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आतंकवाद और युद्ध

Terrorism and War

नहीं तो मारे जाते रामचंद्र गुहा !

हिमांशु  कुमार

[आप विश्वास करेंगे कि ख्याति  प्राप्त इतिहासकार, लेखक और बुद्धिजीवी रामचंद्र गुहा को छत्तीसगढ़ के एक पुलिस थाने के भीतर नक्सली सिद्ध कर दिया गया और उनको मारने की तैयारी कर ली गयी थी...  - सं. (जनज्वार)]
 
[विडंबना शब्द इस बात के लिए बहुत हल्का है कि रामचंद्र गुहा बड़े ही सक्रिय रूप से माओवादियों के खिलाफ़ लिखते रहे हैं। - सं. (सह-संचार)]

अभी देश में सरकारी भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज़ उठाने वालों को नक्सली,माओवादी और आतंकवादी कह कर डरा कर चुप कराने का जोरदार धंधा चल रहा है.और हमारे देश का मध्यवर्ग जो बिना मेहनत किये ऐश की ज़िंदगी जी रहा है वो सरकार के इस झूठे प्रचार पर विश्वास करना चाहता है ताकि कहीं ऐसी स्थिति ना आ जाए जिसमें ये हालत बदल जाए और मेहनत करना ज़रूरी हो जाए.

इसलिए बराबरी ओर गरीबों के लिए आवाज़ उठाने वाले मारा जा रहा है या झूठे मुकदमें बना कर जेलों में डाल दिया गया है.लेकिन क्या आप विश्वास करेंगे की अंतर्राष्ट्रीय ख्याती प्राप्त इतिहासकार,लेखक और बुद्धिजीवी रामचंद्र गुहा को एक पुलिस थाने के भीतर नक्सली सिद्ध कर दिया गया और उनको मारने की तैयारी कर ली गयी थी.



शाहिद आज़मी के बिना एक साल

महताब आलम

बीते साल 11 फ़रवरी को रात के क़रीब नौ का वक़्त रहा होगा. दिल्ली की कुख्यात सर्दी के बीच मुंबई से मेरे एक दोस्त का फोन आया- अज्ञात बंदूकधारियों ने शाहिद आज़मी को उनके दफ्तर में मार डाला. यह अवाक कर देने वाली खबर थी, जिस पर यकीन करना मुश्किल हो रहा था. लेकिन खबर सच थी.

शाहिद


शाहिद जब मारे गये तब वे महज 32 साल के थे. यूँ तो शाहिद की पारिवारिक जड़े आज़मगढ़ में थीं लेकिन वे मुंबई के, देवनार इलाक़े में जन्मे और पले-बढ़े. ये इलाका टाटा इस्टीट्यूट ऑफ़ सोशल साइंस के लिए जाना जाता है.

उनकी हत्या के सिर्फ़ एक हफ़्ते पहले ही मैं आज़मगढ़ गया था. वहां मैंने हर उमर के लोगों को उनके बारे में बहुत ऊंची भावनाओं के साथ बोलते हुए पाया था और महसूस किया कि लोग उन्हें काफ़ी सम्मान के साथ देखते हैं.

शाहिद को 1994 में भारत के चोटी के नेताओं की हत्या की ‘साज़िश’ के आरोप में पुलिस ने उनके घर से गिरफ़्तार कर लिया था. इसका एक मात्र साक्ष्य उनका क़बूलनामा था, जिसे उन्होंने कभी किया ही नहीं था. फिर भी उन्हें छह साल की क़ैद हुई. दिल्ली के तिहाड़ जेल में रहते हुए शाहिद ने स्नातक के लिए दाख़िला कराया और अन्य क़ैदियों के कानूनी मामलों को निबटाने में मदद करना शुरु किया.

2001 में जब वे रिहा हुए तो घर आए और पत्रकारिता और क़ानून के स्कूल में साथ-साथ दाखिला लिया. तीन साल बाद, उन्होंने वक़ील मजीद मेनन के साथ काम करने के लिए वेतन वाले उप-संपादक पद को छोड़ दिया. यहां उन्होंने बतौर जूनियर 2,000 रुपये महीने पर काम शुरू किया. बाद में, उन्होंने अपनी ख़ुद की प्रैक्टिस शुरू कर दी जिसने एक निर्णायक फ़र्क़ पैदा किया. बतौर वक़ील महज 7 साल के अल्प समय में उन्हें न्याय की अपनी प्रतिबद्धता के लिए शोहरत और बदनामी दोनों मिली. यह कहना अनुचित नहीं होगा कि वे एक ऐसे इंसान थे, जो इस व्यवस्था द्वारा उत्पादित किए गए, इस्तेमाल किए गए और बाद में 'ठिकाने’ लगा दिए गए.

एक निर्मम राज्य के पक्ष में

अभय तिवारी

[लेखक के विचारों से संपादक की सहमति यहाँ बहुत सीमित है। पर लेख (शीर्षक पर अधिक ध्यान न दें) को यहाँ शामिल इसलिए किया जा रहा है कि इसमें प्रस्तुत विचार ढेर सारे अन्य लोगों के विचारों से मिलते हैं और उनको नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। हमारे पास उनके लिए क्या उत्तर हैं? हम (हम कौन? सह-संचार वाले, और कौन?) उनसे किस हद तक सहमत हैं और किन बातों पर? इनमें से कुछ सवालों के जवाब तो दिए जाते रहे हैं (मूल लेख पर जाकर टिप्पणियाँ भी पढ़ें), पर कुछ के नहीं दिए गए हैं, या दिए भी गए हैं तो शायद काफी नहीं है। कम से कम लेखक कविता और अहिंसा और डेमोक्रेसी और रूल ऑफ़ लॉ के जाप की आड़ में इसी तंत्र द्वारा निर्मम, अनैतिक, ग़ैर-कानूनी हत्याओं का दौर चलाने की वकालत तो नहीं कर रहे, ना ही वे विरोधियों और असहमतों का 'जीवन असंभव बना देने' की (शहीद दिवस के आस-पास) गर्व से घोषणा कर रहे हैं। अगर यह 'स्रैण करुणा' मात्र है तो भी कोल्ड ब्लडेड मर्डरर की मर्दानगी से तो बेहतर ही है। उनका मुख्य तर्क यह है कि राज्य तंत्र (कॉर्पोरट तंत्र की बात उन्होंने नहीं की है, पर राज्य-कॉर्पोरट तंत्र कहना अधिक उचित होगा) की मशीनरी इतनी निर्मम है कि उसकी दीवार पर सिर फोड़ने से कोई फायदा नहीं है। इसी में निहित यह विचार दिखता है कि अगर फायदा होता तो उनकी राय कुछ और होती। लेकिन इन्हीं लेखक ने यह भी लिखा है मिस्र के बारे में...।]

बावजूद इसके कि लोकतांत्रिक राज्य अभी भी, मानवाधिकारों को अनदेखा कर के अपनी प्रजा का दमन करता है, और एक विशेष वर्ग के हित में समाज के दूसरे वर्गों के शोषण को प्रायोजित करता है, ऐतिहासिक तौर पर अब तक लोकतांत्रिक राज्य ही सबसे उदार और मानवतावादी सिद्ध हुआ है- और वो व्यवस्थाएं जो अपने को मनुष्य के विकास की आगे की अवस्थाएं मानती थीं, कहीं अधिक क्रूर और दमनकारी सिद्ध हुईं जैसे समाजवाद और साम्यवाद।

इशरत जहाँ मुठभेड़ मामले में नया मोड़

(साभार बीबीसी हिंदी)

गुजरात पुलिस ने इशरत जहाँ और तीन अन्य को चरमपंथी संगठन लश्कर का सदस्य बताकर उन्हें कथित मुठभेड़ में मार दिया था.

गुजरात पुलिस मुठभेड़ की नए सिरे से छानबीन कर रहे विशेष जांच दल के एक सदस्य ने कहा है कि 2004 इशरत जहाँ और तीन दूसरे लोगों का मुठभेड़ फ़र्ज़ी था.

शुक्रवार को गुजरात हाई कोर्ट में इस मामले पर एक लम्बी दलील पेश करते हुए सीनियर पुलिस अधिकारी सतीश वर्मा ने कहा कि इस मामले में एक नई प्राथिमिकी यानी एफ़आईआर दर्ज होनी चाहिए.

पहले हुए एक न्यायिक जांच में भी ये बात सामने आई थी कि 2004 में आतंकवादी बताकर इन लोगों को जिस तरह से मारा गया था वह मुठभेड़ फ़र्ज़ी थी. लेकिन अदालत ने उस रिपोर्ट पर रोक लगा दी थी.

सतीश वर्मा उस तीन सदस्यीय विशेष जांच दल के सदस्य हैं जो गुजरात उच्च न्यायालय के आदेश पर पिछले साल बनाई गई थी.

दो जजों की खंडपीठ के सामने एक हलफ़नामे में सतीश वर्मा ने कहा,"अभी तक सामने आए साक्ष्य उन बातों को नकारते हैं जो एफआईआर में कही गई हैं."

सबूत

उन्होनें इसके सबूत के तौर पर पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट और दूसरे तथ्यों को अदालत के सामने रखा.

जाँच दल के सदस्य का कहना था कि इशरत जहाँ और तीन अन्य के शरीर से निकाली गई गोली उस पिस्तौल से मेल नहीं खाती जिसका इस्तेमाल पुलिस के अनुसार मुठभेड़ के दौरान किया गया था.

सतीश वर्मा का कहना था कि पुलिस ने इन चारों को ये कहकर मारा था कि ये लोग गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की हत्या के इरादे से गुजरात आए थे लेकिन इस बात का कोई सबूत पेश नहीं किया जा सका कि ये ख़बर पुलिस को किस आधार पर, कहाँ और कैसे मिली.

हालांकि अदालत की कार्रवाई के सामने जांच दल के भीतर की फूट भी सामने आई.

दोनों जजों ने इस मामले में हाई कोर्ट के वरिष्ठ वकील योगेश लखानी को अदालत का दोस्त मुक़र्रर कर दिया है जो जाँच दल के बीच के मतभेदों पर बीच-बचाव करेंगें.


(दखल की दुनिया से साभार)

विकिलीक्स और पेंटागन पेपर्स

अनिल एकलव्य

(ज़ेड मैग में प्रकाशित डेविड माइकल ग्रीन के लेख "व्हाट विकिलीक्स रियली रिवील्स" पर आधारित)

[अनुवादकों की कमी, बल्कि एकदम अनुपलब्धता, के चलते हम कुछ चुने हुए लेखों का सार या संक्षिप्त रूप सह-संचार में प्रकाशित करने का क्रम आज से शुरू कर रहे हैं। संभव है इन लघु लेखों में मूल लेख से बाहर की कुछ अतिरिक्त जानकारी भी हो या हिन्दी लेखक (रुपांतरकार कह लीजिए) की टिप्पणी भी हो।]

विकिलीक्स को लेकर बहुत कुछ लिखा जा चुका है। फिर भी कुछ पहलू हैं जिन पर सही से नज़र शायद नहीं डाली गई है। डेविड माइकल ग्रीन अपने इस लेख में उन्हीं में से एक पहलू पर ध्यान दिलाते हैं। वो इस सवाल का जवाब देने की कोशिश करते हैं कि विकिलीक्स द्वारा अब तक सामने लाए गए दस्तावेज़ों से असल में क्या तथ्य सामने आते हैं। ऐसा करने के लिए वे इन दस्तावेज़ों की तुलना कई दशक पहले डैनियल एल्सबर्ग के पेंटागन पेपर्स से करते हैं। पेंटागन पेपर्स हालांकि संख्या में कम थे (तब इतनी बड़ी संख्या में दस्तावेज़ों को कहीं से कहीं ले जाना तकनीकी रूप से भी संभव नहीं था) पर उनमें जो कुछ था उससे उच्च स्तर के अधिकारियों के सोचने और काम करने के तरीके का पता चलता था। यह बात भी खुल कर सामने आती थी कि ये अधिकारी जो सार्वजनिक रूप से कहते हैं और जो गोपनीयता के पर्दे के पीछे कहते हैं उसमें कितना बड़ा अंतर है। सीधे शब्दों में कहा जाए तो पेंटागन पेपर्स से सरकारी झूठों का, बल्कि झूठ पर आधारित पूरी व्यवस्था का पर्दाफ़ाश होता था। अगर ऐसा नहीं होता तो उन दस्तावेज़ों का कोई खास महत्व नहीं होता।

एक और दंतेवाड़ा

निराला और अनुपमा

(तहलका से साभार)

यह दंडकारण्य का वह दंतेवाड़ा तो नहीं जहां के एक बड़े हिस्से में माओवादियों द्वारा पीपुल्स गवर्नमेंट का राज चलता है लेकिन एशिया के सबसे बड़े साल के जंगल सारंडा की पिछले दस साल में जैसी हालत हो गई है, उसे दूसरा दंतेवाड़ा कहना गलत नहीं होगा. निराला और अनुपमा की यह विशेष रिपोर्ट 

ईराकी युद्ध अभिलेख

डैनियल एल्सबर्ग

23 अक्टूबर, 2010

[पाँच बजे शाम ई एस टी, शुक्रवार 22 अक्टूबर 2010 को विकिलीक्स ने इतिहास में गुप्त सैनिक अभिलेखों का सबसे बड़ा संकलन जनता के सामने जारी किया। ये 391,832 रिपोर्टें ('ईराकी युद्ध अभिलेख') ईराक में युद्ध और कब्ज़े का ब्यौरा देती हैं, 1 जनवरी 2004 से 31 दिसंबर 2009 तक (मई 2004 तथा मार्च 2009 के महीनों को छोड़ कर), सीधे संयुक्त राज्य अमरीका के सैनिकों के शब्दों में। इनमें से हर एक 'सिगऐक्ट' यानी युद्ध में उल्लेखनीय कृत्य है। ये घटनाओं का बिल्कुल वही विवरण देते हैं जो अमरीकी सेना ने ईराक में ज़मीनी तौर पर देखा और सुना, और ये युद्ध

या तो इसे अपनी कल्पना में जगह दें या इसका समर्थन करना बंद कर दें

जूलियन असांज

23 अक्टूबर, 2010

यह रिपोर्ट, जिसकी पेंटागन द्वारा निंदा की गई है, दावा करती है कि अमरीकी सेनाध्यक्ष ईराक में असैनिकों की यातना और हत्या के सबूतों को नज़रअंदाज़ करते रहे हैं।

"इस सामग्री से ऐसी 15,000 असैनिक मौतों का पता चलता है जिनके बारे में पहले कोई रिपोर्ट नहीं आई। यह एक असाधारण रूप से बड़ी संख्या है उन लोगों की जिनके बारे में पहले कभी बात नहीं की गई," जूलियन असांज ने कहा।

हम सब एक टाइम बम पर बैठे हुए हैं

मुकदमे की कानूनी जांच किये बिना आप किसी को फांसी कैसे दे सकते हैं?

बम, पलटाव और भविष्य

तारिक़ अली

पिछले तीन सप्ताह से पाकिस्तान के सैनिक शासक तालिबान को इस बात के लिए मनाने की कोशिश कर रहे हैं कि वह ओसामा बिन लादेन को पकड़वा दे और उस बरबादी से बच जाए जिस की तैयारी चल रही है। वो नाकामयाब रहे। क्योंकि ओसामा मुल्ला उमर का दामाद है, यह कोई खास आश्चर्य की बात भी नहीं है। अधिक रोचक सवाल यह है कि पाकिस्तान, अपने सैनिकों, अधिकारियों तथा पाइलटों को अफ़ग़ानिस्तान से वापस बुलाने के बाद, तालिबान में फूट डालने में और अपने पर पूरी तरह निर्भर हिस्सों को लौटाने में सफल रहा है या नहीं। सैनिक प्रशासन के लिए काबुल की भावी गठबंधन सरकार में अपना प्रभाव बनाए रखने के लिए यह एक मुख्य उद्देश्

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लेखक विषय संवाद साभार अनुवादक

पहले वो आए साम्यवादियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं साम्यवादी नहीं था

 

फिर वो आए मजदूर संघियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं मजदूर संघी नहीं था

 

फिर वो यहूदियों के लिए आए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं यहूदी नहीं था

 

फिर वो आए मेरे लिए

और तब तक बोलने के लिए कोई बचा ही नहीं था

 

मार्टिन नीमोलर (1892-1984)