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दिल लगाई और सताई - 2

हावर्ड ज़िन

[हावर्ड ज़िन रचित 'ए पीपुल्स हिस्टरी ऑफ़ द यूनाइटेड स्टेट्स' (संयुक्त राज्य का जनवादी इतिहास) के छठे अध्याय 'द इंटिमेटली आप्रेस्ड' के अनुवाद का दूसरा भाग। अनुवादक: लाल्टू]

[इन इंडियनों में] औरतों को पुरुषों के समकक्ष माना जाता था यह कहना अतिशयोक्ति होगी - पर उन्हें आदर और सम्मान दिया जाता था और कुटुंब-संरचना के सामाजिक ढांचे में उनका महत्वपूर्ण स्थान था।

जिन अवस्थाओं में गोरे लोग अमरीका में आकर बसे, उनसे औरतों के लिए कई किस्म की परिस्थितियाँ उठ खड़ी हुईं। जहाँ भी पहली बस्तियाँ (गोरों की) संपूर्णतः पुरुषों की ही थीं, औरतों को काम-दासियों, बच्चे पैदा करने वालियों या साथ देने वालियों की तरह लाया गया। सन् 1619 में, जिस साल वर्जीनिया प्रांत में पहले काले गुलाम आए, नब्बे औरतें इकट्ठी एक जहाज़ पर जेम्सटाउन में आईं : "समझदार, युवा और क्वांरी ... अपनी सहमति से बस्ती के लोगों की पत्नियाँ बन बिकीं, ताकि उनकी यात्रा का खर्च अदा हो सके।"

शुरुआत के उन वर्षों में कई औरतें, प्रायः किशोरी लड़कियाँ - बंधुआ मज़दूर बन कर आईं। उनकी ज़िंदगी गुलामों से बहुत अलग नहीं थी। सिर्फ़ इतना था कि उनका दासत्व एक अवधि के बाद खत्म हो जाता था। अपने स्वामियों और स्वामिनियों के प्रति वफ़ादार होने को वे बाध्य थीं। 'अमेरिका की कामगार औरतें' (बैक्सनडाल, गॉर्डन और रेव्हरवाई) में लेखक इस तरह लिखते हैं -

"उनकी तनख्वाहें बहुत कम थीं और उनके साथ अक्सर बुरा और क्रूर व्यवहार होता था; उन्हें अच्छा खाना नहीं मिलता था और उनकी कोई निजी ज़िंदगी न थी। ऐसी भयंकर हालतों की वजह से विद्रोह होना स्वाभाविक था। अलग-अलग परिवारों में रहते हुए और अपनी जैसी हालत में दूसरों के साथ कम संपर्क होने से बंधुआ नौकरों के पास विरोध का एक प्राथमिक उपाय था : शांत असहयोग - कम से कम काम करने की कोशिश और अपने मालिकों के लिए अड़ंगे पैदा करने की कोशिश, बेशक मालिक-मालकिन उनके तरीकों की व्याख्या अलग ढंग से करते थे और अपने नौकरों के अड़ियल आचरण को आलस, मूर्खता और बदमाशी कहते थे।"

उदाहरणतः कनेटीकट की आम अदालत ने सन् 1645 में आदेश दिया कि किसी "सूज़न सी. को, अपनी मालकिन के प्रति विद्रोही भाव से पेश आने के कारण, सुधार-गृह* में भेजा जाए और कड़ी मेहनत करवाई जाए। अगले भाषण-दिवस पर उसे पेश किया जाए और आम जनता से सामने उसका सुधार किया जाए। ऐसा हर हफ़्ते तब तक किया जाए, जब तक इसके विपरीत आदेश न दिया जाए।"

* हाउस ऑफ़ करेक्शन - ऐसे अपराधियों को जिनका अपराध भारी न हो (खास तौर पर बच्चों और औरतों को) ऐसे आश्रमों में रखा जाता है, जहाँ नियमों का पालन करते हुए और आश्रम से बाहर निकलने की आज़ादी के बिना रहना पड़ता है।

मालिकों द्वारा नौकरों (नौकरानियों) का यौन-शोषण आम बात बन गई थी। वर्जीनिया एवं अन्य औपनिवेशिक प्रांतों की अदालतों के बयानों से यह पता चलता है कि कई मालिकों को ऐसे अपराध के लिए अदालत का मुँह देखना पड़ा। ये मुकद्दमें ऐसे रहे होंगे जिनमें मालिकों के कृत्य बहुत ही घृणित रहे, अन्यथा कई घटनाओं को आम आदमी की आँखों तक आने का मौका ही नहीं मिला।

सन् 1756 में ऐलिज़ाबेथ स्प्रिंग्स ने अपनी नौकरी के बारे में अपने पिता को बहुत दुःख भरा खत लिखा -

"हम अभागे अंग्रेज़ यहाँ जिस पीड़ा में जी रहे हैं, तुम लोग इंग्लैंड में बैठ कर वह सोच भी नहीं सकते। इतना ही कहूँ कि ... रात-दिन मेहनत करनी पड़ती है, प्रायः घोड़ों के साथ जुतना पड़ता है ... बांध कर चाबुक से पीटा जाता है ... इंडियनों का उगाया मक्का और नमक के अलावा कुछ खाने को नहीं मिलता; साथ ही यह ताने सुनने पड़ते हैं कि कई नीग्रो हमसे बेहतर काम करते हैं। पहनने को जूते या मोज़े नहीं हैं ..."

काले मर्दों के अमरीका लाए जाने के बारे में जितनी भी भयावह कल्पना की जा सकती है, काली औरतों की सच्चाई उससे कई गुना अधिक थी। आने वाले दासों में प्रायः एक तिहाई औरतें होती थीं। दास-व्यापारियों के अनुसार -

"मैंने लाशों से बंधी औरतों को बच्चे जनते देखा है; इन लाशों को हमारे पियक्कड़ ओवरसियर ने हटाया नहीं था ... चम्मचों की तरह पैक की गई इन औरतों को अक्सर ... जलते पसीने में बच्चे जनने पड़ते थे ... जहाज़ की डेक पर  एक जवान नीग्रो औरत बंधी थी; जहाज़ पर चढ़ते ही कुछ देर बाद वह बेहोश हो गई थी।"

किंडा ब्रेंट नाम की एक भगोड़ी दासी ने एक और बोझ के बारे में बतलाया है -

"अब मैं पंद्रह साल की हो गई - एक गुलाम लड़की के लिए यह एक दुःखी दौर है। मेरे मालिक ने मेरे कानों में गंदी बातें कहना शुरु किया। हालांकि मेरी उम्र कम थी, पर उसकी बातों के मतलब से मैं नावाकिफ न थी ... हर मोड़ पर मेरा मालिक मुझे पकड़ता और याद दिलाता कि मैं उसकी हूँ ... वह कसम खाकर कहता कि उसकी बात मानने को वह मुझे मज़बूर करेगा ... दिन-भर की थकान के बाद ताज़ी हवा के लिए मैं बाहर जाती तो उसकी पदचाप मेरा पीछा करती। अपनी माँ की कब्र पर झुकते ही उसकी घनी छाया मेरे ऊपर आ गिरती ... मेरा दिल इन दुःखपूर्ण घटनाओं से भारी हो चला ..."

आज़ाद गोरी औरतों को, जिनको नौकर या गुलामों की तरह नहीं, बल्कि पहले आवासियों की पत्नियों की तरह लाया गया, काफ़ी कठिनाइयाँ झेलनी पड़ीं। 'मेफ़्लावर' (बसंत का फूल) नामक जहाज़ में अट्ठारह शादीशुदा औरतें आईं। तीन गर्भवती थीं और एक ने उतरने से पहले ही एक मरा बच्चा जन्मा। गर्भ और बीमारियों से औरतें पीड़ित रहीं। बसंत आने तक अट्ठारह में से केवल चार ज़िंदा रहीं।

जो जीवित रह जातीं, जंगल में मर्दों के साथ ज़िंदगियाँ बितातीं। उन औरतों को अक्सर विशेष सम्मान मिलता क्योंकि उनकी बुरी तरह ज़रूरत थी। मर्दों की मौत होने पर औरतें अक्सर उनका काम संभालतीं। पहले एक सौ साल के दौरान अमेरिकी सरहद पर औरतें मर्दों के साथ समानता पाने के बहुत करीब लगती थीं।

 

दिल लगाई और सताई - 1



 


लेखक विषय संवाद साभार अनुवादक

पहले वो आए साम्यवादियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं साम्यवादी नहीं था

 

फिर वो आए मजदूर संघियों के लिए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं मजदूर संघी नहीं था

 

फिर वो यहूदियों के लिए आए

और मैं चुप रहा क्योंकि मैं यहूदी नहीं था

 

फिर वो आए मेरे लिए

और तब तक बोलने के लिए कोई बचा ही नहीं था

 

मार्टिन नीमोलर (1892-1984)