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दिल लगाई और सताई - 3

हावर्ड ज़िन

[हावर्ड ज़िन रचित 'ए पीपुल्स हिस्टरी ऑफ़ द यूनाइटेड स्टेट्स' (संयुक्त राज्य का जनवादी इतिहास) के छठे अध्याय 'द इंटिमेटली आप्रेस्ड' के अनुवाद का तीसरा भाग। अनुवादक: लाल्टू]

पर ईसाई शिक्षाओं से प्रभावित बस्ती बसाने वालों द्वारा इंग्लैंड से लाए गए विचारों का बोझ सभी औरतों पर था। 'नारी-अधिकारों के कानून' नामक सन् 1632 के एक दस्तावेज़ पर अंग्रेज़ी कानून का सारांश इस तरह था -

"... विवाह का बंधन इकट्ठे बंधने की प्रक्रिया है। पुरुष और नारी एक-समान हैं, पर यह जानना ज़रूरी है कि वे कितने समान हैं। जब एक नाला एक बड़ी नदी में गिरता है तो उसका (नाले का) नाम कोई महत्व नहीं रखता ... शादी होते ही औरत ढंक जाती है ... उसका बहाव खो जाता है। शादीशुदा औरत को हम यही कहेंगे कि उसका नया अस्तित्व उससे बड़ा, उसका साथी, उसका स्वामी है।"

उपनिवेश-काल में नारी की कानूनी सत्ता पर लिखते हुए जूलिया स्प्रूइल ने लिखा है, "पत्नी पर पति का नियंत्रण यहाँ तक मान्य था कि वह उसे (पत्नी को) ताड़ना दे सके ... पर पत्नी को स्थायी रूप से चोट पहुँचाने या हत्या करने का अधिकार उसे नहीं था। ..."

संपत्ति के बारे में : "पत्नी की निजी संपत्ति पर संपूर्ण मालिकाना हक और उसकी ज़मीनों पर आजीवन हक के अलावा भी उसकी किसी भी दूसरी किस्म की आय को पति ले लेता था। उसकी मेहनत की (घर के बाहर) कमाई भी वह लेता था ... अगर वे दोनों कुछ कमाते तो स्वाभाविक रूप से वह पति के ही पास जाता था।"

कुँवारी लड़की का बच्चा पैदा होना अपराध माना जाता था; 'दोगले' आचरण के लिए लाई गई औरतों के मामलात से उपनिवेश-काल की कचहरी के दस्तावेज़ भरे पड़े हैं, जबकि बच्चे के पिता को कानून छूता भी नहीं था और उसे खुली छूट थी।

सन् 1747 में न्यू इंग्लैंड क्षेत्र में बॉस्टन शहर के पास कनेटीकट प्रांत की एक न्यायिक अदालत में पाँचवीं दफ़ा एक दोगले बच्चे को जन्म देने के अपराध में लाई गई किसी 'सुश्री पोली बेकर' का भाषण एक उपनिवेशी पत्रिका में इस तरह छपा -

"माननीय बेंच [न्यायाधीशों की समिति - अनुवादक] से यह प्रार्थना है कि मुझे दो शब्द कहने का मौका दिया जाए। मैं एक गरीब दुखियारी हूँ, मेरे पास पैरवी के लिए वकील को देने के पैसे नहीं हैं ... साहिबान, यह पाँचवीं दफ़ा मुझे एक ही वजह से खींच कर आपके पास लाया गया है; दो बार मैंने भारी जुर्माना चुकाया है, दो बार सार्वजनिक रूप से मुझे सज़ा दी गई, क्योंकि जुर्माना भरने के पैसे मेरे पास न थे। बेशक यह कानूनी कार्रवाई थी, पर चूंंकि कभी-कभी कानून गलत माने जाते हैं और उनमें संशोधन किया जाता है या कुछ कानून खास परिस्थितियों में व्यक्ति को अत्यधिक कष्ट देते हैं ... मैं यह कहने की छूट चाहूंगी कि जिस कानून के ज़रिये मुझे दंडित किया गया है, वह अनुचित है और मुझ पर खास तौर से सख्त है ... इस कानून से मुझे यह पता नहीं चल रहा ... कि मेरा अपराध क्या है। मैंने जान से खेलकर पाँच बच्चों को जीवन दिया है। अगर इस तरह से भारी आरोपों से दंडित होकर जुर्माना न देना पड़ा होता, तो उनका लालन-पालन और भी अच्छा होता ..."

"आखिर ऐसी गरीब औरतें क्या करें, जो परंपरा और स्वभाव से मर्दों के पीछे दौड़ने में असफल हैं और जो पति चुनकर जबरन उन पर खुद को थोप नहीं सकतीं और जिनको कानून कोई पति नहीं देता और फिर भी अपने प्राकृतिक गुणों को जीने पर उन्हें दंड दिया जाता है ..."

"... इस खातिर मैंने सामाजिक मर्यादा की हानि का खतरा उठाया है और बार-बार मुझे लोगों की भर्त्सना और दंड मिले हैं - मेरी प्रार्थना है कि मुझे सज़ा न दी जाए, बल्कि मेरे नाम पर एक मूर्ति बनाई जाए।"

अमेरिका और इंग्लैंड की एक प्रसिद्ध पत्रिका 'द स्पेक्टेटर' में परिवार में पिता की स्थिति पर ऐसी टिप्पणी छपी : "मानव-मस्तिष्क के लिए हुकूमत और आधिपत्य से अधिक सुखदायी और कुछ नहीं है, और ,,, एक परिवार में पिता होते हुए ,,, मेरा काम अधिकतर आदेश देना होता है .., संक्षेप में, महोदय, मुझे अपना परिवार एक पितृसत्तामूलक सार्वभौमिक इकाई दिखती है, जिसमें मैं ही राजा और पुरोहित दोनों हूँ।"

(यह पढ़कर) इसमें कोई आश्चर्य नहीं होता कि रूढ़िवादी न्यू इंग्लैंड क्षेत्र में औरतों पर ऐसा ही शासन होता रहा। एक बढ़ई के काम के खिलाफ शिकायत कि हिमाकर करने वाली एक औरत के मामले की सुनवाई पर बॉस्टन शहर के प्रभावशाली पादरी रेवरेंड जॉन कॉटन ने कहा : "... यह मिथ्या नीति है कि पति पत्नी की बात माने और पत्नी पति की नहीं। ईश्वर ने औरतों के लिए कानून बनाया है : पत्नियों, हमेशा अपने पतियों की आज्ञा मानो।"

 

दिल लगाई और सताई - 2

दिल लगाई और सताई - 1


 


लेखक विषय संवाद साभार अनुवादक

पहले वो आए साम्यवादियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं साम्यवादी नहीं था

 

फिर वो आए मजदूर संघियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं मजदूर संघी नहीं था

 

फिर वो यहूदियों के लिए आए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं यहूदी नहीं था

 

फिर वो आए मेरे लिए

और तब तक बोलने के लिए कोई बचा ही नहीं था

 

मार्टिन नीमोलर (1892-1984)