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एक राबिया के विरोध में पुलिस और पूरी व्यवस्था

रजनीश प्रसाद

[राबिया के विरोध में, राडिया के नहीं। वैसे वो व्यस्त भी तो होंगे देशद्रोहियों के खिलाफ़ लड़ाइयाँ लड़ने में। हिंसा को रोकने का सवाल है, जनतंत्र को बचाने का सवाल है। और बहुत से सवाल हैं इसी तरह के। फुर्सत कहाँ है।]

दिल्ली उच्च न्यायालय ने पुलिस, वकीलों और व्यापारियों के गठजोड़ से लगभग पांच वर्ष से लगातार बलात्कार की शिकार राबिया के मामले में पुलिस आयुक्त को कार्रवाई करने का निर्देश दिया है। राबिया के मामले में महिला आयोग, पुलिस के उच्चाधिकारियों, गृह मंत्रालय से सुनवाई नहीं किये जाने की स्थिति में राबिया ने उच्च न्यायालय को एक पत्र लिखा था और उसी पत्र के आधार पर पुलिस आयुक्त को कार्रवाई करने का निर्देश दिया गया है। यह जानकारी जागृति महिला समिति की अध्यक्ष निर्मला शर्मा ने संवाददाता सम्मेलन में दी। इस मौके पर पीड़िता भी मौजूद थी।

संवाददाताओं के सामने अपनी दर्दनाक दास्तां बताते हुए राबिया ने कहा कि वह उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर जिले के निम्न मध्यवर्ग के परिवार की है। 12वीं कक्षा पास करने के बाद सन 2002 से 2004 तक कंप्यूटर ट्रैनिंग, सिलाई कढ़ाई, ब्यूटी पार्लर आदि की ट्रेनिंग लेती रही। जनवरी 2005 में राबिया फैशन डिजायनिंग का कोर्स करने का सपना लिये दिल्ली आयी और संस्थान में दाखिले के लिए गयी। लेकिन फैशन डिजायनिंग का सेशन जून/जुलाई से शुरू होना था। इसी बीच राबिया की नजर एक हिंदी अखबार के टेली कालर के जॉब के विज्ञापन पर पड़ी। इस जॉब के सिलसिले में उसे प्रीतमपुरा के टूईन टॉवर में साजन इंटर प्राइजेज में मिलना था। उसे प्रोपराइटर सुरेंद्र बिज उर्फ साहिल खत्री ने कोई भी नियुक्ति पत्र या करारनामा नहीं दिया। वहीं से 18-19 साल की राबिया के जीवन की बर्बादी शुरू हो गयी। दो माह काम करने पर प्रोपराइटर उर्फ मालिक ने उसे मात्र तीन हजार रूपये वेतन दिये। राबिया ने इतने कम वेतन की स्थिति में नौकरी छोड़ने को कहा तो प्रोपराइटर ने राबिया को रहने के लिए जगह का ऑफर दिया। राबिया 20 अप्रैल 2005 प्रोपराइटर द्वारा दिये गये फ्लोर सी-27, ओम अपार्टमेंट 33/77 पंजाबी बाग में अपने सामान के साथ शिफ्ट हो गयी। उस फ्लोर पर पहले से ही एक लड़की रह रही थी।

आजकल न्याय भी बिकता है

प्रशांत भूषण से प्रशांत दुबे की बातचीत

देश में औसतन हर रोज एक नये घोटाले के इस दौर में अधिकांश भारतीय भ्रष्टाचार पर बात करते हैं लेकिन उच्चतम न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता और मानवाधिकार कार्यकर्ता प्रशांत भूषण ऐसे लोगों से अलग हैं. वे केवल बात करने में यकीन नहीं करते. यही कारण है कि वे पिछले दो दशक से भ्रष्टाचार के खिलाफ हरसंभव लड़ाई लड़ रहे हैं. उन्होंने न्यायपालिका के अंदर की गंदगी को सार्वजनिक करने का काम किया, आम जनता की वाहवाही बटोरी और न्यायपालिका की आंख की किरकिरी भी बने. भ्रष्टाचार में डूबी न्यायपालिका के एक वर्ग ने आंखें तरेरी और प्रशांत भूषण पर मुकदमे भी दर्ज कराये गये. ये और बात है कि प्रशांत भूषण इन मुकदमों के बाद और उत्साह से अपने काम में जुट गये. यहां पेश है हाल ही में उनसे की गई बातचीत के अंश.

 

क्या आज के दौर में आम आदमी को न्याय मिलने की उम्मीद आप करते हैं ?

देखिये, यह एक विचित्र दौर है जबकि विकास दर तो 9 प्रतिशत पर पहुंच गई है लेकिन 10 वर्षों में 2 लाख से ज्यादा किसानों ने आत्महत्या की है. विश्व के 10 सबसे अमीर लोगों में 4 हिन्दुस्तानी हैं लेकिन अर्जुन सेनगुप्ता कमेटी की रिपोर्ट के मुताबिक देश की 77 फीसदी जनता 20 रूपये प्रतिदिन से कम पर जीवन यापन कर रही है. विकास दर और गरीबी में सीधा-सीधा जुड़ाव है. यदि गरीबी इतनी है तो विकास दर बढ़ कैसे रही है? इसका सीधा जवाब यह है कि यह विकास दर इस देश के प्राकृतिक संसाधनों को बेच-बेचकर लाई जा रही है. देश का 1 ट्रिलियन डॉलर पैसा स्विस बैंकों में रखा है. prashant-bhushan

यह कहना मुश्किल है कि आज के इस दौर में आम आदमी को न्याय मिल ही जाये. आजकल न्याय भी बिकता है, जिसकी जेब में पैसा है, वह न्याय का हकदार है बाकी सभी तो न्याय की आस लगाये रहते हैं. यह अंकल जज का जमाना है. न्यायपालिका भी भ्रष्ट हो रही है, दीमक तो उसमें भी लग चुकी है. पूरी व्यवस्था पर, पूरा कब्जा इन कारपोरेट घरानों का है.

लडने वाला समाज अपनी भाषा भी गढ़ता चलता है

अनामिका से चन्दन राय का संवाद

जब कोई समाज युध्दरत होता है, तो वह उसकी अस्मिता की लडाई होती है। उसकी भाषा में संघर्ष की चेतना होती है, एक तरह का ओज होता है। चाहे तो आप अफ्रीकी समाज की भाषा ही देख लें। वहां की बोली जानेवाली अंग्रेजी और ब्रिटिश अंग्रेजी या क्विन्स अंग्रेजी कह लें, में अंतर मिल जाएगा

कविता की ओर झुकाव आपने कब महसूस किया? घर के परिवेश का क्या असर आप महसूस करती हैं?

बचपन में पिताजी के साथ अंत्याक्षरी खेलती थी। पिताजी हमेशा मुझे हरा देते थे। मैं भी हार से बचने के लिए कुछ जोर-आजमाईश करने लगी थी। पिताजी ने भी लिखने के लिए प्रोत्साहित किया। नई डायरी लाई गई और खेल-खेल में ही कविता शुरू हो गई।

बाल्यावस्था का दौर काफी राजनीतिक रूप से उथल-पुथल भरा रहा होगा। आपातकाल, जयप्रकाश नारायण और लोहिया का दौर था वह। क्या उस राजनीतिक माहौल का भी कुछ असर रहा?

जनकवि दुर्गेन्द्र अकार से भेंट

सुधीर सुमन

कहें कवि दुर्गेंद्र अकारी...

[कविता के लिए जिन्होंने सब कुछ किया, पूरी जिन्दगी उसे दी, जनता ने उसे पाला पोसा, अपना बनाया और सर आँखों पर रखा. कहानी जैसी लगती इस बात के प्रमाण हैं दुर्गेन्द्र अकारी. उनसे रोचक मुलाक़ात की सुधीर सुमन ने, यह रपट समकालीन जनमत से साभार - सं. (कारवाँ)]

पिछली गर्मियों में आरा पहुँचने पर मालूम हुआ कि जनकवि दुर्गेंद्र अकारी जी की तबीयत आजकल कुछ ठीक नहीं रह रही है। साथी सुनील से बात की, तो वे झट बोले कि उनके गांव चला जाए। उनकी बाइक से हम जून माह की बेहद तीखी धूप में अकारी जी के गांव पहुंचे। लोगों से पूछकर उस झोपड़ीनुमा दलान में हम पहुंचे, जिसकी दीवारें मिट्टी की थीं और छप्पर बांस-पुआल और फूस से बना था। एक हिस्से में दो भैंसे बंधी हुई थीं। दूसरे हिस्से में एक खूंटी पर अकारी जी का झोला टंगा था। एक रस्सी पर मच्छरदानी और कुछ कपड़े झूल रहे थे। दीवार से लगकर दो साइकिलें खड़ी थीं और बीच में एक खाली खाट, लेकिन अकारी जी गायब। हम थोड़े निराश हुए कि लगता है कहीं चले गए। फिर एक बुजर्ग शख्स आए। मालूम हुआ कि वे उनके भाई हैं। उन्होंने बताया कि अकारी गांव में ही हैं। खैर, तब तक एक नौजवान उन्हें पड़ोस से बुलाकर ले आया। उसके बाद उनसे हमने एक लंबी बातचीत की, जिसके दौरान हमें भोजपुर के क्रांतिकारी कम्युनिस्ट आंदोलन के इतिहास की झलक तो नजर आई ही, एक सीधे स्वाभिमानी गरीब नौजवान के संघर्षशील जनता का कवि बनने की दास्तान से भी हम रूबरू हुए।

नहीं तो मारे जाते रामचंद्र गुहा !

हिमांशु  कुमार

[आप विश्वास करेंगे कि ख्याति  प्राप्त इतिहासकार, लेखक और बुद्धिजीवी रामचंद्र गुहा को छत्तीसगढ़ के एक पुलिस थाने के भीतर नक्सली सिद्ध कर दिया गया और उनको मारने की तैयारी कर ली गयी थी...  - सं. (जनज्वार)]
 
[विडंबना शब्द इस बात के लिए बहुत हल्का है कि रामचंद्र गुहा बड़े ही सक्रिय रूप से माओवादियों के खिलाफ़ लिखते रहे हैं। - सं. (सह-संचार)]

अभी देश में सरकारी भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज़ उठाने वालों को नक्सली,माओवादी और आतंकवादी कह कर डरा कर चुप कराने का जोरदार धंधा चल रहा है.और हमारे देश का मध्यवर्ग जो बिना मेहनत किये ऐश की ज़िंदगी जी रहा है वो सरकार के इस झूठे प्रचार पर विश्वास करना चाहता है ताकि कहीं ऐसी स्थिति ना आ जाए जिसमें ये हालत बदल जाए और मेहनत करना ज़रूरी हो जाए.

इसलिए बराबरी ओर गरीबों के लिए आवाज़ उठाने वाले मारा जा रहा है या झूठे मुकदमें बना कर जेलों में डाल दिया गया है.लेकिन क्या आप विश्वास करेंगे की अंतर्राष्ट्रीय ख्याती प्राप्त इतिहासकार,लेखक और बुद्धिजीवी रामचंद्र गुहा को एक पुलिस थाने के भीतर नक्सली सिद्ध कर दिया गया और उनको मारने की तैयारी कर ली गयी थी.



अमेरिकी पुलिस का लोकतंत्र

अनिल सिन्हा

अमेरिकी सैनिकों की बर्बरता व क्रूरता से आज पूरी दुनिया परिचित है। ऐसा शायद ही कोई दिन होता हो जब अमेरिकी सैनिक दुनिया के किसी न किसी हिस्से में अपने करतब न दिखा रहे हों। दरअसल उनका प्रशिक्षण ही ऐसा है कि उन्हें ट्रिगर, बैरल, बम राकेट आदि के सामने जो भी दिखाई देता है, चाहे वह आदमी हो या प्रांतर, उसे उड़ा देना है, उसे नेस्तनाबूद कर देना है। यह ट्रेनिंग उन्हें तब से मिलती आ रही है जब कोलम्बस ने अमेरिका की खोज की थी और वहां के मूल निवासियों को नेस्तनाबूद करते हुए ब्रितानी, मेक्सिकन आदि साम्राज्यवादियों के लिए यहां का रास्ता खोल दिया था। हॉवर्ड जिन जैसे अमेरिकी लेखक ने इस स्थिति को बड़े प्रमाणिक और तथ्यपूर्ण ढंग से अपनी किताब ‘पीपुल्स हिस्ट्री आफ अमेरिका’ में लिखा है। सैनिकों की बात छोड़ दें तो अमेरिकी पुलिस और जितनी तरह के सुरक्षाकर्मी हैं, जैसे- इमिग्रेशन आफिसर, रेल पुलिस, सिविल पुलिस आदि कानून लागू करने के नाम पर हिंसा और बर्बरता की हद पार करते हुए दिखाई देते हैं। फोमांट (कैलीफोर्निया, अमेरिका) से लौटते हुए मुझे कुछ महीने बीत गए हैं, पर वहां की पुलिस की बर्बरता मेरी आंखों के सामने बार बार नाच उठती है। किस हद तक जातीय द्वेष-

सस्ती नैनो – मंहगा खेल

सुनील

कुछ बरस पहले भारत के प्रमुख उद्योगपति रतन टाटा ने यह घोषणा करके धमाका-सा किया था कि वे भारत के निम्न मध्यम वर्ग के लिए एक लाख रु. वाली कार बनाएंगे। यह दुनिया की सबसे सस्ती कार होगी और सबसे कम ईंधन-खर्च वाली कार होगी। इसे ‘नैनो’ नाम दिया गया, जिसका शाब्दिक अर्थ है सूक्ष्म या अति सूक्ष्म। अभी तक इसका उपयोग एक तरह की नवीनतम तकनालॉजी – ‘नैनो टेक्नोलॉजी’ - को बताने के लिए किया जाता रहा है।

इस लखटकिया कार को पूंजीवाद और भूमंडलीकरण के चमत्कार के रुप में पेश किया गया। किस तरह से इनके फायदे धीरे-धीरे नीचे तक पहुंचेंगे, इसकी मिसाल के रुप में भी इसे पेश किया गया। किन्तु पश्चिम बंगाल में इस नैनो कार के कारखाने के लिए कोलकाता से 45 कि.मी. दूर सिंगूर नामक स्थान पर जब किसानों की जमीन का अधिग्रहण किया जाने लगा, तो जबरदस्त विरोध खड़ा हो गया। टाटा की नैनो कार परियोजना विवादों में फंस गई। जहां पश्चिम बंगाल की वाम मोर्चा सरकार इसे वहां के औद्योगीकरण का एक महत्वपूर्ण सोपान मान रही थी, वहीं कई लोगों ने औद्योगीकरण के इस समूचे मॉडल पर ही सवाल खड़े किए। सिंगूर और नन्दीग्राम आधुनिक भारत में विकास और औद्योगीकरण से जुड़े द्वन्द्व तथा संघर्षों का प्रतीक बन गए।

आखिरकार टाटा को सिंगूर से इस कारखाने को हटाने और गुजरात ले जाने का फैसला करना पड़ा। बाद में धीरे-धीरे यह तथ्य सामने आने लगा कि पश्चिम बंगाल सरकार ने इस परियोजना के लिए कितने बड़े पैमाने पर अनुदान, करों में छूट और मदद देने का समझौता किया था। इस गजब की सस्ती कार के ‘सस्तेपन’ के रहस्य की परतें अब धीरे- धीरे खुल रही हैं।