर बुढ़ों तक का योगदान महत्वपूर्ण होता है.

कॉरपोरेट, सियासत और मनमोहन मंत्रिमंडल

पुण्य प्रसून बाजपेयी

कॉरपोरेट के लिये रेड कारपेट बिछाने वाले मनमोहन सिंह कॉरपोरेट के हितों को साधने वाले मंत्रियों पर निशाना भी साध सकते हैं, इसे मंत्रिमंडल विस्तार से पहले किसी मंत्री या कॉरपोरेट घराने ने सोचा नहीं होगा। लेकिन मंत्रिमंडल विस्तार को लेकर जो लकीर मनमोहन सिंह ने खींची, उसमें अगर एक तरफ निशाने पर कॉरपोरेट घरानों के लिये काम करने वाले मंत्रियों को लिया तो अब 2 जी स्पेक्ट्रम घोटाले की जांच में उन कॉरपोरेट घरानों को घेरने की तैयारी हो रही है, जिन्हें भरोसा है कि सरकार से करीबी ने अगर उन्हें मुनाफे का लाइसेंसधारक बनाया है तो उनपर कोई कार्रवाई हो नहीं सकती। पहले बात मंत्रियों की। पूर्व पेट्रोलियम मंत्री मुरली देवडा को अंबानी के बच्चे गैस वाले अंकल के नाम से जानते हैं । और 2006 में जब मणिशंकर अय्यर को हटा कर मुरली देवड़ा को पेट्रोलियम मंत्री बनाया गया तो उनकी पीठ पर उन्हीं मुकेश अंबानी का हाथ था, जिनपर काग्रेस के करीबी होने का तमगा कांग्रेसियो ने ही लगा रखा था। इसलिये मुरली देवडा बतौर मंत्री भी अक्सर यह कहते रहे कि उनके लिये मुकेश अंबानी कितने अहम हैं। और तो और 2008 में जब अमेरिका में गैस की किमत 3.70 डॉलर थी, तब भी रिलायंस भारत में गैस की कीमत 4.20 डॉलर लगा रहा था और मुरली देवडा न सिर्फ राष्ट्रीय घरोहर को कौड़ियों के मोल मुकेश अंबानी को बेच रहे थे बल्कि उनके साथ आंध्रप्रदेश के त्रिमूला मंदिर में पूजा अर्चना करने से भी नहीं कतरा रहे थे।

भगत सिंह के बारे में कुछ अनदेखे तथ्य

कनक तिवारी

मैं भगतसिंह के बारे में कुछ भी कहने के लिए अधिकृत व्यक्ति नहीं हूं. लेकिन एक साधारण आदमी होने के नाते मैं ही अधिकृत व्यक्ति हूं, क्योंकि भगतसिंह के बारे में अगर हम साधारण लोग गम्भीरतापूर्वक बात नहीं करेंगे तो और कौन करेगा. मैं किसी भावुकता या तार्किक जंजाल की वजह से भगतसिंह के व्यक्तित्व को समझने की कोशिश कभी नहीं करता. इतिहास और भूगोल, सामाजिक परिस्थितियों और तमाम बड़ी उन ताकतों की, जिनकी वजह से भगतसिंह का हम मूल्यांकन करते हैं, अनदेखी करके भगतसिंह को देखना मुनासिब नहीं होगा.

भगत सिंह

 
पहली बात यह कि कि दुनिया के इतिहास में 24 वर्ष की उम्र भी जिसको नसीब नहीं हो, भगतसिंह से बड़ा बुद्धिजीवी कोई हुआ है? भगतसिंह का यह चेहरा जिसमें उनके हाथ में एक किताब हो-चाहे कार्ल मार्क्स की दास कैपिटल, तुर्गनेव या गोर्की या चार्ल्स डिकेन्स का कोई उपन्यास, अप्टान सिन्क्लेयर या टैगोर की कोई किताब-ऐसा उनका चित्र नौजवान पीढ़ी के सामने प्रचारित करने का कोई भी कर्म हिन्दुस्तान में सरकारी और गैर सरकारी संस्थानों सहित भगतसिंह के प्रशंसक-परिवार ने भी लेकिन नहीं किया. भगतसिंह की यही असली पहचान है.

भगतसिंह की उम्र का कोई पढ़ा लिखा व्यक्ति क्या भारतीय राजनीति का धूमकेतु बन पाया? महात्मा गांधी भी नहीं, विवेकानन्द भी नहीं. औरों की तो बात ही छोड़ दें. पूरी दुनिया में भगतसिंह से कम उम्र में किताबें पढ़कर अपने मौलिक विचारों का प्रवर्तन करने की कोशिश किसी ने नहीं की. लेकिन भगतसिंह का यही चेहरा सबसे अप्रचारित है. इस उज्जवल चेहरे की तरफ वे लोग भी ध्यान नहीं देते जो सरस्वती के गोत्र के हैं. वे तक भगतसिंह को सबसे बड़ा बुद्धिजीवी कहने में हिचकते हैं.

आर एस एस ने १८४८ में तिरंगे को पैरों तले रौंदा था

शेष नारायण सिंह

25 जनवरी, 2011

श्रीनगर  के लाल चौक पर झंडा फहराने की बीजेपी की राजनीति पूरी तरह से उल्टी पड़ चुकी है . बीजेपी की अगुवाई वाले  एन डी ए के संयोजक शरद यादव तो पहले ही इस  झंडा यात्रा को गलत बता चुके हैं ,अब बिहार के मुख्य मंत्री और बीजेपी के महत्वपूर्ण सहयोगी नीतीश कुमार ने श्रीनगर में जाकर झंडा फहराने की जिद का विरोध किया है . शरद यादव ने तो साफ़ कहा है कि जम्मू कश्मीर में जो शान्ति स्थापित हो रही है उसको कमज़ोर करने के लिए की जा रही बीजेपी की झंडा यात्रा का फायदा उन लोगों को होगा जो भारत की एकता का विरोध करते हैं . नीतीश कुमार ने बीजेपी से अपील की है कि इस फालतू यात्रा को फ़ौरन रोक दे .सूचना क्रान्ति के चलते अब देश के बहुत बड़े मध्यवर्ग को मालूम चल चुका है कि झंडा फहराना बीजेपी की राजनीति का स्थायी भाव नहीं है , वह तो सुविधा के हिसाब से झंडा फहराती रहती है . . बीजेपी की मालिक आर एस एस के मुख्यालय पर २००३ तक कभी भी तिरंगा झंडा नहीं फहराया गया था. वो तो जब २००४ में तत्कालीन बीजेपी की नेता उमा भारती तिरंगा फहराने कर्नाटक के हुबली की ओर कूच कर चुकी थीं तो लोगों ने अखबारों में लिखा कि हुबली में झंडा फहराने के साथ साथ उमा भारती को नागपुर के आर एस एस के मुख्यालय में भी झंडा फहरा लेना चाहिए .,तब जाकर आर एस एस ने अपने दफ्तर पर झंडा फहराया . २००४ के विवाद के दौरान भी उतनी ही हडकंप मची थी जितनी आज मची हुई है लेकिन तब टेलीविज़न की खबरें  इतनी विकसित नहीं थी इसलिए बीजेपी की  धुलाई उतनी नहीं हुई थी जितनी कि आजकल हो रही है . तिरंगा फहराने  के बहाने बहुत सारे सवाल भी बीजेपी वालों से पूछे  जा रहे हैं.  अभी कुछ साल पहले कुछ कांग्रेसी तिरंगा लेकर चल पड़े थे और उन्होंने ऐलान किया था कि वे आर एस एस के नागपुर मुख्यालय पर भी तिरंगा झंडा फहरा देगें . रास्ते में उन पर लाठियां बरसाई गयी थी. लोग सवाल पूछ रहे हैं कि उस वक़्त के तिरंगे से  क्यों चिढी हुई थी बीजेपी जो महाराष्ट्र  में अपनी  सरकार का इस्तेमाल करके  तिरंगा फहराने जा  रहे कांग्रेसियों को पिटवाया था. जब उमा भारती  ने २००४  हुबली में झंडा फहराने के लिए यात्रा की थी तो विद्वान् इतिहासकार रामचंद्र गुहा ने प्रतिष्ठित अखबार ,हिन्दू में एक बहुत ही दिलचस्प लेख लिखा था  .उन्होंने  सवाल किया था कि बीजेपी आज क्यों इतनी ज्यादा राष्ट्रप्रेम की बात करती है . खुद ही उन्होंने जवाब का भी  अंदाज़ लगाया था कि शायद इसलिए कि बीजेपी की मातृ पार्टी , आर एस एस ने आज़ादी की लड़ाई में कभी हिस्सा नहीं लिया था .१९३० और १९४० के दशक में जब आज़ादी की लड़ाई पूरे उफान पर थी तो आर एस एस का कोई भी आदमी या सदस्य उसमें शामिल नहीं हुआ था. यहाँ तक कि जहां भी तिरंगा फहराया गया , आर एस एस वालों ने कभी उसे सल्यूट तक नहीं किया .आर एस एस ने हमेशा ही भगवा झंडे को तिरंगे से ज्यादा महत्व  दिया .३० जनवरी १९४८ को जब महात्मा गाँधी की ह्त्या कर दी गयी तो इस तरह की खबरें आई थीं कि  आर एस एस के लोग तिरंगे झंडे को पैरों से रौंद रहे थे . यह खबर उन दिनों के अखबारों में खूब छपी थीं .आज़ादी के संग्राम में शामिल लोगों को आर एस एस की इस हरकत से बहुत तकलीफ हुई थी . उनमें जवाहरलाल नेहरू भी एक थे . २४ फरवरी को उन्होंने अपने एक भाषण में अपनी  पीडा को व्यक्त किया  था  . उन्होंने कहा कि खबरें आ रही हैं कि आर एस एस के सदस्य तिरंगे का अपमान कर रहे हैं .. उन्हें  मालूम होना चाहिए कि राष्ट्रीय झंडे का अपमान करके वे अपने आपको देशद्रोही साबित कर रहे हैं 

भावनात्मक मुद्दों पर राजनीतिक पैंतरेबाजी नहीं करनी चाहिए

शेष नारायण सिंह

24 जनवरी, 2011

राजनीति एक गंभीर विषय है . जब भी राजनीति को भावनात्मक मुद्दों के सहारे चलाने की कोशिश की जाती है, नतीजे बहुत ही भयानक होते हैं . राजनीति की गलती क्रिकेट की गलती नहीं है . जब राजनेता गलती करता है तो इतिहास बदलता है . आने वाली पीढ़ियों  का भविष्य या तो सुधरता या तबाह होता है .इसलिए राजनीति को भावनात्मक धरातल पर कभी नहीं ले जाया जाना चाहिए. इस बात को समझने के लिए सबसे अच्छा उदाहरण पड़ोसी देश पाकिस्तान का है जहां आजादी के बाद से ही भावनात्मक मुद्दों को राजनीति का विषय बनाया गया और आज पाकिस्तानी राष्ट्र तबाही के कगार पर खड़ा है .आज़ादी के वक़्त हम भाग्यशाली थे कि हमारे नेता वास्तविकता के धरातल पर ही काम करते थे और देश में विकास की बुनियाद रख दी गयी. शिक्षा समेत हर क्षेत्र में जो काम हुआ उस से फौरी लाभ की उम्मीद तो नहीं थी लेकिन भविष्य के सुधरने की मज़बूत संभावना थी. जवाहर लाल नेहरू की मृत्यु के बाद हमारे यहाँ भी भावनात्मक मुद्दों को राष्ट्रीय मुद्दा बनाने की कोशिश शुरू हो गयी. सबसे शुरुआती उदाहरण बंगलादेश के जन्म का है . पाकिस्तान के दो टुकड़े करके जब बंगलादेश की जनता ने अपनी आज़ादी जीती तो इंदिरा गाँधी ने उस जीत का सेहरा अपने सर लेकर बाद के जितने चुनाव हुए सबको भावनातमक धरातल पर  जीतने की कोशिश की और काफी हद तक सफल भी रहीं लेकिन उसका नुकसान यह हुआ कि इंदिरा गाँधी यह समझ बैठीं कि चुनाव जीतने के लिए गंभीर राजनीति की नहीं भावनात्मक विषयों की ज़रुरत होती है . नतीजा यह हुआ कि १९७५ में सत्ता में बने रहने के लिए उन्हें इमरजेंसी लगानी पड़ी और १९७७ में सत्ता से बाहर कर दी गयीं . 

बगैर पेशे के माओवादी होना

चन्द्रिका

(साभार: दखल की दुनिया )

९२ पेज के फैसले में तीन जिंदगियों को आजीवन कारावास दिया जा चुका है. बिनायक सेन के बारे में उतना कहा जा चुका है जितना वे निर्दोष हैं और उतना बाकी है जितना सरकार दोषी है. अन्य दो नाम पियुष गुहा और नारायण सान्याल, जिनका जिक्र इसलिये सुना जा सका कि बिनायक सेन के साथ ही इन्हे भी सजा मुकर्रर हुई, शायद अनसुना रह जाता. पर जिन नामों और संख्याओं का जिक्र नहीं आया वे ७७० हैं, जो बीते बरस के साथ छत्तीसगढ़ की जेलों में कैद कर दी गयी, इनमें हत्याओं और यातनाओं को शामिल नहीं किया गया है. जिनमे अधिकांश आदिवासी हैं पर सब के सब माओवादी. यातनायें इससे कई गुना अधिक हैं और दुख जिसकी गणना किसी भी जनगणना में बाकी रह जायेगी. इनके बारे मे बात करना युद्ध में एक मार्मिक व स्पर्षी अलाप ही होगा. छत्तीसगढ़ का आदिवासी होना थोड़े-बहुत उलट फेर के साथ माओवादी होना है और माओवादी होना अखबारी कतरनों से बनी हमारी आँखों में आतंकवादी होना. यह समीकरण बदलते समय के साथ अब पूरे देश पर लागू हो रहा है. सच्चाई बारिश की धूप हो चुकी है और हमारा ज़ेहन सरकारी लोकतंत्र का स्टोर रूम.
दशकों पहले जिन जंगलों में रोटी, दवा और शिक्षा पहुंचनी थी, वहाँ सरकार ने बारूद और बंदूक पहुंचा दी. बारूद और बंदूक के बारे में बात करते हुए शायद यह कहना राजीव गाँधी की नकल करने जैसा होगा कि जब बारूद जलेगी तो थोड़ी गर्मी पैदा ही होगी. देश की निम्नतम आय पर जीने वाला आदिवासी समाज, देश के सबसे बड़े और दुनिया के १० में से एक सार्वाधिक रक्षा बजट प्राप्त सेना से लड़ रहा है. यह लड़ने की आस्था है, धार्मिक आस्था के विरुद्ध लड़ाई की ऐसी आस्था जिसमे हर बार जीतने की ख्वाहिश तीव्र हो जाती है. इस बात से बेपरवाह कि देश का मध्यम वर्ग भारतीय सत्ता को बहुत ताकतवर मानता है.

इंकलाब के ढहते अर्थ

कनक तिवारी

‘इंकलाब ज़िंदाबाद‘ बीसवीं सदी के भारत में शायद सबसे प्रखर लोकप्रिय नारा रहा है. कई नारे हैं जिन्होंने देश के जीवन को बेहद प्रभावित किया है. ‘भारत माता की जय‘, ‘दुनिया के मज़दूरों एक हो‘, ‘हर ज़ोर ज़ुल्म की टक्कर में संघर्ष हमारा नारा है‘, ‘गूंजे धरती और आकाश देश का नेता जयप्रकाश‘, ‘जयश्रीराम‘, हम सुधरेंगे, युग बदलेगा‘, ‘गरीबी हटाओ‘, ‘जय जवान जय किसान‘ ‘स्वतंत्रता हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है‘, ‘तुम मुझे खून दो मैं तुम्हें आज़ादी दूंगा‘, वगैरह नारे आज भी देश की गूंज-अनुगूंज बने हुए हैं.

दलित नेता सुधीर ढवले को बिनायक सेन बनाने की तैयारी

शेष नारायण सिंह

यह एक खतरनाक दौर है। सत्ता ने नशे में चूर आले दर्जे के मूर्ख हुक्मरान हर वो आदेश दे रहे हैं जो देश की मूल भावना के खिलाफ जाता है। वो एक तरफ को लूट-खसोट में लिप्त हैं और हजारों-लाखों करोड़ रुपये के घोटाले कर रहे हैं और दूसरी तरफ उन लोगों को उठा कर जबरन जेल में ठूंस रहे हैं जो गरीबों-दलितों के हितों की बात करते हैं। बिनायक सेन के साथ जो कुछ हुआ उसके गवाह हम सब हैं और अब महाराष्ट्र में दलित नेता सुधीर ढवले को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है। यही नहीं रविवार को उनके घर पर बिना सर्च वारंट के छापा मारा और घरवालों के विरोध को नजरअंदाज करते हुए तलाशी ली। पुलिस की इस गैरकानूनी कार्रवाई का हम विरोध करते हैं और सरकार से मांग करते हैं कि सुधीर ढवले को तुरंत रिहा किया जाए। – मॉडरेटर  (जनतंत्र)

महाराष्ट्र पुलिस ने भी छत्तीसगढ़ पुलिस की तरह गरीबों के अधिकार की लड़ाई लड़ने वालों की धरपकड़ शुरू कर दी है। इस सिलसिले में दलित अधिकारों के चैम्पियन और मराठी पत्रिका, ‘विद्रोही ‘ के संपादक सुधीर ढवले को गोंदिया पुलिस ने देशद्रोह और अनलॉफुल एक्टिविटीज़ प्रेवेंशन एक्ट की धारा 17, 20 और 30 लगाकर गिरफ्तार कर लिया। उन पर आरोप है कि वे आतंकवादी काम के लिए धन जमा कर रहे थे और किसी आतंकवादी संगठन के सदस्य थे। पुलिस ने उनको नक्सलवादी बताकर अपने काम को आसान करने की कोशिश भी कर ली है।

राष्ट्रद्रोह, राजद्रोह और जनविद्रोह

कनक तिवारी

[इस लेख का खास महत्व इस निगाह से है कि लेखक न सिर्फ़ कानून से जुड़े हैं, बल्कि विनायक सेन के वकील रह चुके हैं। जाहिर है, अन्य लेखों की ही तरह, इस लेख को यहाँ शामिल करने का अर्थ इसके पूरे कथ्य से संपूर्ण संपादकीय सहमति नहीं है। लेकिन शामिल किया है तो कुछ तो सहमति होगी ही।]

विनायक सेन के मामले में चुप रहना उचित नहीं होगा. मैं ज़मानत आवेदन के सिलसिले में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में उनका वकील रह चुका हूं. इसलिए मुझे अच्छी तरह मालूम है कि उस स्थिति में विनायक सेन के विरुद्ध पुलिस की केस डायरी में ऐसा कुछ नहीं था कि प्रथम दृष्टि में मामला भी बनता. यह अलग बात है कि हाईकोर्ट ने उनकी ज़मानत मंजूर नहीं की जो बाद में लगभग उन्हीं तथ्यों पर बल्कि पुलिस द्वारा और कुछ साक्ष्य एकत्रित कर लिए जाने के बावजूद सुप्रीम कोर्ट में मंजूर हो गई.

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लेखक विषय संवाद साभार अनुवादक

पहले वो आए साम्यवादियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं साम्यवादी नहीं था

 

फिर वो आए मजदूर संघियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं मजदूर संघी नहीं था

 

फिर वो यहूदियों के लिए आए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं यहूदी नहीं था

 

फिर वो आए मेरे लिए

और तब तक बोलने के लिए कोई बचा ही नहीं था

 

मार्टिन नीमोलर (1892-1984)