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अहिंसा

एक निर्मम राज्य के पक्ष में

अभय तिवारी

[लेखक के विचारों से संपादक की सहमति यहाँ बहुत सीमित है। पर लेख (शीर्षक पर अधिक ध्यान न दें) को यहाँ शामिल इसलिए किया जा रहा है कि इसमें प्रस्तुत विचार ढेर सारे अन्य लोगों के विचारों से मिलते हैं और उनको नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। हमारे पास उनके लिए क्या उत्तर हैं? हम (हम कौन? सह-संचार वाले, और कौन?) उनसे किस हद तक सहमत हैं और किन बातों पर? इनमें से कुछ सवालों के जवाब तो दिए जाते रहे हैं (मूल लेख पर जाकर टिप्पणियाँ भी पढ़ें), पर कुछ के नहीं दिए गए हैं, या दिए भी गए हैं तो शायद काफी नहीं है। कम से कम लेखक कविता और अहिंसा और डेमोक्रेसी और रूल ऑफ़ लॉ के जाप की आड़ में इसी तंत्र द्वारा निर्मम, अनैतिक, ग़ैर-कानूनी हत्याओं का दौर चलाने की वकालत तो नहीं कर रहे, ना ही वे विरोधियों और असहमतों का 'जीवन असंभव बना देने' की (शहीद दिवस के आस-पास) गर्व से घोषणा कर रहे हैं। अगर यह 'स्रैण करुणा' मात्र है तो भी कोल्ड ब्लडेड मर्डरर की मर्दानगी से तो बेहतर ही है। उनका मुख्य तर्क यह है कि राज्य तंत्र (कॉर्पोरट तंत्र की बात उन्होंने नहीं की है, पर राज्य-कॉर्पोरट तंत्र कहना अधिक उचित होगा) की मशीनरी इतनी निर्मम है कि उसकी दीवार पर सिर फोड़ने से कोई फायदा नहीं है। इसी में निहित यह विचार दिखता है कि अगर फायदा होता तो उनकी राय कुछ और होती। लेकिन इन्हीं लेखक ने यह भी लिखा है मिस्र के बारे में...।]

बावजूद इसके कि लोकतांत्रिक राज्य अभी भी, मानवाधिकारों को अनदेखा कर के अपनी प्रजा का दमन करता है, और एक विशेष वर्ग के हित में समाज के दूसरे वर्गों के शोषण को प्रायोजित करता है, ऐतिहासिक तौर पर अब तक लोकतांत्रिक राज्य ही सबसे उदार और मानवतावादी सिद्ध हुआ है- और वो व्यवस्थाएं जो अपने को मनुष्य के विकास की आगे की अवस्थाएं मानती थीं, कहीं अधिक क्रूर और दमनकारी सिद्ध हुईं जैसे समाजवाद और साम्यवाद।

गांधी, तुम तो रोज मरते हो

कनक तिवारी

इतिहास में अब तक यह तय नहीं हो पाया है कि गांधी लोगों की मुसीबत हैं या लोग गांधी की. ताज़ा इतिहास का यह सबसे बड़ा दुनियावी शख्स लगभग सर्वसम्मति से सहस्त्राब्दी का नायक मान लिया गया है. यह मुख्यतः उस अमरीका की पहल पर हुआ है, जहां गांधी कभी नहीं गए थे. उन्होंने अमरीकी राष्ट्रपति की यह सलाह भी अनसुनी कर दी थी कि यदि गांधी चाहें तो अमरीका भारत की आज़ादी को लेकर ब्रिटिश प्रधानमंत्री से मध्यस्थता करने को तैयार है.

अमरीका में ही मार्टिन लूथर किंग जूनियर हुए जिन्होंने अश्वेतों के पक्ष में प्रसिद्ध मांटगोमरी मार्च निकाला. उन्हें अमरीकियों ने मार डाला और वे दुनिया में अश्वेत गांधी के रूप में मशहूर हो गए. अमरीका का प्रजातांत्रिक ढांचा ऊपरी तौर पर मानव अधिकारों का रक्षक है. वहां न्यायपालिका की श्रेष्ठता असंदिग्ध है. इसके बावजूद अमरीका पूरी दुनिया में पूंजीवाद का सरगना शोषक बना हुआ है. उसके नाम से किसी देश की घिग्गी बंध जाती है. किसी दूसरे को मितली आने लगती है. कोई उससे छुटकारा पाने को मोक्ष के बराबर समझता है. दुनिया में लेकिन भारत वह महान देश है, जिसके प्रधानमंत्री मोहनदास करमचंद गांधी के रास्ते पर चलने की नीयत रखने के बदले अमरीका के मनमोहन बने हुए हैं.

इस वर्ष गांधी के निधन दिवस पर उसी नई दिल्ली में एक कथित जनयुद्ध की शुरुआत की गई, जहां 5 बजकर 17 मिनट पर गांधी को गोडसे की गोलियों ने भून दिया था. गांधी की शहादत का दिन भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए बौद्धिकों, नागरिकों और स्वयंसेवी संस्थाओं की ओर से प्रतीक के तौर पर चुना गया. उसी नई दिल्ली में आज़ादी के कोई पांच वर्ष पहले से गांधी के योग्यतम शिष्यों नेहरू और पटेल वगैरह ने उनके कर्म को दाखिलदफ्तर कर दिया था.

देश का विभाजन गांधी के विरोध के बावज़ूद हुआ. गांधी के सपनों का भारत कांग्रेस के कर्णधारों ने अपने पैरों तले कुचला लेकिन तोतारटंत की तरह उनके नाम का जाप करना जारी रखा. गांधी का नाम फिर भी भारत के लोकजीवन की झाड़ियों में छिपा रहा. इस वर्ष देश के करीब साठ शहरों में उसकी याद में केंद्र सरकार की भ्रष्टाचार-कथा के विरुद्ध एक जनचुनौती जूलूस, रैली और आमसभा बनकर सड़कें नापती रही.

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लेखक विषय संवाद साभार अनुवादक

पहले वो आए साम्यवादियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं साम्यवादी नहीं था

 

फिर वो आए मजदूर संघियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं मजदूर संघी नहीं था

 

फिर वो यहूदियों के लिए आए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं यहूदी नहीं था

 

फिर वो आए मेरे लिए

और तब तक बोलने के लिए कोई बचा ही नहीं था

 

मार्टिन नीमोलर (1892-1984)