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कला

कला, सच और राजनीति

हैरॉल्ड पिंटर

07 दिसंबर, 2005

1958 में मैने यह लिखा था:

"कोई चीज़ सच या झूठ में से एक ही हो ऐसा कोई ज़रूरी नहीं है; एक ही चीज़ सच और झूठ दोनों एक साथ हो सकती है। वास्तविक और अवास्तविक के बीच कोई ठोस अंतर नहीं है, ना ही जो सच है और जो झूठ है उसके बीच।"

मेरा मानना है कि ये बातें कुछ मायने रखती हैं और अब भी कला के द्वारा वास्तविकता की खोज पर लागू होती हैं। इसलिए एक लेखक होने के नाते तो मैं इनका समर्थन करता हूँ पर बतौर एक नागरिक मैं ऐसा नहीं कर सकता। एक नागरिक के तौर पर मुझे पूछना पड़ेगा: सच क्या है? झूठ क्या है?

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लेखक विषय संवाद साभार अनुवादक

पहले वो आए साम्यवादियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं साम्यवादी नहीं था

 

फिर वो आए मजदूर संघियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं मजदूर संघी नहीं था

 

फिर वो यहूदियों के लिए आए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं यहूदी नहीं था

 

फिर वो आए मेरे लिए

और तब तक बोलने के लिए कोई बचा ही नहीं था

 

मार्टिन नीमोलर (1892-1984)