Increase |  Decrease |  Normal

Current Size: 100%

Share this
Syndicate content

दिल लगाई और सताई - 8

हावर्ड ज़िन

[हावर्ड ज़िन रचित 'ए पीपुल्स हिस्टरी ऑफ़ द यूनाइटेड स्टेट्स' (संयुक्त राज्य का जनवादी इतिहास) के छठे अध्याय 'द इंटिमेटली आप्रेस्ड' के अनुवाद का आठवाँ भाग। अनुवादक: लाल्टू]

मैसाचुसेट्स राज्य के चिकोपी नगर के ऐसे नागरिक की डायरी में, जिसे महिलाओं से सहानुभूति न थी, 2 मई, 1843 की एक घटना का उल्लेख है -

"लड़कियाँ बड़ी तादाद में इकट्ठा हो रही हैं ... आज सुबह नाश्ते के बाद रंगीन खिड़की के पर्दे से बनाए गए एक बैनर के पीछे-पीछे सोलह औरतों का एक जुलूस चौराहे के चारों ओर चलता रहा ... वापस लौट आने तक ... उनकी संख्या चौवालीस थी। कुछ देर मार्च करने के बाद वे तितर-बितर हो गईं। निशाहार के बाद बयालीस की संख्या में मार्च करती हुई वे काबोट नगर तक गईं ... वे सड़कों पर मार्च करती रहीं, इसका उनको कोई फ़ायदा न था।"

1840 के दशक में कई शहरों में हड़तालें हुईं, जो न्यू इंग्लैंड क्षेत्र में शुरूआत में हुई 'भीड़ों' से अधिक आक्रामक थीं। पर ये अधिकतर असफल रहीं। पिट्सबर्ग शहर के पास एलीबेनी मिलों में लगातार हुई हड़तालों के में दैनिक कार्य-अवधि कम करने की मांग की गई। इन हड़तालों के दौरान कई बार लाठियाँ और पत्थर हाथों में लिए औरतों ने कपड़ा मिलों के दरवाज़े तोड़े और करघों को रोका।

तत्कालीन महिला सुधारक कैथरीन बीचर ने फैक्ट्री पद्धति के बारे में लिखा है -

"मौके पर अवलोकन और पड़ताल के आधार पर जानकारियाँ इस प्रकार हैं : मैं जाड़े के मौसम के बीचों-बीच वहाँ गई। हर सुबह पाँच बजे काम पर जाने के लिए बुलाती घंटियों से मेरी नींद टूटती। कइयों ने मुझे बतलाया कि कपड़ा पहनने और नाश्ता करने के लिए इतना कम समय था कि दोनों जल्दीबाजी में करने पड़ते। मिल का काम बत्ती के प्रकाश में शुरू होता और बिना रुके बारह बजे तक अधिकतर खड़े-खड़े करना पड़ता। फिर भोजन के लिए आधे घंटे का अवकाश, जिसमें आने-जाने का समय भी शामिल होता। फिर वापस मिलों में, सात बजे तक काम ... ध्यान रहे कि इतने घंटों तक ऐसे कमरों में काम करना पड़ता, जहाँ जलती बत्तियों और 40 से 80 व्यक्तियों के श्वसन से साफ़ हवा प्रदूषित होती रहती ... और जहाँ हवा हज़ारों करघों, चरखों और धागों से उड़ती रुई से भरी होती।"

और उच्च वर्ग की महिलाओं का जीवन? अपनी पुस्तक, 'डोमेस्टिक मैनर्स ऑफ़ द अमेरिकन्स' (अमरीकी पारिवारिक तौर-तरीके) में एक अंग्रेज़ औरत फ़्रांसेस ट्रोलोप ने लिखा है -

"फ़िलाडेल्फ़िया शहर की एक उच्च वर्गीय औरत के दैनंदिन जीवन की कथा सुनिए ... एक बहुत सफल और प्रख्यात वकील और सीनेटर की पत्नी - सोकर उठने पर पहला घंटा कपड़ों को करीने से सजाने में गुज़रा; फिर साफ-सुथरी, गंभीर, शांत, वह आंगन में उतरती है; आज़ाद काला नौकर नाश्ता ले आता है; वह भुना हैम (सूअर का माँस) और नमकीन मछली खाती और चुपचाप काफ़ी पीती है, इस दौरान उसका पति अखबार पढ़ रहा होता है। ग्यारह बजे उसकी कुहनी के नीचे एक अखबार पड़ा होता है। फिर शायद वह कप-प्लेट धोती है। ग्यारह बजे उसकी (घोड़ा-)गाड़ी तैयार करने के लिए कहा जाता है, तब तक वह पेस्ट्री रूम (हल्की आँच की भट्टी वाली रसोई) में व्यस्त है। उसका धवल सफेद एप्रन, चूने के रंग-से रेशम को बचाता है। गाड़ी आने से बीस मिनट पहले वह वापस अपने कमरे में लौट जाती है, जिसे कि वह चेंबर कहती है। अपने एप्रन को, जो अभी भी धवल-सफेद है, झाड़कर सँवारती है। अपने कीमती कपड़े की सिलवटें ठीक करती है ... खूबसूरत टोपी पहनती है ... फिर वह नीचे उतरी और उसी वक्त उसका आज़ाद काला गाड़ीवान आज़ाद काले नौकर को गाड़ी तैयार होने की सूचना देता है। गाड़ी में चढ़ वह आदेश देती है, "डोर्कास सोसायटी चलो।""

लोवेल नगर में एक नारी श्रम-सुधार संघ ने 'फ़ैक्ट्री दस्तावेज़' नाम से एक शृंखला प्रकाशित की। पहले अंक का शीर्षक था, 'एक कर्मचारी की नज़रों में फ़ैक्ट्री की ज़िंदगी की असलियत' और इसमें मिल में काम कर रही औरतों को, "हर मायने में एक गुलाम के समतुल्य! एक ऐसी व्यवस्था के गुलाम, जो सुबह पाँच से शाम सात बजे तक काम करने को मज़बूर करती है, जिससे नित्य-कर्म के लिए सिर्फ़ एक ही घंटा बचता है" - 'शासकों' की इच्छाओं और ज़रूरतों का गुलाम कहा गया।

सन् 1845 में 'न्यूयॉर्क सन' में यह संवाद छपा -

"औरतों की विशाल सभा - हमसे आग्रह किया गया है कि नगर के औद्योगिक युवा महिला कर्मचारियों को आगाह करें कि आज दोपहर चार बजे पार्क में एक विशाल सभा का आयोजन किया गया है।"

"हमसे यह भी आग्रह किया गया है कि नगर के पुरुषों को उनके पौरुष का ध्यान दिलाएँ और सम्मानपूर्वक उनसे कहें कि वे इस सभा में न आएँ क्योंकि जिनके लिए यह सभा आयोजित है, वे खुद ही बातचीत, चर्चा आदि करना चाहती हैं।"

इसी दौरान 'न्यूयॉर्क हेरॉल्ड' में "बड़ी रोचक स्थिति और वेश-भूषा में दिखती 700 औरतें ... अपने कार्यस्थल पर होते अन्यायों और अत्याचारों को दूर करने के उद्देश्य से कर रही" एक सभा के बारे में खबर छपी। हेरॉल्ड में ऐसी सभाओं के बारें में संपादकीय छपा : "हमें शक है कि इससे किसी भी प्रकार के नारी-श्रमिक को फ़ायदा होगा ... ऐसे सभी प्रयास अंत में निष्फल होते हैं।"

 

दिल लगाई और सताई - 7

दिल लगाई और सताई - 6

दिल लगाई और सताई - 5

दिल लगाई और सताई - 4

दिल लगाई और सताई - 3

दिल लगाई और सताई - 2

दिल लगाई और सताई - 1


 


लेखक विषय संवाद साभार अनुवादक

पहले वो आए साम्यवादियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं साम्यवादी नहीं था

 

फिर वो आए मजदूर संघियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं मजदूर संघी नहीं था

 

फिर वो यहूदियों के लिए आए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं यहूदी नहीं था

 

फिर वो आए मेरे लिए

और तब तक बोलने के लिए कोई बचा ही नहीं था

 

मार्टिन नीमोलर (1892-1984)