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मध्य-पूर्व

Middle East

भारत में भी मिस्र

प्रीतीश नंदी

क्या आपको कभी यह महसूस नहीं हुआ कि भारत दुनिया के सर्वाधिक अनदेखे लोगों का देश है? ये अनदेखे-अदृश्य लोग लाखों-करोड़ों की तादाद में हैं, इसके बावजूद उन पर कोई गौर नहीं करता. हम सभी उन्हें नजरअंदाज कर देते हैं, जैसे कि उनका कोई अस्तित्व ही न हो. हां, उनके पास मतदाता परिचय पत्र हैं. उनमें से कुछ के पास पैन कार्ड भी हो सकते हैं. नंदन नीलेकणी जल्द ही उन्हें उनका विशिष्ट पहचान क्रमांक भी दे देंगे, ठीक उसी तरह जैसे टेलीकॉम कंपनियों ने उन्हें सेलफोन मुहैया करा दिए हैं. उनके नाम पर बैंकों में खाते हैं और उन्हें एटीएम कार्ड भी दिए गए हैं. इसके बावजूद वे हमारे गणतंत्र के गुमशुदा लोगों में से हैं.

इनमें से अधिकांश युवा और बेरोजगार हैं. कुछ बुढ़े हैं, जो किसी रोजगार के योग्य नहीं. वे सभी उस भारत के हिस्से हैं, जिसकी उपेक्षा कर दी गई है. नहीं, उन्होंने अपनी इस स्थिति का चुनाव स्वयं नहीं किया है. यह स्थिति एक धूर्त राजनीतिक तंत्र द्वारा निर्मित की गई है, जो एक ऐसा वोट बैंक पाना चाहता है, जिसका वह दोहन कर सके. इसीलिए आजादी के छह दशक बाद भी वे नामहीन और शक्लहीन हैं. वे भारत की उस मुख्यधारा के अंग नहीं हैं, जो तालियों की गड़गड़ाहट में डूबा हुआ है. वे तकनीकी क्रांति का भी हिस्सा नहीं हैं. मोबाइल फोन कभी भी बिजली या पानी का विकल्प नहीं हो सकते. इन लोगों ने कभी आर्थिक सुधारों के बारे में सुना भी न हो, क्योंकि उससे उन्हें कोई लाभ नहीं हुआ है. उन्हें तो यह भी नहीं मालूम कि वे जिस भारत देश में रह रहे हैं, वह दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में से है.

मिस्र में प्रदर्शन

एक बार मिस्र हो जाओ मेरे देश

शैलेन्द्र

[यह कविता फोन पर एक मित्र ने सुनाई. वे उत्तर प्रदेश के अम्बेडकर नगर जिले में कन्द्रियांवा गांव के रहने वाले हैं. उनका नाम शैलेन्द्र है. बी.ए. में पढ़ते हैं...... गांव से थोड़ी दूर पर मड़हा नदी है. यहाँ इन्हें रेंगते जानवरों के बीच मोटे उपन्यास जो किसी शर्मा द्वारा लिखा गया होता है... खूनी कातिल, जुदाइ की रातें जैसे जाने क्या-क्या शीर्षक वाले, पढ़ते हुए पाया जा सकता है. इनसे सम्पर्क का कोई अन्य स्रोत नहीं है. मोबाइल पड़ोसी की है. बी.बी.सी. की खबरें रोज सुनते हैं. गाँव के लोग
इन्हें आवारा कहते हैं, चरवाहे नाम से इन्होंने अवधी और हिन्दी में कई कविताएं लिखी हैं, जो अप्रकाशित हैं. - सं. (दखल की दुनिया)]
 

मिस्त्र-ट्यूनीशिया के बरक्स जनक्रान्ति की भारतीय चुनौती

सुनील

तुम हमें रोक नहीं सकते। मुझे उठा लो, मेरे साथियों को उठा लों! हमें जेल में डाल दो! मार दो! जो भी तुम करना चाहते हो, करो! हम अपना देश वापस ले रहे है। तुम लोगो ने 30 सालों से इस देश को बर्बाद किया है। बस, बहुत हो चुका है। बहुत हो गया! बहुत हो गया!

ये शब्द थे मिस्त्र के ताजा जन-विद्रोह के एक युवा नेता वेल घोनिम के, जो उसने उपराष्ट्रपति द्वारा आंदोलन के खिलाफ फौज के इस्तेमाल की धमकी देने पर एक टीवी साक्षात्कार में कहे। गूगल इंटरनेट कंपनी का यह अधिकारी एक दिन पहले ही जेल से बाहर आया था। मिस्त्र में उत्तेजना, जोश, युवाशक्ति और देशभक्ति का यह अभूतपूर्व ज्वार आखिरकार रंग लाया और 30 सालों से मिस्त्र पर एकछत्र राज कर रहे तानाशाह होस्नी मुबारक को गद्दी छोड़कर एक टापू में शरण लेना पड़ा। इसके पहले ट्यूनीशिया के तानाशाह बेन अली को जनशक्ति के आगे देश छोड़कर भागना पड़ा।

हालांकि अभी भी दोनों देशों की सत्ता अमरीका-परस्त फौज के हाथ में है और भविष्य अनिश्चित है, फिर भी वहां की जनशक्ति की यह बड़ी जीत है। यह तय हो गया है कि वहां लोकतंत्र कायम होगा और सरकार कोई भी बने, वह जनभावनाओं की उपेक्षा नहीं कर सकती । सबसे बड़ी बात यह हुई है कि आम जनता निडर बन गई है और उसे अपनी शक्ति का अहसास हो गया है। जनता की इन दो जीतों का पूरे अरब विश्व में बिजली की माफिक जबरदस्त असर हुआ है। वहां भी तानाशाह सरकारों के खिलाफ प्रदर्शन हो रहे है। अरब देशों की मुस्लिम जनता सिर्फ इस्लामी कट्टरपंथ के आह्वान पर ही कुछ करती है, यह भ्रान्ति भी दूर हुई है।

पूंजीवाद पर संकट की छाया

अरब परिघटना – सवाल सिर्फ़ तानाशाही का नहीं है

अशोक कुमार पाण्डेय

पहले ‘उत्तरी अफ़्रीका के हांगकांग’ कहे जाने वाले ट्यूनीशिया और अब अरब क्षेत्र में अमरीकी साम्राज्यवाद के सबसे विश्वस्त सहयोगी मिस्र में पिछले दिनों हुई घटनाओं ने पूरी दुनिया को हिला कर रख दिया है। जहाँ ट्यूनीशिया के तानाशाह बेन अली को देश छोड़ कर भागना पड़ा, वहीं मिस्र में होस्नी मुबारक़ द्वारा मंत्रिमण्डल में व्यापक फेरबदल के बावज़ूद लाखों की जनता सड़कों पर है और वह मुबारक़ के सत्ता छोड़े जाने से पहले वापस लौटने के मूड में नहीं लग रही। इन लड़ाईयों ने अब निर्णायक रूप ले लिया है और स्थिति लगातार विस्फोटक बनी हुई है।  दशकों से सत्ता में बने हुए इन शासकों के प्रति जनता का जबर्दस्त गुस्सा सिर्फ़ तानाशाही के प्रति नहीं है। पश्चिमी और पूंजीवादी मीडिया इस पूरी परिघटना को केवल ‘चुनाव आधारित लोकतंत्र के समर्थन में तानाशाही के ख़िलाफ़ जनाक्रोश’ के रूप में दिखाने का प्रयास कर रहा है। इसके पीछे उन जगहों पर पुराने शासकों की जगह अपने समर्थन वाले नये चेहरों को स्थापित करने की मंशा भी है कि जिससे वहाँ अमेरीकी नेतृत्व वाले साम्राज्यवाद के हित सुरक्षित रह सकें। लेकिन हक़ीक़त यह है कि इस आक्रोश की जड़ें गहरी हैं और सीधे-सीधे नव उदारवादी नीतियों के उन घातक तथा विभाजनकारी परिणामों से जुड़ी हुई हैं जिनके स्पष्ट धब्बे हम अपने देश की आर्थिक-सामाजिक व्यवस्था में भी देख सकते हैं।

मिस्र में सफल रही जनता की क्रांति,राष्ट्रपति होस्नी मुबारक ने दिया इस्‍तीफा

(जनपक्ष से साभार)

मिस्र में करीब 15 दिन से चल रही जनता की ‘क्रांति’ रंग ला चुकी है। मिस्र में 30 साल से सत्ता में काबिज रहे राष्ट्रपति ने आखिरकार आंदोलनकारियों के सामने घुटते टेक दिए। उन्होंने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है।राष्‍ट्रपति हुस्‍नी मुबारक को लेकर खबर आ रही है कि वह देश छोड़ चुके हैं और सत्‍ता उप राष्‍ट्रपति के हवाले कर गए हैं।

उपराष्‍ट्रपति ने आज मुबारक के इस्‍तीफे की घोषणा कर दी। इससे पहले जनता ने राष्‍ट्रपति महल की ओर मार्च किया। इसी बीच सेना ने कहा है कि वे देश से आपातकाल हटाने को राजी हैं और जैसे ही स्थितियां सामान्य होंगीं, आपातकाल हटा लिया जाएगा।

मुबारक के पद छोड़ते ही पूरे देश में जश्न का माहौल है। इससे पूर्व मुबारक पर पद छोड़ने को लेकर चारों तरफ से दबाव बढ़ रहा था।

ईरान के प्रेस टीवी ने खबर दी कि हुस्नी मुबारक मिस्र छोड़कर भाग गए हैं। अपुष्ट खबरों के मुताबिक मुबारक के साथ सेना प्रमुख भी शर्म-एल-शेख के रेड-सी रिसॉर्ट में हैं।

उधर अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा भी मिस्र के हालात पर नजर रखे हुए थे। वहां की आम जनता को देश की सेना का भी समर्थन मिला हुआ था। इसकी वजह से ना चाहते हुए भी मुबारक को अपने पद से इस्तीफा देने के लिए बाध्य होना पड़ा।

इससे पूर्व शुक्रवार को ही हुस्नी मुबारक राजधानी काहिरा छोड़कर अज्ञात स्थान के लिए रवाना हो गए थे। समाचार एजेंसी डीपीए के मुताबिक राष्ट्रपति महल से मुबारक हेलीकॉप्टर से अज्ञात स्थान के लिए रवाना हुए। ऐसा माना जा रहा है कि वे शर्म-अल-शेख के रेड सी रिसोर्ट गए होंगे।

उल्लेखनीय है कि वर्ष 1981 से सत्ता पर काबिज मुबारक पर पद छोड़ने का चौतरफा दबाव बढ़ गया था।मिस्र में 82 वर्षीय मुबारक के 30 साल पुराने शासन को खत्म करने के लिए लाखों प्रदर्शनकारी 25 जनवरी से आंदोलन कर रहे हैं।

उनके इस्तीफे की मांग को लेकर पिछले दो सप्ताह से देशव्यापी आंदोलन जारी है। राजधानी काहिरा का तहरीर चौक पिछले 25 जनवरी से आंदोलन का केंद्र बना हुआ था।

संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक 25 जनवरी के बाद से विरोध प्रदर्शनों में देश में अब तक 300 लोगों की मौत हो चुकी है।

जो सवाल पत्रकारीय कौशल में दफन हो गये

पुण्य प्रसून बाजपेयी

रेलगाडी पर हज़ारों की तादाद में चीटिंयो और चूहों की तरह अंदर बाहर समाये बेरोज़गार नवयुवकों को देखकर आंखों के सामने पहले ढाका में मज़दूरों से लदी ट्रेन रेंगने लगी जो हर बरस ईद के मौके पर नज़र आती है। वही जब बेरोज़गार युवकों से पटी ट्रेन पटरी पर रेंगने लगी और कुछ देर बाद ही 19 की मौत की खबर आयी तो 1947 में विभाजन की त्रासदी के दौर में खून से पटी रेलगाडियों की कहानी और द्दश्य ही जेहन में चलने लगा। कई राष्ट्रीय न्यूज़ चैनलों के स्‍क्रीन पर भी यही दृश्य चलते हुये भी दिखायी दिये ... और यूपी में देशभर के लाखों बेरोज़गारो की बेबाकी सी चलती भी स्क्रीन पर रेंगती तस्वीरो के साथ ही दफन हो गयी। यानी कोई सवाल पत्रकारीय माध्यमों में कहीं नहीं उठा कि सवा चार सौ धोबी-नाई-कर्मचारी की नियुक्ति के लिये बरेली पहुंचे सवाल चार लाख बेरोज़गारों की ज़िन्दगी ऐसे मुहाने पर क्यों आ कर खडी हुई है जहां ढाई से साढ़े तीन हज़ार की आईटीबीपी को नौकरी भी मंजूर है। ना अखबार ना ही न्यूज़ चैनलों ने बहस की कि जो बेरोज़गार मारे गये वह सभी किसान परिवार से ही क्यों थे। किसी ने गांव को शहर बनाने की मनमोहनइक्नामिक्स की ज़िद पर सवाल खड़े कर यह नहीं पूछा कि सवा चार लाख बेरोज़गारों में साढ़े तीन लाख से ज़्यादा बेरोज़गार किसान परिवार के ही क्यों थे। यह सवाल भी नहीं उठा कि कैसे विकास के नाम पर किसानी खत्म कर हर बरस किसान परिवार से इस तरह आठवीं पास बेरोज़गारों में सत्तर लाख नवयुवक अगली रेलगाड़ी पर सवार होने के लिये तैयार हो रहे हैं।

मिस्र से उठी जम्हूरी हवा!

गिरीश मिश्र

उम्मीद-आशंकाओं के बीच : ट्यूनीशिया से शुरू हुई जनविद्रोह की धमक ने मिस्र को पूरी तरह से अपने आगोश में ले लिया है. मिस्र में जिस तरह से राजधानी काहिरा, सुएज, अलेक्जेंडिन्या समेत अनेक शहरों में लाखों लोग सड़कों पर रैली की शक्ल में उतरे और राष्‍ट्रपति हुस्नी मुबारक के तीन दशक के शासन के खात्मे की मांग की, उसने दुनिया भर में अनेक सर्वसत्तावादी तानाशाही तंत्रों को भयभीत कर दिया है.

खबर है कि जार्डन के राजा अब्दुल्लाह ने भी अपने प्रधानमंत्री रिफाई को हटा दिया है. उनकी जगह पूर्व जनरल और सैन्य सलाहकार मारुफाल बखीत को नया प्रधानमंत्री बनाया है और शासन में अनेक सुधारों की बात कही है. फलस्तीन में भी नए चुनाव कराने की बात शासन स्तर पर उठ रही है. वहां पांच साल पहले चुनाव हुए थे. सीरिया में भी फेसबुक और ट्विटर पर राष्‍ट्रपति असद की मुखालफत शुरू हो गई है और राजधानी दमिश्क में विरोध मार्च की चर्चा सुर्खियों में है. ट्यूनीशिया के राष्‍ट्रपति के सऊदी अरब भागने के बाद से ही पड़ोसी राष्‍ट्र अल्जीरिया, यमन में भी गरीबी, तानाशाही, भ्रष्टाचार, कुव्यवस्था के विरोध के साथ ही लोकतांत्रिक आजादी की मांग जोर पकड़ रही है. लेबनान और अन्य देश भी इस जम्हूरी हवा के असर से अछूते नहीं हैं. लेकिन ये तो रही पड़ोसी देशों की बात, दिलचस्प तो ये है कि चीन, रूस और ईरान जैसे तानाशाही तंत्र भी अब सकते में हैं. चीन में वेब पर नियंत्रण और बढ़ा दिया गया है. ईरान में 2009 में राष्‍ट्रपति अहमदीनेजाद के फिर राष्‍ट्रपति बनने पर हुए जन विरोध को फिर से हवा मिल गई है. आगामी 12 फरवरी को वहां भी छात्रों की रैली का आयोजन है. इसी तरह रूसी राष्‍ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन को हटाए जाने की आवाज रूस में भी उठनी शुरू हो गई है.

राजनीति की बारीक समझ को टी वी न्यूज़ का स्थायी भाव बनाना पड़ेगा

शेष नारायण सिंह

मिस्र में जनता सडकों पर है. अमरीकी हुकूमत की समझ में नहीं आ रहा है कि क्या करे. दुविधा की स्थिति है. होस्नी मुबारक का जाना तो तय है लेकिन उनकी जगह किसको दी जाए, यह अमरीका की सबसे बड़ी परेशानी है. मुबारक ने जिस पुलिस वाले को अपना उपराष्ट्रपति तैनात किया है, उसको अगर गद्दी देने में अमरीका सफल हो जाता है तो उसके लिए आसानी होगी लेकिन उसके सत्ता संभालने के बाद अवाम को शांत कर पाना मुश्किल होगा. जिस तरह से भ्रष्ट सत्ता को उखाड़ फेंकने के लिए लोग सड़क पर उतरे हैं, उनके तेवर अलग हैं. लगता नहीं कि वे आसानी से बेवक़ूफ़ बनाए जा सकते हैं.
 
अमरीका की सबसे बड़ी चिंता यह है कि इस्लामी बुनियादपरस्त लोग सत्ता पर काबिज़ न हो जाएँ. अगर ऐसा हुआ तो अमरीकी विदेश नीति का एक मज़बूत किला ज़मींदोज़ हो जाएगा. काहिरा के तहरीर चौक पर जो दस लाख से भी ज्यादा लोग मंगलवार को दिन भर जमे रहे वे सरकार बदलने आये थे, लॉलीपाप खरीदने नहीं. दिलचस्प बात यह है कि मिस्र की फौज भी अब जनता के जायज़ आन्दोलन को समर्थन दे रही है. उसने साफ़ कह दिया है कि निहत्थे लोगों पर हथियार नहीं चलाये जायेगें. नतीजा यह हुआ कि मुबारक के हुक्म से तहरीर चौक पर फौजी टैंक तो लगा दिए गए लेकिन उनसे आम तौर पर जो दहशत पैदा होती है वह गायब थी. लोग टैंकों को भी अपना मान कर घूम रहे थे. फौज और सुरक्षा बलों के इस रुख के कारण जनता में संघर्ष की कोई बात नज़र नहीं आ रही थी. लगता था कि मेला लगा हुआ है और लोग पूरे परिवार के साथ तहरीर चौक पर पिकनिक का आनंद ले रहे हैं.
 
लेकिन बुधवार को हालात बिगड़ गए. मुबारक ने ऊंटों और घोड़ों पर सवार अपने गुंडों को तहरीर चौक पर मार पीट करने के लिए भेज दिया. आरोप तो यह भी है कि वे पुलिस वाले थे और सादे कपड़ों में आये थे. उनको हिदायत दी गयी थी कि तहरीर चौक पर जो अवाम इकठ्ठा है उसे मार पीट कर भगाओ. ज़ाहिर है कि पिछले दस दिनों से जो कुछ भी काहिरा में हो रहा है वह सत्ता से पंगा लेने की राजनीति का नया उदाहरण है. जिस लोकशाही की बात बड़े-बड़े विचारकों ने की है, उसी का एक नया आयाम है.
 
इस सारे प्रकरण में बी बी सी, अल जजीरा,अल अरबिया और सी एन एन के टेलिविज़न कैमरों की रिपोर्टिंग देखने का मौक़ा मिला.

मिस्र में अमरीकी विदेशनीति की अग्नि परीक्षा की घड़ी

शेष नारायण सिंह

काहिरा के तहरीर चौक पर आज लाखों लोग जमा हैं और हर हाल में सत्ता पर कुण्डली मारकर बैठे तानाशाह से पिंड छुडाना चाहते हैं. जहां तक मिस्र की जनता का सवाल है, वह तो अब होस्नी मुबारक को हटाने के पहले चैन से बैठने वाली नहीं है लेकिन अमरीका का रुख अब तक का सबसे बड़ा अडंगा माना जा रहा है. बहरहाल अब तस्वीर बदलती नज़र आ रही है. शुरुआती हीला हवाली के बाद अब अमरीका की समझ में आने लगा है कि मिस्र में जो जनता उठ खडी हुई है उसको आगे भी बेवक़ूफ़ नहीं बनाया जा सकता. अब लगने लगा है कि अमरीकी विदेशनीति के प्रबन्धक वहां के तानाशाह, होस्नी मुबारक को कंडम करने के बारे में सोचने लगे हैं. यह अलग बात है अभी सोमवार तक विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन इसी चक्कर में थीं कि मिस्र में सत्ता परिवर्तन ही हो. यानी अमरीकी हितों का कोई नया चौकी दार तैनात हो जाए जो होस्नी मुबारक का ही कोई बंदा हो कहीं. मुबारक मिस्र से हटकर कहीं और बस जाएँ और मौज की ज़िंदगी बिताते रहें.

मिस्र में अब ताज उछाले जायेगें, तख़्त गिराए जायेगें

शेष नारायण सिंह

मिस्र के राष्ट्रपति, होस्नी मुबारक की विदाई का वक़्त करीब आ पंहुचा है. लगता है अब वहां  ज़ुल्मो-सितम के कोहे गिरां रूई की तरह उड़ जायेगें. विपक्ष की आवाज़ बन चुके, संयुक्त राष्ट्र के पूर्व उच्च अधिकारी मुहम्मद अल बरदेई ने साफ़ कह दिया है कि होस्नी मुबारक को फ़ौरन गद्दी छोडनी होगी और चुनाव के पहले एक राष्ट्रीय सरकार की स्थापना भी करनी होगी. पिछले तीस साल से अमरीका की कृपा से इस अरब देश में राज कर रहे मुबारक को मुगालता हो गया था कि वह हमेशा के लिए हुकूमत में आ चुके हैं. लेकिन अब अमरीका को भी अंदाज़ लग गया है कि कि होस्नी मुबारक को मिस्र की जनता अब बर्दाश्त करने को तैयार नहीं है. तहरीर चौक पर जुट रहे लोगों को अब किसी का डर नहीं है. राष्ट्रपति मुबारक, फौज के सहारे राज करते  आ रहे हैं लेकिन लगता है कि अब फौज भी उनके साथ नहीं है. तहरीर चौक में कई बार ऐसा देखा  गया कि अवाम फौजी अफसरों को हाथों  हाथ ले रही है. यह इस बात का संकेत है कि अब फौज समेत पूरा देश बदलाव चाहता है.

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लेखक विषय संवाद साभार अनुवादक

पहले वो आए साम्यवादियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं साम्यवादी नहीं था

 

फिर वो आए मजदूर संघियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं मजदूर संघी नहीं था

 

फिर वो यहूदियों के लिए आए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं यहूदी नहीं था

 

फिर वो आए मेरे लिए

और तब तक बोलने के लिए कोई बचा ही नहीं था

 

मार्टिन नीमोलर (1892-1984)