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दिल लगाई और सताई - 6

हावर्ड ज़िन

[हावर्ड ज़िन रचित 'ए पीपुल्स हिस्टरी ऑफ़ द यूनाइटेड स्टेट्स' (संयुक्त राज्य का जनवादी इतिहास) के छठे अध्याय 'द इंटिमेटली आप्रेस्ड' के अनुवाद का छठा भाग। अनुवादक: लाल्टू]

अलग-अलग दिशाओं में जटिल परिवर्तन हो रहे थे। अब औरतें घर से निकलकर  औद्योगिक माहौल में शामिल होने को मज़बूर थीं। साथ ही उन पर नियंत्रण कायम रखने के लिए उन पर घर में रहने को भी दबाव डाला जा रहा था। घर की ठोस दीवारों के अंदर घुसती हुई बाहरी दुनिया पुरुष के आधिपत्य की दुनिया में डर और तनाव पैदा कर रही थी। इसके टूटते पारिवारिक बंधनों की जगह अब सैद्धांतिक नियंत्रण ले रहे थे। पुरुषों द्वारा लाए गए 'औरत की जगह' के सिद्धांत को कई औरतों ने स्वीकार किया।

आर्थिक विकास के साथ यांत्रिक कार्यों और व्यापार में पुरुष मुख्य भूमिका अदा करने लगे और आक्रामकता क्रमशः एक पुरुष चरित्र के रूप में पारिभाषित होने लगी। औरतों को शायद अधिकाधिक संख्या में खतरनाक बाहरी दुनिया में आने की वजह से शांत रहने को कहा गया। हालांकि धनी औऱ मध्य वर्ग के लोगों के लिए कपड़ों के स्टाइल विकसित हो रहे थे, पर जैसा कि हमेशा होता है, गरीबों पर भी स्टाइल का आतंक था - फ़ैशनों में औरतों के भारी कपड़े, कोर्सेट और पेटीकोट आदि उनको सक्रिय दुनिया से अलग रखने के लिए ही विकसित हुए।

हालांकि औरतों की स्थिति अधिकाधिक अनिश्चित होती रही, फिर भी चर्च, स्कूल और परिवार में औरतों को अपनी जगह में बांधे रखने के लिए कुछ सिद्धांतों का विकास ज़रूरी हो गया। बार्बरा वेल्टर ने ('डिमिटि कन्विक्शंस') में लिखा है कि सन् 1820 के बाद 'सही औरत का प्रपंच' और अधिक होता गया। औरत के लिए सच्चरित्र होना ज़रुरी था। 'द लेडीज़ रिपॉज़िटरी' में एक पुरुष ने लिखा, "औरत की बुनियादी ज़रूरत धर्म है, क्योंकि उससे अपनी अधीनता के समुचित आत्म-सम्मान उसे मिलता है।" अपनी पुस्तक 'वुमन, इन हर सोशल ऐंड डॉमेस्टिक कैरेक्टर' (औरत : सामाजिक व पारिवारिक विशिष्टताएँ) में श्रीमती जॉन सैंडफ़र्ड ने लिखा, "धर्म औरत की बुनियादी ज़रूरत है। इसके बिना वह हमेशा अशांत और दुखी होगी।"

यौन पवित्रता को नारी की विशिष्टता माना गया। ऐसा माना जाने लगा कि पुरुष अपने जैविक स्वभाव से ही व्यभिचारी है, पर एक औरत को कभी भी झुकना नहीं चाहिए। एक पुरुष ने लिखा, "अगर तुम ऐसा करो तो अपन अल्प-जिज्ञासा, मूर्खता, छलना और अवांछित वेश्यावृत्ति में रोने के अलावा और कुछ न बचेगा।" किसी औरत ने लिखा कि "अत्यधिक उत्साही और असावधान" औरतें मुसीबत में फँसेंगी।

किशोन वय से ही संकीर्ण भूमिकाओं में बंधन शुरू हो जाता था। आज्ञाकारिता की शिक्षा लड़की को पहले ही उचित साथी के प्रति समर्पण से लिए तैयार कर देती थी। बार्बरा वेल्टर ने इसका वर्णन किया है -

"इस अनुमान के दो पहलू हैं : अमरीकी औरत में प्यार करने लायक विशिष्टता असीम थी और वह इतनी ही उत्तेजक थी कि एक कमरे में उसके साथ कोई स्वस्थ पुरुष खुद को नियंत्रित नहीं रख सकता था और वही लड़की अपने परिवार के कवच से 'निकलती हुई' दिशाहीन स्नेह और नाज़ुक भावनाओं से इस तरह लबालब भरी थी कि पहले ही मर्द को देखते ही वह प्रेम में डूब जाती थी। किशोर वय की बसंत की रात के सपने से वह जागती और परिवार और समाज की ज़िम्मेदारी बनती कि उसकी आँखें उचित वर पर पड़ें, न कि किसी भी गधे के सिर वाले भांड पर। अपनी इस ज़िम्मेदारी को वे (वर्ग या लिंग-भेद पर आधारित) स्कूल, नृत्यशालाओं, यात्राओं और अन्य बाहरी नियंत्रणों के सीमित कायदों से पूरा करतीं थीं। अपेक्षा यह थी कि वे आज्ञाकारिता के भीतरी नियंत्रण को प्रस्तुत करें। इन दो पहलूओं से एक किस्म की सामाजिक पवित्रता का बंधन तैयार होता था जो किशोर वय के पूरे होने पर वैवाहिक साथी के न आने तक टूटता न था।"

जब सन् 1851 में अमीलिया ब्लूमर ने अपने नारीवादी प्रकाशन में यह लिखा कि पारंपरिक कपड़ों की जकड़ से छूटकर औरतें एक किस्म की छोटी स्कर्ट और पैंट पहनें, तो आम औरतों की पत्र-पत्रिकाओं में इसकी आलोचना हुई। एक कहानी में एक लड़की 'ब्लूमर' कपड़ों की शौकीन दिखाई गई, पर उसके प्रोफेसर ने इस तरह उसे डांटा, "यह सब इन दिनों व्याप्त समाजवाद और कृषि-मामलों में उग्रवादी रवैयों का एक और रूप है।"

सन् 1830 में प्रकाशित 'द यंग लेडीज़ बुक' (युवतियों की पत्रिका) में देखिए, "... पालने से कब्र तक, जीवन की किसी भी अवस्था में औरत से आज्ञाकारिता और अनुशासन, नम्र स्वभाव, नम्र मस्तिष्क अपेक्षित हैं।" सन् 1850 में 'ग्रीनवुड लीव्स' (ग्रीनवुड की पत्तियाँ) में एक औरत ने लिखा : "औरत की सच्ची मेधा उसके नम्र, सशंक और किसी पर पूरी तरह निर्भर होने के निरंतर बचपने में है।" 'रिफ़्लेक्शंस ऑफ़ अ सदर्न मेट्रन' (एक दक्षिणी धाय की स्मृतियाँ) में : "अगर उसकी कोई आदत मुझे बुरी लगी, मैंने इस बारे में नम्रता से एक या दो बार कहा, फिर चुपचाप इसे सहा।" औरतों को 'दांपत्य व घरेलू सुख के नियम' बतलाते हुए एक किताब का अंतिम वाक्य था, "बहुत अधिक अपेक्षाएँ नहीं होनी चाहिए।"

औरत का काम घर में हँसी-खुशी रहना, धर्म मानना, नर्स, रसोई, सफ़ाई, सिलाई का काम और बागबानी करना था। औरतों का अधिक पढ़ना अनुचित कहा गया और कुछ किताबों से दूर रहने की सलाह दी गई। 1830 की दशक में जब सुधारक हैरिएट मार्टिनो की किताब 'सोसायटी इन अमरीका' (अमरीकी समाज) आई, एक समीक्षक ने लिखा कि इसे औरतों से दूर रखा जाए। "ऐसी किताबें पढ़कर वे अपनी सही स्थिति और उद्देश्यों से दूर हटेंगी और दुनिया फिर अस्थिरता में धकेली जाएगी।"

 

दिल लगाई और सताई - 5

दिल लगाई और सताई - 4

दिल लगाई और सताई - 3

दिल लगाई और सताई - 2

दिल लगाई और सताई - 1


 


लेखक विषय संवाद साभार अनुवादक

पहले वो आए साम्यवादियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं साम्यवादी नहीं था

 

फिर वो आए मजदूर संघियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं मजदूर संघी नहीं था

 

फिर वो यहूदियों के लिए आए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं यहूदी नहीं था

 

फिर वो आए मेरे लिए

और तब तक बोलने के लिए कोई बचा ही नहीं था

 

मार्टिन नीमोलर (1892-1984)