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दिल लगाई और सताई - 4

हावर्ड ज़िन

[हावर्ड ज़िन रचित 'ए पीपुल्स हिस्टरी ऑफ़ द यूनाइटेड स्टेट्स' (संयुक्त राज्य का जनवादी इतिहास) के छठे अध्याय 'द इंटिमेटली आप्रेस्ड' के अनुवाद का चौथा भाग। अनुवादक: लाल्टू]

अट्ठारहवीं सदी में लंदन की एक लोकप्रिय 'पॉकेट बुक' अमरीकी उपनिवेशों में भारी तादाद में पढ़ी गई। इसका शीर्षक था 'एक पुत्री को सलाह'।

"पहले नींव डालना ज़रूरी है। भिन्न लिंगों में असमानता होने से और दुनिया को अधिक संपन्न बनाने के लिए कानून बनाने वाले पुरुषों को तर्क-शक्ति अधिक मिली, इससे औरतों को अपने लिए तय किए गए कर्तव्यों को पालन करने की आवश्यक तैयारी का बेहतर मौका मिला ,,, तुम्हारी लिंग जाति को अपने आचरण के लिए हमारी तार्किकता की ज़रुरत थी, अपनी रक्षा के लिए हमारी ताकत की और हमें तुम्हारी कोमलता की और तुमसे मनोरंजन की ..."

यह कमाल है कि ऐसी प्रभावी शिक्षा के खिलाफ भी औरतें विद्रोह कर बैठीं। विद्रोही नारियों को हमेशा खास कमज़ोरियों का सामना करना पड़ा है : इन्हें अपने मालिकों की आँखों के सामने हर रोज़ जीना पड़ता है; घर-गृहस्थी में उन्हें अलग रखा जाता है। इस तरह दूसरी किस्म की शोषित श्रेणियों के विद्रोहियों को मिलती ताकत से स्रोत, हर दिन की दोस्ती, से वे वंचित होती हैं।

ऐन हचिंसन तेरह बच्चों की माँ थी, एक धार्मिक महिला थी और जड़ी-बूटियों से चिकिस्ता करने में माहिर थी। मैसाचुसेट्स खाड़ी की बस्ती में उसने चर्च पिताओं का यह कहकर विद्रोह किया कि वह और दूसरे कई साधारण व्यक्ति अपने-आप बाइबल की व्याख्या कर सकते हैं। वह अच्छी वक्ता थी। उसने कई सभाएँ कीं; जिनमें अधिकाधिक औरतें आने लगीं (और कुछ मर्द भी)। शीघ्र ही बॉस्टन शहर के उसके घर में साठेक या अधिक लोगों के समूह स्थानीय पादरियों के खिलाफ उसकी आलोचना सुनने इकट्ठे होने लगे। गवर्नर जॉन विंथ्राप ने इस तरह उसका विवरण दिया है, "नकचढ़ी और डरावने स्वभाव की, हाज़िर-जवाब और उत्तेजक, बातूनी और पुरुष से भी अधिक दुस्साहसी, हालांकि समझदारी और निर्णय लेने में कई औरतों की अपेक्षा घटिया एक औरत।"

दो बार ऐन हचिंसन की सुनवाई हुई। चर्च द्वारा विधर्मिता के लिए और सरकार द्वारा आज्ञाखिलाफी के लिए। आम सुनवाई के वक्त वह गर्भवती और बीमार थी, पर जब तक वह बेहोशी की हालत में न पहुँची, उसे बैठने की आज्ञा न दी गई। धार्मिक सुनवाई में कई हफ़्तों तक उससे सवाल पूछे गए और वह फिर बीमार पड़ गई। पर बाइबल की जानकारी और अद्भुत वाक्प्रतिभा के बल पर उसने सवाल पूछने वालों को ललकारा। अंततः जब उसने लिख कर पश्चाताप न किया, वे संतुष्ट न हुए। उनका कहना था : "उसकी शक्ल में पश्चाताप का चिह्न नहीं है।"

उसे उपनिवेश से निकाल दिया गया। सन् 1638 में जब वह रोड आइलैंड राज्य के लिए चली, उसके साथ पैंतीस और परिवार थे। फिर वह लौंग आइलैंड के समुद्री किनारों पर आई तो अपनी ज़मीन खो चुके इंडियन लोगों ने उसे अपना दुश्मन माना। उन्होंने उसे और उसके परिवार को मार डाला। बीस साल बाद, मैसाचुसेट्स खाड़ी के इलाके में उसकी सुनवाई के दौरान उसके पक्ष में बोलने वाले सिर्फ़ मेरी डायर और दो अन्य क्वेकर (समाज-सुधारक संगठन - अनुवादक) बंधु थे, जिन्हें उपनिवेशी सरकार ने फांसी चढ़ाई। इल्ज़ाम था - "विद्रोह, देशद्रोह और आत्मालाप में लिप्त होना।"

सार्वजनिक मामलों में औरतों की भागीदारी कम ही रही हालांकि दक्षिणी और पश्चिमी सरहदों पर परिस्थितियाँ कभी-कभी इसके अनुकूल थीं। जूलिया स्प्रूइल ने जॉर्जिया राज्य के पुराने दस्तावेज़ों में इंडियन माँ और अंग्रेज़ पिता से जन्मी मेरी मसग्रोव मैथ्यूज़ की कहानी पढ़ी, जो क्रीक भाषा बोलती थी और इंडियन मामलात में जॉर्जिया के गवर्नर जेम्स ओगलयार्प की सलाहकार बनी। स्प्रूइल के अनुसार जैसे-जैसे समूह स्थायी रूप से बसते गए, सार्वजनिक मामलों से औरतों को और भी अलग कर दिया गया और औरतें भी पहले की तुलना में अधिक दब्बू होती गईं। देखिए एक दरख़्वास्त : "यह स्त्री जाति का धर्म नहीं है कि हम शासकीय नीति के खिलाफ गहराई से सोचें।"

वैसे स्प्रूइल के अनुसार, आज़ादी की लड़ाई के दौरान, जंग की ज़रूरतों से औरतें सार्वजनिक मामलों से जुड़ने को मज़बूर हुईं। औरतों ने देशभक्त गुट बनाए, ब्रिटिश विरोधी खुराफ़ातें कीं, आज़ादी के लिए लेख लिखे। चाय की कीमतें बेहद बढ़ाने वाले ब्रिटिश चायकर के खिलाफ लोगों में प्रचार किया। ब्रिटिश सामानों का बॉयकॉट कर औरतों को अपने कपड़े खुद बनाने का संदेश देने और स्वदेशी सामान का उपयोग करने के लिए 'आज़ादी की बेटियाँ' समूह बनाए। सन् 1777 में बॉस्टन टी पार्टी जैसी एक नारी-समूह की 'कॉफ़ी पार्टी' हुई, जिसके बारे में ऐब्रिगेल ऐडम्स ने अपने पति जॉन को लिखा -

"एक प्रसिद्ध, धनी, कंजूस व्यापारी (अविवाहित) की दुकान में कॉफ़ी का ढेर था, जिसे वह छः शिलिंग प्रति पाउंड की दर से कमेटी को बेचने से इन्कार करता रहा। करीब सौ या अधिक औरतें एक ठेला और कुछेक संदूक लेकर गोदाम पहुँचीं और उससे चाभियाँ मांगीं, और उसने नहीं दीं। इस पर एक ने उसे गर्दन पकड़ ठेले में उछाला। जब उसे कोई उपाय न सूझा, उसने चाभियाँ दे दीं। तब ठेला उलटकर उन्होंने उसे भगाया और गोदाम खोल डाला। सारी कॉफ़ी खुद निकाली, संदूकों में डालकर चल पड़ीं ... पूरी घटना को मर्दों की एक भीड़ खड़ी अचंभे में देखती रही।"

 

दिल लगाई और सताई - 3

दिल लगाई और सताई - 2

दिल लगाई और सताई - 1


 


लेखक विषय संवाद साभार अनुवादक

पहले वो आए साम्यवादियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं साम्यवादी नहीं था

 

फिर वो आए मजदूर संघियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं मजदूर संघी नहीं था

 

फिर वो यहूदियों के लिए आए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं यहूदी नहीं था

 

फिर वो आए मेरे लिए

और तब तक बोलने के लिए कोई बचा ही नहीं था

 

मार्टिन नीमोलर (1892-1984)