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फिरकापरस्ती

Fundamentalism

इन्द्रेश कुमार आरएसएस के सेक्युलर दोस्त

धीरेश सैनी

[लेखक ने यहाँ एक बहुत महत्वपूर्ण मुद्दा उठाया है जिससे शायद और भी बहुतों (इस संपादक सहित) का वास्ता पड़ा होगा, लेकिन इस पर अभी शायद पर्याप्त रुप से गौर नहीं किया गया है।]

'पार्टनर तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है?' जैसे सवाल अधिकतर लोगों को हमेशा ही असुविधाजनक लगते आये होंगे, पर इन दिनों हमारे 'वामपंथी', 'गांधीवादी' और 'डेमोक्रेटिक' साथियों को ऐसे सवाल पूरी तरह फिजूल नज़र आने लगे हैं. वैसे भी करियरवादी दौर में खुलकर फलने-फूलने के लिये गैर-आलोचनात्मक संबध ही मुफ़ीद साबित होते हैं. कलावाद की आड़ में छुपकर दक्षिणपंथ की मदद करने वाले भी शायद बदले वक़्त पर हैरान होंगे कि कैसे सब कुछ 'खुला खेल फर्रुखाबादी' की तर्ज़ पर होने लगा है. इन्टरनेट की दुनिया ने ऐसी दोस्तियों की दुनिया को अभूतपूर्व विस्तार दिया है. ब्लॉग, फेसबुक और ऐसी दूसरी `सोशल` साइट्स में एक हत्यारा और एक गांधीवादी मजे-मजे में साथ रहते हैं, एक क्रांतिकारी वामपंथी जाने-अनजाने आसानी से एक दक्षिणपंथी आतंकवादी का दोस्त हो सकता है. मतलब इस नई 'सामाजिकता' में सब कुछ संभव है.

इशरत जहाँ मुठभेड़ मामले में नया मोड़

(साभार बीबीसी हिंदी)

गुजरात पुलिस ने इशरत जहाँ और तीन अन्य को चरमपंथी संगठन लश्कर का सदस्य बताकर उन्हें कथित मुठभेड़ में मार दिया था.

गुजरात पुलिस मुठभेड़ की नए सिरे से छानबीन कर रहे विशेष जांच दल के एक सदस्य ने कहा है कि 2004 इशरत जहाँ और तीन दूसरे लोगों का मुठभेड़ फ़र्ज़ी था.

शुक्रवार को गुजरात हाई कोर्ट में इस मामले पर एक लम्बी दलील पेश करते हुए सीनियर पुलिस अधिकारी सतीश वर्मा ने कहा कि इस मामले में एक नई प्राथिमिकी यानी एफ़आईआर दर्ज होनी चाहिए.

पहले हुए एक न्यायिक जांच में भी ये बात सामने आई थी कि 2004 में आतंकवादी बताकर इन लोगों को जिस तरह से मारा गया था वह मुठभेड़ फ़र्ज़ी थी. लेकिन अदालत ने उस रिपोर्ट पर रोक लगा दी थी.

सतीश वर्मा उस तीन सदस्यीय विशेष जांच दल के सदस्य हैं जो गुजरात उच्च न्यायालय के आदेश पर पिछले साल बनाई गई थी.

दो जजों की खंडपीठ के सामने एक हलफ़नामे में सतीश वर्मा ने कहा,"अभी तक सामने आए साक्ष्य उन बातों को नकारते हैं जो एफआईआर में कही गई हैं."

सबूत

उन्होनें इसके सबूत के तौर पर पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट और दूसरे तथ्यों को अदालत के सामने रखा.

जाँच दल के सदस्य का कहना था कि इशरत जहाँ और तीन अन्य के शरीर से निकाली गई गोली उस पिस्तौल से मेल नहीं खाती जिसका इस्तेमाल पुलिस के अनुसार मुठभेड़ के दौरान किया गया था.

सतीश वर्मा का कहना था कि पुलिस ने इन चारों को ये कहकर मारा था कि ये लोग गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की हत्या के इरादे से गुजरात आए थे लेकिन इस बात का कोई सबूत पेश नहीं किया जा सका कि ये ख़बर पुलिस को किस आधार पर, कहाँ और कैसे मिली.

हालांकि अदालत की कार्रवाई के सामने जांच दल के भीतर की फूट भी सामने आई.

दोनों जजों ने इस मामले में हाई कोर्ट के वरिष्ठ वकील योगेश लखानी को अदालत का दोस्त मुक़र्रर कर दिया है जो जाँच दल के बीच के मतभेदों पर बीच-बचाव करेंगें.


(दखल की दुनिया से साभार)

कला के लिए कला और प्रतिरोध

ऑड्री लॉर्ड

प्रतिरोध को मैं हमारी ज़िंदगियों की विभीषिकाओं, विसंगतियों को महसूस करने हेतु किसी को उत्साहित करने वाले जेनुइन साधन के तौर पर देखती हूँ. सामाजिक प्रतिरोध कहता है कि जिस तरह हम जी रहे हैं, हमेशा उस तरह जीना ज़रूरी नहीं है. अगर हम खुद शिद्दत से महसूस करते हैं, और शिद्दत से महसूस करने के लिए खुद को और औरों को उत्साहित करते हैं, तो बदलाव लाने के हमारे उत्तरों का बीज हमें मिल जाएगा. क्योंकि जब आप जान जाते हैं कि जिसे आप महसूस कर रहे हैं
वह क्या है, जब आप जान जाते हैं तो आप शिद्दत से महसूस कर सकते हैं, शिद्दत से प्यार कर सकते हैं, ख़ुशी महसूस कर सकते हैं, और फिर हम मांग करेंगे कि हमारी ज़िंदगियों के सभी हिस्से वैसी ख़ुशी पैदा करें. और अगर ऐसा नहीं होगा तो हम पूछेंगे,"ऐसा क्यों नहीं हो रहा है?" और यह पूछना ही अनिवार्यतः हमें बदलाव की तरफ ले जाएगा.
 
इसलिए सामाजिक प्रतिरोध और कला मेरे लिए अभिन्न हैं. मेरे लिए कला के लिए कला का वास्तव में कोई अस्तित्व नहीं है. 'ईदर' कला 'ऑर' प्रतिरोध जैसी कोई बात नहीं है. मैंने जिस बात को गलत पाया, मुझे उसके खिलाफ बोलना ही था. मैं कविता से प्यार करती थी, मैं शब्दों से प्यार करती थी. पर जो सुन्दर था उसे मेरी ज़िन्दगी को बदलने का मकसद पूरा करना था, वरना मैं मर जाती. इस पीड़ा को अगर मैं व्यक्त नहीं कर सकती और उसे बदल नहीं सकती, तो मैं ज़रूर उस पीड़ा से मर जाउंगी. और यही सामाजिक प्रतिरोध का आग़ाज़ है.
 
("ऑड्री लॉर्ड", ब्लैक वूमन राइटर्स एट वर्क . संपा: क्लॉडिया टेट.  न्यू योंर्क: कॉन्टिनम, 1983,पृ. 100-106.)

(जनपक्ष से साभार)

फासीवाद, साम्प्रदायिकता और दलितजन

मुकेश मानस

हिन्दुस्तान के दलित समुदायों के लिए सांप्रदायिकता और फासीवाद एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। दोनों एक दूसरे से अभिन्न रूप से जुड़े हुए हैं। कहना चाहिए कि दोनों एक दूसरे के पूरक हैं। हिन्दुस्तान का इतिहास इस बात का साक्षात प्रमाण है। मौजूदा हालात में तो इन दोनों को अलग करके देखा ही नहीं जा सकता है।

फिर भी ऐसे लोगों की संख्या कम नहीं है जो जानते-बूझते हुए इन दोनों को अलग-अलग खानों में रखकर देखते हैं। कुछ लोग अपनी सीमाओं के कारण ऐसा कर जाते हैं। विस्तृत अध्ययन, व्यावहारिक अनुभव की कमी, दलितों के संबंध में भारतीय इतिहास की आधी-अधूरी जानकारी और संकुचित नज़रिए के कारण ये लोग ऐसा करते हैं। कई बार इन चीजों पर चलताऊ ढंग से कुछ कहने या लिखने के कारण भी ऐसा हो जाता है। मुझे यह कहने में कोई गुरेज नहीं है कि ऐसे लोगों में दलित राजनीतिज्ञ और विचारक भी बड़ी संख्या में शामिल हैं।

अमरीका में रंगभेद की शुरुआत

हावर्ड ज़िन

[बर्बर दास प्रथा मानवता पर एक धब्बा रही है। रंगभेद और नस्लभेद के रूप में इसके अवशेष आज भी मौजूद हैं। सत्रहवीं सदी के शुरू में अफ़्रीकी काले लोगों को दास बनाकर वर्जीनिया (अमेरिका) ले जाया गया। वहाँ उनकी खरीद-फ़रोख्त का व्यापार होता था। वहाँ पहुँचने, बिकने और फिर दासता करने की निहायत निकृष्ट और अमानवीय स्थितियों का ब्यौरा, 'संयुक्त राज्य का जनवादी इतिहास' पुस्तक से उद्घृत इस अंश में दिया गया है। यहाँ, आज तक चली आ रही काले और गोरे के बीच की नफ़रत के स्रोत दास प्रथा की शुरुआत में तलाशने की कोशिश की गई है। उन ऐतिहासिक कारणों का भी पता लगाया गया है जिनके चलते गरीब काले और गोरे आपस में एकजुट होकर अपनी हालत के खिलाफ विद्रोह नहीं कर सके।]

[पत्रिका सांचा में मई 1989 को प्रकाशित]

कितना गहरा खोदेंगे हम?

अरुंधती रॉय

अभी हाल ही में एक युवा कश्मीरी मित्र से मेरी बात हो रही थी कश्मीर में जीवन के बारे में। राजनीतिक बिकाऊपन और अवसरवादिता के बारे में, सुरक्षा बलों की असंवेदनशील क्रूरता, हिंसा से सरोबार समाज की रिसती पनपती सीमाओं के बारे में, जहाँ हथियारबंद कट्टरपंथी, पुलिस, गुप्तचर सेवाओं के अधिकारी, सरकारी अफ़सर, व्यापारी, यहाँ तक कि पत्रकार भी एक दूसरे का सामना करते हैं और धीरे-धीरे, समय के साथ, एक दूसरे जैसे बन जाते हैं। उसने बात की अंतहीन हत्याओं के बारे में, 'खो चुके' लोगों की बढ़ती हुई संख्या के बारे में, कानाफूसी के बारे में, उन अफ़वाहों के बारे में जिनका कोई जवाब नहीं देता

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लेखक विषय संवाद साभार अनुवादक

पहले वो आए साम्यवादियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं साम्यवादी नहीं था

 

फिर वो आए मजदूर संघियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं मजदूर संघी नहीं था

 

फिर वो यहूदियों के लिए आए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं यहूदी नहीं था

 

फिर वो आए मेरे लिए

और तब तक बोलने के लिए कोई बचा ही नहीं था

 

मार्टिन नीमोलर (1892-1984)