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स्विस बैंक में जमा काले धन का राज खोलेगी विकीलीक्‍स

17 जनवरी, 2010

(भड़ास4मीडिया से साभार)

विकीलीक्‍स जल्‍द ही स्विस बैंकों में काला धन छिपाने वाले सफेदपोशों का पर्दाफाश करेगा. स्विस बैंक में कालेधन से जुड़ी अहम जानकारियां जल्‍द ही विकीलीक्‍स पर उपलब्‍ध हो सकती है. स्विट्जरलैंड की जूलियस बेअर बैंक के पूर्व अधिकारी रूडोल्‍फ एल्‍मर ने लंदन में कहा है कि वे लगभग दो हजार ऐसे ग्राहकों की सूची विकीलीक्‍स को सौंप देंगे जो कर चोरी एवं काले धन को इकट्ठा करने में शामिल हैं.

यह रहा बिनायक सेन को उम्र कैद देनेवाला ‘बनाना रिपब्लिक’

आनंद प्रधान

लोकतंत्र, न्याय और मानवाधिकारों का इससे बड़ा मजाक और क्या हो सकता है

"और, तब मुझे प्रतीत हुआ भयानक
गहन मृतात्माएँ इसी नगर की
हर रात जुलूस में चलतीं,
परन्तु दिन में
बैठती हैं मिलकर करती हुई षड्यंत्र
विभिन्न दफ्तरों-कार्यालयों, केन्द्रों में, घरों में,
हाय,हाय! मैंने देख लिया उन्हें नंगा,
इसकी मुझे और सजा मिलेगी."

(डा. बिनायक सेन को सजा दिए जाने पर आक्रोश जाहिर करते हुए अपने मित्र और लेखक आशुतोष कुमार ने मुक्तिबोध की ये पंक्तियां फेसबुक पर डाली है. वहीँ से साभार.)
 

जैसीकि आशंका थी, मानवाधिकार कार्यकर्ता और बाल रोग विशेषज्ञ डा. बिनायक सेन को रायपुर की स्थानीय अदालत ने देशद्रोह और राज्य के खिलाफ हिंसक तख्ता पलट के लिए षड्यंत्र करने जैसे आरोपों में उम्र कैद की सजा सुना दी. अरुंधती राय ने सही कहा कि क्या विडम्बना है कि भोपाल गैस कांड में हजारों बेकसूरों के नरसंहार के दोषियों को दो साल की सजा और डा. बिनायक सेन को उम्र कैद? आश्चर्य नहीं कि इस फैसले ने पूरे देश की अंतरात्मा को झकझोर दिया है. न्याय, लोकतंत्र और मानवाधिकारों में यकीन रखनेवाले लोग सदमे में हैं.

सचमुच, लोकतंत्र, न्याय और मानवाधिकारों के साथ इससे बड़ा मजाक नहीं हो सकता है. आखिर डा. बिनायक सेन का कसूर क्या है? यह कि मेडिकल साइंस की इतनी बड़ी डिग्री लेकर प्रैक्टिस करने और रूपया पीटने के बजाय छत्तीसगढ़ जैसे अत्यंत गरीब राज्य में जाकर सबसे गरीबों की सेवा करना और उन गरीबों की आवाज़ उठाना?

काले कारनामों की अंधेरी कोठरी से निकले सच

संजय द्विवेदी

सूचनाओं ने अपनी मुक्ति के रास्ते तलाश लिए हैं : इन दिनों हम सूचनाओं के एक ऐसे लोकतंत्र में हैं जहां आप उन्हें बांध नहीं सकते। वे आ रही हैं सुनाने हमारे काले कारनामों की कहानियां, उन लौह द्वारों को तोड़कर जो राजसत्ताओं ने बना रखे थे। विकिलीक्स को यूं ही न देखिए। उसकी सूचना की ताकत को देखिए और महसूसिए कि अगले क्षण कौन सी सूचना हमें हिलाकर रख देगी। दुनिया के इस्लामी जगत को तमाम सवालों पर कोसने वाले अमरीकी जनतंत्र के नायक इन खुलासों पर बौखलाए क्यों हैं। वे क्यों जूलियन असांजे के पीछे हाथ धोकर पड़ गए हैं। इसे सोचने की जरूरत है। सूचना व विचारों के जनतंत्र में अगर सलमान रश्दी और तस्लीमा को लेकर इस्लामी अधिनायकवाद गलत है तो अमेरिका की असांजे के मामले में बौखलाहट का आदर कैसे किया जा सकता है। जाहिर तौर पर सूचना एक ऐसे असरदायी हथियार में बदल गयी है कि राजसत्ताएं अपना स्वाभाविक जनतांत्रिक चरित्र भी कायम नहीं रख पा रही हैं।

सूचनाएं अब मुक्त हैं। वे उड़ रही हैं इंटरनेट के पंखों। कई बार वे असंपादित भी हैं, पाठकों को आजादी है कि वे सूचनाएं लेकर उसका संपादित पाठ स्वयं पढ़ें। सूचना की यह ताकत अब महसूस होने लगी है। विकिलीक्स के संस्थापक जूलियन असांजे अब अकेले नहीं हैं, दुनिया के तमाम देशों में सैकड़ों असांजे काम कर रहे हैं। इस आजादी ने सूचनाओं की दुनिया को बदल दिया है। सूचना एक तीक्ष्ण हथियार बन गयी है। क्योंकि वह उसी रूप में प्रस्तुत है, जिस रूप में उसे पाया गया है। ऐसी असंपादित और तीखी सूचनाएं एक असांजे के इंतजार में हैं। ये दरअसल किसी भी राजसत्ता और निजी शक्ति के मायाजाल को तोड़कर उसका कचूमर निकाल सकती हैं। क्योंकि एक असांजे बनने के लिए आपको अब एक लैपटाप और नेट कनेक्शन की जरूरत है। याद करें विकिलीक्स के संस्थापक असांजे भी एक यायावर जीवन जीते हैं। उनके पास प्रायः एक लैपटाप और दो पिठ्ठू बैग ही रहते हैं।

बिनायक के बहाने असहमति के पक्ष में

मसिजीवी

डा. बिनायक सेन अब एक अपरिचित नाम नहीं है। ब्लॉगजगत में ही उनपर कुछ मित्रों ने लिखा है मसलन परवेज साहब ने लिखा, रियाज ने लिखा संजीव तिवारी ने भी लिखा पर जाहिर है हम अपनी चिंताओं व सरोकारों की वरीयताएं स्‍वयं तय करते हैं- इन चिट्ठाकार मित्रों ने इस विषय पर अपनी अलग अलग राय ही रखी है जिसमें जाहिर है असहमतियॉं हैं और गनीमत है कि वे हैं। हाल में नेपकिन विवाद में जब हम चिट्ठाकार असहमतियों को सम्‍मानजनक जगह देने की मांग पर बहस कर रहे थे तभी देश में डा. बिनायक के अधिकारों को लेकर एक बहस जारी थी- ऐसी ही एक साहसी पोस्‍ट डा. सुनील दीपक ने समलैंगिकों के अधिकारों को लेकर पेश की है- चिट्ठाकारी ने अपने दायित्‍व संभालने शुरू कर दिए हैं। इसका श्रेय हमें पसंद हो या न हो हमें सुनीलजी व अविनाश जैसे चिट्ठाकारों को देना होगा जो अपने अपने तरीके से असहमत व विविध की अभिव्‍यक्ति के प्रति कटिबद्ध दिखते हैं।

बिनायक के साथ खड़े न हुए तो हमारे साथ भी यही होगा

शेष नारायण सिंह

 

बिनायक सेन

बिनायक सेन

छत्तीसगढ़ में रायपुर की एक अदालत ने मानवाधिकार नेता डॉ. बिनायक सेन को आजीवन कारावास की सज़ा सुना दी. पुलिस ने डॉ. सेन पर कुछ मनगढ़ंत आरोप लगाए हैं लेकिन उन पर असली मामला यह है कि उन्होंने छत्तीसगढ़ रियासत के शासकों की भैंस खोल ली है. बिनायक सेन बहुत बड़े डाक्टर हैं, बच्चों की बीमारियों के इलाज़ के जानकार हैं. किसी भी बड़े शहर में क्‍लीनिक खोल लेते तो करोड़ों कमाते और मौज करते.

शासक वर्गों को कोई एतराज़ न होता. छतीसगढ़ का ठाकुर भी बुरा न मानता, लेकिन उन्हें पता नहीं क्या भूत सवार हुआ कि वे पढ़ाई-लिखाई पूरी करके छत्तीसगढ़ पहुंच गए और गरीब आदमियों की मदद करने लगे. उन्हें गरीब आदमियों की मदद करनी थी तो छत्तीसगढ़ के बाबू साहेब से मिलते और सलवा जुडूम टाइप किसी सामजिक संगठन में भर्ती हो जाते. गरीब आदमी की मदद भी होती और शासक वर्ग के लोग खुश भी होते, लेकिन उन्होंने राजा के खिलाफ जाने का रास्ता चुना और असली गरीब आदमियों के पक्षधर बन गए. केसरिया रंग के झंडे के नीचे काम करने वाले छत्तीसगढ़ के राजा को यह बात पसंद नहीं आई और जब उनकी चाकर पुलिस ने फर्जी आरोप पत्र दाखिल करके उन्हें जेल में भर्ती करवा दिया है तो देश भर में लोकतंत्र और नागरिक आज़ादी की बात करने वाले आग-बबूला हो गए हैं और अनाप-शनाप बक रहे हैं.

जूलियन असांज के समर्थन में

जॉन पिल्जर

08 दिसंबर, 2010

ऑर्वेल की प्रस्तावना 'ऐनिमल फ़ार्म' के लिए

रॉबर्ट वीवर

[जॉर्ज आर्वेल ने अपने प्रसिद्ध उपन्यास 'ऐनिमल फ़ार्म' के लिए एक प्रस्तावना लिखी थी, जिसे छापा नहीं गया और पुस्तक के साथ अब भी नहीं छापा जाता। प्रस्तुत है रॉबर्ट वीवर की टिप्पणी ऑर्वेल के जीवन तथा इस प्रस्तावना के बारे में। ऑर्वेल की प्रस्तावना को भी शीघ्र ही पेश करेंगे।]

राष्ट्रवाद और हिंदी समुदाय - 3

प्रसन्न कुमार चौधरी

हिंदी समुदाय, नवजागरण और राष्ट्रवाद के विभिन्न पहलुओं पर ध्यान खींचनेवाले इस लंबे लेख की तीसरी  और आखिरी किस्त पोस्ट करते हुए हाशिया अभी राष्ट्रीय और औपनिवेशिक संस्कृति पर जारी बहस में भी शामिल हो रहा है. आगे हम इस बहस से जुड़ी कुछ और सामग्री भी पोस्ट करेंगे और इसी के साथ अपना नजरिया भी पेश करेंगे. फिलहाल यह लेख, हंस से साभार.

तस्लीमा नसरीन तथा अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता

अरुंधती रॉय

13 फरवरी, 2008

मैं चाहूंगी कि इस मुद्दे पर ग़ौर करते समय हम विशेष सतर्कता बर्तें। ख़ास कर तस्लीमा नसरीन के मुद्दे को हमें एकतरफा लेन्स अर्थात् केवल 'धार्मिक कट्टरवाद' तथा धर्म-निरपेक्ष उदारवाद के बीच टकराव के रूप में नहीं देखना चाहिए। हालांकि स्वंय तस्लीमा नसरीन ने भी इस प्रकार के दृष्टिकोण को प्रतिपादित किया है। अपने वेबसाइट में एक जगह वह लिखती हैं - 'मानवजाति को एक अनिश्चित भविष्य का सामना करना पड़ रहा है - विशेष रूप से टकराव दो अत्यंत अलग विचारधाराओं, धार्मिक कट्टरवाद तथा धर्मनिरपेक्षता के बीच है'। मेरे विचार में यह टकराव दरअसल बौद्धिक और तार्क

मीडिया और भीड़ पर वक्तव्य

अरुंधती रॉय

1 नवंबर, 2010

नई दिल्ली, 31 अक्टूबर: करीब सौ लोगों की एक भीड़ मेरे घर पर आज सुबह 11 बजह पहुँची (रविवार 31 अक्टूबर 2010)। उन्होंने गेट तोड़ दिया और सामान की तोड़-फोड़ की। उन्होंने कश्मीर के बारे में मेरे विचारों के खिलाफ़ नारे लगाए, और मुझे एक सबक सिखाने की धमकी दी।

एन डी टी वी, टाइम्स नाओ तथा न्यूज़ 24 की ओ बी वैनें पहले से ही घटना का सीधा प्रसारण करने के लिए तैयार थीं। टी वी रिपोर्टों का कहना है कि भीड़ में मुख्यत: भाजपा के महिला मोर्चे के सदस्य थे।

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लेखक विषय संवाद साभार अनुवादक

पहले वो आए साम्यवादियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं साम्यवादी नहीं था

 

फिर वो आए मजदूर संघियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं मजदूर संघी नहीं था

 

फिर वो यहूदियों के लिए आए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं यहूदी नहीं था

 

फिर वो आए मेरे लिए

और तब तक बोलने के लिए कोई बचा ही नहीं था

 

मार्टिन नीमोलर (1892-1984)