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एशिया प्रशांत

Asia Pacific

विकीलीक्स का सही इस्तेमाल किया गया तो देश की राजनीति का बहुत भला होगा

शेष नारायण सिंह

[हम बस यहाँ इतना जोड़ना चाहेंगे कि विकीलीक्स के काम के पीछे अकेले जूलियन असांज ही नहीं, और भी बहुत से लोग हैं, सबसे महत्वपूर्ण तो वे जिन्होंने दस्तावेज़ उपलब्ध करवाए। विकीलीक्स से बाहर भी उनके बहुत से समर्थक हैं। एक समय तक तो मुख्यधारा का मीडिया भी उनकी सराहना ही कर रहा था और उनके द्वारा सार्वजनिक किए गए दस्तावेज़ों का बड़े ज़ोर-शोर से उपयोग कर रहा था। अमरीका का मीडिया भी। फिर विकीलीक्स ने कुछ ऐसा कर डाला कि 'अपनी टीम' और 'अपने लोगों' के विरोध में चला गया। ऐसा लगने लगा कि 'अपन' भी घेरे में आ जाएंगे। ऐसा होते ही 'न्यूयॉर्क टाइम्स' तो क्या 'द गार्जियन' तक का राग बदल गया और जूलियन असांज हीरो से विलन बन गए। लेकिन विकीलीक्स के दस्तावेज़ों का उपयोग अब भी हो रहा है और उनकी जीवनी पर पहले किताब और फिर किताब पर आधारित फिल्म से पैसा कमाने में उन्हीं लोगों को परहेज नहीं है। उधर जूलियन असांज एक तरह से नज़रबंद हैं आने वाले खतरे के इंतज़ार मेंऔर ब्रैडले मैंनिंग के ऊपर मृत्युदंड का खतरा मंडरा रहा है (उन्हें लगातार दी जा रही गैर-कानूनी यातना के अलावा)। शर्ली जैकसन के अंदाज़ में कहें तो अच्छी खेती (मानव) बलि मांग रही है। दूसरे ढंग से कहें तो शहीद बनाने का मौसम है। पर दस्तावेज़ों का इस्तेमाल हो रहा है, यह भी कम नहीं है। उम्मीद तो कर ही सकते हैं कि इससे कुछ अच्छा बदलाव आए। उम्मीद करने के लिए हाल-फिलहाल बहुत ज़्यादा चीज़ें हैं भी नहीं । फिर भी उस सवाल से नज़र बचाना मुश्किल होता जा रहा है जो उधर पीछे अटका हुआ है पर गायब होने का नाम नहीं ले रहा : "है कोई माई का लाल वीर पुरूष जो भ्रष्टाचार का पर्दाफ़ाश करने से आगे जाकर भारत का ब्रैडले मैंनिंग या डैनियल एल्सबर्ग बन सके?"। हम बड़ी कोशिश कर रहे है

अंधेर नगरी के राजा

पुण्य प्रसून बाजपेयी

पहली बार किसी प्रधानमंत्री ने माफी मांगी। पहली बार लोकसभा में विपक्ष के किसी नेता ने माफ भी कर दिया। पहली बार भ्रष्टाचार, महंगाई और कालेधन पर सरकार कटघरे में खड़ी दिखी। पहली बार सुप्रीम कोर्ट ने प्रधानमंत्री से लेकर जांच एंजेसियों को समाजवादी सोच का पाठ यह कर पढ़ाया कि अपराध अपराध होता है। उसमें कोई रईस नहीं होता। पहली बार प्रधानमंत्री के चहेते कारपोरेट घरानों को भी अपराधी की तरह सीबीआई हेडक्वाटर में दस्तक देनी पड़ी। पहली बार चंद महीने पहले तक सरकार के लिये देश के विकास से जुडी डीबी रियल्टी कार्पो सरीखी कंपनी के निदेशक जेल में रहकर पद छोड़ना पड़ा। पहली बार पौने सात साल के दौर में यूपीए में संकट भ्रष्टाचार के खिलाफ हो रही कार्रवाई को लेकर मंडराया। और पहली बार सरकार को बचाने भी वही दल खुल कर आ गया जिसकी राजनीति गैर कांग्रेसी समझ से शुरु हुई। यानी पहली बार देश में यह खुल कर उभरा कि मनमोहन सिंह सिर्फ सोनिया गांधी के रहमो करम पर प्रधानमंत्री बनकर नहीं टिके है बल्कि देश का राजनीतिक और सामाजिक मिजाज भी मनमोहन सिंह के अनुकूल है।

थैंक यू, सुप्रीम कोर्ट

कनक तिवारी

इधर कुछ महीनों से सुप्रीम कोर्ट ने देश की चिंता करने में ज़्यादा सक्रियता बरतने का परिचय दिया है. वैसे वे सब काम कार्यपालिका अर्थात केन्द्र सरकार को ही करने थे. देश की यह हालत है कि मुद्दई सुस्त गवाह चुस्त की तरह आचरण हो रहा है.

न्यायिक सक्रियता का लेकिन बढ़ जाना लोकतंत्र के लिए अच्छा लक्षण नहीं है. इससे धीरे-धीरे न्यायपालिका में भी एक तरह का अधिनायकवाद उभरता रहा है. लेकिन मौज़ूदा हालत यह है कि यदि न्यायतन्त्र ने तन्त्र के अन्याय के खिलाफ लोकतांत्रिक मूल्यों का बचाव नहीं किया तो जनता में भयानक पराजय की भावना पनपने लगेगी. मौजूदा समय में वही एक पुराना कारण राजनेताओं और नौकरशाहों को जुल्मखोर बनाता नज़र आ रहा है क्योंकि भारतीय जनता में इक्कीसवीं सदी में भी अन्याय के खिलाफ उठ खड़े होने का मुनासिब जज्बा दीख ही नहीं रहा है.p-j-thomas

 

केन्द्रीय सतर्कता आयुक्त पी जे थॉमस के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने देश के प्रधानमंत्री और गृहमंत्री के प्रशासनिक-न्यायिक विवेक पर सीधा तमाचा मारा है. शुरू में यह भ्रम फैलाया गया कि तीन सदस्यीय चयन समिति के सामने थॉमस की वह पुरानी फाइल रखी ही नहीं गई जब उनके खिलाफ केरल राज्य के सचिव के रूप में पामोलिन घोटाले में उनका भी नाम अभियुक्तों में संलग्न किया गया था.

 

दो तिहाई दलित बच्चे दसवीं क्लास के पहले ही स्कूल छोड़ने को मजबूर हो जाते हैं

शेष नारायण सिंह

दलितों को शिक्षित करने की दिशा में राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी को केंद्र सरकार ने स्वीकार कर लिया है. संविधान में व्यवस्था है कि दलित भारतीयों के लिए सकारात्मक हस्तक्षेप के ज़रिये समता मूलक समाज की स्थापना की जायेगी. उसके लिए १९५० में संविधान के लागू होने के साथ ही यह सुनिश्व्चित कर दिया गया था कि राजनीतिक नेतृत्व अगर दलितों के विकास के लिए कोई योजनायें बनाना चाहे तो उसमें किसी तरह की कानूनी अड़चन न आये. लेकिन संविधान लागू होने के ६० साल बाद भी अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों को शिक्षा के क्षेत्र में बाकी लोगों के बराबर करने के लिए कोई प्रभावी क़दम नहीं उठाया गया है. सबको मालूम है कि सामाजिक परिवर्तन का सबसे बड़ा हथियार शिक्षा ही है. जिन समाजों में भी बराबरी का माहौल बना है उसमें दलित और शोषित वर्गों को शिक्षित करना सबसे बड़ा हथियार रहा है लेकिन भारत सरकार और मुख्य रूप से केंद्र की सत्ता में रही कांग्रेस सरकार ने दलितों को शिक्षा के क्षेत्र में ऊपर उठाने की दिशा में कोई राजनीतिक क़दम नहीं उठाया है. उनकी जो भी कोशिश रही है वह केवल खानापूर्ति की रही है.

ऐसा लगता है कि १९५० से अब तक कांग्रेस ने दलितों को वोट देने की मशीन से ज्यादा कुछ नहीं समझा. शायद इसीलिये दलितों के वैकल्पिक राजनीतिक नेतृत्व के विकास की आवश्यकता समझी गयी और कुछ हद तक यह काम संभव भी हुआ. दक्षिण में तो यह राजनीतिक नेतृत्व आज़ादी के करीब २० साल बाद ही प्रभावी होने लगा था लेकिन उत्तर में अभी यह बहुत कमज़ोर है. उत्तर प्रदेश में एक विकल्प उभर रहा है लेकिन उसमें भी शासक वर्गों की सामंती सोच के आधार पर ही दलितों के विकास की राजनीति की जा रही है क्योंकि नौकरशाही पर अभी निहित स्वार्थ ही हावी हैं. कई बार तो ऐसा लगता है कि राजनीतिक पार्टियां जब भी दलितों के विकास के लिए कोई काम करती हैं तो यह उम्मीद करती हैं कि दलितों के हित के बारे में सोचने वाली जमातें उनका एहसान मानें. कारण जो भी हों दलितों को शक्तिशाली बनाने के लिए जो सबसे ज़रूरी हथियार शिक्षा का है उस तक अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों की पंहुच अभी सीमित है.

जापान की परमाणु सुरक्षा पर उठे सवाल, भारत को सजग रहना पड़ेगा

शेष नारायण सिंह

जापान में कहर बरपा हुए २ दिन से ज्यादा हो गए हैं.कुदरत ने मुसीबत का इतना बड़ा तूफ़ान खड़ा कर दिया है कि पता नहीं कितने वर्षों में यह दर्द कम होगा. मुसीबत का पैमाना यह है कि अभी तक यह नहीं पता चल पा रहा है कि इस प्रलय में कितने लोगों की जानें गयी हैं. जापान में आये भूकंप और सुनामी ने वहां के लोगों की ज़िंदगी को नरक से भी बदतर बना दिया है. लेकिन इस मुसीबत का जो सबसे बड़ा ख़तरा है उसकी गंभीरता का अंदाज़ लगना अब शुरू हो रहा है. जापान सरकार के एक बड़े अधिकारी ने बताया है कि शुक्रवार को आये भयानक भूकंप में जिन परमाणु बिजली घरों को नुकसान पंहुचा है उनमें से एक में पिघलन शुरू हो गयी है. यह बहुत ही चिंता की बात है. सरकारी प्रवक्ता का यह स्वीकार करना अपने आप में बहुत बड़ी बात है. इसके पहले वाले बिजली घर में भी परमाणु ख़तरा बहुत ही खतरनाक स्तर तक पंहुच चुका है. जापान सरकार के एक प्रवक्ता ने इस बात को स्वीकार भी किया था लेकिन अब अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों के डर से वे बात को बदल रहे हैं. अब वे कह रहे हैं कि शुरू में तो ख़तरा बढ़ गया था लेकिन अब कानूनी रूप से स्वीकृत स्तर पर पंहुच गया है. जापान के मुख्य कैबिनेट सेक्रेटरी , युकिओ एडानो ने रविवार को बताया कि अब फुकुशीमा बिजली घर की समस्या का भी हल निकाल लिया गया है.इन परमाणु संयंत्रों की बीस किलोमीटर की सीमा में अब कोई भी आबादी नहीं है. करीब सत्रह लाख लोगों को इस इलाके से हटा लिया गया है. यह परमाणु संस्थान जापान की राजधानी टोक्यो से करीब २७० किलोमीटर दूर उत्तर की तरफ है. जापान की परेशानी पूरी इंसानियत की परेशानी है.करीब ५० मुल्कों ने जापान को हर तरह से मदद देने का प्रस्ताव भी किया है.अमरीका का सातवाँ बेडा उसी इलाके में ही है ,उसका इस्तेमाल भी बचाव और राहत के काम में किया जा रहा है. सच्ची बात यह है कि जापान को किसी तरह की आर्थिक सहायता की ज़रुरत नहीं है लेकिन इतनी बड़ी मुसीबत के बाद हर तरह की सहायता की ज़रुरत रहती है. ज़ाहिर है जापान इस मुसीबत से बाहर आ जाएगा.

एक राबिया के विरोध में पुलिस और पूरी व्यवस्था

रजनीश प्रसाद

[राबिया के विरोध में, राडिया के नहीं। वैसे वो व्यस्त भी तो होंगे देशद्रोहियों के खिलाफ़ लड़ाइयाँ लड़ने में। हिंसा को रोकने का सवाल है, जनतंत्र को बचाने का सवाल है। और बहुत से सवाल हैं इसी तरह के। फुर्सत कहाँ है।]

दिल्ली उच्च न्यायालय ने पुलिस, वकीलों और व्यापारियों के गठजोड़ से लगभग पांच वर्ष से लगातार बलात्कार की शिकार राबिया के मामले में पुलिस आयुक्त को कार्रवाई करने का निर्देश दिया है। राबिया के मामले में महिला आयोग, पुलिस के उच्चाधिकारियों, गृह मंत्रालय से सुनवाई नहीं किये जाने की स्थिति में राबिया ने उच्च न्यायालय को एक पत्र लिखा था और उसी पत्र के आधार पर पुलिस आयुक्त को कार्रवाई करने का निर्देश दिया गया है। यह जानकारी जागृति महिला समिति की अध्यक्ष निर्मला शर्मा ने संवाददाता सम्मेलन में दी। इस मौके पर पीड़िता भी मौजूद थी।

संवाददाताओं के सामने अपनी दर्दनाक दास्तां बताते हुए राबिया ने कहा कि वह उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर जिले के निम्न मध्यवर्ग के परिवार की है। 12वीं कक्षा पास करने के बाद सन 2002 से 2004 तक कंप्यूटर ट्रैनिंग, सिलाई कढ़ाई, ब्यूटी पार्लर आदि की ट्रेनिंग लेती रही। जनवरी 2005 में राबिया फैशन डिजायनिंग का कोर्स करने का सपना लिये दिल्ली आयी और संस्थान में दाखिले के लिए गयी। लेकिन फैशन डिजायनिंग का सेशन जून/जुलाई से शुरू होना था। इसी बीच राबिया की नजर एक हिंदी अखबार के टेली कालर के जॉब के विज्ञापन पर पड़ी। इस जॉब के सिलसिले में उसे प्रीतमपुरा के टूईन टॉवर में साजन इंटर प्राइजेज में मिलना था। उसे प्रोपराइटर सुरेंद्र बिज उर्फ साहिल खत्री ने कोई भी नियुक्ति पत्र या करारनामा नहीं दिया। वहीं से 18-19 साल की राबिया के जीवन की बर्बादी शुरू हो गयी। दो माह काम करने पर प्रोपराइटर उर्फ मालिक ने उसे मात्र तीन हजार रूपये वेतन दिये। राबिया ने इतने कम वेतन की स्थिति में नौकरी छोड़ने को कहा तो प्रोपराइटर ने राबिया को रहने के लिए जगह का ऑफर दिया। राबिया 20 अप्रैल 2005 प्रोपराइटर द्वारा दिये गये फ्लोर सी-27, ओम अपार्टमेंट 33/77 पंजाबी बाग में अपने सामान के साथ शिफ्ट हो गयी। उस फ्लोर पर पहले से ही एक लड़की रह रही थी।

आजकल न्याय भी बिकता है

प्रशांत भूषण से प्रशांत दुबे की बातचीत

देश में औसतन हर रोज एक नये घोटाले के इस दौर में अधिकांश भारतीय भ्रष्टाचार पर बात करते हैं लेकिन उच्चतम न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता और मानवाधिकार कार्यकर्ता प्रशांत भूषण ऐसे लोगों से अलग हैं. वे केवल बात करने में यकीन नहीं करते. यही कारण है कि वे पिछले दो दशक से भ्रष्टाचार के खिलाफ हरसंभव लड़ाई लड़ रहे हैं. उन्होंने न्यायपालिका के अंदर की गंदगी को सार्वजनिक करने का काम किया, आम जनता की वाहवाही बटोरी और न्यायपालिका की आंख की किरकिरी भी बने. भ्रष्टाचार में डूबी न्यायपालिका के एक वर्ग ने आंखें तरेरी और प्रशांत भूषण पर मुकदमे भी दर्ज कराये गये. ये और बात है कि प्रशांत भूषण इन मुकदमों के बाद और उत्साह से अपने काम में जुट गये. यहां पेश है हाल ही में उनसे की गई बातचीत के अंश.

 

क्या आज के दौर में आम आदमी को न्याय मिलने की उम्मीद आप करते हैं ?

देखिये, यह एक विचित्र दौर है जबकि विकास दर तो 9 प्रतिशत पर पहुंच गई है लेकिन 10 वर्षों में 2 लाख से ज्यादा किसानों ने आत्महत्या की है. विश्व के 10 सबसे अमीर लोगों में 4 हिन्दुस्तानी हैं लेकिन अर्जुन सेनगुप्ता कमेटी की रिपोर्ट के मुताबिक देश की 77 फीसदी जनता 20 रूपये प्रतिदिन से कम पर जीवन यापन कर रही है. विकास दर और गरीबी में सीधा-सीधा जुड़ाव है. यदि गरीबी इतनी है तो विकास दर बढ़ कैसे रही है? इसका सीधा जवाब यह है कि यह विकास दर इस देश के प्राकृतिक संसाधनों को बेच-बेचकर लाई जा रही है. देश का 1 ट्रिलियन डॉलर पैसा स्विस बैंकों में रखा है. prashant-bhushan

यह कहना मुश्किल है कि आज के इस दौर में आम आदमी को न्याय मिल ही जाये. आजकल न्याय भी बिकता है, जिसकी जेब में पैसा है, वह न्याय का हकदार है बाकी सभी तो न्याय की आस लगाये रहते हैं. यह अंकल जज का जमाना है. न्यायपालिका भी भ्रष्ट हो रही है, दीमक तो उसमें भी लग चुकी है. पूरी व्यवस्था पर, पूरा कब्जा इन कारपोरेट घरानों का है.

एनिवन कैन बी अ फेमिनिस्ट

गुंजेश

फ्रांस की जो स्थिति 1949 में थी, पश्चिमी समाज उन दिनों जिस आर्थिक और सामाजिक परिवर्तन के दौर से गुज़र रहा था, वह शायद हमारा आज का भारतीय समाज है, उसका मध्यम वर्ग है, नगरों और महानगरों में बिखरी हुई स्त्रियाँ हैं, जो संक्रमण के दौर से गुज़र रहीं हैं”। (डॉ. प्रभा खेतान, स्त्री उपेक्षिता)

आठ मार्च अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के रूप में मनाया जाता है। अगर स्कूलों में जिस तरह से लेख लिखना सिखाया जाता है उस भाषा में लिखूँ तो इस दिन महिलाओं के उत्थान, उनकी सामाजिक स्थिति में बेहतरी के लिए किये जाने वाले कार्यों की सराहना की जाती है। कुछ जगहों पर कुछ विशेष कार्यक्रम आयोजित किये जाते हैं। अखबारों में खास तौर से सफलता और चुनौतियों वाले लेख छापे जाते हैं। सामाजिक तौर पर स्थापित स्त्रियों पर रंगा-रंग फीचर भी इस दिन अखबारों के पन्नों पर विशेष रूप से पाये जाते हैं। इसकी शुरुआत हो चुकी है रविवार को एक प्रतिष्ठित अँग्रेजी अखबार ने अपने रविवार के विशेष सप्लिमेंट को आठ मार्च यानी अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के नज़र किया है। इसमें अखबार ने लोगों की राय जाननी चाहिए है कि ‘स्त्रीवाद’ की अब कितनी ज़रूरत रह गई है।

करूणानिधि को धमकाने के लिए कांग्रेस ने 2जी घोटाले की तलवार का इस्तेमाल किया

शेष नारायण सिंह

तमिलनाडु की पार्टी, द्रविड़ मुन्नेत्र कषगम से पिंड छुडाने की कांग्रेस पार्टी की कोशिश ने दिल्ली में राजनीतिक उथल पुथल पैदा कर दी है. शुरू में तो डी एम के वालों को लगा कि मामला आसानी से धमकी वगैरह देकर संभाला जा सकता है लेकिन बात गंभीर थी और कांग्रेस ने डी एम के को अपनी शर्तें मानने के लिए मज़बूर कर दिया. कांग्रेस को अब तमिलनाडु विधान सभा में ६३ सीटों पर लड़ने का मौक़ा मिलेगा लेकिन कांग्रेस का रुख देख कर लगता है कि वह आगे भी डी एम के को दौन्दियाती रहेगी. यू पी ए २ के गठन के साथ ही कांग्रेस ने डी एम के को औकात बताना शुरू कर दिया था लेकिन बात गठबंधन की थी इसलिए खींच खांच कर संभाला गया और किसी तरह सरकार चल निकली. लेकिन यू पी ए के बाकी घटकों और कांग्रेसी मंत्रियों की तरह ही डी एम के वालों ने भी लूट खसोट शुरू कर दिया. बाकी लोग तो बच निकले लेकिन डी एम के के नेता और संचार मंत्री, ए राजा पकडे गए. उनके चक्कर में बीजेपी और वामपंथी पार्टियों ने डॉ मनमोहन सिंह को ही घेरना शूरू कर दिया. कुल मिलाकर डी एम के ने ऐसी मुसीबत खडी कर दी कि कांग्रेस भ्रष्टाचार की राजनीति की लड़ाई में हारती नज़र आने लगी. राजा को हटाया गया लेकिन राजा बेचारा तो एक मोहरा था. भ्रष्टाचार के असली इंचार्ज तो करुणानिधि ही थे. उनकी दूसरी पत्नी और बेटी भी सी बी आई की पूछ-ताछ के घेरे में आने लगे. तमिलनाडु में डी एम के की हालत बहुत खराब है लेकिन करूणानिधि को मुगालता है कि वे अभी राजनीतिक रूप से कमज़ोर नहीं हैं. लिहाजा उन्होंने कांग्रेस को विधान सभा चुनावो के नाम पर धमकाने की राजनीति खेल दी. कांग्रेस ने मौक़ा लपक लिया. कांग्रेस को मालूम है कि डी एम के के साथ मिलकर इस बार तमिलनाडु में कोई चुनावी लाभ नहीं होने वाला है. इसलिए उसने सीट के बँटवारे को मुद्दा बना कर डी एम के को रास्ता दिखाने का फैसला कर लिया लेकिन डी एम के को गलती का अहसास हो गया और अब फिर से सुलह की बात शुरू हो गयी. डी एम के के नेता अभी सोच रहे है कि कुछ विधान-सभा की अतिरिक्त सीटें देकर कांग्रेस से करूणानिधि के परिवार के लोगों के खिलाफ सी बी आई का शिकंजा ढीला करवाया जा सकता है. लेकिन खेल इतना आसान नहीं है. कांग्रेस ने बहुत ही प्रभावी तरीके से करूणानिधि एंड कंपनी को औकात बोध करा दिया है.

लडने वाला समाज अपनी भाषा भी गढ़ता चलता है

अनामिका से चन्दन राय का संवाद

जब कोई समाज युध्दरत होता है, तो वह उसकी अस्मिता की लडाई होती है। उसकी भाषा में संघर्ष की चेतना होती है, एक तरह का ओज होता है। चाहे तो आप अफ्रीकी समाज की भाषा ही देख लें। वहां की बोली जानेवाली अंग्रेजी और ब्रिटिश अंग्रेजी या क्विन्स अंग्रेजी कह लें, में अंतर मिल जाएगा

कविता की ओर झुकाव आपने कब महसूस किया? घर के परिवेश का क्या असर आप महसूस करती हैं?

बचपन में पिताजी के साथ अंत्याक्षरी खेलती थी। पिताजी हमेशा मुझे हरा देते थे। मैं भी हार से बचने के लिए कुछ जोर-आजमाईश करने लगी थी। पिताजी ने भी लिखने के लिए प्रोत्साहित किया। नई डायरी लाई गई और खेल-खेल में ही कविता शुरू हो गई।

बाल्यावस्था का दौर काफी राजनीतिक रूप से उथल-पुथल भरा रहा होगा। आपातकाल, जयप्रकाश नारायण और लोहिया का दौर था वह। क्या उस राजनीतिक माहौल का भी कुछ असर रहा?

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लेखक विषय संवाद साभार अनुवादक

पहले वो आए साम्यवादियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं साम्यवादी नहीं था

 

फिर वो आए मजदूर संघियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं मजदूर संघी नहीं था

 

फिर वो यहूदियों के लिए आए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं यहूदी नहीं था

 

फिर वो आए मेरे लिए

और तब तक बोलने के लिए कोई बचा ही नहीं था

 

मार्टिन नीमोलर (1892-1984)