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भारत में सामूहिक बलात्कार के आरोपियों के विरुद्ध हत्या का मामला दर्ज, प्रदर्शनकारियों का महिलाओं के लिए व्यापक अधिकारों पर ज़ोर

भारत में पांच पुरुषों के विरुद्ध एक चलती बस में एक 23 वर्षीय छात्रा के अपहरण, सामूहिक बलात्कार और हत्या के आरोप में औपचारिक रूप से मामला दर्ज किया गया है। 16 दिसंबर के बलात्कार के दौरान इस महिला  का शरीर इतनी बुरी तरह विकृत हो गया था कि उसे आंतों के प्रत्यारोपण की जरूरत थी, लेकिन अंततः गंभीर आंतरिक चोटों के कारण उसका जीवन नहीं बचाया जा सका। "मुझे लगता है कि यह एक लंबे समय से संचित गुस्से और आक्रोश का असर था," भारत में यौन हिंसा के खिलाफ विरोध प्रदर्शन की मुख्य आयोजकों में से एक, अखिल भारतीय प्रगतिशील महिला संघ की कविता कृष्णन का कहना है। "इस मामलें में यह सब फट पड़ा, शायद इसलिए कि उसके साथ ऐसा इतनी मामूली दैनिक गतिविधि के दौरान हुआ: वह केवल अपने दोस्त के साथ एक फिल्म देखने के बाद घर जाने के लिए एक बस में चढ़ी थी। और मुझे लगता है कि इस बात ने हर एक के मानस को छू लिया क्योंकि हर कोई उसकी जगह अपने को रख कर देख सकता था। मुझे लगता है कि उन सबने इस अनाम व्यक्ति के साथ एक गहरा संबंध महसूस किया।" सामूहिक बलात्कार के इस मामले ने भारत में यौन हिंसा के अन्य मामलों पर प्रकाश डाला है, जहां हर 20 मिनट में एक महिला के साथ बलात्कार किया जाता है, राष्ट्रीय अपराध रजिस्ट्री के अनुसार। "मुझे लगता है हमें उऩ सब बदलावों पर भी नज़र डालनी पड़ेगी जो कि विभिन्न प्रकार की सामाजिक और सांस्कृतिक ताकतों के कारण हो रहे हैं - वैश्वीकरण, लोगों का एक जगह से दूसरी जगह जाना, दिखावटी उपभोग, उन सब चीज़ों का मीडिया में व्यापक प्रदर्शन जो इतनी आसानी से उपलब्ध हैं," एलोरा चौधरी, बोस्टन के मैसाचुसेट्स विश्वविद्यालय में महिलाओं के अध्ययन की एसोसिएट प्रोफेसर, का मानना है। "ये सब के सब, मुझे लगता है, और खास तौर पर इन सब विभिन्न प्रकार की ताकतों तथा लैंगिक गतिकी के परस्पर संघर्ष के चलते शहरी क्षेत्रों में हो रहे परिवर्तनों  से लैंगिक गतिकी में, स्त्री-पुरुष संबंधों में तरह-तरह के बदलाव आ रहे हैं।" [प्रतिलेख शामिल है]

अतिथि:

कविता कृष्णन, अखिल भारतीय प्रगतिशील महिला एसोसिएशन की सचिव और भारत में यौन हिंसा के खिलाफ विरोध प्रदर्शन के मुख्य आयोजकों में से एक।

एलोरा चौधरी, बोस्टन में मैसाचुसेट्स विश्वविद्यालय में महिलाओं के अध्ययन की एसोसिएट प्रोफेसर।

एक अंग्रेज की ईमानदार स्वीकारोक्ति

डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'

[इंग्लैण्ड के प्रसिद्ध मानवाधिकार कार्यकर्ता  लार्ड  एंथनी   लेस्टर ने सवा सौ करोड़ भारतीयों को अवसर प्रदान किया है कि वे देश के नकाबपोश कर्णधारों से सीधे सवाल करें... - सं. (जनज्वार)]

जहाँ  तक मुझे याद है, मैं 1977 से एक बात को बड़े-बड़े नेताओं से सुनता आ रहा हूँ. नेता कहते हैं भारतीय कानूनों में अंग्रेज़ों की मानसिकता छुपी हुई है, इसलिये इनमें आमूलचूल परिवर्तन की ज़रूरत है, लेकिन परिवर्तन कोई नहीं करता है.

जाने माने लेखक व पत्रकार अनिल सिन्हा का नि‍धन

नई दि‍ल्‍ली : जाने-माने लेखक व पत्रकार अनिल सिन्हा नहीं रहे। 25 फरवरी को दिन के 12 बजे पटना के मगध अस्पताल में उनका निधन हो गया। 22 फरवरी को जब वे दिल्ली से पटना आ रहे थे, ट्रेन में ही उन्हें ब्रेन स्ट्रोक हुआ। उन्हें पटना के मगध अस्पताल में अचेतावस्था में भर्ती कराया गया। तीन दिनों तक जीवन और मौत से जूझते हुए 25 को उन्होंने अन्तिम सांस ली। उनका अन्तिम संस्कार पटना में ही होगा। उनके निधन की खबर से पटना, लखनऊ, दिल्ली, इलाहाबाद सहित तमाम जगहों में लेखको, संस्कृतिकर्मियों के बीच दुख की लहर फैल गई। जन संस्कृति मंच ने उनके निधन पर गहरा दुख प्रकट किया है। उनके निधन को जन सांस्कृतिक आंदोलन के लिए एक बड़ी क्षति बताया है।

ज्ञात हो कि अनिल सिन्हा एक जुझारू व प्रतिबद्ध लेखक व पत्रकार रहे हैं। उनका जन्म 11 जनवरी, 1942 को जहानाबाद, गया, बिहार में हुआ। उन्होंने पटना वि‍श्‍वविद्यालय से 1962 में एम.ए. हिन्दी में उतीर्ण किया। वि‍श्‍वविद्यालय की राजनीति और चाटुकारिता के विरोध में उन्होंने पीएचडी बीच में ही छोड़ दी। उन्होंने प्रूफ रीडिंग, प्राध्यापिकी, विभिन्न सामाजिक विषयों पर शोध जैसे कई कार्य किये। 70 के दशक में उन्होंने पटना से ‘विनिमय’ साहित्यिक पत्रिका का प्रकाशन शुरू किया जो उस दौर की अत्यन्त चर्चित पत्रिका थी। आर्यवर्त, आज, ज्योत्स्ना, जन, दिनमान से भी वह जुड़े रहे। 1980 में जब लखनऊ से अमृत प्रभात निकलना शुरू हुआ, उन्होंने इस अखबार में काम किया। अमृत प्रभात लखनऊ में बन्द होने के बाद में वे नवभारत टाइम्स में आ गये। दैनिक जागरण, रीवाँ के वह स्थानीय संपादक रहे। लेकिन वैचारिक मतभेद की वजह से उन्होंने यह अखबार छोड़ दिया।

दादासाहेब फाल्के के उद्यम का दस्तावेज़ है मराठी फिल्म हरिशचंद्राची फैक्टरी

शेष नारायण सिंह

टेलिविज़न पर मराठी फिल्म "हरिशचंद्राची फैक्टरी " देखने का मौक़ा मिला. एक बहुत ही अज़ीज़ दोस्त ने कहा कि मराठी भाषा न जानने की वजह से फिल्म को देखने में कोई दिक्क़त नहीं आयेगी. इस फिल्म के बारे में इतना पता था कि आस्कर पुरस्कारों के लिए गयी थी लेकिन पुरस्कार मिला नहीं. फिल्म देख कर समझ में आया कि आस्कर पुरस्कार देने वाले गलती कैसे करते हैं.यह फिल्म भारतीय सिनेमा के आदिपुरुष दादा साहेब फाल्के की पहली फिल्म हरिश्चंद्र तारामती के निर्माण के बारे में है. दादासाहेब फाल्के ने इस देश में सिनेमा की बुनियाद डालने के लिए अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया था. उनके उद्यम को विषय बनाकर बनायी गयी यह फिल्म बेहतरीन है और पहली बार फिल्म निर्देशन का काम कर रहे परेश मोकाशी की लीक से हट कर चलने की हिम्मत भी लाजवाब है. फिल्म एक वृत्तचित्र है लेकिन डाकुमेंटरी की तरह बनायी गयी है. दादासाहेब फाल्के के दृढ़निश्चय को फिल्म की भाषा में पेश करने की कोशिश में फिल्मकार ने एक ऐसी फिल्म बनाने में सफलता हासिल कर ली है जो गैर मराठी भाषी को भी मन्त्रमुग्ध करने की क्षमता रखती है...

राजनीति की बारीक समझ को टी वी न्यूज़ का स्थायी भाव बनाना पड़ेगा

शेष नारायण सिंह

मिस्र में जनता सडकों पर है. अमरीकी हुकूमत की समझ में नहीं आ रहा है कि क्या करे. दुविधा की स्थिति है. होस्नी मुबारक का जाना तो तय है लेकिन उनकी जगह किसको दी जाए, यह अमरीका की सबसे बड़ी परेशानी है. मुबारक ने जिस पुलिस वाले को अपना उपराष्ट्रपति तैनात किया है, उसको अगर गद्दी देने में अमरीका सफल हो जाता है तो उसके लिए आसानी होगी लेकिन उसके सत्ता संभालने के बाद अवाम को शांत कर पाना मुश्किल होगा. जिस तरह से भ्रष्ट सत्ता को उखाड़ फेंकने के लिए लोग सड़क पर उतरे हैं, उनके तेवर अलग हैं. लगता नहीं कि वे आसानी से बेवक़ूफ़ बनाए जा सकते हैं.
 
अमरीका की सबसे बड़ी चिंता यह है कि इस्लामी बुनियादपरस्त लोग सत्ता पर काबिज़ न हो जाएँ. अगर ऐसा हुआ तो अमरीकी विदेश नीति का एक मज़बूत किला ज़मींदोज़ हो जाएगा. काहिरा के तहरीर चौक पर जो दस लाख से भी ज्यादा लोग मंगलवार को दिन भर जमे रहे वे सरकार बदलने आये थे, लॉलीपाप खरीदने नहीं. दिलचस्प बात यह है कि मिस्र की फौज भी अब जनता के जायज़ आन्दोलन को समर्थन दे रही है. उसने साफ़ कह दिया है कि निहत्थे लोगों पर हथियार नहीं चलाये जायेगें. नतीजा यह हुआ कि मुबारक के हुक्म से तहरीर चौक पर फौजी टैंक तो लगा दिए गए लेकिन उनसे आम तौर पर जो दहशत पैदा होती है वह गायब थी. लोग टैंकों को भी अपना मान कर घूम रहे थे. फौज और सुरक्षा बलों के इस रुख के कारण जनता में संघर्ष की कोई बात नज़र नहीं आ रही थी. लगता था कि मेला लगा हुआ है और लोग पूरे परिवार के साथ तहरीर चौक पर पिकनिक का आनंद ले रहे हैं.
 
लेकिन बुधवार को हालात बिगड़ गए. मुबारक ने ऊंटों और घोड़ों पर सवार अपने गुंडों को तहरीर चौक पर मार पीट करने के लिए भेज दिया. आरोप तो यह भी है कि वे पुलिस वाले थे और सादे कपड़ों में आये थे. उनको हिदायत दी गयी थी कि तहरीर चौक पर जो अवाम इकठ्ठा है उसे मार पीट कर भगाओ. ज़ाहिर है कि पिछले दस दिनों से जो कुछ भी काहिरा में हो रहा है वह सत्ता से पंगा लेने की राजनीति का नया उदाहरण है. जिस लोकशाही की बात बड़े-बड़े विचारकों ने की है, उसी का एक नया आयाम है.
 
इस सारे प्रकरण में बी बी सी, अल जजीरा,अल अरबिया और सी एन एन के टेलिविज़न कैमरों की रिपोर्टिंग देखने का मौक़ा मिला.

मीडिया के चतुर सुजान – सावधान!

आनंद प्रधान

(तहलका से साभार)

मीडिया पर वैकल्पिक मीडिया की निगेहबानी एक शुभ संकेत है

पिछला साल मुख्यधारा के कॉरपोरेट मीडिया के लिए अच्छा नहीं रहा. खबरों की खरीद-फरोख्त (पेड न्यूज) के गंभीर आरोपों से घिरे कॉरपोरेट मीडिया की साख को नीरा राडिया प्रकरण से गहरा धक्का लगा. उसकी विश्वसनीयता पर सवाल दर सवाल उठ रहे हैं, लेकिन अफसोस की बात यह है कि उन सवालों के जवाब नहीं मिल रहे हैं. नतीजा, कॉरपोरेट मीडिया के कारनामों के कारण लोगों का उसमें भरोसा कम हुआ/हो रहा है.

इसका एक नतीजा यह भी हुआ है कि लोग समाचार मीडिया को लेकर जागरूक हो रहे हैं. पाठक, श्रोता और दर्शक अब आंख मूंदकर उस पर भरोसा नहीं कर रहे हैं. वे खुद भी खबरों की पड़ताल करने लगे हैं. इसमें न्यू मीडिया उनकी मदद कर रहा है. न्यू मीडिया और खासकर सोशल मीडिया जैसे फेसबुक, ट्विटर, यू-ट्यूब, ब्लॉग आदि के कारण न सिर्फ उनकी सक्रियता बढ़ी है बल्कि उनका आपस में संवाद भी बढ़ा है. पाठकों-दर्शकों का एक छोटा-सा ही सही लेकिन सक्रिय वर्ग कॉरपोरेट समाचार मीडिया पर कड़ी निगाह रख रहा है और उसकी गलतियों और भटकावों को पकड़ने और हजारों-लाखों लोगों तक पहुंचाने में देर नहीं कर रहा है.

एक ताजा उदाहरण देखिए. वैसे तो अंग्रेजी समाचार चैनल सीएनएन-आईबीएन और इसके संपादक राजदीप सरदेसाई की साख और प्रतिष्ठा बहुत अच्छी है लेकिन पिछले दिनों इस चैनल और खुद उनके कार्यक्रम में एक ऐसी घटना घटी जिसे पत्रकारीय नैतिकता की कसौटी पर उचित नहीं ठहराया जा सकता है. हुआ यह कि इस चैनल पर नीरा राडिया प्रसंग में इस मुद्दे पर बहस का कार्यक्रम प्रसारित किया गया कि ‘क्या लॉबीइंग को कानूनी बना देना चाहिए?’ कार्यक्रम के दौरान दर्शकों की राय दिखाते हुए कई ट्वीट पेश किए गए जिनमें ज्यादातर में लॉबीइंग को कानूनी बनाने की वकालत की गई थी.

बीबीसी रेडियो से अब हिन्दी खबरें नहीं आयेगीं

शेष नारायण सिंह

ब्रिटिश ब्राडकास्टिंग कारपोरेशन के कई सेक्शन बंद किये जा रहे हैं. दुर्भाग्य की बात यह है कि हिन्दी सर्विस में भी बंदी का ऐलान कर दिया गया है. इसका  मतलब  यह हुआ कि बीबीसी  रेडियो की हिंदी सर्विस को मार्च के अंत में बंद  कर दिया जाएगा. बीबीसी की हिन्दी सेवा का बंद होना केवल एक व्यापारिक फैसला नहीं है. यह संस्कृति को प्रभावित करने वाला इतिहास का ऐसा मुकाम है जिसकी धमक बहुत दिनों तक महसूस की जायेगी. हालांकि इस बात में भी दो राय नहीं है  कि बीबीसी की हिंदी सर्विस ने अपना वह मुकाम खो दिया है जो उसको पहले हासिल था...

पहले के दौर में बीबीसी की ख़बरों का भारत में बहुत सम्मान किया जाता था.१९७५ में जब इमरजेंसी लगी और भारत की आकाशवाणी  और दूरदर्शन इंदिरा सरकार की ढपली बजाने लगे तो जो कुछ भी सही खबरें इस देश के आम आदमी के पास पंहुचीं वे सब बीबीसी की कृपा  से ही  पंहुचती थीं. इसके अलावा भी देश के हिन्दी भाषी इलाकों में रेडियों के श्रोताओं का एक बहुत बड़ा वर्ग  है जिसकी रोज़मर्रा की ज़िंदगी में बीबीसी रेडियो पर हिन्दी खबरें सुनना  एक ज़रूरी  काम की तरह है. उत्तर  प्रदेश और बिहार में पढ़े लिखे लोगों का एक बहुत बड़ा वर्ग है जिसके लिए कोई भी सूचना खबर नहीं बनती जब तक कि उसे बीबीसी पर न सुन लिया जाए. इस तरह की संस्था का बंद होना निश्चित रूप से इस देश के लिए दुःख की बात है.

राडिया कांड : कौए कभी कौए का मांस नहीं खाते?

दिलीप मंडल

मीडिया के बारे में अक्सर कहा जाता है कि हर किसी की बंद मुट्ठी खोलने को तत्पर मीडिया कभी अपनी मुट्ठी नहीं खोलता। ब्रिटिश पत्रकार निक डेविस ने मीडिया और लॉबीइंग के रिश्तों के बारे में अपनी चर्चित किताब “फ्लैट अर्थ न्यूज” की भूमिका की शुरुआत में मीडिया के बारे में लिखा है कि कुत्ता कुत्ते को नहीं खाता और भूमिका के अंत में लिखा है कि इस नियम को तोड़ने की जरूरत है। मीडिया में यह अघोषित विधान रहा है कि देश-दुनिया में जो कुछ हो रहा है, सब कुछ बताओ, लेकिन अपने बारे में और अपने कारोबार से जुड़े अन्य संस्थानों और लोगों के बारे में न बताओ। इसके उदाहरण आसपास देख सकते हैं।

मिसाल के तौर पर 2009 में जब आर्थिक मंदी के दौर में भारत में छंटनियां हो रही थीं, तो कारोबार के अलग-अलग क्षेत्रों में नौकरियां खत्म होने की खबरें देने वाले अखबारों या चैनलों ने यह नहीं बताया कि मीडिया में भी बड़े पैमाने पर छंटनी हुई है और वेतन घटाये गये हैं। मीडिया के मालिक और संपादक राजनेताओं ओर पार्टियों के करीब हैं, यह बात हम तभी जान पाते हैं, जब कोई मालिक या संपादक राज्यसभा का सदस्य बन जाता है या पद्मश्री या पद्मविभूषण से सम्मानित किया जाता है। मीडिया कभी नहीं बताता कि उसके कौन से और कारोबार और कारोबारी हित हैं और इस बात का उसकी संपादकीय नीति पर किस तरह असर पड़ता है। मिसाल के तौर पर भारत में प्रमुख मीडिया हाउस, मीडिया से इतर लगभग ढाई सौ और कारोबार में हैं। यह कारोबार कुछ भी हो सकता है, मसलन – चीनी मिल, तेल मिल, रियल एस्टेट, माइनिंग, स्टील, शिक्षा, फिल्म निर्माण, अचार, रसायन उद्योग, रिटेलिंग आदि। लेकिन यह बात पाठकों और दर्शकों को पता नहीं चलती।

राडिया कांड और मीडिया: धंधा है और गंदा है

दिलीप मंडल

9 जनवरी, 2011

यह छवियों के विखंडन का दौर है। एक सिलसिला सा चल रहा है, इसलिए कोई मूर्ति गिरती है तो अब शोर कम होता है। इसके बावजूद, 2010 में भारतीय मीडिया की छवि जिस तरह खंडित हुई, उसने दुनिया और दुनिया के साथ सब कुछ खत्म होने की भविष्यवाणियां करने वालों को भी चौंकाया होगा। 2010 को भारतीय पत्रकारिता की छवि में आमूल बदलाव के वर्ष के रूप में याद किया जाएगा। देखते ही देखते ऐसा हुआ कि पत्रकार सम्मानित नहीं रहे। वह बहुत पुरानी बात तो नहीं है जब मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता था। लेकिन आज कोई यह बात नहीं कह रहा है। कोई यह बात कह भी रहा है तो उसे पोंगापंथी करार दिया जा सकता है।

मीडिया का स्वरूप पिछले दो दशक में काफी बदल गया है। मीडिया देखते ही देखते चौथे खंभे की जगह, कुछ और बन गया। वह बाकी धंधों की तरह एक और धंधा बन गया। मीडिया को एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री के साथ जोड़ दिया गया और पता चला कि भारत में यह उद्योग 58,700 करोड़ रुपए का है। अखबार और चैनल चलाने वाली कंपनियों का सालाना कारोबार देखते ही देखते हजारों करोड़ रुपए का हो गया। मुनाफा कमाना और मुनाफा बढ़ाना मीडिया उद्योग का मुख्य लक्ष्य बन गया। मीडिया को साल में विज्ञापनों के तौर पर साल में जितनी रकम मिलने लगी, वह कई राज्यों के सालाना बजट से ज्यादा है।

लाइव इंडिया का रावण चैनल हेड सुधीर चौधरी

विनीत कुमार

कल हमने आपसे अपील की थी कि मैंने तो स्टार न्यूज के भीतर रावण और चैनल के रावण मानसिकता से ड्राइव होने की बात लिख दी है। आप भी पहल करें,अच्छा रहेगा। ठीक उसी रात मीडिया फोकस साइट मीडियाखबर डॉट कॉम ने एक सीरिज शुरु की- न्यूज चैनलों के नौ रावण और उनलोगों की पूरी एक लिस्ट जारी है जो वाकई अलग-अलग खौपनाक कारनामे से मीडिया इन्डस्ट्री के रावण हैं। लिहाजा हम वहां से वो पोस्ट उधार लेकर आपसे साझा कर रहे हैं। ये बहुत ही मौजूं दौर है,जहां आकर मीडिया जिसे की लोकतंत्र का चौथा स्तंभ और बदलाव का नायक करार देते रहे,उसकी शक्ल एक विलेन के तौर पर बन गयी है। पहले पीपली लाइव और अब नॉक आउट देखकर हम इसे आसानी से समझ सकते हैं।

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लेखक विषय संवाद साभार अनुवादक

पहले वो आए साम्यवादियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं साम्यवादी नहीं था

 

फिर वो आए मजदूर संघियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं मजदूर संघी नहीं था

 

फिर वो यहूदियों के लिए आए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं यहूदी नहीं था

 

फिर वो आए मेरे लिए

और तब तक बोलने के लिए कोई बचा ही नहीं था

 

मार्टिन नीमोलर (1892-1984)