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अर्थव्यवस्था

Economics

अंधेर नगरी के राजा

पुण्य प्रसून बाजपेयी

पहली बार किसी प्रधानमंत्री ने माफी मांगी। पहली बार लोकसभा में विपक्ष के किसी नेता ने माफ भी कर दिया। पहली बार भ्रष्टाचार, महंगाई और कालेधन पर सरकार कटघरे में खड़ी दिखी। पहली बार सुप्रीम कोर्ट ने प्रधानमंत्री से लेकर जांच एंजेसियों को समाजवादी सोच का पाठ यह कर पढ़ाया कि अपराध अपराध होता है। उसमें कोई रईस नहीं होता। पहली बार प्रधानमंत्री के चहेते कारपोरेट घरानों को भी अपराधी की तरह सीबीआई हेडक्वाटर में दस्तक देनी पड़ी। पहली बार चंद महीने पहले तक सरकार के लिये देश के विकास से जुडी डीबी रियल्टी कार्पो सरीखी कंपनी के निदेशक जेल में रहकर पद छोड़ना पड़ा। पहली बार पौने सात साल के दौर में यूपीए में संकट भ्रष्टाचार के खिलाफ हो रही कार्रवाई को लेकर मंडराया। और पहली बार सरकार को बचाने भी वही दल खुल कर आ गया जिसकी राजनीति गैर कांग्रेसी समझ से शुरु हुई। यानी पहली बार देश में यह खुल कर उभरा कि मनमोहन सिंह सिर्फ सोनिया गांधी के रहमो करम पर प्रधानमंत्री बनकर नहीं टिके है बल्कि देश का राजनीतिक और सामाजिक मिजाज भी मनमोहन सिंह के अनुकूल है।

थैंक यू, सुप्रीम कोर्ट

कनक तिवारी

इधर कुछ महीनों से सुप्रीम कोर्ट ने देश की चिंता करने में ज़्यादा सक्रियता बरतने का परिचय दिया है. वैसे वे सब काम कार्यपालिका अर्थात केन्द्र सरकार को ही करने थे. देश की यह हालत है कि मुद्दई सुस्त गवाह चुस्त की तरह आचरण हो रहा है.

न्यायिक सक्रियता का लेकिन बढ़ जाना लोकतंत्र के लिए अच्छा लक्षण नहीं है. इससे धीरे-धीरे न्यायपालिका में भी एक तरह का अधिनायकवाद उभरता रहा है. लेकिन मौज़ूदा हालत यह है कि यदि न्यायतन्त्र ने तन्त्र के अन्याय के खिलाफ लोकतांत्रिक मूल्यों का बचाव नहीं किया तो जनता में भयानक पराजय की भावना पनपने लगेगी. मौजूदा समय में वही एक पुराना कारण राजनेताओं और नौकरशाहों को जुल्मखोर बनाता नज़र आ रहा है क्योंकि भारतीय जनता में इक्कीसवीं सदी में भी अन्याय के खिलाफ उठ खड़े होने का मुनासिब जज्बा दीख ही नहीं रहा है.p-j-thomas

 

केन्द्रीय सतर्कता आयुक्त पी जे थॉमस के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने देश के प्रधानमंत्री और गृहमंत्री के प्रशासनिक-न्यायिक विवेक पर सीधा तमाचा मारा है. शुरू में यह भ्रम फैलाया गया कि तीन सदस्यीय चयन समिति के सामने थॉमस की वह पुरानी फाइल रखी ही नहीं गई जब उनके खिलाफ केरल राज्य के सचिव के रूप में पामोलिन घोटाले में उनका भी नाम अभियुक्तों में संलग्न किया गया था.

 

एक बदचलन की मौत !

अजय प्रकाश

एक आटो आकर रुका। उसमें से दो औरतें उतरीं। आगे वाली औरत उतरते ही छाती पीटते हुए गला फाड़ रोने लगी। आवाज लोगों के घरों तक पहुंची तो सभी घरों की बालकनी बच्चों और महिलाओं से भर गयी...
 
परसों की बात है। दिन के करीब दस बज रहे थे। दुबारा लौट आयी ठंड के बाद मेरी हिम्मत ठंडे पानी से नहाने की नहीं हुई तो सोचा क्यों न धूप में खड़े होकर थोड़ा गरम हो लिया जाये। धूप की गरमी से अगर हिम्मत बंध गयी तो नहा लूंगा,नहीं तो कंपनियों ने महकने का इंतजाम तो कर ही रखा है। यह सोचकर मैं बालकनी से लगकर सड़क की हरियाली देखने लगा।
 
तभी एक आटो आकर रुका। उसमें से दो औरतें उतरीं। आगे वाली औरत उतरते ही छाती पीटते हुए गला फाड़ रोने लगी। आवाज लोगों के घरों तक पहुंची तो सेकेंडो में सभी घरों की बालकनी बच्चों और महिलाओं से भर गयी। काम पर नहीं गये कुछ मेरे जैसे मर्द भी झांकने लगे। जिनके कमरे नीचे के फ्लोर में थे वो रोने वाली के आसपास मंडराने लगे। मेरी मां से नहीं रहा गया तो वह नीचे मौका-मुआयना करने के लिए चल दी। मां के नीचे जाते देख बीबी ने पूछा, कहां जा रही हैं?

मां जवाब दिये बगैर चलते बनी तो सामने से पड़ोसी की बीबी ने कहा,‘देहात से आयी हैं,इसलिए वो तो जाये बिना नहीं मानेंगी। मेरी सास भी ऐसी ही हैं।’इस बीच दहाड़ मारती औरत आटो से आगे बढ़ते हुए अपने कमरे की ओर चिल्लाते हुए चल पड़ी,‘अरे हमार बछिया कौन गति भईल तोहार (ओह,मेरी बेटी तेरा क्या हाल हुआ)।'

मेरी बीबी ने उसकी आवाज सुन मुझसे कहा जरा सुनना तो क्या कह रही है भोजपुरी में। मैं अभी कुछ कहता उससे पहले ही कोने वाली मकान मालकिन अपनी बालकनी से बोल पड़ी, ‘बिहार की हैं- छपरा की।’ फिर मैंने कहा, ‘उसकी बेटी को कुछ हुआ है।’

अब उस औरत के रोने-घिघियाने की आवाज शब्दों में बदल चुकी थी। सड़क से ग्राउंड फ्लोर और ग्राउंड फ्लोर से फर्स्ट  फ्लोर होते हुए हमतक बड़ी जानकारी ये आयी कि रोने वाली औरत की बेटी की लाश चार दिन से किसी सरकारी हॉस्पीटल में पड़ी है। बड़ी जानकारी मिलते ही क्यों...क्यों...क्यों, की आवाज तमाम बालकनियों और फ्लोरों पर गूंजने लगी।

सस्ती नैनो – मंहगा खेल

सुनील

कुछ बरस पहले भारत के प्रमुख उद्योगपति रतन टाटा ने यह घोषणा करके धमाका-सा किया था कि वे भारत के निम्न मध्यम वर्ग के लिए एक लाख रु. वाली कार बनाएंगे। यह दुनिया की सबसे सस्ती कार होगी और सबसे कम ईंधन-खर्च वाली कार होगी। इसे ‘नैनो’ नाम दिया गया, जिसका शाब्दिक अर्थ है सूक्ष्म या अति सूक्ष्म। अभी तक इसका उपयोग एक तरह की नवीनतम तकनालॉजी – ‘नैनो टेक्नोलॉजी’ - को बताने के लिए किया जाता रहा है।

इस लखटकिया कार को पूंजीवाद और भूमंडलीकरण के चमत्कार के रुप में पेश किया गया। किस तरह से इनके फायदे धीरे-धीरे नीचे तक पहुंचेंगे, इसकी मिसाल के रुप में भी इसे पेश किया गया। किन्तु पश्चिम बंगाल में इस नैनो कार के कारखाने के लिए कोलकाता से 45 कि.मी. दूर सिंगूर नामक स्थान पर जब किसानों की जमीन का अधिग्रहण किया जाने लगा, तो जबरदस्त विरोध खड़ा हो गया। टाटा की नैनो कार परियोजना विवादों में फंस गई। जहां पश्चिम बंगाल की वाम मोर्चा सरकार इसे वहां के औद्योगीकरण का एक महत्वपूर्ण सोपान मान रही थी, वहीं कई लोगों ने औद्योगीकरण के इस समूचे मॉडल पर ही सवाल खड़े किए। सिंगूर और नन्दीग्राम आधुनिक भारत में विकास और औद्योगीकरण से जुड़े द्वन्द्व तथा संघर्षों का प्रतीक बन गए।

आखिरकार टाटा को सिंगूर से इस कारखाने को हटाने और गुजरात ले जाने का फैसला करना पड़ा। बाद में धीरे-धीरे यह तथ्य सामने आने लगा कि पश्चिम बंगाल सरकार ने इस परियोजना के लिए कितने बड़े पैमाने पर अनुदान, करों में छूट और मदद देने का समझौता किया था। इस गजब की सस्ती कार के ‘सस्तेपन’ के रहस्य की परतें अब धीरे- धीरे खुल रही हैं।

इक्कीसवीं सदी में भारत का भविष्य

सुनील

[भारतीय ज्ञानपीठ, उज्जैन द्वारा आयोजीत पद्यमभूषण डॉ. शिवमंगल सिंह सुमन स्मृति अखिल भारतीय सद्भावना व्याख्यानमाला 2010 में 29 नवंबर 2010 को दिया गया व्याख्यान]

करीब पच्चीस साल पहले हमारे तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने हमें याद दिलाना शुरु किया था कि भारत बहुत जल्दी इक्कीसवी में पहुंचने वाला है। हमें इक्कीसवीं सदी में जाना है। यह बात करते करते हम इक्कीसवीं सदी मे पहुंच गए और इस नई सदी के दस साल भी बीत गए। इक्कीसवीं सदी का भारत कहां है, कैसा है, कैसा बनने वाला है, कहां पहुँचने वाला है- यह एक विशद विषय है। यहां उसके कुछ पहलुओं पर विचार करेंगें।

निश्चित ही नई सदी में बहुत सारी चीज़ें काफी चमकदार दिख रहीं है। बीस साल या पचास साल पहले के मुकाबले भारत काफी आगे दिखाई दे रहा है। कई तरह की क्रांतियां हो रही है। कम्प्यूटर क्रांति चल रही है। मोबाईल क्रांति भी हो गई है - अब गरीब आदमी की जेब में भी एक मोबाइल मिलता है। ऑटोमोबाईल क्रांति चल रही है। एक ज़माना था जब स्कूटर के लिए नंबर लगाना पड़ता था, वह ब्लैक में मिलता था। कारों के बस दो ही मॉडल थे – एम्बेसेडर और फिएट। अब किसी भी शोरुम में जाइए, मनपसंद मॉडल की मोटरसाइकिल या कार उठा लाइए। नित नए मॉडल बाज़ार में आ रहे है। सड़कों पर कारें ही कारें दिखाई देती हैं।  सड़कें फोरलेन-सिक्सलेन बन रही है। हाईवे, एक्सप्रेसवे की चिकनी सड़कों पर गाड़ियां हवा से बात करती हैं। ‘फोरलेन‘ शब्द तो बच्चे-बच्चे की जुबान पर चढ़ गया है। इसी तरह शिक्षा में भी क्रांति आ गई है। पहले इंजीनियरिंग, मेडिकल, बी.एड. कॉलेज गिनती के हुआ करते थे। आज एक-एक शहर में दस-दस कॉलेज है और उनमें सीटें खाली रहती है। पहलें चुनिंदा कॉन्वेंट स्कूल हुआ करते थे,  अब इंग्लिश मिडियम स्कूल गली-गली, मोहल्ले में खुल गए है। 

भारत में भी मिस्र

प्रीतीश नंदी

क्या आपको कभी यह महसूस नहीं हुआ कि भारत दुनिया के सर्वाधिक अनदेखे लोगों का देश है? ये अनदेखे-अदृश्य लोग लाखों-करोड़ों की तादाद में हैं, इसके बावजूद उन पर कोई गौर नहीं करता. हम सभी उन्हें नजरअंदाज कर देते हैं, जैसे कि उनका कोई अस्तित्व ही न हो. हां, उनके पास मतदाता परिचय पत्र हैं. उनमें से कुछ के पास पैन कार्ड भी हो सकते हैं. नंदन नीलेकणी जल्द ही उन्हें उनका विशिष्ट पहचान क्रमांक भी दे देंगे, ठीक उसी तरह जैसे टेलीकॉम कंपनियों ने उन्हें सेलफोन मुहैया करा दिए हैं. उनके नाम पर बैंकों में खाते हैं और उन्हें एटीएम कार्ड भी दिए गए हैं. इसके बावजूद वे हमारे गणतंत्र के गुमशुदा लोगों में से हैं.

इनमें से अधिकांश युवा और बेरोजगार हैं. कुछ बुढ़े हैं, जो किसी रोजगार के योग्य नहीं. वे सभी उस भारत के हिस्से हैं, जिसकी उपेक्षा कर दी गई है. नहीं, उन्होंने अपनी इस स्थिति का चुनाव स्वयं नहीं किया है. यह स्थिति एक धूर्त राजनीतिक तंत्र द्वारा निर्मित की गई है, जो एक ऐसा वोट बैंक पाना चाहता है, जिसका वह दोहन कर सके. इसीलिए आजादी के छह दशक बाद भी वे नामहीन और शक्लहीन हैं. वे भारत की उस मुख्यधारा के अंग नहीं हैं, जो तालियों की गड़गड़ाहट में डूबा हुआ है. वे तकनीकी क्रांति का भी हिस्सा नहीं हैं. मोबाइल फोन कभी भी बिजली या पानी का विकल्प नहीं हो सकते. इन लोगों ने कभी आर्थिक सुधारों के बारे में सुना भी न हो, क्योंकि उससे उन्हें कोई लाभ नहीं हुआ है. उन्हें तो यह भी नहीं मालूम कि वे जिस भारत देश में रह रहे हैं, वह दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में से है.

मिस्र में प्रदर्शन

नर्मदा का शोकगीत

प्रशांत दुबे/रोली शिवहरे

“साहब! हम कभी किसी को काली चाय नहीं पिलाते थे, पर क्या करें ? आज शर्म भी लग रही है आपको यह चाय पिलाते हुये. मजबूर हैं.”रामदीन

दरअसल काली चाय जो आज बड़े लोगों के लिये स्वास्थ्य का सबब है, किसी के लिये यह शर्म की बात भी है. आईये जाने क्या है इस काली चाय का गणित.

“बहुत खेती थी. बहुत मवेशी थे. दूध दही था हमारे यहां. सुख-सुविधा थी. सुख से रहते थे. मेरी खुद की बीस एकड़ जमीन थी. धान, गेहूँ, ज्वार, बाजरा, तिल, मक्का सब उगाते थे साहब ! और अब ... ?” फिर वह मन ही मन कुछ बुदबुदाते हैं जैसे किस्मत को दोष दे रहे हो या फिर किसी को अपशब्द कह रहे हो.

वह कहते हैं –“मेरा बुढ़ापा ऐसे ही नहीं आ गया है. तीन-तीन बार अपने गाँव से, अपने-अपनों से बिछड़ने का नतीजा है ये. सरकार क्या करेगी या सरकार ने क्या किया ? जमीन का मुआवजा दे दिया, उसके अलावा हमारी अपने जड़ों का क्या ?”

यह कहानी है बरगी बाँध से डूबे गांवों में से एक मगरधा गांव के रामदीन की . रामदीन आज 62 वर्ष के है. यह कहानी अकेले रामदीन की नहीं बल्कि रामदीन जैसे ऐसे हजारों लोग है, जो अपने आज और कल का गणित लगाते है और जीवन की इस धूप-छांव को बड़ी ही शिद्दत महसूस कर रहे है.

उजड़े हुये लोग

मगरधा गांव भी रानी अवंतीबाई लोधी परियोजना के कारण उजड़े अन्य 192 गांवों की तरह वर्ष 1987 में उजडा. रामदीन कहते है- “बाँध बनने की बात पर पहले विश्वास नहीं होता था पर बांध बंध गया और हम कुछ नहीं कर सके. लेकिन नर्मदा माई को कोई बांध कैसे बांध सकता है, वह तो अभी भी रिसती ही हैं.

“हम तो इतने भोले थे साहब कि कुछ समझ ही नहीं पाये और बाँध में काम करने जाते रहे. अगर हम तब समझ जाते तो आवाज बुलंद करते. और जब आवाज बुलंद की तो बहुत देर हो चुकी थी.”

पूंजी की चाकर राजनीति और गरीब की दुश्मन सरकार

शेष नारायण सिंह

अभी मिस्र जैसी बात तो नहीं है लेकिन अब भारत की जनता भी शासक वर्गों की मनमानी के खिलाफ लामबंद होने लगी है. जहां तक राष्ट्रीय राजनीतिक पार्टियों की बात है उनकी विश्वसनीयता तो बहुत कम है लेकिन अगर कोई भी आदमी या संगठन सरकार की तरफ से प्रायोजित महंगाई के खिलाफ नारा देता है तो जनता मैदान लेने में कोई संकोच नहीं करती. अभी कुछ हफ्ते पहले बाबा रामदेव और उनकी तरह के कुछ संदिग्ध लोगों ने महंगाई के खिलाफ एकजुटता का नारा दिया तो देश के हर शहर में लोग जमा हो गए और सरकार के साथ साथ सभी राजनीतिक पार्टियों की निंदा की. आम आदमी के दिमाग में राजनीतिक बिरादरी के लिए जो तिरस्कार का भाव है, वह लोकशाही के लिए ठीक नहीं है. ज़ाहिर है कि राजनीतिक बिरादरी को अपनी छवि को दुरुस्त करने के लिए फौरान काम करना चाहिए वरना अगर अरब देशों की तरह जनता सडकों पर आ गयी तो आज की राजनीतिक जमातों में से कोई भी नहीं बचेगा.

देश का भट्टा बैठाकर सरकार बचाने की मनमोहनी कवायद

पुण्य प्रसून बाजपेयी

8 फरवरी को सुप्रीम कोर्ट में जब मुलायम सिंह के खिलाफ आय से ज्यादा संपत्ति के मामले में अटॉर्नी जनरल ने मुलायम का पक्ष लिया तो कई सवाल एकसाथ खड़े हुये। क्या मनमोहन सिंह सरकार पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं, जो सरकार के बाहर दोस्ती का दाना डालना शुरु किया गया है। चूंकि एक तरफ आय से ज्यादा संपत्ति के मामले में सरकार ही सक्रिय है और वहीं अगर सरकार ही सुप्रीम कोर्ट में सीबीआई की पहल को खारिज कर रही है तो फिर यह दोस्ती न करने पर चेताना है या अपने उपर आये संकट के मद्देनजर पहले से तैयारी करना। और यही मामला मायावती के खिलाफ भी चल रहा है और उसकी सुनवायी, जो पहले 15 फरवरी को होनी थी, अब उसकी तारीख बढ़ाकर 15 मार्च कर दी गयी है। जिसे फैसले का दिन माना जा रहा है।

तो क्या मनमोहन सिंह मायावती के सामने भी अपनी दोस्ती का चुग्गा फेंक रहे हैं। लेकिन यूपीए से बाहर साथियों की तलाश और सीबीआई को इसके लिये हथियार बनाने की जरुरत मनमोहन सिंह के सामने क्यों आ पड़ी है, समझना यह जरुरी है । असल में पहली बार मनमोहन सिंह के सामने दोहरी मुश्किल है। एकतरफ सरकार की छवि के जरिये कांग्रेस के दामन को बचाना और दूसरी तरफ विकास की अपनी थ्योरी को नौकरशाहों के जरिये बिना लाग-लपेट लागू कराना । संयोग से खतरा दोनों पर मंडरा रहा है। नीरा राडिया टेप ने जहां संकेत दिये कि नेता-नौकरशाह-कॉरपोरेट के कॉकटेल के जरिए देश को लगातार चूना लगाया जा रहा है वहीं सीबीआई जांच की खुलती परतों के बीच जब सुप्रीम कोर्ट ने भ्रष्टाचार पर नकेल कसने की दिशा में कदम बढ़ाया तो घेरे में राजनेता ए राजा, नौकरशाह सिद्दार्थ बेहुरा और कॉरपोरेट घराने के रतन टाटा ही आये।

हमारी बात नहीं मानेंगे तो पछताना पड़ेगा

मेधा पाटकर से आलोक प्रकाश पुतुल की बातचीत

 

नर्मदा बचाओ आंदोलन की नेत्री और सुप्रसिद्ध सामाजिक कार्यकर्ता मेधा पाटकर का मानना है कि विकास की अवधारणा को ठीक से समझा नहीं जा रहा है, जिससे सामाजिक संघर्ष लगातार बढ़ता जा रहा है. मेधा पाटकर की राय में सशस्त्र माओवादी आंदोलन के मुद्दे तो सही हैं लेकिन उनका रास्ता सही नहीं है. हालांकि मेधा पाटकर यह मानती हैं कि देश में अहिंसक संघर्ष और संगठन भी अपना काम कर रहे हैं, लेकिन सरकार उनके मुद्दों को नजरअंदाज कर रही है, जिससे इस तरह के आंदोलनों की जगह लगातार कम हो रही है. यहां पेश है, उनसे की गई एक बातचीत.

देश भर में जब कभी भी विकास की कोई प्रक्रिया शुरू होती है तो चाहे-अनचाहे, जाने-अनजाने उसका विरोध शुरू हो जाता है. गरीब भले गरीब रह जाए, आदिवासी भले आदि वास करने को मजबूर रहे लेकिन एक खास तरह के दबाव में विकास का विरोध क्या बहुत रोमांटिक ख्याल नहीं है?

विकास की परिभाषा किसी भी भाषा, किसी भी माध्यम में आप ढूढें तो यही होती है कि संसाधनों का उपयोग करके जो जीने के, जो जीविका के बुनियादी अधिकार हैं, या जरूरते हैं, उसकी पूर्ती करना. तो विकास की संकल्पनाएं तो अलग-अलग हो सकती हैं. कोई भी विकास का विरोधी नहीं है, न हम है, न सरकार भी हो सकती है. लेकिन सरकार एक प्रकार का विकास का नजरिया, ये कहते हुए जब सामने लाती है कि उन संसाधनों के आधार पर वो लाभ ही लाभ पाएंगे, वो आर्थिक या भौतिक लाभ. लेकिन उसमें जिन लोगों के हाथ में पीढ़ियों से संसाधन हैं, उनका न कोई योगदान होगा नियोजन में, न ही उनको लाभों में भागीदारी या हिस्सा मिलेगा. तब जा कर हमको अपने विकास की संकल्पना भी रखने का अधिकार है.

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लेखक विषय संवाद साभार अनुवादक

पहले वो आए साम्यवादियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं साम्यवादी नहीं था

 

फिर वो आए मजदूर संघियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं मजदूर संघी नहीं था

 

फिर वो यहूदियों के लिए आए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं यहूदी नहीं था

 

फिर वो आए मेरे लिए

और तब तक बोलने के लिए कोई बचा ही नहीं था

 

मार्टिन नीमोलर (1892-1984)