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डायन

 

डायन है सरकार फिरंगी, चबा रही हैं दांतों से,
छीन-गरीबों के मुहं का है, कौर दुरंगी घातों से।
जिस तरह से एक समय में फिरंगी सरकार डायन थी उसी तरह से आज महंगाई डायन हो गयी है. उस फिरंगी सरकार और वर्तमान सरकार के बीच कई दशकों का फासला है लेकिन अभिव्यक्ति के स्वर और उनके आयाम नही बदले. आखिर इस सरकार और महंगाई के लिए कोई पुरुष उपमा भी तो दी जा सकती थी ?

इधर मैकाले उधर गांधी

सुनील

पिछले दिनों मुझे केरल में त्रिशूर के पास एक स्कूल में जाने का मौका मिला। देश में चल रहे स्कूलों से यह काफी अलग था। करीब पांच एकड़ जमीन में जंगल है, बगीचा है, खेत है और स्कूल भी है। कक्षाओं के लिए खुला शेड है जिस पर खपरैल या नारियल के पत्तों की छत है। बच्चे कक्षा में पढ़ने के अतिरिक्त खेत और बगीचे में भी काम करते हैं। मेरा स्वागत एक नारियल के पानी से किया गया और बाद में वहीं लगे केले मैंने खाए। स्कूल के बच्चों के साथ मेरी सभा का संचालन एक वरिष्ठ छात्रा ने किया। सबसे पहले छात्राओं के एक समूह ने एक गीत से स्वागत किया जो कई भारतीय भाषाओं में था। मैंने उनसे पूछा कि मैं हिन्दी में बोलूं या अंग्रेजी में, तो ज्यादा बच्चों ने हिन्दी के पक्ष में हाथ खड़े किए। इस स्कूल में चार भाषाएं पढ़ाई जाती हैं – मलयालम, हिन्दी, अंग्रेजी और अरबी। शिक्षा का माध्यम अंग्रेजी है। क्यों, मैंने पूछा तो स्कूल संचालक ने बताया कि वे केन्द्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड का पाठ्यक्रम पढ़ाते हैं और उसमें मलयालम माध्यम का प्रावधान नहीं है। फिर भी वे तीसरी कक्षा तक मलयालम में पढ़ाते हैं। एक कारण शायद यह भी होगा कि पालक भी अंग्रे्जी माध्यम में शिक्षा चाहते हैं। फिर भी हिन्दी पर उनका बहुत आग्रह है । संचालक ने मुझसे कहा कि अच्छे हिन्दी शिक्षक खोजने में मैं कुछ मदद करुं। इस स्कूल का संचालन एक मुस्लिम दंपत्ति कर रहे हैं। किन्तु बच्चे सभी धर्मों के हैं और सभी धर्मों के प्रति आदर के भाव पर आग्रह है।

बच्चों की जागरुकता के स्तर से मैं काफी प्रभावित हुआ। मैंने उनसे पूछा कि वे बड़े होकर क्या बनना चाहते हैं तो जबाव मिला कि अच्छे नागरिक और अच्छा इंसान। मुझे शंका हुई कि कहीं यह सिखाया हुआ जवाब तो नहीं है। किन्तु जल्दी ही स्पष्ट हो गया कि ऐसा नहीं है। मेरे वक्तव्य के बाद उनके सवाल पूछने की बारी थी, तो एक ने पूछा, राष्ट्रीय आय की वृद्धि दर अच्छी होने पर भी देश की हालत खराब क्यों है ? बाद में दो छात्राओं ने मुझसे देर तक बात की। वे इरोम शर्मिला के बारे में जानती थी। किन्तु क्या उत्तर-पूर्व से सशस्त्र बल विशेष शक्ति कानून हटाना उचित होगा, एक ने मुझसे पूछा। उत्तर-पूर्व, कश्मीर, माओवाद आदि पर फिर विस्तार से बात हुई।

बीबीसी रेडियो से अब हिन्दी खबरें नहीं आयेगीं

शेष नारायण सिंह

ब्रिटिश ब्राडकास्टिंग कारपोरेशन के कई सेक्शन बंद किये जा रहे हैं. दुर्भाग्य की बात यह है कि हिन्दी सर्विस में भी बंदी का ऐलान कर दिया गया है. इसका  मतलब  यह हुआ कि बीबीसी  रेडियो की हिंदी सर्विस को मार्च के अंत में बंद  कर दिया जाएगा. बीबीसी की हिन्दी सेवा का बंद होना केवल एक व्यापारिक फैसला नहीं है. यह संस्कृति को प्रभावित करने वाला इतिहास का ऐसा मुकाम है जिसकी धमक बहुत दिनों तक महसूस की जायेगी. हालांकि इस बात में भी दो राय नहीं है  कि बीबीसी की हिंदी सर्विस ने अपना वह मुकाम खो दिया है जो उसको पहले हासिल था...

पहले के दौर में बीबीसी की ख़बरों का भारत में बहुत सम्मान किया जाता था.१९७५ में जब इमरजेंसी लगी और भारत की आकाशवाणी  और दूरदर्शन इंदिरा सरकार की ढपली बजाने लगे तो जो कुछ भी सही खबरें इस देश के आम आदमी के पास पंहुचीं वे सब बीबीसी की कृपा  से ही  पंहुचती थीं. इसके अलावा भी देश के हिन्दी भाषी इलाकों में रेडियों के श्रोताओं का एक बहुत बड़ा वर्ग  है जिसकी रोज़मर्रा की ज़िंदगी में बीबीसी रेडियो पर हिन्दी खबरें सुनना  एक ज़रूरी  काम की तरह है. उत्तर  प्रदेश और बिहार में पढ़े लिखे लोगों का एक बहुत बड़ा वर्ग है जिसके लिए कोई भी सूचना खबर नहीं बनती जब तक कि उसे बीबीसी पर न सुन लिया जाए. इस तरह की संस्था का बंद होना निश्चित रूप से इस देश के लिए दुःख की बात है.

राष्ट्रवाद और हिंदी समुदाय - 3

प्रसन्न कुमार चौधरी

हिंदी समुदाय, नवजागरण और राष्ट्रवाद के विभिन्न पहलुओं पर ध्यान खींचनेवाले इस लंबे लेख की तीसरी  और आखिरी किस्त पोस्ट करते हुए हाशिया अभी राष्ट्रीय और औपनिवेशिक संस्कृति पर जारी बहस में भी शामिल हो रहा है. आगे हम इस बहस से जुड़ी कुछ और सामग्री भी पोस्ट करेंगे और इसी के साथ अपना नजरिया भी पेश करेंगे. फिलहाल यह लेख, हंस से साभार.

राष्ट्रवाद और हिंदी समुदाय - 2

प्रसन्न कुमार चौधरी

हाशिया पर राष्ट्र, आधुनिकता, समुदाय और इतिहास पर प्रसन्न कुमार चौधरी के लम्बे लेख कि पहली किस्त पोस्ट की गयी थी. अब इसकी दूसरी किस्त पेश कि जा रही है. तीन किस्तों में इस लेख का प्रकाशन हंस में हुआ है, जिसे हम भाई रणेंद्र के सौजन्य से यहाँ साभार पेश कर रहे हैं. 
 

राष्ट्रवाद और हिंदी समुदाय - 1

प्रसन्न कुमार चौधरी

राष्ट्र, आधुनिकता, समुदाय और इतिहास लंबे समय से विवादग्रस्त विषय रहे हैं. प्रस्तुत लेख हिंदी समुदाय और उससे संबंधित इतिहास की पृष्ठभूमि की टोह में इन अवधारणाओं से पुनः दो-चार होते हुए इस संबंध में नई सोच को प्रस्तावित करता है। इस लेख की कई स्थापनाओं से बहस व असहमतियां हो सकती हैं. हम उन बहसों और असहमतियों को सार्थक चर्चा के लिए आमंत्रित करते हैं। -संपादक, हंस

राष्ट्र, राष्ट्र-राज्य और राष्ट्रवाद

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लेखक विषय संवाद साभार अनुवादक

पहले वो आए साम्यवादियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं साम्यवादी नहीं था

 

फिर वो आए मजदूर संघियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं मजदूर संघी नहीं था

 

फिर वो यहूदियों के लिए आए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं यहूदी नहीं था

 

फिर वो आए मेरे लिए

और तब तक बोलने के लिए कोई बचा ही नहीं था

 

मार्टिन नीमोलर (1892-1984)